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Social Story : तुनकमिजाज बाई

Social Story : फरिश्ता कौंप्लैक्स में ममता नगरनिगम के लाल, हरे, काले रंगों के कचरे के बड़े डब्बे लिए एकएक घर की घंटी बजाती कचरा इकट्टा करने रोज की तरह आवाज लगाने लगी.

उसी समय बाकी कामवालियां भी अपनेअपने लगे घरों में साफसफाई करने को आ-जा रही थीं और कुछ रहवासी अपने कामधंधे के लिए घर से निकल रहे थे.

उस व्यस्त फ्लोर पर सभी ने एक बार में अपनेअपने कचरे खुद या अपने घर पर काम करने आई बाई के हाथ बाहर भिजवा दिए और कई सीधा उन डब्बों में अपने वेस्ट डाल अपने घरों के भीतर चले गए.

उस फ्लोर पर एक घर शेष था जिस में अभीअभी कोई नए लोग रहने आए थे. कल भी उन्होंने कचरा उस के जाने के बाद बाहर रखा और पूरा फ्लोर बदबूदार हो गया.

वह कल की तरह आज बिल्डिंग मैनेजर से डांट नहीं खाना चाहती थी, इसलिए ममता ने फिर घंटी बजाई. लेकिन कोई न आया. उस ने उस घर के सामने जा कर जोर से आवाज लगाई.

“दीदी, कचरा हो तो अभी दे दीजिए.”

सुबह के 9 बजे अपनी बदहवास नींद में चूर वे मेमसाहब अपनी नाकमुंह बिचका कर अपने घर के दरवाजे को आधा खोल, कचरे से पिलपिलाती झिल्ली उस के पैर की ओर जोर से फेंक कर झट से अपना दरवाजा बंद कर लेती हैं.

‘ये कचरा बिनने वाले दो कौड़ी के लोग सुबहसुबह हमारी नींद खराब करने को मुंह उठा कर चले आते हैं, गंवार कहीं के,’ वे अपने घर के भीतर बड़बड़ाती रहीं और दरवाजे के इस पार खड़ी ममता उन की बातें सुन हतप्रभ रह गई.

वह सोचती रह गई कि काम तो काम होता है, चाहे वह एअरकंडीशनर कमरे में बैठ कर कंप्यूटर चलाने वाला हो या गटर साफ करने वाला, अपनाअपना पेट पालने परिश्रम तो सभी करते हैं. उन की मेहनत आंकने को वह किसी से नहीं कह रही पर इस तरह से तिरस्कार करना क्या सही है?

उन्हें उसे ऐसा कहते सुन टीस जरूर हुई और एकाएक ममता के कानों के साथ उस की भीगी आंखें उन के आलीशान करीगरी किए हुए दरवाजे पर जा अटकीं और एक पल को उन के कहे एकएक शब्द उस के दिमाग में घूमने लगे. इसी बीच उस की खोई हुई नजरों ने अपने पैरों के बीच कुछ बहता हुआ पाया. उस ने नीचे देखा और अपने जूते झट से अलग कर लिए.

उन के द्वारा प्रतिबंधित की जा चुकी नष्ट न होने वाली पन्नी, जो वर्ल्ड लाइफ फैडरेशन के आंकड़े के अनुसार प्रदेश में रोजाना 20 गायों की मौत का कारण बन रही है, को जोर से फेंकने से वह पूरी तरह से फट गई थी और उस से बदबू मारती उन के घर की सड़ीगली जूठन के साथ डिस्पोजेबल चम्मच, घड़ी के सैल, सैनेटरी पैड आदि साफ टाइल्स पर धरधरा कर जहांतहां फैल गए.

वह अपने दस्ताने पहने हाथों से उन्हें उठा वेस्ट अनुसार नगरनिगम के डब्बो में डाल तो देती है पर तब तक उस से निकल चुका गंदे कचरे का पानी फर्श पर फैल गया.

उस ने खुद को समझाया कि सालों से कुछ घरों से ऐसी ओछी प्रतिक्रिया मिलना उस के लिए तो आम बात थी, फिर इतना दिल से क्यों लगना, जाने दो.

‘एक ही झिल्ली में सब तरह का कचरा नहीं डाला जाता,’ यह बात नगरनिगम के कर्मचारी समयसमय पर खुद आ कर और पंफलेट द्वारा सालों से बतला रहे हैं.

मां तो अनपढ थी फिर भी उन्हें इतनी समझ थी पर इतने बड़े पढ़ेलिखे लोगों को भला यह आसान बात क्यों नहीं समझ आती. जिन्हें सूखा, गीला और प्रकृति के लिए जोखिम वाले सामान के डब्बों के बीच का फर्क नहीं पता.

बिना विभाजन किए किचन का वेस्ट, प्लास्टिक सामान, सैलबैटरीज, बिना लाल क्रौस किए पेपर में लपेट कर पैड-डायपर की अलग झिल्ली, टूटे कांच बिना सोचे कि उन के फेंकने के बाद उस कचरे को कुत्ते, गाय या कचरा बिनने वाले के खोलने पर वो चोटिल हो सकते हैं और न ही अपने घर से होती पर्यावरण को सुरक्षित रखने की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी व दिनभर मोबाइल पर उंगलिया चलाने वाली अतिव्यस्त जनता समय के अभाव का बहाना कर सभी कचरा अलगअलग करने में असमर्थ हो एकसाथ ठूंस कर फेंक देती है, जबकि यही जनता सरकार को वायु, जल, मिट्टी के बढ़ते प्रदूषण के लिए बेझिझक कोसने में देर नहीं लगाती.

कचरा तो बिन गया पर गंदगी का वह लसलसा, लारदार पानी जस का तस था.

सफाई वाली तो आ कर जा चुकी और उस का काम कचरा इकट्टा करना है, गंदगी साफ करना नही. एक बार को कर भी दे पर उस के पास तो सफाई का सामान ही नहीं है, बाकी घरों से कचरा लेने के लिए देर भी हो रही है. उसे उस फ्लोर को ऐसे ही गंदगी के बीच छोड़ कर जाने के अलावा कोई रास्ता न सूझा और वह एक के बाद एक दूसरे फ्लोर में कचरा इकट्ठे करने यह सोच कर निकल गई कि जब सफाईवाली दिखेगी तो उस से कह कर यहां सफाई करवा देगी.

वहीं, कुछ घंटों बाद जब वे मेमसाहब सजधज कर, परफ्यूम मार, शौपिंग के लिए मौल को निकलने अपना दरवाजा बंद कर अपनी चिकनी हाई हील्स से लिफ्ट की ओर जाने मुड़ीं नहीं कि वे धम्म से उन मक्खियों से भिनकते अपने द्वारा फेंके कचरे में जा फिसलीं.

तभी सामने वाले घर से काम कर निकलती बाई ने उन्हें फर्श पर से अपने चिपचिपाते हाथों से उठने का बारबार असफल प्रयास करते पाया और दूसरी ओर से उसी समय ममता सफाईवाली को ले कर आ पहुंची.

वे तीनों उन की मदद करने को उन की ओर फुरती से बढ़ने लगीं.

“यह क्या तरीका है गवारों? न सफाई करने की अक्ल है न ही कचरा हटाने की. तुम लोग को नौकरी से नहीं निकलवाया तो मेरा नाम नहीं. रुको वहं, यहा मत आना. वहीं खड़ी रहो. अपने गंदे हाथों से मुझे छूना मत,” वे मेमसाहब गिरती-संभलती बड़बड़ाती हैं.

“हां, तो पड़ी रह वैसी. एक तो मदद कर रहे हैं, और ये अकड़ दिखा रही हैं. देखा था मैं ने, कैसे कचरा फेंक कर दे रही थी सुबह. देख, अब अपने किए पर कैसी लोट रही है.”

“चुप रह, अपनी औकात देख कर बात कर, अनपढ़.”

“हां मानते हैं, आप लोग जैसे बड़े स्कूलकालेज में नहीं गए पर कचरा का विभाजन कर फेंकने की तमीज हमारे पास आप से बहतर है. अनपढ़गंवार आप को हमें नहीं बल्कि हमें आप को कहना चाहिए.”

“दीदी माफ करिएगा,” ममता ने मामला बढ़ता देख उसे चुप करा दिया. जो वह आज सुबह न कह सकती थी, उस तुनकमिजाज बाई ने उसे सुना दिया.

सफाईवाली बिना कुछ कहे वह गंदगी साफ कर ममता के साथ चली गई और वे मेमसाहब अपना सिर झुकाए, अपनी पीठ सरका कर दरवाजे का सहारा लेते अपने महंगे कपड़ों से रिसती हुई बदबूदार लार को अपने साथ घर के भीतर ले जातीं यह सोचती रहीं कि असलियत में गंवार है कौन ? Social Story

Romantic Story in Hindi : प्रेम की शुरुआत

Romantic Story In Hindi : होली वाले दिन सुबह आंख खुली और बिस्तर से उतरने के लिए सरोज ने पैर नीचे रखे तो हैरान रह गई. पलाश के ढेर सारे फूल जमीन पर बिछे हुए थे. मन को लुभाते रंगीले फूलों ने सारी फिजा को रंगीन बना दिया और यही रंग सुमन के जीवन में बिखेर गया. ट्रेन की खिड़की से बाहर देखतेदेखते मन विभोर सा हो रहा था. पूरा जंगल पलाश के फूलों से लदालदा चंपई रंग में रंगा हुआ लग रहा था. बचपन में जब भी होली नजदीक आती थी तो सब बड़ों को कहते सुनते थे कि जंगल से पलाश के फूल लाएंगे और उन से होली के रंग तैयार करेंगे.

सच में ये रंग हैं ही इतने रंगीले, देख कर मन को खूब लुभाते हैं और सारी फिजा को रंगीन कर देते हैं. मेरे जीवन में भी यही रंग समाया है जब से सुमेर की प्रीत मन में जगी है. मन तो नहीं था उन्हें छोड़ कर आने को और वे भी तो कैसे तड़प कर बोले थे- ‘मत जाओ सरोज, मैं इतने दिन तुम्हारे बिना कैसे रहूंगा.’ पर पगफेरी के लिए भी न आती तो लोग क्या कहते और मम्मीपापा का भी तो मन करता होगा बिटिया से मिलने का. ये रिश्ते भी कैसे पल में बदल जाते हैं कि जिस से कभी जानपहचान भी न थी, आज वही मन का मीत है, सब से प्यारा है, दिल का सहारा है. मु झे तो पहली ही नजर में सुमेर भा गए थे.

देखने दिखाने की रस्मों के बीच कब दिल मेरे पहलू से निकल कर उन का बन बैठा, पता ही नहीं चला. प्रीत ने अनछुए मन को ऐसा छुआ कि अब कुछ नहीं भाता था. सारे वक्त खोईखाई सी रहने लगी थी. मन उन्हीं की यादों में खोया रहता. पिछले साल यही तो दिन थे जब होली नजदीक आ रही थी. सगाई के बंधन में बंधे हम दोनों पूरी तरह एकदूसरे की प्रीत के रंग से सराबोर थे. सुमेर रोज शाम को औफिस से लौटते ही मु झे फोन करते और लगभग एकडेढ़ घंटे तक हम दोनों एकदूसरे की बातों में खो जाते.

उस रोज शाम होते ही मु झे उन की याद सताने लगी पर उन का फोन नहीं आया और जब मैं ने फोन किया तो कवरेज क्षेत्र से बाहर बता रहा था. मन की बेचैनी और अधीरता बढ़ती जा रही थी और कुछ आशंकाएं भी होने लगीं. जो हमें सब से प्यारा होता है उस के बारे में अकसर हम डरने लगते हैं, अपनी जान से ज्यादा उस की फिक्र करने लगते हैं. मन घबरा कर उलटासीधा सोच रहा था. ‘न जाने क्या हुआ होगा, फोन क्यों नहीं लग रहा, कहीं कुछ… नहींनहीं, ऐसा नहीं हो सकता. मैं ने अपने इस विचार को झटक दिया और फिर से कोशिश की पर अब भी उन का फोन नहीं लगा. जब बेचैनी हद से ज्यादा बढ़ गई तो मैं ने उस के परिवार की सब से करीबी दोस्त यानी उस की भाभी और मेरी प्यारी जेठानी को फोन करना उचित समझा क्योंकि वही हमारी हमउम्र और राजदार थीं.

उन के बारे में सुमेर अकसर बताया करता था. सो, मैं ने उन्हें फोन किया. मेरी आवाज सुन कर ही वे मेरी परेशानी भांप गईं और हंसती हुई बोलीं, ‘क्या हुआ देवरानीजी, आज देवरजी से बात नहीं हुई क्या जो इतनी बेचैन हो?’ मैं ने सकपकाते हुए कहा, ‘भाभी, सुमेर का फोन नहीं लग रहा, वे ठीक तो हैं न?’ ‘वह बिलकुल ठीक हैं, सरोज. असल में सुमेर अपने दोस्तों के साथ पार्टी में गया है. उस ने मु झ से कहा था तुम्हें बता दूं पर मैं भूल गई, सौरी.’ इतना सुनते ही मेरी आंखों से गंगाजमुना बहने लगी. बहुत गुस्सा आ रहा था सुमेर पर. मेरी भावनाओं की कोई कद्र ही नहीं उसे. जब अभी यह हाल है, आगे क्या होगा. दिल के भीतर कुछ टूट कर बिखरता सा लगा. उस शाम मैं ने खुद को कमरे में बंद कर लिया था.

रोरो कर सूजी हुई आंखें ले कर मम्मी के पास गई तो मम्मी हैरान रह गईं. ‘क्या हुआ, तेरी आंखें क्यों सूजी हुई हैं, रोईर् है क्या?’ मम्मी ने बड़े प्यार से मु झे अपने पास बैठाया और सिर पर हाथ फेरती हुई बोलीं, ‘क्या बात है, हमेशा खिलखिलाती रहने वाली हमारी गुडि़या रानी आज इतनी उदास कैसे है?’ ‘मम्मी, आप यह सगाई तोड़ दो, मैं सुमेर से शादी नहीं करूंगी,’ मैं ने आंसू पोंछते हुए कहा. ‘सगाई तोड़ दो? क्या कह रही है तू, होश में तो है न?’ ‘हां मां, मैं पूरे होश में हूं. मैं उस से शादी नहीं करूंगी. उसे मेरी भावनाओं की कद्र नहीं. आज संडे था, मैं ने सारे दिन उस के फोन का इंतजार किया और शाम को खुद फोन किया तो पता चला वह अपने दोस्तों के साथ पार्टी में गया है.

