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जिंदगी मेरे घर आना

दफ्तर में नए जनरल मैनेजर आने वाले थे. हर जबान पर यही चर्चा थी. पुराने जाने वाले थे. दफ्तर के सभी साहब और बाबू यह पता करने की कोशिश में थे कि कहां से तबादला हो कर आ रहे हैं. स्वभाव कैसा है, कितने बच्चे हैं इत्यादि. परंतु कोई खास जानकारी किसी के हाथ नहीं लग रही थी. अलबत्ता उन के तबादलों का इतिहास बड़ा समृद्ध था, यह सब को समझ आने लगा था.

नियत दिन नए मैनेजर ने दफ्तर जौइन किया तो खूब स्वागत किया गया. पुराने मैनेजर को भी बड़े ही सौहार्दपूर्ण ढंग से बिदा किया.

शशांक साहब यानी जनरल मैनेजर वातानुकूलित चैंबर में भी पसीनापसीना होते रहते. न जाने क्यों हर आनेजाने वाले से शंकित निगाहों से बात करते. लोगों में उन का यह व्यवहार करना कुतूहल का विषय था. पर धीरेधीरे दफ्तर के लोग उन के सहयोगपूर्ण और अहंकार रहित व्यवहार के कायल होते गए.

1 महीने की छुट्टी पर गया नीरज जब दफ्तर में आया तो शशांक साहब को नए जनरल मैनेजर के रूप में देख पुलकित हो उठा, क्योंकि वह उन के साथ काम कर चुका था. वैसे ही शंकित रहने वाले साहब नीरज को देख और ज्यादा शंकित दिखने लगे थे. बड़े ही ठंडे उत्साह से उन्होंने नीरज से हाथ मिलाया और फिर तुरंत अपने काम में व्यस्त हो गए.

मगर ज्यों ही नीरज उन से मिलने के बाद चैंबर से बाहर गया, उन के कान दरवाजे पर ही अटक गए. शशांक को महसूस हुआ कि बाहर अचानक जोर के ठहाकों की गूंज हुई. वे वातानुकूलित चैंबर में भी पसीनापसीना हो गए कि न जाने नीरज क्या बता रहा होगा.

अब उन का ध्यान सामने पड़ी फाइलों में नहीं लग रहा था. घड़ी की तरफ देखा. अभी 12 ही बजे थे. मन हुआ घर चले जाएं, फिर सोचा घर जा कर भी अभी से क्या करना है. कोई अरुणा थोड़े है घर में…

‘शायद नीरज अब तक बता चुका होगा. न जाने क्याक्या बताया होगा उस ने. क्या उसे असली बात मालूम होगी,’ शशांक साहब सोच रहे थे, ‘क्या नीरज भी यही समझता होगा कि मैं ने अरुणा को मारा होगा?’

यह सोचते हुए शशांक की यादों का गंदा पिटारा खुलने को बेचैन होने लगा. अधेड़ हो चले शशांक ने वर्तमान का पेपरवेट रखने की कोशिश की कि अतीत के पन्ने कहीं पलट न जाएं पर जो बीत गई सो बात गई का ताला स्मृतियों के पिटारे पर टिक न पाया. काले, जहरीले अशांत सालों के काले धुएं ने आखिर उसे अपनी गिरफ्त में ले ही लिया…

शादी के तुरंत बाद की ही बात थी.

‘‘अरुणा तुम कितनी सुंदर हो, तुम्हें जब देखता हूं तो अपनी मां को मन ही मन धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने तुम्हें मेरे लिए चुना.’’

अरुणा के लाल होते जा रहे गालों और झुकती पलकों ने शशांक की दीवानगी को और हवा दे दी.

क्या दिन थे वे भी. सोने के दिन और चांदी की रातें. शशांक की डायरी के पन्ने उन दिनों कुछ यों भरे जा रहे थे.

‘‘जीत लिखूं या हार लिखूं या दिल का सारा प्यार लिखूं,

मैं अपने सब जज्बात लिखूं या सपनों की सौगात लिखूं,

मैं खिलता सूरज आज लिखूं या चेहरा चांद गुलाब लिखूं,

वो डूबते सूरज को देखूं या उगते फूल की सांस लिखूं.’’

दिल से बेहद नर्म और संवेदनशील शशांक के विपरीत अरुणा में व्यावहारिकता अधिक थी. तभी तो उस ने उस छोटी सी मनीऔर्डर रसीद को ही ज्यादा तवज्जो दी.

‘‘शशांक ये 2 हजार रुपए आप ने किस को भेजे हैं?’’ उस दिन अरुणा ने पहली बार पूछा था.

‘‘यह रसीद तो मेरी डायरी में थी. इस का मतलब तुम ने अपने ऊपर लिखी मेरी सारी कविताओं को पढ़ लिया होगा?’’ शशांक ने उसे निकट खींचते हुए कहा.

‘‘अपनी मां को भेजे हैं, हर महीने भेजता हूं उन के हाथ खर्च हेतु.’’

शशांक ने सहजता से कहा और फिर अपने दफ्तर के किस्से अरुणा को सुनाने लगा.

पर शायद उस ने अचानक बदलने वाली फिजा पर गौर नहीं किया. चंद्रमुखी से सूरजमुखी का दौर शुरू हो चुका था, जिस की आहट कवि हृदय शशांक को सुनाई नहीं दे रही थी. अब आए दिन अरुणा की नईनई फरमाइशें शुरू हो गई थीं.

‘‘अरुणा इस महीने नए परदे नहीं खरीद सकेंगे. अगले महीने ही ले लेना. वैसे भी ये गुलाबी परदे तुम्हारे गालों से मैच करते कितने सुंदर हैं.’’

शशांक चाहता था कि अरुणा एक बजट बना कर चले. मां को पैसे भेजने के बाद बचे सारे पैसे वह उस की हथेली पर रख कर निश्चिंत रहना चाहता था.

‘‘तुम्हारे पिताजी तो कमाते ही हैं. फिर तुम्हारी मां को तुम से भी पैसे लेने की क्या जरूरत है?’’ अरुणा के शब्दबाण छूटने लगे थे.

‘‘अरुणा, पिताजी की आय इतनी नहीं है. फिर बहुत कर्ज भी है. मुझे पढ़ाने, साहब बनाने में मां ने अपनी इच्छाओं का सदा दमन किया है. अब जब मैं साहब बन गया हूं, तो मेरा यह फर्ज है कि मैं उन की अधूरी इच्छाओं को पूरा करूं.’’

शशांक ने सफाई दी थी. परंतु अरुणा मुट्ठी में आए 10 हजार को छोड़ उन 2 हजार के लिए ही अपनी सारी शांति भंग करने लगी. उन दिनों 10-12 हजार तनख्वाह कम नहीं होती थी. पर शायद खुशी और शांति के लिए धन से अधिक समझदारी की जरूरत होती है, विवेक की जरूरत होती है. यहीं से शशांक और अरुणा की सोच में रोज का टकराव होने लगा. गुलाबी डायरी के वे पन्ने जिन में कभी सौंदर्यरस की कविताएं पनाह लेती थीं, मुहब्बत के भीगे गुलाब महकते थे, अब नूनतेललकड़ी के हिसाबकिताब की बदबू से सूखने लगे थे.

