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बिग बॉस ने गौतम विज से छीनी कैप्टेंसी, सौदर्या बनी कारण

सलमान खान का पसंदीदा शो बिग बॉस 16 इन दिनों टीवी पर छाया हुआ है. शो के कंटेस्टेंट में अपने अपने टॉस्क को लेकर खूब लड़ाइयां चल रही है. बीते सप्ताह कैप्टन गौतम विज बने हुए थें.

उनके कैप्टन बनने पर साजिद खान और अर्चना गौतम काफी ज्यादा नाराज हुए थें. लेकिन हैरानी कि बात यह है कि वह 4 दिन भी कैप्टन की गद्दी पर टिक नहीं पाएं थें. और बिग बॉस ने उन्हें फॉयर कर दिया है, इस शो से.

 

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वहीं खबर ये भी आ रही है कि सौदर्या शर्मा की वजह से उन्हें कैप्टेंसी की गद्दी से हटाया गया है. सौदर्या शर्मा लगातार गौतम विज से अंग्रेजी में बात करती रही हैं. गौतम ने उन्हें इस बात के लिए एकदम से नहीं टोका. ऐसे में बिग बॉस ने गौतम को कैप्टेंसी से हटाने का सोचा.

यूं देखा जाए तो गौतम के कैप्टन बनने से सभी लोग नाराज थें, जिसमें खासतौर पर नाराजगी देखने को मिली वो थें शिव ठाकरें, साजिद खान, अर्चना गौतम, टीना दत्ता.

ऐसे में देखा जा रहा है कि गौतम को कैप्टन के पद से हटने पर ज्यादा खुशी इन्हीं लोगों को हुई. अब देखते हैं कि अगला कैप्टन इस घर में कौन बनेगा. फैंस को भी इस दिन का इंतजार है.

अनुपमा और अनुज से नाराज होगी बरखा, अधिक तोड़ेगा पाखी का दिल!

टीवी एक्ट्रेस रूपाली गांगुली इन दिनों अनुपमा को लेकर काफी ज्यादा चर्चा में बनी हुई हैं. उनके इस सीरियल को खूब पसंद किया जा रहा है. इस सीरियल में आए दिन कुछ न कुछ नया ड्रामा देखऩे को मिलते रहता है.

अनुपमा में कई दिनों से पाखी और अधिक का ड्रामा चालू है अब तो दोनों ने भागकर शादी भी कर ली है. जिससे दर्शकों का एक्साइटमेंट सातवें आसमान पर है. वनराज पाखी की जिम्मेदारी अनुज को सौप देता है. वहीं अनुज और अनुपमा दोनों को कपाड़िया मेंशऩ ले जाता है.

 

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लेकिन अनुपमा में होने वाले ड्रामे खत्म नहीं होते हैं. आगे इस सीरियल में दिखाया जाएगा कि अनुज और अनुपमा कपाड़िया मेंशन आ जाते हैं. पाखी सबके सामने अनुज की धज्जियां उड़ाती हैं कि जो सगा भआई मेरा नहीं हुआ वो किसीका भी नहीं होगा.

जिसे मैंने बच्चे से ज्यादा माना उसने मुझे धोखा दिया, वह तुम्हारा क्या होगा. आगे गुस्से में कहती है कि मेरे शब्द लिख लो कि ये शादी ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगी.

आगे के एपिसोड में दिखाया जाएगा कि पाखी और अधिक सबका आशीर्वाद लेते हैं. और जब बरखा के पास जाते हैं तो बरखा उसे आशीर्वाद देने से मना कर देती है. बरखा कहती है कि ये शादी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाएगी जल्द ही अधिक का असली चेहरा तुम्हें नजर आएगा.

मैं तुम्हें कभी मांफ नहीं करुंगी, जो तुमलोगों को करना था वो कर लिया तुमने. इसके साथ ही अनुज के साथ भी नाराजगी जाहिर करती है. कहती है कि बापू जी के कहने पर आप यहां तो ले आएं लेकिन अब मैं इन्हें मांफ नहीं करुंगी.

मुझे न पुकारना

बस में बहुत भीड़ थी, दम घुटा जा रहा था. मैं ने खिड़की से बाहर मुंह निकाल कर 2-3 गहरीगहरी सांसें लीं. चंद लमहे धूप की तपिश बरदाश्त की, फिर सिर को अंदर कर लिया. छोटे बच्चे ने फिर ‘पानीपानी’ की रट लगा दी. थर्मस में पानी कब का खत्म हो चुका था और इस भीड़ से गुजर कर बाहर जा कर पानी लाना बहुत मुश्किल काम था. मैं ने उस को बहुत बहलाया, डराया, धमकाया, तंग आ कर उस के फूल से गाल पर चुटकी भी ली, मगर वह न माना.

मैं ने बेबसी से इधरउधर देखा. मेरी निगाह सामने की सीट पर बैठी हुई एक अधेड़ उम्र की औरत पर पड़ी और जैसे जम कर ही रह गई, ‘इसे कहीं देखा है, कहां देखा है, कब देखा है?’

मैं अपने दिमाग पर जोर दे रही थी. उसी वक्त उस औरत ने भी मेरी तरफ देखा और उस की आंखों में जो चमक उभरी, वह साफ बता गई कि उस ने मुझे पहचान लिया है. लेकिन दूसरे ही पल वह चमक बुझ गई. औरत ने अजीब बेरुखी से अपना चेहरा दूसरी तरफ मोड़ लिया और हाथ उठा कर अपना आंचल ठीक करने लगी. ऐसा करते हुए उस के हाथ में पड़ी हुई सोने की मोटीमोटी चूडि़यां आपस में टकराईं और उन से जो झंकार निकली, उस ने गोया मेरे दिमाग के पट खोल दिए.

उन खुले पटों से चांदी की चूडि़यां टकरा रही थीं…सलीमन बूआ…सलीमन बूआ…हां, वे सलीमन बूआ ही थीं. बरसों बाद उन्हें देखा था, लेकिन फिर भी पहचान लिया था. वे बहुत बदल चुकी थीं. अगर मैं ने उन को बहुत करीब से न देखा होता तो कभी न पहचान पाती.

दुबलीपतली, काली सलीमन बूआ चिकने स्याह गोश्त का ढेर बन गई थीं. मिस्कीन चेहरे पर ऐसा रोबदार इतमीनान और घमंड झलक रहा था जो बेहद पैसे वालों के चेहरों पर हुआ करता है. अपने ऊपर वह हजारों का सोना लादे हुए थीं. कान, हाथ, नाक कुछ भी तो खाली नहीं था. साड़ी भी बड़ी कीमती थी और वह पर्स भी, जो उन की गोद में रखा हुआ था. मेरा बच्चा रो रहा था और मैं उस को थपकते हुए कहीं दूर, बहुत दूर, बरसों पीछे भागी चली जा रही थी. मैं जब बच्ची थी तो यही सलीमन बूआ सिर्फ मेरी देखभाल के लिए रखी गई थीं. उन दिनों वे बहुत दुखी थीं. उन के तीसरे मियां ने उन को तलाक दे दिया था और लड़के को भी उन से छीन लिया था. सलीमन बूआ ने अपनी सारी ममता मुझ पर निछावर कर दी. मैं अपनी मां की ममता इसलिए कम पा रही थी क्योंकि मुझ से छोटे 2 और बच्चे भी थे.

अम्मा बेचारी क्या करतीं, मुझे संभालतीं या मेरे नन्हे भाइयों को देखतीं. सलीमन बूआ की मैं ऐसी आशिक हुई कि रात को भी उन के पास रहती. अब्बाजान सोते में मुझे अपने बिस्तर पर उठा ले जाते, लेकिन रात को जब भी मेरी आंख खुलती, फिर भाग कर सलीमन बूआ के पास पहुंच जाती. वे जाग कर, हंस कर मुझे चिपटा लेतीं, ‘आ गई मेरी बिटिया रानी…’ और फिर अपनी बारीक आवाज में वे लोरी गाने लगतीं, जिस को सुन कर मैं फौरन सो जाती. मुझे नहलाना, मेरे कपड़े बदलना, कंघी करना, काजल लगाना, खिलानापिलाना, सुलाना, कहानियां सुनाना, बाहर टहलाने ले जाना, यह सब बूआ के जिम्मे था. अम्मा मेरी तरफ से बेफिक्र हो कर दूसरे बच्चों में लग गई थीं.

बड़े भाई और आपा मुझे चिढ़ाते, ‘देखो, परवीन की बूआ क्या काली डरावनी सी है. अंधेरे में देखो तो डर जाओ. अरे, भैंस है पूरी, शैतान की खाला.’ मैं रोरो मरती, दोनों को काटने दौड़ती, चप्पल खींचखींच मारती. सलीमन बूआ यह सब सुन कर बस मुसकरा दिया करतीं और मुझ से दोगुना लाड़ करने लगतीं. मैं काफी बड़ी हो गई थी, लेकिन फिर भी उन की गोद में लदी रहती. मुहर्रम में मातम या 7 तारीख का कुदरती आलम देखने के लिए मैं इतनी दूर से खुरदपुरा और सय्यदवाड़ा महल्लों में उन की गोद में ही लद कर जाया करती. वह हांफ जातीं, थक कर चूर हो जातीं, मगर न मैं उन की गोद से उतरती न वे उतारतीं.

कोई औरत टोकती, ‘ऐ सलीमन बूआ, इस मोटी को लादे घूम रही हो, फेफड़ा फट जाएगा.’

तब वे बहुत बुरा मानतीं, ‘फटने दो मेरा फेफड़ा, तुम काहे को फिक्र करती हो, बड़ी आई मेरी बिटिया को नजर लगाने वाली.’ घर आ कर वे मेरी नजर उतारतीं तो मैं बड़े घमंड से गरदन अकड़ाअकड़ा कर बड़े भाई और आपा को देखती. तब वे दोनों जलभुन कर रह जाते. सचमुच मुझे अपनी काली डरावनी सी सलीमन बूआ से कितना प्यार था. बचपन छूटा, जवानी ने गले लगाया, फिर भी सलीमन बूआ मेरे उतने ही करीब रहीं. मैं अकसर उन के साथ ही सोती. तब मुझे कभी रात में नींद न आती तो वे मुझे लोरी सुनाने लगतीं, ‘चंदन का है पालना, रेशम की है डोर…जीवे मेरी रानी बिटिया…’

मैं हंस देती, ‘बूआ, अब तो लोरी न सुनाया करो, मैं बड़ी हो गई हूं.’

‘लाख बड़ी हो जाओ, मेरे लिए तो वही छटांक भर की हो.’

सलीमन बूआ ने 3 शादियां की थीं, 2 से कोई बच्चा नहीं हुआ तो तलाक हो गया कि वे बांझ हैं.

मगर तीसरी शादी हुई तो 9वें महीने ही बूआ की गोद भर गई. यह शादी 5 साल चली. लेकिन यहां भी दुखों ने बूआ का पीछा न छोड़ा. उन के मियां का दूसरी औरत से दिल लग गया. बूआ यह बरदाश्त न कर सकीं. झगड़ा बढ़ा तो मर्द ने तलाक दे दिया और घर से निकाल दिया. साथ ही उस ने बच्चा भी छीन लिया. हारी, दुत्कारी सलीमन बूआ घरघर का कामकाज कर के पेट की आग बुझा रही थीं कि चाचा ने उन को अम्मा के पास पहुंचा दिया और उन्होंने उन को मेरे लिए रख लिया. खाना, कपड़ा, तनख्वाह, पान, दवा, बिछौना, बस और क्या चाहिए था उन्हें. बूआ हमारे घर में जम कर पूरे 16 बरस रहीं. बच्चे बड़े हो गए. बड़े अधेड़ हो गए, बूआ हमारे घर का एक जरूरी पुरजा बन गई थीं.

मगर एक दिन 21 बरस का ऊंचा, तगड़ा, गहरा सांवला नौजवान हमारे दरवाजे पर आ कर खड़ा हुआ. उस ने पुकारा, ‘अम्मा.’

बूआ, जो मेरे लिए उबटन पीस रही थीं, आवाज को सुनते ही दरवाजे की तरफ देखने लगीं. उन का हाथ रुका तो चांदी की चूडि़यों का खनकना बंद हो गया.

