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Ladli Behna Yojana: शगुन – स्वाभिमान, अभिमान और आत्मसम्मान का

Ladli Behna Yojana: 12 दिसंबर 2023 को जब डाक्टर मोहन यादव ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी तब प्रदेशवासियों में नये और युवा उर्जावान मुख्यमंत्री मिलने का उत्साह तो था ही लेकिन खासतौर से महिलाओं के मन में यह आशंका भी थी कि वे कहीं लाडली बहना योजना बंद न कर दें. वक्त रहते न केवल यह बल्कि दूसरी कई आशंकाएं भी निर्मूल साबित हुईं.

सवाल जहाँ तक लाडली बहना योजना का है तो प्रदेश की महिलाओं के चेहरे उस वक्त खिल उठे जब डाक्टर मोहन यादव ने यह घोषणा की कि इस बार बहनों को 250 रु राखी बंधाई के शगुन के रूप में दिए जायेंगे. यानी इस बार बहनों को 1500 रु मिलेंगे.

बीती 12 जुलाई को उज्जैन की ग्राम पंचायत नलवा में मोहन यादव ने लाडली बहना सम्मेलन में बहनों की झोली शगुन के साथ साथ सौगातो से भी भर दी. उन्होंने प्रदेश की 1 करोड़ 27 लाख बहनों के खाते में 1543.16 करोड़ की राशि वितरित की. यह सफल और दुनिया भर में चर्चित लाडली बहना योजना की 26वीं किश्त थी. इस मौके पर रक्षाबन्धन के एक महीना पहले से ही माहौल त्यौहारमय हो गया जिसे मोहन यादव के उद्बोधन ने और भी भावुक बना दिया. उन्होंने कहा, राखी भाई बहन के परस्पर स्नेह का बंधन है.

यह अनंतकाल से चला आ रहा अटूट बंधन है राखी आई है तो भाई का बहन को शगुन देना लाजिमी है. इसलिए राखी से पहले हमारी सरकार सभी लाडली बहनों को 250 रु की अतिरिक्त राशि बतौर शगुन देगी.

हम यहीं नहीं रुकेंगे, डाक्टर मोहन यादव ने कहा, बल्कि प्रदेश की हर लाडली बहन को पक्का मकान भी बना कर देंगे. प्रदेश की सभी बहने हमारा मान हैं अभिमान हैं. इनके मान सम्मान और कल्याण के लिए हम कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. दीवाली के बाद आने वाले भाईदूज तक राज्य सरकार सभी लाडली बहनों को 1250 से बढ़ाकर हर महीने 1500 रु सहायता राशि देगी.

यह घोषणा सुनते ही पांडाल उपस्थित महिलाओं की तालियों से गूंज उठा. महिलाओं की ख़ुशी उस वक्त और बढ़ गई जब उन्होंने यह कहा कि यह राशि धीरे धीरे बढ़ाकर 3000 रु महीना कर दी जाएगी. बकौल डाक्टर मोहन यादव बहनें अपने पैसों को अच्छी तरह से सहेजना जानती हैं. उनके हाथ में पैसा रहे तो बच्चों को भी बेहतर जिन्दगी मिलती है. बहनों के जतन से ही घर में खुशियां आती हैं.

इस दिन नलवा में लगभग एक महीने पहले ही राखी का त्यौहार मन गया. कई महिलाओं ने डाक्टर मोहन यादव को राखी बाँधी. इन बहिनों ने अपने लाडले सीएम भैया को एक बड़ी राखी भी भेंट की. एवज में मुख्यमंत्री सौगातों की बौछार करते गये. उन्होंने कहा कि देश भर में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में नारी सशक्तिकरण का अभियान जारी है. 4 करोड़ से भी ज्यादा पक्के मकानों की रजिस्ट्री बहनों के नाम पर हो रही है. बहने देश का सौभाग्य हैं वे मायके और ससुराल दोनों पक्षों को धन्य करती हैं.

इस आयोजन में मुख्यमंत्री ने लाडली लक्ष्मी योजना, प्रधानमन्त्री मातृवंदन योजना व प्रधानमन्त्री उज्ज्वला योजना के हितग्राहियों को भी राशि वितरित की.  उन्होंने 30 लाख से भी ज्यादा महिलाओं के खाते में प्रधानमन्त्री उज्ज्वला योजना के तहत सिलेंडर रिफलिंग के लिए 46.34 करोड़ रु सब्सिडी के डाले. इसके अलावा 56,74 लाख सामाजिक सुरक्षा पेंशन हितग्राहियों को उनके खाते में 340 करोड़ की राशि अंतरित की.

उन्होंने यह घोषणा भी की कि प्रदेश में अब तक 5 लाख किलोमीटर लंबी सड़के बनबाने के बाद सरकार प्रदेश के सभी मजरे टोलों तक भी सड़कें बनवाएगी. किसानों के लिए भी उन्होंने राहत देते 90 प्रतिशत अनुदान पर सोलर पम्प देने की घोषणा की. मध्यप्रदेश को मिल्क केपिटल बनाने के लिए शुरू की गई डाक्टर भीमराव आंबेडकर कामधेनू योजना का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने दूध की पैदावार को 9 से बढ़ाकर 20 फीसदी तक करने का लक्ष्य निर्धारित किया.

सावन की शुरुआत में ही घोषणाओं और योजनाओं की सुहानी बौछारों के बीच लाडली बहना सम्मेलन प्रदेश की लाडली बहनों के लिए एक यादगार आयोजन बन गया. एक आर्थिक निश्चिंतता और गारंटी महिलाओं में स्वाभिमान के साथ साथ आत्मविश्वास भी भर रही है इसमें कोई शक नहीं. Ladli Behna Yojana

Romantic Story : भूल – प्यार के सपने दिखाने वाले अमित के साथ क्या हुआ?

Romantic Story : कैफे कौफी डे’ में रजत, अमित, विनोद और प्रशांत बैठे गपें मार रहे थे, इतने में अचानक रजत की नजर घड़ी पर गई तो वह बोला, ‘‘अमित, तुझे तो अभी ‘उपवन लेक’ जाना है न, वहां पायल तेरा इंतजार कर रही होगी.’’

अमित ने अपने कौलर ऊपर करते हुए कहा, ‘‘वही एक अकेली थोड़ी है जो मेरा इंतजार कर रही है, कई हैं, करने दे उसे भी इंतजार, बंदा है ही ऐसा.’’

प्रशांत हंसा, ‘‘हां यार, तू अमीर बाप की इकलौती औलाद है, हैंडसम है, स्मार्ट है, लड़कियां तो तुझ पर मरेंगी ही.’’

अमित ने इशारे से वेटर को बुला कर बिल मंगवाया और बिल चुकाने के बाद अपनी गाड़ी की चाबी उठाई और बोला, ‘‘चलो, मैं चलता हूं, थोड़ा टाइमपास कर के आता हूं,’’ सब ने ठहाका लगाया और अमित बाहर निकल गया. वह सीधा ‘उपवन लेक’ पहुंचा, पायल वहां बैंच पर बैठी थी, उस ने कार से उतरते अमित को देखा तो खिल उठी. वह अमित को देखती रह गई. शिक्षित, धनी, स्मार्ट अमित उस जैसी मध्यवर्गीय घर से ताल्लुक रखने वाली साधारण लड़की को प्यार करता है, यह सोचते ही पायल खुद पर इतरा उठी. पास आते ही अमित ने उस की कमर में हाथ डाल दिया और इधरउधर देखते हुए कहा, ‘‘चलो, कहीं चल कर कौफी पीते हैं.’’

‘‘नहीं अमित, अगर किसी ने देख लिया तो?’’

‘‘अरे पायल, मैं तुम्हें जिस होटल में ले जाऊंगा वहां तुम्हारी जानपहचान का कोई फटक भी नहीं सकता.’’

पायल को अमित की यह बात बुरी तो लगी, लेकिन उस के व्यक्तित्व के रोब में दबा उस का मन कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाया, उस ने चुपचाप सिर हिला दिया. अमित उसे एक शानदार महंगे होटल में ले गया और दोनों ने एक कोने में बैठ कर कौफी और कुछ स्नैक्स का और्डर दे दिया, हलकाहलका मधुर संगीत और होटल के शानदार इंटीरियर को देख पायल का मन झूम उठा.

अमित की मीठीमीठी बातें सुन कर पायल किसी और ही दुनिया में पहुंच गई. करीब घंटेभर दोनों साथ बैठे रहे. इस दौरान कभी अमित पायल का हाथ अपने हाथ में ले कर बैठता तो कभी उस के खूबसूरत सुनहरे बालों को उंगलियों से सहलाने लगता. पायल हमेशा की तरह सुधबुध खो कर उस की बातों की दीवानी बन खोई रही. जब उस के मोबाइल की घंटी बजी तो वह होश में आई, उस के पापा का फोन था, उन्होंने पूछा, ‘‘कहां हो?’’

पायल ने तुरंत कहा, ‘‘बस पापा, रास्ते में हूं, घर पहुंचने वाली हूं.’’ उस ने अमित से कहा, ‘‘अब मैं जा रही हूं, फिर मिलेंगे.’’ अमित ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम जाओ, मैं यहां अपने दोस्त का इंतजार कर रहा हूं, वह आता ही होगा.’’ पायल चली गई. अमित ने मुसकराते हुए घड़ी देखी. रंजना को उस ने आधे घंटे बाद यहीं बुलाया था. वह जानता था कि पायल घंटेभर से ज्यादा नहीं रुक पाएगी, क्योंकि उस के पापा काफी अनुशासनप्रिय हैं.

अमित बिजनैसमैन कमलकांत का इकलौता बेटा था, मम्मी का देहांत हो चुका था. उस ने अभीअभी एमबीए किया था ताकि बिजनैस संभाल सके. वह युवतियों को खिलौना समझता था, उन पर पैसा खर्च कर वह अपना उल्लू साधता था. वह कई युवतियों से एकसाथ फ्लर्ट करता था. कालेज में युवतियां उस की दीवानी थीं, जिस का उस ने हमेशा फायदा उठाया.

पायल के जाने के बाद वह अब रंजना का इंतजार कर रहा था. खुले विचारों वाली रंजना मौडर्न ड्रैस पहन कर मिलने आई थी. अमित को देख कर उस ने फ्लाइंग किस की और पास पहुंच कर उस से सट कर बैठ गई. अमित ने उस से प्यार भरी बातें कीं और छेड़खानी शुरू कर दी.

रंजना खुद को बड़ी खुशनसीब मानती थी कि उसे अमित जैसा दौलतमंद बौयफ्रैंड मिला. उस ने शादी का जिक्र किया, ‘‘अमित, तुम डैड से हमारी शादी की बात कब कर रहे हो?’’

अमित चौंक कर बोला, ‘‘देखता हूं, अभी तो डैड बहुत बिजी हैं,’’ कहते हुए वह मन ही मन हंसा, ’कितनी बेवकूफ होती हैं लड़कियां, दो बोल प्यार के सुन कर शादी के सपने देखने लगती हैं, हुंह. शादी और इन से, शादी तो अपने ही जैसे उच्चवर्गीय परिवार की किसी लड़की से करूंगा, मखमल में टाट का पैबंद तो लगने से रहा,’अमित ने रंजना की बातों का रुख मोड़ दिया. फिर घंटेभर टाइमपास कर रंजना को ले कर कार की तरफ बढ़ा और उस के घर से पहले ही कार रोक कर उसे उतार कर आगे बढ़ गया.

वह जब घर पहुंचा तो उस के पिता कमलकांत औफिस से आ चुके थे, वे ड्राइंगरूम में गुमसुम बैठे थे. अमित गुनगुनाते हुए घर के अंदर दाखिल हुआ तो उस से पापा की नजरें मिलीं. अमित ने अपने पिता के चेहरे की गंभीरता भांप ली और बोला, ‘‘डैड, कुछ प्रौब्लम है क्या? आप की तबीयत तो ठीक है न?’’

कमलकांत कुछ नहीं बोले, बस, सोफे पर उन्होंने सिर टिका लिया. अमित घबरा कर आगे बढ़ा, ‘‘क्या हुआ डैड?’’

कमलकांत की बुझीबुझी सी आवाज आई, ‘‘2 दिन से सोच रहा हूं तुम्हें बताने के लिए, मुझे एबीसी कंपनी के शेयरों में काफी घाटा हुआ है. अब सारा पैसा डूब गया, जबरदस्त नुकसान हुआ है.’’

दोनों बापबेटा काफी देर सिर पकड़ कर बैठे रहे, फिर कमलकांत ने कहा,

‘‘मि. कुलकर्णी की बेटी से तुम्हारे रिश्ते की जो बात चल रही थी आज उन्होंने भी बात घुमाफिरा कर इस रिश्ते को खत्म करने का संकेत दे दिया है. अब तुम्हें कोई लड़की पसंद हो तो बता देना,’’ तभी नौकर ने आ कर खाना बनाने के लिए पूछा तो दोनों ने ही मना कर दिया.

दोनों के होश उड़े हुए थे, दोनों बापबेटा अपनेअपने कमरे में रातभर जागते रहे. कमलकांत रातभर अपने वकील, सैक्रेटरी, मैनेजर से बात करते रहे, अमित ने तो अपना फोन ही स्विचऔफ कर दिया था, कहां तो वह रोज इस समय फोन पर किसी न किसी लड़की को भविष्य के सुनहरे सपने दिखा रहा होता था. अगले कुछ दिनों में स्थिति और भी स्पष्ट होती चली गई थी. शहर में चर्चा होने लगी, इसी वजह से कमलकांत को हार्टअटैक आ गया, उन्हें तुरंत अस्पताल में भरती किया गया. अमित की भी हालत खराब थी. रिश्तेदारों ने भी उस से दूरी बना ली. सिर्फ एकदो दोस्त उस के साथ अस्पताल में थे.

अमित पिता की रातदिन देखभाल कर रहा था. कुछ दिन बाद जब उन की हालत में कुछ सुधार हुआ तो डाक्टर के निर्देशों के साथ घर आते ही उन्होंने अमित से कहा, ‘‘बेटा, तुम जल्दी से जल्दी साधारण ढंग से ही शादी कर लो, मेरी एक चिंता तो खत्म हो जाएगी. तुम्हारी तो इतनी सारी लड़कियों से दोस्ती है. मुझे बताओ, किस से शादी करना चाहते हो?’’

‘‘डैड, पहले आप ठीक तो हो जाओ, मुझे तय करने के लिए थोड़ा समय चाहिए.’’

समाचारपत्रों में छपी खबरों से अब तक रंजना, पायल और अन्य लड़कियों को भी अमित के चरित्र और कमलकांत की गिरती साख की खबर लग चुकी थी. अमित ने पायल को मिलने के लिए फोन किया तो उस ने साफ इनकार कर दिया और बोली, ‘‘तुम एक आवारा और चरित्रहीन लड़के हो, लड़कियों की भावनाओं से खेलते हो. शादी तो दूर मैं तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखना चाहती.‘‘

अमित पायल के व्यंग्यबाणों से अपमान, मानसिक पीड़ा और क्रोध में जला जा रहा था. इस पीड़ा से उस ने अपनेआप को बहुत मुश्किल से संभाला. सामान्य होने के बाद उस ने रंजना को फोन किया तो रंजना का भी जवाब था, ‘‘तुम अब कुछ भी नहीं हो अमित, जिस पिता के पैसे पर ऐश कर के लड़कियों को बेवकूफ बनाते थे वह पैसा तो अब डूब गया. अब मेरी भी तुम में कोई रुचि नहीं है. मुझे पूजा, अनीता और मंजू के बारे में भी पता चल चुका है, अब सब तुम्हारी हकीकत जान चुके हैं. पिता की दौलत के बिना तुम कुछ नहीं हो, किसी लड़की को अपने से कम समझना, तुम लड़कों का ही हक नहीं है बल्कि हम में भी फैसला लेने की क्षमता, इच्छा, रुचि और पसंद होती है. काश, तुम गरीब और साधारण रूपरंग वाले लेकिन चरित्रवान युवक होते और लड़कियों की भावनाओं से नहीं खेलते,’’ कह कर रंजना ने उस की बात सुने बिना ही फोन रख दिया.

अमित को ऐसा लगा जैसा कि रंजना ने उसे करारा तमाचा मारा हो. निष्प्राण सा वह बिस्तर पर ढह गया. उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो शरीर का खून पानी हो गया हो. उस का गला सूखने लगा और वह अब कुछ करने की हालत में नहीं था. वह बड़ी मुश्किल से उठा और पापा को उस ने अपने हाथ से जबरदस्ती कुछ खिला कर दवा दी, फिर अपने कमरे में आ कर निढाल पड़ गया. उस के दिलोदिमाग में विचारों की आंधी का तांडव चल रहा था. वह इस तरह अपने को ठुकराना सहन नहीं कर पा रहा था. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस जैसे स्मार्ट, हैंडसम लड़के का कोई लड़की इस तरह से अपमान कर सकती है. उस ने अब तक न जाने कितनी लड़कियों को अपनी बातों के जाल में फंसाया था, लेकिन आज उन साधारण लड़कियों ने उस के घमंड को चकनाचूर कर दिया.

