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Cloud Burst Incidents : खतरे के बादल

Cloud Burst Incidents : विगत वर्षों में बादल फटने की घटनाएं अकसर हो रही हैं. इस से जान व माल की हानि हो रही है. बादलों का प्रैशर बढ़ने से वे फट जाते हैं और वेग के साथ मलवा, पत्थर और विशाल शिलाएं अपने साथ ले कर आते हैं. मगर इन प्राकृतिक घटनाओं से बचा जा सकता है जो इंसानी लापरवाहियों के चलते हो नहीं पा रहा.

मैं उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में रहती हूं. गढ़वाल क्षेत्र में भी मेरा नियमित तौर पर भ्रमण रहता है क्योंकि मैं एक घुमक्कड़ हूं. घुमक्कड़ी मेरा महज शौक नहीं बल्कि अपने आसपास के भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवेश के बारे में जानकारी हासिल करने का खास माध्यम भी है. बरसात में, जिसे स्थानीय भाषा में हम चौमास भी कहते हैं, पानी बरसना स्वाभाविक है लेकिन इस की निकासी का उचित प्रयास प्रशासन को ही करना होगा.

एक समय था जब आबादी कम थी तो किसी न किसी तरह पानी की निकासी हो जाती थी लेकिन आज, 2021 के आंकड़ों के अनुसार, हल्द्वानी की जनसंख्या 6,56,000 दर्ज है जो बीते 5 वर्षों में और बड़ी होगी. पहाड़ी क्षेत्र से जितना भी पलायन हुआ है, इस का सब से अधिक भार हल्द्वानी शहर पर ही पड़ा है. आज से लगभग 25-30 वर्षों पहले यह शहर रहने लायक नहीं माना जाता था. यह भाबर का इलाका है, जहां गरमी और मच्छर की वजह से परिस्थितियां प्रतिकूल थीं. धीरेधीरे जनसंख्या का घनत्व बढ़ा और शहर फैलता गया. महानगरों वाली संस्कृति धीरेधीरे यहां भी दिखाई दे रही है. बड़ेबड़े मौल हैं. और्डर करते ही 10 मिनट में पहुंच जाने वाला ब्लिंकिट भी है. सुविधाओं में इजाफा हुआ है लेकिन जलभराव की समस्या काफी बढ़ गई है.

शहर के आसपास बहने वाले रकसिया, कलसिया और शेर नाला उफान पर होने की वजह से कई दुर्घटनाएं हो चुकी हैं. हल्द्वानी शहर में जल आपूर्ति करने वाली गोला नदी का जलस्तर बढ़ जाने से रेलवे के आसपास बनी असंख्य झुग्गीझोंपड़ियां खतरे में आ जाती हैं. सब से बड़ी गलती उन्हें यहां पर बसने की इजाजत देना और फिर उन के पुनर्वास की व्यवस्था न करना है. सामान्य दिनों में ही हल्द्वानी से महज 25-30 किलोमीटर दूर भीमताल तक पहुंचने में अकसर बहुत ज्यादा समय लग जाता है. बरसात में तो हाल और भी बुरा रहता है. अपने पुराने शहर नैनीताल और अल्मोड़ा जाने के लिए मुझे कई बार सोचना पड़ता है. कैंचीधाम की बढ़ती लोकप्रियता की वजह से आगे जाने वाले लोगों के लिए भी बहुत मुश्किल हो गई है.

भीमताल, भवानी, मुक्तेश्वर, रामगढ़ इस के आसपास के पर्वतीय स्थल हैं जहां सालभर पर्यटकों की भरमार रहती है. इस जरूरत को पूरा करने के लिए वहां पर कई सारे गैस्टहाउस बने हैं. रिजौर्ट्स और एयरबीएनबी वैबसाइट के माध्यम से बुक होने वाले अनेक पर्यटक आवास बने हैं. छोटेछोटे भवन तो ज्यादा परेशानी पैदा नहीं करते लेकिन बड़ेबड़े रिजौर्ट्स के निर्माण के लिए पहाड़ियों के साथ छेड़छाड़ करनी पड़ती है जिस से वे कमजोर पड़ रही हैं. चूंकि ये संपत्तियां पूंजीपति लोगों की होती हैं इसलिए इन पर किसी तरह की कार्यवाही भी नहीं होती. पैसों के लेनदेन से ही सारा मामला सैट हो जाता है. जूनजुलाई के महीनों में मुक्तेश्वर-रामगढ़ नाम से प्रसिद्ध फलपट्टी देखने लायक होती है. सेव, नाशपाती, प्लम, आडू और खुबानी से लकदक पेड़ देख कर मन झूम जाता है. इसी इरादे से उधर की तरफ रुख करो तो कंक्रीट के जंगल दिखाई देते हैं.

कुछ स्थानीय लोग हैं जो अपने खेतों को बचाए हुए हैं लेकिन अधिकतर लोग अपनी जमीन बेच कर हल्द्वानी या दिल्ली जैसे शहरों में बस गए हैं. और लहलहाती जमीन अब बंजर हो गई है. इतने सारे रिजौर्ट और होटल के लिए पानी की आपूर्ति संभव नहीं है, इसलिए सभी जगह भालू गाढ़ नामक वाटरफौल से टैंकरों से पानी की सप्लाई होती है. पर्यटकों को लुभाने के लिए इन होटल को हिंदी, इंग्लिश, कुमाऊनी, जापानी और चीनी नाम दिए गए हैं.

शायद पहाड़ों में स्वास्थ्य और शिक्षा की बेहतर व्यवस्था होती तो लोग अपने घर और अपने खेतों को बेच कर बड़े शहरों का रुख न करते. प्रशासन की बेरुखी और खुद बड़े शहरों में रहने की उन की चाहत ने पहाड़ों को दुखों के समंदर में डुबो दिया है.

नैनीताल की मौल रोड तो काफी सालों से धंस रही है, बीते वर्षों में हल्द्वानी-नैनीताल राष्ट्रीय राजमार्ग के धंसने की भी खबरें आई थी. भवाली-अल्मोड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग में क्वारब के पास लंबे समय से लगातार मलबा और बोल्डर आने से यह रास्ता अकसर बंद हो जाता है और यात्रियों को रानीखेत के रास्ते अल्मोड़ा पहुंचना पड़ता है. इस से समय और पैसे दोनों की हानि होती है. खैरना के पास सुयाल बाड़ी में सड़क धंसने से वहां पर स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय की लगभग एक दशक पहले बनी बिल्डिंग को भी खतरा बना हुआ है.

राजस्थान के झालावाड़ में छत गिरने से 8 बच्चों की मौत के बाद प्रशासन और संवाददाताओं ने भी आंखें खोलीं और स्कूलों का जायजा लिया. पता चला कि बहुत सारे स्कूल जर्जर अवस्था में चल रहे हैं जो बरसात में कभी भी ढह सकते हैं.

हल्द्वानी से लोग नौकरी के लिए आसपास के शहरों में अप-डाउन करते हैं बिलकुल जैसे दिल्ली और एनसीआर में. अभी हाल ही में मूसलाधार बारिश के कारण हल्द्वानी के पास ही स्थित बल्दिया खान-फतेहपुर मार्ग में ऐसे ही यात्रियों की कार आगे और पीछे दोनों तरफ सड़क धंसने के कारण फंस गई. बहुत कोशिश करने के बाद भी जब ये 5-6 लोग कार को निकालने में कामयाब नहीं हुए तो इन्होंने एक समाचारपत्र के कर्मचारियों को फोन किया.

उन्हीं के शब्दों में, “सर, प्लीज हमें बचा लीजिए. आगे भी सड़क धंस गई है और पीछे भी. हमारी कार बढ़ नहीं रही है. सुनसान इलाका है. हमें कुछ समझ में नहीं आ रहा है.” संपादक के माध्यम से बात पुलिस तक पहुंची, तब इन यात्रियों को रेस्क्यू किया गया. समस्याएं बहुत सारी हैं, ये त्वरित समाधान मांगती हैं.

उत्तराखंड का अधिकतर पहाड़ी भाग चाहे वह कुमाऊं का हो या गढ़वाल का, बहुत ही सुंदर और मनमोहक है. 9 नवंबर, 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग हो कर जब इस नए राज्य की स्थापना हुई तो इस का मूल उद्देश्य पहाड़ी क्षेत्र का समुचित विकास करना था. विकास की प्रक्रिया शुरू हुई लेकिन इतने अविकसित रूप में कि विकास विनाश का पर्याय बन गया. एक शांत सुंदर प्रदेश की जो परिकल्पना थी, वह अपराधों और प्राकृतिक आपदाओं का गढ़ बन कर रह गई. विकास ऐसा होना चाहिए जो विनाश से बचाए. पहाड़ की भौगोलिक स्थिति से अपरिचित लोग जब पहाड़ से संबंधित योजनाएं बनाएंगे तो यही होगा.

बीते 5 अगस्त, 2025 को आई भीषण आपदा इसी का परिणाम है जब खीर गंगा नदी के साथ 42 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से आए मलबे ने उत्तरकाशी के धराली क्षेत्र में भारी तबाही मचाई. मुखबा के सामने बसा गांव धराली धराशाई हो गया है. एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, आईटीबीटी, सेना सभी बचाव कार्य में लगे हुए हैं. राज्य में रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है. यात्रा सीजन चल रहा है. जोशीमठ, बद्रीनाथ यात्रा का मुख्य पड़ाव है. यह पहले से ही मकानों में दरार आने की घटना से संवेदनशील एरिया माना जा रहा है. अपनी जोशीमठ यात्रा के दौरान वहां पर स्थित काफी घरों में क्रौस के लाल निशान देखे थे. अब वर्तमान की इस घटना के बाद वहां भी लोगों से घर खाली करवाए जा रहे हैं. हरिद्वार, ऋषिकेश के घाट भी खाली करने के आदेश हुए हैं जो ऋषि गंगा आपदा की याद दिलाते हैं.

त्रासदियां हम ने पहले भी देखी हैं पर सबक नहीं लिया. घाटी में बसे गांव में अचानक मलबा आया. लोगों ने सीटी बजा कर सचेत किया पर ऐसी दुर्घटनाओं में संभलने का मौका नहीं मिल पाता. यह घटना 2013 की केदारनाथ त्रासदी की पुनरावृत्ति ही है. तीन स्थानों पर एकसाथ बादल फटने की घटना हुई है. पहाड़ से बह कर जब नदी नीचे उतर आती है तो उसे प्रवाह के लिए रास्ता चाहिए और जब उस के रास्ते पर हम कंक्रीट के जंगल खड़े कर देंगे तो कुपित हो कर अपने रास्ते में आए हुए हर व्यवधान को तहतनहस करती हुई वह आगे बढ़ जाती है. यह पानी का स्वभाव है.

कुमाऊं और गढ़वाल दोनों ही जगह भ्रमण के दौरान जगहजगह अवैध निर्माण ढांचे देखे जाते हैं. चूंकि अधिकतर नदियां गढ़वाल क्षेत्र से ही निकलती हैं सो तबाही भी पहले वहीं ज्यादा आती है. नदी का रास्ता अवरुद्ध कर वहां निर्माण करना आपदा का मुहाना तैयार कर बारबार विनाश को निमंत्रण देना है. चारधाम यात्रा, रेलवे और बिजली परियोजना की वजह से गढ़वाल क्षेत्र में अंधाधुंध दोहन हुआ है. कुमाऊं में भी यही ट्रैंड देखने को मिल रहा है. कुछ वर्षों पहले तक आदि कैलाश यात्रा पैदल की जाती थी पर अब पहाड़ों को काट कर सड़कमार्ग बन गया है. यात्रियों के ठहरने के लिए होटल, रिजौर्ट आदि बनाने की तैयारी है. ऐसे में विनाश तय है. आपदा की इस भयावहता को देख कर भी अगर नहीं संभले तो फिर पहाड़ों को कोई नहीं बचा सकता.

केदारनाथ आपदा के समय भी यही हुआ था. प्रशासन के आंकड़े कुछ और थे और असलियत कुछ और थी. कई सालों बाद तक भी रास्ते या इधरउधर मरे हुए लोगों के कंकाल मिलते रहे. पूरे पहाड़ी क्षेत्र में नदियों के किनारे कई होटल, रिजौर्ट और आवासीय परिसर अवैधानिक रूप से बनाए गए हैं. प्रशासन बेखबर है और न्यायालय भी इस बात का संज्ञान नहीं लेता.

विगत वर्षों में बादल फटने की घटनाएं अकसर हो रही हैं. बादलों का प्रैशर बढ़ने से वे फट जाते हैं और वेग के साथ मलबा, पत्थर और विशाल शिलाएं अपने साथ ले कर आते हैं.

हाल में हुई क्लाउड बर्स्ट की घटना के दौरान भी यही हुआ, वेग के साथ आता हुआ पानी पलभर में अपने रास्ते में आए मकानों को अपने साथ बहा ले गया. हर्षिल के पास स्थित सेना का कैंप भी ध्वस्त हो गया और एक हैलिपैड भी पूरी तरह से खत्म हो गया. हालांकि बद्रीनाथ मार्ग उत्तरकाशी में नहीं पड़ता, यह पौड़ी जिले में आता है पर इस बाढ़ का असर यहां तक भी हुआ है. भागीरथी का जलस्तर भी लगातार बढ़ रहा है और चमोली में मलारी के पास सड़क का 50-60 मीटर हिस्सा टूट कर गिर गया है और सड़क 2 भागों में बंट गई है जिस से आम जनता के साथसाथ सैनिक वाहनों को आनेजाने में भी दिक्कत होना स्वाभाविक है.

प्रशासन द्वारा प्रभावित लोगों को हर संभव मदद की बात हर आपदा के बाद की जाती है पर आपदा रोकने के सशक्त प्रयास नहीं किए जाने की वजह से दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहती है. हिमाचल प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों से तबाही का जो हाल हुआ है वह किसी से छिपा नहीं है पर हम ने उस से भी सबक नहीं लिया. अंधाधुंध निर्माण कार्यों में खुद को झोंक दिया.

कुछ साल पहले तक 6-7 दिनों तक लगातार बारिश होती थी जिसे क्षेत्रीय भाषा में सतझड़ लगना कहते थे. आज स्थिति बिलकुल भिन्न है. इस तरह की बारिश नहीं होती लेकिन अचानक जब होती है तो रौद्र रूप धारण कर लेती है. दो-तीन दिन की बारिश ही भारी तबाही का कारण बन रही है. मध्य हिमालय में काफी हलचल देखी जा रही है. ग्लेशियर पिघल कर टूट रहे हैं जो पर्यावरण की दृष्टि से चिंता का कारण है.

हिमालय क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए जनता जागरूकता भी जरूरी है. प्राकृतिक टोपोग्राफी का ध्यान रखना बहुत जरूरी है. पर्वतीय क्षेत्र के लिए अतिरिक्त बजट निर्धारित कर अनुकूल नीतियां बनाई जाना बहुत आवश्यक है. 2024 में भी 154 करोड रुपए का नुकसान और जानमाल की भारी हानि हुई थी. पिछले कई वर्षों से यह सिलसिला जारी है.

