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Social Story : बिल्डर उवाच – धोखाधड़ी के शिकार मध्यमवर्गीय पुरुष की कहानी

Social Story : तो हुआ यों कि गरीबदास लाचारप्रसाद गए फ्लैट देखने श्यामनगर ऐक्सटैंशन में. गरीबदास उन का अपना नाम है और पिता का नाम लाचारप्रसाद. इस प्रकार उन का पूरा नाम है गरीबदास लाचारप्रसाद. कुछ परिवारों में नाम के साथ पिता का नाम रखने की परंपरा है. कुछ स्थानों पर गांव का नाम रखने की भी प्रथा है. ऐसे लोगों के लिए ऐसा फौर्म भरना कठिन हो जाता है जिस में 25-30 अक्षरों की शब्दसीमा होती है.

निम्नवर्गीय और मध्यवर्गीय परिवारों में नाम अमीरों के रख लेते हैं। जैसे, मुकेश, गौतम वगैरा. और कुछ न सही नाम तो अमीरों वाला होना चाहिए. कुछ लोग पद को ही अपना नाम बना लेते हैं. जैसेकि मैनेजर सिंह, कमांडर प्रसाद वगैरा.

निम्न और मध्यवर्गीय परिवारों के लोगों की संज्ञा जो भी हो विशेषण गरीबदास लाचारप्रसाद ही होता है. पर कुछ मध्यवर्गीय परिवार अपना नाम ऐसा रखते हैं जो उन की आर्थिक हैसियत की याद दिलाता रहे और बंदा अपनी हैसियत कभी न भूले. गरीबदास लाचारप्रसाद का परिवार भी वैसे परिवारों में ही था जो अपने पैर जमीन पर रखने में यकीन करते हैं.

आजकल शहर बढ़ने के मामले में महंगाई को भी बुरी तरह से मात दे रहे हैं. पहले एक मोहल्ला बनता है फिर बढ़तेबढ़ते वह ग्रेटर उपसर्ग ले लेता है. और भी बढ़ कर ऐक्सटैंशन प्रत्यय उस के साथ लग जाता है. आने वाले समय में शायद उपसर्ग और प्रत्यय दोनों लगाने की आवश्यकता पड़ें.

उदाहरण के लिए रामनगर बढ़ कर ग्रेटर रामनगर हो जाएगा फिर रामनगर ऐक्सटैंशन और आगे चल कर ग्रेटर रामनगर ऐक्स्टैंशन. उपसर्ग और प्रत्यय का ऐसा भी अकाल नहीं है साहित्य की दुनिया में. वैसे, ऐक्सटैंशन में टैंशन शब्द समाहित है. रामनगर, श्यामनगर, करीमनगर या माइकलगंज के साथ जब ऐक्सटैंशन लग जाए तो उस में भी कई प्रकार के टैंशन संलग्न हो जाते हैं. यथा पानी का टैंशन, ट्रैफिक का टैंशन वगैरा का टैंशन, वगैरा का टैंशन.

तो गरीबदास लाचारप्रसाद श्यामनगर ऐक्सटैंशन में गए फ्लैट देखने. रास्ते में अलगअलग बिल्डर, कंपनी के तख्ती लिए खड़े लोगों को देख कर उन्हें स्टेशन, फुटपाथ दुकानों की याद आ गई जहां सामान बेचने के लिए दलाल आएदिन आवाज देते रहते हैं या फिर रेलवे स्टेशन या बसस्टौप के समीप के होटल, जिन के नुमाइंदे ग्राहकों को अपने भोजनालय में ‘ओल्ड इज गोल्ड’ भोजन करने के लिए आने का बारहमासी न्योता देते रहते हैं.

पर्यटन स्थल पर भी ऐसे दृश्य बहुतायत में पाए जाते हैं. वैसे कई शहरों में बस स्टैंड में ऐसे नजारे भी दिख जाते हैं जहां यात्री को एक एजेंट किसी और बस में बैठा देता है तो उस का समान दूसरा एजेंट किसी और बस में रख देता है.

गरीबदास लाचार प्रासाद इन तख्तीधारियों से बचतेबचाते एक बिल्डर के औफिस में पहुंचे. जोरदार तरीके से स्वागत हुआ उन का. कुछ वैसे ही जैसे बलि देने के पहले बकरे का होता है. चायकौफी परोसा गया, जलपान के लिए पूछा गया. तरहतरह के रंगीन आकर्षक पैंफलेट और बुकलेट दिखाए गए जिसे देख वे उच्च जीवनशैली जीने के हसीन सपनों में ऐसे खोए कि मुंगेरीलाल के हसीन सपनों के सारे रिकौर्ड तोड़ बैठे. फिर उन्हें अतुलनीय सैंपल फ्लैट का विहंगम अवलोकन करवाया गया. सैंपल फ्लैट के परिवेश उर्फ चक्रव्यूह को देख मंत्रमुग्ध होने से कोई अनुभवी व्यक्ति ही बच सकता था पर इस मामले में अधिकांश ‘फ्लैटार्थी’ अभिमन्यु ही साबित होते हैं.

चक्रव्यूह में घुस तो जाते हैं, मगर निकल नहीं पाते क्योंकि बिल्डर के कर्मचारी और दलालरूपी अनेक योद्धा उन्हें पस्त करने के लिए हाजिर रहते हैं और उन योद्धाओं का एक ही उद्देश्य होता है कि चक्रव्यूह के अंदर आने वाला बिना फ्लैट बुक किए वापस जाने न पाएं. और इस के लिए जिम, स्विमिंग पूल, क्लब हाउस आदि के तिलस्म का प्रयोग किया जाता है. 56 इंच के टीवी पर ऐनिमेटेड दृश्य का अकाट्य जाल फेंका जाता है.

तो गरीबदास उर्फ अभिमन्यू चक्रव्यूह में फंस गया अर्थात फ्लैट की बुकिंग राशि जमा कर दी. राशी जमा होते ही गरमजोशी से उन से हाथ मिलाया गया और उपहार में सुंदर जिल्द वाली गीता दी गई.

“पर गीता ही क्यों?” उन्होंने सेल्स ऐग्जीक्यूटिव से पूछा.

आजकल सभी कंपनियां अपने कर्मचारियों को और कुछ दें न दें पदनाम प्यार से देते हैं- सेल्स ऐग्जीक्यूटिव, कस्टमर रिलेशन औफिसर, मार्केटिंग सुपरिटैंडेंट वगैरा. वेतनभत्ते भले ही कम दें पर पदनाम ऐसा देते हैं कि कम वेतनभत्ते के दर्द को वे भूल जाते हैं. ‘आटे की बरफी पर चांदी का वर्क’ की तरह ये पदनाम होते हैं.

“सर, इसी में तो सारा ज्ञान समाहित है,” ऐग्जीक्यूटिव उवाच अर्थात ऐग्जीक्यूटिव ने कहा. पर उस के आंगिक भाषा से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह कह रहा हो यह बहुत बड़ा सहारा बनेगा आप के लिए. इसे ठीक से पढ़ लेना. न सिर्फ पढ़ लेना बल्कि हृदय में भी समा लेना. कुछ खोने के गम से उबरने में सहायता मिलेगी.
फिर समयसमय पर लाखों रुपए के किश्त भरते रहें अपने फ्लैट में रहने के हसीन सपने की प्रत्याशा में.

जब रजिस्ट्री का समय आया तो न जाने कौनकौन से अड़चन आएं कि वर्ष दर वर्ष बीतते गए पर फ्लैट पाने की तमन्ना दिवास्वप्न बन कर रह गई. अब बिल्डर के द्वारा प्रदत्त गीता ही उन का सहारा है. उसे पढ़ कर ज्ञानी बन रहे हैं और ध्यान से अपने जीवनभर की पूंजी को गंवाने के दुख को विस्मृत करने की कोशिश कर रहे हैं और खुद से यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्यों व्यर्थ चिंता करते हो? चिंता चिता समान होती है. चिंता से चतुराई घटेगी. किस से व्यर्थ डरते हो? अर्थात फ्लैट नहीं भी मिलेगा तो क्या होगा. जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है वह अच्छा हो रहा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा. यानि यदि फ्लैट नहीं भी मिलेगा तो भी उस में कोई न कोई हितकारक बात ही होगी. तुम भूत का पश्चाताप न करो अर्थात जीवनभर की कमाई गंवाने का मलाल मन में न रखो. तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो, तुम क्या लाए थे जो तुम ने खो दिया, तुम ने क्या पैदा किया था जो नाश हो गया, न तुम कुछ ले कर आए थे, जो लिया यहीं से लिया, जो दिया यहीं पर दिया. जो लिया इसी से लिया. जो दिया उसी को दिया. खाली हाथ आए और खाली हाथ चले. आज जो तुम्हारा है कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा. तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो. बस, यही प्रसन्नता तुम्हारे दुखों का कारण है. अर्थात गीता का बड़ा सहारा है उन्हें.

अब उन की समझ में बात आई कि बिल्डर बुकिंग के समय सभी को गीता क्यों देता था. साथ ही बगल वाले बिल्डर के अपार्टमैंट को माननीय न्यायालय के द्वारा गिराए जाने के आदेश को मद्देनजर रखते हुए खुद को खुशनसीब मान रहे हैं कि उन का अपार्टमैंट कम से कम सीना तान कर खड़ा तो है.

जैसे गीता के ज्ञान ने कौरवों और पांडवों को बरबाद कर दिया। उसी प्रकार शायद आने वाले दिनों में कोर्ट निर्णय दे कि जो अपार्टमैंट बन रहा है वह अवैध है और उसे ढहा दिया जाए. फिर जिन के खूनपसीने की कमाई इस में लगी है उस के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने के लिए कोई कमिटी बना दी जाए और एक बार फिर से अनवरत प्रतीक्षा का सफर शुरू हो.

कहा गया है कि जब तक सांस तब तक आस. अब फ्लैट पाने की आस पूरी होने तक सांस बची रहे तो उसे सौभाग्य माना जाए अन्यथा गीता का ज्ञान तो है ही,’क्यों व्यर्थ चिंता करते हो…’ Social Story

Family Story : आंसू – डाक्टर एरिक रामसे ने प्रणब से क्या कहा ?

Family Story : प्रणब चंद्र बोस कोलकता में एक कैमिकल कंपनी के सीईओ थे. उन की उम्र तकरीबन 48 साल रही होगी. प्रणब के मातापिता एक मध्यम वर्ग के लोग थे और राजगीर नगर महल्ले में रहते थे. पिताजी, जिन्हें वह “बाबूजी” कह कर पुकारता था, एक सरकारी दफ्तर में काम करते थे और मां घर के पास के एक प्राइमेरी स्कूल में दूसरी जमात के बच्चों को पढ़ाती थीं.

प्रणब उन की अकेली संतान थी और अपने मातापिता के साथ और पड़ोसियों व दोस्तों के बीच एक संस्कारी और शांतिभरे माहौल में फलफूल कर बड़ा हुआ था.

प्रणब बचपन से ही मेधावी था. उस ने 12वीं जमात की परीक्षा बड़े ही अच्छे अंकों से पास की और प्रदेश में उस का तीसरा रैंक था, इसलिए कोलकाता यूनिवर्सिटी में दाखिले में कोई दिक्कत न हुई. उसे स्कौलरशिप के साथ एडिमशन मिल गया. वहां से कैमिस्ट्री के विषय में स्नातक बना.

प्रणब और उस के मातापिता की बड़ी इच्छा थी कि वह आगे की पढ़ाई विदेश में जा कर करे और बड़ा नाम कमाए. चाहे उस को बड़ी उम्र में, अपने एकलौते बेटे से दूर रह कर अकेले ही क्यों न रहना पड़े. उस के एक चहेते प्रोफैसर डाक्टर घोष, जो खुद भी विदेश से लौट कर आए थे, ने बाबूजी से यह आग्रह किया कि वे उसे आगे की पढ़ाई अमेरिका में करवाएं, जिस से उस की प्रतिभा और कड़ी मेहनत और कुछ कर पाने की इच्छा विकसित हो सके.

प्रणब के मातापिता और प्रोफैसर को पूरा विश्वास था कि प्रणब अपनी पढ़ाई कर के भारत लौटेगा, जैसे कि प्रोफैसर ने खुद ही किया था.

अमेरिका में प्रणब ने अपने प्रोफैसर की अनुशंसा पर शिकागो विश्वविद्यालय में एडिमशन ले लिया. उस ने 5 सालों में ही कैमिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी के साथ एमबीए भी कर लिया. साथ ही साथ उस को स्कौलरशिप भी मिलती थी. इस के अलावा वह शाम को हफ्ते में 3 बार पढ़ा कर थोड़े से पैसे बना लेता था.

प्रणब को अपने मातापिता की बहुत याद आती थी, इसलिए अपने पैसे बचा कर वह साल में एक बार 2-3 हफ्ते के लिए भारत जरूर आता. अपने मातापिता के साथ वह 1 या 2 तीर्थस्थानों और देखने वाली जगहों पर जा कर वापस चला जाता था. उस को तो मातापिता के साथ बिताए समय में बड़ा ही मजा आता था. वह फिर भारत लौट कर आने की प्रतीक्षा करता था.

5 साल बाद जब प्रणब घर आया, तो उस को बंगाल एग्रोकैमिकल्स कंपनी में एक अच्छी नौकरी मिल गई. अपनी काबिलीयत और कड़ी मेहनत से उस ने काफी तरक्की की. इस बीच उस की शादी सुलेखा से हो गई. जल्दी ही वह एक बेटी का बाप बन गया. अपने परिवार के साथ वह एक बड़े से घर में रहने लगा. वहां मातापिता के आराम की सारी सुविधाएं थीं.

प्रणब की तरक्की में तब चारचांद लगे, जब 46 साल की उम्र में वह कंपनी का सीईओ चुना गया.

अब तक बाबूजी रिटायर हो चुके थे. बुढ़ापे की वजह से उन की सेहत थोड़ी ढीली चल रही थी. अब वे पहले की तरह चल नहीं पाते थे. इस बीच कोलकाता में हैजा फैल गया और अचानक ही उस की मां का देहांत हो गया. यह इतना अचानक हुआ कि एक दिन उस ने डाक्टर को बुलाया और उस ने दवा दी और दूसरे दिन ही उन्होंने प्राण त्याग दिए.

यह सदमा बाबूजी सह न सके. अपने 51 साल के साथी को खो देने का गम वे सह नहीं पाए और उन्हें लकवा मार गया. उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया.

मां के जाने का गम प्रणब को भी था, तभी ऐसी दर्दनाक और अप्रत्याशित घटना घटी कि बाबूजी के स्ट्रोक ने तो उसे जैसे मूर्छित ही कर दिया. वह अपना दिमागी संतुलन खो बैठा. अपनी पत्नी और डाक्टरों की सलाह से यह निश्चय किया कि उसे आराम की सख्त जरूरत है. उस ने महीनेभर के लिए आराम करने का निश्चय किया.

कंपनी के बोर्ड ने मामले की गंभीरता को समझा और उसे आराम करने की अनुमति दे दी. प्रणब की जगह सुदर्शन शर्मा को अंतरिम सीईअच बना दिया.

प्रणब जब अपने परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों की सहायता से संभला, तो उस ने निश्चय किया कि वह अब बाबूजी के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएगा. उन की सेवा के लिए उस ने 2 नौकरों को रखा. एक 45 साल के शेरू को, जो रातभर बाबूजी के साथ रहता था. दिन में सेवा के लिए एक महिला नर्स रखी.

थोड़े दिनों के अनुभव के बाद पता चला कि वे दोनों अच्छी तरह से बाबूजी की सेवा किया करते थे. वह कुछ आश्वस्त हुआ कि उस ने अच्छा फैसला लिया था और बाबूजी भी खुश  लगते थे.

अब प्रणब जैसे ही घर आता, सब से पहले बाबूजी को नमस्कार करता, गले लगाता और उन के साथ तकरीबन घंटेभर बैठ कर उन की सेवा करता, बातें करता और पैर दबा कर उन्हें आराम कराता. बाबूजी को बहुत ही अच्छा लगता और वे आशीर्वाद और दुआओं से उस की शाम सुहानी बना देते.

प्रणब को शाम की इन क्रियाओं से जो सुकून, शांति और खुशी मिलती, उस की व्याख्या करना तो असंभव है. वैसे भी प्रणब इन चीजों को महत्व नहीं देता कि और लोग उस की तारीफ कर रहे हैं या निंदा. वह तो अपने मन की शांति के लिए ये सब कर रहा था.

अब बाबूजी की सेवा करना तो एक दिनचर्या बन गई थी, जिस को एक दिन भी चूकना प्रणब के लिए असहनीय बन गया था.

एक दिन प्रणब ने साफ तौर पर देखा कि जब वह बाबूजी के पास पहुंचता था और गले लगाता था, तो बाबूजी बड़े ही भावुक हो जाते और उन की आंखों से आंसू निकल आते थे.  कभीकभी तो ये आंसू झरझर कर बहने लगते. स्वाभाविक है कि प्रणब की आंखें भी भर आतीं और वह बड़े प्यार से उन्हें आश्वासन देता कि सब ठीक हो जाएगा.

एक दिन दोपहर को आधा दिन काम करने के बाद जब प्रणब घर पहुंचा और सीधा बाबूजी के कमरे में गया, तो उस ने देखा कि बाबूजी की आंखों से अब भी आंसू बह रहे थे. उस ने उन की नर्स से बात की, तो पता लगा कि यह तो रोज की बात है. चिंता करने की जरूरत नहीं है. ये आंसू तकलीफ के आंसू हैं, जो उन को दवाई मिलने से पहले वे कष्ट में रहते हैं, उन को जोड़ों और सिर में दर्द होता है, लेकिन दवाई मिलने के बाद ये दर्द कम हो जाते हैं और उन्हें आराम मिल जाता है. और वे सो जाते हैं. प्रणब ने डाक्टर से भी पूछा, तो वे भी नर्स के विचार से पूरी तरह सहमत थे.

प्रणब और उस के परिवार का जीवन ढर्रे पर चल रहा था. प्रणब चैन की नींद सोता था. वह अपने पिता और परिवार के भविष्य के बारे में थोड़ाबहुत चिंतित तो रहता ही था, जो कि स्वाभाविक था.

एक रात की बात है. प्रणब बिस्तर में लेटा हुआ था, तभी उसे अचानक एक विचार आया. उस ने सोचा कि वह जब भी बाबूजी से मिलेगा, तो उन के आंसुओं को एकत्रित करेगा. उस ने बाजार से कुछ टैस्ट ट्यूब खरीदे. शाम को जब वह बाबूजी से मिलने गया, तो बाबूजी उसे देख कर हमेशा की तरह मुसकरा दिए. प्रणब उन के गले लगा और बातचीत कर रहे थे कि उन की आंखें भीग गईं और उन से आंसू निकलने लगे.
प्रणब ने तभी इन टैस्ट ट्यूब में आंसुओं को एकत्रित कर लिया. उस ने बाबूजी से पूछा कि उन को आंसू क्यों आ गए? क्या वे दर्द में हैं?
बाबूजी ने बहुत कोशिश के बाद धीमी आवाज में बोल और इशारों से प्रगट किया कि वे इतने प्रफुल्लित हो जाते हैं कि उन की आंखों से स्वाभाविक ही आंसू निकल आते हैं और वो उन्हें रोक नहीं सकते.

