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Religious Traditions : धर्म – दान के धन पर सिर्फ ब्राह्मणों का हक ?

Religious Traditions : मंदिरों में दान आम लोग देते हैं, यदि उस का कुछ हिस्सा सरकार उन के ही विकास कार्यों में खर्च करती है तो गलत क्या है? हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का इस मामले में निर्देश ब्राह्मणों पर दान के पैसों पर पूरा अधिकार देने जैसा है. 

ब्राह्मण सर्व लभते सर्व तस्य हि सर्वदा

दानम् च विपुलं दत्वा स्वर्गलोके महीयते

अर्थात

ब्राह्मण सभी प्रकार के दान प्राप्त करने का अधिकारी है क्योंकि वह सदा सर्वस्व का हकदार है. उसे विपुल दान देने से दाता स्वर्गलोक में सम्मानित होता है.

                          (महाभारत अनुशासन पर्व, अध्याय 61, श्लोक 11)

यह बात, जो सदियों पहले महाभारत में वेद व्यास ने दोटूक कही थी, को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जलेबी की तरह गोलमोल घुमाफिरा कर कानूनी भाषा में बीती 10 अक्तूबर को दिए एक फैसले में कही जो 14 अक्तूबर को सार्वजनिक हुआ. इस पर किसी को कोई हैरानी नहीं हुई. जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर व जस्टिस राकेश कैंथला की बैंच ने इस मामले (सिविल रिट पिटीशन 1834/2018) की बाबत अपने फैसले में जो कहा उस का निचोड़ है-

भक्त मंदिरों में दान देते हैं यह विश्वास करते हुए कि वे देवताओं की देखभाल, मंदिर के रखरखाव और सनातन धर्म के प्रचार के लिए उपयोग होगा. यदि सरकार इन पवित्र दानों को अपने खजाने में मिला लेती है तो यह भक्तों के विश्वास का अपमान है.

ट्रस्टी इस दान के संरक्षक हैं, मालिक नहीं. इन का दुरुपयोग आपराधिक विश्वासघात माना जाएगा.

मंदिर के फंड को राज्य की सामान्य आय की तरह नहीं देखा जा सकता. यह सरकारी योजनाओं, विज्ञापनों या अन्य गैरधार्मिक गतिविधियों के लिए नहीं दिया जा सकता.

राज्यों को मंदिरों के प्रबंधन में निष्पक्षता स्पष्ट करनी होगी लेकिन धार्मिक कार्यों के प्रचार के लिए फंड का उपयोग सही दिशा में हो. संविधान में सैक्युलर का अर्थ नास्तिकता नहीं, बल्कि सर्वधर्म समभाव है.

ऐसी और भी कई बातें अदालत ने कहीं जो गैरजरूरी और असंबद्ध थीं लेकिन शायद कोर्ट को कोई गिल्टी फील हो रही थी जो उस ने अपने फैसले को सही साबित करने या उसे वजनदार बनाने के लिए उसे भानुमती का कुनबा जोड़ना पड़ा.

यह है मामला :

हिमाचल प्रदेश के शिमला में रहने वाले जाति से कश्मीरी ब्राह्मण कश्मीर चंद शादयाल, जो पेशे से समाजसेवी हैं लेकिन धार्मिक आयोजनों में काफी सक्रिय रहते हैं, ने साल 2018 में एक जनहित याचिका कोर्ट में दाखिल की थी. उस में उन्होंने आरोप लगाए थे कि हिमाचल प्रदेश के मंदिरों, जैसे नैना देवी, ज्वालामुखी आदि में आया दान सरकारी योजनाओं, जैसे सड़क निर्माण विज्ञापन आदि में गलत तरीके से इस्तेमाल हो रहा है जो भक्तों के विश्वास का अपमान है. कश्मीर चंद ने अदालत से मांग की कि इस में पारदर्शिता बरती जाए और दान के पैसे का इस्तेमाल केवल धार्मिक कार्यों में किया जाए.

यह समाजसेवी पूरी दस्तावेजी तैयारी के साथ कोर्ट पहुंचा था. उस ने नैना देवी, ज्वालामुखी और चामुंडा आदि मंदिरों के फंड्स के उपयोग पर आरटीआई दाखिल कर जानकारी हासिल कर ली थी कि इन में आए दान के पैसों में से काफी पैसे सरकारी योजनाओं पर खर्च किए गए थे. सरकारी विभागों ने इस की पुष्टि की थी. इन में हिंदू रिलीजियस इंस्टिट्यूशन डिपार्टमैंट (हिंदू धार्मिक संस्थान विभाग) प्रमुख है. अदालत में पेश दस्तावेजों से उजागर हुआ कि 2018 से पहले ही दान के करोड़ों रुपयों का इस्तेमाल गैरधार्मिक कार्यों में हुआ है.

7 अगस्त, 2018 को प्रारंभिक सुनवाई करते अदालत ने सभी डिप्टी कमिश्नरों को निर्देश दिया कि वे पिछले 5 सालों के फंड उपयोग का ब्योरा बजरिए हलफनामा पेश करें. इस से पहले एफिडेविट कश्मीर चंद ने भी पेश किया था जिस में व्यक्तिगत शिकायतों, भक्तों के बयान और फंड्स के बेजा इस्तेमाल की जानकारी थी. उस में उन्होंने हिमाचल प्रदेश हिंदू पब्लिक रिलीजियस इंस्टिट्यूशंस एक्ट 1984 की धाराओं 13, 19, 20 और 48 का उल्लंघन किया जाना बताया था. खासतौर से धारा 48 का उल्लंघन जो यह कहती है कि फंड का पैसा केवल धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल किया जाए. धारा 20, जो लेखाजोखा से संबंधित है, का भी पालन नहीं होना पाया गया.

डिप्टी कमिश्नरों ने फंड्स का जो ब्योरा पेश किया उस में अदालत ने पारदर्शिता की कमी पाई और अपना फैसला आवेदक के पक्ष में सुनाया. हिमाचल प्रदेश हिंदू पब्लिक रिलीजियस इंस्टिट्यूशंस एक्ट 1984 की धारा 13 कहती है कि ट्रस्टी केवल संरक्षक हैं, मालिक नहीं लेकिन ट्रस्टी और पुजारी दान का व्यक्तिगत उपयोग कर रहे थे या फिर बेजा और गैरजरूरी खर्च कर रहे थे. साबित यह भी हुआ कि सरकार मंदिर फंड्स का इस्तेमाल सामान्य राजस्व की तरह कर रही थी जो संविधान के धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता वाले  अनुच्छेद 25-26 का उल्लंघन है

बेतहाशा आमदनी :

मुकदमे के दौरान यह भी उजागर हुआ कि नैनादेवी और ज्वालामुखी मंदिरों की साल 2024 में आय 200 करोड़ रुपयों से भी ज्यादा है और मंदिरों के पास 2 क्विंटल सोना और 45 किलो चांदी भी संपत्ति की शक्ल में हैं. यानी, ‘दुकान’ खासी चलती हुई है जिस के पैसों को ले कर खींचतान मची हुई थी. यह खींचतान खत्म नहीं हो गई है बल्कि हुआ यह है कि अब दान, दक्षिणा, चढ़ावे के पैसे का इस्तेमाल सिर्फ धार्मिक कार्यों और धर्मार्थ में होगा.

धार्मिक काम यानी पूजापाठ, यज्ञ, हवन, प्रसाद, मूर्ति, अनुष्ठान वगैरह में पैसे खर्च किए जाएंगे, इस के अलावा मंदिर को और भव्यता भी दान के पैसे से दी जाएगी. कुछ सुविधाएं भी दी जाएंगी, मसलन मंदिर में धर्मशाला आदि बनवाना जिस से भक्त मंदिर में व सस्ते में रुकें और ज्यादा से ज्यादा दान दें. इस तरह कुछ सालों में ही मंदिर की आमदनी दोगुनीचौगुनी हो जाएगी और ज्यादा भक्त आकर्षित होंगे जिस से पैसा और ज्यादा आएगा. अब यह किसी ने नहीं सोचा कि जब बहुत ज्यादा पैसा हो जाएगा तब उस का क्या होगा. क्या मुगलों की तरह लुटेरों के लिए यह इकट्ठा किया जाता है या अंगरेजों के लिए जिन्होंने मंदिरों का पैसा भी लूटा और हमें गुलाम बना कर भी रखा.

अब यह बिजनैस नहीं तो और क्या है. देशभर के भक्त नैना देवी, ज्वालामुखी और चामुंडा जैसे मंदिरों में आ कर अपनी मेहनत की कमाई दान में देते हैं. एवज में उन्हें क्या मिलता है, मोक्ष का  झूठा आश्वासन, दुखदर्द दूर हो जाने का  झांसा जिस का उद्भव धर्मग्रंथों में वर्णित किस्सेकहानियां होते हैं.

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सीधेसीधे इस ठगी के धंधे को नजरअंदाज करते दान का पैसा पंडेपुजारियों के हाथों में बने रहने देने का फैसला सुना दिया है जिस से सिवा ब्राह्मणों के किसी और का भला नहीं होने वाला. किसी भी मंदिर ट्रस्ट का मुखिया अभी भी कमिश्नर, डिप्टी कमिश्नर या एसडीएम ही होगा लेकिन उस का काम मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था संभालना भर होगा. पैसों का हिसाबकिताब सारे ट्रस्टी मिल कर तय करेंगे कि कहां कितना खर्च किया जाए कि जिस से आय और बढ़े.

मंदिरों के ट्रस्टों के अधिकतर सदस्य ब्राह्मण पंडेपुजारी ही होते हैं. एकाध सत्तारूढ़ दल का विधायक, सांसद या धाकड़ नेता होता है जिस का शीश इन पंडों के आगे  झुका ही रहता है. यानी, पैसा अब पूरी तरह पंडों के कब्जे में रहेगा जिस का मनमाना खर्च वे करेंगे और ट्रस्ट के मुखिया की हैसियत से सरकारी अधिकारी की जिम्मेदारी केवल ट्रांसपेरैंसी की रहेगी.

वैसे भी, उस के पास ढेरों सरकारी काम होते हैं, इसलिए मंदिरों के फंड और  झं झटों से उसे कोई सरोकार नहीं होता. उसे तो, बस, बैलेंसशीट पर दस्तखत भर करना होता है. अब पंडेपुजारी जो चाहें सो करें उन की मरजी. अगर कोई अफसर ज्यादा दखल देगा तो या तो उसे भी अपने साथ मिला लिया जाएगा या फिर न मानने पर उस की बदली करा दी जाएगी.

खूब होते हैं घपले-घोटाले :

कश्मीर चंद बनाम हिमाचल प्रदेश स्टेट मुकदमे में इस बात का जिक्र किया भी गया है कि सरकारी अधिकारी और ट्रस्टी मिल कर घालमेल कर रहे थे. अब नहीं करेंगे, इस की कोई गारंटी नहीं. हां, इतना जरूर होगा कि दान का पैसा सरकारी खजाने में अब नहीं जाएगा. अभी तक भी थोड़ा ही आता था जिसे कल्याणकारी या जनहित योजनाओं में सरकार लगा लेती थी तो कोई गुनाह नहीं कर देती थी. सड़क अगर उस ने बनवाई तो वह सभी के लिए फायदे की बात थी जिस से अवागमन सुलभ होता है. यही बात दूसरे उन कामों पर लागू होती है जो सार्वजनिक हित के होते हैं.

उदाहरण नैना देवी मंदिर का लें तो वह म झोले किस्म का मंदिर है जिस के पास साल 2022 तक 11.47 करोड़ रुपए नकद थे, 58.97 करोड़ रुपए की फिक्स्ड डिपौजिट थी. इस के अलावा 180 किलो सोना (कीमत 140 करोड़ रुपए से भी ज्यादा) और 7,292 किलो चांदी (कीमत 1,240 करोड़ रुपए से भी ज्यादा) थी. नैना देवी मंदिर में सोने के मुकाबले चांदी ज्यादा होने की दास्तां भी कम दिलचस्प नहीं.

माना जाता है कि जब शंकरजी सती को ले कर भाग रहे थे तब सती माता की आंखें इस जगह गिरी थीं. इसलिए, इस मंदिर में जो चांदी की आंखें दान करता है उस की आंखों की बीमारियां ठीक होती हैं. मंदिर के बाहर इफरात से चांदी की आंखें दुकानों पर बिकती हैं जिन की कीमत 500 से ले कर 5 हजार रुपए तक होती है. ये आंखें मंदिर के गर्भगृह में चढ़ाई जाती हैं. पैसे वाले भक्त तो सोने की आंखें दान करते हैं.

अब कोर्ट को इस अंधविश्वास से कोई सरोकार नहीं कि यह दान आस्था या विश्वास के चलते कम बल्कि डर और अंधविश्वास की वजह से ज्यादा आता है. अगर ‘सिल्वर आई’ दान करने से आंखों के रोग ठीक होते तो देश में नेत्र रोग विशेषज्ञों की जरूरत ही नहीं रह जाती. कम से कम हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर और शिमला में तो आई स्पैशलिस्ट न होता लेकिन वहां भी इफरात से हैं तो इस का सीधा सा मतलब है कि यह खालिस ठगी है.

वर्ष 2025 आतेआते दानदक्षिणा का आंकड़ा कितना बड़ा, इस के आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं लेकिन जनवरी 2026 तक हो जाएंगे क्योंकि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सख्त लहजे में यह भी कहा है कि सरकार उस के आदेशों का पालन 3 महीने के अंदर करे वरना इसे अदालत की अवमानना मान कार्रवाई की जाएगी. नैना देवी मंदिर में सालभर में औसतन कोई 20 लाख श्रद्धालु जाते हैं. दोनों नवरात्र के दिनों में तो वहां पैर रखने को भी जगह नहीं मिलती.

दूसरे मंदिरों की तरह इस मंदिर में भी जगहजगह दानपेटियां रखी हैं जिन के तालों की चाबियां पंडेपुजारियों के पास होती हैं. दूसरे मंदिरों की ही तरह यहां भी पंडे अपना आसन जमाए बैठे रहते हैं जो मंत्र बुदबुदाने से ले कर माथे पर तिलक लगाने तक की फीस लेते हैं. मंदिरों के बारे में किसी ने गलत नहीं कहा कि इन से दानपेटियां हटा दी जाएं तो यहां से पुजारी खुदबखुद गायब हो जाएंगे.

नैना देवी मंदिर श्री नैना देवी श्राइन बोर्ड से संचालित होता है. मंदिर के मुख्य पुजारी को लगभग एक लाख रुपए सैलरी मिलने का अंदाजा है जबकि जूनियर पुजारियों को 20 से 50 हजार रुपए महीना पगार मिलती है. इन्हें दान के पैसे से ही आवास, चिकित्सा और यात्रा जैसे भत्ते भी मिलते हैं. इस के बाद भी पुजारी पैसों के लिए रोते झींकते रहते हैं. अब इन की आमदनी सैलरी, भत्ते वगैरह हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक मंदिर की वैबसाइट पर डाले जाएंगे तब पता चलेगा कि दान के पैसों का कितना बड़ा हिस्सा उन पंडेपुजारियों को पालनेपोसने पर खर्च होता है जो करतेधरते कुछ नहीं. घोषित रूप से नैना देवी मंदिर में गीतम प्रजाति के ब्राह्मण पूजापाठ कराते हैं. ब्राह्मणों को ही दान देने के निर्देशों में से एक निर्देश मनुस्मृति का यह भी है-

ब्राह्मणाय प्रयच्छेत सर्व धर्माय कल्पितम

अर्थात जो भी वस्तु धर्म के लिए दी जाती है वह ब्राह्मण को दे देनी चाहिए.

(अध्याय 3 श्लोक 116-118)

और

शूद्राय तु न दद्यात ब्राह्मणाय दद्यात

अर्थात शूद्र को दान नहीं देना चाहिए, ब्राह्मण को देना चाहिए.

(अध्याय 4, श्लोक 226-232)

सदुपयोग क्यों नहीं ?

दूसरे ब्रैंडेड मंदिरों के मुकाबले नैना देवी मंदिर का पैसा और सोनाचांदी, जमीनजायदाद भले ही कम हो लेकिन बहुत कम भी नहीं है. इस पैसे से क्याक्या नहीं किया जा सकता जो पड़ापड़ा सड़ रहा है. इस पैसे को किसी ने मेहनत से नहीं कमाया है और न ही यह किसी दैवीय चमत्कार की देन है बल्कि यह भक्तों की मेहनत का पैसा है जिसे निष्क्रिय रखना क्या उन का अपमान और दुरुपयोग नहीं. इस से स्कूल, कालेज, अस्पताल वगैरह खोले जाएं तो कईयों का भला होगा और सभी को कुछ न कुछ मिलेगा लेकिन चूंकि मामला धर्म और भगवान का है इसलिए अच्छेअच्छे तर्कवादियों के मुंह सिल जाते हैं. दौर हिंदूवादियों का है जिस में मंदिर तबीयत से फलफूल रहे हैं जिन से रोजगार ब्राह्मणों को मिल रहा है जो पंडेपुजारी की हैसियत से देश की तरह मंदिरों को भी अपने हिसाब से हांक रहे हैं.

कश्मीर चंद शादयाल अगर वाकई सच्चे समाजसेवी होते तो दान के पैसों से बनी सड़क पर उन्हें खुशी और फख्र होना चाहिए था न कि कोर्ट जाने की हद तक किलपना चाहिए था. उन्हें तो यह मांग करनी चाहिए थी कि मंदिरों में फालतू पड़े पैसे से प्रदेश में सड़कों का जाल बिछा देना चाहिए या गरीबपिछड़ी बस्तियों में बच्चों के स्कूल खुलवा देना चाहिए, गरीबों की सेहत के मद्देनजर अस्पताल बनवा देना चाहिए.

लेकिन नहीं, धर्म से इतर कोई कश्मीर चंद नहीं सोचना चाहता जिन की देश में इन दिनों भरमार है. ये लोग चाहते हैं कि पैसा सिर्फ ब्राह्मण के पास रहे क्योंकि वह धर्मसंस्कृति वगैरह का जानकार व रक्षक है. वह दान के पैसे का स्वाभाविक उत्तराधिकारी है फिर भले ही चंद मंत्रों और पूजापाठ के अलावा उसे कुछ और न आता हो. कुल जमा, वह जन्मना श्रेष्ठ है, इसलिए मेहनत कर पेट भरना उस की शान के खिलाफ है. अब तो हाईकोर्ट ने भी उन से इत्तफाक रख दिया है. सो, कोई क्या कर लेगा.

तो फिर सरकार से लेते क्यों हैं ?

कश्मीर चंद बनाम हिमाचल प्रदेश स्टेट मुकदमे की दिलचस्प बहस में बचाव पक्ष के वकील महाधिवक्ता अनूप रत्तन ने जो दलीलें दीं उन से भले ही हाईकोर्ट ने इत्तफाक न रखा हो लेकिन उन की दलीलों में दम था कि हिंदू पब्लिक रिलीजियस इंस्टिट्यूशन एंड चैरिटेबल एंडोमैंट्स एक्ट 1984 की धाराओं 19 व 20 के तहत राज्य सरकार को मंदिरों के प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन का अधिकार है. उन के मुताबिक दान में आया पैसा पब्लिक ट्रस्ट का हिस्सा है जिसे राज्य सार्वजनिक हित में उपयोग कर सकता है.

बकौल अनूप रत्तन, चिंतपूर्णी और नैना देवी मंदिरों की आय क्रमश: 100 करोड़ व 60 करोड़ रुपए का उपयोग केवल धार्मिक कार्यों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. इसे सड़क निर्माण, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सामाजिक कल्याण योजनाओं में डायवर्ट करना उचित है.

ऐसे कई तर्कों से अदालत सहमत नहीं हुई. यह और बात है लेकिन इस सिलसिले में एक अहम बात यह भी है कि जब दान का पैसा सार्वजनिक भले की कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च नहीं किया जा सकता तो सरकारी पैसा भी क्यों धर्म, धार्मिक कार्यों और धर्मस्थलों पर खर्च किया जाए. इस बाबत न तो कोई वकील कुछ बोलता, न ही जज. ऐसे में पंडेपुजारियों के बारे में तो सोचना ही फुजूल है जिन की रोजीरोटी ही दान के पैसों से चलती है.

पिछले 11 सालों से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार मंदिरों और धरमकरम पर खुले हाथ और पूरी दरियादिली से खर्च कर रही है. इस पर किसी भक्त के पेट में मरोड़ नहीं उठती कि हम मंदिरों में भी चढ़ाएं और सरकार को टैक्स भी दें, यह कहां का इंसाफ है. हकीकत तो यह है कि भाजपा को वोट इसी शर्त पर मिलते हैं कि वह सतयुग और त्रेता युग की तरह ब्राह्मणों की परवरिश करती रहे.

राज्य सरकारें भी इस खेल में पीछे नहीं हैं. मिसाल हिमाचल प्रदेश की ही लें तो उस का इस साल का बजट कोई 52,965 करोड़ रुपए का है जिस में से लगभग 500 करोड़ रुपए धार्मिक कार्यों पर खर्च करने का प्रावधान है. इस पैसे से इफरात से धार्मिक मेले वहां आयोजित किए जा रहे हैं, धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है और मंदिरों तक भक्तों की पहुंच आसान बनाई जा रही है. अकेले नैना देवी मंदिर के सौंदर्यीकरण और दूसरी सुविधाओं के लिए सौ करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया है. दीगर सरकारी खर्चों, जो आमतौर पर छिपे हुए और प्रशासनिक होते हैं, का तो कोई हिसाबकिताब ही नहीं.