पहाड़ों और पेड़ों का अनियंत्रित कटाव इस क्षेत्र को कब्रिस्तान में बदलने में देर नहीं लगाएगा. सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों की अपेक्षा के कारण ही नए राज्य निर्माण का विचार आया था लेकिन यह दुखद है कि नीति नियंताओं ने सिर्फ देहरादून, हरिद्वार जैसे मैदानी क्षेत्रों की प्रगति पर ध्यान दिया लेकिन पहाड़ों में स्थित ग्रामीण क्षेत्रों को पूरी तरह से विसरा दिया. इन आपदाओं से बचने के उपाय और आपदा के बाद जानमाल की सुरक्षा के उपायों पर गंभीरता से विचार करना होगा. सिर्फ विकास का गीत गाना ही काफी नहीं है. यह तबाही मानव जनित है तो मानव को ही चेतना होगा. प्रकृति का रास्ता अवरुद्ध करोगे तो न वह शिकायत करेगी, न कोर्टकचहरी का रास्ता अपनाएगी, वह तो सीधे अपना रास्ता बनाएगी. Cloud Burst Incidents

Alimony : औरतों का गुजारा भत्ता मांगना भीख या अधिकार

Alimony : भारतीय समाज में शादी को बहुत ही पवित्र बंधन माना जाता है लेकिन यह पवित्र बंधन एकतरफा ही रहा है. कंस्टीट्यूशन के लागू होने से पहले तक मर्दों के लिए शादी के माने कुछ और थे और औरतों के लिए कुछ और. शादी एक पवित्र बंधन सिर्फ औरतें के लिए था. औरत अगर शादी से संतुष्ट न तो उस के पास इस पवित्र बंधन से आजाद होने का कोई विकल्प नहीं था लेकिन मर्द एक औरत के होते दूसरी व तीसरी ब्याह सकता था. पवित्रता के पाखंड में सिर्फ औरतें फंसती थीं, मर्द नहीं.

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के लागू होने के बाद, संवैधानिक पर तौर ही सही, औरत और मर्द बराबर हो गए. अब औरतें विवाह की पवित्रता के ढोंग को चुनौती दे सकती थीं और उस के बंधन से आजाद हो सकती थीं. हालांकि, 75 साल बाद आज भी संविधान की यह आजादी सामाजिक स्तर तक नहीं पहुंची है. ग्रामीण भारत की औरतें आज भी पतियों द्वारा छोड़ी जाती हैं और उन्हें पूछने वाला कोई नहीं होता लेकिन शहरी क्षेत्रों में हालात बदल रहे हैं.

पढ़ीलिखी औरतें अब शादी के पाखंड को झेलने को तैयार नहीं. यही कारण है कि भारत में हर साल तलाक के मामले बढ़ रहे हैं. आंकड़ों के अनुसार, 2023 में देशभर के फैमिली कोर्ट्स में लगभग 8.26 लाख मामलों का निबटारा हुआ था. इन में तलाक, सेपरेशन, एलिमनी, गुजारा भत्ता और बच्चे की कस्टडी जैसे मामले शामिल हैं. औसतन, हर दिन लगभग 2,265 मामले निबटाए गए. यह भी ध्यान देने योग्य है कि 2023 के अंत तक फैमिली कोर्ट्स में लगभग 11.5 लाख मामले पैंडिंग थे.

तलाक के बढ़ते मामलों के बीच कुछ ऐसे मामले भी आते रहते हैं जो कोर्ट के फैसले पर सोचने को मजबूर करते हैं. तलाक के केसेज में कोर्ट के कई मामले ऐतिहासिक बन जाते हैं तो कई मामलों में जजों कि पुरुषवादी मानसिकता उजागर हो जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक तलाक के मामले में फैसला सुनाया, जिस में वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान और सहायक अधिवक्ता प्रभजीत जौहर ने पति की ओर से दलीलें पेश की थीं. इस मामले में पत्नी ने अपने पति से 12 करोड़ रुपए और मुंबई में एक फ्लैट की मांग की थी. कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद तलाक को मंजूरी दी और पति को निर्देश दिया कि वह अपनी पूर्व पत्नी को मुंबई के ‘कल्पतरु’ हाउसिंग कौम्प्लेक्स में एक फ्लैट सौंपे.

माधवी दीवान ने कोर्ट में तर्क दिया कि पत्नी की मांगें नाजायज और कानूनी अधिकारों से परे हैं, क्योंकि वह पढ़ीलिखी और काम करने में सक्षम है. कोर्ट ने पति की इनकम और प्रौपर्टी की जांच की और माना कि पत्नी ससुर की संपत्ति पर अधिकार नहीं जता सकती. आखिरकार कोर्ट ने पत्नी को दो विकल्प दिए- या तो बिना किसी विवाद के फ्लैट स्वीकार करे, या 4 करोड़ रुपए की एकमुश्त राशि ले. पत्नी ने फ्लैट चुनने का फैसला किया. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 और धारा 25 (स्थायी गुजारा भत्ता और रखरखाव) पर आधारित है. इस धारा के तहत क्रूरता, परित्याग, व्यभिचार आदि को आधार बना कर तलाक की मांग की जा सकती है. इस मामले में, कोर्ट ने दोनों पक्षों की सहमति और वैवाहिक रिश्ते के टूटने की स्थिति (इर्रिवर्सिवल ब्रेकडाउन औफ मैरिज) को आधार बनाया. हालांकि, विशिष्ट आधार (जैसे क्रूरता या परित्याग) का उल्लेख सार्वजनिक जानकारी में नहीं होने के कारण सहमति से तलाक को मंजूरी दी गई, जो धारा 13(1)(आई-बी) या धारा 13-बी(पारस्परिक सहमति से तलाक) के तहत नियम है.

कोर्ट ने पत्नी की गुजारा भत्ता और संपत्ति की मांग को धारा 25 के तहत जांचा, जो तलाक के बाद जीवनसाथी को वित्तीय सहायता प्रदान करने की व्यवस्था करता है. इस धारा के तहत, कोर्ट को यह सुनिश्चित करना होता है कि गुजारा भत्ता निष्पक्ष और उचित हो, जिस में दोनों पक्षों की वित्तीय स्थिति, जीवनशैली, और आत्मनिर्भरता की क्षमता को ध्यान में रखा जाता है.

मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई और जस्टिस के वी विश्वनाथन की पीठ ने औरतों को सलाह देते हुए कहा कि “पत्नी को गरिमा के साथ जीने के लिए स्वयं कमाना चाहिए. आधुनिक युग में, विशेष रूप से पढ़ीलिखी और सक्षम महिलाओं को ‘भीख’ (अत्यधिक गुजारा भत्ता) पर निर्भर नहीं रहना चाहिए.” इस मामले पर कोर्ट ने बेशक निष्पक्षतापूर्वक फैसला सुनाया लेकिन फैसले के बाद जजों की उपरोक्त टिप्पणी से उन की मानसिकता भी स्पष्ट जाहिर हो गई. गुजारा भत्ता हासिल करना भीख कैसे है? अगर संविधान औरतों को गुजारा भत्ता हासिल करने को उन का अधिकार समझता है तो कोई जज औरतों के इस संवैधानिक अधिकार को ‘भीख’ की संज्ञा कैसे दे सकता है? क्या यह संविधान का मजाक नहीं है? इस में दो राय नहीं कि कई औरतें लालच में ज्यादा गुजारा भत्ता की मांग करती हैं लेकिन यह तय करना तो कोर्ट का काम है और कोर्ट ने इस मामले में औरत को उस का हक दिलवाया भी है. फिर, कोर्ट को इस तरह की अनर्गल टिप्पड़ी करने की क्या तुक है? कोर्ट की यह टिप्पणी संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध ही नहीं बल्कि तलाक के लिए कचहरी के चक्कर काट रही तमाम औरतों के सम्मान के खिलाफ भी है. Alimony

Family Story In Hindi : नामुराद गैजेट्स – अवि ने मम्मा से क्यों मांगा आईपैड ?

Family Story In Hindi : स्कूल से आते ही बेटा अवि मेरे गले से लटक गया और बोला, ‘‘माय मौम‘‘ और मुझे किस कर के कमरे में चला गया.

बेटा अवि 15 साल का हो गया था, लेकिन बिलकुल बच्चों की तरह लाड़ करता था. मेरे हाथ से खाना खाता था और खाते ही मेरी गोद में सो जाता था.

मैं उस पर खूब प्यार लुटाती और प्यार से धीरे से सिरहाने पर लिटा देती थी.  ऐसा रोज होता था.

मैं उसे रोजाना समझाती, ‘‘बड़े हो गए हो अब तुम. खुद खाना खाया करो.’’

‘‘कभी नहीं. आई लव माय फैमिली. मम्मा, मैं आप को देखे बिना नहीं रह सकता. हमेशा आप के हाथ से ही खाना खाऊंगा.‘‘

ऐसा कह कर वह जोरजोर से हंसने लगा.

एक दिन स्कूल से आ कर अवि बोला, ‘‘मम्मा, परसों मेरी बर्थडे पर मुझे आईपैड दिला दो. मेरे सब फ्रेंड्स के पास है.‘‘

‘‘बेटा दिला तो दूं, लेकिन तुम्हारी पढ़ाई? पापा नहीं मानेंगे.‘‘

‘‘पढ़ाई की चिंता मत करो मम्मा. वो मैं सब करूंगा और आप हां कर दो बस, पापा को तो मैं मना लूंगा.‘‘

बर्थडे वाले दिन सुबह सिरहाने के पास आईपैड का बौक्स देख कर अवि  खुशी से फूला न समाया और मुझे अपनी बांहों में उठा लिया.

‘‘पापामम्मा, यू बोथ आर अमेजिंग. आई लव यू. अपने सारे फ्रेंड्स को बताऊंगा कि मेरे पास भी अब अपना आईपैड है,‘‘ खुशी से उछलता हुआ अवि स्कूल चला गया.

मैं और मेरे पति रवि हम दोनों उसे खुश देख कर बहुत खुश थे.

स्कूल से आते ही अवि अपना आईपैड ले कर अपने कमरे में चला गया. खाना भी कमरे में ही मंगा लिया. अब ये सिलसिला रोज का ही हो गया था.

धीमेधीमे अपनी पढाई की जरूरत बता कर खरीदे गए या फ्रेंड्स की देखादेखी आईपैड के बाद अब मोबाइल, टैब और लैपटौप जैसे अनेकों गैजेट्स मिल कर ये ही उस की फैमिली हो गए थे.

हम दोनों से अब अवि कम ही बोलता था. मैं उसे बुलाबुला कर रह जाती थी. अब ज्यादा टोकने पर वह चिड़चिड़ा हो जाता था.

अचानक से उस की जिंदगी में हम दोनों की जगह अब उस की गैजेट फैमिली ही इंपोर्टेंट हो गई थी और मेरी ममता तड़प रही थी.

मैं सोच रही थी कि क्या इतनी पावर है इन गैजेट्स में कि बच्चों की जिंदगी में इन के सामने अपने मातापिता या परिवार की कोई अहमियत ही नहीं है. इन नामुराद गैजेट्स ने मुझ से मेरा बेटा छीन लिया.

सुबहसुबह रवि को औफिस भेज कर किचन के काम निबटाने लगी तभी मेरा मोबाइल बजा. मुझे प्राइवेट बैंक से नौकरी के लिए फोन आया था.

शाम को मैं ने रवि व बेटे अवि को बताया कि मैं यह नौकरी करना चाहती हूं, क्योंकि अवि भी अब बड़ा हो गया है और अपने गैजेट्स में ही बिजी रहता है और मैं भी सारा दिन बोर हो जाती हूं.

‘‘अवि, तुम मम्मा के बिना मैनेज कर लोगे, क्योंकि मम्मा को औफिस से आने में रात हो जाया करेगी,’’ रवि ने पूछा.

‘‘पापा, मैं थोड़ी देर आईपैड और मोबाइल फोन पर गेम खेल कर होमवर्क वगैरह कर लिया करूंगा. नो प्रोब्लम पापा.

‘‘हां… हां,  मम्मा आप ज्वाइन कर लो. कोई दिक्कत नहीं,‘‘ अवि ने खुशी से कहा.

‘‘तो ठीक है, मुझे भी कोई दिक्कत नहीं,‘‘ रवि ने कहा.

‘‘अच्छा बेटे, ये लो घर की चाबी और खाना बना कर रख दिया है. स्कूल से आ कर खा लेना,‘‘ अवि को घर की चाबियां दीं और मैं रवि के साथ ही औफिस के लिए निकल पड़ी और अवि चाबी ले स्कूल बस में चढ़ गया.

दोपहर को अवि ने ताला खोला और कमरे में जा कर बिस्तर पर पड़  गया और बिना कुछ खाएपिए ही उसे नींद आ गई.

दरवाजे पर घंटी बजने पर अचानक से नींद खुली और मुझे दरवाजे पर देख और घड़ी देख चिल्ला कर बोला, ‘‘मम्मी, मुझे तो एक जरूरी असाइनमेंट मेल करना था शाम 5 बजे तक. अब तो मुझे बहुत डांट पड़ेगी.’’ मेरी आंख लग गई और रोने लगा. रात के 8 बज रहे थे.

‘‘अच्छा चलो, पहले कपडे बदलो और खाना खा कर होमवर्क करो,’’ मैं ने प्यार से गले लगाते हुए कहा.

रोजाना ही औफिस से घर पहुंचते ही मुझे अवि किसी न किसी बात पर सुबकता हुआ ही मिलता. मैं ने नोटिस किया कि अब अवि मोबाइल और आईपैड पर कम ही टाइम बिता रहा था. एकदम चुपचाप सा हो गया था वह.

6 महीने हो चुके थे मुझे औफिस जाते हुए.
आज शनिवार था और हम तीनों की छुट्टी थी. मैं और रवि सुबह की चाय पी रहे थे, तभी अवि आया और बोला, ‘‘मम्मा, मैं सबकुछ खुद से मैनेज नहीं कर पा रहा. स्कूल से आ कर ताला खोलना, खुद से खाना लेना, कोरियर लेना वगैरह. मैं कुछ भी नहीं कर पाता और ऐसे ही रात के 8 बज जाते हैं. मैं आप को मिस करता हूं मम्मा,’’ कह कर वह मुझ से लिपट कर सुबकने लगा.

‘‘पर, जब मैं औफिस नहीं जाती थी और तुम्हारे साथ थी, तब भी तुम आईपैड, टैब, लैपटौप और मोबाइल में ही बिजी रहते थे. मेरे बुलाने पर भी नहीं आते थे तो अब क्यों तुम मुझे अपने पास चाहते हो बेटे ?‘‘ मैं ने कहा.

‘‘आप मुझ से सब वापस ले लो मम्मा. मुझे मम्मा चाहिए, आईपैड और मोबाइल नहीं. लेकिन, आप औफिस मत जाया करो प्लीज मम्मा. मैं आप के बिना नहीं रह सकता.

“मैं जब स्कूल से आता हूं तो आप घर पर ही मिला करो. मैं खाना भी खुद खाऊंगा. आप को तंग नहीं करूंगा. बस आप मेरे पास रहो प्लीज…प्लीज,‘‘ रोतेरोते वह मुझ से लिपट गया.

