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जीने की राह- भाग 1: उदास और हताश सोनू के जीवन की कहानी

एक हफ्ते बाद कल पत्नी नीता व बेटी रिया घर लौट आएंगी, यह सोच कर मन बेहद उत्साहित था, दोनों के बिना घर काटने को दौड़ता था. नित्य की भांति मैं ने न्यूज देखने के लिए टीवी औन कर लिया था. जिस ट्रेन से दोनों लौट रही थीं वह बुरी तरह दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी. टीवी पर बहुत भयानक दृश्य दिखाया जा रहा था. ट्रेन के कुछ डब्बे पानी में गिर गए थे, कुछ पुल से लटके हुए थे और कुछ उलटपलट कर दूर गिर गए थे. मैं टीवी के सामने जड़वत बैठा हुआ था, मानो दिलोदिमाग ने काम करना बंद कर दिया हो. मेरा निकटतम पड़ोसी उत्तम हांफता हुआ मेरे पास पहुंचा. उस ने भी टीवी पर यह भयंकर दृश्य देख लिया था, उसे भी नीता और रिया के लौटने की खबर थी.

वह हांफता हुआ बोला, ‘‘मन, यह कैसी खबर है?’’

उस की बात सुन कर मैं दहाड़ मार कर रो पड़ा. वह मुझे संभालते हुए बोला, ‘‘नहीं मन, खुद को संभाल, हम यह क्यों सोचें कि नीता और रिया सुरक्षित नहीं होंगे. अरे, सब थोड़े ही हताहत हुए होंगे. तू विश्वास रख, नीता और रिया एकदम ठीक होंगी. हम जल्दी से जल्दी वहां पहुंचते हैं और उन्हें अपने साथ लिवा लाते हैं. मेरे दोस्त हिम्मत रख, सब ठीक रहेगा.’’ मैं ने कहा, ‘‘अच्छा हो कि तेरी बात सही निकले, वे दोनों सहीसलामत हों. किंतु मैं अकेला ही जाऊंगा, तू भाभीजी की देखभाल कर, कल ही तो उन का बुखार उतरा है, अभी वे काफी कमजोर हैं.’’ थोड़ी नानुकुर के बाद उत्तम मान गया. मैं अकेला ही घटनास्थल पर पहुंचा. भयानक एवं वीभत्स दृश्य था. चंद लोगों के अलावा सब खत्म हो चुके थे. चंद जीवित लोगों में नीता और रिया नहीं मिलीं. उन्हें लाशों में से तलाशना बेहद मुश्किल काम था. दो कदम आगे बढ़ चार कदम पीछे हट जाता, मन चीत्कार कर कहता, ‘नहीं होगा यह कार्य मुझ से,’ किंतु उन्हें बिना देखे भी तो वापस नहीं जा सकता था. पागलों की तरह मैं अपनों की लाशें ढूंढ़ रहा था.

विचित्र दृश्य था, अजीब तरह की अफरातफरी मची हुई थी, कई समाज सेवी संस्थाएं व स्थानीय जनता तो सहयोग कर ही रही थी, सरकारी तंत्र भी सहयोग में लगा हुआ था. मेरी नजर अचानक रिया पर पड़ी. वहीं बगल में नीता भी थी. बिलकुल क्षतिविक्षत हालत में. मेरी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा किंतु अपनेआप को संभाला. मैं अपनी नीता एवं रिया की लाशें समेटे खड़ा था, वहीं निकट एक युवती, मेरी रिया की हमउम्र

2 लाशों के मध्य बैठी रोए जा रही थी. मेरा दिल रोरो कर गुहार लगा रहा है, इन निर्दोषों ने ऐसा क्या अपराध किया था जो जान गंवा बैठे या हम ने ऐसा क्या कर दिया जो अपनों को गंवा बैठे. थोड़ी देर में सार्वजनिक रूप से दाहसंस्कार किया जाने वाला था. कई लोग उस में शामिल हो रहे थे, कुछ लोग अपनों की लाशें अपने साथ लिए जा रहे थे, कुछ लाशें अपनों का इंतजार कर रही थीं, कुछ ऐसे भी थे जिन्हें अपनों की लाशें भी नसीब नहीं हुई थीं, वे पागलों की तरह उन्हें खोज रहे थे, रो रहे थे, चिल्ला रहे थे. इंसान कभी कल्पना भी नहीं करता है कि जीवन में उसे ऐसे दर्दनाक दौर का सामना करना पड़ जाएगा. भयानक दृश्य था, एकसाथ इतनी लाशें जल रही थीं, इतनी भारी संख्या में लोग विलाप कर रहे थे. ऐसे अवसर पर मानवीय चेतना विशेष जागृत हो उठती है तथा मनमस्तिष्क में सवालों की झड़ी लग जाती है, ‘हमारे साथ ही ऐसा क्यों हुआ, किस गलती की सजा मिली है, ऐसी तो कोई गलती की हो, याद ही नहीं आता. हम अपनों से बिछड़ कर जीने के लिए क्यों अभिशप्त हुए वगैरवगैरा.’ दाहसंस्कार के बाद मैं नीता और रिया के सामान को समेट कर इधरउधर घूम रहा था. काफी भिखारी भी पहुंच गए थे, काफी कुछ तो उन्हें दे दिया यह सोच कर कि जिन का सामान है वे तो चले गए, चलो किसी के तो काम आएगा, किंतु इस सोच के बाद भी सब न दिया जा सका. कुछ सामान समेट कर अपने साथ रख लिया, मानो इस बहाने नीता और रिया मेरे साथ हों.

मैं नीता और रिया की यादों के समुद्र में गोते लगा रहा था, दुख का दर्द असहनीय था. लगता था मानो वह कलेजे को चीर कर निकल जाएगा. पटना वापस लौटना था, मन होता कहीं भाग जाऊं, क्या करूंगा पत्नी और बेटी के बिना घर में, उन के बिना जीने की कल्पना से ही कलेजा मुंह को आता था, फिर भी लौटना तो था ही. अचानक उस युवती पर नजर ठहर गई. वह भी अपने मातापिता का दाहसंस्कार कर सामान समेटे एक बैंच पर गुमसुम बैठी थी. मैं ने उस के समीप पहुंच, उस से पूछा, ‘‘तुम कहां से हो?’’

‘‘जी पटना से,’’ उस ने उदास नजरों से देखते हुए संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

मैं ने पूछा, ‘‘रात की पटना जाने वाली ट्रेन से जाने वाली हो?’’

उस ने सहमति में सिर हिला दिया. अभी ट्रेन के लिए लगभग 3 घंटे शेष थे. मैं ने कहा, ‘‘चलो, स्टेशन ही चलते हैं.’’ वह आज्ञाकारी बच्चों की तरह साथ चल दी. मैं महसूस कर रहा था कि अत्यधिक उदासीनता के बावजूद इस युवती से जुड़ता जा रहा हूं. एक अजीब सा अपनापन महसूस करने लगा हूं इस अजनबी युवती से कुछ ही घंटों की बातचीत में ऐसा लग रहा था जैसे मैं उसे वर्षों से जानता हूं. फिर हम दोनों ट्रेन पकड़ने के लिए चल दिए. हम दोनों ट्रेन में पहुंच चुके थे. दिनभर के थकेहारे थे, सो अपनीअपनी बर्थ पर चले गए. सुबहसुबह मेरी नींद खुली. मैं ने पाया, वह भी जाग चुकी है. पटना स्टेशन आने में अभी लगभग 1 घंटा शेष था. हम दोनों की विदा होने की घड़ी नजदीक आ पहुंची थी. मैं ने उस से कहा, ‘‘मेरा नाम मानव है, वैसे नजदीकी लोग मुझे ‘मन’ पुकारते हैं. क्या मैं तुम्हारा नाम जान सकता हूं?’’

