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Family Story In Hindi : खिलौना – क्यों रीना अपने ही घर में अनजान थी?

Family Story In Hindi : पलक बहुत ही खोईखोई सी घर के एक कोने में बैठी थी. न जाने क्यों उसे यह घर बहुत अजनबी सा लगता था. बिजनौर में सबकुछ कितना अपनाअपना सा था. सबकुछ जानापहचाना, कितने मस्त दिन थे वे… पासपड़ोस में घंटों खेलती थी और बड़ी मम्मी कितने प्यार से पकवान बनाती थीं. स्कूल में हमेशा प्रथम आती थी वह. वादविवाद प्रतियोगिता हो या गायन, पलक हमेशा ही अव्वल आती.

रविवार का दिन तो जैसे एक त्यौहार होता था। पासपड़ोस के अंकलआंटी आते थे और फिर घर की छत पर मूंगफली और रेवड़ी की बैठक होती थी. बड़े पापा, मम्मी अपने बचपन के किस्से सुनाते थे. पलक घंटों अपनी सहेलियों के साथ बैठ कर उन पलों में सारा बचपन जी लेती थी.

पूरा दिन 24 घंटों में ही बंटा हुआ था। यहां की तरह नही था कि कुछ पलों में ही खत्म हो जाता है।

तभी ऋषभ भैया अंदर आए और बोले,”पलक, तुम यहां क्यों एक कोने में बैठी रहती हो? क्या प्रौब्लम है।”

ऋषभ भैया अनवरत बोले जा रहे थे,”यह दिल्ली है, बिजनौर नहीं। यह क्या अजीब किस्म की जींस और ढीली कुरती पहन रखी हैं…पता है कल मेरे दोस्त तुम्हें देख कर कितना हंस रहे थे।”

पलक को समझ नहीं आ रहा था, जो कपड़े बिजनौर में मौडर्न कहलाते थे वे यहां पर बेकार कहलाते हैं. पलक सोच रही थी कि बड़ी मम्मी, पापा ने तो उसे दिल्ली में पढ़ने के लिए भेजा था पर यहां के स्कूल में तो लगता है पढ़ाई के अलावा सारे काम होते हैं. सब लोग धड़ाधड़ इंग्लिश बोलते हैं, कैसीकैसी गालियां देते हैं कि उस के कान लाल हो जाते हैं।

वैसे इंग्लिश तो पलक की भी अच्छी थी पर न जाने क्यों दिल्ली में उसे बहुत झिझक होती है.

आज ऋषभ भैया और मम्मीपापा पलक को मौल ले कर गए थे, शौपिंग कराने के लिए। इतना बड़ा मौल पलक ने इस से पहले कभी नहीं देखा था.

जब पलक छोटी थी तो बारबार उस के दिमाग मे यही बात आती थी कि वह नानानानी के साथ क्यों रहती है?

पेरैंटटीचर मीटिंग में वह अपने नानानानी को ले कर नहीं जाना चाहती थी, क्योंकि सब की मम्मी इतनी सुंदर, जवान और नएनए स्टाइल के कपड़े पहनती हैं और उस की नानी खिचड़ी बाल और उलटीसीधी साड़ी पहन कर जाती थी.

एक बार उस ने अपनी नानी से पूछ ही लिया,”मैं अपने मम्मीपापा के साथ क्यों नही रहती हूँ?”

नानी हंसते हुए बोली थीं,”क्योंकि कुदरत ने तुम्हें अपने नानानानी के जीवन मे रंग भरने भेजा है.”

पलक को कुछ समझ नहीं आता था पर यह दुविधा उस के बालमन में हमेशा रहती थी. बस इस के अलावा उस की जिंदगी में सब कुछ परफैक्ट था.

जब कभी कभी पलक की मम्मी रीना दिल्ली से अपने बेटे ऋषभ के साथ आती थी तो पलक को बहुत बुरा लगता था. उन दिनों पलक की नानी कितनी अजनबी हो जाती थीं. सारा दिन वह रीना के चारों तरफ घूमती थीं. ऋषभ भैया उसे कितनी हेयदृष्टि से देखते थे.

पलक जब 11 साल की हुई तो उस के जन्मदिन पर उस की मम्मी ने उसे पूरी कहानी बताई कि पलक की बेहतर देखभाल के लिए ही वह नानानानी के पास रहती है और जल्द ही पलक को वे लोग दिल्ली ले जाएंगे.

कितनी खुश हुई थी पलक यह सुन कर कि जल्द ही वह अपने मम्मीपापा के साथ चली जाएगी.

उस बार जब छुट्टियों में रीना बिजनौर आई हुई थी तो पलक रीना को कर अपने स्कूल पेरैंटटीचर मीटिंग में ले कर गई. दोस्तों को उस ने बहुत शान से अपनी मम्मी से मिलवाया था.

रीना बहुत खुश हो कर पलक के साथ उस के स्कूल गई थी, क्योंकि अब वह अपनी बेटी को उस के बेहतर भविष्य के लिए दिल्ली ले कर जाना चाहती थी.

पलक का स्कूल देख कर रीना को धक्का लगा था, क्योंकि पलक का स्कूल छोटा और पुरानी तकनीक पर आधारित था.

आते ही रीना अपनी मां से बोली,”मम्मी, अब पलक को दिल्ली ले कर जाना ही होगा। इस छोटे शहर में पलक का ठीक से विकास नहीं हो पाएगा। इस के स्कूल में कुछ भी ठीक नही है।”

पलक की नानी रुआंसी हो कर बोलीं,”रीना, तुम भी तो इसी स्कूल में पढ़ी थीं और बेटा तुम तो पलक को इस दुनिया मे लाना ही नहीं चाहती थी। वह तो जब मैं ने सारी जिम्मेदारी उठाने की बात की थी तब तुम उसे जन्म देने के लिए तैयार हुई थी।”

रीना बेहद महत्त्वाकांक्षी युवती थी. जब उस का बेटा ऋषभ 3 वर्ष का ही हुआ था तब पलक के आने की आहट रीना को मिली थी। ऋषभ की जिम्मेदारी, नौकरी और घर की भागदौड़ में रीना थक कर चूर हो जाती थी. ऐसे में एक नई जिम्मेदारी के लिए वह तैयार नहीं थी. वैसे भी उन्हें बस एक ही बच्चा चाहिए था, ऐसे में पलक के लिए उन की जिंदगी में कोई जगह नहीं थी.

दिल्ली में आसानी से गर्भपात नहीं हो सकता था इसलिए रीना बिजनौर गर्भपात कराने आयी थी. पर रीना के मम्मीपापा अपने अकेलेपन से ऊब चुके थे. बेटा विदेश में बस गया था. रीना को भी घरपरिवार और नौकरी के कारण यहां आने की फुरसत नहीं थी. इसलिए रीना के मम्मीपापा, जानकीजी और कृष्णकांतजी को ऐसा लगा जैसे यह कुदरत की इच्छा हो और यह बच्चा उन के पास आना चाह रहा हो…

कितनी मुश्किल से जानकी ने रीना को मनाया था। पूरे समय वे रीना के साथ बनी रही थीं ताकि उसे किसी बात की तकलीफ न हो.

पलक के जन्म के 2 माह बाद जानकी पलक को ले कर बिजनौर आ गई थी. रीना किसी
भी कीमत पर पलक की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती थी, इसलिए उस ने पलक को अपना दूध भी नहीं पिलाया था.

मां का दूध न मिलने के कारण पहले 2 साल तक पलक बेहद बीमार रही. जानकी और कृष्णकांतजी का एक पैर घर और दूसरा हौस्पिटल में रहता.

पासपड़ोस वाले कहते भी,”आराम के वक्त इस उम्र में यह क्या झंझाल मोल ले लिया है…” पर जानकी की जिंदगी को एक मकसद मिल गया था. उन की दुनियाभर की बीमारियां एकाएक गायब हो गई थीं.

सारा दिन कैसे बीत जाता था जानकी को पता भी नहीं लगता था। पलक के साथ जानकी ने बहुत मेहनत की थी. 4 वर्ष की होतेहोते पलक एकदम जापानी गुड़िया सी लगने लगी थी.

अब जब भी छुट्टियों में रीना घर जाती तो पलक की बालसुलभ हरकतें और उस का भोलापन देख कर उस की सोई हुई ममता जाग उठती थी. पर रीना किस मुंह से अपनी मां से यह कहती, क्योंकि वह तो पलक को इस दुनिया में लाना ही नहीं चाहती थी और न उस की कोई जिम्मेदारी उठाना चाहती थी। इसलिए कितनेकितने दिनों तक वह अपने मम्मीपापा के पास बिजनौर फोन भी नहीं करती थी.

धीरेधीरे समय बीतता गया और ऋषभ भी अब किशोरवस्था में पहुंच गया था. ऋषभ अब अपनी ही दुनिया में व्यस्त रहता.

जब रीना ने अपने पति पराग से इस बात का जिक्र किया तो उस ने भी रीना को झिड़क दिया,”तुम कितनी खुदगर्ज हो रीना, अब पलक बड़ी हो गई है और ऋषभ की तरफ से तुम फ्री हो तो तुम्हें पलक याद आने लगी है और तुम्हें यह एहसास होने लगा है कि तुम पलक की मम्मी हो?

“याद है तुम्हें जब वह 7 महीने की थी और बेहद बीमार थी, तुम्हारी मम्मी ने तुम से आने के लिए कहा था पर तुम औफिस के काम का हवाला दे अमेरिका चली गई थी.

“हर वर्ष जब हम छुट्टियों में घूमने जाते थे तो मैं कितना कहता था कि पलक को भी साथ ले लेते हैं पर तुम हमेशा कतराती थीं क्योंकि तुम 2 बच्चों की जिम्मेदारी एकसाथ नहीं उठा सकती थीं…”

रीना चुपचाप बैठी रही और पलक को अपने घर लाने के लिए मंथन करती रही.

समय बीतता गया और रीना हर संभव कोशिश करती रही अपनी मम्मी को यह जताने की कि उन का पालनपोषण करने का तरीका पुराना है.

वह यह जताना चाहती थी कि पलक की बेहतर परवरिश के लिए उसे दिल्ली भेज देना चाहिए.

आज रीना को पलक के स्कूल जाने से यह मौका मिल भी गया. पलक 12 वर्ष की हो चुकी थी। रीना अपनी बेटी को अपने जैसा ही स्मार्ट बनाना चाहती थी. जब रीना की मम्मी ने अपनी बेटी की बात को अनसुना कर दिया तो रीना ने अपने पापा से बात की कि पलक की आगे की पढ़ाई के लिए उसे दिल्ली भेज देना चाहिए।

कृष्णकांतजी एक व्यवहारिक किस्म के इंसान थे। दिल से न चाहते हुए भी कृष्णकांतजी को पलक की भविष्य की खातिर रीना की बात माननी पड़ी.

पलक को जब पता चला कि वह अपने मम्मीपापा के साथ दिल्ली जा रही है तो वह बेहद खुश थी. पर जब सारा सामान पैक हो गया तो पलक एकाएक रोने लगी कि वह किसी भी कीमत पर नानानानी को छोड़ कर नहीं जाना चाहती…

उधर जानकीजी का घोंसला एक बार फिर से खाली हो गया था पर इस बार पंछी के उड़ने का दर्द अधिक
था. कृष्णकांतजी जितना जानकीजी को समझाते,”वह रीना की ही बेटी है और तुम्हे खुश होना चाहिए कि हमारी पलक बड़े और अच्छे स्कूल में पढ़ेगी पर जानकीजी को तो जैसे उस की दुनिया ही वीरान लगने लगी थी।

जानकीजी को पूरा विश्वास था कि पलक उन के बिना रह नहीं पाएगी. बेटी ने एक बार भी नहीं कहा था, इसलिए उन्हें खुद तो दिल्ली जाने की हिम्मत नही हुई थी पर पति कृष्णकांतजी की चिरौरी कर के घर के पुराने नौकर मातादीन को ढेर सारी मिठाईयों के साथ दिल्ली भेज दिया.

नई दुनिया, नए लोग और चमकदमक सभी को अच्छी लगती हैं और पलक तो फिर भी बच्ची ही थी. वह इस टीमटाम में अपने पुराने घर और साथियों को भूल गई थी. मातादीन को देख कर एक पल के लिए पलक की आंखों
में चमक तो आई पर नए रिश्तों के बीच फिर वह चमक भी धीमी पड़ गई थी.

मातादीन पलक को खुश देख कर उसे आशीष दे कर अगले दिन विदा हो गया था. मातादीन को विदा करते हुये रीना का स्वर कसैला हो उठा और
बोली,”काका, मम्मी को बोलिएगा, पलक की चिंता छोड़ दे, वह मेरी बेटी है, मैं अपनेआप संभाल लूँगी।”

दिल्ली आ कर मातादीन ने कहा,”बीबीजी, चिंता छोड़ दीजिए। पलक बिटिया नई दुनिया में रचबस गयी हैं।”

पर जानकीजी खुश होने के बजाए दुखी हो गई थीं और फिर से उन का शरीर बीमारियों का अड्डा बन गया था.

उधर 1 माह बीत गया था और पलक के ऊपर से चमकदमक की खुमारी उतर गई थी. अब पलक चाह कर भी अपनेआप को दिल्ली की भागतीदौड़ती जिंदगी में ठीक से ढाल नहीं पा रही थी.

स्कूल का माहौल उस के पुराने स्कूल से बिलकुल अलग था. घर आ कर पलक किस से अपने मन की बात कहे, उसे समझ ही नहीं आता था.

पलक बहुत कोशिश करती थी अपनेआप को ढालने की पर असफल ही रहती. नानानानी का जब भी बिजनौर से फोन आता तो पलक हर बार यही ही बोलती कि उसे दिल्ली में बहुत मजा आ रहा है. पलक
अपने नानानानी को परेशान नहीं करना चाहती थी.

पलक के मम्मीपापा सुबह निकल कर रात को ही आते थे. ऋषभ भैया अपने दोस्तों और दुनिया में व्यस्त रहते। पासपड़ोस न के बराबर था. यहां के बच्चे उसे बेहद अलग लगते थे।

जब पलक ने अपनी मम्मी से इस बारे में बात की तो 12 साल की बच्ची का अकेलपन दूर करने के लिए उस की मम्मी ने उसे समय देने के बजाए विभन्न प्रकार की हौबीज क्लासेज में डाल दिया।

पहले ही पलक स्कूल में ही ऐडजस्ट नहीं कर पा रही थी और अब गिटार क्लास, डांस क्लास, अबेकस क्लास
पलक को हौबी क्लासेज के बजाए स्ट्रैस क्लासेज लगती थी.

पलक की नन्हीं सी जान इतनी अधिक भागदौड़ और तनाव को झेल नहीं पाई थी. उस के हौंसले पस्त हो गए थे.

वार्षिक परीक्षाफल आ गया था और पलक 2 विषयो में फेल हो गई थी.

परीक्षाफल देखते ही रीना पलक पर आगबबूला हो उठी,”बेवकूफ लड़की, कितना कुछ कर रही हूं मैं तुम्हारे लिए… दिल्ली के सलीके सिखाने के लिए कितनी हौबी क्लासेज पर पैसे खर्च हो गए पर तुम तो रहोगी वही छोटे शहर की सिलबिल।”

पराग रीना को समझाने की कोशिश भी करता कि पलक और ऋषभ को एक तराज़ू पर ना तौले. पलक को थोड़ा समय दे, वह जैसे रहना चाहती है उसे रहने दे.

इतने तनाव का यह असर हुआ कि पलक को बहुत तेज बुखार हो गया था. पराग रात भर पलक के माथे पर गीली पट्टियां बदलता रहा था. रीना यह कह कर जल्दी सो गई कि अगले दिन औफिस में उस की जरूरी मीटिंग है.

रात भर बुखार में पलक तड़पती रही. अपनी बेटी को तड़पता देख कर पराग ने निर्णय ले लिया था.
पराग ने जानकीजी को फोन कर दिया और वे जल्दी ही शाम पलक के पास पहुंच गईं.

पराग ने खुद यह महसूस किया कि जानकीजी के आते ही पलक का बुझा हुआ चेहरा चमक उठा था.
जब रात को रीना औफिस से लौटी तो जानकीजी को देख कर वह सकपका गई.

