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Kahani in Hindi : किराए का घर

Kahani in Hindi : सालों बाद मन की मुराद पूरी हुई थी. जिन्दगी का एक बहुत बड़ा सपना पूरा हो गया था. लंबे इंतजार के बाद आखिरकार हमें हमारा अपना घर मिल गया था. किराये के छोटे से फ्लैट से अपने बड़े से घर में शिफ्ट होने के बाद से तो मेरे पैर ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. बच्चे भी बड़े उत्साहित थे. पूरे घर में फुदकते-चहकते घूमते थे. दिल्ली के घुटनभरे दो कमरे के पुराने से किराए के मकान से इस बड़े से मकान में आना जैसे जन्नत में आने के बराबर था.

कई सालों के बाद बन कर तैयार हुआ था हमारा यह घर. संजू के दादा के गुजरने के बाद मेरे पति को प्रौपर्टी में काफी हिस्सा मिला था, उसको बेच कर हमें एकमुश्त पैसा मिला तो यह बड़ा घर बन पाया. खुला-खुला दो मंजिला, गाड़ी के लिए पार्किंग स्थल, पोर्टिको, सामने छोटा सा किचेन गार्डन. घर के भीतर खूबसूरत चमकती दीवारें. सुंदर पेंट से रची हुई. खिड़कियों पर मंहगे सुंदर पर्दे. अपना ड्राइंग रूम तो मैंने ऐसा सजाया था कि पूछो मत.

मेरी जो भी सहेली मिलने आती ड्राइंगरूम की सजावट पर ही मर मिटती थी. कई तो जल कर खाक भी हो गयीं. मजे की बात तो यह थी कि इस घर में आते ही हमें ऊपर वाली मंजिल में रहने के लिए बढ़िया अमीर किराएदार भी मिल गये. अच्छा किराया आने लगा. मैं और मेरे पति की खुशी बढ़ गयी कि चलो घर की साज-सज्जा का अतिरिक्त खर्चा किराये से ही निकल आएगा. बच जाएगा सो अलग.

उस दिन मैं अपने ड्राइंग रूम में बैठी टीवी पर अपना मनपसंद सीरियल देख रही थी. अचानक मेरी नजर पीछे दीवार से सटे काउच पर गयी. मैं एक झटके से उठ खड़ी हुई. मेरे बेटे संजू ने पीछे की पूरी दीवार अपने रंगीन क्रेओन्स से रंग डाली थी. कहीं पतंग, कहीं तितली, कहीं फूल, कहीं घर और नदी…. न जाने क्या-क्या बना डाले थे दीवार पर. खूबसूरत दीवार का सत्यानाश कर डाला था उसने.

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मैं गुस्से में उठी और संजू के सारे क्रेओन्स उठा कर रद्दी की टोकरी में फेंक दिये. दो थप्पड़ लगाये और चीख कर पूछा, ‘तुझे घर की दीवारें गंदी करते शर्म नहीं आयी? दीवार का सारा पेंट खराब कर डाला. कितना गंदा लग रहा है. पापा देखेंगे तो कितना गुस्सा करेंगे…आने दे तेरे पापा को… आज तेरी अच्छी कुटायी करवाती हूं… ’

संजू रोते हुए बोला, ‘पर मम्मी इससे पहले भी तो मैं घर की दीवारों पर लिखता था. तब तो आपने कभी नहीं डांटा. आप भी तो रसोई की दीवार पर दूध वाले का, काम वाली का हिसाब लिखती थीं…?’

मैं चिल्लायी, ‘संजू, वह किराए का घर था, यह हमारा अपना घर है. इसे गंदा नहीं करना चाहिए.’

इसके बाद जो बात संजू ने कही उसको सुन कर मेरी बोलती ही बंद हो गयी.

संजू ने कहा, ‘तो मम्मी, किराए के घर में लिख सकते हैं? फिर तो ऊपर जो किराएदार आये हैं, वह भी दीवारों पर लिख सकते हैं न? उनकी बेटी बहुत अच्छी ड्राइंग बनाती है…मैं कल से ऊपर जाकर उसके साथ ही ड्राइंग करूंगा…. फिर तो आप नाराज नहीं होएंगी न?’ Kahani in Hindi

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Indian Politics: इमल्सिफिकेशन सी होती है गठबंधनीय राजनीति

Indian Politics: बिहार विधानसभा चुनाव जैसेजैसे वक्त गुजरता जा रहा है वैसेवैसे उबाऊ भी होते जा रहे हैं उन का रोमांच झाग की तरह साबित हो रहा है तो इस की एक बड़ी वजह गठबंधन वाली राजनीति भी है जिस में विपरीत विचारधारा वाले दल भी दूध में पानी की तरह मिल गए लगते हैं लेकिन हकीकत में वे इमल्शन हो गए हैं जिन के घटक कभी भी अलग हो जाते हैं और कभी भी घुल मिल जाते हैं.

इमल्सिफिकेशन वह प्रक्रिया है जिस में दो अमिश्रणीय तरल पदार्थ जैसे तेल और पानी को मिला कर एक मिश्रण जिसे इमल्शन कहा जाता है बनाते हैं. यह मिश्रण तब तक स्थिर रहता है जब तक एक इमाल्सिफायर मौजूद हो जो दोनों तरल पदार्थों को एक दूसरे में फैलने और अलग न होने में मदद करता है.

गठबंधनीय राजनीति का हाल भी कुछ ऐसा ही है जिस में दो या उस से ज्यादा दल मिल कर एक इमल्शन यानी गठबंधन बनाते हैं जो तभी तक स्थिर रहता है जब तक कुर्सी या सत्ता नाम का इमाल्सिफायर मौजूद हो. जो दोनों दलों को एक दूसरे में विलय होने और अलग न होने देने में मदद करता है.

एमल्सिफायर एक ऐसा पदार्थ होता है जो तेल और पानी के बीच की सतह के तनाव को कम करता है. इस के अणुओं का एक हिस्सा पानी के प्रति आकर्षित होता है जिसे हाइड्रोफिलिक कहते हैं और दूसरा जिसे हाइड्रोफोबिक कहते हैं तेल के प्रति आकर्षित होता है जिस से दोनों तरल पदार्थ जुड़े रहते हैं.

गठबंधन बनाम इमल्सिफिकेशन

इस रासायनिक क्रिया की एक और दिलचस्प बात यह भी है कि इमल्शन अस्थाई होता है और समय के साथ तेल व पानी अलग हो जाते हैं. इमाल्सिफायर इस अलगाव को रोकता है जिस से मिश्रण स्थिर रहता है. बिहार की राजनीति और विधानसभा चुनाव की केमेस्ट्री के मद्देनजर देखें तो हो यही राजनैतिक क्रिया रही है जिसे दोनों गठबंधनों से सहज समझा जा सकता है. एनडीए में चार दल भाजपा, जदयू, हम और एलजेपी हैं. पिछले चुनाव में एलजेपी ने अपने दम पर चुनाव लड़ा था. अब वह वापस एनडीए में है. तब एनडीए को बहुमत से महज 3 ही ज्यादा यानी 125 सीटें मिली थी.

तब महागठबंधन को 110 सीट मिलीं थीं 8 सीटें इधरउधर बंट गई थी. इस इमल्शन के घटक थे आरजेडी, कांग्रेस और तमाम वामदल जिन्होंने 16 सीट जीतकर सभी को चौंका दिया था इन में से भी 12 सीट अकेले सीपीआई माले के खाते में गई थीं.

अब इस चुनाव में समीकरणथोड़े बदले हैं. पिछले चुनाव में 4 सीट जीतने वाली विकासशील इंसान पार्टी ( वीआईपी ) एनडीए का साथ छोड़ कर महागठबंधन के साथ लड़ रहा है.

यानी साफ है कि गठबंधनों में शामिल दलों का कोई इमान धरम नहीं होता. सभी का मकसद स्वार्थ और मंजिल कुर्सी होती है जिस के लिए वे अपने उसूल बेच भी देते हैं और गांठ में पैसा हो तो दूसरे के खरीद भी लेते हैं. ऐसे में इन से जनता के भले की उम्मीद करना एक बेकार की बात है. बतौर उदहारण या मिसाल देखें तो एनडीए में एलजेपी के चिराग पासवान और हम के जीतन राम माझी की मूल विचारधारा दलित हिमायती और मनुवाद विरोधी रही है. इस के बाद भी वे बनियों और ब्राह्मणों की कही जाने वाली भाजपा की गोद में क्यों बैठे हैं. जाहिर है सत्ता के लिए.

उधर भाजपा के हाल भी जुदा नहीं उसे कुर्सी हासिल करने के लिए दलित वोटों की दरकार रहती है इसलिए वह इन दोनों की मुहताज रहती है.
बिहार के लिहाज से देखें तो इस समीकरण के तहत होता यह है कि चिराग पासवान और जीतनराम माझी के दलित वोट उसे मिल जाते हैं और इन दोनों को सवर्ण वोट उन्हें मिल जाते हैं. जद यू को अपने कोर वोट कुर्मी समुदाय के अलावा छुटपुट वोट मुसलमानों और दलितों के भी मिलते रहते हैं. उसे भी अपनी सीटों पर भाजपा के सवर्ण वोटों का टेका मिल जाता है, एवज में कुर्मी वोट थोक में भाजपा को मिल जाते हैं. इस चुनाव में ऐसा होगा ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि मुसलमानों, दलितों और अति पिछड़े समुदायों का मोहभंग नीतिश कुमार से हुआ है. इस से घाटा दोनों दलों का ही होगा.

महागठबंधन इस पैमाने पर कुछ बेहतर स्थिति में है क्योंकि कांग्रेस और आरजेडी का वोट बेंक लगभग एक सा है. यादव, मुसलमान और दलित वोटों की उसे आस है. एक हकीकत यह भी है कि आरजेडी का वोट बैंक कभी कांग्रेस का ही हुआ करता था. वामपंथी दलों को अति पिछड़ों और महादलितों के वोट मिलते रहे हैं जिन्हें कांग्रेस से ज्यादा परहेज नहीं जिस का और आरजेडी का वोट उसे मिलने का ही नतीजा था कि वह 2020 में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन ये दल कर पाए थे.

मूल स्वभाव के साइड इफैक्ट्स

इमल्सिफिकेशन में तेल और पानी यों ही नहीं मिल जाते हैं. इस के लिए तेल और पानी को जोर से हिलाया और फेंटा जाता है जिस से इन दोनों में से किसी एक की बूंदें दूसरे में फैल जाती हैं. लेकिन इन दोनों के गुणधर्म नहीं बदलते मतलब गठबंधनो में शामिल दलों का मूल स्वभाव कायम रहता है. जैसे भाजपा का हिंदुत्व का एजेंडा मनुवाद और मंदिर नीति दलित दलों के साथ चुनाव लड़ने से खत्म नहीं हो जाते हां इन पर बिहार में वह ज्यादा ढिंढोरा नहीं पीटती. इसी तरह जीतनराम माझी और चिराग पासवान भाजपा की इन नीतियों से इत्तफाक न रखते हुए भी महज सत्ता के लिए भाजपा के पिछलग्गू बने रहते हैं.

इन दोनों नेताओं में एक बड़ा फर्क यह है कि चिराग धीरेधीरे भाजपा की संगत के चलते पूजापाठ और सार्वजनिक रूप से कर्मकांड करने लगे हैं. लेकिन कभी वे मनुवाद का समर्थन कर पाएंगे ऐसा लगता नहीं क्योंकि एलजेपी की बुनियाद ही मनुवाद और कर्मकांडों के विरोध की रही है जो कि पार्टी के संस्थापक चिराग के पिता रामविलास पासवान ने राखी थी, अगर चिराग इस से भागेंगे तो उन का वोटर उन से भागने लगेगा.

पिछले चुनाव में ऐसा हुआ भी था जब उन की पार्टी एक सीट पर सिमट गई थी जब कि उस ने 117 पर अपने उम्मीदवार उतारे थे.

जीतनराम माझी खुलेआम भाजपा राम मंदिर और मनुवाद की खिलाफत करते रहे हैं. लेकिन ऐसा वे तभी करते हैं जब सत्ता से बाहर होते हैं. चुनाव आते ही वे चोला बदल लेते हैं जो नरेंद्र मोदी उन्हें मनुवाद के पालक पोषक लगते हैं वे चुनाव आते ही यानी इमल्सिफिकेशन की प्रक्रिया शुरू होते ही उन के सर्वमान्य और पूज्यनीय नेता हो जाते हैं.

इस बार वे 15 सीट मांग रहे थे लेकिन भाजपा ने उन्हें 6 ही दीं. इस पर उन के तेवर उग्र नहीं हुए उलटे ढीले पड़ गए क्योंकि दो सीटों से उन के परिवारजन लड़ रहे हैं. जनता और दलित हितों के मुकाबले उन्हें परिवार का हित दिख रहा है सो उन्होंने नरेन्द्र मोदी में आस्था व्यक्त कर दी. जिस से अपने वोटर को यह समझाया जा सके कि हम ने भाजपा के गुणधर्म यानी उस की विचारधारा नहीं अपना ली है.

पौलिटिकल इम्ल्सीफिकेशन कोलाइडल केमेस्ट्री के वास्तविक इमल्सिफिकेशन की तरह ही अस्थाई होता है. यह पूरे देश सहित कई बार बिहार से भी साबित होता रहा है. 2015 के चुनाव में जद यू, आरजेडी और कांग्रेस एक छतरी के नीचे खड़े भाजपाई बारिश का मुकाबला करने यों ही मजबूर नहीं हो गए थे. उस वक्त में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता सर चढ़कर बोल रही थी जिस से देश में ममता बनर्जी के बाद कोई चिढ़ा हुआ था तो वे नीतिश कुमार थे जो मोदी को पानी पी पीकर कोसते रहते थे.

आरजेडी और कांग्रेस के सहयोग से उन्होंने मोदी की लोकप्रियता के रथ को थाम लिया था. तब इस ग्रांड एलाइंस को 177 सीटें मिली थीं.
इस के बाद नीतिश भी मोदी के मुरीद होते चले गए और अपनी सहूलियत और खुदगर्जी के मुताबिक इधरउधर होते रहे. इस से उन की विश्वसनीयता इतनी घटी कि 2020 के चुनाव में जद यू 43 सीटों पर सिमट गई और भाजपा छलांग लगा कर 74 पर पहुंच गई.