अगर दान का पैसा धार्मिक कार्यों में ही खर्च होना है तो टैक्स का पैसा भी विकास कार्यों और जन कल्याणकारी योजनाओं में ही लगने की बाध्यता भी होनी चाहिए जिस से लाभ सभी धर्मों, वर्गों और जातियों के लोगों को हो. मंदिरों में दिए दान से तो सिर्फ ब्राह्मणों का ही भला व कल्याण होता है.

दान हि ब्राह्मणे श्रेष्ठम अन्येशान्म निष्फल स्मृतम

अर्थात ब्राह्मण को दिया गया दान श्रेष्ठ है, अन्य को दिया गया निष्फल.

(गरुड़ पुराण 2.95.35)

सनातनियों के संविधान मनुस्मृति के अलावा भी ब्राह्मणों द्वारा रचे गए तमाम धर्मग्रंथ इन निर्देशों से भरे पड़े हैं कि दान पर सिर्फ ब्राह्मणों का ही हक है, बाकियों को दिया गया दान निष्फल यानी बेकार टाइप का होता है. Religious Traditions :

Changing Shoe Fashion : बदल रही है जूतों की दुनिया

Changing Shoe Fashion : जूतों का बाजार बदल चुका है. कभी यह जरूरत और आराम के लिए पहने जाते थे अब यह फैशन ब्रांड के रूप में प्रयोग किए जा रहे हैं. पहले यह लेदर और कैनवास के बनते थे. लेदर में ब्लैक और ब्राउन दो कलर होते थे. कैनवास में सफेद कलर के होते थे. अब लेदर और कैनवास दोनों में तमाम तरह की वैरायटी आ गई हैं.

हमारे समाज में इंसान की परख उस के जूते से की जाती है. जूते बता देते हैं कि उस को पहनने वाला कैसा है. जो लोग इस को जानते हैं वह मौके के अनुसार ही जूते पहन कर जाते हैं. अगर पार्टी समारोह में जा रहे हैं तो लेदर या फोम लेदर के शूज पहन कर जाते हैं. अगर मॉर्निंग वॉक पर जा रहे हैं तो कैनवास शूज पहन सकते हैं. पैंट शर्ट पर एक किस्म के जूते पहन सकते हैं तो कुर्ता पजामा पर नागरा जूते पहने जाते हैं.

महिलाएं जींस पर कैनवास के जूते पहन सकती हैं पर साड़ी और सलवार सूट पर वह सैंडल पहनती हैं. यह अमीरी और गरीबी दोनों को दिखाते हैं. अगर जूते सही तरह से पॉलिश और साफ सुथरे पहने होते हैं तो यह अनुशासन को दिखाते हैं.

जूतों का बाजार बदल चुका है. कभी यह जरूरत और आराम के लिए पहने जाते थे अब यह फैशन ब्रांड के रूप में प्रयोग किए जा रहे हैं. पहले यह लेदर और कैनवास के बनते थे. लेदर में ब्लैक और ब्राउन दो कलर होते थे. कैनवास में सफेद कलर के होते थे. अब लेदर और कैनवास दोनों में तमाम तरह की वैरायटी आ गई हैं. अब ड्रेस से मैचिंग शूज पहने जाने लगे हैं. जिस वजह से एक आदमी कई तरह के शूज अपने पास रखता है. पुरूषों से अधिक कीमत महिलाओं के फुटवियर की होने लगी है.

जूतों की खोज पैरों को नुकीली और खुरदरी चीजों से बचाने के लिए लगभग 7,000-8,000 ईसा पूर्व में हुई थी. इस के लिए पैरों को पेड़ों की छाल, पत्तियों और जानवरों की खाल का प्रयोग किया जाता था. अमेरिका सहित दुनिया के कई हिस्सों में गुफाओं और पत्थरों में इन की पहचान पाई गई हैं.

समय के साथ जूते बनाने के लिए जानवरों की खाल का प्रयोग किया जाने लगा. इस में भैंस, भालू, हिरण जैसे तमाम जानवरों की खाल प्रमुख होती थी. प्राचीन भारत में लकड़ी के खड़ाऊ पहने जाते थे. अब भी कुछ लोग इस को पहनते हैं.

मौर्य और गुप्त काल में सैनिकों और राजाओं के लिए चमड़े के जूते बनने लगे थे. जूतों का प्रयोग फैशन और रुतबे के रूप में मुगल काल में शुरू हुआ. 1658-1659 में मुगल शहजादा सुलेमान शिकोह जब भारत आए तो अपने साथ आधुनिक जूते ले कर आए, जिन को ‘सलीमशाही जूते’ कहा जाता था.

17वीं सदी में जूता बनाने के लिए सिलाई तकनीक का विकास हुआ. जिस के बाद जूतों के निर्माण में क्रांति आ गई. 1856 में लाइमन ब्लैक ने जूता सिलाई मशीन का आविष्कार किया और 1864 तक इसे और बेहतर बनाया गया, जिस से जूतों का बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हो सका.

यूएस रबर कंपनी ने 1892 में रबर सोल वाले कैनवास के जूते तैयार किए. 1917 में ‘केड्स’ कैनवास स्नीकर्स तैयार किए गए. लेदर और कैनवास के जूते एक साथ चलन में आए. उस दौर में यह मंहगे थे और आम लोगों की पहुंच से दूर हो गए थे.

भारत में जूतों को बनाने का काम फैक्ट्री से ले कर आम करीगर तक फैल गया. जूतों को तैयार करने वाले कारीगर को मोची कहा जाने लगा. यह काम एक खास जाति और वर्ग के लोग करने लगे. नागरा जूतों भारत में बहुत पहना जाता था. इन को महिला और पुरुष दोनों पहनते थे. महिलाओं के जूतों को जूती कहा जाता था. इन का डिजाइन पुरुषों से अलग होता था.

आरामदायक और फैशनेबल की डिमांड :

भारत में तैयार लेदर के जूते विदेशों में खूब पसंद किए जाते हैं. अब लेदर की जगह पर कैनवास और फोम लेदर ने अपनी जगह बना ली है. फोम लेदर कंपनी में आर्टिफिशियल तरह से बनाया जाता है. इस की सबसे बड़ी वजह यह कि कैनवास और फोम लेदर से बने जूते किफायती और आरामदायक तो होते ही है. इस के अलग अलग तरह के डिजाइन भी बनाए जा सकते हैं.

महिलाओं की हील से ले कर पुरुषों के जूतों तक स्नीकर्स ने 70 प्रतिशत बाजार पर कब्जा जमा लिया है. भारत में कानपुर और आगरा के फुटवियर उत्पादन के सबसे बड़े केंद्र हैं. यूरोपीय देशों और अमेरिका में इन की जबरदस्त पकड़ बनाई है.

आगरा की 6000 से अधिक छोटीबड़ी इकाइयों से 70 से अधिक देशों में जूतों का 5,000 करोड़ रुपए का सालाना निर्यात होता है. यहां 65 प्रतिशत से अधिक देश के घरेलू बाजार में आपूर्ति और 18 हजार करोड़ रुपए का स्थानीय स्तर पर कारोबार है.

जूते अब ड्रेस सेंस व ड्रेस कोड के साथ प्रयोग हो रहे हैं. जूतों के रंग और डिजाइन बदल रहे हैं. लोगों को अब फैशन के साथ ही आराम चाहिए. कभी काले और ब्राउन रंग को पसंद किया जाता था. अब हल्के रंग सर्वाधिक पसंद किए जाते हैं. अब ग्राहकों की मांग के अनुसार शेड, डिजाइन तैयार कराए जा रहे हैं.

सामान्य रंग जैसे ब्लैक या ब्राउन फुटवियर के अलावा सर्दियों में प्राकृतिक रंगों के शेड ट्रेंड में रहते हैं, जबकि गर्मियों में पेस्टल कलर को खूब पसंद किए जाते हैं. यूरोपीय देशों में वहां के मौसम के अनुसार बूट की मांग रहती है, तो अन्य देशों में स्नीकर्स का प्रचलन बढ़ रहा है.

महिलाओं में पार्टी वियर स्नीकर्स की मांग बढ़ी है. इस को देखते हुए स्नीकर्स पर एंब्रॉयडरी और मेटल बटन का काम ज्यादा कराया जा रहा है. जितनी ज्यादा कलाकारी होगी, उसी अनुसार कीमत तय होती है. लखनऊ में चिकनकारी और चांदी के तारों से भी इन को तैयार किया जाता है. अब लोगों के काम करने के घंटे बढ़े हैं. जिस से वे भारी और बोझिल जूते या सैंडल पहनना पसंद नहीं करते, इसलिए स्पोर्ट्स शूज इंडस्ट्री की ग्रोथ भी तेजी से बढ़ी है.

आने वाले दिनों में स्मार्ट जूता तैयार हो रहा है. जो एआई से चलेगा. इस में कदमों की आहट से लोगों को पहचान लिया जाएगा. साथ ही स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने वालों को जूते यह भी अपडेट देंगे कि कितना कदम चले.

भारत में फुटवियर का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, यहां सब से ज्यादा बिकने वाले जूते ऐसे होते हैं जो गुणवत्ता, आराम और कीमत में संतुलन प्रदान करते हैं. भारत में सबसे अधिक पसंद किए जाने वाले ब्रांड में बाटा, नाइकी, एडीडास, प्यूमा, रीबॉक सबसे प्रमुख है. हर वर्ग के लोगों के पास इन के जूते मिल जाते हैं.

डायबिटीज जैसे पेशेंट्स को डाक्टर लेदर के जूते पहनने से मना करते हैं. यह पैरों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इन लोगों को कैनवास या फिर फौम लेदर के शूज पहनने के लिए कहा जाता है. इस तरह से शूज का बाजार बदल चुका है. अब यह जरूरत के साथ ही साथ आराम और फैशन को दिखाने का जरिया बन गया है. साधारण तौर पर 500 से कैनवास और 800 में फोम लेदर के शूज मिलने शुरू हो जाते हैं. प्योर लेदर के शूज 3 हजार से ऊपर के मिलने लगे हैं. महंगे किस्म के कैनवास 8 से 10 हजार तब मिलते हैं. इन की कीमत ब्रांड के अनुसार भी होती है. भारत में 100 से अधिक ब्रांड के शूज मिलते हैं.

चाइनीज रबर सोल आने के बाद इन की लाइफ बढ़ गई है. अलग अलग खेलों में अलग किस्म के शूज पहने जाते हैं. इन की कीमत बहुत अधिक होती है. सेना और पुलिस के लिए भी अलग किस्म के जूते तैयार किए जाते हैं. यह देखने में हल्के पर मजबूत होते हैं. मौसम के अनुसार इन का प्रयोग होता है.

सेना में बर्फ पर रहने वालों के जूते अलग होते हैं. यह इस तरह से तैयार किए जाते हैं जो अंदर से पैर को गर्म रखते हैं. इन के सोल में भी खास ध्यान रखा जाता है जिस से यह फिसल न सके.

जंगल में जाते समय बूट किस्म वाले जूते पहने जाते हैं जिस से रेंगने वाले जानवर और कीड़े पैर को नुकसान न पहुंचा सके. जूते हिफाजत और फैशन दोनों को स्टेटस सिंबल बन चुके हैं. जिस की वजह से ही इस का बाजार तेजी से बढ़ता जा रहा है. आज बिना शूज के इंसान की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. Changing Shoe Fashion :

Elderly Health Issues : युवाओं पर भारी पड़ते हैं घर के बुजुर्गों के रोग

Elderly Health Issues : छोटे परिवार होने के कारण परेशानियां बढ़ रही हैं. मां बाप की देखभाल में युवाओं का करियर प्रभावित हो जाता है. गांव और शहर दोनों ही जगहों पर इस तरह के मामले बढ़ रहे हैं.

‘बाबा अभी रात नहीं हुई है. घर की लाइट चली गई है. इसलिए आप को रात का आभास हो रहा है. अभी तो कनु कोचिंग से भी वापस नहीं आई है.’ दीपिका ने अपने ससुर को समझाते हुए कहा. जिन को लग रहा था कि रात हो गई है. 80 साल के प्रभाकर अपनी बहू और उस की दो बेटियों के साथ रहते थे. बेटे की मृत्यु के बाद उन की याददाश्त पर प्रभाव पड़ा. उन को भूलने की बीमारी हो गई. ससुर और बेटियों को संभालने के लिए दीपिका को अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़नी पड़ी.

प्रभाकर को भूलने के साथ ही साथ चिंता करने की भी आदत पड़ गई थी. छोटीछोटी बात को ले कर चिंता करते थे और फिर झगड़ने लगते थे.

35 साल की दीपिका अपने ससुर, पति और बच्चों के साथ रहती थी. दीपिका प्राइवेट जॉब करती थी. उस के पति रमेश की जनरल मर्चेंट की दुकान थी. ससुर को पेंशन मिलती थी. ऐसे में उन का परिवार चल रहा था. दीपिका की 2 बेटियां कनु और मनु थी. वह स्कूल में पढ़ती थी. इस बीच उन के पति को नशे की लत लग गई. जिस के बाद उन की दुकान कर्ज में डूबने लगी. घर में झगड़े होने लगे. ऐसे में एक दिन उन्होंने आत्महत्या कर ली.

रमेश की आत्महत्या ने पूरे परिवार को तितर बितर कर दिया. ससुर प्रभाकर बीमार रहने लगे. जिस के कारण दीपिका को अपनी जॉब छोड़नी पड़ी. अब घर केवल ससुर की पेंशन और घर के किराए से चल रहा था. दीपिका की दोनों बेटियां पढ़ रही थी. उन की जिम्मेदारियां बढ़ रही थी. दूसरी तरफ ससुर को भूलने की बीमारी ने परेशानी में डाल रखा था. दीपिका का पूरा करियर खत्म हो गया था. इस तरह की हालत केवल दीपिका की ही नहीं थी. कुछ इसी हालातों से कविता भी गुजर रही है.

हरदोई की रहने वाली कविता की शादी लखनऊ में हुई थी. उस के पति विवेक अपने पिता की अकेली संतान थे. कविता और उस के पति सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करते थे. शादी के 2 साल के बाद उसकी सास की मृत्यु हो गई. इसके बाद ससुर के दिमाग पर असर हो गया. 65 साल की उम्र में वह बीमार रहने लगे. अब घर को संभालने का जिम्मा कविता पर आ गया. घर का कोई और ऐसा नहीं था जो बीमार ससुर की देखभाल कर सके. एक दिन वह घर से बाहर निकले तो फिर वापस ही नहीं आए. दो तीन दिन के बाद वह भिखारियों के बीच भीख मांग कर खाते पाए गए.

तब विवेक और कविता ने तय कि उन में से कोई एक अपनी नौकरी छोड़ कर घर रह कर पिता की देखभाल करेगा. क्योंकि उन के गायब होने और भीख मांगने की घटना ने समाज में उन लोगों को बदनाम कर दिया था. लोग कहने लगे कि बेटे बहू ने घर से निकाल दिया था. जबकि वह भटक कर गए थे. कविता ने सोचा वह ही अपनी नौकरी छोड़ देगी. अब वह ससुर की देखभाल करने के लिए घर पर रहती है. उसे इस बात का अफसोस भी है कि उस को अपनी अच्छी खासी जॉब छोड़नी पड़ी.

बुढ़ापे के रोग युवाओं के सपनों पर भारी पड़ते हैं. केवल एकल परिवार ही नहीं संयुक्त परिवार भी इस से प्रभावित होते हैं. रमेश चन्द्र का बड़ा परिवार है. उन की पत्नी की मृत्यु 4 साल पहले हो चुकी थी. वह अपने 4 बेटों बहुओं और नाती पोतों के साथ रहते थे. 70 साल की अवस्था में उन को पैरालिसिस यानी लकवा मार गया. उन को लखनऊ के पीजीआई ले जाया गया. वहां वह 25 दिन भर्ती रहे. वह जिंदा थे पर ठीक नहीं हुए. घरवालों का 15-20 लाख रुपया खर्च हो गया.

डॉक्टरों ने कहा कि अब आप इन को घर ले जाएं. ऐसे में घर के एक कमरे को 3 लाख खर्च कर के अस्पताल के कमरे जैसा बनाया गया. 10-10 हजार महीने पर दो पैरामेडिकल स्टाफ रखे जो घर में ही अस्पताल जैसी देखभाल कर सके. पूरा घर अस्पताल में बदल गया था. घर के लोग अपना कामधाम छोड़ कर पिता की देखभाल में लगे थे. नाते रिश्तेदारों का सिलसिला देखने के लिए लगा था. 3 माह करीब 90 दिन तक वह जीवित रहे. तब तक पूरा घर प्रभावित रहा.

बुजुर्गों में बढ़ रही मानसिक परेशानियां :

इस तरह की बहुत सी घटनाएं बढ़ रही हैं. छोटे परिवार होने के कारण परेशानियां बढ़ रही हैं. मां बाप की देखभाल में युवाओं का करियर प्रभावित हो रहा है. गांव और शहर दोनों ही जगहों पर इस तरह के मामले बढ़ रहे हैं. बुजुर्गों की मानसिक हालत बिगड़ रही है.

उत्तर प्रदेश में पीजीआई, लखनऊ मेडिकल कॉलेज और सैफई विश्वविद्यालय ने 350 बुजुर्गों पर एक अध्ययन किया. इस में बुजुर्गों की मानसिक हालत को जांचने के लिए मेंटल टेस्ट किया. जिस का स्कोर 23 या उस से कम पाया गया उसे मानसिक रूप से कमजोर माना गया.

इस रिपोर्ट से पता चला की आदमी और औरत दोनों ही इससे प्रभावित दिखे. इस शोध को इंडियन जर्नल ऑफ साइकेट्री के अक्टूबर 2025 अंक में प्रकाशित किया गया है.

इस अध्ययन में पता चलता है कि 24 फीसदी बुजुर्गों की मानसिक हालत कमजोर पाई गई थी. 87 फीसदी लोगों में इस की शुरुआत थी. महिलाओं में यह दर 33 फीसदी पाई गई जो पुरूषों अपेक्षा अधिक पाई गई. अधिक आयु, विधवा होना और दैनिक काम न कर पाने की हालत इस के मुख्य कारण पाए गए. इस अध्ययन करने वाली टीम में डॉक्टर प्रत्यक्षा पंडित, डाक्टर सुगंधी शर्मा, डॉक्टर रीमा कुमारी, डॉक्टर आदर्श त्रिपाठी और डॉक्टर प्रभाकर शर्मा शामिल थे.

डॉक्टर आदर्श त्रिपाठी कहते हैं ‘मानसिक समस्या धीरे धीरे बढ़ती है. अकसर इस को सामान्य बुढ़ापा मान कर नजरअंदाज कर दिया जाता है. अगर समय पर जांच, संतुलित भोजन, सामाजिक मेलजोल और देखभाल हो तो सुधार हो सकता है.’

बुजुर्गों में होने वाले मानसिक रोग :

अवसाद, चिंता, और डिमेंशिया बुजुर्गों में होने वाले प्रमुख मानसिक रोग हैं. डिमेंशिया का सब से आम अल्जाइमर है. डिमेंशिया याददाश्त, सोच और व्यवहार को प्रभावित करता है. जिस से दैनिक गतिविधियों को करना मुश्किल हो जाता है. अल्जाइमर में मस्तिष्क की कोशिकाओं को धीरे धीरे नष्ट कर देता है. जिस से मानसिक हालत और खराब होती जाती है.

अवसाद यानी डिप्रेशन में जीवन पर निराशा, उदासी बढ़ जाती है. जिस से कोई काम नहीं हो पाता है. चिंता में बेचैनी और घबराहट बढ़ जाती है. इस के कारण सामाजिक अलगाव, प्रियजनों की मृत्यु या रिटायरमेंट जैसे जीवन में बड़े बदलाव होते हैं.

मानसिक रोगों में डेलिरियम भी है. यह अचानक होने वाला भ्रम है जो स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, संक्रमण, या दवाओं के साइड इफेक्ट के चलते हो सकता है. जिन बुजुर्गों मे नशे की आदत होती है वह दूसरी मानसिक बीमारियों को भी बढ़ाने का काम करता है. इन की पहचान के तमाम कारण होते हैं. सोने या व्यवहार में बदलाव भी मानसिक बीमारियों का संकेत देते हैं. सोचने समझने की क्षमता में कमी भी इस के संकेत होते हैं. इन बीमारियों का इलाज नहीं है. ऐसे में इन से बचाव कर सकते हैं. जिस से इन का प्रभाव कम हो सकता है. यह बीमारियां जड़ से खत्म नहीं होती है.

बचाव ही इलाज है :

अल्जाइमर रोग में उम्र बढ़ने के साथ कई लोग भूलने की बीमारी बढ़ जाती है. भूलने की बीमारी का मतलब यह नहीं कि वह अल्जाइमर है. अल्जाइमर डिमेंशिया का एक आम रूप है. डिमेंशिया से पीड़ित लगभग 60-80 फीसदी लोगों में अल्जाइमर रोग पाया जाता है. अल्जाइमर में दिमाग की कोशिकाएं धीरे धीरे मर जाती हैं. जिस से मस्तिष्क के कुछ हिस्से आपस में संवाद नहीं कर पाते. इस वजह से जीवन प्रभावित होता है. अल्जाइमर ऐसा रोग है जो ठीक नहीं होता है. इलाज से इस के प्रभाव को कम किया जा सकता है.

इस बीमारी को शुरुआती चरणों में याददाश्त का कमजोर होना होता है. धीरे धीरे यह बढ़ता जाता है जिस से प्रभावित व्यक्ति अकेले जीने की हालत में नहीं रहता है. अल्जाइमर से पीड़ित सभी दैनिक गतिविधियों के लिए मदद की जरूरत पड़ती है. कई बार यह बीमारियां 20-20 साल तक साथ चलती रहती है. सामान्य तौर पर यह 4 से 8 साल तक बना रहता है. आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में 65 या उस से अधिक आयु के लगभग 9 में से 1 व्यक्ति को यह रोग है. 85 या उससे अधिक आयु के 3 में से 1 व्यक्ति को भी यह रोग है.