रात में खाने की मेज पर बहुत दिनों बाद पलक ने मन से खाया और बोली,”नानी, यहां पर किसी को ढंग से खाना बनाना नहीं आता।”

रीना कट कर रह गई और बोली,”मम्मी, आप ने पलक की आदत खराब कर रखी है, हैल्थी फूड उसे पसंद ही नही हैं।”

जानकीजी कुछ न बोलीं बस पलक को दुलारती रहीं। 2 दिनों के अंदर ही पलक स्वस्थ हो कर चिड़िया की तरह चहकने लगी.

एक हफ्ते बाद जब जानकीजी अपना सामान बांधने लगीं तो पलक भी अपना बैग पैक करने लगी.

जानकीजी बोलीं,”पलक, तुम कहां जा रही हो?”

पलक बोली,”नानी, मैं आप के बिना नहीं रह सकती हूं, मुझे यहां नहीं पढ़ना।”

रीना चिल्लाने लगी,”मम्मी इसलिए मैं नहीं चाहती थी आप यहां आओ…

“आप ने उसे बिगाड़ दिया है, बिलकुल भी प्रतिस्पर्धा नही है पलक में, बिलकुल छुईमुई खिलौना बना कर छोड़ दिया है। मेरी बेटी इस दुनिया में कभी कुछ कर भी पाएगी या नहीं…”

जानकीजी इस से पहले कुछ बोलतीं कि तभी पराग बोल उठा,”खिलौना पलक को मम्मीजी ने बनाया है या तुम ने?”

“जब तुम्हारा मन था तुम पलक को बिजनौर छोड़ देती हो और जब मन करता है तब तुम सब की अनदेखी कर के पलक को दिल्ली ले कर आ जाती हो, बिना यह जाने कि इस में पलक की मरजी है या नहीं…”

रीना ने हलका सा विरोध किया और बोली,”मां हूं मैं उस की…”

पराग बोला,”हां तुम उस की मां हो और वह तुम्हारी बेटी है मगर कोई चाबी वाला खिलौना नहीं।”

रीना पराग पर कटाक्ष करते हुए बोली,”लगता है तुम बेटी की जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते हो, इसलिये यह सब बोल रहे हो।”

पराग रीना की बात सुन कर तिलमिला उठा क्योंकि उस में लेशमात्र भी सचाई नहीं थी।

इस से पहले पराग कुछ कहता, पलक ने धीरे से कहा,”मम्मी, मेरी खुशी मेरे अपने घर मे है, जो बिजनौर में है. यह भागदौड़, यह कंपीटिशन मेरे लिए नहीं हैं।”

इस से पहले कि रीना कुछ बोलती, जानकीजी बोलीं,”रीना, जो जहां का पौधा है वह वहीं पर पनपता है।”

रीना ने आगे कुछ नहीं कहा और चुपचाप अपने कमरे में चली गई. जाने से पहले पराग ने पलक को गले लगाते हुए कहा,”पलक जब भी तुम्हारा मन करे बिना एक पल सोचे चली आना और बेटा तुम्हारे 2 घर हैं एक बिजनौर में और दूसरा दिल्ली में।

“बेटा, कामयाबी कभी भी किसी जगह की मुहताज नहीं होती।”

पलक और जानकीजी को जाते हुए देख कर पराग सोच रहा था कि शायद खिलौने की चाबी अब खिलौने के पास ही है.

अब पराग अपनी बेटी की भविष्य को ले कर निश्चिंत हो गया था. Family Story In Hindi

Box Office : नहीं चली ‘मेट्रो इन दिनों’, फीका पड़ा अनुराग बसु का जादू

Box Office : फिल्म ‘मेट्रो इन दिनों’ बौक्स औफिस पर अपने पहले पार्ट ‘लाइफ इन मेट्रो’ जैसा कमाल नहीं दिखा पाई है. दर्शक फिल्म से कनेक्ट नहीं कर पाए.

2007 में अनुराग बसु ने एक फिल्म ‘लाइफ इन मेट्रो’’ बनाई थी, जिस में कोंकणा सेन शर्मा और इरफान खान जैसे कलाकार थे. इसे बौक्स औफिस पर अच्छी सफलता मिली थी. अब वही अनुराग बसु अपनी फिल्म ‘लाइफ इन मेट्रो’ का 18 साल बाद सिक्वअल ‘मेट्रो..इन दिनों’’ बनाई है, जिसे उन्होंने ‘स्प्रिचुअल रीमेक / आध्यात्मिक रीमेक का नाम दिया है, जबकि इस फिल्म में आध्यात्म का कहीं कोई नामोनिशान नहीं है.

जुलाई माह के पहले सप्ताह यानी कि 4 जुलाई को रिलीज हुई. इस फिल्म में नीना गुप्ता, कोंकणा सेन शर्मा, फातिमा सना शेख, सारा अली खान, अनुपम खेर, पंकज त्रिपाठी, अली फजल, आदित्य रौय कपूर और शाश्वत चटर्जी जैसे कलाकार हैं. लेकिन यह फिल्म उन की पिछली फिल्म ‘लाइफ इन मेट्रो’ के मुकाबले कहीं नहीं ठहरती.

यह फिल्म पूरी तरह से मुंबई के कोलाबा जैसे हाईफाई सोसायटी की ही कहानी लगती है. इस फिल्म में फिल्मकार ने इंसानी रिश्तों की बात करने के नाम पर सैक्स और हवस की ही बात की है. पूरी फिल्म में सैक्स की जगह अराजकता ही नजर आती है. फिल्म में एक दंपति की 12-13 साल की बेटी है, जो कि सैक्स को ले कर इतनी व्याकुल है कि वह अपनी मासी से पूछती है कि उसे लड़के को किस करना चाहिए या लड़की को किस करना चहिए? पूरी फिल्म में 4 अलगअलग शहरों, चार अलगअलग उम्र के दंपतियों की कहानी है. पर नवीनता कुछ भी नहीं है.

कहा जाता है कि अनुराग बसु ने इस फिल्म के लिए 250 दिन शूटिंग की. कई बार कई सीन रीशूट किए गए. और इस का बजट 150 करोड़ रूपए है. निर्माताओं का दावा है कि फिल्म ने पूरे सप्ताह भर में 32 करोड़ रूपए कमाए. जबकि सकनिल्क का दावा है कि फिल्म ने 24 करोड़ रूपए एकत्र किए. जबकि 150 करोड़ रूपए के बजट वाली फिल्म को ‘नो लौस नो प्राफिट’ के लिए तकरीबन 400 करोड़ रूपए कमाने चाहिए. इस तरह यह फिल्म पूरी तरह से डिजास्टर हो चुकी है. इतना ही नहीं लोग मान रहे हैं कि यह जो आंकड़े हैं वह भी फेक हैं. क्योंकि सिनेमा तो एकदम खाली पड़े रहे.

फिल्म के डिजास्टर होने की मूल वजह यह है कि दर्शक फिल्म के किरदारों और उन की हरकतों के सथ रिलेट नहीं कर पाता. फिल्म ‘मेट्रो इन दिनों’ में एक दंपति मुंबई का मोंटी (पंकज त्रिपाठी ) और काजोल (कोकणा सेन शर्मा ) हैं, इन की दो टीनएजर बेटियां हैं. पर दोनों की जिंदगी में सकून नहीं है. दोनों नाम बदल कर डेटिंग ऐप पर चैट करते हैं. काजोल, माया बन कर अपने पति को रोमांस के लिए होटल बुलाती है, जहां वह अपनी सहेली की मदद से नंगा कर पूरे फाइव स्टोर होटल व सड़क पर निवस्त्र दौड़ाती है. फिर गोवा ले जाती है, जहां वह अपनी उम्र से भी आधी उम्र के युवक के साथ रोमांस करती है और होटल के एक कमरे में अपने प्रेमी संग अय्याशी करती है.

अपनी पत्नी की यह सारी हरकतें बेचारा मोंटी देखता रहता है. क्या भारत में इस तरह की आधुनिक पत्नियां हैं? बौलीवुड में लोग कह रहे हैं कि क्या अनुराग बसु ने अपनी आप बीती फिल्म में दिखाई है. अनुराग बसु भी शादीशुदा हैं और उन की भी दो टीनऐजर बेटियां हैं. फिल्म में सारा अली खान का किरदार सैक्स को ले कर पूरी तरह से कन्फ्यूज्ड है. वैसे भी सारा अली खान व आदित्य राय कपूर की अब तक एक भी फिल्म को सफलता नसीब नहीं हुई.

Voter List Controversy : हिंदू राष्ट्र में आधार होगा निराधार “बिहार तो झांकी है असम पश्चिम बंगाल बाकी है”

Voter List Controversy : बिहार विधानसभा चुनाव में वोटर लिस्ट विवाद के बाद यह बात साफ नजर आ रही है कि हिंदू राष्ट्र में आधार निराधार हो कर रह जाएगा.

चुनाव आयोग ने कहा है कि वोटर लिस्ट में कोई गैर भारतीय नहीं रहेगा. वोटर लिस्ट की जांच का जो मौडल बिहार विधान सभा में लागू किया गया है वह दूसरे राज्यों में भी लागू होगा. जैसेजैसे वहां पर विधानसभा चुनाव होंगे, वैसेवैसे वोटर उस राज्य में लिस्ट की जांच होगी. इस तरह से समझें तो अगला नम्बर असम और बंगाल का है. इस के बाद उत्तर प्रदेश की भी बारी है. 2026 में जिन राज्यों में चुनाव होंगे वहां यह जांच होगी. जिस में केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी भी शामिल होंगे.

असल में यह एक पौराणिक साजिश है कि जिस के तहत बड़ी जनसंख्या को नागरिकता ही न देने का काम किया जा रहा है. जिस हिंदू राष्ट्र की बात हो रही है वह पौराणिक व्यवस्था को बनाए रखना चाहता है. जिस के अनुसार सिर्फ सवर्णों को ही पूजा पाठ, धन, मकान, सत्ता का हक है. बाकी सब तो दस्यु या पशु हैं. राम रावण युद्ध में दर्शाया गया है कि जब युद्व खत्म हो गया तो राम तो राजा बन गए उन के साथ युद्ध करने वालों को वापस जंगलों और पहाड़ों पर भेज दिया गया. बिहार में वोटर लिस्ट में सुधार के नाम पर पौराणिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए नागरिकता को वर्ण से जोड़ने की साजिश की जा रही है.

देश में संविधान लागू होने से पहले किस तरह से चुनाव होते थे, किन को वोट देने का अधिकार था. अगर इस को देखें तो साफ पता चलता है कि वोट देने का अधिकार सब को नहीं था. 1857 के बाद अंगरेजों ने लोकल सेल्फ गवर्नमेंट पौलिसी कानून बनाया था. जो 1884 में पूरी तरह से लागू हो गया. 1909 में इलैक्शन एक्ट पारित हुआ उस के बाद इलैक्शन शुरू हुआ. उस समय वोटर लिस्ट में केवल 50 लोगों के नाम होते थे. यह वह लोग थे जो इलाके के मुखिया, जमीदार, बड़े साहूकार, बड़े काश्तकार यानी कि उस वक्त जो टैक्स के रूप में लगान जमा करते थे वही लोग चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने के हकदार थे. वे ही लोग वोटर हुआ करते थे और उन्हीं लोगों में से चुनाव लड़ने वाले होते थे. उन्हीं में से लोग चुनाव जीत कर इलाके के विकास के लिए कार्य करते थे.

50 लोगों की वोटर लिस्ट में से केवल 4 लोगों को चुनाव लड़ाते थे. यह वह लोग होते थे जो उस समय 100 रुपए से अधिक का आयकर या माल गुजारी भरते थे. मुश्किल से गांव के अनुसार 4 या 5 वोट ही होते थे. 4 प्रत्याशी होते थे और 46 वोटर और इन्हीं लोगों में से एक जीत कर लोकल बोर्ड का मुखिया बनता था. वे डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के मेंबर जो राजधानी लखनऊ में बैठा करते थे या फिर दिल्ली जाते थे.

जब देश आजाद हुआ तो यह तय किया गया कि भारत में लोकतंत्र की स्थापना के लिए अधिक से अधिक लोगों को वोट डालने का अधिकार दिया जाएगा. इस से पहले भारत ही नहीं अन्य देशों में भी अमीरो को ही वोट देने का अधिकार था. भारत के संविधान ने यह तय किया कि जो भी बालिग लोग हैं वह वोट देंगे. उम्र के अलावा कोई बंधन नहीं रखा गया था. भारत में हुए पहले आम चुनाव में करीब 17 करोड़ लोगों ने हिस्सा लिया, जिस में 85 फीसदी लोग न तो पढ़ सकते थे और न लिख सकते थे. कुल मिला कर करीब 4500 सीटों के लिए चुनाव हुआ था, जिस में 499 सीटें लोकसभा की थीं.

संविधान को दरकिनार करने की साजिश

बिहार में वोटर लिस्ट के बहाने इस तरह की व्यवस्था को बनाने का काम हो रहा है जहां वोटर लिस्ट में वह लोग होंगे जो पौराणिक व्यवस्था को मानेंगे. जो इस को चुनौती देने वाले होंगे उन के वोट के अधिकार को ही खत्म कर दिया जाएगा. देश को संविधान लागू होने से पहले के कालखंड में ले जाया जा रहा है. नागरिकता को वर्ण व्यवस्था से जोड़ने की साजिश की जा रही है. यह काम केवल बिहार तक ही सीमित नहीं रहेगा. यह पूरे देश में होगा.

बिहार विधान सभा चुनाव में वोटर लिस्ट विवाद के बाद चुनाव आयोग ने कहा कि ‘वोटर लिस्ट में जांच का काम देश के हर राज्य में किया जाएगा. इस में घरघर जा कर मतदाताओं की पुष्टि की जाएगी. इस के जरिए चुनाव आयोग यह चाहता है कि कोई गैर भारतीय वोटर लिस्ट में न रहे.’ 2029 में लोकसभा चुनाव से पहले सभी राज्यों की वोटर लिस्ट की स्क्रीनिंग पूरी करने की योजना है.

इस को दक्षिणापंथी लोगों की उस मांग से जोड़ कर देखा जा सकता है. जो भारतीय न हो उस को वोट देने का अधिकार न हो. यही उद्देश्य एनआरसी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का भी था. जनगणना में भी केन्द्र सरकार इसी तरह का कोई हेरफेर कर सकती है. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव कहते हैं ‘जातीय जनगणना के आंकड़ों और वोटर लिस्ट के मामले में भाजपा सरकार पर भरोसा नही किया जा सकता है.’

बिहार वोटर लिस्ट में जिस तरह से चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, उस के पहले महाराष्ट्र के चुनाव में वोटर लिस्ट की गड़बड़ी हो चुकी है. जिस से यह साफ दिखने लगा है कि हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए कुछ भी संभव है. इस को देख कर यह कहा जा सकता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में अगर भाजपा को 400 से अधिक सांसद मिल गए होते तो वह कानून बना कर इस तरह के काम करती जिन्हें अब उस को पिछले दरवाजे से करने की कोशिश हो रही है.

क्या है वोटर लिस्ट विवाद ?

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट को अपडेट करने का काम शुरू किया. जिस में नए मतदाताओं के नाम जोड़े जा रहे हैं और जो वोटर नहीं हैं, उन के नाम हटाए जा रहे हैं. इस में सभी मतदाताओं को सत्यापन का एक फोर्म भरना पड़ रहा है. जिस में अपने बारे में कुछ जरूरी जानकारी देनी है. चुनाव आयोग जो जानकारी मांग रहा है, उस में दो प्रावधान किए गए हैं, जैसे 2003 या उस के बाद पैदा हुए मतदाताओं को अपना जन्मप्रमाण पत्र या मातापिता के वोटर आईडी का एपिक नंबर देना होगा. जबकि 2003 से पहले पैदा हुए लोगों को कोई दस्तावेज नहीं देना है.

विवाद का कारण यह है कि आयोग ने सत्यापन के दस्तावेजों में राशन कार्ड और आधार कार्ड को मान्यता नहीं दी है. विपक्ष इस बात से नाराज है. उस का तर्क है कि यह गरीब मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने की कोशिश है. यह एक तरह से नागरिकता का सत्यापन हो रहा है. नागरिकता के सत्यापन से उस को डर है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट से गायब हो जाएंगे. मुसलिम मतदाता विपक्ष का सब से बड़ा हथियार हैं. इस के जरीये हिंदू राष्ट्र बनाने की तैयारी है. विपक्ष की सब से बड़ी चिंता यह है कि बिहार मौडल पूरे देश में ले जाया जाएगा. घुसपैठियों को भले ही देश से न निकाला जा सकता हो पर उन को वोट के अधिकार से वंचित रखा जा सकता है.