‘कौन है?’ बड़े भाई ने डपट कर पूछा, क्योंकि वह नौजवान सीधा अंदर घुसा आ रहा था. नीली पैंट, सफेद कमीज, हाथ में शानदार बैग, चमकते जूते और कलाई में सोने की घड़ी देख सब ठिठक कर रह गए.

‘मैं हूं…कलीम…अम्मा को लेने आया हूं,’ उस ने कहा.

बूआ ने 21 बरस के उस नौजवान में अपने 5 साल के कल्लू को बिलबिलाता देख लिया था. वे चीख मार कर दौड़ीं, ‘कलुवा.’

‘अम्मा,’ और दोनों एकदूसरे से लिपट गए.

उफ, बेमुरव्वत, बेवफा सलीमन बूआ एकदम सब कुछ भूल गईं. अपनी जिंदगी के 16 बरस उन्होंने एक पल में झटक कर दूर फेंक दिए. उन्होंने तो उस बिखरे उबटन को भी न उठाया, जो चक्की के इर्दगिर्द पड़ा था और जिस को पीसते हुए वे लहकलहक कर गा रही थीं, ‘गंगाजमनी तेरी ससुराल से आया सेहरा… अब्बा मियां ने खड़े हो के बंधाया सेहरा…’

मैं सन्न बैठी रह गई, अचानक पत्थर की मूरत बन गई. बस, टुकुरटुकुर बूआ को देखती रह गई. यह बड़ी खुशी की बात थी कि उन का बेटा उन को लेने आया था. रोता, बिलखता कलुवा अब हंसतामुसकराता कलीम अहमद बन गया था. उस का बाप मर गया था और अपने पीछे ढेर सी दौलत छोड़ गया था, जिस का कलीम अकेला वारिस था क्योंकि उस की सौतेली मां बहुत बरस पहले ही उस के बाप को छोड़ कर भाग गई थी. बाप की बेड़ी कटी तो वह अपनी मां का पता लगातेलगाते हमारे यहां आ पहुंचा और 2 घंटे के बाद ही बूआ को ले कर चलता बना. 2 घंटों में बूआ सिर्फ एक बार मेरे पास आई थीं, वह भी जाते वक्त, ‘जा रही हूं बीबी…हमेशा सुखी रहो…’ मैं ने सोचा था कि बूआ बिलख उठेंगी, मुझे किसी नन्ही बच्ची की तरह गोद में भर लेंगी, कलीम से लड़ेंगी, कहेंगी, ‘वाह, मैं क्यों जाऊं अपनी बेटी को छोड़ कर…’

मगर नहीं, बूआ की तो बाछें खिल उठी थीं. कालाकलूटा चेहरा, जो मुझ को सलोना नजर आता था, खुशी के मारे और खून की तमतमाहट से और स्याह हो गया था. ‘जा रही हो बूआ?’ मेरी आवाज थरथरा गई.

‘हां, बेटी…मेरा कलुवा अब बहुत बड़ा आदमी बन गया है. कह रहा है, मेरी बड़ी बेइज्जती होती है, तुम क्यों दूसरों के दर पर पड़ी हो? ठीक भी है…ऐसे कब तक जिंदगी गुजारती. अच्छा, चलता हूं…’

यह कह कर उन्होंने मेरा सिर थपका और बगल में दबी हुई अपने कपड़ों की पोटली ठीक करने लगीं. फिर यह जा, वह जा. फिर उड़तीपड़ती खबरें मैं सुनती रही कि बूआ कलकत्ता में हैं, बड़े मजे कर रही हैं. कलीम की एक नहीं, कई दुकानें खुल गई हैं. कार भी खरीद ली है और मकान भी बन गया है. आज बरसों बाद मैं सलीमन बूआ को फिर देख रही थी. नजर थी कि उन पर से हटने का नाम नहीं ले रही थी. बच्चा मेरी गोद में रोतेरोते निढाल हो चुका था और अब सिसकियां भर रहा था. मैं सोचने लगी कि बूआ कितनी बेवफा और संगदिल निकलीं. कभी किस चाव से कहा करती थीं, ‘इतनी उम्र यहां गुजरी, अब जो रह गई है, वह भी रानी बिटिया के साथ इस के ससुराल में गुजर जाएगी. बिटिया को पाला है, इस के बच्चे भी पालूंगी, आंखों के तारे बना कर रखूंगी…’

लेकिन इस वक्त मैं भी सामने थी और मेरे दोनों बच्चे भी मेरे साथ थे. मेरा छोटा बच्चा प्यास के मारे रो रहा था. और सलीमन बूआ ने चंद मिनट पहले ही किस मजे से अपने खूबसूरत थर्मस से पानी पिया था. फिर बड़ी नफासत से रूमाल से मुंह पोंछा, थर्मस बंद कर के बराबर में रखी हुई टोकरी के अंदर रखते हुए भी उन्होंने मेरी या मेरे बच्चों की तरफ नहीं देखा.

मेरा जी चाह रहा था कि पुकारूं, ‘सलीमन बूआ’, मगर उन की ठंडीठंडी बेरुखी ने मेरे होंठ सीं दिए.

‘‘लो बहन, बच्चे को पानी पिला दो,’’ एक औरत भीड़ को चीर कर बड़ी मुश्किल से मेरे पास पहुंची तो मेरी जान में जान आ गई.

‘‘बहन, बहुतबहुत शुक्रिया,’’ मैं इतना ही कह पाई.

‘‘शुक्रिया कैसा बहनजी, बच्चा जान दिए दे रहा था…मैं ने नरेश के पिता से पानी मंगवाया, कोई साथ में नहीं है क्या?’’

‘‘नहीं, मेरे पति मुझे स्टेशन पर मिल जाएंगे. मैं अपने मायके से आ रही हूं.’’

यह बात मैं ने सिर्फ सलीमन बूआ को सुनाने के लिए जरा ऊंची आवाज में कही. मगर वे उसी तरह ठस बनी बैठी खिड़की से बाहर देखती रहीं. बच्चे ने जी भर पानी पिया और मेरी ओर देख कर हंसने लगा.

इतने में ड्राइवर आ गया और उस ने हौर्न बजाया. खुश हो कर बच्चे ने पूछा, ‘‘अम्मा, अब बस चलेगी?’’

‘‘हां, बेटा…अब चलने ही वाली है.’’

‘‘आहा…बस चल रही है,’’ उस ने अपने नन्हेमुन्ने हाथों से ताली बजाई. 2-3 आदमी उस की मासूम खुशी देख कर हंसने लगे. मैं ने बड़ी उम्मीद से सलीमन बूआ की तरफ देखा कि शायद वे भी देखें, शायद उन के चेहरे पर भी मुसकराहट उभरे और शायद वे अपनी बेमुरव्वती अब न निभा सकें. मगर बूआ का चेहरा सपाट था, चिकना स्याह पत्थर, जिस पर हलकीहलकी झुर्रियों का जाल सा बंधा हुआ था. मैं ने सोचा, शायद बराबर में बैठा हुआ 8-9 बरस का लड़का उन का पोता होगा. वे उस से बातें कर रही थीं. वही आवाज, वही अंदाज, वही होंठों का खास खिंचाव…

मेरा नन्हा बाबी ऊंघने लगा था. मैं ने उस को गोद में लिटा लिया और उस के नर्म बालों में उंगलियां फेरते हुए बिना इरादा ही गुनगुनाने लगी, ‘‘चंदन का है पालना, रेशम की डोर, जीवे मेरा राजा बेटा…’’

एकाएक एक अजीब, बहुत अजीब सी बात हुई. सलीमन बूआ के चेहरे पर एक चमक सी आई, उन की नजरें मेरे चेहरे से होती हुई बाबी पर जम गईं. मेरा दिल जोरजोर से धड़क उठा, लव कांप रहे थे. मैं ने सोचा, अब सलीमन बूआ उठीं और अब उन्होंने मेरी गोद से बाबी को ले कर कलेजे से लगाया और अपनी उसी मीठी, सुरीली आवाज में गुनगुनाने लगीं, ‘चंदन का है पालना…’

वह उठीं और बीच की सीट पर मेरी तरफ पीठ किए बैठे आदमी से कहने लगीं, ‘‘ओ बच्चे, तू इधर मेरी सीट पर बैठ जा, मैं उधर बैठ जाऊंगी.’’ वह जरा कसमसाया, मगर सोने की चूडि़यों की चमक और खनक के रोब में आ गया. वह उठ कर बूआ की जगह जा बैठा और बूआ अपना भारी जिस्म समेट कर उस की जगह पर धंस गईं. अब मेरी तरफ उन की पीठ थी.

सबकुछ बदल गया था, मगर उन का जूड़ा नहीं बदला था. वही पहाड़ी आलू जैसा उजड़ा, सूखा जूड़ा और उस के गिर्द लाल फीता. मेरे दिल में गुदगुदी सी उठी, मैं सब कुछ भूल गई. मैं तो बस वही शोख और खिलंदरी परवीन बन गई थी जो दिन में कम से कम 15 बार बूआ का जूड़ा हिला कर ढीला कर दिया करती थी. तब बूआ मुहब्बत भरी झिड़कियां दे कर अपनी नन्ही सी चोटी खोल कर लाल फीता दांतों में दबाए नए सिरे से जूड़ा बनाने लगती थीं. मैं ने हाथ बढ़ा कर उन का नन्हा सा जूड़ा छू लिया तो उन के बदन में बिजली सी दौड़ गई. वे मुड़ीं और घूर कर मेरी तरफ देखा. मैं मुसकराई, फिर हंस पड़ी, ‘‘बूआ…’’ मैं ने आगे कुछ कहना चाहा, लेकिन बड़ी सर्द आवाज में और बड़ी नागवारी से उन्होंने तेज सरगोशी की, ‘‘मुझे बूआ न पुकारना… इस तरह तो मेरी बेइज्जती होगी, कहना हो तो आंटीजी कहो.’’ सहसा मेरे होंठों पर आई हंसी एक खिंचाव की सूरत में जम कर रह गई.

मां, ब्रेकअप क्यों न करा -भाग 2 : डायरी पढ़ छलका बेटी का दर्द

“सच कहूं, तो वह डायरी सुमनजी की मुझ से ज्यादा जिगरी सखी नजर आने लगी थी. 1-2 बार तो ऐसा भी हुआ कि मैं तुम्हारे घर आई, तो मैं ने सुमनजी को डायरी थामे देखा. इसलिए मैं खुद ही जल्दी वापस घर जाने का बहाना ढूंढ़ लेती थी. मैं उन के इन तनाव के दिनों में उन का अधिक से अधिक साथ देना चाहती थी. लेकिन, वो मुझे डायरी, हम दोनों के बीच एक अनजानी सी दूरी बढ़ा रही थी और दूरी केवल हम दोनों सखियों के बीच ही नहीं बढ़ रही थी. मैं देख रही थी कि पतिपत्नी के बीच में भी कुछ तनाव था, जबकि मेरे हिसाब से उन्हें तुम्हारे पापा के सहयोग और संवेदनाओं की जरूरत थी.

“तुम्हारे पापा सुमनजी से बहुत ही झिझड़ कर बात करते थे और मम्मी शांति बनाए रहती थी. ऐसा लगता था जैसे तुम्हारे पापा कोई जिद मनवाना चाह रहे हों. और उस में सुमनजी की सहमति नहीं रही हो. नतीजा तुम्हारी मम्मी को अपमान और अवहेलना के रूप में झेलना पड़ रहा है.

“जब तुम्हारे मामा इलाज के लिए मामी के साथ कीमोथैरेपी के लिए ग्वालियर आते थे, तो पापा की चिड़चिड़ाहट और भी अधिक बढ़ जाती थी. सुमनजी घर के माहौल को शालीन बनाए रखने के लिए न जाने क्या कुछ, कितना कुछ बरदाश्त कर रही थीं, यह मैं समझ तो रही थी, लेकिन उन्होंने कभी अपने मुंह से इस बारे में कोई जिक्र नहीं किया.’’

‘‘हां आंटी, मैं भी उन की बढ़ती हुई खामोशी को महसूस कर रही थी, खूब समझाती भी थी. लेकिन यह जानती थी कि अपने लाड़ले भाई की इस गंभीर अवस्था को देख कर उन का इस तरह विचलित होना स्वाभाविक ही है. पापा के असहयोग और तिरस्कार को उन्होंने मुझे कभी महसूस ही नहीं होने दिया.

