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कसक- भाग 1: क्यों अकेले ही खुश थी इंदु

संगीता अग्रवाल

चेहरे पर मुसकान, मीठी वाणी, मेहनती और बेहद खूबसूरत… सभी गुणों से परिपूर्ण इंदू एक नेक इंसान थी. पर समाज के हिसाब से उस का समय बहुत ही खराब था क्योंकि उम्र के 40 सावन पार कर लेने के बाद भी आज तक उस की शादी नहीं हुई थी. इंदू देश की राजधानी दिल्ली में एक न्यूज चैनल में बड़ी जिम्मेदारी की पोस्ट पर थी. न्यूज चैनल में संपादक के पद तक पहुंचने तक के सफर के विषय में इंदू सोचने लगी कि कितना सुंदर था उस का बचपन जहां वह शौकिया दर्पण के सामने न्यूज एंकर की नक्ल किया करती थी. एक चुलबुली लड़की जो 3 भाइयों में अकेली बहन थी और पूरे परिवार की लाड़ली. टैलीविजन पर दिखने की उस की चाहत अब उसे पत्रकारिता की ओर ले जा रही थी. स्कूल से अब वह कालेज में आ गई थी और पहले से ज्यादा खूबसूरत दिखने लगी थी. अपने रेशमी बाल, गुलाबी गाल और आकर्षक आवाज के कारण कालेज में इंदू काफी लोकप्रिय थी. कालेज के कई अच्छे लड़के इंदू को मन ही मन बहुत पंसद करते थे. उन में से एक था अमन, जो इंदू को बेहद पंसद करता था. लेकिन उस ने कभी भी अपने प्यार का इजहार इंदू से नहीं किया.

अमन भी इंदू की ही तरह प्रतिभाशाली था. उस की कविताएं और मधुर आवाज कालेज की लड़कियों में बहुत लोकप्रिय थी, पर उस का मन था जो केवल किसी न किसी तरह इंदू के इर्दगिर्द ही अपनी खुशी तलाशता रहता था. इंदू की नजर में अमन एक अच्छा मित्र, एक अच्छा कवि और एक नेक इंसान था. इस से ज्यादा इंदू ने कभी उस के बारे में कुछ नहीं सोचा. कालेज के हर कार्यक्रम में जहां लड़कियों में इंदू को हमेशा प्रथम पुरस्कार मिलता, वहीं अमन भी अपनी कविताओं से सब को दीवाना बना देता था. कालेज की पढ़ाई अब पूरी होने वाली थी, कालेज का अंतिम साल चल रहा था. अमन सोचने लगा कि कैसे वह अपने मन की बात इंदू तक पहुंचाए?

कालेज का विदाई समारोह हो रहा था. सभी छात्र और अध्यापक आपस में मिल रहे थे. इंदू की सहेली प्रिया ने कई बार उसे अमन का नाम ले कर अमन का इंदू के प्रति प्यार समझाने की कोशिश की थी. पर उस का मन कितना नासमझ था जो उस समय अमन के प्यार और अपनी सहेली के इशारे को समझ नहीं सका.

आईफोन में फंसा इश्क

सतपुड़ा की पहाडि़यों से घिरे मध्य प्रदेश के अमला को मध्य प्रदेश का शिमला भी कहा जाता है. 5 जुलाई,
2022 की सुबह अमला पुलिस स्टेशन के टीआई संतोष पंद्रे पुराने केस की फाइल को देख रहे थे, तभी केबिन के बाहर से आई आवाज ने उन का ध्यान फाइल से हटा दिया.

‘‘साब, क्या मैं अंदर आ सकती हूं?’’ दरवाजे पर एक अधेड़ उम्र की महिला अपने पति के साथ खड़ी थी.
उन्हें देखते ही टीआई ने कहा, ‘‘आइए, अंदर आ जाइए, कहिए कैसे आना हुआ?’’ ‘‘साब, मेरा नाम लता काचेवार है. मेरे पति इस दुनिया में नहीं हैं. मेरा बेटा मानसिक रूप से बीमार है. हम लोग अमला नगर परिषद के वार्ड नंबर 10 में रहते हैं. मेरी 19 साल की बेटी मुसकान 3 जुलाई की सुबह बाजार से जरूरी सामान लेने के लिए घर से निकली थी, मगर अभी तक घर नहीं लौटी है,’’ यह कहते हुए लता फफक कर रो पड़ी.

टीआई ने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा, ‘‘आप चिंता मत कीजिए, पुलिस आप की हरसंभव मदद करेगी. मुसकान का हुलिया बताइए और अगर उस की कोई फोटो हो तो मुझे दे दीजिए. पुलिस उसे जल्द ही खोज निकालेगी.’’‘‘साब, मुसकान के हाथ पर 3 स्टार वाला एक टैटू बना हुआ है और उस के बाल सुनहरे हैं और ये रही उस की फोटो,’’ लता ने अपनी बेटी की फोटो पर्स से निकालते हुए कहा.टीआई संतोष पंद्रे ने फोटो पर नजर डाली तो सुनहरे बालों की खूबसूरत नाकनक्श की मुसकान को देख क र समझ गए कि उम्र के इस मोड़ पर अकसर लड़केलड़कियों के कदम फिसल ही जाते हैं.

‘‘यदि तुम्हें किसी पर शक हो तो खुल कर बताओ, पुलिस तुम्हारे साथ है.’’ टीआई ने कहा.
‘‘साब, मेरी बेटी कभी घर और दुकान के अलावा कहीं नहीं जाती थी. किसी लड़के के साथ उस की दोस्ती भी नहीं थी. साब, पिछले 2 सालों से वह अमला के कृष्णा ज्वैलर्स के यहां सेल्सगर्ल का काम कर रही है.’’ लता ने टीआई को बताया.

टीआई ने मुसकान की जल्द ही पतासाजी का आश्वासन देते हुए लता को घर जाने को कहा.
लता जानती थी कि मुसकान अकसर खरीददारी के लिए कृष्णा ज्वैलर्स के मालिक पुनीत सोनी के साथ नागपुर आतीजाती थी और कई बार काम के सिलसिले में वहीं होटल में रुक भी जाती थी. लेकिन अब तो उस का पता ही नहीं चल पा रहा था.

दूसरे दिन सुबह तक मुसकान न तो घर लौटी और न ही उस से फोन पर संपर्क हो पाया तो लता ने कृष्णा ज्वैलर्स के मालिक पुनीत सोनी को फोन लगा कर बेटी के संबंध में जानकारी ली.पुनीत ने लता को बताया कि मुसकान तो कल दुकान पर आई ही नहीं थी. इतना ही नहीं, पुनीत ने यह भी बताया कि वह 2-3 दिन छुट्टी पर जाने की बात भी कह रही थी.

पुनीत की बातें सुन कर लता के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मुसकान कहां चली गई.उधर पुलिस ने मुसकान की गुमशुदगी दर्ज करने के बाद उस की पतासाजी के लिए सोशल मीडिया पर उस की सूचना प्रसारित कर दी. इस के अलावा विभिन्न थानों में भी उस की फोटो भेज दी. मगर मुसकान के बारे में कोई भी सुराग पुलिस के हाथ नहीं लगा.

अमला शहर की सीमा महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से भी लगी हुई हुई है. ऐसे में आपराधिक घटनाओं की सूचनाओं के आदानप्रदान के लिए पुलिस विभाग का अंतरराज्यीय वाट्सऐप ग्रुप बना हुआ है.
7 जुलाई, 2022 को उसी वाट्सऐप ग्रुप में नागपुर काटोल पुलिस ने एक नौजवान युवती की लाश मिलने की पोस्ट शेयर की तो बैतूल जिले की एसपी सिमाला प्रसाद की नजर उस पोस्ट पर ठहर गई.

वह लाश महाराष्ट्र के नागपुर के पास काटोल पुलिस थाने के अंतर्गत चारगांव इलाके में ईंट भट्ठे के पास मिली थी. वह पीले रंग की टीशर्ट पहने थी, जिस पर अंगरेजी में लव लिखा हुआ था. उस के हाथ पर 3 स्टार का टैटू बना हुआ था. युवती के सिर पर हमले की वजह से चेहरे की पहचान आसानी से नहीं हो पा रही थी.एसपी ने यह पोस्ट अमला पुलिस के सोशल मीडिया एकाउंट पर शेयर की तो अमला पुलिस थाने के टीआई संतोष पंद्रे ने फोटो को गौर से देखा. मुसकान की मां लता ने उन्हें जो फोटो दिया था, उस से उस की कदकाठी काफी मेल खा रही थी.

