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मंजिल तक : भाग 2

उन के चेहरे पर खुशी देख कर धर्मा को एक अजीब संतोष हुआ. आगे बढ़ कर भाभी की आंखों में आंखें डाल कर बोला, ‘‘आप के बिना रहना कितना मुश्किल होगा, भाभी.’’ भाभी की आंखें सजल हो गईं. आंचल के कोर से उस ने चतुराई से आंसू पोंछ डाले. धर्मा ने आहिस्ते से कहा, ‘एक बात और कहनी है, भाभी.’’ ‘‘कहो धर्मा,’’ भाभी ने बड़ी आत्मीयता से कहा. ‘‘वह जो मैं ने अभी कहा था न कि आप सुंदर हैं, स्मार्ट हैं, पढ़ीलिखी हैं वगैरहवगैरह. सब ?ाठ था. आप भी मेरी तरह अंगूठा छाप हैं,’’

धर्मा ने कहा और इस के पहले कि भाभी के हाथ आता, वह वहां से नौदोग्यारह हो गया. सोनिया ने वीजा के लिए जरूरी सारे कागजात पूरे किए और चंद ही दिनों में अमेरिका का वीजा उस के पासपोर्ट की शोभा बन चुका था. धर्मा सोनिया पर दिलोजान निसार कर रहा था, सुबहशाम उस का तसव्वुर और रातदिन उस घड़ी का इंतजार जब सोनिया अमेरिका जाएगी और वह भी पीछेपीछे अमेरिका पहुंच जाएगा, जहां वे एक नया जीवन शुरू करेंगे, जिस में ढेर सारा प्यार होगा और बहुत सारा विश्वास एवं समर्पण. आखिरकार, वह दिन आ भी गया जब सोनिया अमेरिका जाने के लिए तैयार थी. धर्मा ने मुंबई आ कर सोनिया को विदाई दी और आंखों में भविष्य के सपने संजोए भारी मन से वापस अपने गांव आ गया.

न्यूयौर्क जा कर सोनिया ने आगे की पढ़ाई करने के लिए यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया और बाकी के वक्त में छोटीमोटी नौकरी भी कर ली. वादे के मुताबिक धर्मा हर महीने सोनिया को पैसे भेजता रहता और सप्ताह में एक बार उन की आपस में बात होती रहती. पढ़ाई की वजह से बात छोटी ही होती और फिर धीरेधीरे बातों का सिलसिला बादलों में छिपे चांद की तरह हो गया. वक्त बदलता रहा और शीघ्र ही सोनिया ने अपनी पढ़ाई समाप्त कर के वहां एक अच्छी कंपनी में नौकरी हासिल कर ली. नौकरी शुरू करने के बाद तो धर्मा के लिए सोनिया से बात करना ही दुश्वार हो गया. अभी फोन रखती हूं, जरूरी मीटिंग है, शाम को बात करती हूं. मगर वह शाम कभी न आती. धर्मा भाभी को सारी बातें बताता रहता और धर्मा की बातें सुन कर भाभी के चेहरे पर भी चिंता की रेखाएं आतीजातीं.

उस शाम जब धर्मा किसी काम से दिल्ली गया था तो भाभी ने सोनिया से फोन पर बात की. सोनिया ने फोन उठा तो लिया मगर बातचीत बढ़ाना नहीं चाहती थी, ‘‘मैं अभी’ सोनिया कुछ कहना चाह रही थी कि भाभी ने बात काट दी, ‘‘तुम्हारी मीटिंगों से ज्यादा जरूरी मेरी बात है. मु?ो तुम्हारे रंगढंग ठीक नहीं लग रहे. धर्मा तुम से अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता है, अपना हर वादा निभाया उस ने. अब उसे इंतजार है कि तुम उसे वहां कब बुलाऊंगी.’’ ‘‘मैं कोशिश कर रही हूं, भाभी. मगर धर्मा के पास न कोई डिगरी है न कोई हुनर, उज्जड किस्म का आदमी है. दिमाग के नाम पर जीरो वाट का बल्ब. मैं करूं तो क्या करूं.’’ भाभी को काटो तो खून नहीं, फोन उस के हाथ से छिटक कर गिर पड़ा और वह स्वयं भी वहीं निढाल हो कर गिर पड़ीं. सोनिया की नीयत पर अब उसे शक न करने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. आंखों के सामने धर्मा का चेहरा घूमने लगा.