इस की एक वजह यह भी थी कि कुछ नहीं बल्कि कई सीटों पर सवर्ण वोटों ने जद यू को वोट नहीं किया दूसरी तरफ जद यू के वोटर ने ईमानदारी से भाजपा को वोट किया अब जद यू का वोटर इस चुनाव में इस का बदला निकाले तो बात कतई हैरानी की नहीं होगी.

उबल नहीं रही जनता

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां है जब कि उन की सहयोगी पार्टियां क्षेत्रीय पार्टियां हैं जिन के मुखिया मूलतः वोट शिफ्टिंग का काम करते हैं और उस का कमीशन इन से वसूलते हैं. सौदेबाजी और सियासी माहौल के मुताबिक यह कमीशन कम ज्यादा होता रहता है. इस इमल्सिफिकेशन में हैरत और दिलचस्पी की एक बड़ी बात या सवाल जिस का जवाब अच्छेअच्छे सियासी पंडितों और विश्लेषकों के पास नहीं वह यह है कि आखिर दलित तबका जो दो बड़े वोट शिफ्टर्स पासवान और माझी के पास है भाजपा को आसानी से वोट क्यों कर देता है. यह लगभग 6 फीसदी है जो भाजपा को तकरीबन 40 सीटों पर फायदा पहुंचाता है.

महागठबंधन के वोटर में इतनी ईमानदारी और कमिटमेंट दोनों नहीं दिखते. पिछला नतीजा देख कहा जा सकता है कि कांग्रेस का सवर्ण वोट जो 20 – 25 फीसदी के लगभग है उस ने आरजेडी को वोट नहीं किया क्योंकि लालू यादव भी माझी की तरह मनुवाद के घोर विरोधी हैं इसी तरह आरजेडी के पूरे यादव वोट कांग्रेस को नहीं मिलते दिखते, अगर ऐसा होता तो कांग्रेस 2020 के चुनाव में 19 सीटों पर सिमट कर नहीं रह जाती.

ऐसा इसलिए कि कहीं तेल की मात्रा ज्यादा थी तो कहीं पानी की कई बार वोटर ने इन को ढंग से परखा यानी फेंटा ही नहीं क्योंकि उस की दिलचस्पी चुनावों से खत्म हो चली थी. ऐसा ही इस बार भी होता दिख रहा है तो इस का सीधा सा मतलब है कि जनता किसी भी मुद्दे को ले कर उबल नहीं रही है न राम मंदिर पर और न ही संविधान या हिंदूमुसलिम पर ( इसे जनता ने लोकसभा का विषय मान लिया है ) हां आंशिक असर युवा बेरोजगारी और महंगाई का दिखता है लेकिन उस के चलते कितने फीसदी वोट इधरउधर लुढ़केंगे यह तो 14 नवंबर को पता चलेगा जब नतीजे घोषित हो रहे होंगे जिन से साबित यह भी होगा कि इम्लसिफिकेशन यानी गठबंधन वाली राजनीति का भविष्य क्या है. Indian Politics

Corruption In India: अधिकारी के पास दो करोड़ से ज्यादा नकद बरामद

Corruption In India: भारत में भ्रष्टाचार की संस्कृति रही है. भ्रष्टाचार की इस संस्कृति का पोषक धार्मिक व्यवस्था है. भगवान को भोग, प्रसाद और मंदिर की दान पेटी में चढ़ावा चढ़ाने से ईश्वर खुश हो सकता है. पंडित को दक्षिणा देने से पुण्य मिल सकता है. मस्जिद में चंदा या जकात के नाम पर धन खर्च करने से अल्लाह खुश हो सकता है. धर्म की इस मानसिकता ने ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है. आम आदमी भ्रष्टाचार की इस मानसिकता में आकंठ डूबा हुआ है. यही कारण है की पूरा सिस्टम भ्रस्टाचार की गर्त में समाया हुआ है.

सीबीआई ने गुवाहाटी में राष्ट्रीय राजमार्ग एवं अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (एनएचआईडीसीएल) के एक कार्यकारी निदेशक की तलाशी के दौरान 2.62 करोड़ रुपए नकदी जब्त की और अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया. कार्यकारी निदेशक रितेन कुमार सिंह की तलाशी के दौरान सीबीआई ने 2.62 करोड़ रुपए नकद और देश भर में उन के और उन के परिवार के सदस्यों के नाम नौ प्रापर्टीज और 20 अपार्टमेंट के दस्तावेज जब्त किए. तलाशी के दौरान महंगी गाड़ियों की खरीद से संबंधित दस्तावेज भी जब्त किए गए.

कार्यकारी निदेशक रितेन कुमार सिंह असम के गुवाहाटी में एनएचआईडीसीएल के औफिस में तैनात थे. सीबीआई का आरोप है कि रितेन कुमार सिंह ने एक निजी कंपनी को लाभ पहुंचाने के एवज में मोटी रिश्वत ली थी. सीबीआई ने इस मामले में कोलकाता की एक कंपनी मोहन लाल जैन के प्रतिनिधि बिनोद कुमार जैन को भी गिरफ्तार किया है.

बड़े अधिकारियों के घरों से करोड़ों की नगदी, सोनाचांदी, प्रापर्टीज के कागजात मिलना कोई नई बात नहीं है. सिस्टम में चपरासी हो या कोई बड़ा अधिकारी घूसखोरी में ज्यादातर लिप्त ही होते हैं. यही कारण है की ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (CPI) में भारत 180 देशों में से 96वें स्थान पर है.

भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त क़ानून होने के बावजूद घूसखोरों को कोई डर नहीं होता. भ्रष्टाचार को खत्म करना ही है तो भ्रष्टाचार की उस मानसिकता को खत्म करना होगा जिस की शुरुआत धर्म से होती है. भारतीयों की रगो में दौड़ते भ्रष्टाचार के लिए धर्मस्थल, धार्मिक गुरु और धार्मिक प्रचार तंत्र जिम्मेदार हैं. Corruption In India

Road Safety: सड़क गड्ढे और मुआवजा

Road Safety: सडक पर गड्ढों में हिचकोले खाते सफर करना हर किसी का अनुभव होता है. ऐसे में लोग सरकार सहित संबंधित निकाय नगरनिगम वगैरह और पीडब्ल्यू को कोसते मंजिल पर पहुंच कर गड्ढों की वजह से झेली परेशानी भूल जाते हैं. देश की बिरली ही सड़क गड्ढा विहीन होगी.

ऐसे में लोगों को रोड टैक्स अदा करने और टोल टैक्स देने में भी तकलीफ होना स्वभाविक है. कुछ जागरूक लोग शिकायत भी करते हैं पर होता जाता कुछ नहीं. सड़क माफिया अपना सीना ताने भ्रष्टाचार और मनमानी में यह सोचते लिप्त रहता है कि हमारा कोई क्या बिगाड़ लेगा. लोग मरते हैं तो मरते रहें, घायल होते हैं तो होते रहें, उन के वाहन खटारा होते हैं तो होते रहें हमारी बला से.

लेकिन इस मनमानी पर अंकुश लगने की उम्मीद जगाई है बौम्बे हाईकोर्ट ने जिसने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि सड़क पर गड्ढे किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा हैं यदि सड़कों की ख़राब स्थिति के कारण किसी नागरिक को नुकसान होता है तो सम्बंधित नगरपालिका या प्रशासन उसे उचित मुआवजा देने का जिम्मेदार है. मुआवजा देने में ढिलाई प्रशासन की लापरवाही का संकेत है और यह संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है. यानी साफ और सुरक्षित सड़क हर नागरिक का मौलिक अधिकार है.

महाराष्ट्र में इसे जवाबदेही मौडल कहा जाने लगा है. हुआ यूं था कि साल 2023 में ठाणे का एक 28 वर्षीय युवक स्कूटी से गड्ढे में गिर कर घायल हो गया था. उस के परिवारजनों ने बजाय सिर्फ भुनभुनाने के नगर निगम पर लापरवाही का आरोप लगाते अदालत में याचिका दायर कर दी. जांच में साबित हुआ कि सड़क का ठेका जैसा कि आमतौर पर होता है बिना गुणवत्ता जांच के पास कर दिया गया था. हाई कोर्ट ने न केवल युवक को मुआवजा दिलाया बल्कि सम्बंधित इंजीनियर पर 50 हजार रुपए का जुर्माना भी ठोका. हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुआवजे का कुछ हिस्सा सरकार को देना होगा और कुछ दोषी अधिकारी से वसूला जाएगा. मौत होने पर मुआवजा राशि 6 लाख रुपए तक और घायल होने पर 50 हजार रुपए से शुरू होगी.

इस फैसले में राहत है और चेतावनी भी है कि अब मनमानी और भ्रष्टाचार नहीं चलेंगे. अगर आप भी गड्ढों की वजह से कोई नुकसान उठाते हैं तो जागरुकता दिखाते अदालत का दरवाजा खटखटाइए. इस के लिए आप को गड्ढे का फोटो और यात्रा का पूरा विवरण डाक्टर के पर्चे सहित तैयार रखना होगा. Road Safety

Diwali 2025 : छोटा घर बड़ी दीवाली

Diwali 2025 : जब से तकनीक और बाजार लोगों के घरों में घुसे हैं, तब से हमारे त्योहार भी इस की जद में आ गए हैं. यही वजह है कि इस बार दीवाली के त्योहार पर एक इश्तिहार टैलीविजन की स्क्रीन पर तैर रहा है, जिस में एक बुजुर्ग कार से उतरने से पहले बोलते हैं कि यार, कमर टूट गई है. तो कार ड्राइव कर रही एक मौडर्न लड़की सवाल करती है कि क्या जरूरत थी सब के घर जा कर विश करने की, विश तो मैसेज पर भी कर सकते थे न?

इस पर वे बुजुर्ग मुसकरा कर कहते हैं कि देखो, टैक्नोलौजी इतनी भी एडवांस नहीं हुई है कि हम मैसेज पर मुंह मीठा कर पाएं. यह इश्तिहार आज के समाज का आईना है, जहां बड़े मैट्रो शहरों के बड़े घरों में रहने वाले नौजवान ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों के छोटे घरों में रह रही नई पीढ़ी की नुमाइंदगी करने वाले भी दीवाली पर घर की सफाई के लिए अर्बन क्लैप जैसी प्रोफैशनल कंपनी का सहारा लेने की सोचते हैं, पर त्योहार के बहाने हम अपने परिवार, पड़ोस और पहचान वालों के लिए क्या महसूस कर सकते हैं, इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता.

इसे एक उदाहरण से सम झते हैं. 21 साल का अरुण हरियाणा के पानीपत शहर में सैक्टर एरिया में रहता है. छोटा शहर है, घर भी छोटा है, पर जब अरुण की मम्मी ने एक रविवार को उसे सुबहसुबह उठते ही पूरे घर के पंखे और अलमारियां साफ करने को कहा तो अरुण के मुंह का जायका बिगड़ गया. बड़ी नानुकुर के बाद अरुण ने यह काम करने का बीड़ा उठाया. स्टूल पर चढ़ कर अपने हाथ से एकएक पंखा साफ किया, फिर अलमारियों से भी धूलमिट्टी हटाई तो उसे महसूस हुआ कि जिस घर में वह इतने वर्षों से रह रहा है, उस से वह पूरी तरह से परिचित ही नहीं है. वजह, अरुण या तो कालेज के चलते घर से बाहर रहता है या फिर अपने कमरे में मोबाइल ले कर पड़ा रहता है. एक दिन के जरा से इस काम से अरुण को अपने घर से जुड़ाव महसूस हुआ.

छोटे बजट में बड़ा उत्सव

अगर थोड़ा सा बजट बनाया जाए तो लोग अपने छोटे घरों में भी दीवाली का बड़ा उत्सव मना सकते हैं. अमूमन हर घर में 4 लोग तो होते हैं और अगर आप का घर छोटा है तो सभी मिल कर उसे साफ करें, सजाएं और उसे ऐसा बनाएं, जिस से आप के सपनों की  झलक उस में दिखाई दे. ऐसा करने से सब से पहले तो घर वालों का आपस में बंधन और ज्यादा मजबूत होता है और एकदूसरे की पसंदनापंसद का भी पता चलता है. उन्हें टीम की तरह काम करने का मौका मिलता है और घर को सब का मिलाजुला रूप देने से वह मानो खिल उठता है.

उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर की रहने वाली 23 साल की रश्मि ने भी ऐसा ही कुछ किया. उस ने 19 साल के अपने छोटे भाई रोहित के साथ मिल कर दरवाजे व खिड़कियों से ले कर घर की दीवारों पर सस्ती सजावट कुछ इस तरह से की कि देखने वाले सम झ ही नहीं पाए कि? कैसे कम खर्च में घर को शाही लुक दिया जा सकता है. रोहित तो दो कदम आगे निकला. उस ने घर के बरामदे में अपने हाथों से रंगोली बनाई और बिजली की महंगी लडि़यों के बजाय मिट्टी के दीयों से रोशनी की.

रश्मि और रोहित के मम्मीपापा ने बाजार की महंगी और मिलावटी मिठाई का औप्शन छोड़ कर घर में ही बनाई खीर और बेसन के लड्डू. उन्होंने यही चीजें अपने आसपड़ोस में भी बांटीं. पटाखों को सिरे से नकार दिया और उस के बदले सब के लिए नए कपड़े खरीदे. इतना ही नहीं, आपस में एकदूसरे को सरप्राइज गिफ्ट भी दिए. सब से बड़ी बात तो यह रही कि वे चारों पड़ोस में मिठाई आदि बांटने गए और घर पर साथ बैठ कर रात का भोजन किया.

अकेले में भी मजा लें

यह तो हो गई परिवार के साथ दीवाली मनाने की बात पर अगर आप दीवाली पर अकेले हैं तो आप का छोटा सा आशियाना भी आप को काटने के लिए दौड़ेगा लेकिन इस अकेलेपन का भी समाधान है. इस के लिए आप अपने औफिस के साथियों को अपने घर बुलाएं और उन के साथ दीवाली का मजा लें. इस पर भी अगर कुछ अधूरापन लगे तो दीवाली की जगमग करती रात का नजारा देखने के लिए अपने महल्ले का एक चक्कर जरूर लगाएं. अनजान चेहरों को देख कर मुसकराएं, अपने हमउम्र को ‘हाय’ बोल दें, बड़ों को ‘नमस्ते’ कहते जाएं.

