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Intelligent : समझदार कौन – वयस्क या बच्चा, “मां की गोद सुरक्षित या भगवान की”

Intelligent : छोटा बच्चा कहानियों में भरोसा नहीं करता. आप उसे खिलौना देने की जगह क्या यह कह कर खुश कर सकते हैं कि वह सोच ले कि उस के पास एक बड़ी सी गुड़िया है या चौकोर क्यूब है या रेल का इंजन है.

अफसोस यह कि मानव एकदम काल्पनिक कहानियों में अगाध विश्वास रखता है और बच्चों तक से भौतिक व काल्पनिक चीजों में भेद करने की शक्ति छीन लेता है. बच्चा रो कर खाना मांगता है जबकि वयस्क पूजा कर के खाने की तमन्ना करता है. बच्चा मां की गोद में सुरक्षित महसूस करता है जबकि वयस्क एक भगवान को गोद में रख कर खुद को सुरक्षित महसूस करने की झूठी आदत डाल लेता है.

बच्चों का विकास ठोस धरातल पर होता है. वे छू कर, सूंघ कर, देख कर, सुन कर विश्वास करते हैं. वयस्क जिसे छू नहीं सकते, जिसे सुन नहीं सकते, जिसे सूंघ नहीं सकते, जिसे देख भी नहीं सकते उस पर विश्वास ही नहीं करते बल्कि साजिशन पैदा किए गए उस विश्वास के लिए झगड़ने, छीनने और मरनेमारने तक के लिए तैयार हो जाते हैं.
समझदार कौन है, वयस्क या बच्चा?

Uma Bharti : दीदी मां बन कर क्या हासिल हुआ उमा को

Uma Bharti : 17 नवंबर, 2022 से खुद के सभी बंधनों से मुक्त हो जाने का एलान कर देने वाली फायरब्रैंड हिंदूवादी नेत्री मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती (नया नाम दीदी मां) का अब कोई नाम भी नहीं लेता. मशहूर जैन मुनि विद्यासागर से संन्यास दीक्षा लेने वाली उमा उन इनेगिने पिछड़े वर्ग की नेताओं में से एक थीं जिन की राजनीति राममंदिर आंदोलन से इस नारे के साथ चमकी थी कि ‘एक धक्का और दो, बाबरी मसजिद तोड़ दो’. इस के बाद वे 3 बार खजुराहों से सांसद बनीं और केंद्रीय मंत्री भी बनाई गईं लेकिन उन की सियासी जिंदगी की एक बड़ी उपलब्धि थी 2003 में मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बन जाना.

ठीक 259 दिनों बाद उन्हें यह पद छोड़ना पड़ा था. वजह थी 1994 के कर्नाटक के हुबली दंगों में भड़काऊ भाषण देने का आरोपी होने के चलते कर्नाटक की एक अदालत द्वारा उन के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी करना. नैतिकता के आधार पर भाजपा आलाकमान ने उन से जो इस्तीफ़ा लिया वह बहुत जल्द एक सियासी साजिश साबित हुआ. उन की जगह बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया गया हालांकि उन्हें भी जल्द चलता कर यह जिम्मेदारी विदिशा के सांसद शिवराज सिंह चौहान को सौंप दी गई जो 17 साल तक अंगद के पांव की तरह इस कुरसी पर जमे रहे.

अपनी अलग पार्टी भारतीय जन शक्ति पार्टी उमा ने बनाई लेकिन नाकाम रहीं और मायूस हो कर भाजपा में लौट आईं. उन्हें केंद्रीय मंत्री पद तो दिया गया लेकिन दोबारा मुख्यमंत्री की कुरसी उन के लिए ख्वाब ही रही. अब दीदी मां बन गईं उमा खामोश ही रहती हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि अब उन की क्या, अच्छेअच्छों की पूछपरख भाजपा में नहीं रही जो मोदीशाह की पौकेट पार्टी बन चुकी है. आरएसएस विचारक गोविंदाचार्य से प्रेमप्रसंग से ले कर सनातनी होने के बाद भी एक जैन मुनि से ही दीक्षा लेने तक के दर्जनों विवाद और रहस्य उन से जुड़े हुए हैं. अफसोस तो यह कि कोई उन की चर्चा भी नहीं करता.

Slum Demolitions : देश भर में टूटती झुग्गियां “विकास बनाम वंचितों की जंग”

Slum Demolitions : देश में एक ओर हाइवे, मेट्रो और बुलेट ट्रेन का कार्य चल रहा है. इसके साथ ही देश की गरीबी छुपाने के लिए एक और महत्वपूर्ण कार्य चल रहा है झुग्गियों को गिराने का. पहले झुग्गियों में जा जा कर हाथ जोड़ कर नेताओं ने वोट मांगे और अब उस जगह को अवैध बता कर बुलडोजर चलवा रहे है.

2022 तक सबको पक्के मकान देने का लक्ष्य रखा गया था और लक्ष्य पूरा नहीं हुआ तो झुग्गियों को बोलडोजर चलवा कर गिराया जा रहा है. हाल ही में दिल्ली, मुंबई, जूनागढ़, और भोपाल सहित कई शहरों में हजारों झुग्गियों पर बुलडोजर चलाया गया है और यह अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य अभी भी जारी है. दिल्ली के यमुना किनारे बसे बस्तियों की झुग्गियों पर जब बुलडोजर चलवाया गया तो वह दृश्य देखने में इतना भयावह था कि इसे लिखकर बयां करना बहुत ही मुश्किल है. देश की मेनस्ट्रीम मिडिया ने अपने चैनल पर यह नहीं दिखया क्योंकि कोटसूट पहन कर स्टूडियो में न्यूज प्रेजेंट करने वाले एंकर्स को देश विकसित लगता है और गरीबी तो उनके डाटा के मुताबिक कब की जा चुकी है. 11 साल से चल रही सरकार में नेता इतने इमानदारी और मेहनत से काम कर रहे हैं कि उनके शीश महल से गरीबी दिखाई नहीं दे रही है. न यमुना पानी गन्दा है, न बेरोजगारी है और न ही देश में महंगाई है.

सरकार ने झुग्गियां तोड़ी, लेकिन लोगों के लिए उनके घर टूटे, मिनटों में उन्होंने अपने सर छुपाने के लिए बनाई छत गंवा दी. इसके साथ ही बच्चों ने खो दिए अपने वो सपने जिन्हें उन्होंने खुली आंखों से इन झुग्गियों में ही देखा था. सामान के साथसाथ लोगों की यादें और जमापूंजी भी मलबे में दब गई.

क्यों बनती हैं झुग्गियां?

झुग्गियों को तोड़ने से पहले सरकार को खुद से यह सवाल जरुर करना चाहिए था कि आखिर देश में झुग्गियां क्यों बनती है? लोग गांवों से शहरों में कमाने आते हैं ऐसे में उन्हें रहने के लिए छत तो चाहिए ही और शहर महंगाई और भीड़ से त्रस्त है, जो गरीबों को शहर में अपना छत बनाने से रोकते है. न तो सरकारी योजनाओं से सभी गरीबों को उनके लिए पक्का मकान मिल पता है और न ही सरकार उनके लिए कोई विशेष कल्याणकारी योजना बनाती है. अगर कल्याणकारी योजना है भी तो न वह ठीक से संचालित होती है और न उसकी ठीक से मौनिटरिंग होती है. अगर गांव के लोगों को उनके गांव में कोई विकल्प मिल जाता या बुलेट ट्रेन की तरह बुलेट विकास गांव तक पहुंच जाता तो न झुग्गियां बनती और न कभी गांव के लोग शहर की तरफ अपना रूख करते. झुग्गियां लोगों की जरुरत है, क्योंकि शहरों में किराया पर मकान लेना विकल्प नहीं ख्वाब है. नौकरी से पहले लोगों को घर की जरुरत होती है और यही ‘आश्रय’ उसे रेलवे की जमीन, वन विभाग की जमीन या अन्य सरकारी जमीन पर झुग्गी बना देता है. गरीब लोगों के लिए झुग्गी केवल चार दीवारें नहीं होती है. उनके लिए झुग्गी परिवार का पहला सपना होता है, झुग्गी एक उम्मीद होती है कि आने वाला उनका कल और बेहतर होगा. सरकार की बुलडोजर सिर्फ झुग्गी नहीं तोड़ती, वो उनके हैसलों, सपनों और बेहतर कल के सपनों को भी तोड़ देती है.

झुग्गियां जब टूटती हैं तो इलाके में मातम जैसा माहौल होता है. बच्चे अपनी मां की गोद में रोते हैं, पुरुषों के चेहरे पर बेबसी साफ झलकती है और महिलाएं अंदर से टूट चुकीं होती है. मिडिया ढोल पीट कर कहता है कि हम विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए है, लेकिन अगर हम चौथी अर्थव्यवस्था है और मौजूदा सरकार ने करोड़ो लोगों को गरीबी से बाहर निकाल दिया है तो ये झुग्गी में रहने वाले कौन है? क्या यह देश के नागरिक नहीं है? क्या इन्होंने सरकार चुनने के लिए अपना वोट नहीं दिया? ऐसे तमाम सवाल है जिनका जवाब शायद ही सरकार देना पसंद करेगी. सरकार का तो सिर्फ एक ही मकसद दिखाई देता है, जितना हो सकें लोगों को धर्म की ओर झोंक दो, धार्मिक उन्माद फैलाओं ताकि लोग एक दुसरे को मारने-मरने पर उतर आएं. सिर्फ एक ही नारा गूंजना चाहिए, सिर्फ एक ही नाम होना चाहिए और एक ही शासक होना चाहिए. बाकी कोई भी जन मुद्दा हो, चाहे वह कितना भी अहम हो, या चुनाव के दौरान किए गए वादे हो, ये सब पटल पर नहीं आना चाहिए. विकास का सिर्फ हल्ला होना चाहिए, जमीनी विकास नहीं, हवा हवाई विकास होना चाहिए, यही मौजूदा सरकार की मकसद और मंजिल है.

ये तंज नहीं हकीकत है, डिजिटल इंडिया वाली सरकार को पौराणिक भारत व्यापार के लिए चाहिए. सरकार के लोग नए संसद भवन में नए सूट पहनकर पुराने नेताओं से सवाल करें और झुग्गियों पर जनता का कोई सवाल उन्हें पसंद नहीं, वे अवैध है बस ये उन्हें मालुम है. क्या गरीबों को नहीं मालुम है कि उनकी झुग्गी अवैध है? गरीब सब जानते है, लेकिन उनके पास कोई विकल्प नहीं है. क्योंकि न उन्हें उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल पाई है और न इस गरीबी से निकलने का कोई नया रास्ता मिल पाया. जब जब उन्होंने गरीबी से निकलने का प्रयास किया, सरकार ने नया आडंबर रच कर उन्हें गरीब रहने दिया, उन्हें सिर्फ पार्टी का झंडा ढोने और दरी बिछाने के लिए इस्तेमाल किया गया. उन्हें ऐसे बरगलाया गया कि पार्टी के लोग उनके सुखदुख में साथ है. लेकिन वर्तमान परिस्थितियों ने अब सब कुछ साफ कर दिया है.

क्या सारे झुग्गीवासी घुसपैठिए हैं?

मिडिया इस नैरेटिव को अक्सर दिखा रहा है कि झुग्गियों में रहने वाले लोग घुसपैठिय हैं. इसके साथ ही जिस तरह से प्रशासन अल्प समय में कार्रवाई कर रहा है, उससे ये साफ जाहिर होता है कि इस नैरेटिव को सेट करने में प्रशासन मिडिया के साथ मिली हुई है. बीते दशकों तक यही मिडिया झुग्गियों में जाकर रिपोर्टिंग करती थी कि झुग्गियों में बिजली, पानी और साफसफाई की सुविधा होनी चाहिए. अब यही मिडिया झुग्गियों में रहने वाले लोगों को घुसपैठिया बता रही है. देखा जा रहा है कि मुस्लिम बहुल और बंगाली भाषी इलाकों में इस आरोप को और अधिक बल मिलता है. अगर इन झुग्गियों में रहने वाले लोग घुसपैठिया है तो ये भारत में घुस कैसे गए, क्या बौर्डर पर ठीक से निगरानी नहीं हो रहीं है, जबकि देश की सीमा और उससे जुड़े मामले गृह मंत्रालय के अधीन आता है. अगर बौर्डर से घुसपैठ हुई है तो गृह मंत्रालय को अधिकारिक रूप से इसके लिए बयान जारी करना चाहिए और साथ ही इसका डाटा भी जारी करना चाहिए कि कितने घुसपैठिए भारत में दाखिल हुए है. अगर झुग्गी में रहने वाले घुसपैठिए है तो क्या झुग्गी तोड़ने से वे अपने देश वापस चले जाएंगे? ऐसे में तो सरकार को अमेरिका की तरह हाथों में हथकरी लगाकर घुसपैठियों को उनके देश वापस भेजना चाहिए. वहीं सबसे बड़ा सवाल यह है कि लोग झुग्गियों में दशकों से रह रहें हैं उनके पास अधिकारिक पहचानपत्र है और वे चुनावों में वोट भी देते है. ऐसे में सरकार को ये देखना चाहिए कि उनके सिस्टम कौन है जो दस्तावेज बना रहा है, क्योंकि दस्तावेज उन्हीं के बन सकते है जो भारत के किसी न किसी कोने से ताल्लुक रखते है. और बिना सबूत के आधार पर जो दस्तावेज बने सरकार को उन पर ध्यान देना चाहिए, और उन्हें देश से बाहर करना चाहिए, न कि बुलडोजर लेकर आम भारतीयों के घर तबाही मचानी चाहिए.

सच्चाई तो यह है कि झुग्गियों में रहने वाले अधिकतर लोग मजदूरी करते हैं. ये लोग फैक्ट्रियों में, लोगों के घरों में, दुकानों में, काम करते है. ये विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. लेकिन जब सरकार को अपनी मनमानी करनी होती है तो उन्हें घुसपैठिया बता कर निपटा दिया जाता है.