जिन लोगों के माता पिता या भाई बहन को अल्जाइमर है या था, उन्हें इस का खतरा अधिक होता है. अगर एक से अधिक रिश्तेदार अल्जाइमर से पीड़ित हैं, तो यह खतरा और भी बढ़ जाता है.

महिलाओं में अल्जाइमर रोग होने की संभावना अधिक होती है. जिन के सिर में चोट लगी हो या जो भूलने की बीमारी के शिकार होते हैं उन में अल्जाइमर का खतरा अधिक होता है. अल्जाइमर रोग हृदय और रक्त वाहिकाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा है. मस्तिष्क को रक्त की आपूर्ति करने वाली रक्त वाहिकाओं को होने वाली क्षति इस को बढ़ावा देने का काम करती है.

इस को कम करने के लिए धूम्रपान छोड़ दें. नियमित व्यायाम करें और भरपूर अच्छी नींद लें. खाने में भरपूर मात्रा में फल और सब्जियों वाला खाना खाएं. डिप्रेशन डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हाई कोलेस्ट्रॉल वाले मरीजों को यह ज्यादा प्रभावित करता है. वजन को कंट्रोल में रखें. परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने से लाभ होता है.

मानसिक बीमारियों से प्रभावित लोगों का सामाजिक सुरक्षा देने के लिए राजीव गांधी सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 बनाया था. यह कानून मानसिक बीमारी से पीड़ित लोगों के अधिकारों की रक्षा करते हैं. इस में सम्मान के साथ जीने का अधिकार, गोपनीयता का अधिकार, और समुदाय में उपचार का अधिकार प्रमुख है. आपराधिक मामलों में मानसिक बीमारी को एक बचाव के रूप में भी माना जा सकता है, जहां अदालतें अभियुक्त के मानसिक स्वास्थ्य के आधार पर निर्णय ले सकती हैं.

मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में किसी भी तरह के क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार से सुरक्षा का अधिकार इस कानून के तहत मिलता है. मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति से संबंधित कोई भी जानकारी मीडिया को उन की अनुमति के बिना जारी नहीं की जा सकती है. 2017 में इस कानून में संशोधन करके इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल माध्यम से गोपनीयता को भंग करना भी जोड़ दिया गया है. कानून ने अधिकार दिया है कि जहां तक जहां तक संभव हो मरीज का इलाज अकेले न किया जाए. Elderly Health Issues :

Society Issues : बड़ा मकान, कितना नफा नुकसान ?

Society Issues : बड़ा मकान हर किसी का सपना होता है जो अब, होम लोन के जरिए ही सही, साकार होने लगा है. इस की बड़ी कीमत भी लोग अदा कर रहे हैं लेकिन इन में से भी अधिकतर लोग एक वक्त के बाद बड़े मकान को ले कर पछताते नजर आते हैं. बड़ा मकान कुंठा है, स्मार्ट इन्वेस्टमेंट है या जरूरी सहूलियत, इस बात को सम झ पाना एकदम आसान भी नहीं है.

‘‘साढ़े 3 कमरे का मकान और उस में रहने वाले हम 8 लोग. आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि वह कितना तकलीफदेह था,’ अब से कोई चार दशक पहले को याद करते वे बताती हैं, ‘‘खासतौर से युवा होती हम तीनों बहनों के लिए तो जिंदगी बहुत कठिन थी जो अम्मा के साथ एक बेडरूम में सोती थीं. बाहर वाला कमरा जो महज थोड़ा बड़ा होने और लकड़ी का एक पुराना सोफा सेट युक्त होने के चलते ड्राइंग रूम के खिताब से नवाज दिया गया था वह पापा का स्थायी बेडरूम था और भाई लोग बाहर के कमरे में सोते थे.

‘‘जगह कम होने के चलते हमें कपड़े बदलने तक में बहुत एहतियात बरतनी पड़ती थी. पीरियड्स के दिनों में तो हम बहनों को जिंदगी दुश्वार लगने लगती थी कि कैसे सब से छिपा कर कपड़ों की पुटलिया बाहर जा कर फेंके और सुबह सुबह लेट बाथ के लिए पब्लिक टॉयलेट जैसी लाइन में लगे अपनी बारी आने का इंतजार करते रहें.

‘‘हिंदी की प्राध्यापिका होने के बाद भी मैं उन तकलीफों यानी छोटे मकान की जिंदगी को पूरी तरह बयां नहीं कर सकती.’’ पिछले दिनों ही भोपाल के एक सरकारी कॉलेज से रिटायर हुईं बिंदिया मिश्रा (बदला नाम) याद करते आगे बताती हैं, ‘‘बात एक तो करेला और ऊपर से नीम चढ़ा जैसी बात तब हो जाती थी जब घर में कोई मेहमान आ जाता था. उस दौर में अधिकतर मेहमान बिन बुलाए ही होते थे. किसी को इंटरव्यू देना होता था, कोई अपने बेटे या बेटी के रिश्ते की बात करने आया होता था और किसी को राजधानी होने के कारण किसी सरकारी दफ्तर में कोई काम होता था, या कोई यों ही हम से मिलने की आड़ ले कर भोपाल घूमने फिरने की गरज से आ जाता था.

‘‘हालांकि मेहमानों के आने को बहुत ज्यादा अन्यथा नहीं लिया जाता था लेकिन दिक्कत तो होती थी. उन्हें अलग बिस्तर देने के कारण हम भाईबहनों को बेड शेयर करना पड़ता था, तत्कालीन मेहमाननवाजी के तहत उन्हें पकवान भी खिलाने पड़ते थे और टॉयलेट वगैरह में भी प्राथमिकता देनी पड़ती थी.

‘‘पापा सरकारी विभाग में क्लर्क थे. कुछ खेती भी गांव में थी, इसलिए पैसों की किल्लत खास नहीं थी पर इस से छोटे घर में रहने की कोफ्त कम नहीं हो जाती थी. खैर, वक्त गुजरते सब सेटल होते गए. हम भाई बहनों की शादी हो गई, सभी अच्छी नौकरियों से लग गए. मैं एमपी पीएससी के जरिए कालेज में असिस्टैंट प्रोफेसर हो गई. पति भी सरकारी अधिकारी हैं, इसलिए यहीं भोपाल के एक पौश इलाके में बड़ा मकान एक करोड़ रुपए का खरीद लिया जिस की अपनी दिक्कतें और सहूलियते हैं. लेकिन गुजरी जिंदगी और वर्तमान हालात के मद्देनजर देखूं तो सहूलियतें ज्यादा हैं जिस ने सब से ज्यादा सुकून महिलाओं को दिया है.

‘‘सुकून यह कि, बिंदिया कहती हैं, ‘‘अब हमारे पास स्पेस ज्यादा है. 2 बेटियां हैं, उन के अपने अलग कमरे हैं. लिहाजा, प्राइवेसी की समस्या किसी के साथ नहीं. एक गैस्टरूम है लेकिन खाली पड़ा रहता है. कितनी अजीब बात है कि जब मेहमान खटकते थे तब भर भर कर आते थे, अब उन के लिए अलग इंतजाम हो गए हैं तो कभी कभार ही आते हैं. अब जो भोपाल आते भी हैं तो घर के बजाय होटल में ठहरते हैं.

‘‘सारी सुविधाएं मौजूद हैं, फिर भी कुछ कमियां हैं जो खटकती रहती हैं. कल को बेटियां शादी कर अपनी ससुराल चली जाएंगी तब इतना बड़ा मकान हमें अखरेगा. इसलिए हम दोनों अभी से प्लान कर रहे हैं कि किसी अच्छी सी सोसाइटी में एक एमआईजी फ्लैट खरीद कर उस में शिफ्ट हो जाएं. 2 बेडरूम, एक हौल का सैट हम पति पत्नी के लिए पर्याप्त रहेगा उम्र के हिसाब से भी और सुरक्षा के लिहाज से भी.’’

कुंठा नहीं जरूरत है

जाहिर है बिंदिया के मन में वही डर है कि बच्चे बाहर चले जाएंगे तब हम पति पत्नी दोनों अकेले बड़े मकान में कैसे रहेंगे. यह समस्या अकेले भोपाल की एक प्रोफेसर की नहीं बल्कि पूरे देश के लोगों की है कि जब बुढ़ापा अकेले और दूसरों के भरोसे ही काटना है तो बड़े मकान की तुक क्या. बड़े मकान का मेंटिनैंस आसान नहीं होता खासतौर से तब जब एक तिहाई खाली पड़ा हो. मकान दो मंजिला हो तो खाली पड़ी ऊपरी मंजिल की साफ सफाई महीनों नहीं होती.

तो फिर लोग क्यों बड़े मकान बड़ी तादाद में खरीद रहे हैं जबकि ये कई कई पहलुओं पर माफिक नहीं बैठते. मुमकिन है यह मध्यवर्गीय कुंठा हो क्योंकि पहले राजा महाराजा महलों में रहते थे, नगर सेठ और रईस किस्म के लोग बड़ी हवेलियों और कोठियों में रहते थे. इस नाते भी वे खास होते थे और मकान से भी अपनी अलग पहचान रखते थे. छोटे लेकिन पक्के मकानों में रहने वालों की हिम्मत नहीं पड़ती थी कि वे इन खास लोगों को मकान के मामले में टक्कर दें.

लेकिन 70 का दशक आतेआते माहौल बदला और शहरीकरण ने पांव पसारने शुरू किए तो लोगों का भ्रम टूटने लगा कि वे बड़े आलीशान मकानों में नहीं रह सकते. इसी दौरान संयुक्त  परिवारों के टूटने का भी श्रीगणेश हो चुका था. लोग शिक्षित हो कर नौकरियों में आ रहे थे, इसलिए उन का आत्मविश्वास और सामाजिक सम्मान बढ़ने लगा था. बापदादों के तंग गलियों में बने छोटे मकान, जिन में घर के मेंबर भेड़ बकरियों सरीखे ठुंसे रहते थे, से उन का लगाव खत्म होने लगा था. पैतृक संपत्ति बेचने को ले कर लोगों की  िझ झक और पूर्वाग्रह खत्म हो चुके थे.

एक विराम के बाद 90 के दशक में फिर एक अघोषित आवास क्रांति, जिस ने नरसिम्हा राव सरकार के आर्थिक उदारीकरण के बाद जन्म लिया, के तहत लोगों का स्टेटस मकान के साइज से तय होने लगा था. मकानों की श्रेणियां तीन हिस्सों में बंटने लगीं एलआईजी यानी लोअर इनकम ग्रुप, एमआईजी यानी मिडिल इनकम ग्रुप और एचआईजी यानी हाई इनकम ग्रुप.

यह वर्गीकरण आवास बनाने वाली सरकारी एजेंसियों जैसे हाउसिंग बोर्ड, नगर विकास प्राधिकरण वगैरह के दिमाग की उपज था जिसे बाद में रियल एस्टेट कारोबार ने गोद ले लिया. इस ने इस आर्थिक वर्गीकरण को और विस्तार देते उन में सीनियर और जूनियर जैसे विशेषण जोड़ दिए.

लेकिन अब सब कुछ उलट पुलट है. इनकम ग्रुप के माने बदल गए हैं. इस में अहम रोल बैंक होम लोन का है जो बहुत आसानी से मिल रहा है और लोग बिना किसी तनाव के ले भी रहे हैं क्योंकि अब हर किसी को बड़ा मकान चाहिए भले ही उस की जरूरत हो न हो. सोने से भी पहले बड़ा मकान एक स्मार्ट इन्वेस्टमेंट माना जाने लगा है जो एक हद तक हकीकत भी है. बकौल बिंदिया मिश्रा, हम तो रहेंगे नहीं लेकिन बच्चों के लिए 2-3 करोड़ के मकान का इंतजाम कर जा रहे हैं जिस से भविष्य में उन्हें कोई आर्थिक परेशानी पेश न आए.

होम लोन की ट्रिग्नोमेट्री

सीधे सीधे कहा जाए तो लोग अगली पीढ़ी के लिए होम लोन ले रहे हैं, बड़ा या छोटा मकान तो उस का जरिया या बहाना है. एनएचबी यानी नेशनल हाउसिंग बोर्ड की सालाना रिपोर्ट के आंकड़े एक दिलचस्प हकीकत बयान करते हैं. बीते 2 सालों में कर्ज ले कर मकान खरीदने वालों की तादाद साढ़े चार गुना तक बढ़ी है. 2022-23 में बैंकों और विभिन्न वित्तीय संस्थाओं ने कुल 37.77 लाख होम लोन दिए थे जो 2023-24 में बढ़ कर 1.75 करोड़ हो गए यानी महज एक साल के अंतर से 363 फीसदी होम लोन बढ़े.

इसे आसान तरीके से सम झें तो सालाना कोई 68 लाख मकान होम लोन के जरिए बिक रहे हैं जो आने वाले सालों में और बढ़ सकते हैं. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि लोगों के दिलो दिमाग से कोविड का खौफ खत्म हो चुका है और वे अब जिंदगी को नश्वर मानते हुए जी लेना चाहते हैं.

होमलोन कोई बहुत बड़ा जोखिम भी नहीं है क्योंकि लोग अपनी भविष्य की आमदनी आंक कर ही कर्ज लेते हैं. दूसरे, मकान की कीमतें लोकेशन के हिसाब से बढ़ती भी रहती हैं. इस त्रिकोणमिति का तीसरा एंगल यह है कि अब हर घर में

2 या उस से ज्यादा सदस्य कमा रहे हैं. जाहिर है इस से लोगों की पारिवारिक आय बढ़ी है. वहीं, यह भी ठीक है कि उस का बड़ा फायदा मिडिल क्लास के लोग ही मकान के मद्देनजर उठा पा रहे हैं.

जिन की सालाना आमदनी 3-4 लाख रुपए है उन की 10-20 फीसदी बढ़ भी जाए तो उस से मकान नहीं खरीदा जा सकता. आय का यह अतिरिक्त हिस्सा खाने पीने, कपड़ों, धरम करम और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स में खर्च हो रहा है लेकिन जिन की सालाना आमदनी 10 लाख रुपए से ऊपर है वे अपने खर्चों में और कटौती कर मकान ले पा रहे हैं.

यह इस लिहाज से भी ठीक है कि 50 लाख रुपए का होम लोन जो लेता है वह उस का मार्जिन मनी कम से कम 10 लाख रुपए पहले ही जमा या इकट्ठा कर लेता है. यानी, लोन लेने के लिए भी आप को बचत करना जरूरी हो चला है जो खुद की आर्थिक स्थिति और देश के वित्तीय स्वास्थ्य के लिहाज से शुभ संकेत है. लोन लेने के बाद भी लोगों की बचत और किफायत की आदत न केवल बरकरार रहती है बल्कि कई दफा तो और बढ़ जाती है क्योंकि ईएमआई भरने की चिंता उन्हें रहती है जो लोन लेने के साथ ही घर के मंथली बजट का हिस्सा हो जाती है.

लग्जरी मकान का बढ़ता क्रेज

इन 2 सालों में हैरत की बात है कि बैंकों के होम लोन का एक बड़ा हिस्सा बड़े मकानों के लिए लिया गया. 50 लाख रुपए से ऊपर वाले होमलोन कोई 302 फीसदी बढ़े हैं जो कुल होम लोन की राशि का 38.32 फीसदी हिस्सा होता है. 2022-23 में जहां इन लग्जरी मकानों की बिक्री 5.25 फीसदी हुई थी वह 2023-24 में बढ़ कर 18.15 फीसदी हो गई थी. कुल मकानों की हिस्सेदारी में बड़े मकानों की बिक्री 10.37 फीसदी हो गई है. यानी देश में बिकने वाला हर 10वां मकान बड़ा या लग्जरी है.

रिपोर्ट की मानें तो उलट इस के अफोर्डेबल मकानों की बिक्री घट रही है. सस्ते घरों के लिए कर्ज की मांग इस दौरान 66 फीसदी के लगभग घटी. 2024-25 में लोन की सब से बड़ी हिस्सेदारी 10 से 25 लाख की कीमत वाले घरों के लिए 65.86 फीसदी रही जो कि 2023-24 में महज 11.48 फीसदी थी.

यही आजकल का मध्यवर्ग है. होमलोन निम्न आय वर्ग वालों ने भी लिए लेकिन बहुत कम लिए. 2 लाख से ले कर 5 लाख रुपए तक की कीमत वाले घरों के लिए इस साल 11.07 फीसदी लोगों ने होम लोन लिए जबकि 5 से 10 लाख रुपए तक की कीमत वाले मकानों के लिए होम लोन का फीसद 28.29 रहा.

इस का यह मतलब नहीं कि लोगों की आमदनी बहुत ज्यादा बढ़ रही है बल्कि यह है कि अपना मकान हर किसी की प्राथमिकता में है. अब यह जरूरत अगर कर्ज से पूरी हो रही है तो लोग लोन लेने से हिचक नहीं रहे.

होमलोन लेने वाले अधिकतर लोग जानते हैं कि उन्हें मकान की कीमत से दोगुना पैसा चुकाना पड़ता है लेकिन यह सौदा उन्हें घाटे का नहीं लगता क्योंकि मकान की कीमत भी लोन चुकता होतेहोते डेढ़ से ले कर दोगुनी हो जाती है और इस दौरान अगर किराए के मकान में रहा जाए तो किराए का पैसा बेकार जाता है. इसलिए लोग बजाय किराए के मकान में रहने के, कर्ज वाला अपना घर चुन रहे हैं.

बड़े मकान के नफे नुकसान

बड़े मकान का भी यही फंडा है क्योंकि वे अधिकतर 2 या 3 मंजिला होते हैं और उन का किराया भी ज्यादा होता है. पौश रिहायशी इलाकों में दूसरी मंजिल पर अकसर किराएदार ही रहते मिलते हैं जिन से मिले किराए से मालिक मकान को मासिक किस्त चुकाने में सहूलियत मिल जाती है. यह राशि अकसर मासिक किस्त की आधे से थोड़ी कम होती है.

यदि किसी ने 60 लाख रुपए होम लोन 15 साल के लिए लिया है तो उस की ईएमआई 70 हजार रुपए के लगभग बनती है लेकिन इसी मकान का किराया 20-25 हजार रुपए महीना भी मिले तो बो झ कम तो हो जाता है.

भोपाल की पॉश रिहायशी कॉलोनी मीनाल में रहने वाली अर्चना श्रीवास्तव की मानें तो बिजली विभाग की नौकरी के दौरान उन्हें किस्तें चुक जाने का पता भी नहीं चला. अब रिटायरमेंट के बाद वे पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त हैं तो दूसरी मंजिल किराए पर देने की सोच रही हैं क्योंकि बेटी की शादी के बाद ऊपरी मंजिल खाली हो गई है. उन के पति को भी पेंशन मिलती है और बेटा भी कमाने लगा है.

ऐसे में अर्चना को बड़ा मकान घाटे का सौदा नहीं लगता. वे बताती हैं आज से 10 साल पहले जब यह बड़ा मकान लिया था तो हर कोई टोकता था कि यह फिजूल है. घर में कुल चार लोग हैं, तो इतना बड़ा मकान लेने का औचित्य क्या, इस मकान की कीमत तब 60 लाख रुपए थी जो अब एक करोड़ रुपए हो गई है.

यानी, यह एक अच्छा निवेश था जो अब मुनाफेदार साबित हो रहा है. इकलौता डर या चिंता बड़े मकानों की यह है, अर्चना बताती हैं. बच्चे इंट्रोवर्ट होते जा रहे हैं वे अपने कमरों में बंद रहते हैं जिस से, खासतौर से, टीनएजर्स की निगरानी नहीं हो पाती. छोटे मकानों में नजदीकियां रहती थीं लेकिन बड़े मकानों में नहीं रहतीं. कोई घर में आता भी है तो बच्चों को इस से सरोकार नहीं रहता. लिहाजा, वे मिलनसार नहीं रह जाते. यह एक ऐसी समस्या है जिस का हाल फिलहाल कोई समाधान नजर नहीं आता. लेकिन छिपे खर्च भी बढ़े तमाम सहूलियतों के बाद अकसर वे लोग जिन्होंने बड़ा मकान खरीदा है कई बार  झींकते भी नजर आते हैं क्योंकि शिफ्टिंग के एक साल बाद उन्हें सम झ आता है कि बड़ा मकान हाथी सरीखा होता है जिस का चारा खरीदने में पसीने छूट जाते हैं. ब्याज की मार के बाद जो पैसा बचता है वह इस हाथी की खुराक बन जाता है. मकान जितना बड़ा होता है उस का खर्च भी ज्यादा होता जाता है. मोटे तौर पर यह छोटे मकान से लगभग 10 गुना ज्यादा होता है. आइए देखें कैसे छिपे खर्च बड़े मकान मालिक को सकते में डालते हैं.

प्रॉपर्टी टैक्स : छोटे मकान से कोई चार गुना ज्यादा होता है. इस की दरें लोकेशन और सर्किल रेट के हिसाब से अलग अलग होती हैं. हाल ही में छोटा मकान छोड़ भोपाल के ही रचना टावर्स में रहने आई अंकिता प्रधान बताती हैं कि यहां 2,200 वर्ग फुट फ्लैट का प्रौपर्टी टैक्स उन्हें 4,400 रुपए सालाना देना पड़ रहा है जबकि छोटे मकान में वे सिर्फ 1,200 रुपए का भुगतान बतौर प्रॉपर्टी टैक्स अदा कर रही थीं.