मन शांत हुआ तो उस ने सोचा कि सिर्फ पुरुष होने के नाते वह किसी लड़की की भावनाओं से नहीं खेल सकता. उस ने हमेशा अपनी भावनाओं को ही महत्त्व दिया. कभी उस के मन में यह बात नहीं आई कि किसी लड़की का भी आत्मसम्मान व पसंदनपसंद हो सकती है. उस के दिमाग में तो हमेशा यही गलतफहमी रही कि उसे पा कर हर लड़की खुद को धन्य समझेगी, लेकिन उस रात आत्मविश्लेषण करते हुए उस ने महसूस किया कि पायल और रंजना की बातों ने उस की सोच को नया आयाम दिया है. सुबह उस का मन एकदम शांत था, ठीक तूफान के गुजरने के बाद की तरह शांत. उसे अपनी भूल का एहसास हो चुका था. वह मन ही मन पायल, रंजना और पता नहीं कितनी लड़कियों से माफी मांग रहा था. Romantic Story

Family Story In Hindi : दुआ मांगो सब ठीक हो जाएगा

Family Story In Hindi : वह पेट से थी. कोख में किस का बच्चा पलबढ़ रहा था, ससुराल वाले समझ नहीं पा रहे थे. सब अंदर ही अंदर परेशान हो रहे थे.

पिछले 2 साल से उन का बड़ा बेटा जुबैर अपने बूढ़े मांबाप को 2 कुंआरे भाइयों के हवाले कर अपनी बीवी सुगरा को छोड़ कर खाड़ी देश कमाने गया था. शर्त के मुताबिक उसे लगातार 2 साल नौकरी करनी थी, इसलिए घर आने का सवाल ही नहीं उठता.

इसी बीच जुबैर की बीवी सुगरा कभी मायके तो कभी ससुराल में रह कर समय काट रही थी. 2 साल बाद उस के शौहर का भारत आनाजाना होता रहेगा, यही बात सोच कर वह खुश थी.

सुगरा जब भी मायके आती तो हर जुमेरात शहर के मजार जाती. उस मजार का नाम दूरदूर तक था. कई बार तो वह वहां अकेली आतीजाती थी.

एक शहर से दूसरे शहर में ब्याही गई सुगरा ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी. उस ने शहर के एक मदरसे में तालीम पाई थी. सिलाईकढ़ाई और पढ़ाई सीखतेसीखते मदरसे के हाफिज से उस की जानपहचान हो गई थी. वह हाफिज से हंसतीबोलती, पर प्यारमुहब्बत से अनजान थी.

मदरसे में पढ़तेपढ़ते सुगरा के अम्मीअब्बू ने रिश्तेदारी में अच्छा रिश्ता पा कर उस की शादी करने की सोची.

‘सुनोजी, रिश्तेदारी में शादी करने से आपस में बुराई होती है. हालांकि वह हमारी खाला का बेटा है. रोजगार की तलाश में है. जल्द लग नौकरी जाएगी,  पर…’ सुगरा की मां ने कहा था.

‘पर क्या?’ सुगरा के अब्बू ने पूछा था.

‘कल को कोई मनमुटाव हो गया या लड़के को लड़की पसंद न आई तो…’ सुगरा की अम्मी बोली थीं.

‘सुना है कि लड़का खाड़ी देश में कमाने जा रहा है. नौकरी वाले लड़के मिलते ही कहां हैं,’ सुगरा के अब्बू ने कहा था.

दोनों परिवारों में बातचीत हुई और उन का निकाह हो गया. पर मदरसे के हाफिज को सुगरा अब भी नहीं भुला पाई थी.

आज मुर्शिद मियां का परिवार जश्न मना रहा था. एक तो उन के बेटे जुबैर की नौकरी खाड़ी देश में लग गई थी, दूसरी उन के घर खूबसूरत सी बहू आ गई.

‘सुगरा, तुम जन्नत की परी जैसी हो. तुम्हारे आने से हमारा घर नूर से जगमगा गया,’ कह कर जुबैर ने सुगरा को अपने सीने से लगा लिया था.

उन दोनों के बीच मुहब्बत की खुशियों ने डेरा जमा लिया था. पूरा परिवार खुश था.

एक महीने का समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला. जुबैर खाड़ी देश जाने की तैयारी करने लगा. सुगरा को उदासी ने घेर लिया था. उस के दिल से आह निकलती कि काश, जुबैर उसे छोड़ कर न जाता.

‘सिर्फ 2 साल की ही तो बात है,’ कह कर जुबैर सुगरा को आंसू और प्यार के बीच झूलता छोड़ कर नौकरी करने खाड़ी देश चला गया था.

सुगरा की मायूसी देख उस की सास ने अपने शौहर से कहा था, ‘इन दिनों सुगरा घर से बाहर नहीं निकलती है. बाबा के मजार पर हाजिरी देने के लिए उसे देवर रमजान के साथ भेज दिया करें, ताकि उस का मन बहला रहे.’

वे हंसे और बोले, ‘जुबैर के गम में परेशान हो रही होगी. भेज दिया करो. जमाना बदल रहा है. आजकल के बच्चे घर में कैद हो कर नहीं रहना चाहते,’ अपनी बात रखते हुए सुगरा के ससुर मुर्शिद मियां ने इजाजत दे दी थी.

सुगरा मजार आने लगी थी. उस की खुशी के लिए देवर रमजान उस से हंसताबोलता, मजाक करता था, ताकि वह जुबैर की याद भुला सके.

जुबैर को गए 2 महीने हो गए थे लेकिन सासससुर की खुली छूट के बाद भी सुगरा की जिंदगी में कोई खास बदलाव नहीं आया था.

इसी बीच सुगरा के अब्बू आए और उसे कुछ दिनों के लिए घर ले गए. सुगरा ने अम्मी से आगे पढ़ने की बात कही, ताकि उस का मन लगा रहे और वह तालीम भी हासिल कर सके.

मायके में सुगरा के मामा के लड़के को तालीम देने के लिए बुलाया गया. अब सुगरा घर पर ही पढ़ने लगी थी.

एक दिन मजार पर हाफिज ने सुगरा की खूबसूरती की तारीफ क्या कर दी, उस के दिल में हाफिज के लिए मुहब्बत पैदा हो गई.

शादीशुदा सुगरा जवानी का सुख भोग चुकी थी. वह खुद पर काबू नहीं रख पाई और हाफिज की तरफ झुकने लगी.

‘कल मजार पर मिलते हैं…’ आजमाने के तौर पर हाफिज ने कहा था, ‘शाम 7 बजे.’

यह सुन कर सुगरा शरमा गई.

‘ठीक है,’ सुगरा ने कहा था.

ठीक 7 बजे सुगरा मजार पर पहुंच गई. दुआ मांगने के बाद वह हाफिज के साथ गलियारे में बैठ कर बातें करने लगी.

हाफिज ने सुगरा को बताया कि मजार पर दुआ मांगने से दिल को सुकून मिलता है, मनचाही मुराद मिलती है.

अब वे दोनों रोजाना शाम को मजार पर मिलने लगे थे. उन के बीच के फासले कम होने लगे थे.

तकरीबन 4 महीने का समय बीत गया. एक दिन ससुराल से देवर आया और सुगरा की मां को अपनी अम्मी की तबीयत खराब होने की बात कह कर सुगरा को अपने साथ ले गया.

ससुराल में सुगरा जुबैर की याद में डूबी रहने के बजाय हाफिज की दीवानी हो गई थी. वह उस से मिलने को बेकरार रहने लगी थी.

धीरेधीरे सुगरा की सास ठीक हो गईं. सुगरा अब शहर के मजार पर जा कर हाफिज से मिलने की दुआ मांगती थी.

समय की चाल फिर बदली.

‘मैं कालेज में एक पीरियड में हाजिरी लगा कर आता हूं, तब तक तुम मजार पर रुकना,’ कह कर सुगरा को छोड़ उस का देवर कालेज चला गया.

इसी बीच सुगरा ने फोन पर हाफिज को मजार पर बुलाया. उन की मुलाकात दोबारा शुरू हो गई.

देवर के जाने के बाद मजार के नीचे पहाड़ी पर सुगरा अपनी जवानी की प्यास बुझाती और लौट कर मजार से दूर जा कर बैठ जाती. ससुराल में रह कर हाफिज से अपनी जवानी लुटाती सुगरा की इस हरकत से कोई वाकिफ नहीं था.

शहर की मसजिद में हाफिज को बच्चों को तालीम देने की नौकरी मिल जाने से अब सुगरा और उस के बीच की दूरियां मिट गईं. सुगरा को भी सासससुर से सिलाई सैंटर जा कर सिलाई सीखने की इजाजत मिलने की खुशी थी.

जुबैर को खाड़ी देश गए सालभर से ऊपर हो गया था.

‘तकरीबन 4-5 महीने की बात है,’ उस की अम्मी ने सुगरा से कहा था.

‘हां अम्मी, तब तक वे आ जाएंगे,’ सुगरा बोली थी.

पर सुगरा को अब जुबैर की नहीं हाफिज की जरूरत थी. सुगरा और हाफिज के बीच अब कोई दीवार नहीं थी. हाफिज की मसजिद वाली कोठी में वे बेफिक्री से मिलते थे.

सुगरा भी दिल खोल कर हाफिज के साथ रंगरलियां मनाने लगी थी और नतीजा…

सुगरा की तबीयत अचानक खराब होने पर उस की सास उसे अस्पताल ले कर गईं.

डाक्टर ने बताया, ‘आप की बहू मां बनने वाली है.’

घर लौट कर सास मायूसी के साए में डूब गईं. सोचा कि जब जुबैर डेढ़ साल से सुगरा से नहीं मिला तो फिर बहू के पैर भारी कैसे हो गए?

सुगरा ने जुबैर को फोन पर पूरी बात बताई.

जुबैर ने कहा, ‘दुआ मांगो सब ठीक हो जाएगा.’

जुबैर समझ गया था कि मामला क्या है, पर वह यह भी जानता था कि हल्ला मचाने पर वही बदनाम होगा. उसे अभी कई साल खाड़ी देश में काम करना था. एक बच्चा उस के नाम से रहेगा तो उसे ही अब्बा कहेगा न.

Social Story In Hindi : मेरो मदन गोपाल

Social Story In Hindi : रामपुरा गांव में बैरागिन माताश्री के सत्संग का काफी प्रचार हो रहा था. इस से पहले शहर में 7 दिन तक उन्होंने भागवत कथा की धूम मचा रखी थी. माताश्री से दीक्षा लेने के लिए लोगों की कतारें लग गई थीं. ईर्ष्यावश कृष्ण मंदिर के पुजारी के मुंह से निकल ही गया, ‘‘घर का जोगी जोगड़ा, बाहर का जोगी सिद्ध…माताश्री ने 7 दिन में ही लगभग 2 लाख रुपए बटोर लिए हैं. हमें कोई ससुरा 21 या 51 रुपए से ज्यादा दक्षिणा नहीं देता.’’

रामपुरा गांव के पहले के जमींदार और अब के सरपंच स्वरूप सिंह ने भी माताश्री की कथा को सुना था. उन के मन में भक्ति रस की लहरों ने जोर मारा तो अपने गांव में भी कथा करवाने की जिद सी ठान ली. उन के छोटे भाई योगेश और बेटे मनोज ने बहुत समझाया कि इन ढकोसलों में कुछ नहीं रखा. पर स्वरूप सिंह ने किसी की एक न मानी. माताश्री बड़ी मुश्किल से 21 हजार रुपए दक्षिणा पाने के प्रस्ताव पर 3 दिन तक सत्संग करने को राजी हुईं.

कथास्थल को काफी भव्य रूप प्रदान किया गया था. सुसज्जित मंच की शोभा देखने लायक थी. आसपास के 5-6 गांवों की भीड़ जमा हो गई थी. सुनने वालों के लिए रंगबिरंगे शामियाने तान दिए गए थे. रोशनी की जगमगाहट में पूरा माहौल भक्ति रस में डूबने को तैयार था. 7 बजे के लगभग भजनकीर्तन आरंभ हुआ. उस के बाद माताश्री के प्रवचन ने भक्तों को काफी प्रभावित किया. इस के बाद कीर्तन मंडली ने फिर से अपना रंग जमाया.

अलगअलग साजों के संग नईनई फिल्मी तर्जों पर तैयार किए गए भजनों को सुन कर पंडाल में बैठे ग्रामीण झूमझूम कर तालियां बजाने लगे. ‘धूम मचा दे…धूम मचा दे…’ गीत की तर्ज पर गाए भजन पर तो आगे बैठे 7-8 युवक मस्ती में ठुमके लगाने लगे. कार्यक्रम समाप्त होने से पहले माताश्री ने एक भजन गाया…

‘मेरो मदन गोपाल…मेरो मदन गोपाल…

सोनाचांदी मैं ना चाहूं ना चाहूं धनमाल…

मेरो मदन गोपाल…’

माताश्री के सुरीले कंठ से गाए गए इस भजन ने श्रोताओं को पूरी तरह सम्मोहित कर दिया. कथा की समाप्ति पर एक वृद्धा बोल उठी, ‘‘माताश्री कितना त्यागमय जीवन जी रही हैं. कोई लोभलालच नहीं, कोई ऐशोआराम नहीं…किसी तरह की सुखसुविधा की इच्छा नहीं…’’

माताश्री के रात्रि विश्राम के लिए सरपंच के सड़क किनारे बने नए दो- मंजिला मकान में शानदार प्रबंध था. भोजन में पुलाव, 3 सब्जियां, दाल, पूरी व खीर आदि का इंतजाम था.

दूसरे दिन भी रात में सत्संग का वैसा ही कार्यक्रम था, पर तीसरे दिन गड़बड़ हो गई. लगभग 70 किलोमीटर दूर के कसबे से फोन आया कि सरपंचजी के ससुर इस दुनिया से कूच कर गए हैं. अत: वे पत्नी के संग ससुराल जाने की तैयारी करने लगे. जातेजाते सरपंच अपने छोटे भाई और बेटे को समझा गए कि सत्संग में विघ्न नहीं पड़ना चाहिए. उन्हें डर था कि भाई और बेटा कोई चाल न चल जाएं, अत: भेंटपूजा के रूप में वस्त्र, मिठाई, फलों की 2 टोकरियां और 21 हजार रुपए माताश्री को उसी समय देते गए.

तीसरे दिन ठीक समय पर माताश्री का प्रवचन शुरू हुआ. फिर लगभग 1 घंटे तक श्रोताओं ने भजनों का आनंद लिया. कथा समाप्ति पर श्रोता घरों को लौटने लगे. अचानक सभी लोग पंडाल में प्रवेश करती बैलगाड़ी को कौतुक से देखने लगे. सरपंच के बेटे मनोज ने माताश्री के समक्ष जा कर हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘हमारे पापों को क्षमा करें…आप को विश्रामस्थल तक पहुंचाने के लिए हम ने नाहक ही कार का इस्तेमाल किया. आप के त्यागमयी शरीर को इस से कितना कष्ट हुआ होगा. चलिए, अब बैलगाड़ी में सवार हो जाइए, मौसम भी खराब है…किसी समय भी बरसात हो सकती है.’’

माताश्री और उन की मुख्य शिष्या क्रोध में भुनभुनाती हुई बैलगाड़ी पर सवार हो गईं. भजनमंडली पैदल चलने लगी.

माताश्री अभी पहले सदमे से उबरी भी नहीं थीं कि एक दूसरा हृदय विदारक दृश्य उन की आंखों के सामने साकार हो उठा. बैलगाड़ी खेत के किनारे बनी एक झोंपड़ी के सामने जा कर रुक गई. अब तो माताश्री से रहा न गया, गुस्से में उबलती हुई तीखी आवाज में बोलीं, ‘‘तुम्हारे पिता के आग्रह को हम ठुकरा न सके. अगर मालूम होता कि ऐसे भक्त के घर में कंस जैसा बेटा और रावण जैसा भाई मौजूद हैं तो 21 क्या, हम 51 हजार रुपए में भी इस ओर न झांकते. बच्चे, तुम अभी हमारी हस्ती से परिचित नहीं हो.’’

‘‘शांत, माताश्री, शांत…आप स्वयं ही भजन गा रही थीं कि ‘नहीं चाहिए महल चौबारे, रहूं झोंपड़ी में खुशहाल…’ अत: हम ने सोचा, चौबारे में पलंग पर बिछे मखमली गद्दे पर लेटने से आप की आत्मा को कितना कष्ट झेलना पड़ा होगा. अब आप स्वयं सोचिए, हम भला यह पाप क्योंकर करते?’’ सरपंच के भाई योगेश की व्यंग्य भरी वाणी सुन कर साथ खड़े युवक अपनी हंसी न रोक सके.