विश्वास के स्तर के इतने बड़े हृस की उन्हें जरा भी आशा न थी. अगले रोज जब धर्मा आया तो भाभी उस से नजरें मिलाने से बच रही थीं. हाथमुंह धोते हुए धर्मा ही बोल पड़ा, ‘‘भाभी, सोनिया का नंबर लगातार बंद आ रहा है. लगता है, नैटवर्क की गड़बड़ है.’’ ‘‘सोनिया ने मोबाइल नंबर बदल दिया होगा, धर्मा. वह तु?ा से बात करने से कतरा रही है. उस ने मेरे विश्वास की डोर को सोचीसम?ा साजिश के तहत तोड़ दिया. तुम्हारी असली गुनहगार मैं हूं. सम?ा नहीं आता कि मैं तुम्हें क्या कहूं, क्या सलाह दूं.’’ ‘‘मु?ो इस बात का एहसास था भाभी, इसलिए मैं दिल्ली गया था. बड़ी मुश्किल से एक महीने का टूरिस्ट वीजा मिला है. अगले हफ्ते ही मैं न्यूयौर्क जाऊंगा. सरपंचजी का बेटा सोमू वहां बरसों से है. मैं ने उसे सारी बातें सम?ा दी हैं और उस ने वादा किया है कि वह मेरी पूरी मदद करेगा. उस का एक जानकार वकील है जिसे मैं ने सोनिया पर नजर रखने को और उस के बारे में सबकुछ पता करने को कहा है. उस के जरिए सोनिया से मिल कर सारी बातें साफ कर लूंगा.’’

‘‘फिर,’’ भाभी को सम?ा नहीं आ रहा था कि धर्मा के मन और मस्तिष्क में क्या उथलपुथल चल रही थी. उस ने बिना भाभी की तरफ देख कर कहा, ‘‘और फिर सोनिया यहां होगी, तुम्हारे पास अपनी गलती का प्रायश्चित्त करने के लिए, तुम्हारे कदमों में सिर रखने के लिए.’’ ‘‘लेकिन उस ने इनकार कर दिया तो.’’ ‘‘खाली हाथ तो नहीं लौटूंगा, भाभी. यह मेरी जिद भी है और तुम से वादा भी. जिस ने तुम्हें कष्ट दिया है उसे इस दर्द की टीस का एहसास तो दिलाना ही पड़ेगा.’’ न्यूयौर्क हवाई अड्डे पर सोमू ने बड़ी गर्मजोशी से धर्मा का स्वागत किया और उसे अपने घर ले गया. ‘‘मेरे पास सिर्फ एक महीने का वक्त है, सोमू और मु?ो सोनिया से मिलना ही पड़ेगा. तू मु?ो किसी तरह से उस के पास ले चल. फिर देखता हूं कि वक्त की धारा मोड़ कर हमें किस मुहाने पर ले कर जाती है.’’ ‘‘मैं कोशिश करता हूं कि तुम्हें जल्द से जल्द सोनिया तक ले जा सकूं हालांकि सोनिया अब पहले वाली सोनिया नहीं है. उस के पास दौलत है,

थोड़ीबहुत शोहरत भी है, रुतबा है.’’ सोमू की कुछ ही दिनों की मेहनत रंग लाई. उस ने सोनिया को विश्वास में लिया और दक्षिण अफ्रीका से आए एक बिजनैस डैलिगेशन से मिलने का वक्त ले लिया. डैलिगेशन जब मिलने गया तो उस में सब से आगे धर्मा था. ‘‘तुम, तुम यहां?’’ धर्मा को सामने देख कर सोनिया मानो आकाश से धरातल पर गिर पड़ी पर जल्द ही वह सारा माजरा सम?ा गई. ‘‘तुम्हारा चौंकना स्वाभाविक है. तुम से मिलने के लिए, अपनी होने वाली पत्नी तक पहुंचने के लिए मु?ो एक नकली डैलिगेशन का सहारा लेना पड़ा. मैं तुम से बात करना चाहता हूं, अपने बारे में, तुम्हारे बारे में, हम दोनों के बारे में.’’ ‘‘देखो धर्मा, यह औफिस है. यहां मैं काम करती हूं, आज मेरे पास बिलकुल वक्त नहीं है. मैं अभी न्यूयौर्क से बाहर जा रही हूं और वैसे भी यहां यों बात करना मुनासिब नहीं होगा. मैं तुम से शनिवार को मिलती हूं. शाम 5 बजे इसी औफिस के पीछे न्यू एंपायर कौफी हाउस में.’’ ‘‘देख लो सोनिया, मेरे पास वक्त बहुत कम है और खोने को कुछ भी नहीं है और तुम्हारी तिजोरी भरी पड़ी है. तुम्हारी एक गलत चाल तुम से यहां पर तुम्हारी करतूतों के हिसाब मांग सकती है. एक बात और याद रखना कि मैं अनपढ़ जरूर हूं लेकिन बेवकूफ नहीं.’’ सोमू ने धर्मा को ले जा कर चंद्रा से मिलवाया जो वकील के साथसाथ एक रजिस्टर्ड डिटैक्टिव भी था. ‘‘सोनिया के बारे में जो भी सूचनाएं आप ने भेजीं उन से एक बात शीशे की तरह साफ है कि उस ने अपने बारे में यहां बहुतकुछ फर्जी बताया हुआ है. अपनी डिगरी, भारत में विभिन्न कंपनियों में अपने काम का अनुभव, बैंक खातों की जानकारी सबकुछ ?ाठा है. उस की यह इमारत ?ाठ की बुनियाद पर टिकी हुई है.