सोसाइटी भी महंगी : बकौल अंकिता, यहां सोसाइटी के 2,600 रुपए देने पड़ रहे हैं जबकि छोटे मकान में महज 1,200 रुपए दे रही थी. यानी दोगुना ज्यादा जिस का सालाना अंतर 19,200 रुपए अतिरिक्त खर्च.

भोपाल के ही कीलनदेव अपार्टमेंट में रह रहे आनंद कहते हैं, पौश और महंगे रिहायशी इलाकों में काम वाले भी महंगे मिलते हैं. इस अपार्टमेंट में शिफ्ट होने से पहले वे कामवाली बाइयों पर महज 3,000 रुपए महीना खर्च कर रहे थे जो बढ़ कर अब 6,000 रुपए हो गया यानी दोगुना. सालाना यह अंतर 36,000 रुपए होता है.

भोपाल के ही नामी आर्किटेक्ट सुयश कुलश्रेष्ठ बताते हैं, बड़े मकान, चाहे वे स्वतंत्र हों या फ्लैट हों, का खर्च एकदम से 20 फीसदी तक बढ़ता है. इन घरों के हर कमरे में एसी लगा होता है और हर बाथरूम में गीजर. इस के अलावा किचन में 3 तरह के गैजेट्स होते हैं जो बिजली का खर्च कुल मिला कर तीन गुना कर देते हैं. गर्मी में तो यह आठ गुना तक चला जाता है. जो बिजली खर्च छोटे मकान में 1,500 रुपए होता है वह बड़े मकान में औसतन 6,000 रुपए तक हो जाता है. यह एक बड़ा खर्च है जिस का अनुभव शिफ्टिंग के बाद ही होता है.

पुताई सफाई भी महंगी : यह ठीक है कि अब घरों की पुताई पहले जैसी सालाना नहीं होती लेकिन 3 साल बाद हो या 5 साल बाद पड़ती बहुत महंगी है. कितनी ही किफायत से कर लें, ऑफ सीजन में कर लें, प्रति वर्ग फुट पुताई का औसत खर्च 30 रुपए बैठता है. अगर 2 हजार वर्ग फीट में रंग करवाएं तो यह 60,000 रुपए होता है लेकिन दीवारों की शान और सुरक्षा के लिए अकसर लोग प्रीमियम रॉयल या एपकोलाइट (वाशेबल, एंटी फंगल, एंटी स्टेन) जैसे महंगे रंगों का इस्तेमाल करवाते हैं जिन की लागत 80 रुपए वर्ग फीट तक आती है.

इन सब से भी महंगी पड़ती है सजावट. सुयश बताते हैं, ‘‘एक 12×12 फुट के कमरे में अगर अच्छी क्वालिटी का वालपेपर लगाया जाए जो हर किसी की पसंद होता है तो उस की कीमत 48 हजार रुपए तक होती है. ये वालपेपर 3 से 5 साल चलते हैं बशर्ते इन्हें पानी और नमी न लगे. लेकिन अगर लग जाए तो 2 साल में ही वे रहने वालों को काटने को दौड़ने लगते हैं. लिहाजा, फिर पहले जैसा ही खर्च करना पड़ जाता है.

बड़े मकान की दुश्वारियां यहीं खत्म नहीं होतीं. इन की सब से बड़ी दिक्कत पड़ोसीपन होती है. आमतौर पर लोग एकदूसरे से कोई खास मतलब नहीं रखते क्योंकि जितना बड़ा मकान उतना ही बड़ा अहंकार उन में रहने वालों का होता है. फ्लैट्स में तो ये दिक्कतें और बढ़ जाती हैं. ऊपर वाले फ्लोर की ठकठक से निबट पाना आसान काम नहीं होता. इस के अलावा फ्लैट्स में रहने वाले लोग कपड़े सुखाने के लिए भी तरस जाते हैं. बालकनी में कपड़े सुखाना बड़े मकान की शान से मेल नहीं खाता. अगर किसी नल से पानी रिस रहा है तो उस की मरम्मत में हजारों खर्च हो जाते हैं. ड्रेनेज लाइन कहां से निकल कर कहां जा रही है, यह बिल्डर भी नहीं बता पाता. बेशक बड़े मकान की अपनी अलग शान है लेकिन उस की कीमत भी भारी पड़ती है, इसलिए खरीदने के पहले बड़े मकान की परेशानियों और छिपे खर्चों का आकलन कर लेना चाहिए वरना बाद में पछताना भी पड़ सकता है. Society Issues :

Hindi Satire Story : बैकबेंचर्स – अब इन स्टूडेंट्स का क्या होगा?

Hindi Satire Story : जब से केरल में सर्कुलर जारी हुआ है कि क्लास रूम में अब कोई बैकबेंचर नहीं होगा तब से बैकबेंचर्स की नींद उड़ गई है. कैसे लेंगे वे पीछे बैठ कर मस्ती करने का सुख?

जब से यह पता चला है कि केरल में अब कोई बैकबेंचर नहीं होगा, मैं चिंता में हूं. खुश होने वाले खुश भी हैं. जो खुश हैं, शायद उन्होंने बैकबेंचर होने का आनंद नहीं लिया है. उन से जीवन में बहुत कुछ छूट गया है.

न्यूज यह है कि केरल के कुछ विद्यालयों में अब क्लास रूम में फ्रंट बेंचर और बैकबेंचर के बीच का अंतर खत्म किया जा रहा है, यह पीछे की सीट का आनंद उठाने वाले स्टूडेंट्स के साथ अन्याय है. इस के लिए स्कूलों में सेमी सर्कुलर सीटिंग व्यवस्था शुरू कर दी गई है. यह आइडिया 2024 की मलयालम फिल्म ‘स्थानानार्थी  श्रीकुट्टन’ से लिया गया है.

फिल्म में एक बैकबेंचर स्टूडेंट श्रीकुट्टन स्कूल इलेक्शन में एक फ्रंट बेंचर को चुनौती देता है. वह साइंस फेयर में सेमी सर्कुलर सीटिंग का सुझाव देता है जिस से स्टूडेंट्स में भेदभाव न हो. फिल्म के अंत में स्कूल इस सु झाव को अपना लेता है. अब तक केरल के 8 स्कूलों और पंजाब के एक स्कूल ने अपनी क्लासरूम व्यवस्था बदल दी है. मतलब, खुशी खुशी पीछे बैठ कर मस्ती करने वाले काफी स्टूडेंट की मौज पर रोक लग चुकी है.

नई व्यवस्था से टीचर्स भी संतुष्ट हैं. वे कह रहे हैं कि इस से स्टूडेंट्स पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देंगे, उन का बैठने का तरीका सुधरा है और पढ़ाई का माहौल ज्यादा प्रभावी हो गया है. फिल्म के डायरेक्टर कहते हैं, ‘हमें नहीं लगा था कि फिल्म का ऐसा सामाजिक असर होगा. अब यह नेशनल स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है. हम बहुत खुश हैं.’ भाई, होंगे आप खुश, कोई बैकबेंचर्स से भी पूछ ले कि क्या वे इस व्यवस्था से खुश हैं? उन का कितना सुख, कितने अनुभव उन से छीन लिए जाएंगे. उन के माता पिता तो उन्हें अभी से चिढ़ाने लगे हैं. पापा लोग कह रहे हैं कि ‘भाई, स्कूल तो हम ने एंजॉय किया है. आहा, क्या दिन थे’ और मम्मी लोग तो पता नहीं क्या याद कर के शरमाए जा रही हैं. पापा लोगों के चेहरे पर बैकबेंचर सुनते ही एक रौनक आ जाती है.

मम्मी पापा के प्राचीन काल से चले आ रहे डायलौग ‘हमारे जमाने में तो’ वाले अखंड पाठ में एक और डायलॉग जुड़ गया है जिसे वे आगे जा कर गर्व से ऐसे कहेंगे, ‘हम तो बैकबेंचर्स हुआ करते थे, स्टूडेंट लाइफ तो हम ने एंजॉय की है. तुम क्या जानो, हम तो टीचर के मुड़ते ही ब्लैकबोर्ड पर चौक से ऐसा निशाना लगाते थे कि टीचर तो छोड़ो, अगल बगल के दोस्तों को छोड़ कर बाकी स्टूडेंट्स को भी पता नहीं लग पाता था कि क्लास में यह अर्जुन कौन है. जलनखोर स्टूडेंट चाह कर भी पता नहीं कर पाते थे कि उन पर कागज से हेलीकॉप्टर बना कर किस ने फेंका.’

पापा लोग दोस्तों के साथ बैठ कर अपने अपने दिन याद करेंगे कि उन के लव नोट्स आगे पास करने में पहले की सीटिंग व्यवस्था ने कितनी अहम भूमिका निभाई है. ओह. नई सीटिंग व्यवस्था तो प्यार की छोटी छोटी चिट्ठियां भी बंद करवा देगी. आज भले ही चिट्ठियों की  जगह मोबाइल ने ले ली हो, पर टीचर के सामने बैठ कर तो मोबाइल भी बंद हुआ ही सम झो. पर किशोर प्रेम के दिन, कुछ घंटों पर तो रोक लग ही जाएगी. मम्मी लोगों को पता नहीं कौन कौन याद आएगा कि पहले की सीटिंग व्यवस्था में फलाने ने कैसे पीछे से चिट्ठी दी थी, फलाना आता जाता कैसे देखता था, कितना अच्छा लगता था लेकिन था बैकबेंचर. किसी को क्या पता वह अपनी हाजिरी लगा कर उसे खिड़की के बाहर से देखने के लिए पीछे से निकल कर भाग जाने के लिए ही बैकबेंचर बना था. कोई कहेगा, भाई, हम तो टीचर के पढ़ाते पढ़ाते ही पीछे बैठ कर खा भी लेते थे. बैकबेंचर्स होने के फायदे अपने बड़ों के मुंह से सुनते हुए जेन जी को कितना बुरा लगेगा.

स्टूडेंट्स, जो जानबू झ कर पीछे बैठते थे, कम परेशान नहीं हैं, उन्हें यह चिंता हो रही है कि अच्छे भले क्लास में पीछे बैठ कर रील्स देख लिया करते थे, व्हाट्सएप चलता रहता था, अब क्या होगा? फ्रंट बेंचर्स बैकबेंचर्स को ऐसे देख रहे हैं कि अब बैठो हमारे साथ, अब मजा आएगा. अब तुम लोगों की मस्ती बंद होगी. बस, वही स्टूडेंट्स खुश दिख रहे हैं जिन्हें आगे बैठना होता था पर सीटिंग व्यवस्था के कारण मौज मस्ती करने वाले बैकबेंचर्स के साथ पीछे बैठना पड़ता था.

यह तो अच्छा है कि यह बदलाव आज के जमाने में हुआ, मम्मी पापा के जमाने में हुआ होता तो न जाने कितनी कहानियां, कितनी फिल्में, कितने गाने बिना बने ही रह जाते. कुछ भी कहो, किशोर प्रेम इसी उम्र में होता है. जब तक छिप छिप कर कोई कनखियों से देखे न, टीचर से बच कर एकदूसरे को इशारा न करे, तब तक स्टूडेंट लाइफ का मजा ही क्या. खैर, अब फ्रंट बेंचर्स जानें या बैकबेंचर्स, नियम तो स्टूडेंट्स की भलाई के लिए ही बनाए गए हैं, उन्हें भी पढ़ते पढ़ते आदत पड़ ही जाएगी. बस, उन के मम्मीपापा को अपने बच्चों के सामने अपनी शेखी बघारने के और किस्से मिल गए. Hindi Satire Story :

Bodily Autonomy : औरतों के जिस्म पर मर्दों की मर्जी क्यों ?

Bodily Autonomy : शादी के बाद पति को अपनी पत्नी के साथ कुछ भी करने का अधिकार मिल जाता है. भारतीय समाज में शादी का मतलब यही है. सवाल यह है कि क्या शादीशुदा होने के बाद पत्नी शारीरिक संबंध बनाने से इनकार कर सकती है? क्या पति को यह अधिकार है कि वह अपनी पत्नी की मरजी के बिना उस से सैक्स संबंध बना सके? क्या इसे बलात्कार नहीं माना जाएगा? क्या कहता है कानून, आइए जानते हैं.
मर्दों की बनाई सामाजिक व्यवस्था में औरतें सिर्फ ऑब्जेक्ट ही हुआ करती थीं. दहेज का भार लड़की के वजन से कम होने पर उसे छोड़ दिया जाता या जला दिया जाता था. पुराने जमाने में औरतें भोग की वस्तु से ज्यादा कुछ न थीं. भारतीय समाज में कन्या को दान में देने की मान्यताएं आज भी मौजूद हैं. आजादी के बाद बदलते दौर के हिसाब से कानून बदले और नारी की स्थिति में बदलाव आया. कॉन्स्टिट्यूशन ने औरतों को भी इंसान माना और बराबरी से जीने का अधिकार दिया लेकिन समाज आज भी औरतों को इंसान मानने को तैयार नहीं. कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं जिन में औरतों को सिर्फ ऑब्जेक्ट ही समझा जाता है.
झांसी में एक औरत को उस के पति ने शारीरिक संबंध बनाने से मना करने पर तीसरी मंजिल से नीचे फेंक दिया. इस जोड़े ने 3 साल पहले मंदिर में सात फेरे ले कर एक दूजे का हाथ थामा था. 3 साल में ही दोनों के बीच का यह प्रेम संबंध एक डिजास्टर बन गया. पत्नी ने सैक्स के लिए मना किया तो पति ने उसे तीसरी मंजिल से नीचे फेंक दिया. फिलहाल गंभीर हालत में महिला को अस्पताल में भर्ती कराया गया है जहां उसका इलाज जारी है.
यह घटना मर्दवादी मानसिकता का एक उदाहरण है. शादीशुदा जोड़ों के बीच सैक्स संबंध जरूरी है लेकिन शादी का मतलब सिर्फ सैक्स की पूर्ति नहीं होता. सैक्स संबंध अगर दोनों पार्टनर की रजामंदी से बने तो यह दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज होती है लेकिन अगर सैक्स के लिए कोई एक पार्टनर तैयार न हो तो यह बलात्कार जैसा ही होता है.
कई बार पत्नी की मरजी न होने पर भी वह पति की भावनाओं का खयाल कर सैक्स के लिए अनुमति दे देती है लेकिन ऐसा बार बार होने पर पत्नी का सैक्स के प्रति रुझान कम होने लगता है. औरतों की इस समस्या को मर्द नहीं समझते और वे जबरदस्ती पर उतर आते हैं. पत्नी से संभोग करना पति अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है, इसलिए भारत में मैरिटल रेप आम बात है.
कई मामलों में मनमुटाव या किसी अन्य कारण से भी पत्नियां शारीरिक संबंध से दूरी बना लेती हैं जिस से पति तनाव में जीने लगते हैं. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार अगर किसी शादीशुदा जोड़े के बीच बिना उचित कारण के लंबे वक्त तक शारीरिक संबंध नहीं है और इसे ले कर पति तनाव में जी रहा है तो इसे मानसिक क्रूरता (मैंटल क्रूएल्टी) की श्रेणी में माना जा सकता है जो तलाक के लिए एक आधार बन सकता है.
पत्नी से सैक्स की पूर्ति नहीं होने के कारण पति मानसिक तनाव में चले जाते हैं और कानून इसे मानसिक क्रूरता मान भी लेता है लेकिन कानून की नजर में बालिग पत्नी के साथ उस की मरजी के खिलाफ सैक्स करना कोई अपराध नहीं है. क्या यह कानून का विरोधाभासी चरित्र नहीं है?
विद्या विश्वनाथन बनाम कार्तिक बालकृष्णन मामला
विद्या विश्वनाथन और कार्तिक बालकृष्णन की शादी 6 अप्रैल, 2005 को चेन्नई में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी. शादी के बाद दोनों लंदन चले गए. विद्या ने लंबे समय तक बिना कोई कारण बताए कार्तिक से शारीरिक संबंध नहीं बनाए. इस से कार्तिक मानसिक तनाव में जीने लगा. आखिरकार कार्तिक ने चेन्नई की फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर कर दी और पत्नी ने काउंटरक्लेम दायर कर शादी को बनाए रखने की मांग की. इस के अलावा विद्या ने कार्तिक के परिवार पर भी आरोप लगाए लेकिन अदालत में वह अपने आरोप सिद्ध नहीं कर पाई.
फर्स्ट एडिशनल फैमिली कोर्ट, चेन्नई ने 11 अगस्त, 2011 को पत्नी के काउंटरक्लेम को मान लिया. ट्रायल कोर्ट ने विद्या द्वारा कई वर्षों तक शारीरिक संबंध से इनकार करने को मानसिकता क्रूरता नहीं माना और पति की तलाक याचिका खारिज कर दी.
कार्तिक ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील दायर की. हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला पलट दिया. हाईकोर्ट ने पत्नी का लंबे समय तक शारीरिक संबंध न बनाने को मानसिक क्रूरता मानते हुए कार्तिक के पक्ष में फैसला सुना दिया.
हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ विद्या सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई. 22 सितंबर, 2014 को जस्टिस के एस राधाकृष्णन और जस्टिस पी एस नरसिम्हा की बैंच ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा, ‘बिना पर्याप्त कारण के लंबे समय तक साथी को शारीरिक संबंध से वंचित रखना मानसिक क्रूरता है.’ यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विद्या को 3 माह के भीतर परमानेंट एलिमनी के रूप में 40 लाख रुपए देने का आदेश दिया.
सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से पहले क्रूरता को शारीरिक हिंसा से जोड़ा जाता था लेकिन इस केस के बाद शारीरिक संबंध से वंचित रखना भी तलाक का जायज आधार बन गया. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्रूरता का आकलन स्थापित नियमों के अनुसार नहीं बल्कि सिचुएशनल होता है.
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय पुरुषों के पक्ष में ही है. सवाल यह है कि पत्नी यदि 18 साल से ऊपर हो और किसी भी कारण से वह पति से शारीरिक संबंध बनाना न चाहती हो तो इसे मानसिक क्रूरता की श्रेणी में क्यों माना जाए? अगर यह मानसिक क्रूरता ही है तो बिना पत्नी की सहमति से सैक्स करना बलात्कार की श्रेणी में क्यों नहीं है?
शादी का मतलब बलात्कार का लाइसेंस?
अपनी पत्नी से जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाना कानूनी रूप से अपराध है लेकिन केवल तभी जब पत्नी की उम्र 18 वर्ष से कम हो. आईपीसी की धारा 375 कहती है कि यदि कोई पुरुष किसी महिला के साथ उसकी सहमति के बिना यौन संबंध बनाता है तो वह बलात्कार है लेकिन इस में 2 अपवाद हैं : एक, पुरुष अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है जिसकी उम्र 18 वर्ष से अधिक है तो वह बलात्कार नहीं माना जाएगा.
वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने की मांग लंबे समय से चल रही है. दिल्ली हाईकोर्ट ने 2022 में इस पर फैसला सुरक्षित रखा था लेकिन केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि इस से विवाह संस्था कमजोर और अस्थिर हो जाएगी. 2023 के आपराधिक कानून सुधार यानी बीएनएस की धारा 63 में भी यह अपवाद बरकरार है.
मैरिटल रेप के खिलाफ 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई जिस पर 2 जजों की बेंच को फैसला देना था लेकिन इस मामले में दोनों जजों के विचार बंट गए. एक जज ने बालिग पत्नी के साथ जबरदस्ती यौन संबंध को जायज माना दूसरे ने इसे बलात्कार माना.
2023 के एक मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था, ‘पति का पत्नी पर यौन अधिकार नहीं है, सहमति जरूरी है लेकिन अगर सहमति के बिना भी संबंध बने तो यह संवैधानिक तौर पर अपराध नहीं है.’
इस का मतलब है कि विवाह के बाद पत्नी की उम्र 18 वर्ष या अधिक होने पर उस की मरजी के कोई मायने ही नहीं. उस के साथ जबरदस्ती की जा सकती है. 18 साल से ऊपर की पत्नी के साथ बलात्कार भी करो तो कोई अपराध नहीं. हैरानी की बात यह है कि यह प्रावधान 1860 से चला आ रहा है.
बालिग पत्नी के साथ उस की मरजी के खिलाफ सैक्स संबंध बनाना अपराध है या नहीं, अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. सुप्रीम कोर्ट में मैरिटल रेप के खिलाफ कई याचिकाएं दायर हैं. यदि मैरिटल रेप पर सुप्रीम कोर्ट ने औरतों के पक्ष में फैसला दिया तो बालिग पत्नी के साथ भी जबरदस्ती संबंध बनाना बलात्कार माना जाएगा.
घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की धारा 3 के तहत वैवाहिक बलात्कार को घरेलू हिंसा के रूप में मान्यता दी गई है. पत्नी इस आधार पर अदालत में सुरक्षा या मुआवजा मांग सकती है लेकिन इस कानून में भी पत्नी की सहमति के बिना शारीरिक संबंध बनाए जाने को बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा गया.
दो लोगों के बीच शादी और सहवास के लिए आपसी सहमति जरूरी है. यदि पत्नी की मरजी के खिलाफ पति उस के साथ सैक्स करे तो इसे बलात्कार ही माना जाना चाहिए लेकिन भारतीय समाज में आज भी औरतों की मरजी के कोई मायने नहीं. मर्दवादी समाज आज भी औरतों को अपनी प्रॉपर्टी ही समझता है. कॉन्स्टिट्यूशन के प्रिएंबल में ही व्यक्ति की गरिमा की बात कही गई है लेकिन मैरिटल रेप के नाम पर भारतीय समाज में आज भी औरतों की गरिमा को तार तार किया जाता है.
मैरिटल रेप के मामले में कानून भी मर्दवादी मानसिकता के साथ खड़ा नजर आता है. ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय से उम्मीद है कि वह इस मर्दवादी मानसिकता को ध्वस्त करते हुए कानून में बदलाव करे और औरतों की गरिमा को बरकरार रखते हुए उन की सहमति/असहमति के महत्व को समझें. Bodily Autonomy.

