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इंजीनियर बनकर भी हैं बेरोजगार

Engineering Jobs Crisis: इंजीनियरिंग को देश की प्रगति का हिस्सा माना जाता है. अगर देश में इंजीनियर बडी संख्या में बेरोजगार हो तो देश की प्रगति का अंदाजा लगाया जा सकता है. यह हालत उस समय काल में है जब यह कहा जाता है कि देश विश्व गुरू बनने की दिशा में सबसे आगे है. बिना इंजीनियरिंग सेक्टर के देश विश्व गुरू कैसे बनेगा यह सोचने वाली बात है.

नोटबंदी, जीएसटी, कोरोना और केन्द्र सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण कांस्ट्रैशन, आईटी, कंप्यूटर, और आटोमोबाइल सेक्टर बुरी तरह से प्रभावित हुये. इनके प्रभावित होने का सबसे बडा प्रभाव इंजीनियरिंग सेक्टर पर पडा. इंजीनियरिंग करने के बाद भी छात्रों को नौकरियां नहीं मिल रही. सेलरी का पैकेज कम हो गया. जिसकी वजह से जौब और सैलरी पैकेज के लिहाज से हौट केक कहा जाने वाला इंजीनियरिंग सेक्टर अब अपने सबसे बुरे दौर में पहंुच गया है. 7 सालों में बी.टेक की 51 फीसदी सीटें खाली रह गई. पढेलिखे इंजीनियर अब सरकारी चपरासी बनने की होड मेें आवेदन करने लगे है.

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हर मां बाप की एक इच्छा होती थी कि उसका बेटा पढलिख कर आईएएस, डाक्टर या इजीनियर बने. अगर बेटा है तो इंजीनियर और अगर बेटी है तो डाक्टर बने. आईएएस बनने में लंबा समय लगता था. डाक्टर बनने में भी एमबीबीएस के बाद एमडी और दूसरे कोर्स करने के बाद ही अच्छे डाक्टर बन सकते थे. ऐसे में सबसे अच्छा इंजीनियर बनना होता था. 12 वीं पास करने के बाद 4 साल का बी.टेक करने के बाद अच्छी नौकरी मिल जाती थी. कम से कम 8 से 10 लाख का सालाना पैकेज मिल जाता था. ऐसे में इंजीनियर बनना ही समझदारी मानी जाती थी.

इंजीनियरिंग पढने वालों की संख्या बढने लगी तो इंजीनियरिग पढाने वाले कालेज पूरे देश में कुकरमुत्ते की तरह से उग आये. जिन बच्चों को आईआईटी और एमएनआईटी जैसे कालेजों में एडमिशन नहीं मिलता था तो वह प्राइवेट कालेजों में पढाई करके इंजीनियर बनने लगे. प्राइवेट कालेजो में 4 साल की पढाई में 8 लाख से लेकर 12 लाख तक का खर्च आने लगा. इतने पैसों का इंतजाम बहुत सारे पैरेंटस करने लगे. पैरेंटस को लगता था कि एक दो साल की सैलरी में पूरी पढाई का खर्च निकल आता है.

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सरकारी चपरासी से भी कम हो गया वेतन :
2014-15 के बाद इंजीनियरिंग की जौब में गिरावट शुरू होने लगी. इंजीनियरिंग में सबसे अधिक जौब कांस्ट्रैशन सेक्टर, आईटी सेक्टर, कंप्यूटर सेक्टर और आटोमोबाइल सेक्टर में थी. इन सभी सेक्टर में गिरावट के कारण इंजीनियरिंग की जौब संकट के दौर में आ गई है. इसके कारण इंजीनियर की पढाई पूरी करने के बाद भी जौब नहीं मिल रही. जो जौब मिल रही है उसमें भी सेलरी का पैकेज 3 लाख का आ गया है.

इंजीनियरिंग के मुकाबले ग्रेजुएट करके दो साल बीएड करने के बाद अगर बच्चा टीईटी टीचर्स इंजीबिल्टी टेस्ट पास स्कूल टीचर्स बन सकते है. जहां सरकारी टीचर्स बनने पर 50 हजार को मासिक वेतन मिलने लगता है. वहां प्रमोशन भी होते है जौब सुरक्षा की भी गारंटी होती है. इसकी पढाई में खर्च कम आता है. बीएड की दो साल की पढाई में 50 हजार से 1 लाख तक का खर्च आता है. ऐसे में अब इंजीनियर बनकर भी बेरोजगार युवाओं की संख्या बढती जा रही है. ऐसे में यह बेरोजगार इंजीनियर सरकारी चपरासी की नौकरी के लिये भी आवेदन करने में पीछे नहीं रह रहे है.

बढती बेरोजगारी से बंद होने लगे कालेज :
इंजीनियरिंग के बाद भी रोजगार न मिलने की गारंटी के चलते इसके प्रति छात्रो का क्रेज घट रहा है. इसी वजह से इसकी सीटें दशक के सबसे निचले स्तर तक लुढ़क गई हैं. 2015-16 से लगातार इंजीनियरिंग कॉलेज बंद होने के लिए आवेदन कर रहे हैं. इंजीनियरिंग सीटें भी कम हो रही हैं. ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन के आंकडों के मुताबिक अब देश भर में अंडरग्रेजुएट, पोस्टग्रेजुएट और डिप्लोमा लेवल की इंजीनियरिंग सीटें घटकर 23.28 लाख रह गई हैं. इस गिरावट के चलते 1.46 लाख सीटें कम हुई हैं.

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टैक्निकल एजूकेशन में को बढावा देने के लिये सरकार ने इसमें इंजीनियरिंग के साथ ही साथ ऑर्किटेक्चर, मैनेजमेंट, होटल मैनेजमेंट और फार्मेसी को भी शामिल कर लिया गया है. बीटेक की सबसे ज्यादा सीटें अभी है. 80 फीसदी सीटें इंजीनियरिंग की हैं. कमजोर इंफ्राटैक्चर, लैब्स व फैकल्टी की कमी के कारण कालेज अच्छी पढाई नहीं करा पा रहे है. जिसकी वजह से अच्छे इंजीनियर भी नहीं तैयार हो पा रहे. विदेशो में भी इनको जौब नहीं मिल पा रही.

बंद हो रहे ज्यादा खुल रहे कम
2014-15 में देश भर के एआईसीटीई से स्वीकृत कालेजो में करीब 32 लाख इंजीनियरिंग सीटें थीं. इंजीनियरिंग को लेकर घटते क्रेज के चलते करीब सात साल पहले कई इंजीनियरिंग कॉलेजों को बंद हो गये. 6 सौ से अधिक इंजीनियरिंग कालेज बंद हो गये. कोरोना महामारी के चलते 2015-16 से लेकर हर साल कम से कम 50 इंजीनियरिंग संस्थान बंद हुए हैं. इस साल भी 63 संस्थानों को बंद करने की एआईसीटीई से मंजूरी मिल गई. 2016-17 में देश भर के 3291 इंजीनियरिंग कॉलेजों में 15.5 लाख बीटेक की 51 फीसदी खाली रह गई. देश भर में नए इंजीनियरिंग कॉलेजों खुलने के आंकडे देखे जाये तो पांच साल में सबसे कम कालेज खुले है. एआईसीटीई ने 2019 में 2020-21 में 54 नए इंजीनियरिंग कालेजो को ही मंजूरी दी है. एआईसीटीई ने 2017-18 में 143, 2018-19 में 158 और 2019-20 में 153 नए संस्थानों को मंजूरी दी थी.

इंजीनियरिंग सैक्टर को देश के निर्माण का सबसे बडा सैक्टर माना जाता है. जिस देश में इंजीनियरिंग की पढाई से छात्रों का क्रेज घटने लगे कालेज बंद होने लगे और पढे लिखे इंजीनियर सरकार चपरासी की नौकरी के लिये आवेदन करने लगे उस देश के प्रगति के बारें में अंदाजा लगाया जा सकता है. गलत सरकारी नीतियों के चलते लाखों लाख इंजीनियर बेरोजगार है. वह 3 से 4 लाख सालाना के पैकेज पर भी नौकरी करने को तैयार है. वह इंजीनियरिंग के काम के अलावा मार्केटिंग और दूसरे क्षेत्र में काम करने लगे है. Engineering Jobs Crisis

क्यों जंजाल बन जाती है बुजुर्गों की देखभाल?

Senior Citizen Issues: बात 1 जुलाई की है. रात को लगभग 11 बजे एक महंगी कार विदिशा के हरि वृद्धाश्रम में आ कर रुकी. उस में से एक सुंदर लेकिन हैरानपरेशान महिला एक बुजुर्ग को ले कर उतरी. महिला का नाम नेहा और साथ उतरे उस के पिता जिन का नाम महेश तिवारी है. भोपाल निवासी 87 वर्षीय महेश तिवारी समाज कल्याण विभाग से रिटायर्ड प्रथम श्रेणी अधिकारी हैं. उन की पैंशन ही करीब 40 हजार रुपए महीना बनती है. भोपाल के पौश शाहपुरा इलाके में उन का अपना बड़ा सा मकान है. नेहा ने वृद्धाश्रम के संचालक दंपती वेदप्रकाश शर्मा और इंदिरा शर्मा से गिड़गिड़ाते अंदाज में आग्रह किया कि उस का बेटा बीमार है जिस की देखभाल के लिए वह कुछ दिनों के लिए पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ना चाहती है. अपने हालात सामान्य होते ही वह पिता को ले जाएगी.

वेदप्रकाश शर्मा द्वारा आवश्यक पूछताछ करने पर उस ने बताया कि उस के पिता एक सामान्य वृद्ध हैं और उन्हें कोई क्रिटिकल बीमारी नहीं है. आश्रम में जगह खाली थी और इंदिरा व वेद को नेहा से हमदर्दी भी हो आई थी, इसलिए उन्होंने तुरंत औपचारिकताएं पूरी करते महेश तिवारी को भरती कर लिया. टीवी सीरियल सी कहानी लेकिन महेश तिवारी सामान्य वृद्ध नहीं निकले जैसा कि नेहा ने बताया था. वे एक हिंसक वृद्ध निकले, जिस ने देखते ही देखते इस वृद्धाश्रम की शांत जिंदगी में खासा तहलका और उपद्रव मचा दिया. शुरू के दोतीन दिन सामान्य रहने के बाद उन्होंने आश्रम के दूसरे वृद्धों को भद्दी गलियां देनी शुरू कर दीं. हद तो तब हो गई जब उन्होंने दूसरे वृद्धों सहित स्टाफ के सदस्यों की पिटाई भी करनी शुरू कर दी. वेदप्रकाश महेश तिवारी का यह रौद्र रूप देख घबरा उठे जो स्वाभाविक बात भी थी क्योंकि वे बिलकुल विक्षिप्तों जैसी हरकतें कर रहे थे. आश्रम के बुजुर्गों ने इस पर एतराज जताया और स्टाफ के 2 कर्मचारियों ने तो आश्रम आना ही बंद कर दिया.

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वेदप्रकाश ने नेहा को फोन किया और उन्हें उन के पिता की करतूतें बताईं. लेकिन नेहा उन्हें लेने नहीं आई तो उन का माथा ठनका क्योंकि हरि वृद्धाश्रम को उन्होंने 15 साल की कड़ी मेहनत व लगन से नाम और मुकाम दिया है. ऐसा पहली बार हो रहा था कि आश्रम में रह रहे बुजुर्ग इस नए मेहमान के बरताव को ले कर दहशत में आ गए थे लेकिन कहीं और वे जा नहीं सकते थे क्योंकि अब यही उन का यह आखिरी सहारा था. पिता द्वारा दूसरे बूढ़ों की कुटाई करते और गालियां बकते वीडियो भी वेदप्रकाश ने नेहा को भेजे लेकिन उस ने विदिशा आ कर पिता को वापस ले जाने से साफ इनकार कर दिया. जब उसे यह बताते दबाव बनाया गया कि ऐसे क्रिटिकल बूढ़ों को सामान्य वृद्धाश्रम में नहीं रखा जा सकता, उन के लिए विशेष प्रबंध करना होगा और यह सरासर धोखाधड़ी है, तो नेहा इस बात पर राजी हो गई कि ठीक है, आप ही पापा को भोपाल छोड़ जाइए. इस बाबत उस ने अपने घर का पता भी दे दिया. वेदप्रकाश ने सोचा कि चलो पिंड छूटा और 16 जुलाई को उन्होंने कार द्वारा आश्रम की टीम के साथ महेश तिवारी को भोपाल रवाना कर दिया. भोपाल में दिए गए पते पर यह टीम पहुंची तो घर पर ताला ?ाल रहा था. नेहा भी आधार कार्ड पर दिए अपने पते पर नहीं मिली.

अड़ोसपड़ोस में पूछताछ करने पर पता चला कि यह मकान है तो इन्हीं तिवारीजी के नाम लेकिन मुद्दत से खाली पड़ा है. उन की बेटी कहीं और रहती है. और जानकारी ली तो यह बात भी सामने आई कि इस के पहले महेश तिवारी अपने बेटे के साथ रहते थे जो अब मुंबई शिफ्ट हो गया है. नेहा ने भाई से कानूनी लड़ाई लड़ कर पिता की सेवा और संपत्ति का हक हासिल किया था. वह अविवाहित है और उस ने बच्चा गोद लिया हुआ है. आश्रम टीम अब सकते में थी क्योंकि इस महाभारत के श्रवण से उन का मकसद हल नहीं हो रहा था. थकहार कर उन्होंने शाहपुरा थाने की शरण ली और बताया कि किस तरह धोखा दे कर दिमागी तौर पर बीमार बुजुर्ग को उन के पल्ले बांध दिया गया है. लेकिन पुलिस वालों ने हाथ खड़े कर दिए कि हम इस मामले में कुछ नहीं कर सकते. इस टीम ने पुलिस वालों को यह भी बताया कि ‘मातापिता भरण पोषण कानून 2005’ के तहत वृद्ध मातापिता की देखभाल करना संतान की जिम्मेदारी है जो उन की पैंशन भी ले रही है और जायदाद का भी इस्तेमाल कर रही है.

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पर तमाम ज्ञान और दलीलें देने के बाद भी बात नहीं बनी तो यह टीम महेश तिवारी को वापस विदिशा ले गई. तिवारीजी को वापस आया देख आश्रम के बूढ़े फिर दहशत से भर उठे लेकिन असल आफत वेदप्रकाश और इंदिरा की थी जो इस हिंसक वृद्ध को न तो निगल सकते थे और न उगल सकते थे की तर्ज पर न तो रखने का जोखिम उठा सकते थे और न ही यों भगा सकते थे. यानी एक तरफ कुआं था तो दूसरी तरफ खाई थी. इन दोनों को डर इस बात का था कि कहीं इस बुजुर्ग के हाथों कुछ उलटासुलटा हो गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे. भोपाल से उन्हें यह भी पता चला था कि नेहा का अपना अलग रसूख है और उस के हाथ बहुत लंबे हैं. लेकिन कुछ तो करना ही था, इसलिए वेदप्रकाश ने भोपाल में पुलिस के आला अफसरों को अपनी परेशानी बताई तो आखिरकार 21 जुलाई को महेश तिवारी को नेहा के एक दोस्त के जरिए सुपुर्द कर भोपाल भेज दिया गया.

इस पूरी फिल्मी सी कहानी की वीडियो रिकार्डिंग कर चुके वेदप्रकाश का कहना है, ‘‘अगर हमारे आश्रम में ऐसे क्रिटिकल बूढ़ों को रखने की व्यवस्था होती तो हम जरूर उन्हें रखते और अगर वे सामान्य होते तो भी हम इस बात को हजम कर लेते कि कोई औलाद ?ाठ बोल कर पिता को हमारे यहां छोड़ गई. यह हमारे लिए कोई नई बात नहीं है पहले भी नेहा जैसी कई संतानें ऐसा कर चुकी हैं लेकिन यह मामला गंभीर था, इसलिए हम कोई रिस्क नहीं ले सकते थे.’’ परेशानियां ही परेशानियां जो वृद्ध सामान्य हैं लेकिन बातबात में दखलंदाजी कर दूसरी कई ऊटपटांग हरकतों से बेटेबेटियों और खासतौर से बहुओं का चैन से जीना मुहाल कर देते हैं, उन की क्या अब जरूरत है कि उन के बारे में भी चर्चा की जाए जबकि उन की सारी वाजिब जरूरतें पूरी कर दी जाती हैं? इस सवाल का सटीक और तार्किक जवाब न तो वेदप्रकाश दे पाए और न ही कोई दूसरा दे सकता.