यहां मैं इंतजार कर रही हूं और वह है कि उसे अभी से मेरी परवा नहीं तो शादी के बाद क्या होगा, बोलो मम्मी?’ यह कह कर मैं ने अपना सिर मम्मी की गोद में रख दिया. मम्मी मेरे बालों को हौलेहौले सहलाने लगीं, बोलीं, ‘सुन बिटिया, ये रिश्ते बहुत नाजुक होते हैं, बिलकुल रेशम की डोरी की तरह, जरा से खिंचाव से टूट जाते हैं. हम स्त्रियां धैर्य और सहनशीलता की पर्याय मानी जाती हैं. क्या हुआ अगर आज सुमेर दोस्तों के साथ पार्टी में चला गया, रोज तो वह तु झ से बात करता है न. वह तु झ से प्यार करता है पर उस की भी अपनी जिंदगी है. और फिर, अभी शादी नहीं हुई तो वह आजाद भी है. तू देखना, शादी के बाद वह कैसे अपनी जिम्मेदारी निभाता है.’ मां ने मु झे बहुत सम झाया पर मैं अपनी जिद पर अड़ी रही. किसी के सम झाने का मु झ पर असर नहीं हो रहा था.

सुमेर पार्टी से देररात घर आया और आते ही सुमन भाभी ने उन्हें मेरे फोन के बारे में बताया पर उसे मेरी नाराजगी का अंदाजा नहीं था, इसलिए उस ने इस बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया और सो गया. फिर सुबह उठते ही औफिस चला गया. औफिस की व्यस्तता में उसे ध्यान नहीं आया. शाम को औफिस से लौटने के बाद उस ने मु झे फोन लगाया पर मैं ने नहीं उठाया. उधर फोन बज रहा था और इधर मेरी आंखें बरस रही थीं. जब बहुत देर तक फोन बजता रहा तो मैं ने गुस्से में फोन स्विच औफ कर दिया. सुबह देखा तो व्हाट्सऐप पर उस के मैसेज थे. ‘हाय सरोज, कैसी हो? भाभी ने तुम्हारे फोन के बारे में बताया था पर पार्टी से आने में देर हो गई थी, इसलिए सो गया. औफिस में बिजी था, इसलिए शाम को तुम्हें फोन किया पर तुम ने फोन नहीं उठाया.’ ‘क्या हुआ? नाराज हो मु झ से?’ मैं ने मैसेज पढ़ कर फोन पटक दिया. शाम को मम्मी के फोन पर उस का फोन आया तो मम्मी ने अपना फोन मु झे पकड़ा दिया. वह हैलोहैलो कर रहा था पर मैं ने बात नहीं की. वह कह रहा था-

‘सरोज कैसी हो? मैं जानता हूं तुम फोन पर हो. कुछ तो बोलो, तुम्हारी मीठी आवाज सुने हुए पूरे 2 दिन हो गए. इतने से कुसूर की इतनी बड़ी सजा क्यों दे रही हो मु झे? मु झ से बात करो, प्लीज.’ पर मैं ने बिना कुछ बोले ही मम्मी का फोन उन्हें लौटा दिया और अपनी सहेली के घर चली गई. उस के बाद कुछ दिनों तक उस का फोन नहीं आया और मैं ने भी नहीं किया. मां झुं झला कर कहती रहीं, ‘पता नहीं क्या जिद पकड़ी है इस लड़की ने. अरे, इतना अच्छा लड़का है, मना रहा था. लेकिन यह मानी नहीं. बस, अकड़ती जा रही है.’ ‘मम्मी, मैं आप की बेटी हूं और आप हो कि उसी की तरफदारी करती रहती हो?’ मैं ने तुनक कर कहा तो मम्मी डांटने लगीं. ‘जो सही है उसी का पक्ष ले रही हूं मैं.

इतना भी क्या अकड़ ले कर बैठी है. कल तेरी जेठानी का फोन आया था, कह रही थी, सुमेर आजकल बहुत उदास रहने लगा है.’ यह सुन कर अच्छा महसूस हुआ कि मेरी नाराजगी का असर हो रहा है पर फिर भी अकड़ी रही. होली वाले दिन सुबह आंख खुली और बिस्तर से उतरने के लिए पैर नीचे रखे तो हैरान रह गई. पलाश के ढेर सारे फूल जमीन पर बिछे हुए थे. मैं उन पर पैर रख कर चलने लगी तो देखा ये फूलों की बिछावन गार्डन तक जा रही थी और गार्डन में लगे झूले तक थी और झूला भी फूलों से सजा हुआ था.

मैं आश्चर्य से भरी आंखें मलती फूलों पर चलतीचलती झूले पर जा कर बैठी ही थी कि किसी ने पीछे से आ कर मेरे गालों पर गुलाल मल दिया. पीछे मुड़ कर देखा, सुमेर और उस के दोस्त खड़े थे और मु झे देख कर मुसकरा रहे थे. एक दोस्त बोला, ‘भाभीजी, सुना है आप हम से और हमारे दोस्त से बहुत नाराज हैं?’ मैं ने सकपकाते हुए कहा, ‘नहीं तो.’ और मैं मुसकरा दी. ‘अब नानुकुर मत कीजिए, भाभी. आप को पता भी है, हमारे दोस्त की क्या हालत हो गई है? बेचारा देवदास बन कर रह गया है, देखिए,’ दूसरा दोस्त बोला. मैं ने सुमेर की ओर देखा तो वह मुंह लटका कर खड़ा था. यह देख कर मु झे जोर से हंसी आ गई. तीसरा दोस्त बोला, ‘अरे भाभीजी, आप को मनाने के लिए हम सब ने मिल कर कितनी मेहनत की है, पता भी है आप को? कल जंगल जा कर जितने भी पलाश के फूल मिले, तोड़ लाए और आज जल्दी उठ कर आप के लिए फूलों की डगर बनाई. अब तो मान जाइए.’ मैं जरा सी मुसकराई तो जैसे उन सब को ग्रीन सिग्नल मिल गया और सब ने मिल कर मु झे रंग डाला. मैं ने भी अपनी पिचकारी से उन सब को खूब भिगोया. हमारे प्रेम की शुरुआत की होली सच में यादगार बन गई. Romantic Story In Hindi 

Social Story In Hindi : गुटरगू

Social Story In Hindi : पक्षियों की अलग ही दुनिया है. कभी सोचती थी कि पक्षी स्वतंत्र हैं, वे हमारी तरह समाज व कानून की जंजीरों से जकड़े हुए नहीं हैं. पर, नजदीक जा कर मामूल हुआ कि उन का भी अपना समाज है, अपनी निराली दुनिया व अनुभूतियां हैं. एक वर्ष बीत गया, पर वह जोड़ा मैं अभी तक नहीं भूल सकी.

मुझे काफी दिनों से मकान की तलाश थी, क्योंकि जिस मकान में हम रह रहे थे, वह मकान कम, दड़बा अधिक जान पड़ता था. खैर, तलाश पूरी हुई. मेरे पतिदेव ने काफी अच्छा फ्लैट तलाश कर लिया. ग्राउंड फ्लोर पर दो कमरे का यह फ्लैट पा कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई. दिल्ली जैसे शहर में खुला, हवादार व सस्ता मकान सौभाग्य से ही मिलता है.

कुछ दिन यों ही सामान सेट करने में व्यतीत हो गए. लेकिन जब जरा व्यस्तता से फुरसत मिली तो यह देख कर सुकून हुआ कि सामने के पेड़ की एक बड़ी सी टहनी हमारी खिड़की के शीशे को छू रही है. खिड़की कम ही खोली जाती थी, क्योंकि दिल्ली की पौल्यूटेड एयर में एयर कंडीशनर ही चलाना पड़ता है.

एक दिन मैं बाजार जाने के लिए जैसे ही बाहर निकली, ऊपर की पड़ोसनें आपस में बतिया रही थीं. उन्होंने मुझे देखा नहीं था, पर चलतेचलते कुछ शब्द कानों में पड़ ही गए, “अरे, इस में फिर कोई आ गया…”

यह बात हमारे बारे में ही थी, इस में कोई शक नहीं था. मैं सोचने लगी, ‘आखिर इस में लोग ठहरते क्यों नहीं?’

मुझे तो अभी तक कोई दोष नजर नहीं आया. क्या चोरी होती है यहां या फिर किसी भूतप्रेत का चक्कर है? क्योंकि मैं भूतों में विश्वास नहीं रखती, सो मेरे दिमाग से यह विचार शीघ्र ही निकल गया.

दूसरे ही दिन निमंत्रित किए मेहमान की तरह एक जोड़ी मेरी खिड़की के पीछे ठकठक करने लगी. शीशे से भी गुटरगूंगुटरगूं का शोर आने तक एक कबूतरकबूतरी को पेड़ की डाल पर देख मैं ने माथा सिकोड़ लिया. मैं बारबार बाहर जा कर उन्हें उड़ाती, वह फिर हठी बालक से वहीं जम जाते. मुझे लगा कि वे ड्राइव को रोज गंदा करेंगे.
एकाएक मुझे याद आया और मैं ने कहा, “अच्छा बच्चू, अब देखती हूं कि कैसे आते हो?”

मैं ने एक लंबा सा डंडा उठाया और डरा कर टहनी से ही डंडा सटा दिया और फिर इत्मीनान से रसोई का काम निबटाने लगी.

रसोई का काम समाप्त कर सोचा, लेट ही लूं. सचमुच बच्चों के बिना घर कैसा सूना लगता है. काश, मेरे पास कोई नन्हामुन्ना होता.

मैं अपने ही विचारों में डूबनेउतरने लगी.

अभी पलकें बोझिल हो कर मुंदने ही वाली थी कि गुटरगूं की आवाज सुन कर चौक पड़ी. वह जोड़ी फिर उस डाल पर आ गई थी. वहां ऊपर दृष्टि गई तो देखती ही रह गई. शायद शीशे के पीछे उन्हें मेरे वहां होने का अहसास न था.

सलेटी रंग पर काली धारियां लिए वह जोड़ी बहुत ही खूबसूरत लग रही थी. वे जब अपनी चमकीली गरदन मटकाते, उन की भूरी आंखें गजब का आकर्षण पैदा कर देतीं. उसी दिन मुझे विश्वास हुआ कि पक्षियों में सौंदर्य भरपूर होता है.
कबूतर कबूतरी की गरदन पर चोंच मारता और कबूतरी आंख मूंद कर कभी गरदन को इधर और कभी दूसरी ओर फेर लेती. फिर थोड़ी देर बाद कबूतर ने उस के अंगों पर चोंच से गुदगुदी करनी आरंभ की.

अब कबूतरी ने आंखें झपका कर खोल दीं और एकदो बार इधरउधर देखा, बिलकुल उस कामिनी की तरह जो प्रेमी को प्रेम का प्रतिदान देने से पूर्व निश्चित हो जाती है. और फिर वही क्रिया दोहराई कबूतरी ने, कबूतर और कबूतरी पीछे सरकते चले गए और थोड़ी देर बाद सुनाई पड़ने लगा पंखों के फड़फड़ाने का स्वर.

सांझ घिर आई थी. मैं ने जैसे ही परदे डाले, कबूतरकबूतरी उड़ चले बादलों की ओर.

जब पतिदेव पधारे तो सब से पहली बात मैं ने यही बताई, “सुनिए, आज कबूतरों ने नाक में दम कर दिया. सारे ड्राइव पर बीट कर दी. बारबार धोना पड़ा.”

*कबूतरों ने या कबूतरकबूतरी ने. अरे, मनाने दो उन्हें भी हनीमून,” हंस कर वह बोले.

और बात आईगई हो गई.
लेकिन अगले 4 दिनों में मैं परेशान हो गई. कभी देखती, बाहर रखी कुरसी पर बीट पड़ी है, तो कभी गाड़ी पर. उन्होंने चित्रकारी कर दी है, तो अपना काम छोड़छोड़ कर उन्हें भगाती. पर, वे कहां मानने वाले थे.
पहले कुछ दिनों वे शी… शी का स्वर सुन कर भाग भी जाते, लेकिन कुछ दिनों पश्चात वे डरते ही न थे. मैं कई तरह से डरातीधमकाती. वे बड़े मजे से चहलकदमी करते रहते. शायद वे जान गए थे कि मुझ से उन्हें कोई खतरा नहीं है. मुझे बहुत क्रोध आता, पर यह रहा कितने दिन. खिड़की खोल कर भी हटाना चाहा, पर वे माने नहीं. अब डाल काटना तो मेरे बस का था नहीं.

मैं धीरे से परदा हटा कर देखती तो उन का प्रणय दृश्य देख शरमा जाती. दोनों चोंच से चोंच मिलाए मस्त. कभी देखती कबूतर धीरे से पुकारता ‘गुटरगूं’ तो वह उड़ कर उस के पास जा बैठती.

कबूतर मैं ने देखा न हो, ऐसी बात नहीं है. बहुत जगह मैं उस ‘गुटरगूं’ के स्वर से ऊबी हूं, पर उस प्यार की टेर में जो मिठास है, आनंद है, वह वर्णित नहीं किया जा सकता.

उन्हीं दिनों मेरी तबीयत कुछ खराब रहने लगी और जब हम को मालूम हुआ कि मैं मां बनने वाली हूं तो हम दोनों जैसे झूम उठे. सचमुच अच्छी खुशी के सम्मुख मैं उस जोड़े को कई दिनों तक भूले रही.

इतवार का दिन था. यह रसोई में आए और बोले, “देखो, इंदू, तुम्हें एक चीज दिखाऊं.”

“क्या दिखाएंगे, यहीं बता दो न.”

“नहीं, यहां नहीं,” वह बोले और लगभग खींचते हुए बेडरूम में ले गए.

“शी…” इन्होंने उंगली से चुप रहने का इशारा किया और धीरे से कान में बोले, “बाहर डाल पर देखना.”

मैं ने देखा तो शरमा गई, “बड़े बेशर्म हैं आप.”

“अच्छा.”

“कितना प्यार है इन में. शिक्षा लेनी चाहिए इन से,” ऐसा कह कर मैं वहां से भाग आई.

कबूतर डरते तो हैं नहीं, फिर इन के पीछे क्यों समय नष्ट किया जाए, यह सोच कर मैं बेफिक्र सी हो गई. बारबार उठने में आलस्य सा आने लगा. अब जो थोड़ीबहुत झिझक थी, वह भी दूर हो गई. वे बड़े मजे से मेरे गेट के आसपास भी पांव के पास घूमते और शोर ऐसे मचाते जैसे पालतू हों.