टीआई ने मुसकान की मां लता को थाने बुला कर वह फोटो दिखाई तो उस के होश उड़ गए. पीली टीशर्ट और हाथ पर बने टैटू को देख कर वह जोर से चीखी, ‘‘मेरी बेटी कहां है और उस का ये हाल किस ने कर दिया?’’इस के बाद पुलिस लता को ले कर नागपुर के काटोल पहुंच गई. काटोल पुलिस थाने के टीआई महादेव आचरेकर ने लता को युवती की लाश के कपड़े, अंगूठी और मोबाइल फोन दिखाया तो उस ने बताया कि ये सब उस की बेटी मुसकान के हैं.

महाराष्ट्र के किसी भी थाने में इस तरह के हुलिए वाली किसी लड़की की गुमशुदगी दर्ज नहीं थी.
इस वजह से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि युवती शायद पड़ोसी राज्यों में से किसी शहर की रहने वाली हो.
इस पर नागपुर क्राइम ब्रांच ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों की पुलिस से संपर्क किया और फोटो सोशल मीडिया पर शेयर कर दी. पोस्टमार्टम के बाद लाश की शिनाख्त न होने से काटोल पुलिस ने लाश दफना दी थी.

नागपुर (ग्रामीण) पुलिस के काटोल थाने में मुसकान की हत्या का मामला कायम कर लता से पूछताछ की और मुसकान के मोबाइल में मिले फोटो के आधार पर यह बात सामने आई कि मुसकान का प्रेम प्रसंग कृष्णा ज्वैलर्स के मालिक पुनीत सोनी से चल रहा था. लिहाजा काटोल पुलिस केस की जांच के लिए अमला आ गई.पुलिस ने पुनीत सोनी से मुसकान की हत्या के संबंध में पूछताछ की तो पहले तो वह पूरे घटनाक्रम से अंजान बना रहा. पुलिस ने जब उस के मोबाइल की काल डिटेल्स रिपोर्ट सामने रखी तो वह बगलें झांकने लगा.

पुलिस ने उस के शोरूम पर काम करने वाले 17 साल के किशोर अन्नू से पूछताछ की तो वह डर गया और उस ने पल भर में ही पूरे रहस्य से परदा हटा दिया. पुलिस टीम ने पुनीत से सख्ती से पूछताछ की तो मुसकान की हत्या की सारी कहानी सामने आ गई.अमला के सरदार वल्लभभाई पटेल वार्ड में रहने वाली मुसकान महत्त्वाकांक्षी थी, मगर परिवार की माली हालत के चलते उसे हायर सेकेंडरी परीक्षा पास करते ही सेल्सगर्ल की नौकरी करनी पड़ी.

कोरोना काल में मुसकान के पिता की मौत हो जाने के बाद परिवार की माली हालत खराब हो गई थी. मुसकान का बड़ा भाई आपराधिक किस्म का था. आए दिन उस के झगड़े होते रहते थे. इसी के चलते पिछले साल उस का किसी ने मर्डर कर दिया था.बड़े भाई की मौत के बाद घर चलाना मुश्किल हो गया था. ऐसे में मुसकान कृष्णा ज्वैलर्स शोरूम पर सेल्सगर्ल की नौकरी करने लगी.

मुसकान को कृष्णा ज्वैलर्स शोरूम पर काम करते हुए बमुश्किल महीना भर ही बीता था, मगर इस एक महीने में ही उसे एक बात साफ समझ में आ गई थी कि शोरूम के मालिक पुनीत की नजरें उसे ही घूरा करती हैं. 28 साल का पुनीत सोनी अपने पिता सुनील सोनी की एकलौती संतान होने के साथ हैंडसम भी था. मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में अमला नगर परिषद की गणेश कालोनी में रहने वाले पुनीत का ज्वैलरी का कारोबार आसपास के इलाकों में खूब चलता है.

19 साल की खूबसूरत मुसकान जब पुनीत के पास काम मांगने आई तो वह पहली ही नजर में पुनीत के दिल में उतर गई. वैसे तो पुनीत शादीशुदा होने के साथ एक बेटे का बाप भी था, लेकिन खूबसूरत लड़की को अपने सामने पा कर उस की चाहत इस कदर बढ़ चुकी थी कि वह अपने आप को रोक नहीं सका.
एक दिन शोरूम पर जब ग्राहक नहीं थे तो पुनीत ने अपने दिल का हाल मुसकान से कह ही दिया, ‘‘मुसकान, तुम बहुत खूबसूरत हो, तुम्हें देखता हूं तो मैं अपने दिल को काबू में नहीं रख पाता हूं.’’

कम उम्र में घरपरिवार के खर्च की जिम्मेदारी संभालने वाली मुसकान भी उस के प्यार के इजहार को नकार न सकी. ज्वैलरी शोरूम पर ही उन का प्यार परवान चढ़ने लगा.पुनीत मुसकान की हर ख्वाहिश और जरूरतों का खयाल रखने लगा. पुनीत मुसकान को अपने प्यार के जाल में फंसा चुका था. वह आए दिन मुसकान को तरहतरह के गिफ्ट की पेशकश करता था. दुकान में 17 साल का एक लड़का अन्नू (परिवर्तित नाम) भी काम करता था. पुनीत और मुसकान के बीच मीडिएटर का काम अन्नू करता था.
पुनीत मुसकान के साथ संबंध बनाने को उतावला हो रहा था, मगर मुसकान अपने मातापिता के डर से इस के लिए राजी नहीं थी.

पिछले साल दीपावली के पहले की बात है. एक दिन मौका पा कर पुनीत मुसकान के घर जा कर उस की मां से बोला, ‘‘मांजी दीपावली के बाद सीजन शुरू होने वाला है. ज्वैलरी की खरीदारी के लिए मुसकान को नागपुर साथ ले जाना है, मुसकान को ग्राहकों की पसंदनापसंद का खूब अनुभव हो गया है.’’
बेटी की तारीफ सुन कर लता ने यह सोच कर हामी भर दी कि आखिर पुनीत उस का मालिक जो ठहरा, उस के साथ जाने में हर्ज ही क्या है.

मुसकान के घर वालों की सहमति मिलते ही एक दिन कार से पुनीत और मुसकान नागपुर के लिए चल पड़े. रास्ते में कार के सफर के दौरान उन्होंने खूब मस्ती की. नागपुर पहुंच कर दिन भर ज्वैलरी की खरीदारी की और पुनीत ने मुसकान को नए स्टाइलिश कपड़े दिलाए तो उस की खुशी दोगुनी हो गई.
मुसकान अपने आप पर फख्र कर रही थी कि पुनीत उस का कितना खयाल रखता है. शाम को एक होटल में कमरा ले कर दोनों ठहर गए. कमरे में पहुंचते ही पुनीत के सब्र का बांध टूट चुका था. उस ने मुसकान को अपनी बाहों में भरते हुए कहा, ‘‘तुम्हारा प्यार पाने के लिए मैं कब से तड़प रहा था मेरी जान, आज मुझे अपनी प्यास बुझा लेने दो.’’

मुसकान ने भी हौले से पुनीत के सिर पर हाथ घुमाते हुए कहा, ‘‘थोड़ा सब्र करो. मैं तो पूरी रात तुम्हारे साथ हूं. मैं भी अपना सब कुछ तुम्हें लुटा दूंगी.’’प्यार के जोश और वासना की आग में 2 जिस्म कब एक जान हो गए, उन्हें पता ही नहीं चला. रात भर होटल में अपनी हसरतों को पूरा करने के बाद दूसरे दिन सुबह दोनों अमला पहुंच गए.

एक बार शुरू हुआ वासना का खेल धीरेधीरे रफ्तार पकड़ चुका था. पुनीत ज्वैलरी की खरीदारी का बहाना बना कर मुसकान को अकसर ही नागपुर और दूसरे शहरों में ले जाने लगा.मुसकान भी यह बात समझ चुकी थी कि शादीशुदा जिंदगी जीने वाला उस का प्रेमी पुनीत केवल उस के जिस्म से ही खेल रहा था, लिहाजा वह भी पुनीत से अपनी हर जायजनाजायज मांग रखने लगी थी.धीरेधीरे वह पुनीत को ब्लैकमेल भी करने लगी. पुनीत यदि मुसकान की मांग पूरी करने में आनाकानी करता तो वह उसे बदनाम करने की धमकी देने लगती.