“आंटी, याद कीजिए, उन्होंने कुछ न कुछ तो बताया होगा आप को कभी. केवल मामा की बीमारी उन्हें इतना कमजोर नहीं कर सकती थी. वे तो स्वयं उन्हें यहां बुला कर उन का बेहतर इलाज करा रही थीं. मुश्किल समय में पूरी हिम्मत के साथ जुटते हुए मैं ने उन्हें देखा है. फिर मामा के लिए वह इतना कमजोर कैसे हो गई. मुझे इस बात पर यकीन ही नहीं हो रहा कि मम्मी मामा की बीमारी की वजह से कितनी मायूस थीं. मुझ से जब फोन पर बात करती थीं तो बहुत ही औपचारिक सी बातें होती थीं, ऐसा लगता था जैसे बहुतकुछ छुपा कर वह बहुत थोड़ा सा मुझे बताना चाह रही हैं.

“आंटी, आप तो उन की बहुत नजदीकी सहेली थीं. ऐसा संभव ही नहीं कि उन्होंने आप से अपने मन की बात छुपाई है. अब तो मम्मी चली गई हैं. बताइए न आंटी, क्या हो रहा था यहां पर?’’

‘‘तुम सही कह रही हो तोशी. तुम्हारी मम्मी मुझ से बहुत अधिक दिनों तक सबकुछ छुपा कर नहींं रख सकी थीं. पता नहीं, मुझे तुम्हें बतलाना चाहिए या नहीं. लेकिन यह जानती हूं कि तुम उन की बिटिया हो, तुम्हें यह सब जरूर जानना चाहिए.

“तोशी, जिंदगी हमेशा एकजैसी कहां चलती है. सुमनजी अमेरिका में बेटे अमन के तलाक से बहुत ही तनावग्रस्त रहती थीं. बेटा विदेश में अकेला पत्नी से हो रहे अलगाव को सह रहा था.

“हां, तुम्हारे लिए वे संतुष्ट थीं कि उन की लाड़ली बेटी को आत्मीय और संस्कारी परिवार मिल गया है कि तभी मन्नू भैया के गले के कैंसर के बारे में पता चला. सुमनजी के तो पैरों तले ही जमीन खिसक गई थी. मातापिता बहुत बुजुर्ग हैं. भैयाभाभी उन्हीं की सेवा कर रहे थे कि अब यह परेशान आन पड़ी थी. सुमन उन सभी की सहायता करना चाहती थी, लेकिन तुम्हारे पापा को छोड़ कर जाना और लंबे समय तक शिवपुरी में रहना संभव न होता, इसलिए उन्होंने भैयाभाभी को मुंबई जा कर इलाज कराने की जगह ग्वालियर के कैंसर अस्पताल में इलाज कराने की सलाह दी थी.

मुन्ने भैया के साथ शुरू में भाभी आती थीं और लगातार साथ में रहती थीं, लेकिन शिवपुरी में पापा मम्मी को बहुत समय अकेला न छोड़ना पड़े, इसलिए कई बार मन्नू भैया यहां अकेले रह जाते थे और भाभी, पापामम्मी के पास शिवपुरी पहुंच जाती थी. सुमन अपने मन्नू भैया का भरपूर खयाल रखती थी. समय पर दवाई, उन की सेवा सबकुछ वह अपनी नौकरी के साथ और कभी छुट्टी ले कर मैनेज कर रही थीं. लेकिन, मैं देख रही थी कि तुम्हारे पापा को मन्नू भैया का यहां रहना पसंद नहीं आ रहा था. उन के यहां रहने पर वह बहुत चिढ़चिढ़े से नजर आते थे. माहौल न बिगड़े, इसलिए सुमन झूठी मुसकान लिए काम करती रहती थी. हालांकि पड़ोसी दंपती की बातचीत सुनना अच्छी बात नहीं है. लेकिन, एक बार जब मैं सुमन से मिलने आ रही थी, तो दरवाजा आधा खुला हुआ था. अंदर से तुम्हारे पापामम्मी की तीखी बहस मुझे सुनाई दी. मैं तो यह समझ कर बिना बैल बजाए आ रही थी कि इस वक्त तुम्हारे पापा घर पर नहीं होंगे और यही वक्त होता था जब हम दोनों सखियां अपने मन की बातें किया करते थे.

“भाई साहब कह रहे थे, ‘‘नहीं, मैं ने कह दिया न, अब और नहीं. भारत के सारे कैंसर मरीज मुंबई पहुंचते हैं. तुम ने इन्हें ग्वालियर की राह क्यों दिखाई? तुम सारा दिन उन्हीं की सेवा में लगी रहती हो. पैसा खर्च हो रहा है, सो अलग. अब दवाएं, टेस्ट और स्पेशल डाइट के लिए उन से पैसे तो मांगने से रहा. कीमो और बड़ी जांचों के वह पैसे दे देते हैं तो क्या.

“और सच कहूं न, तो मुझे उन का विकृत चेहरा बिलकुल बरदाश्त नहीं है. मैं ढंग से खापी रहा हूं न, ढंग से रह पा रहा हूं. डाक्टर कहे या न कहे, मुझे तो लगता है कि यह कैंसर भी छूत की बीमारी है. बस बहुत हो गई सेवा. अब इन से कह देना कि जब भी ग्वालियर आएं, सीधे अस्पताल जाएं. और अगर रुकना है तो होटल में कोई कमरा किराए पर लिया करें.’’

‘‘आप कैसी बातें कर रहे हैं? वह मेरा दूर का रिश्तेदार नहीं सगा भाई है. आप को अधिक समय अकेला न रहना पड़े, इसलिए मैं स्वयं शिवपुरी न जा कर उन्हें यहां रख कर अपने मन को तसल्ली दे रही हूं. मेरे रहते वह भला किराए का कमरा क्यों लेगा. मैं ने आप के मातापिता की भी भरपूर सेवा की है.

“आप के पिताजी की गंभीर बीमारी में तो कभी आप ने संक्रमण की चिंता जाहिर नहीं की. जरूरत पड़ने पर हमारे खूने के रिश्ते भला किसी और के मोहताज क्यों हो? क्या मेरी तकलीफ, मेरा दुख आप का अपना नहीं है? मुझे आप के इस तरह के व्यवहार ने बहुत निराश किया है.”

न्याय में देरी

न्याय लोकतंत्र का अहम आधार है जो तेजी से पंगु होता जा रहा है. न्याय मिलने में देरी से आम आदमी का न्यायिक प्रक्रिया पर से विश्वास उठता जा रहा है और लोग इस व्यवस्था से अब चिढ़ने लगे हैं. आखिर क्यों न्याय आम आदमी से दूर होता जा रहा है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में 4 दशक पहले दायर की गई एक अपील पर फैसला देते हुए सजायाफ्ता राजकुमार को सभी आरोपों से बरी कर दिया. यह अपराध 1981 में किया गया था.

सैशन कोर्ट का फैसला 1982 में आया और अपील का निबटारा 2022 में आ कर हुआ. राजकुमार इतने सालों तक जेल में रहे. दोषी वे अकेले नहीं थे बल्कि 3 और लोग थे जो अब इस दुनिया में नहीं हैं. जरा अजीब नहीं लगता कि एक इंसान को सजा दी गई और उस की अपील पर फैसला 40 साल बाद आता है और फिर उसे बरी कर दिया जाता है. लेकिन इतने सालों तक उस की तकलीफभरी जिंदगी का क्या? कौन लौटाएगा उन के इतने साल? यह पहला ऐसा मामला नहीं है जिस में न्याय देने में जरूरत से ज्यादा देरी हुई हो. कुख्यात बेहमई कांड, जिस में फूलनदेवी और उन के साथियों ने 20 से अधिक लोगों को गोलियों से भून दिया था, 40 साल बाद भी न्याय के लिए प्रतीक्षारत है.

इस मामले के ज्यादातर अभियुक्त, गवाह और यहां तक कि पीडि़त भी न्याय की प्रतीक्षा करतेकरते गुजर चुके. ऐसे मामले इतने अधिक हैं कि उन्हें अपवाद भी नहीं कहा जा सकता. वास्तव में जो अपवाद होना चाहिए उसी ने नियम का रूप ले लिया है क्योंकि अधिकतर मामलों में 15-20 साल की देरी होना आम हो गया है. देरी उन मामलों में होती है जिन्हें संगीन माना जाता है. उन्नाव में गैंगरेप के बाद इंसाफ के लिए दरदर भटक रही पीडि़ता को गैंगरेप के ही आरोपी ने कोर्ट जाते वक्त जिंदा जला दिया. आरोपी कुछ दिनों पहले ही जमानत पर रिहा हो कर आया था. ढीले सिस्टम की वजह से एक साल से इंसाफ से लिए भटकती पीडि़ता को आखिरकार अपनी जान गंवानी पड़ी. लगातार मिलती धमकियों के बाद भी यूपी की लचर पुलिसिंग व्यवस्था पीडि़ता को सुरक्षा नहीं दे पाई और न ही कोर्ट उसे इंसाफ दिला पाया. लेकिन गुनहगारों को जमानत मिल गई, कैसे? यह सिर्फ यूपी की बात नहीं है, बल्कि पूरे देश में ऐसा हो रहा है.

देश को ?ा?ाकोर कर रख देने वाले निर्भया कांड में भी क्या हुआ. 18 दिनों बाद चार्जशीट फाइल करने के बाद इंसाफ मिलने में 7 साल लग गए. यानी 2,566 दिन. निर्भया के मातापिता को हाईकोर्ट से सुप्रीमकोर्ट में 2 साल सिर्फ तारीख मिलने में लग गए थे. कानून बदले, सख्ती बढ़ी लेकिन बदल नहीं पा रहा तो वह है देश का सिस्टम. कहने को तो वह पहला सामूहिक बलात्कार और हत्या का मामला था मगर फिर भी न्याय की रफ्तार धीमी ही चलती रही. रेप पीडि़ता को इंसाफ क्या राजनेताओं के जमावड़े, कैंडल जलाने, आंसू बहाने या फिर धरने पर बैठने से मिलेगा? खासकर यूपी में आएदिन महिलाओं और लड़कियों के साथ ऐसी घटनाएं हो रही हैं. यहां भी महिलाएं और लड़कियां ही दोषी हैं क्योंकि उन्हें अकेले घर से नहीं निकलना चाहिए था, उसे ऐसेवैसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए थे, सजधज कर बाहर नहीं निकलना चाहिए.

जब देश के बड़े नेतागण ही ऐसे ब्यानबाजी करें कि जवानी में गलतियां हो जाती हैं तो फिर सोचिए, अपराधियों के मन में भय कहां से आएगा? आजादी के 75 साल बाद भी अगर आदमी को इंसाफ के लिए दरदर भटकना पड़ रहा हो, इंसाफ के बदले केवल उसे तारीख पे तारीख मिल रही हो तो यह बड़े अफसोस की बात है. दरअसल, हमारे देश का सिस्टम ढीलतंत्र है. आतंकी घटनाओं, सामूहिक हत्याओं, बड़े पैमाने पर हिंसा, बलात्कार, दुष्कर्म, कत्ल, दंगे सरीखे जघन्य अपराधों में भी ऐसा होता है. देश की अदालतों पर मुकदमों का बो?ा, जजों के खाली पद, नई अदालतें बनाने के वादे, सब मुंहबाए सरकार से उम्मीद लगाए देख रहे हैं. 2014 के फरवरी में जारी किए गए बीजेपी के घोषणापत्र में कहा गया था कि अगर वह सरकार में आई तो अदालतों की संख्या ही नहीं, बल्कि जजों की संख्या भी तेजी से बढ़ाई जाएगी, ताकि लंबित मुकदमों का बो?ा हटाया जा सके.