प्रणब ने डाक्टर से पूछा, तो उन्होंने बताया कि शायद ये आंसू आभार, कृतज्ञता, आशीर्वाद और खुशी के हैं. डाक्टर ने यह भी कहा कि मुझे पूरा यकीन है कि इन आंसुओं के बहाने के बाद बाबूजी बहुत खुश नजर आते होंगे और वे सुखदायक विचार प्रगट करते होंगे. प्रणब ने पूरी तरह से इस का समर्थन किया.

प्रणब अब हमेशा बाबूजी के आंसू टैस्ट ट्यूब में एकत्रित करता. इस के अलावा उस ने देखा कि शनिवार और रविवार को जब वह उन से मिलता है और बाबूजी जब दर्द में होते हैं, तो उन के आंसू निकल आते हैं.

उस ने एक और टैस्ट ट्यूब में उन को भी एकत्रित करना शुरू कर दिया. नर्स को भी उस ने दिखाया कि वह कैसे बाबूजी को बिना किसी कष्ट दिए उन के आंसुओं को एकत्र करे.

कुछ समय बाद प्रणब के पास 2 तरह के आंसुओं से भरे कई टैस्ट ट्यूब एकत्रित हो गए. वह आंसू के टैस्ट ट्यूब को संभाल कर अपने शयनकक्ष में कबर्ड में रखता. पहले तो इस का पता प्रणब की पत्नी सुलेखा को भी नहीं था, लेकिन थोड़े दिनों के बाद जब भेद खुला, तो उस ने सच बता दिया. इसे सुन कर तो वह भी बड़ी खुश हुई और बिना एक शब्द बोले उस ने अपनी भावनाएं बता दीं, और उसे गले से लगा लिया.
प्रणब जब से शिकागो यूनिवर्सिटी से भारत आया था, तभी से वह अपने पुराने प्रोफैसरों के संपर्क में था. कभी पत्रों से, तो कभी फोन या ईमेल से. उन के प्रोफैसर के भारत आने पर वह उन से अपने बिजनैस के बारे में भी सलाह और सुझाव लेता था. सारे प्रोफैसरों में डाक्टर श्रीनिवासन उस के सब से अधिक पसंदीदा प्रोफैसर थे. वह उन से भी सलाह लिया करता था. वे बड़े ही मेधावी और विश्वविख्यात वैज्ञानिक थे, लेकिन उन में घमंड और अहंकार बिलकुल नहीं थे, उन के इन गुणों के कारण ही वह बहुत प्रभावित था. आखिर वह भी तो ऐसा ही था.

एक दिन प्रणब जब औफिस में बैठा अपने पत्रों को पढ़ रहा था, तभी उस की नजर एक पत्र पर पड़ी, जो शिकागो यूनिवर्सिटी से कैमिकल इंजीनियरिंग विभाग से आया था.

प्रणब ने जब उस पत्र को खोला तो पता लगा कि उस पत्र में उसे शिकागो यूनिवर्सिटी द्वारा अरैंज किए हुए एक इंटरनैशनल कैमिकल कौंफै्रंस में उसे एक पेपर देने के लिए आमंत्रित किया गया है. उस पेपर का विषय होगा, “भारत में 1947 से वर्तमान तक, कैमिकल इंजीनियरिंग के विकास और भविष्य में भारत का सहयोग”.

यह निमंत्रण प्रणब के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था. उसे देख कर प्रणब को बड़ी प्रसन्नता हुई, यह कौंफ्रैंस, जिस को प्रोफैसर श्रीनिवासन के द्वारा विस्थापित किया गया था, लगभग 6 महीने बाद जुलाई की 14-19 तारीख तक था.

प्रणब की इस कौंफ्रैंस में जाने की बहुत इच्छा थी. केवल इसलिए नहीं कि इस से उस की इज्जत बढ़ेगी, बल्कि तकनीकी विकास होगा, शोहरत बढ़ेगी, लेकिन इस से भारत का नाम भी होगा और साथ में उस की कंपनी का भी नाम होगा.

लेकिन कुछ सोचने के बाद उसे थोड़ी चिंता हुई कि वह बाबूजी को 10 दिन छोड़ कर कैसे जा पाएगा. उन की देखभाल कौन करेगा, उस की दिनचर्या में “बसी” हुई बाबूजी की सेवा, उन से बात करना, टैस्ट ट्यूब में आंसू एकत्रित करना कौन करेगा ?

प्रणब ने जब अपने मन का दुख अपनी पत्नी सुलेखा को बताया, तो उस ने कुछ सोचने के बाद कहा कि अगर वे इजाजत दें, तो उन की गैरमौजूदगी में बाबूजी की सेवा करेगी. उन की खुशी और दुख के आंसू एकत्र करेगी.

प्रणब ने जब यह सुना, तो उसे बड़ी प्रसन्नता हुई, लेकिन वह तो सोचता था कि वह इस कौंफ्रैंस में अपनी पत्नी को भी साथ ले जाएगा. उस का न जाना तो उस की पत्नी के साथ अन्याय होगा.

सुलेखा समझ गई थी कि प्रणब अभी भी कुछ चिंतित हैं. सुलेखा ने आश्वासन दिया कि वह अगर उस के साथ जाने के बारे में चिंतित है, तो उसे चिंता की कोई जरूरत नहीं है. सुलेखा ऐसा इसलिए कर रही है, क्योंकि बाबूजी की सेवा करना उस का भी धर्म है. उसे ऐसा कर के बड़ी खुशी होगी. वह जैसे अपने पिता की मौत से पहले उन की सेवा कर चुकी है, उसे आप के पिता की सेवा करने का मौका दीजिए, क्योंकि इस से उसे बड़ा ही संतोष मिलेगा और जहां तक विदेश घूमने जाने का सवाल है, तो वह कभी आगे भी पूरा हो जाएगा. वैसे भी कौंफ्रैंस में प्रणब इतना बिजी होगा कि कुछ और करने का समय भी तो नहीं मिलेगा.

प्रणब को सुलेख की बातों में सचाई की सुखद महक आई. थोड़ा सोचने के बाद प्रणब ने सुलेखा का आभार जताया और उस की बात मानने का निश्चय किया. उस ने अपने सीनियर  कर्मचारियों और सुदर्शन को बताया कि वह जून में 10 दिन के लिए शिकागो जाएगा.

शिकागो जाने से पहले ही उस ने अपने पेपर लिखने की जोरशोर से तैयारी शुरू कर दी, क्योंकि वहां जाने में केवल 3 महीने ही बचे थे.

आखिर वह दिन आ ही गया. प्रणब शिकागो पहुंच गया. शिकागो जाने से पहले उस ने सारी तैयारी कर दी थी. उस ने बाबूजी को बता दिया था कि वह जून में 10 दिन के लिए विदेश जा रहा है और उन दिनों सुलेखा ही बाबूजी की सेवा करेगी और उन के आंसू भी टैस्ट ट्यूब में जमा करेगी. वह हर रोज बाबूजी से जूम पर बात करेगा.

बाबूजी ने उसे खुशीखुशी अनुमति दे दी. इस मौके पर भी वह इन आंसुओं को एकत्र करना न भूला.

जब प्रणब अपने बैग तैयार कर रहा था, तो उस ने एक बैग में बाबूजी के आंसुओं के 2 टैस्ट ट्यूब (एक खुशी के आंसू और एक दर्द के) रखना नहीं भूला.

शिकागो पहुंच कर वह प्रोफैसर श्रीनिवासन से मिला और पुरानी यादों, उस के पेपर और कौंफ्रैंस के बारे में और परिवार के बारे में बात करतेकरते कितने घंटे बीत गए, लेकिन किसी को खबर ही नहीं लगी.

प्रणब ने प्रोफैसर श्रीनिवासन को अपना पेपर पढ़ने को दिया. पढ़ने के बाद प्रोफैसर श्रीनिवासन ने उसे शाबाशी दी और कहा कि उन्हें पूरा विश्वास था कि प्रणब बड़ा ही उच्च स्तर का पेपर लिखेगा. प्रणब ने उन्हें निराश नहीं किया. उन्होंने कहा कि इस में कोई संदेह नहीं कि उस के पेपर की बड़ी प्रशंसा होगी और कौंफैं्रस में उस का और भारत का नाम होगा. और वैसा ही हुआ भी.

उस के प्रिजेंटेशन के बाद लोगों ने बड़ी तालियां बजाईं, जो एक मिनट तक रुकी ही नहीं. उस के बाद भी कई लोगों ने अलग से बड़ी आत्मीयता से उस से हाथ मिलाए और तारीफ के पुल बांध दिए.

प्रणब ने अपने परिवार, खासकर बाबूजी को जूम पर बताया, तो वे भी आनंदित हुए और उन के खुशी के आंसू थमते ही नहीं थे.

पेपर प्रस्तुत करने के एक दिन बाद प्रणब ने प्रोफैसर श्रीनिवासन और उन की पत्नी को अपने होटल में डिनर के लिए दावत दी. पतिपत्नी थोड़ा जल्दी पहुंच गए. प्रणब ने उन्हें अपने कमरे में बुलाया और थोड़ी देर इधरउधर की बातों में लग गए.

प्रोफैसर श्रीनिवासन ने नोटिस किया कि प्रणब की टेबल पर 2 टैस्ट ट्यूब पड़ी थीं. वे थोड़ा हैरानी में पड़ गए, लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं. थोड़ी देर बातचीत के बाद वे तीनों डिनर के लिए रैस्टोरेंट में पहुंचे और एक बहुत ही स्वादिष्ठ, पौष्टिक और संतुष्टि देने वाले खाने का लुत्फ उठाया. खाना मिलाजुला था, भारतीय और अमेरिकी शैली का और उस में दोनों पाकशैलियों के लक्षणों के स्वाद थे.

थोड़ी देर आराम करने के बाद सब लोग अपने घर चले गए. कार में चलते समय और सोने तक प्रोफैसर श्रीनिवासन सोचते रहे कि उन ट्यूबों में क्या था, जिसे प्रणब अपने कमरे में संभाल कर रखे हुए था. लेकिन कुछ समझ में नहीं आया. उन्होंने निश्चय किया कि कल जब प्रणब उन से मिलने आएगा, तो वे उस से जरूर पूछेंगे.

दूसरे दिन जब प्रणब उन से मिलने गया, तो उन्होंने कहा कि प्रणब, अगर मैं तुम से एक बड़ी निजी बात पूछूं, तो कोई एतराज तो न होगा? अगर थोड़ी भी हिचकिचाहट हां, तो माफ करना. हम यह बात यहीं पर समाप्त कर देंगे.

प्रणब ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे बेफिक्र हो कर जवाब देगा. आखिर आप मुझ से बड़े हैं. मुझे पूरा विश्वास है कि आप के सवाल बड़े ही अच्छे ही होंगे.

प्रोफैसर श्रीनिवासन को यह सुन कर बड़ी खुशी हुई और उन्होंने उस से वहां टेबल पर रखे 2 टैस्ट ट्यूब के बारे में पूछा.

प्रणब ने कहा कि यह तो बड़े संयोग की बात है और उसे खुशी है कि उन्होंने इस बारे में पूछा, क्योंकि वह इस के बारे में उन से बात करना चाहता था, लेकिन मौका न मिला था और न हिम्मत.

प्रणब ने सारी बात उन्हें कह सुनाई कि कैसे उसे यह विचार आया और कैसे वह बड़े दिनों से इन आंसुओं को एकत्र कर रहा है. उस की वजह इन टैस्ट ट्यूबों को यहां लाने की यह थी कि वह उन से इस बारे में बात कर के पूछना चाहता था कि इन आंसुओं की जांच करवाने में वे इस की मदद कैसे कर सकते हैं?

प्रोफैसर श्रीनिवासन ने जब यह सब सुना, तो वे प्रणब से बहुत प्रभावित हुए कि वह अपने पिता को कितना प्यार करता है. उन्होंने आंसू एकत्र करने वाली ऐसी भक्ति के बारे में कभी नहीं सुना था और उन की आंखें नाम हो गईं. जब वे संभले तो उन्होंने प्रणब से कहा कि उस ने एक बहुत ही रोचक बात उठाई है. यह प्रकृति का संयोग है या कोई जादू, यह उन्हें नहीं पता, लेकिन वे एक ऐसे वैज्ञानिक डा. एरिक रामसे को जानते हैं, जो उन के बहुत अच्छे दोस्त है. वे जानेमाने न्यूरोलौजिस्ट हैं. वे आंसुओं के बारे में बहुत माहिर हैं. वे और उन के विद्यार्थी इस विषय पर रिसर्च भी कर रहे हैं.

प्रोफैसर श्रीनिवासन ने कहा कि वे उन के घर के पास ही रहते हैं. आज ही वे उन से बात करेंगे कि अगर वे कल अपना थोड़ा समय दोनों को दे सकें, तो उन के बड़े आभारी होंगे, क्योंकि प्रणब परसों भारत लौट जाने वाला है.

प्रोफैसर श्रीनिवासन ने डाक्टर एरिक रामसे से बात की, तो वे भी प्रणब के आंसू एकत्र करने के बारे में सुनने के बाद बड़े ही प्रभावित हुए. उन्होंने कहा कि वे शाम को उन से अपने औफिस में मिलेंगे और बातचीत करेंगे.

दूसरे दिन प्रणब और प्रोफैसर श्रीनिवासन डाक्टर एरिक रामसे के औफिस पहुंचे. उन्होंने दोनों का स्वागत किया और बातचीत करने लगे. डाक्टर एरिक रामसे ने उन्हें अवगत कराया कि “आँसू” की रिसर्च पुरानी भी है और नई भी, क्योंकि अभी तक जो वैज्ञानिकों को पता है, उस से अधिक उन्हें भी नहीं पता है. यह रिसर्च अभी भी चल रही है और चलती रहेगी.

बातचीत के दौरान डाक्टर एरिक रामसे ने बताया कि समय की कमी के कारण मैं आप को पूरी तरह से तो नहीं बता सकता, केवल संक्षिप्त में बता रहा हूं कि आंसू आप की आंखों के लिए बहुत ही जरूरी हैं, क्योंकि वे आप को लुब्रिकेट करते है और आप के इम्यून सिस्टम  यानी निरापद प्रणाली की मदद करते हैं, और इर्रीटेंट्स साफ करते हैं. आंसू में 3 परतें होती हैं. वे जल, नमक, एंटीबौडीज, एंटीबैक्टीरियल एंजाइम और कई कैमिकल्स के बने होते हैं. आंसू आप की आंखों को तरल रखते हैं और यह कई कैमिकल्स जिस में लाइसोजाइम जैसे कैमिकल्स हैं. दूसरे तरह के आँसू वे हैं, जो आंख की दूषित वातावरण के इर्रीटेंट्स जैसे कि प्याज काटने पर उस का रस, गंध, गैसें, ,अत्यधिक रोशनी से, पीपर स्प्रे, मंुह को तीखा यानी उग्र करने वाले पदार्थ, खांसी इत्यादि की वजह से निकलते हैं और आंखों को साफ करते हैं. तीसरी प्रकार के आंसू होते हैं भावनात्मक या संवेदना के या फिर रोने वाले. यह तब निकलते हैं, जब भावनात्मक तनाव बढ़ जाता है, जैसे बहुत प्रसन्नता या खुशी, दिमाग का और शरीर का असहनीय दर्द, क्रोध, पीड़ा, अतिआनंद या हंसी के माहौल में, संवेदना के आंसू. दूसरे 2 तरह के आंसुओं से कैमिकल कंपोजीशन में बहुत ही विभिन्न होते हैं. इन में कई प्रोटीन वाले हार्मोंस होते हैं, जो कई तरीकों के कैमिकल्स हैं, जो दर्द को कम करने, आंख की हिफाजत करने और भावनात्मक शांति में मदद करते हैं और व्यक्ति को आराम देते हैं.

डाक्टर एरिक रामसे ने प्रणब के बाबूजी के आंसू एकत्र करने को एक बड़ी ही हैरानी वाली बात कही कि उन के शारीरिक दर्द के आंसू और खासतौर पर संवेदना के आंसू, जो उस के  बाबूजी से प्रेम, श्रद्धा और लगाव का प्रतीक है.

उन्होंने प्रणब को प्रस्ताव दिया कि अगर वह इन टैस्ट ट्यूब में एकत्रित खुशी और दर्द के आंसुओं को उन के पास छोड़ जाए, तो वे उसे रिजर्व करेंगे, रिसर्च करेंगे. उन को विश्वास था कि कुछ न कुछ नई जानकारी उभर कर आएगी, क्योंकि एक तो यह आंसू प्योर हैं, सच्चे  है और गहरी भावना के दौरान एकत्र किए गए हैं.

प्रोफैसर श्रीनिवासन और प्रणब बड़े प्रसन्न हुए और दोनों ने डाक्टर एरिक रामसे को अपना आभार जताया और टैस्ट ट्यूब खुशीखुशी उन को दे दिए. डा. एरिक रामसे ने उन्हें 2 पेज की एक लिस्ट भी दी, जिस में आंसुओं के रिसर्च के महत्वपूर्ण पेपर थे, जिस से वे दोनों अपनी जानकारी को बढ़ा सकें.

प्रणब जब भारत पहुंचा, तो बड़ा खुश लग रहा था. वह बहुत हलकापन महसूस कर रहा था मानो उस को कोई बड़ी उपलब्धि मिल गई हो. उस ने यह प्रण लिया कि वह डाक्टर एरिक रामसे और प्रोफैसर श्रीनिवासन के संपर्क में रहेगा और उन से फोन पर बात करता रहेगा.

तकरीबन 3 साल बीत गए, जिस में प्रणब ने प्रोफैसर श्रीनिवासन और डाक्टर एरिक रामसे से कई बार संपर्क किया.

डाक्टर एरिक रामसे ने आंसुओं के और भी सैंपल मंगवाए और रिसर्च के बारे में तीनों बड़ी आत्मीयता से बात करते. डाक्टर एरिक रामसे ने प्रणब को बताया कि रिसर्च अच्छी चल रही है. उन्होंने आगे यह भी बताया कि एक साफ पेपर पर लिख कर यह रिसर्च एक प्रकाशक को भेजी है. इस काम को रोहित कुमार, जो उन का रिसर्च करने वाला छात्र है, प्रणब, प्रोफैसर श्रीनिवासन और डाक्टर एरिक रामसे लेखक हैं. इस पेपर में उन्होंने 3 महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले थे कि बाबूजी के इन भावनात्मक आंसुओं में 1. 2 नए प्रकार के हार्मोंस थे, जिन का आंसुओं के साहित्य में अभी तक विवरण नहीं हुआ था. (हो सकता है कि इसलिए कि वे प्योर यानी शुद्ध थे अर्थात उन में  में मिलावट नहीं थी ) 2. इन आंसुओं में कुछ अलग ही एक सूक्ष्म सी सुगंध थी, जिस को पहचानना आसान  नहीं था. 3. ये आंसू गालों की त्वचा पर देर तक ठहरते थे यानी जल्दी सूखते नहीं थे. ये नई खोज बहुत ही रोचक और आंसुओं की रिसर्च में उन का बहुत बड़ा योगदान होगा. उन्होंने यह भी कहा कि बाबूजी के दर्द के  आंसुओं की रिसर्च अभी भी जारी है.