उस ने कहा, ‘‘मेरा नाम सुनयना है. मुझे मेरे नजदीकी ‘सोनू’ कहते हैं.’ कठिन समय में हम दोनों की आत्मीयता, जीवन संजीवनी का काम कर रही थी. मैं ने कहा कि मैं तुम्हें अपना मोबाइल नंबर दे देता हूं. हम मोबाइल के माध्यम से संपर्क बनाए रख सकते हैं. हम दोनों ने एकदूसरे से अपने नंबर शेयर कर लिए. हम फिर अपनों की याद में खोए गुमसुम से बैठ गए. मैं ने ही चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘‘सोनू, मैं कृष्णपुरी कालोनी में शांतिपार्क अपार्टमैंट में रहता हूं. मुझे तो पटना में रहते हुए 32 साल हो गए हैं.’’ ‘‘मुझे पटना में रहते हुए मात्र 15 दिन ही हुए हैं. मैं ने यहां गर्ल्स हाई स्कूल जौइन किया है. मेरे मम्मीपापा  बहुत उत्साहित थे, विशाखापट्टनम से वे मेरी ही व्यवस्था देखने आ रहे थे. मेरा ही कुसूर है. न ही मैं यहां जौइन करती और न ही वे लोग यहां आने की सोचते और न ही इस दुर्घटना में फंसते. उन लोगों की मौत की जिम्मेदार मैं ही हूं,’’ वह भावविह्वल हो रो पड़ी.

मैं ने समझाते हुए कहा, ‘‘स्वयं को दोषी नहीं समझो. यहां प्रत्येक के आने और जाने की तिथि तय है. इस में तुम्हारा कोई दोष नहीं है. जिस को जितना मिलना है उतना ही मिलता है. हमें सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए.’’ मेरी बातों का सोनू पर कुछ असर हुआ. उस ने स्वयं को संभाल लिया. कुछ पल शांत रहने के बाद वह बोली, ‘‘मनजी, आप कृष्णपुरी में रहते हैं न, मेरा स्कूल भी तो वहीं है.’’ मैं ने याद करते हुए कहा, ‘‘हांहां, हमारी कालोनी के सामने एक गर्ल्स स्कूल है तो, वैसे उस की 3-4 शाखाएं हैं पटना में.’’

सोनू ने कहा, ‘‘हां, शाखाएं तो हैं, किंतु मेरा अपौइंटमैंट कृष्णपुरी शाखा में हुआ है. मैं ने जौइन भी कर लिया है. अभी मैं अपनी एक फ्रैंड के साथ रहती हूं. वहां से स्कूल काफी दूर है. मैं स्कूल के आसपास ही रहने की व्यवस्था करना चाहती हूं.’’ मैं ने कहा, ‘‘हमारी कालोनी में तो काफी फ्लैट्स हैं. तुम्हें अवश्य पसंद का फ्लैट मिल जाएगा. मैं तुम्हें जल्दी से जल्दी पता कर बताता हूं.’’

मेरी बीवी की कई लड़कों से दोस्ती है, मुझे क्या करना चाहिए?

सवाल

मेरी शादी को 6 महीने हो चुके हैं. मेरी बीवी मायके में रह कर अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती है. उस की कई लड़कों से दोस्ती है. मुझे लगता है कि कहीं वह किसी लड़के से प्यार न करने लगे. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

शादी की बुनियाद यकीन पर टिकी होती है. आप को अपनी बीवी पर भरोसा करना चाहिए. उसे किसी से प्यार करना होता, तो शादी से पहले ही कर लेती. वैसे, आप उसे अपने पास रख कर भी पढ़ाई पूरी करा सकते हैं, पर वजह प्यार होनी चाहिए न कि शक.

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शक एक ऐसी लाइलाज बीमारी होती है जिसका कोई इलाज नहीं, अगर एक बार यह किसी को खास कर पतिपत्नी में से किसी को अपनी चपेट में ले ले तो  वह इंसान को हैवान बना सकती है. हाल ही में कुछ ऐसी ही घटना हैदराबाद में देखने को मिली जहां अवैध संबंधों के शक पर एक महिला ने अपने पति को ऐसी सजा दी जिसका दर्द शायद वह अपनी जिन्दगी में कभी नही भुला पाएगा. आप यह जानकर दंग रह जाएंगे की ३० साल की इस आरोपी महिला ने पति से विवाद होने पर चाकू से उसका प्राइवेट पार्ट काटने की कोशिश की जिसके चलते उसके पति को काफी गंभीर चोटें आईं.

ऐसा ही एक अन्य मामला दिल्ली के निहाल विहार इलाके में भी सामने आया जहाँ  पति ने ही अपनी पत्नी का मर्डर कर दिया. पकड़े जाने पर पति ने सारी बातें पुलिस के सामने खोल दीं. उसने साफ किया कि उसे अपनी पत्नी के चरित्र पर उसे शक था.आपको जानकार हैरानी होगी कि दोनों ने लव मैरिज की थी, लेकिन पति को लगता था कि उसकी पत्नी की दोस्ती कई लड़कों से है. इस बात को लेकर अक्सर दोनों में झगड़ा होता था.

टूटते परिवार बिखरते रिश्ते

शक न जाने कितने हँसते खेलते परिवारों को तबाह कर देता है. दांपत्य जीवन जो विश्वास की बुनियाद पर टिका होता है. उसमे शक की आहट जहर घोल देती है हाल के दिनों में अवैध संबंधों के शक में लाइफ पार्टनर पर हमले और हत्या करने की घटनाएं बढ़ रही हैं. मनोवैज्ञानिक इसके पीछे संयुक्त परिवारों के बिखरने को एक बड़ा कारण मानते हैं.

दरअसल, संयुक्त परिवारों में जब पति पत्नी के बीच कोई भी मन मुटाव होता था तो घर के बड़े उसे आपसी बातचीत से सुलझा देते थे, या बड़ों की उपस्थिति में पतिपत्नी का झगडा बड़ा रूप नहीं ले पाता था जबकि आज की स्थिति में जहाँ पति पत्नी अकेले रहते है आपसी झगड़ों में वे एक दूसरे पर हावी होने की कोशिश करते हैं वहां उनके आपसी सम्बन्धों  में शक की दीवार को हटाने वाला कोई नहीं होता. ऐसे में शक गहराने के कारण पति-पत्नी के रिश्ते दम तोड़ने लगते हैं वर्तमान लाइफस्टाइल जहाँ जहाँ पति पत्नी दोनों कामकाजी हैं और दिन के आधे  से ज्यादा समय वे घर से बाहर रहते हैं घर से बाहर  उनका विपरीत  सेक्स के साथ उठाना बैठना होता है. ज्यादा समय साथ रहने से उनके बीच आकर्षण जन्म लेता है और ऐसे में वे बाहरी सम्बन्ध दोनों के बीच शक का आधार बनते हैं. ऐसे में पति पत्नी दोनों को एक दूसरे पर विश्वास रखना  होगा और सामने वाले को उस विश्वास को कायम रखना होगा.