आदर्शों, संस्कृति, नैतिकता और धर्म का उपदेश हर कोई थोप सकता है और थोपता ही है कि कुछ भी हो, मांबाप कैसे भी हों उन की सेवा और देखभाल करना संतानों की महती जिम्मेदारी है. इस प्रतिनिधि ने जब भोपाल में कुछ ऐसे लोगों से बात की जिन के यहां वृद्ध मांबाप थे तो कई हैरतअंगेज बातें सामने आईं. पेश हैं यहां उन के चुनिंदा अंश जो यह सोचने को मजबूर करते हैं कि अभिभावकों की सेवासुश्रूषा के मामले में मुंह खोल कर युवाओं को दोषी ठहरा देना जितना आसान काम है उस से ज्यादा कहीं मुश्किल उन की परेशानियों व तनाव को सम?ा पाना है. (आग्रह पर गोपनीयता की दृष्टि से नाम बदल दिए गए हैं). 37 वर्षीय गौरव बैंक कर्मी हैं और भोपाल की एक रिहायशी कालोनी में रहते हैं. मकान बहुत ज्यादा बड़ा नहीं है उस में 2 बैडरूम और एक हौल है. एक कमरे में उन के 68 वर्षीय रिटायर्ड पापा रहते हैं. जिंदगीभर सरकारी नौकरी करते रहे गौरव के पापा को किशोरावस्था से ही तंबाकू खाने की बुरी लत है. इस के नुकसानों पर चर्चा करने के बाद गौरव बताते हैं, ‘‘अब 2 साल से अशक्तता के चलते वे अपने कमरे से बाहर नहीं निकल पाते लेकिन तंबाकू नियमित खाते हैं और कमरे में ही थूकते रहते हैं. सम?ाने का कोई असर उन पर नहीं होता. ज्यादा कहो तो दयनीय चेहरा बनाते कहते हैं, ‘‘तू तो मु?ो कहीं जंगल या वृद्धाश्रम में छोड़ आ.’’ गौरव की पत्नी नेहा ससुर की देखभाल करती है जो सुबहशाम ससुर के कमरे की पीक साफ करतेकरते स्वाभाविक तौर पर खी?ा जाती है.

यह काम कोई नौकर करने को तैयार नहीं होता. यह रोज की परेशानी है. नेहा और गौरव बताते हैं, ‘‘आप या कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि हमारी हालत क्या हो जाती होगी. पापा जानतेसम?ाते हैं कि हम उन्हें खुद से दूर नहीं करेंगे, इसलिए इमोशनल ब्लैकमेलिंग करते रहते हैं. कमरे में दोदो पीकदान रखे होने के बाद वे पीक दीवारों और फर्श पर थूकते हैं. हम उन की सेवा और देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ते और इस बाबत हमें किसी का सर्टिफिकेट भी नहीं चाहिए, पर उन की थूकने की आदत से हम पर क्या गुजरती है, सम?ाना और सम?ाना दोनों मुश्किल काम है.’’ कई बार आधी रात को उठ कर गौरव को पिता को देखने जाना पड़ता है. इस का गौरव को मलाल नहीं और इस बात का भी नहीं कि उन्हें बहुत से सुख पिता की वजह से छोड़ने पड़ते हैं. नेहा की इच्छा है कि एकाध बार केरल या कश्मीर नहीं, तो पचमढ़ी या मांडू कहीं तो घूमने जाया जाए लेकिन ससुर की हालत देखते वह इस इच्छा का गला घोंट लेती है कि फिर इन की देखभाल कौन करेगा. यही पिता बेटेबहू की एक सलीके की बात मानने को तैयार नहीं तो इन दोनों पर तरस और सहानुभूति हो आना भी कुदरती बात है.

उन का 8 साल का बेटा भी दादाजी की गंदगी देख उन के कमरे में नहीं जाता. ऐसी ही कहानी 42 वर्षीय योगिता की है जो एक सरकारी कालेज में असिस्टैंट प्रौफेसर हैं. योगिता बुजुर्ग मां की देखभाल के चलते शादी नहीं कर पाईं. अब से कोई 12 साल पहले अमरावती से नौकरी करने बैतूल आईं तो साथ देने मां भी आ गईं. योगिता मां के ?ागड़ालू स्वभाव को ले कर परेशान हैं जो नौकरों से भी हर कभी ?ागड़ती हैं और पड़ोसियों से भी. 5 साल पहले ट्रांसफर पर वे भोपाल आईं तो उम्मीद बंधी कि बड़े शहर में आ कर शायद मां का स्वभाव बदल जाए लेकिन यह खुशफहमी ही साबित हुई. मां ने यहां भी बेवजह लड़ना?ागड़ना नहीं छोड़ा. ‘‘बहुत शर्मिंदगी होती है,’’ योगिता बताती हैं, ‘‘मां को सम?ाने से कोई फायदा नहीं होता क्योंकि उन्हें तो कलह करने की आदत पड़ गई है. अब तो पड़ोसियों ने शिकायत करना ही बंद कर दिया है. मेरे सामाजिक संपर्क, मेलमिलाप सब बंद हैं. दिनरात मां के स्वभाव की चिंता लगी रहती है.

क्लासरूम में पढ़ाते हुए भी ध्यान घर पर ही रहता है कि मां आज न जाने किस पड़ोसी पर गरजबरस रही होंगी.’’ योगिता की चिंता अपनी जगह वाजिब है कि कभी कोई इमरजैंसी पड़ी तो कोई पड़ोसी सहयोग न करेगा. सारे रिश्तेदार नागपुर की तरफ हैं और अब उन्हें भी कोई खास सरोकार नहीं रह गया है. जिस मां के लिए घर नहीं बसाया, वही मां ?ागड़ालू स्वभाव की हो तो योगिता और नेहा में कोई खास फर्क नहीं रह जाता, सिवा इस के कि एक के पिता घोषित तौर पर हिंसक थे और एक की मां अभी घोषित तौर पर नहीं हैं. खुद योगिता हाई ब्लडप्रैशर की गिरफ्त में आ गई हैं और अब खुद के भविष्य को ले कर तनाव में रहने लगी हैं. जैन समुदाय के एक बड़े कारोबारी 28 वर्षीय निशंक के बुजुर्ग पिता विकट के जिद्दी हैं, जिन्हें घर के हर काम में दखल देना ही रहता है. सब्जीभाजी की खरीद से ले कर कारोबार तक के लेनदेन की जानकारी उन्हें रोज चाहिए रहती है. बकौल निशंक, यह एक गैरजरूरी बात है कि कोई बुजुर्ग रोजरोज यह तय करे कि आज सब्जी यही बनेगी, नहीं तो खाना नहीं खाऊंगा.

आजकल कारोबार का सारा हिसाबकिताब और लेनदेन कंप्यूटर से होता है, जिस की जानकारी पिता को नहीं है. उन्हें रोज प्रिंट निकाल कर देने पड़ते हैं. न दो, तो घर में महाभारत शुरू हो जाती है. एक प्राइवेट कंपनी में अच्छे पैकेज पर काम कर रहे 27 वर्षीय अभिषेक की शादी को 4 साल ही हुए हैं. 68 साल की हो चलीं उन की मां ऊंचा सुनती हैं लेकिन उन्हें हर बात सुननी ही रहती है. अभिषेक कहते हैं, ‘‘आप को शायद यह परेशानी नहीं लगेगी कि कोई मिलने वाला या यारदोस्त सपत्नीक आ जाता है तो मम्मी तुरंत ड्राइंगरूम में पहुंच जाती हैं और बारबार बीच में टोकती हैं. उन्हें हर बात जोर से बोल कर बतानी पड़ती है. ‘‘घर में हम पतिपत्नी बात करें तो भी वे दखल देती हैं. कई बार उन्हें लगता है कि हम उन के ऊंचा सुनने का मजाक बना रहे हैं, जिस पर वे गुस्सा हो जाती हैं और कुछ दिन बात ही नहीं करतीं. इस से हमें बुरा लगता है, गिल्ट फील होता है लेकिन क्या करें, सम?ा नहीं आता.’’

गायब होते अधेड़ इन और ऐसी समस्याओं का कोई इलाज है ही नहीं, सिवा इस के कि ज्यादा परेशान करने वाले बुजुर्गों को वृद्धाश्रम छोड़ दिया जाए जोकि आमतौर पर हर कोई नहीं करता क्योंकि उन में मांबाप के प्रति जिम्मेदारी का भाव है और सामाजिक दबाव भी है कि लोग क्या कहेंगे. दूसरा तरीका सब से आसान और प्रचलित है कि युवा अपनी इच्छाओं व जरूरतों को किनारे करते सेवा करते जाएं. वेदप्रकाश बताते हैं कि उन के आश्रम में आने वाले कोई 80 फीसदी बुजुर्ग खुद की हरकतों के चलते आश्रम में छोड़ दिए जाते हैं. ये वे वृद्ध हैं जो उम्र के अहंकार और जिद्दी स्वभाव के शिकार हैं. उन की अपनी धार्मिक और दूसरी मान्यताएं हैं जिन के चलते बच्चों के साथ उन का रहना दूभर हो जाता है. यह पीढ़ी युद्ध बिलकुल भी नया नहीं है लेकिन बदलते वक्त के साथ वृद्ध खुद बिलकुल भी नहीं बदलना चाहते. एक अहम वजह परिवारों की बदलती बनावट और संरचना का भी है जिस के तहत घरों में अब 2 ही पीढि़यां बहुतायत से दिखती हैं, पहली पीढ़ी युवा है और दूसरी वृद्ध.

बीच की पीढ़ी यानी अधेड़ों की संख्या कम हो रही है. पुरानी परिवार व्यवस्था जो 25-30 साल पहले तक नजर आती थी उस में अधेड़ वृद्धों और अतिवृद्धों की देखभाल व सेवा की जिम्मेदारी संभाल लेते थे, जिस से युवाओं को राहत और आजादी मिल जाती थी और वे खुल कर जी पाते थे. यह 3 पीढि़यों का एक अघोषित सम?ाता था जिस में सभी को सहूलियत थी. अब लोग ज्यादा फिट रहने लगे हैं कि आप एक 60 साल के व्यक्ति को बूढ़ा नहीं कह सकते क्योंकि वह एकदम फिट और चुस्तदुरुस्त रहता है. उस के खयालात भी ज्यादा पोंगापंथ वाले नहीं होते. यहां तक कोई परेशानी परिवारों में खड़ी नहीं होती. परेशानी उस वक्त खड़ी होती है जब 40 साल तक के लोगों को 65 पार के बूढ़ों की देखभाल की जिम्मेदारी उठानी पड़ जाती है. अगर वे ?ाक्की और जिद्दी हों, जो आमतौर पर होते ही हैं, तो मामला उल?ाने लगता है. अधिकतर बूढ़े युवाओं से तालमेल बैठाने की कोशिश ही नहीं करते. इंदिरा शर्मा बताती हैं, ‘‘वे बहुत पजैसिव होते हैं और असमर्थ व अशक्त होते हुए भी घर की सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथ में रखना चाहते हैं. चूंकि इस का संचालन नहीं कर पाते,

इसलिए धीरेधीरे चिड़चिड़े होतेहोते कब भार बन जाते हैं, यह किसी को पता नहीं चलता और जब चलता है तब तक बात काफी बिगड़ चुकी होती है.’’ अब चूंकि अधेड़ कहीं से आयात नहीं किए जा सकते, इसलिए जिम्मेदारी उन युवाओं को उठानी पड़ती है जो कैरियर के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं या कर चुके होते हैं और जिंदगी का यह हिस्सा अपनी मरजी से गुजारना चाहते हैं, तो कोई गुनाह नहीं करते. अकसर गुनाह दरअसल, बुजुर्ग करते हैं जिस की सजा युवाओं को भुगतनी पड़ती है जिन से यह उम्मीद की जाती है कि वे बूढ़ों को, जैसे भी हो, ?ोलें यहां तक कि अपनी आजादी और प्राइवेसी भी गिरवी रख दें. सभी समझें वास्तविकता होता भी यही है लेकिन कोफ्त उस वक्त होती है जब दिनोंदिन बढ़ती और गंभीर होती इस समस्या पर एकतरफा सोचा जाता है. वृद्धाश्रम कोई जेल नहीं हैं जहां जाने से बुजुर्गों को कोई सजा मिलती हो, बल्कि यह तो एक अच्छी सुविधा है जहां बूढ़े जिंदगी की शाम और बेहतर ढंग से गुजार सकते हैं. बदलाव के इस दौर में वृद्धावस्था से अतिवृद्धावस्था में दाखिल हो रहे ज्यादातर लोग खुद अलग रहना चाहते हैं. लेकिन ऐसे समझदार बुजुर्गों की संख्या अभी 30 फीसदी भी नहीं है.

ये वे वृद्ध हैं जो बिना किसी कुंठा और पूर्वाग्रह के हालात को सम?ाते किसी पर न तो भार बनना चाहते और न ही अपने बच्चों की आजादी छीनना चाहते हैं. इन्हें सम?ादार और आधुनिक बुजुर्ग कहा जा सकता है जो युवाओं से मित्रवत पेश आते हैं और खुद की पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, मानसिक सेहत के अलावा दूसरी परिस्थितियों को सम?ा उन से सम?ाता कर लेने की बुद्धिमानी दिखाते हैं. ये बच्चों को बातबात में टोकते नहीं हैं कि कहां जा रहे हो? कब तक आओगे? मेरी दवा का क्या हुआ? अपनी अनदेखी का ?ाठा दोष भी उन्हें नहीं देते. समस्या वे बूढ़े हैं जिन का जिक्र ऊपर किया गया है. यहां भी यह देखने में आता है कि अधिकतर लोग अपनी वृद्धावस्था के बारे में कोई योजना नहीं बनाते खासतौर से वे जिन के पास बहुत ज्यादा पैसा नहीं है. पैंशनभोगी और आर्थिकरूप से आत्मनिर्भर वृद्धों की तो जैसेतैसे कट जाती है लेकिन परेशानी उन वृद्धों को ज्यादा होती है जो पूरी तरह यानी हर स्तर पर संतानों पर निर्भर होते हैं. इसीलिए इन का शोषण और उपेक्षा ज्यादा होने लगती है क्योंकि बाद की जिंदगी के ये दूसरों के मुहताज पूरी तरह हो जाते हैं.

वेदप्रकाश बताते हैं कि उन के आश्रम में ऐसे बुजुर्गों की तादाद ज्यादा है जिन्होंने अपने बुढ़ापे के बारे में कभी सोचा ही नहीं और बच्चों के लिए बगैर कुछ ज्यादा किएधरे उन से रिश्ते के नाम पर रिटर्न ज्यादा चाहते हैं. असल समस्या है युवाओं से उन के शोषण की हद तक उम्मीदें पाल लेना और उन्हें बातबात पर मांबाप की महत्ता बताना. इस पर एनआईटी रायपुर के एक प्रौफेसर हरेंद्र विक्रोल कहते हैं, ‘‘बात को उलट कर भी देखा जाना चाहिए कि मांबाप के तुम पर कई एहसान हैं, यह बात गलत है क्योंकि उन्होंने हमारे प्रति वही जिम्मेदारी निभाई थी जो आज हम अपने बच्चों के प्रति निभा रहे हैं.

उपकार और कर्तव्य जैसे शब्दों का वजन आज का युवा नहीं उठा सकता क्योंकि ये फुजूल संदर्भ में इस्तेमाल किए जाते हैं. तुक की बात तो यह है कि यथासंभव बूढ़ों के प्रति भी जिम्मेदारी निभाई जाए और जब वजह कोई भी हो, न निभे तो उसे छोड़ देना ही बेहतर और सुकून वाला काम है.’’ जाहिर है असल त्याग वे युवा पेश कर रहे हैं जिन के अभी खेलनेखाने, मौजमस्ती और आजादी से जीने के दिन हैं. उन से यह सब अगर बुजुर्ग अपनी बेजा हरकतों, जिद और अहम के चलते छीनते हैं तो यह उन के साथ ज्यादती ही कही जाएगी. Senior Citizen Issues

मृत्यु के बाद भी पाखंड का अंत नहीं

Social Awareness: भारत में कोरोना की दूसरी लहर में सारे मृत्युपरांत कर्मकांड धरे के धरे रह गए. संस्कार तो दूर, पंडे तो मृतक के नजदीक तक न फटके. लेकिन इन सब से सबक लेने की जगह लोग फिर से पाखंड की इस फंतासी में फंसते जा रहे हैं और हैरानी यह कि इन में पढ़ेलिखे बढ़चढ़ कर हैं. हमारे देश में अंधविश्वास और पाखंड की अमरबेल आधुनिक, सभ्य व पढ़ेलिखे समाज के मध्यवर्ग पर बुरी तरह फैली हुई है. समाज को जागरूक करने का दावा करने वाला शिक्षित मध्यवर्ग बातें भले ही विज्ञान के आविष्कारों की करता हो परंतु सदियों से चली आ रही कुरीतियों व परंपराओं को तोड़ने का साहस वह आज भी नहीं कर पाया है. विज्ञान के साथ वैज्ञानिक नजरिया न होने के कारण समाज में एक अजीब विरोधाभास दिखाई दे रहा है.