लेकिन, चाहे कितनी भी वैज्ञानिक रिसर्च  हो, कैमिकल अध्ययन या न्यूरोलौजिकल या मैडिकल रिसर्च हो, उन आंसुओं के पीछे छिपी हुई जो भावनाएं हैं, जो अतःकरण के विचार, इनसानियत का मूक प्रदर्शन, अटूट श्रद्धा, अहंकाररहित त्याग, छत्रछाया का भाव और प्यार को अभिव्यक्त करना विज्ञान से परे है और उस के लिए जो जिन चक्षुओं और यंत्रों की जरूरत है, उन की तो अभी तक खोज ही नहीं हुई है. इन आंसुओं को शब्दों में क्या, पुस्तकों में भी नहीं मिलता है. वो तो केवल प्रणब द्वारा ही अपने मन में, जेहन में महसूस किए जा सकते हैं, और बेचारा प्रणब उस को किसी से कह भी नहीं सकता. Family Story

Prostitution : सभ्य समाज में वेश्यावृति लीगल होने से क्या अंतर आएगा

Prostitution : भारत की सर्वोच्च अदालत ने भारत में वेश्यावृत्ति को कानूनी तौर पर जायज करार दिया है. दुनिया के लगभग सभी विकसित देशों में ऐसा कानून पहले से है, मतलब वहां वेश्यावृत्ति लीगल है. न्यूजीलैंड में वेश्यावृत्ति को साल 2003 में कानूनी मान्यता मिल चुकी है. न्यूजीलैंड में लाइसेंस प्राप्त वेश्यालय भी संचालित होते हैं, साथ ही इस देश में सैक्स वर्कर्स को सभी सामाजिक लाभ भी मिलते हैं.

जरमनी में वेश्यावृत्ति को कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त है और वेश्यालय भी लीगल हैं. यहां सैक्स वर्कर को स्वास्थ्य बीमा दिया जाता है. उन्हें टैक्स का भुगतान करना पड़ता है. इतना ही नहीं उन्हें पेंशन जैसे सामाजिक लाभ भी मिलते हैं. ग्रीस में भी सैक्स वर्कर्स को समान अधिकार मिलते हैं और उन्हें स्वास्थ्य जांच के लिए भी जाना पड़ता है.

भारत और पश्चिमी देशों में चल रहे जिस्मफरोशी के इस धंधे में एक बड़ा अंतर है जो भारतीय लोगों की उस फितरत को दर्शाता है जिस में इंसानी संवेदनाएं गायब नजर आती हैं. बाहर के देशों में वेश्यावृत्ति के लिए नाबालिग लड़कियों की मंडी नहीं लगती. विदेशों में भी पूरा खेल डिमांड और सप्लाई का है लेकिन वहां हैवानियत के पेशे में भी थोड़ी इंसानियत नजर आती है. इस के उलट भारत में वेश्यावृत्ति के लिए बेची या खरीदी गई कम उम्र की लड़कियों की दास्तानें सुन कर रौंगटे खड़े हो जाते हैं.

हमारे यहां गरीब परिवारों में बेटी होना अभिशाप होता है. जिस्मफरोशी के लिए सब से ज्यादा लड़कियां गरीब परिवारों से ही आती हैं. देश के कई इलाकों में देह के धंधे के लिए बेटियां बेची जाती हैं. उठाई जाती हैं. किराए पर दी या ली जाती हैं या घरेलू हिंसा की शिकार हो कर कोई महिला मजबूरी में किसी चकलाघर तक पहुंचती है. आस्ट्रेलिया महाद्वीप की कुल आबादी से ज्यादा हमारे देश मे वो लड़कियां हैं जो इस वक्त वेश्यावृत्ति के दलदल में फंसी हुई हैं.

भारत में वेश्यावृत्ति की कड़वी हकीकत यह है कि अपनी मर्जी से शायद ही कोई लड़की किसी कोठे तक पहुंचती हो. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने वेश्यावृत्ति की इस विडम्बना पर कोई टिप्पणी नहीं की. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार वेश्यावृत्ति भी एक पेशा ही है.

बंगाल नेपाल उड़ीसा झारखंड बिहार के दूरदराज इलाकों में बेटियों की खरीदफरोख्त का पूरा नेटवर्क खड़ा है. पुलिस और कानून की नाक के नीचे यह सब होता है. एक लड़की की कुर्बानी से कई जेबें गरम होती हैं और कइयों की हवस शांत होती है. सोनागाछी, जीबी रोड या भारत के किसी भी रेड लाइट एरिया की जमीनी हकीकत यही है.

ह्यूमन राइट्स वौच की ताजा रिपोर्ट देश में जिस्मफरोशी के धंधे की जो जमीनी हकीकत बयान करती है उसे जानकर रौंगटे खड़े हो जाते हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार पूरे भारत में 2 करोड़ सैक्स वर्कर हैं जिन में सिर्फ मुंबई में ही 2 लाख हैं. ये वो अभागी लड़कियां हैं जिन्हें हमारा सभ्य समाज वेश्या के नाम से जानता है. जिस्म के इस धंधे में लगी लड़कियों में 12 प्रतिशत नाबालिग बच्चियां हैं. 1997 से 2004 के बीच जिस्मफरोशी में लगी लड़कियों की संख्याि में 50 फीसदी इजाफा हुआ. इस रिपोर्ट के अनुसार कम उम्र की 12 लाख बच्चियां भी इस धंधे का हिस्सा हैं.

देश की सब से बड़ी जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूइरो की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में देह व्याशपार में लिप्ती लड़कियों में से 90 प्रतिशत वो हैं जिन की खरीदफरोख्त हुई यानी कि इस धंधे में लगी 90 प्रतिशत लड़कियों को जबरन वेश्या बनना पड़ा.

नैशनल क्राइम ब्यूोरो की रिपोर्ट के अनुसार 6 प्रतिशत लड़कियां बलातकार के बाद बेच दी जाती हैं और इस तरह वे देह के इस व्यारपार में आती हैं बाकी बची 4 प्रतिशत वो हैं जो घरेलू हिंसा की शिकार होने के बाद मजबूरी में यह रास्ता चुनने को मजबूर होती हैं.

दुनिया भर में करीब 2 करोड़ वेश्याेएं यौन संक्रमित बीमारियों से ग्रसित हैं, जिन में से आधी तो सिर्फ भारत से आती हैं.

कोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस को यह आदेश दिया कि जब भी पुलिस किसी जगह छापा मारे तो सैक्स वर्कर्स को गिरफ्तार या परेशान न करे, क्योंकि इच्छा से वेश्यावृत्ति में शामिल होना अवैध नहीं है, सिर्फ वेश्यालय चलाना गैरकानूनी है.

कोर्ट के इस नजरिए से जिस्मफरोशी में लिप्त लड़कियों को भले ही पुलिसिया उत्पीड़न से थोड़ी बहुत राहत मिले लेकिन इस से बड़े बदलाव की उम्मीद करना व्यर्थ है.

कानून बनाने वाले न्यायधीशों को वेश्यावृत्ति की जमीनी हकीकत से वास्ता क्या ? ठीक वैसे ही जैसे हमारे यहां बाल विवाह निषेध कानून बना कर हम मान बैठे कि अब बाल विवाह खत्म हो गया लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है. आज भी देश में 56 प्रतिशत लड़कियों की शादी 15 साल से कम उम्र में ही हो जाती है.

वेश्यावृत्ति गैरकानूनी पेशा थी तब भी तो धंधा चल ही रहा था. अब लीगल हो जाने के बाद यह धंधा और जोरों से चलेगा. बेरोजगारी के आलम में थोड़ी राहत तो मिलेगी. सभ्य समाज में वेश्यावृत्ति क्यों कायम है, न्यायधीशों के लिए यह सवाल जरूरी नहीं है. इस में लगी औरतों की जिंदगियों में झांकने की भी जरूरत न्यायधीशों को नहीं. अब यह लीगल हो जाने के बाद वेश्या कही जाने वाली लड़कियों की जिंदगी में क्या बदलाव आएगा ? मालूम नहीं लेकिन इन के छोटे दलालों को बड़ी राहत जरूर मिल जाएगी.

Story In Hindi : आदमकद – त्रिभुवन ने सूरज को दहेज में क्या दिया

Story In Hindi : सूरज को पुलिस महकमे में आए हुए ज्यादा समय नहीं हुआ था. उस ने एक महीने पहले ही थाने का चार्ज लिया था. एक दिन की बात है. सूरज तैयार हो रहा था. आज वह बहुत ही जल्दी में था, क्योंकि मंत्रीजी आ रहे थे. उसे ठीक 11 बजे सर्किट हाउस पहुंचना था. वहीं मंत्रीजी जिले के सभी अफसरों की बैठक लेने वाले थे.

सूरज बाथरूम से बाहर आया और यूनिफौर्म पहन कर आदमकद आईने के सामने जा खड़ा हुआ. उसे याद आया कि उस ने कभी अपने बड़े साले के कंधे पर हाथ रख कर कहा था, ‘त्रिभुवन, मुझे आधेअधूरे काम से सख्त नफरत है. मैं जो भी पसंद करता हूं, वह पूरा और परफैक्ट होना चाहिए, इसीलिए मैं उसी आईने में खुद को देखना पसंद करता हूं, जो आदमकद हो और मैं उसी शख्स को ही सब से ज्यादा पसंद करना चाहूंगा, जो आदमकद हो.’

त्रिभुवन समझदार था. उस ने दहेज के फर्नीचर में सूरज को एक खूबसूरत आदमकद आईना ही दिया, जिस के सामने वह तैयार हो कर खड़ा हुआ था.

तभी डाइनिंग टेबल पर नौकर ने नाश्ता लगा दिया. सूरज नाश्ता कर ही रहा था कि उस की पत्नी एक गिलास ताजा बादाम दूध ले कर आ गई. उस ने नाश्ते के बाद दूध पी कर गिलास टेबल पर रखा और टेबल पर रखे पर्स को उठाया, उस में रखे नोट गिने. पर्स में केवल 4 सौ रुपए थे.

सूरज ने पत्नी से पूछा, ‘‘क्या पर्स में से कुछ रुपए निकाले थे?’’

‘‘हां, सुबह 7 सौ रुपए दिए हैं दूध वाले को.’’

‘‘इस में हजार रुपए और कम हैं?’’ सूरज ने मन ही मन हिसाब लगाते हुए पूछा.

पत्नी ने सूरज के सवाल के जवाब में एक नया सवाल उछाल दिया, ‘‘हजार रुपए… अरे, क्या मेरा कोई खर्च नहीं है. मैं ने अपने खर्च के लिए निकाल लिए हैं… कहां तक आप से मांगती रहूं…’’

‘‘ठीक है…’’ यह कह कर सूरज ने पर्स जेब में रखा और चाबी उठा कर अपनी मोटरसाइकिल पर शहर से कुछ दूरी पर बने हुए पुराने सर्किट हाउस की ओर चल पड़ा.

शहर के बीचोंबीच खुली विदेशी शराब की दुकान पर जब सूरज की नजर गई, तो अनायास ही उस का मन खुश हो गया. उस ने सोचा, ‘बहुत होशियार समझता था अपनेआप को यह ठेकेदार. मैं ने इसे थाने बुलाया तो आया ही नहीं. अपने मैनेजर के हाथ से 5 हजार रुपए भेज दिए.

‘मैं ने 5 हजार रुपए लौटाते हुए खबर भिजवाई कि 10 हजार रुपए से कम में बात नहीं बनेगी और अगर मेरी बात पसंद नहीं है, तो नियमानुसार दुकान ठीक सुबह 10 बजे खुल कर रात 8 बजे बंद हो जानी चाहिए. और किसी भी हालत में पीछे के दरवाजे से शराब नहीं बेची जा सकेगी.

‘वह नहीं माना. 3 दिन पहले मैं ने रात को 8 बजे खुद जा कर दुकान बंद कराई और ठेकेदार को कह आया कि रोज रात को 8 बजे थाने से एक सिपाही आ कर तुम्हारी दुकान की चाबी ले जाया करेगा और सुबह 10 बजे तुम थाने से चाबी मंगवा लिया करो.’

तब से रोज यही हो रहा था. दुकान 8 बजे बंद होती थी और सुबह 10 बजे के बाद ही खुलती थी.

अब सूरज को पहाड़ी पर बने सर्किट हाउस की ऊंची इमारत दिखाई देने लगी थी. वह सर्किट हाउस पहुंच गया. अभी मंत्रीजी नहीं आए थे.

कुछ पलों बाद ही मंत्रीजी की कई कारों का काफिला सर्किट हाउस में दाखिल हुआ.

मंत्रीजी और उन की पत्नी एक कार से उतरे और सीधे वीआईपी कमरा नंबर 4 में जा पहुंचे, जो पहले से ही उन के लिए बुक था. दूसरी कारों से भी कई लोग उतरे. वे कौनकौन थे, भीड़ में उन को पहचानना मुश्किल था.

कुछ देर बाद एसपी साहब ने इशारे से सूरज को नजदीक बुलाया, ‘‘सुनो…’’

वह एसपी साहब के नजदीक पहुंचा और बोला, ‘‘जी सर.’’

‘‘जाइए, मंत्रीजी बुला रहे हैं.’’

‘‘मुझे… मुझे बुला रहे हैं?’’ सूरज ने हड़बड़ा कर पूछा.

‘‘हां, आप को ही बुला रहे हैं. ‘‘देखना, कोई बवाल न हो. कुछ किया तो नहीं है न?’’

‘‘नहीं सर, ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ है,’’ यह कर सूरज मंत्रीजी के कमरे की ओर भागा.

कमरे में मंत्रीजी के अलावा वही शराब ठेकेदार बैठा था. सूरज ने सोचा, ‘आज मैं गया काम से. न जाने क्या सच और कितना झूठ कहा होगा इस ने मेरे बारे में.’

सूरज ने मंत्रीजी को नमस्ते किया और कहा, ‘‘जयहिंद सर.’’

‘‘जयहिंद… ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’

‘‘जी, सूरज.’’

‘‘सूरज, क्या आप अभी नएनए आए हैं इस महकमे में?’’

‘‘जी हां सर, यह मेरी पहली ही पोस्टिंग है,’’ सूरज ने मंत्रीजी को बताया.

‘‘देखिए सूरज, ये रामप्रसाद हैं. तुम्हारे थाने के तहत इन की एक छोटी सी शराब की दुकान है. ये बहुत पुराने ठेकेदार हैं. सुना है, इन को आप से कुछ शिकायत है. यह शिकायत आपस में दूर कर लें, तो ज्यादा अच्छा होगा. आपस में मिल कर रहो और आगे से मेरे पास कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए.’’

‘‘जी सर, अब कोई शिकायत नहीं आएगी,’’ सूरज बोला.

एक लंबी चुप्पी के बाद सूरज ने कहा, ‘‘सर, क्या मैं जा सकता हूं?’’

‘‘हां, अब तुम जा सकते हो.’’

‘‘जयहिंद,’’ कह कर सूरज कमरे से बाहर आ गया.

सूरज ने कमरे से बाहर आते ही उस के पीछेपीछे वह शराब का ठेकेदार भी आ गया और उस ने सूरज की ओर एक लिफाफा बढ़ाया.

सूरज ने लिफाफे को अपनी जेब में रखा और पूछा, ‘‘कितने हैं?’’

‘‘पूरे 10 हजार हैं.’’

‘‘ठीक है, अब चाबी भेजने की जरूरत नहीं है, लेकिन हर महीने की 5 तारीख तक रुपए पहुंचा दिया करो.’’

उस ने रजामंदी से सिर हिलाया और फिर मंत्रीजी के कमरे में जा पहुंचा.

‘‘क्यों, मामला निबट गया?’’ मंत्रीजी ने पूछा.

‘‘जी हां.’’

‘‘कुछ दिया क्या?’’

‘‘जी हां, कुल 10 हजार रुपए का एक लिफाफा दिया है.’’

‘‘यह तुम ने ठीक किया, क्योंकि मैं तो अभी चला जाऊंगा, तुम्हें इसी के रहना इलाके में है. पुलिस और कारोबारियों के संबंध आपस में मधुर रहने चाहिए.’’

फिर मंत्रीजी कुछ सोचने लगे और अचानक बोले, ‘‘अच्छा ठीक है, अब तुम जाओ. कोई परेशानी की बात हो, तो मुझे फोन कर देना.’’

यह कह कर मंत्रीजी कमरे से लगे हुए एक दूसरे कमरे में चले गए.

मंत्रीजी को आते देख कर नाश्ते की टेबल से उन की पत्नी उठने लगीं, तो मंत्रीजी ने हंसते हुए कहा, ‘‘पहले नाश्ता कर लो, फिर बात करते हैं.’’

पत्नी ने बात अनसुनी करते हुए कहा, ‘‘अगर आप कहें, तो बाजार चली जाऊं. अभी साढ़े 10 बजे हैं, जल्दी ही लौट आऊंगी.’’

‘‘हांहां, चली जाओ. मैं एक थानेदार को साथ में भेज देता हूं. देखो, ज्यादा खरीदारी मत करना. शायद, उस के पास 10 हजार रुपए ही होंगे,’’ कह कर मंत्रीजी मुसकराए.

‘‘जी, मैं समझ गई.’’

मंत्रीजी पहले वाले कमरे में आए और उन्होंने कमरे में लगी घंटी के स्विच पर हाथ रखा. घंटी की आवाज गूंज उठी.

चपरासी कमरे में आया और बोला, ‘‘जी सर…’’

‘‘सूरज थानेदार को भेजो.’’

यह सुन कर चपरासी कमरे के बाहर चला गया.

कुछ ही पलों बाद सूरज मंत्रीजी के सामने खड़ा था, ‘‘जी सर.’’

‘‘देखो सूरज,  हमारी श्रीमती को कुछ खरीदारी करनी है. ऐसा करो कि तुम मेरा यह एटीएम कार्ड ले जाओ. मैं नंबर बता देता हूं, रास्ते में बैंक से श्रीमतीजी से पूछ कर रुपए निकाल लेना.’’

यह कह कर मंत्रीजी ने अपने कपड़ों की सभी जेबों को देखा, पर एटीएम कार्ड होता, तो मिलता. फिर भी मंत्रीजी एक चालाक कलाकार की तरह बारबार जेबें देखे जा रहे थे.

जब एटीएम कार्ड मिलने में देर होने लगी, तो सूरज ने कहा, ‘‘सर, रहने दीजिए, मैं देख लूंगा.’’

‘‘अच्छा सूरज, तो तुम देख लेना. वैसे भी मीटिंग में पहले ही काफी देर हो चुकी है,’’ यह कह कर मंत्रीजी ने कुछ फाइलें उठाईं और कमरे से बाहर मीटिंग हाल की ओर चल दिए.

मंत्रीजी के कमरे से बाहर जाते ही सूरज ने लिफाफा निकाला और रुपए गिने. पूरे 10 हजार रुपए थे.

‘‘जी मैडम, चलिए,’’ यह कह कर सूरज कमरे से बाहर आया.

ड्राइवर ने पूछा, ‘‘कहां चलना है?’’

पीछे की सीट पर बैठ चुकी मैडम ने सूरज से कहा, ‘‘आप हमें साड़ी के किसी बढि़या शोरूम में ले चलिए.’’

शहर के सब से बढि़या साड़ी शोरूम के सामने कार रोकी गई.

दुकान में घुसते ही दुकानदार ने मैडम से कहा, ‘‘क्या दिखाऊं?’’

‘‘कुछ खास नहीं, बनारसी साड़ी दिखाओ,’’ मैडम ने कहा.

‘‘मैडम, आप साडि़यां किस रेंज में देखना पसंद करेंगी?’’