’’ ‘‘और अमेरिका में ऐसे आर्थिक अपराध सामान्य नहीं माने जाते. इन की सजा भी उतनी ही सख्त है जितनी अन्य अपराधों की है. आप की मंगेतर को न सिर्फ वापस भारत डिपोर्ट कर सकते हैं बल्कि यहां के कानून के मुताबिक उन्हें अच्छीखासी जेल की सजा भी मिल सकती है.’’ उत्तर में धर्मा ने एक फीकी मुसकान फेंकी और इजाजत लेते हुए बोला, ‘मैं भी कुछ ऐसा ही चाहता हूं.’’ तय दिन और तय समय पर धर्मा सोनिया से मिलने तय जगह पर पहुंच गया, ‘‘तुम आज जिस मुकाम पर पहुंची हो वहां तुम्हें पहुंचाने में मेरा प्यार, मेरी भाभी की आत्मीयता और मेरी धरती का बलिदान छिपा है. तुम ने तीनों का अपमान किया. मैं अच्छी तरह से जानता था कि तुम निहायत स्वार्थी और मतलबी किस्म की इंसान हो मगर मैं ने अपनी भाभी के निश्च्छल प्रेम पर अपनी सोच को कुरबान कर दिया और तुम ने इस का यह सिला दिया?’’ ‘‘मैं तुम से रिश्ता तोड़ना नहीं चाहती थी, बस, एक अच्छे मौके का इंतजार कर रही थी.’ सोनिया कुछ कहना चाह रही थी मगर धर्मा ने उसे रोक दिया.

नौर्मल डिलीवरी से ज्यादा फायदेमंद क्यों मानी जाती है सिजेरियन, जानें

सामान्य हो सकने वाली डिलीवरी के केस में भी औपरेशन करने वाले डाक्टरों के बीच आजकल सक्सैसफुल सिजेरियन का रिकौर्ड बनाने की होड़ सी लगी है. इसे ये अपने प्रोफाइल में तो जोड़ते ही हैं, साथ ही इस से अपनी और अपने मालिकों की जेबें भी भरते हैं. अमीर हो या गरीब, इन के चंगुल में एक बार आ जाने पर मुश्किल से ही निकल पाता है. स्वास्थ्य सुविधाओं का निजीकरण होने के बाद सरकारी अस्पताल तो अनाथ बच्चों की तरह पल रहे हैं. उन में न तो सही ढंग के वार्ड बचे हैं और न  ही बैड.

दिल्ली के एक मैटरनिटी होम में प्रैग्नैंसी टैस्ट कन्फर्म होने के बाद ज्योति और विकास का जोड़ा घर पहुंचा. उस मैटरनिटी होम के बारे में विकास ने अपने साथियों और रिश्तेदारों से बड़ी तारीफ सुन रखी थी, ऐसे में उन्हें अपने पहले बच्चे के जन्म के लिए वही अस्पताल सब से उपयुक्त लगा. पहली बार वहां की गाइनी डाक्टर से मीटिंग हुई. दोनों को डाक्टर का स्वभाव बड़ा अच्छा लगा. कभी कोई परेशानी न हो इस के लिए डाक्टर ने अपना पर्सनल नंबर भी दे दिया. तमाम टैस्ट व आएदिन अस्पतालों के चक्कर काटना तो जैसे ज्योति और विकास के लिए आम हो गया था. प्रसव का समय आया तो विकास ने अपनी पत्नी के गर्भ की नियमित जांच ठीक एक दिन पहले भी कराई थी. खैर, भरती होने के बाद डाक्टर ने ज्योति के डिलीवरी केस को काफी कौंप्लिकेटेड बताते हुए उसे सिजेरियन डिलीवरी कराने की सलाह दी.