राशन, कपड़े, अस्पताल : झुग्गी में भी जीवन है

अगर झुग्गियां अवैध है तो सरकार को वहां बिजली, पानी नहीं देना चाहिए. इसके साथ ही वहां के लोगों को राशन कार्ड भी नहीं होना चाहिए था. तो फिर सरकार ने ये सब क्यों किया? इसका सीधा जवाब है “वोट बैंक”.

गरीबों के उत्थान के लिए सरकार कम ही काम करती है, छोटेमोटे सुविधा मुहैय्या करवाने से इसमें जितना गरीबों का फायदा नहीं होता उससे ज्यादा इसका राजनितिक फायदा होता है. सरकार बस्तियों में विकास के वादे करती है और पूंजीवाद को बढ़ावा देती है. झुग्गीवासियों को अगर अपनी बिमारी का इलाज करवाना होता है तो उन्हें सरकारी अस्पताल का रूख करना पड़ता है और जग जाहिर है कि सरकारी अस्पताल में इलाज कैसा होता है. ये लोग रोजाना की दिहाड़ी से अपना घर चलाते हैं, इनके पास न कोई इंश्योरेंस है और न कोई सेविंग्स.

भारत में लगभग हर शहर में सरकारी जमीनों पर कब्जा एक आम बात है. इन जमीनों पर बसी बस्तियां ‘अनकहे समझौते’ के तहत बनी होती है. यह कब्जा केवल गरीब आदमी का नहीं होता, इसके पीछे पूरा तंत्र शामिल होता है, जिसमें स्थानीय नेता, दलाल, और भ्रष्ट अधिकारियों की तगड़ी मिलीभगत होती है.

सबसे पहले दलाल जमीन चिन्हित करते हैं, फिर गरीबों को वहां बसाते हैं. उनसे ‘सेटिंग’ का नाम लेकर पैसा भी लिया जाता है. साथ ही वादा किया जाता है कि उन्हें कोई नहीं हटाएगा. लेकिन जब सरकार को वह जमीन किसी भी कीमत पर चाहिए होती है तो दलाल, राजनीतिक लोग सभी गायब हो जाते है.

क्या झुग्गीवासियों की आय नहीं बढ़ी?

सवाल ये भी उठता है कि अगर कोई परिवार झुग्गी में 15-20 साल से रह रहा है, तो क्या उनकी आय में बढ़ोतरी नहीं हुई? क्या अभी भी उनकी स्थिति जस की तस ही हैं?

इस सवाल का जवाब ‘हां और न’ दोनों है. कुछ परिवारों ने तरक्की तो की है, अपने बच्चों को पढ़ाया भी है और निजी किराए के घर में गए है. लेकिन अधिकतर लोग अब भी वहीं है जहां पहले थे. इसके साथ ही कई लोगों ने तरक्की तो की, लेकिन उन्होंने अपनी झुग्गी को नहीं छोड़ा. यही कारण है कि कुछ झुग्गियों में आपको एयर कंडीशन भी नजर आ जाएगा. अधिकतर लोगों के जीवन शैली में बदलाव नहीं होने का मुख्य कारण स्थायी रोजगार की कमी, महंगाई और अस्थिर आय है.

दिहाड़ी मजदूरी करने वाले को प्रतिदिन आय 500 से 600 रुपए भी बड़ी मुश्किल से मिल पाती है. लेकिन मौजूदा समय में ये परिवार का पेट पालने के लिए भी काफी नहीं है. इसलिए वे बच्चों से भी मजदूरी करवाते है, क्योंकि खर्च तीनगुना बढ़ गया है.

सरकार की दुविधा : सुविधाएं दो या तोड़ो?

सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि सरकार एक ओर झुग्गियों को अवैध मानती है वहीं दूसरी ओर वहां विकास कार्य करने का दावा भी करती है. इसके साथ ही पानी, शौचालय, बिजली, राशन कार्ड, आधार कार्ड, वोटर कार्ड भी जारी किए जाते है.

झुग्गियां अगर अवैध है तो वहां वोट मांगना कहां से जायज है? यही कारण है जब झुग्गियां टूटती है तो लोगों में आक्रोश होता है. उनकी आंखे ये सवाल करती है आखिर क्यों उन्हें जबरन निशाना बनाया गया? क्यों अरबों रूपए की योजनाओं में पक्का मकान सरकार उन्हें नहीं दे सकती? क्यों उन्हें नेताओं ने अपने वादों से बरगलाया?

प्रधानमंत्री आवास योजना और हर राज्य सरकारों की हाउसिंग स्कीम्स मौजूद होने बावजूद करोड़ो लोग झुग्गियों में रहने को मजबूर है. इसकी वजह स्पष्ट जानकारी का अभाव, भ्रष्टाचार और अफसरों की मनमानी है, जिस वजह से यह योजनाएं जमीनी स्तर पर फेल हो जाती है. अगर सरकार वाकई चाहती है कि झुग्गियां न हो, तो उन्हें जनता को कल्याणकारी योजनाओं से न्यूनतम आसान किश्तों पर आवास का विकल्प उपलब्ध करवाना होगा, जो कि प्रतिव्यक्ति आय के अनुरूप हो, रोजगार के नए मार्ग सृजित करने होंगे, पूंजीवाद को हावी होने से रोकना होगा ताकि देश में सत्ता और शक्ति का केन्द्रीयकरण न हों. इसके साथ ही जमीन माफियाओं और दलाल तंत्रों एवं लाटसाहब अफसरों पर सख्त कार्यवाही करनी होगी. बुलेट ट्रेन और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट तब सफल होंगे जब आम आदमी की आय बढ़ेगी, उसे पक्की छत मिलेगी. वरना एक तरफ स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट और दूसरी तरफ टूटती झुग्गियां देश के लोकतंत्र को खोखला कर देगी और तानाशाही बढ़ेगी.

Hindi Love Stories : चाय – गायत्री की कौन सी इच्छा अधूरी रह गई थी

Hindi Love Stories : गायत्री को अभी तक होश नहीं आया था. वैसे रविकांत गायत्री के लिए कभी परेशान ही नहीं हुए थे. उस की ओर उन्होंने कभी ध्यान ही नहीं दिया था. बस, घर सुचारु रूप से चलता आ रहा था. घर से भी ज्यादा उन के अपने कार्यक्रम तयशुदा समय से होते आ रहे थे. सुबह वे सैर को निकल जाते थे, शाम को टैनिस जरूर खेलते, रात को टीवी देखते हुए डिनर लेते और फिर कोई पत्रिका पढ़तेपढ़ते सो जाते. उन की अपनी दुनिया थी, जिसे उन्होंने अपने इर्दगिर्द बुन कर अपनेआप को एक कठघरे में कैद कर लिया था. उन का शरीर कसा हुआ और स्वस्थ था.

रविकांत ने कभी सोचने की कोशिश ही नहीं की कि गायत्री की दिनचर्चा क्या है.? दिनचर्या तो बहुत दूर की बात, उन्हें तो उस का पुराना चेहरा ही याद था, जो उन्होंने विवाह के समय और उस के बाद के कुछ अरसे तक देखा था. सामने अस्पताल के पलंग पर बेहोश पड़ी गायत्री उन्हें एक अनजान औरत लग रही थी.

रविकांत को लगा कि अगर वे कहीं बाहर मिलते तो शायद गायत्री को पहचान ही न पाते. क्या गायत्री भी उन्हें पहचान नहीं पाती? अधिक सोचना नहीं पड़ा. गायत्री तो उन के पद्चाप, कहीं से आने पर उन के तन की महक और आवाज आदि से ही उन्हें पहचान लेती थी. कितनी ही बार उन्हें अपनी ही रखी हुई चीज न मिलती और वे झल्लाते रहते. पर गायत्री चुटकी बजाते ही उस चीज को उन के सामने पेश कर देती.

पिछले कई दिनों से रविकांत, बस, सोचविचार में ही डूबे हुए थे. बेटे ने उन से कहा था, ‘‘पिताजी, आप घर जा कर आराम कीजिए, मां जब भी होश में आएंगी, आप को फोन कर दूंगा.’’

बहू ने भी बहुतेरा कहा, पर वे माने नहीं. रविकांत का चिंतित, थकाहारा और निराश चेहरा शायद पहले किसी ने भी नहीं देखा था. हमेशा उन में गर्व और आत्मविश्वास भरा रहता. यह भाव उन की बातों में भी झलकता था. वे अपने दोस्तों की हंसी उड़ाते थे कि बीवी के गुलाम हैं. पत्नी की मदद करने को वे चापलूसी समझते.

रविकांत सोच रहे थे कि गायत्री से हंस कर बातचीत किए कितना समय बीत चुका है. बेचारी मशीन की तरह काम करती रहती थी. उन्हें कभी ऐसा क्यों नहीं महसूस हुआ कि उसे भी बदलाव चाहिए?

एक शाम जब वे क्लब से खेल कर लौटे, तो देखा कि घर के बाहर एंबुलैंस खड़ी है और स्ट्रैचर पर लेटी हुई गायत्री को उस में चढ़ाया जा रहा है. उस समय भी तो अपने खास गर्वीले अंदाज में ही उन्होंने पूछा था, ‘एंबुलैंस आने लायक क्या हो गया?’

फिर बेटेबहू का उतरा चेहरा और पोते की छलछलाती आंखों ने उन्हें एहसास दिलाया कि बात गंभीर है. बहू ने हौले से बताया, ‘मांजी बैठेबैठे अचानक बेहोश हो गईं. डाक्टर ने नर्सिंगहोम में भरती कराने को कहा है.’

तब भी उन्हें चिंता के बजाय गुस्सा ही आया, ‘जरूर व्रतउपवास से ऐसा हुआ होगा या बाहर से समोसे वगैरह खाए होंगे.’

यह सुन कर बेटा पहली बार उन से नाराज हुआ, ‘पिताजी, कुछ तो खयाल कीजिए, मां की हालत चिंताजनक है, अगर उन्हें कुछ हो गया तो…?’

13 वर्षीय पोता मनु अपने पिता को सांत्वना देते हुए बोल रहा था, ‘नहीं पिताजी, दादी को कुछ नहीं होगा,’ फिर वह अपने दादा की ओर मुड़ कर बोला, ‘आप को यह भी नहीं पता कि दादी बाजार का कुछ खाती नहीं.’

उस समय उन्होंने पोते के चेहरे पर खुद के लिए अवज्ञा व अनादर की झलक सी देखी. उस के बाद कुछ भी बोलने का रविकांत का साहस न हुआ. उन का भय बढ़ता जा रहा था. डाक्टर जांच कर रहे थे. एकदम ठीकठीक कुछ भी कहने की स्थिति में वे भी नहीं थे कि गायत्री की बेहोशी कब टूटेगी. इस प्रश्न का जवाब किसी के पास नहीं था.

कुछ बरस पहले गायत्री के घुटनों में सूजन आने लगी थी. वह गठिया रोग से परेशान रहने लगी थी. दोपहर 3 बजे उसे चाय की तलब होती. वह सोचती कि कोई चाय पिला दे तो फिर उठ कर कुछ और काम कर ले. बहू दफ्तर से शाम तक ही आती. एक दिन असहनीय दर्द में गायत्री ने रविकांत से कहा, ‘मुझे अच्छी सी चाय बना कर पिलाइए न, अपने ही हाथ की पीपी कर थक गई हूं.’

रविकांत झल्लाते हुए बोले, ‘और भेजो बहू को दफ्तर. वह अगर घर संभालती तो तुम्हें भी आराम होता.’

हालांकि रविकांत अच्छी तरह जानते थे कि अब महिलाओं को केवल घर से बांध कर रखने का जमाना नहीं रहा, पर अपनी गलत बात को भी सही साबित करने से ही तो उन के अहं की पुष्टि होती थी.

कुछ माह पूर्व रात को सब साथ बैठ कर खाना खा रहे थे. रविकांत हमेशा की तरह अपना खाना जल्दीजल्दी खत्म कर हाथ धो कर वहीं दूसरी कुरसी पर बैठ गए और टीवी देखने लगे. अचानक मनु ने पूछा, ‘दादाजी, क्या आप दादीजी में कुछ फर्क देख रहे हैं?’

रविकांत ने टीवी पर से आंखें हटाए बिना पूछा, ‘कैसा फर्क?’

‘पहले दादीजी को देखिए न, तब तो पता चलेगा.’

बेचारी गायत्री अपने में ही सिमटी जा रही थी. रविकांत ने एक उड़ती नजर उस पर डाली और बोले, ‘नहीं, मुझे तो कोई फर्क नहीं लग रहा है.’

‘आप ठीक से देख ही कहां रहे हैं, फर्क कैसे महसूस होगा?’ मनु निराशा से बोला. इस बीच बहूबेटा मुसकराते रहे.

‘पिताजी, बोलिए न, दादाजी को बता दूं?’ मनु ने लाड़ से पूछा.

फिर वह गंभीर स्वर में बोला, ‘दादाजी, दादी को दोपहर की चाय कौन बना कर पिलाता है, बता सकते हैं?’

दादाजी कुछ बोलें, उस से पहले ही छाती तानते हुए वह बोला, ‘और कौन, सिवा मास्टर मनु के…’

‘तू चाय बना कर पिलाता है?’ रविकांत अविश्वास से हंसते हुए बोले.

‘क्यों, मैं क्या अब छोटा बच्चा हूं? दादीजी से पूछिए, उन की पसंद की कितनी बढि़या चाय बनाता हूं.’

उस समय रविकांत को लगा था कि पोते ने उन्हें मात दे दी. उन के बेटे ने उन से कभी खुल कर बात नहीं की थी. उन का स्वाभिमान, भले ही वह झूठा हो, उन्हें बाध्य कर रहा था कि मनु के बारे में वही खयाल बनाएं जो अन्य पुरुषों के बारे में थे. उन्हें लगा, मनु भी बस अपनी बीवी की मदद करते हुए ही जिंदगी बिता देगा. ऐसे लोगों के प्रति उन की राय कभी भी अच्छी नहीं रही.