Story In Hindi: बदलते एहसास- भाभी के तानों से गोकुल के आत्मसम्मान को चोट

Story In Hindi: भाभी के ताने अब गोकुल के आत्मसम्मान को चोट पहुंचा रहे थे. इस से गोकुल ने अब घर छोड़ने का फैसला कर लिया और घर से दूर रह कर गोकुल की जिंदगी में कुछ ऐसा बदलाव आया, जिस की किसी ने कल्पना भी न की होगी.

उठो लाट साहब, चाय पी लो. 7 बजने वाले हैं. मुझे बच्चों को स्कूल भी भेजना है.’’
उनींदे से गोकुल के कानों पर यह कर्कश आवाज पहुंची थी.
तभी दूसरी आवाज आती है, ‘‘गोकुल, उठ जा. रोज सुबह सुबह घर में कलह कराना तुझे अच्छा लगता है क्या?’’
गोकुल की नींद खुल गई थी. भाभी और मां के प्रवचन रोज की तरह आज भी उस के कानों में घुल रहे थे पर वह बेफिक्र सा पड़ा था.
मां की बात तो एकबारगी बरदाश्त भी कर लेता पर भाभी का इस तरह से उलाहना देना उसे कतई मंजूर न था. उस का जी करता कि कानों में कोई सीसा पिघला कर भर दे. जहां तक चाय की बात थी, उस ने कभी गरम चाय की डिमांड नहीं की थी. जैसी मिलती वैसी पी लेता. फिर उस के बिस्तर से उठ जाने से कौन से घर के काम फटाफट होने लगेंगे बल्कि और कलह हो जाएगी.
भाभी को वह फूटी आँखों नहीं सुहाता था. वह नहीं समझ पाती थी कि टूर एंड ट्रैवल्स और ट्रेकिंग का काम थका देने वाला होता है. बड़ा भाई कुछ कहना भी चाहता तो पत्नी के सामने उसका मुंह न खुलता था. एक तरह से वह पत्नी की बातों का मूक समर्थन करता था.
मां जानती थी कि मेरा बेटा बिलकुल नालायक तो नहीं लेकिन ऐसे बेटे को लायक भी तो नहीं कहा जा सकता जिस की शादी की चिंता ने ही उस को इतना परेशान कर दिया हो. कितनी कोशिश नहीं की थी मां ने. जगह जगह रिश्तेदारों से कहा था. चिह्न भेजा था पर कोई लड़की मिली ही नहीं.
एक समय था जब लड़के वालों की तरफ से शादी का प्रस्ताव आना लड़की वाले अपना सौभाग्य समझते थे लेकिन आज गोकुल जैसे कई लड़के इस कस्बे में हैं जिन्हें सुंदरता और बुद्धिमत्ता की कसौटी पर कसी जाने वाली तो क्या, साधारण रंग रूप वाली, घर गृहस्थी का ध्यान रखने वाली लड़कियां भी नहीं मिल रहीं. ऐसे में किस का दोष कहा जाएगा. लड़के का ही कहेगा न? काबिल होता तो क्यों न मिलती लड़की?
बदलते सामाजिक ताने बाने को गहराई से मापने वाले कितने हैं? कभी कभी मां भी उसे दोष देती. भाभी तो हमेशा पीछे ही पड़ी रहती. कई बार कहती, ‘‘पढ़ाई के दिनों में थोड़ा मेहनत कर ली होती और कोई छोटी मोटी सरकारी नौकरी भी मिल जाती तो आज शादी के लिए लड़की भी मिल जाती पर नहीं, लाट साहब को तो मौज मस्ती से फुरसत ही नहीं मिलती होगी. तुम्हारे बड़े भाई ने नहीं की पढ़ाई? तभी आज सरकारी नौकर हैं. पूरी गृहस्थी चलाने का दम भरते हैं.’’
गोकुल का बड़ा भाई सरकारी नौकरी में था और एक मध्य औसत वर्ग के परिवार का सा रहन सहन उसका था. शादी के लगभग 8 साल हो चुके थे. 2 बच्चे थे. मां का सपना था कि अब घर में छोटी बहू भी आ जाए पर लड़की की तलाश एक मुश्किल काम जान कर गोकुल ने शादी का इरादा छोड़ दिया था. मां अक्सर कहती, ‘‘शादी के बगैर वंश आगे कैसे चलेगा?’’

गोकुल बेपरवाह सा कह देता, ‘‘तु झे वंश चलाने की परवा है तो भाभी के बच्चे चलाएंगे न तेरा वंश. मेरी परवाह न कर. मेरा परिवार बहुत बड़ा है.’’ मां न समझ पाती थी इस बात को. यकीनन परिवार तो हम पति, पत्नी और उनके बच्चों से बनी इकाई को कहते हैं. ज्यादा से ज्यादा इस में माता पिता को भी जोड़ लिया लेकिन समाज को परिवार समझने की भूल हम ने कभी की ही नहीं. अगर ऐसा होता तो क्या समाज में प्रेम ही प्रेम नहीं होता. मगर गोकुल की विचारधारा कुछ ऐसी ही थी. बचपन से ही वह प्रकृति प्रेमी रहा था. पहाड़ में जन्म हुआ. आंखें खोलते ही सामने हरे भरे खेत, बर्फ से ढके पहाड़ देखे तो उन्हीं से मोहब्बत कर बैठा और इस के बाद कभी किसी लड़की की मोहब्बत में गिरफ्तार होने का मौका ही नहीं आया.
वह सोच सोच कर परेशान था कि भाभी उसे निठल्ला क्यों कहती है. न वह भाई भाभी पर बोझ था, न माता पिता पर. जो कुछ भी कमाता था, उस का एक नियत हिस्सा घर खर्च चलाने के लिए मां के हाथ पर रखता. इस बार जब उस ने मां के हाथ में 15 हजार रुपए रखे तो मां ने कहा था, ‘‘मु झे नहीं. अपनी भाभी को दिया कर ये पैसे. घर तो वही चलाती है.’’ पर गोकुल की कोशिश भाभी से दूर रहने की ही होती. वह कहता, ‘‘तू ही दे देना भाभी को.’’

पहाड़ों से टक्कर लेने वाले गोकुल का दिल भाभी से डरता था क्योंकि पहाड़ उसे मुकाबला करने का हौसला देते जबकि भाभी अपने व्यंग्यबाणों से हमेशा उसे नीचा दिखाती और उस के हौसलों को पस्त करती थी. कल की ही तो बात है. जैसे ही वह ग्रुप को ट्रेकिंग करा कर 2 दिनों बाद थका हारा घर लौटा था तो भाभी ने ठंडा दालभात प्लेट में डाल कर डाइनिंग टेबल पर रख कर जोर से कहा था, ‘‘आ गए लाट साहब हिमालय की यात्रा से. पेट पूजा कर लो.’’
यह अपमान बहुत भारी था. मां को भी बुरा लगा था पर बहू ने उसे अपने मोहपाश  के जाल में ऐसा उलझाया था कि वह छोटे बेटे की सुध लेना ही भूल गई. दरअसल, मां अपने बेटे की शादी को ले कर बहुत परेशान थी. हर मां की तरह उस का भी अरमान था कि बेटे की शादी हो जाए और मां की जिम्मेदारी पूरी हो जाए पर बहुत हाथ पैर मारने पर भी छोटी बहू नहीं मिली.
छोटी बहू की तलाश अब गोकुल के आत्मसम्मान को चोट पहुंचा रही थी. यों तो वह हमेशा ही कम बोलता था लेकिन इधर कुछ दिनों से वह ज्यादा चुप था. उस की यह चुप्पी आने वाले तूफान की चेतावनी सी लगने लगी थी. यह सच है कि विरोधी पर हथियार का प्रयोग अगर सही समय पर न करो तो वह खुद पर ही वार करने लगता है. कितना अपमान सहा था गोकुल की चुप्पी ने? चुप तो वह आज भी रहेगा पर अपने ही तरीके से वार करेगा.
आखिर चार दिनों के बाद उस ने हाथ जोड़ कर मां से अपना मंतव्य बता दिया, ‘‘मैं ने शहर में पर्यटन कार्यालय के पास एक छोटे से कमरे में अपने रहने का इंतजाम कर लिया है. मेरी वजह से आप सब को जो तकलीफ होती रही, वह अब नहीं होगी.’’
मां तो मां थी. यह सुनते ही हताश हो गई. कई बातें उस के दिमाग में घूमने लगीं, गोकुल के खाने पीने का इंतजाम वगैरह.
पर आज गोकुल किसी की सुनने वाला नहीं था. उसका व्यवहार अपेक्षाकृत संयत था. मां के दोनों कंधों पर हाथ रखते हुए बोला, ‘‘मैं पास ही शहर में हूं. यहां से मात्र दो तीन किलोमीटर दूर. जब मेरी याद आए, मुझे फोन कर लेना. मैं मिलने चला आऊंगा या बुला लूंगा.’’
भाभी मन ही मन गोकुल के इस फैसले से खुश थी. बस, मन में थोड़ी सी कुचकुचाट थी कि महीने के बंधे हुए 15 हजार रुपए अब नहीं मिलेंगे और इस के अलावा भी समय समय पर गोकुल खाने पीने व घर का जरूरी सामान ले कर आ जाता था. वह सब भी बंद हो जाएगा. गोकुल महीने के 15-20 दिन तो पर्यटकों के साथ टूर पर रहता था. घर में उसके खाने पीने का खर्चा ही क्या रहा? कई बार उस के आने की खबर नहीं होती थी तो भाभी खाना बचा कर भी नहीं रखती थी.
पिंडारी ग्लेशियर, कफनी ग्लेशियर, सुन्दरढूंगा, मिलम ग्लेशियर, पंच केदार, मध्य महेश्वर, खलिया टॉप, औली और भी न जाने कहां कहां जाता था वह टीम को ले कर और टेंट लगा कर कई दिनों तक वहीं ठिकाना बना लेता. जब भी वह एडवेंचर की दुनिया की तरफ बढ़ता, दिनरात भूल जाता लेकिन संयुक्त परिवार में यह संभव नहीं था. एक 27-28 साल का युवा भाभी की डांट खाए, जरूर उस के मन को आघात पहुंचता था.
अगस्त का महीना था. वह अपने नए ठिकाने पर पड़ा हुआ था. अब जल्दी जागने की जरूरत नहीं थी. पिछले 2-3 दिन से वह महसूस कर रहा था कि आजादी का सुख कितना बड़ा होता है. तभी दो तीन विदेशी लोगों का ग्रुप उसे ढूंढते हुए वहां तक पहुंचा और बोला कि उन्हें पिंडारी ग्लेशियर जाना है. पहाड़ों में बहुत बरसात हो रही थी. गोकुल ने उन्हें समझाया कि बरसात का समय है और यों भी पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम का कोई पता नहीं रहता. वे अपने इस एडवेंचर टूर को एक महीने के लिए स्थगित कर दें या कहीं और चलने को तैयार रहें लेकिन विदेशी ग्रुप पिंडारी जाने की जिद पर अड़ा रहा. एक बोला, ‘‘हम इतनी दूर से आए हैं. एक महीने का इंतजार कैसे कर लें? हमारे वीजे की भी एक समय सीमा है.’’
ऐसे में गोकुल को उनके साथ जाने का इंतजाम करना ही था. यही असली एडवेंचर था, आपदा विभाग ज्यादा सक्रिय नहीं था, मोबाइल सिग्नल पहाड़ों में नहीं मिलते थे. लोकल लोगों की मदद से पुल बना कर पर्यटक पिंडर नदी पार कर लेते थे.

हिमालय के लोगों और उन की संस्कृति को जानना इन विदेशी घुमक्कड़ों की चाहत होती थी. साथ ही, गोकुल भी बहुत कुछ सीखता था. पीठ पर सामान बांध कर सुबह सुबह ट्रेकिंग वाले स्थान पर पहुंच गए. 5 किलोमीटर ट्रेकिंग की और चाय पी. थोड़ी देर रुक कर प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लिया. फोटोग्राफी के शौकीन लोगों ने कुछ तस्वीरें लीं. तसवीरें शोध में भी अहम भूमिका निभाती हैं और फिर आगे चल कर बेस कैंप में खाना खाया. थके और भूखे होने पर यह साधारण सा खाना भी इतना स्वादिष्ठ लगता था, जैसा किसी बड़े बड़े होटल का खाना भी नहीं. विशेष तौर पर बनाया गया पहाड़ी खाना पर्यटकों के लिए आकर्षक होता था. यात्राओं से तन और मन अकसर दोनों प्रफुल्लित होते हैं और सेहत तो बढ़िया रहती ही है. पुनर्जागरण काल के बाद दुनिया में अनेक तरह की क्रांतियां आईं. यह एक नई क्रांति का दौर था, जहां रोजगार जैसी समस्याओं से जूझने वाले युवा शादी के बंधन से दूर रहना चाहते थे.
वहीं लड़कियों में भी पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होने की होड़ मची थी. बड़ा न सही, छोटा मोटा कोई भी काम और रोजगार जरूर करना चाहती थीं ताकि आत्मनिर्भर रहें और उन की इस जिद ने उन के सपनों को भी विस्तृत आकाश दिया. ऐसे में जब आकांक्षाएं बड़ी हो जाएं तो जीवनसाथी का चुनाव काफी कठिन हो जाता है. दोनों ही तरफ से विवाह जैसी संस्था को चुनौती मिलनी शुरू हो गई थी. गोकुल के ट्रेकिंग ग्रुप में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने लगी थी जिन्होंने ताउम्र अकेले रहने का फैसला कर लिया था और ये सब एक दूसरे के अच्छे दोस्त थे. इन की रुचि एक थी. इन की मंजिल भी एक थी.

पारिवारिक जिम्मेदारियों में फंसा आदमी ज्यादा दिनों तक घर से बाहर रहने की कहां सोच सकता है लेकिन इन लोगों की जिंदगी कई मानों में शानदार थी. सबसे ज्यादा समझने वाली बात यह कि ये केवल जिंदगी का आनंद ही नहीं ले रहे थे बल्कि प्रकृति को संरक्षण भी दे रहे थे. पर्यटक अपने एक या दो बच्चों के साथ पहाड़ घूमने आते और बच्चे कार के अंदर से चिप्स के रैपर, कोल्ड ड्रिंक की खाली बोतल सड़क से नीचे जंगल में फेंक देते.
बहुत कुपित होता था गोकुल यह देख कर कि ये लोग एक बच्चे तक को नहीं संभाल पाते, उसे शिष्टाचार नहीं सिखा पाते. उस की टीम जंगलों से कूड़ा करकट उठा कर उसे ठिकाने लगाती. जहां जहां ये लोग जाते, बांस, बुरांश अशोक, अतीस, खूबानी, काफल जैसे फलों के पेड़ लगाते. अपने साथ मिट्टी में लपेटे हुए बीज और गुठलियां ले जाते और इन्हें दूर दूर बिखेर देते. अगली यात्रा के दौरान जब नन्हे नन्हे पौधे मुस्कुराते हुए दिखाई देते तो गोकुल और इन सब की खुशी की सीमा न रहती. खुशियों का विस्तृत आकाश मिल जाता सब को इन जानदार नन्हे नन्हे पौधों को देख कर.
उस के साथियों में से एक था सागर. उम्र में गोकुल से काफी छोटा पर अपने नाम के अनुरूप ही विशाल दिलवाला और घूमने का अथाह शौकीन. उस ने बद्रीनाथ जाने की जिद पकड़ी थी पर गोकुल और कुछ लोगों का कहना था कि अभी यात्रा सीजन के आरंभ में भीड़ को देखते हुए जाने का विचार सही नहीं है. बरसात के बाद जाएंगे.
सागर मान गया और बरसात भी बीत गई. चारधाम में भीड़भाड़ अब कम होने लगी थी क्योंकि अधिकतर श्रद्धालु कपाट खुलने के चंद महीनों के दौरान ही तीर्थयात्रा के लिए उमड़ पड़े थे. गोकुल ने अपनी छोटी सी टीम, जिस में सागर भी शामिल था, के साथ बद्रीनाथ जाने का प्रोग्राम बनाया.
मन से वह आध्यात्मिक प्रवृत्ति का था पर उस का धर्म विचित्र था. मंदिरों में जा कर घंटों पूजापाठ करना या भीड़ लगाना उस का ध्येय नहीं था. उस के अपने कुछ आदर्श थे जिन का पालन कर वह अंतर्मन की शांति पाता. समूह के कई लोग बद्री धाम के दर्शन करना चाहते थे इसलिए एक सुबह ये लोग ट्रैवलर टैंपो से निकल गए. कुल मिलाकर 15 लोग थे. इन में रूपा भी थी. रूपा पिछले दो तीन सालों से गोकुल की टीम से जुड़ी थी. वह गोकुल की जिंदगी से भी जुड़ना चाहती थी. एक दो बार गोकुल को इस बात का एहसास दिलाने की कोशिश भी की थी उस ने. गोकुल ने अपने बंजारेपन का हवाला देते हुए हर बार उस के अरमानों पर पानी फेर दिया.

बद्रीनाथ दर्शन के बाद वे लोग माणा की तरफ बढ़े जो यहां से लगभग 2 किलोमीटर आगे था. चीन तिब्बत सीमा से लगा यह भारत का आखिरी गांव है जो अब पहला गांव कहलाने लगा है. माणा से वसुधारा और स्वर्गारोहिणी तक ट्रेकिंग की जाती है. कैंप के 15 लोगों में से 11 तो स्वर्गारोहिणी तक जाने का जिगर रखते थे लेकिन 4 लोग बेस कैंप वसुधारा तक ही जाने की हिम्मत कर पाए. शारीरिक परेशानी की वजह से रूपा भी वसुधारा तक ही जाना चाहती थी पर गोकुल के साथ की चाहत उस के पैरों को आगे धकेल रही थी. रास्ते में वह थक कर जानबूझ कर रुक जाती ताकि गोकुल की नजरें इनायत हों.

उसे बैठे हुए देख कर गोकुल पूछता, ‘‘रूपा, तबीयत ठीक नहीं क्या? अगर कोई परेशानी है तो बेस कैंप में ही रुक जाओ.’’
‘‘नहीं, मैं आप के साथ चलूंगी. मेरे मन की बात तो आप समझ नहीं पाए लेकिन साथ चलने की इजाजत तो दे सकते हैं.’’
‘‘सम झा करो, रूपा. मैं ने तुम्हें पहले भी सम झाया है कि जो मोहब्बत और चाहत हम दोनों के बीच में अभी है, उस की शादी के बाद उम्मीद मत करना. शादी के बाद जीवन बिलकुल बदल जाता है. किसी भी शादीशुदा जोड़े को ले कर सोच लो. क्या तुम रोज ट्रेकिंग में इस तरह मेरे साथ आ पाओगी. मेरा रोज रोज घर से बाहर रहना ही तुम्हें खलने लगेगा और फिर शुरू होगी चिकचिक बाजी. इसलिए, शादी जैसी बात को मन से निकाल दो.’’
वह अपनी कहानी रूपा को सुनाता कि उस की मां ने कितनी कोशिश की थी शादी की लेकिन लड़कियों के अजब नखरे थे. समय रहते अगर रूपा उसे मिल गई होती तो जरूर शादी कर लेता लेकिन अब तो स्वच्छंद रहने की सी आदत हो गई है. अपने भाई भाभी के  झगड़ों के बारे में रूपा को बताता. बताता कि कैसे घर में सिर्फ भाभी का ही राज चलता है, न माँ का, न बड़े भाई का.
अचानक रूपा का हाथ पकड़ कर वह कहता, ‘‘जरूरतें तुम्हारी भी हैं, मेरी भी. बिना किसी बंधन में बंधे हम उन्हें पूरा करेंगे. ये जो पेड़ पौधे हैं, ये पशु पक्षी हैं, ये सब हमारे बच्चे हैं. हम इन को पालेंगे. इन की देखभाल करेंगे. इस से बड़ा सुख और कहीं नहीं.
खैर, देर सवेर रूपा भी इस सचाई को समझ गई और अब वह बगैर शादी के ही खुश थी. लगभग 8 दिनों बाद वे लोग वापस घर लौटे. ज्यादा दौड़ भाग की वजह से एक दिन गोकुल बीमार पड़ गया. किसी ने बड़े भाई को फोन कर बताया. वह ऑफिस में था. घर पहुंच कर मां को साथ ले कर गोकुल के कमरे में पहुंचा. वहां जा कर देखा तो दंग रह गया. जिस गोकुल को घर में इतनी घुड़कियां मिलती थीं, बात बात पर अपनी भाभी की दस बातें सुननी पड़ती थीं, उस से मोहब्बत करने वाले सैकड़ों लोग वहां पर खड़े थे. यह देख कर मां की आंखें भीग गईं. उसे गोकुल के शब्द याद आ रहे थे, ‘मां, मेरा परिवार तो बहुत बड़ा है. देखेगी न तो आंखें फटी की फटी रह जाएंगी.’
सामने दीवार पर ‘ट्रेक विद गोकुल’ का शानदार चमचमाता बोर्ड लगा था जो शाम घिरने के साथ रोशनी की जगमगाहट में और ज्यादा चमकदार प्रतीत हो रहा था.
स्ट्रेस और गर्मी से होने वाली परेशानी थी जो कुछ ही दिनों में ठीक हो गई. गोकुल का काम अब बढ़िया चल गया था. कर्णप्रयाग से आगे चोपता में उस की टीम के साथी विशन की जमीन थी, उसी का आइडिया था कि वे लोग वहां पर पर्यटकों के लिए टेंट और होमस्टे की व्यवस्था करें तो रोजगार भी बढ़िया चलेगा और लोगों को सुविधा भी होगी.