तभी 2 सूखी रोटियों और मूंग की दाल से सजी थाली को माताश्री के सामने रखते हुए मनोज ने धीरे से कहा, ‘‘क्षमा करें, हम ने 2 दिन तक हलवा, पूरी, पनीर और खीर खिला कर आप के साथ घोर अन्याय किया है. जैसा कि आप भजन गा रही थीं कि ‘खाने को न चाहिए हलवा पूरी, दो रोटी व मूंग की दाल…’ अत: आप की उसी फरमाइश को ध्यान में रखते हुए हम ने यह सादा व पवित्र भोजन तैयार करवाया है. धन्य हैं आप और धन्य हैं आप का त्यागमय जीवन…आप वास्तव में महान हैं…’’

‘‘शंभू,’’ माताश्री ने अपने ड्राइवर की ओर क्रोध से देखा, ‘‘तुम भी इन पापियों की बातें सुन कर दांत फाड़ रहे हो…जल्दी से अपनी गाड़ी ले कर आओ.’’

तभी एक देहाती ने ऊंचे स्वर में गाया, ‘‘अब तो हो गया बुरा हाल, टूट गई जोग की तलवार और बैराग की ढाल, मेरो तो मदन गोपाल…मेरो तो मदन गोपाल.’’

इन पंक्तियों को सुन कर सभी ने जोरदार ठहाका लगाया.

माताश्री शीघ्र ही अपनी मंडली के संग गांव से ही विदा नहीं हुईं, शहर के मंदिर में रखा बोरियाबिस्तर समेट कर रातोंरात वहां से भी नौ दो ग्यारह हो गईं. वह जानती थीं कि गांव की घटना तरहतरह के मिर्चमसालों के संग सुबह होतेहोते पूरे शहर में फैल चुकी होगी. अत: ऐसी स्थिति में भय, लज्जा और अपमान से बचने के लिए वे जल्द से जल्द वहां से बहुत दूर निकल जाना चाहती थीं.

कुछ दिनों बाद पता लगा, माताश्री की शादी उन के ड्राइवर शंभू से हो गई. दोबारा बैलगाड़ी पर न चढ़ना पड़े, लगता है माताश्री ने इस का पूरा इंतजाम कर लिया था. Social Story In Hindi

Romantic Story In Hindi : दिल की दहलीज पर – मधुरा का सपना क्यों रह गया अधूरा ?

Romantic Story In Hindi : ‘‘आहा, चूड़े माशाअल्लाह, क्या जंच रही हो,’’ नवविवाहिता मधुरा की कलाइयों पर सजे चूड़े देख दफ्तर के सहकर्मी, दोस्त आह्लादित थे. मधुरा का चेहरा शर्म से सुर्ख पड़ रहा था. शादी के 15 दिनों में ही उस का रूप सौंदर्य और निखर गया था. गुलाबी रंगत वाले चेहरे पर बड़ीबड़ी कजरारी आंखें और लाल रंगे होंठ… कुछ गहने अवश्य पहने थे मधुरा ने, लेकिन उस के सौंदर्य को किसी कृत्रिम आवरण की आवश्यकता न थी. नए प्यार का खुमार उस की खूबसूरती को चार चांद लगा चुका था.

‘‘और यार, कैसी चल रही है शादीशुदा जिंदगी कूल या हौट?’’ सहेलियां आंखें मटकामटका कर उसे छेड़ने लगीं. सच में मनचाहा जीवनसाथी पा मानों उसे दुनिया की सारी खुशियां मिल गई थीं. मातापिता के चयन और निर्णय से उस का जीवन खिल उठा था.

‘‘वैसे क्या बढि़या टाइम चुना तुम ने अपनी शादी का. क्रिसमस के समय वैसे भी काम कम रहता है… सभी जैसे त्योहार को पूरी तरह ऐंजौय करने के मूड में होते हैं,’’ सहेलियां बोलीं.

‘‘इसीलिए तो इतनी आसानी से छुट्टी मिल गई 15 दिनों की,’’ मधुरा की हंसी के साथसाथ सभी सहकर्मियों की हंसी के ठहाकों से सारा दफ्तर गुंजायमान हो उठा.

तभी बौस आ गए. उन्हें देख सभी चुप हो अपनीअपनी सीट पर चले गए.

‘‘बधाई हो, मधुरा. वैलकम बैक,’’ कहते हुए उन्होंने मधुरा का दफ्तर में पुन: स्वागत किया.

सभी अपनेअपने काम में व्यस्त हो गए.

‘‘मधुरा, शादी की छुट्टी से पहले जो तुम ने टर्न की प्रोजैक्ट किया था कैरी ऐंड संस कंपनी के साथ, उस का क्लोजर करना शेष है. तुम्हें तो पता हैं हमारी कंपनी के नियम… जो रिसोर्स कार्य आरंभ करता है वही कार्य को पूरी तरह समाप्त कर वित्तीय विभाग से उस का पूर्ण भुगतान करवा कर, फाइल क्लोज करता है. लेकिन बीच में ही तुम्हारे छुट्टी पर जाने के कारण उन का भुगतान अटका हुआ है. उस काम को जल्दी पूरा कर देना,’’ कह कर बौस ने फोन काट दिया.

मधुरा ने फाइल एक बार फिर से देखी. भुगतान के सिवा और कार्य शेष न था. फाइल पूरी करने हेतु उसे कैरी ऐंड संस कंपनी के प्रबंधक जितेन से एक बार फिर मिलना होगा और फिर वह जितेन के विचारों में खो गई.

शाम को घर लौट कर रात के भोजन की तैयारी कर मधुरा अपने कमरे में हृदय के दफ्तर से लौटने की प्रतीक्षा कर रही थी. समय काटने के लिए उस ने अपनी डायरी उठा ली. पुराने पन्ने पलटने लगी. पुराने पन्ने उसे स्वत: ही पुरानी यादों में ले गए…

29 जुलाई

आज इंप्लोई मीटिंग में बौस ने मेरे काम की तारीफ की. कितनी खुशी हुई, मेरे परिश्रम का परिणाम दिखने लगा है. नए क्लाइंट कैरी ऐंड संस कंपनी का प्रोजैक्ट भी मुझे मिल गया. इस प्रोजैक्ट को मैं निर्धारित समयसीमा में पूरा कर अपने परफौर्मैंस अप्रेजल में पूरे अंक लाऊंगी.

30 जुलाई

क्या बढि़या दफ्तर है कैरी ऐंड संस कंपनी का. मुझे आज तक अपना दफ्तर कितना एवन लगता था, लेकिन आज उन का दफ्तर देख कर मेरे होश फाख्ता हो गए. इंटीरियर डिजाइनर का काम लाजवाब है. इतने बढि़या दफ्तर में अकसर आनाजाना लगा रहेगा. मजा आ जाएगा.

31 जुलाई

सारे विभाग बहुत अच्छी तरह नियंत्रित हैं और आपस में अच्छा समन्वय स्थापित है. कैरी ऐंड संस कंपनी का आईटी विभाग प्रशंसा के काबिल है. आज अपने काम की शुरुआत की मैं ने. लोगों से मिल ली. किंतु जिन के साथ मिल कर काम करना है यानी जितेन, उन से मिलना रह गया. कल उन से भी मिल लूंगी.

1 अगस्त

मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसे हीरो जैसा बंदा दफ्तर में टकराएगा मुझ से.

उफ, कितना खूबसूरत नौजवान है जितेन. लंबाचौड़ा, सुंदर… लगता है सीधे ‘मिल्स ऐंड बून्स’ के उपन्यासों से बाहर आया है… मेरे सपनों का राजकुमार.

6 अगस्त

आज पूरे हफ्ते भर बाद फिर से जितेन से मुलाकात हुई. वे इतना व्यस्त रहते हैं कि मुलाकात ही नहीं हो पाती. इतने ऊंचे पद पर हैं… अभी तक ठीक से बात भी नहीं हो पाई है. पता नहीं कब हम दोनों को बातचीत करने का मौका मिलेगा. अभी तो मैं जितेन को अपने कार्य के बारे में भी ढंग से नहीं बता पाई हूं.

16 अगस्त

जितना देखती हूं उतना ही दीवानी होती जा रही हूं मैं जितेन की. एक बार मेरी ओर देख भर ले वह… मेरी सांस गले में ही अटक जाती है. लगता है जो बोल रही हूं, जो काम कर रही हूं, सब भूल जाऊंगी. इतना स्वप्निल मैं ने स्वयं को कभी नहीं पाया पहले. यह क्या हो जाता है मुझे जितेन के समक्ष. लेकिन वह है कि मुझे समय ही नहीं देता. बस 4-5 मिनट कुछ काम के बारे में पूछ कर चला जाता है. कब समझेगा वह मेरे दिल का हाल? क्या मेरी आंखों में कुछ नहीं दिखता उसे?

3 सितंबर

आज घर लौटते समय एफएम, पर ‘सत्ते पे सत्ता’ मूवी का गाना सुना, ‘प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया. कि दिल करे हाय, कोई तो बताए क्या होगा… गाड़ी चलाते समय पूरा गला खोल कर गाना गाने का मजा ही कुछ और है…’ फिर आज तो गाना भी मेरे दिल का हाल बयां कर रहा था. न जाने जितेन के साथ पल दो पल कब मिलेंगे और मैं अपने दिल का हाल कब कह पाऊंगी.

हृदय के कमरे में आने की आहट से मधुरा अतीत की स्मृतियों से वर्तमान में लौट आई.

‘‘कैसा रहा दफ्तर में शादी के बाद पहला दिन?’’ हृदय ने पूछा.

मधुरा को हृदय की यह बात भी बहुत भाती थी कि वह उस की हर गतिविधि, हर भावना, हर बात का खयाल रखता है. दोनों ने बातचीत की, खाना खाया और अगली सुबह के लिए अलार्म लगा कर सो गए.

अगले दिन मधुरा अपने क्लाइंट कैरी ऐंड संस कंपनी पहुंची. आज उस ने फाइल क्लोजर की पूरी तैयारी कर ली थी. फाइनल पेमैंट का चैक देने वह जितेन के कक्ष में पहुंची. उस के हाथों में चूड़े देख जितेन ने उसे बधाई दी, ‘‘मुझे आप की कंपनी से पता चला था कि आप अपनी शादी हेतु छुट्टियों पर गई हैं.’’

कार्य पूरा करने के बाद मधुरा ने अपने दफ्तर लौटने के लिए कैब बुला ली. सारे रास्ते उस के मनमस्तिष्क में जितेन घूमता रहा. किस औपचारिकता से बात कर रहा था आज… उसे याद हो आया वह समय जब जितेन और मधुरा की मित्रता भी हो गई थी और वह ‘सिर्फ अच्छे दोस्त’ की श्रेणी से कुछ आगे भी बढ़ चुके थे.

मधुरा तब कैरी ऐंड संस कंपनी जाने के बहाने खोजती रहती. जितेन भी हर शाम उसे उस के दफ्तर से पिक करता और दोनों कहीं कौफी पीते समय व्यतीत करते. दोनों को ही एकदूसरे का साथ बेहद भाता था. मधुरा के चेहरे की चमक बढ़ती रहती और जितेन कुछ गंभीर स्वभाव का होने के बावजूद उसे देख मुसकराता रहता. जितेन आए दिन मधुरा को तोहफे देता रहता. कभी ‘शैनेल’ का परफ्यूम तो कभी ‘हाई डिजाइन’ का हैंडबैग.

‘‘जितेन, क्यों इतने महंगे तोहफे लाते हो मेरे लिए? मैं हर बार घर और दफ्तर में झूठ बोल कर इन की कीमत नहीं छिपा सकती.’’

‘‘तो सच बता दिया करो न… मैं ने कब रोका है तुम्हें?’’

‘‘तुम तो जानते हो कि हमारी कंपनी में भरती के समय हर मुलाजिम से कौंफिडैंशियलिटी ऐग्रीमैंट भरवाया जाता है. चूंकि तुम एक क्लाइंट हो, मैं तुम्हें न तो डेट कर सकती हूं और न ही तुम से शादी. इतना ही नहीं मैं तुम्हारी कंपनी अगले 2 वर्षों तक भी जौइन नहीं कर सकती हूं… तुम से शादी के बाद मैं नौकरी से त्यागपत्र दे कहीं और नौकरी ढूंढ़ूंगी…’’

‘‘शादी के बाद? हैंग औन,’’ मधुरा की बात को बीच में ही काटते हुए जितेन ने कहा, ‘‘शादी तक कहां पहुंच गईं तुम? हम एक कपल हैं, बस, मैं अभी शादीवादी के बारे में सोच भी नहीं सकता… वैसे भी शादी तो मां अपने सर्कल की किसी लड़की से करवाना चाहेंगी… तुम समझ रही हो न?’’

मधुरा के माथे पर चिंता की लकीरें और चेहरे पर असमंजस के भाव पढ़ कर जितेन ने आगे कहा, ‘‘तुम इस समय का लुत्फ उठाओ न… ये महंगे तोहफे, ये बढि़या रेस्तरां, अथाह शौंपिंग… ये सब तुम्हें खुश करने के लिए ही तो हैं… कूल?’’

उस शाम मधुरा को पता चला कि सामाजिक स्तर का भेदभाव केवल कहानियों में नहीं, अपितु वास्तविक जीवन में भी है. उस ने सोचा न था कि उसे भी इस भेदभाव का सामना करना पड़ेगा. उस के बाद जब कभी जितेन टकराया, बस एक फीकी सी मुसकान मधुरा के पाले में आई. खैर, उस का भी मन नहीं हुआ कि जितेन से बात करे. उस का मन खट्टा हो चुका था.

फिर उस की मम्मी ने उसे रमा आंटी के बेटे से मिलवाया. अच्छा लगा था मधुरा को वह. खास कर उस का नाम-हृदय. शांत, सुशील और विनम्र. घरपरिवार तो देखाभाला था ही, रहता भी इसी शहर में था. चलो, ‘मिल्स ऐंड बून्स’ के हीरो को भी देख लिया और अब वास्तविकता के नायक को भी. पर क्या करें. जीवन तो वास्तविक है. इस में सपनों से अधिक वास्तविकता का पलड़ा भारी रहना स्वाभाविक है.

जब से मधुरा की मुलाकात हृदय से हुई थी तभी से कितने अच्छे और मिठास भरे मैसेज भेजने लगा था वह. हृदय ने उस का मन पिघला दिया था. जल्दी ही हामी भर दी उस ने इस रिश्ते के लिए. उस की मम्मी और आंटी कितनी खुश हुईं. उस का मन भी खुश था. मन की तहों ने जहां एक तरफ जितेन को छाना था वहीं दूसरी तरफ हृदय को भी टटोल कर देखा था. मधुरा जैसी रुचिर, लुभावनी और मेधावी लड़की आगे बढ़ चुकी थी.

हर अनुभव जीवन में कुछ सबक लाता है और कुछ यादें छोड़ जाता है. चलते रहने का नाम ही जीवन है. मधुरा अपने दफ्तर पहुंच चुकी थी. आज वह अपने परफौर्मैंस अप्रेजल में अपने पूरे किए प्रोजैक्ट को भरने वाली थी. Romantic Story In Hindi

Family Story In Hindi : अपने पराए – रिश्तों के ताने बाने को समझाती कहानी

Family Story In Hindi : लखनऊ छोड़े मुझे 20 साल हो गए. छोड़ना तो नहीं चाहती थी पर जब पराएपन की बू आने लगे तो रहना संभव नहीं होता. जबतक मेरी जेठानी का रवैया हमारे प्रति आत्मिक था, सब ठीक चलता रहा पर जैसे ही उन की सोच में दुराग्रह आया, मैं ने ही अलग रहना मुनासिब समझ.

आज वर्षों बाद जेठानी का खत आया. खत बेहद मार्मिक था. वे मेरे बेटे प्रखर को देखना चाहती थीं. 60 साल की जेठानी के प्रति अब मेरे मन में कोई मनमुटाव नहीं रहा. मनमुटाव पहले भी नहीं था, पर जब स्वार्थ बीच में आ जाए तो मनमुटाव आना स्वाभाविक था.

शादी के बाद जब ससुराल में मेरा पहला कदम पड़ा तब मेरी जेठानी खुश हो कर बोलीं, ‘‘चलो, एक से भले दो. वरना अकेला घर काटने को दौड़ता था.’’

वे निसंतान थीं. तब भी उन का इलाज चल रहा था पर सफलता कोसों दूर थी. प्रखर हुआ तो मुझ से ज्यादा खुशी उन्हें हुई. हालांकि दिल में अपनी औलाद न होने की कसक थी, जिसे उन्होंने जाहिर नहीं होने दिया. बच्चों की किलकारियों से भला कौन वंचित रहना चाहता है. प्रखर ने घर की मनहूसियत को तोड़ा.