‘‘किसकिस रेंज में हैं?’’ मैडम ने पूछा.

‘‘25 हजार रुपए से ले कर 20 हजार रुपए तक की रेंज में हैं.’’

मैडम ने पलभर सोचा और फिर कहा, ‘‘आप मुझे 5 से 6 हजार रुपए की रेंज में साड़ी दिखाइए.’’

दुकानदार ने साडि़यों का एक बड़ा सा ढेर लगा दिया, जिस में एक से बढ़ कर एक बढि़या साडि़यां थीं. काफी देर बाद 2 साडि़यों को पसंद कर मैडम ने कहा, ‘‘सूरज, इन दोनों साडि़यों को पैक करवा दीजिए.’’

सूरज के इशारे पर दुकानदार ने दोनों साडि़यों को पैक कर दिया और सूरज ने काउंटर पर जा कर पूछा, ‘‘कितने रुपए का बिल हुआ?’’

‘‘कुल 11 हजार रुपए का.’’

यह सुन कर सूरज ने वही लिफाफा जेब से निकाला, जिसे ठेकेदार ने दिया था और गिन कर पूरे 10 हजार रुपए दुकानदार को देते हुए उस ने कहा, ‘‘कुछ कम तो कीजिए.’’

‘‘आप को देख कर ही हम ने पहले से ही 2 हजार रुपए कम कर दिए हैं,’’ यह कहते हुए दुकानदार ने रुपए गिने और कहा, ‘‘साहब, इस में एक हजार रुपए कम हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं है. अगर तुम्हें रुपए ज्यादा कम लग रहे हैं, तो कभी थाने से आ कर ले जाना.’’

सूरज को मालूम था कि न यह कभी थाने आएगा और न ही वह इसे कभी रुपए देगा.

सूरज ने पूछा, ‘‘मैडमजी, कुछ और लेना है क्या?’’

‘‘नहीं सूरज, हमारे शहर में सबकुछ मिलता है. फिर भी अगर कभी इस तरफ आऊंगी, तो आप को ही तकलीफ दूंगी,’’ यह कह कर वे दुकान से बाहर निकल कर कार की ओर बढ़ गईं. सूरज ने राहत की सांस ली.

रात मंत्रीजी को विदा कर सूरज के घर पहुंचा और जब वह आदमकद आईने के सामने खड़ा हो कर कपड़े बदलते हुए अपनेआप को देख रहा था, तभी उस की पत्नी पास आ कर खड़ी हो कर उसे प्यार से देखने लगी.

सूरज ने उस से कहा, ‘‘आदमकद कोई नहीं है. न मैं, न तुम और न वे.’’ Story In Hindi 

Family Story : मालती – मालती और तेजा के बीच की परेशानी का क्या कारण था

Family Story : तेजा के शराब पीने की लत से मालती परेशान थी. लाख कोशिशों के बाद भी तेजा शराब पी कर घर आता तो कलह मचा देता था. एक दिन मालती को कुछ नहीं सूझा तो उस ने एक कड़ा फैसला ले लिया. क्या करना चाहती थी मालती? कदमों के लड़खड़ाने और कुंडी खटखटाने की आवाज सुन कर मालती चौकन्नी हो उठी और बड़बड़ाई, ‘‘आज फिर…?’’ आंखों में नींद तो थी ही नहीं. झटपट दरवाजा खोला. तेजा को दुख और नफरत से ताकते हुए वह बुदबुदाई, ‘‘क्या करूं? इन का इस शराब से पिंड छूटे तो कैसे?’’ ‘‘ऐसे क्या ताक रही है? मैं… कोई तमाशा हूं क्या…? क्या… मैं… कोई भूत हूं?’’ तेजा बहकती आवाज में बड़बड़ाया. ‘‘नहीं, कुछ नहीं…’’ कुछ कदम पीछे हट कर मालती बोली. ‘‘तो फिर… एं… तमाशा ही हूं… न? बोलती… क्यों नहीं…? ’’ कहता हुआ तेजा धड़ाम से सामने रखी चौकी पर पसर गया. मालती झटपट रसोईघर से एक गिलास पानी ले आई. तेजा की ओर पानी का गिलास बढ़ा कर मालती बोली,

‘‘लो, पानी पी लो.’’ ‘‘पी… लो? पी कर तो आया हूं… कितना… पी लूं? अपने पैसे से पीया… अकबर ने भी पिला दी… अब तुम भी पिलाने… चली हो…’’ मालती कुछ बोलती कि तेजा ने उस के हाथ से गिलास झपट कर दीवार पर पटकते हुए चिल्लाया, ‘‘मजाक करती है…एं… मजाक करती है मुझ से… पति के साथ… मजाक करती है. …पानी… पानी… देती है,’’ तेजा उठ कर मालती की ओर बढ़ा. मालती सहम कर पीछे हटी ही थी कि तेजा डगमगाता हुआ सामने की मेज से जा टकराया. मेज एक तरफ उलट गई. मेज पर रखा सारा सामान जोर की आवाज के साथ नीचे बिखर गया. खुद उस का सिर दीवार से जा टकराया और गुस्से में बड़बड़ाता हुआ वह मालती की ओर झपट पड़ा. मालती को सामने न पा कर तेजा फर्श पर बैठ कर फूटफूट कर रोने लगा. तेजा के सामने से हट कर मालती एक कोने में दुबकी खड़ी थी. उसे काटो तो खून नहीं. वह एकटक नशे में धुत्त अपने पति को देख रही थी.

उस का कलेजा फटा जा रहा था. तेजा के रोने की आवाज सुन कर बगल के कमरे में सोए दोनों बच्चों की नींद टूट गई. आंखें मलती 10 साल की मुन्नी और उस के पीछे 8 साल का बेटा रमेश पिता की ऐसी हालत देख कर हैरानपरेशान थे. पिता के इस तरह के बरताव के वे दोनों आदी थे. आज पिता के रोने से उन्हें बड़ी तकलीफ हो रही थी, पर मां के गालों से लुढ़कते आंसुओं को देख कर वे और भी दुखी हो गए. बेटी मुन्नी मां का हाथ पकड़ कर रोने लगी. रमेश डरासहमा कभी बाप को देखता, तो कभी मां के आंसुओं को. तेजा को लड़खड़ा कर खड़ा होता देख तीनों का कलेजा पसीज गया. तभी तेजा मालती पर झपट पड़ा, ‘‘मुझे भूख नहीं लगती क्या?… तुझे मार डालूंगा… तुम ने मुझे नीचे… गिरा दिया और… आंसू बहा रही है… झूठमूठ के आंसू… तुम ने मुझे मारा… मैं ने तेरा क्या बिगाड़ा?… एं… क्या बिगाड़ा… बता…?’’ मालती के बाल उस के हाथों की गिरफ्त में आ गए. वह उन्हें छुड़ाने की नाकाम कोशिश करने लगी. बेटी मुन्नी जोरों से रोने लगी. रमेश अपने पिता का हाथ अपने नन्हे हाथों से पकड़ कर हटाने की नाकाम कोशिश करने लगा. मालती ने चिल्ला कर रमेश को मना किया, पर वह नहीं माना.

इस बीच तेजा ने रमेश को धक्का दे कर नीचे गिरा दिया. उस का सिर फर्श से टकराया और देखते ही देखते खून का फव्वारा फूट पड़ा. खून देख कर मालती बदहवास हो कर चिल्ला पड़ी, ‘‘खून… रमेश… मेरे बेटे के सिर से खून…’’ खून देख कर तेजा का हाथ ढीला पड़ा. मालती और मुन्नी दहाड़ें मार कर रोने लगीं. पड़ोसियों ने आ कर सारा माजरा देखा और रमेश को अस्पताल ले जा कर मरहमपट्टी करवाई. खाना रसोईघर में यों ही पड़ा रहा. मालती रातभर रमेश को सीने से लगाए रोती रही. नींद आंखों से गायब थी. अपनी औलाद के लिए घुटघुट कर जीने के लिए मजबूर थी मालती. मन ही मन उस ने तेजा से हार मान ली थी. हालात से समझौता कर मालती ने मान लिया था कि यही उस की किस्मत में लिखा है. पर, तेजा ने शराब से हार नहीं मानी. रात के अंधेरे में तेजा राक्षस बन कर घर में कुहराम मचाता, तो दिन की रोशनी में भले आदमी की तरह मुसकान बिखेरता मालती और बेटीबेटे को लाड़प्यार करता. ऐसा लगता कि जैसे रात में कुछ हुआ ही नहीं. पर अंदर ही अंदर मालती की घुटन एक चिनगारी का रूप लेने लगी थी.

एक दिन तो मालती की खिलाफत ने अजीब रंग दिखाया. उस दिन मालती ने दोनों बच्चों को स्कूल जाने से रोक दिया. तेजा ने पूछा, ‘‘क्या आज स्कूल बंद है? ये तैयार क्यों नहीं हो रहे हैं?’’ ‘‘नहीं, मेरी तबीयत ठीक नहीं है. इसी वजह से इन्हें रोक लिया,’’ मालती गंभीर हो कर बोली. ‘‘तो मैं आज काम पर नहीं जाता. तुम्हारे पास रहूंगा. इन्हें जाने दो,’’ तेजा बोला. ‘‘नहीं, ये आज नहीं जाएंगे. मेरे पास ही रहेंगे,’’ मालती बोली. ‘‘जैसी तुम्हारी मरजी. ज्यादा तबीयत खराब हो, तो मुझे बुलवा लेना. डाक्टर के पास ले जाऊंगा,’’ तेजा बड़े प्यार से बोला. मालती और बच्चों को छोड़ तेजा काम पर चला गया. एक घंटे बाद मालती ने मुन्नी के हाथों शराब की भट्ठी से 4 बोतल शराब मंगवाई. दरवाजा बंद कर धीरेधीरे एक बोतल वह खुद पी गई. फिर मुन्नी व रमेश को पिलाने लगी.

मुन्नी ज्यादा पीने की वजह से रोने लगी. रमेश भी रोता हुआ बड़बड़ाने लगा, ‘‘मम्मी, अच्छी नहीं लग रही है. अब मत पिलाओ मम्मी.’’ ‘‘पी लो, थोड़ी और पी लो… देखो, मैं भी तो पी रही हूं…’’ रुकरुक कर मालती बोली और दोनों के मुंह में पूरा गिलास उडे़ल दिया. दोनों ही फर्श पर निढाल हो कर गिर पड़े. मालती ने दूसरी बोतल भी पी डाली और वह भी फर्श पर लुढ़क गई. थोड़ी देर बाद बच्चे उलटी करने लगे और चिल्लाने लगे. बच्चों की दर्दभरी कराह और चिल्लाहट सुन कर पड़ोसी दरवाजा तोड़ कर घर में घुसे. वहां की हालत देख कर सभी हैरान रह गए. कमरे में शराब की बदबू पा कर उन्हें समझते देर नहीं लगी कि तेजा की हरकतों से तंग आ कर ही मालती ने ऐसा किया है.

पड़ोसियों ने तीनों को अस्पताल पहुंचाया. खबर पा कर तेजा अस्पताल की ओर भागा. मालती और बच्चों का हाल देख कर वह पछाड़ खा कर गिर पड़ा और फूटफूट कर रोने लगा. ‘‘बचा लो भैया… इन्हें बचा लो… मेरी मालती को बचा लो… मेरे बच्चों को बचा लो…’’ कहता हुआ तेजा अपनी छाती पीट रहा था. ‘‘और शराब पियो तेजा… और पियो… और जुल्म करो अपने बीवीबच्चों पर… देख लिया…’’ एक पड़ोसी ने गुस्साते हुए कहा. ‘‘नहीं, नहीं… मैं कुसूरवार हूं… मेरी वजह से ही यह सब हुआ… उस ने कई बार मुझे समझाने की कोशिश की, पर मैं ही अपनी शराब की बुरी आदत की वजह से मामले को समझ नहीं पाया,’’ रोतेरोते तेजा बोला. करीब एक घंटे बाद डाक्टर ने आ कर बताया कि दोनों बच्चे तो ठीक हैं, पर मालती ने दम तोड़ दिया है. उसे बचाया नहीं जा सका. उस पर शराब के असर के अलावा दिमागी दबाव बहुत ज्यादा था. तेजा फूटफूट कर रोने लगा. उसे अक्ल तो आ गई थी, पर इतनी अच्छी बीवी को खोने के बाद. Family Story

लेखक : हीरा लाल मिश्र

Love Story In Hindi : तेरे बिन – क्या हर्षा को कोई और मिल गया था या बात कुछ और थी

Love Story In Hindi : हर्षा जिस दिन से मायके से लौटी थी उल्लास उसे कुछ बदलाबदला पा रहा था. औफिस जाते समय पहले तो वह उस की हर जरूरत का ध्यान रखती. नाश्ता, टिफिन, घड़ी, मोबाइल, वालेट, पैन, रूमाल कहीं कुछ रह न जाए. वह नहा कर निकलता तो धुले व पै्रस किए कपड़े, पौलिश किए जूते उसे तैयार मिलते. रोज बढि़या डिनर, संडे को स्पैशल लंच, सुंदर सजासंवरा घर, मुसकान से खिलीखिली हर वक्त आंखों में प्यार का सागर लिए उस की सेवा में बिछी रहने वाली हर्षा के रंगढंग उस दिन से कुछ अलग ही नजर आ रहे थे.

अब उसे कोई चीज टाइम पर जगह पर नहीं मिलती. पूछता तो उलटे तुरंत जवाब मिल जाता कि कुछ खुद भी कर लिया करो. अकेली कितना करूं. उल्लास इधरउधर दिमाग के घोड़े दौड़ाने लगा था.

‘उस दिन औफिस की पुरानी सैक्रेटरी बीमार जान कर उसे देखने घर चली आई. कहीं इस कारण हर्षा को कुछ फील तो नहीं हो गया या  हर्षा की नई भाभी पारुल ने तो कहीं उसे पट्टी पढ़ा कर नहीं भेजा, बहुत तेज लगती है वह या फिर औफिस में बिजी रहने के कारण आजकल कम टाइम दे पाता हूं. घर में अकेले पड़ेपड़े बोर हो जाती होगी शायद. मायके में जौइंट फैमिली जो है… बच्चा भी तो नहीं अभी कोई, जो उसी से मन लग जाता. 2-3 साल बाद बच्चे का प्लान खुद ही तो मिल कर बनाया था. पूछने पर तो सही जवाब भी नहीं देती आजकल,’ उल्लास सोचे जा रहा था.

‘‘उल्लास खाना बना दिया है, निकाल कर खा लेना. बाकी फ्रिज में रख देना. मुझे शायद आने में देर हो जाए. फ्रैंड के घर किट्टी पार्टी है,’’ हर्षा का सपाट स्वर सुनाई दिया.

‘‘संडे को कौन किट्टी पार्टी रखता है? एक ही दिन तो सभी जैंट्स घर पर होते हैं?’’

‘‘और हम जो रोज घर में रहतीं हैं उन का क्या? कल से तुम्हारे कपड़े बैड पर फैले हैं. उन्हें समेट कर रख लेना. मेरी समझ नहीं आता मेरे लिए क्यों छोड़ कर जाते हो?’’ और धड़ाम से दरवाजा बंद कर वह चली गई.

उल्लास सोचने लगा कि वह पहले भी तो यों छोड़ जाता था… तब उस के काम खुशीखुशी कर देती थी, तो अब उस ने ऐसा क्या कर दिया जो हर्षा उस से रूठीरूठी सी रहने लगी है? वह उस पर और बर्डन नहीं डालेगा. अपने काम खुद कर लिया करेगा.

उल्लास ने जैसेतैसे बेमन से खाना खा  लिया. हर्षा का खाना बेस्वाद तो कभी नहीं बना, भले ही खिचड़ी बनाए. इसी कारण उस का बाहर का खाना बिलकुल छूट गया था… पर अब तो कभी नमक ज्यादा तो कभी कम. कच्ची सब्जी, जलीजली रोटियां. हुआ क्या है उसे? वह हैरान था. उस की समझ में कुछ नहीं आ रहा था.

फिर मन ही मन बुदबुदाया कि चल बेटा होस्टल डेज याद कर और आज कुछ बना डाल हर्षा को खुश करने के लिए. जब तक वह घर लौटे बढि़या सा डिनर तैयार कर ले उस के लिए… हमेशा वही बनाती है उसे भी तो कभी कुछ करना चाहिए. फिर सोचने लगा कि हर्षा को आमिर खान पसंद है. अत: पहले ‘दंगल’ मूवी के टिकट बुक करा लिए जाएं नाइट शो के. फिर औनलाइन टिकट बुक किए. दोनों की पसंद का खाना तैयार किया.

हर्षा आई तो उस का प्रयास देख कर मन ही मन खुश हुई. करी को थोड़ा सा ठीक किया, पर बाहर जाहिर नहीं होने दिया. यही तो चाहने लगी थी कि उल्लास किसी भी बात के लिए उस पर निर्भर न रहे. डिनर भी चुपचाप हो गया. मूवी में भी हर्षा चुपचुप रही.

उस की चुप्पी उल्लास को अखरने लगी थी. अत: बोला, ‘‘कोई बात है हर्षा तो मुझे बताओ… मुझ से कुछ गलत हो गया या मेरा साथ तुम्हें अब अच्छा नहीं लगता?’’

‘‘जब तुम हिंदी मूवी पसंद नहीं करते हो, तो मेरी पसंद के टिकट नहीं लाने चाहिए थे. प्रत्यूष और धनंजय को ले कर अच्छा होता कोई अपनी पसंद की इंग्लिश मूवी ऐंजौय करते… जबरदस्ती मेरे कारण देखने की क्या जरूरत है?’’

उल्लास देखता रह गया कि जो हर्षा रातदिन उसे दोस्तों के साथ न जाने और अपने साथ ही हिंदी मूवी देखने की जिद करती थी वही आज उलटी बात कर रही है… क्यों उस से कट रही है हर्षा? क्या किसी और के लिए दिल में जगह बना ली है? फिर उस ने सिर झटका कि वह ऐसा सोच भी कैसे सकता है? उसे दीवानों की तरह चाहने वाली हर्षा ऐसा कभी नहीं कर सकती. वह चाहती है न कि वह अपने सारे काम खुद करे तो करेगा. तब तो खुश होगी. उसे पहले वाली हर्षा मिल जाएगी.

2-3 महीने में उल्लास ने अपने को काफी बदल लिया. अपने कपड़े हर संडे धो डालता. कुछ खुद प्रैस करता कुछ को बाहर से करवा लेता. घड़ी, वालेट, मोबाइल, चार्जर वगैरह ध्यान से 1-1 चीज रख लेता. हर्षा को इस के लिए परेशान न करता. पेट भरने लायक खाना भी बनाना आ गया था. औफिस जाने से पहले अपना कमरा ठीक कर जाता.

अब तो खुश हो हर्षा? वह पूछता तो हर्षा हौले से मुसकरा देती, पर अंदर से उसे अपने कामों को स्वयं करता देख बहुत दुखता, पर वह ऐसा करने के लिए मजबूर थी.

‘‘उल्लास इंगलिश की नईर् मूवी लगी है, जाओ अपने दोस्तों के साथ देख आओ.’’

‘‘हर्षा तुम मुझे ऐसे अपने से दूर क्यों कर रही हो. मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि यह कैसी खुशी है तुम्हारी? क्या मुझे अपने लायक नहीं समझती अब?’’

