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Summer Special: इस मौसम में होने वाली बीमारियों से ऐसे बचें

गरमी का मौसम अपने साथ बहुत सी बीमारियां ले कर आती है. इस दौरान हमारा इम्यून सिस्टम काफी प्रभावित होता है. इसके अलावा गरमी हमारे पाचन और त्वचा को बुरी तरह प्रभावित होती है. इस दौरान लोगों को मौसमी फ्लू और संक्रमण का खतरा अधिक रहता है. ऐसे में जरूरी है कि आप पहले से इन परेशानियों से लड़ने के लिए तैयार रहें. इसलिए हम आपको कुछ जरूरी टिप्स देने वाले हैं जो आपको इन चुनौतियों के सामने मजबूती से खड़े रखने में मदद करेंगे.

रहें हाइड्रेटेड

drink water in morning

यदी आप दिनभर में पर्याप्त पानी पी रहे हैं तो आपके अंदर बहुत से रोगों से लड़ने की क्षमता विकसित हो जाती है. पानी को शरीर के फाइबर द्वारा हमारे कोलोन में खींच लिया जाता है और यह नरम मल बनाने में शरीर की मदद करता है.

फाइबर इनटेक लें

prevention for asthma patients

अनाज, फल, सब्जियां और फलियां जैसे खाद्य पदार्थ फाइबर के प्रमुख स्रोत होते हैं. इसके साथ ही ये कब्ज की आशंका को भी दूर करता है.

कम कैफीन

गरमी में कैफीन का सेवन कम करें. इससे आपका पाचन तंत्र का फंग्शन प्रभावित होता है. इसके कारण आगे चल कर अल्सर, एसिडिटी और जलन होती है.

वर्कआउट

tips of mental peace

पसीने के निकलने से शरीर के बहुत से विकार दूर होते हैं. पसीने के रास्ते शरीर की सारी गंदगी निकल जाती है. इसके साथ ही आपके शरीर को फिट और स्वस्थ रखने में भी ये काफी सहायक होता है. हम जितना अधिक शारीरिक तौर पर सक्रिय रहेंगे, हमारे लिए जीवन खुशहाल होगा.

धूप से बचें

धूप से दूरी बनाने की कोशिश करें. ध्यान रखें कि तेज धूप में तीन घंटे से अधिक रहने से स्वास्थ संबंधित बहुत सी परेशानियां होती हैं.

ध्यान दें कि गरमी में जौंडिस, टाइफाइड और फूड प्वाइजनिंग जैसी समस्याओं के होने का खतरा काफी अधिक रहता है. इनसे बचने के लिए जरूरी है कि आप अपने खानपान की आदतों में बदलाव लाएं और धूप में कम समय बिताएं. बाहर के खाने से परहेज, मील्स नहीं छोड़ना और बाहरी ड्रिंक एवं अल्कोहल की बजाय स्वास्थ्यकर विकल्पों जैसे छोटे बदलाव बड़ा अंतर ला सकते हैं. ये छोटे लेकिन अनहेल्दी आदतें आपके शरीर को नुकसान पहुंचा सकती हैं.

Summer Special: ऐसे पाएं डैंड्रफ से छुटकारा

गरमी हो या सरदी डैंड्रफ हर किसी की प्रौब्लम होती है, जिसके लिए हम मार्केट से महंगे-महंगे शैम्पू खरीद लेते हैं. शैम्पू हमारे सिर से डैंड्रफ निकाले या न निकाले ये बालों को डैमेज कर देती है. डैंड्रफ से छुटकारा पाने के लिए होममेड तरीका सबसे बेस्ट होता है जिससे न हमारे बाल डैमेज होते हैं और न ही हमारी स्किन को नुकसान पहुंचता है. ये आपकी बालों से बिना किसी साइड इफेक्ट के डैंड्रफ दूर कर देते हैं. आइए आपको बताते हैं डैंड्रफ दूर करने के कुछ होममेड टिप्स…

1. नींबू का रस से दूर करें डैंड्रफ प्रौब्लम

डैंड्रफ की प्रौब्लम को दूर करने के लिए नींबू के रस का इस्तेमाल करना बहुत फायदेमंद है, सरसों के तेल में या फिर कोकोनट औयल में एक नींबू को अच्छी तरह निचोड़ लें. इस तेल से स्कैल्प में हल्की मसाज करें और कुछ देर के लिए इसे यूं ही छोड़ दें. इसके बाद बालों को अच्छी तरह धो लें. हफ्ते में दो बार दोहराएं.

2. टी ट्री औयल से पाएं डैंड्रफ की प्रौब्लम से छुटकारा

टी-ट्री औयल में एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल गुण होते हैं. अपने शैंपू में इसकी कुछ बूंदें मिलाकर सिर धो लें. चार से पांच बार के इस्तेमाल से ही डैंड्रफ की प्रौब्लम दूर हो जाएगी.

3. दही का करें इस्तेमाल

रूसी की समस्या में दही का इस्तेमाल करना बहुत फायदेमंद होता है. एक कप दही में एक चम्मच बेकिंग सोडा मिला लें. इस पैक को स्कैल्प में लगाएं. कुछ ही दिनों में आपको फर्क नजर आने लगेगा.

4. नीम और तुलसी का पानी करें ट्राय

नीम और तुलसी की कुछ पत्तियों को पानी में डालकर अच्छी तरह उबाल लें. जब बर्तन का पानी आधा रह जाए तो इसे छान लें और ठंडा होने के लिए रख दें. इस पानी से बालों को धोएं. कुछ बार के इस्तेमाल से ही डैंड्रफ की प्रौब्लम दूर हो जाएगी.

5. मुल्तानी मिट्टी है डैंड्रफ दूर करने के लिए बेस्ट

मुल्तानी मिट्टी पाउडर ले लें. इसमें सेब का सिरका मिलाएं. बाद में इसे शैंपू की तरह इस्तेमाल करके हफ्ते में दो बार आजमाएं.

साकिब सलीम ने ‘क्रैकडाउन सीजन 2’ की शूटिंग की पूरी

साकिब सलीम ने जम्मू-कश्मीर में अपूर्व लाखिया की जासूसी थ्रिलर सीरीज ‘क्रैकडाउन सीज़न 2’ की शूटिंग पूरी कर ली है. एक सस्पेंस पूर्ण कहानी पर आधारित और पावर-पैक प्रदर्शन से भरपूर यह सीरीज  2022 में डिजिटल स्क्रीन पर दर्शकों का मनोरंजन करेंगी . इस सीरीज में साकिब सलीम, श्रिया पिलगांवकर, मोहम्मद इकबाल खान, अंकुर भाटिया, राजेश तैलंग, वलूचा डी सूसा और एकावली खन्ना मुख्य भूमिका निभा रहे है . यह सीरीज २ भारत में सबसे बहुप्रतीक्षित थ्रिलर में से एक है.

क्रैकडाउन सीज़न 2 के समापन पर साकिब कहते है कि “मैं बहुत आभारी हूं कि मुझे रियाज़ पठान के किरदार को डिजिटल स्क्रीन पर जीने का मौका मिला. सीरीज़ की टीम ने शानदार तालमेल बिठाया और हम समय पर शूटिंग को सफलतापूर्वक पूरा करने में सक्षम रहे . अपने किरदार रियाज़ पठान की ट्रेनिंग से लेकर कैमरे के सामने आने तक की गई सभी तैयारी दमदार हुई . मैं इसकी रिलीज़ की प्रतीक्षा कर रहा हूं. मुझे उम्मीद है कि दर्शकों को यह सीरीज इतना पसंद आएगी की वो फिर से एक बार इस सीरीज को देखना पसंद करेंगे .”