सवाल उठता है कि ठीक एक दिन पहले तक ज्योति के सारे टैस्ट सामान्य थे और बच्चा भी स्वस्थ बताया गया था. लेकिन मात्र रात बीतने के बाद उस की डिलीवरी में अड़चनें क्यों बताई गईं. ज्योति और विकास को डाक्टरों ने इस तरह भयभीत किया कि बच्चे के सिर में गर्भनाल फंस गई है, जिस से बच्चे के गले में फंदा भी लग सकता है आदि. डर कर और पहले बच्चे की चाह में उन्हें सिजेरियन डिलीवरी करानी पड़ी. देखा जाए तो अकेले ज्योति और विकास के साथ ही ऐसा नहीं हुआ बल्कि आएदिन डाक्टरों के जाल में लोग फंसते रहते हैं. दिल्ली एनसीआर के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, निजी अस्पतालों में लगभग 75 से 80 फीसदी बच्चे औपरेशन से पैदा होते हैं जबकि सरकारी अस्पतालों में केवल 40 फीसदी सिजेरियन होते हैं. बड़े शहरों में लगभग 60 प्रतिशत महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी होती है. कइयों को ज्यादा उम्र के कारण नौर्मल डिलीवरी में परेशानी होती है. डाक्टरों के मुताबिक, नौर्मल डिलीवरी से पैदा होने वाले बच्चों में बीमारियों से लड़ने की क्षमता दूसरे बच्चों के मुकाबले ज्यादा होती है.

सिजेरियन प्रसव की सलाह निजी अस्पतालों में यों ही नहीं दी जाती. सामान्य डिलीवरी कराने के उसे 15 हजार रुपए के बीच मिलते हैं तो वहीं सिजेरियन करने पर यही रेट 25 से 50 हजार रुपए और इस से ऊपर तक वसूल लिए जाते हैं. दुनियाभर में औपरेशन के जरिए प्रसव के चलन पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चिंता जताते हुए कहा है कि यह प्रक्रिया तभी अपनाई जाए जब मैडिकल तौर पर जरूरी हो. औपरेशन के जरिए होने वाले प्रसव का मां और बच्चा दोनों पर बुरा असर पड़ता है. किसी भी देश के लिए 10-15 फीसदी के बीच सिजेरियन मामले उचित हैं लेकिन इस से ज्यादा मामले खतरनाक संकेत देते हैं. 5 में से 1 महिला सिजेरियन डिलीवरी के रास्ते को चुनती है. कई देशों में औपरेशन के जरिए प्रसव की महामारी देखी जा रही है. यहां तक कि कई ऐसे केसों में औपरेशन कर दिए जाते हैं जबकि इस अप्राकृतिक डिलीवरी की जरूरत नहीं होती है. सिजेरियन करते समय पेट पर चीरा लगा कर बच्चे को गर्भाशय से बाहर निकाला जाता है. सामान्य प्रसव में महिला को 24 घंटे में अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है जबकि सिजेरियन में कम से कम उसे 5 दिन अस्पताल में रहना पड़ता है.

कब जरूरी है सिजेरियन

कैलाश अस्पताल, नोएडा की गाइनोकोलौजिस्ट डा. दीप्ती मैथानी के अनुसार :

-गर्भवती महिला का ब्लडप्रैशर बढ़ने या दौरा पड़ने की स्थिति में सिजेरियन औपरेशन किया जाता है वरना दिमाग की नसें फट सकती हैं और लिवर व किडनी खराब हो सकते हैं.

-कभीकभी देखा गया है कि छोटे कद वाली महिलाओं के कूल्हे की हड्डी छोटी होने के कारण बच्चा सामान्य तरीके से नहीं हो पाता.

-कई बार दवाओं से बच्चेदानी का मुंह नहीं खुल पाता, ऐसे में सर्जरी करनी पड़ती है. ज्यादा खून बहने पर भी सिजेरियन औपरेशन करना पड़ सकता है.

-बच्चे की धड़कन कम होने या गले में गर्भनाल लिपटी होने, बच्चे का आड़ा या उलटा होना, कमजोरी या खून का दौरा कम होने पर भी औपरेशन किया जाता है.

-बच्चा जब पेट में ही गंदा पानी (मल-मूत्र) कर दे तो उसे मिकोनियम कहते हैं इस स्थिति में भी तुरंत औपरेशन कर बच्चे की जान बचाई जाती है.

सिजेरियन और भ्रांतियां

समाज में सिजेरियन डिलीवरी के बाबत काफी भ्रम है, जिन में से कुछ ये हैं:

पहला बच्चा सिजेरियन हो तो दूसरा सामान्य नहीं होता? ऐसे में सिजेरियन की संभावना बढ़ जाती है क्योंकि दूसरी बार प्रसव पीड़ा के दौरान टांके फटने का डर रहता है. पर यह जरूरी नहीं कि पहला केस अगर अप्राकृतिक हो तो दूसरा सामान्य नहीं हो सकता.

आम धारणा बन गई है कि सिजेरियन के बाद महिला बस पूरा आराम ही करे. माना कि सर्जरी के बाद महिला को ज्यादा से ज्यादा आराम की जरूरत होती है लेकिन 1 महीने के बाद उसे अपने रोजमर्रा के काम करना शुरू कर देना चाहिए. डाक्टर द्वारा बताए गए व्यायाम भी करें अन्यथा महिला मोटी हो सकती है.