शेरोशायरी छोड़ शशांक फुरसत के पलों में बीवी को खुश रखने के नुसखे और अधिक से अधिक कमाई करने के तरीके सोचता. नन्हा कौशल अरुणा और शशांक के मध्य एक मजबूत कड़ी था. परंतु उस की किलकारियां तब असफल हो जातीं जब अरुणा को नाराजगी के दौरे आते. सौम्य, पारदर्शी हृदय का स्वामी शशांक अब गृह व मानसिक शांति हेतु बातों को छिपाने में खासकर अपने मातापिता से संबंधित बातों को छिपाने में माहिर होने लगा.

उस दिन अरुणा सुबह से ही कुछ खास सफाई में लगी हुई थी. पर सफाई कम जासूसी अधिक थी.

‘‘यह तुम्हारे बाबूजी की 2 महीने पहले की चिट्ठी मिली मुझे. इस में इन्होंने तुम से 10 हजार रुपए मांगे हैं. तुम ने भेज तो नहीं दिए?’’

अरुणा के इस प्रश्न पर शशांक का चेहरा उड़ सा गया. पैसे तो उस ने वाकई भेजे थे, पर अरुणा गुस्सा न हो जाए, इसलिए उसे नहीं बताया था. पिछले दिनों उसे तरक्की और एरियर मिला था. इसलिए घर की मरम्मत हेतु बाबूजी को भेज दिए थे.

अरुणा आवेश में आ गई, क्योंकि शशांक का निर्दोष चेहरा झूठ छिपा नहीं पाता था.

‘‘रुको, मैं तुम्हें बताती हूं… ऐसा सबक सिखाऊंगी कि जिंदगी भर याद रखोगे…’’

उस वक्त तक शशांक की सैलरी में अच्छीखासी बढ़ोतरी हो चुकी थी पर अरुणा उन 10 हजार के लिए अपने प्राण देने पर उतारू हो गई थी. आए दिन उस की आत्महत्या की धमकियों से शशांक अब ऊबने लगा था.

सूरजमुखी का अब बस ज्वालामुखी बनना ही शेष था. अरुणा का बड़बड़ाना शुरू हो गया था. शशांक ने नन्हे कौशल का हाथ पकड़ा और उसे स्कूल छोड़ते हुए दफ्तर के लिए निकल गया. अभी दफ्तर पहुंचा ही था कि उस के सहकर्मी ने बताया, ‘‘जल्दी घर जाओ, तुम्हारे पड़ोसी का फोन आया था. भाभीजी बुरी तरह जल गई हैं.’’

बुरी तरह से जली अरुणा अगले 10 दिनों तक बर्न वार्ड में तड़पती रही.

‘‘मैं ने सिर्फ तुम्हें डराने के लिए हलकी सी कोशिश की थी… मुझे बचा लो शशांक,’’ अरुणा बोली.

जाती हुई अरुणा यही बोली थी. अपनी क्रोधाग्नि की ज्वाला में उस ने सिर्फ स्वयं को ही स्वाहा नहीं किया, बल्कि शशांक और कौशल की जिंदगी की समस्त खुशियों और भविष्य को भी खाक कर दिया था. लोकल अखबारों में, समाज में अरुणा की मौत को सब ने अपनी सोच अनुसार रंग दिया. रोने का मानो वक्त ही नहीं मिला. कानूनी पचड़ों के चक्रव्यूह से जब शशांक बाहर निकला तो नन्हे कौशल और अपनी नौकरी की सुधबुध आई. उस के मातापिता अरुणा की मौत के कारणों और वजह के लांछनों से उबर ही नहीं पाए. कुछ महीनों के भीतर ही दोनों की मौत हो गई.

बच गए दोनों बापबेटे, दुख, विछोह, आत्मग्लानि के दरिया में सराबोर. अरुणा नाम की उन की बीवी, मां ने उन के सुखी और शांत जीवन में एक भूचाल सा ला दिया था. खुदगर्ज ने अपना तो फर्ज निभाया नहीं उलटे अपनों के पूरे जीवन को भी कठघरे में बंद कर दिया था. उस कठघरे में कैद बरसोंबरस शशांक हर सामने वाले को कैफियत देता आया था. घृणा हो गई थी उसे अरुणा से, अरुणा की यादों से. भागता फिरने लगा था किसी ऐसे कोने की तलाश में जहां कोई उसे न जानता हो.

अरुणा का यों जाना शशांक के साथसाथ कौशल के भी आत्मविश्वास को गिरा गया था. 14 वर्षीय कौशल आज भी हकलाता था. बरसों उस ने रात के अंधेरे में अपने पिता को एक डायरी सीने से लगाए रोते देखा था. जाने बच्चे ने क्याक्या झेला था.

एक दिन शशांक ने ध्यान दिया कि कौशल बहुत देर से उसे घूर रहा है. अत: उस ने

पूछा, ‘‘क्या हुआ कौशल? कुछ काम है मुझ से?’’

‘‘प…प…पापा क…क… क्या आप ने म…म… मम्मी को मारा था?’’ हकलाते हुए कौशल ने पूछा.

‘‘किस ने कहा तुम से? बकवास है यह. मैं तुम्हारी मां से बहुत प्यार करता था. उस ने खुद ही…’’ बोझिल हो शशांक ने थकेहारे शब्दों में कहा.

‘‘व…व…वह रोहित है न, वह क…क… कह रहा था तुम्हारे प…प..पापामम्मी में बनती नहीं थी सो एक दिन तुम्हारे प…प…पापा ने उन्हें ज…ज… जला दिया,’’ कौशल ने प्रश्नवाचक निगाहों से कहा. उस की आंखें अभी भी शंकित ही थीं.

यही शंकाआशंका शशांक के जीवन में भी उतर गई थी. अपनी तरफ उठती हर निगाह उसे प्रश्न पूछती सी लगती कि क्या तुम ने अपनी बीवी को जला दिया? क्या अरुणा का कोई पूर्व प्रेमी था? क्या अरुणा के पिताजी ने दहेज नहीं दिया था?

जितने लोग उतनी बातें. आशंकाओं और लांछनों का सिलसिला… भागता रहा था शशांक एक जगह से दूसरी जगह बेटे को ले कर. अब थक गया था. वह कहते हैं न कि एक सीमा के बाद दर्द बेअसर होने लगता है.