साकिब सलीम, सोनाक्षी सिन्हा और रितेश देशमुख के साथ हॉरर कॉमेडी काकुड़ा में भी दिखाई देंगे और सोनाक्षी सिन्हा. हुमा कुरैशी अभिनीत अपनी पहली प्रोडक्शन डबल एक्सएल की रिलीज का इंतजार कर रहे हैं.

गुरमीत-देबीना की बेटी की पहली झलक आई सामने, देखें Photo

गुरमीत चौधरी (Gurmeet Choudhary) और देबीना बनर्जी (Debina Bonnerjee) के घर तीन दिन पहले ही नन्ही परी का आगमन हुआ है. गुरमीत चौधरी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो फैंस के साथ शेयर कर बताया था कि वो पेरेंट्स बन गए हैं.

उन्होंने इस वीडियो को शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा था कि ‘ग्रैटिट्यूड के साथ हम अपनी बेबी गर्ल का इस दुनिया में स्वागत कर रहे हैं… 3-4-2022, आप सभी के प्यार और Blessings के लिए सभी को शुक्रिया, पेरेंट्स बने हैं.

 

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देबीना हाल ही में अस्पताल से डिस्चार्ज हुईं. इस दौरान गुरमीत और देबीना अपनी नन्ही परी के साथ दिखे. हालांकि इनकी बेटी का चेहरा कैमरे में कैद नहीं हुआ. लेकिन अगर आप देबीना और गुरमीत की बेटी की पहली झलक देखना चाहते हैं तो अब आपका ये इंतजार खत्म हुआ. इन दोनों की बेटी की पहली तस्वीर सामने आ गई है.

 

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जी हां, इस तस्वीर को सोशल मीडिया पर जीविता (Jeevita Oberoi) नाम के इंस्टाग्राम अकाउंट से शेयर किया गया है. इस तस्वीर में जीविता ना केवल बच्ची को गोद में लिए हुए दिखाई दीं, बल्कि बच्ची का चेहरा भी दिखा. इस तस्वीर को शेयर करते हुए गुरमीत-देबीना को भी टैग किया है.

 

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जीविता ने इंस्टाग्राम पर ये तस्वीर शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा, ‘मेरी फिश और मेरा स्टार बॉय अब पेरेंट्स बन गए हैं. ये सब हुआ एक प्यारी सी नन्ही परी के आने के बाद. मैं अभी भी यकीन नहीं कर पा रही हूं कि तुम दोनों इस प्यारी सी बच्ची के पेरेंट्स बन गए हो. तुम दोनों को ढेर सारी खुशियां, प्यार, किस और सकारात्मक ऊर्जा इस प्यारे से सफर के लिए. एक बार फिर से शुक्रिया हमारे दिल को खुशियों से भरने के लिए. जीवी मासी हमेशा बेबी की फेवरेट मौसी रहेगी. लव यू.’ इस पोस्ट की तीसरी स्लाइड में बेबी गर्ल का चेहरा आप देख सकते हैं.

Anupamaa Prequel: शूटिंग छोड़कर पार्टी करती दिखी अनुपमा, देखें Video

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ का प्रीक्वल की शूटिंग इन दिनों चर्चे में है. 17 साल पहले अनुपमा और शाह परिवार के जीवन में क्या हुआ था, ये बड़ा ट्विस्ट एंड टर्न अनुपमा- नमस्ते अमेरिका में देखने को मिलेगा. अनुपमा इस शो में 28 साल की महिला के किरदार में नजर आएगी. इसी बीच एक अनुपमा का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वह शूटिंग छोड़कर पार्टी करती दिखाई दे रही हैं.

दरअसल अनुपमा स्टार रुपाली गांगुली ने बीते दिन ही अपना 45वां जन्मदिन सेलीब्रेट किया है.  बर्थडे के दिन भी रुपाली गांगुली सीरियल अनुपमा के प्रीक्वल (Anupamaa Namaste America) की शूटिंग करती नजर आईं.

 

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इसी बीच सीरियल अनुपमा के सेट की एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. इस वीडियो में अनुपमा अपने टीवी शो की टीम के साथ केक कट करती नजर आईं. उसी समय अनुज यानी गौरव खन्ना ने भी अनुपमा को सरप्राइज दिया है.

 

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अनुज ने अनुपमा की ये पार्टी वीडियो कॉल के जरिए अटैंड की. आप देख सकते हैं कि वीडियो में अनुपमा वीडियो कॉल पर अपने अनुज से बात करती नजर आ रही है. वीडियो में अनुपमा के प्रीक्वल का लुक आप देख सकते हैं.

 

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हाल ही में ‘अनुपमा – नमस्ते अमेरिका’ का प्रोमो रिलीज किया गया है. इस शो में अनुपमा के कई कलाकार नजर आएंगे तो वहीं शो में टीवी एक्ट्रेस पूजा बनर्जी (Puja Banerjee) का भी नाम जुड़ गया है. खबर ये भी है कि शो में पूजा बनर्जी वनराज की गर्लफ्रेंड की भूमिका में नजर आएंगी.

 

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हाल ही में पूजा बनर्जी ने वनराज संग फोटो शेयर की थी. इसी के साथ एक्ट्रेस ने अपनी भूमिका का भी जिक्र अपने पोस्ट में किया है. एक्ट्रेस पूजा बनर्जी ने पोस्ट में लिखा, यहां मैं प्रेजेंट कर रही हूं ऋतिका. मैं और सुधांशु को ‘अनुपमा-नमस्ते अमेरिका’ में एक नए अवतार में दिखाई देंगे.’

पावर वीडर: निराई-गुड़ाई का काम करें

यह यंत्र सब्जियों, फूलों व फलों के पौधों सहित कपास में अनावश्यक कतारों के बीच में उग आई खरपतवार को निकालने के लिए काम आता है. इस के अलावा यह गन्ने की फसल में निराईगुड़ाई करने के साथसाथ मिट्टी चढ़ाने में भी काम आता है.

यह पावर वीडर यंत्र खासकर उन छोटे और सीमांत किसानों के लिए बेहद ही फायदेमंद रहता है, जो ट्रैक्टर या उस से संबंधित यंत्रों पर भारीभरकम रकम खर्च करने में सक्षम नहीं हैं.

क्या है पावर वीडर

यह आमतौर पर छोटी मशीन होती है, जिस को इस्तेमाल करना बहुत ही आसान है. इस यंत्र में 1 या 2 इंजन लगे होते हैं. इंजन से ब्लेड, मेकैनिकल क्लच और गियरबौक्स को जोड़ने के लिए एक शाफ्ट लगी होती है. इस की गति को नियंत्रित करने के लिए चेन या बैल्ट ड्राइव अथवा वर्म गियर का उपयोग किया जाता है.

वैस, 2 या 4 गियर वाले पावर वीडर यंत्र भी आते हैं. छोटे वीडर 1.5 से 5 हौर्सपावर क्षमता वाले होते हैं. वैसे तो 2 स्ट्रोक इंजनों की क्षमता तकरीबन  25 से 50 सीसी है, पर इन की ईंधन खपत 60 से 90 मिनट प्रति लिटर होती है.

अपने आकार और फीचर्स के मुताबिक पावर वीडर की कीमतें अलगअलग हो सकती हैं. मिनी पावर वीडर यंत्र की कीमत तकरीबन 10,000 रुपए से शुरू हो कर 50,000 रुपए तक हो सकती है, जबकि मध्यम या दीर्घ पावर वीडर की कीमत तकरीबन 50,000 से डेढ़ लाख रुपए तक की कीमतों में आते हैं. उन्नत और एडवांस तकनीक वाले पावर वीडर की कीमतें एक से ढाई लाख रुपए तक हो सकती हैं.