‘‘उल्लास तुम तो लायक हो और तुम्हारे लिए वह लाली मौसी ने सही लड़की चुनी थी उन की ननद की बेटी संजना. बिलकुल तुम्हारे लिए हर तरह से सही मैच… उस ने अभी तक शादी नहीं की. मेरी वजह से उस से रिश्ता होतेहोते रह गया था तुम्हारा… लाली मौसी इसी कारण अभी तक नाराज हैं. उन की नाराजगी तुम दूर कर सकते हो तो बताओ…’’

‘‘कहां इतनी पुरानी बात ले कर बैठ गई तुम… हम दोनों ने एकदूसरे को

पसंद किया, प्यार किया, शादी की. अब यह बात कहां से आ गई… अच्छा औफिस को देर हो रही है. मैं निकलता हूं शाम को बात करते हैं रिलैक्स,’’ और फिर हमेशा की तरह बाहर निकलते हुए उस के माथे पर चुंबन जड़ दिया, ‘‘तुम कुछ भी कर लो, कह लो तुम्हें प्यार करता रहूंगा. सी यू हनी.’’

‘‘यही तो मैं अब नहीं चाहती उल्लास… तुम्हें कुछ कह भी तो नहीं सकती,’’ हर्षा देर तक रोती रही. कल ही उसे मुंबई के लिए निकलना था कभी न लौटने के लिए. उस ने अपनेआप को किसी तरह संभाला. छोटे से बैग में सामान पैक कर लिया. उल्लास आया तो उसे बताने की हिम्मत न हुई. रात बेचैनी से करवटें बदलते बीत गई.

‘‘तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही हर्षा,’’ उल्लास कभी पानी, कभी चाय तो कभी कौफी बना लाता. कभी माथा सहलाता.

‘‘डाक्टर को बुलाऊं क्या?’’

‘‘कुछ नहीं थोड़ा सिरदर्द है. सुबह तक ठीक हो जाएगा. तुम अब सो जाओ.’’

मगर उल्लास माना नहीं तेल की शीशी उठा लाया. ढक्कन खोला तो वह फिसल कर बैड के नीचे पहुंच गया. वह झुका तो पैक्ड बैग नजर आया.

‘‘अरे यह बैग कैसा है? कौन जा रहा है?’’

‘‘हां, उल्लास मुझे कल ही जाना पड़ रहा है मुंबई. अभि मुझे लेने कल सुबह यहां पहुंच जाएगा. वह मेरी सहेली रुचि की बहन की शादी है. उस का कोई है नहीं. घबरा रही है, डिप्रैशन में अस्पताल में दाखिल भी रही. सारी तैयारी करनी है. अत: मां से रिक्वैस्ट की कि अभि को भेज कर मुझे बुला लें. मेरे पास भी तुम से रिक्वैस्ट करने के लिए फोन आया था. मैं ने कह दिया उल्लास मुझे मना नहीं करेंगे… 1 महीना क्या 6 महीने रख लो. सारे काम खुद करने की आदत डाल ली है. अब उल्लास को कोई परेशानी नहीं होगी अकेले. सही है न?’’ वह हलके से मुसकराई. पर इतना प्यार करने वाले पति उल्लास से सब मनगढ़ंत कहने के लिए मजबूर वह अंदर तक हिल गई.

‘‘मगर… कितने दिन… मैं अकेले कैसे… कुछ बताया तो होता?’’

‘‘अकेले की आदत तो डाल ही लेनी चाहिए… आत्मनिर्भर होना चाहिए हर तरह से… अचानक कोई चल पड़े तो रोता ही फिरे दूसरा, कुछ कर ही न पाए,’’ वह हंसी थी.

‘‘चुप करो… कैसी बेसिरपैर की बातें कर रही हो… जा रही हो तो मैं तुम्हें रोक नहीं रहा… कब लौटोगी यह बताओ. शादी के लिए 10 दिन बहुत हैं, 1 महीना जा कर क्या करोगी पर ठीक है जाओ… हर दिन मुझे फोन करोगी. चलो अब सो जाओ.’’

8 बज चुके थे. तभी अभि आ गया, ‘‘कहां हो दीदी?’’

‘‘अभी उठी नहीं. कल तबीयत कुछ ठीक नहीं थी उस की… कुछ अजीब सी बातें कर रही थी, इसलिए अभी उठाया नहीं.’’

‘‘1 बजे की फ्लाइट है जीजू, देर न हो जाए.’’

‘‘हां, मैं उठाने ही जा रहा था. मुझे रात को ही मालूम हुआ… चाय बन गई, तुम उठा दो मैं चाय डाल कर लाता हूं.’’

‘‘दीदी उठो. मैं आ भी गया. चलना नहीं क्या? देर हो जाएगी,’’ अभि ने उसे उठाया.

‘‘जितनी देर होनी थी अभि हो चुकी अब और क्या होगी?’’ कहते हुए हर्षा उठ बैठी.

‘‘क्यों नहीं आप वहां रुकीं इलाज करवाने… कोशिश तो की ही जा सकती थी… क्यों नहीं बताने दिया जीजू को?’’ छोटा भाई अभि उस के कंधे पकड़ लाचारगी से बैठ गया. आंखों में बूंदें झलकने लगीं.

‘‘वक्त बहुत कम था मेरे पास, कितना इलाज हो पाता… तुझे तो पता ही है, तेरे जीजू को तैयार भी तो करना था मेरे बिना रहने के लिए… तू शांत हो जा बस,’’ हर्षा उस के आंसू पोंछने लगी जो रुक ही नहीं रहे थे.

उल्लास के कदमों की आहट कमरे की ओर आने लगी, तो अभि ने झट अपने आंसू दोनों हाथों से पोंछ डाले और सामान्य दिखने की कोशिश करने लगा.

हर्षा जातेजाते उल्लास को ठीक से रहनेखाने की तमाम हिदायतें दिए जा रही थी. अधिक फोन मत करना… वहां सब मुझे छेड़ेंगे कि उल्लास तेरे बिना रह ही नहीं पा रहा.

अब उदास, परेशान मत हो… तुम्हीं ने तो लंबा प्रोग्राम बनाया है. दोस्त के यहां शादी में जा रही हो. खुशीखुशी जाओ, मेरी चिंता बिलकुल छोड़ दो. मैं सब मैनेज कर लूंगा… ठाट से रहूंगा, देखना.’’

एअरपोर्ट से अंदर जाने के लिए हर्षा ने उल्लास का हाथ छोड़ा तो लगा उस की सारी दुनिया ही छूट गई. उल्लास को आखिरी बार जी भर कर देख लेना चाह रही थी. बड़ी मुश्किल से अपने को संभाला और हौले से बाय कहा. मुसकरा कर हाथ हिलाया और फिर झटके से चेहरा घुमा लिया. आंखों में उमड़ते बादलों को बरसने से रोक पाना उस के लिए असंभव था.

2 दिन ही बीते थे हर्षा को गए हुए औफिस में उल्लास को पता चला उस की अगले फ्राईडे को मुंबई में मीटिंग है. वह खुशी से उछल पड़ा. उस ने 2-3 बार ट्राई किया कि हर्षा को बता दे पर फोन नहीं मिला. फिर सोचा अचानक उसे सरप्राइज देगा.

‘‘फोन ही नहीं मिल रहा हर्षा का. यहां मेरी मीटिंग है आज 3 बजे. सोच रहा हूं हर्षा को सरप्राइज दूं. उस की सहेली रुचि का जल्दी पता बता अभि.’’

अभि उसे हैरानपरेशान सा देख रहा था.

‘‘जीजू आप…’’ उस ने पैर छुए, ‘‘मैं वहीं जा रहा हूं आइए. 1 मिनट रुको. अंदर अम्मांजी से तो मिल लूं.’’

‘‘सब वहीं हैं जीजू,’’ वह धीरे से बोला.

‘‘कहां खोया है तू… लगता है तेरी भी जल्दी शादी करनी पड़ेगी,’’ उल्लास अकेले ही बोले जा रहा था.

‘‘अरे कहां ले आया तू टाटा मैमोरियल… कौन है यहां कुछ तो बोल… अभि कहीं हर्षा…’’ वह आशंका से व्याकुल हो उठा.

अभि बिना कुछ बोले उस का हाथ पकड़ सीधे हर्षा के पास ले आया, ‘‘सौरी दी… मैं आप को दिया प्रौमिस पूरा नहीं कर पाया,’’ और फिर फूटफूट कर रो पड़ा.

दिल से न चाहते हुए भी हर्षा की आंखें जैसे उल्लास का ही इंतजार कर रही थीं.

मानो कह रही हों तुम्हें देख अब तसल्ली से जा सकूंगी. उल्लास के हाथ को कस कर थामे उस की हथेलियों की पकड़ ढीली पड़ने लगी. वह बेसुध हो गई.

‘‘हर्षाहर्षा तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा. तुम ने मुझे क्यों नहीं पता लगने दिया? डाक्टर… सिस्टर…’’

‘‘आप बाहर आइए प्लीज, हिम्मत से काम लीजिए… मैं ने इन्हें 2-3 महीने पहले ही बता दिया था… बहुत लेट आए थे… कैंसर की लास्ट स्टेज थी. अब कुछ नहीं हो सकता…’’

‘‘ऐसे कैसे कह सकते हैं डाक्टर? आप लोग नहीं कर पा रहे यह बात और है… मैं अमेरिका ले जाऊंगा… फौरन डिस्चार्ज कर दीजिए. मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा हर्षा मैं अभी आया,’’ और वह बाहर भागा.

जी जान लगा कर उल्लास ने आननफानन में अमेरिका जाने की व्यवस्था कर ली. 2 दिन बाद वह हर्षा को ले कर लुफ्थांसा विमान में इसी उम्मीद की उड़ान भर रहा था.

‘‘तेरे बिन नहीं जीना मुझे हर्षा,’’ उस ने उस के कानों में धीरे से कहा और हमेशा की तरह उस के माथे पर चुंबन अंकित कर दिया, परंतु इस बार वह आंसुओं में भीगा था. Love Story In Hindi

Romantic Story In Hindi : अपना सा अजनबी

Romantic Story In Hindi : जिंदगी का गणित सीधा और सरल नहीं होता. वह बहुत उलझा हुआ और विचित्र होता है. रमा को लगा था, सबकुछ ठीकठाक हो गया है. जिंदगी के गणितीय नतीजे सहज निकल आएंगे. उस ने चाहा था कि वह कम से कम शादी से पहले बीए पास कर ले. वह कर लिया. फिर उस ने चाहा कि अपने पैरों पर खड़े होने के लिए कोई हुनर सीख ले. उस ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया और उस में महारत भी हासिल कर ली.

फिर उस ने चाहा, किसी मनमोहक व्यक्तित्व वाले युवक से उस की शादी हो जाए, वह उसे खूब प्यार करे और वह भी उस में डूबडूब जाए. दोनों जीवनभर मस्ती मारें और मजा करें. यह भी हुआ. विनोद से उस के रिश्ते की बात चली और उन लोगों ने उसे देख कर पसंद कर लिया. वह भी विनोद को पा कर प्रसन्न और संतुष्ट हो गई पर…

शादी हुए 2 साल गुजरे थे. 7-8 माह का एक सुंदर सा बच्चा भी हो गया था. वह सबकुछ छोड़छाड़ कर और भूलभाल कर अपनी इस जिंदगी को भरपूर जी रही थी. दिनरात उसी में खोई रहती थी. वह पहले एक रेडीमेड वस्त्रों की निर्यातक कंपनी में काम करती थी. जब उस की शादी हुई, उस वक्त इस धंधे में काफी गिरावट चल रही थी. इसलिए उस नौकरी को छोड़ते हुए उसे कतई दुख नहीं हुआ. कंपनी ने भी राहत की सांस ली.

परंतु जैसे ही इधर फिर कारोबार चमका और विदेशों में भारतीय वस्त्रों की मांग होने लगी, इस व्यापार में पहले से मौजूद कंपनियों ने अपने हाथ आजमाने शुरू कर दिए.

राहुल इसी सिलसिले में कंपनी मैनेजर द्वारा बताए पते पर रमा के पास आया था, ‘‘उमेशजी आप के डिजाइनों के प्रशंसक हैं. वे चाहते हैं, आप फिर से नौकरी शुरू कर लें. वेतन के बारे में आप जो उपयुक्त समझें, निसंकोच कहें. मैं साहब को बता दूंगा…

‘‘मैडम, हम चाहते हैं कि आप इनकार न करें, इसलिए कि हमारा भविष्य भी कंपनी के भविष्य से जुड़ा हुआ है. अगर कंपनी उन्नति करेगी तो हम भी आगे बढ़ेंगे, वरना हम भी बेकारों की भीड़ के साथ सड़क पर आ जाएंगे. आप अच्छी तरह जानती हैं, चार पैसे कंपनी कमाएगी तभी एक पैसा हमें वेतन के रूप में देगी.’’

व्यापारिक संस्थानों में आदमी कितना मतलबी और कामकाजी हो जाता है, राहुल रमा को इसी का जीताजागता प्रतिनिधि लगा था. एकदम मतलब की और कामकाजी बात सीधे और साफ शब्दों में कहने वाला. रमा ने उस की तरफ गौर से देखा, आकर्षक व्यक्तित्व और लंबी कदकाठी का भरापूरा नौजवान. वह कई पलों तक उसे अपलक ताकती रह गई.

‘‘उमेशजी को मेरी ओर से धन्यवाद कहिएगा. उन के शब्दों की मैं बहुत कद्र करती हूं. उन का कहा टालना नहीं चाहती पर पहले मैं अपने फैसले स्वयं करती थी, अब पति की सहमति जरूरी है. वे शाम को आएंगे. उन से बात कर के कल उमेशजी को फोन करूंगी. असल में हमारा बच्चा बहुत छोटा है और हमारे घर में उस की देखभाल के लिए कोई है नहीं.’’

चाय पीते हुए रमा ने बताया तो राहुल कुछ मायूस ही हुआ. उस की यह मायूसी रमा से छिपी न रही.

‘‘कंपनी में सभी आप के डिजाइनों की तारीफ अब तक करते हैं. अरसे तक बेकार रहने के बाद  इस कंपनी ने मुझे नौकरी पर रखा है. अगर कामयाबी नहीं मिली तो आप जानती हैं, कंपनी मुझे निकाल सकती है.’’

जाने क्यों रमा के भीतर उस युवक के प्रति एक सहानुभूति सी उभर आई. उसे लगा, वह भीतर से पिघलने लगी है. किसीकिसी आदमी में कितना अपनापन झलकता है. अपनेआप को संभाल कर रमा ने एक व्यक्तिगत सा सवाल कर दिया, ‘‘इस से पहले आप कहां थे?’’

‘‘कहीं नहीं, सड़क पर था,’’ वह झेंपते हुए मुसकराया, ‘‘बंबई में अपने बड़े भाई के पास रह कर यह कोर्स किया. वहीं नौकरी कर सकता था परंतु भाभी का स्वभाव बहुत तीखा था. फिर हमारे पास सिर्फ एक कमरा था. मैं रसोई में सोता था और कोई जगह ही नहीं थी.

‘‘भैया तो कुछ नहीं कहते थे, पर भाभी बिगड़ती रहती थीं. शायद सही भी था. यही दिन थे उन के खेलनेखाने के और उस में मैं बाधक था. वे चाहती थीं कि मैं कहीं और जा कर नौकरी करूं, जिस से उन के साथ रहना न हो. मजबूरन दिल्ली आया. 3-4 महीने से यहां हूं. हमेशा तनाव में रहता हूं.’’

‘‘लेकिन आप तो बहुत स्मार्ट युवक हैं, अच्छा व्यवसाय कर सकते हैं.’’

‘‘आप भी मेरा मजाक बनाने लगेंगी, यह उम्मीद नहीं थी. कंपनी की अन्य लड़कियां भी यही कह कर मेरा मजाक उड़ाती हैं. मुझे सफलता की जगह असफलता ही हाथ लगती है. पिछले महीने भी मैं ज्यादा व्यवसाय नहीं कर पाया था. तब उमेशजी ने बहुत डांट पिलाई थी. इतनी डांट तो मैं ने अपने मांबाप और अध्यापकों से भी नहीं खाई. नौकरी में कितना जलील होना पड़ता है, यह मैं अब जान रहा हूं.’’

मुसकरा दी रमा, ‘‘हौसला रखिए, ऐसा होता रहता है. ऊपर से जो हर वक्त मुसकराते दिखाई देते हैं, भीतर से वे उतने खुश नहीं होते. बाहर से जो बहुत संतुष्ट नजर आते हैं, भीतर से वे उतने ही परेशान और असंतुष्ट होते हैं. यह जीवन का कठोर सत्य है.’’

चलतेचलते राहुल ने नमस्कार करते हुए जब कृतज्ञ नजरों से रमा की ओर देखा तो वह सहसा आरक्त हो उठी. बेधड़क आंखों में आंखें डाल कर अपनी बात कह सकने की सामर्थ्य रखने वाली रमा को न जाने क्या हो गया कि वह छुईमुई की तरह सकुचा गई और उस की पलकें झुक गईं.

‘‘आप मेरी धृष्टता को क्षमा करें, जरूर आप का बच्चा आप की ही तरह बेहद सुंदर होगा. क्या मैं एक नजर उसे देख सकता हूं?’’ दरवाजे पर ठिठके राहुल के पांव वह देख रही थी और आवाज की थरथराहट अपने कानों में अनुभव कर रही थी.

रमा तुरंत शयनकक्ष में चली गई और पालने में सो रहे अपने बच्चे को उठा लाई.

‘‘अरे, कितना सुंदर और प्यारा बच्चा है,’’ लपक कर वह बाहर फुलवारी में खिले एक गुलाब के फूल को तोड़ लाया और रमा के आंचल में सोए बच्चे पर हौले से रख दिया. फिर उस ने झुक कर उस के नरम गालों को चूम लिया तो बच्चा हलके से कुनमुनाया. जेब से 50 रुपए का नोट उस बच्चे की नन्ही मुट्ठी में वह देने लगा तो रमा बिगड़ी, ‘‘यह क्या कर रहे हैं आप?’’

‘‘यह हमारे और इस बच्चे के बीच का अनुबंध है. आप को बीच में बोलने का हक नहीं है, रमाजी,’’ कह कर वह मुसकराया.

‘यह आदमी कोई जादूगर है. कंपनी की अन्य लड़कियों को तो इस ने दीवाना बना रखा होगा,’ रमा पलभर में न जाने क्याक्या सोच गई.

‘‘अभी आई,’’ कह कर वह बच्चे को पालने में लिटा फिर वहां आ गई. परंतु अब राहुल बाहर जाने को उद्यत था. उसे बाहर फाटक तक छोड़ने गई तो उस ने पलट कर रमा को हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और हौले से मुसकरा कर हिचकते हुए कहा, ‘‘यह तो अशिष्टता ही होगी कि पहली मुलाकात में ही मैं आप से इतनी छूट ले लूं, लेकिन कहना भी जरूरी है…’’

रमा एकाएक घबरा गई, ‘बाप रे, यह क्या हो गया. क्या कहने जा रहा है राहुल, कहीं मेरे मन की कमजोरी इस ने भांप तो नहीं ली?’