गोकुल को भी आइडिया पसंद आया तो उस ने इस शहर को छोड़ कर उसे अपना ठिकाना बदलने की सोची. इतना बड़ा फैसला लेने से पहले एक बार वहां जा कर व्यवस्था देख लेने के इरादे से वह कुछ लोगों को ले कर चल दिया. विशन पहले ही वहां पहुंच चुका था. पांच छह कमरों का छोटा सा घर फिलहाल ले चुके थे. विशन ने खाना बनाने के लिए गैस, कुछ बर्तन और राशन का इंतजाम भी कर दिया था. टीम जब चोपता पहुंची तो सब की खुशी का ठिकाना न रहा.
रूपा उछल कर बोली, ‘‘अब यही होगा अपना परमानेंट ठिकाना.’’ तभी टीम का एक मेंबर उस से पूछने लगा, ‘‘क्या तुम्हारे पेरेंट्स तुम्हें अलाउ कर देंगे?’’
‘‘हां क्यों नहीं, जो लड़कियां जॉब करती हैं, क्या वे घर से अलग नहीं रहतीं? मैं ने घर में बता दिया है कि मुझे माउंटेनियरिंग पर प्रशिक्षण लेना है और मैं आगे चोपता में ही रहूंगी.’’
फिर सवाल आया खाना बनाने का. इतने सारे लोगों के लिए खाना बनाने की व्यवस्था. क्या किसी को किराए पर रखना होगा? गोकुल इस सवाल से जूझ ही रहा था कि टीम के उत्साही युवक युवतियों ने फटाफट आलू छीलने शुरू कर दिए. दबंग सी दिखने वाली मोना ‘बहुत भूख लगी है यार’ कहते हुए आटे का पैकेट फाड़ कर परात में आटा डाल कर उसे गूंदने लगी है. गोकुल ने सोचा भी नहीं था कि मोना इस तरह घर का काम भी करती होगी. एक घंटे के अंदर खाना तैयार था. समीर एक कोने पर बैठा हुआ सलाद के लिए प्याज, टमाटर और खीरा काट लिया.
हंसते हंसते सभी ने खाना खाया. कुछ लोगों को प्लेट मिलीं, कुछ लोगों को पत्तल लेकिन इस से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था. गोकुल हंसते हुए बोलता है, ‘‘जो पत्तल में खा रहे हैं, वे इसे गाय के बर्तन में डाल देंगे और प्लेट में खाने वाले अपनी प्लेट खुद धोएंगे. हंसी का एक ठहाका गूंजा और चोपता की शांत वादी में देर तक विचरण करता रहा. इस से सुंदर परिवार का एहसास और क्या हो सकता है. शायद, इन सभी लोगों के मन में यह विचार एक साथ उठ रहा था.
3-4 दिन यहां रहते हुए हो गए थे. गोकुल टीम के कुछ लोगों के साथ आसपास की जगह भी एक्सप्लोर कर आया था. अब उसे इस बात का एहसास हो गया था कि यहां रहने में किसी भी प्रकार की कोई अड़चन नहीं आने वाली. रजिस्ट्रेशन और दूसरी औपचारिकताएं विशन पूरी कर रहा था. खाना खाने के बाद बर्तन धोने का काम भी ये युवा बहुत ही खुशी से कर लेते. जलवायु परिवर्तन का असर पहाड़ी क्षेत्रों में भी साफ दिखाई दे रहा था. अक्टूबर का मौसम अपेक्षाकृत गर्म था और नवंबर का सुहावना लग रहा था.

चारधाम यात्रा समाप्ति को आ गई थी. पर्यटकों की भीड़ भाड़ अपेक्षाकृत कम हो गई थी. अब आने वाले महीने में ओली में बर्फ पड़ने पर स्कीइंग की प्रबल संभावना बनी हुई थी. गोकुल का ध्यान इस ओर भी था. अपनी टीम को काम समझा कर 3-4 लोगों को साथ ले कर वह वापस शहर लौट आया. अब कुछ दिनों में इन लोगों को सभी का सामान ले कर चोपता जाना था. गोकुल के पास जरूरत भर का थोड़ा सा सामान था जो लगभग पैक हो चुका था. उस से जुड़े कई लोग उदास दिखाई दे रहे थे क्योंकि उन सभी का चोपता जाना संभव
नहीं था. उन्हें वहीं रह कर बिजनैस में सहयोग करना था और पर्यटकों को ले कर जाना था.
गोकुल ने महसूस किया कि जाने से पहले एक बार मां और भाई से मिलना तो जरूरी था. यही सोच कर उस के कदम पाइन हाउस की तरफ बढ़ गए. उस के सभी साथी उस के पीछे हो लिए. वहां पहुंच कर गोकुल ने घंटी बजाई तो भाभी ने दरवाजा खोला. लगभग 7 वर्षों बाद गोकुल को सामने खड़ा देख कर वे चौंक गईं और कुछ पलों के लिए जड़ हो गईं.
गोकुल का कमजोर दिखने वाला चेहरा आज हृष्ट पुष्ट था, उस में लालिमा थी. होश संभालने पर भाभी ने प्रश्नवाचक दृष्टि उस की ओर गड़ाई और औपचारिकता वश उसे गेट के अंदर आने को कहा. गोकुल ने पीछे मुड़ कर देखा तो एक हुजूम वहां पर आ खड़ा हुआ, जिस में उस के हमउम्र युवक युवतियां और कई छोटे बड़े बच्चे भी शामिल थे.
‘‘प्रणाम भाभी, मां कहां हैं?’’
‘‘पड़ोस में गई हैं समय काटने.’’
‘‘ठीक है. मैं मां के आने तक यहीं पर इंतजार करता हूं.’’
‘‘चाहो तो अंदर बैठ सकते हो.’’
‘‘मेरा इतना बड़ा परिवार समा जाएगा क्या आप के घर में?’’
गोकुल ने अपने साथियों को बाहर ही खड़े रहने का इशारा किया और मां के कमरे की तरफ बढ़ा.
‘‘बच्चे कहां हैं, दिख नहीं रहे?’’
‘‘दोनों की शादी हो गई. नितिन यहीं दो घर छोड़ कर रहता है और जतिन दानपुर महल्ले में,’’ यह कहते हुए भाभी थोड़ा शर्मिंदा थीं. उन के अपने बच्चे ही उन से दूर थे. उन्हें गोकुल का कद एक वटवृक्ष सा महसूस हो रहा था जो दूर दूर तक फैले अपने लंबे चौड़े परिवार के साथ खड़ा था. Story In Hindi.

Romantic Story: बंद आकाश, खुला आकाश

Romantic Story: लेखक – भुवनचंद्र जोशी – सरिता, बीस साल पहले, दिसंबर (प्रथम) 2005 – अपने शौक के चलते मैं ने एक तोते के बच्चे को खरीद कर पिंजरे में बंद कर दिया लेकिन कुछ समय बाद जब तोतों के  झुंड को देख उस तोते ने उड़ने की कोशिश की तो पिंजरे में उस की छटपटाहट व बेचारगी ने हम सब को विचलित कर दिया.
एक दिन मैं तोते का बच्चा खरीद कर घर ले आया. उस के खाने पीने के लिए 2 कटोरियां पिंजरे में रख दीं. नया नया कैदी था, इसलिए अकसर चुप ही रहता था. हां, कभी कभी  टें, टें की आवाज में चीखने लगता.
घर के लोग कभी कभी उस निर्दोष कैदी को छेड़ कर आनंद लेते लेकिन खाने के वक्त उसे भी खाना और पानी बड़े प्यार से देते थे. वह एक दो कौर कुट-कुटा कर, बाकी छोड़ देता और टें, टें शुरू कर देता. फिर चुपचाप सींखचों से बाहर देखता रहता.
उसे रोज इंसानी भाषा बोलने का अभ्यास कराया जाता. पहले तो वह ‘हं, हं’ कहता था जिस से उसकी समझ में न आने और आश्चर्य का भाव जाहिर होता पर धीरे धीरे वह आमाम, आमाम कहने लगा.
अब वह रोज समय पर खाना या पानी न मिलने पर कटोरी मुंह से गिरा कर संकेत भी करने लगा, फिर भी कभी कभी वह बड़ा उदास बैठा रहता और छेड़ने पर भी ऐसा प्रतिरोध करता जैसे चिंतन में बाधा पड़ने पर कोई मनीषी क्रोध जाहिर कर फिर चिंतन में लीन हो जाता है.
एक दिन तोतों का एक बड़ा झुंड हमारे आंगन के पेड़ों पर आ बैठा. उन की टें, टें से सारा आंगन गूंज उठा. मैं ने देखा कि उन की आवाज सुनते ही पिंजरे में मानो भूचाल आ गया. पंखों की निरंतर फड़फड़ाहट, टें, टें की चीखों और चोंच के क्रुद्ध आघातों से वह पिंजरे के सींखचों को जैसे उखाड़ फेंकना चाहता था. उस के पंखों के टुकड़े हवा में बिखर रहे थे. चोंच लहूलुहान हो गई थी. फिर भी वह उस कैद से किसी तरह मुक्त होना चाहता था.  झुंड के तोते भी उसे आवाज दे कर प्रोत्साहित करते जैसे लग रहे थे.
झुंड के जाने के बाद उस का उफान कुछ शांत जरूर हो गया था लेकिन क्षत विक्षत उस कैदी की आंखों में गुस्से की लाल धारियां बहुत देर तक दिखाई देती रहीं. उसकी इस बेचारगी ने घर के लोगों को भी विचलित कर दिया और वे उसे मुक्त करने की बात करने लगे, लेकिन बाद में बात आई गई हो गई.
कुछ दिनों बाद की बात है. एक दिन मैं ने इस अनुमान से उस का पिंजरा खोल दिया कि शायद वह उड़ना भूल गया होगा. द्वार खुला, वह धीरे धीरे पिंजरे से बाहर आया. एक क्षण रुक कर उस ने फुरकी ली और आंगन की मुंडेर पर जा बैठा. उस के पंखों और पैरों में लड़खड़ाहट थी.
फिर भी वह अपनी स्वाभाविक टें, टें के साथ एक डाल से दूसरी डाल पर फुदकता जा रहा था. उस के बाद वह पहाड़ी, सीढ़ीदार खेतों पर बैठता उड़ता हुआ घर से दूर होने लगा.
अपनी भूल पर पछताता मैं और गांव भर के बच्चे तोते के पीछे पीछे उसे पुचकार कर बुलाते जा रहे थे और वह हम से दूर होता जा रहा था. मैं ने गौर किया कि उस की उड़ान में और तोतों जैसी फुरती नहीं थी. उस की इस कमी को लक्ष्य कर मुझे शंका होने लगी कि अगर वह लौटा नहीं तो न तो अपने साथियों के साथ खुले आकाश में उड़ पाएगा और न ही अपना दाना जुटा पाएगा.
तोते को भी जैसे अपनी लड़खड़ाहट का एहसास हो चुका था. इसीलिए कुछ दूर जाने पर वह एक पेड़ की डाल पर बैठा ही रह गया और उसे पुचकारते हुए मैं उस के पास पहुंचा तो उस ने भी डरते झिझकते अपने आप को मेरे हवाले कर दिया.
काश, उस ने अपनी लड़खड़ाहट को अपनी कमजोरी न मान लिया होता तो वह उसी दिन नीलगगन का उन्मुक्त पंछी होता. मगर वह अपनी लड़खड़ाहट से घबरा कर हिम्मत हार बैठा और फिर से पिंजरे का पंछी हो कर रह गया.
करीब साल भर बाद, एक दिन फिर उस के उड़ने की जांच हुई. अब की बार खुले में पिंजरा खोलने का जोखिम नहीं लिया गया. घर की बैठक में 2 बड़ी जालीदार खिड़कियों को छोड़ कर बाकी रास्ते बंद कर दिए गए. पिंजरा खोला गया. कुछ दूर खड़े हो कर हम सब उसे ही देखने लगे. पहले वह खुले द्वार की ओर बढ़ा. फिर रुक कर गौर से उसे देखने लगा.
उस ने एक फुरकी ली लेकिन द्वार की ओर नहीं बढ़ा. हमें लगा कि हमारे डर से वह बाहर नहीं आ रहा है. हम सब ओट में हो कर उसे देखने लगे लेकिन वह दरवाजे की तरफ फिर भी नहीं बढ़ा. कुछ देर बाद वह दरवाजे की ओर बढ़ा जरूर लेकिन एक निगाह बाहर डाल कर फिर पिंजरे में मुड़ गया. फिर पिंजरे से निकल कर बाहर आया. हम सब उत्सुकता से उसे ही देख रहे थे. उस ने एक लंबी फुरकी ली, जैसे उड़ने से पहले पंखों को तोल रहा हो. वह पहली मुक्ति के समय की अपनी बेबसी को शायद भूल गया था.
उस ने दो तीन जगह अपने पंखों को चोंच से खुजलाया और  झटके से पंखों को फैलाया कि एक ही उड़ान में वहां से फुर्र हो जाए लेकिन पंख केवल फड़फड़ा कर रह गए. वह चकित था. उस ने एक उड़ान भर कर पास के एक टीले तक पहुंचना चाहा, लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही जमीन पर गिर पड़ा और फड़फड़ाने लगा. उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसे हो क्या गया है. वह बार बार उड़ने की कोशिश करता और हर बार मुंह की खाता.
अंत में, थका हारा पिंजरे की परिक्रमा करने के बाद वह द्वार पर आ रुका. उस ने एक निराश नजर अपने चारों ओर डाली और सिर  झुका कर धीरे धीरे पिंजरे के अंदर चला गया. मुड़ कर एक बार फिर ललचाई नजरों से उस ने पिंजरे के खुले द्वार को निहारा और हताशा से मुंह फेर लिया. पिंजरे में अपनी चोंच को पंखों के बीच छिपा कर आंख मूंद खामोश बैठ गया. अब चाह कर भी वह उस दिन पिंजरे को छोड़ कर नहीं जा सकता था.
वह शायद पछता रहा था कि मैं ने उस दिन उड़ जाने का मौका क्यों खो दिया. काश, उस दिन थोड़ी हिम्मत कर के मैं उड़ गया होता तो फिर चाहे मेरा जो होता, इस गुलामी से लाख गुना बेहतर होता, पर अब क्या करूं? उस ने मान लिया कि मुक्त उड़ान का, खुले आकाश का, बागों और खेतों की सैर का, प्रकृति की ममतामयी गोद का और नन्हे से अपने घोंसले का उस का सपना भी उसी की तरह इस पिंजरे में कैद हो कर रह जाएगा और एक दिन शायद उसी के साथ दफन भी हो जाएगा.
मुझे लगा जैसे आज उसका रोम रोम रो रहा है और वह पूरी मानव जाति को कोसते हुए कह रहा है- ‘यह आदमी नामक प्राणी कितना स्वार्थी है. खुद तो आजाद रहना चाहता है पर आजाद पंछियों को कैद कर के रखता है. ऊपर से हुक्म चलाता है, यह जताने के लिए कि कोई ऐसा भी है जो उस के इशारों पर नाचता है. मुझे कैद कर दिया पिंजरे में. ऊपर से हुक्म देता है, यह बोलो, वह बोलो. बोल दिया तो ‘शाबाश’ कहेगा, लाल फल खाने को देगा. न बोलो तो डांट पिलाएगा.
‘मुझे नहीं सीखनी इंसान की भाषा. खुद तो बोल बोल कर इंसानों ने इंसानियत का सत्यानाश कर रखा है और हमें उन के बोल बोलने की सीख देता है. कहां बोलना है, कैसे बोलना है और कितना बोलना है, यह इंसान अभी तक समझ नहीं पाया. इसे इंसान सम झ लेता तो बहुत से दंगे फसाद,  झगड़े और उपद्रव खत्म हो जाते.
‘चला है मुझे सिखाने, मेरी चुप्पी से ही कुछ सीख लेता कि दर्द अकेले ही सहना पड़ता है. फिर चीख पुकार क्यों? इतना भी इंसान की समझ में नहीं आता. बहुत श्रेष्ठ समझता है अपने आप को. शौक के नाम पर पशु पक्षियों को कैद कर के उन पर हुक्म चलाता है और कहता है, ‘पाल’ रखा है.
‘कुत्तेबिल्ली इसलिए पालता है कि उन पर धौंस जमा सके. दुनिया को दिखाना चाहता है कि देखो, ये कैसे मेरा हुक्म बजा लाते हैं. कैसे मेरे इशारों पर जीते मरते हैं. हुक्म चलाने की, शासन करने की, अपनी आदम इच्छा को आदमी न जाने कब काबू कर पाएगा? इसीलिए तो निरंकुश घूम रहा है सारी सृष्टि में.
‘इंसान मिलजुल कर क्या खाक रहेगा, जबकि इसे दूसरा कोई ऐसा चाहिए जिस पर यह हुक्म चलाए. जब तक लोग हैं तो लोगों पर राज करता है. लोग न मिलें तो हम पशु पक्षियों पर रोब गांठता है. जब लोगों ने हुक्म मानने से यह कहते हुए मना कर दिया कि जैसे तुम, वैसे हम. तो फिर तुम कौन होते हो हम पर राज
करने वाले? तब शामत हम सीधे साधे पशु पक्षियों पर आई. किसी ने मेरी बिरादरी को पिंजरे में डाला तो किसी ने प्यारी मैना को. किसी ने बंदर को धर पकड़ा तो किसी ने रीछ की नाक में नकेल डाल दी.
‘इंसान है कि हमें अपने इशारों पर नचाए जा रहा है. हमें नाचना है. हमारी मजबूरी है कि हम इंसान से कमजोर हैं. हमारे पास इंसान जैसा शरीर नहीं. हमारे पास आदमी जैसा फितरती दिमाग नहीं. आदमी जैसा सख्त दिल नहीं. हम आदमी जैसे मुंहजोर नहीं. इसीलिए हम बेबस हैं, लाचार हैं और इंसान हम पर अत्याचार करता चला आ रहा है.
काश, इंसान में यह चेतना आ जाए कि वह किसी को गुलाम बनाए ही क्यों? खुद भी आजाद रहे और दूसरे प्राणियों को भी आजाद रहने दे. जैसे जैसे ऐसा होता जाएगा वैसे वैसे यह दुनिया सुघड़ होती जाएगी, सुंदर होती जाएगी, सरस होती जाएगी. जब आदमी के ऊपर किसी का शासन होगा तब उसकी समझ में आएगा कि आजाद रहने और आजाद रहने देने का आनंद क्या है, बंद आकाश और खुले आकाश का अंतर क्या है? तब आदमी महसूस करेगा कि जब वह हम पशु पक्षियों को अपना गुलाम बनाता है तो हम पर और हमारे दिल पर क्या गुजरती है.’
तोते की टें…टें की आवाज ने मेरी तंद्रा भंग कर दी. मैं  झटके से उठा. खूंटी पर से तोते का पिंजरा उतारा और चल पड़ा  झुरमुट वाले खेतों की ओर.
खेत शुरू हो गए थे. पकी फसल की बालियां खाने के लिए हरे चिकने तोते  झुरमुट से खेतों तक उड़ान भरते और चोंच में अनाज की बाली लिए लौटते.  झुरमुट और खेत दोनों में उन के टें…टें के स्वर छाए थे. पिंजरे का तोता भी अब चहकने लगा था.
मैं रुक गया और पिंजरे को अपने चेहरे के सामने ले आया और ‘पट्टूपट्टू’ पुकारने लगा. वह पिंजरे में इधर से उधर व्याकुलता से घूमता जा रहा था. बीच बीच में पंख भी फड़फड़ाता जाता. उस में अप्रत्याशित चपलता आ गई थी. शायद यह दूसरे तोतों की आवाज का करिश्मा था जो वह मुक्ति के लिए आतुर हो रहा था.
मैंने ज्यादा देर करना ठीक नहीं सम झा. पिंजरे का द्वार  झुरमुटों की तरफ कर के खोला और प्यार से बोला, ‘‘जा, उड़ जा. जा, शाबाश, जा.’’
वह सतर्क सा द्वार तक आया. गर्दन बाहर निकाल कर जाने क्या सूंघा, पंख फड़फड़ाए और उड़ गया. एक छोटी सी उड़ान. वह सामने के पत्थर पर जा टिका. एक क्षण वहां रुक कर पंख फड़फड़ाए और फिर उड़ान ली. यह उड़ान, पहली उड़ान से कुछ लंबी थी.
अब वह एक  झाड़ी पर जा बैठा. उस के बाद उड़ा तो एक जवान पेड़ की लचकदार डाल पर जा बैठा. उस के बैठते ही डाल  झूलने लगी. उस ने एक दो  झूले खाए और फिर यह जा, वह जा, तोतों के  झुंड में शामिल हो गया. मैं ने संतोष की सांस ली.
लौटने लगा तो हाथ में खाली पिंजरे की तरफ ध्यान गया. एक पल पिंजरे को देखा और विचार कौंधा कि सारे खुराफात की जड़ तो यह पिंजरा ही है. यह रहेगा, तो न जाने कब किस पक्षी को कैद करने का लालच मन में आ जाए.
मैं ने घाटी की ओर एक सरसरी नजर डाली और पिंजरे को टांगने वाले हुक से पकड़ कर हाथ में तोलते हुए एक ही  झटके से उसे घाटी की तरफ उछाल दिया. पहाड़ी ढलान पर शोर से लुढ़कता पिंजरा जल्दी ही मेरी आंखों से ओझल हो गया.
घर लौटते समय मैं खुद को ऐसा हलका महसूस कर रहा था जैसे मेरे भी पंख उग आए हों.