4 पहियों वाला पूसा वीडर

यह बहुत ही साधारण यंत्र है. इस यंत्र में निराईगुड़ाई करने के लिए 30 सैंटीमीटर चौड़ा फाल लगा होता है. इस यंत्र से 40 सैंटीमीटर या उस से ज्यादा कतार से कतार की दूरी वाली फसलों की गुड़ाई कर सकते हैं. इस यंत्र का वजन तकरीबन 12 किलोग्राम है.

एक आदमी द्वारा खड़े हो कर इसे चलाया जाता है. हाथ से चला कर गुड़ाई करने वाले ये दोनों यंत्र भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली द्वारा बनाए गए हैं.

आप इस संस्थान के कृषि अभियांत्रिकी विभाग से संपर्क कर इन यंत्रों की पूरी जानकारी ले सकते हैं. इस के अलावा इस यंत्र को किसी भी कृषि यंत्र निर्माता से खरीद सकते हैं, क्योंकि यह बहुत ही साधारण यंत्र है.

ट्रैकऔन कल्टीवेटर

कम वीडर

यह यंत्र गन्ना, कपास, मैंथा, फूल, पपीता और केले वगैरह की फसलों के साथसाथ दूसरी कतार वाली फसलों की निराईगुड़ाई करने और खाद मिलाने के भी काम आता है.

यह यंत्र पहाड़ी इलाकों में कृषि व बागानों के काम के लिए भी बेहद कारगर है. इस यंत्र से निराईगुड़ाई का खर्च तकरीबन 30 से 40 रुपए प्रति बीघा आता है.

यह कल्टीवेटर कम वीडर 2 मौडलों में स्थानीय बाजार में मौजूद है. पहला मौडल टीके 160पी पैट्रोल से चलने वाला है और दूसरा मौडल टीके 200 के केरोसिन से चलने वाला यंत्र है. दोनों में 4 स्ट्रोक इंजन लगा होता है. इस में 4.8 हौर्सपावर का इंजन होता है. इस में लगे रोटर की चौड़ाई तकरीबन 12 से 18 इंच तक है. इस यंत्र का वजन भी तकरीबन 80-90 किलोग्राम के आसपास है.

इस यंत्र को अमर हैड एंड गियर मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी द्वारा बनाया गया है. यह यंत्र अपनेआप आगे की ओर खेत को तैयार करता हुआ चलता?है. इस मशीन को धकेलना नहीं पड़ता है. जरूरत के मुताबिक रोटर की चौड़ाई और गहराई को घटाया या बढ़ाया जा सकता है.

इतना ही नहीं, किसानों के फायदे के लिए भी समयसमय पर सरकार की अनेक योजनाएं आती रहती हैं, चाहे वे कृषि यंत्रों से जुड़ी हों, पशुपालन से जुड़ी हों या कृषि के अन्य क्षेत्र से जुड़ी हों, इन सभी योजनाओं का फायदा किसान ले सकते हैं. सरकार द्वारा इन सभी योजनाओं पर अच्छीखासी सब्सिडी यानी छूट किसानों को दी जाती है.

विधानसभा चुनाव 2022: नारे और वादे की जीत

भाजपा ने हिंदुत्व के एजेंडे को सामने रख कर चुनाव लड़ा. इस में लोकलुभावन वादे और नारों की भरमार थी. ‘आप’ के अलावा विपक्ष अपना एजेंडा जनता के सामने रख पाने में असफल रहा. वहीं, नारे और वादे के बल पर चुनाव तो जीते जा सकते हैं पर देश नहीं चलाया जा सकता. देश चलाना एक ‘स्टेट क्राफ्ट’ है, जिस में भाजपा फेल हुई या पास, यह सवाल सदा खड़ा रहेगा.

साल 2024 के भावी लोकसभा चुनाव का सैमीफाइनल माने जाने वाले 5 राज्यों के चुनावों में कांग्रेस अपना एक राज्य पंजाब बचा नहीं पाई जबकि भाजपा अपने 4 राज्य उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा बचाने में सफल रही है. पौराणिक कथाओं पर सरकार चलाने वालों की जीत हुई है. दलित और पिछड़ों का प्रभाव खत्म होता दिख रहा है.

आम आदमी पार्टी यानी ‘आप’ ने पंजाब का विधानसभा चुनाव जीत कर यह साबित कर दिया कि अगर चुनाव जीतने की कला आती हो तो क्षेत्रीय दल भी कम समय में ही एक राज्य से दूसरे राज्य में अपना प्रभाव बना सकता है. ‘आप’ देश की पहली ऐसी क्षेत्रीय पार्टी बन गई है जो दिल्ली से बाहर पंजाब में अपनी सरकार बनाने में सफल हो गई है.

‘आप’ के नेता अरविंद केजरीवाल भी उसी तरह से ‘हनुमान भक्त’ हैं जैसे भाजपा के लोग ‘राम भक्त’ बनते हैं. धर्म की राजनीति के नारे और वादे से चुनाव जीते जा सकते हैं पर इस से देश का विकास नहीं किया जा सकता. धर्म आधारित राजनीति करने वाले दल कभी भी सब को साथ ले कर चलने की कुशल ‘स्टेट क्राफ्ट’ नहीं सीख पाएंगे. इस की वजह से एकसाथ सभी जातियों और धर्म का विकास नहीं हो पाएगा.

नारे और वादे से चुनाव जीते जा सकते हैं, लोगों का दिल जीत कर उन को एकजुट नहीं किया जा सकता. 5 राज्यों के चुनावों में दलित और पिछड़ों की अगुआई को नकारने का काम किया गया है और जिस के बाद देश 22वीं शताब्दी की जगह वापस पौराणिक युग की तरफ जा रहा है जहां ऋषिमुनियों की अगुआई में राजपाट चलता था.

पौराणिक युग में भी जो लड़ाई जीती गई, वहां भी नारों का प्रभाव था. महाभारत की बात करें तो वहां लड़ाई कौरवों और पाडवों के बीच केवल अपने राज्य पर अधिकार के लिए थी. उस को ‘अधर्म पर धर्म की जीत’ बताया गया. 2022 में विधानसभा चुनाव राज्यों में सरकार बनाने के लिए लड़े व जीते गए. पर इस को हिंदुत्व की जीत के रूप में दिखाया जा रहा है. इस जीत में एक वर्ग खुद को अलगथलग महसूस कर रहा है जो आने वाले समय में रूस और यूक्रेन जैसे हालात पैदा कर सकता है. चुनाव का महत्त्व केवल जीतहार से नहीं होता. इस का देश पर भी व्यापक असर होता है. जो पूरे देश को ले कर एकसाथ चल सके, ऐसी सरकार ही विकास के लिए जरूरी होती है.

कौमेडियन से मुख्यमंत्री बने भगवंत मान

कांग्रेस, अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी जैसे दलों को पंजाब की जनता ने पूरी तरह से नकार दिया है. राज्य की कुल 117 सीटों में से आम आदमी पार्टी को 92 सीटें मिली हैं. कांग्रेस 18, अकाली 3 और भाजपा 2 सीटें ही जीत सकी हैं. आम आदमी पार्टी यानी ‘आप’ के नेता भगवंत मान मुख्यमंत्री बने.