अस्पताल में बैठेबैठे न जाने क्यों उन्हें ऐसा लग रहा था कि अब चाय बनाना सीख ही लें. गायत्री को होश आते ही अपने हाथ की बनी चाय पिलाएं तो उसे कितना अच्छा लगेगा. अपनी सोच में आए इस क्रांतिकारी परिवर्तन से वे खुद भी आश्चर्य से भर गए.

एक दिन रविकांत मनु से बोले, ‘‘आज जब भी तू चाय बनाए तो मुझे बताना कि कितना पानी, कितनी चीनी और दूध वगैरह कब डालना है. सब बताएगा न?’’

‘‘ठीक है, जब बनाऊंगा, आप खुद ही देख लीजिएगा. आजकल तो केवल आप के लिए बनती है. वैसे दादी की और मेरी चाय में दूध और चीनी कुछ ज्यादा होती है.’’

‘‘तुम नहीं पियोगे?’’

‘‘जब से दादी अस्पताल गई हैं, मैं ने चाय पीनी छोड़ दी है,’’ कहतेकहते मनु की आंखों में आंसू भर आए.

‘‘आज से हम दोनों साथसाथ चाय पिएंगे. आज मैं बनाना सीख लूंगा तो कल से खुद बनाऊंगा.’’

मनु सुबकसुबक कर रोने लगा, ‘‘नहीं दादाजी, जब तक दादीजी ठीक नहीं हो जाएंगी, मैं चाय नहीं पिऊंगा.’’

रविकांत को पहली बार लगा कि गायत्री की घर में कोई हैसियत है, बल्कि हलकी सी ईर्ष्या भी हुई कि उस ने बहू व पोते पर जादू सा कर दिया है. मनु को गले लगाते हुए वे बोले, ‘‘तुम अपनी दादी को बहुत चाहते हो न?’’

‘‘क्यों नहीं चाहूंगा, मेरे कितने दोस्तों की दादियां दिनभर ‘चिड़चिड़’ करती रहती हैं. घर में सब को डांटती रहती हैं, पर मेरी दादी तो सभी को केवल प्यार करती हैं और मुझे अच्छीअच्छी कहानियां सुनाती हैं. मालूम है, मुझे उन्होंने ही कैरम व शतरंज खेलना सिखाया. मां भी हमेशा दादी की तारीफ करती हैं. बिना दादीजी के तो हम लोग उन के प्यार को तरस जाएंगे.’’

‘‘नहीं बेटा, ऐसा मत बोल. तेरी दादी को जल्दी ही होश आ जाएगा. फिर हम तीनों साथसाथ चाय पिएंगे,’’ पहली बार रविकांत को अपनी आवाज में कंपन महसूस हुआ.

उस दिन उन्होंने चाय बनानी सीख ही ली. मनु को खुश करने को उन्हें अचानक एक तरकीब सूझी, ‘‘क्यों न ऐसा करें, हम रोज दोपहर की चाय बना कर अस्पताल ले जाएं, किसी दिन तो तुम्हारी दादी होश में आएंगी, फिर तीनों साथसाथ चाय पिएंगे.’’

मनु उन की बात से बहुत उत्साहित तो नहीं हुआ, पर न जाने क्यों दिल उन की बात मानने को तैयार हो रहा था.

अगले दिन दोपहर को अस्पताल से फोन आया, बहू बोल रही थी, ‘‘पिताजी, मांजी होश में आ गई हैं, आप मनु को ले कर तुरंत आ जाइए.’’

रविकांत बच्चों की तरह उत्साह से भर उठे. जल्दीजल्दी चाय बना कर थर्मस में भर कर साथ ले गए. वहां गायत्री पलंग पर लेटी जरूर थी, पर डाक्टरों, नर्सों और दूसरे कर्मचारियों के खड़े रहने से दिख नहीं पा रही थी. मनु किसी तरह पलंग के पास पहुंच कर दादी की नजर पड़ने का इंतजार करने लगा.

रविकांत के मन में बस एक ही बात थी कि थर्मस में से अपने हाथ की बनी चाय पिला कर गायत्री को चकित कर दें, उन्होंने यह भी नहीं देखा कि वह वास्तव में होश में आ गई है या नहीं और डाक्टर क्या कह रहे हैं? बस, कप में चाय भर कर गायत्री के पास खड़े हो गए. गायत्री मनु को देख रही थी और मनु उस के हाथ को सहला रहा था.

डाक्टर ने रविकांत को देखा, ‘‘यह आप कप में क्या लाए हैं?’’

‘‘जी, इन्हें पिलाने के लिए चाय लाया हूं,’’ रविकांत की इच्छा हो रही थी कि कहें, ‘अपने हाथ की बनी,’ पर संकोच आड़े आ रहा था.

‘‘नहीं, अब आप को इन का बहुत खयाल रखना पड़ेगा. मैं पूरा डाइट चार्ट बना कर देता हूं. उसी हिसाब और समय से इन्हें वही चीजें दें, जो मैं लिख कर दूं. चीनी, चावल, आलू, घी, वसा सब एकदम बंद. शक्कर वाली चाय तो इन के पास भी मत लाइए.’’

रविकांत चाय का प्याला हाथ में लिए बुत की तरह खड़े रहे. मनु नर्स द्वारा लाया गया सूप छोटे से चम्मच से बड़े जतन से दादी के मुंह में डाल रहा था. Hindi Love Stories

Romantic Story In Hindi : आखिरी इच्छा – क्या थी पूनम की आखिरी इच्छा

Romantic Story In Hindi : मैं अपने ही शहर में होने के बावजूद 1 माह बाद अपने घर में दाखिल हुआ था. पूरे 30 दिन मैं ने दीप्ति के साथ लिवइन में उस के छोटे से घर में बिताया था. इस 1 महीने मैं बेहद खुश रहा था जैसे मन की मुराद पूरी हो गई हो. दीप्ति औफिस में मेरी कुलीग थी. हालांकि उस की उम्र मुझ से 5 साल कम थी मगर वह इतनी खूबसूरत थी कि मैं उस से प्रेम करने लगा था और 1 हफ्ते के मुख्तसर से वक्त में हम ने साथ जीनेमरने की कसमें भी खा ली थीं. यह अलग बात है कि शादी होने से पहले ही लिवइन में एकदूसरे के साथ रहने का हमारा यह फैसला जिहादी था.

शादी में एकमात्र और गंभीर समस्या मेरी पहली पत्नी पूनम थी, जिस से मैं ने 10 साल पहले ठीक इसी तरह से प्रेमविवाह किया था और 1 साल बाद ही मुझे वह औरत इतनी बोर लगने लगी थी कि मैं ने उस की तरफ ध्यान देना ही छोड़ दिया था. अगले 9 सालों तक हमारे बीच रिश्ते कुछ ऐसे रहे जैसे किसी मजबूरी के तहत 2 यात्री किसी 1 ही सीट पर यात्रा करने को विवश हों.

आज घर लौटने के पीछे दीप्ति का आग्रह बड़ी वजह थी. उस ने कहा था कि लिवइन में रहने से अच्छा है कि मैं जा कर पत्नी से तलाक की बात करूं और जैसे भी हो उसे राजी करूं. मुझे विश्वास नहीं था कि तलाक की बात पर वह राजी होगी. आखिर हमारा 8 साल का बेटा वह सूत्र था जिस की वजह से वह मुझ से आज तक बंधी हुई थी और मुझे लगता था कि यह बंधन अब मजबूत होता जा रहा था. बावजूद इस के कि पत्नी का मेरे जीवन मे कोई महत्त्व शेष न था.

घर में दाखिल होते ही उस ने मुझे पानी का गिलास दिया और कुछ पलों बाद चाय बना कर ले लाई. चाय पीते हुए तलाक का जिक्र करना मुझे जल्दबाजी लगी इसलिए मैं ने रात होने तक इंतजार करने का फैसला किया.

वह मेरे आने से शायद बहुत खुश हुई थी. हालांकि उस की खुशी कभी चेहरे पर दिखाई नहीं देती थी. उस के काम से उस के खुश होने का एहसास करने की मुझे आदत सी हो गई थी.आज उस ने खाना मेरी पसंद का बनाया था. मैं सोफे पर बैठा मोबाइल पर गेम खेल रहा था जब उस ने बिन कहे खाना ला कर वहीं परोस दिया.

“तुम से कुछ जरूरी बात करनी थी, 2 मिनट पास बैठो,” वह खाना दे कर जाने लगी तो मैं ने कहा. वह बिना कुछ कहे बगल वाली कुरसी पर बैठ गई. यह दिखाने के लिए कि हालात सामान्य थे मैं इत्मिनान से खाना खाने लगा.

“पिछले 10 सालों से हमारे बीच कुछ भी अच्छा नहीं चल रहा है. हम एकदूसरे के साथ जबरन बंधे से हैं. मैं चाहता हूं कि हम तलाक ले कर एकदूसरे से आजाद हो जाएं. तुम्हारा क्या विचार है,” बहुत हिम्मत कर के एक सांस में मैं ने दिल की बात कह दी. फिर उस के हावभाव को जांचने के लिए उस के चेहरे की ओर देखा. ऐसा लगा जैसे वह किसी गंभीर बीमारी से जूझ रही हो.

चेहरे पर फीकी सी हंसी ला कर उस ने मेरी आंखों से आंखें मिलाईं तो उन आंखों में भी मुझे दूर तक एक सूनापन नजर आया, जिसे देख कर एक पल के लिए दिमाग सन्न रह गया. फिर अगले ही पल दीप्ति का खयाल आते ही जैसे सब भूल बैठा.

“आप की खुशी से बड़ी मेरे लिए कोई बात भला क्या हो सकती है? अगर इसी में आप की खुशी है तो यही सही,” कहते हुए उस का चेहरा उदास हो गया.

“तो फिर मैं वकील से बात कर लेता हूं ताकि वे जरूरी कागजात तैयार कर सकें. संभव है कि 20 दिनों में हम आजाद होंगे.”

“मगर मेरी एक छोटी सी शर्त है…”

“क्या चाहिए तुम्हें?” मुझे लगा कि जैसा मैं समझ रहा था उतनी आसानी से मामला हल न होगा.

“मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए. मैं तो बस इतना चाहती हूं कि जब तक तलाक नहीं हो जाता हम उसी तरह साथ रहें जैसे शादी के पहले 20 दिनों में रहे थे. यह मेरी आखिरी इच्छा है.”

“आखिरी इच्छा?”

“तलाक के बाद तो आप के लिए मैं मर ही जाऊंगी न,” उस ने कहा तो उस का खूबसरत चेहरा सिकुड़ सा गया. बहुत कुछ बदलीबदली सी.

मैं मन ही मन खुश हुआ कि मांगा भी तो क्या, बस 20 दिन. इतने दिनों को तो जेल की सजा समझ कर भी काट सकता था.

फोन कर के औफिस से मैं ने 10 दिनों की छुट्टी ली. फिर दीप्ति को भी फोन पर खुशखबरी सुनाने के साथ ही वकील से बात करने को कह दिया. अब मैं फिल्म के एक पात्र की तरह अभिनय करने के लिए तैयार था.

अभिनय को सशक्त और वास्तविक बनाने के लिए कभी रसोई में काम करती पत्नी को पीछे से बांहों में भर लेता, कभी उसे बांहों में उठा कर बैडरूम में ले आता. वह बरतन साफ कर रही होती तो मैं झाड़ू लगाने लग जाता. वह आटा गूंध रही होती तो सामने बैठ कर अपलक निहारता रहता.

इन सब क्रियाओं के बाद भी लगता कि उस के भीतर कुछ टूट रहा था.जैसे जीने की उमंग मर रही थी. 3 दिनों में ही मुझे एहसास होने लगा था कि अब खुशी और गम के उस के लिए वे मायने नहीं रह गए थे जो तब थे जब हम ने शादी की थी.

एक दिन सुबह वह उठने लगी तो पैरों पर खड़े होते ही ऐसे लड़खड़ाई कि बैड का किनारा हाथ में न आया होता तो गिर गई होती. हालांकि मैं उस के साथ सो भी रहा था मगर मात्र अभिनय के बतौर. वह लड़खड़ाई तो मेरा अभिनय भी जैसे लड़खड़ाया था.

“तुम ठीक हो पूनम?” हालचाल पूछने की बिलकुल नीयत न होने के बावजूद नितांत अपनेपन से दिल की आवाज निकली.

“हां, मैं बिलकुल ठीक हूं. बस, नींद पूरी तरह खुली नहीं थी इसलिए लड़खड़ा गई थी,” फिर कुछ याद करते हुए उस ने पूछा,”वकील से बात हो गई?”

“हां, फोन कर दिया था उसे.”

“आप वकील न ही करते. बेवजह पैसे खर्च होंगे आप के. अगर मैं वैसे ही छोड़ कर चली जाऊं तो?”

मैं जैसे सिहर उठा. जाने क्यों मुझे लगा कि उस के कहने का आशय वह नहीं था जो मैं समझ रहा था. उस ने 20 दिन साथ रहने की शर्त रखते हुए भी क्यों कहा था कि यह मेरी आखिरी इच्छा है?

उस रोज वह दिनभर काम में लगी रही और मैं उस की बातों को मन ही मन दिमाग मे तौलता रहा. दोपहर को उस ने खाना लगाया तो मैं ने साथ बैठ कर खाने का आग्रह किया. अब मेरी अभिनय कला जवाब दे रही थी. मैं ने एक निवाला अपने हाथ से उस के मुंह में रखा. हम ने ठीक शादी के पहले दिनों की तरह एकदूसरे को खाना खिलाया. खाना खत्म कर के वह बरतन ले जाने लगी तो मैं ने उसे रोक दिया,”राहुल को होस्टल से बुला लूं? 2-4 दिन साथ रह लेगा.”