मैं ने और रवि ने उसे गले लगा लिया. अवि अपने कमरे में भाग कर गया और आईपैड, टैब, लैपटौप और मोबाइल ला कर रवि को वापस कर दिए.

अवि को गैजेट्स के चंगुल से बचाने के लिए मुझे अपनी नौकरी दांव पर लगानी पड़ी, पर रवि और मेरे लिए ये सौदा कतई महंगा नहीं था. Family Story In Hindi

Hindi Love Stories : जाना पहचाना – क्या था प्रतिभा के सासससुर का अतीत?

Hindi Love Stories : ‘उन की निगाहों में जाने कितने ही रंग समाए हैं….
पर हर रंग में मुझे अपना ही अक्स नजर आता है….’
अमर ने एकटक प्रतिभा को देखते हुए कहा तो वह हंस पड़ी.

“चलो आज तुम्हें अपने पैरंट्स से मिलवा दूं.” अमर ने प्रतिभा का हाथ थाम कर फिर से कहा. प्रतिभा खुशी से चीख पड़ी,
” सच”
उस के चेहरे पर शर्म की लाली बिखर गई.

माहौल में और भी रंग भरते हुए अमर ने कहा, “सोचता हूं लगे हाथ उन से हमारी शादी का दिन भी तय करवा लूं.”

प्रतिभा ने हौले से पलकें उठाते हुए कहा,” सीधे शब्दों में कहो न कि तुम मुझे प्रपोज कर रहे हो. इतने निराले अंदाज में तो कभी किसी ने प्रपोज नहीं किया होगा.”

प्रतिभा की बात सुन कर अमर हंस पड़ा फिर गंभीर होता हुआ बोला,” सच प्रतिभा बहुत प्यार करने लगा हूं तुम्हें और तुम से जुदा हो कर जीने की बात सोच भी नहीं सकता. इसलिए चाहता हूं जल्द से जल्द हमारे रिश्ते को घर वालों की भी स्वीकृति मिल जाए. ”

“जरूर मिल जाएगी स्वीकृति. तुम बताओ कब चलना है?”

“कल कैसा रहेगा? एक्चुअली कल सटरडे है. सुबह निकलेंगे तो शाम से पहले ही लखनऊ पहुंच जाएंगे. फिर संडे वापस दिल्ली.”

“वेरी गुड. मैं इंडियन ड्रैस पहन कर चलूंगी ताकि तुम्हारे पेरेंट्स को एक नजर में पसंद आ जाऊं. ” कह कर उस ने अपना सिर अमर के कंधों पर टिका दिया.

अमर और प्रतिभा एक ही ऑफिस में पिछले 4 सालों से साथ काम करते आ रहे हैं. प्रतिभा पटना की है और दिल्ली में पढ़ाई के साथ पार्टटाइम जॉब करती है. इधर अमर भी लखनऊ से अपने सपनों को पूरा करने दिल्ली आया हुआ है. दोनों इतने दिनों से साथ हैं. एकदूसरे को पसंद भी करते हैं. पर आज पहली दफा अमर ने साफ तौर पर प्रतिभा से दिल की बात कही थी. दोनों के दिल सुनहरे सपनों की दुनिया में खो गए थे.

अगले दिन सुबहसुबह ट्रेन थी. प्रतिभा ने एक सुंदर हल्के नीले रंग का फ्रॉकसूट पहना. उस पर गुलाबी रंग का काम किया हुआ दुपट्टा लिया. माथे पर नीले रंग की बिंदी लगाई. होठों पर हल्का गुलाबी लिपस्टिक लगा कर बालों को खुले छोड़ दिए. हाई हील्स पहन कर जब वह अमर के सामने आई तो वह आहें भरता हुआ बोला,” आज तो महताब जमीन पर उतर आया है…..  साथसाथ चलेगी रोशनी सारी रात …. ”

“मिस्टर शायर, आप कहें तो हम प्रस्थान करें?” मुसकुरा कर प्रतिभा ने कहा और दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़े आगे बढ़ गए.

पूरे रास्ते दोनों भावी जीवन के सपने देखते रहे. घर पहुंच कर अमर ने बेल बजाई तो प्रतिभा का दिल धड़क उठा. वह पहली बार अपनी भावी सासससुर से मिलने वाली थी. दरवाजा अमर की मां ने खोला. पीछे से उस के पिता भी आ गए. प्रतिभा ने जल्दी से दुपट्टा सिर पर रख कर सासससुर के पैर छूए और आशीर्वाद लिया. सास ने उसे गले से लगा लिया और प्यार से अंदर ले आई.

इधर प्रतिभा इस बात को ले कर चकित थी कि पहली बार मिलने के बावजूद उसे अमर के मातापिता का चेहरा जाना पहचाना सा लग रहा था. वह असमंजस की स्थिति में थी. थोड़ी देर की बातचीत के बाद आखिरकार उस ने अपने मन की बात बोल ही दी.

इस पर अमर के पिता एकदम हड़बड़ा से गए. मगर जल्द ही संभलते हुए बोले,” देखा होगा बेटी तुम ने कहीं आतेजाते.”

फिर बात बदलते हुए पूछने लगे,” तुम पटना में कहां रहती हो?”

जी कंकरबाग में. ”

जवाब दे कर प्रतिभा ने फिर सवाल किया,” पर अंकल आप दोनों तो लखनऊ में रहते हो और मैं दिल्ली में. आप कभी अमर से मिलने दिल्ली आए भी नहीं हो. फिर मैं ने आप दोनों को कहां देखा होगा?”

अमर की मां ने बात बात संभालने की कोशिश की और बोली,” बेटी एक जैसे चेहरे वाले भी बहुत से लोग होते हैं. वह सब छोड़ और यह बता कि तुझे पसंद क्या है वही बना देती हूं.”

प्रतिभा तुरंत उठ गई और बोली,” अरे आंटी आप बैठो मैं बनाती हूं न.”

इस के बाद प्रतिभा ने कोई सवाल नहीं किया. खातेपीते और बातें करते कब रात हो गई पता ही नहीं चला. सास ने प्रतिभा को अपने कमरे में सोने के लिए बुला लिया. प्रतिभा ने टेबल पर रखी तस्वीरें देखते हुए पूछा,” आंटी जी अपनी पुरानी तस्वीरें दिखाइए न और आप दोनों की शादी की तस्वीर भी.”

“अरे बेटी अब पुरानी तस्वीरें कौन निकाले. अंदर कहीं संदूक में पड़ी होगी और वैसे भी हम ने कोर्ट मैरिज की थी.”

“कोर्ट मैरिज, क्या बात है आंटी. उस जमाने में आप ने कोर्ट मैरिज कर ली.”

“अब चल सो जा प्रतिभा. पुरानी बातें याद करने से क्या फायदा?” कह कर सास करवट बदल कर सो गई. इधर प्रतिभा सोच में डूबी रही.

अगले दिन दोनों दिल्ली के लिए वापस रवाना हो गए. प्रतिभा के मन में अभी भी कुछ उलझनें थी मगर अमर बहुत खुश था. प्रतिभा को ले कर उस के मांबाप का रिस्पांस पॉजिटिव जो था. प्रतिभा ने अपने मन की बात अमर को नहीं बताई. वह उस की खुशी में कोई बाधा पहुंचाना जो नहीं चाहती थी.

दिल्ली पहुंच कर प्रतिभा ने नेट पर खोजखबर निकालने की कोशिश की. मगर कुछ पता नहीं चला. फिर उस ने अमर के मांबाप के साथ अपनी फोटो अपने पैरेंट्स को शेयर की और लिखा,” यह फोटो मेरे सब से अच्छे दोस्त के मम्मीपापा की है. उन से पहली बार मिलने के बावजूद उन का चेहरा जानापहचाना सा लगा. क्या आप इन्हें पहचानते हैं?

प्रतिभा के पिता ने जवाब दिया,”चेहरे पहचाने से लगते हैं पर याद नहीं आता कि कौन है.”

जवाब पढ़ कर प्रतिभा चुप रह गई. धीरेधीरे यह बात उस के दिलोदिमाग से उतरती गई.

कुछ दिन बाद गर्मी की छुट्टियों में प्रतिभा ने अपने घर पटना जाने की तैयारियां शुरू कर दी. पटना जाने को ले कर वह उत्साहित थी मगर अमर से बिछड़ने के अहसास से मन भारी भी हो रहा था. किसी तरह अमर से विदा ले कर वह ट्रेन में बैठ गई. सारे रास्ते वह अमर और अपने रिश्ते को ले कर सोचती रही. अब वह अमर के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी. पिछले कुछ दिनों में अमर उस के दिल के बहुत करीब आ गया था.

पटना जंक्शन पर उतरते ही उस का दिमाग दिल्ली के गलियारों को भूल कर पटना की सड़कों पर आ टिका. अपने घर के आगे रुकते ही पुराना समय आंखों के आगे नाचने लगा जब स्कूल में पढ़ने वाली प्रतिभा अपने घरआंगन को गुलजार रखती थी. वह मम्मीपापा की इकलौती लाडली बिटिया जो थी. दरवाजा खोलते ही मां ने उसे गले से लगा लिया.

अपने कमरे का दरवाजा खोलते ही पुरानी यादों के साये फिर से उस के मन को छूने लगे.  बैग एक कोने में पटक कर वह बिस्तर पर लुढ़क गई. 2 दिन प्रतिभा ने जम कर आराम किया और मम्मीपापा को अपनी नई जिंदगी से जुड़े किस्से सुनाए. तीसरे दिन वह थोड़ी एक्टिव हुई और घर की सफाई करने लगी. सफाई के दौरान उसे जाले लगी एक पुरानी तस्वीर दिखी. तस्वीर करीब 30 -35 साल पहले की थी जब उस के मम्मीपापा कॉलेज में थे. जाले पोंछ कर प्रतिभा ध्यान से तस्वीर देखने लगी कि अचानक उसे तस्वीर में अमर के पिता दिखाई दिए हालांकि वे काफी बदले हुए नजर आ रहे थे मगर वह उन का चेहरा एक नजर में ही पहचान गई थी.

बगल में ही उसे अमर की मां भी दिख गई. प्रतिभा को अब सारी बात समझ आने लगी थी कि क्यों उसे उन दोनों के चेहरे जानेपहचाने लग रहे थे. बचपन में उस ने कई बार वह फोटो बहुत ध्यान से देखी थी. पर उसे अब तक यह समझ नहीं आया था कि उस के मम्मीपापा ने अमर के पैरंट्स की फोटो पहचानी क्यों नहीं जबकि वे कॉलेज में साथ थे.

काफी देर तक प्रतिभा यही सब सोचती रही. तभी उसे सरला काकी का ख्याल आया. उस के परिवार के साथ उन का रिश्ता बहुत पुराना था. प्रतिभा ने अपने साथ वह तस्वीर भी ले ली. सरला आंटी का बेटा सुजय उस का बचपन का साथी था.

सरला काकी ने उसे देखते ही गले से लगा लिया. कुछ देर बैठने के बाद प्रतिभा ने वह तस्वीर निकाली और काकी को दिखाई. काकी तुरंत तस्वीर पहचान गई. तब प्रतिभा ने अमर के पैरंट्स की तस्वीर दिखाई जिस में वह भी थी. इस तस्वीर को देख कर काकी चौंकी और फिर बोलीं,” अरे तुम मुकुंद और सुधा से कब मिली? वे दोनों कैसे हैं बेटा?”

“आप जानती हैं इन्हें?”

“हां मेरी बच्ची. वे तस्वीर दिखा अपने पापा वाली. उस में भी तो वे दोनों खड़े हैं न.”

“पर मम्मीपापा ने तो इन्हें पहचाना नहीं.”

प्रतिभा की बात सुन कर काकी थोड़ी गंभीर हो गई फिर बोली,” कैसे पहचानेंगे? उस का घर जो जलाया था तेरे पापा ने.”

“घर जलाया था पर क्यों काकी?”

“क्योंकि उस वक्त तेरे पापा की बुद्धि मारी गई थी. सरपंच के इशारों पर चलते थे. सरपंच ने आदेश दिया था कि उन की बिरादरी का लड़का एक दलित लड़की से शादी नहीं कर सकता. सुधा दलित थी न. सरपंच ने लठैतों को भेजा उन का घर जलाने को. बस तेरे पापा भी निकल लिए साथ. यह भी नहीं सोचा कि अपने दोस्त का घर जलाने जा रहे हैैं. उस की आंख तो तब खुली जब उन का पुश्तैनी घर पूरी तरह जलाने के बाद सरपंच के लड़कों ने मुकुंद के बूढ़ेमां बाप को भी मार डाला. छोटी बहन को घर में जिंदा जला दिया. यह सब देख कर तेरे बाप की रूह कांप उठी और उस ने उसी दिन से सरपंच का साथ पूरी तरह छोड़ दिया. इधर मुकुंद और सुधा किसी तरह अपनी जान बचा कर कहीं भाग गए. वे कहां गए, उन के साथ क्या हुआ यह कोई नहीं जानता.”

प्रतिभा चुपचाप काकी से यह बीती कहानी सुनती रही. उस की आंखों के आगे अब सब कुछ स्पष्ट हो चुका था.

“क्या आप मुझे उन का जला हुआ घर दिखा सकती हो?”

“बेटा उन का पुश्तैनी घर तो सालों पहले खंडहर में तब्दील हो चुका है और आज तक खंडहर ही है. कोई नहीं जाता उधर. तू कहती है तो मैं सुजय को भेजती हूं तेरे साथ.”

प्रतिभा सुजय के साथ उस खंडहरनुमा घर को देखने पहुंची. टूटीजली इमारतें, खाली पड़े आधेअधूरे कमरे, दरकी हुई दीवारें, दम घोंटता वीरानापन, सब चीखचीख कर उस स्याह काली रात का दर्द बयां करते दिखे. प्रतिभा ने मोबाइल से तसवीरें खींचीं. एकएक जगह जा कर उस दर्द को महसूस किया. फिर अपने घर लौट आई.

दिल्ली आ कर वह अमर के पिता से मिली और भरी आंखों से उन्हें धन्यवाद कहा तो उन्होंने चौंकते हुए प्रतिभा की ओर देखा.

प्रतिभा ने कहा,” अंकल मैं पटना के कंकड़बाग में उसी मोहल्ले में रहती हूं जहां कभी आप दोनों भी…… इतनी मुसीबतें आने के बाद भी आप ने आंटी का साथ नहीं छोड़ा. अपने प्यार को निभाया. इतनी हिम्मत दिखाई. यू आर ग्रेट अंकल …. ”

उस की बातें सुन कर अमर के पिता की आँखें भर आई. वे समझ गए थे कि जो राज उन्होंने बेटे से भी छुपाया वह सब बहू जान चुकी है. अमर के पिता ने प्रतिभा के सर पर आशीर्वाद का हाथ रखा और फिर हौले से मुस्कुरा दिए.

प्रतिभा ने फैसला कर लिया था कि अब वह जल्द ही अमर से शादी कर लेगी मगर अपने पिता को इस शादी में नहीं बुलाएंगी. अमर से भी सच्चाई छिपा कर रखेगी. इस बीच मम्मी ने फोन पर बताया कि अगले सप्ताह पापा का कैटरैक्ट का ऑपरेशन होने वाला है.