देखते ही देखते मुसकान की लाइफस्टाइल काफी मौडर्न हो चुकी थी. महंगे कपड़े और मोबाइल का शौक उस के सिर चढ़ कर बोल रहा था. बदनामी के डर से मुसकान की हर डिमांड पूरी करना पुनीत की मजबूरी बन चुकी थी.जून महीने के अंतिम सप्ताह की बात है. रात के करीब 9 बजे जब मुसकान अपने घर जाने लगी तो उस ने पुनीत से कहा, ‘‘मेरा मोबाइल बारबार हैंग हो जाता है, मुझे एक आईफोन दिला दो.’’
‘‘चलो देखते हैं, अभी तो घर निकलो बाद में बात करते हैं.’’ पुनीत ने उस समय तो बात टालने के मकसद से यह कह कर बात खत्म कर दी थी.

धीरेधीरे पुनीत को यह बात समझ आ गई थी कि दुकान की आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा वह मुसकान पर खर्च कर रहा है. पुनीत यह सोच कर हैरान था कि इसी तरह चलता रहा तो किसी दिन उस का ज्वैलरी का कारोबार ठप्प हो जाएगा.प्रेमिका की आए दिन बढ़ने वाली डिमांड उस की परेशानी का सबब बन चुकी थी. इस बार 60-70 हजार के आईफोन की डिमांड से पुनीत मन ही मन तिलमिला गया था. उसे अब रातरात भर नींद नहीं आ रही थी.

आखिर में पुनीत ने मुसकान से छुटकारा पाने का कठोर निर्णय ले लिया था. अपनी इस योजना में उस ने दुकान पर काम करने वाले नौकर अन्नू को रुपयों का लालच देते हुए शामिल कर लिया था.
योजना के मुताबिक पुनीत ने 3 जुलाई की सुबह अचानक मुसकान को फोन किया, ‘‘हैलो मुसकान, जल्दी से तैयार हो जाओ, आईफोन लेने के लिए नागपुर चलना है.’’मुसकान आईफोन मिलने की खुशी में पागल हो गई और जल्दी से तैयार हो कर घर से बाहर निकलते हुए मां से केवल इतना ही कह पाई, ‘‘मैं बाजार जा रही हूं, कुछ देर में वापस आती हूं.’’

कुछ ही देर में पुनीत और अन्नू कार ले कर बाजार आ चुके थे. बाजार से मुसकान को कार में बिठा कर वे नागपुर के लिए रवाना हो गए.कार पुनीत ही ड्राइव कर रहा था और मुसकान अगली सीट पर बैठी थी, जबकि पिछली सीट पर बैठा अन्नू मोबाइल पर गेम खेलने का नाटक कर रहा था.कार से सफर के दौरान मुसकान को बीयर की पेशकश की गई, लेकिन उस ने इंकार कर दिया. पुनीत और अन्नू ने मिल कर शराब पी. कुछ ही घंटों में कार मध्य प्रदेश की सीमा से बाहर निकल चुकी थी.

रास्ते में सुनसान जगह पर पुनीत ने कार रोकी और बराबर की सीट पर बैठी मुसकान के गले में हाथ डाल कर प्यार का नाटक करने लगा. इसी दौरान पीछे बैठे हुए अन्नू ने उस का जोर से गला दबा दिया. मुसकान ने जोर से चीखने की कोशिश की, मगर पुनीत ने उस का मुंह हथेली से बंद कर दिया.
कुछ ही देर में जब वह बेहोश हो गई तो दोनों ने उसे कार से बाहर खींच लिया और सड़क पर पड़े पत्थर से उस का सिर कुचल कर मौत के घाट उतार दिया. मुसकान की लाश को सड़क के किनारे लुढ़का कर दोनों कार से अमला वापस आ गए.

पुनीत ने मुसकान की ब्लैकमेलिंग से तंग आ कर उसे प्रदेश के बाहर खत्म करने की योजना इसलिए बनाई ताकि किसी को उस पर शक न हो. मगर पुलिस की नजरों से वह ज्यादा दिन तक बच नहीं सका.
महाराष्ट्र के काटोल पुलिस के टीआई महादेव आचरेकर और मध्य प्रदेश के अमला पुलिस के टीआई संतोष पंद्रे की सूझबूझ से 11 जुलाई को मुसकान की हत्या के राज से परदा हट गया.

महाराष्ट्र पुलिस ने पुनीत सोनी और अन्नू को मुसकान की हत्या के जुर्म में भादंवि की धारा 302 और 201 के तहत दर्ज कर कोर्ट में पेश किया, जहां से पुनीत को नागपुर सैंट्रल जेल और अन्नू को बाल सुधार गृह भेज दिया.

विंटर स्पेशल : बढ़ता प्रदूषण बेऔलाद न कर दे

Writer- स्नेहा सिंह

भारत के कुछ शहर दुनिया में प्रदूषण की रैंकिंग में टौप पर हैं. इस समस्या को गंभीरता से विचारने की सख्त जरूरत है, क्योंकि प्रदूषण न सिर्फ स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों को जन्म दे रहा है बल्कि याद्दाश्त और प्रजनन शक्ति को भी घटा रहा है.

बहुत कम लोगों को पता है कि उच्च वायु प्रदूषण वाले इलाकों में रहने वाली बुजुर्ग महिलाओं को अल्जाइमर यानी याद्दाश्त कमजोर होने की बीमारी हो सकती है. शोध से पता चला है कि प्रदूषित वायु में सांस लेने से महिलाओं के दिमाग में सिकुड़न होती है, जैसा अकसर अल्जाइमर में होता है. वैज्ञानिकों के अनुसार, कम दिमागी वौल्यूम डिमैंशिया और अल्जाइमर के मुख्य कारकों में से एक है. प्रदूषित वायु दिमागी तंत्र में बदलाव पैदा कर नर्व सैल नैटवर्क को बाधित करती है. इस से अल्जाइमर की बीमारी के लक्षण बढ़ते हैं.

वायु प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, यह तो हम सभी जानते हैं, पर यह प्रजनन संबंधित समस्याएं भी खड़ी करता है, इस की जानकारी बहुत कम लोगों को है. प्रदूषित हवा में औक्सीजन की मात्रा बहुत कम होती है, जिस से यह शुक्राणुओं और अंडाणुओं को नुकसान पहुंचा सकती है. अगर कोई अधिक समय तक प्रदूषण में रहता है तो शुक्राणुओं और अंडाणुओं की संख्या को तो नहीं, पर उस की गुणवत्ता निश्चित रूप से प्रभावित हो सकती है. खराब हो रही एयर क्वालिटी इंडैक्स (एक्यूआई) धीरेधीरे बहुत ज्यादा गंभीर मामला बनता जा रहा है, जो फेफड़े की प्रणाली, हृदय और आंखों को प्रभावित करने के साथसाथ हार्मोंस में बदलाव भी लाता है.

प्रदूषण के कारण महिलाओं को बंधत्व का खतरा

महिलाओं का प्रजनन तंत्र वायु प्रदूषण के कारण खतरे में पड़ता जा रहा है. प्रदूषण अंडाणुओं का जहां विकास होता है, उस अंडाशय की कोशिकाओं पर प्रतिकूल असर डालता है. अगर कोई महिला लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संसर्ग में रहती है तो फोलिक्स की गुणवत्ता में ही नहीं, अंडाणुओं के जैनेटिक मेकअप में भी समस्या पैदा हो सकती है.

प्रदूषित हवा में ऐसे तमाम प्रदूषक हैं, जो खासकर प्रजनन संबंधित स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं. इस में माइक्रोंस (पीएम 10) से छोटे सूक्ष्म कण, नाइट्रोजन औक्साइड और सल्फर डायोऔक्साइड का समावेश होता है. ये प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल असर डालते हैं और ये असमय डिलीवरी तक करा सकते हैं.

ये प्रदूषक आईवीएफ ट्रीटमैंट की दर में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं परंतु इस संबंध को स्थापित करने के लिए अभी तक औपचारिक अध्ययन नहीं किया गया है. पर बंधत्व के मामले की संख्या में धीरेधीरे अधिकता देखने को मिल रही है, जो पर्यावरण संबंधित वातावरण में गेटटुगेदर होने के कारण हो सकते हैं.

पुरुषों में देखने को मिल रहा बंधत्व के पीछे का वातावरण

शुक्राणुओं की कोशिकाओं के विकृत होने और कमजोर पड़ने के साथ जुड़े यंत्ररचना एंडोक्राइन डिसरप्टर एक्टिविटी (हार्मोन संबंधित असंतुलन) के रूप में भी जानी जाती है. हम सांस के रूप में जो हवा अंदर लेते हैं, उस में छोटेछोटे कण (मनुष्य के बाल से भी छोटे) होते हैं. जिन में कौपर, जिंक, सीसा आदि होता है और जो एस्ट्रोजनिक और एंटी एंड्रोजनिक होते हैं. अगर इन्हें लंबे समय तक सांस में लिया जाए तो ये टैस्टोस्टेरौन और शुक्राणुओं के कोष के उत्पादन में अवरोध पैदा कर सकते हैं.