कबूतरों को शांतिप्रिय पक्षी कहा जाता है, पर ऐसा नहीं है. जब यह एक जगह कब्जा कर लेते हैं, तो दूसरे को वहां झांकने भी नहीं देते. और यदि कोई दूसरा जोड़ा ऐसा दुस्साहस करता भी है, तो इन में जम कर लड़ाई होती है.

एक बार जब खिड़की खुली थी तो देखा कि एक दूसरा जोड़ा डाल पर आ गया तो उस जोड़े ने उस की ऐसी दुर्गत बनाई कि पूछो मत.

और एक दिन क्या देखती हूं कि साफ किए छोटे से बाग में छोटीछोटी डंडियां बिखरी पड़ी हैं. कुछ समझ में नहीं आया. हार कर… फेंक दीं.

देखते ही देखते कबूतर और कबूतरी ने 8-10 फेरे लगाए. वे हर बार सूखी सी डंडियां लाते और ऊपर रख कर चले जाते. मैं सोचने लगी कि आखिर क्या करेंगे यह इन का.

शाम को जब मैं ने उन्हें बताया, तो उन्हें मेरी भावभंगिमा पर हंसी आ गई. मुझे बहुत खीज हुई, “हूं, मरदों को बस हंसना आता है. नहीं बताते, न सही.”

यह तौलिया उठा कर बाथरूम में चले गए. थोड़ी देर में जब मुंहहाथ धो कर लौटे, तो बोले, “बता दूं.”

“बताना है तो बता दीजिए, नहीं तो रहने दीजिए,” मैं ने भी ऐसे कहा, जैसे मुझे दिलचस्पी न हो.

“तो खिलाओ लड्डू, तुम मौसी बनने वाली हो.”

“क्या कहा…?”

“कबूतरी तुम्हारी बहन, तो तुम मौसी नहीं बनोगी उस के बच्चों की.”

“ठेंगे से,” मैं ने अंगूठा दिखा दिया. नारी को नारी जाति से हमदर्दी हो जाती है, खासकर ऐसी स्थिति में. मैं ने उन पर कोई रुकावट नहीं डाली.

और एक दिन साहब ने फरमाया, “दो बच्चों की मौसी बन गई हो, मुबारक हो.”

“अंडे कहो न, अभी बच्चे कहां से आए. सुनो, मैं भी देख लूं.”

मैं ने खिड़की से परदा हटा कर देखा.

“अरे, क्या बचपना करती हो? ऐसी हालत में खिड़की न खोल देना,” यह बोल उठे.
मैं मन मसोस कर रह गई.

अब कबूतरी रातदिन अंडों को सेती और कबूतर दाना ले कर आता. कितनी तन्मयता थी उन में, यह देख कर ही मालूम होता है. दोनों रातदिन जुटे रहते.

मैं स्वयं कल्पना में खो गई. मैं भी मां बनूंगी. कैसा होगा वह. फिर मैं भी उसे सीने से लगा कर रखूंगी.

कभी सोचती, जब अंडों से बच्चे निकल आएंगे, तब दोनों उसे दाना खिलाएंगे, उड़ना सिखाएंगे और फिर वे भी अपने मांबाप की तरह गुटरगूं का शोर करेंगे.

रातरात भर कबूतरी अंडों को सेती और अपनी चोंच से उन डंडियों को तोड़तोड़ कर गोलाई में रखती, ताकि वे उस घेरे से निकल कर नीचे न गिर जाएं. और वह दिन भी आया, जब अंडों से दो बच्चे निकले, एक नर, एक मादा.

एक बार हम दोनों ने घर भर की सफाई की. पति पेड़ पर चढ़ कर कुछ फालतू डंडिया जो नीचे लटक रही थीं, तोड़ने लगे. मैं ने चिल्ला कर कहा, “देखो, बच्चों को तंग मत करना.”

“बहुत खयाल है मौसी को.”

“हां है. अब बताओ, कैसे हैं दोनों?” मैं अपनी जिज्ञासा को न दबा पाई.

“अरे बाबा, यहां तो बड़ी बदबू है,” पति बोले और फिर एक स्वर सुनाई दिया, “बहुुत शरारती है तू, मेरे घर में मुझे ही आंखें दिखाता है.”

“सुनो, नीचे आ जाओ. कबूतरी आ गई तो समझेगी कि इन्हें उड़ा रहे हैं, कहीं वह चोंच मार दे.” और ये तुरंत नीचे उतर आए.

इस के आगे की घटना दुखद है. मौत कितनी भयावह है, कितने रूप हैं इस के. जीवन का कठोर सत्य है यह. मैं रसोई में थी. इन की आवाज आई, “देखो, क्या हो गया?”

मैं ने देखा तो चीख निकल गई. बाहर के बरामदे में एक बच्चे को बिल्ली मुंह में उठाए सामने से गुजर गई और दूसरा नीचे मरा पड़ा था.

कबूतरी ने करुण स्वर में पुकारा, ‘गुटरगूं.’

मेरे आंसू पलकों पर जम गए. मुझे लगा, कबूतरी की आंखें नम हैं. वह उड़ गई. और थोड़ी देर बाद दोनों कबूतरकबूतरी भयभीत दृष्टि से चारों ओर देख रहे थे. दो दिन वे शायद भ्रम मिटाने के लिए आते रहे और फिर चले गए नियति के मारे.

उन दिनों मेरा जी बहुत खराब रहा. लगा, जैसे किसी निकट परिचित की मौत हो गई हो.

इस के बाद हम दोनों ने निश्चय कर लिया कि अब किसी पक्षी को अपने पेड़ पर आश्रय न लेने देंगे. भला कौन इन की रक्षा कर सकता है. मेरी कल्पनाएं बिखर गईं. मैं सहम गई. अपने होने वाले बच्चे की सुखद अनुभूतियों के बीच एक भय समा गया. ओह, काल के आगे किस की क्या बिसात. इन सब का यही परिणाम हुआ कि मैं चिड़ियों को भी उड़ाती रहती. मैं उन्हें न रहने देती और सारे दिन बाहर ‘शी… शी’ का स्वर गूंजा करता. ऊपर वाली पड़ोसनें मुझे देख कर मंदमंद मुसकराती.

एक दिन सोचा कि गीले कपड़ों को पंखे की हवा में बाहर वाले बरामदे में सुखा लूं. फुलस्पीड पर पंखा चला कर मैं बाल सुलझाने लगी. न जाने कब वही कबूतर टांड पर आ बैठा. हाथ में कंघी लिए जैसे ही मैं ने उसे देखा तो खीज उठी. और मुंह से निकला, ‘शी…शी.’

कबूतर घबरा कर जैसे ही उड़ा तो पंखे से टकरा कर पंख छितराए और नीचे जमीन पर छटपटाने लगा. मेरी चीख घुट कर रह गई. ओह, मेरे पांव में इतनी शक्ति भी नहीं रही कि दो कदम चल सकूं. सिर से पांव तक कंपकपी. कुछ क्षणों में मैं ने अपने पर काबू पाया और भाग कर पानी ले आई और जैसे ही मैं ने कबूतर के मुख में पानी की बूंदें टपकाई, वह खून के कतरे उगल कर शांत हो गया.

तभी कबूतरी डाल पर आ बैठी और चारों तरफ गरदन घुमाघुमा कर देखने लगी और नीचे जैसे ही उस ने अपने साथी को देखा, वही करुण स्वर उभरा- ‘गुटरगूं.’
प्रत्युत्तर न पा कर वह सहम गई.

उस की ऐसी दशा देख कर मेरे आंसू निकल पड़े. मन पुकार उठा, ‘यह ठीक है कि उस की मौत की जिम्मेदार मैं हूं, पर ये सब अनजाने में हुआ. तुम मुझे कोई बददुआ न देना. मैं तुम से माफी चाहती हूं.’ उस की दृष्टि को सहना मेरे बूते से बाहर था. मैं ने नजर झुकाई और वह उड़ गई.

मैं ने इन के सीने से लग कर कहा, “आज मुझे खाना खाने के लिए मजबूर न करो. मेरा मन बहुत खराब है.”

यह समझे कि मैं बुरी तरह भयभीत हो गई हूं. कई तरह से समझायाबुझाया, पर कोई सांत्वना मुझे उस घटना की चोट से उबार न सकी.

कबूतरी कई बार आती. डाल पर मैं खिड़की से देख फिर वह वैसे ही वापस हो जाती, शायद खोए हुए साथी के मिलने की आस बाकी थी.

मुझे उस पर दया आती. उस के लिए यह पेड़ कितना खराब रहा, जहां उसे अपने बच्चे, अपना पति खो देना पड़ा है.

मैं कई बार बाहर ड्राइव वे पर गेहूं के दाने रख देती. उन दोनों को दाने चुगते देख मुझे असीम संतुष्टि का आभास होता.

और एक दिन मैं मोबाइल पर मैसेज पढ़ रही थी. और कबूतरी डाल पर बैठी थी. मैं ने देखा, ऐसा लगा जैसे वह अतीत में खोई है, कितनी स्मृतियां सिमटी हैं इस घर में. काश, जो हो गया वह न होता तो वह किती सुखी और संतुष्ट होती. अचानक जैसे भूकंप आ गया. बिल्ली ने इतनी जोर से झपट्टा मारा था कि कबूतरी विरोध भी न कर सकी. बिल्ली विजय भाव आंखों से मुसकराती कबूतरी की गरदन दबाए भाग गई और मेरे मुंह से निकला, ‘उफ्फ, तेरी कहानी खत्म हो गई.’

लेकिन आज सोचती हूं, नहीं, कहानी खत्म नहीं हुई, वह आज भी ताजा है, मेरे दिलोदिमाग पर. Social Story In Hindi

Love Stories In Hindi : किताबों के लेनदेन वाली प्रेम कहानी

Love Stories In Hindi : मैंने मोबाइल में समय देखा. 6 बजने में 5 मिनट बाकी थे. सुधा को अब तक आ जाना चाहिए था,

वह समय की बहुत पाबंद थी. मेरी नजर दरवाजे पर टिकी थी. डेढ़, पौने 2 साल से यही क्रम चला आ रहा था. इस का क्या परिणाम होगा, मैं भी नहीं जानता था. फिर भी मैं सावधान रहता था. जो भी हो रहा था, वह उचित नहीं था, यह जानते हुए भी मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था.

माना कि वह मुझ पर मुग्ध थी, पर शायद मैं कतई नहीं था. मेरा हराभरा, भरापूरा संसार था. सुंदर, सुशील, गृहस्थ पत्नी, 2 बच्चे, प्रतिष्ठित रौबदाब वाली नौकरी.

15 साल के वैवाहिक जीवन में पत्नी से कभी किसी तरह की कोई किचकिच नहीं. यह अलग बात है कि कभी पल, 2 पल के लिए किसी बात पर तूतूमैंमैं हो गई हो. फिर भी अंदर से व्यवहारिक गृहस्थ कट रहा था कि अभी समय है, यहीं रुक जाओ, वापस लौट आओ.

वैसे सुधा के साथ मेरे जो संबंध थे, वे इतने छिछोरे नहीं थे कि एक झटके में तोड़े जा सकें या अलग हुआ जा सके. सब से बड़ी बात यह थी कि हम ने कभी मर्यादा लांघने की कोशिश नहीं की. हमारे रिश्ते पूरी तरह स्वस्थ और समझदारी भरे थे. कुछ हद तक मेरे बातचीत करने के लहजे और कलात्मक स्वभाव की वजह से वह मेरी ओर आकर्षित हुई थी. इस में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं था.

आप से 10 साल छोटी युवती आप से जबरदस्त रूप से प्रभावित हो और आप संन्यासी जैसा व्यवहार करें, यह संभव नहीं है. मैं ने भी खुद को काबू में रखने की कोशिश की थी, पर मेरी यह कोशिश बनावटी थी, क्योंकि शायद मैं उस से दूर नहीं रह सकता था. कोशिश की ही वजह से आकर्षण घटने के बजाय बढ़ता जा रहा था. लगता था कि यह छूटेगा नहीं. उस की नौसिखिया लेखकों जैसी कहानियां को मैं अस्वीकृत कर देता, वह शरमाती और निखालिस हंसी हंस देती. फिर फटी आंखों से मुझे देखती और अपनी कहानी अपने ही हाथों से फाड़ कर कहती, ‘‘दूसरी लिख कर लाऊंगी.’’

कह कर चली जाती. हमारे बीच किताबों का लेनदेन होने लगा था. उस की दी गई किताबें ज्यादातर मेरी पढ़ी होती थीं. कुछ मुझे पढ़ने जैसी नहीं लगती थीं, मैं उन्हें वापस कर देता था.

वह मेरे अहं को झकझोरती रहती थी. शायद मैं उसे हैरान करने वाली युक्तियों से ठंडक पहुंचाता रहता था. क्योंकि मैं पुरुष था. हमारे संबंध यानी रिश्ते भले ही चर्चा में नहीं थे, पर खुसरफुसर तो होने ही लगी थी. यहां एक बात स्पष्ट कर दूं कि हमारे बीच किसी भी तरह का शारीरिक संबंध नहीं था. इस तरह के रिश्ते के बारे में हम ने कभी सोचा भी नहीं था.

सुधा से इस तरह की मैं ने कभी अपेक्षा भी नहीं की थी. न ही मेरा कोई इरादा था. उस से मेरा रिश्ता मानसिक स्तर का था. जिस तरह लोगों के बीच समान स्तर का होता है, उसी तरह मेरा और उस का बौद्धिक रिश्ता था. ऐसा शायद समाज के डर से था, पर मैं उस से रिश्ता तोड़ने से घबरा रहा था. हमारा समाज स्त्रीपुरुष की दोस्ती को स्वस्थ नजरों से नहीं देखता. यह सत्य भी है, पर ये रिश्ते स्थूल थे. धरातल के थे. यह मान लेना चाहिए कि मेरे और सुधा के बीच रिश्ते पवित्र थे. उस के मन में मेरे प्रति जो आदर था, उसे मैं सस्ते में नहीं ले सकता था. इस बात पर मुझे जरा भी विश्वास नहीं था. कल शाम उस का फोन आया, ‘‘सर, कल शाम को 6 बजे मिल सकते हैं?’’

मना करने का मन था, इसलिए मैं ने पूछा, ‘‘ऐसा क्या काम है?’’

‘‘काम हो तभी मिल सकते हैं क्या सर?’’

‘‘ऐसा तो नहीं है, पर… ओके मिलते हैं, बस.’’ कह कर मैं ने फोन रख दिया.

मेरे फोन रखते ही पत्नी ने पूछा, ‘‘कौन था?’’

मैं कुछ जवाब दूं, उस के पहले ही बोली, ‘‘सुधा ही होगी?’’