बड़ी ही तीव्र गति से शशांक का मन बेकाबू रथ सा भूतकाल के पथ पर दौड़ा जा रहा था. चल रहे थे स्मृतियों के अंधड़…

तभी कमरे की दीवार घड़ी ने जोर से घंटा बजाया तो शशांक की तंद्रा भंग हुई. बेलगाम बीते पलों के रथ पर सवार मन पर कस कर लगाम कसी. जो बीत गया सो बात गई…

‘1 बज गया, कौशल भी स्कूल से आता होगा’, चैंबर से बाहर निकला तो देखा पूरा दफ्तर अपने काम में व्यस्त है.

‘‘क्यों आज लंच नहीं करना है आप लोगों को? भई मुझे तो जोर की भूख लगी है?’’ मुसकराने की असफल कोशिश करते हुए शशांक ने कहा.

सभी ने इस का जवाब एकसाथ मुसकराहट में दिया.

घर पहुंच शशांक ने देखा कि खानसामा खाना बना इंतजार कर रहा था.

‘‘खाना लगाऊं साहब, कौशल बाबा कपड़े बदल रहे हैं?’’ उस ने पूछा.

‘‘अरे वाह, आज तो सारी डिशेज मेरी पसंद की हैं,’’ खाने के टेबल पर शशांक ने चहकते हुए कहा.

‘‘पापा आप भूल गए हैं, आज आप का जन्मदिन है. हैप्पी बर्थडे पापा,’’ गले में हाथ डालते हुए कौशल ने कहा.

‘‘तो कैसा रहा आज का दिन. नए स्कूल में मन तो लग रहा है?’’ शशांक ने पूछा. अंदर से उस का दिल धड़क रहा था कि कहीं पिछली जिंदगी का कोई जानकार उसे यहां न मिल गया हो. पर उस ने एक नई चमक कौशल की आंखों में देखी.

‘‘पापा, मैथ्स के टीचर बहुत अच्छे हैं. साइंस और अंगरेजी वाली मैडम भी बहुत अच्छा बताती हैं. बहुत सारे दोस्त बन गए हैं. सब बेहद होशियार हैं. मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ेगी ताकि मैं उन सब के बीच टिक पाऊं…’’

शशांक ने गौर किया कि कौशल का हकलाना अब काफी कम हो गया है. शाम को कौशल ने खानसामे और ड्राइवर की मदद से एक छोटी सरप्राइज बर्थडे पार्टी का आयोजन किया था. उस के नए दोस्त तो आए ही थे, साथ ही उस ने शशांक के दफ्तर के कुछ सहकर्मियों को भी बुला लिया था.

नीरज भी आया था. ऐसा लग रहा था कौशल को उस ने भी सहयोग किया था इस आयोजन में. नीरज को उस ने फिर चोर निगाहों से देखा कि क्या इस ने सचमुच किसी को कुछ नहीं बताया होगा? अब जो हो सो हो, कौशल को खुश देखना ही उस के लिए सुकूनदायक था.

कब तक अतीत से भागता रहेगा. अब कुछ वर्ष टिक कर इस जगह रहेगा और तबादले कौशल की पढ़ाई के लिए अब ठीक न होंगे. वर्षों बाद घर में रौनक और चहलपहल हुई थी.

‘‘पापा आप खुश हैं न? हमेशा दूसरों के घर बर्थडे पार्टी में जाता था, सोचा आज अपने घर कुछ किया जाए,’’ कह कौशल ने एक नई डायरी और पैन शशांक के हाथ में देते हुए कहा, ‘‘आप के जन्मदिन का गिफ्ट, आप फिर से लिखना शुरू कीजिए पापा, मेरे लिए.’’

उस रात शशांक देर तक आकाश की तरफ देखता रहा. आसमान में काले बादलों का बसेरा था. मानो सुखरूपी चांद को दुखरूपी बादल बाहर आने ही नहीं देना चाहते हों. थोड़ी देर के बाद चांद बादलों संग आंखमिचौली खेलने लगा, ठीक उस के मन की तरह. बादल तत्परता से चांद को उड़ते हुए ढक लेते थे. मानो अंधेरे के साम्राज्य को बनाए रखना ही उन का मकसद हो.

अचानक चांद बादलों को चीर बाहर आ गया और चांदनी की चमक से घोर अंधेरी रात में उजियारा छा गया. शशांक देर तक चांदनी में नहाता रहा. पड़ोस से आती रातरानी की मदमस्त खुशबू से उस का मन तरंगित होने लगा, उस का कवि हृदय जाग्रत होने लगा. उस ने डायरी खोली और पहले पन्ने पर लिखा:

‘‘जिंदगी, जिंदगी मेरे घर आना… फिर से.’’

शादी के चार महीने बाद अंकिता लोखंडे ने दी गुड न्यूज!

अंकिता लोखंडे (Ankita Lokhande) अपनी शादीशुदा जिंदगी को लेकर सुर्खियों में छायी रहती हैं. वह अक्सर अपने पति के साथ फोटोज और वीडियो शेयर करती रहती हैं. हाल ही में उन्हें ‘लॉक अप’ (Lock Upp)  में देखा गया. इस शो में उन्होंने एक गुड न्यूज दी.जिसे सुनकर सबका मुंह खुला का खुला ही रह गया. आइए बताते है, क्या कहा अंकिता ने?

जैस कि ‘लॉक अप’ में आने वाले हर कंटेस्टेंट को अपना एक सीक्रेट बताना होता है. ऐसे में कंगना ने अंकिता को भी एक सीक्रेट बताने के लिए कहा. कंगना ने कहा, अंकिता हमारे यहां एक परंपरा है कि लोगों को अपने जीवन से एक सीक्रेट बताना होता है.

 

कंगना रनौत के इस सवाल पर पहले अंकिता ने कहा कि उनके पास कोई राज नहीं है लेकिन बाद में जब कंगना ने जोर दिया तो एक्ट्रेस ने बताया कि यह सीक्रेट विक्की को भी नहीं पता. मुझे बधाई दो दोस्तों, मैं प्रेग्नेंट हूं. ये सुनकर कंटेस्टेंट और कंगना हैरान रह गए लेकिन बाद में अंकिता ने कहा, अप्रैल फूल बनाया. इस पर कंगना ने जवाब दिया, फर्स्ट अप्रैल भी नहीं है आज.

 

कंगना रनौत ने ये भी कहा कि मुझे आशा है कि तुम्हारा झूठा सीक्रेट जल्दी सच हो जाए.  इसपर अंकिता ने जवाब दिया, जल्दी होगा. आपको बता दें कि अंकिता 14 दिसंबर 2021 को अपने लॉन्गटाइम बॉयफ्रेंड विक्की जैन के साथ शादी के बंधन में बंधी थीं.

 

अंकिता लोखंडे इन दिनों हैप्पी मैरिड लाइफ एंजॉय कर रही हैं. अंकिता और उनके पति विक्की जैन टीवी शो स्मार्ट जोड़ी में काम कर रहे हैं. हाल ही में अंकिता, कंगना के रियलिटी शो लॉक अप में अपनी वेब सीरीज पवित्र रिश्ता के अपकमिंग सीजन को प्रमोट करने आई थीं. इस दौरान कंगना ने उनसे सीक्रेट पूछा था.