मात्र  12वीं कक्षा पास भगवंत मान ने अपना कैरियर कौमेडियन के रूप में शुरू किया था. उन्होंने बीकौम के पहले साल की पढ़ाई की पर ग्रेजुएशन पूरा नहीं किया. कपिल शर्मा के साथ ‘द ग्रेट कौमेडियन लाफ्टर चैलेंज’ टीवी शो में हिस्सा लिया. वहां से वे मशहूर हुए. संगरूर जिले के रहने वाले भगवंत ने इंद्रप्रीत कौर से शादी की. एक पुत्र और एक पुत्री हैं. वर्ष 2015 में भगवंत का पत्नी से तलाक हो गया. फिर भगवंत आम आदमी पार्टी के साथ जुड़े और 2014 में सांसद बने.

मणिपुर की जीत का हीरो है फुटबौलर

मणिपुर ऐसा राज्य है जहां करीब आधी आबादी गैरहिंदू है. यहां ईसाई घोषिततौर पर 41.29 तो मुसलिम 8.40 फीसदी हैं. भाजपा को अब तक घाटी के मैतेई हिंदुओं की पार्टी माना जाता था, जिस का प्रभाव राज्य के कुल क्षेत्रफल के 10 प्रतिशत और 29 सीटों वाले घाटी तक माना जा रहा था. 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कुल 60 सीटों में 31 सीटों पर जीत दर्ज की है. जीत के हीरो मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह रहे हैं.

नोंगथोम्बम बीरेन सिंह राजनीति में आने से पहले फुटबौल के खिलाड़ी रहे हैं. बीएसएफ से इस्तीफा दे कर एन बीरेन सिंह ने पत्रकारिता को अपना कैरियर बनाया. वर्ष 1992 में उन्होंने ‘नाहरोलगी थौडांग’ नाम से एक स्थानीय दैनिक शुरू किया और 2001 तक उस के संपादक के रूप में काम किया. वे 2002 में राजनीति में शामिल हो गए और डैमोक्रेटिक क्रांतिकारी पीपल्स पार्टी के टिकट पर हेनिंग विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से विधायक बने.

2007 तक अपनी सीट बरकरार रखी. फरवरी 2012 तक कैबिनेट मंत्री के रूप में काम किया. वर्ष 2016 में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. वर्ष 2017 में उन्होंने फिर हेनिंग विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीता. इस के बाद वे मणिपुर के 12वें मुख्यमंत्री बने. भाजपा और सहयोगियों के 33 विधायकों के साथ सरकार चलाई. अब 2022 में भाजपा की तरफ से चुनाव लड़ व जीत कर राज्य में बहुमत की सरकार बनाने में सफल हुए.

गोवा में 3 पतिपत्नी के जोड़े पहुंचे सदन

40 विधानसभाई सीटों वाले गोवा राज्य में स्थिर सरकार बनना दूर की कौड़ी जैसा लगता था क्योंकि एक भी विधायक के इधरउधर होने से सरकार गिर जाती थी. भाजपा ने वहां तीसरी बार सरकार बनाने में सफलता हासिल की है. 40 सीटों में से 20 सीटें भाजपा ने जीत लीं जबकि 11 कांग्रेस, 2-2 सीटें एमजीपी और आम आदमी पार्टी को मिली हैं. मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत तो चुनाव जीत गए पर उन के दोनों डिप्टी सीएम चुनाव हार गए हैं

गोवा के चुनाव की सब से खास बात यह है कि वहां 3 पतिपत्नी चुनाव जीत कर सदन में पहुंचे हैं.

उत्तराखंड में हारे, उत्तर प्रदेश में बच गए सेनापति

70 सीटों वाले उत्तराखंड में 47 सीटें जीत कर भाजपा ने अपनी सरकार बचा ली लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी सीट हार गए. उत्तराखंड में पहली बार किसी पार्टी को दोबारा सरकार चलाने का बहुमत मिला है. हर 5 साल में सरकार बदल जाती थी. उत्तराखंड के बड़े भाई का दर्जा प्राप्त उत्तर प्रदेश में भी 37 साल के बाद किसी सरकार को दोबारा बहुमत मिला है. वहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी सीट जीतने में सफल रहे लेकिन डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य चुनाव हार गए.

उत्तर प्रदेश में भाजपा 273 सीटें जीतने में सफल रही है. मजबूत विपक्ष के रूप में समाजवादी पार्टी गठबंधन को 125 सीटें मिली हैं. 31 प्रतिशत वोट पाने के बाद भी वह सत्ता से बाहर है. योगी आदित्यनाथ के रूप में हिंदुत्व की वापसी भले हो गई हो पर वहां दलित, पिछड़े हाशिए पर चले गए हैं. इस का असर आने वाले दिनों में दिखाई देगा.

दलितपिछड़ों के हाशिए पर जाने की सब से बड़ी वजह वे खुद हैं. वे हिंदुत्व के प्रभाव में वोट कर रहे हैं, जिस की वजह से 1980 के दशक में डाक्टर राम मनोहर लोहिया, चौधरी चरण सिंह और कांशीराम ने जिस दलित और पिछड़ा समाज को आगे करने के लिए ‘85 बनाम 15’ का नारा दिया था, वह बिखर गया है. इस का असर केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश की राजनीति पर पड़ेगा. भाजपा के मुकाबले दूसरे दल नारे देने और वादे करने में आगे नहीं आ पा रहे हैं. जबकि, चुनाव जीतने के लिए ऐसे भरोसे की जरूरत होती है. पिछले चुनावों को देखें तो यह बात सम?ा जा सकती है.

नारे और वादों से चुनाव जीत सकते हैं, दिल नहीं

चुनाव जीतने के लिए जरूरी है कि नारे और वादे ऐसे हों जिन से जनता को आकर्षित किया जा सके. वादे पूरे हों या न, पर जनता को लगना चाहिए कि वादा किया जा रहा है. कांग्रेस के शुरुआती दौर को देखें तो यह बात सम?ा जा सकती है. इंदिरा गांधी के जमाने में कांग्रेस इसी तरह से नारे और वादे कर बड़ीबड़ी जीत हासिल करती थी. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नारे और वादे इतिहास में सब से ज्यादा मशहूर रहे हैं. बैंकों का राष्ट्रीयकरण और पाकिस्तान का विभाजन 2 बड़े काम हैं जो उन के द्वारा किए गए. अपनी इसी क्षमता के कारण दुनिया इंदिरा गांधी की ताकत की कायल थी.

इंदिरा गांधी चुनाव जीतने के लिए बड़े वादे और नारे दे कर काम करती थीं. इंदिरा गांधी के लोकप्रिय नारों में ‘गरीबी हटाओ’ का नारा सब से प्रमुख था. 1971 का यह नारा इतना लोकप्रिय हुआ कि 2022 के विधानसभा चुनावों में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को इस नारे का जिक्र करना पड़ा.

‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है.’

इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओं’ नारे का विपक्षी मजाक भी उड़ाते रहे. इस के बाद भी कांग्रेस का यह सब से लोकप्रिय नारा रहा है. तब से आज तक कांग्रेस कोई ऐसा नारा देने और वादा करने में सफल नहीं हुई जिस की वजह से वह चुनाव जीतने में सफल नहीं हो पा रही है. नारे और वादों के बल पर कैसे मजबूत से मजबूत सरकार गिराई जा सकती है, इस का एक दूसरा बड़ा उदाहरण विश्वनाथ प्रताप सिंह हैं. राजीव गांधी सरकार में वे प्रमुख नेताओं में थे. 1983 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए आम चुनाव में राजीव गांधी को सब से बड़ा बहुमत मिला था. राजीव गांधी सरकार को ‘मिस्टर क्लीन’ की उपाधि दी गई. लेकिन 5 साल के अंदर ही राजीव गांधी की छवि खराब होने लगी.