बिजी लाइफ स्टाइल

शादी के बाद जहां वैवाहिक रिश्ते को बनाए रखने में पति और पत्नी दोनों की जिम्मेदारी होती है वहीं  इसके खत्म करने में भी दोनों का हाथ होता है. शादी के कुछ वर्षों बाद जब दोनों अपनी रूटीन लाइफ से बोर होकर और जिम्मेदारियों से बचने के लिए किसी तीसरे की तरफ आकर्षित होने लगते हैं, यानी एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रखते हैं, तो वैवाहिक रिश्ते का अंत शक से शुरू हो कर एक दूसरे को शारीरिक नुकसान पहुंचाने और हत्या तक पहुंच जाता है.

कई बार परिवार की जिम्मेदारियों के बीच फंसे होने के कारण  जब पति पत्नी  जिंदगी की उलझनों को  सुलझा नहीं पाते तो उनके बीच अनबन होने लगती है और उस के लिए वे बाहरी संबंधों को जिम्मेदार ठहराने लगते हैं. उनके दिमाग में  शक  घर करने लगता है. धीरे-धीरे शक गहराता है और झगड़े बढ़ जाते हैं. यदि कोई उन्हें समझाए तो शक और सारी समस्याएं खत्म हो सकती हैं, लेकिन, एकल परिवार में उन्हें समझाने वाला कोई नहीं होता. इस कारण हालात मारपीट, हमले और हत्या तक पहुंच जाते हैं.

तुम सिर्फ मेरे हो वाली सोच

लाइफ पार्टनर के प्रति अधिक  पजेसिव होना भी शक का बडा कारण  बनता है. आज के माहौल में जहां महिलाएं और पुरुष ऑफिस में साथ में बड़ी बड़ी जिम्मेदारियां संभालते हैं ऐसे में उनका आपसी मेलजोल होना स्वाभाविक है . ऐसे में पति या पत्नी में से जब भी कोई एक दुसरे को किसी बाहरी व्यक्ति से मेलजोल बढ़ाते देखता है तो उस पर शक करने लगता है और उसे  यह बर्दाश्त नहीं होता कि उसका लाइफ पार्टनर जिसे वह प्यार करता है वह किसी और के साथ मिले जुले या बात भी करे क्योंकि वह उस पर सिर्फ अपना अधिकार समझता है. इस  तरह की मानसिकता संबंधों में कडवाहट भर देती है. पति या पत्नी जब फ़ोन पर किसी अन्य महिला  या पुरुष का मेसेज या कॉल देखते हैं तो एक दुसरे पर शक करने लगते हैं. भले ही वास्तविकता कुछ और ही हो लेकिन शक का बीज दोनों के सम्बन्ध में दरार डाल देता है जिसका अंत मारपीट और हत्या जैसी घटनाओं से होता है.

जासूसी का जरिया बनते एप्स

पति पत्नी के रिश्ते में दूरियां लाने में स्मार्टफ़ोन भी कम जिम्मेदार नहीं हैं. जहां सोशल मीडिया ने वैवाहिक जोड़ों को शादी के बंधन से अलग किसी और के  साथ प्यार की पींगें बढ़ने का मौका दिया है, वहीं स्मार्ट फ़ोन में ऐसे एप्स आ गए हैं, जो पति पत्नी को एक दूसरे की जासूसी करने  का पूरा अवसर देते हैं. इन एप्स द्वारा पति या पत्नी जान सकते हैं कि उनका लाइफ पार्टनर उनके अतिरिक्त किस से फोन पर सबसे ज्यादा बातें करता है यानी किस से आजकल उसकी नजदीकियां बढ़ रही  हैं , उनके बीच क्या बातें होती है , वे कौन सी इमेजेज या वीडियोज शेयर करते हैं, यानी लाइफ पार्टनर के फ़ोन पर कंट्रोल करने का पूरा इन्तजाम है. ये एप्स लाइफ पार्टनर की हर एक्टिविटी पर नजर रखने का पूरा मौका देते हैं. इन एप्स की मदद से आपके लाइफ पार्टनर का फोन पूरी तरह आपका हो सकता है.

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अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप तकनीक का सदुपयोग आपसी रिश्तों में नज़दीकी लाने में करें या इन्हें रिश्तों में दूरियां बनाने का कारण बनायें? फैसला आपका है.

 

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

आशिकी: तनु की गैरमौजूदगी में फ्लर्ट कर रहा था नमन

औफिस से आते समय गाना सुनते हुए कार चलाते नमन का मूड बहुत रोमांटिक हो गया. पत्नी तनु का खयाल आया, साथ ही अपनी फ्लोर पर एक फ्लैट शेयर कर के रहने वाली अंजलि, निया, रोली और काजल का भी खयाल आया तो घर जाने का उत्साह और भी बढ़ गया.

5 साल पहले नमन का विवाह तनु से हुआ था. दोनों ही लखनऊ में थे. यहां मुंबई में नमन जौब करता था. चारों लड़कियों से आतेजाते तनु की अच्छी जानपहचान हो गई थी. सब कामकाजी थीं पर छुट्टी के दिन जब भी कोई फ्री होती तो तनु के पास आनाजाना लगा रहता था. तनु कुछ स्पैशल बनाती तो इन के लिए भी रख लेती थी.

नमन और तनु की एक 3 वर्षीय बेटी भी थी सिया. तनु की गोद में प्यारी सी गुडि़या जैसी सिया से बोलते, हंसतेखेलते चारों लड़कियां तनु के भी करीब आती गई थीं. दिलफेंक, आशिकमिजाज नमन इन चारों लड़कियों में बड़ी रुचि लेने लगा था.

रोली एक दिन औफिस नहीं गई थी. नमन शाम को औफिस से आया तो वह तनु के साथ बैठ कर चाय पी रही थी. नमन उसे देखते ही खुश हो गया और उन दोनों के साथ ही बैठ कर चहकचहक कर बातें करने लगा.

रोली ने हंस कर कहा भी, ‘‘लग ही नहीं रहा है आप औफिस से आए हैं. इतने फ्रैश?’’

नमन ने मन ही मन सोचा कि फ्रैश तो तुम्हें देख कर हुआ हूं. नमन यही चाहता था कि इन चारों में से किसी न किसी से मिलनाजुलना होता रहे. चारों सुंदर, स्मार्ट थीं. तनु अकसर सिया के साथ व्यस्त होती. इन चारों में से कोई भी लड़की किसी काम से आ जाती और नमन घर पर होता तो वह आगे बढ़ कर खुद ही उन की आवभगत में लग जाता था. तनु सोचती कि वह सिया के साथ व्यस्त है तो नमन मेहमान की आवभगत कर उस की जिम्मेदारी में हाथ बंटाता है.

नमन का झुकाव इन लड़कियों की तरफ बढ़ता ही जा रहा था. घर में ही नहीं, औफिस में भी नमन का यही हाल था. साथ में काम करने वाली लड़कियों के साथ खूब फ्लर्ट करता था. कभी किसी लड़की को कौफी औफर करता, कभी किसी का घर रास्ते में न पड़ने पर भी उसे घर तक छोड़ देता. तनु अपने पति के इस स्वभाव को गंभीरता से न लेती. वह सोचती, नमन काफी सोशल है, क्या बुरा है इस में. हमारे कौन से रिश्तेदार हैं यहां. ये कुछ दोस्त ही तो हैं.

एक दिन सिया को ले कर तनु किसी बर्थडे पार्टी में गई हुई थी. नमन औफिस से आया. ताला लगा था. उस के पास चाबी तो रहती थी पर जब उस ने इन लड़कियों का फ्लैट खुला देखा तो मन में कुछ और ही सोच लिया. उन की डोरबैल बजा दी तो दरवाजा काजल ने खोला.

नमन ने भोली सूरत बना कर पूछा, ‘‘सिया और तनु यहां तो नहीं हैं?’’

‘‘नहीं तो?’’

‘‘ओह.’’