इस समस्या के मूल में तथ्य यह है कि इस प्रकार की जहरीली हवा को सांस में लेने से ये शुक्राणुओं को अवनति और शुक्राणुओं के काउंट के गर्भ के लिए आदर्श रूप में जरूरी संख्या की अपेक्षा एक निश्चित स्तर तक नीचे ले जाता है. इतने कम काउंट, गतिशीलता और संकेंद्रण के साथ शुक्राणु फैलोपिन ट्यूब के अंदर पहुंचने के लिए सक्षम नहीं रहते. परिणामस्वरूप, असंख्य प्रयासों के बावजूद जीवनसाथी गर्भ नहीं धारण कर सकता.

टैस्टोस्टेरौन के स्तर में कमी होने से सहवास की इच्छा भी कम हो रही है. इस तरह वैवाहिक जीवन असफल हो जाता है. डीजल का उत्सर्जन और ओजोन के बढ़ रहे स्तर तथा हवा में मिश्रित सल्फर डायोऔक्साइड और छोटेछोटे कण रक्त में रासायनिक प्रतिक्रिया पैदा करते हैं, जिस के कारण मुक्त मूलक (फ्री रैडिकल्स) में वृद्धि होती है, जो प्रजनन की क्षमता रखने वाले पुरुष के भी शुक्राणुओं की गुणवत्ता को परोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं. अधिक वायु प्रदूषण के स्तर के संसर्ग में आने वाले नवजात का कम वजन, कमजोर विकास, नियत समय से पहले प्रसूति और नवजात की मौत होना स्वाभाविक है, जो शुक्राणुओं की खराब गुणवत्ता का परोक्ष परिणाम है.सुरक्षित रहें

पीएम 10 क्षमता वाले सुगंधित हाइड्रोकार्बंस शरीर में हार्मोन संबंधित बदलाव के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार हैं. टैस्टोस्टेरौन और एस्ट्रोजन की अवनति वाले स्तर समागम की इच्छा कम करने के साथसाथ प्रजनन क्षमता को कम करते हैं.

प्रदूषण को पूरी तरह तो टाला नहीं जा सकता, पर जीवनशैली में कुछ बदलाव कर के और खानपान पर नियंत्रण कर के गर्भधारण के लिए आदर्श माने जाने वाले शुक्राणुओं का काउंट उचित स्तर का बनाने के लिए मददगार हो सकता है. ये बताई गई विधि अपनाने से तंदुरुस्त शुक्राणु विकसित करने के लिए, शुक्राणुओं की गुणवत्ता, मात्रा, संकेद्रण और गतिशीलता बनाने में मददगार हो सकती है.

आहार में विटामिंस, खनिज और जरूरी पोषक तत्त्वों का समूह हो. इस तरह के एंटीऔक्सिडैंट की मात्रा बढ़ाएं जो शुक्राणुओं को स्वस्थ रखने में मददगार होने के लिए जाने जाते हैं. एंटीऔक्सिडैंट के सेवन को बढ़ाने से शुक्राणुओं की गुणवत्ता सुधरने के साथसाथ कोशिकाओं की लंबी उम्र के लिए शरीर में जहां भी मुक्त मूलक

(फ्री रैडिकल्स) होते हैं, उन्हें ये नष्ट कर के शरीर में सुरक्षा यंत्ररचना के रूप में काम करते हैं.

बंधत्व को दूर करने वाले डाक्टर अपने रोगियों को मास्क पहनने, अपने घर में ही नहीं वाहनों में भी प्यूरीफायर्स इंस्टौल करने की सलाह देते हैं. वे कहते हैं कि जहां तक संभव हो, घर के अंदर ही रहें. सब से उचित उपाय प्रदूषित क्षेत्र को छोड़ देना है, पर लोग इस के लिए कोई प्रयास नहीं करते. इस के लिए लोगों को जाग्रत होना चाहिए और औफिसों में भी एयर प्यूरीफायर इंस्टौल करवाना चाहिए.

सलमान खान कि इस एक्ट्रेस का हुआ भयानक एक्सीडेंट

बॉलीवुड एक्ट्रेस रंभा को लेकर एक बुरी खबर आरही है कि उनका कार एक्सीडेंट हो गया है, जिसके बाद से उनके फैंस काफी ज्यादा परेशान नजर आ रहे हैं. बता दें कि उनके कार में उनकी बेटी और नैनी मौजूद थी.

खबर है कि इस एक्सीडेंट के दौरान एक्ट्रेस और उनकी बेटी को काफी गंभीर चोट आई है, जिससे वह दोनों काफी ज्यादा परेशान  हैं. रंभा की बेटी को तुरंत अस्पताल में भर्ती करवाया गया है. इस हादसे की जानकारी एक्ट्रेस ने अपने सोशल मीडिया के जरिए दिया है.

 

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इस खबर के सामने आते ही सभी फैंस काफी ज्यादा परेशान हैं. साथ ही रंभा भी काफी ज्यादा परेशान नजर आ रही हैं. एक्ट्रेस ने इंस्टाग्राम पर फोटो शेयर किया है जिसमें उनकी बेटी अस्पताल में नजर आ रही हैं. इसके साथ ही एक्ट्रेस ने कार की भी तस्वीर शेयर कि है जो कि पूरी तरह से डैमेज हो गई है.

बॉलीवुड एक्ट्रेस रंभा ने सलमान खान के साथ कई सारी हिट फिल्मों में काम किया है. इसके साथ ही वह गोविंदा के साथ भी कई हिट फिल्मों में काम कर चुकी हैं.

खैर अभी रंभा के परिवार को दुआ की जरुरत है कि जल्द उनकी बेटी स्वस्थ होकर वापस घर लौटे.

Bigg Boss 16: अंकित और प्रियंका की दोस्ती टूटी, जानें क्या है कारण

सलमान खान का शो बिग बॉस 16 इन दिनों टीआरपी लिस्ट में सबसे आगे है, शो में अब्दूरोजिक से लेकर प्रियंका चहर चौधरी तक को खूब पसंद किया जा रहा है.

आए दिन बिग बॉस 16 के कंटेस्टेंट ट्विटर पर ट्रेंड किया जा रहा है, वीडियो के प्रीकैप ने लोगों को हैरान करके रख दिया है, अंकित गुप्ता और प्रियंका चहर चौधरी गेम को लेकर काफी ज्यादा बहस कर रहे हैं. अब इन दोनों में बात इतनी ज्यादा बढ़ गई की दोनों बैठकर रोने लगें.

 

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प्रियंका ने अंकित को मुंह पर बोल दिया कि वह उन्हें झेल रही है, इस शो में दिखाया जा रहा है कि प्रियंका और अंकित की लड़ाई खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. अंकित भी प्रियंका को जवाब देने में पीछे नहीं हटते हैं वह कहते हैं कि मत दो मेरा साथ.

बता दें कि वह पहले भी कई बार बिग बॉस 16 में लड़ाई कर चुके हैं, उन्हें परेशान किया जा चुका है.  लेकिन इससे पहले प्रियंका उनका साथ देती नजर आईं थी लेकिन अब बिल्कुल भी साथ नहीं दे रही है. दोनों एकदम से खिलाफ हो गए हैं एक दूसरे के.

बता दें कि प्रियंका और अंकित एक साथ सीरियल उदारिया में काम कर चुके हैं. जिसमें इन दोनों को खूब पसंद किया गया था.

माइनस 20 डिग्री तापमान : भाग 1

‘ जयहिंद, सर. आपकी पोस्ंिटग आ गई है. ’ हैडकर्लक साहब ने जब मुझे बताया तो मेैंने पूछा, ‘ कहां की है ? ’‘‘ पता नहीं, पर, सर आप को चंदीगढ़ ट्रांजिट कैंप में रिपोर्ट करनी है. यह लैटर दिया है. ’’

मैं समझ गया, यह फारवर्ड ऐरिया की छोटी यूनिट है जिसे मुझे कमांड करना है. लैटर में लिखा था, यूनिट फीलड में है और फैमिली क्वार्टर उपलब्ध नहीं हैं. लेह एयरपोर्ट से आपको गाड़ी लेने आएगी. सर्दी काफी रहंेगी. मन के भीतर केवल यह विचार था कि हर सैनिक को चाहे वह किसी भी रैंक का हो, इस ऐरिया में जाना पड़ता है.