यह सुन कर उस ने अमर से बात की और उसे कोर्ट मैरिज के लिए तैयार कर लिया. कुछ खास लोगों की उपस्थिति में कोर्ट मैरिज कर के आर्य समाजी तरीके से शादी करना तय हुआ. प्रतिभा ने जानबूझ कर शादी की तारीख 15 दिन बाद की रखवाई जब उस के पापा का ऑपरेशन हो चुका हो और उस की शादी में केवल उस की मम्मी ही आ सकें.

शादी वाले दिन प्रतिभा की मम्मी ने अमर की मम्मी को देखा तो खुद को रोक नहीं सकी और सुधा कह कर एकदम से उन के गले लग गई. 30 साल पुरानी सहेलियां जो मिली थी. अमर के पिता भी प्रतिभा की मम्मी को देख कर चकित थे. तीनों भीगी पलकों से पुराने दिन याद करने लगे.

नियत समय पर शादी भी हो गई. सारा कार्यक्रम अच्छी तरह निबट गया.

प्रतिभा की मम्मी अब घर लौटने वाली थी. ट्रेन में बैठने से पहले उन्होंने प्रतिभा को गले लगाया और रोती हुई बोली,” बेटा मैं समझ गई हूँ कि तूने ऐसा इंतजाम क्यों किया ताकि केवल मुझे ही शादी में बुलाना पड़े. देख बेटा तेरे पापा के हाथों तेरे सासससुर के साथ गलत हुआ था मैं यह मानती हूं. मगर उसी दिन से तेरे पापा बिल्कुल बदल भी गए और उन्हें अपने किए पर बहुत पछतावा भी है. मुझ से शादी होने के बाद उन्हें प्यार की गहराई का एहसास भी हो चुका है. जानती है मैं जब आ रही थी तो तेरे पापा ने क्या कहा था?”

“क्या कहा था मम्मी ?”

“उन्होंने कहा, ‘मुझे लग रहा है मेरी बच्ची मेरा पाप धोने वाली है. वह उसी दलित लड़की के बेटे से शादी करने वाली है जिन के परिवार को मेरी आंखों के आगे मार दिया गया और मैं ने कोई विरोध भी नहीं किया. मैं सालों से यह दर्द और पछतावा दिल में लिए जी रहा था. मेरी बच्ची उन से रिश्ता जोड़ कर मेरी जिंदगी का दर्द थोड़ा कम कर देगी.”

“सच मम्मी, पापा सब कुछ समझ गए?” प्रतिभा की आंखें भर आईं.

“हां बेटा और वे तुझ से बात कर के आशीर्वाद देने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहे थे. उन्हें लगता है कि तू उन्हें माफ नहीं कर पाएगी.”

“ऐसा नहीं है मम्मी. पापा को कहना हम जिंदगी की नई शुरुआत करेंगे.” कह कर उस ने मम्मी को गले से लगा लिया.

उस की आंखों में खुशी के आंसू थे. Hindi Love Stories

Romantic Story in Hindi : मैं यहीं रहूंगी

Romantic Story in Hindi : शादी के बाद सुरुचि ससुराल पहुंची. सारे कार्यक्रम खत्म होने के बाद 3-4 दिनों में सभी मेहमान एकएक कर के वापस चले गए. लेकिन, उस की ननद और उस के 2 बच्चे 2 दिनों के लिए रुक गए. उस के साससुसर ने तो बहुत पहले ही इस दुनिया से विदा ले ली थी, इसलिए उस की ननद ने, जितने दिन भी रहीं, सुरुचि को भरपूर प्यार दिया ताकि उस को सास की कमी न खले. भाई के विवाह की सारी जिम्मेदारी वे ही संभाल रही थीं. सुरुचि ने उन के सामने ही घर के कामों को सुचारु रूप से संभालना शुरू कर दिया था. उस ने अपने स्वभाव से उन का दिल जीत लिया था. ननद इस बात से संतुष्ट थीं कि उन के भाई को बहुत अच्छी जीवनसंगिनी मिली है. अब उन्हें भाई की चिंता करने की जरूरत नहीं है.

विदा लेते समय ननद ने सुरुचि को गले लगाते हुए कहा, ‘‘मेरा भाईर् दिल का बहुत अच्छा है, तुझे कभी कोई तकलीफ नहीं होने देगा, तू उस का ध्यान रखना और कभी भी मुझ से कोई सलाह लेनी हो तो संकोच नहीं करना. मैं आती रहूंगी, दिल्ली से सहारनपुर दूर ही कितना है.’’

‘‘दीदी, आप परेशान मत होइए, मैं इन का ध्यान रखूंगी,’’ सुरुचि ने झुक कर उन के पैर छुए. उस की ननद तो औटो में बैठ गई लेकिन बच्चे खड़े ही रहे. सुरुचि ने उन से कहा, ‘‘जाओ, ममा के साथ बैठो.’’

‘‘नहीं, अब तो तुम आ गई हो, इसलिए ये यहीं रहेंगे…’’ ननद आगे कुछ और कहतेकहते जैसे रुक सी गईं.

सुरुचि यह सुन कर अवाक रह गई. अभी विवाह को दिन ही कितने हुए हैं, इसलिए कोई भी सवाल करना उसे ठीक नहीं लगा. उन के जाने के बाद उस के दिमाग में सवालों ने उमड़ना शुरू कर दिया था, कहीं दीदी इसलिए तो मुझ पर इतना स्नेह नहीं उड़ेल रही थीं कि अपने बच्चों की जिम्मेदारी मुझ पर डाल कर आजाद होना चाह रही थीं. उन के छोटे से शहर में अच्छी पढ़ाई होती नहीं है, लेकिन एक बार मुझ से अपनी योजना के बारे में बता कर मेरी भी तो मरजी जाननी चाहिए थी. जल्दी से जल्दी अपने शक को दूर करने के लिए वह पति के औफिस से लौट कर आने का इंतजार करने लगी.

सुंदर के आते ही उस ने उसे चाय दी. उस के थोड़े रिलैक्स होते ही, यह सोच कर कि उसे यह न लगे कि उस की बहन के बच्चे रखने में उसे आपत्ति है, उस ने धीरे से पूछा, ‘‘दीदी के बच्चे यहीं रहेंगे क्या?’’

‘‘दीदी के नहीं, वे मेरे ही बच्चे हैं. पत्नी की मृत्यु के बाद दोनों बच्चों को अपने पास रख कर उन्होंने ही उन को पाला है. तुम्हें…’’

‘‘क्या तुम शादीशुदा हो? तुम ने हमें पहले क्यों नहीं बताया? हमें धोखा दिया…? अपने पति की बात पूरी होने से पहले ही वह लगभग चीखती हुई बोली. उसे लगा जैसे वह किसी साजिश की शिकार हुई है, इस स्थिति के लिए वह बिलकुल तैयार नहीं थी.

सुंदर भौचक सा थोड़ी देर तक उस की तरफ देखता रहा, फिर धीरे से बोला, ‘‘मैं ने तुम्हारे भाई से सबकुछ बता दिया था. उन्होंने तुम्हें नहीं बताया? मैं ने तुम्हें धोखा नहीं दिया. फिर भी तुम मेरी ओर से आजाद हो, कभी भी वापस जा सकती हो.’’

अब चौंकने की बारी उस की थी. ‘तो क्या, मेरे अपने भाई ने मुझे छला है.’ उस को लगा उस के माथे की नसें फट जाएंगी, उस ने दोनों हाथों से जोर से सिर पकड़ लिया और रोतेरोते, धम्म से जमीन पर बैठ गई. कहनेसुनने को अब बचा ही क्या था. उस के सारे सपने जैसे टूट कर बिखर गए थे. शरीर से जैसे किसी ने सारी शक्ति निचोड़ ली हो, वह किसी तरह वहां से उठ कर सोफे पर निढाल हो कर लेट गई.

सुरुचि के दिमाग में विचारों ने तांडव करना शुरू कर दिया था, अतीत की यादों की बदली घुमड़घुमड़ कर बरसने लगी. उस के पिता तो बहुत पहले ही चले गए थे, उस की मां ने ही उसे और उस के भाई को नौकरी कर के पढ़ायालिखाया. जब वह कालेज में पढ़ती थी, उस के भविष्य के सपने बुनने के दिन थे, तभी अचानक हार्टअटैक से मां की मृत्यु हो गई. भाई उस से 5 साल बड़ा था, इसलिए उस का विवाह मां के सामने ही हो गया था.

मां के जाने के बाद भाईभाभी का उस के प्रति व्यवहार बिलकुल बदल गया. वे उसे बोझ समझने लगे थे. गे्रजुएशन के बाद उस की पढ़ाई पर भी उन्होंने रोक लगा दी थी. भाभी भी औफिस जाती थी. सुरुचि सुबह से शाम घर के काम में जुटी रहती थी. उस के विवाह के लिए कई प्रस्ताव आए, लेकिन ‘अभी जल्दी क्या है’ कह कर भाईभाभी टाल दिया करते थे, मुफ्त की नौकरानी जो मिली हुईर् थी.

इसी बीच, उन के 2 बच्चे हो गए थे. जब पानी सिर से गुजरने लगा और रिश्तेदारों ने उन्हें टोकना शुरू कर दिया, तो उन्होंने उस की शादी के बारे में सोचना शुरू किया, जिस की परिणति इस रिश्ते से हुई. जिस उम्र की वह थी, उस में बिना खर्च के इस से अच्छा रिश्ता क्या हो सकता था. उस का मन भाईभाभी के लिए घृणा से भर उठा.

अचानक, सुंदर को सामने खड़े देख कर उस के विचारों को झटका लगा. सुंदर ने उस के पास बैठते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे साथ जो भी हुआ, बहुत बुरा हुआ. लेकिन दुखी होने से बीता वक्त वापस नहीं आएगा. अभी उठो और शांतमन से इस का हल सोचो. जो तुम चाहोगी, वही होगा. तब तक तुम मेरी मेहमान हो. तुम कहोगी तो मैं तुम्हारे भाई के पास छोड़ आऊंगा.’’

‘‘भाई के पास जा कर क्या होगा. यदि, उन्हें मेरी खुशी की परवा होती तो ऐसा करते ही क्यों. मुझे नहीं जाना उन के पास,’’ वह बुदबुदाईर् और आंखों के आंसू पोंछ कर घर के काम में लग गई.

अगले दिन सुबहसुबह उस की ननद का फोन आया. सुरुचि समझ गई कि कल की घटना के बारे में वे जान चुकी हैं, इसीलिए उन का फोन आया है. उधर से आवाज आई, ‘‘सुरुचि बेटा, हम ने तुम्हारे भाई से कुछ भी नहीं छिपाया था. फिर भी यदि तुम्हें बच्चों से समस्या है, तो वे पहले की तरह मेरे पास ही रहेंगे, लेकिन मेरे भाई को मत छोड़ना, बहुत सालों बाद उस के जीवन में तुम्हारे रूप में खुशी आई है. बड़ी मुश्किल से वह विवाह के लिए राजी हुआ था.’’ वे भरे गले से बोलीं.

‘‘जी,’’ इस के अलावा वह कुछ बोल ही नहीं पाई. इस से पहले कि सुरुचि कुछ फैसला ले कर उन्हें बताए, उन्होंने ही उस की सोच को दिशा दे दी थी.

उस ने नए सिरे से सोचना शुरू किया कि भाई के घर वापस जा कर वह फिर से उस नारकीय दलदल में फंसना नहीं चाहती और बिना किसी सहारे के अकेली लड़की की इस दुनिया में क्या दशा होती है, यह सब जानते हैं. यदि उस का विवाह किसी कुंआरे लड़के से होता, तो क्या गारंटी थी वह सुंदर की तरह उसे समझने वाला होता. उस की कोई गलती नहीं है, फिर भी वह उसे आजाद करने के लिए तैयार है. इतना प्यार करने वाली मां समान ननद, कहां सब को मिलती है. भाईबहन का प्यार, जिस में दोनों एकदूसरे की खुशी के लिए कुछ भी त्याग करने के लिए तैयार हैं, जो उसे कभी अपने भाई से नहीं मिला.

बच्चे जो शुरू में उसे दूर से सहमेसहमे देखते थे, अब सारा दिन उस के आगेपीछे घूमते रहते हैं. इतने सुखी संसार को वह कैसे त्याग सकती है. जो खुशी प्यार और अच्छे रिश्तों से हासिल हो सकती है, बेशुमार धनदौलत या ऐशोआराम से नहीं मिल सकती. इतना प्यार, जिस की उस के जीवन में बहुत कमी थी, हाथ फैलाए उस के स्वागत के लिए तैयार है.

समाज में अधिकतर बहुओं को घर में निचला दर्जा दिया जाता है, वहां एक लड़की को विवाह के बाद इतना प्यार और मानसम्मान मिल जाए, तो उसे और क्या चाहिए. उसे अपने समय से समझौता कर लेने में ही भलाई लगी. शक व चिंता की स्थिति से वह उबर चुकी थी.

आत्मसंतुष्टि के लिए उस ने दोनों बच्चों को अपने पास बुलाया और पूछा, ‘‘बेटा, मैं जा रही हूं, तुम दोनों, पहले की तरह, अपनी बूआ के साथ रहोगे न?’’

‘‘नहींनहीं, वहां पापा नहीं रह सकते, हमें आप दोनों के साथ रहना है. आप हमें छोड़ कर मत जाइए, प्लीज. आप हमें बहुत अच्छी लगती हैं.’’ इतना कह कर दोनों सुबकने लगे.

सुरुचि ने दोनों को गले से लगा लिया. उस का भी दिल भर आया, इतना तो उसे कभी, उस के भतीजों ने महत्त्व नहीं दिया था, जिन को उस ने वर्षों तक प्यारदुलार दिया था.

सुरुचि ने अपनी ननद को अपने फैसले से अवगत कराने के लिए फोन मिलाया और बोली, ‘‘दीदी, मैं यहीं रहूंगी. कहीं नहीं जाऊंगी. दोनों बच्चे भी मेरे साथ रहेंगे.’’ अभी उस की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उस की नजर पीछे खड़े, सुंदर पर पड़ी, जो उस की बात सुन कर मुसकरा रहा था. आंखें चार होने पर वह नवयौवना सी शरमा गई, भूल गई कि वह अपनी ननद से बात कर रही थी. Romantic Story in Hindi 

Social Story In Hindi : ऊंची उड़ान – आकाश और संगीता के बीच क्या रिश्ता था ?

Social Story In Hindi : रात के 12 बजे फोन की घंटी बजी. उस समय आकाश और संगीता शर्मोहया भूल कर एकदूसरे से लिपट कर शारीरिक संबंध बना रहे थे. दोबारा फोन की घंटी बजी. जब संगीता के कानों में घंटी की आवाज पड़ी, तो वह आकाश से बोली, ‘‘आकाश, तुम्हारा फोन बज रहा है.’’

‘‘बजने दो. मुझे डिस्टर्ब मत करो.’’

इस के बाद वे दोनों अपने काम में बिजी हो गए. कुछ समय बाद आकाश ने कहा, ‘‘बहुत मजा आया संगीता.’’ संगीता कुछ कहती, उस से पहले फोन की घंटी फिर बजी.