विपक्ष ने पूरी ताकत से इस लड़ाई को लड़ने का फैसला किया. उसे यह डर था कि महाराष्ट्र जैसी वोटर लिस्ट में गडबडी का लाभ बिहार में भी भाजपा उठा सकती है. पटना में कांग्रेस और दूसरे प्रमुख दलों ने रैली की. सड़क के साथ ही साथ विपक्ष ने इस लडाई को कोर्ट में भी लडने का काम किया. वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि चुनाव से ठीक पहले प्रदेश के 7.9 करोड़ मतदाताओं को यह कहना कि वह अपनी पात्रता को सत्यापित करें, यह एक तरह से हजारों वोटर्स को मतदान से रोकने की कोशिश है. आधार कार्ड को स्वीकार न करना पूरी तरह से नागरिकता जांच की कवायद है.

आधार कार्ड 12 अंकों की एक पहचान संख्या है, जिसे भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण द्वारा जारी किया जाता है. यह प्रत्येक भारतीय की पहचान और उस के निवास स्थान का प्रमाण है. आधार कार्ड की मान्यता बैंकिंग, स्कूल एडमिशन, सरकारी योजनाओं का लाभ लेने से ले कर अस्पतालों में इलाज तक सभी जगहों पर है. वोट देने के समय भी यह पहचान पत्र के रूप में मान्य था. सवाल उठता है कि जब आधार पहचान पत्र के रूप में वोट डालने के लिए प्रयोग किया जा सकता है तो वोटर लिस्ट की जांच में इस को क्यों माना नहीं जा रहा है ? चुनाव आयोग का कहना है कि वोटर लिस्ट अपडेशन में आधार कार्ड को प्रमाण नहीं माना जा सकता क्योंकि यह नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है.

कोर्ट और आयोग आमने सामने

बिहार में वोटर लिस्ट संशोधन विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कई सवाल पूछे. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि आयोग ने मतदाता सूची में संशोधन का जो समय चुना है वह चिंताजनक है. आधार जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज को संशोधन प्रक्रिया के सत्यापन से बाहर रखना बहुत ही चिंताजनक है. यदि विशेश सूचना रिपोर्ट का उद्देश्य नागरिकता सत्यापित करना है तो यह प्रक्रिया इतनी देर से शुरू क्यों हुई ? इस को चुनाव से जोड़ कर क्यों देखा जा रहा है ?

चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत संवैधानिक रूप से अनिवार्य है. अनुच्छेद 326 में यह कहा गया है कि केवल भारतीय नागरिकों को ही मतदाता के रूप में नामांकित किया जा सकता है. इसी वजह से मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए और सभी योग्य नागरिकों को वोट का अधिकार दिलाने के लिए नागरिकता की पुष्टि हो रही है.

चुनाव आयोग ने कहा कि इस से पहले 2003 में यह प्रक्रिया की गई थी. चुनाव आयोग के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है जिस का मतदाताओं से सीधा संबंध है और अगर मतदाता ही नहीं होंगे तो हमारा अस्तित्व ही नहीं होगा. आयोग किसी को भी मतदाता सूची से बाहर करने का न तो इरादा रखता है और न ही कर सकता है, जब तक कि आयोग को कानून के प्रावधानों द्वारा ऐसा करने के लिए बाध्य न किया जाए. हम धर्म, जाति आदि के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकते.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘गैर नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर करना केंद्रीय गृह मंत्रालय का विशेषाधिकार है. चुनाव आयोग का नहीं. आयोग क्यों इस मसले पर ध्यान दे रहा है. यह उन का काम नहीं है. चुनाव आयोग ने सूची के सत्यापन के लिए जो समय चुना है, वह सही नहीं है. सब से बड़ी चिंता यह है कि आधार को सत्यापन के लिए जरूरी दस्तावेजों में शामिल न करना है.

समस्या यह है कि पहले कोर्ट ने ही आधार को नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं माना था. जस्टिस एस पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2018) के केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कहा था कि आधार एक विशिष्ट पहचान पत्र है, लेकिन यह भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं है. सरकार की ओर से भी यह स्पष्ट कहा गया था कि आधार कार्ड को नागरिकता और जन्मतिथि का प्रमाण पत्र नहीं माना जा सकता है. यह सिर्फ और सिर्फ एक व्यक्ति का पहचान पत्र है और उस के निवास स्थान की जानकारी देता है. भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के अनुसार अगर कोई विदेशी नागरिक 182 दिन तक भारत में लगातार रहता है, तो उस का आधार कार्ड बन सकता है, लेकिन यह सिर्फ पहचान पत्र है उस की नागरिकता का प्रमाण नहीं.

यह बात अब साफ होती नजर आ रही है कि आधार कार्ड नागरिकता को प्रमाणपत्र नहीं माना जा सकता. इस का लाभ उठा कर हिंदू राष्ट्र बनाने वाले उन लोगों को वोट के अधिकार से वंचित कर रहे हैं जो गरीब हैं. जिन की कोई सुनने वाला नहीं है. जिस से केवल वह लोग वोट दे सकें जो वोटर लिस्ट में दर्ज हैं. जिन लोगों से विरोध का डर है उन को इस बहाने वोटर लिस्ट से बाहर किया जा सकता है. वोटर लिस्ट में उन के नाम ही होंगे जो हिंदू राष्ट्र को मानने वाले होंगे. भले ही घुसपैठियों को देश से बाहर न किया जाए पर वोट देने के अधिकार से उन को वंचित किया जा सकता है.

Romantic Story In Hindi : समर्थन – क्या बंजारीलाल को मिल पाया मनचाहा प्यार?

Romantic Story In Hindi : बंजारीलाल कुछ सालों से कैंसर से जूझ रहा था. बहुत से लोगों को यह एहसास नहीं होता है कि पुरुष जब कैंसर से पीड़ित होते हैं, तो उन्हें भी उतनी ही सहानुभूति की आवश्यकता होती है जितनी औरतों को. जब लोगों को बंजारीलाल के कैंसर के बारे में पता चला तो ज्यादातर ने यह मान लिया कि यह कैंसर का कोई रूप होगा, लेकिन विस्तारपूर्वक जानना उचित नहीं समझा.

इस का यह मतलब नहीं था कि बंजारीलाल को लोगों का समर्थन नहीं मिला. उस की पत्नी, बच्चे, परिवारजन, दोस्तयार और जो पहले सहकर्मी थे, सभी से समर्थन प्राप्त हुआ, विशेषरूप से पोतेपोतियां अद्भुत रूप से अपना समर्थन दिखाते थे,“दादाजी, क्या आप को चोट लगी है? दादाजी, क्या आप को खानेपीने के लिए कुछ चाहिए? आप को आराम से बैठने के लिए एक तकिया चाहिए? कहां दर्द होता है दादाजी,” वगैरह…

बंजारीलाल के सभी बच्चे महानगरों में रहते थे. कोई मैनेजर के पद पर था, कोई सौफ्टवेयर इंजीनियर था. ट्रेन के सफर में कम से कम 1 दिन तो लग ही जाता, इसलिए उन्होंने तब तक उन्हें नहीं देखा जब तक कि अपना इलाज शुरू नहीं कर दिया और सिर के बाल झड़ नहीं गए. अपने इलाज के दौरान भी बंजारीलाल ने अपना काम करना जारी रखा और कभीकभार अपने बच्चों और पोतेपोतियों से मिलने उन के शहरों तक चले जाया करता था.

जब उस ने कीमोथेरैपी शुरू की थी और बाल निकाल दिए, तब उस का एक बेटा और बेटे का परिवार उस से मिलने आया था. बेटे का लगभग 3 साल का बेटा था जो चाहता था कि उस के दादाजी उस के साथ खेलें. अपने घर से अपने साथ वह अपने खिलौने भी ले कर आया था. जब दादाजी उस के साथ खेलते, तो हंसीमजाक में वह दादाजी की टोपी उतार कर उन के गंजे सिर पर हाथ फेरता. फिर दादाजी को टोपी वापस पहना कर फिर से खेल में जुट जाता. पोता पता नहीं इस हरकत से क्या करना चाहता था, मगर बंजारीलाल को पोते की इस हरकत से बड़ा सुकून मिलता था.

बंजारीलाल अपने अन्य बच्चों और पोतेपोतियों से मिलने उन के शहरों में भी गया. उन के शहर अपनी यात्रा शुरू करने से पूर्व, वह सब को फोन पर बता देता था. साथ ही यह भी कहता कि उस के वहां पहुंचने से पहले पोतेपोतियों को वे लोग बता दें कि दादाजी अब गंजे हो गए थे. हो सके तो कारण भी बता दें. फिर बच्चों को चाहे जितना समझ में आए.

अपने बेटेबेटियों के जिस किसी परिवार में वह जाता, वहां आमतौर पर पहले तो सभी बैठ कर सामान्य पारिवारिक बातों पर चर्चा करते, लेकिन बीमारी के बारे में कोई कुछ नहीं कहता. मगर जैसे ही मातापिता कमरे से बाहर निकलते, पोतेपोतियां दादाजी को पकड़ लेते और उन से तरहतरह के सवाल पूछने लगते. अगर मातापिता बीच में ही लौट आते, तो बातचीत वापस स्कूल के पाठ्यक्रम, पोतेपोतियों की पढ़ाई, किसी के जन्मदिन या फिर कार्टून चैनल पर आ जाती.

बच्चों की ओर से यह उन का दादाजी की देखभाल करने का तरीका था. वे सवाल पूछने से नहीं डरते थे, न ही उन सवालों से शर्मिंदा होने से, जिन्हें वयस्क पूछने में अकसर संकोच करते हैं. बंजारीलाल को इस रोग के बाद ही पता चला कि कैंसर रोगी के प्रति चिंता दिखाने और समर्थन व्यक्त करने का सब से अच्छा तरीका है कि दिमाग में जो प्रश्न आ रहे हैं, सब पूछ लिए जाएं और हो सके तो सहायता प्रदान करें. इस का नतीजा यह निकलेगा कि अन्य लोग भी उन के साथ सहजतापूर्वक वार्तालाप कर सकेंगे.

बंजारीलाल को अपने इलाज के दौरान और ठीक होने तक कई लोगों से बहुत समर्थन मिला. कई कैंसर रोगियों के पास बात करने के लिए कोई नहीं आता था. भले ही वे अपनी बीमारी के बारे में बातचीत करने के लिए हमेशा तैयार हों. वे स्वयं चाहते थे कि किसी को बताएं कि वे किस दौर से गुजर रहे हैं या डाक्टर के अनुसार जल्द ही उन्हें किनकिन चीजों का सामना करना पड़ेगा. बंजारीलाल के पोतेपोतियों ने वह सच्ची ईमानदारी दिखाई जो बच्चों में होती है और उस के पूरे परिवार को यह सिखाया कि उन्हीं की तरह सादगी से दूसरों की चिंताजनक स्थिति में किस प्रकार का बरताव होना चाहिए. ऐसे सादगीपूर्ण व्यवहार से ही कठिन परिस्थितियों से गुजरता इंसान अपने मन के नजरिए को बदल कर अपना जीवन बदल सकता है.

पहली बार कैंसर की विनाशकारी खबर सुनने के कुछ दिनों बाद जब बंजारीलाल की बहन का फोन आया, तो अपनी बहन की एक बात उसे विचित्र लगी. बहन ने साधारणतया कहा,“जिंदगी में जितना प्यार अब तक तुम ने महसूस न किया होगा, उतना प्यार अब मिलेगा,” बंजारीलाल इस से बिलकुल विपरीत उम्मीद कर रहा था. इसलिए उस समय उसे यह पता नहीं चला कि इस बात के क्या मायने हो सकते हैं. यहीं से उस की वह यात्रा शुरू हो गई जो हर कैंसर रोगी को करनी पड़ती है.

बंजारीलाल को अपनी बहन के कथन में तब सचाई प्रतीत हुई जब कुछ दिनों के बाद उस ने अपनी बेटी को अपनी बीमारी के निदान और आने वाली सर्जरी से अवगत कराया.

दूर शहर में रहने वाली बेटी को जब फोन पर कहा तो बेटी ने उस प्रकार के उलटे सवाल नहीं किए जैसे हम आजकल की युवा पीढ़ी से उम्मीद करते हैं. उस ने यह नहीं पूछा कि मैं क्या कर सकती हूं आप के लिए? न ही ऐसा संवेदनहीन प्रश्न किया कि क्या मेरा आना जरूरी है? न ही यह कहा कि मैं आने की कोशिश करूंगी. बल्कि तपाक से कहा कि आप चिंता मत कीजिए. मैं रास्ते पर हूं. उस ने फौरन एअरप्लेन की ही टिकट कटा ली.

अपने पति के पक्ष लेने और उस का प्रोत्साहन मिलने पर बंजारीलाल की बेटी तब तक उस के साथ रही जब तक बंजारीलाल को उस की मदद लगती रही. अपनी बेटी का साथ और उस का प्यार मिलने से बंजारीलाल को ऐसा लगा जैसे किसी बेपनाह को सहारा मिल गया हो.

अगले दिन जब बंजारीलाल ने अपने मित्र से इस बात का जिक्र किया, तो आधे घंटे में ही उस का मित्र अपना सारा कामकाज छोड़ कर दौड़ताभागता चला आया. बंजारीलाल के साथ दवा की दुकान तक भी गया, यहां तक कि जब बंजारीलाल डाक्टर से बातचीत कर रहा था, तो भी उस के साथ ही रहा कि अगर बंजारीलाल को किसी बात को समझने में असुविधा महसूस होती हो, तो वह उसे समझा दें. जब कभी बंजारीलाल को अपनी हालत के चलते रोना आ जाता, तो उस का मित्र उसे सांत्वना देता. उस के मित्र ने कैंसर के केस अपने ही घर में देखे थे, इसलिए उस ने भी डाक्टर से कई तरह के सवाल किए और बंजारीलाल से सारी बातों की जानकारी ली ताकि उसे भी यह समझने में मदद मिले कि बंजारीलाल के साथ क्या हो रहा है. अपनी बेटी और मित्र में बंजारीलाल को जैसे किसी ने कोई तोहफा उपहार में दे दिया हो. उस ने कभी सोचा भी न था कि दोनों को उस की इतनी परवाह हो सकती है.

जब शरीर तमाम तरह के भयावह, भयानक चीजों से गुजरने लगा तो एकबारगी उसे लगा कि हिम्मत जवाब दे जाएगी. लेकिन जैसेजैसे पोतेपोतियों, बेटेबेटियों और मित्रों का साथ मजबूत होने लगा, वैसेवैसे उसे समझ में आने लगा कि इन्हीं लोगों का प्यार किस प्रकार उस के जिंदा रहने के हौसले को कायम रख सकता है. इसी हौसले के चलते उसे विश्वास हो गया कि वह कैंसर जैसी चीज पर भी विजय प्राप्त कर सकेगा. लोगों के न केवल सांत्वना, बल्कि सद्भावना संदेश भी व्हाट्सऐप पर आते रहे. भोजन की तो कभी दिक्कत हुई ही नहीं. किसी के द्वारा कहा गया एक छोटा सा वाक्य भी उसे पूरे दिनभर प्रफुल्लित रखता.

सब से बड़ी पोती 12वीं कक्षा में होने के बावज़ूद कभीकभार चली आती और किताबों से कहानियां और लेख दादाजी को पढ़ कर सुनाती. बेटोंबहुओं ने दादाजी के सामने अपने बच्चों की चंचलता को दुत्कारा नहीं और उन्हें सामान्य व्यवहार ही करने दिया. यही बात बंजारीलाल को छू गई. कृत्रिम व्यवहार से या व्यवहार परिवर्तन से उसे जरूर अटपटा महसूस होता और अपने परिवार वालों से उस की दूरी बन जाती. जाने क्यों किताबों की कहानियां सुन कर उसे भी बहुत मजा आता. पढ़ने की उस की शक्ति क्षीण हो चुकी थी, शायद इसलिए भी उसे खुशी होती थी. उन के बचपन में उस ने पोतेपोतियों को बहुत कहानियां पढ़ कर सुनाईं, शायद उसी की भरपाई थी. बङी पोती ने कक्षा 8वीं से 12वीं तक की सारी हिंदी पुस्तकें पढ़ कर दादाजी को सुना दीं. कहानी और कविताएं पढ़ कर दोनों एकसाथ हंसे और रोए.