जेठानी ने मुझ से कभी परायापन नहीं रखा. वे भरसक मेरी सहायता करतीं. मेरे पति की आय कम थी. इसलिए वक्तजरूरत रुपएपैसों से मदद करने में भी वे पीछे नहीं हटतीं. प्रखर के दूध का खर्च वही देती थीं. कपड़े आदि भी वही खरीदतीं. मैं ने भी उन्हें कभी शिकायत का मौका नहीं दिया. प्रखर को वे संभालतीं, तो घर का सारा काम मैं देखती. इस तरह मिलजुल कर हम हंसी- खुशी रह रहे थे.

हमारी खुशियों को ग्रहण तब लगा जब मुझे दूसरा बच्चा होने वाला था. नई तकनीक से गर्भधारण करने की जेठानी की कोशिश असफल हुई और डाक्टरों ने कह दिया कि इन की मां बनने की संभावना हमेशा के लिए खत्म हो गई, तो वे बुझबुझ सी, उदास रहने लगीं. न उन में पहले जैसी खुशी रही न उत्साह. उन के मां न बन पाने की मर्मांतक पीड़ा का मुझे एहसास था, क्योंकि मैं भी एक मां थी. इसलिए प्रखर को ज्यादातर उन्हीं के पास छोड़ देती. वह भी बड़ी मम्मी, बड़ी मम्मी कह कर उन्हीं से चिपका रहता. रात को उन्हीं के पास सोता. उन की भी आदत कुछ ऐसी बन गई थी कि बिना प्रखर के उन्हें नींद नहीं आती. मैं चाहती थी कि वे किसी तरह अपने दुखों को भूली रहें.

जब मुझे दूसरा बच्चा होने को था, पता नहीं मेरे जेठजेठानी ने क्या मशविरा किया. एक सुबह वे मुसकरा कर बोलीं, ‘‘बबली, इस बच्चे को तू मुझे दे दे,’’ मैं ने इसे मजाक  समझ और उसी लहजे में बोली, ‘‘दीदी, आप दोनों ही रख लीजिए.’’

‘‘मैं मजाक नहीं कर रही,’’ वे थोड़ा गंभीर हुईं.

‘‘मैं चाहती हूं कि तुम इस बच्चे को कानूनन मुझे दे दो. मैं तुम्हें सोचने का मौका दूंगी.’’

जेठानी के कथन पर मैं संजीदा हो गई. मेरे चेहरे की हंसी एकाएक गुम हो गई. ‘कानूनन’ शब्द मेरे मस्तिष्क में शूल की भांति चुभने लगा.

शाम को मेरे पति औफिस से आए, तो मैं ने जेठानी का जिक्र किया.

‘‘दे दो, हर्ज ही क्या है. भैयाभाभी ही तो हैं,’’ ये बोले.

मैं बिफर पड़ी, ‘‘कैसे पिता हैं? आप को अपने बच्चे का जरा भी मोह नहीं. एक मां से पूछिए जो 9 महीने किन कष्टों से बच्चे को गर्भ में पालती है?’’

‘‘भैया हैं, कोई गैर नहीं.’’

‘‘मैं ने कब इनकार किया. फिर भी कैसे बरदाश्त कर पाऊंगी कि मेरा बच्चा किसी और की अमानत बने. मैं अपने जीतेजी ऐसा हर्गिज नहीं होने दूंगी.’’

‘‘मान लो लड़की हुई तो?’’

‘‘लड़का हो या लड़की. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता.’’

‘‘मुझे पड़ता है. सीमित आमदनी के चलते कहां से लाएंगे दहेज के लिए लाखों रुपए. भैयाभाभी तो संपन्न हैं. वे उस की बेहतर परवरिश करेंगे.’’

‘‘परवरिश हम भी करेंगे. मैं कुछ भी करूंगी पर अपने कलेजे के टुकड़े को यों जाने नहीं दूंगी,’’ मैं ने आत्मविश्वास के साथ जोर दे कर कहा.

‘‘सोच लो. बाद में पछताना न पड़े.’’

‘‘हिसाबकिताब आप कीजिए. प्रखर मुझ से ज्यादा उन के पास रहता है. क्या मैं ने कभी एतराज किया? जो आएगा उसे भी वही पालें, पर मेरी आंखों के सामने. मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा. उलटे मुझे खुशी होगी कि इसी बहाने खून की कशिश बनी रहेगी.’’

मेरे कथन से मेरे पति संतुष्ट न थे. फिर भी मैं ने मन बना लिया था कि लाख दबाव डालें मैं अपने बच्चे को उन्हें गोद लेने नहीं दूंगी. वैसे भी जेठानीजी को सोचना चाहिए कि क्या जरूरी है कि गोद लेने से बच्चा उन का हो जाएगा? बच्चा कोई सामान नहीं जो खरीदा और अपना हो गया. कल को बच्चा बड़ा होगा, तो क्या उसे पता नहीं चलेगा कि उस के असली मांबाप कौन हैं? वे क्या बच्चा ले कर अदृश्य हो जाएंगी. रहेगा तो वह हम सब के बीच ही.

मुझे जेठानी की सोच में क्षुद्रता नजर आई. उन्होंने हमें और हमारे बच्चों को गैर समझ, तभी तो कानूनी जामा पहनाने की कोशिश कर रही हैं. ताईताऊ, मांबाप से कम नहीं होते बशर्ते वे अपने भतीजों को वैसा स्नेह व अपनापन दें. क्या निसंतान ताईताऊ प्रखर की जिम्मेदारी नहीं होंगे?

15 दिन बाद उन्होंने मुझे पुन: याद दिलाया तो मैं ने साफ मना कर दिया, ‘‘दीदी, मुझे आप पर पूरा भरोसा है, पर मेरा जमीर गवारा नहीं करता कि मैं अपने नवजात शिशु को आप को सौंप दूं. मैं इसे अपनी सांसों तले पलताबढ़ता देखना चाहती हूं. वह मुझ से वंचित रहे, इस से बड़ा गुनाह मेरे लिए कोई नहीं. मैं अपराध बोध के साथ नहीं जी सकूंगी.’’

क्षणांश मैं भावुक हो उठी. आगे बोली, ‘‘ताईताऊ मांबाप से कम नहीं होते. मुझ पर यकीन कीजिए, मैं अपने बच्चों को सही संस्कार दूंगी.’’

मेरे कथन पर उन का मुंह बन गया. वे कुछ बोलीं नहीं पर पति (जेठजी) से देर तक खुसरपुसर करती रहीं. कुछ दिन बाद पता चला कि वे मायके के किसी बच्चे को गोद ले रही हैं. वैसे भी कानूनन गोद लेने की सलाह मायके वालों ने ही उन्हें दी थी. वरना रिश्तों के बीच कोर्टकचहरी की क्या अहमियत?

आहिस्ताआहिस्ता मैं ने महसूस किया कि अब जेठानी में प्रखर के प्रति वैसा लगाव नहीं रहा. दूध का पैसा इस बहाने से बंद कर दिया कि अब उन के लिए संभव नहीं. मुझे दुख भी हुआ, रंज भी. एक प्रखर था, जो दिनभर ‘बड़ीमम्मी’, ‘बड़ीमम्मी’ लगाए रखता था. मैं ने अपने बच्चों के मन में कोई दुर्भावना नहीं भरी. जब मैं ने बच्ची को जन्म दिया तो जेठानी ने सिर्फ औपचारिकता निभाई. जहां प्रखर के जन्म पर उन्होंने दिल खोल कर पार्टी दी थी, वहीं बच्ची के प्रति कृपणता मुझे खल गई. मैं ने भी साथ न रहने का मन बना लिया. घर जेठानी का था. उन्हीं के आग्रह पर रहती थी. जब स्वार्थों की गांठ पड़ गई, तो मुझे घुटन होने लगी. दिल्ली जाने लगी तो जेठ का दिल भर आया. प्रखर को गोद में उठा कर बोले, ‘‘बड़े पापा को भूलना मत,’’ मेरी भी आंखें भर गईं पर जेठानी उदासीन बनी रहीं.

20 साल गुजर गए. मैं एक बार लखनऊ तब आई थी जब जेठानी ने अपनी बहन के छोटे बेटे को गोद लिया था. इस अवसर पर सभी जुटे थे. उन के चेहरे पर अहंकार झलक रहा था, साथ में व्यंग्य भी. जितने दिन रही, उन्होंने हमारी उपेक्षा की. वहीं मायके वालों को सिरआंखों पर बिठाए रखा. इस उपेक्षा से आहत मैं दिल्ली लौटी तो इस निश्चय के साथ कि अब कभी उधर का रुख नहीं करूंगी.

आज 20 साल बाद भीगे मन से उन्होंने मुझे याद किया, तो मैं उन के प्रति सारे गिलेशिकवे भूल गई. उन्हें सहीगलत की पहचान तो हुई? यही बात उन्हें पहले समझ में आ जाती तो हमारे बीच की दूरियां न होतीं. 20 साल मैं ने भी असुरक्षा के माहौल में काटे. एकसाथ रहते तो दुखसुख में काम आते. वक्तजरूरत पर सहारे के लिए किसी को खोजना तो न पड़ता.

खत इस प्रकार था : ‘कागज पर लिख देने से न तो गैर अपना हो जाता है, न मिटा देने से अपना गैर. मैं ने खून से ज्यादा कागजों पर भरोसा किया. उसी का फल भुगत रही हूं. जिसे कलेजे से लगा कर रखा, पढ़ालिखा कर आदमी बनाया, वही ठेंगा दिखा कर चला गया. जो खून से बंधा था उसे कागज से बांधने की नादानी की. ऐसा करते मैं भूल गई थी कि कागज तो कभी भी फाड़ा जा सकता है. रिश्ते भावनाओं से बनते हैं. यहीं मैं चूक गई. मैं भी क्या करती. इस भय से एक बच्चे को गोद ले लिया कि इस पर किसी का कोई हक नहीं रह जाएगा. वह मेरा, सिर्फ मेरा रहेगा. मैं यह भूल गई थी कि 10 साल जिस बच्चे ने मां के आंचल में अपना बचपन गुजारा हो, वह मुझे मां क्यों मानेगा?

‘मैं भी स्वार्थ में अंधी हो गई थी कि वह मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा. उस मां के बारे में नहीं सोचा जिस ने उसे पैदा किया कि क्या वह ऐसा चाहेगी? सिर्फ नाम का गोदनामा था, इस की आड़ में मेरी बहन का मुख्य मकसद मेरी धनसंपदा हथियाना था, जिस में वह सफल रही. मैं यह तो नहीं कहूंगी कि प्रखर को मेरे पास बुढ़ापे की सेवा के लिए भेज दो, क्योंकि यह हक मैं ने खो दिया है फिर भी उस गलती को सुधारना चाहती हूं जो मैं ने 20 साल पहले की थी.’

पत्र पढ़ने के बाद मैं तुरंत लखनऊ आई. मेरे जेठ को फालिज का अटैक था. हमें देखते ही उन की आंखें भर आईं. प्रखर ने पहले ताऊजी फिर ताईजी के पैर छुए, तो जेठानी की आंखें डबडबा गईं. सीने से लगा कर भरे गले से बोलीं, ‘‘बित्ते भर का था, जब तुझे पहली बार सीने से लगाया था. याद है, मेरे बगैर तुझे नींद नहीं आती थी. मां की मार से बचने के लिए मेरे ही आंचल में सिर छिपाता था.’’

‘‘बड़ी मम्मी,’’ प्रखर का इतना कहना भर था कि जेठानीजी अपने आवेग पर नियंत्रण न रख सकीं. फफक कर रो पड़ीं.

‘‘मैं तो अब भी आप की चर्चा करता हूं. मम्मी से कितनी बार कहा कि मुझे बड़ी मम्मी के पास ले चलो.’’

‘‘क्यों बबली, हम क्या इतने गैर हो गए थे. कम से कम अपने बेटे की बात तो रखी होती. बड़ों की गलती बच्चे ही सुधारते हैं,’’ जेठानीजी ने उलाहना दिया.

‘‘दीदी, मुझ से भूल हुई है,’’ मेरे चेहरे पर पश्चात्ताप की लकीरें खिंच गईं.

2 दिन हम वहां रहे. लौटने को हुई तो मैं ने महसूस किया कि जेठानीजी कुछ कहना चाह रही थीं. संकोच, लज्जा जो भी वजह हो पर मैं ने ही उन से कहा कि क्या हम फिर से एकसाथ नहीं रह सकते.

मैं ने जैसे उन के मन की बात छीन ली. प्रतिक्रियास्वरूप उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और बोलीं, ‘‘बबली, मुझे माफ कर दो.’’

जेठानी के अपनेपन की तपिश ने हमारे मन में जमी कड़वाहट को हमेशा के लिए पिघला दिया.

लखनऊ छोड़े मुझे 20 साल हो गए. छोड़ना तो नहीं चाहती थी पर जब पराएपन की बू आने लगे तो रहना संभव नहीं होता. जबतक मेरी जेठानी का रवैया हमारे प्रति आत्मिक था, सब ठीक चलता रहा पर जैसे ही उन की सोच में दुराग्रह आया, मैं ने ही अलग रहना मुनासिब समझ.

आज वर्षों बाद जेठानी का खत आया. खत बेहद मार्मिक था. वे मेरे बेटे प्रखर को देखना चाहती थीं. 60 साल की जेठानी के प्रति अब मेरे मन में कोई मनमुटाव नहीं रहा. मनमुटाव पहले भी नहीं था, पर जब स्वार्थ बीच में आ जाए तो मनमुटाव आना स्वाभाविक था.

शादी के बाद जब ससुराल में मेरा पहला कदम पड़ा तब मेरी जेठानी खुश हो कर बोलीं, ‘‘चलो, एक से भले दो. वरना अकेला घर काटने को दौड़ता था.’’

वे निसंतान थीं. तब भी उन का इलाज चल रहा था पर सफलता कोसों दूर थी. प्रखर हुआ तो मुझ से ज्यादा खुशी उन्हें हुई. हालांकि दिल में अपनी औलाद न होने की कसक थी, जिसे उन्होंने जाहिर नहीं होने दिया. बच्चों की किलकारियों से भला कौन वंचित रहना चाहता है. प्रखर ने घर की मनहूसियत को तोड़ा.

जेठानी ने मुझ से कभी परायापन नहीं रखा. वे भरसक मेरी सहायता करतीं. मेरे पति की आय कम थी. इसलिए वक्तजरूरत रुपएपैसों से मदद करने में भी वे पीछे नहीं हटतीं. प्रखर के दूध का खर्च वही देती थीं. कपड़े आदि भी वही खरीदतीं. मैं ने भी उन्हें कभी शिकायत का मौका नहीं दिया. प्रखर को वे संभालतीं, तो घर का सारा काम मैं देखती. इस तरह मिलजुल कर हम हंसी- खुशी रह रहे थे.

हमारी खुशियों को ग्रहण तब लगा जब मुझे दूसरा बच्चा होने वाला था. नई तकनीक से गर्भधारण करने की जेठानी की कोशिश असफल हुई और डाक्टरों ने कह दिया कि इन की मां बनने की संभावना हमेशा के लिए खत्म हो गई, तो वे बुझबुझ सी, उदास रहने लगीं. न उन में पहले जैसी खुशी रही न उत्साह. उन के मां न बन पाने की मर्मांतक पीड़ा का मुझे एहसास था, क्योंकि मैं भी एक मां थी. इसलिए प्रखर को ज्यादातर उन्हीं के पास छोड़ देती. वह भी बड़ी मम्मी, बड़ी मम्मी कह कर उन्हीं से चिपका रहता. रात को उन्हीं के पास सोता. उन की भी आदत कुछ ऐसी बन गई थी कि बिना प्रखर के उन्हें नींद नहीं आती. मैं चाहती थी कि वे किसी तरह अपने दुखों को भूली रहें.

जब मुझे दूसरा बच्चा होने को था, पता नहीं मेरे जेठजेठानी ने क्या मशविरा किया. एक सुबह वे मुसकरा कर बोलीं, ‘‘बबली, इस बच्चे को तू मुझे दे दे,’’ मैं ने इसे मजाक  समझ और उसी लहजे में बोली, ‘‘दीदी, आप दोनों ही रख लीजिए.’’

‘‘मैं मजाक नहीं कर रही,’’ वे थोड़ा गंभीर हुईं.

‘‘मैं चाहती हूं कि तुम इस बच्चे को कानूनन मुझे दे दो. मैं तुम्हें सोचने का मौका दूंगी.’’

जेठानी के कथन पर मैं संजीदा हो गई. मेरे चेहरे की हंसी एकाएक गुम हो गई. ‘कानूनन’ शब्द मेरे मस्तिष्क में शूल की भांति चुभने लगा.

शाम को मेरे पति औफिस से आए, तो मैं ने जेठानी का जिक्र किया.

‘‘दे दो, हर्ज ही क्या है. भैयाभाभी ही तो हैं,’’ ये बोले.