‘‘आकाश फोन…’’ संगीता बोली.

‘‘जाओ, तुम ही फोन उठा लो,’’ आकाश ने संगीता से कहा.

‘‘हैलो… कौन हो तुम? इतनी रात को बारबार फोन क्यों कर रहे हो?’’ संगीता ने पूछा.

‘क्यों… तुम दोनों के काम में रुकावट आ गई? मुझे मालूम है कि तुम सावंत की पत्नी हो, जो चंद रुपयों के लिए किसी का भी बिस्तर गरम करती हो,’ फोन पर किसी की आवाज आई.

‘‘क्या बकवास कर रही हो? कौन हो तुम?’’ संगीता ने पूछा.

‘बेशर्म औरत, आधी रात को जिस शादीशुदा मर्द के साथ तुम रंगरलियां मना रही हो, मैं उसी की पत्नी बोल रही हूं.’ यह सुन कर संगीता चौंक गई. ‘‘किस का फोन है? किस से बहस कर रही हो?’’ आकाश ने पूछा.

‘‘तुम्हारी पत्नी का फोन है…’’ संगीता इतना ही बोल पाई.

आकाश ने चौंकते हुए कहा, ‘‘क्या… कल्पना का फोन है? पहले क्यों नहीं बताया. लाओ, फोन दो… हैलो… कल्पना.’’

‘हैलो… मैं कल्पना…’ और कुछ बोलतेबोलते वह चुप हो गई.

आकाश चौंक पड़ा, ‘‘क्या बात है कल्पना? क्या हुआ? घर में सब ठीक है न? प्रतिमा और सुमन की तबीयत… जल्दी बताओ,’’ उस ने कई सवाल एकसाथ पूछ लिए. कल्पना की सांस फूली सी लग रही थी. वह धीरे से बोली, ‘आप जल्दी से घर आइए. अब मुझ में इतनी हिम्मत नहीं कि फोन पर बता सकूं.’ ‘ठीक है कल्पना, मैं सुबह होते ही घर पहुंचता हूं,’’ आकाश फोन रख कर सोच में डूब गया. 3 साल भी नहीं हुए थे आकाश को यहां आए हुए. अच्छीनौकरी और मुंहमांगी तनख्वाह ने आखिर उस के बरसों के बांध को तोड़ दिया था. पुरानी नौकरी के साथ पुराने शहर और घरपरिवार को छोड़ कर वह यहां आ बसा था.

पत्नी कल्पना ने कई बार समझाया, 2 जवान बेटियों के साथ भला वह नौकरीपेशा औरत कैसे संभाल पाएगी सब अकेले ही, लेकिन आकाश पर एक ही धुन सवार थी कि किसी भी तरह अमीर बनना है. आकाश के हुनर की वहां कोई कद्र न थी. वह ज्यादातर समय घर पर ही बिता देता था. नौकरी करने वाली पत्नी को उस का घर से जुड़े रहना बड़ी राहत देता है. बेटियों को स्कूल लाने व ले जाने की जिम्मेदारी आकाश की थी. साथसाथ सब्जीभाजी और राशन की जिम्मेदारी भी. कुलमिला कर एक खुशहाल परिवार था. लेकिन उस खुशहाल माहौल में पहला कंकड़ उसी दिन पड़ गया था, जिस दिन आकाश के पड़ोसी राजकुमार अपनी नई मोटरसाइकिल ले आए थे. राजकुमार एक ठेकेदार था. हर साल लाखों रुपए का मुनाफा और मुनाफे के साथसाथ मशहूर हो गया था उस का नाम.

राजकुमार की दौलत आकाश को अंदर ही अंदर कहीं चुभ गई थी. एक दिन आकाश अपनी सारी जमापूंजी जोड़ने बैठा, ‘कल्पना… कल्पना… कहां हो तुम?’

‘कपड़े सुखा रही हूं.’

‘कपड़े सुखा कर जल्दी आओ. हां सुनो… आज तक मैं ने तुम्हें जितने भी रुपए रखने को दिए हैं, वो सब ले कर आओ.’

‘अब इन पैसों से क्या करने का इरादा है तुम्हारा? किसी के बहकावे में आ कर ज्यादा मुनाफा जोड़ने के चक्कर में नहीं आइएगा.’

‘अमीर बन कर ऐशोआराम में अपनी जिंदगी बिताना मेरा सपना है.’

‘मैं तुम से बहस नहीं करना चाहती. तो तुम ने अपने मन में ठान लिया है, वह सब करो. लेकिन अपनी हद में रह कर.’

आज आकाश एक कंपनी का एमडी है. गाड़ी, आलीशान घर, चपरासी सबकुछ है उस के पास. लेकिन इन सुविधाओं का मजा उठाने के लिए उस का परिवार साथ नहीं है. जिन के लिए यह सब किया, वे अपनी जिंदगी के नियमों को लांघ कर उस के पास रहने नहीं आ सकते, सिवा तीजत्योहार के.

आकाश ने शहर के कुछ लोगों से धीरेधीरे अपना मेलजोल बढ़ाया और वह एक बीयरबार में पार्टनर बन गया. वहां रुपयों की बारिश होने लगी. आकाश अपनी सोच से बाहर निकला… आखिर घर में क्या दिक्कत हुई है, जो कल्पना उसे फोन पर बताने के लिए हिम्मत न कर सकी.

आकाश ने अपने मोहल्ले के एक करीबी दोस्त से वादा लिया था कि उस की गैरहाजिरी में वह उस के घर पर नजर रखेगा और बीवीबेटियों की खैरखबर लेता रहेगा. कहीं उस के दोस्त ने घर में कुछ गड़बड़ तो नहीं की होगी या बाहर का कोई? दूसरे दिन आकाश घर पहुंचा. घर पर नौकरानी के सिवा कोई नहीं था. उस ने बताया, ‘‘साहब, कल्पना मैडम और प्रतिमा बेटी किसी डाक्टर के पास गए हुए हैं. वे लोग आते ही होंगे.’’

कुछ देर बाद कल्पना और प्रतिमा घर पहुंचे. आकाश ने पूछा, ‘‘कल्पना, घर में सुमन भी नहीं है और तुम दोनों किसी डाक्टर के पास गई थीं. तुम सब की तबीयत तो ठीक है न?’’ ‘‘प्रतिमा, तू अपने कमरे में जा. मैं इस का चैकअप कराने गई थी,’’ कल्पना दुखी लहजे में बोली.

‘‘चैकअप कराने… क्यों?’’

‘‘सुनो इस की करतूत… कल 7 बजे जब मैं सब्जी लेने जा रही थी, तब मेरी नजर सोफे पर बैठी सुमन पर पड़ी. सिर पर हाथ रख कर देखा, तो उस को तेज बुखार था. डाक्टर के पास से लाई दवा सुमन को दी और उस के पास बैठेबैठे मेरी आंख लग गई. ‘‘आधी रात को मेरी नींद खुली. देखा तो सुमन का बुखार उतर गया था. सोचा, प्रतिमा को देखती चलूं. प्रतिमा अपने कमरे में तो थी, पर उस के साथ में था आप के दोस्त राजकुमार का बेटा. यह देख कर मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई.’’

‘‘राजकुमार का लड़का?’’ आकाश चिल्लाया.

‘‘रुको, अब दूसरों से लड़नाझगड़ना समझदारी की बात नहीं है. न ही किसी पराए पर आंख मूंद कर यकीन करना. सुमन और प्रतिमा मेरी एक बात नहीं सुनतीं. उलटा, तुम्हारी तरह मुझे डांट देती हैं. आजकल घर में जो कुछ भी हो रहा है, तुम्हारे बुरे काम का असर है. दोनों जवान बेटियां मेरे हाथ से निकल चुकी हैं. उन्हें सही राह पर लाना तुम्हारी जिम्मेदारी है.’’ आकाश सिर पकड़ कर बैठ गया. वह पछता रहा था कि अपने परिवार से दूर रहना, किसी पराए पर यकीन करना और जिंदगी में ऊंची उड़ान भरना कभीकभी बेवकूफी भरा काम भी हो सकता है. Social Story In Hindi

Family Story : किस्सा डाइटिंग का – गुप्ताजी की पत्नी उनका वजन क्यों कम करवाना चाहती थी ?

Family Story : एक दिन सुबहसुबह पत्नी ने मुझ से कहा, ‘‘आप ने अपने को शीशे में देखा है. गुप्ताजी को देखो, आप से 5 साल बड़े हैं पर कितने हैंडसम लगते हैं और लगता है जैसे आप से 5 साल छोटे हैं. जरा शरीर पर ध्यान दो. कचौरी खाते हो तो ऐसा लगता है कि बड़ी कचौरी छोटी कचौरी को खा रही है. पेट की गोलाई देख कर तो गेंद भी शरमा जाए.’’

मैं आश्चर्यचकित रह गया. यह क्या, मैं तो अपने को शाहरुख खान का अवतार समझता था. मैं ने शीशे में ध्यान से खुद को देखा, तो वाकई वे सही कह रही थीं. यह मुझे क्या हो गया है. ऐसा तो मैं कभी नहीं था. अब क्या किया जाए? सभी मिल कर बैठे तो बातें शुरू हुईं. बेटे ने कहा, ‘‘पापा, आप को बहुत तपस्या करनी पड़ेगी.’’

फिर क्या था. बेटी भी आ गई, ‘‘हां पापा, मैं आप के लिए डाइटिंग चार्ट बना दूं. बस, आप तो वही करते जाओ जोजो मैं कहूं, फिर आप एकदम स्मार्ट लगने लगेंगे.’’

मैं क्या करता. स्मार्ट बनने की इच्छा के चलते मैं ने उन की सारी बातें मंजूर कर लीं पर फिर मुझे लगा कि डाइटिंग तो कल से शुरू करनी है तो आज क्यों न अंतिम बार आलू के परांठे खा लिए जाएं. मैं ने कहा कि थोड़ी सी टमाटर की चटनी भी बना लेते हैं. पत्नी ने इस प्रस्ताव को वैसे ही स्वीकार कर लिया जैसे कि फांसी पर चढ़ने वाले की अंतिम इच्छा को स्वीकार करते हैं.

मैं ने भरपेट परांठे खाए. उठने ही वाला था कि बेटी पीछे पड़ गई, ‘‘पापा, एक तो और ले लो.’’

पत्नी ने भी दया भरी दृष्टि मेरी ओर दौड़ाई, ‘‘कोई बात नहीं, ले लो. फिर पता नहीं कब खाने को मिलें.’’

आमतौर पर खाने के मामले में इतना अपमान हो तो मैं कदापि नहीं खा सकता था पर मैं परांठों के प्रति इमोशनल था कि बेचारे न जाने फिर कब खाने को मिलें.

रात को सो गया. सुबह अलार्म बजा. मैं ने पत्नी को आवाज दी तो वे बोलीं, ‘‘घूमने मुझे नहीं, आप को जाना है.’’

मैं मरे मन से उठा. रात को प्रोग्राम बनाते समय सुबह 5 बजे उठना जितना आसान लग रहा था अब उतना ही मुश्किल लग रहा था. उठा ही नहीं जा रहा था.

जैसेतैसे उठ कर बाहर आ गया. ठंडीठंडी हवा चल रही थी. हालांकि आंखें मुश्किल से खुल रही थीं पर धीरेधीरे सब अच्छा लगने लगा. लगा कि वाकई न घूम कर कितनी बड़ी गलती कर रहा था. लौट कर मैं ने घर के सभी सदस्यों को लंबा- चौड़ा लैक्चर दे डाला. और तो और अगले कुछ दिनों तक मुझे जो भी मिला उसे मैं ने सुबह उठ कर घूमने के फायदे गिनाए. सभी लोग मेरी प्रशंसा करने लगे.

पर सब से खास परीक्षा की घड़ी मेरे सामने तब आई जब लंच में मेरे सामने थाली आई. मेरी थाली की शोभा दलिया बढ़ा रहा था जबकि बेटे की थाली में मसालेदार आलू के परांठे शोभा बढ़ा रहे थे. चूंकि वह सामने ही खाना खा रहा था इसलिए उस की महक रहरह कर मेरे मन को विचलित कर रही थी.

मरता क्या न करता, चुपचाप मैं जैसेतैसे दलिए को अंदर निगलता रहा और वे सभी निर्विकार भाव से मेरे सामने आलू के परांठों का भक्षण कर रहे थे, पर आज उन्हें मेरी हालत पर तनिक भी दया नहीं आ रही थी.

खाने के बाद जब मैं उठा तो मुझे लग ही नहीं रहा था कि मैं ने कुछ खाया है. क्या करूं, भविष्य में अपने शारीरिक सौंदर्य की कल्पना कर के मैं जैसेतैसे मन को बहलाता रहा.

डाइटिंग करना भी एक बला है, यह मैं ने अब जाना था. शाम को जब चाय के साथ मैं ने नमकीन का डब्बा अपनी ओर खिसकाया तो पत्नी ने उसे वापस खींच लिया.

‘‘नहीं, पापा, यह आप के लिए नहीं है,’’ यह कहते हुए बेटे ने उसे अपने कब्जे में ले लिया और खोल कर बड़े मजे से खाने लगा. मैं क्या करता, खून का घूंट पी कर रह गया.

शाम को फिर वही हाल. थाली में खाना कम और सलाद ज्यादा भरा हुआ था. जैसेतैसे घासपत्तियों को गले के नीचे उतारा और सोने चल दिया. पर पत्नी ने टोक दिया, ‘‘अरे, कहां जा रहे हो. अभी तो तुम्हें सिटी गार्डन तक घूमने जाना है.’’

मुझे लगा, मानो किसी ने पहाड़ से धक्का दे दिया हो. सिटी गार्डन मेरे घर से 2 किलोमीटर दूर है. यानी कि कुल मिला कर आनाजाना 4 किलोमीटर. जैसेतैसे बाहर निकला तो ठंडी हवा बदन में चुभने लगी. आंखों में आंसू भले नहीं उतरे, मन तो दहाड़ें मार कर रो रहा था. मैं जब बाहर निकल रहा था तो बच्चे रजाई में बैठे टीवी देख रहे थे. बाहर सड़क पर भी दूरदूर तक कोई नहीं था पर क्या करता, स्मार्ट जो बनना था, सो कुछ न कुछ तो करना ही था.

फिर यही दिनचर्या चलने लगी. एक ओर खूब जम कर मेहनत और दूसरी ओर खाने को सिर्फ घासफूस. अपनी हालत देख कर मन बहुत रोता था. लोग बिस्तर में दुबके रहते और मैं घूमने निकलता था. लोग अच्छेअच्छे पकवान खाते और मैं वही बेकार सा खाना.

तभी एक दिन मैं ने सुबह 9 बजे अपने एक मित्र को फोन किया. मुझे यह जान कर आश्चर्य हुआ कि वह अभी तक सो कर ही नहीं उठा था जबकि उस ने मुझे घूमने के मामले में बहुत ज्ञान दिया था. करीब 10 बजे मैं ने दोबारा फोन किया. तो भी जनाब बिस्तर में ही थे. मैं ने व्यंग्य से पूछा, ‘‘क्यों भई, तुम तो घूमने के बारे में इतना सारा ज्ञान दे रहे थे. सुबह 10 बजे तक सोना, यह सब क्या है.’’