जिन व्यक्तियों से वह कभी मिला नहीं, उन्होंने भी उस के बारे में पूछा. सेवानिवृत्त हो जाने के बाद उस का एक पूर्वसहकर्मी कार्यालय के मित्रों द्वारा भेजे गए संदेश और उपहार ले कर आया. किसी ने सिर को ढंकने के लिए गरम टोपी भेजी, किसी ने प्रेरणादायक किताबें, किसी ने अगरबत्तियों के पैकेट, किसी ने मालिश वाले तेल की शीशी, किसी ने पेनड्राइव में गाने भर कर भेजे, किसी ने थरमस भेजा, किसी ने शौल और भी बहुत कुछ. उन्होंने उसे याद करने की पर्याप्त परवाह की, इसी से बंजारीलाल को जिंदादिली का अनुभव हुआ.

जरूरत के समय में सारा परिवार साथ देगा, यह कोई जरूरी नहीं है. लेकिन जिस तरह से तत्काल रूप से संपूर्ण परिवार उस के साथ हो लिया, उस से बंजारीलाल भावविह्वल हो उठा. कई अद्भुत तरीकों से उन्होंने उस का समर्थन किया और उसे प्रोत्साहित किया. सभी एकसाथ शामिल हुए. वे हर कदम पर उस के साथ थे. बेटी तो तब भी उस के साथ थी जब उस का आखिरी कीमोथेरैपी सत्र था और बेटों ने उपचार के अंत का जश्न मनाने के लिए सभी परिवार वालों को घर पर इकट्ठा कर लिया.

मंझली बहू बिना पूछे ही चली आती और घर की साफसफाई की ओर ध्यान देती. अब घर को सिर्फ नौकरानी के बल पर नहीं छोड़ा जा सकता था. पूरी प्रक्रिया के दौरान उस ने दिलासा देने वाले शब्द ही कहे, कभी भी कङवे शब्द नहीं कहे. ऐसा कुछ भी नहीं कहा जिस से बंजारीलाल स्वयं को जरा सा भी असहज महसूस करे. पड़ोसी और दोस्त तो कईयों बार खाना ले कर आए. उन के द्वारा भेजे गए फूलों के गुच्छे और अनगिनत अन्य अपरिचित कामनाएं देने वाले लोगों से उस ने स्वास्थ्य लाभ अनुभव किया. उसे ऐसा लगा कि ये सारी चीजें उसे हमेशा याद रहेंगी क्योंकि इन्हीं की वजह से उस का कठिन समय गुजर गया. ऐसे अपरिचित लोगों के बारे में सोचने से ही उस का जी कृतज्ञता से भर जाता था.

अब जब भी वह पीछे मुड़ कर देखता, तो अपनी बहन के साधारणतया कहे हुए शब्द उस के कानों में गूंजते. जिस असीम प्यार की उसे प्राप्ती हुई थी, उसी की वजह से अब तक वह जीवित था और कैंसर जैसी बीमारी से लड़ने में सक्षम हो पाया था. हां, डाक्टरों के अद्भुत उपचार और डाक्टरी सलाह तथा कई अन्य लोगों की कामनाओं ने उस की जान बचाने में मदद की, लेकिन उसे पूरा विश्वास था कि शरीर का ठीक होना संभव न हो पाता यदि उन का प्यार उस के भीतर न समा जाता. जिस प्रेम की तलाश में वह जिंदगी भर भटकता रहा, वह उसे इस प्रकार से मिलेगा, इस की उस ने कल्पना भी न की थी.

आखिरी दम तक बंजारीलाल अपने ही पैरों पर खडा रहा और अपना घर छोड़ कर किसी के घर जा कर उन पर बोझ न बना. शायद उसे मिले असीमित प्यार का यही कारण था. अपनी कठिन यात्रा के दौरान उसे जो प्रेमरूपी खजाना मिला था, उस का मूल्य सिर्फ वही जान सकता था जो उस रास्ते से गुजर रहा हो. Romantic Story In Hindi 

Samajik Kahani : मेरा राष्ट्रभाषा प्रेम

Samajik Kahani : मेरा राष्ट्रभाषा प्रेम चाहो तो आप मुझे ओल्ड फैशंड कह लो. चाहे इसे मेरा लैक औफ कान्फिडेंस मान लो पर मैं हमेशा हिंदी में ही बात करना पसंद करती हूं. इंगलिश मीडियम स्कूलों में पढ़े होने के बावजूद, ऐक्चुअली हमारे बचपन में घर का एनवायरमैंट ही बहुत पैट्रिऔटिक था. हार्ड वर्क, औनेस्टी आदि पर बहुत स्टै्रस दिया जाता था. इंडिया को नईनई फ्रीडम मिली थी. तब पैट्रिऔटिज्म तो जैसे हमारे ब्लड में ही घुला हुआ था. हाई मौरेल वैल्यूज के साथ ही हमारे पेरैंट्स इस बात के लिए भी बहुत पर्टिकुलर थे कि घर में अपनी नैशनल लैंग्वेज में ही बात की जाए, एंड यू नो, उस वक्त के पेरैंट्स कितने स्ट्रिक्ट हुआ करते थे.

मेरे ग्रैंडफादर फेमस फ्रीडमफाइटर थे और फादर आर्मी आफिसर. हमारी फैमिली में पैट्रिऔटिज्म का एक लंबा टै्रडिशन है, जो हमारे गे्रट ग्रैंडफादर तक जाता है. इस के साथ ही हमारी फैमिली बहुत आर्थोडौक्स थी. घर में सर्वेंट्स और मेड होने के बावजूद हम बच्चों की अपब्रिंगिंग हमारी मदर ने स्वयं ही की. हालांकि वे हाइली ऐजुकेटेड लेडी थीं बट उन्होंने हाउसवाइफ बन कर रहना ही प्रिफर किया. यह उन का पर्सनल डिसीजन था, फादर अथवा ग्रैंडपेरैंट्स का दबाव नहीं. कुछ भी कहो, कामकाजी महिला घरपरिवार को उतना समय नहीं दे सकती जितना कि फुलटाइम हाउसवाइफ.

हांहां, मालूम है अब उन्हें ‘होममेकर’ कहा जाता है. बात तो एक ही है. हमारी मदर ने अपनी पूरी लाइफ घर, बच्चों को ही डिवोट कर दी. वे हमसब की हैल्थ का भी भरपूर खयाल रखती थीं. घर में जंकफूड बिलकुल एलाउड नहीं था सिर्फ और सिर्फ हैल्दी फूड ही खाया जाता था. बे्रकफास्ट में हम डेली एग, मिल्क और पोरिज में से ही कुछ खाते. लंच में ट्वाइस ए वीक तो हम नौनवेज खाते थे यानी मीट, चिकन, फिश कुछ भी. हां, डिनर हम लाइट ही करते. स्नैक्स में भी फ्राइड की जगह हम फ्रैश फू्रट ही लेते.

आर्मी आफिसर की वाइफ होने से मदर एक आर्डिनरी वाइफ से ज्यादा स्मार्ट तो थीं ही, सुंदर भी बहुत थीं. अपनी गे्रसफुल फिगर, विट और इंटैलिजैंस के कारण अपने फ्रैंड्स में बहुत पापुलर थीं वे. और हम दोनों बहनों की तो आइडियल वे थीं ही.

खैर, मैं ने भी अपने बच्चों को हाई मौरेल वैल्यूज तो दी ही हैं उन्हें अपनी मदरटंग की रिस्पैक्ट करना भी सिखाया है. अलगअलग फील्ड में प्रोफैशनली क्वालीफाइड होने पर भी वे अपने घर में मदरटंग में ही बातें करते हैं. वरना आजकल तो अंगरेजी में बात करना स्टेटस सिंबल ही बन गया है. अगर आप हिंदी स्पीकिंग कैटेगरी को बिलौंग करते हैं तो आप हाई सोसाइटी में खुद को अनफिट पाते हैं. आप न तो अच्छी नौकरी ही पा सकते हैं न ही अपने फ्रैंड्स सर्कल अथवा पार्टी आदि में बोलने का आत्मविश्वास ही.

पिछले साल मैं अपनी बेटी का ऐडमिशन कराने विश्वविद्यालय गई, वहां का एनवायरमैंट देख कर तो भौचक ही रह गई. सब लड़कियों ने जीन्स और टौप ही पहन रखे थे. हेयर सब के शौर्ट, लड़की और लड़कों में भेद करना हमारे लिए डिफिकल्ट हो गया. वहां सब यों फर्राटेदार इंगलिश बोल रहे थे कि एक बार तो मु  झे लगा मैं यूरोप के किसी देश में पहुंच गई हूं, टाइम कितना चेंज हो गया है न. जब हम छोटे थे तो सलवारसूट के ऊपर दुपट्टा ओढ़ा जाता था. वह भी प्रौपरली, न कि एक शोल्डर पर रखा हुआ. आजकल तो ऐसी लड़कियों पर टौंट करते हुए उन्हें ‘बहनजी’ टाइप कहा जाता है.

जिस तरह इंगलिश स्पीकिंग कोर्स चलते हैं, इंगलिश स्पीकिंग जैसी पुस्तकें धड़ाधड़ बिकती हैं, वक्त आ गया है कि उसी लाइन पर हमें हिंदी स्पीकिंग कोर्स भी स्टार्ट करने चाहिए. देखा जाए तो हिंदी सीखना उतना मुश्किल है भी नहीं. अंगरेजी के मुकाबले में तो बहुत इजी है. ग्रामर के फिक्स्ड नियम हैं. कोई भी साइलैंट लैटर नहीं, उच्चारण एकदम सहज. स्पीकिंग एंड राइटिंग एकदम सेम. जैसा बोलते हो ज्यों का त्यों लिख डालो. शौर्ट में यह कि अगर आप करैक्टवे में बोलते हैं तो करैक्ट ही सीखोगे भी. सो सिंपल. हमें चाहिए कि हम हिंदी को ज्यादा से ज्यादा प्रौपोगेट करें. अगर हम हिंदी में बोलेंगे तो सामने वाला हिंदी में जवाब देने को ओबलाइज्ड भी रहेगा, और इस से हमारी हिंदी की लोकप्रियता बढ़ेगी.

मैं ने देशविदेश में बहुत टै्रवल किया है. दुनिया भर में लोगों को अपनी राष्ट्रभाषा में ही बोलते पाया है. चाहे वह जरमनी, जापान हो या फ्रांस, रशिया या ईरान. वहां के प्रोफैशनल कालेजों में भी अपनी भाषा में पढ़ाई कराई जाती है. बीजिंग ओलिंपिक का तो उद्घाटन समारोह ही चीनी भाषा में कंडक्ट किया गया था. हमारा देश होता तो हिंदी का एक वर्ड भी सुनने को नहीं मिलता आप को. अगर वे लोग अपनी लैंग्वेज बोलने में इतना गर्व फील कर सकते हैं तो हम क्यों हिंदी को पीछे पुश करते जा रहे हैं? किसी से कम है क्या हमारी लैंग्वेज? कितना धनी है हमारा लिटरेचर. ढेर सारे क्षेत्रीय भाषाओं के अनुवाद मिला कर तो हिंदी और भी रिच हो जाती है. हमें तो प्राउड फील करना चाहिए अपने रिच हैरिटेज पर. अपनी प्राचीन सिविलाइजेशन और कल्चर पर.

जी हां, बहुत प्रेम है मु  झे अपनी राष्ट्रभाषा से. तभी तो मैं हमेशा हिंदी में ही बोलतीलिखती हूं. आप को कुछ शक है मेरी हिंदी पर. पर आजकल तो हिंदी ऐसे ही बोली जाती है न. यकीन नहीं हो रहा तो अपने कान खुले रख कर कहीं भी बैठ जाओ, जो लोग अंगरेजी बोल रहे हैं तो वे तो अंगरेजी ही बोल रहे हैं पर जो लोग तथाकथित हिंदी में बातचीत कर रहे हैं उन्हें सुनो, व्याकरण हिंदी की, वाक्य संरचना हिंदी की पर मुख्य शब्द अंगरेजी के होंगे. मसलन, लास्ट वीक हम अपने कजिन की मैरिज अटेंड करने जयपुर गए थे. मित्रमंडली में, ब्याहशादी में, पार्टी में यही भाषा चलती है. जो व्यक्ति जितना पढ़ालिखा होगा उस की बोलचाल की भाषा में अंगरेजी के शब्दों का योगदान भी उतना अधिक होगा. निपट गंवार ही होगा जो शुद्ध हिंदी में बात करेगा. ‘टाइम क्या है?’ की जगह पूछेगा ‘समय क्या हुआ है?’

मेरे विचार से यह भाषा का निरादर है. क्या वे यह कहना चाहते हैं कि इन शब्दों का हिंदी रूपांतर है ही नहीं? अथवा वह कर्ण मधुर नहीं? शायद उन्हें लगता है कि अंगरेजी शब्दों का प्रयोग नहीं करेंगे तो लोग हमें अनपढ़ सम  झेंगे? तकनीकी अथवा प्रौद्योगिक शब्दों के लिए कभी अंगरेजी शब्दों का सहारा लेना भी पड़ सकता है. दरअसल, हर जीवंत भाषा अपने में दूसरी भाषाओं के शब्द समेटती चलती है पर हिंदी में उपलब्ध शब्दों के बदले अंगरेजी शब्दों का प्रयोग हास्यास्पद ही लगता है.

आप किसी के घर भोजन पर आमंत्रित हैं और गृहिणी आप से मनुहार कर रही है, ‘राइस तो आप ने लिए नहीं, कर्ड भी लीजिए न.’ भई, पुलाव और दही कहने में क्यों शर्म आती है, पर नहीं साहब, आप को पता कैसे चलेगा कि उन्हें अंगरेजी भाषा का भी ज्ञान है. आधुनिकता के नाम पर अंगरेजी शब्दों का प्रयोग पढ़ालिखा होने का प्रमाणपत्र ही बन गया है. आजकल यदि हम कभी हिंदी में स्वयं को व्यक्त नहीं कर पाते तो दोष भाषा का नहीं हमारे सीमित ज्ञान का है.

हमारी एक परिचिता हिंदी की अध्यापिका हैं. उच्च कक्षाओं में हिंदी पढ़ाती हैं पर आप की हर बात का उत्तर वे अंगरेजी में ही देने का प्रयत्न करेंगी चाहे टांगटूटी अंगरेजी बोलें क्योंकि कहीं आप यह न सम  झ लें कि वे अंगरेजी बोलना नहीं जानतीं.

किसी कवि की उक्ति याद आ रही है :

‘कितने शहरी हो गए

लोगों के जज्बात

हिंदी भी करने लगी

अंगरेजी में बात.’

हम क्यों हिंदी बोलने में हीनता का अनुभव करते हैं? यह खिचड़ी भाषा भी तो यही हीनता ही दर्शाती है? इतना व्यापक हो चुका है इस खिचड़ी भाषा का प्रभाव कि यदि मैं अपनी अंगूठाछाप काम वाली बाई से कहूं कि ‘प्याला मेज पर रख दो’ तो वह असमंजस में खड़ी मेरा मुंह ताकती है और सम  झाने पर हैरान हो कहती है, ‘कप टेबल पर रखने को बोलो न?’ वह लाइट को ‘लेट’ और चांस को ‘चानस’ भले ही कहे पर अंगरेजी शब्द उस की अनपढ़ बुद्धि में भी घुसपैठ कर चुके हैं अच्छी तरह से.

कहां पहुंचा दिया है हम ने हिंदी को? ध्यान रहे, अंगरेजी शब्द को नागरी में लिख देने मात्र से ही वे हिंदी के शब्द नहीं बन जाते. केवल अंगरेजी ही क्यों, आप जितनी भाषाएं सीख सकते हैं सीखिए, पर अपनी भाषा में अंगरेजी भाषा के शब्द घुसेड़ने का हक आप को कतई नहीं है. Samajik Kahani

Parivarik Kahani : कशमकश – सीमा के चेहरे से मुस्कान क्यों गायब हो गई थी ?

Parivarik Kahani : ‘‘वाहभई, मजा आ गया… भाभी के हाथों में तो जैसे जादू की छड़ी है… बस खाने पर घुमा देती हैं और खाने वाला समझ ही नहीं पाता कि खाना खाए या अपनी उंगलियां चाटे,’’ मयंक ने 2-4 कौर खाते ही हमेशा की तरह खाने की तारीफ शुरू कर दी तो रसोई में फुलके सेंकती सीमा भाभी के चेहरे पर मुसकराहट तैर गई.

पास ही खड़ी महिमा के भीतर कुछ दरक सा गया, मगर उस ने हमेशा की तरह दर्द की उन किरचों को आंखों का रास्ता नहीं दिखाया, दिल में उतार लिया.