याद रखिए, त्योहार हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में रस भरने के लिए मनाए जाते हैं, फिर चाहे वह आप के हाथ की बनी मिठाई की मिठास हो या कही गई बात की चाशनी, त्योहार को भरपूर जिएं. दीवाली का तो संदेश ही है अपनों का स्वागत करना तो फिर इस नेक काम में कैसी कंजूसी. Diwali 2025

Happy Diwali : खुशियोंभरी दीवाली

लेखक – रेणु लैसी फ्रांसिस

विमला का मन आज सुबह से ही बेचैन था. उन की बेटी अंजू ठीक एक साल बाद उन से मिलने आ रही थी. अंजू इंजीनियर थी, कंपनी की तरफ से एक साल की ट्रेनिंग के लिए जरमनी गई थी. विमला हर थोड़ी देर में अपने पति नितिन से कह रही थी, ‘जल्दी घर से निकल जाओ अंजू को लाने के लिए, रास्ते में ट्रैफिक ज्यादा होता है, तुम समय पर नहीं पहुंच पाओगे तो अंजू परेशान हो जाएगी.’

नितिन उन से हर बार यही कहते, ‘मुझे याद है अंजू आ रही है, लेकिन उस के आने में अभी कई घंटे हैं. मैं अभी से वहां जा कर क्या करूंगा. जैसे ही आने का समय होगा, मैं आधे घंटे पहले पहुंच जाऊंगा.’

नितिन समय से एयरपोर्ट पहुंच गए और अंजू के आने की खबर विमला को दे दी. जब से अंजू की आने की खबर मिली, विमला वहीं गेट पर बैठ गईं. उन्हें एकएक पल मानो एकएक साल जितना लंबा लग रहा था. अंजू को आए तो एक घंटा हो चुका था लेकिन अंजू और नितिन दोनों घर नहीं आए थे. विमला दोनों को फोन लगा रही थी. दोनों के फोन नैटवर्क क्षेत्र से बाहर आ रहे थे. विमला के पड़ोसी भी विमला के साथ थे. सभी परेशान हो रहे थे कि नितिन और अंजू अभी तक क्यों नहीं आए. अचानक विमला के मोबाइल में नितिन का फोन आया कि वे सिटी अस्पताल आ जाएं, उन दोनों का ऐक्सिडैंट हो गया है.

विमला और उन के पड़ोसी सिटी अस्पताल पहुंचे तो देखा अंजू का शव औपरेशन थिएटर से बाहर आ रहा था. डाक्टर साहब नितिन से कह रहे थे, ‘सौरी, हम आप की बेटी को नहीं बचा सके.’ तब नितिन ने कहा, ‘सर, मैं अपनी बेटी की आंखों को दान करना चाहता हूं ताकि मेरी बेटी की आंखें जिंदा रहें. आप किसी बहुत जरूरतमंद को ये आंखें दे दीजिए ताकि वह मेरी बेटी की आंखों से दुनिया देख सके. विमला ने इस बात पर एतराज किया तो नितिन और डाक्टर ने विमला को सम?ाया कि उस व्यक्ति के बारे में सोचो जिस ने हमेशा अपने आसपास अंधेरा ही पाया है. आप उस की जिंदगी में रोशनी दे रही हैं. उस समय तो विमला ने कुछ न कहा लेकिन वे अब भी नाराज ही थीं. अंजू की आंखों को दान क्यों किया इस बात को ले कर.

आज अंजू की पुण्यतिथि थी. विमला का मन उदास था तब नितिन ने आ कर उन से कहा, ‘‘आज हमारे घर एक खास मेहमान आने वाले हैं. तुम उस से अच्छा व्यवहार करना.’’ विमला कुछ पूछतीं, उस से पहले नितिन वहां से जा चुके थे.

थोड़ी देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई. नितिन ने दरवाजा खोला तो सामने एक 35 साल का युवक खड़ा था और उस के साथ ही उस की पत्नी और 2 साल का बेटा खड़ा था. नितिन ने उन्हें अंदर बुलाया. उस ने नितिन के पैर छुए. नितिन ने उसे आशीर्वाद दिया और अपने सीने से लगा लिया और कहा, ‘‘तुम हमेशा मेरे  कलेजे का टुकड़ा रहोगे’’ और उन की आंखों में आंसू आ गए.

उस युवक ने कहा, ‘पापा, मैं आप का बेटा हूं और आप हमेशा मेरे पापा रहोगे.’

नितिन उस की आंखों में ही देखता रहा. इन की आवाजें सुन कर विमला भी वहां आ गईं. तब उस युवक ने विमला के पैर छूने चाहे तो विमला दूसरे कमरे में चली गईं. तब नितिन ने कहा, ‘‘हम दोनों मिल कर तुम्हारी मम्मी को मना लेंगे.’’

नितिन उन लोगों को ले कर विमला के पास आए तब उस युवक ने कहा. ‘‘मैं आप का और अंकल का हमेशा शुक्रगुजार रहूंगा. आप ने एक नहीं, 3 लोगों की जान बचाई है.’’ उस युवक ने आगे कहा, ‘‘मेरा नाम राकेश है. मैं अपने मम्मीपापा की इकलौती संतान था. हमारा जनरल स्टोर था. अच्छीखासी कमाई थी. मेरी शादी रीना से हुई. रीना भी अपने मम्मीपापा की इकलौती संतान थी. देखने में जितनी सुंदर, व्यवहार में उतनी ही अच्छी. उस के आने से घर में हमेशा रौनक रहने लगी.

‘‘एक बार दीवाली के समय मेरा और रीना का परिवार हरिद्वार जा रहा था तब अचानक हमारी गाड़ी के ऊपर एक बडा़ सा पटाखा आ कर गिरा और हमारी गाड़ी का ऐक्सिडैंट हो गया. मेरे और रीना के मम्मीपापा ऐक्सिडैंट में मारे गए थे. मेरी आंखों में बारूद और कांच के टुकड़े जाने से मेरी आंखों की रोशनी चली गई. हमारा बेटा भी छोटा था. सारी जिम्मेदारी रीना पर आ गई. रीना बच्चे को भी देखती और जनरल स्टोर भी संभालती. मैं उस के साथ जनरल स्टोर में आ कर बैठ जाता था. मेरे दोस्त, जिन्हें मैं अपना भाई जैसा मानता था और उन पर दिल खोल कर खर्च करता था, उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया था.

‘‘जैसेतैसे जीवन की गाड़ी चल रही थी कि अब लफंगे लड़के और फालतू आदमी लोग ज्यादा ही स्टोर पर आने लगे थे. सामान एक लेते और कीमतें दस सामान की पूछते रहते. रीना को मजबूरी में सारे सामान के दाम बताने पड़ते. वे लोग ज्यादा समय स्टोर में रुकने के बहाने ढूंढ़ते थे. एक दिन तो हद हो गई.

2 लड़के आए और सामान लेने के बहाने रीना का हाथ पकड़ लिया.

‘‘रीना ने जब उसे चिल्लाया तो मैं ने उसे धक्का दिया. वे मेरे साथ मारपीट करने लगे. इतने में अंकलजी स्टोर पर कुछ सामान खरीदने आए. उन्होंने उस लड़के को धमकाया कि यदि उस ने आइंदा स्टोर पर आ कर ऐसी हरकतें कीं तो वे पुलिस में उसे दे देंगे. उस समय तो वे लड़के चले गए लेकिन उस घटना के बाद रीना बीमार पड़ गई.

‘‘तब अंकलजी ने मु?ा से कहा कि तुम कोई आदमी रख लो स्टोर पर काम करने के लिए. फिर अंकलजी ने कहा, मेरे मित्र आंखों के डाक्टर हैं. मैं उन से बात करूंगा कि वे तुम्हारी आंखों के लिए ऐसे व्यक्ति की तलाश करें जो मृत्यु के बाद अपनी आंखें दान करना चाहता हो ताकि दान की हुई आंखें वे तुम्हें लगा सकें.

‘‘इस बीच, मैं ने एक आदमी स्टोर के काम के लिए रख लिया था लेकिन उस ने भी हमारे साथ बेईमानी की. सारा सामान बेच कर स्टोर में ताला लगा कर भाग गया.

‘‘तब रीना ने एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी कर ली. बहुत मुश्किल से गुजर हो रही थी कि थोड़े दिनों पहले मेरे बेटे की तबीयत भी खराब हो गई थी. अंजू का ऐक्सिडैंट हुआ तब मेरा बेटा वहीं एडमिट था. वहीं अंकल ने मु?ो देखा और अंजू की आंखों को मु?ो देने का वादा किया.

‘‘आज मैं अंजू की आंखों से ही अपने बेटे और बीवी को देख पाया और उन्हें सुरक्षित जीवन दे पा रहा हूं.’’ इतना कह कर राकेश ने विमला के पैर पकड़ लिए और कहने लगा, ‘‘मां, एक बार मेरी तरफ देखो, मैं भी आप का बेटा हूं.’’

राकेश के आंसू विमला के पैर पर गिरे तो विमला ने राकेश को उठाया और जब उस की तरफ देखा तो उन्हें लगा वे अंजू को ही देख रही हैं. उन्होंने राकेश को गले से लगा लिया. इतने में रीना भी विमला के पास आ गई और बोली, ‘‘मां, आप राकेश की ही नहीं, मेरी भी मां हो.’’ तब पीछे से रीना का बेटा आ गया और बोला, ‘‘आप मेरे मम्मीपापा की मां हो तो मेरी कौन हो?’’ तब पीछे से नितिन ने आ कर कहा, ‘ये तुम्हारी दादीमां हैं.’’

विमला ने उन तीनों को गले लगा लिया और कहा, ‘‘मु?ो तुम लोगों ने मां कहा है तो मेरी एक बात मानोगे तब रीना ने कहा, ‘‘मां, आप आज्ञा तो दो, हम आप के लिए जान तक दे सकते हैं.’’

विमला ने कहा, ‘‘जान देना नहीं है, बस, मेरी जान बन कर मेरे साथ मेरे घर में आ कर रहो. अंजू हमेशा कहती थी कि वह हम दोनों को छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी, इसलिए ही प्रकृति ने तुम्हें मेरे पास भेज दिया.’’

रीना ने कहा, ‘‘ठीक है, मां. हम लोग कभी भी आप को छोड़ कर नहीं जाएंगे. मेरा तो मायका भी यहीं है और ससुराल भी यहीं.’’

यह सुन कर विमला ने अंजू की तसवीर के सामने खड़े हो कर कहा, ‘‘बेटी, तू ने तो मेरी ?ाली खुशियों से भर दी. आज मुझे बेटे के साथ बहू और पोता भी मिल गया. अब मैं भी डाक्टर के पास जा कर अपनी आंखों को दान करने वाला फौर्म भर कर आऊंगी.’’

तब नितिन ने कहा, ‘‘तुम अकेली नहीं, हम सभी जाएंगे ताकि हमारे मरने के बाद हमारी आंखें जिंदा रहें.’’

सब को खुश देख कर विमला ने कहा कि यह दीवाली तो मेरे लिए हजारों खुशियां ले कर आई. Happy Diwali

Indian Society: तलाक की प्रक्रिया आसान हो तो दहेज हत्याएं रुक जाएं

Indian Society, सीतापुर, उत्तर प्रदेश – फंदे से लटका शव, दहेज हत्या का आरोप

सीतापुर जिले के पिसावां थाना क्षेत्र के सैदापुर गांव में एक विवाहिता 23 वर्षीय सरस्वती का शव कमरे में फंदे से लटका पाया गया. मृतका की शादी 5 महीने पहले मुनेश्वर उर्फ़ गोलू के साथ हुई थी. मायके वालों ने आरोप लगाया कि उन्होंने अपनी हैसियत के अनुसार दहेज दिया था पर ससुराल वालों ने बाइक और सोने की चेन की अतिरिक्त मांग की, मांग पूरी न होने पर उन की बेटी के साथ प्रताड़ना की गई और हत्या करने के बाद शव को फांसी पर लटका दिया गया. (हिंदुस्तान/12 अक्तूबर 2025)

दिल्ली – ससुर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज, दहेज हत्या आरोप

दिल्ली हाईकोर्ट ने 20 वर्षीय बहू की दहेज के लिए हत्या के आरोप में ससुर सुनील कुमार सिंह की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण मामला है, जिस में एक युवती दहेज की लालच की शिकार हुई है. पीड़िता सोनम ने मरने से पहले बयान दिया था कि उसे जबरन एसिड पिलाया गया था. (आजतक/9 अक्तूबर 2025)

मुंबई – दहेज-प्रताड़ना के मामले बढ़े

मुंबई में इस वर्ष पहले 10 महीनों में महिला विरुद्ध शारीरिक एवं मानसिक छेड़छाड़ / दहेज प्रताड़ना के 300 से अधिक मुकदमे दर्ज किए गए. (महाराष्ट्र टाइम्स)

लखनऊ – महिला ने दहेज-प्रताड़ना की शिकायत दर्ज कराई

लखनऊ की एक महिला ने अपने पति और ससुराल वालों पर दहेज की मांग, शारीरिक हिंसा, और हस्तक्षेप जैसे आरोप लगाए हैं. उस ने दावा किया कि जब उस ने विरोध किया तो उसे परिवार ने छोड़ दिया. (द टाइम्स औफ इंडिया)

लखनऊ/सरोजनीनगर – विवाहिता ने दहेज उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज कराई – पति समेत 7 ससुरालियों पर 40 लाख रुपए और कार मांगने का आरोप

सरोजनीनगर की अवध विहार कालोनी निवासी आयशा खातून का प्रेम विवाह जैद खान से 30 जनवरी 2023 को हुआ था. शादी के बाद जैद के परिजनों ने उन्हें अपने घर में रखने से इनकार कर दिया, जिस के बाद आयशा और जैद मायके में रहने लगे. कुछ महीने पहले जैद परिजनों ने जैद पर दबाव बनाया कि वह आयशा और अपनी 10 माह की बेटी अनायजा को छोड़ दे, या फिर ससुराल वालों को 40 लाख रुपए और एक कार दे. आयशा द्वारा इस मांग का विरोध करने पर जैद ने कई बार उस के साथ मारपीट की. 21 मई 2025 को जैद उसे और बेटी को पीट कर घर में छोड़ कर चला गया. (दैनिक भास्कर/13 अक्तूबर 2025)

कर्नाटक / बेलगावी – पत्नी की हत्या, शव छिपाया गया

कर्नाटक के बेलगावी जिले में एक व्यक्ति आकाश कंबर ने अपनी 20 वर्षीय पत्नी साक्षी कंबर की हत्या कर उस का शरीर पलंग के नीचे छुपाया और भाग गया. इस घटना का खुलासा तब हुआ जब तीन दिन बाद आरोपी की मां को बिस्तर के नीचे बहू का शव मिला. पुलिस आरोपी की तलाश कर रही है. लड़की के परिवार का कहना है कि यह दहेज प्रताड़ना से जुड़ा मामला है. (एनडीटीवी)

ये मात्र 7 दिनों की चंद ख़बरें हैं जो बताने के लिए काफी हैं कि लालची पति और क्रूर ससुरालियों के हाथों मासूम लड़कियां किस तरह मारीपीटी जा रही हैं, जलील की जा रही हैं और गाजर मूली की तरह काटी जा रही हैं. 2024 में नैशनल कमीशन फोर वीमेन के पास दहेज प्रताड़ना के 25473 मामले और दहेज हत्या के 292 मामले आए थे. अदालतों में दहेज हत्या के करीब 70 हजार मामले चल रहे हैं. जिन में अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ है. महिलाओं के साथ शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के इन मामलों में न सिर्फ दहेज की मांग शामिल है, बल्कि महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से बुरी तरह परेशान किया गया और कइयों की हत्या कर दी गई.