मैं बिफर पड़ी, ‘‘कैसे पिता हैं? आप को अपने बच्चे का जरा भी मोह नहीं. एक मां से पूछिए जो 9 महीने किन कष्टों से बच्चे को गर्भ में पालती है?’’

‘‘भैया हैं, कोई गैर नहीं.’’

‘‘मैं ने कब इनकार किया. फिर भी कैसे बरदाश्त कर पाऊंगी कि मेरा बच्चा किसी और की अमानत बने. मैं अपने जीतेजी ऐसा हर्गिज नहीं होने दूंगी.’’

‘‘मान लो लड़की हुई तो?’’

‘‘लड़का हो या लड़की. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता.’’

‘‘मुझे पड़ता है. सीमित आमदनी के चलते कहां से लाएंगे दहेज के लिए लाखों रुपए. भैयाभाभी तो संपन्न हैं. वे उस की बेहतर परवरिश करेंगे.’’

‘‘परवरिश हम भी करेंगे. मैं कुछ भी करूंगी पर अपने कलेजे के टुकड़े को यों जाने नहीं दूंगी,’’ मैं ने आत्मविश्वास के साथ जोर दे कर कहा.

‘‘सोच लो. बाद में पछताना न पड़े.’’

‘‘हिसाबकिताब आप कीजिए. प्रखर मुझ से ज्यादा उन के पास रहता है. क्या मैं ने कभी एतराज किया? जो आएगा उसे भी वही पालें, पर मेरी आंखों के सामने. मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा. उलटे मुझे खुशी होगी कि इसी बहाने खून की कशिश बनी रहेगी.’’

मेरे कथन से मेरे पति संतुष्ट न थे. फिर भी मैं ने मन बना लिया था कि लाख दबाव डालें मैं अपने बच्चे को उन्हें गोद लेने नहीं दूंगी. वैसे भी जेठानीजी को सोचना चाहिए कि क्या जरूरी है कि गोद लेने से बच्चा उन का हो जाएगा? बच्चा कोई सामान नहीं जो खरीदा और अपना हो गया. कल को बच्चा बड़ा होगा, तो क्या उसे पता नहीं चलेगा कि उस के असली मांबाप कौन हैं? वे क्या बच्चा ले कर अदृश्य हो जाएंगी. रहेगा तो वह हम सब के बीच ही.

मुझे जेठानी की सोच में क्षुद्रता नजर आई. उन्होंने हमें और हमारे बच्चों को गैर समझ, तभी तो कानूनी जामा पहनाने की कोशिश कर रही हैं. ताईताऊ, मांबाप से कम नहीं होते बशर्ते वे अपने भतीजों को वैसा स्नेह व अपनापन दें. क्या निसंतान ताईताऊ प्रखर की जिम्मेदारी नहीं होंगे?

15 दिन बाद उन्होंने मुझे पुन: याद दिलाया तो मैं ने साफ मना कर दिया, ‘‘दीदी, मुझे आप पर पूरा भरोसा है, पर मेरा जमीर गवारा नहीं करता कि मैं अपने नवजात शिशु को आप को सौंप दूं. मैं इसे अपनी सांसों तले पलताबढ़ता देखना चाहती हूं. वह मुझ से वंचित रहे, इस से बड़ा गुनाह मेरे लिए कोई नहीं. मैं अपराध बोध के साथ नहीं जी सकूंगी.’’

क्षणांश मैं भावुक हो उठी. आगे बोली, ‘‘ताईताऊ मांबाप से कम नहीं होते. मुझ पर यकीन कीजिए, मैं अपने बच्चों को सही संस्कार दूंगी.’’

मेरे कथन पर उन का मुंह बन गया. वे कुछ बोलीं नहीं पर पति (जेठजी) से देर तक खुसरपुसर करती रहीं. कुछ दिन बाद पता चला कि वे मायके के किसी बच्चे को गोद ले रही हैं. वैसे भी कानूनन गोद लेने की सलाह मायके वालों ने ही उन्हें दी थी. वरना रिश्तों के बीच कोर्टकचहरी की क्या अहमियत?

आहिस्ताआहिस्ता मैं ने महसूस किया कि अब जेठानी में प्रखर के प्रति वैसा लगाव नहीं रहा. दूध का पैसा इस बहाने से बंद कर दिया कि अब उन के लिए संभव नहीं. मुझे दुख भी हुआ, रंज भी. एक प्रखर था, जो दिनभर ‘बड़ीमम्मी’, ‘बड़ीमम्मी’ लगाए रखता था. मैं ने अपने बच्चों के मन में कोई दुर्भावना नहीं भरी. जब मैं ने बच्ची को जन्म दिया तो जेठानी ने सिर्फ औपचारिकता निभाई. जहां प्रखर के जन्म पर उन्होंने दिल खोल कर पार्टी दी थी, वहीं बच्ची के प्रति कृपणता मुझे खल गई. मैं ने भी साथ न रहने का मन बना लिया. घर जेठानी का था. उन्हीं के आग्रह पर रहती थी. जब स्वार्थों की गांठ पड़ गई, तो मुझे घुटन होने लगी. दिल्ली जाने लगी तो जेठ का दिल भर आया. प्रखर को गोद में उठा कर बोले, ‘‘बड़े पापा को भूलना मत,’’ मेरी भी आंखें भर गईं पर जेठानी उदासीन बनी रहीं.

20 साल गुजर गए. मैं एक बार लखनऊ तब आई थी जब जेठानी ने अपनी बहन के छोटे बेटे को गोद लिया था. इस अवसर पर सभी जुटे थे. उन के चेहरे पर अहंकार झलक रहा था, साथ में व्यंग्य भी. जितने दिन रही, उन्होंने हमारी उपेक्षा की. वहीं मायके वालों को सिरआंखों पर बिठाए रखा. इस उपेक्षा से आहत मैं दिल्ली लौटी तो इस निश्चय के साथ कि अब कभी उधर का रुख नहीं करूंगी.

आज 20 साल बाद भीगे मन से उन्होंने मुझे याद किया, तो मैं उन के प्रति सारे गिलेशिकवे भूल गई. उन्हें सहीगलत की पहचान तो हुई? यही बात उन्हें पहले समझ में आ जाती तो हमारे बीच की दूरियां न होतीं. 20 साल मैं ने भी असुरक्षा के माहौल में काटे. एकसाथ रहते तो दुखसुख में काम आते. वक्तजरूरत पर सहारे के लिए किसी को खोजना तो न पड़ता.

खत इस प्रकार था : ‘कागज पर लिख देने से न तो गैर अपना हो जाता है, न मिटा देने से अपना गैर. मैं ने खून से ज्यादा कागजों पर भरोसा किया. उसी का फल भुगत रही हूं. जिसे कलेजे से लगा कर रखा, पढ़ालिखा कर आदमी बनाया, वही ठेंगा दिखा कर चला गया. जो खून से बंधा था उसे कागज से बांधने की नादानी की. ऐसा करते मैं भूल गई थी कि कागज तो कभी भी फाड़ा जा सकता है. रिश्ते भावनाओं से बनते हैं. यहीं मैं चूक गई. मैं भी क्या करती. इस भय से एक बच्चे को गोद ले लिया कि इस पर किसी का कोई हक नहीं रह जाएगा. वह मेरा, सिर्फ मेरा रहेगा. मैं यह भूल गई थी कि 10 साल जिस बच्चे ने मां के आंचल में अपना बचपन गुजारा हो, वह मुझे मां क्यों मानेगा?

‘मैं भी स्वार्थ में अंधी हो गई थी कि वह मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा. उस मां के बारे में नहीं सोचा जिस ने उसे पैदा किया कि क्या वह ऐसा चाहेगी? सिर्फ नाम का गोदनामा था, इस की आड़ में मेरी बहन का मुख्य मकसद मेरी धनसंपदा हथियाना था, जिस में वह सफल रही. मैं यह तो नहीं कहूंगी कि प्रखर को मेरे पास बुढ़ापे की सेवा के लिए भेज दो, क्योंकि यह हक मैं ने खो दिया है फिर भी उस गलती को सुधारना चाहती हूं जो मैं ने 20 साल पहले की थी.’

पत्र पढ़ने के बाद मैं तुरंत लखनऊ आई. मेरे जेठ को फालिज का अटैक था. हमें देखते ही उन की आंखें भर आईं. प्रखर ने पहले ताऊजी फिर ताईजी के पैर छुए, तो जेठानी की आंखें डबडबा गईं. सीने से लगा कर भरे गले से बोलीं, ‘‘बित्ते भर का था, जब तुझे पहली बार सीने से लगाया था. याद है, मेरे बगैर तुझे नींद नहीं आती थी. मां की मार से बचने के लिए मेरे ही आंचल में सिर छिपाता था.’’

‘‘बड़ी मम्मी,’’ प्रखर का इतना कहना भर था कि जेठानीजी अपने आवेग पर नियंत्रण न रख सकीं. फफक कर रो पड़ीं.

‘‘मैं तो अब भी आप की चर्चा करता हूं. मम्मी से कितनी बार कहा कि मुझे बड़ी मम्मी के पास ले चलो.’’

‘‘क्यों बबली, हम क्या इतने गैर हो गए थे. कम से कम अपने बेटे की बात तो रखी होती. बड़ों की गलती बच्चे ही सुधारते हैं,’’ जेठानीजी ने उलाहना दिया.

‘‘दीदी, मुझ से भूल हुई है,’’ मेरे चेहरे पर पश्चात्ताप की लकीरें खिंच गईं.

2 दिन हम वहां रहे. लौटने को हुई तो मैं ने महसूस किया कि जेठानीजी कुछ कहना चाह रही थीं. संकोच, लज्जा जो भी वजह हो पर मैं ने ही उन से कहा कि क्या हम फिर से एकसाथ नहीं रह सकते.

मैं ने जैसे उन के मन की बात छीन ली. प्रतिक्रियास्वरूप उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और बोलीं, ‘‘बबली, मुझे माफ कर दो.’’

जेठानी के अपनेपन की तपिश ने हमारे मन में जमी कड़वाहट को हमेशा के लिए पिघला दिया. Family Story In Hindi

Story In Hindi : मुखरता – डर कर चुप बैठ गई रिचा से क्या गलती हुई

Story In Hindi : रिचा बीए प्रथम वर्ष की छात्रा थी. वह क्लास में आखिरी बैंच पर बैठती थी और एकदम बुझीबुझी सी रहती थी. कुछ पूछने पर वह या तो चुप हो जाती या फिर बहुत कम सवालों का जवाब देती. वैसे रिचा पढ़ने में होशियार और मेहनती थी, लेकिन हरदम अकेली, खुद में खोई रहती. कोई न कोई बात तो थी जो उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी. सब से ज्यादा चौंकाने वाली बात यह थी कि वह लड़कों की मौजूदगी में सामान्य नहीं रहती थी. अगर गलती से कोई लड़का उसे छू लेता या कंधे पर हाथ रख देता, तो वह क्रोधित हो जाती.

उस के मातापिता भी कुछ समझ नहीं पा रहे थे. वे अगर उस से कुछ पूछते, तो वह एक गहरी चुप्पी साध लेती. उस की बचपन की सहेली मीरा जब भी मिलती, रिचा से चुप रहने की वजह पूछती पर उसे कोई जवाब नहीं मिलता. लेकिन मनोविज्ञान की स्टूडैंट होने के कारण वह रिचा की मानसिक अवस्था समझ रही थी. उसे किसी अनहोनी का डर खाए जा रहा था.

एक दिन मीरा ने उस से बात करने का निश्चय किया. शुरू में तो रिचा ने सवालों से बचना चाहा, शायद वह थोड़ी भयभीत भी थी, पर मीरा के साथ रोज वार्त्तालाप करने से उस का हौसला बढ़ने लगा.

एक दिन उस के दुखों का बांध ढह गया और उस की भावनाओं ने उथलपुथल की और वह रोने लगी. फिर धीरेधीरे उस ने अपनी बीती सारी बातें बताईं. उस ने बताया, ‘‘एक दिन दोपहर को मैं इतिहास पढ़ रही थी. वैसे भी इतिहास का विषय सब के लिए नींद की गोली जैसा होता है, पर मेरे लिए यह एक रोमांचक था. अनजाने में ही मेरे अंकल जल्दी घर वापस आ गए. वे हमेशा से ही मेरे कपड़ों, पढ़ाई व मेरे दोस्तों में रुचि रखते थे.

‘‘मैं उन से प्रेरित थी. वे मुझे मेरे पिता से ज्यादा निर्देशित करते थे. कई चीजों के बारे में चर्चा करतेकरते अंकल ने मुझे अपने पास आ कर बैठने को कहा. मुझे इस में कुछ भी अटपटा नहीं लगा और मैं उन के पास जा कर बैठ गई. बात करतेकरते वे अचानक मेरे गुप्तांगों को बेहूदे तरीके से छूने लगे. यह देख कर मैं पीछे हट गई. मुझे उन की इस हरकत से असुविधा महसूस होने लगी. मैं सही समय पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाई. संयोग से मेरी मां हौल में आ गईं. मैं मौके का फायदा उठा कर अपने कमरे में भाग गई. मेरे साथ हौल में जो कुछ हुआ वह समझने में मुझे थोड़ा वक्त लगा. वह एक ऐसी अनहोनी थी जिस ने मेरी जिंदगी अस्तव्यस्त कर दी थी.

‘‘मैं ने खुद से घृणा के भाव से पूछा, ‘मेरे साथ क्यों?’ मैं अपनी मां को यह बात नहीं बता पा रही थी, क्योंकि मुझे शर्मिंदगी और घबराहट महसूस हो रही थी.

‘‘अगले दिन अंकल ने मुझे फिर पीछे से पकड़ा और शैतानों वाली हंसी हंसते हुए पूछा कि मुझे कैसा लग रहा है.

‘‘मेरे कुछ जवाब न देने और घूर कर देखने पर उन्होंने मुझे धमकाया. मैं डर के साथसाथ क्रोधित भी हो गई थी. मैं उन्हें थप्पड़ मारना चाहती थी पर उन की पकड़ से छूट ही नहीं पा रही थी.

‘‘मेरी चुप्पी उन की इस हरकत को बढ़ावा दे रही थी. धीरेधीरे मैं अंकल से दूरी बना कर रहने लगी. मैं ऐसी किसी जगह नहीं जाती थी जहां वे मौजूद हों. अब उन्हें देखते ही मुझे घृणा महसूस होने लगती थी. मेरा सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा न लेना मेरे मातापिता को अनुचित लगता था. वे मेरे इस व्यवहार का कारण पूछते थे. मैं इस उलझन में थी कि यह सब सुनने के बाद इस बारे में उन की क्या राय होगी? डर से मैं ने यह बात उन्हें न बताना ही सही समझा.

‘‘मैं अब खुद को असहाय सा महसूस करने लगी हूं और सालों से सबकुछ चुपचाप सह रही हूं. लंबे समय से वे बातें मेरे दिमाग में चलचित्र की तरह ताजी हैं. मैं अपनी मां से इस बारे में बात करना चाहती हूं पर नहीं कर पाती.

‘‘जीवन में आगे चल कर मैं मर्दों के साथ रिश्ता नहीं निभा पाऊंगी. मुझे अपने दोस्तों (किसी लड़के) का साधारण तरीके से छूना भी पसंद नहीं आता. मैं अपने बिगड़ते रिश्तों का कारण नहीं जान पा रही हूं. मैं खुद का आदर नहीं कर पाती और खुद से ही नाराज रहती हूं.’’ यह सब कहते हुए वह रोने लगी.

यह सब सुन कर मीरा को बहुत दुख हुआ. मीरा ने उस से कहा,’’ अच्छा, बुरा मत मानना, अन्याय सहना भी बहुत बड़ा अपराध है. आज अपनी इस दशा की जिम्मेदार तुम खुद हो. अगर तुम खुल कर अपनी मम्मी से इस यौनशोषण के बारे में बतातीं, तो शायद आज यह स्थिति न आती.

‘‘तुम क्यों हिचकिचाती रही? क्यों तुम ने शर्मिंदगी महसूस की. जीवन में बलि का बकरा बनने से अच्छा है कि हम खुद के लिए आवाज उठाएं. तुम आज ही अपनी मां से इस बारे में बात करो. तुम ने कोई अपराध नहीं किया है, जो तुम डरो. अगर तुम डर कर अपराधी को सजा नहीं दोगी, तो तुम उसे अपराध करने के लिए प्रेरित करोगी. कल को कुछ भी हो सकता है.

‘‘मुखरता, सहनशीलता और आक्रामकता का सही बैलेंस है. मुखर होना मतलब खुद के या दूसरों के अधिकार के लिए आराम से और सकारात्मक भाव से अपनी बात रखना होता है, न कि आक्रामक या सहनशील हो कर खड़ा होना. मुखरता खुद में ही एक पुरस्कार की तरह है, क्योंकि यह देख कर अच्छा लगता है कि लोग आप की बातें ध्यान से सुनते हैं और परिस्थितियां भी अकसर अपने अनुसार ही चलती हैं.