‘‘अरे भाभी, महिमा को भी कुछ बनाना सिखा दो न… रोजरोज की सादी रोटीसब्जी से हम ऊब गए… बच्चे तो हर तीसरे दिन होटल की तरफ भागते हैं,’’ मयंक ने अपनी बात आगे बढ़ाई तो लाख रोकने की कोशिशों के बावजूद महिमा की पलकें नम हो आईं.

इस के पास कहां इतना टाइम होता है जो रसोई में खपे… एक ही काम होगा… या तो कलम पकड़ लो या फिर चकलाबेलन… सीमा की चहक में छिपे व्यंग्यबाण महिमा को बेंध गए, मगर बात तो सच ही थी, भले कड़वी सही.

महिमा एक कामकाजी महिला है. सरकारी स्कूल में अध्यापिका महिमा को मलाल रहता है कि वह आम गृहिणियों की तरह अपने घर को वक्त नहीं दे पाती. ऐसा नहीं है कि उसे अच्छा खाना बनाना नहीं आता, मगर सुबह उस के पास टाइम नहीं होता और शाम को वह थक कर इतनी चूर हो चुकी होती है कि कुछ ऐक्स्ट्रा बनाने की सोच भी नहीं पाती.

महिमा सुबह 5 बजे उठती है. सब का नाश्ता, खाना बना कर 8 बजे तक स्कूल पहुंचती है. दोपहर 3 बजे तक स्कूल में व्यस्त रहती है. उस के बाद घर आतेआते इतनी थक जाती है कि यदि घंटाभर आराम न करे तो रात तक चिड़चिड़ाहट बनी रहती है. रात को रसोई समेटतेसमटते 11 बज जाते हैं. अगले दिन फिर वही दिनचर्या.

इतनी व्यस्तता के बाद महिमा चाह कर भी सप्ताह के 6 दिन पति या बच्चों की खाने, नाश्ते की फरमाइशें पूरी नहीं कर पाती. एक रविवार का दिन उसे छुट्टी के रूप में मिलता है, मगर यह एक दिन बाकी 6 दिनों पर भारी पड़ता है. सब से पहले तो वह खुद ही इस दिन थोड़ा देर से उठती. फिर सप्ताह भर के कल पर टलने वालेकाम भी इसी दिन निबटाने होते हैं. मिलनेजुलने वाले दोस्तरिश्तेदार भी इसी रविवार की बाट जोहते हैं. इस तरह रविवार का दिन मुट्ठी में से पानी की तरह फिसल जाता है.

क्या करे महिमा… अपनी ग्लानि मिटाने के लिए वह बच्चों को हर रविवार होटल में खाने की छूट दे देती है. धीरेधीरे बच्चों को भी इस आजादी और रूटीन की आदत सी हो गई है.

महिमा महसूस करती है कि उस का घर सीमा भाभी के घर की तरह हर वक्त सजासंवरा नहीं दिखता. घर के सामान पर धूलमिट्टी की परत भी दिख जाती है. कई बार छोटेछोटे मकड़ी के जाले भी नजर आ जाते हैं. इधरउधर बिखरे कपड़े और जूते तो रोज की बात है. लौबी में रखी डाइनिंगटेबल भी खाने के कम, बच्चों की किताबों, स्कूल बैग, हैलमेट आदि रखने के ज्यादा काम आती है.

कई बार जब महिमा झुंझला कर साफसफाई में जुट जाती है, तो बच्चे पूछ बैठते हैं, ‘‘आज अचानक यह सफाई का बुखार कैसे चढ़ गया? कोई आने वाला है क्या?’’ तब वह और भी खिसिया जाती.

हालांकि महिमा ने अपनी मदद के लिए कमला को रखा हुआ है, मगर वह उस के स्कूल जाने के बाद आती है, इसलिए जो जैसा कर जाती है उसी में संतुष्ट होना पड़ता है.

स्कूल में आत्मविश्वास से भरी दिखने वाली महिमा भीतर ही भीतर अपना आत्मविश्वास खोती जा रही थी. यदाकदा अपनी तुलना सीमा भाभी से करने लगती कि कितने आराम से रहती हैं सीमा भाभी. घर भी एकदम करीने से सजा हुआ… अच्छे खाने से पतिबच्चे भी खुश.

दिन में 2-3 घंटे एसी की ठंडी हवा में आराम… और एक मैं हूं…. चाहे हजारों रुपए महीना कमाती हूं… कभी अपने पैसे का रोब नहीं झाड़ती… जेठानी के सामने हमेशा देवरानी ही बनी रहती हूं… कभी भी रानी बनने का गरूर नहीं दिखाती… फिर भी मयंक ने कभी मेरी काबिलियत पर गर्व नहीं किया. बच्चे भी अपनी ताई के ही गुण गाते रहते हैं.

वैसे देखा जाए तो वे सब भी कहां गलत हैं. कहते हैं कि दिल तक पहुंचने का रास्ता पेट से हो कर गुजरता है. मगर मैं कहां इन दूरियों को तय कर पाई हूं… जल्दीजल्दी जो कुछ बना पाती हूं बस बना देती हूं. एक सा नाश्ता और खाना खाखा कर बेचारे ऊब जाते होंगे… कैसी मां और पत्नी हूं… अपने परिवार तक को खुश नहीं रख पाती… महिमा खुद को कोसने लगती और फिर अवसाद के दलदल में थोड़ा और गहरे धंस जाती.

क्या करूं? क्या इतनी मेहनत से लगी नौकरी छोड़ दूं? मगर अब यह सिर्फ नौकरी कहां रही… यह तो मेरी पहचान बन चुकी है. स्कूल के बच्चे जब मुझे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. उन के अभिभावक बच्चों के सामने मेरा उदाहरण देते हैं तो वे कितने गर्व के पल होते हैं… वह अनमोल खुशी को क्या सिर्फ इतनी सी बात के लिए गंवा दूं कि पति और बच्चों को उन का मनपसंद खाना खिला सकूं. महिमा अकसर खुद से ही सवालजवाब करने लगती, मगर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाती.

इसी बीच महिमा की स्कूल में गरमी की छुट्टियां हो गईं. उस ने तय कर लिया कि इन पूरी छुट्टियों में वह सब की शिकायतें दूर करने की कोशिश करेगी. सब का मनपसंद खाना बनाएगी. नईनई डिशेज बनाना सीखेगी… घर को एकदम साफसुथरा और सजा कर रखेगी…

छुट्टी का पहला दिन. नाश्ते में गरमगरम आलू के परांठे देखते ही सब के चेहरे खिल उठे. भूख से अधिक ही खा लिए सब ने. उन्हें संतुष्ट देख कर महिमा का दिल भी खुश हो गया. मयंक टिफिन ले कर औफिस निकल गया और बच्चे कोचिंग क्लास. महिमा घर को समेटने में जुट गई.

दोपहर ढलतेढलते पूरा घर चमक उठा. लगा मानो दीवाली आने वाली है. मयंक और बच्चे घर लौट आए. आते ही बच्चों ने अपनी किताबें और बैग व मयंक ने अपनी फाइलें और हैलमेट लापरवाही से डाइनिंगटेबल पर पटक दिया. महिमा का मूड उखड़ गया, मगर उस ने एक लंबी सास ली और सारा सामान यथास्थान पर रख कर डाइनिंगटेबल फिर से सैट कर दी.

महिमा ने रात के खाने में भी 2 मसालेदार सब्जियों के अलावा रायता और सूजी का हलवा भी बनाया. सजी डाइनिंगटेबल देख कर मयंक और बच्चे खुश हो गए. उन्हें खुश देख कर महिमा भी खुश हो उठी.

अब रोज यही होने लगा. नाश्ते में अकसर मैदा, बेसन, आलू और अधिक तेलमिर्च मसाले का इस्तेमाल होता था. रात में भी महिमा कई तरह के व्यंजन बनाती थी. अधिक वैरायटी बनाने के चक्कर में अकसर रात का खाना लेट हो जाता था और गरिष्ठ होने के कारण ठीक से हजम भी नहीं हो पाता था.

अभी 15 दिन भी नहीं बीते थे कि मयंक ने ऐसिडिटी की शिकायत की. रातभर खट्टी डकारों और सीने में जलन से परेशान रहा. सुबह डाक्टर को दिखाया तो उस ने सादे खाने और कई तरह के दूसरे परहेज बताने के साथसाथ क्व2 हजार का दवाओं का बिल थमा दिया.

दूसरी तरफ घर को साफसुथरा और व्यवस्थित रखने के प्रयास में बच्चों की आजादी छिनती जा रही थी. महिमा उन्हें हर वक्त टोकती रहती कि इस्तेमाल करने के बाद अपना सामान प्रौपर जगह पर रखें. मगर बरसों की आदत भला एक दिन में छूटती है और फिर वैसे भी अपना घर इसीलिए तो बनाया जाता है ताकि वहां अपनी मनमरजी से अपने तरीके से रहा जाए. मां की टोकाटाकी से बच्चे घर वाली फीलिंग के लिए तरसने लगे, क्योंकि घर अब होटल की तरह लगने लगा था.

घर को संवारने और सब को मनपसंद खाना खिलाने की कवायद में महिमा पूरा दिन उलझी रहने लगी. हर वक्त कोई न कोई नई डिश या नया आइडिया उस के दिमाग में पकता रहता. साफसफाई के लिए भी दिन भर परेशान होती, कभी कमला पर झल्लाती तो कभी बच्चों को टोकती. नतीजन, एक दिन रसोई में खड़ीखड़ी महिमा गश खा कर गिर पड़ी. मयंक ने उसे उठा कर बिस्तर में लिटाया. बेटे ने तुरंत डाक्टर को फोन किया.

चैकअप करने के बाद पता चला कि महिमा का बीपी बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है. डाक्टर ने आराम करने की सलाह के साथसाथ मसालेदार, ज्यादा घी व तेल वाले खाने से परहेज करने की सलाह दी. साथ ही लंबाचौड़ा बिल थमाया वह अलग.

‘‘सौरी मयंक मैं एक अच्छी पत्नी और मां की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकी,’’ महिमा ने मायूसी से कहा.

‘‘पगली यह तुम से किस ने कहा? तुम ने तो हमेशा अपनी जिम्मेदारियां पूरी शिद्दत के साथ निभाई है. मुझे गर्व है तुम पर,’’ मयंक ने उस का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.

‘‘तो फिर वे हमेशा सीमा भाभी की तारीफें… वह सब क्या है?’’ महिमा ने संशय से पूछा.

‘‘अरे बावली, तुम भी गजब करती हो… पता नहीं किस आसमान तक अपनी सोच के घोड़े दौड़ा लेती हो,’’ मयंक ने ठहाका लगाते हुए कहा. महिमा अचरज के भाव लिए मुंह खोले उसे देख रही थी.

जब हमारी सगाई हुई थी उस के बाद से ही सीमा भाभी के व्यवहार में परिवर्तन नजर आने लगा था. उन्हें लगने लगा था कि नौकरीपेशा बहू आने के बाद घर में उन की अहमियत कम हो जाएगी. यह भी हो सकता है कि तुम उन पर अपने पैसे का रोब दिखाओ.

बातबात में उन की तारीफ करते हैं ताकि वे किसी हीनभावना से ग्रस्त न हो जाएं. मगर इस सारे गणित में अनजाने में ही सही, हम से तुम्हारा पक्ष नजरअंदाज होता रहा. हम सब तुम्हारे गुनाहगार हैं,’’ मयंक ने शर्मिंदा होते हुए अपने कान पकड़ लिए.

यह देख महिमा खिलखिला पड़ी, ‘‘तो अब सजा तो आप को मिलेगी ही… आप सब को अगले 20 दिन और इसी तरह का चटपटा और मसालेदार खाना खाना पड़ेगा.’’

‘‘न बाबा न… इतनी बड़ी सजा नहीं… हमें तो वही सादी रोटीसब्जी चाहिए ताकि हमारा पेट भी हैप्पी रहे और जेब भी. क्यों बच्चो?’’ मयंक ने नाटकीयता से कहा. अब तक बच्चे भी वहां आ चुके थे.

‘‘ठीक है, मगर सप्ताह में एक दिन तो होटल जाने दोगे और हमें अपनी मनपसंद डिशेज खाने दोगे न?’’ दोनों बच्चे एकसाथ चिल्लाए तो महिमा के होंठों पर भी मुसकराहट तैर गई. Parivarik Kahani

Social Story In Hindi : सावित्री और सत्य

Social Story In Hindi : सावित्री को नींद नहीं आ रही थी. अभी पिछले साल ही उस के पति की मौत हुई थी. उस की शादीशुदा जिंदगी का सुख महज एक साल का था. सावित्री ससुराल में ही रह रही थी. उस का पति ही बूढ़े सासससुर की एकलौती औलाद था. ससुराल और मायका दोनों ही पैसे वाले थे. सावित्री अपने मायके में 4 बच्चों में सब से छोटी और एकलौती लड़की थी. मांबाप और भाइयों की दुलारी…

मैट्रिक पास होते ही सावित्री की शादी हो गई थी. पति की मौत के बाद उस का बापू उसे लेने आया था, पर वह मायके नहीं गई. उस ने बापू से कहा था कि आप के तो 3 बच्चे और हैं, पर मेरे सासससुर का तो कोई नहीं है. पहाड़ी की तराई में एक गांव में सावित्री का ससुराल था. गांव तो ज्यादा बड़ा नहीं था, फिर भी सभी खुशहाल थे. उस के ससुर उस इलाके के सब से धनी और रसूखदार शख्स थे. वे गांव के सरपंच भी थे. पहाडि़यों पर रात में ठंडक रहती ही है. थोड़ी देर पहले ही बारिश रुकी थी. सावित्री कंबल ओढ़े लेटी थी, तभी अचानक ही जोर के धमाके की आवाज से वह चौंक पड़ी थी. वह बिस्तर से नीचे उतर आई. शाल से अपने को ढकते हुए बगल में सास के कमरे में गई. वहां उस ने देखा कि सासससुर दोनों ही जोरदार धमाके की आवाज से जाग गए थे. उस के ससुर स्वैटर पहन कर टौर्च व छड़ी उठा कर बाहर जाने के लिए निकलने लगे, तो सावित्री ने कहा, ‘‘बाबूजी, मैं आप को रात में अकेले नहीं जाने दूंगी. मैं भी आप के साथ चलूंगी.’’

काफी मना मरने के बावजूद सावित्री भी उन के साथ चल पड़ी थी. जब सावित्री बाहर निकली, तो थोड़ी दूरी पर ही खेतों के बीच उस ने आग की ऊंची लपटें देखीं. गांव के कुछ और लोग भी धमाके की आवाज सुन कर जमा हो चुके थे. करीब जाने पर देखा कि एक छोटे हवाईजहाज के टुकड़े इधरउधर जल रहे थे. लपटें काफी ऊंची और तेज थीं. किसी में पास जाने की हिम्मत नहीं थी. देखने से लग रहा था कि सबकुछ जल कर राख हो चुका है. तभी सावित्री की नजर मलबे से दूर पड़े किसी शख्स पर गई, जिस के हाथपैरों में कुछ हरकत हो रही थी. वह अपने ससुर के साथ उस के नजदीक गई. कुछ और लोग भी साथ हो लिए थे. उस नौजवान का चेहरा जलने से काला हो गया था. हाथपैरों पर भी जलने के निशान थे. वह बेहोश पड़ा था, पर रहरह कर अपने हाथपैर हिला रहा था. तभी एक गांव वाले ने उस की नब्ज देखी और फिर नाक के पास हाथ ले जा कर सावित्री के ससुर से बोला, ‘‘सरपंचजी, इस की सांसें चल रही हैं. यह अभी जिंदा है, पर इस की हालत नाजुक दिखती है. इस को तुरंत इलाज की जरूरत है.’’ सरपंच ने कहा, ‘‘हां, इसे जल्द ही अस्पताल ले जाना होगा. प्रशासन को अभी इस की सूचना भी शायद न मिली हो. सूचना मिलने के बाद भी सुबह के पहले यहां पर किसी के आने की उम्मीद नहीं है. तुम में से कोई मेरी मदद करो. मेरा ट्रैक्टर ले कर आओ. इसे शहर के अस्पताल ले चलते हैं.’’