एक तरफ विज्ञान और टैक्नोलौजी की उपलब्धियों का तेजी से प्रसार हो रहा है तो दूसरी तरफ लोगों में वैज्ञानिक नजरिए के बजाय अंधविश्वास, कट्टरपंथ, पोंगापंथ जैसी अंधविश्वासी परंपराएं तेजी से पांव पसार रही हैं. कोरोना जैसी महामारी ने इन अंधविश्वासी परंपराओं के मौजूदा स्वरूप में परिवर्तन तो किया है मगर लोग मौका मिलते ही फिर दकियानूसी परंपराओं के जाल में फंसे नजर आते हैं. अप्रैलमई 2021 में भारत में कोरोना की स्थिति भयावह थी. परिवार के लोग कोरोना से मरने वाले का अंतिम संस्कार तक नहीं कर पा रहे थे, लेकिन सिर्फ 2 माह बाद ही सामान्य हालात होने के बाद सबकुछ भूल कर वही लोग फिर से अंधभक्ति और पाखंड में लग गए. समाज को इन परंपराओं और पाखंड की ओर ढकेलने का काम धर्म के ठेकेदार पंडेपुजारियों द्वारा बखूबी कर रहे हैं. धर्म के ठेकेदार लोगों को बताते हैं कि मरने वाले की आत्मा की शांति के लिए ये कर्मकांड नहीं करोगे तो मरने वाले को स्वर्ग का टिकट कैसे मिलेगा.

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मध्यवर्गीय लोग ही भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर पिछड़ी परंपराओं व मान्यताओं को थोप रहे हैं. वैज्ञानिक नजरिया, तर्कशीलता, प्रगतिशीलता और धर्मनिरपेक्षता की जगह अंधभक्ति, पाखंड और धार्मिक कट्टरवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है. पढ़ेलिखे व आधुनिक मध्यवर्ग का यही आचरण कम पढ़ेलिखे दलितपिछड़े मध्यवर्गीय परिवारों के लिए मिसाल बन जाता है और समाज में फैली इन कुप्रथाओं को बढ़ावा मिलता रहता है. समाज भले ही पहनावे में और अंगरेजी में गिटपिट करने से सभ्यता का लबादा ओढ़ कर अपनेआप को आधुनिक सम झने लगा हो परंतु आज के वैज्ञानिक युग में भी आदमी पंडेपुजारियों द्वारा फैलाए गए मायाजाल से बाहर नहीं निकल पाया है. समाज में फैली कुरीतियों और अंधविश्वास पर भाषण देने वाला व्यक्ति भी इन से अछूता नहीं है. ऐसे व्यक्ति आस्था के कारण कम, धार्मिक भय की वजह से ज्यादा इस तरह की बेढंगी परंपराओं को छोड़ नहीं रहे हैं. धर्म का भय दिखा कर पंडेपुरोहित के जिंदा रहते तो लूटखसोट करते ही हैं,

मरने के बाद भी उस के परिजनों से कर्मकांड के नाम पर पैसा झटकने में पीछे नहीं रहते. यही कारण है कि जीवनभर उपेक्षा के शिकार रहे आदमी को भले ही सुखसुविधाएं नसीब न हुई हों लेकिन मरने के बाद होने वाले कर्मकांडों में पानी की तरह पैसा बहाया जाता है. मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार के कर्म के साथ तेरहवीं, छ:मासी, वार्षिकी और तीसरे वर्ष श्राद्ध कर्म के बाद भी पंडेपुजारी उन का पीछा नहीं छोड़ते. मृतात्मा के तरणतारण के नाम पर अंधविश्वासी क्रियाकर्म कराने वाले धर्म के ठेकेदार व्यक्ति की गाढ़ी कमाई का पैसा हड़पने को तत्पर रहते हैं. अंतिम संस्कार का पाखंड जीवन का आखिरी सत्य मृत्यु है. मृत व्यक्ति के शरीर को नष्ट करने के लिए अंतिम संस्कार किया जाता है. देश के सभी भागों में अलगअलग परंपराएं और रीतिरिवाज इस के लिए प्रचलित हैं. इन परंपराओं को रोकने के बजाय नएनए रूपों में आगे बढ़ाने में शिक्षित मध्यवर्ग आगे है.

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अंतिमयात्रा में अर्थी के ऊपर मखाने आदि के साथ पैसे फेंकने की बेहूदा परंपरा आज भी है. पंडित मृतव्यक्ति के अंतिम संस्कार के पूर्व पिंडदान तथा अंतिम संस्कार के समय भी मंत्र पढ़ कर अनावश्यक क्रियाकर्म करा कर धन ऐंठ रहे हैं. अंतिम संस्कार के तीसरे दिन किसी नदी, सरोवर में चिता की राख के विसर्जन के अवसर पर भी ये पंडे हजारों रुपए दानदक्षिणा के नाम पर वसूलते हैं. पंडित 7 दिनों तक गरुड़पुराण का पाठ करवाते हैं कि इसे सुनने से मरने वाले की आत्मा स्वर्ग पहुंच जाती है. त्रिवेणी संगम : आस्था के नाम पर लूट देश के अनेक भागों से मृत व्यक्ति की अस्थियां गंगा नदी में विसर्जन के लिए लाई जाती हैं.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों से आने वाले लोगों के लिए प्रयाग नगरी इलाहाबाद लूट का ऐसा गढ़ है जहां पर अपनेअपने झंडे गाड़ कर बैठे पंडे आने वाले लोगों की 7 पीढि़यों का हिसाबकिताब रखते हैं. रेलवे स्टेशन पर मुंडे़ सिर वाले मुसाफिरों को देख कर इन पंडों के एजेंट उन पर मक्खी की तरह टूटते हैं. उन के रुकने की व्यवस्था वे बड़े आदरसत्कार के साथ करते हैं कि लोग इन के मोहजाल में फंस जाते हैं. जब गंगा तट प्रयाग पर वे पहुंचते हैं तो विभिन्न प्रकार के कर्मकांडों के लिए खुली बोली लगती है. आप की दक्षिणा के हिसाब से पूजनपाठ की पद्धति अलगअलग होती है. गौदान, अनाज का दान और पंडितों के भोजन के नाम पर दुख और अवसाद से ग्रसित व्यक्ति से ये पंडे काफी रुपए निकलवा लेते हैं. लूट का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता.

दशगात्र और पूजनपाठ के बाद जब गंगा, यमुना, सरस्वती नदियों के त्रिवेणी संगम पर लोग अस्थियां विसर्जन के लिए जाते हैं तो वहां नौका घाट के ठेकेदार संगम पर ले जाने तथा लकड़ी से बने आसनों पर नहाने व दानदक्षिणा गंगाजी में छोड़ने के नाम पर पैसा वसूलते हैं. मृत्युभोज और श्राद्धकर्म गंगा नदी में अस्थियों के विसर्जन के बाद तेरहवें दिन पंडित गंगापूजन कराते हैं, जिस में पंडित के उपयोग के लिए पहनने के कपड़े, बरतन, पलंग, जूता, छाता, टौर्च सोना और चांदी से बनी मूर्ति के अलावा बहुत सारी वस्तुएं दान की जाती हैं. 13 ब्राह्मणों को बरतनों के साथ कीमती उपहार व अन्य ब्राह्मणों को दान आदि दे कर भोजन कराया जाता है. आजकल सामाजिक संगठनों द्वारा समाजसुधार के नाम पर मृत्युभोज न कर श्रद्धाजंलि सभा आयोजित करने का ढोल जरूर पीटा जा रहा है परंतु मृत्युभोज को पूरी तरह से बंद करने का साहस वे नहीं दिखा पाए हैं. धरती पर कुढ़कुढ़ कर जीने वाले को बैकुंठ पहुंचाने के लिए तथाकथित पंडे छ: मासी और वार्षिक श्राद्ध करने की सलाह यजमानों को देते हैं.

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इन सब कार्यक्रमों में चावल, जौ, तिल के पिंड बना कर पूजनपाठ का ढोंग किया जाता है. पंडितों के साथ रिश्तेदारों को भोजन कराने का नियम बता कर यजमान की जेब ढीली करने का गोरखधंधा खूब फलफूल रहा है. हिंदी मास की जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन होता है, उस की मृत्यु के तीसरे वर्ष पितृपक्ष में उसी तिथि को श्राद्ध कर्म किया जाता है जिस में मुंडन, पिंडदान, अन्नदान, छायादान के साथ ब्राह्मण भोजन और मेहमानों को भोज दिया जाता है. गया में होता है पिंडदान मृत्यु के तीसरे वर्ष से पितृ मिलन कर पुरखों को पानी देने की परंपरा है. जीतेजी 2 वक्त की रोटी को मुहताज रहे पुरखों को मरने के बाद भोग लगाने का ढकोसला कर पितृपक्ष में विभिन्न प्रकार के पकवानों का आनंद लिया जाता है.

कामकाजी व्यक्ति जब इन कर्मकांडों के प्रति अपनी अरुचि दिखाता है तो धर्म का भय बता कर ये पंडे गया तीर्थ में पिंडदान का विधान बताते हैं. बिहार के गया में पितृपक्ष के 15 दिनों तक मेला लगता है जिस में सरकार तो इन पंडों को लूटने का लाइसैंस भी प्रदान करती है. मोटी दानदक्षिणा ले कर ये पंडित फलगू नदी के तट पर पिंडदान करवा कर लोगों को बताते हैं कि यहां पिंडदान करने से मरने वाला जन्ममृत्यु के चक्कर से मुक्त हो जाता है. गया में बने मठमंदिरों पर जाने वाले श्रृद्धालुओं को चढ़ोत्री के नाम पर खुलेआम लूटा जाता है.

समाज में फैले अंधविश्वास के पीछे अज्ञानता के अलावा, अज्ञात भय, अनिश्चित भविष्य, समस्या का सही समाधान होते हुए भी लोगों की पहुंच से बाहर होना, समाज से कट जाने का भय, परंपराओं से चिपके रहने की प्रवृत्ति, धर्म से डर और ईश्वर के प्रति अंधश्रद्धा, धर्मगुरुओं या मठाधीशों के प्रति अंधविश्वास जैसे कई कारण होते हैं. किसी व्यक्ति के मरने के बाद किए जाने जाने वाले ये धर्मकर्म परिवार की आर्थिक उन्नति में तो बाधा हैं ही, साथ ही, समाज में अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं. जरूरतमंद व्यक्ति को मदद करने के बजाय समाज के ऊंचे आसन पर बैठे पंडेपुजारियों को दान के नाम पर रुपए लुटाने की ये परंपराएं समाज को खोखला ही कर रही हैं. आर्थिक संपन्नता के साथ समाज में अच्छे विचारों, खुली आंखों से सच देखनेसम झने और वैचारिक संपन्नता की आज ज्यादा आवश्यकता है, तभी समाज में व्याप्त कुप्रथाओं को रोका जा सकता है. Social Awareness

गरमाती धरती कहर के करीब

Global Warming: प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि दुनियाभर में देखी जा रही है. अमेरिका और रूस के जंगलों में भयानक आग दहक रही है और पश्चिमी यूरोप के हिस्से विनाशकारी बाढ़ से प्रभावित हैं. इन में अब तक सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं. स्विट्जरलैंड, लक्जमबर्ग और नीदरलैंड्स ने भी भारी बारिश की मार झेली है. मध्य चीन के कुछ हिस्सों में मूसलाधार बारिश के कारण भयंकर बाढ़ आई हुई है. हेनान प्रांत में अभूतपूर्व बारिश से हालात बिगड़ गए हैं. हेनान की राजधानी  झेंग्झोऊ में बाढ़ के कारण 60 से ज्यादा जानें जा चुकी हैं. यह चीन में 1,000 वर्षों में हुई अब तक की सब से भारी बारिश है.

इटली, रोमानिया जैसे देशों में आबादी को भंयकर गरमी की मार पड़ रही है. कनाडा जैसा ठंडा क्षेत्र गरमी की मार झेल रहा है. पिछले वर्ष यूरोप में गरमी से करीब एक लाख 40 हजार लोग प्रभावित हुए थे. आने वाले वक्त में परिस्थितियां और भी ज्यादा बुरी होंगी. बीते साल अमेरिका में कैलिफोर्निया के जंगल आग की ऊंचीऊंची लपटों में घिरे रहे. आग तब भड़की जब पश्चिम में तापमान अत्यधिक बढ़ गया. आजकल अमेरिकी राज्य ओरेगन के जंगलों में आग लगी हुई है. इसे देश की सब से भयावह आग बताया जा रहा है. इस आग की चपेट में जंगल की 3 लाख एकड़ जमीन आ चुकी है.

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अमेरिका के अलगअलग 13 राज्यों में 80 जगहों पर आग लगी है. हीटवेव और तेज हवाओं के कारण लगी आग पर काबू पाना मुश्किल हो रहा है जो स्थिति को खतरनाक बनाता जा रहा है. आस्ट्रेलिया के लिए जंगलों में भी आग लगना कोई नई बात नहीं है. बढ़ते तापमान और सूखे की वजह से आस्ट्रेलिया के अलगअलग हिस्सों के जंगलों में कई बार आग भड़क चुकी है. बीते साल करीब 5 महीने तक जलती रही आग में 50 करोड़ से ज्यादा जानवरों की मौत हुई है. आग कितनी भयावह थी इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस आग से एक लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जल कर राख हो गया. वहीं, जरमनी के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्से बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं और वहां 160 से ज्यादा लोग अब तक बाढ़ के कारण जान गंवा चुके हैं. सौ से ज्यादा लोग लापता हैं.

जरमनी की चांसलर एंजेला मार्केल भीषण बाढ़ की त्रासदी से अपने लोगों को बचाने व उन की हिम्मत बढ़ाने के लिए लगातार बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर रही हैं. उन का कहना है कि 700 सालों में यह जरमनी में सब से बुरी बाढ़ है. बेल्जियम में भी बाढ़ की चपेट में आ कर 31 लोगों की मौत हुई है और सैकड़ों लापता हैं. दुनिया का कोई भी कोना ऐसा नहीं बचा है जहां मौसम के मिजाज में परिवर्तन न हो रहा हो. कहीं धीमे तो कहीं बहुत तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है जिस के चलते जीवजंतु, वनस्पति, मनुष्य और पक्षी सभी प्रभावित हैं. वजह है ग्लोबल वार्मिंग ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ है ग्रीनहाउस गैसों (कार्बन मोनोऔक्साइड, कार्बन डाइऔक्साइड और मीथेन) के कारण पृथ्वी के औसत तापमान में बढ़ोतरी होना. इसे सब से पहले न्यूजर्सी के साइंटिस्ट वैली ब्रोएक्केर ने परिभाषित किया था.

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ये गैसें वाहनों, कारखानों और अन्य कई स्रोतों से उत्सर्जित होतीं हैं. ये खतरनाक गैसें पृथ्वी के वातावरण में मिल कर तापमान में वृद्धि कर रही हैं. आज हमारी धरती ताप युग के जिस मुहाने पर खड़ी है, उस विभीषिका का अनुमान काफी पहले से ही किया जाने लगा था. इस तरह की आशंका सर्वप्रथम 20वीं सदी के प्रारंभ में आर्हीनियस एवं थौमस सी चेम्बरलीन नामक 2 वैज्ञानिकों ने की थी. किंतु इस का अध्ययन 1958 से ही शुरू हो पाया. तब से कार्बन डाइऔक्साइड की सघनता का विधिवत रिकौर्ड रखा जाने लगा. भूमंडल के गरमाने के ठोस सुबूत 1988 से मिलने शुरू हुए.

नासा के गोडार्ड इंस्टिट्यूट औफ स्पेस स्टडीज के जेम्स ईण्हेन्सन ने 1960 से ले कर 20वीं सदी के अंत तक के आंकड़ों से निष्कर्ष निकाला है कि इस बीच धरती का औसत तापमान 0.5 से 0.7 डिग्री सैल्सियस बढ़ गया है. भारत में सैंटर फौर साइंस एंड एनवायरनमैंट के सीनियर डायरैक्टर सुपर्णो बनर्जी कहते हैं, ‘‘ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप पृथ्वी पर जलवायु बहुत तेजी से गरम हो रही है जिस का पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. जलवायु परिवर्तन से जगहजगह तूफान, बाढ़, जंगलों में आग, सूखा और लू के खतरे, उष्णकटिबंधीय चक्रवात बढ़ते ही जा रहे हैं.