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस को छोड़ कर भ्रष्टाचार के खिलाफ नारा दिया. राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स घोटाले का नारा बुलंद कर दिया. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जनता दल के नाम से पार्टी बनाई. उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ नारा दिया- ‘राजा नहीं फकीर है देश की तकदीर है.’ यह नारा काम कर गया और कांग्रेस चुनाव हार गई. विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री बन गए. यह बात और है कि वे बाद में अपने नारे को सही साबित नहीं कर पाए जिस की वजह से विश्वनाथ प्रताप सिंह हाशिए पर पहुंच गए, पर अपने जातेजाते वे मंडल की राजनीति को देश में फैला गए, जिस का व्यापक असर उत्तर प्रदेश और बिहार पर पड़ा.

मंडल कमीशन के प्रभाव से देश में जातीय समरसता की राजनीति शुरू हुई. मंडल की राजनीति में ‘15 बनाम 85’ का नारा दिया गया. 1993 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का नारा ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ चल गया. जिस की वजह से भाजपा 2017 के पहले उत्तर प्रदेश में अपनी बहुमत की सरकार नहीं बना पाई. नारे और वादे बसपा के लिए भी काम करते रहे.

कांशीराम के जमाने के नारों में ‘ठाकुर ब्राह्मण बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएसफोर’ और ‘तिलक तराजू और तलवार, गिनके मारो जूते चार’ बहुत मशहूर थे. इन नारों के दम पर बसपा की नेता मायावती 4 बार उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बनीं. सपा और बसपा अपने वादे और नारे भूलते गए. दूसरी तरफ भाजपा हिंदुत्व की आड़ में ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा लगा कर सत्ता में आ गई.

सपा हाफ, बसपा साफ

2022 के विधानसभा चुनाव को 2024 के लोकसभा चुनाव का सैमीफाइनल माना जा रहा था. जनता भाजपा के खिलाफ थी. कोरोना, महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दे जनता में थे. जनता समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव से उम्मीद लगा रही थी कि वे कोई ऐसा वादा करेंगे, कोई ऐसा नारा देंगे जिस से जनता को यह पता चल सके कि चुनाव जीतने के बाद वे राहत देने का काम करेंगे. पूरे चुनाव में अखिलेश यादव एक भी ऐसा नारा या वादा करने में असफल रहे जिस पर जनता यकीन कर सके. वे केवल यह सोचते रहे कि जनता भाजपा से नाराज हो कर उन को वोट देगी और वे बिना किसी वादे या नारे के मुख्यमंत्री बन जाएंगे.

अखिलेश यादव अक्तूबर 2021 में चुनावी मोड में आते हैं. जब चुनाव को केवल 6 माह से भी कम समय बचा होता है. उन को यह लग रहा था कि यादव और मुसलिम उन के साथ खड़े हो जाएंगे तो यह संख्या 30 प्रतिशत तक हो जाएगी. इस में कुछ जातीय नेताओं को जोड़ लेंगे, तो आराम से 34 से 35 प्रतिशत वोट मिल जाएंगे और वे चुनाव जीत जाएंगे.

2012 में जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने थे तो समाजवादी पार्टी को 29 प्रतिशत वोट ही मिले थे. यह आकलन करते समय अखिलेश यह भूल गए कि 2012 में मुकाबला त्रिकोणात्मक था. कांग्रेस का भी वजूद था. ऐसे में वोट आपस में बंट गए. भाजपा उस समय सत्ता में नहीं थी. भाजपा का हिंदुत्व का नारा प्रभावी नहीं था. 2022 में भाजपा का हिंदुत्व प्रभावी था. कांग्रेस और बसपा चुनावी मैदान में मजबूत नहीं थीं. सपा और भाजपा की आमनेसामने की लड़ाई थी. सपा 347 सीटों पर लड़ी और 32 प्रतिशत वोट पा कर भी 111 सीट ही जीत सकी. बसपा 12 प्रतिशत वोट पा कर केवल एक सीट जीत सकी. भाजपा 42 प्रतिशत वोट पा कर 273 सीटें पाने में सफल हुई.

जनता समाजवादी पार्टी के साथ थी लेकिन अखिलेश यादव कोई वादा करने और नारा देने में सफल नहीं हुए. अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन किया. उस के नेता जयंत चौधरी के साथ ‘दो युवा की जोड़ी’ बनाई. इस को अखिलेश यादव ने ‘दो लड़कों की जोड़ी’ का नाम दिया. पश्चिम उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए सब से कमजोर कड़ी थी. किसान आंदोलन के कारण जाट किसान भाजपा से नाराज थे. कम से कम 25 ऐसे मामले थे जहां भाजपा के विधायकों को गांव के लोगों ने चुनावप्रचार नहीं करने दिया.

जाटों के सामने सब से बड़ी दिक्कत यह थी कि वे यादव जाति के पीछे पिछलग्गू बन कर नहीं चलना चाहते थे. अखिलेश यादव जयंत चौधरी के साथ चुनावप्रचार कर तो रहे थे पर वे जयंत चौधरी को खास महत्त्व नहीं दे रहे थे. जयंत चौधरी से अधिक महत्त्व वे स्वामी प्रसाद मौर्य और ओमप्रकाश राजभर जैसे नेताओं को दे रहे थे. यह बात जाट वोटरों को हजम नहीं हो रही थी.

जाट वोटरों के साथ दूसरी सब से बड़ी दिक्कत यह थी कि वे मुसलिम नेताओं के बढ़ते प्रभाव को स्वीकार नहीं करते हैं. वर्ष 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगे के बाद मुसलमानों के साथ जाट और जाटव खड़े नहीं होना चाहते. उधर, यादव और जाटों के बीच दूरियों की पुरानी वजहें हैं. इस की वजह यह थी कि मुलायम सिंह यादव ने अजीत सिंह को हमेशा अपने से कमतर रखने की कोशिश की. हालांकि, मुलायम सिंह यादव ने पूरी राजनीति लोकदल से ही सीखी.

देशहित में नहीं है हिंदुत्व

हिंदुत्व का नारा दे कर भले ही भाजपा ने विधानसभा चुनाव में 4 राज्य उत्तर प्रदेश, मणिपुर, गोवा और उत्तराखंड में सरकार बना ली पर इस से देश का भला नहीं होने वाला. हिंदुत्व का नारा जैसेजैसे उभरता जाएगा, इस का प्रभाव बढ़ता जाएगा और देश का विकास रुकता जाएगा. देश में बेरोजगारी, महंगाई तो  बढ़ेगी ही, धर्म और समाज में भेदभाव व दूरियां भी बढ़ेंगी.

हिंदुत्व के नाम पर जिस तरह से मुसलमानों के खिलाफ एक गोलबंदी को अंजाम दिया जा रहा है, वह डराने वाला है. भले ही मुसलमान देश में अभी 25 करोड़ हों पर देश के विकास में उन का योगदान है. अगर सरकार बनाने के कारण इस वर्ग को पूरे समाज से दूर किया गया, अलग किया गया तो भारत की हालत रूस और यूक्रेन जैसी होते देर न लगेगी.

आज जो रूस और यूक्रेन एकदूसरे के जानी दुश्मन बने हैं, वे दोनों कभी एक ही देश सोवियत संघ का हिस्सा होते थे. 1991 में यूक्रेन के अलग होने के बाद से दोनों देशों के बीच विवाद शुरू हो गया. विवाद तब और बढ़ गया जब यूक्रेन से रूसी समर्थक राष्ट्रपति को हटा दिया गया.