‘‘घर पर नहीं हैं क्या?’’

‘‘नहीं, मेरे पास चाबी रहती तो है पर आज घर पर ही छोड़ गया था, वह मोबाइल भी नहीं उठा रही है. खैर, आ जाएगी.’’

‘‘आप अंदर आ जाइए, वेट कर लीजिए.’’

नमन यही तो चाहता था. अंदर जा कर चारों तरफ नजर डाली. यहां पहली बार आया था.

काजल से पूछा, ‘‘आज आप औफिस नहीं गईं?’’

‘‘हाफ डे ले कर आ गई थी. तबीयत ठीक नहीं लग रही थी.’’

‘‘अरे, क्या हुआ? चलो, डाक्टर को दिखाते हैं पास ही है.’’

‘‘नहींनहीं, थैंक्स. दवा ले ली है. अभी ठीक हूं. आप के लिए कुछ बना दूं. चाय या कौफी?’’

नमन मन ही मन काजल के साथ समय बिताता हुआ बहुत खुश था. प्रत्यक्षत: गंभीरतापूर्वक बोला, ‘‘नहीं, रहने दें. आप आराम कीजिए.’’

उस के मना करने पर भी काजल कौफी बना ही लाई.

नमन खुश था, एक युवा, सुंदर लड़की की कंपनी में. उस के चेहरे की चमक बढ़ गई थी. कौफी की तारीफ कर काजल से उस के काम, परिवार के बारे में पूछता रहा. काजल सहजता से बात करती रही. नमन के हौसले और बुलंद हो गए. इतने में निया, अंजलि भी आ गईं. दोनों नमन से खुशमिजाजी से मिलीं. नमन इन लड़कियों की संगति में स्वयं को एक हीरो जैसा अनुभव कर रहा था.

फ्लोर पर सिया की आवाज सुन नमन ने कहा, ‘‘तनु आ गई. चलता हूं. आज आप लोगों के साथ टाइम का पता ही नहीं चला. थैंक्स,’’ कहता हुआ नमन उन के फ्लैट से निकल गया. उसे देखते ही तनु चौंकी, ‘‘अरे, तुम कब आए?’’

‘‘तुम कहां थीं?’’

‘‘ऊपर की फ्लोर पर ही एक बच्चे की बर्थडे पार्टी थी. सोचा था तुम्हारे आने तक आ जाऊंगी, पर तुम्हारे पास तो घर की एक चाबी है न?’’

नमन ने अंदर आते हुए कहा, ‘‘पता नहीं, मैं ने अपनी चाबी कहां रख दी. ऐसे ही बाहर खड़ा था तो ये लड़कियां जबरदस्ती अंदर ले गईं.’’

‘‘ठीक है, कोई बात नहीं, तुम्हारे लिए चाय बना दूं?’’

‘‘नहीं, रहने दो. उन लड़कियों ने ही पिला दी,’’ कहता हुआ नमन अपनी अलमारी में झूठमूठ ही सामान इधरउधर करता हुआ बोला, ‘‘उफ, यहां रख दी थी मैं ने चाबी. बेकार ही उन के घर जाना पड़ा.’’

सुबह ही तनु के भाई का लखनऊ से फोन आ गया. उस की मम्मी की तबीयत खराब थी. तनु घबरा गई.

नमन ने कहा, ‘‘परेशान मत हो, जा कर देख आओ. फ्लाइट की टिकट बुक कर देता हूं,’’ कह नमन ने मन ही मन पता नहीं कितने प्लान बना डाले तनु के जाने के बाद लड़कियों के साथ जी भर कर टाइमपास करेगा. बहुत उत्साहपूर्वक वह सिया और तनु को एअरपोर्ट छोड़ आया.

फ्लोर पर 4 फ्लैट थे. एक फ्लैट में एक साउथइंडियन बुजुर्ग दंपती रहते थे जो किसी से मतलब नहीं रखते थे. चौथा फ्लैट बंद पड़ा था. नमन ने रात को 8 बजे लड़कियों के फ्लैट की डोरबैल बजाई.

दरवाजा निया ने खोला, ‘‘अरे, नमनजी, आप?’’

‘‘सौरी,पर थोड़ी कौफी है क्या?’’

‘‘क्या हुआ? तनु नहीं हैं?’’

‘‘उस की मम्मी बीमार हैं. उसे आज अचानक लखनऊ जाना पड़ा. मेरे सिर में बहुत दर्द है. सोचा कौफी बना लूं. देखा तो कौफी खत्म थी.’’

‘‘ओके,’’ कह निया अंदर जा 2 पाउच ले कर आई. फिर देते हुए बोली, ‘‘ये लीजिए.’’

जब निया ने अंदर आने के लिए नहीं कहा तो नमन झुंझलाता हुआ घर लौट आया. सोच रहा था, ‘यह तो पहला आइडिया ही फेल हो गया. बेवकूफ लड़की. अंदर ही नहीं बुलाया. कौफी ही औफर कर देती. पैकेट पकड़ा दिए, हुंह.’

अगली सुबह नमन बै्रड बटर खा कर औफिस के लिए निकला तो लिफ्ट में वह और रोली साथ ही घुसे. रोली ने तनु की मम्मी की तबीयत के बारे में पूछा. फिर ऐसे ही मुसकराते हुए पूछा, ‘‘और सब कैसा चल रहा है… अकेले मैनेज करते हैं?’’

नमन के दिल में आशा की एक किरण जगी. फौरन मुंह लटका लिया, ‘‘मुझे तो कुछ बनाना आता भी नहीं है. अभी औफिस की कैंटीन में जा कर नाश्ता करूंगा…’’

लिफ्ट से बाहर निकल कर ‘गुड’ कह मुसकराते हुए रोली यह जा, वह जा. नमन को बड़ा धक्का लगा कि कैसी हैं ये लड़कियां. इतने मैनर्स भी नहीं हैं.

दिन भर फिर मन ही मन सोच रहा था कि किसकिस बहाने से लड़कियों के करीब रहा जा सकता है. तनु पहली बार ही अकेली गई थी. अब तक वह भी साथ ही आताजाता था. अकेले रहने के इस मौके को वह ऐंजौय करना चाहता था.

औफिस में अनमैरिड कुलीग आयुषि से नमन ने लंचटाइम में कहा, ‘‘तनु बाहर गई है, आज टिफिन नहीं लाया हूं. चलो, आज बाहर लंच करते हैं.’’

आयुषि के आसपास वह जानबूझ कर रहा करता था.

हाजिरजवाब आयुषि ने हंस कर कहा, ‘‘नहीं भाई, मैरिड आदमी के साथ क्या लंच पर जाना.’’

नमन को उस पर बहुत गुस्सा आया पर कुछ कह नहीं पाया. मगर नमन ने हार नहीं मानी. वह जानता था कि आयुषि अकेली रहती है. उसे मूवी का भी शौक है. एक दिन फिर कहा, ‘‘आयुषि, मूवी देखने चलें?’’

‘‘तनु अभी नहीं आई?’’

‘‘नहीं, बोर हो रहा हूं, चलो न.’’

‘‘सौरी नमन. मूड नहीं है.’’

नमन ने काफी आग्रह किया पर आयुषि नहीं मानी.

तनु को गए 4 दिन हुए थे. कितनी ही बार उस ने घर पर बहानेबहाने से रोली और बाकी लड़कियों से बातें करने, आगे संपर्क बढ़ाने के बहाने ढूंढ़ें पर बुरी तरह असफल रहा. सब उसे देख कर कन्नी काट जातीं. किसी ने भी उसे प्रोत्साहन नहीं दिया.