“क्या जरूरत है? फोन पर बात तो हो ही जाती है.”

“डाक्टर के पास चलें?”

उस ने सूनी आंखों से मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैं ने उस की किसी दुखती रग को छेड़ दिया हो.

“नहीं, मैं तो बिलकुल ठीक हूं,” इतना कह कर वह चली गई. मैं भी उस के पीछे किचन में आ गया. उस ने बरतन सिंक में डाल दिए तो मैं ने उसे प्यार से बांहों में उठा लिया. इस हरकत को मैं रोज करता आ रहा था लेकिन वह अभिनय था. आज कुछ अपनेपन और प्यार से उठाया तो एहसास हुआ कि उस का वजन भी बहुत कम हो गया था. उसे बांहों में उठाए ला कर बैडरूम में बैड पर लिटा दिया. मैं ने आज 10 साल बाद उसे उसी तरह भरपूर प्यार किया जैसे शादी के पहले दिन किया था. मगर आज जैसे उस के लिए चीजें बेमानी थीं. सारे अरमान मर गए थे जैसे. अब 2 दिन शेष थे लेकिन मेरा मन कह रहा था कि उसे उस के हाल पर छोड़ कर बहुत बड़ा अन्याय कर रहा था मैं.

रोज की तरह शाम 3 बजे दीप्ति का फोन आया. उस ने खबर दी कि सब कागज तैयार हैं, बस एक बार पूनम को कोर्ट आ कर हस्ताक्षर करने होंगे.वार्तालाप के दौरान मैं बस हांहूं करता रहा क्योंकि दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था.

मेरा दिल गवाही दे रहा था कि पूनम की हालत को नजरअंदाज कर के मैं ने बहुत बड़ी गलती कर दी थी. इस बात को जितना सोचता बेचैनी बढ़ती जाती. हालत यह हो गई कि 1-1 पल बहुत भारी गुजरने लगा. कल हमारे करार का आखिरी दिन भी था लेकिन कल तक इंतजार करना असंभव लगा.

“किसी से बहुत जरूरी बात करनी है.लौट कर डाक्टर के पास चलेंगे, तब तक तैयार हो जाओ और हां, आज कोई बहाना नहीं चलेगा,” मैं ने कहा तो रोज की तरह उस ने प्रतिरोध नहीं किया, शायद इसलिए कि आज मेरे लहजे में उसे अपनेपन का एहसास हुआ था.

“कल तो हमारा करार खत्म हो ही रहा है. क्यों नया पेंच फंसा रहे हो?”

कोई जवाब दिए बिना मैं गाड़ी में सवार हुआ और दीप्ति के पास पहुंच गया.

“मैं पूनम को नहीं छोड़ सकता. उसे मेरी जरूरत है,” मैं ने दोटूक शब्दों में कहा तो वह जैसे तिलमिला उठी.

“पिछले 6 महीने से मुझे शादी के हसीन सपने दिखा कर और बिना शादी किए साथ रह कर अब कह रहे हो कि तलाक नहीं ले सकता… अपनी पत्नी से इतना ही प्यार था तो 2 साल से उस की खैरखबर क्यों न ली? मेरे सपनों…”

मैं अपराधी तो दीप्ति का भी था और जो अन्याय उस के साथ हुआ था उस के बदले मुझे कोसने और गालियां देने तक का उसे पूरा अधिकार था. वह दे भी रही थी और जाने कितनी देर तक देती. लेकिन मैं उस की बातों को सुनने के लिए वहां न रुका. पूनम की फिक्र जो सता रही थी. मैं वापस लौट चला.

गाड़ी ड्राइव करते हुए मेरी जिंदगी के बीते 10 साल चलचित्र की तरह दिमाग में घूम रहे थे. पूनम से मिलने का वह सुखद संयोग. जब एक दिन शहर में आई बाढ़ के चलते मुझे बिलकुल अनजान होने के बावजूद उन के घर पनाह लेनी पड़ी थी. मैं उस की सादगी और खूबसूरती पर फिदा हो गया था. फिर शादी के बाद का उस का वह सरल व्यवहार जो उस की खूबसूरती के साथसाथ मुझे दिखाई देना बंद हो गया था.

काश कि जिंदगी का कोई रिवाइंड बटन होता और मुझे उन कुछ सालों को दोबारा जीने का मौका मिलता जब मैं ने पूनम की तरफ से मुंह फेर लिया था. सब एहसास और कर्तव्यबोध लौट आए थे लेकिन अब देर हो चुकी थी.

लग रहा था कि पूनम को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए था. आज तो सफर भी जैसे बहुत लंबा हो गया था. आखिरकार घर पहुंचा तो गाड़ी खङी कर के जल्दी से बाहर निकल कर लगभग दौड़ते हुए घर में घुसा.

वह किचन में नहीं थी. हालांकि खाना वह बना चुकी थी जोकि किचन के रैक पर रखा था. बाथरूम में भी नहीं. घर सुनसान था जैसे वह यहां हो ही नहीं. आगे बढ़ कर मैं ने बैडरूम में कदम रखा. वह बैड पर पड़ी थी. शांत और निश्चल. उस के करीब कुछ डाक्टरी रिपोर्ट ओर दवा की परची भी बिखरे हुए थे. पहली नजर में कोई भी देखता तो कहता कि थक कर सो रही है वह. मगर मैं जानता था कि पिछले 10 सालों में इस वक्त सोना उस का शगल बिलकुल नहीं था.

अज्ञात भावना के चलते मुझे अपनी टांगे कांपती प्रतीत हुईं. शरीर से किसी ने जैसे खून निचोड़ लिया हो.आगे बढ़ कर उस का हाथ थामा. बर्फ की तरह सर्द था और नब्ज गायब. वह मर चुकी थी. मैं उस की बगल में लेट कर फूटफूट कर रोने लगा. रोतेबिलखते स्वाभाविक रूप से वहां पड़ी डाक्टरी रिपोर्ट पर नजर पड़ी, जिस में साफ लिखा था कि वह एक अरसे से कैंसर से पीड़ित थी. Romantic Story In Hindi

लेखक : धीरज राणा भायला 

Social Story : फुलस्टौप – समय रहते संभल गई लड़की की संघर्षपूर्ण कहानी

Social Story : आयना ने आखिरी बार पोर्टफोलियो राघव एजेंसी में भिजवाया था. कुछ हो जाए, इस के बाद वह मौडलिंग के लिए प्रयास नहीं करेगी. 4 महीने पहले ही वह पटना से दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने आई थी. पौकेटमनी के लिए उस के क्लासमेट पार्टटाइम जौब करते थे. उस ने भी मैकडोनाल्ड में पार्टटाइम जौब कर ली. उस की खूबसूरती देख उस के साथी उसे अकसर कहते, ‘‘तुम तो मौडल लगती हो. मौडलिंग क्यों नहीं करती?’’ सब के कहने पर उस ने अपना एक आकर्षक पोर्टफोलियो बनवा लिया और मौडलिंग की चाह लिए कई विज्ञापन एजेंसियों व फोटोग्राफर्स से मिली, लेकिन उसे निराशा ही हाथ लगी. अपनी सारी बचत भी उस ने पोर्टफोलियो बनवाने में लगा दी थी.

एक दिन उस की क्लासमेट सपना ने उसे कुछ एजेंसियों के बारे में बताते हुए कहा, ‘‘ये एजेंसियां मौडलिंग और इवैंट का काम दिलवाती हैं. परंतु इस के लिए वे रजिस्ट्रेशन फीस के रूप में मोटी रकम वसूलती हैं.’’

इस में भी आयना ने काफी रकम खर्च कर कई एजेंसियों में रजिस्टे्रशन करवाए. इन एजेंसियों ने मौडलिंग असाइनमैंट तो नहीं, हां कुछ इवैंट्स में जरूर काम दिलवा दिया था.आयना अब तक अपना काफी समय मौडलिंग के चक्कर में बरबाद कर चुकी थी. इस चक्कर में उस की पढ़ाई भी काफी प्रभावित हुई थी. नतीजतन, ऐग्जाम में उस के सभी दोस्तों के अच्छे नंबर आए थे जबकि आयना पिछड़ गई थी.आयना जबतब घर से भी पैसे मंगवाती रहती थी. उस के घर वाले भी चिंतित रहते थे कि कहीं वह ड्रग्स वगैरा के चक्कर में तो नहीं पड़ गई. पहली बार आयना के नंबर भी कम आए थे.अब तक आयना भी सबकुछ समझ चुकी थी. उसे यह समझ आ गया था कि ग्लैमर की चकाचौंध में उस ने अपने उभरते कैरियर के साथ खिलवाड़ किया है. उसे सबकुछ हार जाने की ग्लानि थी. परंतु जब दोस्त ताने मारते और मजाक उड़ाते तो उसे दुख होता बावजूद इस के वह एक बार और कोशिश करना चाहती थी.

आयना ने इवैंट्स में काम करते हुए अच्छाबुरा हर प्रकार का अनुभव प्राप्त किया था. किसी तरह संपर्कों के बूते वह छोटेछोटे असाइनमैंट भी करने लगी थी, लेकिन जोड़तोड़, चतुराई आदि से काम लेना उस के बस की बात नहीं थी, जबकि दूसरे लोग इसे मैनेजमैंट स्किल कहते थे. ठीक भी था. उस का व्यवहार भी उसे इस क्षेत्र के लिए योग्य नहीं बनाता था. परंतु झूठा अहं उस के आड़े आ जाता था. पता नहीं मौडलिंग में कैरियर बना कर वह क्या साबित करना चाहती थी.एक दिन आयना ने कालेज लाइबे्ररी में कुछ सीनियर्स को देखा, जिन्होंने एक युवक को घेर रखा था. उस युवक की हालत बुरी थी. पता चला कि वह इमारत से कूद कर जान देने पर आमादा था.उत्सुकतावश आयना ने मामले की छानबीन की तो सामने आया कि वह युवक आईएएस की परीक्षा की तैयारी कर रहा था. परीक्षा के प्रयास खत्म होने पर उस की यह हालत हुई है. उस का सपना सिर्फ आईएएस बनना ही था जो टूट गया था. अब वह दुनिया को क्या मुंह दिखाता.

पहले तो आयना को हैरानी हुई कि दुनिया की इतनी फिक्र करने वाला कोई हो सकता है. फिर लगा, जैसे किसी ने उसे आईना दिखा दिया हो. वह भी तो यही कर रही है. दिशाहीन है वह भी. जानतेसमझते हुए भी वह ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रही है. बस, अब और नहीं, आयना ने जैसे खुद को सचेत किया और तुरंत निर्णय लिया कि इस दिशाहीन स्थिति पर अब वह फुलस्टौप लगा देगी. नहीं बढ़ना उसे आगे. जीवन में राहें और भी हैं, फिर मौडलिंग ही क्यों? Social Story

Family Story : दिखावे की काट – पिता की यादों को बरकरार रखती बेटी की मार्मिक कहानी

Family Story : दीवार से सिर टिका कर अंकिता शून्य में ताक रही थी. रोतेरोते उस की पलकें सूज गई थीं. अब भी कभीकभी एकाध आंसू पलकों पर आता और उस के गालों पर बह जाता. पास के कमरे में उस की भाभी दहाड़ें मारमार कर रो रही थीं. भाभी की बहन और भाभी उन्हें समझा रही थीं. भाभी के दोनों बच्चे ऋषी और रिनी सहमे हुए से मां के पास बैठे थे.

भाभी का रुदन कभी उसे सुनाई पड़ जाता. बूआ अंकिता के पास बैठी थीं और भी बहुत से रिश्तेदार घर में जगहजगह बैठे हुए थे. अंकिता का भाई और घर के बाकी दूसरे पुरुष अरथी के साथ श्मशान घाट अंतिम संस्कार करने जा चुके थे.

अंकिता की आंखों से फिर आंसू बह निकले. मां तो बहुत पहले ही उन्हें छोड़ कर चली गई थीं. पिता ने ही उन्हें मां और बाप दोनों का प्यार दे कर पाला. उन की उंगलियां पकड़ कर दोनों भाईबहन ने चलना सीखा, इस लायक बने कि जिंदगी की दौड़ में शामिल हो कर अपनी जगह बना सके और आज वही पिता अपने जीवन की दौड़ पूरी कर इस दुनिया से चले गए.

वह पिता की याद में फफक पड़ी. पास बैठी बूआ उसे दिलासा देते हुए खुद भी भाई की याद में बिलखने लगीं.

घड़ी ने साढ़े 5 बजाए तो रिश्ते की एकदो महिलाएं घर की औरतों के नहाने की व्यवस्था करने में जुट गईं. दाहसंस्कार से पुरुषों के लौटने से पहले घर की महिलाओं का स्नान हो जाना चाहिए. भाभी और बूआ के स्नान करने के बाद बेमन से उठ कर अंकिता ने भी स्नान किया.

‘कैसी अजीब रस्में हैं,’ अंकिता सोच रही थी, ‘व्यक्ति के मरते ही इस तरह से घर के लोग स्नान करते हैं जैसे कि कोई छूत की बीमारी थी, जिस के दूर हटते ही स्नान कर के लोग शुद्ध हो जाते हैं. धर्म और उस की रूढि़यां संस्कार हैं कि कुरीतियां. इनसान की भावनाओं का ध्यान नहीं है, बस, लोग आडंबर में फंस जाते हैं.

औरतों का नहाना हुआ ही था कि श्मशान घाट से घर के पुरुष वापस आ गए और घर के बाहर बैठ गए. घर की महिलाएं अब पुरुषों के नहाने की व्यवस्था करने लगीं. उसी शहर में रहने वाले कई रिश्तेदार और आसपड़ोस के लोग बाहर से ही अपनेअपने घरों को लौट गए. उन्हें विदा कर भैया भी नहाने चले गए. नहा कर अंकिता का भाई आनंद आ कर बहन के पास बैठ गया तो अंकिता भाई के कंधे पर सिर रख कर रो पड़ी. भाई की आंखें भी भीग गईं. वह छोटी बहन के सिर पर हाथ फेरने लगा.