सिजेरियन डिलीवरी के बाद बौडी फूलती ही है? ऐसा नहीं है कि औपरेशन होने के बाद आप मोटी हो ही जाएंगी. यह गलत धारणा है. सब का बौडी स्ट्रक्चर अलगअलग होता है.

कब जरूरी है डिलीवरी?

गाइनोकोलौजिस्ट डा. दीप्ती मैथानी के मुताबिक, डिलीवरी 37 हफ्ते और 40+1 हफ्ते के बीच होनी उचित रहता है. यह चक्र कंपलीट है और बच्चा पूरा स्वस्थ रहता है. कम हफ्ते में डिलीवरी होने पर मां और बच्चे दोनों को कई प्रकार के कौंप्लिकेशंस हो जाते हैं. इसलिए ध्यान रखिए और समयानुसार खाइए पीजिए और डाक्टर की सलाह अनुसार ही चलिए.

वहीं, बौलीवुड ऐक्ट्रैसेस को देखते हुए देर से बच्चे को जन्म देना एक ट्रैंड सा बन गया है. विज्ञान शादी की उम्र तो नहीं बताता पर बच्चे को जन्म देने के लिए 20 से 35 वर्ष के बीच की उम्र सही बताई गई है. 18 साल से कम आयु में बच्चे के जन्म के लिए शरीर तैयार नहीं होता. वहीं, 35 साल के बाद बच्चे के जन्म में कई तरह की मैडिकल परेशानियों खड़ी हो सकती हैं जो मां और बच्चा दोनों के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं.

शरीर में बदलाव

सिजेरियन डिलीवरी के बाद में शरीर में कई बदलाव देखे जा सकते हैं, जैसे :

गर्भवती होने पर वजन का बढ़ना स्वाभाविक है. सिजेरियन डिलीवरी होने पर मोटापा कुछ कम तो होता है पर इतना नहीं. त्वचा फीकी पड़ने लगती है और पूरा शरीर थुलथुला हो जाता है. टांके कटने के बाद डाक्टर से सलाह कर के व्यायाम करना शुरू करें. ध्यान रखें ऐसी ऐक्सरसाइज न करें कि जिस से शरीर में खिंचाव या दर्द महसूस होने लगे. हां, यह सच है कि हारमोंस के प्रभाव से जोड़ों में ढीलापन और दर्द हो जाता है व पेट की मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं.

सामान्य डिलीवरी वाली महिलाएं 6 हफ्तों के बाद किसी भी तरह की ऐक्सरसाइज करना शुरू कर सकती हैं और अगर आप की डिलीवरी सिजेरियन है तो 3 महीनों के बाद ही ऐक्सरसाइज शुरू करें. अगर डिलीवरी के बाद नियमित रूप से उचित ऐक्सरसाइज और उचित खानपान का ध्यान रखा जाए तो शायद आप का वजन बढ़े ही नहीं.

सिजेरियन करवाने के शौकीनों को याद रखना चाहिए कि औपरेशन बिना जोखिम के नहीं होता. इस औपरेशन में अधिक रक्तस्राव होता है. यह संक्रामक भी हो सकता है. दवाएं रिऐक्ट कर सकती हैं. बच्चे को जितने इक्विपमैंट्स से निकाला जाता है उन से भी चोट लग सकती है. जीवनभर वजन उठाने में परेशानी हो सकती है.

अस्पताल में सामान्य डिलीवरी का जहां खर्च 5 हजार से 15 हजार रुपए तक आता है तो वहीं सिजेरियन का यही खर्च इस का चौगुना हो जाता है. यदि इस में एनेस्थीसिया, सहायक, पेडियाट्रिशियन और अस्पताल का खर्च को शामिल कर दिया जाए तो 50 हजार रुपए के ऊपर तक का बिल समाने आ जाता है. आजकल निजी अस्पतालों से जुड़े कुछ गाइनी डाक्टर अपना वेतन नहीं लेते, वे जो सिजेरियन करते हैं उन में उन की मोटी फीस शामिल होती है. ये कमाई दो नंबर की होती है. मुंबई के एक उपनगर घाटकोपर में एक गाइनी के घर आयकर का छापा पड़ा तो उस महिला ने गद्दे में रुई के स्थान पर नोट ठूंस रखे थे. आजकल अधिकांश गाइनी की कमाई सिजेरियन औपरेशनों और गर्भपातों से खूब हो रही है.