इस के अलावा वन्य जीवों का विलुप्त होना, जीवों के आचरण में बदलाव, उन के प्रवास स्थलों का बदलना जैसी बातें सामने आ रही हैं.’’ सुपर्णो बनर्जी आगे कहते हैं, ‘‘वातावरण में गरमी बढ़ने पर वायुमंडल समुद्रों से अधिक पानी एकत्र कर लेता है जिस के कारण भयंकर बारिश और सैलाब का मंजर पैदा होता है. दूसरी ओर, ग्लोबल वार्मिंग से समुद्र के जलस्तर में लगातार वृद्धि हो रही है. यह वृद्धि 2 तरीकों से हो रही है. एक ओर गरम तापमान के कारण ग्लेशियर और भूमि आधारित बर्फ की चादरें पिघल रही हैं और यह पानी समुद्र में जा रहा है. ‘‘दूसरी ओर, ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्री सतह का तापमान भी बढ़ रहा है क्योंकि पृथ्वी के वातावरण की अधिकांश गरमी समुद्र द्वारा अवशोषित होती है.

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गरम समुद्री सतह के कारण तूफान का बनना आसान हो जाता है. तूफान से वर्षा की दर बढ़ती है जिस से दुनियाभर में सैलाब की त्रासद घटनाएं हो रही हैं. ‘‘धरती के जो हिस्से समुद्र के किनारे हैं वे धीरेधीरे पानी में समा रहे हैं. बंगाल के सुंदरवन के डेल्टा के आसपास के द्वीप डूब रहे हैं. ओडिशा के तटीय गांव डूब गए हैं और सरकार गांव वालों से उस डूबी भूमि का भूटैक्स चार्ज कर रही है जो गांव हैं ही नहीं. यही हाल कोलकाता, मुंबई और चेन्नई आदि का होने वाला है.’’ सिकुड़ते ग्लेशियर पृथ्वी पर लगभग एक लाख 98 हजार ग्लेशियर हैं जो करीब 7 लाख 26 हजार स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं. हमारी जलवायु काफी हद तक ग्लेशियरों पर निर्भर करती है तो वहीं साफ पानी का सब से बड़ा स्रोत ग्लेशियर ही हैं.

ग्लोबल वार्मिंग के कारण ये ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं और इस के भयावह परिणाम दुनियाभर में नजर आने लगे हैं. आइसलैंड के सब से प्राचीन ग्लेशियरों में से एक ‘ओकजोकुल ग्लेशियर’ पूरी तरह सूख चुका है. 700 साल से ज्यादा पुराने उस ग्लेशियर से ग्लेशियर का दर्जा तक ले लिया गया है. यह असर जलवायु परिवर्तन के कारण ही हुआ. 2 अगस्त, 2019 को आइसलैंड के इतिहास में एक दिन में सब से ज्यादा व तेज बर्फ पिघलने की घटना दर्ज की गई थी. उस दिन वहां 24 घंटे में 12.5 बिलियन टन बर्फ की चादर पिघल गई. ‘नेचर क्लाइमेट चेंज’ जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, आर्कटिक की बर्फ समय से पहले पिघल रही है और वसंत के दौरान पौधों में पत्ते जल्दी आ रहे हैं. साथ ही, टुंड्रा वनस्पति नए क्षेत्रों में फैल रही है. एक तरह से आर्कटिक में तेजी से तापमान में बदलाव आ रहा है. इस से हरियाली को पनपने में मदद मिल रही है. नासा की सैटेलाइट तसवीरें बताती हैं कि अंटार्कटिका में बर्फ की चादर के नीचे 130 ?ालों का निर्माण हो चुका है.

वहां बर्फ का रंग बदल रहा है. उन इलाकों में समुद्री एल्गी उग रही है जिस से बर्फ का रंग हरा पड़ने लगा है. वैज्ञानिक ग्रीनलैंड को ले कर भी चेतावनी जारी कर चुके हैं. उन का कहना है कि यदि जलवायु परिवर्तन ऐसे ही जारी रहा तो एक दिन ग्रीनलैंड केवल घास का मैदान बन कर रह जाएगा. जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वैंशन 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग की वजह से वर्ष 2100 तक 80 फीसदी ग्लेशियर पिघल कर सिकुड़ सकते हैं और समुद्र का स्तर 2100 तक 2000 के स्तर से 8 फुट से अधिक बढ़ सकता है. भारत में जलवायु परिवर्तन हिमालयी ग्लेशियरों को निगल रहा है. ये ग्लेशियर हिमालय के क्षेत्र में पश्चिम से पूर्व की ओर 2,000 किलोमीटर के दायरे में फैले हुए हैं जो बढ़ते तापमान के कारण 21वीं सदी की शुरुआत की तुलना में आज दोगुनी तेजी से पिघल रहे हैं.

लगभग 4 दशकों में इन ग्लेशियरों ने अपना एकचौथाई घनत्व खो दिया है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण ये ग्लेशियर पतली चादर में परिवर्तित हो रहे हैं और उन में टूटफूट हो रही है. गंगोत्री ग्लेश्यिर, जहां से भारत की सब से बड़ी नदी गंगा का उद्गम होता है, तेजी से पिघल रहा है. गंगोत्री ग्लेशियर प्रतिवर्ष 30 मीटर की दर से सिकुड़ रहा है. यह एक भयावह अनुमान है कि वर्ष 2030 तक गंगा सूख सकती है. गौरतलब है कि उत्तराखंड की कोसी नदी पहले ही सूख कर ‘वैश्विक तापमान’ की व्यथा अभिव्यक्त कर रही है. देश के विभिन्न क्षेत्रों में भूजल स्तर में तीव्र गिरावट दर्ज की जा रही है जिस के कारण खेती के लिए सिंचाई व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लग गया है. पानी के अभाव में खेती घाटे का सौदा बन गई है. हाल ही में सेडार ने भी एक रिसर्च कर बताया था कि हिंदूकुश हिमालय तेजी से सिकुड़ रहा है. इस से ‘इंडियन हिमालयन रीजन’ सहित 8 देशों में जल संकट गहरा सकता है.

भारत, चीन, नेपाल और भूटान जैसे देशों के करोड़ों लोग सिंचाई, जल विद्युत और पीने के पानी के लिए हिमालय के ग्लेशियरों पर निर्भर हैं. इन ग्लेशियरों के पिघलने से आने वाले वक्त में इस पूरे क्षेत्र के जलतंत्र और यहां रहने वाली आबादी का जीवन प्रभावित हो सकता है. हाल के शोध में पता चला है कि दुनियाभर में ऊंचाई वाले ग्लेशियल ?ालों की संख्या और आकार में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. दुनिया में बाढ़ के सब से बड़े खतरों में से एक ग्लेशियरों के पिघलने से बनी ?ालों को माना जाता है. इन ?ालों के टूटने से भारी तबाही होती है. तेज गति में ऊंचाई से आता पानी रास्ते में आने वाले गांव, जंगल, शहर सब तबाह करता हुआ समुद्रों में जा गिरता है जिस के कारण समुद्र का आयतन और जलस्तर खतरनाक स्तर तक बढ़ जाता है.

भारत के उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने के बाद हुई त्रासदी और 16 जून, 2013 की केदारनाथ आपदा, जिस ने उत्तराखंड को तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, की भयावहता आज भी लोगों के रोंगटे खड़े कर देती है. आसमानी आफत ने केदार घाटी समेत पूरे उत्तराखंड में बरबादी के वे निशान छोड़े जिन्हें अब तक नहीं मिटाया जा सका है. आपदा को 8 वर्ष बीत चुके हैं लेकिन आज भी यह सवाल जिंदा है कि क्या उस त्रासदी से आम जनमानस और हमारी सरकारों ने कोई सबक लिया है? पिघलती बर्फ बढ़ते खतरे जलवायु परिवर्तन की वास्तविकता को सम?ाने के लिए बर्फ के सब से बड़े भंडारों की परिस्थितियों को देखना और सम?ाना होगा. दुनिया में बर्फ के सब से बड़े भंडार अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में हैं. इन का पर्यावरण ही दुनिया की जलवायु परिवर्तन का सूचक है. ग्लोबल वार्मिंग के चलते ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार यदि ग्रीनलैंड की पूरी बर्फ पिघली तो समुद्र स्तर में 8 मीटर तक की बढ़ोतरी होगी और मालदीव, मुंबई जैसे अनेक शहर समुद्र के पानी में डूब जाएंगे.

वर्ष 2100 तक 23 डिग्री अक्षांश पर स्थित समुद्रों के पानी के तापमान में 3 डिग्री सैंटीग्रेड की वृद्धि होगी. तापमान की वृद्धि के कारण वर्ष 2080 तक पश्चिमी पैसिफिक महासागर, हिंद महासागर, पर्शिया की खाड़ी, मिडिल ईस्ट और वैस्टइंडीज द्वीप समूहों की कोरल रीफ के 80 से 100 प्रतिशत तक लुप्त होने का खतरा है. अम्लीय पानी के असर से ठंडे पानी की कोरल रीफ और खोल वाले समुद्री जीवों के अस्तित्व को खतरा बढ़ रहा है. समुद्र में औक्सीजन की कमी वाले क्षेत्रों की संख्या बढ़ रही है. यह संख्या 149 से बढ़ कर 200 हो गई है. इस बदलाव के कारण इन क्षेत्रों में मछलियों की पैदावार कम हो गई है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण बदलती जलवायु के प्रभाव पर गहरी नजर रखने वाले पर्यावरणविद सुपर्णो बनर्जी के मुताबिक जलवायु में यह बदलाव दुनिया को कई तरह से प्रभावित कर रहा है. उदाहरण के लिए, जलवायु परिवर्तन के भयंकर प्रभाव के चलते मनुष्य अपनी जगहों से बहुत तेजी से विस्थापित हो रहे हैं. वर्ष 2020 की पहली छमाही में लगभग 10 मिलियन लोग बड़े पैमाने पर जलवायु आपदाओं के कारण विस्थापित हुए थे.

पशुपक्षी और पौधे बदलती परिस्थितियों के अनुकूल होने की सख्त कोशिश कर रहे हैं और जब वे कामयाब नहीं हो पाते तो मर जाते हैं. उदाहरण के लिए, अंटार्कटिका में एडेली पेंगुइन की आबादी उन के आवास से बर्फ के खत्म होने के कारण लगभग 90 प्रतिशत तक गिर गई है. हर साल धरती पर बढ़ रहा है 6 गीगाटन कार्बन सैंटर फौर साइंस एंड एनवायरनमैंट की एक रिपोर्ट कहती है कि पृथ्वी पर हर साल करीब 6 गीगाटन कार्बन बढ़ रहा है जिस का भार इंसानों के भार से 12 गुना ज्यादा है. यह जानकारी हाल ही में चीन के ग्लोबल कार्बन डाइऔक्साइड मौनिटरिंग साइंटिफिक एक्सपैरिमैंटल सैटेलाइट (टैनसैट) द्वारा जारी आंकड़ों में सामने आई है. शुष्क हवा के साथ कार्बन कैसे मिश्रित होता है, इसे सम?ाने के लिए वैज्ञानिकों ने मई 2017 से अप्रैल 2018 तक एकत्रित आंकड़ों का उपयोग करते हुए दुनिया का पहला कार्बन के प्रवाह का डेटासैट और मानचित्र तैयार किया है. इस से जुड़ा शोध 22 जुलाई को ‘एडवांसेस इन एटमौस्फेरिक साइंसेज’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

इस शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता यांग डोंगक्सू के अनुसार, ग्रीनहाउस गैसों के आदानप्रदान की प्रक्रिया के दौरान सौ गीगाटन से भी ज्यादा कार्बन का आदानप्रदान जीवधारियों और वनस्पति के बीच होता है. लेकिन धरती पर जिस तरह से कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि हो रही है उस के कारण हर वर्ष करीब 6 गीगाटन कार्बन वातावरण में जुड़ रहा है, जोकि जलवायु परिवर्तन की वजह बन रहा है. जंगलों के कम होते जाने से अतिरिक्त कार्बन का अवशोषण नहीं हो पा रहा है. खेती को नुकसान जलवायु परिवर्तन से वर्षा आधारित फसलों को अधिक नुकसान हो रहा है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण वर्षा की कम मात्रा से किसानों को सिंचाई हेतु पर्याप्त जल ही उपलब्ध नहीं है. इस के कारण रबी की फसल पर ज्यादा मार पड़ती है. एक अध्ययन के अनुसार, यदि तापमान में 2 डिग्री सैंटीग्रेड के लगभग वृद्धि होती है तो गेहूं की उत्पादकता घट जाएगी.

भारत, जोकि एक कृषि प्रधान देश है, में तापमान के एक डिग्री सैंटीग्रेड बढ़ने पर ही गेहूं के उत्पादन में 4.5 करोड़ टन की कमी हो जाएगी. यही नहीं, वर्ष 2100 तक फसलों की उत्पादकता में 10 से 40 प्रतिशत तक कमी आने से देश की खाद्य सुरक्षा के खतरे में पड़ जाने की प्रबल संभावना है. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण कच्छ और सौराष्ट्र, जो गुजरात के कुल क्षेत्रफल के 25 प्रतिशत तथा राजस्थान के 60 प्रतिशत अंश में फैले हुए हैं, में जल संकट की तसवीर विकराल हो जाएगी जिस के कारण कृषकों की आजीविका पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा. यही नहीं, माही, पेन्नार, साबरमती तथा ताजी नदियों में भी जलभराव की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी जबकि दूसरी तरफ गोदावरी, महानदी तथा ब्राह्मणी में ‘भीषण बाढ़’ के हालात पैदा हो जाएंगे. जिस से कृषकों को भारी तबाही का सामना करना पड़ेगा.

बढ़ती जनसंख्या, बढ़ते उद्योगों एवं विध्वंस होते वनों व जंगलों के कारण विश्व बढ़ते तापमान एवं जलवायु परिवर्तन जैसी ज्वलंत समस्याओं से जू?ाता हुआ विनाश की कगार पर खड़ा है. वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण संपूर्ण पृथ्वी में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दिखने लगे हैं. चिंताजनक तथ्य यह है कि 21वीं सदी में तापमान में वृद्धि 3 से 5 डिग्री सैल्सियस होगी जोकि समस्त विश्व के लिए खतरनाक स्थिति होगी. भारत में बाढ़ और लैंडस्लाइड का भयावह रूप ग्लोबल वार्मिंग का असर भारत पर भारी वर्षा, बादल फटने और पहाड़ों के दरकने के रूप में सामने आ रहा है. लोगों के घर, दुकानें, खेत तबाह हो गए हैं. लाखों लोग घर से बेघर हो चुके हैं.

भारत के कई राज्यों में इस बार मानसून की बारिश पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा है जिस के चलते उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मूकश्मीर और सिक्किम से ले कर महाराष्ट्र और बंगाल तक से भयावह दृश्य सामने आए हैं. इन राज्यों में बारिश के साथ लैंडस्लाइड और बादल फटने की घटनाओं में अब तक 200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. अकेले महाराष्ट्र में ही 150 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. सिक्किम में लैंडस्लाइड के कारण एक रेल सुरंग में काम कर रहे तमाम मजदूर बह गए. ममखोला में सेवक-रंग्पो रेल परियोजना पर काम के दौरान सुरंग के आसपास पहाड़ से चट्टानें गिरने लगीं और करीब 10 मजदूर सुरंग में फंस गए. उन का अस्थायी कैंप पानी में बह गया. स्थानीय लोगों ने 3 मजदूरों को रैस्क्यू किया. एक का शव मिला है और बाकियों का कुछ पता नहीं चला.

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में भी भारी भूस्खलन हुआ है. वहां पहाड़ का बहुत बड़ा हिस्सा टूट कर गिरा है, जिस के चलते पांवटा साहिब से रोहड़ू जाने वाला नैशनल हाईवे 707 बड़वास के पास पहाड़ समेत नीचे धंस गया. हादसे के दौरान सड़कों से अनेक वाहन गुजर रहे थे. हालांकि, पहाड़ दरकने की आहट मिलते ही वाहनों को दोनों तरफ से रोक लिया गया. पश्चिम बंगाल में भी भारी बारिश ने कहर बरपाया है. वहां बारिश के कारण पहाड़ों में दरार आने से मलबा सड़कों पर आ गिरा. लैंडस्लाइड के कारण कलिम्पोंग के पास नैशनल हाइवे-10 की सड़क पूरी तरह से बंद हो गई. कोलकाता और हावड़ा शहर में भी भारी बारिश के कारण सड़कें पानी में डूब गईं. इस बार की असामान्य बारिश से सब से ज्यादा नुकसान महाराष्ट्र को हुआ है.