‘‘हां, मिलना चाहती है.’’

‘‘तुम नहीं मिलना चाहते?’’ बेधड़क सवाल. पत्नी के इस सवाल का जवाब हां या न में नहीं दिया जा सकता था.

मैं ने कहा, ‘‘डरता हूं सुरेखा, वह भी मेरी तरह लेखक बनना चाहती है. स्त्रीपुरुष का भेद किए बगैर मुझे उस की मदद करनी चाहिए, पर…’’

‘‘वह स्त्री है और सुंदर भी, इसीलिए तुम उदार बन रहे हो न? अगर ऐसा है तो घमंडी कहलाओगे.’’ कह कर पत्नी हंस पड़ी. 10वीं पास गांव की पत्नी का अलग ही रूप.

मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या करूं?’’

‘‘मिलने के लिए तो कह चुके हो, अब पूछ रहे हो?’’

‘‘मैं उस अर्थ से नहीं पूछ रहा, मैं पूछ रहा हूं कि उस के साथ के रिश्ते को कैसे रोकूं सुरेखा. मुझे मेरी नहीं, उस की चिंता है. उसकी अभी नईनई शादी हुई है, वह मुझ पर मुग्ध है. उस की यह मुग्धता उस के दांपत्य में आग लगा सकती है. आई एम रियली कंफ्यूज्ड सुरेखा. वह बहुत ही प्यार करने वाली है.’’

‘‘स्पष्ट और सख्ती से कह दो, तुम्हें फोन न करे. जितना हो सके, उतना दूर रहो उस से.’’ पत्नी की सलाह व्यवहारिक थी.

मेरे भीतर का व्यवहारकुशल आदमी उस की बात से सहमत था पर बवाली मन? वह नहीं चाहता था. उसे इस बात में बिलकुल विश्वास नहीं था. वह सोच रहा था, जो तुम्हें पवित्रता से चाहे, तुम्हारा आदर करे, तुम्हारी दोस्ती के बदले गर्व महसूस करे, उस का अपमान, उस की उपेक्षा ठीक नहीं. इस तरह के आदमी की फिक्र तो सामान्य आदमी भी नहीं करता, तुम तो लेखक हो. लेखक तो समाज से ऊपर उठ कर सोचता है.

उस रात नींद नहीं आई. पूरी रात करवटें बदलता रहा. दिन में औफिस के समय बेध्यान हो जाता. पौने 6 बजे डायरेक्टर से अनुमति ले कर कौफी हाउस के लिए निकल पड़ता. कौफी हाउस नजदीक ही था. मैं गाड़ी से 5 मिनट में पहुंच गया. 6 बजने में 5 मिनट बाकी थे. मैं ने 2 कप कौफी का और्डर कर दिया.

‘अभी तक आई क्यों नहीं?’ मैं ने घबरा कर मोबाइल देखा. मुझे वहां आए करीब 10 मिनट हो गए थे. कोई मुश्किल तो नहीं आ गई. आजकल के पतियों के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता. जबरदस्त नजर रखते हैं पत्नियों पर. मोबाइल पर रिसीव्ड और डायल्ड नंबर चैक करते हैं. वाट्सऐप और फेसबुक पर फ्रैंड लिस्ट के साथ मैसेंजर चैक करते हैं. कोई गलत संदेश तो नहीं भेज रहा.

मैं ने माथे का पसीना पोंछा. दरवाजे की तरफ देखा. खिड़की की तरफ ताका तो शाम की गुलाबी धूप छंटने लगी थी. मैं ने सामान्य हो कर बैठने की कोशिश की. आनेजाने वाले असहजता भांप सकते. आखिर 6 बज कर 10 मिनट पर सुधा आई. ब्लैक टीशर्ट और गाढ़ी नीली जींस में आकर्षक लग रही थी. मैं ने मन को लताड़ा, ‘‘तू तो कहता है कि शारीरिक आकर्षण नहीं है, मानसिक दोस्ती है तो फिर…’’

‘‘सौरी सर, आई एम लेट.’’

‘‘बैठो, मैं ने कौफी का और्डर कर दिया है.’’

‘‘थैंक्स सर, सब कुछ ठीक तो है न?’’

‘‘पर ज्यादा समय तक नहीं रहेगा.’’

वातावरण भारी हो उठा. इतना कह कर मैं चुप हो गया था. वह भी चुप थी. थोड़ी देर बाद उस ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘मैं आप को परेशान करती हूं न? सौरी सर, न चाहते हुए भी मैं ने आप को फोन किया. बात यह है कि एक सप्ताह के लिए मैं बाहर घूमने जा रही हूं, इसलिए सोचा कि सर को…’’

‘‘कहां जा रही हो?’’

‘‘जी गुजरात. द्वारिकाधीश.’’

‘‘पति के साथ जा रही हो, साथ में और कौनकौन जा रहा है?’’ मैं ने पूछा.

इसी के साथ मैं ने लंबी सांस छोड़ी. बेयरा 2 कप कौफी रख गया था. एक कप अपनी ओर खिसका कर दूसरा कप उस की ओर खिसका दिया. उसे कौफी ठंडी कर के पीने की आदत थी. मैं ने अपना कप उठा कर मुंह से लगाया.

कप टेबल पर रखते हुए कहा, ‘‘एंजौय करने का टाइम है, करो.’’

‘‘ईर्ष्या हो रही है क्या? मैं तो वही करना चाहती हूं, जो आप को अच्छा लगे. पर पास रहती हूं तो भी आप को अच्छा नहीं लगता और दूर जा रही हूं तो भी आप को अच्छा नहीं लग रहा. आखिर मैं करूं तो क्या करूं, मर जाऊं?’’

‘‘कौफी अच्छी है.’’ कह कर मैं ने चुस्की ली.

वह वैसे ही बैठी रही. वह कौफी ठंडी कर रही थी. मैं अपनी कौफी पी गया. कप टेबल पर रख कर उस की ओर देखा. पत्नी की याद आ गई. मन में आया कि कह दूं कि यह हमारी अंतिम मुलाकात है. अब हम आगे से नहीं मिलेंगे. तुम अपने परिवार में मन लगाओ, मैं अपने परिवार के साथ खुश सुखी हूं. तुम भी अपने परिवार के साथ खुश और सुखी रहो.

अब हमारी उम्र तुम्हारे साथ फाग गाने की नहीं रही. तुम मेरी आंखों के नीचे गड्ढे देख सकती हो. फैलते रेगिस्तान जैसा मेरा सिर. अब इस की विशालता पर गर्व महसूस नहीं किया जा सकता. मेरी बदरूपता का ढिंढोरा पीटता मेरा यह पेट…यह सब तो ठीक है, पर मैं एक जिम्मेदार व्यक्ति हूं सुधा.

‘‘कुछ मंगाना है गुजरात से? नमकीन, किताबें या कुछ और?’’

‘‘नहीं, कुछ नहीं मंगाना.’’

‘‘कोई ख्वाहिश…मन्नत..?’’

‘‘कौन पूरी करेगा?’’

‘‘द्वारिकाधीश.’’ कहते हुए उस की आंखों में सावित्री की श्रद्धा थी.

मैं खिलखिला कर हंस पड़ा. पर उस की श्रद्धा की ज्योति जरा भी नहीं डगमगाई.

‘‘आप को हंसी आ रही है?’’ उस ने एकदम शांति से पूछा, धैर्य खोए बिना. एकदम अलग रूप. उस समय उस की आधुनिकता अदृश्य थी. मेरी नास्तिकता से वह अंजान नहीं थी. फिर भी उस का इस तरह से कहना मुझे हंसने के लिए प्रेरित कर रहा था. इस में कुछ अस्वाभाविक भी नहीं था. पढ़ीलिखी महिलाओं की इस तरह की इच्छाओं को मैं हंसी में उड़ाता था.

‘‘बोलो, क्या चाहते हो?’’ वह अभी भी पहले की ही तरह गंभीर थी.

मुझे मजाक सूझा, ‘‘मांगूं?’’

उस ने आंखों से ही ‘हां’ कहा.

‘‘सुधा, तुम मुझे पसंद नहीं या तुम्हारे प्रति आकर्षण नहीं, यह कह कर मैं खुद के साथ छल नहीं करूंगा. भगवान के प्रति मुझे जरा भी श्रद्धा नहीं है, पर तुम्हारी श्रद्धा की भी हंसी उड़ाने का मुझे कोई हक नहीं है. मुझे अब कोई लालसा नहीं है. मुझे जो मिला है, वह बहुत है. पत्नी, बच्चे, प्रतिष्ठा, पैसा और…’’

‘‘…और?’’

‘‘तुम्हारी जैसी सहृदय मित्र. आखिर और क्या चाहिए? बस, मुझे तुम से एक वचन चाहिए.’’

‘‘क्या?’’

‘‘हमारे बीच यह पवित्रता इसी तरह बनी रहे. हमारी इस विरल मित्रता के बीच शरीर कभी न आए. मित्रता की पवित्रता हम इसी तरह बनाए रखें. हमारे बीच नासमझी की दीवार न खड़ी हो. बोलो, यह संभव है?’’

मेरे इतना कहतेकहते उस की आंखें भर आईं. कौफी का कप खिसका कर वह बोली, ‘‘मुझ पर विश्वास नहीं है सर, आप ने मुझे बहुत सस्ती समझा. स्त्री हूं न, इसीलिए. पर चिंता मत कीजिए, मैं वचन देती हूं कि…’’

इस के बाद बची कौफी एक बार में पी कर बोली, ‘‘आप लेखक हैं. हैरानी हो रही है कि आप लेखक हो कर भी कितने कठोर हैं. लेखक तो बहुत कोमल होता है. आप की तरह पत्थर दिल नहीं.’’

मैं सन्न रह गया. शायद अस्वस्थ भी. मैं ने अपना हाथ छाती पर रख कर देखा, दिल धड़क रहा है या नहीं. Love Stories In Hindi 

Family Story : एक और कोशिश – कैसा था मोहित का बचपन

Family Story : ‘‘किसे बारबार फोन कर रहे हो मोहित, कोई परेशानी है?’’

‘‘कब से फोन कर रहा हूं मां को, उठा ही नहीं रही हैं.’’

‘‘तो पापा को लगाओ न.’’

‘‘वे भी कहां उठा रहे हैं. कैसे हैं ये लोग, उफ्फ.’’

‘‘हो सकता है दोनों कहीं बाहर घूमने या फिर किसी काम से निकले होंगे और शोरगुल में फोन की आवाज सुन नहीं पा रहे होंगे. आप चिंता मत कीजिए, मिस्ड कौल देखेंगे तो खुद ही फोन करेंगे.’’

‘‘तुम्हें तो पता है न, रचिता, कि दोनों कैसे हैं. एकदूसरे से ठीक से बात तो करते नहीं हैं, घूमने क्या जाएंगे साथ में?’’

‘‘जब से औफिस से आए हो, परेशान दिख रहे हो. कोई बात हो गई, क्या? मेरा मतलब है कि क्या कोई जरूरी बात करनी है आप को मां से? थोड़ी देर में फिर से कोशिश करना, तब तक खाना खा लो.’’

‘‘देखो, अब तो दोनों का फोन स्विच औफ जा रहा है, क्या करूं?’’

‘‘हो सकता है फोन की बैटरी चार्ज न हो. वैसे भी, पटना में बिजली की हालत अच्छी नहीं है.’’ मेरी बातों पर तो मोहित का जरा भी ध्यान नहीं था. बस, बारबार फोन लगाए जा रहे थे. ‘‘दीदी को फोन करो, मोहित.’’

जैसे ही वे दीदी को फोन करने जा रहे थे वैसे ही दीदी का फोन आ गया.

‘‘दीदी, मैं आप को ही फोन कर रहा था. देखो न, कब से मांपापा को फोन कर रहा हूं, लग नहीं रहा है. कुछ पता है आप को?’’ मोहित बकबक किए जा रहे थे और दीदी कुछ बोल ही नहीं रही थीं, ‘‘दीदी सुन रही हो?’’

‘‘तू चुप होगा तब बोलूंगी न, मैं भी कब से फोन कर रही हूं. वैसे, तुम चिंता मत करो, मोहित. तुम्हें पता तो है कि मांपापा कैसे हैं. खुद तो मस्त रहते हैं, दूसरों को टैंशन देते हैं और शुरू से तेरी आदत है बेवजह चिंता करने की, अभी सो जा, सुबह बात हो जाएगी.’’

मोहित ने सोचा शायद दीदी ठीक ही कह रही हैं. पर मम्मीपापा फोन तो उठा ही सकते थे. एक बार और लगा कर देखता हूं, सोचते हुए उस ने फिर फोन लगाया पर अब भी उन्होंने फोन नहीं उठाया.

‘‘ऐसे मत देखो, रचिता, चिंता तो होती है न,’’ लेटी हुई रचिता उसे देख रही थी तो वह झुंझला कर बोला.

‘‘मैं समझती हूं, मोहित.’’

रातभर मोहित ठीक से नहीं सोए. जब भी रात को जाग कर देखा तो जाग ही रहे थे और सुबह भी जल्दी जाग गए. मैं ने कहा, ‘‘अभी तो 4:30 ही बजे हैं, मांपापा सो रहे होंगे’’

‘‘फिर भी फोन कर के देखता हूं, रचिता.’’

मोहित का चेहरा बता रहा था कि अभी भी फोन नहीं उठा रहे थे मांपापा. ‘‘आप मौसीजी को फोन लगाओ फिर से, शायद लग जाए,’’ रचिता ने सुझाया.

‘‘हां, वही करता हूं…क्या, कब हुआ, अभी मां कहां हैं मौसी? आप मां का खयाल रखो, मैं जल्दी से जल्दी आने की कोशिश करता हूं.

‘‘रचिता, देखो वही हुआ जिस का मुझे डर था, हमें कल ही निकलना पड़ेगा,’’ मोहित सिर पकड़ कर बैठ गए.

‘‘मौसी ने क्या बोला, यह तो बताओ.’’ मोहित की बेचैनी बता रही थी कि कुछ तो हुआ है, ‘‘मोहित क्या हुआ?’’

‘‘मां मौसी के घर पर हैं. बहुत झगड़ा हुआ है मांपापा में. मां के सिर पर चोट आई है. डाक्टर को दिखा दिया है मौसी ने, अब मां ठीक हैं. ट्रेन का तत्काल का टिकट करवाते हैं, तुम्हें छुट्टी मिल जाएगी न?’’

‘‘हां, मिल जाएगी, आप चिंता मत कीजिए.’’