अब वह हैरान था. अकेली रहती हैं, तनु से अच्छे संबंध हैं, सिया से आतेजाते खेलती हैं, उस से क्या परेशानी है इन्हें. जरा सा भी टाइम उस से बात करने के लिए जैसे होता ही नहीं. अब तो समझ आने लगा है कि उसे नजरअंदाज करती हैं. ‘कोई फालतू बात नहीं’ का संदेश देते हुए आगे बढ़ जाती हैं. कितनी चालाक हैं ये आजकल की लड़कियां… जैसे मेरे मन के भाव पढ़ लिए सब ने.

नमन अकेला बैठा बहुत बोर हो रहा था. आसपास की लड़कियों के साथ फ्लर्ट करने का सपना चकनाचूर हो गया था. सारी आशिकी हवा हो चुकी थी. अचानक तनु को फोन मिला दिया था, ‘‘अगर मम्मी ठीक हैं, तो जल्दी लौट आओ. तुम्हारे बिना मन नहीं लग रहा है.’’

Anupamaa: शो में अब होगा अनुपमा का मेकओवर? देखें Photos

रूपाली गांगुली और सुधांशु पांडे (Sudhanshu Pandey) स्टारर सीरियल अनुपमा (Anupama) की कहानी में लगातार नया ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो में अब तक आपने देखा कि अनुज-अनुपमा हनीमून एंजॉय कर रहे हैं तो दूसरी तरफ समर और वनराज के बीच दूरियां कम हो रही है. समर वनराज को समझने की कोशिश कर रहा है. इसी बीच अनुपाम ने सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें शेयर की है. जिसे देखकर अंदाजा लगाया जा रहा है कि अब अनुपमा का मेकओवर होने वाला है.

दरअसल रूपाली गांगुली ने इंस्टाग्राम पर तस्वीरें शेयर की है. सोशल मीडिया पर ये तस्वीरें जमकर वायरल हो रही है. इन तस्वीरों में वह लाल रंग की साड़ी में नजर आ रही हैं. साड़ी के साथ रूपाली ने गोल्डन कलर की ज्वेलरी भी कैरी की हुई है.

 

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अनुपमा ने अपनी दो तस्वीरों को शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा है, ‘आज जाने की जिद ना करो.’ रूपाली गांगुली की इन तस्वीरों पर अब तक 74 हजार से भी ज्यादा लाइक्स आ चुके हैं.  बता दें कि अनुज और अनुपमा की शादी के बाद शो में नए किरदारों की एंट्री हो रही है, जिससे दर्शकों को एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिलने वाला है.

 

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शो के लेटेस्ट एपिसोड में दिखाया गया कि अनुज अनुपमा अनाथायल में अनु को देखकर इमोशनल हो गये. वो दोनों अनु को लेकर बीच पर गये. अनु समंदर का किनारा देखकर बहुत खुश हो हुई.

 

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तो दूसरी तरफ पारितोष और किंजल अपने होने वाले बच्चे के लिए काफी एक्साइटेड हैं. शो में ये भी दिखाया गया कि किंजल का पैर फिसल गया और वह गिर पड़ी. पारितोष ने किंजल को संभाल लिया और आगे से उसे केयरफुल रहने के लिए कहा.

 

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शो के अपकमिंग एपिसोड में दिखाया जाएगा कि जैसे ही इस बात की भनक राखी दवे को लगेगी तो वह दौड़े-दौड़े शाह हाउस चली आएगी। इसके बाद वह वनराज शाह को खूब ताना मारेगी. अब देखना ये दिलचस्प है कि वनराज राखी दवे को कैसे शांत कराएगा?

‘बड़े अच्छे लगते हैं 2’ के लीड एक्टर हुए अस्पताल में भर्ती, पढ़ें खबर

टीवी सीरियल ‘बड़े अच्छे लगते हैं 2’ को लेकर एक बड़ी खबर आ रही है, बताया जा रहा है कि शो में राम कपूर का किरदार निभाने वाले एक्टर नकुल मेहता (Nakuul Mehta) की तबियत ठीक नहीं चल रही है. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

इस खबर के आने के बाद फैंस एक्टर के लिए दुआ कर रहे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक ‘बड़े अच्छे लगते हैं 2’ फेम एक्टर नकुल मेहता बीमार पड़ गए हैं. बीते कुछ समय से नकुल मेहता की तबियत ठीक नहीं चल रही थी.

 

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खबरों के अनुसार, नकुल मेहता की सर्जरी हुई है.फिलहाल एक्टर रेस्ट पर है. फैंस एक्टर के ठीक होने के लिए दुआ कर रहे हैं. फैंस लगातार नकुल मेहता की सेहत जानने की कोशिश कर रहे हैं. गौरतलब है कि नकुल मेहता इन दिनों राम कपूर बनकर लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं.

 

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शो में नकुल मेहता यानी राम कपूर और दिशा परमार यानी प्रिया की जोड़ी फैंस को काफी पसंद आ रही है. हाल ही में नकुल मेहता ने पिता बनने के एहसास के बारे में बात की थी. उन्होंने बताया था कि पिता बनने के बाद किस तरह से उनकी जिंदगी बदल गई है.

 

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बता दें कि नकुल मेहता ने 2012 में  सीरियल ‘प्यार का दर्द है, मीठा-मीठा प्यारा-प्यारा’ से टेलीविजन डेब्यू किया था. वो टीवी में एक्टिंग के साथ-साथ मॉडलिंग और कई म्यूजिक वीडियो में भी नजर आ चुके हैं.

 

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मेरा बॉयफ्रेंड सेक्स करने के लिए फोर्स करता है, क्या करूं?

सवाल

मैं 24 वर्षीया युवती हूं. मेरा एक बौयफ्रैंड है. हम दोनों का रिलेशनशिप औफिस से शुरू हुआ. पिछले महीने जून में हमें 2 साल हो गए हैं. वह मुझे फिजिकल रिलेशन बनाने के लिए फोर्स कर रहा है. मैं अभी इस में कम्फर्ट नहीं हूं. उसे मना करती हूं तो वह गुस्सा हो जाता है. मुझसे बात नहीं करता. कहता है कि जब करीब नहीं आना था तो रिश्ता बनाया क्यों.

मु?ो उस से प्यार है पर सोचती हूं कहीं इस वजह से रिश्ते खराब न हो जाएं, कभीकभी तो लगता है कहीं वह मु?ो यूज न कर रहा हो. आप ही बताइए मैं क्या करूं?

जवाब

रिश्ता कभी जोरजबरदस्ती से नहीं बनाया जा सकता. आप बता रही हैं कि आप बौयफ्रैंड के साथ सैक्स के लिए तैयार नहीं हैं, फिर भी वह फोर्स कर रहा है और तो और जब आप मना करती हैं तो गुस्सा अलग होता है तो यह बेहद गलत बात है.

सैक्सुअल रिलेशन 2 लोगों के बीच मर्जी से ही बनना चाहिए. जब तक दोनों तैयार नहीं तब तक इस तरह के रिश्ते में जाना ठीक नहीं. जहां जोरजबरदस्ती है वहां प्यार की गुंजाइश नहीं. अगर वह आप से सच में प्यार करता है तो उसे यह जानते हुए फोर्स तो बिलकुल नहीं करना चाहिए.

आप उस से क्लीयर बात करें कि सैक्सुअल इंटीमेसी का मतलब उस के लिए क्या है और वह आप दोनों के रिलेशनशिप के बारे में क्या सोचता है. यह जानें कि वह जब भी आप से बात करता है तो उस की बातों में सैक्स का जिक्र या इसी से जुड़ी बातें कितनी रहती हैं. बात करने के तरीके को नोट करें. वह आप से मिलने के लिए अधिकतर किन जगहों का चुनाव करता है. इन सब का ध्यान रखें.