रत्नागिरी समेत 10 जिलों में बारिश के बाद लैंडस्लाइड, मकान गिरने और बाढ़ जैसी घटनाओं से 150 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है. चिपलून जैसे शहर तो बाढ़ में डूब गए. वहीं, मध्य प्रदेश में ग्वालियरचंबल अंचल के 1225 गांव बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. करीब 2 हजार लोगों को रैस्क्यू करने में सेना जुटी हुई है. मध्य प्रदेश के ग्वालियरचंबल अंचल के शिवपुरी, श्योपुर, दतिया, भिंड, मुरैना और ग्वालियर बाढ़ से बेहाल हैं. सब से ज्यादा प्रभावित 90 गांव शिवपुरी के हैं. रोजीरोटी की तलाश में अब हजारों लोगों का पलायन शुरू हो गया है. बाढ़ से ग्वालियरचंबल अंचल के 6 बड़े पुल और 2 दर्जन से ज्यादा पुलिया बह गई हैं. इन के बहने से करीब 4 सौ करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है. राजस्थान में भी मानसून कहर बन कर टूट रहा है. कोटा, बूंदी और धौलपुर में बाढ़ ने जनजीवन अस्तव्यस्त कर दिया है. कोटा में हुई 8 इंच बारिश ने 43 साल का रिकौर्ड तोड़ दिया है. इसी तरह उत्तर प्रदेश के भी 9 जिलों में बाढ़ जैसे हालात हैं. विलुप्त होते जीव जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण मानव एवं पशुओं की दिनचर्या एवं जीवनचक्र असंतुलित होता जा रहा है. धरती पर से छोटे जीव निरंतर विलुप्त होते जा रहे हैं और 26 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक वनस्पतियों और प्राणियों का अस्तित्व लगभग समाप्त होने को है.

जीवों के व्यवहार में परिवर्तन धनबाद के जयप्रकाश नगर की वैज्ञानिक डा. सोनल चौधरी ने अपने शोध में पाया है कि बर्फ पिघलने से उत्तरी ध्रुव के भालुओं के व्यवहार में बदलाव आ रहा है. वहां वे अपने बच्चों को मार कर खाने लगे हैं. ध्रुवीय भालू, जो बर्फ छोड़ कर इधरउधर नहीं जाते थे, अब जमीन और पहाड़ों पर चढ़ कर पशुपक्षियों को भी निशाना बना रहे हैं. यही हाल रहा तो धु्रवीय भालू की प्रजाति ही खत्म हो जाएगी या उन के व्यवहार में बड़ा परिवर्तन आएगा. वहीं गरमी बढ़ने से परिंदों के अंडे जल्द परिपक्व हो रहे हैं. फूलों के रंग बदल गए हैं. डा. सोनल ने शोध के लिए उत्तरी ध्रुव पर कई महीने गुजारे हैं. उन का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग से उत्तरी ध्रुव पर तेजी से पारिस्थितिकी परिवर्तन हो रहा है. ठोस पहल न हुई तो 21वीं सदी के खत्म होने के साथ समुद्र का जलस्तर इतना बढ़ जाएगा कि न्यूयौर्क और मुंबई जैसे कई शहर पानी में डूब जाएंगे. दुनिया को बचाने के लिए वातावरण के बढ़ते तापमान को रोकना होगा. कार्बन डाइऔक्साइड व अन्य हानिकारक गैसों का उत्सर्जन कम कर हरियाली धरती पर बिछानी होगी. वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट औफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) के ताजा शोध के अनुसार हिमालयी बेसिन और मध्य हिमालय में तापमान में वृद्धि के कारण ठंड पसंद करने वाले जानवर ज्यादा ऊंचाई वाले स्थानों में पहुंच गए हैं.

जलवायु परिवर्तन की वजह से जंगली जानवरों के व्यवहार में भी बदलाव हो रहे हैं. मसलन, जो लंगूर गरम इलाकों में रहते थे, वे अब लेह लद्दाख के साथ ही केदारनाथ में भी दिखने लगे हैं. यहां तक कि कई जगह तो 4,876 मीटर या 16 हजार फुट तक भी लंगूर दिखा है. इसी तरह कई जंतु हैं जो पहले निचले इलाकों में ही पाए जाते थे, अब उन में से कुछ ऊंचाई वाले इलाकों में पहुंच चुके हैं. गरमी में निकलते चूहे और सांप ग्लोबल वार्मिंग के कारण आस्ट्रेलिया में चूहों की संख्या अचानक बड़ी तेजी से बड़ी है. अलमारी खोलिए तो चूहा दिखेगा, सड़क पर चूहों की कतारें, खेतों, घरों, गराज यानी हर जगह सिर्फ चूहे ही चूहे हो गए हैं. इतना ही नहीं, इस से ज्यादा बुरी स्थिति उन लोगों की है जिन के घरों में चूहों का आतंक फैला हुआ है. चूहों का मल साफ करने में लोगों को 6-6 घंटे लग रहे हैं. यह सचाई है आस्ट्रेलिया के पूर्वी इलाके की. वहां पर चूहों का आतंक बहुत ज्यादा फैल गया है. सब से बुरी हालत क्वींसलैंड और न्यू साउथ वेल्स की है. आस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड और न्यू साउथ वेल्स में तो चूहों की इतनी ज्यादा संख्या हो गई है कि लोगों और प्रशासन के हाथपैर फूल गए हैं.

किसानों, दुकानदारों और गृहिणियों के लिए ये एक बड़ी समस्या बन गए हैं. किसान तो इसे चूहों का प्लेग कह रहे हैं क्योंकि कई दशकों से चूहों की इतनी ज्यादा आबादी यहां के स्थानीय लोगों ने नहीं देखी है. कुछ किसानों की तो पूरी फसल चूहों ने खराब कर दी है. क्वींसलैंड और न्यू साउथ वेल्स के कई होटल बंद कर दिए गए हैं. राशन की दुकानों पर काम करने वालों का कहना है कि वे एकएक रात में 600 चूहों को पकड़ते हैं और चूहों के काटने के कारण लोगों को अस्पताल जा कर इंजैक्शन लगवाने पड़ रहे हैं. इधर जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गरमी के असर से मुंबई में सांप निकलने लगे हैं. धरती के भीतर तापमान बढ़ रहा है जिस के चलते गरमी के कारण जहरीले सांप और बिच्छू बिल से बाहर निकल रहे हैं. यहां आएदिन 5-6 जहरीले सांप पकड़े जा रहे हैं. इस की मुख्य वजह तापमान का लगातार 30-32 डिग्री रहना है. इतने ज्यादा तापमान में सांप बिल और जमीन के अंदर से बाहर निकलने लगते हैं. ठंड के दिनों में सांप अपनी ऊर्जा बचाने के लिए जमीन के भीतर ही रहते हैं. इस समय जमीन का तापमान ज्यादा होने के कारण वे बाहर निकल कर घूमनेफिरने और अपना भोजन तलाशने लगे हैं.

कुछ समय पूर्व पर्यावरण विज्ञान के पितामह जेम्स लवलौक ने चेतावनी दी थी कि यदि दुनिया के निवासियों ने एकजुट हो कर पर्यावरण को बचाने का प्रभावशाली प्रयत्न नहीं किया तो जलवायु में भारी बदलाव के परिणामस्वरूप 21वीं सदी के अंत तक 6 अरब व्यक्ति मारे जाएंगे. संसार के एक महान पर्यावरण विशेषज्ञ की इस भविष्यवाणी को मानवजाति को हलके में नहीं लेना चाहिए. द्य जलवायु शिखर सम्मेलन : ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कमी करने को तैयार हुई दुनिया अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 22 अप्रैल को जलवायु शिखर सम्मेलन का आयोजन कर जलवायु को एक बार फिर से वैश्विक फलक पर महत्त्वपूर्ण मुद्दे के रूप में स्थापित किया है. साथ ही, सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को जलवायु क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए भी बाध्य किया है. अमेरिका ने सम्मेलन के समापन के अवसर पर पेरिस सम?ाता 2015 के आधार पर अपने नए राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (एनडीसी) लक्ष्यों को भी घोषित किया. अमेरिका ने अपने नए और दोबारा से तय किए गए एनडीसी लक्ष्यों में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में बड़ी कमी का ऐलान किया है.

नए एनडीसी लक्ष्य के मुताबिक, अमेरिका ने कहा है कि वह वर्ष 2005 के जीएचजी उत्सर्जन स्तर की तुलना में 2030 तक 50 से 52 प्रतिशत की कमी करेगा. इस के अलावा अमेरिका ने साल 2050 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को ‘नेट जीरो उत्सर्जन’ तक पहुंचाने की प्रतिबद्धता भी जाहिर की है. इस सम्मेलन में जापान ने साल 2030 तक जीएचजी के उत्सर्जन के स्तर में 46 प्रतिशत तक की कमी लाने की प्रतिबद्धता जाहिर की. कनाडा ने उत्सर्जन में 30 प्रतिशत कमी लाने तो वहीं यूरोपीय संघ (ईयू) और यूनाइटेड किंगडम (यूके) ने उत्सर्जन को कम करने के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य की घोषणा की है. जोकि क्रमश: साल 2030 और 2035 तक 1990 के उत्सर्जन स्तर से 55 और 78 प्रतिशत तक कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. भारत ने अपने नए एनडीसी लक्ष्यों की घोषणा नहीं की है, क्योंकि भारत का वर्तमान एनडीसी पहले से ही क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर (कैट) के मानक के अनुरूप 2 डिग्री सैल्सियस निर्धारित है. लेकिन भारत ने स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में निवेश जुटाने के लिए एक नई भारत-यूएस जलवायु और स्वच्छ ऊर्जा एजेंडा सा?ोदारी 2030 घोषित की है. अमेरिकी राष्ट्रपति, जो बाइडेन का पेरिस सम?ाते को एक बार फिर से स्वीकार करना, अपने व्यक्तव्यों में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को केंद्र में रखना और अमेरिकी नौकरियों की योजना के माध्यम से घरेलू संरचनात्मक नीतियों को जलवायु अनुकूल बनाने पर जोर देने के साथ ही अन्य बड़े देशों से संवाद और कूटनीति कायम करना, जलवायु परिवर्तन की दिशा में उठाए जा रहे सराहनीय कदम हैं.

अमेरिका में ऐसा कुछ बेहतर काम डोनाल्ड ट्रंप के विज्ञानविरोधी और जीनोफोबिक गतिविधियों के दुखद 4 वर्षों के बाद हो रहा है. जो बाइडेन की ओर से जलवायु परिवर्तन की दिशा में किए जा रहे प्रयास, पिछले किसी भी राष्ट्रपति के प्रयासों की तुलना में अधिक बड़े और प्रभावशाली हैं. सुपर्णों बनर्जी कहते हैं, ‘‘सभी वैश्विक सम?ातों और वार्त्ताओं का मतलब अच्छा है लेकिन क्या वे वास्तव में उस रिजल्ट को हासिल कर पा रहे हैं जो उन्होंने करने के लिए निर्धारित किया था? पहले के सम?ातों आदि का हश्र हमारे सामने है, जैसे क्योटो प्रोटोकौल और कोपेनहेगन सम?ाता. ‘‘ऐसे समय में जब जलवायु संकट तेज हो रहा है, तब सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को गैस, गरमी, ऊर्जा का उत्सर्जन कम करने की तरफ तेजी से प्रयास करने होंगे, वरना कमजोर प्राणी, मनुष्य, पौधे और नन्हे जीव हमारी पृथ्वी से खत्म हो जाएंगे, जिस का परिणाम पूरी मानवजाति के लिए भयावह होगा.’’ Global Warming

Emotional Story: न्याय

Emotional Story: कठघरे में खड़े मुलजिम को जब जज सदानंद ने फाइल पर से आंखें उठा कर देखा तो चौंक गए. वह वसीम था. सदानंद के मानसिक पटल पर एक सीडी घूम गई. पिछले वर्ष अपनी पत्नी शुभलक्ष्मी के कहने पर वे दोनों दक्षिण भारत की यात्रा पर निकले थे. जब चेन्नई पहुंचे तो कन्याकुमारी जाने का भी मन बन गया. विवेकानंद स्मारक तक कई पर्यटक जाते थे और अब तो यह एक तरह का तीर्थस्थान हो गया था. घंटों तक ऊंची चट्टान पर बैठे लहरों का आनंद लेते रहे ेऔर आंतरिक शांति की प्रेरणा पाते रहे. इस तीर्थस्थल पर जब तक बैठे रहो एक सुखद आनंद का अनुभव होता है जो कई महीने तक साथ रहता है.

आने वाले तूफान से अनभिज्ञ दोनों पत्थर की एक शिला पर एकदूसरे से सट कर बैठे थे. ऊंची उठती लहरों से आई ठंडी हवा जब उन्हें स्पर्श करती थी तो वे सिहर कर और पास हो जाते थे. एक ऐसा वातावरण और इतना अलौकिक कि किसी भी भाषा में वर्णन करना असंभव है. तभी उन्हें लगा कि एक डौलफिन मछली हवा में लगभग 20 मीटर ऊपर उछली और उन्हें अपने आगोश में समा कर वापस समुद्र में चली गई.  यह डौलफिन नहीं सुनामी था. एक प्राणलेवा कहर.

इस मुसीबत में उन्हें कोई होश नहीं रहा. कब कहां बह गए, पता नहीं. जो हाथ इतनी देर से एकदूसरे को पकड़े थे अब सहारा खो बैठे थे. न चीख सके न चिल्ला पाए. जब होश ही नहीं तो मदद किस से मांगते? जब उन्हें होश आया तो किनारे से दूर अपने को धरती पर पड़े पाया.

‘शुभलक्ष्मी,’ सदानंद के मुंह से कांपते स्वर में निकला, ‘यह क्या हो रहा है?’

एक अर्द्धनग्न युवक पास खड़ा था. कुछ दूर पर कुछ शरीर बिखरे पड़े थे. युवक ने उधर इशारा किया और लड़खड़ाते सदानंद को सहारा दिया. उन लोगों में सदानंद ने अपनी पत्नी शुभलक्ष्मी को पहचान लिया. मौत इतनी भयानक होगी, इस का उसे कोई अनुमान नहीं था. डरतेडरते पत्नी के पास गया. एक आशा की किरण जागी. सांस चल रही थी. उस युवक व अन्य स्वयंसेवकों की सहायता से वह उसे अपने होटल के कमरे में ले गए जो सौभाग्य से सुरक्षित था.

डाक्टरी सुविधा भी मिली और कुछ ही घंटों की चिंता के बाद शुभलक्ष्मी को होश आ गया. आंखें खुलने पर इतने सारे अजनबियों को देख कर शुभलक्ष्मी घबरा गई, परंतु फिर सदानंद को सामने खड़ा पा कर आश्वस्त हुई.

‘यह सब क्या हो गया?’ पत्नी के स्वर में कंपन था. धीरेधीरे सदानंद ने शुभलक्ष्मी को सुनामी के तांडवनृत्य के बारे में बताया.

‘कितना सौभाग्य है हमारा, जो हम बच गए,’ सदानंद ने कहा.

‘हजारोंलाखों लोगों का जीवन एकदम तहसनहस हो गया है.’

‘न मैं ने कहा होता, न हम यहां आते,’ शुभलक्ष्मी के स्वर में अपराधबोध की भावना थी.

‘नहीं, तुम्हारा ऐसा सोचना गलत है. हादसा तो कहीं भी किसी तरह का हो सकता है,’ सदानंद ने पत्नी का हाथ अपने हाथों में ले कर समझाया, ‘घर बैठे भूकंप आ जाता, जमीन खिसक जाती, सड़क पर दुर्घटना हो जाती.’

‘बसबस, मुझे डर लग रहा है,’ शुभलक्ष्मी ने पूछा, ‘बच्चों को बताया?’

‘सब को बता दिया और कह दिया कि हम सकुशल व आनंदपूर्वक हैं,’ सदानंद ने मीठे व्यंग्य से कहा.

‘सब अब निश्ंिचत हैं. यातायात ठीक होने पर आ भी सकते हैं. वैसे मैं ने मना कर दिया है.’

‘ठीक किया,’ शुभलक्ष्मी ने उदास हो कर कहा.

‘जानती हो, लक्ष्मी, जब मुझे होश आया तो मैं ने सब से पहले क्या पूछा?’ सदानंद ने माहौल हलका करने के लिए कहा.

‘मेरे बारे में पूछा होगा और क्या?’ शुभलक्ष्मी मुसकराई.

‘नहीं,’ सदानंद ने हंस कर कहा, ‘मैं ने पूछा मेरा चश्मा कहां गया?’

‘छि: तुम और तुम्हारा चश्मा.’ शुभलक्ष्मी हंस पड़ी. अचानक याद आया, ‘पर हम बचे कैसे?’

‘वसीम ने बचाया,’ सदानंद ने कहा.

‘वसीम? यह कौन है?’ शुभलक्ष्मी ने आश्चर्य से पूछा.

‘वैसे तो कोई नहीं, लेकिन हमारे लिए तो मसीहा है,’ सदानंद ने बाहर खड़े वसीम को अंदर बुलाया और कहा, ‘यह वसीम है.’