मोहित ट्रेन में भी चुपचाप बैठे रहे. ‘‘मोहित क्या सोच रहे हो? मांपापा इतना लड़ते हैं आपस में तो कभी भी आप ने, दीदी ने, नानानानी ने या फिर मौसी ने उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की? बोलो मोहित, मैं कोई बाहर की नहीं हूं. क्या मैं समझा सकती हूं उन दोनों को, मैं कोशिश कर के देखूं?’’

‘‘सब हार गए दोनों को समझासमझा कर, तुम पापा को नहीं जानती. जब कोई कुछ नहीं कर सका तो तुम क्या करोगी? जब से हम भाईबहन ने होश संभाला है तब से दोनों को लड़तेझगड़ते ही देखा है.’’

लगता है रचिता सो गई. मोहित विचारों में खो गया. रचिता क्या सोचती होगी कि कैसे घर में उस की शादी हो गई. हमारा बचपन तो जैसेतैसे ही बीता. याद है मुझे, छोटीछोटी बातों पर झगड़ा करते रहते थे मांपापा दोनों और धीरेधीरे वह झगड़ा विकराल रूप धारण कर लेता था. डर के मारे हम नानी को फोन कर देते थे और जब वे सब आते, मांपापा को समझाते तो पापा उन की भी बेइज्जती कर देते थे. सो, सब ने हमारे घर आना छोड़ दिया. पापा के परिवार वालों ने भी दोनों के खराब आचरण के चलते आना छोड़ दिया. इन के झगड़ों से पड़ोसी भी परेशान रहने लगे. एक बार पेरैंटटीचर मीटिंग में दोनों का स्कूल जाना अनिवार्य था.

मेरी क्लासटीचर ने कहा, ‘मोहित पढ़ने में तो ठीक है पर स्कूल की किसी भी गतिविधि में भाग नहीं लेना चाहता. क्लास में पीछे की बैंच पर ही बैठता है. कुछ पूछती हूं तो डर जाता है. आप दोनों को जरा ज्यादा ध्यान देना होगा.’

टीचर के इतना कहते ही दोनों एकदूसरे पर आरोप मढ़ने लगे और वहीं शुरू हो गए. मैं शर्म से गड़ा जा रहा था. मैं अपनी टीचर को देख रहा था कि वे क्या सोच रही होंगी. वही दोनों को शांत करने लगीं. वे समझ गई होंगी कि मैं ऐसा क्यों हूं. रास्तेभर लड़ते रहे दोनों. एक बार भी मेरे बारे में नहीं सोचा कि मुझ पर क्या बीत रही होगी.

अपर्णा दीदी सही थीं अपनी जगह. 10वीं पास करने के बाद होस्टल चली गईं. मांपापा ने भी जिम्मेदारी से बचने के लिए होस्टल में डाल दिया. काश, मैं भी दीदी की तरह होस्टल जा पाता लेकिन डरता था कि पापा, मां को मार देंगे.

जब नानानानी का आना बंद हो गया तो मां अकसर वहां चली जाया करती थीं और कितनी बार नानाजी कहते थे कि कुछ दिन वहीं रहो. इस बात को ले कर पापा ने नाना के नाम का परचा छपवा दिया और पूरे शहर में बंटवा दिया कि नाना अपनी बेटी को मेरे प्रति भड़काते हैं और हमारा तलाक करवाना चाहते हैं.

मामा और पापा में इस बात को ले कर बहुत लड़ाई हुई थी. जब भी मैं मौसामौसी को हंसते, बातें करते देखता तो लगता था कि काश, मेरे मांपापा भी ऐसे ही होते. दीदी तो ज्यादा नहीं रहीं हमारे साथ, पढ़ाई के बाद नौकरी और फिर अपने ही पसंद के लड़के के साथ शादी कर के चली गईं. इस बात के लिए भी बहुत बवाल हुआ घर में पर दीदी ने तो शुरू से वही किया जो वे चाहती थीं. अब सोचता हूं कि दीदी अपनी जगह सही थीं. शादी तो मैं ने भी अपनी पसंद की लड़की से की पर मांपापा की मरजी से.

याद है मुझे जब फूफाजी बढ़ैया के मशहूर रसगुल्ले ले कर आए थे. मैं यही मनाता रहा कि इन के सामने ये लोग शुरू न हो जाएं. जैसे ही फूफाजी गए, पापा रसगुल्ले गिनने लगे कि कितने पीस हैं और सख्त हिदायत दी कि कोई भी उन से बिना पूछे रसगुल्ला नहीं खाएगा. तब मैं बच्चा ही था करीब 10-11 साल का, बारबार फ्रिज खोलता पर खाता नहीं था, डर जो था. पर मां तो मां होती है. उन्होंने एक कटोरे में 4 रसगुल्ले निकाल कर मुझे खाने को दे दिए. उस दिन की बातें आज भी मुझे रुलाती हैं. झगड़ा तो बहुत हुआ ही, और मां को मार भी पड़ी थी.

मां भी कहां चुप बैठने वाली थीं. उन्होंने रसगुल्ले का मटका ही तोड़ दिया और गुस्से के मारे सारे रसगुल्लों को अपने पैरों से कुचल दिया और बोला, ‘लो, अब खाओ जितने खाने हैं रसगुल्ले.’ और तब पापा मां के बाल खींचते हुए कमरे में ले गए. मैं रोए जा रहा था. महल्ले वालों ने आ कर बीचबचाव किया और फिर मौसी हमें कुछ दिनों के लिए अपने घर ले गई थीं. ऐसी कितनी बातें हैं जो मेरे मन में हमेशा के लिए घर कर गई हैं.

‘‘उठ गई रचिता?’’ मैं खयालों से बाहर निकल आया था.

‘‘आप सोए नहीं, तब से क्या सोच रहे हैं? सब ठीक हो जाएगा, मोहित.’’

‘‘अब क्या ठीक होगा, यही सोचता हूं कि कोई भी ऐसी सुखद याद नहीं है बचपन की जिसे सोच कर हम मुसकराएं या किसी के साथ बांटे.’’

जैसे ही हम मौसी के घर पहुंचे, मुझे देखते ही मां रो पड़ीं. सिर पर पट्टी बंधी थी. थोड़ी देर रुक कर, मां को ले कर हम अपने घर चले आए.

‘‘प्रणाम, पापा.’’

‘‘हूं.’’

ठीक से जवाब भी नहीं दिया पापा ने. एक दिन की चुप्पी के बाद मोहित ही बोले, ‘‘पापा, मैं मां को कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले जा रहा हूं.’’

‘‘हां, हां, ले जाओ, मेरे खिलाफ भड़का रही है मेरे ही बच्चों को, फौज बुलाई है मुझे मरवाने के लिए.’’

मोहित को पापा पर गुस्सा आया, ‘‘चुप रहिए, कब से सुन रहा हूं आप की बकबक. पता भी है कि क्या बोले जा रहे हैं आप? अपने जैसा ही समझ रखा है मुझे. पता नहीं किस भ्रम में जीते आया मैं कि एक न एक दिन आप दोनों सुधर जाओगे. पर नहीं, मैं ही गलत था. शर्म नहीं आती आप दोनों को. उम्र देखी है 70 के होने वाले हो. मुझे शर्म आती है. मेरा भी घर नहीं बसने देंगे आप लोग. वहां हम जीतोड़ मेहनत करते हैं. कभी कुछ मांगा है आप से? बस, शांति दे दीजिए हमें. तभी मैं ने मोहित का हाथ पकड़ लिया और मांपापा दोनों चुप हो कर मुझे ही देख रहे थे.’’

‘‘हफ्तेभर से परेशान हैं मोहित आप दोनों के लिए. रातरातभर ठीक से सो नहीं पा रहे हैं. जहां इन के साथीदोस्त प्रोमोशन के लिए क्याकुछ नहीं कर रहे हैं वहां आप के बेटे आप दोनों की चिंता में घुले जा रहे हैं. मैं ने देखी है इन के आंखों में वह बेचैनी आप दोनों के लिए, बहुत प्यार करते हैं मोहित आप दोनों से. मुंबई में लाखों की भीड़ में रोज ट्रेन पकड़ कर औफिस जानाआना, अगर इन्हें कुछ हो गया तो…हाथ जोड़ती हूं मत कीजिए झगड़ा, कुछ नहीं रखा है प्यार के सिवा जिंदगी में. आप को खुश होना चाहिए कि आप दोनों साथ हैं, तंदुरुस्त हैं और आप के बच्चे समझदार हैं. कभी दूसरों के घरों में झांक कर देखिए, कितनी जद्दोजेहद से अपनी जिंदगी जी रहे हैं लोग. प्लीज, आप दोनों प्यार से रहिए और कुछ नहीं चाहिए हमें.’’

अब बारी मोहित की थी, ‘‘इन्हें मत समझाओ प्यार की भाषा, मैं कहता हूं जब एकदूसरे से बनती ही नहीं है तो अलग हो जाइए न, क्या जरूरत है समाज के सामने पतिपत्नी का ढकोसला करने की. मैं वकील को फोन लगाऊं बोलिए तो.’’

‘‘मोहित, क्या कर रहे हैं आप? पापा, मेरी बात का बुरा मत मानिएगा पर इस उम्र में आ कर तो पतिपत्नी का एकदूसरे के लिए प्यार और बढ़ जाता है. आप को पता है मेरे पापा मेरी मां से बहुत प्यार करते थे. जब मेरी मां को एक लाइलाज बीमारी हो गई तो कहांकहां नहीं इलाज करवाया पापा ने. हालांकि मां फिर भी नहीं बच पाईं. आज मेरे पापा मां की यादों के सहारे ही जिंदा हैं, मां की हर वे चीजें संभाल कर रखे हैं जो मां को बहुत प्रिय थीं. काश, आज मेरी मां जिंदा होतीं तो मेरे पापा दुनिया के सब से खुश इंसान होते. आप दोनों में भी प्यार है, अगर नहीं होता तो इतने सालों तक एकसाथ नहीं रहते. बोलिए मांपापा, क्या जी पाएंगे एकदूसरे के बगैर? नहीं आएगी एकदूसरे की याद? अपने दिल पर हाथ रख कर पूछिए खुद से.’’

रचिता की बातें सुन कर दोनों चुप थे. रचिता ने मां के सिर पर हाथ रखा तो उन्होंने दोनों हाथों से पकड़ लिया पर बोलीं कुछ नहीं. पिताजी न जाने कहां चले गए. थोड़ी देर में वे आए तो देखा उन के हाथ में 2 गजरे थे, उन्होंने मां के सिरहाने रख दिए और कमरे की खिड़की के पास बाहर खड़े हो कर देखने लगे. आंखों से आंसू बह रहे थे, मानो अहं पिघल कर बह रहा हो.

भावविभोर हो कर रचिता को मोहित ने मातापिता के सामने ही बांहों में भर कर चूम लिया. उसे अपना वह संसार मिल गया जिसे बचपन से ढूंढ़ रहा था. Family Story

Hindi Kavita : क्यों जी रहा हूँ मैं?

Hindi Kavita : क्यों जी रहा हूँ मैं?
ज़िन्दगी की तलास में भटक रहा हूँ मैं
ये क्या ज़िन्दगी है जिसे जी रहा हूँ मैं।
क्यों जी रहा हूँ मैं?

वक़्त ने मुंह फेरा,
अपनों ने साथ छोरा।
बेगैरत हो गया हूँ मैं|
क्यों जी रहा हूँ मैं?

न क्रोध रहा न अहंकार
न घर रहा न परिवार,
सूरज की कड़कती धूप में
मुझे ठंड का एहसास है
आँखो में रोशनी
पर जीवन में अंधकार है|

गम के साए में खुशियाँ तलास रहा हूँ मैं।
ये क्या ज़िन्दगी है जिसे जी रहा हूँ मैं।
क्यों जी रहा हूँ मैं?

लेखक : बाल कृष्ण मिश्रा                                  

Hindi Poem : बागो में फूलों की ख़ुशबू

Hindi Poem : बागो में फूलों की ख़ुशबू
सावन की ठंडी फुहार, बागो में फूलों की बहार
वैगन विला की रंग बिरंगी लताएँ
रंगीन फूलों की टहनियों में सफेद गुलाबी केसरिया, फूलों मे हरी पत्तियों की छटा बिखेरती है
धरती सफेद चादर मे मोगरे के फूलों से सज रही है
सावन की ठंडी फुहार बागो में फूलों की बहार
रात की रानी अपनी ख़ुशबू बिखेर रही है, बेला चमेली गुलदाउदी चम्पा की अपनी छवि निराली है
हरी हरी पत्तियों में रंग बिरंगे गुलाब, कमल, गेंदा, सूरजमुखी, गुलमोहर, नर्गिस, कुमुद, सदा बहार
कामिनी केतकी पलाश, धतूरा, सुगंध राज, राधा चुड़ा सेवती, नाग चम्पा चारों तरफ़ अपना जलवा बिखेर रही हैं
सावन की ठंडी फुहार, बागो में फूलों की बहार
कैसे भूल सकते हैं चारों तरफ़ सूरज के संग आता, सूरज के संग जाता
दफ़्तर का बाबू कोई कहे कोई कहे नाइन औ क्लोक
कई रंगों में चारों तरफ़ अपना आधिकार बिखेर रहा है
सावन की ठंडी फुहार, बागो में फूलों की बहार

लेखिका : रमा सेठी

Social Story In Hindi : पार्टनर – छवि ने क्या खो दिया?

Social Story In Hindi : आवाज में वही मधुरता, जैसे कुछ हुआ ही नहीं. काम है, करना तो पड़ेगा, कोई लिहाज नहीं है. दुखी हो तो हो जाओ, किसे पड़ी है. बिजनैस देना है तो प्यार से बोलना पड़ेगा. छवि अब भी फोन पर बात करती तो उसी मिठास के साथ कि मानो कुछ हुआ ही नहीं. वैसे कुछ हुआ भी नहीं. बस, एक धुंधली तसवीर को डैस्क से ड्रौअर के नीचे वाले हिस्से में रखा ही तो है. अब उस की औफिस डैस्क पर केवल एक कंप्यूटर, एक पैनहोल्डर और उस के पसंदीदा गुलाबी कप में अलगअलग रंग के हाइलाइटर्स रखे थे. 2 हफ्ते पहले तक उस की डैस्क की शान थी ब्रांच मैनेजर मिस्टर दीपक से बैस्ट एंप्लौयी की ट्रौफी लेते हुए फोटो. कैसे बड़े भाई की तरह उस के सिर पर हाथ रख वे उसे आगे बढ़ने को प्रेरित कर रहे थे.