इन्हें आजमाइए:
कपड़ों पर प्रैस की सिलवट तुरंत निकालनी है तो कपड़ा हैंगर पर टांग कर बाथरूम में रख दें जब गरम पानी से नहाएं. सारी सिलवटें अपने आप गायब हो जाएंगी.
बोतल में आखिर में बची टमाटर सौस नहीं निकल रही हो तो थोड़ा सिरका डाल कर झटकें, सारी सौस बाहर आ जाएगी.
पुराने तौलिए को मुलायम बनाना चाहते हैं तो धुलाई के दौरान उस पर सफेद सिरका डालें, तौलिया फूला और मुलायम हो जाएगा.
पेय की बोतल पर गीला टिश्यू पेपर या कपड़ा लपेट कर फ्रीजर में रखें. 10-12 मिनट में बर्फ जैसा ठंडा हो जाएगा.
एक स्प्रे बोतल में पानी, नींबू रस, थोड़ा वनीला एसेंस मिलाएं. कमरे में 2-3 घंटे के बाद स्प्रे करते रहें, घर महकेगा होटल जैसा.
मोबाइल पर जरूरत के समय ही लोकेशन ऑन करें. प्राइवेसी सुरक्षित रहती है.
नल या स्टील सिंक पर जंग या दाग हो तो नींबू और नमक से रगड़ें. चमक फिर से नई जैसी हो जाएगी.
केला जल्दी काला न पड़े, इस के लिए डंठल पर प्लास्टिक रैप या फॉइल लपेट दें, ज्यादा दिन पीले रहेंगे.
लहसुन की कलियां माइक्रोवेव में 10 सेकंड रखें, छिलका आसानी से उतर जाएगा. Romantic Story.

Hindi Kahani: आत्मसम्मान- आखिर लड़के क्यों शर्मसार हो रहे थे?

Hindi Kahani: क्या आत्मसम्मान सिर्फ लड़कियों का होता है, लड़कों का नहीं. उन तीनों लड़कों पर जो घिनौना आरोप लगाया जा रहा था, इस से वे शर्मसार हुए जा रहे थे. आखिर कौन उन्हें फंसा रहा था?
शहर का नामी स्कूल. विशाल भव्य इमारत. शहर के जानेमाने बिजनैसमैन, डाक्टर्स परिवार के बच्चों का स्कूल. सुबह 7 बजे का समय. कारों की कतारें. कई पेरैंट्स आए थे बच्चों को छोड़ने तो वहीं कई ड्राइवर्स भी. स्कूल असैंबली में पहुंचते ही सभी बच्चे अनुशासित कतारों में खड़े थे.
स्कूल प्रेयर व राष्ट्रगान समाप्त होते ही बच्चे अपनीअपनी क्लास में जाने की जल्दी करने लगे. तभी माइक पर टीचर की आवाज गूंजी, ‘‘अपनी क्लास में नहीं जाएं, रुकिए.’’ सभी बच्चे अपनीअपनी जगह खड़े हो गए. वे जानते थे कि कुछ नई घोषणाएं, नई सूचनाएं इसी समय दी जाती हैं, यह नई बात नहीं थी.
तभी प्रिंसिपल ने माइक से तेज आवाज में कहा, ‘‘मानस क्लास इलेवन, अमन व रणवीर क्लास टैंथ तीनों स्टेज पर आएं.’’ अपने नाम की घोषणा होते ही तीनों सम झ नहीं पाए, हुआ क्या है? वे घबराए. लेकिन जाना तो था ही स्टेज पर. तीनों गए.
स्टेज पर पहुंचते ही प्रिंसिपल की गुस्सेभरी आवाज, ‘‘तुम तीनों आजकल क्या कर रहे हो? पढ़ाई पर ध्यान देने के बजाय लड़कियों को अश्लील, न्यूड वीडियो और मैसेज करते हो? यही संस्कार दिए हैं घरवालों ने?’’ कहते हुए उन्होंने अमन को जोरदार थप्पड़ मारा.
‘‘नहीं सर, हम ने ऐसा कुछ नहीं किया,’’ मानस बोला, ‘‘आप से किसी ने झूठ बोला है, झूठी शिकायत की है.’’
वह घबरा गया था. रणवीर भी घबरा गया था, वह हाथ जोड़ कर, कान पकड़ कर बोला, ‘‘नहीं मैडम, हम ने ऐसा कुछ नहीं किया.’’
‘‘तुम्हारी शिकायत आई है. शिकायत क्यों झूठी होगी?’’ प्रिंसिपल चिल्लाते हुए बोलीं, ‘‘तुम तीनों को हफ्तेभर के लिए रैस्टिकेट किया जाता है. पेरैंट्स मीटिंग के बाद तुम तीनों स्कूल आ सकोगे. जाओ अब,’’ प्रिंसिपल ने कहा, ‘अपने मोबाइल यहीं रखो.’
तीनों बेहद अपमानित महसूस कर रहे थे खुद को. तीनों ही अच्छे परिवार से थे. मानस के पिता डाक्टर थे. अमन और रणबीर के पिता के बिजनैस में थे. तीनों स्कूल से निकल कर शहर के एक गार्डन में जा कर बैठ गए. लेकिन स्कूली यूनिफौर्म पहनी हुई थी, इसलिए मन में यह डर भी था कि कहीं लोग यह न सम झें कि स्कूल से बंक मार कर गार्डन में बैठे हैं. कहीं कोई जानपहचान वाला मिल गया तो? मानस के डैड के कई पेशेंट्स आतेजाते टकरा जाते थे. वे मानस को भी जानते थे. अमन, रणवीर सोच रहे थे घरवालों को क्या बताएंगे? आखिर तीनों ने तय किया कि घर जा कर सब सचसच बताएंगे.
अमन ने कहा, ‘‘इतनी इन्सल्ट होने के बाद जीवन को खत्म कर लेना चाहिए. पूरे स्कूल के सामने जलील किया गया. सुसाइड कर लेना चाहिए. सुसाइड नहीं कर सकते तो प्रिंसिपल की जम कर पिटाई करनी चाहिए.’’
‘‘नहींनहीं, ऐसा कुछ नहीं करेंगे. घर जा कर सोचते हैं. कल शाम को इसी गार्डन में मिलते हैं.’
तीनों अपनेअपने घर चले गए.
तीनों के पिता अपनेअपने काम में बिजी थे. सोचने का समय तीनों को मिल गया. मानस, रणवीर, अमन ने अपनीअपनी मां को डिटेल बता दी थी. ये सब सुन कर घरों का माहौल तनावपूर्ण तो हो गया था, डांट भी अच्छीखासी पड़ी थी तीनों को. इंतजार था तो डैड के घर आने का.

रात लगभग 10 बजे मानस के पिता डा. विशाल अपने घर पहुंचे तो देखा, घर में आज खामोशी कुछ ज्यादा है. उन्होंने सोचा, शायद वे ज्यादा लेट हैं तो मानस सो गया होगा. कभीकभी इमरजैंसी केसों में उल झ जाते हैं, डाक्टरी का पेशा ही ऐसा होता है. सो, उन्होंने ध्यान नहीं दिया. कपड़े चेंज कर डाइनिंग टेबल पर आ गए. मानस की मौम विनीता ने गरम चपाती ला कर रखी क्योंकि नौकर आदि सब शाम 7 बजे ही चले जाते हैं.
‘‘मानस क्या जल्दी सो गया था?’’ डा. विशाल ने दाल कटोरी में डालतेडालते पूछा.
‘‘जी, वह जल्दी सो गया था.’’ विनीता सम झदार महिला थी. वह पति को डिनर के बीच में डिस्टर्ब नहीं करना चाहती थी. वह जानती थी, बात सुनने के बाद वे डिनर छोड़ देंगे.
डिनर के बाद वे वाशबेसिन में हाथ धो कर जैसे ही वापस आए, विनीता ने उन को सारी बात बता दी.
डा. विशाल का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा, वे बोले, ‘‘पहले क्यों नहीं बताया, मानस अब इस स्तर पर उतर आया है?’’ फिर वे जोर से चिल्लाए, ‘‘मानस, मानस.’’
विनीता ने तुरंत कहा, ‘‘वह सही है, उस ने ऐसा कुछ नहीं किया होगा. सोचो,
95 फीसदी नंबर लाने वाला बैडमिंटन का अच्छा खिलाड़ी है, उस के तो दोस्त गिनेचुने ही हैं. वह ऐसा क्यों करेगा, क्या आप की पोजीशन नहीं जानता वह?’’
‘‘अरे हां, यह तो सोचा ही नहीं मैं ने,’’ डा. विशाल बोले, ‘‘हर जगह अव्वल आने वाला मानस ऐसा क्यों करेगा? हम ने तो कभी उस पर कोई पाबंदी लगाई नहीं. उस की तो कई लड़कियां फ्रैंड्स हैं, वह ऐसा क्यों करेगा?’’ और तब तक डा. विशाल मानस के कमरे का दरवाजा खोल चुके थे.
पलंग पर मानस औंधा लेटा हुआ फूटफूट कर रो रहा था. डा. विशाल ने पहली बार अपने किशोर बेटे को रोते देखा था. वे तुरंत मानस के पास गए. उसे गले लगा लिया. मानस डैड का सहारा पा कर जोरजोर से रो पड़ा. तभी विनीता पानी का गिलास ले आई. उस ने पानी पिया, फिर सारी बातें बता दीं.
डा. विशाल सब सुनते रहे, फिर बोले, ‘‘वह लड़की कौन है कि जिस को तुम ने वीडियोज, मैसेज किए?’’
‘‘वह नहीं बताया प्रिंसिपल ने,’’ मानस बोला.
‘‘तुम्हारा मोबाइल?’’ डा. विशाल ने सवाल किया.
‘‘प्रिंसिपल ने उसे जब्त कर अपने पास रख लिया,’’ मानस बोला, ‘‘अमन, रणवीर के मोबाइल भी उन्होंने रख लिए थे.’’
‘‘अमन, रणवीर के डैड के मोबाइल नंबर याद हैं?’’
‘‘जी,’’ मानस बोला.

डा. विशाल ने रणवीर और अमन के डैड को कौल कर उसी समय घर पर बुलाया. कुछ ही देर में अमन, रणवीर अपनेअपने डैड के साथ मानस के घर पहुंच गए. दोनों के चेहरे उतरे हुए थे. तनाव चेहरों पर साफ झलक रहा था. लगता था, परिवार में बहुत डांटा गया है, शायद पिटाई भी की गई हो.
डा. विशाल ने सब को देखा, फिर कुछ सोचते हुए बोले, ‘‘पहले तो तुम तीनों यह सोच कर बताओ कि असल बात क्या है?’’
‘‘अंकलजी, हमें फंसाया जा रहा है,’’ अमन, रणवीर दोनों एकसाथ बोले.
रणवीर के पापा ने भी डा. विशाल से कहा, ‘‘रणवीर की तो मैं पिटाई भी कर चुका, लेकिन रणवीर बोल रहा है, झूठी रिपोर्ट की है किसी ने प्रिंसिपल से.’’
‘‘वह लड़की कौन है?’’ डा. विशाल ने पूछा.
‘‘यह प्रिंसिपल ने नहीं बताया.’’
‘‘अच्छा’’ कहते हुए डा. विशाल सोचने लगे, फिर कुछ देर बाद बोले, ‘‘सब से पहले तो तुम तीनों मजबूत रहो कि कोई भी गलत कदम नहीं उठाना है. सुसाइड जैसी बातें नहीं सोचनी हैं क्योंकि हो सकता है कल किसी पेपर में भी यह खबर आ जाए या सोशल मीडिया पर. सोशल मीडिया पर यह खबर फिलहाल नहीं आई है. प्रिंसिपल को स्कूल की रैपुटेशन की भी चिंता होगी, ठीक है?’’
‘‘आप सही बोल रहे हैं,’’ अमन के पापा बोले, ‘‘हम पेरैंट्स मीटिंग का इंतजार क्यों करें, कल ही सुबह, दोपहर या शाम, जब प्रिंसिपल समय देते हैं, मिल लेते हैं.’’
‘‘जी, बिलकुल सही है,’’ रणवीर के पापा बोले.
‘‘लड़कियों के नाम भी पूछ लेते हैं, लड़कियां कौन हैं?’’ डा. विशाल बोले, क्योंकि यह तीनों लड़कों के भविष्य का प्रश्न है. पढ़ाई खराब होगी हफ्तेभर.’’ और उन्होंने प्रिंसिपल को फोन लगा दिया.

डा. विशाल का फोन प्रिंसिपल ने तुरंत उठा लिया, ‘‘हम लोग कल आप से मिलना चाहते हैं मानस को रैस्टिकेट किए जाने वाले मामले के सिलसिले में,’’ डा. विशाल बोले.
‘‘क्यों नहीं, जरूर, कल दोपहर बाद. मु झे भी दुख है कि मानस इतनी गंदी हरकत कर सकता है,’’ प्रिंसिपल बोली.
‘‘मैडम, मु झे लगता है कि ऐसा नहीं हुआ है. मानस ऐसा नहीं कर सकता. मु झे अपने बेटे पर भरोसा है.’’
‘‘कल हम दोपहर बाद मिलते हैं,’’ प्रिंसिपल से बात खत्म करने के बाद डा. विशाल ने कहा, ‘‘प्रिंसिपल से हम सब कल दोपहर बाद मिलेंगे. उन्होंने समय दे दिया है.
कल मिलने के लिए सब तैयार हो गए थे. उन्होंने देखा, अमन का चेहरा उतरा हुआ था.
‘‘अमन, क्या हुआ? हम मिल रहे हैं प्रिंसिपल से, सारी बातें क्लियर हो जाएंगी.’’
‘‘वो, अंकलजी, मैं सोच रहा था,’’ अमन मुश्किल से बोला.
‘‘क्या सोच रहे हो, बोलो,’’ अब अमन के पापा ने सवाल किया.
‘‘वो, पूरी असैंबली के सामने जो इन्सल्ट हुई है वह वापस नहीं आएगी.’’
‘‘पापा, पापा,’’ अब मानस बोला.
‘‘बोलो,’’ डा. विशाल बोले.
‘‘पापा, अमन सुसाइड करने की बात बोल रहा था,’’ मानस ने बताया.
‘‘बेटा, ऐसी बात कभी सपने में भी मत सोचना. तुम अपने परिवार की शान हो. तुम तीनों बैंडमिंटन के अच्छे खिलाड़ी हो. तुम्हारे सुसाइड करने से यह बात साबित हो जाएगी कि आरोप सही है. हमें यह साबित करना है, तुम लोग सही हो, आरोप झूठा है.
‘‘हमें जीवन की मुसीबतों से घबराना नहीं है, डट कर उन का सामना करना है, सम झे,’’ कहते हुए डा. विशाल ने अमन का गाल प्यार से थपथपा दिया.
‘‘अब कभी नहीं सोचोगे सुसाइड का, ठीक है?’’ डा. विशाल आगे बोले.
‘‘ठीक है, हम कल दोपहर में लंच के बाद स्कूल में मिलते हैं,’’ डा. विशाल ने कहा.
सभी अपने घर चले गए. उस समय रात के लगभग एक बज रहे थे.
दूसरे दिन दोपहर में सब स्कूल में उपस्थित थे. मानस, रणवीर, अमन प्रिंसिपल के केबिन के बाहर थे. कुछ बच्चों का स्पौर्ट्स पीरियड था, वे आजा रहे थे. कुछ बच्चों की नजरें जैसे ही तीनों पर पड़ीं, मुसकरा दिए, कटाक्षभरी मुसकान. लेकिन उन तीनों ुके साथ उन के पिता थे तो उन को हिम्मत थी कि पापा साथ में हैं.
कुछ ही देर में प्रिंसिपल के केबिन से एकदो टीचर निकलते दिखीं. एक टीचर अमन के नजदीक आए.
अमन ने कहा, ‘‘गुड आफ्टरनून मैडम.’’
टीचर ने जवाब नहीं दिया, आगे बढ़ गई.

प्रिंसिपल के केबिन में मानस के पेरैंट्स और रणवीर व अमन के पेरैंट्स के अलावा शहर के फेमस ज्वैलरी शौप के मालिक मि. दुग्गल और उन की पत्नी भी थे.
डा. विशाल और अमन व रणवीर के पेरैंट्स उन्हें तुरंत पहचान गए क्योंकि सब गोल्ड, डायमंड के गहने उन्हीं के यहां से खरीदते थे.
सब ने एकदूसरे से नमस्ते की, मुसकराए, फिर प्रिंसिपल को देखने लगे.
मानस, रणवीर, अमन प्रिंसिपल के सामने गरदन झुकाए अपराधी के समान खड़े थे.
एक क्षण उन्होंने डा. विशाल को देखा, फिर रणवीर, मानस और अमन के मोबाइल सामने रख दिए.
बारीबारी से मोबाइल वाले वीडियो डा. विशाल को दिखाए, साथ ही, किसी शिवानी नाम की लड़की के साथ अश्लील सैक्सी मैसेज भी दिखाए.
इसी प्रकार की चैट और वीडियो अमन और रणवीर के मोबाइल से भी भेजी
गई थीं.
‘‘यह शिवानी कौन है?’’ डा. विशाल ने सवाल किया मानस से.
‘‘मेरी बेटी है,’’ मि. दुग्गल ने जवाब दिया.
‘‘अच्छा,’’ कह कर डा. विशाल चुप हो गए.
‘‘अब बताएं क्या कहेंगे आप?’’ प्रिंसिपल बोली.
कुछ सोचते हुए डा. विशाल ने कहा, ‘‘जब तीनों लड़कों को आप ने यहां अपने केबिन में खड़ा कर रखा है तो शिवानी को क्यों नहीं बुलाया? वह क्लास में होगी, उसे भी बुलाइए.’’
‘‘उस की क्या जरूरत है, उस का मोबाइल है मेरे पास,’’ प्रिंसिपल बोली.
‘‘इस की जरूरत है, मैडम. मेरा कहना है इन लड़कों ने वीडियो नहीं भेजे,’’ डा. विशाल बोले.
‘‘शिवानी झूठी है, झूठ बोल रही है वह,’’ अमन के पापा बोले.
‘‘मेरी लड़की झूठे आरोप क्यों लगाएगी?’’ मि. दुग्गल बोले.
‘‘यह तो वही बताएगी, बुलाएं उसे,’’ आखिर प्रिंसिपल ने शिवानी को बुलवाया.
शिवानी केबिन में आते ही रोने लगी.
‘‘देखो, मेरी लड़की के आंसू बोल रहे हैं, वह सही है.’’
प्रिंसिपल ने कहा, ‘‘शिवानी, रोना बंद करो, यह क्लियर करो कि ये वीडियोज इन लड़कों ने भेजे हैं?’’
‘‘जी मैडम, इन्होंने ही भेजे हैं. इन के मोबाइल से आए हैं,’’ शिवानी ने आंसू पोंछते हुए कहा.
‘‘तुम इतने विश्वास से कैसे बोल रही हो, इन के मोबाइल से किसी और ने भेजे हों तो?’’ अब रणवीर के पापा बोले.
‘‘देखो शिवानी, तुम सच बोलो, तुम झूठ बोल रही हो,’’ डा. विशाल बोले.
‘‘अंकलजी, मैं झूठ क्यों बोलूंगी,’’ शिवानी बोली.

‘‘मुझे भी विश्वास है, मानस ऐसा नहीं करेगा. ठीक है मैडम, आप ने समय
दिया, मैं पुलिस की मदद से अपने बेटे पर लगाए आरोप को झूठा सिद्ध
करूंगा. पुलिस की जांच में सच झूठ का पता चलेगा. दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा.’’ ऐसा कहते हुए डा. विशाल ने अमन व रणवीर के पापा से कहा, ‘‘आइए, बच्चों के साथ पुलिस स्टेशन चलते हैं.’’
तभी प्रिंसिपल ने देखा, शिवानी घबरा गई है. उस का चेहरा डर के मारे पीला पड़ गया.
‘‘शिवानी बेटा, क्या हुआ, क्यों घबरा रही हो?’’
शिवानी अपने पिता मि. दुग्गल से लिपट गई, रोतेरोते बोली, ‘‘पापा, सौरी, मैं ने झूठ बोला था.’’
दुग्गल को काटो तो खून नहीं. शर्म और गुस्से से उन का गोरा चेहरा लाल हो गया. उन्होंने एक थप्पड़ शिवानी को मारा. शिवानी का रोना तेज हो गया.
प्रिंसिपल को देख कर डा. विशाल मुसकरा दिए, बोले, ‘‘देख लिया, आरोप झूठे थे.’’
‘‘लेकिन क्यों किया तुम ने, किस प्रकार किया?’’ प्रिंसिपल गुस्से से बोली.
‘‘वो, मधुकर अंकल,’’ शिवानी बोली.
‘‘मधुकर अंकल, ये कौन हैं?’’ प्रिंसिपल बोली.
‘‘मैं बताता हूं मधुकर के बारे में,’’ मि. दुग्गल बोले, ‘‘मधुकर मेरा ड्राइवर है, जो रोज शिवानी को स्कूल छोड़ने आता है. लेकिन उस का इस सब से क्या मतलब?’’ दुग्गल को गुस्सा आने लगा था.
‘‘पूरी बात सचसच बताओ क्या माजरा है?’’ प्रिंसिपल बोली.
‘‘दरअसल, ये तीनों बैडमिंटन के अच्छे प्लेयर हैं, स्कूल की एक्टिविटीज में भी आगे रहते हैं. हमारे ग्रुप को हमेशा हार देखनी पड़ती है, इसलिए इन को परेशान करने के लिए मैं ने यह किया,’’ शिवानी ने बताया.
‘‘वीडियो इन के मोबाइल से कैसे गए, यह भी बताओ?’’
‘‘स्पौर्ट्स पीरियड में जब ये तीनों खेल रहे थे तब इन के मोबाइल औन थे, जिस से वीडियो भी बन रहे थे. मैं ने मधुकर अंकल को सब बता दिया था. गार्ड मधुकर अंकल को जानता था, इसलिए रोका नहीं.