सिजेरियन बना बाधा

डाक्टरों द्वारा मरीजों के परिजनों को इस कदर भयभीत किया जाता है कि वे खुद कह उठते हैं, ‘जैसा आप ठीक समझें. डाक्टर साहब आप पैसों की चिंता न करें, बच्चे को बचा लीजिए.’ ज्यादातर डाक्टर जो परिजनों को डराते हैं वे कुछ इस तरह से हैं जैसे गर्भनाल में बच्चा फंस गया है, बच्चा उलटा है, बच्चा मूवमैंट नहीं कर रहा, धड़कन नहीं आ रही बच्चे की, बच्चे के मुंह में मल चला गया है. बच्चे का सिर बहुत बड़ा है और ऐसे में उस के बाहर आने में कौंप्लिकेशंस हो सकते हैं, गर्भवती महिला हमारे साथ सपोर्ट नहीं कर पा रही है, बच्चा बेहद कमजोर है इसलिए फौरन ऐक्शन लेना पड़ेगा आदि. दरअसल, सिजेरियन औपरेशन करना डाक्टरों का पैसा कमाने का धंधा बन गया है. डर कर लोग अपनी पत्नी या बच्चे को बचाने के लिए भावुक हो उठते हैं. आप के साथ कभी ऐसा हो तो सोचसमझ कर ही व सारे पहलुओं को जान कर ही उचित निर्णय लें.

भोर- राजवी को कैसे हुआ अपनी गलती का एहसास- भाग 2

ये ऐसे सपने थे जिन्हें हर कुंआरी, महत्त्वाकांक्षी और उत्साही लड़की देखती है. राजवी खुश थी, लेकिन एक हकीकत उसे खटक रही थी. वह इतनी सुंदर और पति था सांवला. जोड़ी कैसे जमेगी उस के साथ उस की? पर रोमांचित कर देने वाली परदेशी धरती ने उसे ज्यादा सोचने का समय ही कहां दिया.

कई दिन दोनों खूब घूमे. शौपिंग, पार्टी जो भी राजवी का मन किया अक्षय ने उसे पूरा किया. फिर शुरू हुई दोनों की रूटीन लाइफ. वैसे भी सपनों की दुनिया में सब कुछ सुंदर सा, मनभावन ही होता है. जिंदगी की हकीकत तो वास्तविकता के धरातल पर आ कर ही पता चलती है.

एक दिन अक्षय ने फरमाइश की, ‘‘आज मेरा इंडियन डिश खाने को मन कर रहा है.’’

‘‘इंडियन डिश? यू मीन दालचावल और रोटीसब्जी? इश… मुझे ये सब बनाना नहीं आता. मैं तो अपने घर में भी खाना कभी नहीं बनाती थी. मां बोलती थीं तब भी नहीं. और वैसे भी पूरा दिन रसोई में सिर फोड़ना मेरे बस की बात नहीं. मैं उन लड़कियों में नहीं, जो अपनी जिंदगी, अपनी खुशियां घरेलू कामकाज के जंजालों में फंस कर बरबाद कर देती हैं.’’

चौंक उठा अक्षय. फिर भी संभलते हुए बोला, ‘‘अब मजाक छोड़ो, देखो मैं ये सब्जियां ले कर आया हूं. तुम रसोई में जाओ. तुम्हारी हैल्प करने मैं आता हूं.’’

‘‘तुम्हें ये सब आता है तो प्लीज तुम ही बना लो न… दालसब्जी वगैरह मुझे तो भाती भी नहीं और बनाना भी मुझे आता नहीं. और हां,

2 दिनों के बाद तो मेरी स्टडी शुरू होने वाली है, क्या तुम भूल गए? फिर मुझे टाइम ही कहां मिलेगा इन सब झंझटों के लिए. अच्छा यही रहेगा कि तुम किसी इंडियन लेडी को कुक के तौर पर रख लो.’’

अक्षय का दिमाग सन्न रह गया. राजवी को हर रोज सुबह की चाय बनाने में भी नखरे करती थी और ठीक से कोई नाश्ता भी नहीं बना पाती थी. लेकिन आज तो उस ने हद ही कर दी थी. तो क्या यही है राजवी का असली रूप? लेकिन कुछ भी बोले बिना अक्षय औफिस के लिए निकल गया.

पर यह सब तो जैसे शुरुआत ही थी. राजवी के उस नए रंग के साथ जब नया ढंग भी सामने आने लगा अक्षय के तो होश ही उड़ गए. एक दिन राजवी बिलकुल शौर्ट और पतले से कपड़े पहन कर कालेज के लिए निकलने लगी.

अक्षय ने उसे टोकते हुए कहा, ‘‘यह क्या पहना है राजवी? यह तुम्हें शोभा नहीं देता. तुम पढ़ने जा रही हो तो ढंग के कपड़े पहन कर जाओगी तो अच्छा रहेगा…’’

‘‘ये अमेरिका है मिस्टर अक्षय. और फिर तुम ने ही तो कहा था न कि तुम मौडर्न सोच रखते हो, तो फिर ऐसी पुरानी सोच क्यों?’’