जबसुनामी ने उन्हें समुद्र में खींच लिया था तब अनेक लोग फंसे हुए थे. लहरें कभी नीचे ले जाती थीं

तो कभी ऊपर उछाल देती थीं. वसीम अच्छा तैराक भी था

जो इस हादसे

के समय कहीं आसपास घूम रहा था. अपनी जान की परवा न कर उस ने कई लोगों को खींच कर तट पर पहुंचाया था. कोई बचा, तो कोई नहीं. बचने वालों में सदानंद और उस की पत्नी भी थे.

‘थैंक यू.’ शुभलक्ष्मी ने कहा.

वसीम की मुसकान में एक अनोखापन था.

‘हिंदी कम जानता है,’ सदानंद ने कहा.

कृतज्ञता दिखाते हुए शुभलक्ष्मी

ने पूछा, ‘बेचारे को कोई इनाम दिया?’

‘लेता ही नहीं,’ सदानंद ने गहरी सांस ले कर कहा.

‘मैं ने तो सारा पर्स इसे दे दिया था लेकिन इस ने सिर हिला दिया. मेरी जिंदगी में तो ऐसा इनसान पहली बार आया है.’

‘सब तुम्हारी तरह के थोड़े होते हैं,’ शुभलक्ष्मी ने कटाक्ष किया, ‘सिर्फ सजा देना जानते हो.’

आज वही वसीम सदानंद के सामने खड़ा था. सिर झुकाए एक अपराधी के कठघरे में.

चेन्नई से मुंबई काम की खोज में आया था. 2 महीने हो चुके थे लेकिन ऐसे ही छुटपुट काम के अलावा कुछ नहीं. एक झोंपड़ी में एक आदमी ने एक कोना सोने भर को दे दिया था. पड़ोस में एक दूसरा आदमी रहता था जो काम तो करता नहीं था, बस अपनी पत्नी से काम करवाता था और उस की कमाई शराब में उड़ा देता था. ऐसी बातें आम होती हैं और कोई भी अधिक ध्यान नहीं देता.

देर रात झगड़ा और चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर वसीम बाहर आ गया. सारे पड़ोसी तो जानते थे इसलिए कोई बाहर नहीं आया. वह आदमी अपनी पत्नी व 6-7 साल के बच्चे को बुरी तरह पीट रहा था. दोनों के ही खून निकल रहा था. औरत चीख रही थी और बच्चा रो रहा था.

क्रोध में आ कर उस आदमी ने पास पड़ा एक पत्थर उठा लिया. बच्चे के सिर पर पटकने ही वाला था कि वसीम का सब्र टूट गया. उस ने पत्थर छीन लिया. दोनों में हाथापाई होने लगी. अपने बचाव के लिए वसीम ने उसे धक्का दिया तो वह पीछे गिर पड़ा. एक नुकीला पत्थर उस आदमी के सिर में घुस गया और खून बहने लगा. वसीम की समझ में कुछ न आया कि वह क्या करे?

तब तक कुछ तमाशबीन इकट्ठे हो गए थे. औरत छाती पीटपीट कर रो रही थी. डाक्टरी सहायता के अभाव में जब तक उसे अस्पताल पहुंचाया गया, उस की मौत हो गई थी. पुलिस वसीम को पकड़ कर ले गई. अदालत में पड़ोसियों ने ही नहीं बल्कि मृत आदमी की पत्नी ने भी वसीम के विरुद्ध गवाही दी. इस तरह निचली अदालत ने उसे कातिल करार दिया. आज सदानंद की अदालत में उस की अपील की सुनवाई थी.

सदानंद सोच रहे थे कि जो आदमी अपनी जान की परवा न कर के दूसरों की जान बचा सकता है, क्या वह किसी का कत्ल भी कर सकता था? पड़ोसियों की और मृतक की पत्नी की गवाही पर सारा मामला टिका था. वसीम की बात पर कोई विश्वास नहीं कर रहा था कि वह तो केवल बच्चे की जान बचा रहा था. हाथापाई में वह आदमी मर गया. न तो उसे मारने की कोई इच्छा थी और न ही कारण. अब सदानंद क्या करें?

पड़ोसियों से पूछा कि क्या वे चश्मदीद गवाह थे? सब लोग तो बाद में रोनापीटना सुन कर बाहर आए थे. इसलिए उन की गवाही अविश्वसनीय थी. मृतक की पत्नी से पूछा, ‘‘क्या मुलजिम की तुम्हारे पति से कोई दुश्मनी थी?’’

‘‘नहीं,’’ पत्नी का उत्तर था.

‘‘मुलजिम ने तुम्हारे पति को क्या मारा?’’ सदानंद ने पूछा.

पत्नी चुप रही. कोई उत्तर नहीं दिया.

‘‘तुम्हारा पति क्या शराब के नशे में बच्चे को मारने जा रहा था?’’ सदानंद ने पूछा.

पत्नी फिर भी चुप रही. दूसरी बार पूछने पर उस ने अनिच्छा से स्वीकार किया.

‘‘मुलजिम ने तुम्हारे बच्चे को बचाने के लिए हाथापाई की, यह सच है?’’ सदानंद ने पूछा.

2-3 बार पूछने पर पत्नी ने स्वीकार किया.

सदानंद ने अधिक प्रश्न नहीं किए. उन की दृष्टि में मामला स्पष्ट था. यह एक ऐसी दुर्घटना थी जिस के लिए वसीम जिम्मेदार नहीं था. पूरी तरह निर्दोष बता कर उसे बाइज्जत रिहा कर दिया गया.

घर पर जब शुभलक्ष्मी को यह बताया तो उसे बहुत अच्छा लगा.

‘‘बेचारा, उस का पता मालूम है?’’ शुभलक्ष्मी ने कहा, ‘‘उसे कोई काम दिला सकते हो?’’

‘‘कोशिश करूंगा,’’ सदानंद ने कहा.

‘‘उसे बुलाने के लिए एक आदमी को भेजा है.’’  Emotional Story

Hindi Story: मुखौटा

Hindi Story: ‘‘मेरे आने से आप के काम में कोई हर्ज तो नहीं हुआ,’’ प्रियदर्शिनी ने कमला देवी से कहा. सुबह के सारे काम प्रियदर्शिनी बड़ी फुरती से निबटाती जा रही थी. उस दिन उसे नगर की प्रतिष्ठित महिला एवं बहुचर्चित समाजसेविका कमला देवी से मिलने के लिए समय दिया गया था. काम के दौरान वह बराबर समय का हिसाब लगा रही थी. मन ही मन कमला देवी से होने वाली संभावित चर्चा की रूपरेखा तैयार कर रही थी.

आज तक उस का समाज के ऐसे उच्चवर्ग के लोगों से वास्ता नहीं पड़ा था लेकिन काम ही ऐसा था कि कमला देवी से मिलना जरूरी हो गया था. वह समाज कल्याण समिति की सदस्य थीं और एक प्रसिद्ध उद्योग समूह की मालकिन. उन के पास, अपार वैभव था. कितनी ही संस्थाओं के लिए वह काम करती थीं. किसी संस्था की अध्यक्ष थीं तो किसी की सचिव. समाजसेवी संस्थाओं के आयोजनों में उन की तसवीरें अकसर अखबारों में छपा करती थीं. उन की भारी- भरकम आवाज के बिना महिला संस्थाओं की बैठकें सूनीसूनी सी लगती थीं.

ये सारी सुनीसुनाई बातें प्रियदर्शिनी को याद आ रही थीं. लगभग 3 साल पहले उस ने अपने घर पर ही बच्चों के लिए एक स्कूल और झूलाघर की शुरुआत की थी. उस का घर शहर के एक छोर पर था और आगे झोंपड़पट्टी. उस बस्ती के अधिकांश स्त्रीपुरुष सुबह होते ही कामधंधे के सिलसिले में बाहर निकल जाते थे. हर झोंपड़ी में 4-5 बच्चे होते ही थे. घर का जिम्मा सब से बडे़ बच्चे पर सौंप कर मांबाप निकल जाते थे. 8-9 बरस का बच्चा सीधे होटल में कपप्लेट धोने या गन्ने की चरखी में गिलास भरने के काम में लग जाता था.

जीवन चक्र की इस रफ्तार में शिक्षा के लिए कोई स्थान नहीं था, न समय ही था. दो जून की रोटी का जुगाड़ जहां दिन भर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद कई बार संभव नहीं हो पाता था वहां इस तरह के अनुत्पादक श्रम के लिए सोचा भी नहीं जा सकता था. 10 साल पढ़ाई के लिए बरबाद करने के बाद शायद कोई नौकरी मिल भी जाए लेकिन जब कल की चिंता सिर पर हो तो 10 साल बाद की कौन सोचे?

फिर भी प्रियदर्शिनी की यह निश्चित धारणा थी कि ये बच्चे बुद्धिमान हैं, उन में काम करने की शक्ति है, कुछ नया सीखने की उमंग भी है. इन्हें अगर अच्छा वातावरण और सुविधाएं मिल जाएं तो उन के जीवन का ढर्रा बदल सकता है. अभाव और उपेक्षा के वातावरण में पलतेबढ़ते ये बच्चे गुनहगार बन जाते हैं. चोरी करने, जेब कतरने जैसी बातें सीख जाते हैं. मेहनतमजदूरी करतेकरते गलत सोहबत में पड़ कर उन्हें जुआ, शराब आदि की लत पड़ जाती है और अगर बच्चे बहुत छोटे हों तो कुपोषण का शिकार हो कर उन की अकाल मृत्यु हो जाती है.

उस का खयाल था कि थोड़ी देखभाल करने से उन में काफी परिवर्तन आ सकता है. इसी उद्देश्य से उस ने अपनी एक सहेली के सहयोग से छोटे बच्चों के खेलने के लिए झूलाघर और कुछ बडे़ बच्चों के लिए दूसरी कक्षा तक की पढ़ाई के लिए बालबाड़ी की स्थापना की थी. रात के समय वह झोंपडि़यों में जा कर उन में रहने वाली महिलाओं को परिवार नियोजन और परिवार कल्याण की बातें समझाती, घरेलू दवाइयों की जानकारी देती, साफसुथरा रहने की सीख देती.

पूरी बस्ती उस का सम्मान करती थी. अधिकाधिक संख्या में बच्चे झूलाघर और बालबाड़ी में आने लगे थे. इसी सिलसिले में वह कमला देवी से मिलना चाहती थी. अपना काम सौ फीसदी हो जाएगा ऐसा उसे विश्वास था. किसी राजप्रासाद की याद दिलाने वाले उस विशाल बंगले के फाटक में प्रवेश करते ही दरबान सामने आया और बोला, ‘‘किस से मिलना है?’’

‘‘बाई साहब हैं? उन्होंने मुझे 11 बजे का समय दिया था.’’

‘‘अंदर बैठिए.’’

हाल में एक विशाल अल्सेशियन कुत्ता बैठा था. दरबान उसे बाहर ले गया. इतने में सफेद ऊन के गोले जैसा झबरीला छोटा सा पिल्ला हाथों में लिए कमला देवी हाल में प्रविष्ट हुईं. भारीभरकम काया, प्रयत्नपूर्वक प्रसाधन कर के अपने को कम उम्र दिखाने की ललक, कीमती साड़ी, चमचमाते स्वर्ण आभूषण, रंगी हुई बालों की कटी कृत्रिम लटें, नाक की लौंग में कौंधता हीरा, चेहरे पर किसी हद तक लापरवाही और गर्व का मिलाजुला मिश्रण. पल भर के निरीक्षण में ही प्रियदर्शिनी को लगा कि इस रंगेसजे चेहरे पर अहंकार के साथसाथ मूर्खता का भाव भी है जो किसी भी जानेमाने व्यक्ति के चेहरे पर आमतौर पर पाया जाता है.

उठ कर नमस्ते करते हुए उस ने सहजता से मुसकराते हुए अपना परिचय  दिया, ‘‘मेरा नाम प्रियदर्शिनी है. आप ने आज मुझे मिलने का समय दिया था.’’

‘‘अच्छा अच्छा…तो आप हैं प्रियदर्शिनी. वाह भई, जैसा नाम वैसा ही रंगरूप पाया है आप ने.’’

अपनी प्रशंसा से प्रियदर्शिनी सकुचा गई. उस ने कुछ संकोच से पूछा, ‘‘मेरे आने से आप के काम में कोई हर्ज तो नहीं हुआ?’’

‘‘अजी, छोडि़ए, कामकाज का क्या? घर के और बाहर के भी सारे काम अपने को ही करने होते हैं. और बाहर का काम? मेरा मतलब है समाजसेवा करने का मतलब घर की जिम्मेदारियों से मुकरना तो नहीं होता? गरीबों की सेवा को मैं सर्वप्रथम मानती हूं, प्रियदर्शिनीजी.’’

कमला देवी की इस सादगी और सेवाभावना से प्रियदर्शिनी अभिभूत हो उठी.

‘‘प्रियदर्शिनी, आप बालबाड़ी चलाती हैं?’’

‘‘जी.’’

‘‘कितने बच्चे हैं बालबाड़ी में?’’

‘‘जी, 25.’’

‘‘और झूलाघर में?’’

‘‘झूलाघर में 10 बच्चे हैं.’’

‘‘फीस कितनी लेती हैं?’’

‘‘जी, फीस तो नाममात्र की लेती हूं.’’

‘‘फीस तो लेनी ही चाहिए. मांबाप जितनी फीस दे सकें उतनी तो लेनी ही चाहिए. इतनी मेहनत करते हैं हम फिर पैसा तो हमें मिलना ही चाहिए.’’

‘‘जी, पैसे की बात सोच कर मैं ने यह काम शुरू नहीं किया.’’

‘‘तो फिर क्या समय नहीं कटता था, इसलिए?’’

‘‘जी, नहीं. यह कारण भी नहीं है.’’

कंधे उचका कर आंखों को मटका कर हंस दी कमला देवी, ‘‘तो फिर लगता है आप को बच्चों से बड़ा लगाव है.’’

‘‘जी, वह तो है ही लेकिन सच बात तो यह है कि उस इलाके में ऐसे काम की बहुत जरूरत है.’’

‘‘कहां रहती हैं आप?’’

‘‘सिंधी बस्ती से अगली बस्ती में.’’

‘‘वहां तो आगे सारी झोंपड़पट्टी ही है न?’’

‘‘जी. होता यह है कि झोंपड़पट्टी वाले सुबह से ही काम पर निकल जाते हैं. घर संभालने का सारा जिम्मा स्वभावत: बड़े बच्चे पर आ जाता है. मांबाप की अज्ञानता और मजबूरी का असर इन बच्चों के भविष्य पर पड़ता है. इसी विचार से मैं बच्चों की प्रारंभिक पढ़ाई के लिए बालबाड़ी और छोटे बच्चों की देखभाल के लिए झूलाघर चला रही हूं.’’

‘‘तो इन छोटे बच्चों की सफाई, उन के कपडे़ बदलने और उन्हें दूध, पानी आदि देने के लिए आया भी रखी होगी?’’

‘‘जी नहीं. ये सब काम मैं स्वयं ही करती हूं.’’

‘‘आप,’’ कमला देवी के मुख से एकाएक आश्चर्यमिश्रित चीख निकल गई.

‘‘जी, हां.’’

‘‘सच कहती हैं आप? घिन नहीं आती आप को?’’

‘‘जी, बिलकुल नहीं. क्या अपने बच्चों की टट्टीपेशाब साफ नहीं करते हम?’’

‘‘नहीं, यह बात नहीं है. लेकिन अपने बच्चे तो अपने ही होते हैं और दूसरों के दूसरे ही.’’

‘‘मेरे विचार में तो आज के बच्चे कल हमारे देश के नागरिक बनेंगे. अगर हम उन्हें जिम्मेदार नागरिक के रूप में देखना चाहें, उन से कुछ अपेक्षाएं रखें तो आज उन की जिम्मेदारी किसी को तो उठानी ही पड़ेगी न?’’

शांत और संयत स्वर में बोलतेबोलते प्रियदर्शिनी रुक गई. उस ने महसूस किया, कमला देवी का चेहरा कुछ स्याह पड़ गया है. उन्होंने पूछा, ‘‘लेकिन इन सब झंझटों से आप को लाभ क्या मिलता है?’’

‘‘लाभ?’’ प्रियदर्शिनी की उज्ज्वल हंसी से कमला देवी और भी बुझ सी गईं, ‘‘मेरा लाभ क्या होगा, कितना होगा, होगा भी या हानि ही होगी, आज मैं इस विषय में कुछ नहीं कह सकती लेकिन एक बात निश्चित है. मेरे इन प्रयत्नों से समाज के ये उपेक्षित बच्चे जरूर लाभान्वित होंगे. मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है.’’

‘‘अद्भुत, बहुत बढि़या. आप के विचार बहुत ऊंचे हैं. आप का आचरण भी वैसा ही है. बड़ी खुशी की बात है. वाह भई वाह, अच्छा तो प्रियदर्शिनीजी, अब आप यह बताइए, आप मुझ से क्या चाहती हैं?’’