रूस नहीं चाहता कि यूक्रेन नाटो में शामिल हो, क्योंकि रूस को लगता है कि अगर ऐसा हुआ तो नाटो के सैनिक और ठिकाने उस की सीमा के पास आ कर खड़े हो जाएंगे. रूस और यूक्रेन के बीच तनाव बढ़ गया और फिर युद्ध शुरू हो गया. यूक्रेन पर हमला करने के बाद पूरी दुनिया में रूस अलगथलग पड़ गया. लोग उस की विस्तारवादी नीतियों की आलोचना करने लगे. यूक्रेन रूस के बीच की जंग विश्वयुद्ध की आहट देने लगी, जिस का प्रभाव यूक्रेन से अधिक रूस पर पड़ रहा है.

‘स्टेट क्राफ्ट’ है सब का साथ

किसी भी देश और समाज के छोटे से हिस्से को जब अलगथलग किया जाता है तो ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं जो देश और समाज के हित के नहीं होते हैं. इसी वजह से आजादी के समय भारत में भी बंटवारा हुआ और उस का दर्द अभी तक भुगतना पड़ रहा है. कश्मीर समस्या का जो हल अनुच्छेद 377 हटा कर किया गया है उस का असर क्या होगा, यह भविष्य की गर्त में है. यहां अगर आपसी मेलमिलाप से काम नहीं लिया गया तो अलगाववादी ताकतों को मौका मिलेगा. चुनाव के जरिए ‘स्टेट क्राफ्ट’ का यह काम होता है कि वह हर जाति और धर्म को साथ ले कर चले. सब को उचित प्रतिनिधित्व मिले. संविधान ने इसी मंशा के साथ चुनाव में सुरक्षित सीटों को ससंद और विधानसभा में आरक्षण दिया था.

देश की सरकार चलाने के लिए चुनाव जीतना एक अलग बात है. नारे और वादे के बल पर चुनाव जीते जा सकते हैं पर देश नहीं चलाया जा सकता. देश चलाना एक ‘स्टेट क्राफ्ट’ है. जिस में ‘सब का साथ सब का विकास’ का नारा देने से काम नहीं चलता. इस में सही मानो में सब को साथ ले कर चलना पड़ता है. मुसलमानों को अलगथलग कर के चुनाव जीता जा सकता है पर देश को नहीं चलाया जा सकता. ऐसे में देश में रहने वाले हर जाति व धर्म के लोगों को यह सम?ाना होगा कि देश के विकास में उन का अपना रोल बेहद अहम है. वे खुद को अलगथलग महसूस न करें.

हिंदुत्व के नारे के साथ यह संभव नहीं है. यही वजह है कि 2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी एकएक कर के कई चुनाव जीत चुकी है. इस के बाद भी वह 25 करोड़ लोगों का भरोसा नहीं जीत पाई है. भाजपा को यह ‘स्टेट क्राफ्ट’ सीखना होगा जिस के बल पर वह पूरे समाज और हर जाति व धर्म के लोगों को साथ ले कर चल सके. अगर ऐसा नहीं हुआ तो रूस और यूक्रेन जैसे हालात कभी भी सामने खड़े हो सकते हैं. ऐसे में जरूरी है कि पूरे समाज को साथ ले कर चलने वाली योजनाएं बनें.

चाहत: क्यों हो गया रंजीता और मेनका का तलाक

मातापिता की मरजी के खिलाफ मेनका ने रंजीत से विवाह तो कर लिया पर उस का साथ वह अधिक समय तक निभा नहीं पाई और उस से तलाक ले लिया. लेकिन फिर ऐसी कौन सी घटना घटी जिस ने मेनका को वापस रंजीत की चाहत में गिरफ्तार कर दिया?

चाहत: भाग 1

Writer- रमणी मोटाना

नववर्ष के आगमन पर क्लब दुलहन की तरह सजाया गया था. बिजली के रंगीन बल्बों की रोशनी से सारा प्रांगण जगमगा रहा था. क्लब के बार में दोस्तों के साथ बैठे रंजीत की नजर एक युवती पर पड़ी जो अपनी सहेलियों के साथ खिलखिला कर हंसती हुई पास से गुजर गई.

‘‘यार, यह हसीना कौन है?’’ रंजीत ने अपने दोस्तों से पूछा.

‘‘यह मेनका है. अपने मांबाप के साथ पुणे से आई और जनरल मल्होत्रा की मेहमान है,’’ उस के दोस्त पवन ने कहा.

‘‘तभी तो, मैं भी चकराया कि इस हसीन चेहरे पर पहले कभी नजर क्यों नहीं पड़ी.’’

‘‘बाबू, यह तेरी पहुंच से बाहर है. सेठ अमरचंद का नाम सुना है कभी? वही जिन की कपड़ों की कई मिले हैं. यह उन की एकलौती बेटी है. अमरचंद करोड़पति हैं.’’

‘‘अरे, वह करोड़पति है तो हम भी कोई गएगुजरे नहीं हैं,’’ रंजीत ने छाती फुला कर कहा, ‘‘हम फौजी हैं, देश के रखवाले.’’

पवन रंजीत के कंधे पर हाथ रख कर बोला, ‘‘मेरे फौजी भाई, यहां तेरी दाल नहीं गलने वाली.’’

‘‘देखा जाएगा.’’

तभी हौल में डांस का बैंड बजने लगा. जोड़े उठउठ कर डांस करने लगे.

कुछ देर बाद माइक पर घोषणा हुई कि डांस का अगला कार्यक्रम लेडीज चौइस का है, यानी महिलाएं अपना डांस पार्टनर खुद ही चुनेंगी तो आगे आइए और अपने पसंदीदा पार्टनर का चुनाव कीजिए.

मौका ताड़ कर रंजीत मेनका के सामने जा खड़ा हुआ.

‘‘मैडम, क्या आप को इस जमघट में कोई भी नौजवान पसंद नहीं आया?’’ रंजीत ने पूछा.

मेनका हैरानी से उस की ओर देख कर बोली, ‘‘आप की तारीफ?’’

‘‘खाकसार का नाम रंजीत है. अगर इस डांस के लिए आप ने मु?ो चुना तो मैं आप का आभारी रहूंगा.’’

मेनका धीरे से मुसकराई और उठ कर डांसफ्लोर पर आ गई. अब वह और रंजीत आमनेसामने नृत्य करने लगे. कुछ देर बाद रंजीत ने बैंड वालों को कुछ इशारा किया तो वे एक धीमी रोमांटिक धुन बजाने लगे.

रंजीत ने मेनका को बांहों में ले लिया. संगीत की मदभरी धुन और कमरे की कम रोशनी ने तो वहां के वातावरण में एक रूमानी माहौल पैदा कर दिया.

‘‘क्या हम दोबारा मिल सकते हैं?’’ रंजीत ने पूछा.

‘‘यह मुमकिन नहीं, मैं पुणे में रहती हूं.’’

‘‘पुणे मुंबई से कितना ही दूर है. वैसे, पुणे मेरा जानापहचाना शहर है. मैं ने खड़कवासला से सैनिक प्रशिक्षण पूरा किया है.’’

मेनका के मातापिता की नजर अपनी बेटी पर ही टिकी हुई थी.

‘‘यार, मल्होत्रा,’’ अमरचंद बोले, ‘‘यह लड़का कौन है जो मेनका के साथ डांस कर रहा है?’’