‘‘हां कहा था मैं ने पर पराए देश में तुम्हारी सुरक्षा की भी चिंता है मुझे. मौडर्न होने की भी हद होती है, जिसे मैं समझता हूं और चाहता हूं कि तुम भी समझ लो.’’

‘‘मुझे न तो कुछ समझना है और न ही तुम्हारी सोच और चिंता मुझे वाजिब लगती है. और यह मेरी निजी लाइफ है. मैं अभी उतनी बूढ़ी भी नहीं हो गई कि सिर पर पल्लू रख कर व साड़ी लपेट कर रहूं. और बाई द वे तुम्हें भी तो सुंदर पत्नी चाहिए थी न? तो मैं जब सुंदर हूं तो दुनिया को क्यों न दिखाऊं?’’

राजवी के इस क्यों का कोई जवाब नहीं था अक्षय के पास.

फिर जैसेजैसे दिन बीतते गए, दोनों के बीच छोटीमोटी बातों पर झगड़े बढ़ते गए. अक्षय को समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे? भूल कहां हो रही है और इस स्थिति में क्या हो सकता है, क्योंकि अब पानी सिर के ऊपर शुरू हो चुका था.

राजवी ने जो गु्रप बनाया था उस में अमेरिकन युवकों के साथ इंडियन लड़के भी थे. शर्म और मर्यादा की सीमाएं तोड़ कर राजवी उन के साथ कभी फिल्म देखने तो कभी क्लब चली जाती. ज्यादातर वह उन के साथ लंच या डिनर कर के ही घर आती. कई बार तो रात भर वह घर नहीं आती. अक्षय के पूछने पर वह किसी सहेली या प्रोजैक्ट का बहाना बना देती.

अक्षय बहुत दुखी होता, उसे समझाने की कोशिश करता पर राजवी उस के साथ बात करने से भी कतराती. अक्षय को ज्यादा परेशानी तो तब हुई जब राजवी अपने बौयफ्रैंड्स को ले कर घर आने लगी. अक्षय उन के साथ मिक्स होने या उन्हें कंपनी देने की कोशिश करता तो राजवी सब के बीच उस के सांवले रंग और चश्मे को मजाक का विषय बना देती और अपमानित करती रहती.

एक दिन इस सब से तंग आ कर अक्षय ने नीतू आंटी को फोन लगाया. उस ने ये सब बातें बताना शुरू ही किया था कि राजवी उस से फोन छीन कर रोने जैसी आवाज में बोलने लगी, ‘‘आंटी, आप ने तो कहा था कि तुम वहां राज करोगी. जैसे चाहोगी रह सकोगी. पर आप का यह भतीजा तो मुझे अपने घर की कुक और नौकरानी बना कर रखना चाहता है. मेरी फ्रीडम उसे रास नहीं आती.’’

अक्षय आश्चर्यचकित रह गया. उस ने तब तय कर लिया कि अब से वह न तो किसी बात के लिए राजवी को रोकेगा, न ही टोकेगा. उस ने राजवी को बोल दिया कि तुम अपनी मरजी से जी सकती हो. अब मैं कुछ नहीं बोलूंगा.

पर थोड़े दिनों के बाद अक्षय ने नोटिस किया कि राजवी उस के साथ शारीरिक संबंध भी नहीं बनाना चाहती. उसे अचानक चक्कर भी आ जाता था. चेहरे की चमक पर भी न जाने कौन सा ग्रहण लगने लगा था.

अब वह न तो अपने खाने का ध्यान रखती थी न ही ढंग से आराम करती थी. देर रात तक दोस्तों और अनजान लोगों के साथ भटकते रहने की आदत से उस की जिंदगी अव्यवस्थित बन चुकी थी.

एक दिन रात को 3 बजे किसी अनजान आदमी ने राजवी के मोबाइल से अक्षय को फोन किया, ‘‘आप की वाइफ ने हैवी ड्रिंक ले लिया है और यह भी लगता है कि किसी ने उस के साथ रेप करने की कोशिश…’’

अक्षय सहम गया. फिर वह वहां पहुंचा तो देखा कि अस्तव्यस्त कपड़ों में बेसुध पड़ी राजवी बड़बड़ा रही थी, ‘‘प्लीज हैल्प मी…’’

पास में खड़े कुछ लोगों में से कोई बोला, ‘‘इस होटल में पार्टी चल रही थी. शायद इस के दोस्तों ने ही… बाद में सब भाग गए. अगर आप चाहो तो पुलिस…’’

‘‘नहींनहीं…,’’ अक्षय अच्छी तरह जानता था कि पुलिस को बुलाने से क्या होगा. उस ने जल्दी से राजवी को उठा कर गाड़ी में लिटा दिया और घर की ओर रवाना हो गया. राजवी की ऐसी हालत देख कर उस कलेजा दहल गया था. आखिर वह पत्नी थी उस की. जैसी भी थी वह प्यार करता था उस को.