‘‘जी, बच्चों के बैठने के लिए दरियां स्लेटें, पुस्तकें और खिलौने. मदद के लिए मैं एक और महिला रखना चाहती हूं. उसे पगार देनी पड़ेगी. वर्षा और धूप से बचाव के लिए शेड बनवाना होगा. इस के साथ ही डाक्टरी सहायता और बच्चों के लिए नाश्ता.’’

‘‘तो आप अपनी बालबाड़ी को आधुनिक किंडर गार्टन स्कूल में बदल देना चाहती हैं?’’

‘‘बिलकुल आधुनिक नहीं बल्कि जरूरतों एवं सुविधाओं से परिपूर्ण स्कूल में.’’

‘‘तो साल भर के लिए आप को 10 हजार रुपए दिलवा दें?’’

‘‘जी.’’

‘‘मेरे ताऊजी मंत्रालय में हैं. आप 8 दिन के बाद आइए. तब तक आप का काम करवा दूंगी.’’

‘‘सच,’’ खुशी से खिल उठी प्रियदर्शिनी, ‘‘आप का किन शब्दों में धन्यवाद दूं? आप सचमुच महान हैं.’’

कमला देवी केवल मुसकरा भर दीं.

‘‘अच्छा, अब मैं चलती हूं. आप की बहुत आभारी हूं.’’

‘‘चाय, शरबत कुछ तो पीती जाइए.’’

‘‘जी नहीं, इन औपचारिकताओं की कतई जरूरत नहीं है. आप के आश्वासन ने मुझे इतनी तसल्ली दी है…’’

‘‘अच्छा, प्रियदर्शिनीजी, आप का घर और हमारा समाज कल्याण कार्यालय शहर की एकदम विपरीत दिशाओं में है. आप ऐसा कीजिए, अपनी गाड़ी से यहां आ जाइए.’’

‘‘जी, मेरे पास गाड़ी नहीं है.’’

‘‘तो क्या हुआ, स्कूटर तो होगा?’’

‘‘जी नहीं, स्कूटर भी नहीं है.’’

‘‘मेरे पास फोन भी नहीं है.’’

‘‘प्रियदर्शिनीजी, आप के पास गाड़ी नहीं, फोन नहीं, फिर आप समाजसेवा कैसे करेंगी?’’

उपहासमिश्रित उस हंसी से प्रियदर्शिनी कुछ  हद तक परेशान सी हो उठी. फिर भी वह अपने सहज भाव से बोली, ‘‘मेरा मन पक्का है. हर कठिनाई को सहने के लिए तत्पर हूं. तन और मन के संयुक्त प्रयास के बाद कुछ भी असंभव नहीं होता.’’

अब तो खुलेआम छद्मभाव छलक आया कमला देवी के मेकअप से सजेसंवरे चेहरे पर.

‘‘मैं तो आप को समझदार मान रही थी, प्रियदर्शिनीजी. मैं ने आप से कहीं अधिक दुनिया देखी है. आप मेरी बात मानिए, अपनी इस प्रियदर्शिनी छवि को दुनिया की रेलमपेल में मत सुलझाइए. खैर, आप का काम 8 दिन में हो जाएगा. अच्छा.’’ दोनों हाथ जोड़ कर नमस्ते कहते हुए प्रियदर्शिनी ने विदा ली.

‘‘दीदी, हमारे लिए नाश्ता आएगा?’’

‘‘दीदी, स्कूल के सब बच्चों के लिए एक से कपडे़ आएंगे?’’

‘‘दीदी, सफेद कमीज और लाल रंग की निकर ही चाहिए.’’

‘‘नए बस्ते भी मिलेंगे?’’

‘‘और नई स्लेट भी?’’

‘‘मैं तो नाचने वाला बंदर ले कर खेलूंगा.’’

‘‘दीदी, नाश्ते में केला और दूध भी मिलेगा?’’

‘‘अरे हट. दीदी, नाश्ते में मीठीमीठी जलेबियां आएंगी न?’’

बच्चों की जिज्ञासा और खुशी ने उसे और भी उत्साहित कर दिया.

8वें दिन कमला देवी की कार उसे लेने आई तो उस के मन में उन के लिए कृतज्ञता के भाव उमड़ आए. जो हो, जैसी भी हो, उन्होंने आखिर प्रियदर्शिनी का काम तो करवा दिया न.

उस की साड़ी देख कर कमला देवी ने मुंह बिचकाया और जोरजोर से हंस कर बोलीं, ‘‘अरे, प्रियदर्शिनीजी, कम से कम आज तो आप कोई सुंदर सी साड़ी पहन कर आतीं. फोटो में अच्छी लगनी चाहिए न. फोटोग्राफर का इंतजाम मैं ने करवा दिया है. कल के अखबारों में समाचार समेत फोटो आ जाएगी. अच्छा, चलिए, फोटो में आप थोड़ा मेरे पीछे हो जाइए तो फिर साड़ी की कोई समस्या नहीं रहेगी.’’

कार अपने गंतव्य की ओर बढ़ने लगी तो धीमी आवाज में कमला देवी ने कहा, ‘‘देखिए, प्रियदर्शिनीजी, आप के नाम पर 5 हजार का चेक मिलेगा. वह आप मुझे दे देना. मैं आप को ढाई हजार रुपए उसी समय दे दूंगी.’’

प्रियदर्शिनी ने कुछ असमंजस में पड़ कर पूछा, ‘‘तो बाकी ढाई हजार आप कब तक देंगी?’’

‘‘कब का क्या मतलब? प्रिय- दर्शिनीजी, हमें समाजसेवा के लिए कितना कुछ खर्च करना पड़ता है. ऊपर से ले कर नीचे तक कितनों की इच्छाएं पूरी करनी पड़ती हैं और फिर हमें अपने शौक और जेबखर्च के लिए भी तो पैसा चाहिए.’’

प्रियदर्शिनी को लगा उस की संवेदनाएं पथरा रही हैं. कमला देवी अभी तक बोले जा रही थीं, ‘‘प्रियदर्शिनीजी, आप बुरा मत मानिए. लेकिन यह ढाई हजार रुपए क्या आप पूरा का पूरा स्कूल के लिए खर्च करेंगी? भई, एकआध हजार तो अपने लिए भी रखेंगी या नहीं, खुद के लिए?’’

समाज कल्याण कार्यालय के दरवाजे तक पहुंच चुकी थीं दोनों. तेजी के साथ प्रियदर्शिनी पलट गई. तेज चाल से चल कर वह सड़क पर आ गई. सामने खडे़ रिकशे वाले को घर का पता बता कर वह निढाल हो कर उस में बैठ गई. उस की आंखों के सामने बारबार कमला देवी का मेकअप उतर जाने के बाद दिखने वाला विद्रूप चेहरा उभर कर आने लगा. उन की छद्म हंसी सिर में हथौड़े मारती रही. उन का प्रश्न रहरह कर कानों में गूंजने लगा, ‘फिर आप समाजसेवा कैसे करेंगी?’

जाहिर था प्रियदर्शिनी के पास तथाकथित समाजसेवियों वाला कोई मुखौटा तो था ही नहीं. Hindi Story

लेखक – प्रतिमा डिके

सौतेली मां से बनाया संबंध

सवाल

Personal Problem: मैं 28 साल का हूं. मेरे पिता नहीं हैं. घर में सिर्फ 35 साला मां हैं. रात को वे बगैर कपड़ों के सोती हैं और मैं भी उन्हीं के साथ सोता हूं और रातभर हमबिस्तरी के लिए तड़पता रहता हूं. 2 बार मां ने मुझे संबंध बनाने दिया, पर अब वे मना करती हैं. मैं क्या करूं, क्योंकि मुझ से रहा नहीं जाता है?

जवाब

मां आप से सिर्फ 7 साल बड़ी हैं. जाहिर है कि वे सौतेली हैं. भले ही वे सौतेली हों, पर आप को इस रिश्ते की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए. आप जल्दी से जल्दी अपने स्तर की लड़की खोज कर शादी कर लें. मां का मजाक न बनाएं.

मेरी शादी को 3 साल हो चुके हैं, पति रोजाना संबंध बनाने के लिए मारपीट

आप के पति कोई गुनाह नहीं कर रहे हैं, बस उन का तरीका गलत है. यही काम वे प्यार से भी कर सकते हैं. आप को भी अगर कोई तकलीफ होती है, तो उस बारे में पति को तसल्ली से बता सकती हैं. जब आप इतनी गहराई से जुड़ी हैं, तो बात करने में झिझकना नहीं चाहिए. वैसे, पति का हक है आप के साथ संबंध बनाना, लिहाजा मना न करें.

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

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मैं जब भी पति के साथ शारीरिक संबंध बनाती हूं तो जल्दी थक जाती हूं….

सवाल
मेरी समस्या मेरे और पति के शारीरिक संबंधों को ले कर है. मैं जब भी पति के साथ शारीरिक संबंध बनाती हूं तो जल्दी थक जाती हूं. शारीरिक संबंधों का पूरी तरह आनंद नहीं ले पाती क्योंकि इस दौरान मुझे दर्द होता है.

जवाब
कई बार जब महिला शारीरिक संबंध बनाने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होती तब उस के साथ ऐसी ही समस्या पेश आती है जैसी आप के साथ आ रही है. इस के अलावा वैजाइनल ड्राइनैस भी सैक्स संबंधों के दौरान दर्द का कारण बनता है, इस के लिए आप चाहें तो किसी स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क कर सकती हैं.

सैक्स संबंध को सुखद बनाने के लिए फोरप्ले (चुंबन, सहलाना आदि) जैसी क्रियाएं अवश्य करें. जिस तरह संबंधों को प्रगाढ़ बनाने के लिए सैक्स जरूरी होता है, ठीक उसी तरह फोरप्ले भी जरूरी होता है.

फोरप्ले सैक्स से पहले की कुछ ऐसी क्रियाएं हैं जिन से सैक्स का न केवल खुल कर आनंद लिया जा सकता है बल्कि सैक्स के मजे को दोगुना भी किया जा सकता है. फोरप्ले न केवल सैक्स संबंधों का जरूरी हिस्सा होता है बल्कि इस से आप के साथी की भी सैक्स में रुचि बढ़ती है. यदि आप फोरप्ले करते हैं तो आप अधिक समय तक सैक्स का आनंद उठा पाएंगे. फोरप्ले मूड को तरोताजा करता है, शरीर को रोमांच से भर देता है. फोरप्ले पतिपत्नी को सैक्स के लिए तैयार करता है. Personal Problem

 

Hindi Kahani: एक अदद वीडियो

Hindi Kahani: रात को सोते सोते फ़ोन उठा मलया , ददन में तो काम कहााँ पीछे छोड़ते हैं , कटरीना कै फ का वीडियो ककसी ने भेजा था जजसमे मैिम बततन धो रही हैं , यह एक वीडियो क्या देख मलया , ददन भर की थकान भूल कर मेरे ददमाग मेंयह महान ववचार आ गया कक बतनत तो मैंभी धो रही हूाँ , वीडियो तो मैंबना ही सकती हूाँ , इसकी तरह कुछ औरतो कर नहीीं सकती , एक वीडियो तो बना ही सकती हैं.

अजीब से उत्साह से भर गया मन , पर इसके मलए तो मोहन और बच्चों की हेल्प लेनी पड़ेगी , ओह्ह , आज ही क्यों कम काम करने पर दिया बच्चों को, पता नहीं कल मेरा वीडियो ठीक से बनाएंगे या नहीीं ।ओह्ह , मोहन से भी एक प्यार दिखाना पड़ेगा.  मैंने देखा , मोहन अभी सोये नहीं हैं , स्वर में जजतनी ममठास घोल सकती थी , घोल  , ”मोहन प्यारे ! सो गए क्या ?”

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लॉक डॉउन के बाद मैंने शायद पहली बार उन्हें अपने ख़ास अींदाज में आवाज दी थी ,शायद उन्हें यकीन नहीीं हुआ मुझे ध्यान से देखा , ”राधा रानी ! उन्होंने भी अपने स्पेशल अंदाज में कहा ,”क्या हुआ , तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ?”मैंने अपने सारी आदते दिखाते हुए कहा ,”कल मेरा एक काम कर दोगे ? मोहन प्यारे !””ओह्ह , अब समझा , काम है ! ओह्ह , बोलो , बतनत तो सारे धो आया हूाँ ।

””अरे , तुम तो लॉक उन में एकदम हाउस वाइफ बन गए , प्रिये !”’अब ड्रामा बींद करो , बताओ , क्या करना हैकल मुझे ! ””कल मेरा एक वीडियो बना दोगे ?””अरे , उसमे क्या है , अभी बना दाँू? जबसे लॉक िाउन हुआ है , नाइटी में ही तो रहती हो ”अभी टाइम नहीीं था कक चचढ जाऊीं , नुकसान मेरा होता । कहा ,” नहीीं , अभी नहीीं , कल जब बततन धोऊीं गी, तब बनाना ”

मोहन को जैसे हसी का दौरा पड़ गया , कफर बोले ,” राधा , तुम्हे हुआ क्या ? आज ज्यादा थक गयी क्या ?””नही, थकान छोड़ो । ये देखो ,”कहकर मैंने उन्हें कटरीना का वीडियो ददखाया , उन्होंने देखकर एक ठीक साींस भरी तो मैं जल उठी , कहा ,” आहें भरो , बस , और क्या ! मदत कहीीं के !”
उन्हें बहुत जोर से हसी आ गयी , यह कौनसी गाली हुई ?”” यह मेरे टाइप की गाली है , ऐसा वीडियो बनाना मेरा कल ””ठीक है , राधा रानी , अब सो जाओ ” मोहन तो सो गए , मैं जरा एक्ससाइटेि हो उठी थी , नीींद ही नहीीं आ रही थी ,

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अपने मन को ही समझाया , राधा , सो जाओ , कल कफर गधे जैसे काम करने हैं , बस ये वीडियो बन जाए.सारी फ्रेंड्स को भेजूींगी , या इीं्टाग्राम और फेसबुक पर ही   बतनत मसफत कटरीना थोड़े ही धो रही है , हम भी धो रहे हैं , भाई ”सुबह उठ कर सबसे पहले बच्चों ववनी और आरुल को प्यार ककया , बच्चे कल की िाींट शायद भूल चुके थे , मलपट गए मुझसे ,” बोले ,”मम्मी , आज भी आपके साथ काम करवाने हैं ?”

”हााँ ,बच्चों , जब तक मेड्स नहीीं आती , तब तक तो मम्मी की हेल्प करनी पड़ेगी न , बेटा।” बच्चे मुझे ध्यान से देखने लगे , सुबह सुबह मम्मी इतने प्यार से बोल क्यों रही है ? आरुल ने पूछ ही मलया ,” क्या हुआ , मम्मी ?””कुछ नहीीं ,बेटा , जल्दी से तमु लोग फ्रेश हो जाओ ,”कफर मैंने धीरे से कहा ,”एक काम है , सब इक्कठे हो जाओ ,पापा भी रो हो रहे हैं ।” ”पर क्यों ,मम्मी ?”

” वो मैंबतनत धोने जा रही हूाँ ,तो मुझे अपना वीडियो बनवाना हैबतनत धोते हुए , आजकल देख रहे हो न , सारी सेमलबिटीज घर के काम करते हुए वीडियो बना रही हैं.”बच्चे एक दसू रे को देख कर जैसे मु्कुराये , मन हुआ एक लगा दाँू, पर नहीीं , यह कफर कभी ! बच्चे जब तक फ्रेश होकर आये , मोहन ने कहा , राधा , मेरी एक जरुरी मीदटींग है ,अभी , मुझे जल्दी से नाश्ता दे दो ”

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”पर , मोहन , मेरा वीडियो ?””ववनी बना देगी न ,  वरी” मैंने मोहन को जल्दी से सैंिववच ददए , मोहन ने लैपटॉप खोल ककया ,मैंने कहा , आओ ववनी , अपना फ़ोन ले आओ ””मम्मी , अभी चाजजिंग पर लगाया है , जब तक नाश्ता कर लें ?” मनैं  बुझे मन से नाश्ते का काम ननपटाया , दस बज गए थे , अभी तक मेरे वीडियो का नींबर नहीं आया था , रात को सोचा था , सुबह उठते ही वीडियो शूट होगा । पर अजी कहाीं, यह कटरीना का वीडियो बनाया ककसने था ? लॉक डॉउन में उनकी मेि आ रही थी क्या ? या फुल की होगी ! पर कफर कटरीना बतनत क्यों धोएगी !कौन देगा इसका जवाब , छोड़ो !