आज उस ने फोटो को नीचे ड्रौअर में रख दिया. अब वह ड्रौअर के निचले हिस्से को बंद ही रखती. वह फोटो उस के लिए बहुत माने रखती थी. इस कंपनी में पिछले 6 महीने से छवि सभी एंप्लौयीज के लिए रोलमौडल थी और दीपक सर के लिए एक मिसाल. छवि ने घड़ी देखी, 5 बजने में अब भी 25 मिनट बाकी थे. अगर उस के पास कोई अदृश्य ताकत होती तो समय की इस बाधा को हाथ से पकड़ कर पूरा कर देती. समय चूंकि अपनी गति से धीरेधीरे आगे बढ़ रहा था, छवि ने अपने चेहरे पर हाथ रख, आंखों को ढक अपनी विवशता को कुछ कम किया.

अभी तो उसे लौगआउट करने से पहले रीजनल मैनेजर विनोद को दिनभर की रिपोर्टिंग करनी थी, यही सोच कर उस का मन रोने को कर रहा था. अगर उस ने फोन नहीं किया तो कभी भी उन का फोन आ सकता है. औफिस का काम औफिस में ही खत्म हो जाए तो अच्छा है. घर तक ले जाने की न तो उस की ताकत थी और न ही मंशा. यह आखिरी काम खत्म कर छवि एक पंख के कबूतर की तरह अपनी कंपनी के वन बैडरूम फ्लैट में आ गई. फ्लैट की औफव्हाइट दीवारों ने उस का स्वागत उसी तरह किया जैसे उस ने किसी अनजान पड़ोसी को गुडमौर्निंग कहा हो. फ्लैट में कंपनी ने उसे बेसिक मगर ब्रैंडेड फर्नीचर मुहैया करवा रखे थे. कभी उसे लगता घर भी औफिस का ही एक हिस्सा है और वह कभी घर आती ही नहीं. सच भी तो है, पिछले 6 महीने में वह एक बार भी घर नहीं गई थी.

मात्र 100 किलोमीटर की दूरी पर उस का कसबा था, सराय अजीतमल. पर वहां दिलों की बहुत दूरी थी. पिता के देहांत के बाद मां ने पिता के एक दोस्त प्रोफैसर महेश से लिवइन रिलेशन बना लिए. अब छवि का घर, जहां वह 22 साल रही, 2 प्रेमियों का अड्डा बन गया जहां उस के पहुंचने से पहले ही उस के जाने के बारे में जानकारी ले ली जाती.

कभीकभी तो उसे अपनी मां पर आश्चर्य होता कि वह क्या उस के पिता के मरने का ही इंतजार कर रही थी. पिता पिछले 5 सालों से कैंसर से जूझ रहे थे. इसी कारण छवि को बीच में पढ़ाई छोड़ जौब करनी पड़ी और महेश अंकल ने तो मदद की ही थी. यह बात और है कि उसे न चाहते हुए भी अब उन्हें पापा कहना पड़ता.

छवि ने अपनेआप को आईने में देखा और थोड़ा मुसकराई, वह सुंदर लग रही थी. औफिस में नौजवान एंप्लौयी चोरीछिपे उसे देखने का बहाना ढूंढ़ते और कुछेक अधेड़ बेशर्मी के साथ उस से कौफी पीने का अनुरोध करते. दीपक सर की चहेती होने से कोई सीधा हमला नहीं कर पाता. क्या फोन पर रिपोर्टिंग करते समय विनोद सर जान पाते होंगे कि यह एक पंख की कबूतर कौन्ट्रैक्ट की वजह से अब तक इस नौकरी को निभा रही है, हां…दीपक सर का अपनापन भी एक प्रमुख कारण था कि वह दूसरा जौब नहीं ढूंढ़ पाई. क्या पता उन्हें मालूम हो कि औफिस जाना उसे कितना गंदा लगता है. वह नीचे झुकी, ड्रैसिंग टेबल पर फाइवस्टार रिजोर्ट में 2 दिन और 3 रातों का पैकेज टिकट पड़ा था. मन किया उस के टुकड़ेटुकड़े कर फाड़ कर फेंक दे, पर उस ने केवल एक आह भरी और कमरे की दीवारों को देखने लगी. दीवारों की सफेदी ने उसे पिछले महीने गोवा में समंदर किनारे हुई क्लाइंट मीटिंग की याद दिला दी. मन कसैला हो गया. कैसे समुद्र का चिपचिपा नमकीन पानी बारबार कमर तक टकरा रहा था और 2 क्लाइंट उस से अगलबगल चिपके खड़े थे. उन दोनों की बांहों के किले में वह जकड़ी थी और विनोद सर से ‘चीज’ कह कर एक ग्रुप फोटो लेने में व्यस्त थे.

छवि एक बिन ताज की महारानी की तरह कंपनी और क्लाइंट के बीच होने वाली डील में पिस रही थी. एक लहर ने आ कर उसे गिरा दिया, वह सोचने लगी कि क्या वह सचमुच गिर गई थी. बस, विनोद सर बीचबीच में हौसला बढ़ाते रहते, ‘बिजनैस है, हंसना तो पड़ेगा.’ उन के शब्द याद आते ही उस का मन रोने का किया. उसे लगा इस कमरे की दीवारें सफेद लहरें हैं जो उस के मुंह पर उछलउछल कर गिर रही हैं. वह जमीन पर बैठ गईर् और घुटनों को सीने से लगा सुबकने लगी. अपनी कंपनी से एक कौन्ट्रैक्ट साइन कर उस ने 3 साल की सैलरी का 60 प्रतिशत हिस्सा पहले ही ले लिया था. सारा पैसा पिता की बीमारी में लग गया. छवि का मन रोने से हलका हो गया. थोड़ी राहत मिली तो उठ कर बैड पर बैठ गई. डिनर करने का मन नहीं था, इसलिए सो गई.

सुबह 7 बजे सूरज की किरणें जब परदे को पार कर आंखों में चुभने लगीं तो वह हड़बड़ा कर उठी. वह ठीक 9 बजे औफिस पहुंच गई, उस के पास एक छोटा बैग था. दीपक सर उसे देख कर हलका सा मुसकराए. वह उन से भी छिपती हुई जल्दी से अपने कैबिन में आ कर बैठ गई. 1 घंटा प्रैजैंटेशन बनाने के बाद उसे बड़ी थकान लगने लगी, लगता था कल के रोने ने उस की बहुत ताकत खींच ली थी. तभी फोन बजा और उस का आलस टूटा. दूसरी लाइन पर दीपक सर थे, बोले, ‘‘तुम ने क्या सोचा?’’

ड्रौअर के नीचे के आखिरी खाने में कौन्ट्रैक्ट की कौपी और दीपक सर के साथ उस की फोटो थी. उस ने कौन्ट्रैक्ट को बिना देखे, फोटो को उठा अपने बैग में डाल लिया और बोली, ‘‘आप के साथ पार्टनरशिप,’’ और छवि ने फोन काट दिया. यह कोई पागलपन नहीं था, बल्कि एक सोचासमझा फैसला था. छवि ने ड्रौअर को ताला लगाया और चाबियों को झिझकते हुए, पर दृढ़ता से, पर्स में डाल दिया. 15 दिन लगे पर उसे अपने फैसले पर विश्वास था. फोटो को बैग से निकाल कर एक बार फिर देखा, थोड़ा धुंधला लग रहा था पर उस में अब भी चमक थी.

छवि की आंखों में हलका गीलापन था, कौन्ट्रैक्ट का पैसा दीपक सर की हैल्प से भर पा रही थी. अब वह कंपनी में कभी नहीं आएगी. वह अब आजाद थी. पर 2 दिन और 3 रातें दीपक सर के साथ रिजोर्ट में बिता कर वह उन्हीं के नए फ्लैट में रहेगी, एक पार्टनर बन कर. Social Story In Hindi

Love Stories In Hindi : वॉचपार्टी – शोभा और विनय की जिंदगी में कैसा तूफान मचा गई एक पार्टी

Love Stories In Hindi : अपने पति विनय के जाने के बाद शोभा बार बार कभी समय देखती,कभी हिसाब लगाती कि कौनसा काम करेगी तो समय अच्छी तरह बीत  जायेगा,आज लाइफ में पहली बार वह रात को अकेली घर में रहने वाली थी,कभी ससुराल के लोग,फिर बच्चे,रिनी और मयंक!कभी अकेले रहने की नौबत ही नहीं आयी थी,विनय के टूरिंग जॉब का पूरा टाइम ऐसे ही निकल गया था,पता ही नहीं चला कि कब कितने टूर हो जाते,अकेलापन कभी लगा ही नहीं था,पर अब बच्चों के विदेश में  बसने के बाद यह पहला टूर था,इतने दिन से लॉक डाउन में वर्क फ्रॉम होम कर रहे थे तो पूरा दिन ही व्यस्त बीतता रहा.

पर अब दिल्ली में अचानक एक मीटिंग में विनय को जाना ही पड़ा,उसे काफी समझा बुझा कर विनय तीन दिनों के लिए दिल्ली चले गए तो शोभा ने दिन में कई काम निपटा लिए,कभी अलमारी साफ़ करती,कभी कोई बुक उठा लेती,फिर डिनर भी जल्दी करके सोसाइटी में टहल भी आयी,आजकल किसी से मिलने जुलने का टाइम तो रहा ही नहीं था,मास्क लगाए ज्यादा देर तक यूँ ही टहलते रहने में उसे उलझन होने  लगती तो जल्दी ही घर भी लौट आती. विनय और बच्चे व्हाट्सएप्प पर टच में थे,रोजाना की तरह उसने ग्यारह बजे सोने से पहले गुड नाईट का मैसेज फॅमिली ग्रुप पर लिखा,सबका रिप्लाई भी आ गया,अकेले फिर डर सा लगा तो उसने ड्राइंग रूम की लाइट जलती छोड़ दी और बैडरूम में जाकर सोने के लिए लेट गयी.पचास वर्षीया शोभा कोमल स्वभाव की पति और बच्चों के साथ खुश रहने वाली शांत,अंतर्मुखी महिला थी,दोनों बच्चों को विदेश में जॉब मिल गया था,विनय एक प्राइवेट कंपनी में उच्च पद पर काम करते थे,वैसे तो विनय और शोभा लखनऊ के थे पर अब बीस  साल से मुंबई में रह रहे थे. बीस साल पहले उनका ट्रांसफर लखनऊ से  मुंबई हुआ था.

शोभा कुछ देर अपनी सोचों में खोयी रही फिर उसकी आँख लगी ही थी कि डोरबेल की आवाज से वह बुरी तरह डर कर उठी,जाकर की होल से झांका,नींद भरी आँखें हैरत के जोरदार   झटके से खुल गयीं,समीर खड़ा था ,उसने पल भर में ही दरवाजा खोल दिया,अपने पुराने अंदाज में समीर ने पूछा‘’मैंने किसी को डिस्टर्ब तो नहीं किया ?”

”अब भी ड्रामा करना नहीं छोड़ा तुमने?”शोभा खिलखिला उठी,कहा,”आओ. ”

”हाँ,आ ही गया हूँ,”कहते हुए समीर ने अपना बैग एक तरफ रखा और कहा,”शोभा,पहले मेरे हाथ सेनिटाइज़ करवा दो,यार,फ्लाइट कैंसिल हो गयी,होटल्स बंद हैं,तुम्हारा घर तो याद था,पर फोन नंबर भूल चूका हूँ,इसलिए बिना बताये इस टाइम पहुँच गया,इतना भरोसा था कि तुम लोग मुझे पहचान तो लोगे.‘’

शोभा ने उसके हाथ सेनिटाइज़ करवाते हुए कहा,”बकवास मत करो,अच्छा हुआ तुम्हारी फ्लाइट  कैंसिल हुई,मतलब यहाँ से चोरी चोरी निकल जाते हो न,अच्छा हुआ तुम्हारे साथ,मुझे जल्दी दरवाजा  खोलना ही नहीं चाहिए था,जो दोस्त भूल जाएँ,उन्हें पहचानना ही नहीं चाहिए था मुझे. ”

”अरे,वाह,आज भी तुम गुस्सा तो बड़े प्यार से ही दिखाती हो. ”

दोनों खुल कर हंस दिए,दोनों ने एक दूसरे को इतने सालों बाद भी मेंटेंड रहने पर कॉम्प्लिमेंट्स दिए,समीर ने कहा,यार कहाँ है मेरा,इतने घोड़े बेच कर सो रहा है क्या कि उसकी पत्नी रात में घर में किसी से बातें कर रही है और उसे पता ही नहीं चल रहा ?”

”आज ही दिल्ली गए हैं.तीन दिनों के लिए,एक जरुरी मीटिंग थी. ”

”ओह्ह,नो,मतलब उससे नहीं मिल पाउँगा?”

”रुक जाना,मिलकर चले जाना. ”

”नहीं,नहीं,रुक नहीं सकता,कल ही निकलना है.

”तुम फ्रेश  हो लो,क्या पीओगे?खाना खाओगे?”

”हाँ,कुछ है?”

”सब्जी रखी  है,रोटी बना दूँ?”

”हाँ,दो रोटी,और एक कप चाय,मैं फ्रेश होकर आया. ”

समीर वाशरूम में चला गया,शोभा किचन में आ गयी,सुबह की ही दाल सब्जी रखी थी,गर्म करके रोटी बनायीं और चाय चढ़ा दी,मन अतीत में लखनऊ पहुँच गया,बीस साल पहले चारों  का,समीर और उसकी पत्नी,मधु और दो बच्चे और शोभा का परिवार ! बहुत बढ़िया ग्रुप था,एक ही कॉलोनी में दस साल साथ रहे,बहुत मस्ती करते,साथ साथ घूमते,लाइफ को मिलकर एन्जॉय करते. बच्चों को भी आपस में अच्छा साथ मिलता. फिर विनय का ट्रांसफर मुंबई हो गया,एक बार समीर सपरिवार आया,फिर धीरे धीरे मिलना जुलना कम  होता गया,समीर भी फिर ऑस्ट्रेलिया चला गया तो संपर्क कम होता गया. समीर फ्रेश होकर आया,थोड़ी दाल और आलू गोभी के साथ रोटी खाना शुरू किया तो बोल उठा,तुम्हारे हाथ में तो आज भी स्वाद है. ”

”तुम आज भी खूब झूठ बोल लेते हो,”शोभा ने छेड़ा और फिर कहा,”ये तुम लोग गायब क्यों हो गए ?”

”हम कहाँ गायब हुए,आजकल तो सोशल मीडिया है एक दूसरे से जुड़े रहने के लिए पर पता चला तुम सोशल मीडिया पर कहीं भी नहीं हो,ऐसी भी क्या सबसे दूरी !”