दहेज लेने और देने के खिलाफ देश में सैकड़ों कानून बने, आंदोलन हुए, पोस्टर लगे, नारे गूंजे – लेकिन दहेज का दानव कभी मरा ही नहीं. वह अनेक रूप धर कर औरत को खा रहा है. कभी दहेज खुले पैसों यानी कैश में मांगा जाता है, तो कभी “तोहफे” के नाम पर, कभी कार और मकान की मांग में, तो कभी लड़की के “स्टेटस” की अपेक्षा में. हर साल सैकड़ों बेटियां इस दानव के पेट में समा जाती हैं – कभी जला कर, कभी फांसी पर चढ़ा कर, तो कभी समाज की चुप्पी में दम तोड़ कर.

यह दानव मरेगा नहीं क्योंकि यह हमारे सोचने के ढंग में बैठा है, हमारे धार और हमारे रिवाजों में छिपा है, और हमारे “सम्मान” की झूठी परिभाषा में पल रहा है. जब तक लड़की को “बोझ” और दहेज को “सामाजिक प्रतिष्ठा” माना जाएगा, तब तक यह दानव हर पीढ़ी में पुनर्जन्म लेता रहेगा.

नंदिनी की शादी को 13 साल हो चुके हैं. वह शादी से पहले से नौकरी में है. शादी से पहले उस की सैलरी पर सिर्फ उस का हक था. वह अपनी मर्जी से जैसा चाहती थी वैसा खर्च करती थी. उस के मातापिता या भाई उस से कभी नहीं पूछते थे कि वह अपनी सैलरी का क्या करती है. उसे अच्छी किताबें पढ़ने, अच्छी फिल्में देखने, नईनई जगहें घूमने और अच्छे कपड़े पहनने का शौक था तो उस की सैलरी का अधिकांश हिस्सा इस पर खर्च हो जाता था और बचे हुए पैसे वह बैंक में डाल देती थी. कभी उन पैसों से मां के लिए साड़ी या पापा और भाई के लिए कोई गिफ्ट ले आती थी. मगर शादी के बाद उस की सैलरी पर उस के पति राहुल ने पूरा कब्जा कर लिया. बेहतर भविष्य बनाने के सपने तानतान कर उस ने बचत के नाम पर नंदिनी के अपने तमाम सपने मार दिए. वह अपनी मर्जी से एक पिन तक नहीं खरीद सकती थी. राहुल कहता, ‘जो चाहिए मुझ से बोलो. मैं ला कर दूंगा.’

13 साल से नंदिनी अपनी पूरी सैलरी राहुल के हाथ पर रखने के लिए मजबूर है. इन 13 सालों में वह करीब 80 लाख रुपए कमा कर राहुल को दे चुकी है. उस की सैलरी से उस की सास ने सोने के टौप्स खरीदे. राहुल ने नया कंप्यूटर लिया. घर में नया फ्रिज और नया टीवी आया. राहुल की नई कार की किश्तें उस की सैलरी से भरी गईं. हाल ही में उस ने नई बाइक उस के पैसे से खरीदी. नंदिनी से कहा गया है कि अब तुम इस घर की हो तो तुम्हारी कमाई पर इस घर का हक है. वैसे भी शादी में तुम्हारे घर वालों ने दिया ही क्या? हम ने भी शराफत में कुछ नहीं मांगा. तीज त्योहार पर भी तुम्हारे वहां से कुछ नहीं आता. ऐसे ताने मारते समय राहुल और उस के घर वाले यह भूल जाते हैं कि उस के मांबाप ने उन्हें चलता फिरता रोबोट-कम-एटीएम दिया है, जो हर महीने न सिर्फ हजारों रुपए देता है, बल्कि घर बाहर के सारे काम भी करता है.

उस की अपनी मां की भी यही राय है कि अब तुम उस घर की हो तो वहां की रवायत के अनुसार चलो. दामादजी कुछ गलत नहीं कह रहे हैं. मैं ने भी शादी के बाद अपने पति और सासससुर की सुनी, तभी घर बना रहा. स्पष्ट है कि मां नहीं चाहती कि नंदिनी लड़भिड़ कर मायके आए. उन्होंने इशारों में यह संकेत दे दिया कि इस घर के दरवाजे तुम्हारे लिए बंद हैं. मेहमान के तौर पर दोएक दिन के लिए आना चाहो तो अपने पति की आज्ञा ले कर आओ.

आज नंदिनी का जीवन एक बंधुवा मजदूर के जीवन के सामान है. शादी के नाम पर उस के पैरों में गुलामी की जंजीर डाल दी गई है. नंदिनी सुबह औफिस जाने से पहले घर का पूरा काम करती है. सुबह सब के लिए नाश्ता बनाना, बच्चे को तैयार कर स्कूल भेजना, दोपहर तक का खाना बनाना, रसोई साफ करना, कपड़े धोने के अलावा अनेकों काम हैं जो वह औफिस जाने से पहले निपटाती है. दिन भर औफिस में खटती है और औफिस से घर पहुंच कर फिर रसोई में घुस जाती है. उस के घर लौटने पर कोई उस को एक ग्लास पानी तक के लिए नहीं पूछता. उलटे वही सब के लिए जल्दीजल्दी चाय नाश्ता बनाती है. इस सब के बावजूद उस को आज भी दहेज का ताना मारा जाता है. राहुल अपने रिश्तेदारों के सामने यह कहने से नहीं चूकता कि हम तो अपनी शराफत में मारे गए. हम ने मुंह नहीं खोला तो दहेज में एक धेला नहीं मिला. अब बेटे की शादी में कसर पूरी करूंगा.

नंदिनी की कहानी उन तमाम महिलाओं की कहानी है जो नौकरीपेशा होने के बावजूद, हर महीने एक मोटी रकम ससुरालियों के मुंह में ठूंसने के बावजूद दहेज के तानों के तीर खा रही हैं. जो महिलाएं नौकरीपेशा नहीं हैं उन का जीवन तो और ज्यादा नारकीय है. वे सिर्फ ताने ही नहीं, मारपीट और गालीगलौच का भी सामना कर रही हैं. जो औरतें अपने प्रति हो रही क्रूरता के खिलाफ जरा भी बोलती हैं उन को या तो घर से बाहर निकल दिया जाता है या उन की हत्या कर दी जाती है.

औरत चाहे पढ़ीलिखी हो, या अनपढ़, नौकरीपेशा हो या गृहणी, दहेज के तानों और प्रताड़ना का शिकार है. कुछ हर दिन इस क्रूरता का सामना कर रही हैं तो कुछ मौके बेमौके. औरत के पास निकल भागने के रास्ते नहीं हैं. उन के पास जीवन को अपने मुताबिक जीने का विकल्प ही नहीं है. तनाव और हिंसा से बचने के लिए वे तलाक भी नहीं ले पातीं क्योंकि तलाक की प्रक्रिया आसान नहीं है. जो ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं हैं वे तो इस बारे में सोच भी नहीं पातीं हैं. पढ़ीलिखी औरतें भी कोर्ट-कानून की पेंचीदगियों से डरती हैं.

भारत में औरत के लिए तलाक लेना आज भी कानूनी रूप से संभव तो है, लेकिन सामाजिक, आर्थिक और मानसिक रूप से बेहद कठिन प्रक्रिया बनी हुई है. यह कठिनाई सिर्फ अदालतों या कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज, परिवार और परंपराओं में गहराई तक जमी मानसिकताओं से भी जुड़ी है.

सामाजिक कलंक

तलाकशुदा औरत को समाज अब भी ‘अधूरी’ या ‘गलत’ मानने की प्रवृत्ति रखता है. रिश्तेदारों, पड़ोसियों और यहां तक कि अपने परिवार से भी उसे ताने सुनने पड़ते हैं.

आर्थिक निर्भरता

ज्यादातर महिलाएं आज भी आर्थिक रूप से पति या ससुराल पर निर्भर हैं. तलाक के बाद नौकरी, घर या आर्थिक सुरक्षा न होना उन्हें फैसला लेने से रोकता है.

लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया

भारतीय न्याय प्रणाली में तलाक के मामलों को निपटाने में वर्षों लग जाते हैं. लगातार पेशियां, वकीलों की लम्बीचौड़ी फीस और मानसिक थकान औरत को झकझोर देती है.

कानूनी असमानताएं

हालांकि कानून समानता की बात करता है, लेकिन वास्तविकता में पुरुषों के पास अधिक आर्थिक ताकत और कानूनी साधन होते हैं, जिस से महिला को न्याय पाने में मुश्किल आती है.

परिवार का दबाव

मातापिता और रिश्तेदार अकसर कहते हैं, ‘थोड़ा समझौता कर लो, घर मत टूटने दो. कहां जाओगी? कोई पूछेगा नहीं’. यह भावनात्मक दबाव महिला की आजादी और आत्मसम्मान को कुचल देता है.

बच्चों की जिम्मेदारी

तलाक के बाद बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी अकसर मां पर ही आ जाती है. कोर्ट में कस्टडी की लड़ाई और आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है. अकेले बच्चा पालना, उस को पढानालिखाना आसान नहीं है. इस के लिए पैसा चाहिए.

समाज का घटिया नजरिया

तलाकशुदा औरत के प्रति समाज का नजरिया ठीक नहीं है. समाज ऐसी औरत की इज्जत नहीं करता. उसे ऐसी नजर से देखता है मानो सारा दोष उसी का हो. कभीकभी तो उस को बदचलन ठहरा दिया जाता है. उस के अपने मांबाप उसे वापस अपने घर में नहीं रखना चाहते. मांबाप न रहें तो भाई भाभी को तो वह फूटी आंख नहीं सुहाती. कहीं अकेले कमरा ले कर रहने लगे तो पूरा महल्ला उसे अपनी प्रौपर्टी समझने लगता है.

इस देश में तलाक की प्रक्रिया आसान हो जाए तो औरतों की आज़ादी और आत्मसम्मान बचा रहे. वह दहेज-दानव का शिकार होने से भी बच जाएं. भारत में करोड़ों महिलाएं असंतोषजनक और अपमानजनक वैवाहिक जीवन जीने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि तलाक की प्रक्रिया लंबी, जटिल और सामाजिक रूप से कलंकित मानी जाती है. परिणामस्वरूप औरतें जीवन भर हिंसा और मानसिक प्रताड़ना झेलती रहती हैं. अगर कानून उन्हें जल्दी और सम्मानजनक तरीके से अलग होने का अधिकार दे, तो वे दहेज के दानव और उत्पीड़न के चक्र से मुक्त हो सकती हैं. स्त्री की असली स्वतंत्रता तभी संभव है, जब उस के पास “न” कहने और अपने जीवन की दिशा स्वयं तय करने का अधिकार भी समान रूप से सुरक्षित हो. Indian Society

Bihar Politics: नीतीश कुमार को क्यों याद रखे बिहार

Bihar Politics: किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री के रूप में एक नेता के 20 साल का सफर कम नहीं होता है. 20 साल में पूरी पीढ़ी बदल जाती है. 18 साल में देश में वोट डालने का अधिकार मिल जाता है. नीतीश कुमार 2005 से ले कर 2014 तक लगातार बिहार के मुख्यमंत्री रहे. इस के बाद बीचबीच में कुछ अंतराल को छोड़ दें तो 20 साल वह बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं. बात 20 साल की जगह अगर केवल 5 साल की भी की जाए तो क्या काम नीतीश कुमार ने किया जिस को याद रखा जाए ?

मसलन लालू प्रसाद यादव की बात की जाए तो बिहार का एक बड़ा तबका कहता है कि दलित पिछड़ी जातियों को सम्मान जनक जीने का अधिकार दिलाया. उस के पहले बिहार में बाबू साहब का राज होता था. बिहार में कई लोकगीत लालू प्रसाद यादव के उपर बने हैं. जिन में यह गा कर बताया जाता है कि आज दलित और पिछड़े जो मूंछ रख कर घूम रहे हैं उस के पीछे लालू प्रसाद की मेहनत है. वरना दलित पिछड़ों को सम्मान से जीने का अधिकार नहीं था.

क्या पिछले 5 साल में नीतीश कुमार की इस तरह की कोई उपलब्धि है, जिस की वजह से उन को याद किया जा सके ? 5 साल की क्यों नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के रूप में बिहार में लंबे समय तक काम करने का मौका मिला है. पहली बार वह 3 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक मुख्यमंत्री रहे. दूसरी बार 24 नवबंर 2005 से 25 नवबंर 2010 तक, तीसरी बार 26 नवबंर 2010 से 19 मई 2014 तक, चौथी बार 22 फरवरी 2015 से 19 नवम्बर 2015 तक, पाचंवी बार 20 नवबंर 2015 से 26 जुलाई 2017 तक, छठी बार 27 जुलाई 2017 से 15 नवबंर 2020 तक, सातवी बार 16 नवबंर 2020 से 9 अगस्त 2022 तक और आठवी बार 10 अगस्त 2023 से अब तक मुख्यमंत्री है.