रमा अपने भीतर की कंपकंपी दबाने के लिए चुप ही रही. राहुल ही बोला, ‘‘असल में मैं अपने एक दोस्त के साथ रहता हूं. अब उस की पत्नी उस के पास आ कर रहना चाहती है और वह परेशान है. अगर आप की सिफारिश से मुझे कोई बरसाती या कमरा कहीं आसपास मिल जाए तो बहुत एहसान मानूंगा. आप तो जानती हैं, एक छड़े व्यक्ति को कोई आसानी से…’’ वह हंसने लगा तो रमा की जान में जान आई. वह तो डर ही गई थी कि पता नहीं राहुल एकदम क्या छूट उस से ले बैठे.

‘‘शाम को अपने पति से इस सिलसिले में भी बात करूंगी. इसी इमारत में ऊपर एक छोटा सा कमरा है. मकान मालिक इन्हें बहुत मानता है. हो सकता है, वह देने को राजी हो जाए. परंतु खाना वगैरह…?’’

‘‘वह बाद की समस्या है. उसे बाद में हल कर लेंगे,’’ कह कर वह बाहर निकल गया. गहरे ऊहापोह और असमंजस के बाद आखिर रमा ने अपने पति विनोद से फिर नौकरी करने की बात कही. विनोद देर तक सोचता रहा. असल परेशानी बच्चे को ले कर थी.

‘‘अपनी मां को मैं मना लूंगी. कुछ समय वे साथ रह लेंगी,’’ रमा ने सुझाव रखा.

‘‘देख लो, अगर मां राजी हो जाएं तो मुझे एतराज नहीं है,’’ वह बोला, ‘‘उमेशजी हमारे जानेपरखे व्यक्ति हैं. उन की कंपनी में नौकरी करने से कोई परेशानी और चिंता नहीं रहेगी. फिर तुम्हारी पसंद का काम है. शायद कुछ नया करने को मिल जाए.’’

राहुल के लिए ऊपर का कमरा दिलवाने की बात जानबूझ कर रमा ने उस वक्त नहीं कही. पता नहीं, विनोद इस बात को किस रूप में ले. दूसरे दिन वह बच्चे के साथ मां के पास चली गई और मां को मना कर साथ ले आई. विनोद भी तनावमुक्त हो गया.

रमा ने फिर से नौकरी आरंभ कर दी. पुराने कर्मचारी उस की वापसी से प्रसन्न ही हुए, पर राहुल तो बेहद उत्साहित हो उठा, ‘‘आप ने मेरी बात रख ली, मेरा मान रखा, इस के लिए किन शब्दों में आभार व्यक्त करूं?’’

रमा सोचने लगी, ‘यह आदमी है या मिसरी की डली, कितनी गजब की चाशनी है इस के शब्दों में. कितने भी तीखे डंक वाली मधुमक्खी क्यों न हो, इस डली पर मंडराने ही लगे.’ एक दिन उमेशजी ने कहा था, ‘कंपनी में बहुत से लोग आएगए, पर राहुल जैसा होनहार व्यक्ति पहले नहीं आया.’

‘लेकिन राहुल आप की डांटफटकार से बहुत परेशान रहता है. उसे हर वक्त डर रहता है कि कहीं आप उसे कंपनी से निकाल न दें,’ रमा मुसकराई थी.

‘तुम्हें पता ही है, अगर ऐसा न करें तो ये नौजवान लड़के हमारे लिए अपनी जान क्यों लड़ाएंगे?’ उमेशजी हंसने लगे थे.

‘‘राहुल, एक सूचना दूं तुम्हें?’’ एक दिन अचानक रमा राहुल की आंखों में झांकती हुई मुसकराने लगी तो राहुल जैसे निहाल ही हो गया था.

‘‘अगर आप ने ये शब्द मुसकराते हुए न कहे होते तो मेरी जान ही निकल जाती. मैं समझ लेता, साहब ने मुझे कंपनी से निकाल देने का फैसला कर लिया है और मेरी नौकरी खत्म हो गई है.’’

‘‘आप उमेशजी से इतने आतंकित क्यों रहते हैं? वे तो बहुत कुशल मैनेजर हैं. व्यक्ति की कीमत जानते हैं. आदमी की गहरी परख है उन्हें और वे आप को बहुत पसंद करते हैं.’’

‘‘क्यों सुबहसुबह मेरा मजाक बना रही हैं,’’ वह हंसा, ‘‘उमेशजी और मुझे पसंद करें? कहीं कैक्टस में भी हरे पत्ते आते हैं. उस में तो चारों तरफ सिर्फ तीखे कांटे ही होते हैं, चुभने के लिए.’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है,’’ वह बोली, ‘‘वे तुम्हें बहुत पसंद करते हैं.’’

‘‘उन्हें छोडि़ए, रमाजी, अपने को तो अगर आप भी थोड़ा सा पसंद करें तो जिंदगी में बहुतकुछ जैसे पा जाऊं,’’ उस ने पूछा, ‘‘क्या सूचना थी?’’

‘‘हमारे ऊपर वाला वह छोटा कमरा आप को मिलना तय हो गया है. 500 रुपए किराया होगा, मंजूर…?’’ रमा ने कहा तो राहुल ने अति उत्साह में आ कर उस का हाथ ही पकड़ लिया, ‘‘बहुतबहुत…’’ कहताकहता वह रुक गया.

उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो तुरंत हाथ छोड़ दिया, ‘‘क्षमा करें, रमाजी, मैं सचमुच कमरे को ले कर इतना परेशान था कि आप अंदाजा नहीं लगा सकतीं. कंपनी के काम के बाद मैं अपना सारा समय कमरा खोजने में लगा देता था. आप ने…आप समझ नहीं सकतीं, मेरी कितनी बड़ी मदद की है. इस के लिए किन शब्दों में…’’

‘‘कल से आ जाना,’’ रमा ने झेंपते हुए कहा.

किसीकिसी आदमी की छुअन में इतनी बिजली होती है कि सारा शरीर, शरीर का रोमरोम झनझना उठता है. रगरग में न जाने क्या बहने लगता है कि अपनेआप को समेट पाना असंभव हो जाता है. पति की छुअन में भी पहले रमा को ऐसा ही प्रतीत होता था, परंतु धीरेधीरे सबकुछ बासी पड़ गया था, बल्कि अब तो पति की हर छुअन उसे एक जबरदस्ती, एक अत्याचार प्रतीत होती थी. हर रात उसे लगता था कि वह एक बलात्कार से गुजर रही है. वह जैसे विनोद को पति होने के कारण झेलती थी. उस का मन उस के साथ अब नहीं रहता था. यह क्या हो गया है, वह खुद समझ नहीं पा रही थी.

मां से अपने मन की यह गुत्थी कही थी तो वे हंसने लगीं, ‘पहले बच्चे के बाद ऐसा होने लगता है. कोई खास बात नहीं. औरत बंट जाती है, अपने आदमी में और अपने बच्चे में. शुरू में वह बच्चे से अधिक जुड़ जाती है, इसलिए पति से कटने लगती है. कुछ समय बाद सब ठीक हो जाएगा.’

‘पर यह राहुल…? इस की छुअन…?’ रमा अपने कक्ष में बैठी देर तक झनझनाहट महसूस करती रही.

राहुल ऊपर के कमरे में क्या आया, रमा को लगा, जैसे उस के आसपास पूरा वसंत ही महकने लगा है. वह खुशबूभरे झोंके की तरह हर वक्त उस के बदन से जैसे अनदेखे लिपटता रहता.

वह सोई विनोद के संग होती और उसे लगता रहता, राहुल उस के संग है और न जाने उसे क्या हो जाता कि विनोद पर ही वह अतिरिक्त प्यार उड़ेल बैठती.

नींद से विनोद जाग कर उसे बांहों में भर लेता, ‘‘क्या बात है मेरी जान, आज बहुत प्यार उमड़ रहा है…’’

वह विनोद को कुछ कहने न देती. उसे बेतहाशा चूमती चली जाती, पागलों की तरह, जैसे वह उस का पति न हो, राहुल हो और वह उस में समा जाना चाहती हो.

अब वह मन ही मन राहुल से बोलती, बतियाती रहती, जैसे वह हर वक्त उस के भीतरबाहर रह रहा हो. उस के रोमरोम में बसा हुआ हो. वह अब जो भी रसोई में पकाती, उसे लगता राहुल के लिए पका रही है, वह खाती या विनोद को खिलाती तो उसे लगता रहता, राहुल को खिला रही है. वह अपने सामने बैठे पति को अपलक ताकती रहती, जैसे उस के पीछे राहुल को निहार रही हो.

वह स्नानघर में वस्त्र उतार कर नहा रही होती तो उसे लगता रहता, राहुल उस के पोरपोर को अपनी नरम उंगलियों से छू और सहला रहा है और वह पानी की तरह ही बहने लगती.

राहुल के लिए ऊपर छत पर कोई स्नानघर नहीं था. नीचे सीढि़यां उतर कर इमारत के कर्मचारियों के लिए एक साझा स्नानघर था, जिस में उसे नहाने की अनुमति थी. वह किसी महकते साबुन से नहा कर जब सीढि़यां चढ़ता हुआ उस के फ्लैट के सामने से गुजरता तो अनायास ही वह जंगले में आ कर खड़ी हो जाती. देर तक उस के साबुन की सुगंध हवा के साथ वह अपने भीतर फेफड़ों में महसूस करती रहती. आदमी में भी कितनी महक होती है. आदमी की आदम महक और वह उस महक की दीवानी…उस में मदहोश, गाफिल.

वह जानबूझ कर विनोद के सामने कभी गलती से भी राहुल का जिक्र न करती थी. कमरे में आ जाने के बावजूद कभी उस ने विनोद के सामने उस से बात करने का प्रयास नहीं किया था. न उसे कभी चाय या खाने पर ही बुलाया था.

परंतु क्या सचमुच ऐसा था, इतना सहज और सरल? या संख्याएं और गणितीय रेखाएं आपस में उलझ गई थीं, गड्डमड्ड हो गई थीं?

उस ने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि वह विनोद के अलावा भी किसी अन्य पुरुष की कामना करेगी कि उस के भीतर कोई दूसरा भी कभी इस तरह रचबस जाएगा कि वह पूरी तरह अपनेआप पर से काबू खो बैठेगी.

‘‘राहुल, तुम मेरा भला चाहते हो या बुरा…?’’ एक दिन उस की चार्टर्ड बस नहीं आई थी तो उसे राहुल के साथ ही सामान्य बस से दफ्तर जाना पड़ रहा था. वे दोनों उस समय बस स्टौप पर खड़े थे.

‘‘तुम ने कैसे सोच लिया कि मैं कभी तुम्हारा बुरा भी चाह सकता हूं? अपने मन से ही पूछ लेतीं. मेरे बजाय तुम्हारा मन ही सच बता देता,’’ राहुल सीधे उस की आंखों में झांक रहा था.

‘‘तुम मेरी खातिर ऊपर का कमरा ही नहीं, बल्कि यह नौकरी भी छोड़ कर कहीं चले जाओ. सच राहुल, मैं अब…’’

‘‘अगर तुम मेरे बिना रह सकती हो तो कहो, मैं दुनिया ही छोड़ दूं. मैं तुम्हारे बिना जीवित रहने की अब कल्पना नहीं करना चाहता,’’ उस ने कहा तो रमा की पलकों पर नमी तिर आई.

‘‘किसी भी दिन मेरा पागलपन विनोद पर उजागर हो जाएगा. और उस दिन की कल्पनामात्र से ही मैं कांप उठती हूं.’’

‘‘सच बताना, मेरे बिना अब जी सकती हो तुम?’’

चुप रह गई रमा.

बस आई तो राहुल उस में चढ़ गया. उस ने हाथ पकड़ कर रमा को भी चढ़ाना चाहा तो वह बोली, ‘‘तुम जाओ, मैं आज औफिस नहीं जाऊंगी,’’ कह कर वापस घर आ गई.

मां ने उस की हालत देखी तो पहले तो कुछ नहीं कहा, पर जब वह अपने शयनकक्ष में बिस्तर पर तकिए में मुंह गड़ाए सिसकती रही तो न जाने कब मां उस के पलंग पर आ बैठीं, ‘‘अपनेआप को संभालो, बेटी. यह सब ठीक नहीं है. मैं समझ रही हूं, तू कहां और क्यों परेशान है. मैं आज ही राहुल से चुपचाप कह दूंगी कि वह यहां से नौकरी छोड़ कर चला जाए. इस तरह कमजोर पड़ना अच्छा नहीं होता, बेटी. तेरा अपना घरपरिवार है. संभाल अपनेआप को.’’

रमा न जाने क्यों देर तक एक नन्ही बच्ची की तरह मां की गोद में समाई फफकती रही, जैसे कोई उस का बहुत प्रिय खिलौना उस से छीनने की कोशिश कर रहा हो. Romantic Story In Hindi

Social Story : दाखिले का चक्रव्यूह – कशिश की गंदी चालों में वरुण कैसे फंसा ?

Social Story : ‘‘मे आई कम इन, सर?’’, मेहता कोचिंग सैंटर के दरवाजे पर खड़े वरुण ने झिझकते हुए पूछा.

‘‘यस, कम इन’’, राजीव मेहता सर की कोचिंग खासी प्रसिद्ध थी. यहां से कोचिंग करना मतलब प्रबंधन के प्रमुख संस्थानों में दाखिला पक्का. यहां दाखिला मिलना आसान नहीं था, जिन छात्रों के 12वीं में 90 प्रतिशत से ऊपर अंक आते, उन्हें ही यहां कोचिंग हेतु बुलाया जाता. फिर बाकायदा साक्षात्कार होता. केवल छात्र का ही नहीं, बल्कि उस के अभिभावकों का भी साक्षात्कार लिया जाता.

कोचिंग की आवश्यकता वैसे तो पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थियों को पड़ती है किंतु कोचिंग का व्यवसाय कुछ ऐसा है कि अच्छा नाम कमाने हेतु उन्हें आवश्यकता पड़ती है मेधावी छात्रों की. साथ ही कोचिंग को बखूबी चलाने के लिए पैसा चाहिए, इसलिए ऐसे विद्यार्थी भी चाहिए जो संस्थान को भारी फीस दे सकें. भारत में जनता इतनी है कि हर जगह सीटों की कमी पड़ जाती है. लंबी कतारों में खड़े लोग अपने बच्चों का दाखिला करवाने को लालायित रहते हैं. इसीलिए कोचिंग में दाखिला मिलने पर ऐसी प्रसन्नता होती है मानो आगे की शिक्षा मुफ्त हो.

राजीव सर की कोचिंग की भारी फीस भरनी हर किसी के बूते की बात कहां थी. जब वरुण का नाम काउंसिलिंग के लिए आया तो उस का पूरा परिवार बहुत खुश हुआ. वह भी खुश था कि अब उस का दाखिला एक अच्छे प्रबंधन संस्थान में हो सकेगा.

वरुण पढ़ाई में बहुत मेधावी नहीं था. परिश्रम से ही वह अपने वर्तमान स्थान तक पहुंचा था. इस कोचिंग सैंटर में दाखिले के बाद भी वरुण ने परिश्रम करने की ठानी थी. दाखिले की फीस का इंतजाम पापा ने अपनी पीएफ स्कीम से उधार ले कर किया था और बाद की फीस हेतु वरुण के नाम पर छात्र लोन के लिए अर्जी भी दे दी थी. कोचिंग का समय शाम से ले कर रात तक का होता था. यहां पढ़ाने के लिए बाहर से शिक्षक आया करते थे. धीरेधीरे पता चला कि दिन में ये शिक्षक अन्य प्रबंधन संस्थान में पढ़ाया करते थे, तभी इन्हें वहां की तत्कालीन शिक्षा प्रणाली का अनुमान रहता. ये उसी हिसाब से कोचिंग में भी पढ़ाया करते.

राजीव सर और उन की पत्नी कशिश कोचिंग संस्थान को चलाया करते थे. जैसे एक व्यापारी पौलीक्लीनिक खोल कर उस में अच्छे डाक्टरों को घंटे के हिसाब से पैसे दे कर बुलाता है, बस, कुछ वैसा ही हिसाब यहां था. खैर, बच्चों को तो अपने भविष्य से मतलब था, यदि वह सुनहरा दिख रहा है तो किसी को कोई आपत्ति नहीं थी.

राजीव सर की पत्नी कशिश भी कोचिंग में पूरी भागीदारी निभाती थीं. ‘‘यदि कुछ समझ में न आए तो मेरे पास आना, कभी भी, शरमाना मत. मैं तुम्हारे सारे डाउट क्लीयर कर दूंगी, ओके?’’ नए बैच का ओरिएंटेशन पूरा होने पर कशिश मैम के आश्वासन पर पूरी कक्षा ने तालियां बजा दी.

फिर सत्र आरंभ हो गया और पूरे जोरशोर से पढ़ाई शुरू हो गई. राजीव सर अकसर अपने केबिन में ही सारा दिन बिताते, जबकि कशिश मैम सारे कोचिंग इंस्टिट्यूट का चक्कर लगातीं, शायद, यहीं से कोचिंग क्लास के अंदर चल रही बातों की टोह लिया करती होंगी. अच्छे प्रबंधक के सारे गुण झलकते थे उन में. वरुण उन से काफी प्रभावित रहता और वे भी वरुण को देख मुसकरातीं.

दूसरा सत्र पूरा होने के साथ कोचिंग का आधा कार्यकाल पूर्ण हो चुका था. अगले सत्र के बाद कुछ चुनिंदा छात्रों हेतु छात्रवृत्ति की घोषणा भी होनी थी. यह छात्रवृत्ति 50 से ले कर 90 फीसदी की फीस माफी की हुआ करती थी, ऐसा सब ने सुन रखा था. हर छात्र इस छात्रवृत्ति की ओर ललचाई नजरें रख रहा था. वरुण को इस छात्रवृत्ति की सख्त जरूरत थी. ‘कितना अच्छा हो जो यह मुझे मिल जाए, पापा का काफी लोन भी चुक जाएगा,’ वह सोचने लगा था क्योंकि अब तक की फीस उस के पापा छात्र लोन के जरिए ही चुका पा रहे थे जो उन्होंने वरुण के नाम पर लिया था.

उस शाम, कक्षा समाप्त होने के बाद सभी छात्र अपने घरों की ओर निकलने लगे. तभी वहां कशिश मैम टहलती हुई आईं और बोलीं, ‘‘वरुण, जरा मेरे केबिन में आना.’’

वरुण को आश्चर्य हो रहा था कि उसे कशिश मैम ने क्यों बुलाया है. रात के

9 बज रहे थे, कोचिंग सैंटर लगभग खाली हो चुका था. पहली बार वह उन के केबिन में गया. क्या आलीशान केबिन था. एक तरफ कशिश मैम की मेजकुरसी सजी थी तो दूसरी ओर एक बड़ा सा सोफासैट रखा था. दीवारों पर सुंदर पेंटिंग टंगी हुई थीं. कमरे के 2 विपरीत कोनों में हलकी रोशनी वाले बल्ब जल रहे थे. सुर्ख लाल परदों के कारण कमरे में हलकी लाल रोशनी छिटक रही थी.

‘‘आओ वरुण, मेरे पास चले आओ,’’ कशिश मैम की आवाज आज कितनी मधुर व कामुक प्रतीत हुई, ‘‘हां, दरवाजे की चिटकनी बंद करते आना.’’

‘‘जी मैम, कहिए, क्या कर सकता हूं मैं?’’, वरुण हाथ बांधे एक अच्छे छात्र की भांति खड़ा हो गया.