थोड़ी देर में ही 2-3 नौजवान ट्रैक्टर ले कर आ गए थे. उस घायल नौजवान को ट्रैक्टर से ही शहर के बड़े अस्पताल ले गए. सावित्री भी सरपंचजी के साथ शहर तक गई थी. अस्पताल में डाक्टर ने देख कर कहा कि हालत नाजुक है. पुलिस को भी सूचित करना होगा. यह काम सरपंच ने खुद किया और डाक्टर को तुरंत इलाज शुरू करने को कहा. इमर्जैंसी वार्ड में चैकअप करने के बाद डाक्टर ने उसे इलाज के लिए आईसीयू में भेज दिया. पर उस शख्स के पास से कोई पहचानपत्र या बोर्डिंग पास भी नहीं मिला. हादसे की जगह के पास से एक बुरी तरह जला हुआ पर्स मिला था. उस पर्स में ऐसा कुछ भी सुबूत नहीं मिला था, जिस से उस की पहचान हो सके. डाक्टर ने इलाज तो शुरू कर दिया था. सरपंचजी खुद गारंटर बने थे यानी इलाज का खर्च उन्हें ही उठाना था. सुबह होते ही इस हादसे की खबर रेडियो और टैलीविजन पर फैल चुकी थी.

पुलिस भी आ गई थी. पुलिस को सारी बात बता कर उस की सहमति ले कर सरपंचजी अपनी बहू सावित्री के साथ अपने घर लौट आए थे. शहर के एयरपोर्ट पर अफरातफरी का सा माहौल था. एयरपोर्ट शहर से 20 किलोमीटर दूर और गांव की विपरीत दिशा में था. लोग उस उड़ान से आने वाले अपने रिश्तेदारों का हाल जानने के लिए बेचैन थे. एयरलाइंस के मुलाजिमों ने तो सभी सवारियों और हवाईजहाज के मुलाजिमों की लिस्ट लगा रखी थी, जिस में सब को ही मरा ऐलान किया गया था. थोड़ी ही देर में टैलीविजन पर एक ब्रेकिंग न्यूज आई कि एक मुसाफिर इस हादसे में बच गया है, जिस की हालत नाजुक है, पर उस की पहचान नहीं हो सकी है. सब के मन में उम्मीद की एक किरण जग रही थी कि शायद वह उन्हीं का सगा हो. अस्पताल में भीड़ उमड़ पड़ी थी. डाक्टर ने कहा कि अभी वह वैंटिलेटर पर है और हालत नाजुक है. मरीज के पास तो अभी कोई नहीं जा सकता है, उसे सिर्फ बाहर से शीशे से देखा जा सकता है. लोग बाहर से ही उस को देख कर पहचानने की कोशिश कर रहे थे, पर यह मुमकिन नहीं था. उस का चेहरा काफी जला हुआ था. उस पर दवा का लेप भी लगा था.

इधर सरपंच रोज सुबह अस्पताल आते थे, अकसर सावित्री भी साथ होती थी. वह उन को अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी, क्योंकि सरपंच खुद दिल के मरीज थे. कुछ दिनों के बाद डाक्टर ने सरपंच से कहा, ‘‘मरीज खतरे से बाहर तो है, पर वह कोमा में जा चुका है. कोमा से बाहर निकलने में कितना समय लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता है. कुछ ही दिनों में उसे आईसीयू से निकाल कर स्पैशल वार्ड में भेज देंगे.

‘‘दूसरी बात यह कि उस का चेहरा बहुत खराब हो चुका है. अगर वह कोमा से बाहर भी आता है, तो आईने में अपनेआप को देख कर उसे गहरा सदमा लगेगा.’’

सरपंच ने पूछा, ‘‘तो इस का इलाज क्या है?’’

डाक्टर बोला, ‘‘उस के चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी करनी होगी, पर इस में काफी खर्च होगा. अभी तक के इलाज का खर्च तो आप देते आए हैं.’’

सरपंच ने कहा, ‘‘आप पैसे की चिंता न करें. अगर यह ठीक हो जाता है, तो मैं समझूंगा कि मेरा बेटा मुझे दोबारा मिल गया है.’’ कुछ दिनों के बाद उस मरीज को स्पैशल वार्ड में शिफ्ट किया गया था. वहां उस की देखभाल दिन में तो अकसर सावित्री ही किया करती थी, लेकिन रात में सरपंच के कहने पर गांव से भी कोई न कोई आ जाता था. तकरीबन 2 महीने बाद उस की प्लास्टिक सर्जरी भी हुई. उस आदमी को नया चेहरा मिल गया था. इसी बीच सरपंच के ट्रैक्टर की ट्रौली पर एक बैल्ट मिली. हादसे के बाद उस नौजवान को इसी ट्रौली से अस्पताल पहुंचाया गया था. शायद किसी ने उसे आराम पहुंचाने के लिए बैल्ट निकाल कर ट्रौली के एक कोने में रख दी थी, जिस पर अब तक किसी की नजर नहीं पड़ी थी. बैल्ट पर 2 शब्द खुदे थे एसके. उस बैल्ट को देख कर सरपंच को लगा कि उस आदमी की पहचान में यह एक अहम कड़ी साबित हो.

इस की सूचना उन्होंने पुलिस को दे दी. साथ ही, लोकल टैलीविजन चैनल और रेडियो पर भी इसे प्रसारित किया गया. अगले ही दिन एक बुजुर्ग दंपती उसे देखने अस्पताल आए थे. उन का शहर में काफी बड़ा कारोबार था, पर चेहरा बदल जाने के चलते वे उसे पहचान नहीं पा रहे थे. बैल्ट भी पुलिस को दे दी गई थी. वहां पर उन्होंने सावित्री को देखा, जो मन लगा कर मरीज की सेवा कर रही थी. अस्पताल से निकल कर वे सीधे पुलिस स्टेशन गए और वहां उस बैल्ट को देख कर कहा कि ऐसी ही एक बैल्ट उन के बेटे की भी थी, जिस पर एसके लिखा था. यह बैल्ट जानबूझ कर उन के बेटे ने खरीदी थी, क्योंकि एसके उस के नाम ‘सत्य कुमार’ से मिलती थी. फिर भी संतुष्ट हुए बिना उसे अपना बेटा मानने में कुछ ठीक नहीं लग रहा था. फिलहाल वे अपने घर लौट गए थे. पर सरपंच का मन कह रहा था कि यह सत्य कुमार ही है.

तकरीबन एक महीना गुजर चुका था. सरपंच और सावित्री दोनों ही सत्य कुमार की देखभाल कर रहे थे. एक दिन अचानक सावित्री ने देखा कि सत्य कुमार के होंठ फड़फड़ा रहे थे और हाथ से कुछ इशारा कर रहा था. उस ने तुरंत डाक्टर को यह बात कही. डाक्टर ने कहा कि दवा अपना काम कर रही है और उन्हें पूरी उम्मीद है कि अब वह बिलकुल ठीक हो जाएगा. कुछ दिन बाद सावित्री उसे जब अपने हाथ से खाना खिला रही थी, सत्य कुमार ने उस का हाथ पकड़ कर कुछ बोलने की कोशिश की थी. उसी शाम जब सावित्री अपने घर जाने के लिए उठी, तो सत्य कुमार ने उस का हाथ पकड़ कर बहुत कोशिश के बाद लड़खड़ाती जबान में बोला, ‘‘रुको, मैं यहां कैसे आया हूं? मैं तो हवाईजहाज में था. मैं तो कारोबार के सिलसिले में बाहर गया हुआ था.’’ फिर अपने बारे में उस ने कुछ जानकारी दी थी. सरपंच और सावित्री दोनों की खुशी का ठिकाना न था. उन्होंने डाक्टर को बुलाया. डाक्टर ने उसे चैक कर कहा, ‘‘मुबारक हो. अब यह होश में आ गया है. इस के मातापिता को सूचना दे दें.’’ सावित्री और सरपंच अस्पताल में ही रुक कर सत्य कुमार के मातापिता का इंतजार कर रहे थे. वे लोग भी

खबर मिलते ही दौड़े आए थे. सत्य कुमार ने अपने मातापिता को पहचान लिया था और हादसे के पहले तक की बात बताई. उस के बाद का उसे कुछ याद नहीं था. सत्य कुमार के पिता ने सरपंच और सावित्री का शुक्रिया अदा करते हुए कहा, ‘‘आप के उपकार के लिए हम लोग हमेशा कर्जदार रहेंगे. यह लड़की आप की बेटी है न?’’

सरपंच बोले, ‘‘मेरे लिए तो बेटी से भी बढ़ कर है. है तो मेरी बहू, पर शादी के एक साल के अंदर ही मेरा एकलौता बेटा हम लोगों को अकेला छोड़ कर चला गया, पर सावित्री ने हमारा साथ नहीं छोड़ा.

‘‘मैं तो चाहता था कि यह अपने मांबाप के पास चली जाए और दूसरी शादी कर ले, पर यह तैयार नहीं थी.’’

सत्य कुमार के पिता ने कहा, ‘‘अगर आप को कोई एतराज नहीं है, तो मैं सावित्री को अपनी बहू बनाने को तैयार हूं, क्यों सत्य कुमार? ठीक रहेगा न?’’ सत्य कुमार ने सहमति में सिर हिला कर अपनी हामी भर दी थी. फिर सेठजी ने सत्य कुमार की मां की ओर देख कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘अरे सेठानी, तुम भी तो कुछ कहो.’’ सेठानी बोलीं, ‘‘आप लोगों ने तो मेरे मुंह की बात छीन ली है. मेरे बोलने को कुछ बचा ही नहीं है.’’

फिर वे सावित्री की ओर देख कर बोलीं, ‘‘तुम्हें कोई एतराज तो नहीं है?’’

सावित्री की आंखों से आंसू की कुछ बूंदें छलक कर उस के गालों पर आ गई थीं. वह बोली, ‘‘मैं आप लोगों की भावनाओं का सम्मान करती हूं, पर मैं अपने सासससुर को अकेला छोड़ कर नहीं जा सकती.’’ सरपंच ने सावित्री को समझाते हुए कहा, ‘‘तुम्हें एतराज नहीं होना चाहिए, क्योंकि हम सभी लोगों की खुशी इसी में है. और हम लोगों को अब जीना ही कितने दिन है, जबकि तुम्हारी सारी जिंदगी आगे पड़ी है.’’ सेठजी ने भी सरपंच की बातों को सही ठहराते हुए कहा, ‘‘तुम जब भी चाहो और जितने दिन चाहो, सरपंचजी के यहां बीचबीच में आती रहना.’’ सावित्री सेठजी से बोली, ‘‘सत्यजी को आप ने जन्म दिया है और बाबूजी ने इन्हें दोबारा जन्म दिया है, तो इन की भी तो कुछ जिम्मेदारी बनती है मेरे ससुरजी के लिए.’’

सेठजी बोले, ‘‘मैं मानता हूं और मेरा बेटा भी इतनी समझ रखता है. सत्य कुमार को तो 2-2 पिताओं का प्यार मिलेगा. सत्य कुमार सरपंचजी का उतना ही खयाल रखेगा, जितना वह हमारा रखता है.’’ सावित्री और सत्य दोनों एकदूसरे को देख रहे थे. उन लोगों की बातें सुन कर वह कुछ संतुष्ट लग रही थी. उस दिन सारी रात लोगों ने अस्पताल में ही बिताई थी. सावित्री के मायके में भी सरपंच ने यह बात बता दी थी. सभी को यह रिश्ता मंजूर था. सरपंच ने धूमधाम से अपने घर से ही सावित्री की शादी की थी. Social Story In Hindi

Family Story : उपहार – क्यों बीवी के सामने गिड़गिड़ाया बैजू ?

Family Story : बैजू की साली राधा की शादी बैजू के ताऊ के बेटे सोरन के साथ तय हो गई. बैजू और उस की पत्नी अनोखी नहीं चाहते थे कि यह शादी हो, पर सोरन के बड़े भाई सौदान ने राधा के भाई बिल्लू को बिना ब्याज के कर्ज दे कर यह सब जुगाड़ बना लिया था. अब ऊपरी खुशी से बैजू और अनोखी इस शादी को कराने में जुट गए. शादी से पहले ही राधा ने जीजा से अपने लिए एक रंगीन टीवी उपहार में मांग लिया.

बैजू ने दरियादिली से मान लिया, पर जब अनोखी ने सुना, तो वह जलभुन गई. घर आते ही वह आंखें तरेर कर बोली, ‘‘अपने घर में कालासफेद टैलीविजन नहीं और तुम साली को रंगीन टीवी देने चले हो.

‘‘चलो, सिर्फ साली को देते तो ठीक था, लेकिन उस की शादी में टीवी देने का मतलब है कि सोरन के घर टीवी आएगा. हम टीवी दे कर भी बिना टीवी वाले रहेंगे और सोरन बिना पैसा दिए ही टीवी देखने का मजा उठाएगा.

‘‘तुम आज ही जा कर राधा से टीवी के लिए मना कर दो, नहीं तो मेरीतुम्हारी नहीं बनेगी.’’

बैजू अनोखी की बात सुन कर सकपका गया. उसे तो खुद टीवी देने वाली बात मंजूर नहीं थी, लेकिन राधा ने रंगीन टीवी उपहार में मांगा, तो वह मना न कर सका.

समाज के लोग कहेंगे कि मर्द हो कर अपनी जबान का पक्का नहीं है. यह भी कहेंगे कि वह औरत की बातों में आ गया. सब उसे जोरू का गुलाम कहेंगे.

बैजू इतना सोच कर अपनी बीवी के सामने गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘अनोखी, मैं तेरे हाथ जोड़ता हूं. इतने पर भी तू न माने, तो मैं तेरे पैरों में गिर जाऊंगा. इस बार की गलती के लिए मुझे माफ कर दे. आगे से मैं तुझ से पूछे बिना कोई काम न करूंगा.

‘‘मैं ने राधा को टीवी देने की बात कह दी है, अब मैं अपनी बात से पीछे नहीं हट सकता. तू खुद ही सोच कि क्या मेरी बदनामी में तेरी बदनामी नहीं होगी? लोग मुझे झूठा कहेंगे, तो तुझे भी तो झूठे की बीवी कहेंगे. महल्ले की औरतें ताने मारमार कर तेरा जीना मुहाल कर देंगी. मुझे मजबूर मत कर.’’

अनोखी थोड़ी चालाक भी थी. उसे पता था कि कहने के बाद टीवी न देने से महल्ले में कितनी बदनामी होगी. वह अपने पति से बोली, ‘‘ठीक है, इस बार मैं तुम्हें माफ कर देती हूं, लेकिन आगे से किसी की भी शादी में ऐसी कोई चीज न देना, जो हमारे घर में न हो…

‘‘और तुम यह मत समझना कि मैं बदनामी से डरती हूं. मैं तो केवल तुम्हारे मनुहार की वजह से यह बात मान गई हूं.’’

राधा और सोरन की शादी हुई. बैजू ने अपने दिल पर पत्थर रख कर रंगीन टीवी का तोहफा शादी में दे दिया.

अनोखी भी टीवी की तरफ देखदेख कर अपना दिल थाम लेती थी. मन होता था कि उस टीवी को उठा कर अपने घर में रख ले, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकती थी.

अनोखी का सपना था कि उस के घर में भी रंगीन टीवी हो. उस टीवी पर आने वाले सासबहू की लड़ाई से लबरेज धारावाहिक धूमधाम से चलें. लेकिन ये सब अरमान सीने में ही दबे रह गए.

राधा सोरन के घर में आ कर रहने लगी. थोड़े ही दिनों में राधा ने सोरन से कह कर जीजा का दिया रंगीन टीवी चलाना शुरू कर दिया. टीवी इतनी तेज आवाज में चलता कि बगल में बने बैजू के घर में बैठी अनोखी के कानों तक सासबहू के भड़कते संवाद गूंजते.

अनोखी का दिल होता कि जा कर टीवी देख ले, लेकिन उस ने कसम खाई थी कि जब तक वह अपने घर में भी रंगीन टीवी न मंगवा लेगी, तब तक राधा के घर टीवी पर कोई प्रोग्राम न देखने जाएगी.

राधा ने एक दिन अपनी सगी बहन अनोखी से कहा भी, ‘‘जीजी, तू मेरे घर पर टीवी देखने क्यों नहीं आती? कहीं तुझे भी महल्ले के लोगों की तरह मुझ से जलन तो नहीं होती?’’

अनोखी इस बात को सुन कर खून का घूंट समझ कर पी गई. उस ने राधा को कोई जवाब न दिया, लेकिन दोचार दिनों में ही आसपड़ोस की औरतों से उसे सुनने को मिला कि राधा सब से कहती है, ‘‘मेरी बड़ी बहन मुझ से दुश्मन की तरह जलती है. क्योंकि मेरे घर में रंगीन टीवी है और उस के घर कालासफेद टीवी भी नहीं है.’’