‘‘रो मत, अंकिता. मैं तुम्हें कभी पिताजी की कमी महसूस नहीं होने दूंगा. तेरा यह घर हमेशा तेरे लिए वैसा ही रहेगा जैसा पिताजी के रहते था,’’ बड़े भाई ने कहा तो अंकिता के दुखी मन को काफी सहारा मिला.

‘‘जीजाजी, बाबूजी का बिस्तर और तकिया किसे देने हैं?’’ आनंद के छोटे साले ने आ कर पूछा.

‘‘अभी तो उन्हें यहीं रहने दे राज, यह सब बाद में करते रहना. इतनी जल्दी क्या है?’’ आनंद के बोलने से पहले ही बूआ बोल पड़ीं.

‘‘नहीं, बूआ, ये लोग हैं तो यह सब हो जाएगा, फिर मेहमानों के सोने के लिए जगह भी तो चाहिए न. राज, तुम पिताजी का बिस्तर और कपड़े वृद्धाश्रम में दे आओ, वहां किसी के काम आ जाएंगे,’’ आनंद ने तुरंत उठते हुए कहा.

‘‘लेकिन भैया, पिताजी की निशानियों को अपने से दूर करने की इतनी जल्दबाजी क्यों?’’ अंकिता ने एक कमजोर सा प्रतिवादन करना चाहा लेकिन तब तक आनंद राज के साथ पिताजी के कमरे की तरफ जा चुके थे.

लगभग 15 मिनट बाद भैया की आवाज आई, ‘‘अंकिता, जरा यहां आना.’’

अपने को संभालते हुए अंकिता पिताजी के कमरे में गई.

‘‘देख अंकिता, तुझे पिताजी की याद के तहत उन की कोई वस्तु चाहिए तो ले ले,’’ आनंद ने कहा.

भाभी को शायद कुछ भनक लग गई और वे तुरंत आ कर दरवाजे पर खड़ी हो गईं. अंकिता समझ गई कि भाभी यह देखना चाहती हैं कि वह क्या ले जा रही है. पिताजी की पढ़ने वाली मेज पर उन का और मां का शादी के बाद का फोटो रखा हुआ था. अंकिता ने जा कर वह फोटो उठा लिया. इस फोटो को संभाल कर रखेगी वह.

पिताजी की सोने की चेन और 2 अंगूठियां फोटो के पास ही एक छोटी टे्र में रखी थीं जिन्हें मां ने घर खर्चे के लिए मिले पैसों में बचाबचा कर अलगअलग अवसरों पर पिताजी के लिए बनाया था. चूंकि ये चेन और अंगूठियां मां की निशानियां थीं. इसलिए पिताजी इन्हें कभी अपने से अलग नहीं करते थे.

अंकिता ने फोटो को कस कर सीने से लगाया और तेजी से पिताजी के कमरे से बाहर चली गई. जातेजाते उस ने देख लिया कि भाभी की नजरें टे्र में रखी चीजों पर जमी हैं और चेहरे पर एक राहत का भाव है कि अंकिता ने उन्हें नहीं उठाया. उस के मन में एक वितृष्णा का भाव पैदा हुआ कि थोड़ी देर पहले भैया के दिलासा भरे शब्दों में कितना खोखलापन था, यह समझ में आ गया.

भैया के दोनों सालों ने मिल कर पिताजी के कपड़ों और बाकी सामान की गठरियां बनाईं और वृद्धाश्रम में पहुंचा आए. पिताजी का लोहे वाला पुराना फोल्ंिडग पलंग और स्टूल, कुरसी, मेज और बैंचें वहां से उठा कर सारा सामान छत पर डाल दिया कि बाद में बेच देंगे.

भाभी की बड़ी भाभी ने कमरे में फिनाइल का पोंछा लगा दिया. पिताजी उस कमरे में 50 वर्षों तक रहे लेकिन भैया ने 1 घंटे में ही उन 50 वर्षों की सारी निशानियों को धोपोंछ कर मिटा दिया. बस, उन की चेन और अंगूठियां भाभी ने झट से अपने सेफ में पहुंचा दीं.

रात को भाभी की भाभियों ने खाना बनाया. अंकिता का मन खाने को नहीं था लेकिन बूआ के समझाने पर उस ने नामचारे को खा लिया. सोते समय अंकिता और बूआ ने अपना बिस्तर पिताजी के कमरे में ही डलवाया. पलंग तो था नहीं, जमीन पर ही गद्दा डलवा कर दोनों लेट गईं. बूआ ने पूरे कमरे में नजर डाल कर एक गहरी आह भरी.

बूआ के लिए भी उन का मायका उन के भाई के कारण ही था. अब उन के लिए भी मायके के नाम पर कुछ नहीं रहा. रमेश बाबू ने अपने जीते जी न बहन को मायके की कमी खलने दी न बेटी को. कहते हैं मायका मां से होता है लेकिन यहां तो पिताजी ने ही हमेशा उन दोनों के लिए ही मां की भूमिका निभाई.

‘‘बेटा, अब तू भी असीम के पास सिंगापुर चली जाना. वैसे भी अब तेरे लिए यहां रखा ही क्या है. आनंद का रवैया तो तुझे पता ही है. जो अपने जन्मदाता की यादों को 1 घंटे भी संभाल कर नहीं रख पाया वह तुझे क्या पूछेगा,’’ बूआ ने उस की हथेली को थपथपा कर कहा. अनुभवी बूआ की नजरें उस के भाईभाभी के भाव पहले ही दिन ताड़ गईं.

‘‘हां बूआ, सच कहती हो. बस, पिताजी की तेरहवीं हो जाए तो चली जाऊंगी. उन्हीं के लिए तो इस देश में रुकी थी. अब जब वही नहीं रहे तो…’’ अंकिता के आगे के शब्द उस की रुलाई में दब गए.

बूआ देर तक उस का सिर सहलाती रहीं. पिताजी ने अंकिता के विवाह की एकएक रस्म इतनी अच्छी तरह पूरी की थी कि लोगों को तथा खुद उस को भी कभी मां की कमी महसूस नहीं हुई.

पिताजी ने 2 साल पहले उस की शादी असीम से की थी. साल भर पहले असीम को सिंगापुर में अच्छा जौब मिल गया. वह अंकिता को भी अपने साथ ले जाना चाहता था लेकिन पिताजी की नरमगरम तबीयत देख कर वह असीम के साथ सिंगापुर नहीं गई. असीम का घर इसी शहर में था और उस के मातापिता नहीं थे, अत: असीम के सिंगापुर जाने के बाद अंकिता अपनी नौकरानी को साथ ले कर रहती थी. असीम छुट्टियों में आ जाता था.

अंकिता ने बहुत चाहा कि पिताजी उस के पास रहें पर इस घर में बसी मां की यादों को छोड़ कर वे जाना नहीं चाहते थे इसलिए वही हर रोज दोपहर को पिताजी के पास चली आती थी. बूआ वडोदरा में रहती थीं. उन का भी बारबार आना संभव नहीं था और अब तो उन का भी इस शहर में क्या रह जाएगा.

पिताजी की तीसरे दिन की रस्म हो गई. शाम को अंकिता बूआ के साथ आंगन में बैठी थी. असीम के रोज फोन आते और उस से बात कर अंकिता के दिल को काफी तसल्ली मिलती थी. असीम और बूआ ही तो अब उस के अपने थे. बूआ के सिर में हलकाहलका दर्द हो रहा था.

‘‘मैं आप के लिए चाय बना कर लाती हूं, बूआ, आप को थोड़ा आराम मिलेगा,’’ कह कर अंकिता चाय बनाने के लिए रसोईघर की ओर चल दी.

रसोईघर का रास्ता भैया के कमरे के बगल से हो कर जाता था. अंदर भैयाभाभी, उन के बच्चे, भाभी के दोनों भाई बैठे बातें कर रहे थे. उन की बातचीत का कुछ अंश उस के कानों में पड़ा तो न चाहते हुए भी उस के कदम दरवाजे की ओट में रुक गए. वे लोग पिताजी के कमरे को बच्चों के कमरे में तबदील करने पर सलाहमशविरा कर रहे थे.

बच्चों के लिए फर्नीचर कैसा हो, कितना हो, दीवारों के परदे का रंग कैसा हो और एक अटैच बाथरूम भी बनवाने पर विचार हो रहा था. सब लोग उत्साह से अपनीअपनी राय दे रहे थे, बच्चे भी पुलक रहे थे.

अंकिता का मन खट्टा हो गया. इन बच्चों को पिताजी अपनी बांहों और पीठ पर लादलाद कर घूमे हैं. इन के बीमार हो जाने पर भैयाभाभी भले ही सो जाएं लेकिन पिताजी इन के सिरहाने बैठे रातरात भर जागते, अपनी तबीयत खराब होने पर भी बच्चों की इच्छा से चलते, उन्हें बाहर घुमाने ले जाते. और आज वे ही बच्चे 3 दिन में ही अपने दादाजी की मौत का गम भूल कर अपने कमरे के निर्माण को ले कर कितने उत्साहित हो रहे हैं.

खैर, ये तो फिर भी बच्चे हैं जब बड़ों को ही किसी बात का लेशमात्र ही रंज नहीं है तो इन्हें क्या कहना. सब के सब उस कमरे की सजावट को ले कर ऐसे बातें कर रहे हैं मानो पिताजी के जाने की राह देख रहे थे कि कब वे जाएं और कब ये लोग उन के कमरे को हथिया कर उसे अपने मन मुताबिक बच्चों के लिए बनवा लें. यह तो पिताजी की तगड़ी पैंशन का लालच था, नहीं तो ये लोग तो कब का उन्हें वृद्धाश्रम में भिजवा चुके होते.

अंकिता से और अधिक वहां पर खड़ा नहीं रहा गया. उस ने रसोईघर में जा कर चाय बनाई और बूआ के पास आ कर बैठ गई.

पिताजी की मौत के बाद दुख के 8 दिन 8 युगों के समान बीते. भैयाभाभी के कमरे से आती खिलखिलाहटों की दबीदबी आवाजों से घावों पर नमक छिड़कने का सा एहसास होता था पर बूआ के सहारे वे दिन भी निकल ही गए. 9वें दिन से आडंबर भरी रस्मों की शुरुआत हुई तो अंकिता और बूआ दोनों ही बिलख उठीं.

9वें दिन से रूढि़वादी रस्मों की शुरुआत के साथ श्राद्ध पूजा में पंडितों ने श्लोकों का उच्चारण शुरू किया तो बूआ और अंकिता दोनों की आंखों से आंसुओं की धाराएं बहने लगीं. हर श्लोक में पंडित अंकिता के पिता के नाम ‘रमेश’ के आगे प्रेत शब्द जोड़ कर विधि करवा रहे थे. हर श्लोक में ‘रमेश प्रेतस्य शांतिप्रीत्यर्थे श… प्रेतस्य…’ आदि.

व्यक्ति के नाम के आगे बारबार ‘प्रेत’ शब्द का उच्चारण इस प्रकार हो रहा था मानो वह कभी भी जीवित ही नहीं था, बल्कि प्रेत योनि में भटकता कोई भूत था. अपने प्रियजन के नाम के आगे ‘प्रेत’ शब्द सुनना उस की यादों के साथ कितना घृणित कार्य लग रहा था. अंकिता से वहां और बैठा नहीं गया. वह भाग कर पिताजी के कमरे में आ गई और उन की शर्ट को सीने से लगा कर फूटफूट कर रो दी.

कैसे हैं धार्मिक शास्त्र और कैसे थे उन के रचयिता? क्या उन्हें इनसानों की भावनाओं से कोई लेनादेना नहीं था? जीतेजागते इनसानों के मन पर कुल्हाड़ी चलाने वाली भावहीन रूढि़यों से भरे शास्त्र और उन की रस्में, जिन में मानवीय भावनाओं की कोई कद्र नहीं. आडंबर से युक्त रस्मों के खोखले कर्मकांड से भरे शास्त्र.

धार्मिक कर्मकांड समाप्त होने के बाद जब पंडित चले गए तब अंकिता अपने आप को संभाल कर बाहर आई. भैया और उन के बेटे का सिर मुंडा हुआ था. रस्मों के मुताबिक 9वें दिन पुत्र और पौत्र के बाल निकलवा देते हैं. उन के घुटे सिर को देख कर अंकिता का दुख और गहरा हो गया. कैसी होती हैं ये रस्में, जो पलपल इनसान को हादसे की याद दिलाती रहती हैं और उस का दुख बढ़ाती हैं.

असीम को आखिर छुट्टी मिल ही गई और पिताजी की तेरहवीं पर वह आ गया. उस के कंधे पर सिर रख कर पिताजी की याद में और भैयाभाभी के स्वार्थी पक्ष पर वह देर तक आंसू बहाती रही. अंकिता का बिलकुल मन नहीं था उस घर में रुकने का लेकिन पिताजी की यादों की खातिर वह रुक गई.

तेरहवीं की रस्म पर भैया ने दिल खोल कर खर्च किया. लोग भैया की तारीफें करते नहीं थके कि बेटा हो तो ऐसा. देखो, पिताजी की याद में उन की आत्मा की शांति के लिए कितना कुछ कर रहा है, दानपुण्य, अन्नदान. 2 दिन तक सैकड़ों लोगों का भोजन चलता रहा. लोगों ने छक कर खाया और भैयाभाभी को ढेरों आशीर्वाद दिए. अंकिता, असीम और बूआ तटस्थ रह कर यह तमाशा देखते रहे. वे जानते थे कि यह सब दिखावा है, इस में तनिक भी भावना या श्रद्धा नहीं है.