‘‘मुखरता हमें अपने सोचविचार को खुल कर सामने लाने का आत्मविश्वास और ताकत देती है. यह हम से किसी को भी गलत फायदा उठाने नहीं देती है. मुखरता एक तरह का व्यावहारिक उपचार है जो लोगों को खुद की मदद करने में सक्षम बनाता है.’’

मीरा की बातें सुन कर रिचा शायद अपनी भूल समझ गई थी. उस ने उसी दिन अपनी मां को सारी बातें बता दीं. रिचा की मां कु्रद्ध हो गईं और उस की इस दुर्दशा को न जान पाने के लिए शर्मिंदगी महसूस करने लगी. अब रिचा को एहसास हुआ कि जिस बात को सब के सामने आने के डर से वह हिचकिचाती थी और शर्मिंदगी महसूस करती थी, अगर चुप नहीं रहती, तो उसे इतने समय तक सबकुछ नहीं सहना पड़ता.

रिचा अपने अंकल से ही नहीं, बल्कि अपनी बात समाज के सामने रखने से भी नहीं डरती. मीरा ने उसे एक नया जीवन दिया. परिचय कराया उस का मुखरता से. उसे एक सकारात्मक आत्मछवि और जीने का विश्वास दिया. रिचा अब चुपचाप कुछ भी नहीं सहती है. Story In Hindi

Love Story In Hindi : तुम ही चाहिए ममू – क्या राजेश उससे अलग रह पाया?

Love Story In Hindi : कुछ अपने मिजाज और कुछ हालात की वजह से राजेश बचपन से ही गंभीर और शर्मीला था. कालेज के दिनों में जब उस के दोस्त कैंटीन में बैठ कर लड़कियों को पटाने के लिए तरहतरह के पापड़ बेलते थे, तब वह लाइब्रेरी में बैठ कर किताबें खंगालता रहता था.

ऐसा नहीं था कि राजेश के अंदर जवानी की लहरें हिलोरें नहीं लेती थीं. ख्वाब वह भी देखा करता था. छिपछिप कर लड़कियों को देखने और उन से रसीली बातें करने की ख्वाहिश उसे भी होती थी, मगर वह कभी खुल कर सामने नहीं आया.

कई लड़कियों की खूबसूरती का कायल हो कर राजेश ने प्यारभरी कविताएं लिख डालीं, मगर जब उन्हीं में से कोई सामने आती तो वह सिर झुका कर आगे बढ़ जाता था. शर्मीले मिजाज की वजह से कालेज की दबंग लड़कियों ने उसे ‘ब्रह्मचारी’ नाम दे दिया था.

कालेज से निकलने के बाद जब राजेश नौकरी करने लगा तो वहां भी लड़कियों के बीच काम करने का मौका मिला. उन के लिए भी उस के मन में प्यार पनपता था, लेकिन अपनी चाहत को जाहिर करने के बजाय वह उसे डायरी में दर्ज कर देता था. औफिस में भी राजेश की इमेज कालेज के दिनों वाली ही बनी रही.

शायद औरत से राजेश का सीधा सामना कभी न हो पाता, अगर ममता उस की जिंदगी में न आती. उसे वह प्यार से ममू बुलाता था.

जब से राजेश को नौकरी मिली थी, तब से मां उस की शादी के लिए लगातार कोशिशें कर रही थीं. मां की कोशिश आखिरकार ममू के मिलने के साथ खत्म हो गई. राजेश की शादी हो गई. उस की ममू घर में आ गई.

पहली रात को जब आसपड़ोस की भाभियां चुहल करते हुए ममू को राजेश के कमरे तक लाईं तो वह बेहद शरमाई हुई थी. पलंग के एक कोने पर बैठ कर उस ने राजेश को तिरछी नजरों से देखा, लेकिन उस की तीखी नजर का सामना किए बगैर ही राजेश ने अपनी पलकें झुका लीं.

ममू समझ गई कि उस का पति उस से भी ज्यादा नर्वस है. पलंग के कोने से उचक कर वह राजेश के करीब आ गई और उस के सिर को अपनी कोमल हथेली से सहलाते हुए बोली, ‘‘लगता है, हमारी जोड़ी जमेगी नहीं…’’

‘‘क्यों…?’’ राजेश ने भी घबराते हुए पूछा.

‘‘हिसाब उलटा हो गया…’’ उस ने कहा तो राजेश के पैरों तले जमीन खिसक गई. उस ने बेचैन हो कर पूछा, ‘‘ऐसा क्यों कह रही हो ममू… क्या गड़बड़ हो गई?’’

‘‘यह गड़बड़ नहीं तो और क्या है? कुदरत ने तुम्हारे अंदर लड़कियों वाली शर्म भर दी और मेरे अंदर लड़कों वाली बेशर्मी…’’ कहते हुए ममू ने राजेश का माथा चूम लिया.

ममू के इस मजाक पर राजेश ने उसे अपनी बांहों में भर कर सीने से लगा लिया.

ख्वाबों में राजेश ने औरत को जिस रूप में देखा था, ममू उस से कई गुना बेहतर निकली. अब वह एक पल के लिए भी ममू को अपनी नजरों से ओझल होते नहीं देख सकता था.

हनीमून मना कर जब वे दोनों नैनीताल से घर लौटे तो ममू ने सुझाव दे डाला, ‘‘प्यारमनुहार बहुत हो चुका… अब औफिस जाना शुरू कर दो.’’

उस समय राजेश को ममू की बात हजम नहीं हुई. उस ने ममू की पीठ सहलाते हुए कहा, ‘‘नौकरी तो हमेशा करनी है ममू… ये दिन फिर लौट कर नहीं आएंगे. मैं छुट्टियां बढ़वा रहा हूं.’’

‘‘छुट्टियां बढ़ा कर क्या करोगे? हफ्तेभर बाद तो प्रमोशन के लिए तुम्हारा इंटरव्यू होना है,’’ ममू ने त्योरियां चढ़ा कर कहा.

ममू को सचाई बताते हुए राजेश ने कहा, ‘‘इंटरव्यू तो नाम का है डार्लिंग. मुझ से सीनियर कई लोग अभी प्रमोशन की लाइन में खड़े हैं… ऐसे में मेरा नंबर कहां आ पाएगा?’’

‘‘तुम सुधरोगे नहीं…’’ कह कर ममू राजेश का हाथ झिड़क कर चली गई.

अगली सुबह मां ने राजेश को एक अजीब सा फैसला सुना डाला, ‘‘ममता को यहां 20 दिन हो चुके हैं. नई बहू को पहली बार ससुराल में इतने दिन नहीं रखा करते. तू कल ही इसे मायके छोड़ कर आ.’’

मां से तो राजेश कुछ नहीं कह सका, लेकिन ममू को उस ने अपनी हालत बता दी, ‘‘मैं अब एक पल भी तुम से दूर नहीं रह सकता ममू. मेरे लिए कुछ दिन रुक जाओ, प्लीज…’’

‘‘जिस घर में मैं 23 साल बिता चुकी हूं, उस घर को इतनी जल्दी कैसे भूल जाऊं?’’ कहते हुए ममू की आंखें भर आईं.

राजेश को इस बात का काफी दुख हुआ कि ममू ने उस के दिल में उमड़ते प्यार को दरकिनार कर अपने मायके को ज्यादा तरजीह दी, लेकिन मजबूरी में उसे ममू की बात माननी पड़ी और वह उसे उस के मायके छोड़ आया.

ममू के जाते ही राजेश के दिन उदास और रातें सूनी हो गईं. घर में फालतू बैठ कर राजेश क्या करता, इसलिए वह औफिस जाने लगा.

कुछ ही दिन बाद प्रमोशन के लिए राजेश का इंटरव्यू हुआ. वह जानता था कि यह सब नाम का है, फिर भी अपनी तरफ से उस ने इंटरव्यू बोर्ड को खुश करने की पूरी कोशिश की.

2 हफ्ते बाद ममू मायके से लौट आई और तभी नतीजा भी आ गया.

लिस्ट में अपना नाम देख कर राजेश खुशी से उछल पड़ा. दफ्तर में उस के सीनियर भी परेशान हो उठे कि उन को छोड़ कर राजेश का प्रमोशन कैसे हो गया.

उन्होंने तहकीकात कराई तो पता चला कि इंटरव्यू में राजेश के नंबर उस के सीनियर सहकर्मियों के बराबर थे. इस हिसाब से राजेश के बजाय उन्हीं में से किसी एक का प्रमोशन होना था, मगर जब छुट्टियों के पैमाने पर परख की गई तो उन्होंने राजेश से ज्यादा छुट्टियां ली थीं. इंटरव्यू में राजेश को इसी बात का फायदा मिला था.

अगर ममू 2 हफ्ते पहले मायके न गई होती तो राजेश छुट्टी पर ही चल रहा होता और इंटरव्यू के लिए तैयारी भी न कर पाता. अचानक मिला यह प्रमोशन राजेश के कैरियर की एक अहम कामयाबी थी. इस बात को ले कर वह बहुत खुश था.

उस शाम घर पहुंच कर राजेश को ममू की गहरी समझ का ठोस सुबूत मिला.

मां ने बताया कि मायके की याद तो ममू का बहाना था. उस ने जानबूझ कर मां से मशवरा कर के मायके जाने का मन बनाया था ताकि वह इंटरव्यू के लिए तैयारी कर सके.

सचाई जान कर राजेश ममू से मिलने को बेताब हो उठा. अपने कमरे में दाखिल होते ही वह हैरान रह गया.

ममू दुलहन की तरह सजधज कर बिस्तर पर बैठी थी. राजेश ने लपक कर उसे अपने सीने से लगा लिया. उस की हथेलियां ममू की कोमल पीठ को सहला रही थीं.

ममू कह रही थी, ‘‘माफ करना… मैं ने तुम्हें बहुत तड़पाया. मगर यह जरूरी था, तुम्हारी और मेरी तरक्की के लिए. क्या तुम से दूर रह कर मैं खुश रही? मायके में चौबीसों घंटे मैं तुम्हारी यादों में खोई रही. मैं भी तड़पती रही, लेकिन इस तड़प में भी एक मजा था. मुझे पता था कि अगर मैं तुम्हारे साथ रहती तो तुम जरूर छुट्टी लेते और कभी भी मन लगा कर इंटरव्यू की तैयारी नहीं करते.’’

राजेश कुछ नहीं बोला बस एकटक अपनी ममू को देखता रहा.

ममू ने राजेश को अपनी बांहों में लेते हुए चुहल की, ‘‘अब बोलो, मुझ जैसी कठोर बीवी पा कर तुम कैसा महसूस कर रहे हो?’’

‘‘तुम को पा कर तो मैं निहाल हो गया हूं ममू…’’ राजेश अभी बोल ही रहा था कि ममू ने ट्यूबलाइट का स्विच औफ करते हुए कहा, ‘‘बहुत हो चुकी तारीफ… अब कुछ और…’’

ममू शरारत पर उतर आई. कमरा नाइट लैंप की हलकी रोशनी से भर उठा और ममू राजेश की बांहों में खो गई, एक नई सुबह आने तक. Love Story In Hindi

Social Story : बिल्डर उवाच – धोखाधड़ी के शिकार मध्यमवर्गीय पुरुष की कहानी

Social Story : तो हुआ यों कि गरीबदास लाचारप्रसाद गए फ्लैट देखने श्यामनगर ऐक्सटैंशन में. गरीबदास उन का अपना नाम है और पिता का नाम लाचारप्रसाद. इस प्रकार उन का पूरा नाम है गरीबदास लाचारप्रसाद. कुछ परिवारों में नाम के साथ पिता का नाम रखने की परंपरा है. कुछ स्थानों पर गांव का नाम रखने की भी प्रथा है. ऐसे लोगों के लिए ऐसा फौर्म भरना कठिन हो जाता है जिस में 25-30 अक्षरों की शब्दसीमा होती है.

निम्नवर्गीय और मध्यवर्गीय परिवारों में नाम अमीरों के रख लेते हैं। जैसे, मुकेश, गौतम वगैरा. और कुछ न सही नाम तो अमीरों वाला होना चाहिए. कुछ लोग पद को ही अपना नाम बना लेते हैं. जैसेकि मैनेजर सिंह, कमांडर प्रसाद वगैरा.

निम्न और मध्यवर्गीय परिवारों के लोगों की संज्ञा जो भी हो विशेषण गरीबदास लाचारप्रसाद ही होता है. पर कुछ मध्यवर्गीय परिवार अपना नाम ऐसा रखते हैं जो उन की आर्थिक हैसियत की याद दिलाता रहे और बंदा अपनी हैसियत कभी न भूले. गरीबदास लाचारप्रसाद का परिवार भी वैसे परिवारों में ही था जो अपने पैर जमीन पर रखने में यकीन करते हैं.

आजकल शहर बढ़ने के मामले में महंगाई को भी बुरी तरह से मात दे रहे हैं. पहले एक मोहल्ला बनता है फिर बढ़तेबढ़ते वह ग्रेटर उपसर्ग ले लेता है. और भी बढ़ कर ऐक्सटैंशन प्रत्यय उस के साथ लग जाता है. आने वाले समय में शायद उपसर्ग और प्रत्यय दोनों लगाने की आवश्यकता पड़ें.

उदाहरण के लिए रामनगर बढ़ कर ग्रेटर रामनगर हो जाएगा फिर रामनगर ऐक्सटैंशन और आगे चल कर ग्रेटर रामनगर ऐक्स्टैंशन. उपसर्ग और प्रत्यय का ऐसा भी अकाल नहीं है साहित्य की दुनिया में. वैसे, ऐक्सटैंशन में टैंशन शब्द समाहित है. रामनगर, श्यामनगर, करीमनगर या माइकलगंज के साथ जब ऐक्सटैंशन लग जाए तो उस में भी कई प्रकार के टैंशन संलग्न हो जाते हैं. यथा पानी का टैंशन, ट्रैफिक का टैंशन वगैरा का टैंशन, वगैरा का टैंशन.

तो गरीबदास लाचारप्रसाद श्यामनगर ऐक्सटैंशन में गए फ्लैट देखने. रास्ते में अलगअलग बिल्डर, कंपनी के तख्ती लिए खड़े लोगों को देख कर उन्हें स्टेशन, फुटपाथ दुकानों की याद आ गई जहां सामान बेचने के लिए दलाल आएदिन आवाज देते रहते हैं या फिर रेलवे स्टेशन या बसस्टौप के समीप के होटल, जिन के नुमाइंदे ग्राहकों को अपने भोजनालय में ‘ओल्ड इज गोल्ड’ भोजन करने के लिए आने का बारहमासी न्योता देते रहते हैं.

पर्यटन स्थल पर भी ऐसे दृश्य बहुतायत में पाए जाते हैं. वैसे कई शहरों में बस स्टैंड में ऐसे नजारे भी दिख जाते हैं जहां यात्री को एक एजेंट किसी और बस में बैठा देता है तो उस का समान दूसरा एजेंट किसी और बस में रख देता है.

गरीबदास लाचार प्रासाद इन तख्तीधारियों से बचतेबचाते एक बिल्डर के औफिस में पहुंचे. जोरदार तरीके से स्वागत हुआ उन का. कुछ वैसे ही जैसे बलि देने के पहले बकरे का होता है. चायकौफी परोसा गया, जलपान के लिए पूछा गया. तरहतरह के रंगीन आकर्षक पैंफलेट और बुकलेट दिखाए गए जिसे देख वे उच्च जीवनशैली जीने के हसीन सपनों में ऐसे खोए कि मुंगेरीलाल के हसीन सपनों के सारे रिकौर्ड तोड़ बैठे. फिर उन्हें अतुलनीय सैंपल फ्लैट का विहंगम अवलोकन करवाया गया. सैंपल फ्लैट के परिवेश उर्फ चक्रव्यूह को देख मंत्रमुग्ध होने से कोई अनुभवी व्यक्ति ही बच सकता था पर इस मामले में अधिकांश ‘फ्लैटार्थी’ अभिमन्यु ही साबित होते हैं.

चक्रव्यूह में घुस तो जाते हैं, मगर निकल नहीं पाते क्योंकि बिल्डर के कर्मचारी और दलालरूपी अनेक योद्धा उन्हें पस्त करने के लिए हाजिर रहते हैं और उन योद्धाओं का एक ही उद्देश्य होता है कि चक्रव्यूह के अंदर आने वाला बिना फ्लैट बुक किए वापस जाने न पाएं. और इस के लिए जिम, स्विमिंग पूल, क्लब हाउस आदि के तिलस्म का प्रयोग किया जाता है. 56 इंच के टीवी पर ऐनिमेटेड दृश्य का अकाट्य जाल फेंका जाता है.

तो गरीबदास उर्फ अभिमन्यू चक्रव्यूह में फंस गया अर्थात फ्लैट की बुकिंग राशि जमा कर दी. राशी जमा होते ही गरमजोशी से उन से हाथ मिलाया गया और उपहार में सुंदर जिल्द वाली गीता दी गई.