अनोखी इस बात को भी खून का घूंट समझ कर पी गई. लेकिन एक दिन अनोखी का लड़का रोता हुआ घर आया. जब अनोखी ने उस से रोने की वजह पूछी, तो उस ने बताया, ‘‘मां, मौसी ने मुझे टीवी नहीं देखने दिया.’’

अपने लड़के से यह बात सुन कर अनोखी का अंगअंग जल कर कोयला हो गया. आखिर उस के पति का दिया टीवी उसी का लड़का क्यों नहीं देख सकता? शाम तक अनोखी इसी आग में जलती रही.

जब बैजू घर आया, तो उस ने तुगलकी फरमान सुना दिया, ‘‘तुम अभी जा कर उस टीवी को उठा लाओ. आखिर तुम ने ही तो उस को दिया है. जब हमारा दिया हुआ टीवी हमारा ही लड़का न देख सके, तो क्या फायदा… और वह राधा की बच्ची सारे महल्ले की औरतों से मेरी बदनामी करती फिरती है. तुम अभी जाओ और टीवी ले कर ही घर में कदम रखना.’’

अनोखी की लाल आंखें देख बैजू सकपका गया. अनोखी को जवाब भी देने की उस में हिम्मत न हुई. वैसे, गुस्सा तो बैजू को भी आ रहा था. वह सीधा सोरन के घर पहुंच गया.

राधा टीवी देख रही थी. बैजू को देखते ही वह मुसकरा कर बोली, ‘‘आओ जीजा, तुम भी टीवी देख लो.’’

बैजू थोड़ा नरम हुआ, लेकिन अनोखी की याद आते ही फिर से गरम हो गया. वह थोड़ी देर राधा को देखता रहा, फिर बोला, ‘‘राधा, यह टीवी तुम्हें वापस करना होगा. मैं ने ही तुम्हें दिया था और मैं ही वापस ले जाऊंगा.’’

बैजू के मुंह से टीवी की वापसी वाली बात सुन कर राधा के रोंगटे खड़े हो गए. वह बोली, ‘‘जीजा, तुम्हें क्या हो गया है? आज तुम ऐसी बातें क्यों करते हो? यह टीवी तो तुम ने मुझे उपहार में दिया था.’’

बैजू कुछ कहता, उस से पहले ही महल्ले की कई औरतें और लड़कियां राधा के घर में आ पहुंचीं. उन्हें रंगीन टीवी पर आने वाला सासबहू का सीरियल देखना था.

शायद बैजू गलत समय पर राधा से टीवी वापस लेने आ पहुंचा था. इतने लोगों को देख बैजू के होश उड़ गए. भला, इतने लोगों के सामने उपहार में दिया हुआ टीवी कैसे वापस ले जाएगा. महल्ले की औरतों को देख कर राधा की हिम्मत बढ़ गई.

एक औरत ने राधा से पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है राधा बहन, इस तरह उदास क्यों खड़ी हो?’’

राधा शिकायती लहजे में उन सब औरतों को सुनाते हुए बोली, ‘‘देखो न बहन, जीजा ने पहले मुझे शादी के समय उपहार में यह टीवी दे दिया, लेकिन अब वापस मांग रहे हैं. भला, यह भी कोई बात हुई.’’

राधा की यह बात सुन कर बैजू सकपका गया. अब वह क्या करे. टीवी वापस लेने में तो काफी बदनामी होने वाली थी. उस ने थोड़ी चालाकी से काम लिया. वह गिरगिट की तरह एकदम रंग बदल गया और जोर से हंसता हुआ बोला, ‘‘अरे राधा, तुम तो बड़ी बुद्धू हो. मैं तो मजाक कर रहा था.

‘‘तुम मेरी सगी और एकलौती साली हो, भला तुम से भी मैं मजाक नहीं कर सकता. तुम बड़ी भोली हो, सोचती भी नहीं कि क्या मैं यह टीवी वापस ले जा सकता हूं… पगली कहीं की.’’

बैजू की इस बात पर राधा दिल पर हाथ रख कर हंसने लगी और बोली, ‘‘जीजा, तुम ने तो मेरी जान ही निकाल दी थी. फिर तुम बिना साली के भटकते फिरते. जिंदगीभर तुम किसी लड़की से जीजा सुनने को तरसते.’’

इस बात पर सभी औरतों की हंसी छूट पड़ी. सारा माहौल फिर से खुशनुमा हो गया. बैजू को एक पल भी वहां रहना अच्छा नहीं लग रहा था. वह राधा से बोला, ‘‘अच्छा राधा, अब मैं चलता हूं. मैं तो यह देखने आया था कि टीवी सही चल रहा है कि नहीं.’’ राधा अपने जीजा के मुंह से इतनी फिक्र भरी बात सुन खुश हो गई और बोली, ‘‘जीजा, तुम आए हो तो शरबत पीए बिना न जाने दूंगी. एक मिनट बैठ जाओ, अभी बना कर लाती हूं.’’

राधा ने खुशीखुशी शरबत बना कर बैजू को पिला दिया. शरबत पीने के बाद बैजू उठ कर अपने घर को चल दिया. उसे पता था कि अनोखी उस का क्या हाल करेगी. कहेगी कि साली की मुसकान से घायल हो गए. उस की मीठीमीठी बातों में फंस गए. उस ने शरबत पिला कर तुम को पटा लिया. उस के घर में ही जा कर रहो, अब तुम मेरे पति हो  ही नहीं. लेकिन बैजू भी क्या करता. भला उपहार को किस मुंह से वापस ले ले, वह भी इतनी औरतों के सामने. ऊपर से जिस से उपहार वापस लेना था, वह उस की सगी और एकलौती साली थी. बैजू ने सोच लिया कि वह बीवी का हर जुल्म सह लेगा, लेकिन दिया हुआ उपहार वापस नहीं लेगा. Family Story

Love Stories In Hindi : बंद किताब – क्या खत्म हुआ अभिषेक का 15 साल का इंतजार ?

Love Stories In Hindi : ‘‘तुम…’’

‘‘मुझे अभिषेक कहते हैं.’’

‘‘कैसे आए?’’

‘‘मुझे एक बीमारी है.’’

‘‘कैसी बीमारी?’’

‘‘पहले भीतर आने को तो कहो.’’

‘‘आओ, अब बताओ कैसी बीमारी?’’

‘‘किसी को मुसीबत में देख कर मैं अपनेआप को रोक नहीं पाता.’’

‘‘मैं तो किसी मुसीबत में नहीं हूं.’’

‘‘क्या तुम्हारे पति बीमार नहीं हैं?’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’

‘‘मैं अस्पताल में बतौर कंपाउंडर काम करता हूं.’’

‘‘मैं ने तो उन्हें प्राइवेट नर्सिंग होम में दिखाया था.’’

‘‘वह बात भी मैं जानता हूं.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘तुम ने सर्जन राजेश से अपने पति को दिखाया था न?’’

‘‘हां.’’

‘‘उन्होंने तुम्हारी मदद करने के लिए मुझे फोन किया था.’’

‘‘तुम्हें क्यों?’’

‘‘उन्हें मेरी काबिलीयत और ईमानदारी पर भरोसा है. वे हर केस में मुझे ही बुलाते हैं.’’

‘‘खैर, तुम असली बात पर आओ.’’

‘‘मैं यह कहने आया था कि यही मौका है, जब तुम अपने पति से छुटकारा पा सकती हो.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘बनो मत. मैं ने जोकुछ कहा है, वह तुम्हारे ही मन की बात है. तुम्हारी उम्र इस समय 30 साल से ज्यादा नहीं है, जबकि तुम्हारे पति 60 से ऊपर के हैं. औरत को सिर्फ दौलत ही नहीं चाहिए, उस की कुछ जिस्मानी जरूरतें भी होती हैं, जो तुम्हारे बूढ़े प्रोफैसर कभी पूरी नहीं कर सके.

‘‘10 साल पहले किन हालात में तुम्हारी शादी हुई थी, वह भी मैं जानता हूं. उस समय तुम 20 साल की थीं और प्रोफैसर साहब 50 के थे. शादी से ले कर आज तक मैं ने तुम्हारी आंखों में खुशी नहीं देखी है. तुम्हारी हर मुसकराहट में मजबूरी होती है.’’

‘‘वह तो अपनाअपना नसीब है.’’

‘‘देखो, नसीब, किस्मत, भाग्य का कोई मतलब नहीं होता. 2 विश्व युद्ध हुए, जिन में करोड़ों आदमी मार दिए गए. इस देश ने 4 युद्ध झेले हैं. उन में भी लाखों लोग मारे गए. बंगलादेश की आजादी की लड़ाई में 20 लाख बेगुनाह लोगों की हत्याएं हुईं. क्या यह मान लिया जाए कि सब की किस्मत खराब थी?

‘‘उन में से हजारों तो भगवान पर भरोसा करने वाले भी होंगे, लेकिन कोई भगवान या खुदा उन्हें बचाने नहीं आया. इसलिए इन बातों को भूल जाओ. ये बातें सिर्फ कहने और सुनने में अच्छी लगती हैं. मैं सिर्फ 25 हजार रुपए लूंगा और बड़ी सफाई से तुम्हारे बूढ़े पति को रास्ते से हटा दूंगा.’’

अभिषेक की बातें सुन कर रत्ना चीख पड़ी, ‘‘चले जाओ यहां से. दोबारा अपना मुंह मत दिखाना. तुम ने यह कैसे सोच लिया कि मैं इतनी नीचता पर उतर आऊंगी?’’

‘‘अभी जाता हूं, लेकिन 2 दिन के बाद फिर आऊंगा. शायद तब तक मेरी बात तुम्हारी समझ में आ जाए,’’ इतना कह कर अभिषेक लौट गया.

रत्ना अपने बैडरूम में जा कर फफकफफक कर रोने लगी. अभिषेक ने जोकुछ कहा था, वह बिलकुल सही था.

रत्ना को ताज्जुब हो रहा था कि वह उस के बारे में इतनी सारी बातें कैसे जानता था. हो सकता है कि उस का कोई दोस्त रत्ना के कालेज में पढ़ता रहा हो, क्योंकि वह तो रत्ना के साथ कालेज में था नहीं. वह उस की कालोनी में भी नहीं रहता था.

रत्ना के पति बीमारी के पहले रोज सुबह टहलने जाया करते थे. हो सकता है कि अभिषेक भी उन के साथ टहलने जाता रहा हो. वहीं उस का उस के पति से परिचय हुआ हो और उन्होंने ही ये सारी बातें उसे बता दी हों. उस के लिए अभिषेक इतना बड़ा जोखिम क्यों उठाना चाहता है. आखिर यह तो एक तरह की हत्या ही हुई. बात खुल भी सकती है. कहीं अभिषेक का यह पेशा तो नहीं है? बेमेल शादी केवल उसी की तो नहीं हुई है. इस तरह के बहुत सारे मामले हैं. अभिषेक के चेहरे से तो ऐसा नहीं लगता कि वह अपराधी किस्म का आदमी है. कहीं उस के दिल में उस के लिए प्यार तो नहीं पैदा हो गया है.

रत्ना को किसी भी तरह के सुख की कमी नहीं थी. प्रोफैसर साहब अच्छीखासी तनख्वाह पाते थे. उस के लिए काफीकुछ कर रखा था. 5 कमरों का मकान, 3 लाख के जेवर, 5 लाख बैंक बैलेंस, सबकुछ उस के हाथ में था. 50 हजार रुपए सालाना तो प्रोफैसर साहब की किताबों की रौयल्टी आती थी. इन सब बातों के बावजूद रत्ना को जिस्मानी सुख कभी नहीं मिल सका. प्रोफैसर साहब की पहली बीवी बिना किसी बालबच्चे के मरी थी. रत्ना को भी कोई बच्चा नहीं था. कसबाई माहौल में पलीबढ़ी रत्ना पति को मारने का कलंक अपने सिर लेने की हिम्मत नहीं कर सकती थी.

रत्ना ने अभिषेक से चले जाने के लिए कह तो दिया था, लेकिन बाद में उसे लगने लगा था कि उस की बात को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता था. रत्ना अपनेआप को तोलने लगी थी कि 2 दिन के बाद अभिषेक आएगा, तो वह उस को क्या जवाब देगी. इस योजना में शामिल होने की उस की हिम्मत नहीं हो पा रही थी.

अभिषेक अपने वादे के मुताबिक 2 दिन बाद आया. इस बार रत्ना उसे चले जाने को नहीं कह सकी. उस की आवाज में पहले वाली कठोरता भी नहीं थी. रत्ना को देखते ही अभिषेक मुसकराया, ‘‘हां बताओ, तुम ने क्या सोचा?’’

‘‘कहीं बात खुल गई तो…’’

‘‘वह सब मेरे ऊपर छोड़ दो. मैं सारी बातें इतनी खूबसूरती के साथ करूंगा कि किसी को भी पता नहीं चलेगा. हां, इस काम के लिए 10 हजार रुपए बतौर पेशगी देनी होगी. यह मत समझो कि यह मेरा पेशा है. मैं यह सब तुम्हारे लिए करूंगा.’’

‘‘मेरे लिए क्यों?’’

‘‘सही बात यह है कि मैं तुम्हें  पिछले 15 साल से जानता हूं. तुम्हारे पिता ने मुझे प्राइमरी स्कूल में पढ़ाया था. मैं जानता हूं कि किन मजबूरियों में गुरुजी ने तुम्हारी शादी इस बूढ़े प्रोफैसर से की थी.’’

‘‘मेरी इज्जत तो इन्हीं की वजह से है. इन के न रहने पर तो मैं बिलकुल अकेली हो जाऊंगी.’’

‘‘जब से तुम्हारी शादी हुई है, तभी से तुम अकेली हो गई रत्ना, और आज तक अकेली हो.’’

‘‘मुझे भीतर से बहुत डर लग रहा है.’’

‘‘तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है. अगर भेद खुल भी जाता है, तो मैं सबकुछ अपने ऊपर ले लूंगा, तुम्हारा नाम कहीं भी नहीं आने पाएगा. मैं तुम्हें सुखी देखना चाहता हूं रत्ना. मेरा और कोई दूसरा मकसद नहीं है.’’

‘‘तो ठीक है, तुम्हें पेशगी के रुपए मिल जाएंगे,’’ कह कर रत्ना भीतर गई और 10 हजार रुपए की एक गड्डी ला कर अभिषेक के हाथों पर रख दी. रुपए ले कर अभिषेक वापस लौट गया.

तय समय पर रत्ना के पति को नर्सिंग होम में भरती करवा दिया गया. सभी तरह की जांच होने के बाद प्रोफैसर साहब का आपरेशन किया गया, जो पूरी तरह से कामयाब रहा. बाद में उन्हें खून चढ़ाया जाना था. अभिषेक सर्जन राजेश की पूरी मदद करता रहा. डाक्टर साहब आपरेशन के बाद अपने बंगले पर चले गए थे. खून चढ़ाने वगैरह की सारी जिम्मेदारी अभिषेक पर थी. सारा इंतजाम कर के अभिषेक अपनी जगह पर आ कर बैठ गया था. रत्ना भी पास ही कुरसी पर बैठी हुई थी. अभिषेक ने उसे आराम करने को कह दिया था.

रत्ना ने आंखें मूंद ली थीं, पर उस के भीतर उथलपुथल मची हुई थी. उस का दिमाग तेजी से काम कर रहा था. दिमाग में अनेकअनेक तरह के विचार पैदा हो रहे थे. अभिषेक ड्रिप में बूंदबूंद गिर कर प्रोफैसर के शरीर में जाते हुए खून को देख रहा था. अचानक वह उठा. अब तक रात काफी गहरी हो गई थी. वह मरीज के पास आया और ड्रिप से शरीर में जाते हुए खून को तेज करना चाहा, ताकि प्रोफैसर का कमजोर दिल उसे बरदाश्त न कर सके. तभी अचानक रत्ना झटके से अपनी सीट से उठी और उस ने अभिषेक को वैसा करने से रोक दिया.