”हाँ,समीर,मुझे तो बस किताबों का ही साथ भाता है,और कहीं हाथ मारने की जरूरत ही नहीं होती,मेरी किताबों की दुनिया ही मुझे ख़ुशी देती है,बस जब खाली होती हूँ,किताबे उठा लेती हूँ,टाइम का फिर पता ही नहीं लगता और सुनाओ,हेल्थ कैसी रहती है,मधु कैसी है,बच्चे कहाँ हैं ?”

”बैंगलोर शिफ्ट होने की तैयारी है,यहाँ एक प्रोजेक्ट पर काम करने आ रहा हूँ,बच्चे वहीँ सेट होना चाहते हैं,पर मधु अब इंडिया आना चाहती है,उसके पेरेंट्स अकेले  बैंगलोर में हैं,वह उनके आसपास रहना चाहती है,जब तक प्रोजेक्ट है,बंगलौर रहना ही है,फिर देखते हैं,हेल्थ तो टाइम के साथ कभी ऊपर नीचे रहती ही है पर हाँ,तुम आज भी उतनी ही फिट लग रही हो जैसे पहले लगती थी,”कहते हुए समीर ने शोभा को शरारती नजरों से देखा तो वह मुस्कुरा दी ,समीर ने कहा,पर शोभा,तुम थोड़ा बहुत तो दोस्तों से जुड़ने के लिए फेसबुक पर रह सकती हो न,हम कितने पुराने दोस्तों से फेसबुक से ही जुड़ते चले गए,फिर व्हाट्सएप्प ग्रुप बन गया,अब तो ज़ूम पर भी दोस्तों की महफिलें जमने लगी हैं,तुम कौनसी दुनिया में रहती हो,भाई. ”

शोभा ने कुछ कहा नहीं,समीर का खाना ख़तम हो चुका था,शोभा प्लेट्स उठा कर ले गयी और चाय भी ले आयी,समीर ने पूछा,”तुम नहीं पियोगी?”

”नहीं,इस टाइम पी लूंगी तो नींद नहीं आएगी. ”

”अच्छा,तुम आज भी सो जाओगी ?”

”हाँ,रात को ज्यादा अब जागा  ही नहीं जाता,तुम भी आराम कर लो. ”

”कर लूँगा,पर मुझे सुबह जल्दी निकलना है,ये विनय की मीटिंग दिल्ली में ही है ?”

”हाँ. ”

”विनय के हालचाल तो मुझे मिलते रहते हैं,हम सोशल मीडिया पर भी कभी कभी टकरा जाते हैं,हाय हेलो हो जाती है,बस,वह भी काफी बिजी रहता है पर तुमने तो सबसे बिना बात के संन्यास ले रखा है,बस मैं और मेरा पति टाइप कैसी हो गयी तुम ?”

शोभा हंस दी ,”पर तुम लोगों की कमी मुझे हमेशा खली,यहाँ मुंबई में तुम्हारे जैसे दोस्त कभी नहीं मिले,तुम लोगों को हमेशा याद किया मैंने. विनय काफी बिजी होते गए,टूर पर जाते रहते हैं  इस बार बहुत दिन बाद गए,तुम्हे याद है हमने कितनी मस्तियाँ की हैं,हम कितना घूमे फिरे,सच,बहुत अच्छे दिन बीते तुम लोगों के साथ. और बाकी दोस्त कैसे हैं,किसके टच में हो ?”

”आओ,तुम्हे दिखाता हूँ,”कहते कहते ही समीर ने अपने बैग से अपना लैपटॉप निकाल लिया,फेसबुक खोला,और अपने कॉमन फ्रेंड्स की फोटो दिखा दिखा कर सबके बारे में बताता रहा,शोभा को सबके बारे में जान कर अच्छा लगने लगा,अब रात के दो बज रहे थे,अचानक समीर बुरी तरह चौंका,एक जगह क्लिक करता हुआ बोला,”अरे,ये गीता की  आज वॉच पार्टी चल रही है,देखो,शोभा,इसकी पार्टी लाइव देख सकते हैं,गीता याद है न तुम्हे ?”

शोभा ने धीरे से बस हूँ ही कहा,समीर ने कहा,”हाँ,भाई,तुम  कैसे भूल सकती हो अपने पति की इस दोस्त को जिसे देख कर ही तुम्हारा पारा हाई हो जाता था,सुना है,इसने अपने पति से तलाक ले लिया था,दोनों की बनी नहीं. ”

”मुझे ये कभी पसंद आयी ही नहीं,समीर !”

”हाँ,जानता हूँ,विनय पर खूब डोरे डालती थी यह,किसी भी पार्टी में इसे देख कर तुम्हारा मूड ही खराब हो जाता थाऔर मैं और मधु तुम्हे फिर कितना चिढ़ाते थे !’

”हाँ,यह तो अच्छा है कि पति शरीफ था मेरा वरना हमारे झगडे तुम दोनों को ही सुलझाने पड़ते,”शोभा ने हँसते हुए कहा ,फिर आगे बोली ,”हम भी किसकी बात लेकर बैठ गए,अब तो हमारे बच्चों की पार्टियों के दिन हैं. ”

”अजी हाँ,ये देखो,आओ,देखते हैं मैडम की पार्टी में कौन कौन है. ”

शोभा भी थोड़ा और झुक कर लैपटॉप में देखने लगी,अचानक दोनों को एक करंट सा लगा,समीर के मुँह से निकला,ये विनय ही है क्या?”

शोभा कुछ बोली नहीं,उसने  अपनी नजरें लैपटॉप पर जमा दीं,”ये कैसे हो सकता है ?”वॉचपार्टी में साफ़ साफ़ दिख रहा था कि विनय और गीता एक दूसरे के काफी करीब हैं,म्यूजिक के साथ दोनों के पैर थिरक रहे थे,हाथों में हाथ थे ,शोभा जैसे पत्थर की हो गयी थी,उसके मुँह से इतना ही निकला,पार्टी में जाने को भी मैं बुरा नहीं कहूँगी पर दोनों की बॉडी लैंग्वेज कैसे इग्नोर करूँ?समीर,कहते कहते शोभा का गला रुंध गया,फिर बोली,मुझे तो पता भी नहीं कि विनय उसके टच में हैं !”

”शोभा,आई एम वैरी सॉरी,मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी,बेकार में लैपटॉप खोल कर बैठ गया !बहुत शर्मिंदा हूँ,शोभा ,बड़ी भूल हुई मुझसे !”

”नहीं,समीर,तुम इससे अच्छा कुछ मेरे लिए कर ही नहीं सकते थे कि मेरी आँखें खोल जाओ,विनय ने आज तक मुझे यह नहीं बताया कि ये दिल्ली जाने पर कभी किसी से मिलते हैं,मैं इतना ही जानती हूँकि काम  फिर होटलऔर बस फिर यहाँ घर,पर नहीं,इसके अलावा भी विनय की लाइफ में बहुत कुछ  है,मुझे जानना ही चाहिए था. ”

शोभा ने उठते हुए कहा ,समीर,तुम भी अब आराम कर लो,आओ,बच्चों का रूम दिखा देती हूँ,”कहकर शोभा  उठी तो समीर भी गंभीर सा उसके पीछे पीछे उठ गया. शोभा अपने रूम में आ कर तकिये पर गिरते ही फफक पड़ी,उसे उसके कजिन रवि ने एक बार दिल्ली से फोन कर कहा था कि  उसने विनय को एक होटल में किसी लेडी के साथ देखा है,हुलिया गीता से ही मिलता जुलता बताया था,पर शोभा ने उसे यही कहा था कि ऑफिस की कोई कलीग होगी,उसने कभी किसी को अपने मन का यह दुःख नहीं बताया कि  वह कई बार विनय की आशिकमिजाजी से तंग हो जाती है,सब मन में ही रखती रही,उसने इसीलिए किसीदोस्त से कभी सम्बन्ध रखे ही नहीं,सबसे कटी जीती रही ,आज उसने अपनी आँखों से दोनों को जिस तरह पास देखा था,वह कोई बच्ची नहीं थी कि न समझे,ये सिला मिला है उसे एक अच्छी पत्नी बनकर रहने का,सारे कर्तव्य पूरे करने का,विनय के साथ हर सुख दुःख में कदम से कदम मिला कर चलने का कि विनय आज भी उससे बहुत कुछ छुपा जाते हैं,उसने न कभी विनय से कोई झगड़ा किया है ,न कोई शिकवा,फिर आज उसने यह सब क्या देखा,उसकी आँखों से आंसू बह निकले,इतने आंसूकि उसकी हिचकियाँ बंध गयीं,वह पेट के बल उल्टा लेटी थी,अचानक उसे अपनी गर्दन पर किसी का गर्म  स्पर्श महसूस हुआ ,आँख खोली,लेटे लेटे ही गर्दन घुमाई,समीर उसके पास बैठा था,वह उठने लगी तो समीर ने उसकी पीठ थप थपा दी,कहा,”लेटी रहो,शोभा ,दुखी मत हो,ऐसा भी हो सकता है कि ऐसा कुछ न हो जो हमें लगा है. ”

करवट लेकर शोभा ने कहा,”समीर,मुझे मेरे भाई ने,और भी कई लोगों ने इस तरह की बातें बताई हैं पर मैंने उन पर कभी विश्वास नहीं किया पर अब बहुत हो गया ,”शोभा सिसकने लगी.पर्दे के पीछे से  खिड़की से आती मंद मंद रौशनी में आंसुओं से भरा शोभा का चेहरा देख समीर अपनी सुध बुध अचानक खोने लगा,उसने खुद को संभालने की कोशिश की पर शोभा से इस समय की नजदीकी उसे कहीं और ले जाने लगी,अपनी और शोभा की दोस्ती,विश्वास,उम्र सब की चिंता रखी रह गयी और उसने शोभा के होंठ चूम लिए,शोभा जैसे किसी और ही मानसिक यंत्रणा में जी रही थी,समीर का स्पर्श उसे अपना सा भला सा ही लगा,फिर भी उसने उठने की कोशिश की तो समीर उसके ऊपर धीरे धीरे जैसे जैसे झुकता गया,सब कुछ पल भर ही लगा बदलने में,और फिर अचानक सचमुच बहुत कुछ बदल गया,शोभा का विद्रोही ,घायल मन अचानक समीर का साथ देने लगा,उसके कानों में समीर नेसॉरी तो बार बार  कहा पर इस समय पति की बेवफाई से क्षुब्ध मन इन अनुचित  ही सही पर  कुछ पलों के अपनेपन की धारा में बहने लगा,शोभा ने अपने आप को रोकने की तमाम कोशिशें भी की पर कुछ हठ होता है ऐसे अनचाहे पलों का जिनसे इंसान चाह कर भी जीत नहीं सकता.

जो कभी दोनों ने सोचा भी नहीं था,वह हो गया था,थोड़ी देर बाद समीर फिर उसे एक बार चूम कर रूम से निकल गया,शोभा की कब आँख लगी,उसे पता ही नहीं चला,सुबह वह देर से उठी,आँख खुली तो रात की पूरी बात याद कर एक झटके से उठ बैठी,वह बहुत देर सोई रही थी,उसने टाइम देखा,नौ बज रहे थे,इतना लेट तो वह कभी नहीं उठती,वह फौरन समीर के रूम में गयी,समीर जा चुका था,उसने अपना फोन चेक किया,फॅमिली के ग्रुप पर कई मैसेज थे,फिर समीर के मैसेज थे,लिखा था,जो भी हो गया,शोभा,सॉरी,पर अब तुम हमेशा मेरे टच में रहना,हम आगे भी अच्छे दोस्त बन कर रह सकते हैं,मेरी कोई भी जरुरत हो,मुझे कहना,तुम्हे उठाया नहीं,तुम्हे आराम की जरुरत थी,मेरी फ्लाइट टाइम पर है,बात जरूर करते रहना,विनय से क्या बात करनी है,अच्छी तरह सोच लेना.‘’

फ्रेश होकर शोभा ने चाय बनायीं,ग्रुप पर बस गुड मॉर्निंग का मैसेज डाल कर इतना ही लिख दिया कि  ठीक हूँ,आज लेट सोकर उठी,”

विनय का फौरन मैसेज आया,”अरे,वाह,मेरे बिना इतनी बढ़िया नींद आयी तुम्हे. ”

शोभा ने और कोई जवाब नहीं दिया,वह समीर के बारे में सोचने लगी,क्या हो गया था उसे रात,क्यों नहीं रोका समीर को,यह क्या कर बैठी,समीर क्या सोचता होगा !अब आगे क्या करना चाहिए,क्या विनय से बात करे?नहीं,वह बेशर्मी पर उतर आया तो ?अभी तो बच्चे अपना एक आदर्श परिवार मानते हैं,उनका यह भ्रम तोड़ देन !क्या चुप रहे ?वैसे ही जैसे  हजारों महिलाएं चुप रह जाती हैं ! क्या करे ? और जो समीर के साथ हुआ,उसका गिल्ट रखे मन में ?नहीं,दिल नहीं कर रहा इसे  अपराधबोधमानने केलिए! हाँ,जी ली वह भी कुछ पल किसी के साथ !ठीक नहीं भी है तो भी जी ली !किसी से कुछ नहीं कहेगी,न विनय से ,न बच्चों से !पर क्या यह बात ऐसे ही जाने दे कि विनय उससे झूठ बोलते रहे हैं ! हाँ, फिलहाल कुछ नहीं कहेगी,अभी उसने भी समीर के साथ एक रात बितायी है,शायद अभी वह कुछ नहीं कह पाएगी,उसे भी अभिनय करना होगा विनय की तरह कि वह उनसे कुछ नहीं छुपाती. उसने चाय की घूँट ली ,चाय ठंडी हो चुकी थी,वह चाय गर्म करने किचन की तरफ बढ़ी तो अब मन काफी हल्का हो चुका था. अचानक उसे ख्याल आया कि एक वॉच पार्टी सबकी लाइफ में ऐसा  तूफ़ान मचा कर गयी है कि कोई भी किसी से कुछ कह नहीं पायेगा.पहली बार ही वॉचपार्टी देखी थी और वह भी ऐसी जो भुलाये न भूलेगी. Love Stories In Hindi

Samajik Kahani : डायन – क्या थी गेंदा के बचपन की कहानी?