आर्यन का होगा भयंकर एक्सिडेंट! क्या बचा पाएगी इमली?

टीवी सीरियल ‘इमली’ में  इन दिनों हाई वोल्टेज ड्रामा चल रहा है. हाल ही में शो में दिखाया गया कि इमली और आर्यन ने शादी की. अब इमली आर्यन की पत्नी बन चुकी है. लेकिन शादी के बाद भी इमली आर्यन के साथ नहीं रहना चाहती है. शो के आने वाले एपिसोड में बड़ा ट्विस्ट आने वाला है. आइए बताते हैं, शो के नए एपिसोड के बारे में.

सीरियल ‘इमली’ में आपने देखा कि शादी के बाद इमली और आर्यन के लिए रिसेप्शन पार्टी रखा गया. जिसमें शहर के बड़े लोग हिस्सा लेते हैं. तो दूसरी तरफ आर्यन इमली को अपने साथ रिसेप्शन पार्टी में चलने के लिए कहता है. शो में आप ये भी देखेंगे कि आर्यन इमली की मांग में सिंदूर भरेगा. आर्यन कहेगा कि इमली अब उसकी पत्नी है.

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तो वहीं इमली आर्यन को सबक सिखाने के लिए नौकरानी बनेगी. रिसेप्शन पार्टी में इमली को देखकर सब हैरान रह जाएंगे. पार्टी में सभी मेहमान का एक ही सवाल होगा, आर्यन ने एक नौकरानी से शादी क्यों की? इसी बीच आर्यन भी सफाई में इमली की मदद करेगा.

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तो दूसरी तरफ पार्टी में प्रीता इमली की खूब बेइज्जती करेगी. इमली भी उसकी बोलती बंद कर देगी. वहीं बड़ी मां भी खड़ी होकर मजे से तमाशा देखेगी. पार्टी खत्म होने के बाद आर्यन अपने काम पर निकल जाएगा.

 

शो में आप देखेंगे कि रास्ते में आर्यन का भयंकर एक्सीडेंट होगा. उसकी जान खतरे में होगी. ऐसे में शो में ये देखना होगा कि इमली कैसे आर्यन की जान बचाएगी?

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झटका- भाग 3: निशा के दरवाजे पर कौन था?

निशा का सामना करने के लिए संगीता अगली शाम जींस और लाल टीशर्ट पहन कर बड़े आकर्षक ढंग से तैयार हुई. इस तरह के कपड़ों पर पहले उस के सासससुर चूंचूं करते थे पर उस दिन सास ने भी कुछ नहीं कहा.

अंजलि ने स्मार्ट और स्लिम दिखाने के लिए उस की प्रशंसा की, तो वह खुश हो गई. लेकिन अगले ही पल उस की आंखों में गंभीरता और कठोरता के भाव लौट आए.

सारे रास्ते संगीता निशा को कोसती रही. उस के बारे में संगीता का गुस्सा पलपल बढ़ता गया था.

निशा के फ्लैट की बहुमंजिली इमारत में घुसने से पहले अचानक अंजलि ने पूछा, ‘‘भाभी, आप सिर्फ निशा को ही क्यों दोषी मान रही हो? क्या भैया बराबर के दोषी नहीं हैं?’’

‘‘उन से भी मैं आज निबटूंगी,’’ संगीता का गुस्सा और ज्यादा बढ़ गया.

‘‘वैसे, एक बात कहूं, भाभी?’’

‘‘हां, कहो.’’

‘‘अगर आप ने ढीली पड़ कर जिंदगी के प्रति उत्साह न खोया होता, तो शायद समस्या जन्म ही न लेती.’’

‘‘तुम्हारा ऐसा कहना सही नहीं है. मुझे अपने बच्चे को खो देने के आघात ने दुखी और उदास किया था. अब मैं निकल आई हूं न उस सदमे से. तुम्हारे भैया का कोई अधिकार नहीं है कि मुझे संभालने के बजाय वे किसी दूसरी औरत से टांका भिड़ा लें,’ संगीता ने चिढ़ कर जवाब दिया.

‘‘भैया के संभालने से तो आप नहीं संभलीं, पर निशा की उन के जीवन में मौजूदगी ने आप को जरूर फिर से चुस्तदुरुस्त बनवा दिया है. आज उस से तोबा बुलवा देना, भाभी. पर एक बात ध्यान  में जरूर रखना.’’

‘‘कौन सी बात?’’ अंजलि की बात पसंद न आने के कारण संगीता नाराज नजर आ रही थी.

‘‘निशा वाला चक्कर खत्म हो जाए, तो फिर से बेडौल और जिंदगी की खुशियों के प्रति उदासीन मत हो जाना.’’

‘वैसा अब कभी नहीं होगा,’’ संगीता का स्वर दृढ़ता से भरा था.

‘‘गुड, आओ, अब इस निशा की खबर लें. इस के सिर से प्यार का भूत उतारें.’’ संगीता का हाथ पकड़ कर अजीब से अंदाज में मुसकरा रही अंजलि उस बहुमंजिली इमारत में प्रवेश कर गई.

बेचारी संगीता को अपने मन की भड़ास निशा के ऊपर निकालने का मौका ही नहीं मिला.

अपने फ्लैट का दरवाजा निशा ने खोला था. उस के बेहद सुंदर, मुसकराते चेहरे पर दृष्टि डालते ही संगीता के मन को तेज धक्का लगा.

‘भाभी, यही निशा है. अब इसे छोडऩा मत.’’ उन का परिचय करा कर अंजलि अचानक हंसने लगी, तो संगीता तेज उलझन का शिकार बन गई.

‘‘पहली मुलाकात में यह छोडऩेछुड़ाने की बात मत करो, अंजलि. शादी की सालगिरह की ढेर सारी शुभकामनाएं संगीता,’’ निशा ने आगे बढ़ कर संगीता को गले लगा लिया.

‘‘आज मेरी शादी की सालगिरह नहीं है,’’ संगीता ने तीखे लहजे में उसे जानकारी दी और झटके से उस से अलग भी हो गई.

‘‘इतने सारे लोग गलत हो सकते हैं क्या?’’ संगीता का हाथ पकड़ कर निशा उसे ड्राइंगहौल के दरवाजे तक ले आई.

ड्राइंगहौल में अपने सासससुर, विवेक के खास दोस्तों व उन के परिवारों के साथसाथ अपने पति को तालियां बजा कर अपना स्वागत करते देख संगीता हैरान हो उठी.

‘‘बहू, तिथियों के हिसाब से आज ही है तुम्हारे विवाह की वर्षगांठ, मुबारक हो,’’ संगीता की सास ने उसे गले लगा कर आशीर्वाद दिया.

विवेक के पास आ कर उस के हाथ थाम लिए. चारों तरफ से उन पर शुभकामनाओं की बौछार होने लगी.