‘‘यह कैप्टन रंजीत है. बड़ा ही दिलेर और होनहार जवान है.’’

‘‘यह मेरी बेटी में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी ले रहा है,’’ अमरचंद बोले, ‘‘देखो न, बैंड ने एक के बाद एक कई धुनें बजाईं पर इस ने मेनका के साथ डांस करना बंद नहीं किया.’’

‘‘मेरा खयाल है कि अब हमें चलना चाहिए,’’ अमरचंद की पत्नी अमिता बोली, ‘‘बहुत रात हो गई है.’’

‘‘अरे वाह, बगैर 12 का बजर हुए और बिना नववर्ष का अभिनंदन किए हम आप को कैसे जाने दे सकते हैं?’’ जनरल मल्होत्रा बोले.

तभी एकाएक 12 का घंटा बजना शुरू हुआ. सभी बत्तियां गुल कर दी गईं. हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

रंजीत मेनका के गाल को चूम कर धीरे से बोला, ‘‘आप के जीवन में नववर्ष मंगलमय हो.’’

मेनका ने आंखें तरेर कर उसे देखा और बोली, ‘‘यह क्या बदतमीजी है?’’

‘‘माफ कीजिए, मैं इंग्लिश तरीके से आप को नए साल की शुभकामनाएं दे रहा था.’’

तभी हौल रोशनी से जगमगा गया. रंजीत मेनका को छोड़ कर जनरल मल्होत्रा के पास आ गया. उन्हें एक सैल्यूट मारा और अदब से खड़ा हो गया.

‘‘हैलो, रंजीत, कैसे हो?’’ जनरल मल्होत्रा आत्मीयता से बोले.

‘‘अच्छा हूं.’’

‘‘मल्होत्रा, अब हम चलते हैं,’’ अमरचंद उठ खड़े हुए.

‘‘ठीक है,’’ जनरल मल्होत्रा बोले, ‘‘कल का हमारा गोल्फ खेलने का कार्यक्रम पक्का है न?’’

‘‘हां, कल ठीक 7 बजे हम गोल्फ क्लब पर मिलेंगे और हमारी श्रीमतीजी भाभीजी को ले कर शौपिंग कराने जाएंगी.’’

दूसरे दिन मेनका के घर फोन बज उठा.

‘‘हैलो,’’ मेनका बोली.

‘‘जी, मैं रंजीत बोल रहा हूं.’’

‘‘ओह, आप हैं, कहिए?’’ मेनका ने रुखाई से कहा.

‘‘मैं कल रात की घटना के लिए माफी मांगना चाहता हूं. दरअसल, कल रात मैं नशे में था.’’

‘‘नशे में तो आप नहीं थे, पर खैर, मैं ने आप को माफ किया.’’

‘‘नहीं, ऐसे नहीं. मु?ो एक बार आप मिलने का मौका दीजिए ताकि मैं ढंग से माफी मांग सकूं.’’

‘‘ओह, आप तो पीछे ही पड़ गए. मैं आप को बता दूं कि मेरे मांबाप मु?ो किसी अनजान लड़के से मिलने की इजाजत नहीं देते.’’

‘‘लेकिन अभी तो वे दोनों घर पर नहीं हैं. डैडी गोल्फ खेलने गए हैं और मम्मी शौपिंग करने गई हैं,’’ फिर रंजीत ने जोर दे कर कहा, ‘‘मैं आप के बंगले के बाहर ही खड़ा मोबाइल से बोल रहा हूं. आप आ रही हैं न?’’

मेनका बाहर आई तो रंजीत ने कहा, ‘‘मेरे पास कार तो नहीं है पर एक खटारा मोटरसाइकिल है, चलेगा?’’

‘‘चलेगा.’’

‘‘अब बताइए, कहां चलना है? रैस्तरां में बैठ कर कौफी पीनी है या जुहू की रेत पर टहलना है?’’

‘‘दोनों,’’ मेनका बोली और इसी के साथ मोटरसाइकिल सड़क पर दौड़ने लगी.

जब वे लौटने लगे तो रंजीत ने पूछा, ‘‘अब कब मिलना होगा?’’

‘‘शायद कभी नहीं, कल हम लोग पुणे चले जाएंगे.’’

‘‘देखिए, मु?ा गरीब पर

तरस खाइए, फौजी

हूं. कब सीमा पर भेज दिया जाऊं, कब देश की खातिर लड़तेलड़ते शहीद हो जाऊं, कुछ कह नहीं सकता. एक देशभक्त नागरिक होने के नाते आप का फर्ज बनता है कि आप इस फौजी को कुछ सुनहरी यादें प्रदान करें.’’

कुछ महीने बाद मेनका बोली, ‘‘रंजीत, इस तरह चोरीछिपे हम कब तक मिलते रहेंगे? तुम पापा से शादी की बात क्यों नहीं करते?’’

‘‘ठीक है, इसी सप्ताह मैं पुणे आता हूं, लेकिन क्या तुम्हें लगता है कि पापा मान जाएंगे.’’

‘‘आसानी से तो नहीं मानेंगे बल्कि मु?ो तो डर है कि तुम्हारी बात सुनते ही एक ऐसा विस्फोट होगा कि तुम्हें लगेगा कि तीसरा महायुद्ध शुरू हो गया,’’ मेनका हंसते हुए बोली.

अगले सप्ताह रंजीत पुणे गया और उस की मुलाकात मेनका के पिता अमरचंद से हुई. रंजीत की बातें सुन कर वे गुस्से से फट पड़े.

‘‘नहीं, यह नहीं हो सकता,’’ अमरचंद बोले, ‘‘मैं अपनी एकलौती लड़की का हाथ एक फौजी के हाथ में नहीं दे सकता.’’

‘‘सर, फौजी होने में क्या खराबी है?’’

‘‘खराबी कुछ नहीं है पर हमेशा मौत से जू?ाने वालों के परिवार पर क्या बीतती है, यह तुम अच्छी तरह से जानते हो. हां, अगर तुम आर्मी छोड़ कर मेरे साथ व्यापार में हाथ बंटाओ तो इस बारे में कुछ सोच सकता हूं.’’

‘‘नहीं, सर, मैं फौज की नौकरी नहीं छोड़ना चाहता,’’ इतना कह कर रंजीत वहां से चला गया.

इस घटना के कई दिनों बाद एक दिन सुबह मेनका का फोन रंजीत के पास आया.

‘‘रंजीत, मु?ा पर कड़ा पहरा बैठा दिया गया है. मैं ?घर में नजरबंद हूं. मुंबई तो क्या, मैं घर से बाहर भी नहीं निकल सकती और पापा आजकल मेरे लिए जोरशोर से लड़का ढूंढ़ने में लगे हुए हैं.’’

‘‘मेनका, क्या तुम एक दिन के लिए मुंबई आ सकती हो?’’

‘‘कोशिश करूंगी, पापा को पटाना पड़ेगा. उन की अगले महीने मुंबई में मीटिंग है.’’

मेनका अपने पापा के साथ मुंबई आई. दोनों अपने जुहू वाले बंगले में रुके थे. उस के पापा तैयार हो कर मीटिंग में चले गए तथा वह रंजीत के साथ निकल पड़ी. दोनों ने आर्य समाज मंदिर में जा कर शादी कर ली.

सेठ अमरचंद अपने कमरे में बैठे सिगार का कश भर रहे थे कि मेनका ने कमरे में प्रवेश किया.

‘‘पापा, यह लीजिए मिठाई.’’

‘‘अरे, यह मिठाई किस खुशी में? वे चौंक कर बेटी की ओर देख कर बोले, ‘‘मेनका, तुम ने शादी कर ली क्या?’’