लेकिन अगर ऐसा होता तो भारतीय न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति को ले कर सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच टकराव न बढ़ता. बड़ी संख्या में लंबित मामलों के निबटान के लिए सुप्रीम कोर्ट लगातार जजों की संख्या को बढ़ाने की बात कह रहा है पर ऐसा किया नहीं जा रहा है. जजों की संख्या बढ़ाने की जरूरत क्यों है वर्तमान में देशभर में लंबित मामलों की संख्या साढ़े 4 करोड़ से ज्यादा है जिन की जल्दी सुनवाई के लिए जजों की संख्या को बढ़ाया जाना जरूरी है. पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक, देशभर के न्यायालयों में 15 सितंबर, 2021 तक लंबित मामलों की संख्या 4.5 करोड़ से ज्यादा थी. अध्ययन के मुताबिक, देश में 2010 और 2020 के बीच लंबित मामलों की संख्या 2.8 फीसदी की दर से सालाना वृद्धि हुई. आंकड़ों के मुताबिक, अगर इस के बाद कोई नया मामला दर्ज नहीं होता तो भी सुप्रीम कोर्ट को सभी बचे मामलों को निबटाने में 1.3 वर्ष का समय लगता. वहीं हाईकोर्ट और सबऔर्डिनेट कोर्ट को लंबित मामलों को खत्म करने में 3.3 वर्ष का समय लगता.

लौकडाउन में पारिवारिक विवादों का आंकड़ा बढ़ा तो तलाक का मामला कोर्ट तक जा पहुंचा जबकि 6,347 प्रकरण पहले से लंबित हैं. कानूनी विषय के जानकार कहते हैं कि क्रिमिनल अपील में देरी और बैकलौग का बो?ा एक बड़ा मसला है. ‘जल्दी’ (जस्टिस, एक्सेस एंड लोवरिंग डिलेस इन इंडिया) पहल की प्रमुख दीपिका किन्हल का कहना है कि 1958 में पहले विधि आयोग ने पाया था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के पास 3,727 अपीलें पैंडिंग थीं. लेकिन आज यह आंकड़ा बढ़ कर 16,276 अपीलें हो चुका है. देश के लगभग सभी हाईकोर्ट्स की ऐसी ही स्थिति है. मध्य प्रदेश में 87,617 अपीलें पैंडिंग हैं, पंजाब और हरियाणा में 68,956 और राजस्थान में 49 हजार से ज्यादा व पटना में 36,818 केस पैंडिंग हैं. इस से यह पता चलता है कि फैसले को ले कर कितनी बड़ी परेशानी है.

इस तरह से देश के सभी हाईकोर्ट्स में 10 साल से 2.5 लाख केस पैंडिंग चल रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट सालाना औसतन 6,000 मामलों पर फैसला देता है. अगर सुप्रीम कोर्ट इन सभी क्रिमिनल अपीलों का निबटारा करने की सोचे तो कोई दूसरा काम किए बगैर उसे 40 साल से ज्यादा समय लगेगा. मथुरा, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल का कहना है कि देर से न्याय मिलना अकसर निरर्थक साबित होता है. एक घटना याद करते हुए उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति ने अपने बेटे की सड़क दुर्घटना में मौत हो जाने के 25 साल बाद मुआवजा लेने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि, ‘‘जज साहब, कृपया यह रकम आप अपने पास ही रख लीजिए.

25 साल पहले एक सड़क दुर्घटना में मेरे बेटे की मौत हो जाने के बाद मु?ो अपने पोतों की परवरिश और शिक्षा के लिए इन रुपयों की काफी जरूरत थी. लेकिन अब मु?ो ये रुपए नहीं चाहिए क्योंकि वे सभी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुके हैं.’’ ‘डिलेड इन जस्टिस डिनाइड.’ यह एक इंग्लिश कहावत है. हमारे देश में न्याय इतना विलंब से मिल पाता है कि वह अन्याय के बराबर ही होता है. छोटेछोटे जमीन के टुकड़ों को ले कर 50-50 साल मुकदमे में निकल जाते हैं. फौजदारी के मामलों में तो स्थिति और भी गंभीर है. अपराध में मिलने वाली सजा से ज्यादा तो लोग फैसला आने के पहले ही काट चुके होते हैं. यह सब केवल इसलिए क्योंकि मुकदमे की सुनवाई और फैसले की गति बहुत सुस्त है. रूल औफ लौ इंडैक्स रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में प्रशासनिक एजेंसियां बेहतर प्रदर्शन नहीं करतीं और न्यायिक प्रणाली की गति बहुत धीमी है. इस की मुख्य वजह अदालतों में मामलों की बेतहाशा बढ़ती संख्या और कार्यवाही में होने वाली देरी है.

चुनौतियों का अंबार आज न्यायपालिका के समक्ष सब से बड़ी चुनौती अदालतों में मुकदमों के बो?ा को कम करना है और यह तभी संभव हो पाएगा जब न्यायालयों में कार्य अवधि की सीमा बढ़ाई जाएगी. विधि आयोग की सिफारिशों में इस बात पर गौर किया गया कि लंबित मुकदमों के निबटारे के लिए कोर्ट में छुट्टियों के दिनों में कटौती की जानी चाहिए. अमेरिकी विचारक अलेक्जैंडर हैमिल्टन ने कहा था, ‘‘न्यायपालिका राज्य का सब से कमजोर तंत्र होता है क्योंकि उस के पास न तो धन होता है और न ही हथियार. धन के लिए न्यायपालिका को सरकार पर आश्रित रहना पड़ता है और अपने लिए दिए गए फैसलों को लागू कराने के लिए उसे कार्यपालिका पर निर्भर रहना होता है.’’ विधि आयोग की 120वीं रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत दुनिया में आबादी एवं न्यायाधीशों के बीच सब से कम अनुपात वाले देशों में से एक है. अमेरिका और ब्रिटेन में 10 लाख लोगों पर करीब 150 न्यायाधीश हैं जबकि भारत में इतने ही लोगों पर मात्र 10 न्यायाधीश हैं.

राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन की रिपोर्ट राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक बीते 3 दशकों में मुकदमों की संख्या दोगुनी रफ्तार से बढ़ी है. अगर स्थिति ऐसी ही बनी रही तो अगले 30 सालों में देश की विभिन्न अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या 15 करोड़ तक पहुंच जाएगी. साल 2018 के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय अदालतों में 3.3 करोड़ से भी अधिक मामले अभी भी विचाराधीन हैं. विशेषज्ञ बताते हैं कि कोर्ट में छुट्टियों के चलते यह आंकड़ा बढ़ता ही जाता है. लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर अदालतों में इतनी छुट्टियां मिलती क्यों हैं और छुट्टियों का नियम आया कहां से? लोगों का कहना है कि अदालतों में गर्मी की छुट्टियों का नियम अंगरेजों के जमाने से चला आ रहा है. गरमी की छुट्टियों में अंगरेज जज किसी पहाड़ी इलाके या फिर इंग्लैंड में छुट्टी बिताने जाया करते थे. वकील और मानवाधिकार असीम सरोड़े का कहना है कि पुराने नियमों और व्यवस्था को ढोते रहने से अच्छा नई व्यवस्था लागू होनी चाहिए. हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि अदालतों में छुट्टियां जरूरी हैं. जस्टिस पारानथमन कहते हैं, ‘‘छुट्टियां कोई मुद्दा नहीं है. अदालतों में लंबित मामले हैं क्योंकि किसी तरह की जवाबदेही नहीं है. हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं. निचली अदालतों में अगर कोई फैसला 2 साल में नहीं आता है तो लोग उन से देरी को ले कर सवाल करते हैं.

लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट से यह सवाल पूछने वाला कोई नहीं है. ऐसे में कानूनी मामले 20 साल तक चलते रहते हैं.’’ दिल्ली हाईकोर्ट के सभी केसेज को ले कर की गई एक स्टडी में पता चला कि 70 प्रतिशत देरी के मामलों में वकीलों ने 3 बार से ज्यादा समय मांगा था. इस से साफ है कि जब तक जज ऐसे वकीलों पर सख्त नहीं होते, अपील की पैंडेंसी बनी रहेगी. आज बदलाव के दौर में न्यायपालिका में समय की पाबंदी तय कर के लोगों को इंसाफ देना वक्त की सब से बड़ी जरूरत बन गया है जिस से लोगों का अदालतों पर विश्वास बढ़ेगा तथा कानूनी शिकंजा कसने, सजा की दर बढ़ने से अपराधों में भी अपनेआप नकेल कस जाएगी. निचली अदालतों से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमों के ढेर के साथ लोगों को न्याय मिलने में देरी या फिर न्याय न मिलने की अन्य वजहें भी हैं- देश की कम से कम 85 फीसदी से भी ज्यादा आबादी ऐसी है जिस के पास कोर्ट में मुकदमों की पैरोकारी के लिए या तो पर्याप्त धन नहीं है या फिर इस की वजह अज्ञानता या न्यायालयों का दूर होना है. इस के बावजूद उन के विवाद ऐसे हैं जिन में उन्हें न्याय मिलना चाहिए. पेशे से वकील रह चुके राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अदालतों की भाषा को ले कर महत्त्वपूर्ण बात कही थी. 6 मार्च को औल इंडिया स्टेट जुडिशियल अकैडेमीज डायरैक्टर्स, रिट्रीट में राष्ट्रपति ने कहा था,

‘‘भाषाई सीमाओं के कारण कोर्ट में वादी को अपने ही मामलों में लिए गए फैसलों को सम?ाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है.’’ उन्होंने सु?ाव देते हुए कहा था, ‘‘सभी उच्च न्यायालय अपनेअपने प्रदेश की लोकल भाषा में जनहित के फैसलों का प्रामाणिक अनुवाद प्रकाशित और उपलब्ध कराएं.’’ इस बात को ले कर अकसर बहस होती है कि पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा हो या नहीं. नई शिक्षा नीति में सिफारिश भी की गई कि 5वीं क्लास तक मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा को शिक्षा का मीडियम बनाया जाए लेकिन यह सवाल नहीं उठाया जाता कि अदालती भाषाएं आम आदमी के सम?ाने योग्य क्यों नहीं बनाई जाती हैं? 1950 से ही विधि आयोग की जितनी भी रिपोर्ट्स आईं, उन में जजों की संख्या बढ़ाने पर गौर किया गया था. अदालतों में मुकदमों की फाइलें साल दर साल बढ़ती जा रही हैं जो देश की न्यायिक व्यवस्था के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही हैं. सरकार ने इस ओर ज्यादा ध्यान इसलिए नहीं दिया क्योंकि इस से उस के वोटबैंक पर कोई खास असर नहीं पड़ता. न्याय का शासन जोकि लोकतंत्र का अहम आधार है तेजी से पंगु होता जा रहा है.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि समय पर न्याय करने में सिस्टम की अक्षमता के चलते अभियुक्त को कैद में रखना अन्याय है. राजकुमार के केस में यह अन्याय तो और भी बढ़ गया. न्याय मिलने में देरी से आम आदमी का न्यायिक प्रक्रिया पर से विश्वास उठता जा रहा है और लोग इस व्यवस्था से अब चिढ़ने लगे हैं. इस से समाज में आपराधिक मामले बढ़ने लगे हैं और आपराधिक प्रवृत्ति के लोग छोटा या बड़ा गुनाह करते हुए सजा की परवा नहीं करते. जो पैसे वाले बड़े लोग हैं वे तो कैसे भी कर के बच निकलते हैं. लेकिन आम आदमी, जिस के पास न पावर है और न ही पैसा, उन के मुकदमे की फाइलें कहीं भीड़ में नीचे दब जाती हैं जिस से मुकदमेबाजी में फंसे लोगों में हताशा और निराशा बढ़ रही है. इस का सामाजिक नुकसान बहुत बड़ा है और इस का अनुमान लगाना भी मुश्किल है. इस समस्या के कई पहलू हैं. जजों की संख्या बढ़ाना उन में से एक है लेकिन सिर्फ जजों की संख्या बढ़ाना ही काफी नहीं होगा. न्याय की गुणवत्ता पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है. निचली अदालतों में जितने सक्षम जज होंगे, ऊपरी अदालतों पर उतना ही कम बो?ा पड़ेगा. अधिकतर मुकदमे निम्न और मध्य वर्ग के लोगों के होते हैं और ये मुकदमे लड़े भी निचली अदालतों में जाते हैं.