“पर गीता ही क्यों?” उन्होंने सेल्स ऐग्जीक्यूटिव से पूछा.

आजकल सभी कंपनियां अपने कर्मचारियों को और कुछ दें न दें पदनाम प्यार से देते हैं- सेल्स ऐग्जीक्यूटिव, कस्टमर रिलेशन औफिसर, मार्केटिंग सुपरिटैंडेंट वगैरा. वेतनभत्ते भले ही कम दें पर पदनाम ऐसा देते हैं कि कम वेतनभत्ते के दर्द को वे भूल जाते हैं. ‘आटे की बरफी पर चांदी का वर्क’ की तरह ये पदनाम होते हैं.

“सर, इसी में तो सारा ज्ञान समाहित है,” ऐग्जीक्यूटिव उवाच अर्थात ऐग्जीक्यूटिव ने कहा. पर उस के आंगिक भाषा से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह कह रहा हो यह बहुत बड़ा सहारा बनेगा आप के लिए. इसे ठीक से पढ़ लेना. न सिर्फ पढ़ लेना बल्कि हृदय में भी समा लेना. कुछ खोने के गम से उबरने में सहायता मिलेगी.
फिर समयसमय पर लाखों रुपए के किश्त भरते रहें अपने फ्लैट में रहने के हसीन सपने की प्रत्याशा में.

जब रजिस्ट्री का समय आया तो न जाने कौनकौन से अड़चन आएं कि वर्ष दर वर्ष बीतते गए पर फ्लैट पाने की तमन्ना दिवास्वप्न बन कर रह गई. अब बिल्डर के द्वारा प्रदत्त गीता ही उन का सहारा है. उसे पढ़ कर ज्ञानी बन रहे हैं और ध्यान से अपने जीवनभर की पूंजी को गंवाने के दुख को विस्मृत करने की कोशिश कर रहे हैं और खुद से यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्यों व्यर्थ चिंता करते हो? चिंता चिता समान होती है. चिंता से चतुराई घटेगी. किस से व्यर्थ डरते हो? अर्थात फ्लैट नहीं भी मिलेगा तो क्या होगा. जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है वह अच्छा हो रहा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा. यानि यदि फ्लैट नहीं भी मिलेगा तो भी उस में कोई न कोई हितकारक बात ही होगी. तुम भूत का पश्चाताप न करो अर्थात जीवनभर की कमाई गंवाने का मलाल मन में न रखो. तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो, तुम क्या लाए थे जो तुम ने खो दिया, तुम ने क्या पैदा किया था जो नाश हो गया, न तुम कुछ ले कर आए थे, जो लिया यहीं से लिया, जो दिया यहीं पर दिया. जो लिया इसी से लिया. जो दिया उसी को दिया. खाली हाथ आए और खाली हाथ चले. आज जो तुम्हारा है कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा. तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो. बस, यही प्रसन्नता तुम्हारे दुखों का कारण है. अर्थात गीता का बड़ा सहारा है उन्हें.

अब उन की समझ में बात आई कि बिल्डर बुकिंग के समय सभी को गीता क्यों देता था. साथ ही बगल वाले बिल्डर के अपार्टमैंट को माननीय न्यायालय के द्वारा गिराए जाने के आदेश को मद्देनजर रखते हुए खुद को खुशनसीब मान रहे हैं कि उन का अपार्टमैंट कम से कम सीना तान कर खड़ा तो है.

जैसे गीता के ज्ञान ने कौरवों और पांडवों को बरबाद कर दिया। उसी प्रकार शायद आने वाले दिनों में कोर्ट निर्णय दे कि जो अपार्टमैंट बन रहा है वह अवैध है और उसे ढहा दिया जाए. फिर जिन के खूनपसीने की कमाई इस में लगी है उस के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने के लिए कोई कमिटी बना दी जाए और एक बार फिर से अनवरत प्रतीक्षा का सफर शुरू हो.

कहा गया है कि जब तक सांस तब तक आस. अब फ्लैट पाने की आस पूरी होने तक सांस बची रहे तो उसे सौभाग्य माना जाए अन्यथा गीता का ज्ञान तो है ही,’क्यों व्यर्थ चिंता करते हो…’ Social Story

Family Story : आंसू – डाक्टर एरिक रामसे ने प्रणब से क्या कहा ?

Family Story : प्रणब चंद्र बोस कोलकता में एक कैमिकल कंपनी के सीईओ थे. उन की उम्र तकरीबन 48 साल रही होगी. प्रणब के मातापिता एक मध्यम वर्ग के लोग थे और राजगीर नगर महल्ले में रहते थे. पिताजी, जिन्हें वह “बाबूजी” कह कर पुकारता था, एक सरकारी दफ्तर में काम करते थे और मां घर के पास के एक प्राइमेरी स्कूल में दूसरी जमात के बच्चों को पढ़ाती थीं.

प्रणब उन की अकेली संतान थी और अपने मातापिता के साथ और पड़ोसियों व दोस्तों के बीच एक संस्कारी और शांतिभरे माहौल में फलफूल कर बड़ा हुआ था.

प्रणब बचपन से ही मेधावी था. उस ने 12वीं जमात की परीक्षा बड़े ही अच्छे अंकों से पास की और प्रदेश में उस का तीसरा रैंक था, इसलिए कोलकाता यूनिवर्सिटी में दाखिले में कोई दिक्कत न हुई. उसे स्कौलरशिप के साथ एडिमशन मिल गया. वहां से कैमिस्ट्री के विषय में स्नातक बना.

प्रणब और उस के मातापिता की बड़ी इच्छा थी कि वह आगे की पढ़ाई विदेश में जा कर करे और बड़ा नाम कमाए. चाहे उस को बड़ी उम्र में, अपने एकलौते बेटे से दूर रह कर अकेले ही क्यों न रहना पड़े. उस के एक चहेते प्रोफैसर डाक्टर घोष, जो खुद भी विदेश से लौट कर आए थे, ने बाबूजी से यह आग्रह किया कि वे उसे आगे की पढ़ाई अमेरिका में करवाएं, जिस से उस की प्रतिभा और कड़ी मेहनत और कुछ कर पाने की इच्छा विकसित हो सके.

प्रणब के मातापिता और प्रोफैसर को पूरा विश्वास था कि प्रणब अपनी पढ़ाई कर के भारत लौटेगा, जैसे कि प्रोफैसर ने खुद ही किया था.

अमेरिका में प्रणब ने अपने प्रोफैसर की अनुशंसा पर शिकागो विश्वविद्यालय में एडिमशन ले लिया. उस ने 5 सालों में ही कैमिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी के साथ एमबीए भी कर लिया. साथ ही साथ उस को स्कौलरशिप भी मिलती थी. इस के अलावा वह शाम को हफ्ते में 3 बार पढ़ा कर थोड़े से पैसे बना लेता था.

प्रणब को अपने मातापिता की बहुत याद आती थी, इसलिए अपने पैसे बचा कर वह साल में एक बार 2-3 हफ्ते के लिए भारत जरूर आता. अपने मातापिता के साथ वह 1 या 2 तीर्थस्थानों और देखने वाली जगहों पर जा कर वापस चला जाता था. उस को तो मातापिता के साथ बिताए समय में बड़ा ही मजा आता था. वह फिर भारत लौट कर आने की प्रतीक्षा करता था.

5 साल बाद जब प्रणब घर आया, तो उस को बंगाल एग्रोकैमिकल्स कंपनी में एक अच्छी नौकरी मिल गई. अपनी काबिलीयत और कड़ी मेहनत से उस ने काफी तरक्की की. इस बीच उस की शादी सुलेखा से हो गई. जल्दी ही वह एक बेटी का बाप बन गया. अपने परिवार के साथ वह एक बड़े से घर में रहने लगा. वहां मातापिता के आराम की सारी सुविधाएं थीं.

प्रणब की तरक्की में तब चारचांद लगे, जब 46 साल की उम्र में वह कंपनी का सीईओ चुना गया.

अब तक बाबूजी रिटायर हो चुके थे. बुढ़ापे की वजह से उन की सेहत थोड़ी ढीली चल रही थी. अब वे पहले की तरह चल नहीं पाते थे. इस बीच कोलकाता में हैजा फैल गया और अचानक ही उस की मां का देहांत हो गया. यह इतना अचानक हुआ कि एक दिन उस ने डाक्टर को बुलाया और उस ने दवा दी और दूसरे दिन ही उन्होंने प्राण त्याग दिए.

यह सदमा बाबूजी सह न सके. अपने 51 साल के साथी को खो देने का गम वे सह नहीं पाए और उन्हें लकवा मार गया. उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया.

मां के जाने का गम प्रणब को भी था, तभी ऐसी दर्दनाक और अप्रत्याशित घटना घटी कि बाबूजी के स्ट्रोक ने तो उसे जैसे मूर्छित ही कर दिया. वह अपना दिमागी संतुलन खो बैठा. अपनी पत्नी और डाक्टरों की सलाह से यह निश्चय किया कि उसे आराम की सख्त जरूरत है. उस ने महीनेभर के लिए आराम करने का निश्चय किया.

कंपनी के बोर्ड ने मामले की गंभीरता को समझा और उसे आराम करने की अनुमति दे दी. प्रणब की जगह सुदर्शन शर्मा को अंतरिम सीईअच बना दिया.

प्रणब जब अपने परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों की सहायता से संभला, तो उस ने निश्चय किया कि वह अब बाबूजी के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएगा. उन की सेवा के लिए उस ने 2 नौकरों को रखा. एक 45 साल के शेरू को, जो रातभर बाबूजी के साथ रहता था. दिन में सेवा के लिए एक महिला नर्स रखी.

थोड़े दिनों के अनुभव के बाद पता चला कि वे दोनों अच्छी तरह से बाबूजी की सेवा किया करते थे. वह कुछ आश्वस्त हुआ कि उस ने अच्छा फैसला लिया था और बाबूजी भी खुश  लगते थे.

अब प्रणब जैसे ही घर आता, सब से पहले बाबूजी को नमस्कार करता, गले लगाता और उन के साथ तकरीबन घंटेभर बैठ कर उन की सेवा करता, बातें करता और पैर दबा कर उन्हें आराम कराता. बाबूजी को बहुत ही अच्छा लगता और वे आशीर्वाद और दुआओं से उस की शाम सुहानी बना देते.

प्रणब को शाम की इन क्रियाओं से जो सुकून, शांति और खुशी मिलती, उस की व्याख्या करना तो असंभव है. वैसे भी प्रणब इन चीजों को महत्व नहीं देता कि और लोग उस की तारीफ कर रहे हैं या निंदा. वह तो अपने मन की शांति के लिए ये सब कर रहा था.

अब बाबूजी की सेवा करना तो एक दिनचर्या बन गई थी, जिस को एक दिन भी चूकना प्रणब के लिए असहनीय बन गया था.

एक दिन प्रणब ने साफ तौर पर देखा कि जब वह बाबूजी के पास पहुंचता था और गले लगाता था, तो बाबूजी बड़े ही भावुक हो जाते और उन की आंखों से आंसू निकल आते थे.  कभीकभी तो ये आंसू झरझर कर बहने लगते. स्वाभाविक है कि प्रणब की आंखें भी भर आतीं और वह बड़े प्यार से उन्हें आश्वासन देता कि सब ठीक हो जाएगा.

एक दिन दोपहर को आधा दिन काम करने के बाद जब प्रणब घर पहुंचा और सीधा बाबूजी के कमरे में गया, तो उस ने देखा कि बाबूजी की आंखों से अब भी आंसू बह रहे थे. उस ने उन की नर्स से बात की, तो पता लगा कि यह तो रोज की बात है. चिंता करने की जरूरत नहीं है. ये आंसू तकलीफ के आंसू हैं, जो उन को दवाई मिलने से पहले वे कष्ट में रहते हैं, उन को जोड़ों और सिर में दर्द होता है, लेकिन दवाई मिलने के बाद ये दर्द कम हो जाते हैं और उन्हें आराम मिल जाता है. और वे सो जाते हैं. प्रणब ने डाक्टर से भी पूछा, तो वे भी नर्स के विचार से पूरी तरह सहमत थे.

प्रणब और उस के परिवार का जीवन ढर्रे पर चल रहा था. प्रणब चैन की नींद सोता था. वह अपने पिता और परिवार के भविष्य के बारे में थोड़ाबहुत चिंतित तो रहता ही था, जो कि स्वाभाविक था.

एक रात की बात है. प्रणब बिस्तर में लेटा हुआ था, तभी उसे अचानक एक विचार आया. उस ने सोचा कि वह जब भी बाबूजी से मिलेगा, तो उन के आंसुओं को एकत्रित करेगा. उस ने बाजार से कुछ टैस्ट ट्यूब खरीदे. शाम को जब वह बाबूजी से मिलने गया, तो बाबूजी उसे देख कर हमेशा की तरह मुसकरा दिए. प्रणब उन के गले लगा और बातचीत कर रहे थे कि उन की आंखें भीग गईं और उन से आंसू निकलने लगे.
प्रणब ने तभी इन टैस्ट ट्यूब में आंसुओं को एकत्रित कर लिया. उस ने बाबूजी से पूछा कि उन को आंसू क्यों आ गए? क्या वे दर्द में हैं?
बाबूजी ने बहुत कोशिश के बाद धीमी आवाज में बोल और इशारों से प्रगट किया कि वे इतने प्रफुल्लित हो जाते हैं कि उन की आंखों से स्वाभाविक ही आंसू निकल आते हैं और वो उन्हें रोक नहीं सकते.

प्रणब ने डाक्टर से पूछा, तो उन्होंने बताया कि शायद ये आंसू आभार, कृतज्ञता, आशीर्वाद और खुशी के हैं. डाक्टर ने यह भी कहा कि मुझे पूरा यकीन है कि इन आंसुओं के बहाने के बाद बाबूजी बहुत खुश नजर आते होंगे और वे सुखदायक विचार प्रगट करते होंगे. प्रणब ने पूरी तरह से इस का समर्थन किया.

प्रणब अब हमेशा बाबूजी के आंसू टैस्ट ट्यूब में एकत्रित करता. इस के अलावा उस ने देखा कि शनिवार और रविवार को जब वह उन से मिलता है और बाबूजी जब दर्द में होते हैं, तो उन के आंसू निकल आते हैं.

उस ने एक और टैस्ट ट्यूब में उन को भी एकत्रित करना शुरू कर दिया. नर्स को भी उस ने दिखाया कि वह कैसे बाबूजी को बिना किसी कष्ट दिए उन के आंसुओं को एकत्र करे.

कुछ समय बाद प्रणब के पास 2 तरह के आंसुओं से भरे कई टैस्ट ट्यूब एकत्रित हो गए. वह आंसू के टैस्ट ट्यूब को संभाल कर अपने शयनकक्ष में कबर्ड में रखता. पहले तो इस का पता प्रणब की पत्नी सुलेखा को भी नहीं था, लेकिन थोड़े दिनों के बाद जब भेद खुला, तो उस ने सच बता दिया. इसे सुन कर तो वह भी बड़ी खुश हुई और बिना एक शब्द बोले उस ने अपनी भावनाएं बता दीं, और उसे गले से लगा लिया.
प्रणब जब से शिकागो यूनिवर्सिटी से भारत आया था, तभी से वह अपने पुराने प्रोफैसरों के संपर्क में था. कभी पत्रों से, तो कभी फोन या ईमेल से. उन के प्रोफैसर के भारत आने पर वह उन से अपने बिजनैस के बारे में भी सलाह और सुझाव लेता था. सारे प्रोफैसरों में डाक्टर श्रीनिवासन उस के सब से अधिक पसंदीदा प्रोफैसर थे. वह उन से भी सलाह लिया करता था. वे बड़े ही मेधावी और विश्वविख्यात वैज्ञानिक थे, लेकिन उन में घमंड और अहंकार बिलकुल नहीं थे, उन के इन गुणों के कारण ही वह बहुत प्रभावित था. आखिर वह भी तो ऐसा ही था.

एक दिन प्रणब जब औफिस में बैठा अपने पत्रों को पढ़ रहा था, तभी उस की नजर एक पत्र पर पड़ी, जो शिकागो यूनिवर्सिटी से कैमिकल इंजीनियरिंग विभाग से आया था.

प्रणब ने जब उस पत्र को खोला तो पता लगा कि उस पत्र में उसे शिकागो यूनिवर्सिटी द्वारा अरैंज किए हुए एक इंटरनैशनल कैमिकल कौंफै्रंस में उसे एक पेपर देने के लिए आमंत्रित किया गया है. उस पेपर का विषय होगा, “भारत में 1947 से वर्तमान तक, कैमिकल इंजीनियरिंग के विकास और भविष्य में भारत का सहयोग”.