मैंने मसैज ठीक पर अपनी पोजीशन बनायीीं , ववनी से कहा , बेटा, जजतनी भी चाजजिंग हो गयी हो , ले आओ अभी ”
वह अपना फ़ोन लेकर आयी , कफर मुझे ऊपर से नीचे देखकर बोली ,”मम्मी , यह टी शटत इस पाजामे पर अच्छीनहीीं लग रही है , चेंज कर लो ”मैं फौरन हाथ धोकर टी शटत चेंज कर आयी , आरुल बोला,” मम्मी , पर मुझे एक चीज समझ नहीीं आ रही , आप अपने वीडियो का क्या करोगी ?”’फ्रेंड्स को भेजूगी ”
”तो उनके मलए कौन सा ये नयी चीज होगी , सब बततन ही तो धो रही हैं ”

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मेरे चेहरे से ववनी को समझ आ गया कक मुझे गु्सा आ रहा है , बोली , आरुल , चुप रहो , वीडियो बनाने दो ,मम्मी उसके बाद वीडियो का कुछ भी करें , तुम्हे क्या ,” कहते कहते ववनी को भी हसी आ गयी तो मैंने चढ़ती ,इससे पहले ही उसने कहा ,” मम्मी , आपका चेहरा बहुत मसपीं ल लग रहा है , थोड़ा बहुत मेक अप कर लो ””सुबह सुबह ? बबना नहाये धोये ?”” तो मम्मी , आप पहले नहा धोकर अच्छी तरह रेिी क्यों नहीीं हो जाती ? जब बनाना ही है तो बदढ़या बनाते हैं.

मैंने मस ींक में पड़े बततन देखे ,” पर ये तो अभी धोने हैं ”तो इन्हे धो लो आप , बततन तो कफर हो जायेंगें ”आज आरुल का टनत पोछा लगाने का था , उसने होमशयारी ददखाई ,” मम्मी , बततन का वीडियो ही जरुरी तो नहीं है आओ , आप पोछा लगा लो , मैंआपका वीडियो बना दींगू ”
मैंने कहा ,”न , बेटा , पोछा तो तुम ही लगाओगे ”

दोनों बच्चे ककचन से ननकल गए , मनैं  टूटे मन से बतनत धो मलए , आज पहली बार सोचा कक कब दोबारा धोऊंगी.बततन , कब वीडियो बनेगा । उसके बाद खाने के काम ननपटाए , दोनों बच्चे सफाई में हेल्प करते रहे , आज मोहन
बच गए थे , ऑकफस के काम ने आज उन्हें बचा मलया था , मैंने मन ही मन दहसाब लगाया कक शाम को उनसेक्या क्या काम करवा सकती हूाँ । नहा धोकर लींच बनाया , दोपहर में सबने साथ ही खाया , मैं अब जल्दी से बततन धोना चाहती थी ,

इतने में मेरी फ्री फ़ोन आ गया , उसे भी बताया कक अभी थोड़ी देर में मेरे इंस्टाग्राम पर मेरा
एक वीडियो जरूर देखना , वो पूछती रही , मैं उसे नचाती, चचढ़ाती रही , आज टाइम नहीीं था , बस आधा घींटा बातकरके फ़ोन रख ददया तो जाकर देखा , तीनो सो रहे थे । मझुे ऐसा झटका लगा कक पूछो मत
गु्से में सारे बतनत खूब आवाज करके धोये पर कोई नहीीं उठा. कुम्भकणत की औलादें ! सब चार बजे सोकर उठे.मैंने ककसी से बात नहीीं की , सबको समझ आ गया. मोहन ने आवाज दी ,” राधा रानी , चाय तो वपला दो , कुछ ्नैक्स भी बना लो , तो बततन कफर हो जायेंगे ,” कहकर जब वे हाँसे तो मुझे आग लग गयी .

चाय का कप उन्हेंदेकर अपनी चाय दसू रे रूम में ले जाकर पीने लगी तो वे वहीं आ गए ,”गु्सा क्यों होती हो ? राधा रानी , ये बततन कहााँ भागे जा रहे हैं ?””इंसान का एक मूि होता हैन कुछ करने का ?”मैं गुरातई
” हााँ ,ये तो है ”मैं कफर सीररयस ही रही , , मोहन बोले , ‘ चलो , तुम ये दो कप धो , मैं बनाता हूं वीडियो ”
”दो कप में मजा नहीीं आएगा , फे क लगेगा ””ठीक है , डिनर के बाद ?””ओके ”

मैं अब ये भी सोच रही थी कक पैपराजी के मारे हैं ये मसतारे , इन्हे आजकल घर में बैठे अटेंशन नहीीं ममल रहा है तो वीडियो ही पो्ट ककये जा रहे हैं , मुझे क्यों शौक चरातया है , शाम होते होते काम के बोझ से मेरा आज वीडियो बनाने का शौक ख़तम होने लगा था , कोई मेि न होने से शाम तक तो हालत खराब हो जाती .डिनर के बाद सब मुझे गींभीर देख वीडियो बनाने की बातें करने लगे ,मोहन ने कहा ,” जाओ , राधा , अच्छी तरह से तैयार हो जाओ ,

सब फ्री हैं , चलो , वीडियो बनाते हैंतुम्हारा ”ववनी ने कहा ,” मम्मी , मैंआपका मेक अप कर दाँगू ी , आप वप ींक टी शटत पहन लो ”मैंने कहा , ” वप ींक टी शटत प्रेस नहीीं है , आरुल , प्रेस कर दो फटाफट ”
‘हााँ , मम्मी , करता हूाँ ”मेरा मन दलु ार से भर उठा , वैसे हैंये प्यारे सब  इतने में अरुल की िरी हुई आवाज आयी , मम्मी , मम्मी , ”सब भागे , देखा , मेरी टी शटत जल चुकी थी , मन हुआ सबको पीट कर रख दाँू सब चुप चाप मेरा मुाँह देख रहे.

थे , मनैं  कुछ नहीीं कहा , मैंथक चुकी थी ,टी शटत  बबन में फें की , नाईट गाउन पहना , कुछ काम ननपटाए ,सोने की तैयारी करने लगी , सन्नाटा सा रहा , मोहन ने ही लेटते हुए दहम्मत की ,” राधा , कल सुबह उठते ही Hindi Kahani

मैसेज पर हावी मैलोड्रामा – दादी की शादी

Dadi Ki Shaadi Review: आज के दौर में जहां परिवार एक ही घर में रह कर भी एकदूसरे से दूर होते जा रहे हैं, वहां ‘दादी की शादी’ रिश्तों की उसी खोती गर्माहट को वापस पकड़ने की कोशिश करती है. फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या बुजुर्गों को सिर्फ दवाइयों, पूजापाठ और अकेलेपन तक सीमित कर देना चाहिए? क्या उन्हें दोबारा प्यार करने या अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने का हक नहीं है? इसी सोच के इर्दगिर्द घूमती है यह पूरी फिल्म.

शिमला की खूबसूरत वादियों में रहने वाली विमला आहूजा (नीतू कपूर) अकेली जिंदगी बिता रही हैं. उन के 2 बेटे हैं. बड़ा बेटा जीवन (दीपक दत्ता) दिल्ली में पत्नी अनीता और बेटी कन्नू (सादिया खतीब) के साथ रहता है जबकि छोटा बेटा नाग (जितेंद्र हुड्डा) चंडीगढ़ में अपने परिवार के साथ सैटल है. बेटी सुनैना विदेश में रहती है. तीनों बच्चे अपनीअपनी जिंदगियों में इतने व्यस्त हैं कि मां से मिलने का वक्त नहीं निकाल पाते.

इधर दिल्ली में कन्नू की शादी टोनी कालरा (कपिल शर्मा) से तय होती है. टोनी का बाप बड़ा बिजनैसमैन है. सगाई वाले दिन टोनी का पूरा परिवार जीवन के घर लड़की देखने आता है. सगाई का माहौल है, ढोलनगाड़े हैं, खुशियां हैं. लेकिन उसी दौरान शिमला में विमला फेसबुक चलाना सीखते हुए गलती से पोस्ट कर देती हैं, ‘आई एम गेटिंग मैरिड सून’.

दरअसल, वे अपनी पोती की शादी के बारे में लिखना चाहती थीं. पोस्ट वायरल होती है और पूरे परिवार में भूचाल आ जाता है. टोनी का परिवार रिश्ता तोड़ देता है और बच्चों को लगता है कि मां ने इस उम्र में शादी की बात कह कर उन की इज्जत मिट्टी में मिला दी. इस के बाद पूरा परिवार शिमला पहुंचता है, मकसद सिर्फ दादी की शादी रुकवाना. लेकिन सालों बाद बच्चों को अपने घर में देख कर विमला खुश हो जाती हैं. पर जब उन्हें पता चलता है कि सब शादी रुकवाने आए हैं, तो वे टूट जाती हैं. उन्हें एहसास होता है कि बच्चे प्यार से नहीं, बल्कि अपनी ‘सोसायटी वाली इमेज’ बचाने आए हैं, यहां फिल्म इमोशनल मोड़ लेती है.

कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब विमला की मुलाकात रिटायर्ड ब्रिगेडियर थिरन देवराजन (आर शरत कुमार) से होती है. ब्रिगेडियर उस दौरान शिमला आया हुआ रहता है. विमला उन से रिक्वैस्ट करती हैं कि प्लीज, कुछ दिन मेरे होने वाले पति बनने का नाटक करो, ताकि बच्चे रुक जाएं. ब्रिगेडियर मान जाते हैं. इस के बाद फिल्म में फैमिली ड्रामा, इमोशनल टकराव और प्रौपर्टी को ले कर रिश्तों की असलियत सामने आने लगती है. बच्चे मां पर किए खर्च गिनाने लगते हैं, किस ने दवाओं का बिल भरा, किस ने टिकट कराया, किस ने पैसे भेजे.

फिल्म का विषय मजबूत और जरूरी है. बुजुर्गों के अकेलेपन और परिवारों के भावनात्मक टूटने की बात फिल्म ईमानदारी से कहती है. लेकिन दिक्कत इस के ट्रीटमैंट में है. निर्देशक आशीष आर मोहन कहानी को कई जगह पुराने टीवी सीरियल जैसा बना देते हैं. हर थोड़ी देर में तेज इमोशनल बैकग्राउंड म्यूजिक, लंबे संवाद और जरूरत से ज्यादा मेलोड्रामा फिल्म की पकड़ कमजोर करते हैं. लगभग ढाई घंटे लंबी फिल्म कई जगह खिंची हुई महसूस होती है.

नीतू कपूर फिल्म की जान हैं. उन के चेहरे की मासूमियत, अकेलेपन की तकलीफ और हलकी शरारत सबकुछ बेहद नैचुरल लगता है. वे स्क्रीन पर आते ही फिल्म में जान डाल देती हैं. कपिल शर्मा अपनी कौमिक इमेज से बाहर निकलने की कोशिश करते नजर आते हैं. कुछ इमोशनल सीन्स में वे अच्छे लगते हैं लेकिन रोमांटिक हीरो वाली फील पूरी तरह नहीं आती.

सादिया खतीब ने सादगी से काम किया है. आर शरत कुमार की पर्सनैलिटी प्रभावशाली है हालांकि उन के किरदार को और बेहतर लिखा जा सकता था. रिद्धिमा कपूर अपनी डैब्यू फिल्म में ठीकठाक रहती हैं, लेकिन खास असर नहीं छोड़ पातीं. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. शिमला की लोकेशन्स स्क्रीन पर खूबसूरत दिखती हैं और परिवार वाली गर्माहट पैदा करती हैं. हालांकि, गाने और बैकग्राउंड स्कोर याद नहीं रह पाते.

‘दादी की शादी’ पूरी तरह खराब फिल्म नहीं है. इस में एक जरूरी मैसेज है और कुछ अच्छे इमोशनल पल भी हैं. लेकिन कमजोर लेखन और जरूरत से ज्यादा खिंचे ड्रामे की वजह से यह ज्यादा असर नहीं छोड़ पाती. Dadi Ki Shaadi Review

Ek Din Movie Review: एक दिन

Ek Din Movie Review: यह 2016 में आई थाई फिल्म ‘वन डे’ की रीमेक है. कहानी सेम है. फिल्म दो लोगों पर केंद्रित है, जो एक विश के चलते एक दिन के लिए एकदूसरे के करीब आते हैं. फिल्म का आइडिया बेवकूफाना है मगर स्टोरी को किक देने के लिए चल जाता है. असल समस्या यह है कि फिल्म उस भावनात्मक गहराई तक पहुंच ही नहीं पाती जहां इन दोनों का प्यार दर्शकों को महसूस हो सके.

फिल्म की कहानी दिनेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ डीनो (जुनैद खान) के इर्दगिर्द घूमती है. डीनो ऐसा लड़का है जिसे औफिस में शायद ही कोई नोटिस करता है. वह आईटी सपोर्ट में काम करता है, इंट्रोवर्ट है और खुद को ‘इनविजिबलमैन’ मान चुका है. उसे लगता है उसे कोई क्यों ही पसंद करेगा. उस की जिंदगी की सब से बड़ी खुशी है मीरा (साईँ पल्लवी) को देखना. मीरा औफिस की वह लड़की है जिस से हरकोई प्रभावित है, लेकिन मीरा अपने बौस नकुल (कुनाल कपूर) के साथ रिश्ते में है, जो खुद अपनी शादी और अफेयर के बीच झूल रहा है.

कंपनी का स्टाफ 5 दिनों की ट्रिप पर जापान जाता है. डीनो वहां पहुंच कर विश बेल के आगे मन्नत मांगता है कि एक दिन के लिए मीरा उस की गर्लफ्रैंड बन जाए. उस की विश पूरी हो जाती है. एक हादसे में मीरा को टीजीए नाम की रेयर कंडीशन हो जाती है जिस में उस की एक दिन के लिए याददाश्त चली जाती है. इसी एक दिन में वह डीनो के करीब आ जाती है. फिल्म का तीनचौथाई हिस्सा इसी ‘एक दिन’ का है जिस में दोनों जापान में घूम रहे होते हैं. बर्फीली गलियों में घूमते हैं, बातें करते हैं, खाना खाते हैं और धीरेधीरे करीब आते हैं. सोचने में यह रोमांटिक लगता है, लेकिन फिल्म देखते हुए महसूस नहीं होता. आप कहानी को समझते जरूर हैं, लेकिन उस में डूब नहीं पाते.

असल समस्या डीनो और मीरा की कैमिस्ट्री है. डीनो का किरदार निभा रहा भारीभरकम जुनैद बहुत ही हलका दिखाई देता है. ऐसा लगता है वह एक ही टोन में फंसा है, कोई एक्सप्रैशन नहीं बदलता. फिल्म उसे ‘शर्मीला’ और ‘इनसिक्योर’ दिखाना चाहती है, लेकिन उस की लाइफ में इतना कुछ घट जाने के बाद भी हावभाव गायब लगते हैं. वह प्रेमी कम स्टौकर ज्यादा लगता है.

फिल्म की सब से अच्छी चीज जापान की बर्फीली लोकेशंस, शांत सड़कें और धीमा बैकग्राउंड म्यूजिक है. कई जगह फिल्म देखने में खूबसूरत लगती है, यह कुछकुछ कोरियन रोमांटिक ड्रामा जैसी फील कराती है. लेकिन इस के बावजूद यह इमोशनलेस लव स्टोरी बन कर रह जाती है. साईं पल्लवी का काम अच्छा है. उस ने साउथ इंडियन की भूमिका निभाई है, हिंदी में दक्षिण भारतीय लहजा भी किरदार के हिसाब से नैचुरल लगता है. वह अपनी भूमिका में सहज लगी है, कुछ सीन में तो जान डाल दी है उस ने, जैसे जब उसे बौस कुनाल की हकीकत का पता चलता है और वह रोती है, या जब वह लबुबू डौल के लिए खुश होती है.

फिल्म का एक और कमजोर हिस्सा इस का लेखन है. कुछ संवाद अच्छे हैं. कई बार फिल्म खुद को बहुत ‘क्यूट’ बनाने की कोशिश में बनावटी लगने लगती है. फिल्म में अगर मीरा की याददाश्त खोने को जादुई एंगल से न भी जोड़ा जाता तो भी फिल्म में कुछ न बदलता. फिल्म खत्म होने के बाद कोई बड़ा असर नहीं छोड़ती, न इस के संवाद याद रहते हैं, न ही डीनो-मीरा की जोड़ी. फिल्म देख कर भुला देने लायक है. बस, सुकून यह कि सिर पर जोर नहीं पड़ता.

यह फिल्म हलकीफुलकी, शांत फिल्मों को पसंद करने वालों को ठीक लग सकती है. फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक अच्छा है. सुनील पांडे का डायरैक्शन ठीकठाक है. लोकेशन लाजवाब हैं. गाने अरिजीत सिंह से गंवाए गए हैं. ‘एक दिन…’, ‘ख्वाब देखूं…’ सुनने में अच्छे लगते हैं. सिनेमेटोग्राफी बढ़िया है. Ek Din Movie Review

 

 

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