यह कैसा धर्म है जो व्यक्ति को इनसानियत का पाठ पढ़ाने के बजाय आडंबर और दिखावे का पाठ पढ़ाता है, ढोंग करना सिखाता है.

जीतेजी पिता को दवाइयों और खानेपीने के लिए तरसा दिया और मरने पर कोरे दिखावे के लिए झूठी रस्मों के नाम पर ब्राह्मणों और समाज के लोगों को भोजन करा रहे हैं. सैकड़ों लोगों के भोजन पर हजारों रुपए फूंक कर झूठी वाहवाही लूट रहे हैं जबकि पिताजी कई बार 2 बजे तक एक कप चाय के भरोसे पर भूखे रहते थे. अंकिता जब दोपहर में आती तो उन के लिए फल, दवाइयां और खाना ले कर आती और उन्हें खिलाती.

रात को कई बार भैया व भाभी को अगर शादी या पार्टी में जाना होता था तो भाभी सुबह की 2 रोटियां, एक कटोरी ठंडी दाल के साथ थाली में रख कर चली जातीं. तब पिताजी या तो वही खा लेते या उसे फोन कर देते. तब वह घर से गरम खाना ला कर उन्हें खिलाती.

अंकिता सोच रही थी कि श्राद्ध शब्द का वास्तविक अर्थ होता है, श्रद्धा से किया गया कर्म. लेकिन भैया जैसे कुपुत्रों और लालची पंडितों ने उस के अर्थ का अनर्थ कर डाला है.

जीतेजी पिताजी को भैया ने कभी कपड़े, शौल, स्वेटर के लिए नहीं पूछा. इस के उलट अपने खर्चों और महंगाई का रोना रो कर हर महीने उन की पैंशन हड़प लेते थे, लेकिन उन की तेरहवीं पर भैया ने खुले हाथों से पंडितों को कपड़े, बरतन आदि दान किए. अंकिता को याद है उस की शादी से पहले पिताजी के पलंग की फटी चादर और बदरंग तकिए का कवर. विवाह के बाद जब उस के हाथ में पैसा आया तो सब से पहले उस ने पिताजी के लिए चादरें और तकिए के कवर खरीदे थे.

जीवित पिता पर खर्च करने के लिए भैया के पास पैसा नहीं था, लेकिन मृत पिता के नाम पर आज समाज के सामने दिखावे के लिए अचानक ढेर सारा पैसा कहां से आ गया.

असीम ने 2 दिन बाद के अपने और अंकिता के लिए हवाई जहाज के 2 टिकट बुक करा दिए.

दूसरे दिन भैया ने कुछ कागज अंकिता के आगे रख दिए. दरअसल, पिताजी ने वह घर भैया और उस के नाम पर कर दिया था.

‘‘अब तुम तो असीम के साथ सिंगापुर जा रही हो और वैसे भी असीम का अपना खुद का भी मकान है तो…’’ भैया ने बात आधी छोड़ दी. पर अंकिता उन की मंशा समझ गई. भैया चाहते थे कि वह अपना हिस्सा अपनी इच्छा से उन के नाम कर दे ताकि भविष्य में कोई झंझट न रहे.

‘‘हां भैया, इस घर में आप के साथसाथ आधा हिस्सा मेरा भी है. इन कागजों की एक कापी मैं भी अपने पास रखूंगी ताकि मेरे पिता की यादें मेरे जीवित रहने तक बरकरार रहें,’’ कठोर स्वर में बोल कर अंकिता ने कागज भैया के हाथ से ले कर असीम को दे दिए ताकि उन की कापी करवा सकें, ‘‘और हां भाभी, मां के कंगन पिताजी ने तुम्हें दिए थे अब पिताजी की अंगूठी और चेन आप मुझे दे देना निकाल कर.’’

भैयाभाभी के मुंह लटक गए. दोपहर को असीम और अंकिता ने पिताजी का पलंग, कुरसी, टेबल और कपड़े वापस उन के कमरे में रख लिए. नया गद्दा पलंग पर डलवा दिया. पिताजी के कमरे और उस के साथ लगे अध्ययन कक्ष पर नजर डाल कर अंकिता बूआ से बोली, ‘‘मेरा और आप का मायका हमेशा यही रहेगा बूआ, क्योंकि पिताजी की यादें इसी जगह पर हैं. इस की एक चाबी आप अपने पास रखना. मैं जब भी यहां आऊंगी आप भी आ जाया करना. हम यहीं रहा करेंगे.’’

बूआ ने अंकिता और असीम को सीने से लगा लिया और तीनों पिताजी को याद कर के रो दिए. Family Story

Social Story In Hindi : आई लव फ्रौडिटेरियन

Social Story In Hindi : आप कहेंगे कैसा अजीब प्राणी है. फ्रौड करने वालों का मुरीद है. लेकिन जनाब, जब आप को भी इन फ्रौडिटेरियनों की विशेषता पता चलेगी तो आप के भी ये डियर हो जाएंगे. श्योर हूं मैं. हालांकि मैं कंप्लीटली फ्रौड किस्म का प्राणी नहीं, पर मुझे फ्रौड किस्म के जीव अति पसंद हैं. दूसरे शब्दों में कहूं तो मैं उन का मुरीद हूं और प्योर फ्रौडिटेरियनों का तो मैं… मत पूछो कि उन का मैं क्या हूं? आज की तारीख में सच पूछो तो आई हेट ईमानदारस. कल तक मुझे फ्रौडिटेरियनों से बहुत नफरत थी. शायद तब मेरी इन के बारे में गलत धारणा बनी हुई थी. इन के बारे में मुझे पर्याप्त ज्ञान नहीं था शायद मुझे. बस, इन को ले कर अनुमान ही लगाया जाता था.

और अनुमान तो कोरे अनुमान होते हैं दोस्तो… फ्रौड किस्म के डियरों में वैसे तो बहुत सी विशेषताएं होती हैं पर इन की एक खास विशेषता जिस का मैं बहुत कायल हूं, और है यह कि फ्रौड किस्म के परमादरणीय जब कहीं फ्रौड करते हैं, तो ऊपर से ले कर नीचे तक सब मिलजुल कर करते हैं. फ्रौड करते वक्त इन की योजना देखने लायक होती है. फ्रौड के वक्त इन का भाईचारा देखने लायक होता है. लगता है जैसे उस वक्त ये सब मौसेरे भाई न हो कर जुड़वां भाई हों. फ्रौड से जो भी मिलता है, उसे पूरी ईमानदारी से बराबरबराबर मिलबांट कर खाते हैं, बिना कदकाठी के हिसाब से. ये फ्रौड करने तक ही एकसाथ नहीं रहते, बल्कि गलती से फंसने के बाद भी एकसाथ रहते हैं. साथ ही मरने, साथ ही जीने की भावना अगर देश में कोई देशवासी बचा हो तो मेरे हिसाब से उसे इन के पदचिह्नों का अनुसरण कर इन से सीखनी चाहिए. समाज में ईमानदार लोग उतनी एकजुटता से नहीं रहते जितनी एकजुटता से फ्रौडिए रहते हैं.

मेरा तो मानना है कि जो हमें देश में एकता की स्थापना करनी हो तो हम सब को देशभक्ति, राष्ट्रीयता छोड़ फ्रौड हो जाना चाहिए. आज का समय इन्हीं का है. आप ऊपर वाले पर विश्वास करें या न पर फ्रौडियों पर आंख बंद कर विश्वास कर लीजिए, शांति नहीं, परम शांति मिलेगी. सच कहूं तो ईमानदारों की अपेक्षा इन बंधुओं की पहुंच बहुत ऊपर तक होती है. इन के हाथ बहुत लंबे होते हैं. इतने लंबे कि… पता नहीं ये लोग अपने हाथ इतने लंबे कैसे कर लेते होंगे? इन का मन करे तो लेटेलेटे तथाकथित स्वर्ग तक से फल तोड़ लाएं. दूसरी ओर ईमानदार को तो खुद ईमानदार तक नहीं जानता तो उसे समाज क्या खाक पहचानेगा? और इन गएगुजरे ईमानदारों को जब भी देखो बस सारे काम छोड़ देश की संपत्ति पर कुंडली मार कर बैठे हुए हैं. अरे यार… यह जीवन बारबार थोड़े ही मिलेगा? ईमानदारी से सब को बेईमानी का डट कर खिलाइए भी, और खुद खाइए भी.

इस देश में आ ही गए हैं तो डट कर फ्रौड कीजिए, खुल कर फ्रौड कीजिए. औरों को भी करने दीजिए. हमें यह जीवन ईमानदारी करने को नहीं, फ्रौड करने को मिला है. इसलिए जितने हो सके कदमकदम पर फ्रौड कीजिए, क्या जाने कब जीवन की डोर खिंच जाए. इस किस्म के आदरणीय बंधु मेरे उन घटिया नस्ल के ईमानदार दोस्तों की तरह नहीं होते जो पहले तो मिल कर बेईमानी से फ्रौड करवाते हैं, और बाद में खुद ही मार गए सब का हिस्सा. तथाकथित ईमानदारों की तरह ये बिलकुल फ्रौड नहीं होते कि न तो खाते हैं के नाम पर अकेलेअकेले, चोरीचोरी खाते रहते हैं, पर जब दूसरा खाने लगे तो गुर्राने लग जाते हैं. फ्रौडिए फ्रौड कर खाते भी हैं और अपने संगियों को दिल खोल कर खिलाते भी हैं. बस, इन की यही अदा तो मुझे जिंदा होते भी मार डालती है बाबा… बंधुओ…

मैं कोई बाबा तो नहीं, पर इतना जरूर कहूंगा कि अगर इस देश में जन्म ले ही लिया है तो बाबाओं की तरह ही फ्रौड करतेकरते अपने यहां जन्म लेने को सफल करिए. कारण, यहां आ कर हर जीव का एकमात्र उद्देश्य फ्रौड करना है. कहीं ऐसा न हो कि मरने के बाद कोई आप की जीवन यात्रा लिखना चाहे और पूछे कि क्या फ्रौड किया था कि नहीं? और तथ्य बोलें. अत: मैं तो बस इतना ही कहूंगा कि जो इस जीवन में भारत में पैदा हुए हैं तो डट कर फ्रौड कीजिए. इतने फ्रौड कि हमारे फ्रौड देख फ्रौड के पौराणिक देवताओं का भी हीनता से सिर नीचा हो जाए. हैल्दी एवं चरित्रपूर्ण जीवन के लिए फ्रौड पहनिए, फ्रौड खाइए, फ्रौड ओढि़ए, फ्रौड पीजिए. फ्रौड ही इस जग में सब से बड़ा धर्म है. फ्रौड ही इस जग का सब से बड़ा सत्कर्म है. Social Story In Hindi

Family Story In Hindi : प्रतिदान – मातापिता की अधूरी ख्वाहिश की कहानी

Family Story In Hindi : बाबू साहब, यानी बाबू जगदीश नारायण श्रीवास्तव…रिटायर्ड जिला जज, अब गांव की सब से बड़ी हवेली के एक बड़े कमरे में चारपाई पर असहाय पड़े हुए थे. उन की आंखों के कोरों में आंसू के कतरे झलक रहे थे. वे वहीं अटके रहते हैं. हर रोज ऐसा होता है, जब रामचंद्र उन्हें नहलाधुला कर, साफ कपड़े पहना कर अपने हाथों से उन्हें खाना खिला कर अपने घर के काम निबटाने चला जाता है.

आज बाबू साहब के आंसू पोंछने वाला उन का अपना कोई आसपास नहीं है, लेकिन जब वे सेवा में थे, तो उन के पास सबकुछ था. संपन्नता, वैभव, सफल दांपत्यजीवन, सुखी और व्यवस्थित बच्चे. उन के 2 लड़के हैं. बड़ा लड़का उन की तरह ही प्रादेशिक न्यायिक सेवा में भरती हो कर मजिस्ट्रेट हो गया और आजकल मिर्जापुर में तैनात है. छोटे लड़के ने सिविल सेवा की तैयारी की और भारतीय राजस्व विभाग सेवा में नियुक्त हो कर आजकल मुंबई में सीमा शुल्क विभाग में बतौर डिप्टी कलेक्टर लगा हुआ है. दोनों के बीवीबच्चे उन के साथ ही रहते हैं.

बलिया से जब बाबू जगदीश नारायण रिटायर हुए तो दोनों बच्चों ने कहा जरूर था कि वे बारीबारी से उन के साथ रहें, पर उन का दिल न माना. दोनों लड़कों के बीच में बंट कर कैसे रहते? इसलिए इधरउधर दौड़ने के बजाय उन्होंने गांव में एकांत जीवन जीना पसंद किया और अपने पुश्तैनी गांव चले आए, जो अब कसबे का रूप धारण कर चुका था. चारों तरफ पक्की सड़कें बन चुकी थीं. घरों में बिजली लग चुकी थी. गांव का पुराना स्वरूप कहीं देखने को नहीं मिलता था.

बाबू जगदीश नारायण ने नौकरी में रहते हुए ही अपने पुराने कच्चे मकान को ध्वस्त कर हवेलीनुमा मकान बनवा लिया था. तब पत्नी जीवित थीं. वे खुद सशक्त और अपने पैरों पर चलनेफिरने लायक थे. सुबहशाम खेतों की तरफ जा कर काम देखते थे. पिता के जमाने से घर में काम कर रहे रामचंद्र को अपने पास रख लिया था. बाहर का ज्यादातर काम वही देखता था. मजदूर अलग से थे, जो खेतों में काम करते थे. घर में घीदूध की कमी न रहे इसलिए 2 भैंसें भी पाल ली थीं.

पतिपत्नी गांव में सुख से रहते थे. जीवन में गम क्या होता है, तब बाबू साहब को शायद पता भी नहीं था. छुट्टियों में दोनों लड़के आ जाते थे. घर में उल्लास छा जाता. दोनों बेटों के भी 2-2 बच्चे हो गए थे. वे सब आते, तो लगता उन से ज्यादा सुखी और संपन्न व्यक्ति दुनिया में और कोई नहीं है.