यह निमंत्रण प्रणब के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था. उसे देख कर प्रणब को बड़ी प्रसन्नता हुई, यह कौंफ्रैंस, जिस को प्रोफैसर श्रीनिवासन के द्वारा विस्थापित किया गया था, लगभग 6 महीने बाद जुलाई की 14-19 तारीख तक था.

प्रणब की इस कौंफ्रैंस में जाने की बहुत इच्छा थी. केवल इसलिए नहीं कि इस से उस की इज्जत बढ़ेगी, बल्कि तकनीकी विकास होगा, शोहरत बढ़ेगी, लेकिन इस से भारत का नाम भी होगा और साथ में उस की कंपनी का भी नाम होगा.

लेकिन कुछ सोचने के बाद उसे थोड़ी चिंता हुई कि वह बाबूजी को 10 दिन छोड़ कर कैसे जा पाएगा. उन की देखभाल कौन करेगा, उस की दिनचर्या में “बसी” हुई बाबूजी की सेवा, उन से बात करना, टैस्ट ट्यूब में आंसू एकत्रित करना कौन करेगा ?

प्रणब ने जब अपने मन का दुख अपनी पत्नी सुलेखा को बताया, तो उस ने कुछ सोचने के बाद कहा कि अगर वे इजाजत दें, तो उन की गैरमौजूदगी में बाबूजी की सेवा करेगी. उन की खुशी और दुख के आंसू एकत्र करेगी.

प्रणब ने जब यह सुना, तो उसे बड़ी प्रसन्नता हुई, लेकिन वह तो सोचता था कि वह इस कौंफ्रैंस में अपनी पत्नी को भी साथ ले जाएगा. उस का न जाना तो उस की पत्नी के साथ अन्याय होगा.

सुलेखा समझ गई थी कि प्रणब अभी भी कुछ चिंतित हैं. सुलेखा ने आश्वासन दिया कि वह अगर उस के साथ जाने के बारे में चिंतित है, तो उसे चिंता की कोई जरूरत नहीं है. सुलेखा ऐसा इसलिए कर रही है, क्योंकि बाबूजी की सेवा करना उस का भी धर्म है. उसे ऐसा कर के बड़ी खुशी होगी. वह जैसे अपने पिता की मौत से पहले उन की सेवा कर चुकी है, उसे आप के पिता की सेवा करने का मौका दीजिए, क्योंकि इस से उसे बड़ा ही संतोष मिलेगा और जहां तक विदेश घूमने जाने का सवाल है, तो वह कभी आगे भी पूरा हो जाएगा. वैसे भी कौंफ्रैंस में प्रणब इतना बिजी होगा कि कुछ और करने का समय भी तो नहीं मिलेगा.

प्रणब को सुलेख की बातों में सचाई की सुखद महक आई. थोड़ा सोचने के बाद प्रणब ने सुलेखा का आभार जताया और उस की बात मानने का निश्चय किया. उस ने अपने सीनियर  कर्मचारियों और सुदर्शन को बताया कि वह जून में 10 दिन के लिए शिकागो जाएगा.

शिकागो जाने से पहले ही उस ने अपने पेपर लिखने की जोरशोर से तैयारी शुरू कर दी, क्योंकि वहां जाने में केवल 3 महीने ही बचे थे.

आखिर वह दिन आ ही गया. प्रणब शिकागो पहुंच गया. शिकागो जाने से पहले उस ने सारी तैयारी कर दी थी. उस ने बाबूजी को बता दिया था कि वह जून में 10 दिन के लिए विदेश जा रहा है और उन दिनों सुलेखा ही बाबूजी की सेवा करेगी और उन के आंसू भी टैस्ट ट्यूब में जमा करेगी. वह हर रोज बाबूजी से जूम पर बात करेगा.

बाबूजी ने उसे खुशीखुशी अनुमति दे दी. इस मौके पर भी वह इन आंसुओं को एकत्र करना न भूला.

जब प्रणब अपने बैग तैयार कर रहा था, तो उस ने एक बैग में बाबूजी के आंसुओं के 2 टैस्ट ट्यूब (एक खुशी के आंसू और एक दर्द के) रखना नहीं भूला.

शिकागो पहुंच कर वह प्रोफैसर श्रीनिवासन से मिला और पुरानी यादों, उस के पेपर और कौंफ्रैंस के बारे में और परिवार के बारे में बात करतेकरते कितने घंटे बीत गए, लेकिन किसी को खबर ही नहीं लगी.

प्रणब ने प्रोफैसर श्रीनिवासन को अपना पेपर पढ़ने को दिया. पढ़ने के बाद प्रोफैसर श्रीनिवासन ने उसे शाबाशी दी और कहा कि उन्हें पूरा विश्वास था कि प्रणब बड़ा ही उच्च स्तर का पेपर लिखेगा. प्रणब ने उन्हें निराश नहीं किया. उन्होंने कहा कि इस में कोई संदेह नहीं कि उस के पेपर की बड़ी प्रशंसा होगी और कौंफैं्रस में उस का और भारत का नाम होगा. और वैसा ही हुआ भी.

उस के प्रिजेंटेशन के बाद लोगों ने बड़ी तालियां बजाईं, जो एक मिनट तक रुकी ही नहीं. उस के बाद भी कई लोगों ने अलग से बड़ी आत्मीयता से उस से हाथ मिलाए और तारीफ के पुल बांध दिए.

प्रणब ने अपने परिवार, खासकर बाबूजी को जूम पर बताया, तो वे भी आनंदित हुए और उन के खुशी के आंसू थमते ही नहीं थे.

पेपर प्रस्तुत करने के एक दिन बाद प्रणब ने प्रोफैसर श्रीनिवासन और उन की पत्नी को अपने होटल में डिनर के लिए दावत दी. पतिपत्नी थोड़ा जल्दी पहुंच गए. प्रणब ने उन्हें अपने कमरे में बुलाया और थोड़ी देर इधरउधर की बातों में लग गए.

प्रोफैसर श्रीनिवासन ने नोटिस किया कि प्रणब की टेबल पर 2 टैस्ट ट्यूब पड़ी थीं. वे थोड़ा हैरानी में पड़ गए, लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं. थोड़ी देर बातचीत के बाद वे तीनों डिनर के लिए रैस्टोरेंट में पहुंचे और एक बहुत ही स्वादिष्ठ, पौष्टिक और संतुष्टि देने वाले खाने का लुत्फ उठाया. खाना मिलाजुला था, भारतीय और अमेरिकी शैली का और उस में दोनों पाकशैलियों के लक्षणों के स्वाद थे.

थोड़ी देर आराम करने के बाद सब लोग अपने घर चले गए. कार में चलते समय और सोने तक प्रोफैसर श्रीनिवासन सोचते रहे कि उन ट्यूबों में क्या था, जिसे प्रणब अपने कमरे में संभाल कर रखे हुए था. लेकिन कुछ समझ में नहीं आया. उन्होंने निश्चय किया कि कल जब प्रणब उन से मिलने आएगा, तो वे उस से जरूर पूछेंगे.

दूसरे दिन जब प्रणब उन से मिलने गया, तो उन्होंने कहा कि प्रणब, अगर मैं तुम से एक बड़ी निजी बात पूछूं, तो कोई एतराज तो न होगा? अगर थोड़ी भी हिचकिचाहट हां, तो माफ करना. हम यह बात यहीं पर समाप्त कर देंगे.

प्रणब ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे बेफिक्र हो कर जवाब देगा. आखिर आप मुझ से बड़े हैं. मुझे पूरा विश्वास है कि आप के सवाल बड़े ही अच्छे ही होंगे.

प्रोफैसर श्रीनिवासन को यह सुन कर बड़ी खुशी हुई और उन्होंने उस से वहां टेबल पर रखे 2 टैस्ट ट्यूब के बारे में पूछा.

प्रणब ने कहा कि यह तो बड़े संयोग की बात है और उसे खुशी है कि उन्होंने इस बारे में पूछा, क्योंकि वह इस के बारे में उन से बात करना चाहता था, लेकिन मौका न मिला था और न हिम्मत.

प्रणब ने सारी बात उन्हें कह सुनाई कि कैसे उसे यह विचार आया और कैसे वह बड़े दिनों से इन आंसुओं को एकत्र कर रहा है. उस की वजह इन टैस्ट ट्यूबों को यहां लाने की यह थी कि वह उन से इस बारे में बात कर के पूछना चाहता था कि इन आंसुओं की जांच करवाने में वे इस की मदद कैसे कर सकते हैं?

प्रोफैसर श्रीनिवासन ने जब यह सब सुना, तो वे प्रणब से बहुत प्रभावित हुए कि वह अपने पिता को कितना प्यार करता है. उन्होंने आंसू एकत्र करने वाली ऐसी भक्ति के बारे में कभी नहीं सुना था और उन की आंखें नाम हो गईं. जब वे संभले तो उन्होंने प्रणब से कहा कि उस ने एक बहुत ही रोचक बात उठाई है. यह प्रकृति का संयोग है या कोई जादू, यह उन्हें नहीं पता, लेकिन वे एक ऐसे वैज्ञानिक डा. एरिक रामसे को जानते हैं, जो उन के बहुत अच्छे दोस्त है. वे जानेमाने न्यूरोलौजिस्ट हैं. वे आंसुओं के बारे में बहुत माहिर हैं. वे और उन के विद्यार्थी इस विषय पर रिसर्च भी कर रहे हैं.

प्रोफैसर श्रीनिवासन ने कहा कि वे उन के घर के पास ही रहते हैं. आज ही वे उन से बात करेंगे कि अगर वे कल अपना थोड़ा समय दोनों को दे सकें, तो उन के बड़े आभारी होंगे, क्योंकि प्रणब परसों भारत लौट जाने वाला है.

प्रोफैसर श्रीनिवासन ने डाक्टर एरिक रामसे से बात की, तो वे भी प्रणब के आंसू एकत्र करने के बारे में सुनने के बाद बड़े ही प्रभावित हुए. उन्होंने कहा कि वे शाम को उन से अपने औफिस में मिलेंगे और बातचीत करेंगे.

दूसरे दिन प्रणब और प्रोफैसर श्रीनिवासन डाक्टर एरिक रामसे के औफिस पहुंचे. उन्होंने दोनों का स्वागत किया और बातचीत करने लगे. डाक्टर एरिक रामसे ने उन्हें अवगत कराया कि “आँसू” की रिसर्च पुरानी भी है और नई भी, क्योंकि अभी तक जो वैज्ञानिकों को पता है, उस से अधिक उन्हें भी नहीं पता है. यह रिसर्च अभी भी चल रही है और चलती रहेगी.

बातचीत के दौरान डाक्टर एरिक रामसे ने बताया कि समय की कमी के कारण मैं आप को पूरी तरह से तो नहीं बता सकता, केवल संक्षिप्त में बता रहा हूं कि आंसू आप की आंखों के लिए बहुत ही जरूरी हैं, क्योंकि वे आप को लुब्रिकेट करते है और आप के इम्यून सिस्टम  यानी निरापद प्रणाली की मदद करते हैं, और इर्रीटेंट्स साफ करते हैं. आंसू में 3 परतें होती हैं. वे जल, नमक, एंटीबौडीज, एंटीबैक्टीरियल एंजाइम और कई कैमिकल्स के बने होते हैं. आंसू आप की आंखों को तरल रखते हैं और यह कई कैमिकल्स जिस में लाइसोजाइम जैसे कैमिकल्स हैं. दूसरे तरह के आँसू वे हैं, जो आंख की दूषित वातावरण के इर्रीटेंट्स जैसे कि प्याज काटने पर उस का रस, गंध, गैसें, ,अत्यधिक रोशनी से, पीपर स्प्रे, मंुह को तीखा यानी उग्र करने वाले पदार्थ, खांसी इत्यादि की वजह से निकलते हैं और आंखों को साफ करते हैं. तीसरी प्रकार के आंसू होते हैं भावनात्मक या संवेदना के या फिर रोने वाले. यह तब निकलते हैं, जब भावनात्मक तनाव बढ़ जाता है, जैसे बहुत प्रसन्नता या खुशी, दिमाग का और शरीर का असहनीय दर्द, क्रोध, पीड़ा, अतिआनंद या हंसी के माहौल में, संवेदना के आंसू. दूसरे 2 तरह के आंसुओं से कैमिकल कंपोजीशन में बहुत ही विभिन्न होते हैं. इन में कई प्रोटीन वाले हार्मोंस होते हैं, जो कई तरीकों के कैमिकल्स हैं, जो दर्द को कम करने, आंख की हिफाजत करने और भावनात्मक शांति में मदद करते हैं और व्यक्ति को आराम देते हैं.

डाक्टर एरिक रामसे ने प्रणब के बाबूजी के आंसू एकत्र करने को एक बड़ी ही हैरानी वाली बात कही कि उन के शारीरिक दर्द के आंसू और खासतौर पर संवेदना के आंसू, जो उस के  बाबूजी से प्रेम, श्रद्धा और लगाव का प्रतीक है.

उन्होंने प्रणब को प्रस्ताव दिया कि अगर वह इन टैस्ट ट्यूब में एकत्रित खुशी और दर्द के आंसुओं को उन के पास छोड़ जाए, तो वे उसे रिजर्व करेंगे, रिसर्च करेंगे. उन को विश्वास था कि कुछ न कुछ नई जानकारी उभर कर आएगी, क्योंकि एक तो यह आंसू प्योर हैं, सच्चे  है और गहरी भावना के दौरान एकत्र किए गए हैं.

प्रोफैसर श्रीनिवासन और प्रणब बड़े प्रसन्न हुए और दोनों ने डाक्टर एरिक रामसे को अपना आभार जताया और टैस्ट ट्यूब खुशीखुशी उन को दे दिए. डा. एरिक रामसे ने उन्हें 2 पेज की एक लिस्ट भी दी, जिस में आंसुओं के रिसर्च के महत्वपूर्ण पेपर थे, जिस से वे दोनों अपनी जानकारी को बढ़ा सकें.

प्रणब जब भारत पहुंचा, तो बड़ा खुश लग रहा था. वह बहुत हलकापन महसूस कर रहा था मानो उस को कोई बड़ी उपलब्धि मिल गई हो. उस ने यह प्रण लिया कि वह डाक्टर एरिक रामसे और प्रोफैसर श्रीनिवासन के संपर्क में रहेगा और उन से फोन पर बात करता रहेगा.

तकरीबन 3 साल बीत गए, जिस में प्रणब ने प्रोफैसर श्रीनिवासन और डाक्टर एरिक रामसे से कई बार संपर्क किया.

डाक्टर एरिक रामसे ने आंसुओं के और भी सैंपल मंगवाए और रिसर्च के बारे में तीनों बड़ी आत्मीयता से बात करते. डाक्टर एरिक रामसे ने प्रणब को बताया कि रिसर्च अच्छी चल रही है. उन्होंने आगे यह भी बताया कि एक साफ पेपर पर लिख कर यह रिसर्च एक प्रकाशक को भेजी है. इस काम को रोहित कुमार, जो उन का रिसर्च करने वाला छात्र है, प्रणब, प्रोफैसर श्रीनिवासन और डाक्टर एरिक रामसे लेखक हैं. इस पेपर में उन्होंने 3 महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले थे कि बाबूजी के इन भावनात्मक आंसुओं में 1. 2 नए प्रकार के हार्मोंस थे, जिन का आंसुओं के साहित्य में अभी तक विवरण नहीं हुआ था. (हो सकता है कि इसलिए कि वे प्योर यानी शुद्ध थे अर्थात उन में  में मिलावट नहीं थी ) 2. इन आंसुओं में कुछ अलग ही एक सूक्ष्म सी सुगंध थी, जिस को पहचानना आसान  नहीं था. 3. ये आंसू गालों की त्वचा पर देर तक ठहरते थे यानी जल्दी सूखते नहीं थे. ये नई खोज बहुत ही रोचक और आंसुओं की रिसर्च में उन का बहुत बड़ा योगदान होगा. उन्होंने यह भी कहा कि बाबूजी के दर्द के  आंसुओं की रिसर्च अभी भी जारी है.

लेकिन, चाहे कितनी भी वैज्ञानिक रिसर्च  हो, कैमिकल अध्ययन या न्यूरोलौजिकल या मैडिकल रिसर्च हो, उन आंसुओं के पीछे छिपी हुई जो भावनाएं हैं, जो अतःकरण के विचार, इनसानियत का मूक प्रदर्शन, अटूट श्रद्धा, अहंकाररहित त्याग, छत्रछाया का भाव और प्यार को अभिव्यक्त करना विज्ञान से परे है और उस के लिए जो जिन चक्षुओं और यंत्रों की जरूरत है, उन की तो अभी तक खोज ही नहीं हुई है. इन आंसुओं को शब्दों में क्या, पुस्तकों में भी नहीं मिलता है. वो तो केवल प्रणब द्वारा ही अपने मन में, जेहन में महसूस किए जा सकते हैं, और बेचारा प्रणब उस को किसी से कह भी नहीं सकता. Family Story

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