इन में से कुछ ही फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालतों का रुख करते हैं और इस की वजह है साधनों की कमी. यानी मुकदमों का ढेर मुख्य रूप से निचले स्तर पर है और किसी भी सम?ादार शासक को समाज में शांति, स्थिरता और संतोष बनाए रखने के लिए सब से पहले इस का खयाल रखना चाहिए. इसलिए यह जरूरी है कि न्यायिक व्यवस्था को निचले स्तर पर ताकतवर बनाया जाए और फिर संख्या को ऊपरी स्तर पर उसी अनुपात में बढ़ाया जाए. हमारे देश में न्याय की कई शाखाएं हैं, जैसे अलगअलग टैक्स ट्रिब्यूनल, औद्योगिक अदालतें, कंपनी लौ बोर्ड, उपभोक्ता और सहकारिता अदालतें, राजस्व ट्रिब्यूनल और पारिवारिक अदालतें. इस के अलावा कई मामलों में फास्ट ट्रैक अदालतें और विशेष अदालतों का भी गठन किया जाता है.

साथ ही, अदालतें लोक अदालतें भी आयोजित करती हैं ताकि दोनों पक्ष परस्पर सहमति से विवाद का हल निकाल सकें. इस के अलावा कई पंचाट भी हैं जो सम?ातों और आपसी सहमति के आधार पर मामले सुल?ाते हैं. लेकिन इन सब के बावजूद मुकदमों की बढ़ती संख्या पर कोई खास असर नहीं है. हालांकि ऐसा नहीं है कि मुकदमे पूरी तरह से खत्म हो जाएंगे. व्यवस्था कैसी भी हो, मुकदमे तो रहेंगे ही. दीवानी और फौजदारी मामलों का कई सालों तक अदालतों में लटके रहना समाज की स्थिरता और उन्नति के लिए नुकसानदेह है. अन्याय और निराशा की भावना निश्चित तौर पर अराजकता को भड़काने का काम करेगी. क्योंकि समाज की उन्नति के लिए जरूरी है कि समाज में स्थिरता और शांति बनी रहे. विदेशों में खुशहाली का कारण समय व नियमानुसार केसों का निबटारा माना जाता है. इसलिए अब भारत को भी उचित कदम उठाने चाहिए.

हमारे देश में हजारों केस सुनवाई के इंतजार में न्यायालयों में लंबित पड़े हैं. लाखों लोग न्याय के लिए राह ताक रहे हैं. अदालतों में लंबित केसों का सब से बड़ा कारण जजों की कमी माना जा रहा है. एडवोकेट पीयूष जैन का कहना है, ‘‘आज की कानून व्यवस्था में अकसर प्रतिवादी को नोटिस के बाद सुनवाई में महीनों लग जाते हैं. जबकि समय निर्धारित प्रक्रिया में अधिकारी की जवाबदेही, नियमों का विधिवत पालन, पेपरलैस प्रक्रिया को मान्यता मिलने से कार्य जल्द निबट सकते हैं. इसी तरह लोअर कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक केस के निबटारे की समयसीमा तथा जजों की अपने फैसलों के प्रति जवाबदेही तय होनी चाहिए.’ उन का यह भी कहना है कि 22वीं सदी में 19वीं सदी के कानूनों, न्यायपालिका में बदलाव की प्रक्रिया अपनाई जाए. इसी तरह वकीलों की बारबार सुनवाई टालने की प्रथा को भी रोकना होगा.

विधि की एक स्टडी में पता चला कि दिल्ली हाईकोर्ट में 70 प्रतिशत देरी के मामलों में वकीलों ने 3 बार से ज्यादा वक्त मांगा था. विधि सैंटर फौर लीगल पौलिसी की दीपिका कहती हैं, ‘‘राजकुमार को संविधान में दिए अधिकार का इस्तेमाल करने में 4 दशक लग गए. जबकि अन्य को मौका ही नहीं मिला. यह मानवधिकार उल्लंघन की श्रेणी में आता है.’’ ‘तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख.’ ‘दामिनी’ फिल्म का यह डायलौग भारत की न्याय व्यवस्था का सच बताने के लिए पर्याप्त है. भले ही सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश यह कहें कि जब चीजें गलत होती हैं तो लोगों को यह भरोसा होता है कि न्यायपालिका से उन्हें राहत मिलेगी. यह सही नहीं है क्योंकि मुसीबत में पड़े लोग जब न्यायालय के पास जाते हैं तो अकसर उन्हें तारीख पे तारीख के सिलसिले से जू?ाना पड़ता है. लोग अपनी नाक के नीचे ही देर और अंधेर का शिकार हैं. न्याय में देरी से केवल आर्थिक विकास ही प्रभावित नहीं होता, बल्कि सामाजिक विकास पर भी बुरा असर पड़ता है. इस के अलावा लोगों का लोकतंत्र और उस की व्यवस्थाओं पर से भरोसा उठता जाता है. इतना ही नहीं, इस से कानून के शासक को गंभीर चोट पहुंचती है और इस के नतीजे में अराजक तत्त्वों, अपराधियों और देशविरोधी ताकतों को बल मिलता है. ये सब जानते हैं कि सड़कों पर उतर कर अराजकता फैलाने, रास्ते रोकने, पुलिस थानों पर हमला करने के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं.

शेष शर्त- भाग 2 : अमित के मामाजी क्यों गुस्साएं?

‘‘आप को मेरा खानदान शादी के पहले देखना था, बाबूजी.’’

मामाजी भड़क उठे, ‘‘मुझ से जबान मत चलाना, वरना ठीक न होगा.’’ बात बढ़ती देख अमित पत्नी को धकियाते हुए अंदर ले गया.

मैं लज्जा से गड़ी जा रही थी. पछता रही थी कि आज रुक क्यों गई. अच्छा होता, जो शाम की बस से घर निकल जाती. यों बादल बहुत दिनों से गहरातेघुमड़ते रहे होंगे, वे तो उपयुक्त अवसर देख कर फट पड़े थे. थोड़ी देर बाद मामी ने नौकरानी की सहायता से खाना मेज पर लगाया. मामी के हाथ का बना स्वादिष्ठ भोजन भी बेस्वाद लग रहा था. सब चुपचाप अपने में ही खोए भोजन कर रहे थे. बस, मामी ही भोजन परोसते हुए और लेने का आग्रह करती रहीं. भोजन समाप्त होते ही मामाजी और अमित उठ कर बाहर वाले कमरे में चले गए. मैं ने धीरे से मामी से पूछा, ‘‘विभा…?’’

‘‘वह कमरे से आएगी थोड़े ही.’’

‘‘पर?’’

‘‘बाहर खातीपीती रहती है,’’ उन्होंने फुसफुसा कर कहा.

मैं सोच रही थी कि विभा बहू की जगह बेटी होती तो आज का दृश्य कितना अलग होता.

‘‘देखा, सब लोगों का खाना हो गया, पर वह आई नहीं,’’ मामी ने कहा.

‘‘मैं उसे बुला लाऊं?’’

‘‘जाओ, देखो.’’

मैं उस के  कमरे में गई. उस की आंखों में अब भी आंसू थे. मुझे यह जान कर आश्चर्य हुआ कि अमित उसे मेरे कारण औफिस का काम बीच में ही छुड़वा कर ले आया था और ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. जब भी कोई मेहमान आता, उसे औफिस से बुलवा लिया जाता.

‘‘तुम ने अमित को समझाने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘कई बार कह चुकी हूं.’’

‘‘वह क्या कहता है?’’

‘‘औफिस का काम छोड़ कर आने में तकलीफ होती है तो नौकरी छोड़ दो.’’

क्षणभर को मैं स्तब्ध ही रह गई कि जब नए जमाने का पढ़ालिखा युवक उस के काम की अहमियत नहीं समझता तो पुराने विचारों के मामामामी का क्या दोष.

‘‘चिंता न करो, सब ठीक हो जाएगा. शुरू में सभी को ससुराल में कुछ न कुछ कष्ट उठाना ही पड़ता है,’’ मैं ने उसे धैर्य बंधाते हुए कहा.

फिर घर आ कर इस घटना को मैं लगभग भूल ही गई. संयुक्त परिवार की यह एक साधारण सी घटना ही तो थी. किंतु कुछ माह बीतते न बीतते, एक दिन मामाजी का पत्र आया. उन्होंने लिखा था कि अमित का तबादला अमरावती हो गया है, परंतु विभा ने उस के साथ जाने से इनकार कर दिया है.

पत्र पढ़ कर मुझे पिछली कितनी ही बातें याद हो आईं…

 

हिम्मत- भाग 3 : सही दिशा दे पाने की सोच

जब रांची में था. लगता है जैसे यहां किसी गलत सोहबत में है. शादी को राजी नहीं और घर पर भी रहता नहीं,’’ कहती हुई रोने लगी थीं अम्मां और हम तीनों सहयोगी एकदूसरे का मुंह देखते रहे.परेशान अम्मां मेरे कमरे से चली गईं. क्या करते हम. केशव के साथ हमारा रिश्ता सरकारी था और अम्मां के साथ भावनात्मक.

फिर कुछ ऐसा हुआ कि अम्मां ने हमारे पास आना छोड़ दिया. 2-3 दिन तक तो हम ने संयम रखालेकिन चौथे दिन खाना बनाने वाली बाई से बात की, ‘‘दीदीजरा पता करेंगी आपअम्मां नजर नहीं आतीं. वह तो इस समय रोजाना आती थीं हमारे पास.’’

‘‘वही तो पसंद नहीं आया न अम्मां के सपूत को. बेचारीभूखीप्यासी पड़ी रहती हैं घर में. सुबह मैं जो खाना बना जाती हूं वह भी वैसा ही पड़ा रहता है. मेरी तो यह समझ में नहीं आता कि अगर बाबू साहब के पास मां के लिए समय नहीं था तो उन्हें लाए क्योंवहां भरापूरा परिवार है अम्मां का. वहां से उठा कर यहां ला पटका बेचारी को. शुगर की बीमारी है उन्हेंइसी तरह भूखीप्यासी पड़ी रही तो कौन जाने कब कुछ हो जाए,’’ बाई ने कहा.

‘‘लेकिनहमारे पास अम्मां का आना उन्हें बुरा क्यों लगा?’’‘‘अरे भैयाजीबुरा तो लगेगा नजब अम्मां पूछताछ करेंगी. यह बात अलग है कि बाबू साहब की रासलीला बच्चाबच्चा जानता है. उसी रीना के पास रहते हैं न साहब दिनरात. दुनिया जानती हैबसअम्मां न जान पाएं. डरते होंगे लोगों से कि हिलेगीमिलेगीपासपड़ोस से जानपहचान होगी तो कच्चाचिट्ठा न खुल जाए.’’

‘‘क्यां अम्मां सब जानती हैंवह रोती क्यों हैं?’’‘‘हांभैयाजीकल झगड़ा हुआ था मांबेटे में. बेशर्म ने इतनी लंबी जबान खोली मां के आगे कि क्या बताऊं. मैं तो काम छोड़ कर जाने वाली थीपर अम्मां को देख रुक गई. ऐसी औलाद से तो बेऔलाद रहे इनसान. साहब पढ़लिखे हैं नअरेउन से तो मेरा अनपढ़ पति अच्छा थाजो कम से कम मां के आगे जबान तो नहीं खोलता था.’’

यह सुन कर हम तीनों सहयोगी सन्न रह गए थे.‘‘भैयाजीआप के पास अगर साहब के घर का पता हो तो उन के पिता को बुला दीजिएबहुत उपकार होगा आप का.’’‘‘नहींनहींदीदीहम किसी के घर में दखल नहीं दे सकते. यह तो उन की अपनी समस्या है,’’ मेरे सहयोगी ने इनकार कर दिया.बाई आंखें पोंछ खाना बनाने में लग गई. बेमन से मैं भी दिनचर्या में व्यस्त हो गया.

शाम 7 बजे के करीब बाई आई. चुपचाप खाना बनाती रही. नाराज सी लगी वहतो पूछ ही बैठा, ‘‘अम्मां कैसी हैंदीदी?’’‘‘जिंदा हैं अभी. मर जाएंगी तो पता चल ही जाएगा.’’‘‘ऐसा क्यों कहती होदीदी?’’‘‘तो और क्या कहेंभैया. अनपढ़ हैं न हमऊपर से औरत जात. ऐसी ही भाषा आती है हमें. पढ़ेलिखे अफसर लोगों के तौरतरीके हम जानते जो नहीं.’’