‘‘इन दोनों ने मिल कर हमें बुद्धू बनाया है, संगीता,’’ बहुत प्रसन्न नजर आ रहे विवेक ने अंजलि और निशा की तरफ उंगली उठाई.

‘‘संगीता, मैं अंजलि की सब से पक्की सहेली रितु की बड़ी बहन निशा हूं. ये मेरे पति अरुण हैं और कुदरत की सौगंध खा कर कहती हूं कि मेरा कोई प्रेमी नहीं है.’’ निशा की इस बात पर सभी ने जोरदार ठहाका लगाया.

‘‘यह अंजलि की बच्ची डायरैक्टर थी सारे नाटक की. मेरी कमीज पर सैंट लगाना, मेरी जेब में पिक्चर की कटी टिकटें रखना जैसे शक पैदा करने वाले काम इसी के थे. शाम तक मुझे भी अंधेरे में रखा था इस ने,’’ विवेक ने अंजलि की चोटी को हंसते हुए जोर से एक बार खींचा.

‘‘उई,’’ अंजलि चिल्लाने के बाद शरारती ढंग से मुसकराई, ‘‘भैया, यह हमारे नाटक का ही फल है कि आज भाभी दुलहन जैसी आकर्षक लग रही हैं. निशा को और मुझे तो आप को बढिया सा ईनाम देना चाहिए.’’

‘‘ईनाम के साथसाथ धन्यवाद भी लो,’’ विवेक ने अंजलि और निशा के गाल पर प्यारभरी चपत लगाने के बाद आंखों से हार्दिक धन्यवाद भी दिया.

‘‘थैंक यू, पर तुम दोनों हो बड़ी शैतान. खूब तंग किया है मुझे तुम्हारे नाटक ने,’’ संगीता ने बारीबारी से दोनों को गले लगाया.

‘‘भाभी, मेरी एक बात का बुरा तो नहीं मानोगी?’’ निशा ने शरारती अंदाज में सवाल किया.

‘‘नहीं, आज तो तुम्हारे सौ खून माफ हैं.’’

‘‘देखिए, ‘मोटी भैंस’ को छरहरे बदन वाली हिरणी बनाने के लिए नाटक तो धांसू करना जरूरी था न,” निशा अपनी यह बात कह कर विवेक के पीछे छिप गई. सब को दिल खोल कर हंसता देख, संगीता का गुस्सा उठने से पहले ही खो गया. वह प्यार से विवेक को निहारती, उस से और सट कर खड़ी हो, प्रसन्न अंदाज में मुसकराने लगी.

मीठी छुरी- भाग 1: कौन थी चंचला?

Writer- Reeta Kumari

चंचला भाभी के स्वभाव में जरूरत से कुछ ज्यादा मिठास थी जो शुरू से ही मेरे गले कभी नहीं उतरी, लेकिन घर का हर सदस्य उन के इस स्वभाव का मुरीद था. वैसे भी हर कोई चाहता है कि उस के घर में गुणी, सुघड़, सब का खयाल रखने वाली और मीठे बोल बोलने वाली बहू आए. हुआ भी ऐसा ही. चंचला भाभी को पा कर मां और बाबूजी दोनों निहाल थे, बल्कि धीरेधीरे चंचला भाभी का जादू ऐसा चला कि मां और बाबूजी नवीन भैया से ज्यादा उन की पत्नी यानी चंचला भाभी को प्यार और मान देने लगे. कभी बुलंदियों को छूने का हौसला रखने वाले, प्रतिभाशाली और आकर्षक व्यक्तित्व वाले नवीन भैया अपनी ही पत्नी के सामने फीके पड़ने लगे.

मेरे  4 भाईबहनों में सब से बड़े थे मयंक भैया, फिर सुनंदा दी, उस के बाद नवीन भैया और सब से छोटी थी मैं. हम  चारों भाईबहनों में शुरू से ही नवीन भैया पढ़ने में सब से होशियार थे. इसलिए घर के लोगों को भी उन से कुछ ज्यादा ही आशाएं थीं. आशा के अनुरूप, नवीन भैया पहली बार में ही भारतीय प्रशासनिक सेवा की मुख्य लिखित परीक्षा में चुन लिए गए और उस दौरान मौखिक परीक्षा की तैयारियों में जुटे हुए थे, जब एक शादी में उन की मुलाकात चंचला भाभी से हुई.

निम्न  मध्यवर्गीय परिवार की साधारण से थोड़ी सुंदर दिखने वाली चंचला भाभी को नवीन भैया में बड़ी संभावनाएं दिखीं या वाकई प्यार हो गया, किसे मालूम, लेकिन नवीन भैया उन के प्यार के जाल में ऐसे फंसे कि उन्होंने अपना पूरा कैरियर ही दांव पर लगा दिया. उन से शादी करने की ऐसी जिद ठान ली कि उस के आगे झुक कर उन की मौखिक परीक्षा के तुरंत बाद उन की शादी चंचला भाभी से कर दी गई.

शादी के बाद भाभी ने घर वालों से बहुत जल्द अच्छा तालमेल बना लिया, लेकिन नवीन भैया को पहला झटका तब लगा जब भारतीय प्रशासनिक सेवा का फाइनल रिजल्ट आया. आईएएस तो दूर की बात उन का तो पूरी लिस्ट में कहीं नाम नहीं था. अब उन्हें अपना सपना टूटता नजर आया, वे चंचला भाभी को मांबाबूजी के सुपुर्द कर नए सिरे से अपनी पढ़ाई शुरू करने दिल्ली चले गए.

नवीन भैया भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में 3 बार शामिल हुए. हर बार असफल रहे. भैया हतप्रभ थे. बारबार की इस असफलता ने उन के आत्मविश्वास को जड़ से हिला दिया.

जिन नौकरियों को कभी नवीन भैया ने पा कर भी ठोकर मार दी थी, अब उन्हीं को पाने के लिए लालायित रहते, कोशिश करते पर हर बार असफलता हाथ आती. जब किसी काम को  करने से पहले ही आत्मविश्वास डगमगाने लगे तो सफलता प्राप्त करना कुछ ज्यादा ही मुश्किल हो जाता है. उन के साथ यही हो रहा था.

नवीन भैया पटना लौट आए थे. यहां भी वे नौकरी की तलाश में लग गए, कहीं कुछ हो नहीं पा रहा था. बाबूजी उन का आत्मविश्वास बढ़ाने के बदले उन्हें हमेशा निकम्मा, कामचोर और न जाने क्याक्या कहते रहते.

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प्रतिभाशाली लोगों को चाहने वालों की कमी नहीं होती और उन से ईर्ष्या करने वाले भी कम नहीं होते. होता यह है कि जब कोई प्रतिभाशाली व्यक्ति कामयाबी की राह नहीं पकड़ पाता तो उस के चाहने वाले उस से मुंह मोड़ने लगते हैं और ईर्ष्या करने वाले ताने कसने का कोई मौका नहीं छोड़ते.