इन को जोड़ कर देखें तो करीब 18 साल से अधिक समय तक नीतीश कुमार बिहार की कुर्सी पर बैठे रहे हैं. नीतीश कुमार ने श्रीकृष्ण सिंह का रिकौर्ड तोड़ दिया. वह 14 साल 314 दिन तक मुख्यमंत्री रहे थे. श्रीकृष्ण सिंह कायस्थ बिरादरी के सिन्हा वर्ग से आते थे. नीतीश कुमार के ही नाम सब से कम समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकौर्ड भी रहा है. उन का पहला कार्यकाल मार्च 2000 में केवल 7 दिन का भी रहा है. सब से लंबा कार्यकाल 8 साल 239 दिन भी नीतीश कुमार के नाम रहा. जब वह 2005 से 2014 तक मुख्यमंत्री रहे.

बिहार रहा बदहाल

बचपन में जिस नीतीश कुमार को लोग ‘मुन्ना‘ के नाम से पुकारते थे मुख्यमंत्री बनने के बाद उन को ‘सुशासन बाबू‘ के नाम से जानने लगे. सुशासन बाबू के कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार का नाम तीसरे मोर्चे के प्रधानमंत्री के रूप में लिया जाने लगा था. भारतीय जनता पार्टी को बहुमत मिलने के बाद जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो नीतीश कुमार ने राजनीति की गति को समझा और धीरेधीरे वह ‘मोदी मय‘ होते गए. ऐसे में नीतीश कुमार भले ही 15 साल मुख्यमंत्री बन पाए हो पर बिहार का विकास नहीं हो सका.

नीतीश कुमार केवल बिहार का विकास ही नहीं कर पाए यहां की सामाजिक सरंचना को भी नहीं बचा पाए. जिस समाजवादी विचारधारा के नेता जय प्रकाश नारायण के साथ नीतीश ने अपनी राजनीति शुरू की थी बाद में वह कांग्रेस के विरोध के नाम पर भाजपा की धर्मवादी सोच का हिस्सा बन गए. मोदी के प्रखर धर्म और राष्ट्रवाद आने के बाद नीतीश कुमार उस का हिस्सा बनते गए. नीतीश कुमार ने धर्म की आड़ में गरीब पिछड़ों की आवाज को दबा दिया. नीतीश के शासन में बिहार की हालत पहले से भी बद से बदत्तर होती गई. बिहार में बेकारी, बदहाली, अपराध, स्वास्थ्य और षिक्षा का बुरा हाल है.

बिहार की पोल कोविड काल में पूरे देश ने देखी. 2019 में कोरोना काल के दौरान प्रवासी मजदूरों के पलायन सब ने देखा. आंकड़े बताते हैं कि बिहार से करीब 90 लाख लोगों ने रोजीरोटी के लिए बिहार छोड़ा था. इन में से कोरोना के दौरान 40 लाख लोग इस भ्रम में वापस बिहार आए कि उन को अब यहां काम मिल जाएगा तो मनरेगा के तहत भी उन को पूरा काम नहीं मिला. बिहार में कुल मजदूरों की संख्या 2 करोड़ 43 लाख है. जिन लोगों ने मनरेगा के तहत काम के लिए आवेदन किया था. उन में से केवल 65 लाख को ही जौब कार्ड बन सका.

बिहार में सब से प्रमुख नेता प्रतिपक्ष और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा कि टैक्नोलौजी, उदारीकरण और एआई के दौर के बाद भी विगत 20 सालों में बिहार की प्रति व्यक्ति आय सब से गरीब अफ्रीकी देशों युगांडा और रवांडा से भी कम है. बिहार के 8 करोड़ युवाओं को नौकरी की तलाश है. तेजस्वी यादव को विरोधी भले ही 9वीं फेल कह कर उपहास उड़ाते हों पर तेजस्वी बात खरीखरी कहते हैं. तेजस्वी यादव ने 20 सवाल किए. जिन के जरीए बिहार की हालत का पता किया जा सकता है. उन का कहना था ’बिहार में केला, मकई, मखाना, चावल, गन्ना, आलू, लीची, आम इत्यादि अनेक विश्व प्रसिद्ध अनाज, फल, सब्जियों का इतना उत्पादन होता है, लेकिन इन सभी से संबंधित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग 20 वर्षों से बिहार में क्यों नहीं लगाए गए ?

तेजस्वी यादव ने ट्वीट करते हुए पूछा बिहार बेरोजगारी का मुख्य केंद्र क्यों है? 20 वर्षों की एनडीए सरकार बताए कि बिहार में आईटी कंपनियां क्यों नहीं बुलाई गई ? क्यों नहीं आई और क्यों नहीं आ सकती ? बिहार में आईटी पार्क क्यों नहीं बन सकते ? बिहार दूसरे प्रदेशों से मछली खरीदता है ? बिहार में मछली उत्पादन संबंधित तमाम संसाधन होने के बावजूद यहां ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं कर सकते ? बिहार में मछली उत्पादन को बढ़ावा दे कर, यहां जिलावार मछली बाजार लगाकर मछुआरों की आमदनी और उत्पादन क्यों नहीं बढ़ा सकते ?

बिहार में डेयरी प्रौडक्ट्स यानी दुग्ध उत्पादन संबंधित बड़े उद्योग क्यों नहीं लगाए जा सकते ? बिहार का दूध, घी, मक्खन, चीज, पनीर, खोया इत्यादि दूसरे प्रदेशों और देशों में क्यों नहीं भेजा जा सकता ? बिहार में इंडस्ट्री स्पेसिफिक क्लस्टर या उद्योग-विशिष्ट क्लस्टर क्यों नहीं लगाए जा सकते ? यहां बुन कर उद्योग, लघु उद्योग और हथकरघा उद्योग के लिए क्या किया ? इन के शासन में बड़े पैमाने पर इन उद्योगों को बढ़ावा क्यों नहीं दिया गया ? बिहार को अब तक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित क्यों नहीं किया ? बिहार में पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं.

सरकार नियुक्ति, भर्ती परीक्षा और प्रक्रिया को पारदर्शी तथा नियमित क्यों नहीं करती ? इस बात की जानकारी देनी चाहिए कि बिहार से कुल कितना पलायन हुआ ? बिहार में अप्रत्याशित दर से पलायन क्यों बढ़ रहा है ? पहले से चालू कितने चीनी मिल, जूट मिल, पेपर मिल एवं कुल कितने उद्योग-धंधे और कल-कारखाने बंद हुए तथा उस से बिहार को कुल कितने राजस्व व रोजगार के अवसरों की हानि हुई ? बिहार का कुल कितने लाख करोड़ रुपए शिक्षा और चिकित्सा के नाम पर दूसरे प्रदेशों में गया ? बिहार के मानव संसाधन का कुल कितने प्रतिशत बिहार में और कितने प्रतिशत दूसरे प्रदेशों में कार्यरत है ?

बिहार में 60 लाख ग्रेजुएट हैं. इन में से आधे बेरोजगार हैं. जिस आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि हर दूसरा आदमी बेरोजगार हैं. कारोबारी और किसानों की हालत भी बेहद खराब है. बिहार में 2005 में मंडी सिस्टम बंद कर के उस के समांतर निजी खरीददारों की व्यवस्था है. प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से देखें तो बिहार का देश में चौथा स्थान है. बिहार की प्रति व्यक्ति आय 6 हजार रुपए मासिक यानी करीब 2 सौ रुपए रोज है.

क्या है शराब बंदी का सच ?

नीतीश कुमार के कामों को सोचें तो कोई खास काम सामने नहीं दिखते हैं. एक बात की सब से ज्यादा चर्चा होती है कि उन के राज में शराब बंदी हुई. शराब बंदी का असर तक होता जब लोगों ने शराब पीना छोड़ दिया होता. शराब बंदी का असर गरीब और पिछड़ी जातियो के लोगों पर हुआ जिन को पुलिस ने शराब बेचने के आरोप में बंद कर दिया. तेजस्वी यादव ने आंकड़ों के जरिए शराब बंदी के सच को समझाते हुए पूरा गणित समझाया.

बिहार में शराबबंदी का कड़वा व काला सच 99 फीसदी गरीब, दलित, पिछड़े और अतिपिछड़े वर्गों के लोगों को पकड़ा गया. शराबबंदी कानून के तहत अब तक 9 लाख 36 हजार 949 मुकदमें दर्ज किए गए. जिस के तहत 14 लाख 32 हजार 837 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इन में से लगभग 14 लाख 20 हजार 700 से अधिक गिरफ्तार लोग गरीब, दलित, पिछड़े और अतिपिछड़े वर्गों के हैं. बाकी बचे एक प्रतिशत से भी कम गिरफ्तार लोगों में गैर दलित, गैर पिछड़ा गैर अति पिछड़ा और अन्य राज्यों के लोग है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में 3 करोड़ 86 लाख 96 हजार 570 लीटर शराब बरामद की गई. इस में 2 करोड़ 10 लाख 64 हजार 584 लीटर विदेशी तथा एक करोड़ 76 लाख 31 हजार 986 लीटर देशी शराब शामिल है. इस का मतलब हुआ कि बिहार में विदेशी शराब की खपत अधिक है. अब गरीब लोग तो 2 करोड़ 10 लाख लीटर विदेशी शराब पिएंगे नहीं ? फिर बिहार में विदेशी शराब कौन पीता है? उत्तर है अमीर लोग- जिन्हें ये भ्रष्ट सरकार और पुलिस गिरफ्तार नहीं करती ?

तेजस्वी यादव सवाल पूछते हैं ‘सरकार बताए कि 9 लाख, 36 हजार 949 मुकदमे दर्ज होने और 14 लाख 32 हजार 837 लोगों को गिरफ्तार करने के बाद भी बिहार में 3 करोड़ 86 लाख 96 हजार 570 लीटर शराब कहां से आ रही है ? शराब किस की मिलीभगत से आ रही है ? सप्लाई कौन कर रहा है ? बिहार पुलिस और बिहार सरकार ने शराबबंदी को अवैध उगाही, तस्करी और भ्रष्टाचार का एक सशक्त उपकरण बना लिया है. क्या यह सच नहीं है कि शराबबंदी के नाम पर बिहार में 40 हजार करोड़ से अधिक के अवैध कारोबार की समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है.

नीतीश कुमार में क्या था खास

सवाल उठता है कि नीतीश कुमार में ऐसी क्या खास बात थी कि वह इतने लंबे समय तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे ? दूसरी तरफ उन के 5 साल के कार्यकाल में एक भी ऐसा काम नजर नहीं आ रहा जिस की वजह से बिहार उन को याद रखे ? बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव को सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले नेता के रूप में देखा जाएगा तो नीतीश कुमार को पिछड़ा वर्ग के वोटबैंक में सेंधमारी करने वाले अवसरवादी नेता के रूप में याद किया जाएगा.

देश में मंडल कमीशन के बाद पिछड़ी जातियों ने अपने हक और अधिकार की जो लड़ाई शुरू उसे उपजातियों में बांट कर अपने लाभ के लिए खत्म कर दिया गया. 1990 के बाद हाशिए पर पहुंची सवर्ण राजनीति को पिछड़ा वर्ग में बंटवारे का लाभ मिला. इस वजह से 2025 में सवर्णवादी राजनीति बिहार में वापस कायम होती दिख रही है. नीतीश ने अपना राजनीतिक सफर जयप्रकाश नारायण के साथ शुरू कर के जनता पार्टी, लोकदल, जनतादल, समता पार्टी और फिर जनता दल यूनाइटेड तक तय किया. समय के हिसाब से वह पाला बदलते रहे. इस कारण ही वह लंबे समय तक बिहार के मुख्यमंत्री बने रह सके.

जदयू के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं कि ‘मुझे लोकनायक जयप्रकाश नारायण, छोटे साहब सत्येंद्र नारायण सिन्हा और जननायक कर्पूरी ठाकुर के चरणों में जानने और सीखने का मौका मिला है.‘ नीतीश कुमार के राजनीतिक कैरियर को देखें तो उन्होंने पिछड़ा वर्ग में सेंधमारी कर के उसे कमजोर किया. जिस सवर्णवादी राजनीति को बिहार ने नकार दिया था नीतीश कुमार ने पिछड़े वर्ग के वोटों का सौदा कर के उसी सवर्णवादी सोच को बिहार की सत्ता में स्थापित होने का मौका दिया.

90 के दशक में जब बिहार में सवर्णवादी राजनीति हाशिए पर पहुंच रही थी. लालू प्रसाद यादव ने पिछड़ी जातियों को बिहार की मुख्यधारा में स्थापित करने का काम किया. इस वजह से उन को सामाजिक न्याय के नेता के रूप में स्वीकार किया जाता है. लालू प्रसाद यादव को कमजोर करने के लिए नीतीश कुमार ने पहले पिछड़ी जातियों में सेंधमारी फिर सवर्णवादी राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी के साथ समझौता कर के बिहार में उन के जनाधार को बढ़ाने का काम किया.

पिछड़ी जातियों में सेंधमारी के लिए नीतीश कुमार ने जातियों के वर्ग के बीच उपवर्ग और जातियों की श्रेणियों को तैयार किया. पिछड़ा वर्ग को सब से अधिक नुकसान मोस्ट ओबीसी के अलग होने से हुआ. नीतीश कुमार ने पिछड़ा वर्ग से 22 फीसदी मोस्ट ओबीसी, 12 फीसदी कोइरी, कुर्मी और कुशवाहा, 8 फीसदी महादलित को अलग कर के अपना एक नया वोट बैंक तैयार किया. इस वर्ग ने 16 फीसदी अगड़ों का साथ दे कर पिछड़ा वर्ग की राजनीति को बिहार से उखाड़ कर फेंक दिया.

नीतीश कुमार की सफलता का श्रेय उन के पलटीमार दांव को दिया जा सकता है. जय प्रकाश की समाजवादी विचारधारा से राजनीति शुरू की. पिछड़ों की अगुवाई करने वाले लालू प्रसाद यादव को हाशिए पर ढकेलने के लिए ऊंची जातियों ने नीतीश कुमार का प्रयोग किया. कांग्रेस की विचारधारा का विरोध करने वाले नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी के साथ मिल कर पिछड़े वर्ग को कमजोर करने का काम किया. ऊंची जातियों ने पिछड़ों के नेता लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार को आमने सामने कर के लालू यादव की ताकत को बिहार में खत्म कर दिया.