‘‘क्या केशव अभी तक लौटे नहीं?’’‘‘लौटे थे न. अम्मां ने चायनाश्ता परोसा थापर भूख नहीं हैकह कर चले गए उसी चुड़ैल के घर,’’ बड़बड़ाती हुई बाई काम निबटा कर जाने लगीतब सहसा बोली, ‘‘अम्मां का रोना हम से सहा नहीं जाताभैयाजी. हम अभी उस चुड़ैल के घर से उन्हें ले आते हैं. अगर कुछ हो जाए तो देखा जाएगा.’’

‘‘सुनोदीदी… रुको.’’बाई की हिम्मत पर अवाक रह गया मैं. मुझ से तो बाई ही भलीजिस में बुरे को बुरा कहने की हिम्मत तो है. अनुशासन का मारा मैं अपनी सीमारेखा में बंधा एक लाचार औरत की पीड़ा भी नहीं बांट पा रहा था.‘‘आप साथ चलिएभैयाजीबाहर ही खड़े रहना. बात मैं ही करूंगी. अगर वह हाथ उठा दें तो ही आप सामने आना.’’

‘‘वह आप पर कैसे हाथ उठा सकता है?’’ सहसा मेरे दोनों सहयोगी भी अंदर आते हुए बोले, ‘‘हमारे परिवार की सदस्या हैं आपहाथ तोड़ देंगे उस के. हम ने अभीअभी देखा वह रीना के घर ही गया है. हम सभी चलते हैं आप के साथ,”

“चलिए तो…’’असमंजस में पड़ गया मैं. सहसा दोनों सहयोगी भी साथ हो लिए थे.‘‘कोई फसाद तो नहीं हो जाएगा न. अगर उस ने कहा कि यह उस के घर का मामला हैहम कौन होते हैंतो…’’‘‘उस के घर का मसला तब तक थाजब तक वह उस के घर में था. जब कहानी दीवारें लांघ कर बाहर चली आए तब वह सब का मसला बन जाता है.’’

झटपट हो गया सब. बाई आगे थोड़ी दूरी पर थी और पीछेपीछे हम तीनों भी चल पड़े.अंधेरा घिर आया था. रीना दुकानों के ऊपर बने चौबारे में रहती थी. 20-25 सीढ़ियां चढ़ कर उस के कमरे में आते थे. अंधेरा था सीढ़ियों में.‘‘भैयाजीआप इधर ही खड़े रहना. मैं बाहर ही बुलाऊंगी उसे,’’ निर्देश सा दे कर बाई ने सीढ़ियों का दरवाजा खटखटा दिया.

‘‘कौन है?’’ रीना का स्वर था.दरवाजे से अंदर झांकते हुए बाई ने पूछा, ‘‘केशव साहब हैं क्या यहांउन्हें बाहर भेजिएमुझे बात करनी है.’’‘‘क्या बात करनी है?’’‘‘मैं ने कहा नमुझे साहब से बात करनी है. तुम साहब को बाहर भेजोसुना नहीं तुम ने.’’

‘‘तू इस तरह बात करने वाली कौन होती है…?’’‘‘मैं जो भी हूंहट पीछे. केशव साहब…’’ कहती हुई बाई ने रीना को धक्का दिया, ‘‘हाथ मत लगाना मुझेसमझी न. तेरे पास नहीं आई मैं. 25 साल हो गए मुझे इस गांव मेंआज तक मैं ये सीढ़ियां नहीं चढ़ीसमझी न तू. थूकूं भी न ऐसी चौखट परजहां तुझ जैसी औरत रहती है,’’ कहती हुई बाई अंदर घुस गई और केशव से बोली, ‘‘केशवजीआप बाहर आइए. अरेवाह साहबधन्य हो आप. वहां मां मर रही हैं. चायनाश्ता परोस कर अपने बच्चे का इंतजार कर रही थीं. भूख नहीं थी वहां और यहांपूरीभाजी उड़ा रहे हो. शर्म बेच खाई है क्या…आप बाहर आइएसुना कि नहीं.’’

‘‘यह क्या बदतमीजी हैबाई?’’ कहता हुआ दनदनाता केशव दरवाजे के पास चला आया था.‘‘अब तो बदतमीजी ही होगीसाहब. आप को पता है कि आप की मां भूखी पड़ी रहती हैं. सुबह का खाना दोपहर को और दोपहर का रात को फेंकती हूं. शुगर की बीमारी है न उन को. अगर अंदर पड़ी मर गईं वह तो क्या कर लोगेसाहब. क्या जवाब दोगे अपने बाप कोइलाज कराने लाए थे नयही इलाज हो रहा है.’’

‘‘केशवइस बाई की इतनी हिम्मत…?’’ रीना का स्वर फूटाजिस पर बाई का अंदर से उत्तर सुनाई दिया, ‘‘हाथ मत लगाना मुझे. सुना नहीं तुम नेघाटघाट का पानी पीने वालीतेरी इतनी औकात नहींजो मुझ से मुंह लगाए. तेरी तरह इज्जत नहीं बेच खाई मैं ने45 साल उम्र है मेरी. मेरे सामने तू इस बच्चे का सर्वनाश कर रही है. मैं ने कुछ नहीं कहा. यह दूधपीता बच्चा नहीं है न इसलिएलेकिन इस की मां का रोना मैं नहीं देख सकती. अभी घर चलो साहबमेरे साथअपनी मां को संभालो.’’

‘‘केशवतुम कुछ बोलते क्यों नहीं…?’’ रीना तिलमिला गई.रीना का तिलमिलाना हम साफ समझ रहे थे. मेरी जिंदगी का यह पहला अवसर थाजब मैं ऐसी स्थिति का सामना कर रहा था.‘‘साहबसीधेसीधे मेरे साथ चलोवरना मैं घसीट कर ले जाऊंगी. इनसानियत के नाते ही उस औरत को खाना खिलाओवरना वह मर जाएगी. तुम्हारी मां है वह. अरेअगर यह लड़की इतनी ही प्यारी है तो ब्याह कर घर क्यों नहीं ले जाते इसेक्यों पढ़लिख कर बैंक में अफसर बन कर भी खुद को इतना नीचे गिरा रहे होअपनी इज्जत संभालोसाहबअपना सर्वनाश मत करो. घर चलोसाहब.’’

तभी हमें धक्के जैसा आभास हुआ. क्या केशव ने बाई को धक्का दियासोचते हम तीनों झट से सीढ़ियां चढ़ गएमगर दृश्य कुछ और ही था. शायद रीना बाई पर झपटी थीजिस पर बाई ने ही उसे धक्का दे दिया था.‘‘हाथ मत लगानामैं ने कहा था न कलमुंही. अरीतू नौकरी छोड़ कर कोठे पर क्यों नहीं जा बैठती. 6 साल से तुझे देख रही हूं. हर 2 साल बाद एक नया लड़का फंसा लेती है. औरत है या…’’ भद्दी सी गाली दी थी उसे बाई ने.

केशव और रीना हम तीनों को सामने देख सन्न रह गए थे. शायद उन्हें पता थाउन की कथा कोई नहीं जानता. जो भाषा बार्ई ने बोलीवह हम तो नहीं बोल सकते थेमगर यह भी सच था कि वे दोनों ऐसी ही भाषा सुनने लायक थे.

रीना नीचे फर्श पर पड़ी रही और केशव गरदन झुकाए सीढ़ियां उतर गया. बाई हंस पड़ी. फिर बोली, ‘‘औरत बनी है तो औरत होने का हक भी अदा कररीना. अरी क्या मजबूरी है तुझे. अच्छीखासी नौकरी हैफिर क्यों वेश्या की तरह इज्जत बेचती हैयह कैसा शौक है भईहमारी तो समझ से भी परे है.’’

‘‘बस कीजिएदीदी. आइएचलिए.’’शर्म आ रही थी मुझेकैसे बैंक जा कर रीना और केशव से आंखें मिला पाऊंगा. अनैतिक जीवन ये दोनों जी रहे थेशरमा मैं रहा था.‘‘दीदीआइए,’’ मैं ने पुन: पुकारा.‘‘देखा न तू नेकैसे छोड़ गया तुझे केशवजरा सोचवह तेरा आदमी या सगा होता तो यों मेरे हाथ उठाते भी चुप रहता. क्या लगता है वह तेरा. कुछ भी तो नहीं. छोड़ दे उसे और अपना घर बसा. पढ़लिख कर भी क्यों गंदगी में पड़ी है तू.’’‘‘दीदीअब आप चलिए न,’’

इस बार मैं ने बाई का हाथ ही पकड़ लिया. स्वर भीग गया था मेरा. हम तीनों बाई को उस के घर तक छोड़ आए. पहली बार मैं ने बाई का घर देखा. साफसुथरा घर था उस का.‘‘आ जाओबेटाअंदर आ जाओ,’’ बार्ई ने बहुत ही आदर से कहा.तब वह मां जैसी ही लगी मुझे. वह अकेली थीपति नहीं था और संतान हुई नहीं. बसअपना पेट पालने को वह 3-4 घरों में खाना बनाने का काम करती थी.

बाई ने हमें अपने हाथ के लड्डू खिला कर विदा किया. काफी शांत हो चुकी थी तब तक वह.‘‘अभी रुक जानाबेटासाहब के गांव पत्र मत लिखना. क्या पतासुधर ही जाएं. अगर आंखों में रत्तीभर भी शर्म होती तो इतनी बेइज्जती काफी है. भैयाइतनी कड़वी जबान मैं ने आज तक नहीं बोली,’’ आतेआते पत्र लिखने से रोक दिया मुझे बाई ने. समय देना चाहती थी वह केशव को और हम भी चाहते थे सब सुलझ जाए और बात उस के घर तक न पहुंचे.

घर पहुंच कर हम तीनों की नजर केशव के आंगन में पड़ी. बत्ती जल रही थी और अंदर सब शांत था.‘‘चलोदेख कर आएंकेशव घर आया भी है या कहीं और चला गया. जहां इतनी बेशरमी सह लीवहां थोड़ी और सही. कहीं ऐसा न होअम्मां अभी भी अकेली हों,’’ मेरा सहयोगी बोला और उसी क्षण हम दबे पांव सामने घर में चल गए.सामने ही रसोई में केशव दिख गया. शायद खाना गरम कर रहा थाउलटे पैरों लौट आए हम. संतोष हुआ यह जान कर कि कहानी का यह मोड़ सुखद रहा.

भारी मन से खाना खाया हम ने. मेरे दोनों सहयोगी तो सो गएलेकिन मैं नहीं सो पाया. सोचने लगासंसार कितना विचित्र है न. कैसेकैसे जीव हैं हमारे आसपास. मनुष्य बन कर भी कई जानवर से जीते हैं. पढ़लिख कर भी जिन में संस्कार नहीं पनपे और बाई जैसे अनपढ़ इनसान भी हैंजो सही को सही दिशा में ले जाने से डरते नहीं.

केशव अगर सही मानता था स्वयं को तो क्यों गरदन झुकाए चुपचाप घर चला आया. कुछ अनैतिक स्वीकार किया होगा तभी तो शर्म का मारा चुप रहा. जब इतनी समझ है मनुष्य में तो क्यों ऐसा जीवन जीता है वहजिस में उसे अपने मानसम्मान की बलि देनी पड़े. और बलि भी ऐसी कि घर में काम करने वाली एक बाई ही आईना दिखा देसोचतेसोचते आंखें भारी हो गई मेरी.

सुबह जब बैंक जाऊंगा तब केशव और रीना का सामना होगा. शायद वह अपने आचरण पर लज्जित होंऐसी इच्छा जागी मन में और इसी आस में मेरी आंखें मुंद गईं.सुबहसुबह केशव हमारे पास आयाबैंक में छुट्टी की अर्जी देने. अम्मां को जालंधर ले जा रहा था डाक्टर को दिखाने. चुपचाप चला गया वह. मैं सोचने लगाकल अगर बाई हिम्मत न करती तो शायद केशव कभी न लौटता. क्या अपने जीवन में मैं भी जुटा पाऊंगा सही को सही कहने की हिम्मत. सही को सही दिशा दे पाने की हिम्मत.      