‘‘बहुत कुछ कर सकते हो तुम, पर आज नहीं. आज सिर्फ मुझे करने दो,’’ कहते हुए कशिश मैम उस के एकदम करीब आ कर खड़ी हो गईं. उन की सांस अपने कानों से टकराने से वरुण अचकचा कर थोड़ा दूर हो गया. ‘‘डरो मत. आज यहां और कोई नहीं है. बस, मैं और तुम.’’ कशिश मैम ने वरुण का हाथ पकड़ कर उसे अपने पास सोफे पर बैठा लिया. ‘‘देखो वरुण, मुझे तुम बहुत अच्छे लगते हो, और शायद तुम्हें मैं. मैं ने देखा है तुम्हें अपनी ओर देखते हुए’’, कहते हुए जैसे ही कशिश मैम ने वरुण के बालों में अपनी उंगलियां फिरानी आरंभ कीं, वह घबरा गया, ‘‘नहीं मैम, ऐसी कोई बात नहीं है, बिलकुल नहीं.’’

‘‘अरे, इतना क्यों घबरा रहे हो, डियर? माना कि मैं तुम से उम्र में थोड़ी बड़ी हूं पर मैं किसी कमसिन लड़की से कहीं अधिक सुख दे सकती हूं तुम्हें, और फिर छात्रवृत्ति के बारे में भी तो सुना होगा तुम ने? मैं ने सुना है तुम्हारे पापा ने पीएफ से उधार लिया है और अब तुम एजुकेशन लोन पर पढ़ रहे हो. जरा सोचो,

90 फीसदी छात्रवृत्ति मिलने पर कितना फायदा हो जाएगा तुम्हें.’’

वरुण सोच में डूब गया और कशिश मैम जैसा चाहती थीं वैसा करती रहीं. न चाहते हुए भी वरुण ने कोई प्रतिरोध नहीं किया. फिर तो यह क्रम बन गया. जब कशिश मैम का दिल करता, वे वरुण को बुला लेतीं. जब कोचिंग सैंटर खाली हो जाता, अपने कमरे में कशिश मैम वरुण के साथ मनचाहा करतीं और वरुण चुपचाप सब सह जाता. उस समय उसे केवल अपने पिता की आर्थिक मजबूरी व अपना सुनहरा भविष्य दिखाई देता.

छात्रवृत्ति घोषणा का समय आया. राजीव सर ने हर अध्यापक से उन के छात्रों की सिफारिशी सूची मंगवाई. पूरी कमेटी बैठाई गई. 50 फीसदी छात्रवृत्ति हेतु 10 विद्यार्थियों के नाम सुझाए गए, 60 फीसदी और 70 फीसदी के लिए 3 विद्यार्थी और 90 फीसदी हेतु केवल एक विद्यार्थी का नाम चुनना था. जब पूरी सूची तैयार हो गई, तब मैम ने राजीव सर से खास कह कर वरुण का नाम 90 फीसदी के लिए सुझा दिया, ‘‘लड़का बहुत मेहनती है और मेधावी भी, मैं ने खुद उसे कितनी बार परखा है.’’

घोषणा के बाद वरुण बहुत प्रसन्न हुआ. जिस लालच में उस ने अपना सर्वस्व लुटाया, आखिर वह उसे मिल गया. इस खबर से वरुण पूरे सैंटर में मशहूर हुआ सो अलग. सैंटर की छात्रा नेहा भी अब उस की ओर देख मुसकुराने लगी थी. वरुण को तो नेहा प्रथम दिन से ही आकर्षक लगी थी. वरुण के एक बुद्धिमान विद्यार्थी स्थापित होने के बाद नेहा ने उस से दोस्ती कर ली. उसे विश्वास होने लगा था कि वरुण एक सफल भविष्य बनाएगा.

एक शाम कक्षा समाप्त होने के बाद कुछ लड़कों ने वरुण के ऊपर टिप्पणी की, ‘‘क्या बात है वरुण, कशिश मैम तुम्हें अकेले में क्यों बुलाती हैं, यार?’’

वरुण कुछ उत्तर दे पाता, इस से पहले ही नेहा बोल पड़ी, ‘‘वह इसलिए क्योंकि मैम को वरुण अपने बेटे की याद दिलाता है, उस का नाम है अरुण. दोनों नाम इतने मिलतेजुलते हैं न, तो उन्हें वरुण पर भी प्यार आता है.’’

बाद में वरुण ने नेहा से पूछा, ‘‘आज जो तुम ने कह कर उन लड़कों का मुंह बंद कर दिया, तुम्हें कैसे पता कशिश मैम के बेटे का नाम अरुण है?’’

‘‘वह इसलिए जनाब, क्योंकि राजीव सर और कशिश मैम मेरे मामामामी हैं और अरुण मेरा ममेरा भाई है जो लंदन में पढ़ता है. दरअसल, मैं ने भी इस बात पर गौर किया कि मामी तुम्हें कई बार बुलवाती हैं तो मैं ने उन से कारण पूछा और यह बात उन्होंने स्वयं मुझे बताई. कितनी स्वीट हैं न, मामी’’, नेहा की बात से वरुण भौचक्का रह गया. नेहा, मैम की रिश्तेदार निकली. अब वह कैसे अपने मन की बात उस से कहे? वह तो सोच रहा था कि नेहा की सहायता से मैम के चंगुल से निकलने का प्रयास करेगा. वरुण उदास हो गया.

एक शाम अपनी मनमरजी कर चुकने के बाद कशिश मैम कहने लगीं, ‘‘वरुण, तुम मंजोतिया कालेज में दाखिला चाहते हो न? हमारे यहां जो अनिरुद्ध सर आते हैं, वे वहीं पढ़ाते हैं. मैं ने उन से मंजोतिया कालेज की प्रवेश परीक्षा में आने वाले पेपर मंगवाए हैं, तुम्हें दिखा दूंगी.’’

वरुण सकते में आ गया, ‘‘कैसे मैम? अनिरुद्ध सर दाखिले के पेपर कैसे और क्यों लाएंगे?’’

‘‘तुम क्या सोचते हो कि हमें दिन में पढ़ाने के लिए अच्छे शिक्षक नहीं मिल सकते?’’, हंसते हुए मैम बोलीं, ‘‘हम देर शाम की कोचिंग इसलिए रखते हैं ताकि अच्छे प्रबंधन कालेजों में पढ़ाने वाले शिक्षक हमारे यहां भी पढ़ा सकें. वैसे, निजी प्रबंधन कालेजों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को बहुधा एक नौकरी के साथ दूसरी नौकरी करने की अनुमति नहीं होती है. ऐसा वे चोरीछिपे करते हैं. उन्हें दोगुना वेतन मिल जाता है और हमें अच्छे प्रबंधन कालेजों में दाखिले हेतु प्रश्नपत्र भी. यही शिक्षक हमें वहां से निकलवा कर देते हैं.

‘‘फिर जब हमारे यहां के विद्यार्थी उन्हीं कालेजों में दाखिले के लिए समूह परिचर्चा व साक्षात्कार में भाग लेते हैं, तो यही शिक्षक उन के ऐसे समूह बनवाते हैं, जो उन के मित्र शिक्षक को जंचे ताकि इन का चुनाव आसानी से हो जाए. तभी तो हमारा नाम होता है कि इस कोचिंग सैंटर में पढ़ने से विद्यार्थी अच्छी जगह दाखिला पा लेते हैं. कुछ समझे इस सारे गणित को?’’

वरुण हतप्रभ रह गया. दाखिले के चक्रव्यूह में इतने भेद. खैर, वरुण को इस सब से क्या मतलब. वह तो अपना उल्लू सीधा करने के चक्कर में था, अन्य सभी की भांति.

वरुण को 90 फीसदी वजीफा भी मिल चुका था और अपने मनमाफिक कालेज में दाखिला भी. अब उसे कशिश मैम के चक्रव्यूह में फंसने की क्या आवश्यकता थी भला. सो, इस बार जब कशिश मैम ने उसे बुला भेजा, वह नहीं गया. बल्कि इस बार वह राजीव सर के पास जा पहुंचा और कशिश मैम की सारी पोलपट्टी खोल कर रख दी. सुनते ही राजीव सर आगबबूला हो उठे, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई बकवास करने की? जानते भी हो क्या बक रहे हो?’’

‘‘सर, मैं सच कह रहा हूं. आप अपनी पत्नी से स्वयं पूछ लीजिए.’’

‘‘अब तुम मुझे बताओगे मुझे क्या करना है? निकल जाओ इसी वक्त मेरे कमरे से,’’ कहते हुए राजीव सर ने वरुण को निकाल दिया. वरुण अपने घर लौट गया. लेकिन जो आग उस ने लगाई थी, उस की चिंगारियां अभी भी सुलग रही थीं. राजीव सर ने फौरन कशिश मैम को बुलवा भेजा, और फिर सारी बात उन से पूछ डाली. सारी बात खुलने पर कशिश मैम सकपका गईं. उन्हें जरा भी उम्मीद नहीं थी कि बात यों उघड़ जाएगी. उन का रोरो कर बुरा हाल था, ‘‘आप अपनी पत्नी की बात का विश्वास करेंगे, या एक अनजान लड़के का? वह लड़का कोरा झूठ बोल रहा है. बल्कि उस की मुझ पर बुरी नजर रही है. वह हमेशा मुझे घूरता रहता है. आप ही कहते हैं न कि मेरे जैसा बदन कम ही औरतों का होता है. अब यदि मैं इतनी सुंदर हूं तो क्या इस में भी मेरी गलती है?’’

‘‘उसे हमारे व्यवसाय के अंदर की बातें कैसे पता? उसे कैसे पता कि हम अन्य प्रबंधन कालेज के शिक्षकों से दाखिले के पेपर मंगवाते हैं, हम समूहपरिचर्चा व साक्षात्कार में अपने विद्यार्थियों को कैसे आगे करवाते हैं, जवाब दो’’, राजीव सर अब भी क्रोध में उबल रहे थे.

‘‘मुझे नहीं पता कि उसे ये सब बातें कैसे पता. मैं उसे बेहद शरीफ और नेकनीयत विद्यार्थी समझती थी. याद है मैं ने आप से कह कर उसे 90 फीसदी वजीफा भी दिलवाया था. और वह मुझे ही बेकार में बदनाम कर रहा है. हो सकता है कि वह किसी अन्य कोचिंग सैंटर से पैसे खा रहा हो और हमारे यहां फूट डालने का प्रयास कर रहा हो या फिर उस को हमारे अंदर की बातें कहीं से पता चल गई हैं और वह हमें ब्लैकमेल करना चाह रहा हो…वह पहले हम दोनों में लड़ाई करवाएगा और फिर जब आप अकेले पड़ जाएंगे तब आप को ब्लैकमेल करने लगेगा.’’

फिर कुछ सोच कर कशिश मैम आगे कहने लगीं, ‘‘और हां, यदि आप को अब भी मेरी बात का विश्वास नहीं तो नेहा या किसी अन्य विद्यार्थी से पूछ लीजिए कि मेरे और उस लड़के के क्या संबंध हैं.’’ उन का यह पैंतरा काम कर गया. नेहा का नाम सुन कर राजीव सर शांत हो गए और उसे बुला भेजा.

‘‘जी हां, मामाजी, मामी वरुण को इसलिए पसंद करती हैं क्योंकि उस का नाम अरुण से मेल खाता  है. वे उसे बच्चे की तरह प्यार करती हैं. क्यों, क्या बात है?’’

‘‘कुछ नहीं, नेहा बेटे. अब तुम जाओ.’’ नेहा की बातें सुन कर राजीव सर संभल गए.

अब आगे क्या करना है, इस विषय को ले कर वे गंभीर विचारों में पड़ गए.

दोनों मियांबीवी ने मिल कर यह निर्णय  लिया कि वे वरुण को अनुशासनात्मक कार्यवाही के तहत अपने कोचिंग सैंटर से निकाल देंगे. यदि उस ने ज्यादा होहल्ला किया तो 90 फीसदी वजीफे की रकम के अलावा जो फीस के पैसे उस ने भरे हैं, वह उसे लौटा देंगे लेकिन उसे अपने यहां का विद्यार्थी नहीं दर्शाएंगे.

2 दिनों के बाद राजीव सर ने वरुण को अपने कक्ष में बुलवाया और अनुशासनात्मक कार्यवाही का हवाला देते हुए उसे निष्कासनपत्र थमा दिया.

‘‘यह क्या सर, आप मेरी गलती न होते हुए भी मुझे सजा दे रहे हैं? और कशिश मैम जिन के कारण…’’ वरुण आगे कुछ कहता इस से पहले ही राजीव सर दहाड़ पड़े, ‘‘नाम मत लो मिसेज राजीव का अपनी गंदी जबान से. चुपचाप यह चिट्ठी पकड़ो और निकल जाओ इस सैंटर से. तुम्हारे जैसे लड़कों के लिए यहां कोई जगह नहीं है. याद रखना, अगर तुम ने कोई बवाल खड़ा करने की कोशिश की तो मैं अनुशासनात्मक समिति बिठा कर भी यही कार्य कर सकता हूं. और उस स्थिति में तुम्हें तुम्हारी फीस भी नहीं लौटाई जाएगी. अभी कम से कम मैं तुम्हारी फीस लौटा रहा हूं. चुपचाप फीस लो और दफा हो जाओ यहां से.’’

वरुण के 2 वर्ष बरबाद हुए सो अलग, मनपसंद प्रबंधन संस्थान में हुआ उस का दाखिला भी रद्द हो गया क्योंकि इस सैंटर ने उस प्रबंधन संस्थान को वरुण का गलत चरित्र प्रमाणपत्र भिजवा दिया. वरुण को कशिश मैम से उठाए लाभ की महंगी कीमत यों चुकानी पड़ी. काश, उस ने अपने सुनहरे भविष्य के सपने की खातिर उस समय सही फैसला किया होता तो आज उसे न तो इस तरह लांछित होना पड़ता और न ही उस की प्रगति की राह में यों रोड़े अटकते. अब वह नए सिरे से कैरियर बनाने की कोशिश कर रहा है पर बीचबीच में उसे कशिश मैम की याद आ ही जाती है. अब तो नेहा ने भी उस से सभी संबंध तोड़ लिए हैं और कोई नई लड़की भी उसे घास नहीं डाल रही. यहां कोचिंग सैंटर में सभी स्वार्थी हैं, प्रतिद्वंद्वी हैं, कोई दोस्त नहीं, कोई साथ देने वाला नहीं. Social Story

Family Story In Hindi : खिलौना – क्यों रीना अपने ही घर में अनजान थी?

Family Story In Hindi : पलक बहुत ही खोईखोई सी घर के एक कोने में बैठी थी. न जाने क्यों उसे यह घर बहुत अजनबी सा लगता था. बिजनौर में सबकुछ कितना अपनाअपना सा था. सबकुछ जानापहचाना, कितने मस्त दिन थे वे… पासपड़ोस में घंटों खेलती थी और बड़ी मम्मी कितने प्यार से पकवान बनाती थीं. स्कूल में हमेशा प्रथम आती थी वह. वादविवाद प्रतियोगिता हो या गायन, पलक हमेशा ही अव्वल आती.

रविवार का दिन तो जैसे एक त्यौहार होता था। पासपड़ोस के अंकलआंटी आते थे और फिर घर की छत पर मूंगफली और रेवड़ी की बैठक होती थी. बड़े पापा, मम्मी अपने बचपन के किस्से सुनाते थे. पलक घंटों अपनी सहेलियों के साथ बैठ कर उन पलों में सारा बचपन जी लेती थी.

पूरा दिन 24 घंटों में ही बंटा हुआ था। यहां की तरह नही था कि कुछ पलों में ही खत्म हो जाता है।

तभी ऋषभ भैया अंदर आए और बोले,”पलक, तुम यहां क्यों एक कोने में बैठी रहती हो? क्या प्रौब्लम है।”

ऋषभ भैया अनवरत बोले जा रहे थे,”यह दिल्ली है, बिजनौर नहीं। यह क्या अजीब किस्म की जींस और ढीली कुरती पहन रखी हैं…पता है कल मेरे दोस्त तुम्हें देख कर कितना हंस रहे थे।”

पलक को समझ नहीं आ रहा था, जो कपड़े बिजनौर में मौडर्न कहलाते थे वे यहां पर बेकार कहलाते हैं. पलक सोच रही थी कि बड़ी मम्मी, पापा ने तो उसे दिल्ली में पढ़ने के लिए भेजा था पर यहां के स्कूल में तो लगता है पढ़ाई के अलावा सारे काम होते हैं. सब लोग धड़ाधड़ इंग्लिश बोलते हैं, कैसीकैसी गालियां देते हैं कि उस के कान लाल हो जाते हैं।

वैसे इंग्लिश तो पलक की भी अच्छी थी पर न जाने क्यों दिल्ली में उसे बहुत झिझक होती है.

आज ऋषभ भैया और मम्मीपापा पलक को मौल ले कर गए थे, शौपिंग कराने के लिए। इतना बड़ा मौल पलक ने इस से पहले कभी नहीं देखा था.

जब पलक छोटी थी तो बारबार उस के दिमाग मे यही बात आती थी कि वह नानानानी के साथ क्यों रहती है?

पेरैंटटीचर मीटिंग में वह अपने नानानानी को ले कर नहीं जाना चाहती थी, क्योंकि सब की मम्मी इतनी सुंदर, जवान और नएनए स्टाइल के कपड़े पहनती हैं और उस की नानी खिचड़ी बाल और उलटीसीधी साड़ी पहन कर जाती थी.

एक बार उस ने अपनी नानी से पूछ ही लिया,”मैं अपने मम्मीपापा के साथ क्यों नही रहती हूँ?”

नानी हंसते हुए बोली थीं,”क्योंकि कुदरत ने तुम्हें अपने नानानानी के जीवन मे रंग भरने भेजा है.”

पलक को कुछ समझ नहीं आता था पर यह दुविधा उस के बालमन में हमेशा रहती थी. बस इस के अलावा उस की जिंदगी में सब कुछ परफैक्ट था.

जब कभी कभी पलक की मम्मी रीना दिल्ली से अपने बेटे ऋषभ के साथ आती थी तो पलक को बहुत बुरा लगता था. उन दिनों पलक की नानी कितनी अजनबी हो जाती थीं. सारा दिन वह रीना के चारों तरफ घूमती थीं. ऋषभ भैया उसे कितनी हेयदृष्टि से देखते थे.

पलक जब 11 साल की हुई तो उस के जन्मदिन पर उस की मम्मी ने उसे पूरी कहानी बताई कि पलक की बेहतर देखभाल के लिए ही वह नानानानी के पास रहती है और जल्द ही पलक को वे लोग दिल्ली ले जाएंगे.

कितनी खुश हुई थी पलक यह सुन कर कि जल्द ही वह अपने मम्मीपापा के साथ चली जाएगी.

उस बार जब छुट्टियों में रीना बिजनौर आई हुई थी तो पलक रीना को कर अपने स्कूल पेरैंटटीचर मीटिंग में ले कर गई. दोस्तों को उस ने बहुत शान से अपनी मम्मी से मिलवाया था.

रीना बहुत खुश हो कर पलक के साथ उस के स्कूल गई थी, क्योंकि अब वह अपनी बेटी को उस के बेहतर भविष्य के लिए दिल्ली ले कर जाना चाहती थी.

पलक का स्कूल देख कर रीना को धक्का लगा था, क्योंकि पलक का स्कूल छोटा और पुरानी तकनीक पर आधारित था.