वह उसे ले कर एकांत में गई और फुसफुसा कर कहा, ‘‘तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे, रुपए भले ही अपने पास रख लो. मैं अपने पति को मौत के पहले मरते नहीं देख सकती. जैसे इतने साल उन के साथ गुजारे हैं, बाकी समय भी गुजर जाएगा.’’ अभिषेक ने उस की आंखों में झांका. थोड़ी देर तक वह चुप रहा, फिर बोला, ‘‘तुम बड़ी कमजोर हो रत्ना. तुम जैसी औरतों की यही कमजोरी है. जिंदगीभर घुटघुट कर मरती रहेंगी, पर उस से उबरने का कोई उपाय नहीं करेंगी. खैर, जैसी तुम्हारी मरजी,’’ इतना कह कर अभिषेक ने पेशगी के रुपए उसे वापस कर दिए. इस के बाद वह आगे कहने लगा, ‘‘जिस बात को मैं ने इतने सालों से छिपा रखा था, आज उसे साफसाफ कहना पड़ रहा है.

‘‘रत्ना, जिस दिन मैं ने तुम्हें देखा था, उसी दिन से तुम्हें ले कर मेरे दिल में प्यार फूट पड़ा था, जो आज बढ़तेबढ़ते यहां तक पहुंच गया है. ‘‘इस बात को मैं कभी तुम से कह नहीं पाया. प्यार शादी में ही बदल जाए, ऐसा मैं ने कभी नहीं माना.

‘‘मैं उम्मीद में था कि तुम अपनी बेमेल शादी के खिलाफ एक न एक दिन बगावत करोगी. मेरी भावनाओं को खुदबखुद समझ जाओगी या मैं ही हिम्मत कर के तुम से अपनी बात कह दूंगा.

‘‘इसी जद्दोजेहद में मैं ने 15 साल गुजार दिए. आज तक मैं तुम्हारा ही इंतजार करता रहा. जब बरदाश्त की हद हो गई, तब मौका पा कर तुम्हारे पति को खत्म करने की योजना बना डाली. रुपए की बात मैं ने बीच में इसलिए रखी थी कि तुम मेरी भावनाओं को समझ न सको.

‘‘तुम ने इस घिनौने काम में मेरी मदद न कर मुझे एक अपराध से बचा लिया. वैसे, मैं तुम्हारे लिए जेल भी जाने को तैयार था, फांसी का फंदा भी चूमने को तैयार था.

‘‘मैं तुम्हें तिलतिल मरते हुए नहीं देख सकता था रत्ना, इसलिए मैं ने इतना बड़ा कदम उठाने का फैसला लिया था.’’

अपनी बात कह कर अभिषेक ने चुप्पी साध ली. रत्ना उसे एकटक देखती रह गई.

Family Story In Hindi : शादीलाल की ससुराल यात्रा

Family Story In Hindi : शादीलाल जैसा सामान धरती पर कम ही मिलता है. साढ़े 4 फुट की उस चीज का पेट आगे निकला हुआ था और गंजे सिर पर गिनने लायक बाल थे. मुझे यकीन था कि उस की शादी नामुमकिन है, पर शायद वह अपने माथे पर कुछ और ही लिखा कर लाया था.

जी हां, जैसा हमारा प्यारा दोस्त शादीलाल था, ठीक वैसी ही उस की बीवी यानी मेरी भाभी आई थीं. वे भी करीब 37 साल की होंगी. शादीलाल की कदकाठी से ले कर मोटापा, लंबाई, ऊंचाई, निचाई, चौड़ाई सभी में जबरदस्त टक्कर देने वाली थीं.

मेरी भाभी का नाम पहले कुमारी सुंदरी था, पर अब श्रीमती सुंदरी देवी हो गया था.

पर भाभी का सुंदरी होना तो दूर, वे सुंदरी का ‘सु’ भी नहीं थीं, मगर ससुराल के नाम से बिदकने वाला मेरा यार गजब की तकदीर पाए हुए था. उस के 7 सगी सालियां थीं और सातों एक से बढ़ कर एक.

मैं भी शादी में गया था. सच कहता हूं कि मेरा ईमान भूचाल में जैसे धरती डोलती है, वैसे डोल गया था. अगर मेरी नकेल पहले से न कसी होती, तो मैं शादीलाल की सालियों के साथ इश्क कर डालता.

शादी में शादीलाल की सालियों ने उस की इतनी खिंचाई की थी कि वह ससुराल का नाम लेना ही भूल गया. शादी में उस से जूतों की पूजा कराई गई. धोखे में डाल कर सुंदरी देवी के पैर छुआए गए. सुंदरी देवी के नाम से झूठी चिट्ठी भेज कर उसे जनवासे से 7 फर्लांग दूर बुलवाया गया.

खैर, होनी को कौन टाल सकता था. आज शादीलाल की शादी को एक साल हो गया. सुंदरी देवी अपने मायके में थीं. वे न जाने कितनी बार वहां हो आईं, पर मेरे यार ने कभी वहां की यात्रा का नाम नहीं लिया.

वहां से ससुर साहब की चिट्ठी आई कि आप शादी के बाद से ससुराल नहीं आए. अब सुंदरी की विदाई तभी होगी जब आप खुद आएंगे, वरना नहीं.

यह वाकिआ मुझे तब पता चला, जब औफिस की बड़े बाबू वाली कुरसी पर शादीलाल को गमगीन बैठे देखा.

‘‘मेरे यार, क्या कहीं से कोई तार वगैरह आया है या गमी हो गई?’’ मैं ने घबरा कर पूछा.

शादीलाल ने अपना मुंह नहीं खोला. अलबत्ता, नाक पर मक्खी बैठ जाने पर भैंस जैसे सिर हिलाती है, वैसे न में सिर हिला दिया.

तब मैं ने पूछा, ‘‘क्या आप को सुंदरी देवी की तरफ से तलाक का नोटिस आया है? क्या वे बीमार हैं या सासससुर गुजर गए?’’

अब शादीलाल ने जो सिर उठाया, तो मेरा दिल बैठ गया. लाललाल आंखें आंसुओं से भरी थीं. चेहरा गधे सा मुरझाया था.

मैं ने उस के हाथ पर हाथ रखा, तो शादीलाल रो उठा और बोला, ‘‘देखो एकलौता राम, तुम मेरे खास दोस्त हो, तुम से क्या छिपाना. चिट्ठी आई है.’’

‘‘क्या कोई बुरी खबर है या कोई अनहोनी घटना घट गई?’’

‘‘नहीं, ससुरजी ने मुझे बुलाया है. इस बार वे साले के साथ सुंदरी को नहीं भेज रहे हैं. अब तो मुझे जाना ही होगा.’’

‘‘अरे, तो इस में घबराने की क्या बात है. ससुराल से बुलावा तो अच्छे लोगों को ही मिलता है. तुम तो

7 सालियों के आधे घरवाले हो, तुम जरूर जाओ.’’

‘‘नहीं यार, यही तो मुसीबत है. मैं उन सातों के मुंह में तिनके की तरह समा जाता हूं.’’

‘‘शादीलाल, तुम्हें क्या हो गया है? घबराओ मत, मैं तुम्हारे साथ हूं,’’ मैं ने उसे हौसला बंधाया.

‘‘एकलौता राम, मुझे तुम्हीं पर भरोसा है. इस संसार में मेरा साथ देने वाले यार तुम्हीं हो. क्या तुम मेरे ऊपर एक एहसान करोगे?’’

‘‘कहो यार, मैं तो यारों का एकलौता राम हूं.’’

‘‘तुम को मेरे साथ मेरी ससुराल चलना होगा, वरना मेरी शैतान सालियां मुझे सतासता कर काढ़ा बना कर पी जाएंगी.’’

मैं ने शादीलाल को समझाना चाहा, पर वह मुझे अपनी ससुराल ले ही गया. इस तरह अब शादीलाल की ससुराल यात्रा और साथ में एकलौता राम की यादगार यात्रा शुरू हो गई.

87 किलोमीटर दूर ससुराल में पहुंचे, तो हमारी खूब खातिरदारी हुई. फिर सातों शैतान सालियों के कारनामे शुरू हो गए, जिन का हमें डर था.

थका होने की वजह से शादीलाल शाम 7 बजे से ही खर्राटे लेने में मस्त हो गया. तभी वे सातों आईं. उन्होंने मुंह पर उंगली रख चुप रहने का इशारा किया तो मैं समझ गया कि शादीलाल अब तो गया काम से.

मैं शादीलाल को जगाने के चक्कर में था कि 27 साला एक साली ने कहा, ‘‘आप खामोश रहिए, वरना आप की हजामत जीजा से भी बढ़ कर होगी.’’

मैं ने रजाई तानी और उस में झरोखा बना कर नजारा देखने लगा. शादीलाल के हाथों में एक साली ने नीली स्याही का पोता फेरा. दूसरी साली ने उस की नाक में कागज की सींक बना कर घुसा दी. नतीजतन, शादीलाल का हाथ नाक पर पहुंच गया और स्याही चेहरे पर ‘मौडर्न आर्ट’ बनाती गई.

मैं लिहाफ के अंदर हंसी नहीं रोक पा रहा था. आखिर में 6 सालियां बाहर चली गईं, केवल 7 साल की सुनीता बची, तो उस ने अपने जीजा के हाथों में उसी की हवाई चप्पलें उलटी कर के फंसी दीं और फिर उस के कानों में सींक घुमा कर भाग गई.

सींक से बेचैन हो कर शादीलाल ने अपने कानों पर हाथ मारे, तो चप्पलें गालों पर चटाक से बोलीं.

मैं ने किसी तरह झरोखा बंद किया. हंसहंस कर मेरा पेट हिल रहा था,

पर कान आहट ले रहे थे.

मेरा यार उठा. चप्पलें फेंकने की आवाज आई, फिर उस ने मेरी रजाई उठा दी. मैं तब भी हंस रहा था.

शादीलाल बरस पड़ा, ‘‘एकलौता राम, तू कर गया न गद्दारी. मेरी यह हालत किस ने की?’’

मैं ने आंख मलने का नाटक किया और पूछा, ‘‘क्या बात है यार?’’

‘‘बनो मत, मेरी हालत पर तुम हंस रहे थे.’’

‘‘क्या बात करते हो यार… मैं तो सपने में हंस रहा था. अरे, तुम्हारे चेहरे पर रामलीला का मेकअप किस ने किया?’’

‘‘उठ यार, मैं यहां पलभर भी नहीं ठहर सकता. वही कमबख्त सालियां होंगी,’’ उस ने आईने में अपना चेहरा देखते हुए कहा.

‘‘चलो ससुरजी के पास, मैं उन सब की शिकायत करता हूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘पर यार, ससुरजी ऐसा टैक्नीकलर दामाद देखेंगे तो क्या कहेंगे? आखिर मैं क्या करूं? मैं इसीलिए यहां नहीं आता हूं. तुझे बचाव के लिए लाया था, पर तू भी बेकार रहा.’’

‘‘शादीलाल, क्या मैं रातभर जाग कर तुम्हारी खाट के चक्कर लगाऊंगा? तुम भी तो घोड़े बेच कर सो गए. वहां जग में पानी रखा है, मुंह धो डालो.’’

बेचारा शादीलाल मुंह धो कर लेट गया. मैं सोने की कोशिश में था कि तभी पायल की आवाज सुन कर चौंका.

जीरो पावर का बल्ब जल रहा था. मैं ने देखा, वह भारीभरकम औरत शायद श्रीमती शादीलाल थीं. मैं ज्यादा रात तक जागने पर मन ही मन झल्लाया और करवट बदल कर लेटा रहा. मुझे आवाजें सुनाई पड़ रही थीं.

‘‘अरे तुम, देखो हल्ला नहीं करना. मेरा यार एकलौता राम सोया हुआ है. तुम खुद नहीं आ सकती थीं. तुम्हारी बहनों ने मेरा मजाक बना दिया.’’

ठीक तभी बिजली जलने की आवाज सुनाई दी और सामूहिक ठहाके भी. मैं ने फौरन हड़बड़ा कर रजाई फेंकी. देखा तो दंग रह गया. शादीलाल की 6 सालियां खड़ी थीं. बेचारा शादीलाल उन्हें टुकुरटुकुर देख रहा था.

साली नंबर 5 गद्दा, तकिया व साड़ी फेंक कर फ्राक में खड़ी हो गई और बोली, ‘‘हम सातों को जीजाजी शैतान कह रहे थे.’’

‘‘अरे, मैं तो पहले ही समझ गया था. मैं तो नाटक कर रहा था,’’ शादीलाल ने झेंपते हुए साली नंबर 5 को देखा.

इस मजाक के बाद अगला मजाक सुबह ही हुआ. मैं और मेरा यार जब कमरे से बाहर आए, तो आंगन में सालियों से दुआसलाम हुई.

तभी एक साली ने कहा, ‘‘जीजाजी, क्या आप रात को बड़ी दीदी के कमरे में गए थे?’’

‘‘नहीं सालीजी, तुम्हारे होते हुए मैं वहां क्यों जाता?’’ कह कर शादीलाल ने उसे गोद में उठा लिया.

‘‘पर जीजाजी, आप बड़ी दीदी की चप्पलें पहने हैं और आप की चप्पलें तो दीदी के कमरे में पड़ी हैं.’’

शादीलाल ने घबरा कर पैरों की ओर देखा. पैरों में लेडीज चप्पलें ही थीं.

शादीलाल के हाथ से साली छूट गई, पर मैं ने उसे संभाल लिया. फिर ठहाका लगा, तो शादीलाल की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई.

सब से ज्यादा मजा उस समय आया, जब शादीलाल पेट हलका करने शौचालय में घुसा. तब मैं आंगन में खड़ाखड़ा ब्रश कर रहा था. सालियों ने जो टूथपेस्ट दिया था, उस का स्वाद कड़वा सा था और उस से बेहद झाग भी निकल रहा था.

तभी शौचालय के अंदर के नल का कनैक्शन, जिस से पानी जाता था, एक साली ने बाहर से बंद कर दिया.

मैं ने सोचा कि शादीलाल तो गया काम से. इधर मैं थूकतेथूकते परेशान था कि शादीलाल की सास ने कहा, ‘‘बेटा, तुम कुल्ला कर लो. इन शैतानों ने टूथपेस्ट की जगह तुम्हें ‘शेविंग क्रीम’ दे दी थी.’’

मेरे तो मानो होश ही उड़ गए. जल्दीजल्दी थूक कर भागा और सालियों के जबरदस्त ठहाके सुनता रहा.

शादीलाल एक घंटे बाद जब बिना पानी के ‘शौचालय’ से बाहर आया तो छोटी साली नाक दबा कर आई और बोली, ‘‘जीजाजी, फिर से अंदर जाइए. अब नल चालू कर दिया है.’’

शादीलाल दोबारा अंदर घुसा, फिर निकल कर नहाने घुस गया. उस का लगातार मजाक बनाया जा रहा था, पर वह ऐसा चिकना घड़ा था कि उस पर कोई बात रुकती नहीं थी.

2 दिन ऐसे ही सालियों की मुहब्बत भरी छेड़खानी में गुजरे. जब जाने का नंबर आया तो मेरे सीधेसादे यार शादीलाल ने सालियों से ऐसा मजाक किया कि सातों सालियां ही शर्म से पानीपानी हो गईं.

हुआ यों कि जब हमारे जाने का समय आया और रोनेधोने के बाद तांगे में सामान रख दिया गया, तब सालियां, उन की सहेलियां और महल्ले वालों की भीड़ जमा थी.

तभी शादीलाल ने कहा, ‘‘देखो सातों सालियो, मुझे यह बताओ कि कुंआरी लड़की को क्या पसंद है?’’

सातों सालियों ने न में सिर हिलाया. सब लोगों को यह जानने की बेताबी थी कि शादीलाल अब क्या कहेंगे. तभी शादीलाल ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘अरे, तुम लोगों को नहीं पता कि कुंआरी लड़कियों को क्या पसंद है?’’

‘नहीं,’ सातों सालियों ने एकसाथ फिर से वही जवाब दिया.

‘‘मुझे पहले ही तुम लोगों पर शक था,’’ शादीलाल ने नाटकीय लहजे में कहा.

उस समय सातों सालियों पर घड़ों पानी पड़ गया, जब उन की एक सहेली ने कहा, ‘‘तुम लोगों को जीजाजी ने बेवकूफ बना दिया. उन्हें तुम्हारे कुंआरे होने पर शक है. उन्होंने तुम सभी को शादीशुदा बना दिया है, क्योंकि तुम लोगों को कुंआरी लड़कियों की पसंद नहीं मालूम है.’’

और फिर तो सातों सालियों पर इतने जबरदस्त ठहाके लगे कि सभी दुपट्टे में मुंह छिपा कर अंदर भाग गईं. Family Story In Hindi 

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