जेएनयू और बीएचयू का देश की शिक्षा व्यवस्था में अहम योगदान रहा है. राजनीतिक विचारधारा की लड़ाई में दोनो ही विश्वविद्यालय पिस रहे है. विचारधारा की राजनीति अब ओछी बयानबाजी पर उतर आई है. जहां भगवा समर्थक जेएनयू को ‘सेक्स का अड्डा’ बता रहे है वही बीएचयू में भाषा को धर्म से जोडकर संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के सहायक प्रोफेसर डाक्टर फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध किया जा रहा है. पूरा समाज धर्म के आधार पर विभाजन रेखा पर खड़ा है. धार्मिक विभाजन वोट बैंक की राजनीति लिये भले ही मुफीद हो पर समाज के विकास की दिशा में किसी हालत में उचित नहीं माहौल नहीं है.

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