स्पा सेंटर में हुआ देहव्यापार का खुलासा

हर दूसरेतीसरे रोज पुलिस को मिली स्पा सेंटर पर रेड मारने की खबर हर शहर के अखबार में छपती रहती है और बताया जाता है कि स्पा सेंटर की आड़ में देहव्यापार चल रहा था. समाचार फिर शान से बनता है कि पुलिस ने फर्जी ग्राहक भेज कर भंडाफोड़ किया और मालिक या मालकिन देहव्यापार में लगी औरतों को पकडक़र जेल में बंद कर दिया.

इस के बाद क्या होता है. यह नहीं बताया जाता है. ये लड़कियां और मालिक मैनेजर कितने दिन बंद रहे और बाद में 2-3 साल बाद जज ने क्या फैसला सुनायायह भी पता नहीं चलता.

सब से बड़ी बात यह है कि यह कभी नहीं साबित होता कि देह व्यापार में लगी लड़कियों को क्या जबरदस्ती इस काम पर लगाया जा रहा थायह भी नहीं बताया जाता कि इस स्पा को बंद करने में समाज कितना सुधर गया. यह ढींग भी पुलिस नहीं मारती कि क्या लड़कियों को अपने घरों तक सुधार कर भेज दिया गया.

यह चटखारे वाली खबर असल में पुलिस के धंधे की पोल खुलती है पर मजेदार बात है कि लोग समझते हैं कि शायद यह अनैतिक धंधा बंद करने पर पुलिस ने तीर मारा है. देह व्यापार में आखिर खराबी क्या है. हर औरत का हक है वह जिस के साथ मर्जी हो उस के साथ सोएप्रेम में होने पर सोएशादी हो गई है इसलिए सोए या पैसे मिलते है इसलिए सोएउस के अपने बदन की जरूरत है इसलिए भी वह सोएं तो क्या हर्ज है.

अगर साथ सोने वाला खुश है तो पैसे भी दे सकता हैघर भी दे सकता है. साथ बच्चे भी पैदा कर सकता है. इसे गंदा व्यापार समझने का मतलब है आदमीऔरत के संबंध को गंदा समझता जो एकदम कुदरत के खिलाफ है.

हां जब इस काम का फायदा आदमी उठाने लगेंवे जबरन लड़कियां उठाकर लाएं और उन से धंधा कराएं और आमदनी जेब में रख लें तो गलत बात है पर जो समाचार छपते हैं उन में यह नहीं होता कि लड़कियां छुड़ाई गईउन्हें गुलामी से आजादी दिलाई गईउन्हें अपना पैसा दिलाया गया. समाजों ने कानून ऐसे बनाए हैं कि धंधा चलता रहे. पुलिस और दलाल माल बनाते रहें और औरतों को लूटा जाता रहे.

पुलिस अगर दखल न दे तो लड़कियां अपना खुद का गु्रप बना कर वेश्यावृति कर सकती हैं और  सारा पैसा बांट सकती हैं. पर वेश्याओं पर कानून और पुलिस की जंजीरें बांध कर पुलिस व मालिकों को यह दी गई कि कमाओ और लड़कियों को लूटो.

हाल इतना बुरा है कि शायद ही कोई समाचार छपना हो जिस में लडक़ी पुलिस में शिकायत दर्ज कराए कि उस का हिस्सा मालिकदलालपुलिस वाले खा गए. लड़कियों को बहला कर लाया गया और इस धंधे में जबरन ठूंसा गया इस के केस भी होते हों तो समाचार नहीं बनते. इस तरह के मामले में सुबूत जुटाने मुश्किल होते हैं इसलिए पुलिस हाथ नहीं लगाती. फिर पुलिस खुद लड़कियों को भगाने और धंधे में साथी हो तो वह लड़कियों की लूट की क्यों सुने.

देह व्यापार चल इसलिए रहा है कि इस में कानून अटका हुआ है. अगर कानून और समाज का अड़ंगा न हो तो देह व्यापार खतम हो जाएगालड़कियां अपनेआप खुद धंधा करेंगी और खुद कमाई करेंगी जैसे कोई खोमचे वाला करता है. आदमी और लडक़ी का सौदा अकेले होगाबिना कमीशन के. देह की मालकिन औरत हैवह किसे क्यों दे यह उस पर छोड़ेंइस देनलेन के जुर्म बना कर पुलिसकोठेवालोंदलालोंलड़कियों को उठाने का धंधा न बनाएं.     

व्यंग्य: मैं और मच्छर

कल मुझे कान के डाक्टर के पास जाने की सख्त आवश्यकता महसूस हुई. हुआ यों था कि कल शाम को
गलती से मेरे कमरे की खिड़कियां खुली रह गईं. इस कारण पूरे कमरे में मच्छरों का साम्राज्य हो गया. कमरे में जब मैं ‘मच्छर की आत्मकथा’ कविता पढ़ रहा था, तभी मच्छरों के दल ने मेरे शरीर के खुले हिस्सों पर हमला बोल दिया. कुछ पैर में काट रहे थे तो कुछ हाथ में काटने को तत्पर थे, पर कुछ ऐसे भी थे जो मेरे कान पर भी बैठ कर हमला बोल रहे थे, लेकिन मुझे भनक तक नहीं लग रही थी.

मच्छरों के विषय में यह सर्वविदित है कि वह हमला करने से पूर्व अपने होने या आने की सूचना देते हैं जैसे युद्ध शुरू होने से पूर्व शंख बजाया जाता है. लेकिन कल मुझे ताज्जुब हुआ जब मच्छरों की आवाज मुझे सुनाई ही नहीं दी जबकि मुझे कान में चुभन महसूस हो रही थी.

मैं ने कविता पढ़ना छोड़ कर मच्छरों की आवाज पर ध्यान केंद्रित किया, पर तब भी मुझे मच्छरों की भिनभिनाहट सुनाई नहीं पड़ी. अब मुझे न तो मच्छरों के काटने की चिंता थी और न ही मुझे मच्छरों को भगाने की. अब मुझे चिंता खाए जा रही थी कि क्या ध्वनि प्रदूषण के असर से मच्छरों की भिनभिनाहट सुनाई नहीं पड़ रही है या मेरे कानों में कोई खराबी आ गई है या फिर आजकल मच्छरों ने भिनभिनाना ही बंद कर दिया है?

कुछ समय पूर्व तक मच्छरों की भिनभिनाहट से मैं सचेत हो जाया करता था और गले के ऊपर के हिस्से को मच्छरों के प्रकोप से बचाने का पूर्ण प्रयास करता था लेकिन कल जब कान के कई हिस्सों पर सूजन
हो गई, तब मुझे लगा इस में मच्छरों का दोष नहीं है. मुझे सचेत करने में मेरे कान सक्षम नहीं हो पा रहे, यह जान कर मैं ने डाक्टर से संपर्क करना ज्यादा मुनासिब समझा.

मैं ने डाक्टर साहब से संपर्क साधा. मेरी बारी आने पर डाक्टर साहब ने बड़ी बारीकी से मेरे बांईं कान का
मुआयना किया और कान के पास फुसफुसा कर पूछा कि भई, क्या दिक्कत है? तो मैं ने चिंतित स्वर में कहा,“डाक्टर साहब, सुनने में कुछ परेशानी हो रही है.”

उन्होंने दाएं कान का भी अवलोकन किया और पिछली आवाज से कम आवाज में फिर फुसफुसा कर ही पूछा कि यह तकलीफ कितने दिनों से है? मैं ने गंभीरता से जवाब दिया, “कल से ही…” और इस के बाद मैं ने सारा वाकेआ संक्षेप में बताया कि मुझे कल मच्छरों की भिनभिनाहट सुनाई ही नहीं पड़ी, तो मैं फौरन सलाह हेतु आप के पास आ गया.

मेरी बातें सुन कर डाक्टर साहब ने मुझे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा और फिर परचे पर मेरा नाम और पता लिखने के बाद मुझ से पूछा कि आप करते क्या हैं? मैं ने बताया कि एक सरकारी नौकर हूं और फिलहाल इसी शहर में काम करता हूं, तो उन्होंने कहा, “हो सकता है कि आप के कार्यालय का वातावरण अधिक शोरपूर्ण हो, इस कारण आप के सुनने की क्षमता कुछ कम हो गई हो, अन्यथा कान में कोई गङबङी नहीं लग रही. पर हां, मेरी सलाह होगी कि इन छोटीछोटी बातों पर ध्यान न दें. आप तो सरकारी आदमी हैं. इसलिए भलीभांति आप इस के अभ्यस्त होंगे कि छोटीछोटी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए. सरकारों का फोकस तो हमेशा बड़े कामों पर होता है. इसलिए मेरा सुझाव है कि मच्छरों के विषय में ज्यादा न सोचें. आप बेकार ही परेशान हो रहे हैं. इस विषय में ज्यादा न सोचें नहीं तो आप मानसिक विकृति के भी शिकार हो सकते हैं.”

डाक्टर साहब का यह सुझाव सुन कर मेरा कान तेजी से बजने लगा और मैं आननफानन में डाक्टर साहब से विदा ले कर घर की तरफ चल दिया।

बचपन से ही सुना था कि मच्छर कानों के पास गाना गाते हैं. मच्छरों ने यह अवसर मुझे अब तक प्रदान भी किया था. मच्छर दूर भी होते थे, तब भी यह लगता था कि कान के पास ही गुनगुना रहे हैं. दूरी का सही आंकलन न होने तथा उस की चुभन होने से अपने कानों को ही जोरदार झन्नाटे से मारने का दर्द हम ने कई बार झेला है. वैसे जानकार कहते हैं कि मच्छरों के पंख काफी छोटे होते हैं, इसलिए उड़ने के लिए उन्हें काफी तेजी से फड़फड़ाना पड़ता है.

इसी कारण उन से भिनभिनाने की आवाज आती है.अन्य कुछ विद्वानों का कहना है कि भिनभिनाना मच्छरों की फितरत है, जिस के जरीए वे लोगों से काफी अच्छे से घुलमिल जाते हैं. इस घुलमिल जाने की प्रवृत्ति पर ही तो किसी शायर ने कहा है,”तुम यह न सोचो कि तुम्हारी यादों ने जगाए रखा है, कभीकभी यह काम मच्छर भी कर लिया करते हैं…”

इस के अलावा कुछ वैज्ञानिक यह भी बताते हैं कि वह सिर्फ उड़ने के लिए नहीं, बल्कि प्रजनन क्रिया के लिए भी मादा मच्छर को लुभाने के क्रम में ऐसी आवाजें निकालते हैं. आश्चर्य यह है कि नर मच्छर मादा मच्छर को तब परेशान नहीं करते जब वह सो रही होती है. मच्छर प्रजनन क्रिया उड़ते वक्त ही करते हैं.

भिनभिनाना क्रिया भी इसी का एक हिस्सा है. चूंकि डाक्टर साहब ने मुझे सोचने से मना किया था इसलिए मैं ने कान के दोषों के विषय में सोचना बंद कर दिया. लेकिन अब यह मुद्दा बरकरार था कि जब मेरे कान ठीक हैं, तो मच्छरों का भिनभिनाना क्यों नहीं सुनाई पड़ रहा?

इस कारण मैं ने कोरोनाकाल में जारी कुछ शोधपत्रों का अध्ययन करना शुरू किया. इन अध्ययनों से पता चला कि कोरोनाकाल में लोग भय के कारण या तो स्वविवेक से अपना इलाज कर रहे थे या पुरानी दवाओं को ही चालू रखे हुए थे. चूंकि कोरोनाकाल में लोगों का ध्यान केवल जान बचाने पर था, इस कारण डेंगू, मलेरिया और चिकुनगुनिया जैसी बीमारियों के कारण और प्रकोप पर किसी का ध्यान नहीं जाता था.

कोरोनाकाल में मास्क के लगातार लगाए रखने के कारण कान के संवेदनहीन होने की आशंका भी कुछ शोधपत्रों में जताई गई थी. वैसे कुछ शोधपत्र यह भी बता रहे थे कि कोरोनाकाल में मच्छरों को अपना शिकार ढूंढ़ने में परेशानी होने लगी, इसलिए उन्होंने बिना भिनभिनाए अपना काम जारी रखने का हुनर विकसितकर लिया. पर इन शोधपत्रों को पढ़ कर मुझे न तो सहज विश्वास हुआ और न ही संतोष हुआ.