‘‘हां, पापा,’’ मेनका कांपते हृदय से बोली और नजरें ?ाका लीं.

‘‘रंजीत कहां है?’’ अमरचंद ने पूछा.

‘‘बाहर खड़े हैं.’’

‘‘बुलाओ उसे,’’ अमरचंद बोले, ‘‘जब तुम लोगों ने अपने मन की कर ली है तो अब डर किस बात का?’’

समय गुजरता गया. अब रंजीत व मेनका की खुशियों का प्याला छलछला रहा था. उन के घर एक बेटे का जन्म हुआ. पुत्र निखिल को पा कर रंजीत फूला न समाया.

उस रोज मेनका का जन्मदिन था. रंजीत ने बाजार से फूलों का गुलदस्ता और मोतियों का एक हार खरीदा और गुनगुनाता हुआ घर में दाखिल हुआ, लेकिन घर में अंधेरा देख कर वह चौंक पड़ा. बारबार उस के दिमाग में एक ही प्रश्न उठता कि आखिर वह बिना बताए गई कहां.

समय बीतता गया. धीरेधीरे रंजीत का पारा चढ़ने लगा. वह होंठ चबाता, गुस्से में उफनता बैठा रहा. जब बहुत देर हो गई तो गिलास में शराब का पैग बना कर पीने लगा.

Summer Special: हेल्थ के लिए गुणों की खान है खीरा

*    पेट की गैस, एसिडिटी, छाती की जलन में नियमित रूप से खीरा खाना लाभप्रद होता है

*    जो लोग मोटापे से परेशान रहते हैं उन्हें सवेरे इसका सेवन करना चाहिए. इससे वे पूरे दिन अपने आपको फ्रेश महसूस करेंगे. खीरा हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है.

*    खीरे को भोजन में सलाद के रूप में अवश्य लेना चाहिए. नमक, काली मिर्च व नींबू डालकर खाने से भोजन आसानी से पचता है व भूख भी बढ़ती है.

*    कील मुंहासों, धब्बों व झाइयों पर खीरे का रस लगाना लाभप्रद होता है.

*    यदि आंखों के नीचे काले घेरे बन गए हैं तो खीरे के गोल-गोल टुकड़े काट कर आंखों पर रखें. इससे आंखों को भी ठंडक मिलेगी व कालापन भी दूर होगा. खीरे के रस में दूध, शहद व नींबू मिलाकर चेहरे व हाथ पैर पर लगाने से त्वचा मुलायम व कांतिवान हो जाती है.

*    खीरे में विटामिन बी और कार्बोहाइड्रेट होता है, जो तुरंत एनर्जी देता है. यह फैट्स कम करता है. साथ ही यह सिरदर्द भगाने और मुंह की दुर्र्गंध दूर करने में भी काम आता है. इसे खाना डायबिटीज, किडनी, लीवर आदि की बीमारियों में भी लाभदायक है.

*    भोजन के साथ ही खीरा अन्य कार्र्यों में भी उपयोगी है. इससे आप स्टील के बर्तनों पर पड़े पुराने दाग मिटा सकते हैं. साथ ही यह कपड़ों से पेन के दाग मिटाने के काम भी आता है.

*    खीरे की तासीर ठंडी होती है.  यह त्वचा के लिए काफी लाभदायक होता है. इसका रस चेहरे पर लगाने से चमक आती है. इसमें फाइटो केमिकल होता है, जिससे झुर्रियां कम होती हैं.

*    खीरे में विटामिन बी, फोलिक एसिड, कैल्शियम, आयरन, मैगनीशियम, फासफोरस, मिनरल और जिंक जैसे कई तत्व होते हैं, जो हमारे शरीर के पोषण के लिए महत्वपूर्ण होते हैं.

*    आयुर्वेद के अनुसार खीरा स्वादिष्ट, शीतल, प्यास, दाहपित्त तथा रक्तपित्त दूर करने वाला रक्त विकार नाशक है.

*    आप यदि उदर विकार से परेशान हैं तो दही में खीरे को कसकर उसमें पुदीना, काला नमक, काली मिर्च, जीरा व हींग डालकर रायता बनाकर खाएं. आराम मिलेगा.

*    घुटनों के दर्द को भी दूर भगाता है खीरे का सेवन. घुटनों के दर्द वाले व्यक्ति को खीरे अधिक खाने चाहिए तथा साथ में एक लहसुन की कली भी खा लेनी चाहिए.

*    पथरी के रोगी को खीरे का रस दिन में दो-तीन बार जरूर पीना चाहिए. इससे पेशाब में होने वाली जलन व रूकावट दूर होती है.

*    खीरे के रस में नींबू मिलाकर चेहरे पर लगाने से चेहरे के रंग में निखार आता है.

 सावधानियां  बरतें :-

खीरे का उपयोग करते समय कुछ सावधानियां भी बरतें…

*    खीरा कभी भी बासी न खाएं.

*    जब भी खीरा खरीदें यह जरूर देख लें कि वह कहीं से गला हुआ न हो.

*    खीरे का सेवन रात में न करें. जहां तक हो सके, दिन में ही इसे खाएं.

*    खीरे के सेवन के तुरंत बाद पानी न पिएं खीरा बहुत गुणकारी है, यह तो सभी जानते हैं. फिर भी खीरे के  कई गुण हैं, जिनसे हम अनजान हैं.

 खीरा एक है गुणकारी अनेक !

गर्मियों के दिनी में खीर का अपना ही महत्त्व है, यह बाजार में सर्वत्र मिलता है. खीरे का सेवन भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक किया जाता है. खीरा देश के हर भाग में उपलब्ध है. पहाड़ों में इसका आकार बड़ा होता है. खीरा सुपाच्य, शीतल व तरावट से भरपूर होता है. खीरे की तासीर ठंडी होती है.खीरा व ककड़ी एक ही प्रजाति के फल हैं.

खीरे में विटामिन बी व सी, पोटेशियम, फास्फोरस, आयरन आदि विद्यमान होते हैं. खीरा कब्ज से मुक्ति दिलता है. खीरे में जल का अंश बहुत अधिक मात्रा में होता है इसलिए बार-बार प्यास लगने पर इसका सेवन हमें प्यास में राहत पहुंचाता है.

आइये जानते है खीरे के बारे में कुछ अहम बातें…

सेहत के लिए फायदेमंद रसायनों का मिश्रण है खीरा

खीरे में विटामिन बी, बी-2, बी-3, बी-5, बी-6, सी, फोलिक एसिड, कैल्शियम, आयरन, मैगनीशियम, फासफोरस, मिनरल और जिंक जैसे न जाने कितने ऐसे पोषक तत्व होते हैं, जो हमारे शरीर को जरूरी पोषण देते हैं. इसमें कैलोरी भी बहुत कम होती है. ऑफिस में शाम को भूख लगने पर इससे भूख मिटाई जा सकती है.

हर मौसम में उगाया जाता है

यह हर प्रकार की भूमियों में जिनमें जल निकास का उचित प्रबन्ध हो,उगाया जाता है. इसकी खेती हल्की अम्लीय भूमियों जिनका पी.एच. 6-7 के मध्य हो, में की जा सकती है. अच्छी उपज हेतु जीवांश पदार्थयुक्त दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है. इसकी फसल जायद तथा वर्षा में ली जाती है. अत: उच्च तापक्रम में अच्छी वृद्धि होती है , यह पाले को नहीं सहन कर पाता, इसलिए इसको पाले से बचाकर रखना चाहिए.

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