समाजवाद को भूल दक्षिणापंथी बने नीतीश कुमार

नीतीश कुमार ने नौकरी छोड़ कर 1975 में राजनीति में प्रवेश किया और जय प्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़ गए. इंदिरा सरकार को गिराने में अहम भूमिका निभाई. नीतीश कुमार ने 1977 में विधानसभा चुनाव लड़ा और चुनाव हार गए. इस के बाद भी नीतीश ने हार नहीं मानी. इस के बाद 1980 में विधानसभा चुनाव लड़ने का मौका मिला लेकिन इस में भी उन को हार मिली. भले ही ये लगातार चुनावों में हार रहे थे. लेकिन इन पर हार का कोई विशेष प्रभाव नहीं था पड़ा.

1985 में पहली बार नीतीश कुमार को जीत मिली. इस के बाद युवा लोकदल के अध्यक्ष और बाद में जनता दल के प्रदेश सचिव बन गए.

1990 में केन्द्र की चन्द्रशेखर सरकार वह पहली बार केन्द्रीय मंत्रीमंडल में कृषि राज्यमंत्री बने. 1991 में वह एक बार फिर लोकसभा के लिए चुने गए. इस साल ही जनता दल का राष्ट्रीय सचिव भी चुना गया. इस के संसद में वह जनता दल के उपनेता भी बने. 1989 और 2000 में वह बाढ़ लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. 1989-1999 में वह केन्द्रीय रेल एवं भूतल परिवहन मंत्री भी रहे. अगस्त 1999 में गैसाल में हुई रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने मंत्रीपद से अपना इस्तीफा दे दिया. जौर्ज फर्नांडिस की समता पार्टी के साथ काम किया. साल 2000 में इन को कृषि मंत्री बना दिया गया और 2001 में फिर से रेल मंत्री बना दिया गया.

2005 में बिहार में चुनाव हुए इस समय तक नीतीश कुमार ने जनता दल यूनाइटेड नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली थी. लालू यादव के जंगलराज और परिवारवाद के खिलाफ जनता को विकास का वादा कर के चुनाव जीतने में सफल रहे. भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन के साथ बिहार के मुख्यमंत्री बन गए. 2010 में फिर मुख्यमंत्री के चुनाव हुए. इस में नीतीश को भारी जीत मिली. अब तक नीतीश को भाजपा की जरूरत खत्म हो गई थी तो वह भाजपा से अलग हो गए. इस समय तक भाजपा में नरेंद्र मोदी का उदय शुरू हो चुका था. नीतीश नरेंद्र मोदी की आलोचना करने लगे थे. 2014 के लोकसभा चुनावों में नीतीश को तीसरे मोर्चे का नेता मान प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी माना जा रहा था. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह सारे कयास धरे के धरे रह गए.

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश ने भाजपा से नाता तोड़ कर राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ महागठबंधन कर लिया. इस चुनाव में नीतीश की पार्टी जदयू बिहार में तीसरे नम्बर पर थी इन को 17 फीसदी वोट और 71 सीटें मिलीं, राजद को 18 फीसदी वोट और 80 सीटें मिलीं और भाजपा को 24 फीसदी वोट और 50 सीटें मिलीं. कांग्रेस को 7 फीसदी वोट और 27 सीटें मिलीं. इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहने के बाद भी नीतीश कुमार मुख्यमंत्री और राजद नेता लालू प्रसाद यादव के बेटे और तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम बन गए.

बिहार में फैली धर्म की राजनीति

नीतीश और तेजस्वी यादव के बीच संबंधों की खींचतान के कारण महागठबंधन में विवाद शुरू हुआ था. 26 जुलाई 2017 को सीबीआई द्वारा एफआईआर में उपमुख्यमंत्री और लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव के नाम आने के बाद नीतीश कुमार ने गठबंधन सहयोगी राजद के बीच मतभेद के चलते इस्तीफा दे दिया था. 20 महीने पुरानी महागठबंधन सरकार गिर गई तो नीतीश कुमार पाला बदल कर वापस भाजपा की तरफ आ गए. वह एनडीए गठबंधन में शामिल हुए और मुख्यमंत्री पद की पुनः शपथ ली. भाजपा के सहयोग से सरकार चलाने लगे.

बिहार में जाति की राजनीति का असर था कि यहां धर्म की राजनीति कभी पनप नहीं पाई. नीतीश कुमार का साथ ले कर भाजपा ने अपना उल्लू सीधा करना शुरू किया. 2000 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरी. अब 2025 में भाजपा का पूरा प्रयास होगा कि बिहार में पहली बार वह अपना मुख्यमंत्री बना सके. इस में नीतीश कुमार का सब से बड़ा सहयोग रहेगा. एक बार धर्म का प्रभाव फैला तो फिर अगड़ी जातियों के प्रभाव को खत्म करना मुश्किल हो जाएगा. नीतीश कुमार ने हर कदम भाजपा का साथ दिया है. उम्र में बराबर होने के बाद भी वह प्रधानमंत्री का पैर मंच पर छूने से नहीं चूकते हैं.

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद जब भाजपा अपने बल पर केन्द्र में सरकार नहीं बना पा रही थी तो नीतीश कुमार ने बैशाखी का काम किया. कहने को नीतीश कुमार की राजनीति पिछड़े वर्ग की रही असल में वह अगड़ी जातियों के हित में काम करते रहे. वह भाजपा की पाखंडवादी राजनीति का हिस्सा बन गए. जब अयोध्या में राम मंदिर बना तो भाजपा ने बिहार के सीतामढ़ी में सीता मंदिर बनाने की योजना बनाई तब नीतीश सरकार ने इस काम को पूरा किया.

बिहार के सीतामढ़ी स्थित पुनौराधाम में सीता मंदिर परिसर का शिलान्यास 8 अगस्त को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया. 67 एकड़ में बनने वाले इस भव्य मंदिर का निर्माण 882 करोड़ की लागत से मात्र 11 महीने में पूरा करने की योजना है. पुनौराधाम को सीता के जन्मस्थल के रूप में माना जाता है. नीतीश कुमार के 20 साल की तुलना करें या 5 साल की बिहार को कुछ ऐसा नहीं हासिल हुआ जिस के कारण उन को याद किया जा सके. नीतीश कुमार के सहारे भाजपा ने बिहार पर कुंडली मार ली है. धर्म की जकडन से बिहार को निकालना सरल नहीं है. Bihar Politics

Hindi Story : अम्मा शहर में

Hindi Story : भोपाल की वह पौश कालोनी थी जहां दादी के बेटे मानव का फ्लैट था. नया फ्लैट था. मानव और उस की पत्नी मीनल एक प्राइवेट कंपनी में जौब करते थे. मानव ने मां को महीनेभर पहले ही बोल दिया था, ‘अम्मा, हम दोनों कंपनी के काम से बाहर जाएंगे तो कुछ दिनों तक तुम को यहां आना है. तुम्हारे आने से हम निश्ंिचत हो कर जा सकेंगे. मानसी को भी आप के साथ ज्यादा समय मिल जाएगा.’

बेटेबहू के प्यारभरे बुलावे को कैसे टाल देती, रीना. पोती मानसी के साथ रहने की कल्पना से ही खुश हो उठी थी वह. मानसी 10 साल की थी. दादी सरकारी स्कूल में टीचर थीं. कुछ समय पहले ही रिटायर हुई थी. कुछ समय तो नहीं कह सकते क्योंकि वह 11-12 साल पहले रिटायर हुई थीं. गांव बीरमपुर में बड़े बेटे के साथ रहती थीं वे. गांव की शुद्ध ताजी हवा, पौष्टिक खानपान और फिजिकली रूप से सक्रिय दादी की चुस्तीफुरती देखते ही बनती थी. वे बढ़ती उम्र को सिर्फ नंबर मानती थीं क्योंकि उन्हें हर समय छोटीछोटी समस्याओं पर रोनाधोना, काम से जी चुराना पसंद नहीं था.

दूसरी आम महिलाओं की तरह मंदिरों में भजनकीर्तन में समय गंवाना भी पसंद नहीं था उन्हें. वे कर्म में विश्वास रखती थीं, जो सोचती थीं वही बोलती थीं. कर्म ही सब से बड़ा धर्म है, कर्म से बढ़ कर कुछ नहीं है. बेटे भी मां पर गर्व महसूस करते थे. लेकिन बहुएं कभीकभी चिढ़ जाती थीं और बोल देती थीं, ‘अम्मा आराम से घर में बैठो, गरम रोटी दे रहे हैं खाने को. आप आराम किया करो.’

लेकिन अम्मा कहां सुनतीं. वे तो गांव में भी बच्चों को फ्री ट्यूशन देने बैठ जातीं. आएदिन बच्चों का मजमा लगा लेतीं. कोई बच्चे को पढ़ने को न भेजता तो उस के घर जा कर उसे डांट पिला देतीं. गांव में बड़ी बहू खुश थी. चलो अम्मा, अब छोटे देवर के पास कुछ दिन रहेंगी तो गांव में बच्चों की भीड़ घर पर नहीं लगेगी. वैसे, अम्मा जाती रहती थीं भोपाल लेकिन कुछ दिन रह कर वापस आ जाती थीं. इस बार महीनेभर के लिए जा रही हैं. दोनों पतिपत्नी कंपनी के काम से बेंगलुरु जाएंगे तो अम्मा को वहीं रहना होगा.

भोपाल स्टेशन पर मानव आ गया था अम्मा को लिवाने. कार की डिक्की में अम्मा का सामान रखते हुए मानव ने पूछा, ‘‘अम्मा सब ठीक रहा सफर में, कोई तकलीफ तो नहीं हुई?’’

अम्मा चुप रहीं. मानव ने कार स्टार्ट कर दी.

‘‘अम्मा, तुम जवाब नहीं दे रही हो, क्या हुआ?’’ मानव ने सवाल किया.

‘‘तकलीफ की बात पूछी तू ने, इस पर चुप हूं,’’ अम्मा बोलीं.

‘‘क्यों?’’ मानव आश्चर्य से बोला.

‘‘अरे, ट्रेन में पब्लिक हो तो तकलीफ होगी न. पब्लिक ही नहीं तो काहे की तकलीफ,’’ अम्मा ने खुलासा किया.

‘‘क्या कह रही हो, कंपार्टमैंट में पैसेंजर नहीं थे? तुम अकेली थीं?’’ मानव ने कार रोक दी.

‘‘अरे नहींनहीं, लोग थे पर एसी में पैसेंजर बातचीत कहां करते हैं? परदे खींच कर अपनीअपनी सीटों पर पसरे रहते हैं, मोबाइल चलाते हैं या फिर लैपटौप खोल कर बैठ जाते हैं.’’

मानव जोरजोर से हंसने लगा और उस ने कार स्टार्ट कर दी. लगभग 40 मिनट में वे अपनी कालोनी में पहुंच गए. बड़े अपार्टमैंट के सामने कार रुकी. मानव ने हौर्न बजाया. गार्ड दौड़ता हुआ आया और उस ने गेट खोल दिया. कार को पार्किंग में खड़ा कर मानव लिफ्ट से 5वें माले पर पहुंच कर फ्लैट के सामने पहुंचा ही था कि गेट खुल गया. दरवाजे पर बहू मीनल, पोती मानसी खड़ी थीं. मानसी दादी को देखते ही उन से लिपट गई तो जैसे दादी की सफर की थकान उतर गई हो.

फ्लैट नया था. दीवारों और दरवाजे पर नए किए गए पेंट की गंध पूरे घर में थी. मानसी दादी का हाथ पकड़ कर उसे नया घर दिखाने में व्यस्त थी. बड़ेबड़े 3 बैडरूम, डाइनिंग हौल, खूबसूरत किचन, ड्राइंगरूम सबकुछ बढि़या था. दोदो बालकनी जहां से पूरे भोपाल शहर को देखा जा सकता था.

‘‘मानसी, अब दादी को फ्रैश होने दो, थकी होंगी दादी,’’ बहू मीनल ने कहा.

‘‘अरे बहू, तू चिंता मत कर. मैं न थकती, मेरी थकान तो पोती का मुंह देखते ही उतर गई है,’’ कहती हुई दादी ने मानसी को गले लगा लिया.

बहू ने चाय टेबल पर रख दी थी. बहू जानती थी कि शाम को अम्मा चाय पीती हैं, वह भी खालिस दूध की, चायपत्ती नामभर की डलती है.

दादी बाथरूम से आई तो फ्रैश महसूस कर रही थीं. उन्होंने साड़ी बदल ली थीं. हलकी रेशमी साड़ी थी सफेद रंग की, ब्लाउज रंगीन था. मठरी के साथ दादी ने चाय का घूंट भरा, फिर बोलीं, ‘‘मठरी घर में बनी है क्या?’’

‘‘नहीं अम्मा, बाहर की है. घर में समय नहीं मिल पाता.’’

‘‘अच्छा,’’ फिर बोलीं, ‘‘चाय अच्छी बनाई है, बहू.’’

मीनल मुसकरा दी.

‘‘तुम लोग कब जाओगे बेंगलुरु?’’ अम्मा ने सवाल किया.

‘‘कल शाम को,’’ मानव ने कमरे में आतेआते कहा, ‘‘अम्मा, हम लोग भी अभी नएनए आए हैं फ्लैट में, कुछ लोगों को जानते हैं, अच्छे लोग हैं. 5वें माले पर जितने भी लोग हैं उन से परिचय हो गया है हमारा. ज्यादा परेशान मत होना किसी बात के लिए. दरवाजा एकदम से मत खोलना. पहले देख लेना कौन है- दूध वाला, अखबार वाला, धोबी होगा, यही लोग ही आते हैं. बिल्ंिडग के नीचे मार्केट है, मानसी के साथ जा कर सब्जी वगैरह ले लेना. गार्डन नजदीक है.’’

‘‘अरे, बसबस. मैं क्या दूध पीती बच्ची हूं जो सम झा रहा है.’’

‘‘ये,’’ दादी ने पापा की बोलती बंद कर दी तो मानसी खुश हो गई.

मानव चुप हो गया.

‘‘मानसी है, वह सम झा देगी.’’ दादी ने कहा तो मानसी मुसकरा दी.

दूसरे दिन शाम को मानव और मीनल बेंगलुरु के लिए रवाना हो गए थे. मानसी दादी के साथ बहुत खुश थी, कभी बुक्स की बातें करती तो कभी टीवी पर कार्टून फिल्म लगा लेती.

‘‘दादी डिनर में क्या खाएंगे?’’ मानसी ने लाड़ जताया.

‘‘जो मानसी बोलेगी, दादी बना देगी.’’

‘‘चावल और मखनी मिक्स दाल,’’ मानसी बोली.