Samajik Kahani : केशव हाल ही में तबादला हो कर बस्तर से जगदलपुर के पास सुकुमा गांव में रेंजर पद पर आए थे. जगदलपुर के भीतरी इलाके नक्सलवादियों के गढ़ हैं, इसलिए केशव अपनी पत्नी करुणा और दोनों बच्चों को यहां नहीं लाना चाह रहे थे. एक दिन केशव की नजर एक मजदूरिन पर पड़ी, जो जंगल में सूखी लकडि़यां बीन कर एक जगह रखती जा रही थी. वह मजदूरिन लंबा सा घूंघट निकाले खामोशी से अपना काम कर रही थी. उस ने बड़ेबड़े फूलों वाली गुलाबी रंग की ऊंची सी साड़ी पहन रखी थी. वह गोरे रंग की थी. उस ने हाथों में मोटा सा कड़ा पहन रखा था व पैरों में बहुत ही पुरानी हो चुकी चप्पल पहन रखी थी.

उस मजदूरिन को देख कर केशव उस की उम्र का अंदाजा नहीं लगा पा रहे थे, फिर भी अपनी आवाज को नम्र बनाते हुए बोले, ‘‘सुनो बाई, क्या तुम मेरे घर का काम करोगी? मैं अभी यहां नयानया ही हूं.’’ केशव के मुंह से अचानक घर के काम की बात सुन कर पहले तो मजदूरिन घबराई, लेकिन फिर उस ने हामी भर दी इस बीच केशव ने देखा, उस मजदूरिन ने अपना घूंघट और नीचे खींच लिया. केशव ने वहां पास ही खड़े जंगल महकमे के एक मुलाजिम को आदेश दिया, ‘‘तोताराम, तुम इस बाई को मेरे घर ले जाओ.’’ तोताराम केशव की बात सुन कर एक अजीब सी हंसी हंसा और सिर झुका कर बोला, ‘‘जी साहब.’’

केशव उस की इस हंसी का मतलब समझ नहीं सके. तोताराम ने तुरंत मजदूरिन की तरफ मुड़ कर कहा, ‘‘चल गेंदा, तुझे साहब का घर दिखा दूं.’’ केशव ने उस मजदूरिन के लंबे घूंघट पर ध्यान दिए बिना ही उस से पूछा, ‘‘तुम हमारे घर के सभी काम कर लोगी न, जैसे कपड़े धोना, बरतन मांजना, घर की साफसफाई वगैरह? मैं यहां अकेला ही रहता हूं.’’

इस पर गेंदा ने धीरे से जवाब दिया, ‘‘जी साहब, आप जो भी काम कहेंगे, मैं कर दूंगी.’’ जब से गेंदा आई थी, केशव को बड़ा आराम हो गया था. लेकिन 8-10 दिन बाद ही केशव ने महसूस किया कि गेंदा के आने के बाद से जंगल महकमे के मुलाजिम और पास के क्वार्टर में रहने वाले लोग उन्हें देख कर हंसी उड़ाने वाले अंदाज में मुसकराते थे. एक दिन दफ्तर से आ कर चाय पीते हुए केशव गेंदा से बोले, ‘‘तुम मेरे सामने क्यों घूंघट निकाले रहती हो? मेरे सामने तो मुंह खोल कर रहो.’’ यह सुन कर गेंदा कुछ समय तक तो हैरान सी खड़ी रही और अपने पैर के अंगूठे से जमीन खुरचती रही, फिर गेंदा ने घूंघट उलट दिया. गेंदा का चेहरा देखते ही केशव की चीख निकल गई, क्योंकि गेंदा का चेहरा एक तरफ से बुरी तरह जला हुआ था, जिस के चलते वह बड़ी डरावनी लग रही थी. गेंदा फफक कर रो पड़ी और रोतेरोते बोली, ‘‘साहब, मैं इसलिए अपना चेहरा छिपा कर रखती हूं, ताकि मुझे देख कर कोई डरे नहीं.’’ केशव ने गेंदा के चेहरे की तरफ देखते हुए पूछा, ‘‘यह तुझे क्या हो गया है? तू कैसे इतनी बुरी तरह जल गई? तेरा रूपरंग देख कर तो लगता है, तू कभी बड़ी खूबसूरत रही होगी?’’

प्रेम के दो शब्द सुन कर गेंदा फिर से रो पड़ी और वापस घूंघट खींच कर उस ने अपना चेहरा छिपा लिया और भरे गले से बोली, ‘‘साहब, मैं ने सोचा था कि घूंघट निकाल कर आप का काम कर दिया करूंगी. मुझ गरीब को भी भरपेट भोजन मिल जाएगा, पर कल से नहीं आऊंगी. आप दूसरी महरी रख लेना.’’ इतना कह कर वह जाने लगी, तो केशव ने उसे रोक कर कहा, ‘‘गेंदा, मैं जानना चाहता हूं कि तुम्हारे साथ क्या हुआ और तुम्हारे परिवार में कौनकौन हैं? मुझे पूरी बात सचसच बताओ.’’

‘‘साहब, मैं आप से कुछ नहीं छिपाऊंगी. मैं ने बचपन से ही बहुत दुख सहे हैं. जब मैं 8 साल की थी, तभी मेरे पिता की मौत हो गई थी. थोड़े दिन बाद मेरी मां ने दूसरी शादी कर ली.

‘‘मेरे सौतेले पिता बहुत ही गंदे थे. वे छोटीछोटी बात पर मुझे मारते थे. मेरी मां मुझे बचाने आती, तो पिता उसे भी पीट देते.

‘‘सौतेले पिता मेरी मां को तो रखना चाहते थे, पर मुझे नहीं. इसलिए मेरी मां ने मेरी शादी करने की सोची.

‘‘मैं बहुत ही खूबसूरत और गोरी थी, इसलिए जैसे ही मैं 10 साल की हुई, मां ने मेरी शादी कर दी और मुझे  ससुराल भेज दिया. ‘‘मेरा पति मुझ से उम्र में 10 साल बड़ा था, ऊपर से दुनिया के सारे ऐब उस में थे. मैं जब 13 साल की थी, तभी मुझे एक बेटी हुई. ‘‘बेटी होने से मेरा पति बहुत चिढ़ गया और मुझे दूसरे मर्दों के साथ सोने के लिए मजबूर करने लगा, ताकि उस की नशे की जरूरत को मैं पूरा कर सकूं. पर इस गलत काम के लिए मैं तैयार नहीं थी. इसलिए मारपीट कर के मुझे डराताधमकाता, लेकिन मैं इस के लिए तैयार नहीं हुई.

‘‘इस बीच 14 साल की उम्र में मुझे दूसरी बेटी हो गई. अब तो उस के जुल्म मुझ पर बहुत बढ़ गए, इस से घबरा कर मैं अपनी दोनों बेटियों के साथ मायके चली आई. वहां भी मुझे चैन नहीं मिला, क्योंकि सौतेले पिता मुझे देखते ही गुस्से में अपना आपा खो बैठे, जिस पर मां ने उन्हें समझाया.’’ गेंदा बात करतेकरते बीच में अपने आंसू भी पोंछती जाती थी. तभी केशव को उस की आपबीती सुनतेसुनते कुछ सुध आई, तो उस ने उठ कर गेंदा को एक गिलास पानी पीने को दिया और उस के सिर पर हाथ फेरा. उस के बाद गेंदा ने आगे बताया, ‘‘मैं जब मायके पहुंची, तो 5-7 दिन में ही मेरा पति मुझे लेने आ गया और मां को भरोसा दिलाया कि अब मुझे अच्छे से रखेगा. मां भी क्या करतीं. मुझे मेरे पति के साथ वापस भेज दिया.

‘‘कुछ दिन तक तो वह ठीक रहा, फिर वही जिद करने लगा, पराए मर्दों के साथ सोने के लिए. मैं मार खाती रही, पर गलत काम नहीं किया. ‘‘मैं जब 16 साल की थी, तब तीसरी बार मां बनी. इस बार बेटा हुआ था. मेरे 3-3 छोटे बच्चे, ऊपर से मेरा कमजोर शरीर, लेकिन उसे मुझ पर जरा भी तरस नहीं आया, इसलिए मैं बहुत बीमार हो गई. ‘‘मेरी बीमारी से चिढ़ कर मेरा पति मुझे मेरे मायके छोड़ आया. जब मैं मायके आई, तो इस बार सौतेले पिता का बरताव बड़ा अच्छा था, पर मैं क्या जानती थी कि इस अच्छे बरताव के पीछे उन का कितना काला मन है. ‘‘मेरे सौतेले पिता ने 40 हजार रुपए में मुझे बेच दिया था और वह आदमी पैसे ले कर आने वाला था. यह बात मुझे गांव की एक चाची ने बताई. मेरे पास ज्यादा समय नहीं था.

‘‘फिर भी मैं गांव की पुलिस चौकी पर गई और वहां जा कर थानेदार साहब को अपनी बीमारी के बारे में बताया और उन से विनती की कि मेरी बेटियों को कहीं अनाथ आश्रम में रखवा दें. ‘‘वहां के थानेदार भले आदमी थे. उन्हें मेरी हालत दिख रही थी, इसलिए उन्होंने मुझे भरोसा दिया कि तुम इस फार्म पर दस्तखत कर दो, मैं तुम्हारी दोनों बेटियां वहां रखवा दूंगा. जब तुम्हें उन से मिलना हो, वहां जा सकती हो. ‘‘अपनी दोनों बेटियां उन्हें सौंप कर मैं भाग कर अपने पति के पास आ गई. मुझे देख कर मेरा पति बोला, ‘‘आ गई मायके से. वहां तेरे आगे किसी ने दो रोटी नहीं डाली.

‘‘बेटियों के बारे में न उस ने पूछा और न मैं ने बताया. मैं बहुत बीमार थी, इसलिए बेटे को संभाल नहीं पा रही थी. वह बेचारा भी ढंग से देखभाल नहीं होने के चलते इस दुनिया से चला गया. ‘‘मैं अकेली रह गई थी. मैं ने मन में सोचा कि ऐसे पति के साथ रहने से अच्छा है कि कहीं दूसरे गांव में चली जाऊं और मजदूरी कर के अपना पेट पालूं. मेरे पति को पता नहीं कैसे मेरे घर छोड़ने की बात पता चल गई और उस ने चूल्हे पर रखी गरम चाय गुस्से में मेरे चेहरे पर फेंक दी और मुझे एक ठोकर मारता हुआ बोला, ‘अब निकल जा मेरे घर से. तेरा चेहरा ऐसा बिगाड़ दिया है मैं ने कि कोई तेरी तरफ देखेगा भी नहीं.’

‘‘गरम चाय से मैं बुरी तरह जल गई थी. उस ने मुझे घसीटते हुए धक्का मार कर बाहर कर दिया. मैं दर्द से बेहाल  सरकारी अस्पताल में गई. वहां मेरी बुरी हालत देख डाक्टर ने भरती कर लिया. ‘‘जब मैं ठीक हुई, तो पति का गांव छोड़ कर इस गांव में रहने लगी, पर यहां भी मुझे चैन नहीं है. गांव के लफंगे कहते हैं कि हमें तेरे चेहरे से क्या मतलब, तू अपना घूंघट तो निकाल कर रखती है. ‘‘जब मैं ने सख्ती से दुत्कार दिया, तो वे मुझे डायन कह कर बदनाम कर रहे हैं. गांव में किसी के भी यहां मौत होने पर मुझे ही इस का जिम्मेदार माना जाता है.’’ केशव ने बड़े ही अपनेपन से कहा, ‘‘गेंदा, तुम कहीं नहीं जाओगी. तुम यहीं मेरे पास रहोगी.’’ केशव के ये शब्द सुन कर गेंदा रोती हुई केशव के पैरों से लिपट कर बोली, ‘‘साहब, आप बहुत अच्छे हैं. मुझे बचा लो. इस गांव के लोग मुझे डायन कहते हैं. हो सकता है कि गांव के किसी ऊंची पहुंच वाले के यहां जवान मौत हो जाए, तो ये मुझे मार ही डालेंगे.’’

केशव ने कहा, ‘‘गेंदा, तुम डरो मत. तुम्हें कुछ नहीं होगा.’’ धीरेधीरे गेंदा को केशव के घर में काम करतेकरते एक साल बीत गया, और सबकुछ ठीकठाक सा चल रहा था. शायद तूफान से पहले की शांति जो केशव समझ नहीं पाए. एक दिन गेंदा काम पर नहीं आई, तो केशव ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. सोचा, बीमार होगी या बेटियों से मिलने चली गई होगी. शाम के तकरीबन 4 बजे के करीब तोताराम दौड़ता हुआ आया. वह बहुत डरा हुआ था. उस ने केशव से कहा, ‘‘साहब, जल्दी चलो. गांव के लोग गेंदा को डायन कह कर धमका रहे हैं और उसे जिंदा जलाने जा रहे हैं. क्योंकि गांव के सरपंच का जवान बेटा मर गया है.

‘‘मरा तो वह शराब पी कर है साहब, पर लांछन गेंदा पर लगा रहे हैं कि यह डायन सरपंच के जवान बेटे को खा गई.’’ यह सुन कर केशव हैरान रह गए. उन्होंने सब से पहले पुलिस को फोन किया और तुरंत घटना वाली जगह पर पहुंचने की गुजारिश की और खुद भी वहां चल दिए. वहां का दिल दहला देने वाला सीन देख कर केशव गुस्से से कांपने लगे. तब तक पुलिस भी वहां आ गई थी. गांव के आदमीऔरत चीखचीख कर गेंदा को डायन कह रहे थे और उसे जिंदा जलाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन पुलिस को देख कर सभी ठिठक गए. तब तक केशव ने दौड़ कर गेंदा को अपनी तरफ खींचा, जो अपनी जान बचाने के लिए डरीसहमी इधरउधर दौड़ रही थी. केशव ने चिल्ला कर औरतों से कहा, ‘‘तुम औरतों को शर्म आनी चाहिए कि इस बेकुसूर औरत को जिंदा जलाया जा रहा है. अगर तुम्हारी बेटी को कोई डायन कहे और उसे जिंदा जलाए, तो तुम्हें कैसा लगेगा? सरपंच का बेटा छोटी उम्र ले कर आया था, तो यह क्या करे?

‘‘गेंदा ने गांव के आदमियों की गलत बात नहीं मानी, तो उसे डायन कह कर बदनाम कर दिया. यह औरत हिम्मत के साथ इस समाज से अकेले लड़ रही है और अपनी इज्जत बचाए हुए है. ‘‘खबरदार, जो किसी ने इसे हाथ भी लगाया. आज से यह मेरी बहन है और मेरे साथ ही रहेगी. मैं जहां जाऊंगा, यह मेरे साथ ही रहेगी,’’ कह कर केशव उसे अपने साथ ले आए. वैसे, उस दिन सुकुमा में शाम होने को थी, पर गेंदा की जिंदगी में छाया अंधेरा केशव की हिम्मत से दूर हो गया था. Samajik Kahani

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