मैंने अपनी पत्नी को बताया तो उसने कहा, ‘‘ पोस्ंिटग आनी ही थी. यह अच्छा है, आपकी इंडिपैंटड कमांड होगी. बच्चे पढ़ रहे है. क्वार्टर यही रहेगा. ’’‘ हां, बिल्कुल. अकैडमिक वर्श तक यही क्वार्टर रहेगा.  मैंने सेप्रेटड  फैमिली क्वार्टर के लिए अप्लाई किया है. जल्दी मिल जाएग‘‘ कोई बात नहीं जैसा होगा देखा जाएगा. ’’

मन से मैं चाहता था, क्वार्टर मिल जाए तो मैं उस में सेट करके ही जाऊं. इतनी दूर से बार बार आना मुष्किल होता है. मुझे नई यूनिट में जाने के लिए 1 महीने का समय दिया गया था. मुझे 15 दिन में क्वार्टर मिल गया था. सबकुछ मेनेज करते करते 1 महीना हो ही गया था.

वहां इस समय कमांड कर रहे अफसर से बात हुई तो उन्होंने कहा, ‘‘ सर, चंदीगढ़ ट्रांजिट कैंप के चक्कर में न पड़ें. आप सीधे लेह की फलाइट पकड़ें. अगर वहां ऐयर लिफटिंग के वारंट उपलब्ध नहीं है तो मैं यहां से भेज देता हूं. मैं लेह एयरपार्ट पर गाड़ी भेज दूंगा. स्नोह कलोदिंग की भी वहां उतरते ही जरूरत पड़ेगी, वह भी भेज दूंगा. जो लैटर आपको भेजा है. वह रुटीन लैटर है. सबको भेजा जाता है ’

थैंक्स मेजर सुबरामनियम, ‘ हमारे पास ऐयर लिफटिंग वारंट है. मैं आपको फलाइट बुक करवा कर डेट बताता हूं. ‘‘ ठीक है, मैं उसी के अनुसार गाड़ी भेजूंगा. ’मेरी 5 अक्तूबर की फलाइट बुक हुई थी. मैंने मेजर सुबरामनियम को बता दिया.उसने कहा, ‘‘ सर, टाइम पर गाड़ी भेज दूंगा. ’’

‘ थैंकस. ’मैंने दिल्ली से लेह की फलाइट पकड़ी. 2 घंटे में मैं लेह पहुंच गया था. गाड़ी के साथ 2 जवान थे. ड्राइवर और एक हेल्पर था. मेरे लिए सर्दी के कपड़े लाए थे. सर्दी बहुत थी. मैंने वाषरूम में जा कर स्नोह कलोदिंग पहना. सिर को कैप बलकलावा से ढका. कोटपार्का पहना और गाड़ी में आ कर बैठ गया. मुझे बताया गया था कि आप ने सिर को किसी भी हालत में नंगा नहीं रखना है. सिर को हवा लग गई तो तुरंत बीमार पड़ने का अंदेषा रहेगा. मैंने एक कैप बलकलावा दिल्ली के सदर बाजार से खरीद लिया था. पर वह सिविल ड्रेस में पहनेे के लिए था. सोचा, उतरते ही सिर को हवा लगने से तो बचेंगे. प्लेन में ही घोशणा हो गई थी कि बाहर का तापमान – 8 डिग्री है.

मेरे लिए टोयटा इनोवा भेजी गई थी. मेरा सामान पहले ही गाड़ी में रख दिया गया था. सुबह के 9 बज चुके थे. मैंने ड्राइवर से पूछा, ‘ हम यूनिट में कितने बजे तक पहुंच जाएंगे ? ‘  ‘‘  सर, हम षाम को 4-5 बजे तक पहुंच जाएंगे. ’’

‘ लंच का कैसे होगा ? ’  ‘‘ सर, हम अपना और आप का लंच साथ लाए हैं. रास्ते में कुछ नहीं मिलेगा . ’’धुरबुक में हमारी यूनिट थी. लेह से धुरबुक की दूरी कोई 113 किलोमीटर थी. वर्ड की सब से ऊंची सड़क चांगला टाॅप क्राॅस करके जाना पड़ेगा. सड़क घुमामदार थी. सिंगल पत्थर के पहाड़ थे. पेड़ पोधे कहीं दूर दूर तक नहीं थे. आॅक्सीजन की कमी थी. सांस लेने में दिक्कत हो रही थी. दो कदम चलते ही सांस फूलने लगती थी.

 

आत्मग्लानि- भाग 1 : मोहिनी को किसकी शक्ल याद नहीं थी?

मधु ने तीसरी बार बेटी को आवाज दी,  ‘‘मोहनी… आ जा बेटी, नाश्ता ठंडा हो गया. तेरे पापा भी नाश्ता कर चुके हैं.’’

‘‘लगता है अभी सो रही है, सोने दो,’’ कह कर अजय औफिस चले गए.

मधु को मोहनी की बड़ी चिंता हो रही थी. वह जानती थी कि मोहनी सो नहीं रही, सिर्फ कमरा बंद कर के शून्य में ताक रही होगी.

‘क्या हो गया मेरी बेटी को? किस की नजर लग गई हमारे घर को?’ सोचते हुए मधु ने फिर से आवाज लगाई. इस बार दरवाजा खुल गया. वही बिखरे बाल, पथराई आंखें. मधु ने प्यार से उस के बालों में हाथ फेरा और कहा, ‘‘चलो, मुंह धो लो… तुम्हारी पसंद का नाश्ता है.’’

‘‘नहीं, मेरा मन नहीं है,’’ मोहनी ने उदासी से कहा.

‘‘ठीक है. जब मन करे खा लेना. अभी जूस ले लो. कब तक ऐसे गुमसुम रहोगी. हाथमुंह धो कर बाहर आओ लौन में बैठेंगे. तुम्हारे लिए ही पापा ने तबादला करवाया ताकि जगह बदलने से मन बदले.’’

‘‘यह इतना आसान नहीं मम्मी. घाव तो सूख भी जाएंगे पर मन पर लगी चोट का क्या करूं? आप नहीं समझेंगी,’’ फिर मोहनी रोने लगी.

‘‘पता है सबकुछ इतनी जल्दी नहीं बदलेगा, पर कोशिश तो कर ही सकते हैं,’’ मधु ने बाहर जाते हुए कहा.

‘‘कैसे भूल जाऊं सब? लाख कोशिश के बाद भी वह काली रात नहीं भूलती जो अमिट छाप छोड़ गई तन और मन पर भी.’’

मोहनी को उन दरिंदों की शक्ल तक याद नहीं, पता नहीं 2 थे या 3. वह अपनी सहेली के घर से आ रही थी. आगे थोड़े सुनसान रास्ते पर किसी ने जान कर स्कूटी रुकवा दी थी. जब तक वह कुछ समझ पाती 2-3 हाथों ने उसे खींच लिया था. मुंह में कपड़ा ठूंस दिया. कपड़े फटते चले गए… चीख दबती गई, शायद जोरजबरदस्ती से बेहोश हो गई थी. आगे उसे याद भी नहीं. उस की इसी अवस्था में कोई गाड़ी में डाल कर घर के आगे फेंक गया और घंटी बजा कर लापता हो गया था. मा ने जब दरवाजा खोला तो चीख पड़ीं. जब तक पापा औफिस से आए, मां कपड़े बदल चुकी थीं. पापा तो गुस्से से आगबबूला हो गए. ‘‘कौन थे वे दरिंदे… पहचान पाओगी? अभी पुलिस में जाता हूं.’’

पर मां ने रोक लिया, ‘‘ये हमारी बेटी की इज्जत का सवाल है. लोग क्या कहेंगे. पुलिस आज तक कुछ कर पाई है क्या? बेकार में हमारी बच्ची को परेशान करेंगे. बेतुके सवाल पूछे जाएंगे.’’ ‘‘तो क्या बुजदिलों की तरह चुप रहें,’’ ‘‘नहीं मैं यह नहीं कह रही पर 3 महीने बाद इस की शादी है,’’ मां ने कहा.

 

 

पश्चात्ताप-भाग 1 : किस बात का अफसोस था डॉक्टर सुभाष को

सफेद चादर से ढकी हुई लाश पड़ी थी. भावशून्य चेहरा लिए वह औरत उस लाश के पास ऐसे बैठी थी जैसे मृत युवक के साथ उस का कोई रिश्ता ही न हो. निस्तेज आंखें, वाकशून्य औरत और वह युवक दोनों ही आपस में अजनबीपन का एहसास करवा रहे थे.