अगर वह अधिकतर समय आप से सैक्स को ले कर ही बात करता है तो आप का संदेह कहीं न कहीं ठीक बैठता है कि वह आप को यूज करना चाहता है. ऐसे रिश्ते से निकलना बेहतर है क्योंकि ऐसे लोग कमिटेड नहीं रहते.

इन सब बातों को नोट करेंगी तो आप अपने संदेहों को दूर कर पाएंगी.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

धर्म का धंधा

धर्म का धंधा अपनेआप में धोखेबाजी का है जिस में कल्पित भगवान, देवी, देवता, अवतार बना दिए है और कहां गया है कि इन को पूजोगे तो ही सुखी रहोगे, पैसा आएगा और इस के लिए उन के दर्शन भी करने जाना होगा और वहां दान भी देना होगा. इस महाप्रचार का लाभ अब ही नहीं सदियों से चोरउचक्के भी उठाने लगे हैं. चारधाम यात्रा का बड़ा गुणगान किया गया है और उत्तराखंड की कमजोर पहाडिय़ों पर चौड़ी सडक़ें, होटल, धर्म यात्राएं, ढांबे, पाॄकगे, एम्यूजमैंट सैंटर, रोय वे बनने लगे हैं. अब यहां ले जाने के लिए फर्जी ट्रैवल एजेंसियों भी इंटरनेट पर छा गई हैं.

बहुत सी ट्रैवल एजेंसियां बहुत सस्ते पैकेज देने लगी हैं और एक बार पैसा अकाउंट में आया नहीं कि वे गायब. चारधाम की भव्य तस्वीरों, देवीदेवताओं की मूॢतयां, संस्कृत क्लोकों व मंत्रों से भरपूर ये वैवसाइटें शातिर लोग बनाते है और आमतौर पर खुद को किसी संतमहंत का शिष्य बनाते हैं. जिन्हें वैसे ही मूर्ख बनाना आसान है, वे सस्ते पैकेज के चक्कर में और आसानी से मूख बन रहे हैं.

अब यह काम इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है कि पुलिस भी सिर्फ चेतावनी देने के अलावा कुछ नहीं कर सकती. इंटरनेट पर जाओ, गूगल खर्र्च करो तो इन के एड वाले रिजल्ड सब से पहले आ जाते हैं, गूगल को पैसे लेने से मतलब और वह कमी भी विज्ञापनदाता की बैकग्राउंड चैक नहीं करता. यह काम यूजर का है. यूजर की जाति गुम है नई को वह चारधाम यात्रा कर के पुण्य कमा कर अपना वर्तमान और भविष्य बिना काम किए  गारंटिड करना चाहता है, वह जल्दी ही झांसे में आ जाता है और जब स्टेशन या बस स्टैंड पर सामान व परिवार के साथ पहुंचता है तो पता चलता है कि फंस गया.

इन फंसने वालों से लंबीचौड़ी सहानुभूति नहीं हो सकती क्योंकि जो हमेशा फंसने को तैयार रहते है, उन्हें कोई समझा भी कैसे सकता है. तो लाखों में छपी तस्वीर से पैसा मिलने की आशा करते हैं वे भला कब और कैसे उम्मीद करेंगे कि इंटरनेट की स्क्रीन पर जहां देवीदेवताओं की तस्वीरें हैं, भव्य मंदिर दिख रहे हैं, निर्मल जल बह रहा है, वहां नकली होटलों के फोटो हैं, नकली रिव्यू हैं, झूठे वादे हैं. ये बेवकूफ तो शिकार होने का निमंत्रण खुलेआम देते हैं. अब घर्म के दुकानदार उन्हें लूटें या दुकानदारों की आड़ में शातिर, क्या फर्क पड़ता है.

कंबल ओढ़ो, महसूस करो ठंड है

अयोध्या जा कर ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाने का समय आ गया है. बेहतर जीवन जीने लायक कामधाम रहा नहीं. नौकरियों की इच्छा वैसे ही देश के युवा पहले ही छोड़ चुके हैं, सो अब उन्होंने काम के लिए बाहर निकलना भी बंद कर दिया है. सोशल मीडिया पर धर्म के मैसेज, ‘मातारानी पाप लगाएगी अगर आगे 10 लोगों को फौरवोर्ड नहीं किया तो..’ के डर से युवाओं में पहले ही पूरे दिन व्यस्तता बनी रहती है, इसलिए धार्मिक मैसेज ठेलनेठिलाने का काम जोरों पर है. सुहागा यह कि मंदिरमसजिद के धार्मिक विवादों ने हर दंगाई हाथ को सशक्त करने का काम किया है और वे रोजगार संपन्न सा महसूस कर रहे हैं.

भई, टीवी पर धर्म की बहस से दालरोटी न सही, नफरत तो भरपूर मिल ही रही है. इस आध्यात्मिक मन को और चाहिए भी क्या? भूखप्यास तो भौतिक सुख हैं, इस से तो ध्यान भटकता है, असल जरूरत तो धर्म है, जो जातिवाद सिखाएगा, नफरत सिखाएगा, भेदभाव सिखाएगा, हिंसा सिखाएगा. अब बताओ अपनी संस्कृति न सीखें? इसलिए बहुत से युवा दंगाई बने फिर रहे हैं और बहुत उसी राह पर हैं. मानो तो 45 डिग्री की इस गरमी में मोटा कंबल ओढ़ो और सोचो कि ठंड पड़ रही है, क्योंकि भारत के युवाओं को इस बेरोजगारी युग में दंगाई वाले रोजगार का अभ्यास और आभास हर दिन हो रहा है.

आप पूछेंगे कि धर्म को ले कर इतनी मीठी बातें क्यों कही जा रही है? भई, हम कुछ नहीं कह रहे, रोजरोज के ऊलजलूल विवाद आप के सामने हैं. हम तो मुद्दे पर बात करेंगे. मुद्दा यह है कि भारतीय रेलवे ने बीते 6 सालों में 72 हजार से अधिक पदों को ख़त्म कर दिया है. उपलब्ध दस्तावेजों के हिसाब से ख़त्म किए गए पद ग्रुप सी और डी के हैं. रेलवे का कहना है कि इन पदों को समाप्त किया गया क्योंकि अब आधुनिक तकनीक आ गई है, इसलिए अब इन पदों पर लोगों की जरूरत नहीं है.

अब समस्या यह है कि इन पदों में एक अच्छीखासी संख्या दलितपिछड़ों की रहती है. इन पदों पर ही सब से ज्यादा भरतियां निकलती भी हैं, दलितपिछड़े सब से ज्यादा रेलवे की इस श्रेणी के लिए कम्पीट करते हैं. यही नौकरियां हैं जिन में पहुंच कर वे समाज में बराबरी का दम भरा करते हैं. तकनीक तो आएगी ही, तकनीक और विज्ञान का काम इंसान को राहत देना है, उसे बेरोजगार करना तो पूंजीवादी और अब सरकारी काम हो चला है. अब समस्या यह आ गई है कि दलितपिछड़े क्या करें, जो अपनी पुरानी सी जिंदगी जी रहे हैं. खैर, यह सोचना अब सरकार का काम नहीं है. वह अलग बात है कि दलितपिछड़ों के लिए भी इस समस्या का बंदोबस्त सरकार ने अच्छे से किया है. ज्ञानवापी मसजिद विवाद पौपकौर्न के साथ रोज टीवी पर चल ही रहा है, कुछ दिन बाद तेजोमहल और विष्णु स्तंभ भी टाइमपास के लिए आ ही जाएंगे.