नवीन भैया से जलने वाले रिश्तेदारों और पड़ोसियों को भी मौका मिल गया उन पर तरहतरह के व्यंग्यबाण चलाते रहने का. उन की असफलता से आहत उन के अपने भी उन्हें जबतब जलीकटी सुनाने लगे. पासपड़ोस के लोग तो अकसर उन्हें कलैक्टर बाबू कह उन के जले पर नमक छिड़कते, जिसे सुन एक बार नवीन भैया तो मरनेमारने पर उतारू हो गए थे. जब बाबूजी को इस घटना के बारे में मालूम हुआ तो वे क्रोध में अंधे हो उन्हें बेशर्म और नालायक जैसे अपशब्दों से नवाजते हुए मारने तक दौड़ पड़े थे.

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लोकतांत्रिक हक

रूस यूक्रेन युद्ध एक छोटे देश के अस्तित्व की लड़ाई का ही मामला नहीं है, इस का व्यापक असर हर समाज पर पड़ेगा जैसा द्वितीय विश्व युद्ध का पड़ा था. यह लड़ाई एक छोटे देश के एक विशाल देश की फौज के सामने खड़े होने की हिम्मत की है. इसका संदेश है कि हर देश का नागरिक अगर अपनी सही बात को मनवाना चाहता है या अपने हकों की रक्षा करना चाहता है तो उसे तन कर सब कुछ जोखिम में डाल कर अड़ जाना चाहिए.

यूक्रेन यदि 20 मार्च को सरेंडर कर देता और कहना कि यह तो उस का भाग्य है तो रूस अब तक सरकार बदल चुका होता और उस के टैंक पाटकिया, लिथूनिया, कजागिस्तान, किॢगस्तान की ओर बढ़ रहे होते. यूक्रेन की जनता के घर बचे होते, 30-35 लाख लोग देश छोड़ कर पनाह नहीं ले रहे होते पर एक यूक्रेन विशाल जेल में बदल चुका होता जिस के सारे 4 करोड़ निवासी 9 लाख की रूसी सेना के गुलाम होते.

हमारे अपने देश में क्या होता रहा है. हर संघर्ष में हर हक के लिए हमें यही पाठ पढ़ाया गया है कि आप को वही मिलेगा जो आप के भाग्य में है. गीता बारबार यही कहती है कि हर पल आप का पूर्व निर्धारित है. आप जो चाहे कर लें आप का वर्तमान तो आप के पिछले जन्म के कर्मों से क्या है, हमारी आज की सरकार हर मौके पर कांग्रेस को कोसती है कि उस के कर्मों के फल भारतीय जनता पार्टी की सरकार को भोगने पड़ रहे हैं. व्लादिमीर जेलेंस्की ने न इतिहास का नाम लिया न ईश्वर का. उस ने सिर्फ कहा कि हमें अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी है, जान पर खेल कर. कहीं कम साधन होने पर भी वह रूस से भिड़ गया. पूरा देश उस के पीछे हो गया. दिनों में पूरा यूरोप और अमेरिका उस के समर्थन में खड़ा हो गया.

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यूक्रेन को तुरंत सैनिक शस्त्र मिलने लगे. खाना दवाइयां मिलने लगीं. रूस पर आॢथक प्रतिबंध लग गए. लोकतंत्र की रक्षा यानी हर नागरिक के हकों की रक्षा तभी हो सकती है जब अपने हकों के लिए खड़ा होने का जोखिम लिया जाए और यह पाठ जेलेंस्की ने पढ़ा दिया.

रूस यूक्रेन युद्ध ने यह भी जता दिया है कि रूसी भी पश्चिमी देश जो उत्पादन करते हैं, नारेबाजी नहीं, जो व्यक्ति के हकों का सम्मान करते हैं, तानाशाही का नहीं, जो अपने यहां विविधता अपनाते हुए और्थोडोक्स क्रिश्चियन होते हुए भी एक ज्यू को राष्ट्रपति बनाने की हिम्मत रखते हैं, वे हकों का लाभ जानते हैं, जो समाज अपने चर्च के लिए नहीं अपने लोकतांत्रित हकों के लिए जान जोखिम में डालते हैं, उन्हें किसी से भी डरने की जरूरत नहीं.

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यूक्रेन में चर्चों में घंटे नहीं बजे, पादरियों के प्रवचन नहीं हुए, चर्च को दान देना शुरू नहीं हुआ, सब ने मिल कर विशाल रूस से 2 हाथ करने का फैसला किया और हर सडक़ को रोका गया, हरहाल में बमों की बचने की फैक्ट्री बना डाला गया. हर टैंक की मोलोटोव कोकटेक या शराब की जलती बोतल का सामना करना पड़ा. शहर तहसनहस हो गए है पर दमखम पचासों मंजिल और ऊंचा हो गया है.

यूक्रेन जीने या हारे, रूस को एक सबक मिल गया है. रूसियों को यूक्रेन पर आक्रमण पर उसी तरह बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी जैसे अफगानिस्तान की जनता को कट्टरपंथी इस्लामी तालिबानी शासकों के घर में और सिर पर बैठाने की पड़ रही है. रूसी अपने धाॢमक राजनीतिक तानाशाह के मनमाने फैसले का फल भोगेंगे, अफगान (और उस जैसे और जैसे बहुत दूसरे देश के निवासी) अपने धाॢमक तानाशाहों के फल भोग रहे हैं. फल पिछले जन्म के कर्मों से नहीं इसी जन्म के कर्मों के फल से मिलता है. यूक्रेन का यह पाठ समझ लें.

माफी- भाग 3: क्या सुमन भाभी के मुस्कुराहट के पीछे जहर छिपा था?

राकेश और सुमन का गुरुवार की सुबह सहारनपुर लौटने का कार्यक्रम बना. राकेश के अंदर कोई गंभीर बीमारी नहीं पनप रही है, इस बात की खुशी सुमन भाभी को बहुत थी. इसी कारण उन्होंने सब को बाहर खाना खिलाने की दावत दे डाली. जिस होटल में जाने का कार्यक्रम बना वह बहुत महंगा होटल था.

‘‘भाभी, इतना खर्चा करने की क्या जरूरत है? आसपास के होटलों में भी अच्छा खाना कम खर्चे में उपलब्ध हो जाएगा,’’ अंजलि बोली. वह उस की खुशी में शामिल होने से बचना चाहती थी.

‘‘अंजलि, पैसा खर्च कर के अगर इंसान अपनों के साथ कुछ घडि़यां हंसतेमुसकराते गुजारने में सफल हो जाता है तो यह महंगा सौदा नहीं कहलाता. तुम्हारे परिवार से ज्यादा हमारे करीब और कौन हो सकता है? आज मेरी खुशियों में अगर तुम भी दिल से शामिल हो जाओगी तो मैं तुम्हारी बहुत आभारी रहूंगी,’’ कहते हुए सुमन की आंखों में आंसू छलक आए.