मैं भय से अपने मित्रों को भी इस विषय में सलाह के लिए आमंत्रित नहीं कर सकता था मगर स्वयं
के स्तर पर गहन चिंतन जारी रहा. कुछ दिनों की विचार यात्रा के बाद मुझे लगा कि मच्छरों ने शायद कोई महीन पार्टी जौइन कर ली है, जिस कारण उन्होंने भिनभिनाना बंद कर दिया है.

माननीय नेता लोग भी जब जनता को हानि पहुंचाने वाले कोई काम करते हैं तो इस की भनक तक नहीं लगने देते. मच्छरों ने भी पार्टी हित में संभवतया अपने गुणों को छिपाने की कोशिश की है. मुझे लगा कि मेरे कानों में मच्छरों की भिनभिनाहट वैसे ही सुनाई नहीं दे रही, जैसे नेताओं को जनता की आवाज और मांग सुनाई नहीं देती.

यह सब को पता होता है कि मच्छर डेंगू,मलेरिया, चिकुनगुनिया फैला सकते हैं मगर सच कहें तो मच्छर को भगाने और चुनचुन कर मारने का अपना ही मजा है. हम तो बरसों से इस का मजा ले रहे थे. पर मच्छर थे कि मुझे अब भनक लगने देना नहीं चाह रहे थे. वैसे हर व्यक्ति मच्छरों की आवाज के लिए अलग तरह से संवेदी होता है. इसलिए मच्छरों की भिनभिनाहट स्पर्श की सूचना देने वाली तंत्रिकाओं को भी उत्तेजित कर देती है. इस कारण कुछ लोग आवाज सुनने के साथ दिल मिलाते हुए प्रतिक्रिया करते हैं पर यह मच्छरों का ही कमाल है कि वह लोगों के दिमाग को अतिसक्रिय कर देता है और तुरंत प्रतिक्रिया के लिए विवश कर देता है.

अपने विचार मंथन से संतुष्ट नहीं होने पर आखिरकार मैं ने अपने एक परम मित्र को अपनी समस्या बताई, तो उस ने मजाक में कहा कि हो सकता है कि तुझे कमरे में अकेला जान कर केवल मादा मच्छर ही घुस जाती होंगी, जो भिनभिनाती नहीं. मुझे लगता है कि मादा मच्छरें तुम पर आसक्त हो गई हों, जो बिना किसी फड़फड़ाहट के तुम्हें बुखार से तमतमाने के लिए खून की तलाश कर रही होंगी.

मित्र की व्याख्या ने मुझे अपने पौरूष पर गर्व महसूस कराया, लेकिन संयोग देखिए, मुझे तभी एक मच्छर की भिनभिनाहट सुनाई दी. संभवतया वह नर मच्छर होगा. मुझे उस की उपस्थिति से जलन का अनुभव हुआ. मैं कुछ देर पहले मित्र की बात से जो खुशी महसूस कर रहा था, अचानक उस मच्छर की उपस्थिति से जलन का अनुभव करने लगा. मैं ने तेजी से उस मच्छर का दोनों हाथों से काम तमाम कर दिया. पर उस के मरते ही मुझे एहसास हुआ कि यह क्या, मुझे तो आवाज सुनाई पड़ रही थी. इस बात की मुझे खुशी हुई. पर मैं अब पूर्ण तसल्ली चाहता था.

इसलिए मच्छरों की आवाज पर ध्यान केंद्रित किया. कुछ समय बाद ही एक मच्छर मेरे कान के पास आया, जो कह रहा था,“अपनी व्यथा लिख रहे हो या हम पर व्यंग्य लिख रहे हो? साहस नहीं है कि व्यवस्था पर लिखो. चारों तरफ गंदगी पड़ी है. नगर निगम सोई पड़ी है. न जमा हुआ पानी निकलता है, न अस्पताल का कचरा उठता है और न फौगिंग होती है तो इस में हम क्या करें? तुम्हारी कुव्यवस्था से हमारा जन्म होता है. कभी उस पर भी लिखो, जिस ने मुझे पैदा किया. वही सब का कारण है, बदनाम तो मैं अकारण हो गया. तुम भी अगर मुझे बदनाम करोगे, तो सोचो किस मुंह बकरी का दूध और पपीते के पत्ते का रस पी पाओगे. अच्छा है कि मुझ से दोस्ती कर लो. सिस्टम के साजिश में फंस कर मुझे बदनाम न करो,” मच्छर की बातें सुन कर मेरा भय से स्वाभिमान जग गया और मैं ने मच्छर पर लिखना बंद कर दिया.

ऐनर्जैटिक अफसर : वह सरकारी बजट के साथ क्या कर रहा था

जिस तरह पुलिस को किसमकिसम के चोरों से वास्ता पड़ता है, उसी तरह मुझे भी सरकारी नौकरी में किसमकिसम के अफसरों से वास्ता पड़ा है.पर उन सब में से आज भी मुझे कोई याद है तो बस, एक वह.
अन्य का तो औफिस में होना या न होना एकजैसा था. बहुत कम ऐसे अफसर होते हैं जो सचमुच औफिसों में काम करने आते हैं और जातेजाते मेरे जैसों के जेहन में अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं.

वाह, क्या साहब थे वे. उन के चेहरे पर साहबी का क्या नूर था। आज भी जब उन को किया याद करता हूं तो कलेजा मुंह को नहीं, मुंह से बाहर आ जाता है। तब उसे मुंह के रास्ते फिर उस की जगह बैठाना पड़ता है। आज भी उन के हौसले को दाद दिए नहीं रह पाता। कितने निडर, कितने साहसी। मानो उन के ऊपर तक संबंध न हों, ऊपर तक वे ही हों। जो कर दिया, सो कर दिया। कोई उन से पूछने वाला नहीं, कोई उन से जूझने वाला नहीं। कई बार तो उन की निडर हरकतें देख कर ऐसा लगता था, जैसे वे हर जन्म में साहब ही बने हों। जिस के पास जनमजनम का अफसरी अनुभव हो वही ऐसे बोल्ड काम कर सकता है मित्रो।

उन के चहरे से ही नहीं, उन के रंगढंग से ही नहीं, उन के तो अंगअंग से ही साहबी टपकती थी। उन के आगे शेष तो अफसरी के नाम पर कलंक थे।जब वे हमारे औफिस में तबादला हो कर आए तो उन के आने से पहले ही यह खबर आ गई कि वे बहुत ऐनर्जैटिक हैं, बहुत शक्तिशाली हैं, बहुत फुरतीले हैं, बहुत दिलेर हैं, बहुत भूखे शेर हैं, बहुत साहसी हैं, बहुत दुस्साहसिक हैं, बहुत जोरदार हैं, गजब के चिड़ीमार हैं…और भी पता नहीं क्याक्या। तब ऐसे बहुआयामी अफसर को देखने के लिए मन अधीर हो उठा था।

अब आएगा मजा ऐसे अफसर के साथ काम करने का, नहीं तो आजतक तक तो बस जितने भी अफसरों से पाला पड़ा उन्होंने सरकारी बजट पर फूंकफूंक कर ही कदम रखवाए। सरकारी बजट मनमाफिक किसी ने फूंकने न दिया। मित्रो, वह सरकारी पैसा ही क्या जो मनमाफिक फूंका न जाए।

उन के जौइन करने के बाद उन की एक झलक पाते ही सचमुच उन में उस से भी अधिक गुण पाए जो उन के आने से पहले औफिस में आ विराजे थे। वे तो अपने गुणों से भी 10 कदम आगे थे।

उन्होंने जौइन करते ही मेरी काबिलियत को सूंघ लिया था जैसे कुत्ता किसी बम को सूंघ लेता है। तब वे शतप्रतिशत आश्वस्त हो गए कि पूरे औफिस में उन के काम का कोई बंदा है तो केवल मैं ही। शेष तो यहां घास काटने वाले हैं, साहब की थाली का बचा चाटने वाले हैं।

जौइन करते ही उन्होंने मुझे अपने कैबिन में सादर बुलाया। मुझे सिर से पांव तक निहारने के बाद बोले,”वाह, मजा आ गया। तुम मुझे पा कर धन्य हुए और मैं तुम्हें पा कर धन्य हुआ।”

“यह तो हम दोनों का परम सौभाग्य है, सर। सोने की पहचान जौहरी ही तो कर सकता है।

“गुड, खूब जमेगा रंग जब मिल कर काम करेंगे मैं, तुम और तीसरा कोई नहीं। हम औफिस को बहुत आगे तक ले जाएंगे।”

“बस सर, आप की कृपा रहनी चाहिए मुझ पर। फिर देखिए, औफिस को कहां ले जाता हूं। आप हुकूम कीजिए सर।”

“तो पहले मेरी कुरसीटेबल नई लाइए। और हां, ये परदे भी सारे बदल दीजिए। मुझे इस रंग के परदों से नफरत ही नहीं, सख्त नफरत है। औफिस के लिए नई क्रौकरी लाइए। मेरे औफिस के सारे सोफे बदलवाइए। औफिस में नया पेंट करवाइए, शेड मैं बता दूंगा। उस शेड के दीवारों पर होने से औफिस में पौजिटिव ऐनर्जी का संचार होता है। और हां, सब से पहले मेरे आवास का सारा सामान बदलवाइए। वहां मेरे लिए कितने नौकर रखे हैं?”

“सर 2 हैं।”

“औफिस में कितने चपरासी और चौकीदार हैं?”

“मुझे छोड़ 10 सर।”

“तो उन में से 5 मेरे आवास पर भेज दीजिए अभी। वहां टौयलेट कितने हैं?”

“2 सर।”

“वहां 2 की जगह 4 बनवाइए ताकि टौयलेट आने पर हमें परेशान न होना पड़े, क्योंकि साहब परेशान तो…”

“पर सर…”

“क्या औफिस में बजट की तंगी है? अपनी सरकार है। डौंट वरी, किसकिस प्रोजैक्ट में कितना बचा है ठिकाने लगाने को?”

“सर, औफिस में कुल 5 प्रोजैक्ट हैं। 4 प्रोजैक्ट का पैसा तो लगभग खत्म हो चुका है, पर एक प्रोजैक्ट का एक भी पैसा उन्होंने छुआ भी नहीं था।”

“क्यों?”

“क्योंकि इस प्रोजैक्ट में खाने का स्कोप नहीं था।”

“स्कोप तो कहीं भी नहीं होते दोस्त, निकालने पड़ते हैं। उस में कितना पैसा है?”

“सर, यही कोई 20 लाख।”

“गुड, तो ऐसा करो, उस प्रोजैक्ट का सारा पैसा मेरे आवास पर लगा दो। और हां, काम उसी को देना जो कमीशन सब से अधिक दे। जिस मिशन में कमीशन न हो, उसे मैं सपने में भी हाथ नहीं लगाता।”

“पर सर…”

“जवाब हम देंगे। तुम फिक्र न करो। हम हैं न। और हां, खुद की भी कोई चाहीअनचाही जरूरत हो तो उसे भी बेझिझक… खुश रहा करो यार…और हमारे पास गाड़ी कौन सी है?”

“जिप्सी सर।”

“कब का मौडल है?”

“2012 का सर।”

“ओह, नो… इतनी पुरानी गाङी… देखो, कुछ और करने से पहले लग्जरी मौडल का केस बना कर मंत्रीजी को भेजो। मेरे बच्चे स्कूल छोटी गाड़ी में बिलकुल नहीं जाते। सरकारी माल अपना समझा करो यार… यही ईमानदारी है। सरकारी अफसर को खुल कर जीना चाहिए। खुल कर जिओ और खुल कर जीने दो। यही है सरकारी नौकरी का रास्ता। अपनी तो लाइफ का मोटो यही है दोस्त, बाकी तुम जानो। हमारी तो जनता को समर्पित मामूली सी सेवा बस इतनी भर है।”

“जी सर, आप सचमुच ग्रेट हो सर,” और मैं ने उन के चरण छू लिए।

सेवानिवृत्त होने के बाद भी इस ऐनर्जैटिक अफसर की स्मृति को शतशत नमन है।

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