5 साल पहले पत्नी का देहांत हो गया. बेटे आए. तेरहवीं तक रहे. जब चलने लगे तो बेमन से कहा कि गांव में अकेले कैसे रहेंगे? बारीबारी से उन के पास रहें. गांव की जमीनजायदाद बेच दें. यहां उस का क्या मूल्य है? लेकिन उन्होंने देख लिया था कि बहुएं अपनेअपने पतियों से इशारा कर रही थीं कि पिताजी को अपने साथ रखने की कोई जरूरत नहीं है.

वैसे भी अपनी बहुओं की सारी हकीकत उन्हें ज्ञात थी. वे ठीक से उन से बात तक नहीं करती थीं. करतीं तो क्या वे स्वयं नहीं कह सकती थीं कि बाबूजी, चल कर आप हमारे साथ रहें. पर दिल से वे नहीं चाहती थीं कि बूढ़े को जिंदगी भर ढोएं और महानगर की अपनी चमकदार दुनिया को बेरंग कर दें.

बेटों को बाबू साहब ने साफ मना कर दिया कि वे उन में से किसी के साथ नहीं रहेंगे क्योंकि गांव से, खासकर अपनी कमाई से बनाई संपत्ति से उन्हें खासा लगाव हो गया था. बच्चे चले गए. एक बार मना करने के बाद दोबारा बच्चों ने चलने के लिए नहीं कहा. वे स्वाभिमानी व्यक्ति थे. जीवन में किसी के सामने झकना नहीं सीखा था. कभी किसी के दबाव में नहीं आए थे. आज बेटों के सामने क्यों झकते?

घर में वे और रामचंद्र रह गए. रामचंद्र की बीवी आ कर खाना बना जाती. जब तक वे बिस्तर पर न जाते, रामचंद्र अपने घर न जाता. पूर्ण निष्ठा के साथ वह देर रात तक उन की सेवा में जुटा रहता. दिन भर खेतों मेें मजदूरों के साथ काम करता, फिर आ कर घर के काम निबटाता. भैंसों को चारापानी देता. हालांकि उस की बीवी घर के कामों में उस की मदद करती थी, उस का ज्यादातर काम रसोई तक ही सीमित रहता था.

बाबू साहब को मधुमेह की बीमारी थी. जिस की दवाइयां वे लेते रहते थे. अचानक न जाने क्या हुआ कि उन के हाथपांवों में दर्द रहने लगा. घुटनों तक पैर जकड़ जाते और हाथों की उंगलियां कड़ी हो जातीं. मुट्ठी तक न बांध पाते. सुबह नींद खुलने पर बिस्तर से तुरंत नहीं उठ पाते थे. सारा शरीर जकड़ सा जाता.

पहले बाबू साहब ने आसपास ही इलाज करवाया. कोई फायदा नहीं हुआ तो जिला अस्पताल जा कर चेकअप करवाया. डाक्टरों ने बताया कि नसों के टिशूज मरते जा रहे हैं. नियमित टहलना, व्यायाम करना, कुछ चीजों से परहेज करना और नियमित दवाइयां खाने से फायदा हो सकता है. कोई गारंटी नहीं थी. फिर भी डाक्टरों का कहना तो मानना ही था.

जब वे अस्पताल में भरती थे तो दोनों बेटे एकएक कर के आए थे. डाक्टरों से परामर्श कर के और रामंचद्र को हिदायतें दे कर चले गए. किसी ने छुट्टी ले कर उन के पास रहना जरूरी नहीं समझ. उन की बीवियां तो आई भी नहीं. उन्हें यह सोच कर धक्का सा लगा था कि क्या बुढ़ापे में अपने सगे ऐसे हो जाते हैं. अंदर से उन्हें तकलीफ बहुत हुई थी लेकिन सबकुछ समय पर छोड़ दिया.

कुछ दिन अस्पताल में भरती रह कर बाबू साहब गांव आ गए. इलाज चल रहा था. पर कोई फायदा होता नजर नहीं आ रहा था. उन के पैर धीरेधीरे सुन्न और अशक्त होते जा रहे थे. रामचंद्र उन्हें पकड़ कर उठाता, तभी वे उठ कर बैठ पाते. चलनाफिरना दूभर होने लगा. उन्होंने बड़े बेटे को लिखा कि वह आ कर उन को लखनऊ के के.जी.एम.सी. या संजय गांधी इंस्टीट्यूट में दिखा दे.

बड़ा लड़का आया तो जरूर और उन्हें के.जी.एम.सी. में भरती करवा गया. पर इस के बाद कुछ नहीं. भरती कराने के बाद रामचंद्र से बोल गया कि जब तक इलाज चले, वह बाबूजी के साथ रहे. उस की बीवी को भी लखनऊ में छोड़ दिया.

रामचंद्र अपनी बीवी के साथ तनमन से बाबू साहब की सेवा में लगा रहा. धन तो बाबू साहब लगा ही रहे थे. उस की कमी उन के पास नहीं थी. पर न जाने उन के मन में कैसी निराशा घर कर गई थी कि किसी दवा का उन पर असर ही नहीं हो रहा था. अपनों के होते हुए भी उन का अपने पास न होने का एहसास उन्हें अंदर तक साल रहा था. डाक्टरों की लाख कोशिश के बावजूद वे ठीक न हो सके और लखनऊ से अपाहिज हो कर ही गांव लौटे.

अब स्थिति यह हो गई थी कि बाबू साहब चारपाई से उठने में भी अशक्त हो गए थे. रामचंद्र अधेड़ था पर उस के शरीर में जान थी. अपने बूते पर उन्हें उठा कर बिठा देता था तो वे तकियों के सहारे बिस्तर पर पैर लटका कर बैठे रहते थे.

एक दिन नौबत यह आ गई कि वे खुद मलमूत्र त्यागने में भी अशक्त हो गए. उन्हें बिस्तर से उतार कर चारपाई पर डालना पड़ा. चारपाई के बीच एक गोल हिस्सा काट दिया गया. नीचे एक बड़ा बरतन रख दिया गया, ताकि बाबू साहब उस पर मलमूत्र त्याग कर सकें.

रामचंद्र भी जीवट का आदमी था. न कोई घिन न अनिच्छा. पूरी लगन, निष्ठा और निस्वार्थ भाव से उन का मलमूत्र उठा कर फेंकने जाता. बाबू साहब ने उसे कई बार कहा कि वह कोई मेहतर बुला लिया करे. सुबहशाम आ कर गंदगी साफ कर दिया करेगा, पर रामचंद्र ने बाबू साहब की बातों को अनसुना कर दिया और खुद ही उन का मलमूत्र साफ करता रहा. उन्हें नहलाताधुलाता और साफसुथरे कपड़े पहनाता. उस की बीवी उन के गंदे कपड़े धोती, उन के लिए खाना बनाती. रामचंद्र खुद स्नान करने के बाद उन्हें अपने हाथों से खाना खिलाता. अपने सगे बहूबेटे क्या उन की इस तरह सेवा करते? शायद नहीं…कर भी नहीं सकते थे. बाबू साहब मन ही मन सोचते.

बाबू साहब उदास मन लेटेलेटे जीवन की सार्थकता पर विचार करते. मनुष्य क्यों लंबे जीवन की आकांक्षा करता है, क्यों वह केवल बेटों की कामना करता है? बेटे क्या सचमुच मनुष्य को कोई सुख प्रदान करते हैं? उन के अपने बेटे अपने जीवन में व्यस्त और सुखी हैं. अपने जन्मदाता की तरफ से निर्लिप्त हो कर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जैसे अपने पिता से उन्हें कुछ लेनादेना नहीं है.

और एक तरफ रामचंद्र है, उस की बीवी है. इन दोनों से उन का क्या रिश्ता है? उन्हें नौकर के तौर पर ही तो रखा था. परंतु क्या वे नौकर से बढ़ कर नहीं हैं? वे तो उन के अपने सगे बेटों से भी बढ़ कर हैं. बेटेबहू अगर साथ होते, तब भी उन का मलमूत्र नहीं छूते.

जब से वे पूरी तरह अशक्त हुए हैं, रामचंद्र अपने घर नहीं जाता. अपनी बीवी के साथ बाबू साहब के मकान में ही रहता है. उन्होंने ही उस से कहा था कि रात को पता नहीं कब क्या जरूरत पड़ जाए? वह भी मान गया. घर में उस के बच्चे अपनी दादी के साथ रहते थे. दोनों पतिपत्नी दिनरात बाबू साहब की सेवा में लगे रहते थे.

खेतों में कितना गल्लाअनाज पैदा हुआ, कितना बिका और कितना घर में बचा है, इस का पूरापूरा हिसाब भी रामचंद्र रखता था. पैसे भी वही तिजोरी में रखता था. बाबू साहब बस पूछ लेते कि कितना क्या हुआ? बाकी मोहमाया से वह भी अब छुटकारा पाना चाहते थे. इसलिए उस की तरफ ज्यादा ध्यान न देते. रामचंद्र को बोल देते कि उसे जो करना हो, करता रहे. रुपएपैसे खर्च करने के लिए भी उसे मना नहीं करते थे. तो भी रामचंद्र उन का कहना कम ही मानता था. बाबू साहब का पैसा अपने घर में खर्च करते समय उस का मन कचोटता था. हाथ खींच कर खर्च करता. ज्यादातर पैसा उन की दवाइयों पर ही खर्च होता था. उस का वह पूरापूरा हिसाब रखता था.

रात को जगदीश नारायण को जब नींद नहीं आती तो पास में जमीन पर बैठे रामचंद्र से कहते, ‘‘रमुआ, हम सभी मिथ्या भ्रम में जीते हैं. कहते हैं कि यह हमारा है, धनसंपदा, बीवीबच्चे, भाई- बहन, बेटीदामाद, नातीपोते…क्या सचमुच ये सब आप के अपने हैं? नहीं रे, रमुआ, कोई किसी का नहीं होता. सब अपनेअपने स्वार्थ के लिए जीते हैं और मिथ्या भ्रम में पड़ कर खुश हो लेते हैं कि ये सब हमारा है,’’ और वे एक आह भर कर चुप हो जाते.

रामचंद्र मनुहार भरे स्वर में कहता, ‘‘मालिक, आप मन में इतना दुख मत पाला कीजिए. हम तो आप के साथ हैं, आप के चाकर. हम आप की सेवा मरते दम तक करेंगे और करते रहेंगे. आप को कोई कष्टतकलीफ नहीं होने देंगे.’’

‘‘हां रे, रमुआ, एक तेरा ही तो आसरा रह गया है, वरना तो कब का इस संसार से कूच कर गया होता. इस लाचार, बेकार और अपाहिज शरीर के साथ कितने दिन जीता. यह सब तेरी सेवा का फल है कि अभी तक संसार से मोह खत्म नहीं हुआ है. अब तुम्हारे सिवा मेरा है ही कौन?

‘‘मुझे अपने बेटों से कोई आशा या उम्मीद नहीं है. एक तेरे ऊपर ही मुझे विश्वास है कि जीवन के अंतिम समय तक तू मेरा साथ देगा, मुझे धोखा नहीं देगा. अब तक निस्वार्थ भाव से मेरी सेवा करता आ रहा है. बंधीबंधाई मजदूरी के सिवा और क्या दिया है मैं ने?’’

‘‘मालिक, आप की दयादृष्टि बनी रहे और मुझे क्या चाहिए? 2 बेटे हैं, बड़े हो चुके हैं, कहीं भी कमाखा लेंगे. एक बेटी है, उस की शादी कर दूंगा. वह भी अपने घर की हो जाएगी. रहा मैं और पत्नी, तो अभी आप की छत्रछाया में गुजरबसर हो रहा है. आप के न रहने पर आवंटन में जो 2 बीघा बंजर मिला है, उसी पर मेहनत करूंगा, उसे उपजाऊंगा और पेट के लिए कुछ न कुछ तो पैदा कर ही लूंगा.’’

एक तरफ था रामचंद्र…उन का पुश्तैनी नौकर, सेवक, दास या जो भी चाहे कह लीजिए. दूसरी तरफ उन के अपने सगे बेटेबहू. उन के साथ खून के रिश्ते के अलावा और कोई रिश्ता नहीं था जुड़ने के लिए. मन के तार उन से न जुड़ सके थे. दूसरी तरफ रामचंद्र ने उन के संपूर्ण अस्तित्व पर कब्जा कर लिया था, अपने सेवा भाव से. उस की कोई चाहत नहीं थी. वह जो भी कर रहा था, कर्तव्य भावना के साथ कर रहा था. वह इतना जानता था कि बाबू साहब उस के मालिक हैं, वह उन का चाकर है. उन की सेवा करना उस का धर्म है और वह अपना धर्म निभा रहा था.

बाबू साहब के पास उन के अपने नाम कुल 30 बीघे पक्की जमीन थी. 20 बीघे पुश्तैनी और 10 बीघे उन्होंने स्वयं खरीदी थी. घर अपनी बचत के पैसे से बनवाया था. उन्होेंने मन ही मन तय कर लिया था कि संपत्ति का बंटवारा किस तरह करना है.

उन के अपने कई दोस्त वकील थे. उन्होंने अपने एक विश्वस्त मित्र को रामचंद्र के माध्यम से घर पर बुलवाया और चुपचाप वसीयत कर दी. वकील को हिदायत दी कि उस की मृत्यु पर अंतिम संस्कार से पहले उन की वसीयत खोल कर पढ़ी जाए. उसी के मुताबिक उन का अंतिम संस्कार किया जाए. उस के बाद ही संपत्ति का बंटवारा हो.