परिवार: मां की जिम्मेदारी अनमोल

मां की जगह कोई नहीं ले सकता. मां ऐसी दौलत है जो अनमोल है. जिस के पास यह दौलत है वह सब से धनी है. जन्म से ही बच्चा मां को पहचानने लगता है क्योंकि उस के दिल की धड़कन मां की धड़कन से मिलती है. यही वजह है कि बच्चे की किसी मुश्किल घड़ी में मां को सब से पहले उस का एहसास हो जाता है. चाहे सैलिब्रिटी मां हो या साधारण मां, हर मां में वही प्यार, दुलार, अपनापन समाया रहता है जिस का वर्णन करना आसान नहीं.

मांबेटी का रिश्ता बहुत ही प्यारा रिश्ता है

बेटाबेटा करती हैं और कितनी ही औरतें गर्भ में बेटी को जान से मार डालती हैं. एक बेटी मां के जितना करीब होती है शायद कोई और नहीं. बातें शेयर करना, एकजैसे कपड़ेगहने पहनना सबकुछ एकजैसा होता है.

कुछ मांएं अपनी सब बातें बेटी से शेयर करती हैं तो कोई कुछ बातें अपनी सहेलियों के साथ शेयर करना पसंद करती हैं, पर जब बेटी शादीशुदा हो जाती हैं उसे मां की सारी बातें सम?ाने में आसानी होती है. फिर जहां जेनरेशन गैप होता है वहां बच्चे मां की बातों को गंभीरता से नहीं ले पाते. उन्हें अजीब लगता है. आज की बेटियां जल्दी गुस्सा भी हो जाती हैं और वह गुस्सा बाप पर उतरेगा या मां पर, कहा नहीं जा सकता.

मदर्स डे तो एक तरह से दीवाली और करवाचौथ से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. इस दिन की एक विशेष खासीयत है जो एक मां को दासी या देवी से अलग बनाती है.

मां के साथ रह कर बातचीत करना, एकदूसरे की भावना को सम?ाना प्रमुख है. मां की आर्थिक स्थिति सम?ाना तो बहुत जरूरी है. कई बार जब मां बेटों को ज्यादा भाव दे तो बेटियों को कठिनाई होती है कि मां को कैसे दुलारें. अगर संपत्ति मां के नाम हो तो कई भाई मां को बेटी से मिलने नहीं देते कि कहीं वह संपत्ति अपने नाम न करा ले.

एक मेधावी बेटी की मां का सीना ज्यादा चौड़ा होता है, इसलिए मांबेटी के रिश्ते में बेटी की पढ़ाई पर कहीं कोई आंच नहीं आनी चाहिए. मां पार्टी में जाए तो वहां बेटी की प्रशंसा सुनना मां के लिए सब से ज्यादा सुखदायी होता है. बेटी को सही राह का ज्ञान हो, इसलिए उसे पढ़ते रहने की सलाह दी जानी चाहिए. वह मोबाइल में ही न घुसी रहे.

आज की मां को हमेशा बेटी को आजादी देनी चाहिए. उस से कहें कि तुम हर बात खुद सीखो और हमेशा खुश रहो, कैरियर को खुद चुनो, बौयफ्रैंड खुद चुनो. हां, जीवन में कभी तनाव हो तो मां संभाले और अगर बेटी गलत रास्ते पर जा रही हो तो उसे सही तरफ आगे ले जाना भी मां का काम है. भाई, बहन या बहनें आपस में कभी ना न कहें. यह शिक्षा देना मां का काम है. अगर किसी बेटी के साथ दूसरे की अनबन रहे तो दोनोंतीनों के बीच सम?ाते टैक्टफुली कराने चाहिए.

कुछ बेटियां चाहती हैं कि अपनी चीज न दें जबकि दूसरे की ले लें. वे हमेशा एकदूसरे से आगे रहना चाहती हैं और यह बात आपस में तकरार को जन्म देती है जिस पर मांएं अकसर मनाने के लिए आगे आती हैं.

वे साल मांओं के लिए बड़े चुनौतीपूर्ण होते हैं जब बेटियों का अपना कैरियर चढ़ाव पर होता है. पिता ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते और बेटी के लिए समस्याएं खड़ी हो जाती हैं. हर बच्चे को अपना दोस्त चुनने की आजादी हो पर मांएं बच्चे से उस के दोस्त के बारे में चर्चा कर अपनी राय अवश्य दें. बेटी के दोस्त, चाहे लड़कियां हों या लड़के, मां से मिल अवश्य लें.

आजकल के मातापिता बच्चों से कुछ अधिक उम्मीद रखते हैं?

पहले महिलाओं को घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी, आज है, इसलिए उम्मीदें भी बढ़ी हैं. बेटी के साथ मातापिता का हमेशा दोस्ताना अंदाज होना चाहिए ताकि बेटी भी अपनी किसी बात को मां से बांट सके. जरूरत से अधिक रोकटोक बगावत को जन्म देती है. जरूरत से ज्यादा हैलिकौप्टर मौम बनना भी गलत है.

अपना घर- भाग 2: आखिर विजय के घर में अंधेरा क्यों था?

जब कभी सुरेखा विजय की बांहों में होती तो अचानक ही एक विचार से कांप उठती थी कि अगर किसी दिन विजय को विकास के बारे में पता चल गया तो क्या होगा? क्या विजय उसे माफ कर देगा. नहीं, विजय कभी उसे माफ नहीं करेगा क्योंकि सभी मर्द इस मामले में एकजैसे होते हैं. तब क्या उसे बता देना चाहिए? नहीं, वह खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मारे?

आज विजय को पता चल गया और जिस बात का उसे डर था, वही हुआ. पर वह शक, नफरत और अनदेखी के बीच कैसे रह सकती थी?

सुबह सुरेखा मम्मीपापा के पास जा पहुंची थी.

सुरेखा के कमरे से निकल जाने

के बाद भी विजय का गुस्सा बढ़ता

ही जा रहा था. वह सोफे पर पसर गया. धोखेबाज… न जाने खुद को क्या समझती है वह? अच्छा हुआ आज पता चल गया, नहीं तो पता नहीं कब तक उसे धोखे में ही रखा जाता?

2-3 दिन में ही पासपड़ोस में सभी को पता चल गया. काम वाली बाई कमला ने साफसाफ कह दिया, ‘‘देखो बाबूजी, अब मैं काम नहीं करूंगी. जिस घर में औरत नहीं होती, वहां मैं काम नहीं करती. आप मेरा हिसाब कर दो.’’

विजय ने कमला को समझाते हुए कहा, ‘‘देखो, काम न छोड़ो, 100-200 रुपए और बढ़ा लेना.’’

‘‘नहीं बाबूजी, मेरी भी मजबूरी है. मैं यहां काम नहीं करूंगी.’’

‘‘जब तक दूसरी काम वाली न मिले, तब तक तो काम कर लेना कमला.’’

‘‘नहीं बाबूजी, मैं एक दिन भी काम नहीं करूंगी,’’ कह कर कमला चली गई.

4-5 दिन तक कोई भी काम वाली बाई न मिली तो विजय के सामने बहुत बड़ी परेशानी खड़ी हो गई. सुबह घर व बरतनों की सफाई, शाम को औफिस से थका सा वापस लौटता तो पलंग पर लेट जाता. उसे खाना बनाना नहीं आता था. कभी बाजार में खा लेता. दिन तो जैसेतैसे कट जाता, पर बिस्तर पर लेट कर जब सोने की कोशिश करता तो नींद आंखों से बहुत दूर हो जाती. सुरेखा की याद आते ही गुस्सा व नफरत बढ़ जाती.