‘‘मैं ने एक बात कही थी, साथ चलने से इनकार नहीं किया है,’’ कह कर अंजलि तैयार होने के लिए अपने शयनकक्ष में चली गई.

सुमन की आंखों में आंसू देख कर अंजलि उलझन का शिकार हो गई थी. उन आंसुओं में बनावटीपन या नाटक की झलक अंजलि को नजर नहीं आई थी.

सुमन भाभी के दिल में ऐसा क्या छिपा है जो उन की आंखों में आंसू ले आया? इस राज को हल कर पाने में अंजलि बहुत सोचविचार करने के बाद भी असफल रही.

सुमन की आंखों में आए आंसू देख कर अंजलि को अपने अंदर कुछ परिवर्तन आया जरूर महसूस हुआ. सुमन की जो खराब छवि आज तक उस के दिलोदिमाग में बसी थी उस में कुछ सुधार लाने में वे आंसू सफल रहे थे. उन आंसुओं के कारण वह अंजलि को ज्यादा मानवीय, कोमल व अपने दिल के करीब प्रतीत हुई थी.

वर्षों बाद उस रात सुमन की उपस्थिति में अंजलि कुछ सहज हो कर उन से हंसबोल पाई. मन के कुछ विश्रामपूर्ण अवस्था में होने के कारण ही वह होटल में जा कर खाना खाने के कार्यक्रम का पूरा लुत्फ उठा पाई थी.

अगले दिन सुबह विदा लेने से पहले सुमन ने शिखा व सोनू को खूब प्यार कर के 100-100 रुपए दिए और बोलीं, ‘‘तुम अब परीक्षाओं के बाद सहारनपुर रहने के लिए आना. वहां खूब मजे करेंगे छुट्टियों में,’’ अंजलि को गले लगा कर सुमन ने यह निमंत्रण 2-3 बार दोहराया.

तिपहिया स्कूटर में बैठ कर बसअड्डे जाने से पहले सुमन भाभी ने अंजलि के कान में भावुक स्वर में कहा, ‘‘इस बार मैं तुम से बहुतकुछ कहने की सोच कर आई थी, लेकिन कुछ भी कहने का साहस नहीं जुटा पाई. अपने दिल की बात एक पत्र में लिख कर तुम्हारी ड्रैसिंग टेबल की दराज में रख आई हूं. उसे पढ़ कर अगर तुम मुझ मूर्ख को माफ कर दोगी तो मुझे बहुत शांति मिलेगी.’’

सुमन की आंखों से बहने वाले आंसू इस बार अंजलि के दिल को बहुत गहराई तक उद्वेलित कर गए. उसे सुमन की बात तो ज्यादा समझ नहीं आई, पर उन के कहे की प्रतिक्रियास्वरूप अंजलि को अपनी भी पलकें गीली होती महसूस हुई थीं.

बाद में अपनी ड्रैसिंग टेबल की दराज में से अंजलि को 5 सौ रुपए के 10 नोट और सुमन का लिखा पत्र मिला. पत्र में लिखा था :

प्रिय अंजलि,

8 वर्ष पहले अपनी ईर्ष्या के हाथों मजबूर हो मैं ने झूठ बोल कर जो गुनाह किया था उस की पीड़ा पिछले कुछ महीनों से मैं बहुत ज्यादा महसूस कर रही हूं.

तुम्हें याद होगा, तुम्हारी शादी के कुछ दिनों बाद ही मोनू बीमार पड़ गया था, तब उसे अस्पताल में भरती कराना पड़ा था. उस समय तुम दोनों ने हमारा बहुत मजबूत सहारा बन कर खूब भागदौड़ की थी.

इस बार जब तुम्हारे जेठजी नर्सिंगहोम में भरती हुए तो पासपड़ोस के लोग मुंहजबानी हालचाल पूछ कर अलग हो गए. ज्यादा उम्र के हो जाने के कारण सास और ससुरजी ज्यादा भागदौड़ करने की स्थिति में नहीं थे. मुझ अकेली पर इतना ज्यादा बोझ पड़ा कि मैं अकसर रोने लगती थी.

इस घटना ने मेरी आंखें खोल दीं. अगर मैं ने तुम से संबंध खराब न किए होते तो तुम्हें व अरुण भैया को बुलाने में मैं जरा भी न हिचकिचाती. मुझे तुम दोनों की अनुपस्थिति बहुत खली थी और मैं ने खुद को अपनी चेन चोरी के आरोप वाली भयंकर भूल के लिए रातदिन कोसा था.

मेरी समझ में आ गया है कि अपनों से दूर हो कर आजकल के स्वार्थी संसार में इंसान दुख, असुरक्षा व अकेलेपन के सिवा कुछ नहीं पा सकता. अपने साथ नए सिरे से मधुर संबंध बनाने का मौका तुम मुझे दोगी तो ही मैं अपने दिल में बसे गहरे अपराधबोध से उबरने में सफल हो पाऊंगी.

तुम्हारे पिता से मिले 5 हजार रुपए मैं लौटा रही हूं, लेकिन इतनाभर कर देने से मेरा प्रायश्चित्त पूरा नहीं होगा. जिस दिन तुम्हारी आंखों में मैं अपने लिए नफरत के बजाय प्रेम व अपनत्व के भाव देखूंगी उसी दिन मैं समझूंगी कि तुम ने मुझे माफ कर दिया है. तुम्हें सामने देख कर पिछले 5 दिनों में कई बार मेरा मन हुआ कि तुम्हारे पैरों पर गिर कर माफी मांग लूं, लेकिन हर बार तुम्हारी गहरी नाराजगी देख कर मेरा साहस जवाब दे जाता.

मैं तुम से रिश्ते में बड़ी जरूर हूं पर समझदारी व मानसिक परिपक्वता में तुम से मीलों पीछे हूं. अगली बार जब तुम मुझे देखो तो मेरे गले से लग जाना, नहीं तो मैं खुद को कभी माफ न कर सदा पश्चात्ताप की अग्नि में जलती रहूंगी.

सुमन.

पत्र पढ़ने के बाद अंजलि एकदम उदास हो गई. पिछले दिनों जो गलती उस से हो गई थी उस के एहसास ने उसे दुखी कर दिया था.एक तरफ सुमन भाभी को अपने किए पर गहरा अफसोस महसूस हो रहा था, जो अंजलि के यहां उस से माफी मांगने के इरादे से आई थीं. उन के हंसनेबोलने व सेवा करने के पीछे आपसी संबंध सुधारने की चाह थी. अपना अहंकार ताक पर रख वे अपनी देवरानी के सामने झुकने को तैयार थीं.

एक तरफ वे अपनी गलती के लिए माफी मांगने का साहसिक फैसला कर के आई थीं तो दूसरी तरफ अंजलि उस में आए सुखद परिवर्तन को नोट करने में असफल रही थी. वह अतीत में इस कदर उलझी रही कि ताजा वर्तमान उस की पकड़ में नहीं आया. सुमन उस के गलत रवैए से हतोत्साहित हो कर अगर अपने कदम खींच लेतीं तो उन से आपसी संबंधों के फिर से फलनेफूलने का मौका शायद सदा के लिए हाथ से निकल जाता.