फिर उन्होंने एक दिन तहसील से लेखपाल तथा एक अन्य वकील को बुलवाया और अपनी कमाई से खरीदी 10 बीघे जमीन का बैनामा रामचंद्र के नाम कर दिया. साथ ही यह भी सुनिश्चित कर दिया कि उन की मृत्यु के बाद इस जमीन पर उन के बेटों द्वारा कोई दावामुकदमा दायर न किया जाए. इस तरह का एक हलफनामा तहसील में दाखिल कर दिया.

यह सब होने के बाद रामचंद्र और उस की बीवी उन के चरणों पर गिर पड़े. वे जारजार रो रहे थे, ‘‘मालिक, यह क्या किया आप ने? यह आप के बेटों का हक था. हम तो गरीब आप के सेवक. जैसे आप की सेवा कर रहे थे, आप के बेटों की भी करते. आप ने हमें जमीन से उठा कर आसमान का चमकता तारा बना दिया.’’

वे धीरे से मुसकराए और रामचंद्र के सिर पर हाथ फेर कर बोले, ‘‘रमुआ, अब क्या तू मुझे बताएगा कि किस का क्या हक है. तू मेरे अंश से नहीं जन्मा है, तो क्या हुआ? मैं इतना जानता हूं कि मनुष्य के अंतिम समय में उस को एक अच्छा साथी मिल जाए तो उस का जीवन सफल हो जाता है. तू मेरे लिए पुत्र समान ही नहीं, सच्चा दोस्त भी है. क्या मैं तेरे लिए मरते समय इतना भी नहीं कर सकता?

‘‘मैं अपने किसी भी पुत्र को चाहे कितनी भी दौलत दे देता, फिर भी वह मेरा इस तरह मलमूत्र नहीं उठाता. उस की बीवी तो कदापि नहीं. हां, मेरी देखभाल के लिए वह कोई नौकर रख देता, लेकिन वह नौकर भी मेरी इतनी सेवा न करता, जितनी तू ने की है. मैं तुझे कोई प्रतिदान नहीं दे रहा. तेरी सेवा तो अमूल्य है. इस का मूल्य तो आंका ही नहीं जा सकता. बस तेरे परिवार के भविष्य के लिए कुछ कर के मरते वक्त मुझे मानसिक शांति प्राप्त हो सकेगी,’’ बाबू साहब आंखें बंद कर के चुप हो गए.

मनुष्य का अंत समय आता है तो बचपन से ले कर जवानी और बुढ़ापे तक के सुखमय चित्र उस के दिलोदिमाग में छा जाते हैं और वह एकएक कर बाइस्कोप की तरह गुजर जाते हैं. वह उन में खो जाता है और कुछ क्षणों तक असंभावी मृत्यु की पीड़ा से मुक्ति पा लेता है.

बुढ़ापे की अपंगता को छोड़ कर बाबू साहब को नहीं लगता कि कभी किसी दुख से उन का आमनासामना हुआ हो. पिता संपन्न किसान थे. साथ ही उस जमाने के पटवारी भी थे. 2 बहनों के बीच अकेले भाई थे. लाड़प्यार से पालन- पोषण हुआ था. किसी चीज का अभाव नहीं था, पर वे बिगड़ैल नहीं निकले क्योंकि मां समझदार थीं. अच्छे संस्कार डाले उन में. बुद्धि के तेज थे. स्कूल में हमेशा अव्वल आते. 5वीं के बाद उन्हें पढ़ने के लिए कसबे के इंटर कालेज में भेज दिया गया. वहां भी प्राध्यापकों के चहेते रहे. इंटर के बाद उच्च शिक्षा के लिए वे इलाहाबाद गए. वहां होस्टल में रह कर पढ़ाई की. अच्छे अंकों से बी.एससी. उत्तीर्ण की. तभी उन का मन साइंस से उचट गया.

बातोंबातों में एक दिन उन के एक मित्र ने कह दिया, ‘यार जगदीश, तू क्यों साइंस के फार्मूलों में उलझ हुआ है. तेरी तो तर्कवितर्क की शक्ति बड़ी पैनी है. बहस जोरदार कर लेता है. एलएल.बी. कर के वकालत क्यों नहीं करता?’

कहां तो वे आई.ए.एस. बनने का सपना देख रहे थे, कहां उन के मित्र ने उन की दिशा बदल दी. बात उन को जम गई. बी.एससी. कर चुके थे. तुरंत ला कालेज में दाखिला ले लिया. पढ़ने में जहीन थे ही. कोई दिक्कत नहीं हुई. 3 साल में वकालत पास कर ली और इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक बड़े वकील के साथ प्रैक्टिस करने लगे. साथ ही साथ न्यायिक परीक्षा की तैयारी भी. पहली बार बैठे और पास हो गए. न्यायिक मजिस्ट्रेट बन कर पहली बार उन्नाव गए. तब से 35 साल की नौकरी में प्रदेश के कई जिलों में विभिन्न पदों पर तैनात रहे. अंत में बलिया से जिला जज के पद से रिटायर हुए. न्यायिक सेवा में अपनी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी से नाम कमाया तो आलोचनाओं के भी शिकार हुए. पर उन्हें जो सच लगा, उसी का पक्ष लिया. जानबूझ कर अंतर्मन से किसी का पक्षपात नहीं किया.

कहते हैं न कि जीवन अपना हिसाबकिताब बराबर रखता है. ज्यादातर जीवन में अगर उन्हें सुख ही सुख नसीब हुआ था, तो अब अंत समय में दुख की बारी थी. इसे भी उन्हें इसी जीवन में भुगतना था, वरना जीवन का खाता असंतुलित रह जाएगा. आय और व्यय का पूरा विवरण आना ही चाहिए. सुख अगर आय है तो दुख व्यय.

उन का शरीर दिन ब दिन क्षीण होता जा रहा था. मानसिक संताप से वे उबर नहीं पा रहे थे. बेटे बिना नागा फोन पर उन की कुशलता की जानकारी हासिल कर रहे थे. पर क्या जीवन के अंतिम क्षणों में बच्चों की कुशलक्षेम पूछने भर से उन का कष्ट और संताप कम हो सकता था.

फोन पर ही बेटों को उन्होंने बता दिया था कि पुश्तैनी जमीनजायदाद और खुद की कमाई संपत्ति की उन्होंने वसीयत कर दी है. उस को पंजीकृत भी करवा दिया है. वसीयत वकील अमरनाथ वर्मा के पास रखी है. जीतेजी देखने तो क्या आओगे? मेरी मृत्यु पर ही तुम लोग आओगे, पर अंतिम संस्कार करने से पहले वसीयत पढ़ लेना. उस के बाद ही मेरा अंतिम संस्कार करना.

और वह दिन भी आ पहुंचा. हवेली के विशाल आंगन में उन का पार्थिव शरीर रखा था. एक तरफ परिजन बैठे थे, उन के बीच सफेद कुरतेपायजामे में बाबू साहब के दोनों बेटे बैठे थे. महिलाएं अंदर थीं. वकील साहब को खबर कर दी गई थी. बस पहुंचने ही वाले थे.

वकील साहब के पहुंचते ही सब की नजरें उन के चेहरे पर टिक गईं. उन्होंने बारीबारी से सब को देखा. एक कोने में दीनहीन रामचंद्र बैठा था. केवल उस की आंखों में आंसू थे, पर वह रो नहीं सकता था, क्योंकि वहां सभी धीरगंभीर मुद्रा अपनाए थे.

वकील साहब ने अपने ब्रीफकेस से एक फाइल निकाली और उसे खोल कर पहले बाबू साहब के दोनों बेटों की तरफ देखा, फिर रामचंद्र को अपने पास बुला लिया. गंभीर वाणी में बोले, ‘‘मैं वसीयत पढ़ने जा रहा हूं. आप तीनों ध्यान से सुनना क्योंकि यह केवल आप ही 3 लोगों से संबंधित है,’’ फिर उन्होंने वसीयत पढ़नी प्रारंभ की :

‘‘मैं जगदीश नारायण श्रीवास्तव, निवासी ग्राम व पोस्ट हरचंदरपुर, जिला रायबरेली अपने पूरे होशोहवास और संज्ञान में शपथपूर्वक अपनी संपत्ति की निम्नलिखित वसीयत करता हूं :

‘‘भोरवा खेड़ा स्थित 20 बीघा पुश्तैनी जमीन, जो अलगअलग 4 चकों में है, मेरे दोनों पुत्रों के बीच बराबरबराबर बांट दी जाए. इसी तरह बैंक में जमा धनराशि के भी वे बराबर के हिस्सेदार होंगे. सोनेचांदी के जेवरात इन की बहुओं को बराबरबराबर सुनार की मध्यस्थता में उन की कीमत आंक कर बांट दिए जाएं.

‘‘रही 10 बीघा जमीन, जो मैं ने अपनी बचत और मेहनत की कमाई से खरीदी थी, उस का बैनामा मैं पहले ही अपने पुत्रसमान सेवक रामचंद्र के नाम कर चुका हूं. वह मेरा सगा बेटा नहीं है, पर मैं उस को अपने बेटों से भी बढ़ कर मानता हूं. संतान सुख क्या होता है वह मैं ने अपने दोनों पुत्रों के पालनपोषण से प्राप्त कर लिया है, परंतु जीवन के अंतिम समय में संतान एक पिता को क्या सुख देती है, यह मुझे अपने पुत्रों से प्राप्त नहीं हो सका. वह सुख मुझे मिला तो केवल रामचंद्र से, उस की पत्नी और बच्चों से.

‘‘मेरी सेवा करते समय उन के मन में कभी यह लालसा न रही होगी कि मजदूरी के अलावा उन्हें कुछ और प्राप्त हो. बचपन में हम अपने बच्चों का मलमूत्र साफ करते हैं. हमें उस से घृणा नहीं होती क्योंकि बच्चों को हम अपना अंश समझते हैं और यह समझते हैं कि वे हमारे बुढ़ापे की लाठी हैं, परंतु क्या सचमुच…

‘‘रामचंद्र के शरीर में मेरा खून नहीं है. वह मेरे घरपरिवार का भी नहीं है. है तो बस मात्र एक नौकर, परंतु उस की सेवा में नौकरभाव नहीं है. इस से कहीं कुछ ज्यादा है. वह मेरा मलमूत्र ऐसे उठाता है जैसे अपने अबोध बच्चे का उठा रहा हो. कोई घृणा नहीं उपजती है उस के मन में. उसी पितृभाव से मुझे नहलाताधुलाता है. मुझे साफ कपडे़ पहना कर अपने हाथों से खाना खिलाता है. मेरी सेवा करने में उस की पत्नी ने भी कभी कोताही नहीं बरती. कभी थकान या ऊब का भाव नहीं दिखाया. यह सब करते हुए क्या उन के मन में किसी प्रतिदान की आकांक्षा या लालसा रही होगी…कभी नहीं. इन दोनों ने मुझ से पूछे बिना कोई चीज इधर से उधर नहीं रखी.

‘‘ऐसे स्वामीभक्त रामचंद्र को मैं इस से ज्यादा दे भी क्या सकता था कि उस के बच्चों का भविष्य सुनिश्चित कर दूं. 10 बीघे जमीन में मेहनत से खेती करेंगे तो उन्हें कभी रोटी के लिए दूसरे के आगे हाथ नहीं पसारना पड़ेगा. मेरे बेटे सुखी- संपन्न और नौकरीपेशा वाले हैं. आशा है, मेरे इस निर्णय से उन के दिल को चोट नहीं पहुंची होगी.’’

वकील साहब थोड़ी देर के लिए रुके. सब लोग मंत्रमुग्ध थे. वकील साहब ने आगे पढ़ा :

‘‘इस के बाद यह मकान बचता है. इसे भी मैं ने अपने खूनपसीने की कमाई से बनवाया है. मैं जानता हूं, मेरे बेटेपोते मेरी मृत्यु के बाद गांव का रुख नहीं करेंगे. इस मकान को औनेपौने दाम में किसी बनिए को बेच देंगे. अत: यह मकान भी मैं रामचंद्र को दान करता हूं. मेरी मृत्यु के बाद वह सपरिवार इस मकान को अपने रहने के लिए उपयोग करे. दोनों भैंसें भी उसी की होंगी.’’

लाखों की संपत्ति बाबू साहब एक नौकर को दे कर चले गए. क्या उन के बेटे इस वसीयत को मानेंगे और यों ही चुप बैठे रह जाएंगे? सब की नजरें उन के बेटों की तरफ उठीं और एकटक उन्हें ही ताकने लगीं. वे क्या प्रतिक्रिया करेंगे? परिचित तथा परिजनों को विश्वास था कि अंतिम संस्कार से पहले ही कोई न कोई हंगामा खड़ा हो जाएगा.

उधर रामचंद्र जारजार रो रहा था.

दोनों बेटों ने एकदूसरे की तरफ देखा. चंद क्षणों तक एकदूसरे से कानाफूसी की और बड़े बेटे ने खड़े हो कर कहा, ‘‘हमें पिताजी पर गर्व है. उन्होंने जो कुछ किया, बहुत अच्छा किया. हमें उन से कोई शिकायत नहीं है. सच तो यही है कि हम उन के पुत्र होते हुए भी उन की कोई सेवा न कर सके. उन्हें अकेला छोड़ कर हम अपने बीवीबच्चों में मस्त रहे. वृद्धावस्था का अकेलापन और अपनों के पास न होने का बाबूजी का गम हम महसूस न कर सके. उन्हें अकेला मरने के लिए छोड़ दिया. पर हम रामचंद्र को अपना बड़ा भाई मानते हुए अपनेअपने हिस्से की जमीन को भी बोनेजोतने का अधिकार देते हैं और साथ ही यह अधिकार भी देते हैं कि बाबूजी का अंतिम संस्कार भी उसी के हाथों से संपन्न हो. इन्हीं हाथों ने बाबूजी की अंतिम दिनों में सेवा की है. यही उन का असली पुत्र है और उसे यह अधिकार मिलना चाहिए.’’

सब की नजरों में रामचंद्र के लिए अथाह आदर और सम्मान था. Family Story In Hindi 

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