रात को देर तक नींद न आने के चलते विजय ने शराब के नशे में डूब

कर सुरेखा को भुलाना चाहा. वह जितना सुरेखा को भुलाना चाहता, वह उतनी ज्यादा याद आती.

एक रात विजय ने शराब के नशे में मदहोश हो कर सुरेखा का मोबाइल नंबर मिला कर कहा, ‘‘तुम ने मुझे जो धोखा दिया है, उस की सजा जल्दी ही मिलेगी. मुझे तुम से और तुम्हारे परिवार से नफरत है. मैं तुम्हें तलाक दे दूंगा. मुझे नहीं चाहिए एक चरित्रहीन और धोखेबाज पत्नी. अब तुम सारी उम्र विकास के गम में रोती रहना.’’

उधर से कोई जवाब नहीं मिला.

‘‘सुन रही हो या बहरी हो गई हो?’’ विजय ने नशे में बहकते हुए कहा.

‘यह क्या आप ने शराब पी रखी है?’ वहां से आवाज आई.

‘‘हां, पी रखी है. मैं रोज पीता हूं. मेरी मरजी है. तू कौन होती है मुझ से पूछने वाली? धोखेबाज कहीं की.’’

उधर से फोन बंद हो गया.

विजय ने फोन एक तरफ फेंक दिया और देर तक बड़बड़ाता रहा.

औफिस और पासपड़ोस के कुछ साथियों ने विजय को समझाया कि शराब के नशे में डूब कर अपनी जिंदगी बरबाद मत करो. इस परेशानी का हल शराब नहीं है, पर विजय पर कोई असर नहीं पड़ा. वह शराब के नशे में डूबता चला गया.

एक शाम विजय घर पर ही शराब पीने की तैयारी कर रहा था कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. विजय ने बुरा सा मुंह बना कर कहा, ‘‘इस समय कौन आ गया मेरा मूड खराब करने को?’’

विजय ने उठ कर दरवाजा खोला तो चौंक उठा. सामने उस का पुराना दोस्त अनिल अपनी पत्नी सीमा के साथ था.

‘‘आओ अनिल, अरे यार, आज इधर का रास्ता कैसे भूल गए? सीधे दिल्ली से आ रहे हो क्या?’’ विजय ने पूछा.

‘‘हां, आज ही आने का प्रोग्राम बना था. तुम्हें 2-3 बार फोन भी मिलाया, पर बात नहीं हो सकी.’’

‘‘आओ, अंदर आओ,’’ विजय ने मुसकराते हुए कहा.

विजय ने मेज पर रखी शराब की बोतल, गिलास व खाने का सामान वगैरह उठा कर एक तरफ रख दिया.

अनिल और सीमा सोफे पर बैठ गए. अनिल और विजय अच्छे दोस्त थे, पर वह अनिल की शादी में नहीं जा पाया था. आज पहली बार दोनों उस के पास आए थे.

विजय ने सीमा की ओर देखा तो चौंक गया. 3 साल पहले वह सीमा से मिला था अगरा में, जब अनिल और विजय लालकिला में घूम रहे थे. एक बूढ़ा आदमी उन के पास आ कर बोला था, ‘‘बाबूजी, आगरा घूमने आए हो?’’

‘‘हां,’’ अनिल ने कहा था.

‘‘कुछ शौक रखते हो?’’ बूढ़े ने कहा.

वे दोनों चुपचाप एकदूसरे की तरफ देख रहे थे.

‘‘बाबूजी, आप मेरे साथ चलो. बहुत खूबसूरत है. उम्र भी ज्यादा नहीं है. बस, कभीकभी आप जैसे बाहर के लोगों को खुश कर देती है,’’ बूढ़े ने कहा था.

वे दोनों उस बूढ़े के साथ एक पुराने से मकान पर पहुंच गए. वहां तीखे नैननक्श वाली सांवली सी एक खूबसूरत लड़की बैठी थी.

अनिल उस लड़की के साथ कमरे में गया था, पर वह नहीं.

वह लड़की सीमा थी, अब अनिल की पत्नी. क्या अनिल ने देह बेचने वाली उस लड़की से शादी कर ली? पर क्यों? ऐसी क्या मजबूरी हो गई थी जो अनिल को ऐसी लड़की से शादी करनी पड़ी?

‘‘भाभीजी दिखाई नहीं दे रही हैं?’’ अनिल ने विजय से पूछा.

‘‘वह मायके गई है,’’ विजय के चेहरे पर नफरत और गुस्से की रेखाएं फैलने लगीं.

‘‘तभी तो जाम की महफिल सजाए बैठे हो, यार. तुम तो शराब से दूर भागते थे, फिर ऐसी क्या बात हो गई कि…?’’

‘‘ऐसी कोई खास बात नहीं. बस, वैसे ही पीने का मन कर रहा था. सोचा कि 2 पैग ले लूं…’’ विजय उठता हुआ बोला, ‘‘मैं तुम्हारे लिए खाने का इंतजाम करता हूं.’’

‘‘अरे भाई, खाने की तुम चिंता न करो. खाना सीमा बना लेगी और खाने से पहले चाय भी बना लेगी. रसोई के काम में बहुत कुशल है यह,’’ अनिल ने कहा.

विजय चुप रहा, पर उस के दिमाग में यह सवाल घूम रहा था कि आखिर अनिल ने सीमा से शादी क्यों की?

सीमा उठ कर रसोईघर में चली गई. विजय ने अनिल को सबकुछ सच बता दिया कि उस ने सुरेखा को घर से क्यों निकाला है.

अनिल ने कहा, ‘‘पहचानते हो अपनी भाभी सीमा को?’’

‘‘हां, पहचान तो रहा हूं, पर क्या यह वही है… जब आगरा में हम दोनों घूमने गए थे?’’

‘‘हां विजय, यह वही सीमा है. उस दिन आगरा के उस मकान में वह बूढ़ा ले गया था. मैं ने सीमा में पता नहीं कौन सा खिंचाव व भोलापन पाया कि मेरा मन उस से बातें करने को बेचैन हो उठा था. मैं ने कमरे में पलंग पर बैठते हुए पूछा था, ‘‘तुम्हारा नाम?’’

‘‘यह सुन कर वह बोली थी, ‘क्या करोगे जान कर? आप जिस काम से आए हो, वह करो और जाओ.’

‘‘तब मैं ने कहा था, ‘नहीं, मुझे उस काम में इतनी दिलचस्पी नहीं है. मैं तुम्हारे बारे में जानना चाहता हूं.’

‘‘वह बोली थी, ‘मेरे बारे में जानना चाहते हो? मुझ से शादी करोगे क्या?’

‘‘उस ने मेरी ओर देख कर कहा तो मैं एकदम सकपका गया था. मैं ने उस से पूछा था, ‘पहले तुम अपने बारे में बताओ न.’

‘‘उस ने बताया था, ‘मेरा नाम सीमा है. वह मेरा चाचा है जो आप को यहां ले कर आया है. आगरा में एक कसबा फतेहाबाद है, हम वहीं के रहने वाले हैं. मेरे मातापिता की एक बस हादसे में मौत हो गई थी. उस के बाद मैं चाचाचाची के घर रहने लगी. मैं 12वीं में पढ़ रही थी तो एक दिन चाचा ने आगरा ला कर मुझे इस काम में धकेल दिया.

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