‘‘किचन में चलो,’’ दादी बोलीं.

दोनों डिनर की तैयारी में लग गईं. दाल में हींग, लहसुन, जीरे व प्याज का तड़का लगा. मानसी की भूख तेज हो गई. गरमगरम दालचावल, आलू और मूंग के पापड़ के साथ खाने का स्वाद बढ़ गया. दादी के हाथों का खाना खा कर मानसी खुश थी. दादी भी सोच रही थीं कि यह सुख सब को नहीं मिलता. उन दोनों ने खाना खाया और बालकनी में आ कर बैठ गईं. पूरा भोपाल शहर जगमग कर रहा था.

‘‘दादी, देखो चांद कितना सुंदर लगता है,’’ मानसी बोली.

‘‘हां बेटा, मानसी भी तो सुंदर है,’’ दादी बोलीं.

‘‘दादी, आप के बाल लंबे और सुंदर हैं. मेरे बाल लंबे क्यों नहीं करती मौम?’’ मानसी ने मां की शिकायत की.

‘‘बेटा, उस के पीछे वजह है. लंबे बाल, स्वस्थ बालों के लिए उन की देखभाल भी करनी होती है. मौम जौब में है, तुम छोटी हो, इसलिए समय नहीं निकल पाता होगा. बाल तो बढ़ जाएंगे, कौन सी बड़ी बात है,’’ दादी ने कहा, फिर बोलीं, ‘‘तुम्हारे छोटे कटे हुए बाल भी सुंदर हैं.’’

‘‘अच्छा, दादी,’’ मानसी बोली.

‘‘बिलकुल, चलो, तुम बैठो. मैं तुम्हारे लिए हलदी वाला दूध लाती हूं.’’

‘‘दादी, चौकलेट वाला दूध,’’ मानसी बोली.

‘‘एक बार आज हलदी वाला दूध पियो, कल चौकलेट वाला.’’

‘‘ठीक है,’’ मानसी मान गई.

दादी गरम दूध हलदी डाल कर ले आईं. मानसी को उस का स्वाद अच्छा लगा.

‘‘चल, अब सो जाते हैं,’’ दादी ने मानसी से कहा.

‘‘ठीक है, दादी,’’ कह कर मानसी ने दादी को प्यार किया और दादी के साथ ही सो गई. दूसरे दिन दादी सुबह जल्दी ही उठ गई थीं. उन्हें आदत थीं जल्दी उठने की. फ्रैश  हो कर बालकनी में बैठ गई. ठंडीठंडी हवा भली लग रही थी. पूरा शहर रोशनी से  झिलमिला रहा था. अपार्टमैंट खामोशी में डूबा था. नाइट शिफ्ट का गार्ड जरूर घर जाने की तैयारी में था. दोपहर वाली शिफ्ट का गार्ड आ गया था.

दादी सोच रही थीं, गांव में होतीं तो अब तक मौर्निंग वौक पर निकल जाती पर यहां अनजान हूं, रास्तों से. इसलिए वे बालकनी में ही बैठी रहीं. लगभग घंटेभर बाद दरवाजे के बाहर रखा अखबार ले कर पढ़ने लगीं. इस बीच कमरे में मानसी को देख आई थी. वह सो रही थी. अखबार में वही खबरें- चोरी, साइबर क्राइम, रेप. वे सोचने लगीं, तरक्की ने जीवन को आसान तो बनाया है लेकिन बदमाशों ने उस का भी फायदा उठा लिया. अब साइबर क्राइम बढ़ने लगे.

मोबाइल जैसी छोटी चीज जीवन को सरल बना देती है लेकिन सावधानी न बरतने पर खतरे बढ़ा देती है. दादी मोबाइल चलाती थीं लेकिन उस का इस्तेमाल कम करती थीं. पढ़ने के लिए प्रिंट मीडिया को ही वह अच्छा सम झती थीं.

‘‘दादी, दादी, कब उठीं आप?’’ इतने में मानसी बालकनी में चली आई.

दादी ने देखा, सुबह के सवा सात बज रहे हैं. मानसी को प्यार करती हुई किचन में ले आई. उस के लिए उन्होंने दूध गरम किया. मानसी ने दूध पिया, फ्रैश हो कर दादी से बोली, ‘‘चलो दादी, गार्डन में चलते हैं.’’ दादी को मालूम था कि मानसी के एग्जाम खत्म हो गए हैं. छुट्टियां चल रही हैं. स्कूल अप्रैल में खुलेगा. इस बीच डोरबेल बजी, दादी ने गेट खोला.

‘‘गुडमौर्निंग मैडम, दूध ले लो.’’

मानसी दूध लेने के लिए बरतन ले आई थी. दूध देख कर दादी ने उस में उंगली डाल कर निकाली और जोर से बोलीं, ‘‘यह दूध है कि चूने का पानी? दूध उंगली पर ठहरा ही नहीं. अच्छा लूटते हो. हमारे गांव आना, दूध उंगली से ही चिपक जाएगा इतना गाढ़ा दूध होता है.’’

दूध वाला हंसता हुआ चला गया.

‘‘दादी, अब गार्डन में चलते हैं.’’

‘‘ठीक है, चलोचलो,’’ कहते हुए दरवाजे को लौक किया और लिफ्ट से ग्राउंडफ्लोर पर उतर कर सड़क पर आ गईं वे दोनों.

‘‘मेड साढे़ दस बजे से पहले नहीं आएगी, अभी 8 बज रहे हैं, इस वक्त मौर्निंग वौक वाले मिलेंगे? दादी ने सवाल किया.

‘‘हां दादी, अपने फ्लोर वाली आंटियां इसी समय जाती हैं. वे लेट उठती हैं न, इसलिए. कुछ बच्चे भी होंगे, बाकी के फ्लोर वालों को मैं नहीं जानती,’’ मानसी ने दादी को जानकारी दी.

गार्डन में पहुंचते ही जोरजोर से हंसीठहाकों की आवाज कानों में पड़ने लगी. कहीं से जोर से तालियों की आवाज. बहुत सी महिलाएं लोअर और टीशर्ट में वौक कर रही थीं. शरीर जैसे शर्ट फाड़ कर बाहर आना चाहता हो. भोंडापन  झलक रहा था. कहीं महिलाएं मैदान में बैठीबैठी ऐक्सरसाइज कर रही थीं तो कहीं बतियाने में लगी थीं.

‘‘अरे, इतनी धीरेधीरे दौड़ोगी तो चरबी न पिघलेगी, जोर से दौड़ो.’’ वौक करती महिलाएं रुक गईं दादी की आवाज सुन कर. फिर जब मानसी पर उन की नजर पड़ी तो बोलीं, ‘‘मानसी, कौन हैं ये?’’

‘‘दादी हैं मेरी, मानसी ने जवाब दिया और फिर दादी से बोली, ‘‘अपने फ्लोर की

आंटियां हैं.’’

‘‘तेजतेज घूमो, नहीं तो खूब खेलो. पसीना आने दो,’’ दादी ने सब को सम झाया.

‘‘इस उम्र में क्या खेलना.’’

‘‘ठीक है, कल सुबह तैयार रहना, हम खेल खिलाएंगे,’’ दादी बोलीं.

‘‘वाह, क्या बात है, तालियां दादी के लिए.’’ मानसी खुश हो गई.

फिर दादीपोती पहुंच गईं हंसने वाले ग्रुप में. सब देखने लगे.

‘‘क्यों, घर में हंसने को नहीं मिलता जो यहां हाहा करते रहते हो, नकली हंसी हंसते हो.’’

हंसतेहंसते सब चुप हो गए एकदम से.

‘‘हंसोहंसो, नकली हंसी हंस लो. चलो मानसी, घर चलें.’’

फिर मार्केट से ताजा सब्जी ले कर दोनों घर आ गईं.

सुबह साढे़ दस बजे मेड आ गई थी. आते ही वह मोबाइल ले कर बालकनी में

चली गई. काफी देर हो गई तो दादी चिल्लाईं, ‘‘बाई, पहले घर का  झाड़ूपोंछा

कर लो, डस्ंिटग कर लो, फिर मोबाइल पर बतियाना.’’

‘‘बाई, कौन बाई?’’ मेड, जिस का नाम रजनी था, एकदम से भड़क

गई. मोबाइल दूर कर दादी से बोली, ‘‘मेरा नाम रजनी है, बाई नहीं है. बाई

गलत चीज है. बाई नाचनेगाने वाली और गलत काम करने वाली औरतों को

कहते हैं.’’

‘‘पर हमारे गांव में तो  झाड़ूपोंछा करने वाली को बाई कहते हैं,’’ दादी बोलीं.

फिर भी रजनी का मुंह चढ़ा रहा गुस्से से.

‘‘दादी, उस को बाई मत बोलो, मेड बोलते हैं यहां,’’ मानसी बोली.

‘‘अच्छा, ठीक है. चल, जल्दी से नहा ले, फिर मैं नाश्ता तैयार करूंगी,’’ दादी बोलीं.

‘‘नाश्ते का नहाने से क्या काम?’’ मानसी बोली.

‘‘बिना नहाए नाश्ता करेगी? दादी ने पूछा.

हां, मौमडैड भी तो छुट्टी वाले दिन यही करते हैं. लंच तक नहा लेते हैं,’’ मानसी ने बताया.

‘‘बेटा, नहा कर नाश्ता करना अच्छा होता है. बाद में फिर आलस आने लगता है.’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर मानसी खुशीखुशी नहाने चली गई.

दादी ने गरमगरम पनीर परांठे बना दिए थे. रजनी  झाड़ूपोंछा कर के बालकनी में बैठी थी फुरसत में क्योंकि उस को नाश्ता बनाने और खाना बनाने से फुरसत मिल गई थी.

किचन में दादी काम कर रही थीं. जब तक मानसी नाश्ता कर रही थी, दादी नहा कर आ गईं. दादी के कमर तक बाल खुले थे.

‘‘वाह, इतने सुंदर बाल,’’ मानसी नाश्ता भूल कर दादी के बाल देखने लगी.

दादी मुसकराती हुई बोलीं, ‘‘मानसी के भी इतने लंबे बाल हो जाएंगे.

‘‘मौम ने छोटे रखवा दिए, बोलती है, केयर करनी होती है, टाइम वेस्ट होता है.’’

‘‘कोई बात नहीं. जब तुम बड़ी होगी तो रखना लंबे बाल,’’ दादी ने अपना नाश्ता प्लेट में लिया.

‘‘दादी, परसों संडे है, अपने फ्लोर के हाल में किटी पार्टी होगी. मौम नहीं है तो तुम को जाना होगा.’’

‘‘मतलब, तुम नहीं चलोगी? दादी ने पूछा.

‘‘नहीं मैडमजी, वहां बच्चों का क्या काम? लेडीज की पार्टी होती है,’’ रजनी ने नाश्ते की जूठी प्लेट समेटते कहा.

‘‘अच्छा, ठीक है. चली जाऊंगी,’’ दादी बोलीं.

‘‘मैं घर पर वीडियो गेम खेलूंगी,’’ मानसी ने बताया.

दूसरे दिन सुबह मानसी दादी से पहले ही उठ गई और दादी को उठाती हुई बोली, ‘‘दादी, जल्दी से फ्रैश हो जाओ, हमें गार्डन चलना है. आप ने आंटियों को भी जल्दी आने को कहा था.’’

‘‘बेटा, अभी सुबह के 6 बजे हैं. हम ने उन को 7 बजे का कहा था.’’

‘‘उन को गेम्स का भी कहा था,’’ मानसी बोली.

‘‘हां, हम जल्दी चलते हैं, वे भी आ जाएंगी, ठीक है,’’ दादी ने पोती की बात मानी और फ्रैश हो कर दोनों गार्डन में आ गईं. ठंडी हवा सुकून दे रही थी. पेड़पौधे, हरियाली, चिडि़यों की आवाज भली लग रही थी.

मानसी की नजर एक छोटे से लड़के पर पड़ी जो फूल तोड़ रहा था और एक थैले में जमा कर रहा था. ‘‘देखोदेखो, फूल चुरा रहा है,’’ मानसी चिल्लाई. मानसी के चिल्लाते ही वह छोटा लड़का भागने लगा.

‘‘बेटा, डर मत, इधर आ,’’ दादी बोलीं.

वह डरतेडरते आया. दादी ने देखा, उस का थैला फूलों से भरा है. गुलाब, गेंदे के फूल.

‘‘बेटा, ये फूल क्यों तोड़े हैं, माली ने कभी देखा तो गुस्सा होगा?’’ दादी बोलीं.

‘‘मैं सुबह जल्दी आता हूं, इसलिए वह नहीं देख सकता,’’ बच्चा मासूमियत से बोला.

‘‘लेकिन क्यों तोड़ते हो?’’ दादी ने सवाल किया.

‘‘अपने दादू के लिए, वे फूल बेचते हैं,’’ बच्चा बोला.

‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ मानसी ने पूछा.

‘‘राजा बेटा. दादू मु झे इसी नाम से बुलाते हैं.’’

‘‘अच्छा, तुम हमें दादू से मिलवाने ले चलोगे?’’ दादी बोलीं.

‘‘चलिए,’’ राजा बोला. दादी उस के साथ उस के घर की तरफ चल दीं. लगभग

10 मिनट के रास्ते पर थोड़े कच्चेपक्के मकान थे. सड़क के उस पार एक कच्चे से मकान के सामने जा कर राजा बोला, ‘‘यहीं रहता हूं. दादू यहीं अंदर हैं.’’

दादी ने देखा कच्चे से मकान में थोड़ा सामान था. एक पलंग था, एक वृद्ध व्यक्ति बैठा था.

दादी को देख कर वह उठ गया.

‘‘बच्चे से सुबहसुबह बगीचे से फूल को तुड़वाते हो किसी ने चोरी करते देखा लिया तो?’’

‘‘फूल बेच कर थोड़ेबहुत पैसे आ जाते हैं. सो, गुजारा हो जाता है. मजदूरी नहीं होती मु झ से.’’

‘‘यह आप का पोता है, इस को पढ़ाओलिखाओ.’’

‘‘इस के मांबाप कोरोना में गुजर गए थे. मु झे मर जाना था पर मेरा बेटा और बहू चले गए,’’ वृद्ध रो पड़ा.

‘‘चिंता मत करो, मेरे घर भेज दिया करो, मैं पढ़ा दिया करूंगी. इस की स्कूल की जरूरत मैं पूरी करूंगी,’’ दादी आंसुओं को छिपाती बोली.