अरे, यह तो अर्जुन की मां है. ओह, तो अर्जुन ही दुर्घटनाग्रस्त हुआ है. उस ड्राइवर के उतावलेपन व जल्दबाजी ने फुटपाथ पर चलते हुए बेचारे युवक को ही कुचल दिया. यह अधेड़ औरत, अर्जुन की विधवा मां है. इस का एकमात्र अवलंब अर्जुन ही था. हमारे पड़ोस में ही रह रही है. दूसरों के घर के कपड़ों की सिलाई का काम कर के जैसेतैसे उस ने अपने इकलौते पुत्र को बड़ा किया था, अपनी ओर से भरसक प्रयत्न कर के पुत्र को एमएससी तक पढ़ाया था और जब उसे बेटे की कमाई का आनंद उठाने का समय आया तो यह दुर्घटना हो गई.

मेरी पड़ोसिन होने के नाते व चूंकि मैं डाक्टर था, लोग जल्दी से मुझे बुला कर घर ले आए. किसी के मुंह से एक शब्द नहीं निकल पा रहा है, न सांत्वना का, न ही कोई अन्य शब्द. कभीकभी ऐसी पीड़ादायक स्थितियां आ जाती हैं कि शब्द निरर्थक प्रतीत होते हैं. इतने गहरे जख्म को सहलाना छोड़, छूने भर का एहसास करवाने को जबान ही साथ नहीं देती.

मैं अस्पताल जाने के लिए तैयार हो रहा था एक गंभीर रोगी को देखने, पर यहां आना अत्यधिक जरूरी था. जब अस्पताल की गाड़ी उस के लड़के को उस के घर के सामने उतार रही थी, वह उन्हें रोकने आई कि अरे, यह कौन है? इसे यहां क्यों उतार रहे हो? जो लोग उसे ले कर आए थे, जवाब देने की हिम्मत उन में से भी किसी की नहीं हुई. उस ने आगे बढ़ कर उस की चादर हटा कर मुंह देखा और जड़वत रह गई और अभी भी ऐसे ही मूक बनी बैठी है. ये भावशून्य आंखें, ओह, ये आंखें…बिलकुल याद दिला रही हैं 25 वर्ष पहले की उन्हीं आंखों की, बिलकुल ऐसी ही थीं. अतीत एक बार फिर साकार हो उठता है मेरे सामने.

यों तो मैं डाक्टर हूं, अब तक पता नहीं कितनों की मृत्यु के प्रमाणपत्र दे चुका हूं. मौतें होती ही रहती हैं, पर कुछ ऐसी होती हैं जो मस्तिष्क पर सदैव के लिए अंकित हो जाती हैं, अगर आप उन से कहीं न कहीं जुड़े हैं तो. वैसे तो डाक्टर व मरीज का रिश्ता… एक मरीज आया, ठीक हो गया, चला गया. ठीक नहीं हुआ तो 2-3 बार आ गया. फिर वह डाक्टर को भूल गया, डाक्टर भी उसे भूल गया. बहुत से रोगी डाक्टर बदलते रहते हैं. आज इस डाक्टर के पास, कल दूसरे डाक्टर के पास. बहुत से रोगी हमेशा आते रहेंगे. कहेंगे, डाक्टर साहब, किसी और डाक्टर के पास जाने की इच्छा नहीं होती और अगर चला भी जाता हूं तो ठीक नहीं हो पाता.

एक मरीज व डाक्टर का रिश्ता कायम रहता है और डाक्टर अपने मरीज के बारे में सबकुछ पता रखता है. पर कभीकभी ऐसा भी होता है कि एक मरीज एक बार ही आया है आप के पास लेकिन फिर भी वह अपनेआप को आप की स्मृति से ओझल नहीं होने देता. आप के लिए एक अकुलाहट व एक अजीब व्याकुलता छोड़ जाता है. काश, मैं उस के लिए यह कर पाता, आप को पश्चात्ताप की अग्नि में जलाता है. आप सोचते हैं कि यदि मुझ से यह गलती न होती तो वह बच जाता और ऐसा ये भावशून्य आंखें मुझे आज से 25 वर्ष पूर्व के अतीत की याद दिला रही हैं, बहुत साम्यता है इन आंखों व उन आंखों में.

मैं ने तब अपनी एमडी की डिगरी ले कर दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में नियुक्ति ली थी कैजुअल्टी औफिसर के पद पर. दिल्ली के इतने बड़े अस्पताल में नियुक्ति होने की बहुत प्रसन्नता थी मुझे, पर यह खुशी अधिक दिनों तक टिकी न रह सकी.

शेष शर्त- भाग 3 : अमित के मामाजी क्यों गुस्साएं?

अमित मामाजी का एकलौता बेटा था. घर में धनदौलत की कोई कमी न थी, तिस पर उस ने इंजीनियरिंग की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी. देखने में भी वह लंबाचौड़ा आकर्षक युवक था. इन तमाम विशेषताओं के कारण लड़की वालों की भीड़ उस के पीछे हाथ धो कर पड़ी थी. किंतु मामाजी भी बड़े जीवट आदमी थे. उन्होंने तय कर लिया था कि लड़की वाले चाहे जितना जोर लगा लें, पर अमित का विवाह तो वे अपनी शर्तों पर ही करेंगे. जिन दिनों अमित के रिश्ते की बात चल रही थी, मैं ने भी मामाजी को एक मित्रपरिवार की लड़की के विषय में लिखा था. लड़की मध्यवर्गीय परिवार की थी. अर्थशास्त्र में एमए कर रही थी. देखने में भली थी. मेरे विचार में एक अच्छी लड़की में जो गुण होने चाहिए, वे सब उस में थे.

मामाजी ने पत्रोत्तर जल्दी ही दिया था. उन्होंने लिखा था… ‘बेटी, तुम अमित के लिए जो रिश्ता देखोगी, वह अच्छा ही होगा, इस का मुझे पूरा विश्वास है. पर अमित को विज्ञान स्नातक लड़की चाहिए. दहेज मुझे नहीं चाहिए, लेकिन तुम तो जानती हो, रिश्तेदारी बराबरी में ही भली. जहां तक हो सके, लड़की नौकरी वाली देखो. अमित भी नौकरी वाली लड़की चाहता है.’ मामाजी का पत्र पढ़ कर मैं हैरान रह गई. मामाजी उस युग के आदमी थे जिस में कुलीनता ही लड़की की सब से बड़ी विशेषता मानी जाती थी. लड़की थोड़ीबहुत पढ़ीलिखी और सुंदर हो तो सोने पर सुहागा. जमाने के हिसाब से विचारों में परिवर्तन होना स्वाभाविक है. लेकिन लगता था कि वे बिना यह सोचेविचारे कि उन के अपने परिवार के लिए कैसी लड़की उपयुक्त रहेगी, जमाने के साथ नहीं बल्कि उस से आगे चल रहे थे.

संयोग से दूसरे ही सप्ताह मुझे नागपुर जाने का अवसर मिला. मामाजी से मिलने गई तो देखा, वे बैठक में किसी महिला से बातें कर रहे हैं. वे उस महिला को समझा रहे थे कि अमित के लिए उन्हें कैसी लड़की चाहिए. उन्होंने दीवार पर 5 फुट से 5 फुट 5 इंच तक के निशान बना रखे थे और उस महिला को समझा रहे थे, ‘‘अपना अमित 5 फुट 10 इंच लंबा है. उस के लिए लड़की कम से कम 5 फुट 3 इंच ऊंची चाहिए. यह देखो, यह हुआ 5 फुट, यह 5 फुट 1 इंच, 2 इंच, 3 इंच. 5 फुट 4 इंच हो तो भी चलेगी. लड़की गोरी चाहिए. लड़की के मामापिता, भाईबहनों के बारे में सारी बातें एक कागज पर लिख कर ले आना. लड़की हमें साइंस ग्रेजुएट चाहिए. अगर गणित वाली हो या पोस्टग्रेजुएट हो तो और भी अच्छा है.’’

सामने बैठी महिला को भलीभांति समझा कर वे मेरी ओर मुखातिब हुए, ‘बेटे, आजकल आर्ट वालों को कोई नहीं पूछता, उन्हें नौकरी मुश्किल से मिलती है. खैर, बीए में कौन सी डिवीजन थी लड़की की? फर्स्ट डिवीजन का कैरियर हो तो सोचा जा सकता है. एमए के प्रथम वर्ष में कितने प्रतिशत अंक हैं?’ मैं समझ गई कि अमित के लिए रिश्ता तय करवाना मेरे बूते के बाहर की बात है. मामाजी के विचारों के साथ अमित की कितनी सहमति थी, इसे तो वही जाने, पर इस झंझट में पड़ने से मैं ने तौबा कर ली.