‘‘मधुकर अंकल ने इन तीनों के मोबाइल से सैक्सी वीडियो और चैट मेरे मोबाइल पर पोस्ट कर दिए थे. ये खेलने में बिजी थे. इस तरह ऐसा हो पाया,’’ यह कह कर शिवानी ने सौरी बोला और फिर रोने लगी.
अब प्रिंसिपल की बारी थी सौरी बोलने की. लेकिन डा. विशाल ने कहा, ‘‘यहां नहीं असैंबली में सौरी बोलेगी शिवानी.
‘‘डा. साहब, लड़की है, बदनामी होगी,’’ प्रिंसिपल मैडम बोली.
‘‘बदनामी क्या लड़कों की नहीं होती?’’ मि. दुग्गल बोले.
‘‘ठीक है,’’ प्रिंसिपल बोली.
दूसरे दिन सुबह ही पूरी असैंबली, स्कूल स्टाफ और डा. विशाल और रणवीर व अमन के डैड उपस्थित थे. प्रिंसिपल ने माइक पर कहा, ‘‘उस दिन जो आरोप लगा था अमन, रणवीर, मानस पर उन आरोपों की जांच हुई, आरोप झूठे और निराधार थे. यह गलती शिवानी की थी. हफ्तेभर के लिए शिवानी को रैस्टिकेट किया जाता है.
शिवानी ने माइक पर रोतेरोते सौरी बोला.
तीनों लड़के खुश थे, गर्व से सिर ऊंचा था. उन का आत्मसम्मान
उन को वापस मिल गया था. Hindi Kahani.

Best Hindi Social Story: आदिवासी- गांव में भीमा की CBI से क्यों हुई भिड़ंत?

Best Hindi Social Story: भीमा तो बस गांव में आदिवासियों की जीवनशैली देखने गया था, लेकिन फिर क्यों सीबीआई उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गई थी? जब भीमा पुलिस के हत्थे चढ़ा तो अंत अकल्पनीय रहा.

‘‘इस घटना में और कौन-कौन शामिल था?’’ सीबीआई अधिकारी ने पूछा.
बुजुर्ग बुद्धिजीवी ने कहा, ‘‘इस हिंसा से मेरा कोई लेनादेना नहीं. यह बात सही है कि नक्सली विचारधारा से प्रभावित हूं. इसी पर भाषण भी चल रहे थे. मैं ने भी मंच पर अपनी बात कही. हिंसा कैसे फैल गई, मु झे पता नहीं. हमें अपनी बात कहने का हक है. इसे नक्सलवाद से जोड़ना दूसरी विचारधारा के लोगों की साजिश है.’’
सीबीआई अधिकारी ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम खुद स्वीकार रहे हो कि तुम नक्सली विचारधारा से सहमत हो. जो विचारधारा ही हिंसक है. वहां हिंसा तो होनी ही थी. जानकारी मिली है कि एक नक्सलवादी भी वहां था.’’
‘‘मु झे इस की कोई जानकारी नहीं है. हमारे खिलाफ सुबूत हो तो हमें गिरफ्तार कर के जेल भेज दो.’’
‘‘वो भी करेंगे. तुम जैसे देशद्रोहियों को तो फांसी पर चढ़ा देना चाहिए. तुम्हारे उत्तेजक, हिंसक भाषणों से ही दंगाफसाद हुआ है. तुम और तुम्हारे साथियों की पूरी गतिविधियों का वीडियो हमारे पास है.’’
‘‘औफिसर, जो हम ने कहा, वह फिर दोहरा सकते हैं. कोर्ट में भी दोहरा देंगे. हम ने ऐसा कुछ नहीं किया कि हिंसक घटना घटित हो. हमें खुद आश्चर्य है कि भीड़ हिंसक कैसे हो गई. आप को इस बात की भी जांच करनी चाहिए. मु झे इस में किसी की साजिश लगती है. आप यह बताइए, हमें किस आधार पर गिरफ्तार करेंगे?’’
‘‘तुम खुद और अपने साथियों को गिरफ्तार ही सम झो. भड़काऊ भाषण देना हिंसा ही है.’’
‘‘फिर तो हर नेता को गिरफ्तार कर के देशद्रोह का मुकदमा दर्ज होना चाहिए.’’
‘‘उन के भाषणों से हिंसा नहीं होती. खैर, मु झे यह बताओ कि वह नक्सली कहां गया?’’
‘‘मैं ने कहा न, मु झे नहीं मालूम. जंगलों से छिप कर कोई व्यक्ति इस महानगर में भला क्यों आएगा?’’
‘‘हमारे पास पक्की जानकारी है.’’
‘‘तो आप पता कर लीजिए. कौन सा नक्सली हमारी सभा में कहां से आया. मैं किसी नक्सली को नहीं जानता.’’

चारों बुजुर्ग बुद्धिजीवियों से पूछताछ की गई. सख्ती भी बरती गई लेकिन बहुत खोजबीन के बाद भी कुछ पता नहीं चला. मामला तूल पकड़ रहा था. मीडिया और वामपंथी विचारधारा के लोग सरकार पर हमला कर रहे थे. एक विशेष विचारधारा के लोगों पर सरकार अत्याचार कर रही है. उन्हें देशद्रोही बता रही है. नक्सलवाद से जोड़ रही है. सरकार ने जल्द मामला सुल झाने के लिए कहा. सीबीआई ने हिंसा भड़काने के आरोप में चारों पर केस बना कर उन्हें कोर्ट में पेश किया. कोर्ट ने उन्हें जेल भेज दिया.
सीबीआई अधिकारी की सम झ में नहीं आ रहा था कि भीमा नाम के जिस नक्सली की उन्हें खबर मिली थी वह कहां गया. सख्त चैकिंग/नाकेबंदी के बावजूद वह अब तक पकड़ में क्यों नहीं आया. उसे जमीन खा गई या आसमान. भीमा गया तो कहां गया. सीबीआई की जांच जारी थी. अगर भीमा नाम का नक्सली मिल गया तो इस हिंसक कांड पर चारों के खिलाफ पक्का सुबूत मिल जाएगा. हो सकता है नक्सलियों के दल या उस व्यक्ति द्वारा हिंसा फैलाई गई हो. लाख कोशिश के बाद भी भीमा का कोई सुराग नहीं मिला. सीबीआई की एक टीम गुप्त रूप से नक्सल प्रभावित इलाकों में भीमा की खोज में लग गई.
वह नक्सल प्रभावित गांव से था. जहां एक ओर नक्सली आते थे उन्हें अपने दल में शामिल करने के लिए, उन से सहायता लेने के लिए, उन्हें अपने बनाए कानूनों पर चलने की हिदायत देने. वहीं दूसरी ओर पुलिस आती थी उन से नक्सलवादियों का पताठिकाना जानने के लिए. दोनों तरफ से वे जुल्म का शिकार होते. नक्सली कहते थे, वोट नहीं डालोगे. पुलिस गांव में नहीं आनी चाहिए. सरकार का बहिष्कार करो. हम तुम लोगों के लिए हैं. नक्सली तो आ कर चले जाते. पुलिस से मिले होने के आरोप में दोचार गांव के लोग जान से भी मार दिए गए. भीमा को पता नहीं था कि वे पुलिस से मिले थे या नहीं. भीमा को दोनों ही अच्छे नहीं लगते थे. नक्सली ज्यादातर पुलिस दल पर हमला करते थे.

जब कई पुलिस वाले मारे जाते थे तो पुलिस खिसिया कर गांव वालों को मारतीपीटती. उन्हें नक्सलवादी बना कर उन के झूठे एनकाउंटर करती, मुकदमे बना कर जेल में डालती, गांव खाली करने के लिए कहती.
भीमा ने सुना था कि दिमाग से सभी समस्याओं का हल हो सकता है. जब
उसे पता चला कि कुछ बुद्धिजीवी आदिवासियों के हित में बहुत कर रहे थे और उन का 3 दिनों बाद सम्मेलन है जहां वे आदिवासी समाज के हित में बहुतकुछ करने को कहने वाले हैं. भीमा को लगा कि उसे जाना चाहिए. अपने गांव की समस्या बतानी चाहिए. 3 दिन की यात्रा कर के वह उस स्थान पर पहुंचा. किसी से मिलना तो न हो पाया क्योंकि उस के पहुंचते ही भाषण शुरू हो चुका था.
लंबाचौड़ा, काला भीमा भीड़ में अलग नजर आ रहा था क्योंकि अपने क्षेत्र से वह इकलौता व्यक्ति था. उसे आश्चर्य भी हुआ कि उस के जैसा वहां कोई नहीं है. उस ने मन ही मन सोचा कि फिर इतनी सारी भीड़ किन लोगों की है. ये गोरेचिट्टे, दुबलेपतले, नाजुक से लोग क्या आदिवासी हैं? अगर
नहीं तो ये कौन लोग हैं? क्या ये सब आदिवासियों के शुभचिंतक हैं. थोड़ी देर में भीमा को सम झ में आ गया कि वह यहां गलत आ गया है. सारे भाषण किसी विशेष विचारधारा को ले कर हैं. जो किसी दूसरी विचारधारा के विरोध में हैं. उसे वे राजनीतिक दल भी नजर आए जो चुनाव के समय अकसर उस के गांव आते रहते हैं.

भीमा लघुशंका के लिए पंडाल से बाहर निकला. अचानक मारकाट शुरू हो गई. भीमा घबरा कर वापस रेलवे स्टेशन की तरफ चल दिया. भीमा 5वीं तक पढ़ा था गांव के स्कूल में. दुनियादारी की थोड़ीबहुत सम झ रखता था. जैसे ही वह रात में गांव पहुंचा, गांववालों ने कहा, ‘‘कहां गए थे. यहां पुलिस तुम्हारे बारे में पूछ रही थी. तुम ने कोई बड़ा कांड किया है. बचोगे नहीं. भाग जाओ यहां से.’’
वह सन्नाटे में था. बुद्धिजीवियों की सभा में जाने मात्र से पुलिस को परेशानी होने लगी. कहीं होने वाले दंगाफसाद में उस का नाम तो नहीं आ गया. रात वह गांव के बाहर खेत में सोया. सोते से किसी ने उसे जगाया. आंखें खुलीं तो देखा, उसे चारों तरफ नक्सली घेरे हुए हैं. नक्सली कमांडर सुतपा ने खुश होते हुए कहा, ‘‘बहुत बड़ा कांड कर दिया है तुम ने. शाबाश. अब पुलिस कुत्तों की तरह तलाश रही है. बचना है तो हमारे साथ चलो.’’ कोई रास्ता भी नहीं था उस के पास. पुलिस के हाथ में पड़ने का अंजाम वह जानता था. न चाहते हुए भी वह नक्सली दल में शामिल हो गया.

कमांडर ने कहा ‘‘अभी तुम लड़ाई के लायक नहीं हुए हो. धीरेधीरे सीख जाओगे. तब तक तुम खाना बनाओ अपने साथियों के लिए. बहुत नाम है सरकार में तुम्हारा. हम तुम्हें जल्द ही हथियार चलाना सिखा देंगे. एकदो बड़े कांड करो हमारे लिए भी. प्रमोशन पक्का है तुम्हारा.’’ वह खाना बनाना जानता था. कुछ और लोगों के साथ वह खाना बनाने लगा.
उसे अब तक सम झ नहीं आया कि उस ने ऐसा क्या किया है कि पुलिस से ले कर नक्सलियों में भी उस का इतना नाम हो गया है. डाइनामाइट के विस्फोट से पुलिस की गाडि़यां हवा में उछलने लगीं. चीजों से घाटी गूंजने लगी. आग, धुंआ और परखच्चे उड़ती गाडि़यां नजर आ रही थीं मुख्य सड़क पर. कमांडर के आदेश पर दल के सभी सदस्यों ने स्टेनगन का मुंह खोल दिया. तड़तड़ की आवाज के साथ घायल सिपाहियों को गोलियां छलनी करने लगीं. लाशें बिखरी पड़ी थीं क्षतविक्षत. कमांडर ने वापस चलने का आदेश दिया. नक्सली दल जंगलों में समा गया.
‘‘क्या यह ठीक था.?’’ भीमा ने पूछा.
‘‘हां, हम न मारते तो ये हम तक पहुंच जाते. फिर जो हाल उन का हुआ वो हमारा होता.’’ कमांडर ने कहा.

‘‘लेकिन इन्हें हमारे बारे में पता कैसे चला?’’ दल के दूसरे सदस्य ने पूछा. कमांडर ने कहा ‘‘रामा, लक्ष्मी याद हैं. हमारे दल में थे पहले. उन्हें प्यार हुआ. फिर शादी की बात ले कर हमारे पास आए. मैं ने कहा, ‘‘तुम लड़ने आए हो या गृहस्थी बसाने.’’ दोनों की खामोशी देख मैं ने उन्हें दल छोड़ कर घर बसाने की सलाह दी. दोनों दल छोड़ कर गांव चले गए.
‘‘पुलिस को पता चला, उस ने प्रलोभन दिया. पुलिस में भरती, सरकारी क्वार्टर और अच्छी तनख्वाह. दोनों लालच में आ गए. नहीं भी आते तब भी पुलिस उन्हें न छोड़ती. पुलिस ने उन से हमारे ठिकानों के बारे में जानकारी ली. उन्हें साथ लिया. जो इलाके उन के देखे हुए थे हमारे साथ रहते हुए उन में सब तरफ पुलिस का कब्जा हो गया. हमारे कई साथी मारे गए.
‘‘मु झे पता चला कि आज दोनों फिर पुलिस के साथ हमारे इस स्थान का पता बताने के लिए साथ आ रहे हैं, इसलिए मैं ने पुलिस के साथ उन दोनों को भी खत्म कर दिया. पुलिस उन का भरपूर इस्तेमाल कर के हमारे कई ठिकानों पर कब्जा कर चुकी थी. पहले ही कई लोग मारे जा चुके थे. हिसाब तो बराबर करना ही था. काश, रामा और लक्ष्मी को जाने ही न दिया होता. एक गलत उदाहरण चला गया आदिवासी और नक्सलियों में. सरैंडर करो. पुलिस की मदद करो और सरकारी नौकरी पाओ पुलिस की. इनाम अलग से.’’
‘‘खैर, अब पुलिस हमें पागल कुत्तों की तरह तलाशेगी. इसलिए इस क्षेत्र को छोड़ कर हमें दूसरे राज्य के जंगलों में प्रवेश करना होगा.’’
सब ने कमांडर सुतपा की बात पर सहमति जताई. भांयभांय करता जंगल. बड़ेबड़े सागौन के वृक्षों पर नक्सली ड्यूटी दे रहे थे. उन्हें दूर से आने वाला दिख जाता था.
कुछ लोग खाना बना रहे थे. भीमा भी उन के साथ था. कुछ पत्थरों पर आराम कर रहे थे. कमांडर ने भीमा को आवाज दे कर बुलाया.
‘‘जी कमांडर.’’
‘‘तुम से बड़ी उम्मीद है, भीमा. मु झे पता नहीं तुम ने क्या किया शहर में जा कर लेकिन पूरे कांड में तुम्हारा नाम लिया जा रहा है, जो हमारे लिए गर्व की बात है. खाना ही नहीं बनाते रहना है. हथियार चलाने का प्रशिक्षण आज से शुरू तुम्हारा. तुम्हें दूसरे दल का कमांडर बनना है. वैसे तुम ने कुछ किया भी या मुफ्त की वाहवाही पा रहे हो. कहीं पुलिस, सीबीआई तुम्हें किसी के लिए बलि का बकरा तो नहीं बना रही है.’’
भीमा ने पूरी बात सुनाई. ‘‘हां, इस का मतलब है.’’

कमांडर सुतपा ने बात को सम झते हुए कहा, ‘‘उन बुद्धिजीवियों के खिलाफ तुम्हें खड़ा कर के सरकार उन्हें लंबा लपेटने के चक्कर में है.’’
‘‘ऐसा ही लगता है, कमांडर.’’
‘‘ठीक है तो तुम वैसे ही बन कर दिखाओ, एक खतरनाक नक्सलवादी बन जाओ. आज तुम्हारा खाना बनाने का आखिरी दिन है.’’
‘‘एक बात पूछूं, कमांडर.’’ भीमा
ने कहा.
‘‘पूछो.’’
‘‘यह नरसंहार कर के हमें क्या मिला?’’
‘‘ये जो पुलिस और सरकार है न. ये हमारे जंगल छीन रहे हैं. हमें गांवों से खदेड़ते रहते हैं किसी बड़े उद्योगपति के कहने पर. हमें झूठे आरोपों में फंसा कर जेल भेजते हैं. हमारी बहूबेटियों की इज्जत लूटते हैं. हमें हमारे हक, अधिकारों से वंचित रखते हैं. यह लड़ाई अमीर और गरीब की है. हम गरीबों को उन का हक दिला कर पूंजीवाद को खत्म करना चाहते हैं और ये हम आदिवासियों से सबकुछ छीन कर अमीरों की झोली में डाल रहे हैं. सरकार इन की, पुलिस इन की. अपने वजूद को बचाए रखने के लिए यह लड़ाई जरूरी है, सम झे. अब जाओ खाना बनाने का आखिरी दिन
पूरा करो.’’
‘‘जी कमांडर,’’ यह कह कर भीमा खाना बनाने वालों के पास चला गया.
ऊंचे वृक्ष पर बैठे पहरा देने वाले नक्सली ने पक्षी की आवाज जोर से निकाली. कमांडर सुतपा ने फौरन आदेश दिया. ‘‘सभी अपने हथियार संभालो और जवाबी हमला करते हुए पीछे की तरफ हटते जाओ.’’ वृक्ष पर बैठे चारों नक्सलियों पर अचूक फायर हुए. चारों चीखते हुए वृक्ष से नीचे गिर गए. तत्काल उन की मौत हो गई.
तेजी से पुलिस बल ने गोलियां दागनी शुरू कर दीं. जवाब में नक्सलियों ने भी गोलियां चलानी शुरू कर दीं. दोनों तरफ से गोलियां चल रही थीं. नक्सली गोलियां चलाते हुए पीछे की तरफ भाग रहे थे. कुछ पुलिसकर्मी चीख कर गिर पड़े. कुछ नक्सली गोली लगते ही ढेर हो गए. भीमा के पैर में गोली लगी. वह कराह कर वहीं गिर पड़ा. शेष नक्सली जंगलों में गुम हो गए. पुलिस के हाथ लगा घायल भीमा.

पुलिस अफसर ने उसे कस कर पेड़
से बंधवा दिया. भीमा को हर तरह
की थर्ड डिग्री टौर्चर किया. उस से पताठिकाना पूछा गया नक्सलियों का. उस के पैर से खून बह रहा था. एक सिपाही गोली लगे स्थान पर अपनी बंदूक से प्रहार कर रहा था. भीमा की चीख जंगलों में गूंज रही थी.
‘‘मैं नया हूं. मु झे पताठिकाना नहीं मालूम.’’
‘‘क्या करते हो इन के साथ?’’
‘‘खाना बनाता हूं.’’
पुलिस अफसर ने हंस कर कहा, ‘‘रसोइया हो. कितने पुलिसवालों को मारा.’’
‘‘जी, एक भी नहीं. मु झे बंदूक चलानी नहीं आती. आज से प्रशिक्षण शुरू होने वाला था.’’
‘‘क्या नाम है तुम्हारा.’’
‘‘भीमा.’’
पुलिस औफिसर नाम सुन कर चौंक गया. ‘‘तुम्हारी तलाश तो सीबीआई को है. क्या किया था शहर में?’’
‘‘कुछ नहीं. मैं सिर्फ उन से मिल कर जानना चाहता था कि आदिवासी कैसे शांति से अपने जंगल में रह
सकते हैं?’’
पुलिस औफिसर कुछ सोचने लगा. इसे सीबीआई को सौंपे या इस का एनकाउंटर कर दे. सीबीआई को सौंपने से क्या मिलेगा? मुठभेड़ में मरेगा तो तरक्की, मैडल मिलेगा. भाड़ में गई सीबीआई.
‘‘नक्सलवादी क्यों बने?’’
‘‘पुलिस के डर से,’’ भीमा ने कराहते हुए कहा.
‘‘मैं तुम्हें हमेशा के लिए पुलिस के डर से मुक्त करता हूं,’’ पुलिस अधिकारी ने रिवौल्वर भीमा की ओर तानते हुए कहा.
‘‘साहब, मु झे छोड़ दीजिए.’’

‘‘तुम्हें छोड़ तो नहीं सकता.
सीबीआई के हवाले कर
दिया तो तुम पर केस चलेगा. मीडिया की सुर्खियां बन जाओगे तुम. रिहा हो गए कोर्ट से तो बुद्धिजीवी तुम्हें नेता घोषित कर देंगे. फिर तुम वामपंथी हो कर हमें, हमारे धर्म, हमारे ईश्वर को गाली दोगे. लोगों को हमारे खिलाफ भड़काओगे. पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाओगे. हमारे धर्मग्रंथों का मजाक उड़ाओगे. सारे कट्टरपंथी तुम्हारे साथ हो जाएंगे और ऐसा मैं होने नहीं दूंगा.’’ पुलिस अधिकारी के चेहरे पर क्रोध और क्रूरता के भाव आ गए. उस ने गले में पहना हुआ लौकेट निकाला. उसे चूमा, प्रणाम किया और आसमान की ओर देख कर कहा, ‘‘हे ईश्वर, यह बलि आप के लिए, धर्म के लिए.’’ फिर उस ने गोली चला दी. Best Hindi Social Story.

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