मित्र हंसने लगा, ‘‘अरे भई, आज संडे है. सप्ताह में एक दिन छुट्टी, इस दिन सिर्फ आराम का काम है.’’

मुझे लगा, यही सही रास्ता है. मैं ने फौरन एक दिन के साप्ताहिक अवकाश की घोषणा कर दी और फौरन दूसरे ही दिन उसे ले भी लिया. देर से सो कर उठना कितना अच्छा लगता है और वह भी इतने संघर्ष के बाद. उस दिन मैं बहुत खुश रहा. पर बकरे की मां कब तक खैर मनाती, दूसरे दिन तो घूमने जाना ही था.

तभी बीच में एक दिन एक रिश्तेदार की शादी आ गई. खाना भी वहीं था. पहले यह तय हुआ था कि मेरे लिए कुछ हल्काफुल्का खाना बना लिया जाएगा पर जब जाने का समय आया तो पत्नी ने फैसला सुनाया कि वहीं पर कुछ हल्का- फुल्का खाना खा लेंगे. बस, मिठाइयों पर थोड़ा अंकुश रखें तो कोई परेशानी थोड़े ही है.

उन के इस निर्णय से मन को बहुत राहत पहुंची और मैं ने वहां केवल मिठाई चखी भर, पर चखने ही चखने में इतनी खा गया कि सामान्य रूप से कभी नहीं खाता था. उस रात को मुझे बहुत अच्छी नींद आई थी क्योंकि मैं ने बहुत दिनों बाद अच्छा खाना खाया था लेकिन नींद भी कहां अपनी किस्मत में थी. सुबह- सुबह कम्बख्त अलार्म ने मुझे फिर घूमने के लिए जगा दिया. जैसेतैसे उठा और घूमने चल दिया.

मेरी बड़ी मुसीबत हो गई थी. जो चीजें मुझे अच्छी नहीं लगती थीं वही करनी पड़ रही थीं. जैसेतैसे निबट कर आफिस पहुंचा. पर यहां भी किसी काम में मन नहीं लग रहा था. सोचा, कैंटीन जा कर एक चाय पी लूं. आजकल घर पर ज्यादा चाय पीने को नहीं मिलती थी. चूंकि अभी लंच का समय नहीं था इसलिए कैंटीन में ज्यादा भीड़ नहीं थी पर मैं ने वहां शर्मा को देखा. वह मेरे सैक्शन में काम करता था और वहां बैठ कर आलूबड़े खा रहा था. मुझे देख कर खिसिया गया. बोला, ‘‘अरे, वह क्या है कि आजकल मैं डाइटिंग पर चल रहा हूं. अब कभीकभी अच्छा खाने को मन तो करता ही है. अब इस जबान का क्या करूं. इसे तो चटपटा खाने की आदत पड़ी है पर यह सब कभीकभी ही खाता हूं. सिर्फ मुंह का स्वाद चेंज करने के लिए…मेरा तो बहुत कंट्रोल है,’’ कह कर शर्मा चला गया पर मुझे नई दिशा दे गया. मेरी तो बाछें खिल गईं. मैं ने फौरन आलूबड़े और समोसे मंगाए और बड़े मजे से खाए.

उस दिन के बाद मैं प्राय: वहां जा कर अपना जायका चेंज करने लगा. हां, एक बात और, डाइटिंग का एक और पीडि़त शर्मा, जोकि अपने कंट्रोल की प्रशंसा कर रहा था, वह वहां अकसर बैठाबैठा कुछ न कुछ खाता रहता था. शुरूशुरू में वह मुझ से शरमाया भी पर फिर बाद में हम लोग मिलजुल कर खाने लगे.

बस, यह सिलसिला ऐसे ही चलने लगा. इधर तो पत्नी मुझ से मेहनत करवा रही थी और दूसरी ओर आफिस जाते ही कैंटीन मुझे पुकारने लगती थी. मैं और मेरी कमजोरी एकदूसरे पर कुरबान हुए जा रहे थे. पत्नी ध्यान से मुझे ऊपर से नीचे तक देखती और सोच में पड़ जाती.

फिर 2 महीने बाद वह दिन भी आया जहां से मेरा जीवन ही बदल गया. हुआ यों कि हम सब लोग परिवार सहित फिल्म देखने गए. वहां पत्नी की निगाह वजन तौलने वाली मशीन पर पड़ी. 2-2 मशीनें लगी हुई थीं. फौरन मुझे वजन तौलने वाली मशीन पर ले जाया गया. मैं भी मन ही मन प्रसन्न था. इतनी मेहनत जो कर रहा था. सुबहसुबह उठना, घूमनाफिरना, दलिया, अंकुरित नाश्ता और न जाने क्याक्या.

मैं शायद इतने गुमान से शादी में घोड़ी पर भी नहीं चढ़ा होऊंगा. सभी लोग मुझे घेर कर खड़े हो गए. मशीन शुरू हो गई. 2 महीने पहले मेरा वजन 80 किलो था. तभी मशीन से टिकट निकला. सभी लोग लपके. टिकट मेरी पत्नी ने उठाया. उस का चेहरा फीका पड़ गया.

‘‘क्या बात है भई, क्या ज्यादा कमजोर हो गया? कोई बात नहीं, सब ठीक हो जाएगा,’’ मैं ने पत्नी को सांत्वना दी.

पर यह क्या, पत्नी तो आगबबूला हो गई, ‘‘खाक दुबले हो गए. पूरे 5 किलो वजन बढ़ गया है. जाने क्या करते हैं.’’

मैं हक्काबक्का रह गया. यह क्या? इतनी मेहनत? मुझे कुछ समझ में नहीं आया. कहां कमी रह गई, बच्चों के तो मजे आ गए. उस दिन की फिल्म में जो कामेडी की कमी थी, वह उन्होंने मुझ पर टिप्पणी कर के पूरी की. दोनों बच्चे बहुत हंसे.

मैं ने भी बहुत सोचा और सोचने के बाद मुझे समझ में आया कि आजकल मैं कैंटीन ज्यादा ही जाने लगा था. शायद इतने समोसे, आलूबडे़, कचौरियां कभी नहीं खाईं. पर अब क्या हो सकता था. पिक्चर से घर लौटने के बाद रात को खाने का वक्त भी आया.

मैं ने आवाज लगाई, ‘‘हां भई, जल्दी से मेरा दलिया ले आओ.’’

पत्नी ने खाने की थाली ला कर रख दी. उस में आलू के परांठे रखे हुए थे. ‘‘बहुत हो गया. हो गई बहुत डाइटिंग. जैसा सब खाएंगे वैसा ही खा लो. और थोड़े दिन डाइटिंग कर ली तो 100 किलो पार कर जाओगे.’’

मैं भला क्या कहता. अब जैसी पत्नीजी की इच्छा. चुपचाप आलू के परांठे खाने लगा. अब कोई नहीं चाहता कि मैं डाइटिंग करूं तो मेरा कौन सा मन करता है. मैं ने तो लाख कोशिश की पर दुबला हो ही नहीं पाया तो मैं भी क्या करूं. इसलिए मैं ने उन की इच्छाओं का सम्मान करते डाइटिंग को त्याग दिया. Family Story

Senior Citizen Rights : कानूनी पचड़ों से बच कर, प्लान करें अपना बुढ़ापा

Senior Citizen Rights : देश के संविधान ने बुजुर्गों के अधिकार और भरण पोषण को ले कर कई कानून बनाए हैं. बुजुर्गों की समस्या कानूनी पचड़ों में पड़ने से नहीं बल्कि युवाओं के साथ मेलजोल से सुलझाना ज्यादा बेहतर होता है.

केरल हाईकोर्ट ने अपने आदेश डब्लू.ए. नंबर 1301/ 2019 में कहा, ‘निःसंतान वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण मामले में आदेश देते में कहा है कि ‘केवल कानूनी उत्तराधिकारी ही निःसंतान बुजुर्ग के भरण-पोषण के लिए उत्तरदायी माने जाएंगे. किसी वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति पर कब्जा अपने आप में भरण का दायित्व नहीं बनाता, जब तक कि वह व्यक्ति लागू पर्सनल ला के तहत कानूनी उत्तराधिकारी न हो. हाई कोर्ट ने मेंटिनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल का फैसला खारिज करते हुए कहा कि अपीलकर्ता महिला बुआ सास (पति की बुआ) के भरण-पोषण के लिए उत्तरदायी नहीं हैं.’

मेंटिनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल ने मातापिता व वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण कानून, 2007 के तहत महिला को बुआ सास का भरण पोषण करने के लिए जिम्मेदार ठहराया था क्योंकि निःसंतान वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति उस के पास थी. घटना के मुताबिक अपीलकर्ता एस. सीजा नामक 40 साल की महिला के पति की अविवाहित व निःसंतान बुआ ने 1992 में अपनी संपत्ति भतीजे को उपहार में दे दी थी और 2008 में भतीजे की मृत्यु के बाद वह संपत्ति उस की पत्नी के पास चली गई थी. ऐसे में भतीजे की मृत्यु के बाद बुजुर्ग महिला ने वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण कल्याण कानून के तहत भतीजे की पत्नी को भरण पोषण का आदेश देने की मांग की थी.

केरल हाई कोर्ट के न्यायाधीश सतीश निनान और पी. कृष्ण कुमार की खंडपीठ ने बुआ सास के भरण पोषण की जिम्मेदारी डालने वाले आदेश के विरुद्ध दाखिल महिला की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि उसे पति की बुआ का भरण पोषण करने का आदेश नहीं दिया जा सकता क्योंकि वह मातापिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम की धारा 2(जी) के मुताबिक ‘रिश्तेदार’ की श्रेणी में नहीं आएगी.

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति पर कब्जा अपनेआप में भरण पोषण का दायित्व नहीं बनाता, जब तक कि वह व्यक्ति लागू पर्सनल ला के तहत कानूनी उत्तराधिकारी न हो. कोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति वरिष्ठ नागरिक का कानूनी उत्तराधिकारी नहीं है, वह कानून के तहत सिर्फ इस आधार पर ‘रिश्तेदार’ नहीं कहा जा सकता कि उस के पास वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति है.

हाई कोर्ट ने कहा कि वह उस फैसले से सहमत नहीं है जिस में कहा गया है कि जो व्यक्ति निरूसंतान वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति का उत्तराधिकारी होगा, उसे उस का ‘रिश्तेदार’ माना जाएगा. हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसा समझा जाना कानून की स्पष्ट भाषा के साथ अन्याय होगा. हाई कोर्ट ने कानून के तहत ‘रिश्तेदार’ की व्याख्या की है.

कोर्ट ने कहा कि मातापिता और वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण कानून की धारा-5 कहती है कि मातापिता अपने बच्चों से भरण पोषण का दावा कर सकते हैं और अगर वरिष्ठ नागरिक निःसंतान है तो वह अपने ‘रिश्तेदार’ से भरण पोषण का दावा कर सकता है. कानून के मुताबिक वह व्यक्ति वरिष्ठ नागरिक का रिश्तेदार होना चाहिए. उस के पास भरण पोषण के साधन होने चाहिए. उस के कब्जे में वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति होनी चाहिए या उसे वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति का उत्तराधिकार हो.

कानून में जो ‘रिश्तेदार’ की व्याख्या की गई है उस के मुताबिक निःसंतान वरिष्ठ नागरिक का कोई कानूनी उत्तराधिकारी, जो नाबालिग न हो और जिस के कब्जे में उस की संपत्ति हो या वह उस की संपत्ति पर उत्तराधिकार रखता है. हाई कोर्ट ने कहा कि इस का मतलब है कि वह व्यक्ति कानून के मुताबिक वरिष्ठ नागरिक के कानूनी उत्तराधिकारी के वर्ग या श्रेणी में आता हो.

इसलिए जो व्यक्ति कानूनी उत्तराधिकारी नहीं है, वह कानून के मुताबिक वरिष्ठ नागरिक का ‘रिश्तेदार’ नहीं हो सकता. केवल संपत्ति पर कब्जा होने भर से या उसे उत्तराधिकार में संपत्ति मिलने से वह ‘रिश्तेदार’ नहीं माना जाएगा. सिर्फ इस आधार पर कानून में उसे ‘रिश्तेदार’ नहीं माना जा सकता कि उस महिला ने अपने पति की संपत्ति पर उत्तराधिकार पाया है, जो वरिष्ठ नागरिक ने उपहार में दी थी. अगर गिफ्ट डीड में अलग से इस बात को लिखा गया होता तो अलग बात थी.

क्या होती है गिफ्ट डीड ?

गिफ्ट डीड बिना किसी प्रतिफल के संपत्ति को उपहार के रूप में देने की कानून प्रक्रिया को कहा जाता है. यह ‘दाता’ द्वारा संपत्ति के अधिकारों के हस्तांतरण का एक स्वैच्छिक कार्य है. जहा ‘दान पाने वाले’ को इस के बदले कुछ देना नहीं पड़ता है. इस का उपयोग आमतौर पर अचल संपत्ति, नकदी या अन्य मूल्यवान संपत्तियों को उपहार में देने के लिए किया जाता है. यह दूसरे संपत्ति हस्तांतरणों से भिन्न है क्योंकि इस में स्वामित्व का हस्तांतरण धन के आदान प्रदान के बिना किया जाता है. संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 है, जो भारत में संपत्ति हस्तांतरण को नियंत्रित करता है. इस अधिनियम की प्रमुख धारा 122 और धारा 126 हैं, जिस में गिफ्ट डीड को परिभाषित किया गया है.

गिफ्ट डीड के जरिए संपत्तियां किसी भी पारिवारिक या गैर पारिवारिक सदस्य को उपहार में दी जा सकती है. गिफ्ट डीड में देने वाले को दान दी गई संपत्ति का स्वामित्व का प्रमाण के दस्तावेज देने होते हैं. इस के अलावा दानकर्ता और दान प्राप्तकर्ता दोनों को पहचान और पते का प्रमाण, जैसे आधार कार्ड, पासपोर्ट या मतदाता पहचान पत्र, प्रस्तुत करना होगा. यदि संपत्ति पहले इसके माध्यम से अर्जित की गई थी तो रजिस्ट्री की कापी लागनी होगी. किसी संपत्ति को कानूनी बकाया या लंबित देनदारियों से मुक्त करने के दषा में प्रमाणपत्र देना होगा.

गिफ्ट डीड के पंजीकरण और लागू होने के दौरान दो गवाहों की जरूरत होती है. जो अपनेअपने पहचान पत्र और पते के प्रमाण के साथ हो. स्थानीय उप-पंजीयक कार्यालय गिफ्ट डीड करने के लिए स्टाम्प शुल्क स्वीकार लेता है. दानकर्ता और उपहार प्राप्तकर्ता सभी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते हं और गवाह कार्यालय में ही इसे सत्यापित करते हैं.