वृद्ध पैरों पर गिर पड़ा.

दादी दूर हट गईं. पास में कुछ दुकानें खुली थीं. दूध, बिस्कुट, मक्खन ला कर दादी ने राजा को दिए. कुछ रुपए उन्होंने वृद्ध को दिए और कहा, ‘‘राजा फूल नहीं चुराएगा, आप फूल खरीद कर बेचो.’’ राजा के सिर पर हाथ रख कर मानसी के साथ वे वापस गार्डन आ गईं.

गार्डन में सभी आंटियां दादी का इंतजार कर रही थीं. दादी ने उन को गेम्स खिलाए- रस्सी कूदना, सितोलिया वगैरह.

उन के चेहरे चमक उठे. लगभग घंटेभर बाद वे सब दादी को घेर कर बैठी थीं.

‘‘आप मीनल की सासुमां ही नहीं, हमारी भी मां हो. आप ने एक नई दिशा दी हैं. अब हम हफ्ते में कम से कम से कम दोतीन बार ये गेम खेलेंगे.’’

मानसी खुशी से तालियां बजाने लगी. वह दादी के गले लग गई.

जब घर पहुंची तो मानसी बहुत खुश थी, बोली, ‘‘दादी, मैं आज नाश्ता बनाऊं आप के लिए?’’

‘‘ठीक है, बनाओ, क्या बनाओगी?’’

‘‘चीज पास्ता,’’ मानसी बोली.

‘‘ठीक है,’’ दादी बोलीं.

मानसी का बनाया पास्ता दादी को पसंद आया. उन्होंने खूब तारीफ की.

संडे आते ही मानसी और मेड रजनी ने याद दिलाया कि 12 बजे किटी पार्टी में पहुंचना है.

दादी किटी पार्टी के लिए साड़ी ढूंढ़ने लगीं, कौन सी साड़ी पहनें.

बेबी पिंक कलर की साड़ी उन्होंने पहनने के लिए निकाली. बालों की लंबी चोटी बनाई.

जब पार्टी में पहुंचीं तो महिलाएं इकट्ठी थीं. स्टार्टर का दौर शुरू होने वाला था. खाने की खुशबू हवा में तैर रही थी. दादी को देख कर कुछ महिलाएं तो उन के नजदीक आ गईं. कुछ सुबह गार्डन में मिली थीं, कुछ अपरिचित थीं. कुछ चर्चा चल रही थी किसी मिसेज रायकुंवर के बारे में. पता चला कि वे नहीं आईं, उन की बहू नर्सिंग होम में एडमिट है, डिलीवरी होने वाली है.

दादी ने पूछा, ‘‘डिलीवरी हो गई या होने वाली है?’’

‘‘पता नहीं दोतीन दिन पहले एडमिट कराया गया था,’’ एक महिला बोली.

‘‘मोबाइल पर पूछ लेते हैं,’’ दादी बोलीं.

‘‘पहले लंच कर लेते हैं,’’ एक मौडर्न महिला बोली.

जींसटौप में वह महिला खूबसूरत लग रही थी.

‘‘पहले पूछ लेते हैं,’’ दादी बोलीं, ‘‘क्या आप भी?’’

‘‘चलिए, ठीक है,’’ उस महिला ने खुद फोन न कर के दादी को नंबर दिया.

दादी जब तक फोन करतीं, उस के पहले दूसरी महिला ने फोन कर दिया था दादी की बात सुन कर. ‘‘हैलो रायकुंवरजी, बहू कैसी है? तबीयत ठीक है? अच्छाअच्छा, बधाई हो,’’ कहते हुए उस ने फोन काट दिया था.

‘‘क्या हुआ?’’ दूसरी महिलाएं और दादी ने एकसाथ सवाल किया.

‘‘बेटी हुई है, बहू भी अच्छी है.’’

‘‘तो अच्छी बात है, बधाई देने चलते हैं,’’ दादी बोलीं.

‘‘अरे, आंटीजी आप भी, वह घर आएगी तो देख लेंगे. बहू को भी बच्ची को भी,’’ एक महिला बोली.

‘‘हां, बिलकुल सही बात है,’’ मौडर्न महिला बोली.

‘‘आप सम झिए बात को, नर्सिंग होम जाएंगे तो बच्चे के हाथ में भी कुछ रखना होगा, फिर कुछ फंक्शन रखेगी या नामकरण करेगी, फिर गिफ्ट दो. इसलिए अभी नहीं जाएंगे.’’

दादी ने मानसी को फोन लगाया और कहा, ‘‘रजनी को ले कर किटी पार्टी वाले हौल में आ जाओ.’’

‘‘अरे, दादी क्या हुआ, हम क्या करेंगे आ कर?’’

‘‘तुम आओ तो.’’

मानसी रजनी को ले कर हौल में पहुंच गई.

‘‘गेट वन नर्सिंगहोम चलना है,’’ दादी ने कहा.

‘‘ठीक है, चलिए, नजदीक है,’’ रजनी ने कहा. मानसी और रजनी के साथ दादी नर्सिंगहोम पहुंच गईं. मिसेज रायकुंवर मानसी को जानती थी. मानसी ने दादी का परिचय भी करवाया.

दादी फूलों का बुके, फल आदि ले कर गई थीं. रायकुंवर खुश हो गई. उस की बहू भी मुसकरा दी. नवजात नन्ही बच्ची को देख कर मानसी खुश हो गई. उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरने लगी. बहुत देर तक दादी मिसेज रायकुंवर से बात करती रहीं. रजनी भी आश्चर्य में थी. वह सोच रही थी, लोगों के घर मेहमान आते हैं, उन्हें पड़ोसियों से बात करने की फुरसत नहीं होती, कहां मानसी की दादी इतना घुलमिल गई हैं, परायापन नहीं लगता.

जब दादी मानसी के साथ बाहर निकल रही थीं तो किटी पार्टी वाली महिलाएं नर्सिंगहोम आ रही थीं. उन को देख कर एक क्षण दादी रुकीं, फिर बोलीं, ‘‘बेटियो, मौडर्न कपड़े पहनना जरूरी नहीं है, मौडर्न सोच रखना जरूरी है.’’ उन का भोपाल आना सार्थक हो गया था. Hindi Story

 

Diwali 2025 : युवाओं की पार्टी में शामिल हों बुजुर्ग भी

Diwali 2025 : ‘विवेक, दीवाली एकदम करीब आ गई है, तुम ने पार्टी का लेआउट एकदम तैयार नहीं किया है. कैसे होगा काम मेरी समझ में नहीं आ रहा.’ नेहा और उस का दोस्त विवेक इस दीवाली एक पार्टी प्लान कर रहे थे जिस में उस के 10-12 दोस्त आने वाले थे.

‘नेहा, सब प्लान कर लिया है. बस, एक परेशानी सूरज ने फंसा दी तो अब रमेश, संदीप और आनंद भी उसी समस्या की बात कर रहे हैं,’ विवेक ने कहा.

‘क्या समस्या आ रही है? हमें बताओ, हम हल निकालते हैं,’ नेहा बोली.

‘जो समस्या है उस को समस्या कहना ठीक नहीं है. बात हमारे पेरैंट्स की है. उन को घर छोड़ो तो बहुत दिक्कत होती है. साथ पार्टी में ले जाओ तो सहज अनुभव नहीं होता है. रमेश, संदीप और आनंद इस को ले कर परेशान हैं. बताओ, क्या करें?’ विवेक ने उस को पूरी बात सम?ाई.

‘यह कोई परेशानी नहीं है. यह काम मैं संभाल लूंगी. तुम लोग पार्टी की तैयारी करो,’ नेहा बोली.

‘अरे यार, पहले बताओ क्या करना है?’

‘सिंपल है. इस दीवाली पार्टी में हमारे बुजुर्ग भी पार्टी में हिस्सा लेंगे. हम लोग उन के लिए अलग से व्यवस्था कर देंगे. अगर वे पूरी पार्टी में नहीं भी रहना चाहते तो उन का मन करेगा तो उन को जल्दी घर भेज देंगे.’ नेहा की इस बात को विवेक ने दूसरे दोस्तों को बताया. पूरे ग्रुप ने कहा, ‘आइडिया’ अच्छा है.

अब जिम्मेदारी उन लोगों पर थी जिन के घर में बुजुर्ग थे. कुल मिला कर कर 5 लोग हो रहे थे. इन में 3 महिलाएं और 2 पुरुष थे. वे लोग भी खुशीखुशी पार्टी में आने के लिए तैयार हो गए. अब पार्टी में शामिल होने वालों की कुल संख्या

17 हो गई. होटल बुक हो गया. पार्टी में बुजुर्गों के लिए खाने का मेन्यू उन के अनुसार था. नेहा, विवेक और उस के साथी देर तक पार्टी करने वाले थे. उन लोगों ने बुजुर्गों के मनमुताबिक उन को पहले घर भेज दिया. इस तरह से पार्टी हिट रही.

बुजुर्गों का रखें खयाल

युवाओं द्वारा दीवाली की पार्टी का जब आयोजन किया जाए तो उस में घर के बड़ेबुजुर्गों को भी शामिल किया जाए. वैसे, दोनों के बीच उम्र का अंतर होता है. ऐसे में सामंजस्य बैठाना आसान नहीं होता. भारत में बुजुर्गों की संख्या बढ़ती जा रही है. राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के अनुसार बुजुर्गों की हिस्सेदारी 2011 में लगभग 9 फीसदी थी जो वर्ष 2036 तक 18 फीसदी तक पहुंच सकती है. 1940 के दशक में भारत में औसत आयु लगभग 32 साल थी जो अब बढ़ कर 70 साल हो गई है.

इस दौरान प्रजनन दर प्रति महिला लगभग 6 बच्चों से घट कर केवल 2 रह गई है. इस से महिलाओं को बारबार प्रसव से गुजरने और बच्चे की देखभाल करने की परेशानियों से काफी हद तक राहत मिल गई है. परिवार का स्वरूप बदल गया है. पहले गांव से लोग शहर केवल कमाई करने आते थे. वे अपना परिवार गांव में रखते थे. जब रिटायर होते तब वे वापस गांव परिवार के पास चले जाते थे. औसत आयु कम होने से बुजुर्गों को अकेलापन कम सहन करना पड़ता था.

अब मुद्दा बदल गया है. लोग शहर में रहने भी लगे हैं. परिवार में 3 पीढि़यां एकसाथ रह रही हैं. पिता, बेटा और पोता एकसाथ रह रहे हैं. इसी वजह से अब ज्यादातर लोग 3 कमरों वाला मकान या फ्लैट खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं. ऐसे में कई बार बुजुर्गों में शक्तिहीनता, अकेलापन, बेकारी और अलगाव की भावना बढ़ने लगती है. बच्चे भी अपना जीवन सही से जी नहीं पाते हैं. इस समस्या का समाधान यह है कि युवा बुजुर्गों को भी अपनी पार्टी का हिस्सा बनाएं.

‘हेल्पएज इंडिया’ द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण से उजागर हुआ कि कम से कम 47 फीसदी बुजुर्ग अपनी आय के लिए अपने परिवारों पर निर्भर हैं. 34 फीसदी पैंशन व सरकारी सुविधाओं पर निर्भर हैं. 40 फीसदी लोगों ने कहा, ‘जब तक संभव हो तब तक कार्य करते रहना चाहिए.’ हमारे समाज की सब से बड़ी समस्या यह है कि हमें बुजुर्गों को मैनेज करना नहीं आता. देश में बुजुर्गों के अस्पताल न के बराबर हैं. हमारे ओल्डएज होम भी अच्छे नहीं हैं. अकेले रहने से बुजुर्गों में कई बीमारियां पैदा होने लगती हैं.

एक सर्वे में पता चला कि 30 से 50 फीसदी बुजुर्गों में ऐसे लक्षण मौजूद थे जो उन्हें अवसाद का शिकार बनाते हैं. अकेले रहने को विवश बुजुर्गों में महिलाओं की संख्या अधिक है. अवसाद का गरीबी, खराब स्वास्थ्य और अकेलेपन से गहरा संबंध देखा गया. सामाजिक कल्याण की ज्यादातर योजनाएं आर्थिक आधार पर बनती हैं. गरीबी रेखा से नीचे के परिवार इस में शामिल होते हैं. वृद्धावस्था पैंशन सभी को नहीं मिल पाती है.

पार्टियों का बनाएं हिस्सा

ऐसे में यह जरूरी है कि अपने बुजुर्गों का खयाल रखें. उन का अकेलापन दूर करने के लिए ज्यादा से ज्यादा समय साथ बिताएं. उन को इस बात का एहसास न होने दें कि उन की उपेक्षा हो रही है. उन को अपने दोस्तों और परिवार के लोगों से हमेशा नहीं मिलवा सकते हैं क्योंकि कई बार बुजुर्ग इस के लिए शारीरिक व मानसिक रूप से तैयार नहीं होते. समयसमय पर युवा अपनी पार्टियों में उन को साथ ले जाएं जैसे शादियों में ले जाते हैं. पार्टी में वे अपने हमउम्र लोगों से मिल सके तो उन को अच्छा लगेगा. वे अपने को बेहतर अनुभव करेंगे.

पार्टी में मेन्यू उन की पसंद के अनुसार का हो. उन की पसंद और सु?ाव के अनुसार कुछ गेम्स या फिर डांसम्यूजिक का प्रबंध करें. पार्टी में उन के हमउम्र लोगों को बुलाएं. जितना समय वे पार्टी में रहना पसंद करें उन को वहां रहने दें. अगर वे घर जल्दी वापस आना चाहें तो उन को भेज दें. आजकल ओला व उबर जैसी सुविधाएं हैं. जब पार्टी में बुजुर्ग शामिल होंगे तब युवाओं के मन में यह बो?ा नहीं रह जाएगा कि वे पार्टी कर रहे हैं और उन के बुजुर्ग घर में कैद हैं.

डांस, म्यूजिक, खाना और अपने मनपसंद लोगों का साथ अपनेआप में अलग अनुभव देता है. बुजुर्गों के करीब आने से परिवारों में घनिष्ठता आएगी और युवाओं में बुजुर्गों के प्रति जिम्मेदारी की भावना का विकास हो सकेगा. इस दीवाली बुजुर्गों के साथ पार्टी मनाएं.

घरों में ही नहीं दिलों में भी खुशी के दीये जलाएं. यह कर के देखिए, Diwali 2025

अच्छा लगेगा.      –

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