आते ही रीना अपनी मां से बोली,”मम्मी, अब पलक को दिल्ली ले कर जाना ही होगा। इस छोटे शहर में पलक का ठीक से विकास नहीं हो पाएगा। इस के स्कूल में कुछ भी ठीक नही है।”

पलक की नानी रुआंसी हो कर बोलीं,”रीना, तुम भी तो इसी स्कूल में पढ़ी थीं और बेटा तुम तो पलक को इस दुनिया मे लाना ही नहीं चाहती थी। वह तो जब मैं ने सारी जिम्मेदारी उठाने की बात की थी तब तुम उसे जन्म देने के लिए तैयार हुई थी।”

रीना बेहद महत्त्वाकांक्षी युवती थी. जब उस का बेटा ऋषभ 3 वर्ष का ही हुआ था तब पलक के आने की आहट रीना को मिली थी। ऋषभ की जिम्मेदारी, नौकरी और घर की भागदौड़ में रीना थक कर चूर हो जाती थी. ऐसे में एक नई जिम्मेदारी के लिए वह तैयार नहीं थी. वैसे भी उन्हें बस एक ही बच्चा चाहिए था, ऐसे में पलक के लिए उन की जिंदगी में कोई जगह नहीं थी.

दिल्ली में आसानी से गर्भपात नहीं हो सकता था इसलिए रीना बिजनौर गर्भपात कराने आयी थी. पर रीना के मम्मीपापा अपने अकेलेपन से ऊब चुके थे. बेटा विदेश में बस गया था. रीना को भी घरपरिवार और नौकरी के कारण यहां आने की फुरसत नहीं थी. इसलिए रीना के मम्मीपापा, जानकीजी और कृष्णकांतजी को ऐसा लगा जैसे यह कुदरत की इच्छा हो और यह बच्चा उन के पास आना चाह रहा हो…

कितनी मुश्किल से जानकी ने रीना को मनाया था। पूरे समय वे रीना के साथ बनी रही थीं ताकि उसे किसी बात की तकलीफ न हो.

पलक के जन्म के 2 माह बाद जानकी पलक को ले कर बिजनौर आ गई थी. रीना किसी
भी कीमत पर पलक की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती थी, इसलिए उस ने पलक को अपना दूध भी नहीं पिलाया था.

मां का दूध न मिलने के कारण पहले 2 साल तक पलक बेहद बीमार रही. जानकी और कृष्णकांतजी का एक पैर घर और दूसरा हौस्पिटल में रहता.

पासपड़ोस वाले कहते भी,”आराम के वक्त इस उम्र में यह क्या झंझाल मोल ले लिया है…” पर जानकी की जिंदगी को एक मकसद मिल गया था. उन की दुनियाभर की बीमारियां एकाएक गायब हो गई थीं.

सारा दिन कैसे बीत जाता था जानकी को पता भी नहीं लगता था। पलक के साथ जानकी ने बहुत मेहनत की थी. 4 वर्ष की होतेहोते पलक एकदम जापानी गुड़िया सी लगने लगी थी.

अब जब भी छुट्टियों में रीना घर जाती तो पलक की बालसुलभ हरकतें और उस का भोलापन देख कर उस की सोई हुई ममता जाग उठती थी. पर रीना किस मुंह से अपनी मां से यह कहती, क्योंकि वह तो पलक को इस दुनिया में लाना ही नहीं चाहती थी और न उस की कोई जिम्मेदारी उठाना चाहती थी। इसलिए कितनेकितने दिनों तक वह अपने मम्मीपापा के पास बिजनौर फोन भी नहीं करती थी.

धीरेधीरे समय बीतता गया और ऋषभ भी अब किशोरवस्था में पहुंच गया था. ऋषभ अब अपनी ही दुनिया में व्यस्त रहता.

जब रीना ने अपने पति पराग से इस बात का जिक्र किया तो उस ने भी रीना को झिड़क दिया,”तुम कितनी खुदगर्ज हो रीना, अब पलक बड़ी हो गई है और ऋषभ की तरफ से तुम फ्री हो तो तुम्हें पलक याद आने लगी है और तुम्हें यह एहसास होने लगा है कि तुम पलक की मम्मी हो?

“याद है तुम्हें जब वह 7 महीने की थी और बेहद बीमार थी, तुम्हारी मम्मी ने तुम से आने के लिए कहा था पर तुम औफिस के काम का हवाला दे अमेरिका चली गई थी.

“हर वर्ष जब हम छुट्टियों में घूमने जाते थे तो मैं कितना कहता था कि पलक को भी साथ ले लेते हैं पर तुम हमेशा कतराती थीं क्योंकि तुम 2 बच्चों की जिम्मेदारी एकसाथ नहीं उठा सकती थीं…”

रीना चुपचाप बैठी रही और पलक को अपने घर लाने के लिए मंथन करती रही.

समय बीतता गया और रीना हर संभव कोशिश करती रही अपनी मम्मी को यह जताने की कि उन का पालनपोषण करने का तरीका पुराना है.

वह यह जताना चाहती थी कि पलक की बेहतर परवरिश के लिए उसे दिल्ली भेज देना चाहिए.

आज रीना को पलक के स्कूल जाने से यह मौका मिल भी गया. पलक 12 वर्ष की हो चुकी थी। रीना अपनी बेटी को अपने जैसा ही स्मार्ट बनाना चाहती थी. जब रीना की मम्मी ने अपनी बेटी की बात को अनसुना कर दिया तो रीना ने अपने पापा से बात की कि पलक की आगे की पढ़ाई के लिए उसे दिल्ली भेज देना चाहिए।

कृष्णकांतजी एक व्यवहारिक किस्म के इंसान थे। दिल से न चाहते हुए भी कृष्णकांतजी को पलक की भविष्य की खातिर रीना की बात माननी पड़ी.

पलक को जब पता चला कि वह अपने मम्मीपापा के साथ दिल्ली जा रही है तो वह बेहद खुश थी. पर जब सारा सामान पैक हो गया तो पलक एकाएक रोने लगी कि वह किसी भी कीमत पर नानानानी को छोड़ कर नहीं जाना चाहती…

उधर जानकीजी का घोंसला एक बार फिर से खाली हो गया था पर इस बार पंछी के उड़ने का दर्द अधिक
था. कृष्णकांतजी जितना जानकीजी को समझाते,”वह रीना की ही बेटी है और तुम्हे खुश होना चाहिए कि हमारी पलक बड़े और अच्छे स्कूल में पढ़ेगी पर जानकीजी को तो जैसे उस की दुनिया ही वीरान लगने लगी थी।

जानकीजी को पूरा विश्वास था कि पलक उन के बिना रह नहीं पाएगी. बेटी ने एक बार भी नहीं कहा था, इसलिए उन्हें खुद तो दिल्ली जाने की हिम्मत नही हुई थी पर पति कृष्णकांतजी की चिरौरी कर के घर के पुराने नौकर मातादीन को ढेर सारी मिठाईयों के साथ दिल्ली भेज दिया.

नई दुनिया, नए लोग और चमकदमक सभी को अच्छी लगती हैं और पलक तो फिर भी बच्ची ही थी. वह इस टीमटाम में अपने पुराने घर और साथियों को भूल गई थी. मातादीन को देख कर एक पल के लिए पलक की आंखों
में चमक तो आई पर नए रिश्तों के बीच फिर वह चमक भी धीमी पड़ गई थी.

मातादीन पलक को खुश देख कर उसे आशीष दे कर अगले दिन विदा हो गया था. मातादीन को विदा करते हुये रीना का स्वर कसैला हो उठा और
बोली,”काका, मम्मी को बोलिएगा, पलक की चिंता छोड़ दे, वह मेरी बेटी है, मैं अपनेआप संभाल लूँगी।”

दिल्ली आ कर मातादीन ने कहा,”बीबीजी, चिंता छोड़ दीजिए। पलक बिटिया नई दुनिया में रचबस गयी हैं।”

पर जानकीजी खुश होने के बजाए दुखी हो गई थीं और फिर से उन का शरीर बीमारियों का अड्डा बन गया था.

उधर 1 माह बीत गया था और पलक के ऊपर से चमकदमक की खुमारी उतर गई थी. अब पलक चाह कर भी अपनेआप को दिल्ली की भागतीदौड़ती जिंदगी में ठीक से ढाल नहीं पा रही थी.

स्कूल का माहौल उस के पुराने स्कूल से बिलकुल अलग था. घर आ कर पलक किस से अपने मन की बात कहे, उसे समझ ही नहीं आता था.

पलक बहुत कोशिश करती थी अपनेआप को ढालने की पर असफल ही रहती. नानानानी का जब भी बिजनौर से फोन आता तो पलक हर बार यही ही बोलती कि उसे दिल्ली में बहुत मजा आ रहा है. पलक
अपने नानानानी को परेशान नहीं करना चाहती थी.

पलक के मम्मीपापा सुबह निकल कर रात को ही आते थे. ऋषभ भैया अपने दोस्तों और दुनिया में व्यस्त रहते। पासपड़ोस न के बराबर था. यहां के बच्चे उसे बेहद अलग लगते थे।

जब पलक ने अपनी मम्मी से इस बारे में बात की तो 12 साल की बच्ची का अकेलपन दूर करने के लिए उस की मम्मी ने उसे समय देने के बजाए विभन्न प्रकार की हौबीज क्लासेज में डाल दिया।

पहले ही पलक स्कूल में ही ऐडजस्ट नहीं कर पा रही थी और अब गिटार क्लास, डांस क्लास, अबेकस क्लास
पलक को हौबी क्लासेज के बजाए स्ट्रैस क्लासेज लगती थी.

पलक की नन्हीं सी जान इतनी अधिक भागदौड़ और तनाव को झेल नहीं पाई थी. उस के हौंसले पस्त हो गए थे.

वार्षिक परीक्षाफल आ गया था और पलक 2 विषयो में फेल हो गई थी.

परीक्षाफल देखते ही रीना पलक पर आगबबूला हो उठी,”बेवकूफ लड़की, कितना कुछ कर रही हूं मैं तुम्हारे लिए… दिल्ली के सलीके सिखाने के लिए कितनी हौबी क्लासेज पर पैसे खर्च हो गए पर तुम तो रहोगी वही छोटे शहर की सिलबिल।”

पराग रीना को समझाने की कोशिश भी करता कि पलक और ऋषभ को एक तराज़ू पर ना तौले. पलक को थोड़ा समय दे, वह जैसे रहना चाहती है उसे रहने दे.

इतने तनाव का यह असर हुआ कि पलक को बहुत तेज बुखार हो गया था. पराग रात भर पलक के माथे पर गीली पट्टियां बदलता रहा था. रीना यह कह कर जल्दी सो गई कि अगले दिन औफिस में उस की जरूरी मीटिंग है.

रात भर बुखार में पलक तड़पती रही. अपनी बेटी को तड़पता देख कर पराग ने निर्णय ले लिया था.
पराग ने जानकीजी को फोन कर दिया और वे जल्दी ही शाम पलक के पास पहुंच गईं.

पराग ने खुद यह महसूस किया कि जानकीजी के आते ही पलक का बुझा हुआ चेहरा चमक उठा था.
जब रात को रीना औफिस से लौटी तो जानकीजी को देख कर वह सकपका गई.

रात में खाने की मेज पर बहुत दिनों बाद पलक ने मन से खाया और बोली,”नानी, यहां पर किसी को ढंग से खाना बनाना नहीं आता।”

रीना कट कर रह गई और बोली,”मम्मी, आप ने पलक की आदत खराब कर रखी है, हैल्थी फूड उसे पसंद ही नही हैं।”

जानकीजी कुछ न बोलीं बस पलक को दुलारती रहीं। 2 दिनों के अंदर ही पलक स्वस्थ हो कर चिड़िया की तरह चहकने लगी.

एक हफ्ते बाद जब जानकीजी अपना सामान बांधने लगीं तो पलक भी अपना बैग पैक करने लगी.

जानकीजी बोलीं,”पलक, तुम कहां जा रही हो?”

पलक बोली,”नानी, मैं आप के बिना नहीं रह सकती हूं, मुझे यहां नहीं पढ़ना।”

रीना चिल्लाने लगी,”मम्मी इसलिए मैं नहीं चाहती थी आप यहां आओ…

“आप ने उसे बिगाड़ दिया है, बिलकुल भी प्रतिस्पर्धा नही है पलक में, बिलकुल छुईमुई खिलौना बना कर छोड़ दिया है। मेरी बेटी इस दुनिया में कभी कुछ कर भी पाएगी या नहीं…”

जानकीजी इस से पहले कुछ बोलतीं कि तभी पराग बोल उठा,”खिलौना पलक को मम्मीजी ने बनाया है या तुम ने?”

“जब तुम्हारा मन था तुम पलक को बिजनौर छोड़ देती हो और जब मन करता है तब तुम सब की अनदेखी कर के पलक को दिल्ली ले कर आ जाती हो, बिना यह जाने कि इस में पलक की मरजी है या नहीं…”

रीना ने हलका सा विरोध किया और बोली,”मां हूं मैं उस की…”

पराग बोला,”हां तुम उस की मां हो और वह तुम्हारी बेटी है मगर कोई चाबी वाला खिलौना नहीं।”

रीना पराग पर कटाक्ष करते हुए बोली,”लगता है तुम बेटी की जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते हो, इसलिये यह सब बोल रहे हो।”

पराग रीना की बात सुन कर तिलमिला उठा क्योंकि उस में लेशमात्र भी सचाई नहीं थी।

इस से पहले पराग कुछ कहता, पलक ने धीरे से कहा,”मम्मी, मेरी खुशी मेरे अपने घर मे है, जो बिजनौर में है. यह भागदौड़, यह कंपीटिशन मेरे लिए नहीं हैं।”

इस से पहले कि रीना कुछ बोलती, जानकीजी बोलीं,”रीना, जो जहां का पौधा है वह वहीं पर पनपता है।”

रीना ने आगे कुछ नहीं कहा और चुपचाप अपने कमरे में चली गई. जाने से पहले पराग ने पलक को गले लगाते हुए कहा,”पलक जब भी तुम्हारा मन करे बिना एक पल सोचे चली आना और बेटा तुम्हारे 2 घर हैं एक बिजनौर में और दूसरा दिल्ली में।

“बेटा, कामयाबी कभी भी किसी जगह की मुहताज नहीं होती।”

पलक और जानकीजी को जाते हुए देख कर पराग सोच रहा था कि शायद खिलौने की चाबी अब खिलौने के पास ही है.

अब पराग अपनी बेटी की भविष्य को ले कर निश्चिंत हो गया था. Family Story In Hindi

Box Office : नहीं चली ‘मेट्रो इन दिनों’, फीका पड़ा अनुराग बसु का जादू

Box Office : फिल्म ‘मेट्रो इन दिनों’ बौक्स औफिस पर अपने पहले पार्ट ‘लाइफ इन मेट्रो’ जैसा कमाल नहीं दिखा पाई है. दर्शक फिल्म से कनेक्ट नहीं कर पाए.

2007 में अनुराग बसु ने एक फिल्म ‘लाइफ इन मेट्रो’’ बनाई थी, जिस में कोंकणा सेन शर्मा और इरफान खान जैसे कलाकार थे. इसे बौक्स औफिस पर अच्छी सफलता मिली थी. अब वही अनुराग बसु अपनी फिल्म ‘लाइफ इन मेट्रो’ का 18 साल बाद सिक्वअल ‘मेट्रो..इन दिनों’’ बनाई है, जिसे उन्होंने ‘स्प्रिचुअल रीमेक / आध्यात्मिक रीमेक का नाम दिया है, जबकि इस फिल्म में आध्यात्म का कहीं कोई नामोनिशान नहीं है.

जुलाई माह के पहले सप्ताह यानी कि 4 जुलाई को रिलीज हुई. इस फिल्म में नीना गुप्ता, कोंकणा सेन शर्मा, फातिमा सना शेख, सारा अली खान, अनुपम खेर, पंकज त्रिपाठी, अली फजल, आदित्य रौय कपूर और शाश्वत चटर्जी जैसे कलाकार हैं. लेकिन यह फिल्म उन की पिछली फिल्म ‘लाइफ इन मेट्रो’ के मुकाबले कहीं नहीं ठहरती.

यह फिल्म पूरी तरह से मुंबई के कोलाबा जैसे हाईफाई सोसायटी की ही कहानी लगती है. इस फिल्म में फिल्मकार ने इंसानी रिश्तों की बात करने के नाम पर सैक्स और हवस की ही बात की है. पूरी फिल्म में सैक्स की जगह अराजकता ही नजर आती है. फिल्म में एक दंपति की 12-13 साल की बेटी है, जो कि सैक्स को ले कर इतनी व्याकुल है कि वह अपनी मासी से पूछती है कि उसे लड़के को किस करना चाहिए या लड़की को किस करना चहिए? पूरी फिल्म में 4 अलगअलग शहरों, चार अलगअलग उम्र के दंपतियों की कहानी है. पर नवीनता कुछ भी नहीं है.

कहा जाता है कि अनुराग बसु ने इस फिल्म के लिए 250 दिन शूटिंग की. कई बार कई सीन रीशूट किए गए. और इस का बजट 150 करोड़ रूपए है. निर्माताओं का दावा है कि फिल्म ने पूरे सप्ताह भर में 32 करोड़ रूपए कमाए. जबकि सकनिल्क का दावा है कि फिल्म ने 24 करोड़ रूपए एकत्र किए. जबकि 150 करोड़ रूपए के बजट वाली फिल्म को ‘नो लौस नो प्राफिट’ के लिए तकरीबन 400 करोड़ रूपए कमाने चाहिए. इस तरह यह फिल्म पूरी तरह से डिजास्टर हो चुकी है. इतना ही नहीं लोग मान रहे हैं कि यह जो आंकड़े हैं वह भी फेक हैं. क्योंकि सिनेमा तो एकदम खाली पड़े रहे.

फिल्म के डिजास्टर होने की मूल वजह यह है कि दर्शक फिल्म के किरदारों और उन की हरकतों के सथ रिलेट नहीं कर पाता. फिल्म ‘मेट्रो इन दिनों’ में एक दंपति मुंबई का मोंटी (पंकज त्रिपाठी ) और काजोल (कोकणा सेन शर्मा ) हैं, इन की दो टीनएजर बेटियां हैं. पर दोनों की जिंदगी में सकून नहीं है. दोनों नाम बदल कर डेटिंग ऐप पर चैट करते हैं. काजोल, माया बन कर अपने पति को रोमांस के लिए होटल बुलाती है, जहां वह अपनी सहेली की मदद से नंगा कर पूरे फाइव स्टोर होटल व सड़क पर निवस्त्र दौड़ाती है. फिर गोवा ले जाती है, जहां वह अपनी उम्र से भी आधी उम्र के युवक के साथ रोमांस करती है और होटल के एक कमरे में अपने प्रेमी संग अय्याशी करती है.

अपनी पत्नी की यह सारी हरकतें बेचारा मोंटी देखता रहता है. क्या भारत में इस तरह की आधुनिक पत्नियां हैं? बौलीवुड में लोग कह रहे हैं कि क्या अनुराग बसु ने अपनी आप बीती फिल्म में दिखाई है. अनुराग बसु भी शादीशुदा हैं और उन की भी दो टीनऐजर बेटियां हैं. फिल्म में सारा अली खान का किरदार सैक्स को ले कर पूरी तरह से कन्फ्यूज्ड है. वैसे भी सारा अली खान व आदित्य राय कपूर की अब तक एक भी फिल्म को सफलता नसीब नहीं हुई.

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