गिफ्ट डीड जमा होने के बाद उसे उप पंजीयक कार्यालय में पंजीकृत किया जाता है. उप पंजीयक सभी दस्तावेजों और उनके कानूनी अनुपालन की पुष्टि करता है. जिस के बाद उप पंजीयक उपहार की रसीद कानूनी प्रमाण के रूप में देता है. स्टाम्प शुल्क की गणना राज्य के आधार पर की जाती है, क्योंकि अलगअलग राज्यों में स्टाम्प शुल्क अलग अलग होते हैं. यह बिना किसी छूट के संपत्ति उपहार में देने पर लागू होता है.

भरण पोषण एवं कल्याण अधिनियम

कांग्रेस की अगुवाई वाली डाक्टर मनमोहन सिंह सरकार ने सामाज के हित में कई कानून बनाए थे. मातापिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007 उन्ही में से एक है. यह संविधान द्वारा मातापिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण हेतु वैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है. इस को 29 सितंबर 2008 से लागू किया गया था.

इस कानून के मुताबिक कोई वरिष्ठ नागरिक या माता पिता जो अपनी आय से या अपनी स्वामित्व वाली संपत्ति से अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, वह अपने बच्चों या कानूनी उत्तराधिकारियों से भरण पोषण राशि प्राप्त करने के लिए अधिनियम की धारा 5 के तहत आवेदन करने का हकदार है. इस अधिनियम के तहत मासिक भत्ते के लिए दायर आवेदन का निपटारा 90 दिनों के भीतर किए जाने का प्रावधान है.

यदि बच्चे या रिश्तेदार न्यायाधिकरण के आदेशों का पालन करने में विफल रहते हैं, तो न्यायाधिकरण जुर्माना लगा सकता है और ऐसे व्यक्तियों को वरिष्ठ नागरिकों के भरण पोषण और व्यय के लिए प्रत्येक माह के भत्ते के पूरे या उसके किसी भाग के लिए दंडित कर सकता है या एक माह तक या भुगतान किए जाने तक कारावास का आदेश दे सकता है. अधिकतम भरण पोषण भत्ता 10,000 रुपए प्रति माह से अधिक नहीं होगा.

न्यायाधिकरण कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान ऐसे बच्चों या रिश्तेदारों को वरिष्ठ नागरिक के अंतरिम भरण-पोषण के लिए मासिक भत्ता प्रदान करने का आदेश दे सकता है. यदि वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार व्यक्ति वरिष्ठ नागरिकों को छोड़ देते हैं, तो ऐसे व्यक्तियों को तीन महीने के कारावास या 5,000 तक का जुर्माना या दोनों से दंडित किया जाएगा.

इस अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त याचिकाओं के शीघ्र निपटारे हेतु, प्रत्येक उप मंडल में राजस्व संभागीय अधिकारी की अध्यक्षता में एक न्यायाधिकरण का गठन किया गया है, जो वरिष्ठ नागरिकों और माता पिता द्वारा बच्चो और कानूनी उत्तराधिकारियों से भरण पोषण राशि प्राप्त करता है. जिला समाज कल्याण अधिकारी भरण पोषण अधिकारी के साथ साथ सुलह अधिकारी के रूप में भी इन मामलों को सुनते हैं.

मातापिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम 2007 में ‘उत्तराधिकारी’ शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है. अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार यह उन बच्चों, रिश्तेदारों, या किसी अन्य व्यक्ति को संदर्भित करता है जो वरिष्ठ नागरिक की मृत्यु के बाद उस की संपत्ति या देखभाल के लिए जिम्मेदार होते हैं.

अधिनियम के अनुसार ‘बच्चे’ में पुत्र, पुत्री, पोता, और पोती शामिल हैं जो नाबालिग नहीं हैं. ‘रिश्तेदार’ शब्द में भाई, बहन भतीजे शामिल हैं जो वरिष्ठ नागरिक के कानूनी उत्तराधिकारी हैं. जिन के पास पर्याप्त साधन हैं उन्हें वरिष्ठ नागरिक का भरण-पोषण करना होगा. ‘उत्तराधिकारी’ शब्द इस अधिनियम में कानूनी रूप से जिम्मेदार व्यक्ति को दर्शाता है, जो वरिष्ठ नागरिक के जीवित रहने पर उन की देखभाल करने और उनकी मृत्यु के बाद उन की संपत्ति या देखभाल के लिए जिम्मेदार होता है.

टकराव नहीं मेलजोल से रहे

देश के संविधान ने बुजुर्गों के अधिकार और भरण पोषण को ले कर कई कानून बनाए हैं. बुजुर्गों की समस्या कानूनी पचड़ों में पड़ने से नहीं बल्कि युवाओं के साथ मेलजोल से सुलझाना ज्यादा बेहतर होता है. कानूनी अधिकार लेने के लिए परिजनों के साथ टकराव की हालत बन जाती है. हमारे देश में कानून भले ही बने हों लेकिन उन का पालन कठिन होता है. ऐसे में कोर्ट और बाबूओं के चक्कर लगाना बुजुर्गों के बस के बाहर होता है. परिवार के लोगों से ही जब टकराव के हालत बन जाएं तो मुसीबत और बढ़ जाती है. ऐसे में जरूरी है कि परिजनों और उत्तराधिकारियों से मेलजोल कर के रहना ही सही रहता है.

बुजुर्गों के लिए जरूरी है कि वह 60 साल की उम्र के बाद अपना बुढ़ापा प्लान करना शुरू कर दें. उन की यह कोशिश रहनी चाहिए कि वह किसी पर बोझ बन कर न रहें. परिवार में अपनी उपयोगिता बनाए रखने का स्किल सीख लें. जैसे घर के कामकाज करना सीख लें. परिवार के छोटे बच्चों की जिम्मेदारी उठाएं. उन को स्कूल लाए ले जाए करें. घर में अगर पेड़ पौधे हैं तो उन की केयर करें. बाजार से छोटी बड़ी खरीददारी करें. घर के जरूरी पेपर संभाल कर रखें. इस तरह के बहुत सारे काम हैं जिन को कर के परिवार में अपनी उपयोगिता बनाए रखें.

बुजुर्गों की कोशिश यह रहनी चाहिए कि वह परिजनों के साथ टकराव वाली बातें न करें. कई बार उन के कामकाज में सलाह दे कर टांग अड़ाने का काम करते हैं. इस से बचें. सलाह उचित समय पर उचित तरह से ही दें. अगर सलाह न मानी जाए तो उस को भी मुद्दा न बनाएं. ज्यादातर टकराव खाने को ले कर होता है. जो बच्चे खा रहे हो उसी को खा कर खुश रहें. अपनी जिम्मेदारी खुद उठाएं. जैसे अपने कपड़े धोना है बिस्तर लगाना है. इस तरह के छोटेछोटे काम उपयोगी होते हैं.

अगर बुजुर्ग अपने अंदर इस तरह का बदलाव करने में सफल रहते हैं तो उन का बुढ़ापा सही से कट सकता है. दूसरे घरों की तुलना न करें. कई बार बुजुर्ग यह करते हैं कि वह अपने घर की तुलना दूसरे घरों से करने लगते हैं. वह यह दिखने की कोशिश करते हैं कि उन की देखभाल कम हो रही है. यह तुलना ठीक नहीं होती है. यह भी बारबार करना ठीक नहीं रहता है कि वह अपने मातापिता की जिस तरह से सेवा करते थे उन की सेवा नहीं हो रही है. आर्थिक रूप से जितना अपने पर निर्भर रह सकते हैं रहें. अपनी संपत्ति जीवन काल में अपने पास रखें. अगर जरूरी है तो उस की वसीयत करें. वसीयत के चलते आप के बाद टकराव न हो इस के लिए पूरे परिवार की जानकारी और सहमति से करें. Senior Citizen Rights 

Social Story : पछतावे की चुभन

Social Story : महेश की नौकरी भारतीय वायु सेना में बतौर मैडिकल अटैंडैंट लगी थी. वायु सेना सिलैक्शन सैंटर के कमांडर ने कहा, ‘‘बधाई हो महेश, तुम्हें एक नोबेल ट्रेड मिला है. तुम नौकरी के साथसाथ इनसानियत के लिए भी काम कर सकोगे. किसी लाचार के काम आ सकोगे.’’ जो भी हो, महेश की समझ में तो यही आया कि उसे एक अच्छी नौकरी मिल गई है बस. अस्पताल में तकरीबन 3 महीने की ट्रेनिंग चल रही थी. सबकुछ करना था. मरीजों का टैंपरेचर, ब्लडप्रैशर, नाड़ी वगैरह के रिकौर्ड रखने से ले कर उन्हें बिस्तर पर सुलाने तक की जिम्मेदारी थी. हर बिस्तर तक जा कर मरीजों को दवा खिलानी पड़ती थी. लाचार मरीजों को स्पंज बाथ देना पड़ता था.

महेश तो एक पिछड़े इलाके से था, जहां के अस्पताल के नर्स से ले कर कंपाउंडर, डाक्टर तक मरीजों को डांटते रहते थे. एकएक इंजैक्शन लगाने के लिए नर्स फीस लेती थी. डाक्टरों से बात करने में डर लगता था कि कहीं डांटने न लगें. स्पंज बाथ का तो नाम भी नहीं सुना था. कभी कोई सगा अस्पताल में भरती हुआ, तो उसे एकएक रिलीफ के लिए दाम देते देखा था. पर यहां तो नर्सों का ‘इंटरनैशनल एथिक्स’ हम पर लागू था. हमें पहले ही ताकीद कर दी गई थी कि किसी मरीज से कभी भी चाय मत पीना, वरना कोर्ट मार्शल हो सकता है.

पलपल यही खयाल रहता था कि कैसे नौकरी महफूज रखी जाए. एक दिन जब महेश अपनी शिफ्ट ड्यूटी पर गया, तो उस से पहले काम कर रहे साथी ने बताया, ‘‘एक मरीज भरती हुआ है. उस का आपरेशन होना है और उसे तैयार करना है.’’

यह कह कर वह साथी चला गया. महेश ने देखा, तो वह बवासीर का मरीज था. महेश ने उसे नुसखे के मुताबिक समझा दिया और दवा दे दी. पर एक बात के लिए महेश दुविधा में पड़ गया कि उस मरीज के गुप्त भाग की शेविंग करनी थी. उस की शेविंग कैसे की जाए? अब महेश को अफसोस होने लगा कि यह कैसी नौकरी में वह फंस गया. ड्यूटी उस की थी. उस से पूछा जाएगा.

महेश ने एक उपाय निकाला. मरीज को बुलाया. रेजर में ब्लेड लगा कर उस से कहा, ‘‘अंदर से दरवाजा बंद कर लो और पूरा समय ले कर शेविंग कर डालो.’’ उस मरीज ने हामी में सिर हिलाया और रेजर ले कर चला गया. महेश ने संतोष की सांस ली. दूसरे दिन जब उस मरीज को औपरेशन के लिए जाना था, तब महेश ही ड्यूटी पर था. वह सोच रहा था कि सब ठीक हो.

उस के सीनियर ने उस से पूछा, ‘‘क्या मरीज का ‘प्रीऔपरेटिव’ केयर फालो हुआ?’’ महेश ने ‘हां’ में सिर हिला दिया.

उस सीनियर ने स्क्रीन पर लगा कर मरीज की जांच की. महेश के पास आ कर वह चिल्लाया, ‘‘यह क्या है? तुम ने तो मरीज का कोई केयर ही नहीं किया है?’’

यह सुन कर महेश के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह बोला, ‘‘सर, मैं ने उसे समझा दिया था.’’ वह सीनियर महेश पर बिगड़ा, ‘‘तुम्हारी समझाने की ड्यूटी नहीं है. तुम्हें खुद करना है और यह तय करना है कि मरीज को तुम्हारी लापरवाही के चलते कोई इंफैक्शन न हो.’’ महेश की बोलती बंद हो गई. अगले ही महीने उसे छुट्टी पर घर जाना था. उसे बड़ी कुंठा होने लगी कि यही सब जा कर घर पर बताऊंगा. अब वह अपनेआप को बड़ा बेबस महसूस कर रहा था. वह पूरी तरह हार मान कर सीनियर के पास चला गया, ‘‘सर, मुझे तो अपनेआप को नंगा देखने में शर्म आती है और आप मुझ से उस के गुप्त भाग की शेविंग करने को कह रहे हैं.’’

वह सीनियर तुरंत मुड़ा और मरीज को आवाज दी. उस ने शेविंग का सामान उठाया और कमरे में चला गया. थोड़ी देर बाद वे दोनों बाहर आए.

सीनियर ने महेश से कहा, ‘‘मैं ने इस मरीज की शेविंग कर दी है. किसी लाचार की सेवा करना छोटा या घटिया काम नहीं होता. मैडिकल के प्रोफैशन में औरतमर्द या अंगगुप्तांग नहीं होता, बस एक मरीज होता है और उस का शरीर होता है. तो फिर इस शरीर की साफसफाई करने में किस बात की दिक्कत?’’

इतना कह कर सीनियर चला गया. कितनी आसानी से बिना किसी हीनभावना के उस ने सब कर दिया था. यह देख कर महेश को दुख होने लगा कि उस ने पहले ही ये सब क्यों नहीं किया? उस के अंदर कितनी कुंठा है. उस की नौकरी का असली माने तो यही था. यही तो उस का असली काम था, जिसे करने से वह चूक गया था. उसके पछतावे की चुभन काफी  चोट पहुंचा रही थी. Social Story 

Social Story In Hindi : मैला दामन

Social Story In Hindi : शीला का अंग अंग दुख रहा था. ऐसा लग रहा था कि वह उठ ही नहीं पाएगी. बेरहमों ने कीमत से कई गुना ज्यादा वसूल लिया था उस से. वह तो एक के साथ आई थी, पर उस ने अपने एक और साथी को बुला लिया था. फिर वे दोनों टूट पड़े थे उस पर जानवरों की तरह. वह दर्द से कराहती रही, पर उन लोगों ने तभी छोड़ा, जब उन की हसरत पूरी हो  शीला ने दूसरे आदमी को मना भी किया था, पर नोट फेंक कर उसे मजबूर कर दिया गया था. ये कमबख्त नोट भी कितना मजबूर कर देते हैं. जहां शीला लाश की तरह पड़ी थी, वह एक खंडहरनुमा घर था, जो शहर से अलग था. वह किसी तरह उठी, उस ने अपनी साड़ी को ठीक किया और ग्राहकों के फेंके सौसौ रुपए के नोटों को ब्लाउज में खोंस कर खंडहर से बाहर निकल आई.

वह सुनसान इलाका था. दूर पगडंडी के रास्ते कुछ लोग जा रहे थे. शीला से चला नहीं जा रहा था. अब समस्या थी कि घर जाए तो कैसे? वह ग्राहक के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ कर आई थी. उसे बूढ़ी सास की चिंता थी कि बेचारी उस का इंतजार कर रही होगी. वह जाएगी, तब खाना बनेगा. तब दोनों खाएंगी.

शीला भी क्या करती. शौक से तो नहीं आई थी इस धंधे में. उस के पति ने उसे तनहा छोड़ कर किसी और से शादी कर ली थी. काश, उस की शादी नवीन के साथ हुई होती. नवीन कितना अच्छा लड़का था. वह उस से बहुत प्यार करता था. वह यादों के गलियारों में भटकते हुए धीरेधीरे आगे बढ़ने लगी. शीला अपने मांबाप की एकलौती बेटी थी. गरीबी की वजह से उसे 10वीं जमात के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी.