लगभग 2-3 वर्षों की खोजबीन- जांचपरख के बाद अमित के लिए विभा का चयन किया गया था. वह गोरी, ऊंची, छरहरे बदन की सुंदर देह की धनी थी. उस की शिक्षा कौनवैंट स्कूल में हुई थी. वह फर्राटे से अंगरेजी बोल सकती थी. उस ने राजनीतिशास्त्र में एमए किया था. बंबई से पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद वह नागपुर के एक प्रसिद्ध दैनिक समाचारपत्र में कार्यरत थी. इस विवाह संबंध से मामाजी, मामी और अमित सभी बहुत प्रसन्न थे. खुद मामाजी विभा की प्रशंसा करते नहीं थकते थे. लेकिन विवाह के 3-4 महीने बाद ही स्थिति बदलने लगी. विभा के नौकरी पर जाते ही यथार्थ जीवन की समस्याएं उन के सामने थीं. मामाजी हिसाबी आदमी थे, वे यह सोच कर क्षुब्ध थे कि आखिर बहू के आने से लाभ क्या हुआ? अमित के तबादले ने इस मामले को गंभीर मोड़ पर पहुंचा दिया था.

इस के  बाद नागपुर जाने के अवसर को मैं ने जानबूझ कर टाल दिया था. किंतु लगभग सालभर बाद मुझे एक बीमार रिश्तेदार को देखने नागपुर जाना ही पड़ा. वहीं मामाजी से भेंट हो गई. अमित और विभा के विषय में पूछा तो बोले, ‘‘घर चलो, वहीं सब बातें होंगी.’’ हम लोग घर पहुंचे तो वहां सन्नाटा छाया हुआ था. मामी खिचड़ी बना कर अभीअभी लेटी थीं, उन की तबीयत ठीक नहीं लग रही थी. मुझे देखा तो उठ बैठीं और शिकायत करने लगीं कि मैं ने उन लोगों को भुला दिया है.

‘‘अमित अमरावती में है, उसे वहां बढि़या फ्लैट मिला है पर खानेपीने की कोई व्यवस्था नहीं है. कभी होटल में खा लेता है, कभी नौकर से बनवा लेता है. तुम्हारी मामी बीचबीच में जाती रहती है, इस का भी बुढ़ापा है. यह यहां मुझे देखे या उसे वहां देखे. मेरी तबीयत भी अब पहले जैसी नहीं रही. यहां का कारोबार देखना भी जरूरी है, नहीं तो सब अमरावती में ही रहते. विभा ने नौकरी छोड़ कर अमित के साथ जाने से इनकार कर दिया. सालभर से मायके में है,’’ मामाजी ने बताया. अमित के विषय में बातें करते हुए दोनों की आंखों में आंसू भर आए. मैं ने ध्यान से देखा तो दीवार पर 5 फुट की ऊंचाई पर लगा निशान अब भी नजर आ रहा था.

मन तो हुआ, उन से कहूं, ‘आप की समस्या इतनी विकट नहीं है, जिस का समाधान न हो सके. ऐसे बहुत से परिवार हैं जहां नौकरी या बच्चों की पढ़ाई के कारण पतिपत्नी को अलगअलग शहरों में रहना पड़ता है. विभा और अमित भी छुट्टियां ले कर कभी नागपुर और कभी अमरावती में साथ रह सकते हैं, ’ पर चाह कर भी कह न सकी. दूसरे दिन सुबह हमसब नाश्ता कर रहे थे कि किसी ने घंटी बजाई. मामाजी ने द्वार खोला तो सामने एक बुजुर्ग सज्जन खड़े थे. मामी ने धीरे से परिचय दिया, ‘‘दीनानाथजी, विभा के पिता.’’

पता चला कि विभा और अमित के मतभेदों के बावजूद वे बीचबीच में मामाजी से मिलने आते रहते हैं. मामी अंदर जा कर उन के लिए भी नाश्ता ले आईं. दीनानाथ सकुचाते से बोले, ‘‘बहनजी, आप क्यों तकलीफ कर रही हैं, मैं घर से खापी कर ही निकला हूं.’’ फिर क्षणभर रुक कर बोले, ‘‘क्या करें भई, हम तो हजार बार विभा को समझा चुके कि अमित इतने ऊंचे पद पर है, पूर्वजों का जो कुछ है, वह सब भी तुम्हारे ही लिए है, नौकरी छोड़ कर ठाट से रहे. पर वह कहती है कि ‘मैं सिर्फ पैसा कमाने के लिए नौकरी नहीं कर रही हूं. इस काम का संबंध मेरे दिलोदिमाग से है. मैं ने अपना कैरियर बनाने के लिए रातरातभर पढ़ाई की है. नौकरी के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा से गुजरी हूं. अब इस नौकरी को छोड़ देने में क्या सार्थकता है?’ ऐसे में आप ही बताइए,’’ उन्होंने बात अधूरी ही छोड़ दी.

मामाजी ने अखबार पढ़ने का बहाना कर के उन की बात को अनसुना कर दिया. परंतु मामी चुप न रह सकीं, ‘‘भाईसाहब, लड़की तो लड़की ही है, लेकिन हम बड़े लोगों को तो उसे यही शिक्षा देनी चाहिए कि वह अपनी घरगृहस्थी देखते हुए नौकरी कर सके तो जरूर करे. नौकरी के लिए घरपरिवार छोड़ दे, पति को छोड़ दे और मायके में जा बैठे, यह तो ठीक नहीं है.’’

य-पि मामी ने अपनी बात बड़ी सरलता और सहजता से कही थी परंतु उन का सीधा आक्षेप दीनानाथजी पर था. कुछ क्षण चुप रह कर वे बोले, ‘‘बहनजी, एक समय था जब लड़कियों को सुसंस्कृत बनाने के लिए ही शिक्षा दी जाती थी. लड़की या बहू से नौकरी करवाना लोग अपमान की बात समझते थे. पर अब तो सब नौकरी वाली, कैरियर वाली लड़की को ही बहू बनाना चाहते हैं. इस कारण लड़कियों के पालनपोषण का ढंग ही बदल गया है. अब वे किसी के हाथ की कठपुतली नहीं हैं कि जब हम चाहें, तब नौकरी करने लगें और जब हम चाहें, तब नौकरी छोड़ दें.’’

कुछ देर सन्नाटा सा रहा. उन की बात का उत्तर किसी के पास नहीं था. इधरउधर की कुछ बातें कर के दीनानाथ उठ खड़े हुए. मामाजी उन्हें द्वार तक विदा कर के लौटे और बोले, ‘‘देखा बेटी, बुड्ढा कितना चालाक है. गलती मुझ से ही हो गई. शादी के पहले ही मुझे यह शर्त रख देनी थी कि हमारी मरजी होगी, तब तक लड़की से नौकरी करवाएंगे, मरजी नहीं होगी तो नहीं करवाएंगे.’’उन की इस शेष शर्त को सुन कर मैं अवाक रह गई.

मां, ब्रेकअप क्यों न करा -भाग 4 : डायरी पढ़ छलका बेटी का दर्द

“मुझ से अब और नहीं सहा जाता. अब तो इन का साथ भी नहीं सुहा रहा है. मन करता है कि कुछ खा कर सदा के लिए सो जाऊं. भाभीभैया को बहाना बना कर मैं ने अपने घर में आने से रोका है. आप समझ सकती हो कि इस वक्त मेरे दिल पर क्या गुजर रही होगी. छोटा भाई तिलतिल कर मर रहा है. चाहती थी, जब तक है मेरी आंखों के सामने रहे. मगर पत्थरदिल शर्माजी ने एक बड़ी दीवार खड़ी कर दी है. फैसला मुझे लेना है. मेरे लिए शर्म से डूब मरने की बात है कि मेरे शहर में रहते हुए भी, मेरा कैंसर से जूझ रहा भाई अजनबियों की तरह आ कर असुविधाजनक स्थितियों में रहे. किराए का कमरा ढूंढ़े. अपने बूढ़े मांबाप के पास मुझे हिम्मत बढ़ाने के लिए खड़ा होना था. शर्माजी के इस व्यवहार के बाद अगर मैंं वहां जाने का कड़ा निर्णय लेती हूं, तो बूढ़े मातापिता के लिए अपनी बेटी के परिवार टूटने का दुख भी एक छोटा दुख नहीं होता. उन की बूढ़ी आंखें बिना कहे ही मेरी तकलीफ को पहचान लेंगी.

“परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी हैं कि जो भी निर्णय लूंगी, उसे दुनिया गलत ही कहेगी, मगर अब जो भी हो. शर्माजी का साथ और उन की सेवा करना. न जाने क्यों मेरा मन कतई गवारा नहीं कर रहा है.

“आप कहती थीं न दीदी. सुमन, आजकल तुम्हें इस डायरी से बहुत प्यार हो गया है. मैं ने अपना सारा दर्द इस डायरी में उड़ेल दिया है. डायरी भर चुकी है न. इसलिए आप के सामने छलक पड़ा,’’ गला रुंध गया था सुमन का.

मैं क्या कहती. बहुतकुछ बातें एक दिन पहले ही अनजाने में सुन चुकी थी. और उस दिन सुमनजी ने बयां कर दी थी.

‘‘सब ठीक हो जाएगा. आप भाई साहब की बातों पर इतनी परेशान न हो. पुरुषों को तनाव और बहुत सी परेशानियां होती हैं. तनाव के उन्हीं क्षणों में उन्होंने इस तरह का व्यवहार किया होगा. उन्हें खुद अपनी गलती का एहसास होगा. जेंट्स इस तरह की आधिपत्य की बातें कर के अकसर भूल जाते हैं. आप भी भूल जाओ सुमनजी.’’

‘‘भ्भूूल तो तोशी के पापा गए हैं. सासू मां, 5 साल तक लकवा के कारण बिस्तर पर रहीं, क्या मैं ने उन की शारीरिक विकृति से कोई घृणा की थी तब… और मैं ने पूरे समर्पण के साथ उन की सेवा की.

“डाक्टर कहते हैं कि मन्नू की बीमारी लास्ट स्टेज पर है. मेरा तो दिल बैठा जाता है. और ऐसे में इन्होंने भी अपनी असलियत बता दी. सच कहूं तो अब मेरा इन के साथ रहने का दिल बिलकुल नहीं कर रहा. दिल कर रहा है कि मन्नू से पहले मैं दुनिया के उस पार पहुंच जाऊं, जहां मन्नू के आने पर उस का स्वागत करूं. और फिर उस के साथ रहने से मुझे कोई न रोक सके,’’ कहतेकहते सुमन का गला भर आया था.

‘‘इस तरह हिम्मत मत हारो. मन्नू को आप की जरूरत है,’’ यह कह कर उन्हें खूब सारी दिलासा दे कर मैं अपने घर वापस चली गई थी. सुमनजी, उस दिन इतनी विचलित थीं कि अपने औफिस भी नहीं गई थीं. शाम को जब शर्माजी वापस आए तो हो सकता है उन दोनों के बीच, मन्नू भैया को ले कर फिर कोई बातचीत हुई हो. उस के बाद मेरी मुलाकात उन से नहीं हुई. रात , तकरीबन 10 बजे भाई साहब बेचैन हो कर हड़बड़ाते हुए हमारे घर का दरवाजा बजा रहे थे.
‘‘जल्दी चलिए, देखिए न, सुमन को न जाने क्या हो गया है. वह शाम से सो कर ही नहीं उठी है. उस के मुंह से झाग आ रहा है.’’

हम पहुंचे थे. डाक्टर को फोन कर के बुलाया था. आते ही उस ने हमारी आशंका को सही बतला दिया था. ‘‘आई एम सौरी. शी इज नो मोर… संभव है कि यह ब्रेन हेमरेज का केस है,’’ डाक्टर ने कहा था.’’

‘‘हां, हो सकता है. कुछ दिनों से वह अपने बेटे के तलाक के केस की वजह से तनावग्रस्त थीं और इन का ब्लड प्रेशर भी हाई रहता था. दवाएं ले रही थीं. लेकिन फिर भी हम से दूर चली गईं,’’ भाई साहब ने खुद को संभालते हुए कहा था.

जब यह दुखद सूचना परिजनों के साथ ही साथ सुधा को दी गई, तो वह आश्चर्य से बोली, ‘‘तो क्या दीदी ग्वालियर में ही थीं. दीदी ने हमें तो बताया था कि वे केरल जा रही हैं.’’

‘‘हां, हम जाने वाले थे. लेकिन, इन की तबीयत नासाज होने की वजह से हमें अपना कार्यक्रम रद्द करना पड़ा था,’’ भाई साहब ने बहाना बना दिया था.

‘‘तोशी बेटा, तुम और तुम्हारे परिवार के अन्य सदस्य यही जानते और मानते होंगे कि उस दिन सुमनजी को ब्रेन हेमरेज ही हुआ था. लेकिन, मुझे लगता है कि उन की मृत्यु सामान्य मृत्यु नहीं थी. वह इतनी कमजोर पड़ जाएंगी, मैं ने कभी नहीं सोचा था. लगता था कि उन्होंने अपना सबकुछ गिलाशिकवा मुझ से कह कर अपना मन हलका कर लिया है. लेकिन, उस दिन मैं गलत थी. उन के दिल पर चोट बहुत गहरी थी. उन के लिए यह घाव का भरना मुश्किल हो रहा होगा. और नीताजा उन्होंने कोई प्राणघातक वस्तु का सेवन किया था. उन के शरीर का रंग अजीब सा नीला पड़ गया था.

“तोशी, उन्होंने मुझ से तो सिर्फ एक बार ही कहा था. कुछ अनकहा भी रहा होगा, जो उन्होंने अपनी डायरी में जरूर दर्ज किया होगा. तुम उस डायरी को उन की अलमारी में ढूंढ़ना. तुम्हें यह सब जान कर तकलीफ तो हुई होगी, लेकिन मां की तकलीफ को जानना और उसे महसूस करना एक बिटिया के लिए बहुत ही जरूरी है. इसलिए आज मैं ने तुम्हारे सामने वह सच रख दिया, जो सब आज तक छुपा हुआ था.’’

यह सुन कर तोशी स्तब्ध थी. सुमित्रा ने एक बार उस के कंधों को हिला कर कहा, ‘‘तोशी, तुम सुन तो रही हो ना…?’’

झकझोरने से जैसे वह चेतना में आई. जब पलकें झपकाईं तो आंखों से आंसुओं का समंदर बह निकला. वह दहाड़े मारमार कर रोना चाहती थी, लेकिन शब्द और आवाज कहीं घुट रहे थे, वह समझ नहीं पा रही थी.

‘‘अपनेआप को संभालो बेटा. और हां, इस बात का जिक्र अपनी ससुराल में और अपने पति से कतई मत करना, वरना उन की नजरों में तुम्हारे पापा का सम्मान कम हो जाएगा. अब तो उन्हें भी उन के साथ ही तो रहना है न. आगे तुम समझदार हो. जो होना था वह तो हो चुका. अब अतीत को याद कर अपना आज और भविष्य मत बरबाद करो,’’ सुमित्राजी ने एक व्यावहारिक सलाह दी थी उसे.

‘‘उफ्फ, परिवार के लिए समर्पित मेरी मम्मी को इतनी बड़ी अवहेलना सहनी पड़ी. भैया का तलाक हो रहा है, तो मैं पूरी तरह से भैया के साथ जुड़ी हुई हूं. समयसमय पर बात करती हूं. अपने सुझाव देती हूं और दिलासा भी देती हूं. सच कहूं तो भैया का तनाव मुझे अपने हिस्से की जिंदगी की खुशियों को भी जीने नहीं दे रहा है. यह भाईबहन के रिश्ते इतने मजबूत होते हैं कि दूर रह कर भी जरा सी देर का सलाहमशवरा भी एक बहुत बड़ा संबल बन जाता है. मुझे अगर भैया से बात करने से भी रोका जाए तो मैं क्या कर लूंगी, यह सोचना भी मेेेरे लिए मुश्किल है, क्योंकि मैं ने ससुराल में हर रिश्ते को पूरा मानसम्मान दिया है. और अगर मुझ से एक रिश्ता छीना जाता है तो ऐसे छीनने वाले बेरुखे रिश्तों की मेरे लिए कोई अहमियत नहीं.’’

‘‘बेटा, क्रोध में कोई निर्णय मत लेना. मम्मी नहीं हैं. तुम्हारे मन्नू मामा भी कुछ महीने पहले ही दुनिया छोड़ गए हैं. अब पापा का खयाल रखना. इस गुजरे एक साल में भाई साहब ने बहुत अकेलापन झेला है. मम्मी ने तात्कालिक परिस्थितियों के आक्रोश में अपने जीवन को खत्म कर लिया. भाई साहब के अकेलेपन से तुम्हारी मम्मी की आत्मा भी ऊपर सुकून से ना होगी. अच्छा चलती हूं, समय मिले तो घर आना,’’ कह कर सुमित्राजी ने विदाई ली.

 

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