अंजलि को साफ महसूस हुआ कि उस ने सुमन भाभी के सामने कोई समझदारीभरा व्यवहार नहीं किया था. सचाई तो यह भी कि उस का पत्र पढ़ने के बाद अंजलि खुद को बेहद शर्मिंदा महसूस कर रही थी.

अपने अहंकार की बेहोशी में मैं सुमन भाभी के मनोभावों को अनदेखा कर के कितनी बड़ी भूल करने जा रही थी. इस भूलसुधार के लिए मैं आपसी संबंधों को फिर से मधुर बनाने में भाभी को पूरा योगदान दूंगी. आज ही उन्हें चिट्ठी लिख कर उन से फिर अपने गलत व्यवहार के लिए क्षमाप्रार्थना करूंगी. ऐसा निश्चय करने के बाद ही अंजलि गहरी राहत महसूस करते हुए मुसकरा उठी.

Summer Special: क्या आपकी स्किन भी होती है ड्राई?

बिजी लाइफ स्टाइल और औफिस के कारण हम अपनी स्किन का ख्याल नही रखते. और न ही हम धूप में निकलना बंद कर सकते हैं. इसीलिए हमारी स्किन बेजान और ड्राई पड़ जाती है. साथ ही स्किन कभी-कभी डैमेज हो जाती है. इसीलिए जरूरी है कि बिजी लाइफ स्टाइल के बीच भी आप अपनी स्किन का ख्याल रखें, जिसके लिए आज हम आपको कुछ टिप्स में भी सौफ्ट और डैमेज स्किन की केयर कर पाएंगे.

1. नहाने के टाइम इन बातों का रखें ध्यान

स्किन ड्राई होने से बचाने के लिए ज्यादा गरम पानी का इस्तेमाल करने से बचें. नमीयुक्त साबुन या बौडी वाश का ही इस्तेमाल करें. नहाने का टाइम भी कम रखें और नहाने के बाद बौडी को सौफ्ट बनाए रखने के लिए मौइश्चराइजर का इस्तेमाल करें.

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2. स्किन को रखें मौइश्चराइज

स्किन की सुरक्षा के लिए मौइश्चराइज क्रीम का इस्तेमाल करें. शरीर में लगाने के लिए ऐंटीइची, औयली स्किन, ड्राई स्किन सहित और कई तरह की मौइश्चराइजर क्रीमें मार्केट में मौजूद हैं. उनमें से आप अपनी स्किन के अनुरूप कोई भी क्रीम चुन सकती हैं.

3. गरमी में खानपान का रखें ख्याल

स्किन की ड्राईनेस को दूर करने के लिए पौष्टिक खानपान, मछली और अलसी के तेल, ओमेगा-3 और ओमेगा-6 जैसे फैटी एसिड के सेवन से दूर रहने की कोशिश करें. सोरायसिस और एक्जिमा जैसे स्किन के संक्रामक रोगों से मुकाबले के लिए शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को दुरुस्त रखना जरूरी है. अपने खाने में अंगूर, गाजर, पालक, बादाम, अंडे, मछली आदि शामिल करें, क्योंकि ये सब विटामिन और ओमेगा-3 फैट के अच्छे स्रोत होते हैं.

4. स्किनबूस्टर्स का करें इस्तेमाल

औफिस जाने वाले लोग अपनी स्किन में भरपूर नमी बनाए रखने के लिए स्किनबूस्टर्स आजमा सकते हैं. स्किन की सौफ्टनेस और शाईन को बनाए रखने के लिए रैस्टिलेन वाइटल एक कारगर विकल्प है. नए जमाने का डर्मल फिलर रैस्टिलेन वाइटल चंद मिनटों में शाइनी स्किन मिल जाती है.

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5. सनस्क्रीन का इस्तेमाल है सबसे जरूरी

गरमी में स्किन को नुकसानदेह यूवी किरणों से सुरक्षित रखने के लिए सनस्क्रीन की जरूरत पड़ती है. स्किन को किसी भी तरह के नुकसान से बचाने के लिए बौडी के खुले हिस्सों में 15 या इस से अधिक एसपीएफ वाले सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें.

Summer Special: गरमी में करें इन फलों का सेवन

गरमी के मौसम में शरीर को खाने से अधिक पानी की जरूरत होती है. अगर आपके शरीर में पानी की कमी रह रही है तो आपको कई तरह के रोग हो सकते हैं. सीधे पानी पीने के अलावा आप अपनी डाइट में फलों को शामिल कर के पानी की कमी को दूर कर सकते हैं. इनके सेवन से आप कूल महसूस करेंगे. गरमीयों में मिलने वाले फल आम, तरबूज, खरबूज, बेल व मौसमी आपको अंदर से फिट रखते हैं.

आमतौर पर लोग गरमी में खाना अधिक नहीं खा पाते ऐसे में डाइट में फल को शामिल करना काफी लाभकारी होगा.

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लीची

गरमी में लीची मिलने लगती है. इसे खाने से आपके शरीर में विटामिन ए, सी और पानी प्रचूर मात्रा में मिलता है. इसमें पाए जाने वाले एंटीऔक्सिडेंट शरीर की इम्यून के लिए फायदेमंद होते हैं. त्वचा के लिए भी ये काफी असरदार होता है.

आम

गरमी के मौसम में लोगों को जिन फलों का इंतजार रहता है उनमें आम प्रमुख है. आम ना केवल स्वादिष्ट होता है बल्कि सेहत के लिए इसके कई फायदे हैं. दूध में आम मिला कर पीने से शरीर को काफी उर्जा मिलती है. ध्यान रखें कि इसका अधिक सेवन ना करें. शुगर के मरीजों को खासकर के इसका ध्यान रखना चाहिए.

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तरबूज का सेवन

गरमी में तरबूज का सेवन काफी फायदेमंद होता है. पर ध्यान रखें कि इसके सेवन के दौरान पानी ना पिएं. कोशिश करें कि दोपहर के वक्त पर तरबूज खाएं. इस वक्त शरीर को पानी की खासा जरूरत रहती है. तरबूज आपके शरीर में होने वाली पानी की कमी को दूर करता है.

अंगूर

शरीर को हाइड्रेट रखने में अंगूर काफी अहम रोल निभाता है. ये हमारे फेफड़ों के लिए भी काफी लाभकारी होता है. जिन लोगों को लो बीपी या शुगर की शिकायत है उन्हें अंगूर का सेवन करते रहना चाहिए.

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बेल का शरबत

गरमी में बेल का शरबत आसानी से मिलता है. इससे शरीर की गरमी दूर रहती है. पेट की सेहत के लिए भी ये काफी फायदेमंद होता है.

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