उस के पिता नहीं थे. उस की मां बसस्टैंड पर ठेला लगा कर फल बेचा करती थी. घर संभालना, सब्जी बाजार से सब्जी लाना और किराने की दुकान से राशन लाना शीला की जिम्मेदारी थी. वह अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाती थी. साइकिल पकड़ती और निकल पड़ती. लोग उसे लड़की नहीं, लड़का कहते थे.

एक दिन शीला सब्जी बाजार से सब्जी खरीद कर साइकिल से आ रही थी कि मोड़ के पास अचानक एक मोटरसाइकिल से टकरा कर गिर गई. मोटरसाइकिल वाला एक खूबसूरत नौजवान था. उस के बाल घुंघराले थे. उस ने आंखों पर धूप का रंगीन चश्मा पहन रखा था. उस ने तुरंत अपनी मोटरसाइकिल खड़ी की और शीला को उठाने लगा और बोला, ‘माफ करना, मेरी वजह से आप गिर गईं.’ ‘माफी तो मुझे मांगनी चाहिए. मैं ने ही अचानक साइकिल मोड़ दी थी,’ शीला बोली.

‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं. आप को कहीं चोट तो नहीं आई?’

‘नहीं, मैं ठीक हूं,’ शीला उठ कर साइकिल उठाने को हुई, पर उस नौजवान ने खुद साइकिल उठा कर खड़ी कर दी. वह नौजवान अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो गया और स्टार्ट कर के बोला, ‘‘क्या मैं आप का नाम जान सकता हूं?’’

‘शीला… और आप का?’

‘नवीन… अच्छा चलता हूं.’

इस घटना के 4 दिन बाद फिर दोनों की सब्जी बाजार में मुलाकात हो गई. ‘अरे, शीलाजी आप…’ नवीन चहका, ‘सब्जी ले रही हो?’

 

‘हां, मैं तो हर दूसरेतीसरे दिन सब्जी खरीदने आती हूं. आप भी आते हैं…?’

नहीं, सच कहूं, तो मैं यह सोच कर आया था कि शायद आप से फिर मुलाकात हो जाए…’ कह कर नवीन मुसकराने लगा, ‘अगर आप बुरा न मानें, तो क्या मेरे साथ चाय पी सकती हैं?’

‘चाय तो पीऊंगी… लेकिन यहां नहीं. कभी मेरे घर आइए, वहीं पीएंगे,’ कह कर शीला ने उसे घर का पता दे दिया.

शीला आज सुबह से नवीन का इंतजार कर रही थी. उसे पूरा यकीन था कि नवीन जरूर आएगा. वह घर पर अकेली थी. उस की मां ठेला ले कर जा चुकी थी, तभी मोटरसाइकिल के रुकने की आवाज आई. वह दौड़ कर बाहर आ गई. नवीन को देख कर उस का मन खिल उठा, ‘आइए… आइए न…’ नवीन ने शीला के झोंपड़ी जैसे कच्चे मकान को गौर से देखा और फिर भीतर दाखिल हो गया.

शीला ने बैठने के लिए लकड़ी की एक पुरानी कुरसी आगे बढ़ा दी और चाय बनाने के लिए चूल्हा फूंकने लगी. ‘रहने दो… क्यों तकलीफ करती हो. चाय तो आप के साथ कुछ पल बिताने का बहाना है. आइए, पास बैठिए कुछ बातें करते हैं.’

दोनों बातों में खो गए. नवीन के पिता सरकारी नौकरी में थे. घर में मां, दादी और बहन से भरापूरा परिवार था. वह एक दलित नौजवान था और शीला पिछड़े तबके से ताल्लुक रखती थी. पर जिन्हें प्यार हो जाता है, वे जातिधर्म नहीं देखते. इस बात की खबर जब शीला की मां को हुई, तो उस ने आसमान सिर पर उठा लिया. दोनों के बीच जाति की दीवार खड़ी हो गई.

शीला का घर से निकलना बंद कर दिया गया. शीला के मामाजी को बुला लिया गया और शीला की शादी बीड़ी कारखाने के मुनीम श्यामलाल से कर दी गई. शीला की शादी होने की खबर जब नवीन को हुई, तो वह तड़प कर रह गया. उसे अफसोस इस बात का रहा कि वे दोनों भाग कर शादी नहीं कर पाए. सुहागरात को न चाहते हुए भी शीला को पति का इंतजार करना पड़ रहा था. उस का छोटा परिवार था. पति और उस की दादी मां. मांबाप किसी हादसे का शिकार हो कर गुजर गए थे.

श्यामलाल आया, तो शराब की बदबू से शीला को घुटन होने लगी, पर श्यामलाल को कोई फर्क नहीं पड़ना था, न पड़ा. आते ही उस ने शीला को ऐसे दबोच लिया मानो वह शेर हो और शीला बकरी. शीला सिसकने लगी. उसे ऐसा लग रहा था, जैसे आज उस की सुहागरात नहीं, बल्कि वह एक वहशी दरिंदे की हवस का शिकार हो गई हो. सुबह दादी की अनुभवी आंखों ने ताड़ लिया कि शीला के साथ क्या हुआ है.

उस ने शीला को हिम्मत दी कि सब ठीक हो जाएगा. श्यामलाल आदत से लाचार है, पर दिल का बुरा नहीं है. शीला को दादी मां की बातों से थोड़ी राहत मिली. एक दिन शाम को श्यामलाल काम से लौटा, तो हमेशा की तरह शराब के नशे में धुत्त था. उस ने आते ही शीला को मारनापीटना शुरू कर दिया, ‘बेहया, तू ने मुझे धोखा दिया है. शादी से पहले तेरा किसी के साथ नाजायज संबंध था.’

‘नहीं…नहीं…’ शीला रोने लगी, ‘यह झूठ है.’

‘तो क्या मैं गलत हूं. मुझे सब पता चल गया है,’ कह कर वह शीला पर लातें बरसाने लगा. वह तो शायद आज उसे मार ही डालता, अगर बीच में दादी न आई होतीं, ‘श्याम, तू पागल हो गया है क्या? क्यों बहू को मार रहा है?’

‘दादी, शादी से पहले इस का किसी के साथ नाजायज संबंध था.’

‘चुप कर…’ दादी मां ने कहा, तो श्यामलाल खिसिया कर वहां से चला गया.

‘बहू, यह श्यामलाल क्या कह रहा था कि तुम्हारा किसी के साथ…’

‘नहीं दादी मां, यह सब झूठ है. यह बात सच है कि मैं किसी और से प्यार करती थी और उसी से शादी करना चाहती थी. मेरा विश्वास करो दादी, मैं ने कोई गलत काम नहीं किया.’ ‘मैं जानती हूं बहू, तुम गलत नहीं हो. समय आने पर श्याम भी समझ जाएगा.’ और एक दिन ऐसी घटना घटी, जिस की कल्पना किसी ने नहीं की थी.
श्यामलाल ने दूसरी शादी कर ली थी और अलग जगह रहने लगा था. श्यामलाल की कमाई से किसी तरह घर चल रहा था. उस के जाने के बाद घर में भुखमरी छा गई. शीला मायके में कभी काम पर नहीं गई थी, ससुराल में किस के साथ जाती, कहां जाती. घर का राशन खत्म हो गया था. दादी के कहने पर शीला राशन लाने महल्ले की लाला की किराने की दुकान पर पहुंच गई. लाला ने चश्मा लगा कर उसे ऊपर से नीचे तक घूर कर देखा, फिर उस की ललचाई आंखें शीला के उभारों पर जा टिकीं. ‘मुझे कुछ राशन चाहिए. दादी ने भेजा है,’ शीला को कहने में संकोच हो रहा था.

‘मिल जाएगा, आखिर हम दुकान खोल कर बैठे क्यों हैं? पैसे लाई हो?’

शीला चुप हो गई. ‘मुझे पता था कि तुम उधार मांगोगी. अपना भी परिवार है. पत्नी है, बच्चे हैं. उधारी दूंगा, तो परिवार कैसे पालूंगा? वैसे भी तुम्हारे पति ने पहले का उधार नहीं दिया है. अब और उधार कैसे दूं?’

शीला निराश हो कर जाने लगी.

‘सुनो…’

‘जी, लालाजी.’

‘एक शर्त पर राशन मिल सकता है.’

‘बोलो लालाजी, क्या शर्त है?’

‘अगर तुम मुझे खुश कर दो तो…’

‘लाला…’ शीला बिफरी, ‘पागल हो गए हो क्या? शर्म नहीं आती ऐसी बात करते हुए.’ लाला को भी गुस्सा आ गया, ‘निकलो यहां से. पैसे ले कर आते नहीं हैं. उधार में चाहिए. जाओ कहीं और से ले लो…’ शीला को खाली हाथ देख कर दादी ने पूछा, ‘क्यों बहू, लाला ने राशन नहीं दिया क्या?’

‘नहीं दादी…’

‘मुझ से अब भूख और बरदाश्त नहीं हो रही है. बहू, घर में कुछ तो होगा? ले आओ. ऐसा लग रहा है, मैं मर जाऊंगी.’ शीला तड़प उठी. मन ही मन शीला ने एक फैसला लिया और दादी मां से बोली, ‘दादी, मैं एक बार और कोशिश करती हूं. शायद इस बार लाला राशन दे दे.’

‘लाला, तुम्हें मेरा शरीर चाहिए न… अपनी इच्छा पूरी कर ले और मुझे राशन दे दे…’ लाला के होंठों पर कुटिल मुसकान तैर गई, ‘यह हुई न बात.’ लाला उसे दुकान के पिछवाड़े में ले गया और अपनी हवस मिटा कर उसे कुछ राशन दे दिया. इस के बाद शीला को जब भी राशन की जरूरत होती, वह लाला के पास पहुंच जाती. एक दिन हमेशा की तरह शीला लाला की दुकान पर पहुंची, पर लाला की जगह उस के बेटे को देख कर ठिठक गई.

‘‘क्या हुआ… अंदर आ जाओ.’’

‘लालाजी नहीं हैं क्या?’

‘पिताजी नहीं हैं तो क्या हुआ. मैं तो हूं न. तुम्हें राशन चाहिए और मुझे उस का दाम.’

‘इस का मतलब?’

‘मुझे सब पता है,’ कह कर शीला को दुकान के पिछवाड़े में जाने का इशारा किया. अब तो आएदिन बापबेटा दोनों शीला के शरीर से खेलने लगे. इस की खबर शीला के महल्ले के एक लड़के को हुई, तो वह उस के पीछे पड़ गया.

शीला बोली, ‘पैसे दे तो तेरी भी इच्छा पूरी कर दूं.’ यहीं से शीला ने अपना शरीर बेचना शुरू कर दिया था. एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे. इस तरह वह कई लोगों के साथ सो कर दाम वसूल कर चुकी थी. उस की दादी को इस बात की खबर थी, पर वह बूढ़ी जान भी क्या करती. शीला अब यादों से बाहर निकल आई थी. दर्द सहते, लंगड़ाते हुए वह भीड़भाड़ वाले इलाके तक आ गई थी. उस ने रिकशा रोका और बैठ गई अपने घर की तरफ जाने के लिए. एक दिन हमेशा की तरह शीला चौक में खड़े हो कर ग्राहक का इंतजार कर रही थी कि तभी उसे किसी ने पुकारा, ‘शीला…’

शीला ग्राहक समझ कर पलटी, लेकिन सामने नवीन को देख कर हैरान रह गई. वह अपनी मोटरसाइकिल पर था.

‘‘तुम यहां क्या कर रही हो?’’ नवीन ने पूछा.

शीला हड़बड़ा गई, ‘‘मैं… मैं अपनी सहेली का इंतजार कर रही थी.’’

‘‘शीला, मैं तुम से कुछ बात करना चाहता हूं.’’

‘‘बोलो…’’

‘‘यहां नहीं… चलो, कहीं बैठ कर चाय पीते हैं. वहीं बात करेंगे.’’

शीला नवीन के साथ नजदीक के एक रैस्टोरैंट में चली गई.

‘‘शीला,’’ नवीन ने बात की शुरुआत की, ‘‘मैं ने तुम से शादी करने के लिए अपने मां पापा को मना लिया था, लेकिन तुम्हारे परिवार वालों की नापसंद के चलते हम एक होने से रह गए.’’

‘‘नवीन, मैं ने भी बहुत कोशिश की थी, लेकिन हम दोनों के बीच जाति की एक मजबूत दीवार खड़ी हो गई.’’

‘‘खैर, अब इन बातों का कोई मतलब नहीं. वैसे, तुम खुश तो हो न? क्या करता है तुम्हारा पति? कितने बच्चे हैं तुम्हारे?’’ शीला थोड़ी देर चुप रही, फिर सिसकने लगी, ‘‘नवीन, मेरे पति ने दूसरी शादी कर ली है,’’ शीला ने अपनी आपबीती सुना दी.

‘‘तुम्हारे साथ तो बहुत बुरा हुआ,’’ नवीन ने कहा.

‘‘तुम अपनी सुनाओ. शादी किस से की? कितने बच्चे हैं?’’ शीला ने पूछा.

‘‘एक भी नहीं. मैं ने अब तक शादी नहीं की.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि मुझे तुम जैसी कोई लड़की नहीं मिली.’’

शीला एक बार फिर तड़प उठी.

‘‘शीला, मेरी जिंदगी में अभी भी जगह खाली है. क्या तुम मेरी पत्नी…’’

‘‘नहीं… नवीन, यह मुमकिन नहीं है. मैं पहली वाली शीला नहीं रही. मैं बहुत गंदी हो गई हूं. मेरा दामन मैला हो चुका है. मैं तुम्हारे लायक नहीं रह गई हूं.’’ ‘‘मैं जानता हूं कि तुम गलत राह पर चल रही हो. पर, इस में तुम्हारा क्या कुसूर है? तुम्हें हालात ने इस रास्ते पर चलने को मजबूर कर दिया है. तुम चाहो, तो इस राह को अभी भी छोड़ सकती हो. मुझे कोई जल्दी नहीं है.तुम सोचसमझ कर जवाब देना.’’ इस के बाद नवीन ने चाय के पसे काउंटर पर जमा कए और बाहर आ गया.

शीला भी नवीन के पीछे हो ली. नवीन ने मोटरसाइकिल स्टार्ट कर के कहा, ‘‘मुझे तुम्हारे जवाब का इंतजार रहेगा. उम्मीद है कि तुम निराश नहीं करोगी,’’ कह कर नवीन आगे बढ़ गया. शीला के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. उस ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि वक्त उसे दलदल से निकलने का एक और मौका देगा. अभी शीला आगे बढ़ी ही थी कि एक नौजवान ने उस के सामने अपनी मोटरसाइकिल रोक दी, ‘‘चलेगी क्या?’’

‘‘हट पीछे, नहीं तो चप्पल उतार कर मारूंगी…’’ शीला गुस्से से बोली और इठलाती इतराती अपने घर की तरफ बढ़ गई. Social Story In Hindi 

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