घर पहुंचते ही उस ने अपने फ्रैंड व फैमिली डाक्टर को बुलाया और फर्स्ट ऐड करवाया. उस के चेहरे और शरीर पर जख्म के निशान पड़ चुके थे.

दूसरे दिन बेहोशी टूटने के बाद होश में आते ही राजवी पिछली रात उस के साथ जो भी घटना घटी थी, उसे याद कर रोने लगी. अक्षय ने उसे रोने दिया. ‘जल्दी ही अच्छी हो जाओगी’ कह कर वह उसे तसल्ली देता रहा पर क्या हुआ था, उस के बारे में कुछ भी नहीं पूछा. खाना बनाने वाली माया बहन की हैल्प से उसे नहलाया, खिलाया फिर उसे अस्पताल ले जाने की सोची.

वैलेंटाइन डे : पति पत्नी की प्यार भरी कहानी – भाग 2

‘‘अंकल, मैं एक और उदाहरण दूं?’’ टिंकू ने बड़े उत्साह से पूछा.

‘‘मैं मना कर दूं तो रुक जाओगे?’’ मैं ने बड़़ी आशा से पूछा.

‘‘न, रुकूंगा तो नहीं. आप की इज्जत रखने के लिए यों ही पूछ लिया था. चूंकि टिंकू की मम्मी टीचर हैं इसीलिए बेटे को भी बातबात पर उदाहरण देने की आदत है.’’

‘‘सुनिए, अंकल, विदेशी अपने मांबाप को ‘ओल्ड एज होम’ में रखते हैं और ‘मदर्स डे’ या ‘फादर्स डे’ के दिन फूलों का गुलदस्ता दे कर उन्हें विश करते हैं.’’

टिंकू की बात मुझे बहुत जंची.

‘‘चल, जा, अपनी पढ़ाई कर. छोटा मुंह बड़ी बात,’’ श्रीमतीजी ने उसे डांट दिया. शायद उन्हें याद नहीं था कि टिंकू मेरे बेटे से 4 साल बड़ा था. श्रीमतीजी का यह तेवर शायद इसलिए बना कि वह भी अपने सासससुर को अपने घर में फटकने नहीं देती थीं.

दोपहर के करीब 2 बजे सुमित का फोन आया :

‘‘यार, घर में महाभारत छिड़ा हुआ है. खाना तो क्या चाय तक नसीब नहीं हुई. बड़ी भूख लगी है.’’

‘‘यहां भी वही हाल है,’’ मैं ने रोंआसे स्वर में कहा.

‘‘तू जल्दी से घर से बाहर आ जा,’’ वह मेरा बचपन का दोस्त था और इत्तफाक से हमें एक ही विभाग में नौकरी भी मिल गई थी.

पहले हमारे मकान बहुत दूर थे पर बाद में हम ने पासपास में मकान किराए पर ले लिए. बाहर सड़क पर वह मेरा इंतजार कर रहा था.

‘‘क्या बात है?’’ मैं जानता था पर यों ही पूछ लिया जो आम बात है.

‘‘चल, चलतेचलते बात करते हैं,’’ सुमित बोला.

‘‘सब से पहले किसी होटल में  चलते हैं,’’ सुमित बोला तो मैं जान गया कि वह अधिक देर तक भूखा नहीं रह सकता. खाना खाने के बाद हमारी जान में जान आई.

‘‘हम लोगों ने तो खा लिया पर बाकी बीवीबच्चों का क्या होगा?’’ मैं ने सुमित से पूछा.

‘‘मेरे बच्चों ने तो कुछ बना कर खा लिया है. उन्होंने उसे भी खिला दिया होगा. हां, तू बबलू के लिए कुछ ले ले. वह बेचारा छोटा है.’’

मुझे याद आया कि बेटे को मैगी बना कर खिला दी गई थी. फिर भी मन न माना तो मैं ने दोनों के लिए खाना पैक करवा दिया.

अब सुमित ने भी कुछ खाने की चीजें बंधवा लीं. पेट में आग ठंडी पड़ी तो उस ने कहा, ‘‘अरे, यार, कुछ खरीदना ही पडे़गा वरना मेरी तो खैर नहीं. बच्चे भी मेरे ही पीछे पड़ गए हैं. उन सब ने मुझे जंगली और गंवार करार दे दिया है़.’’

‘‘तुम ठीक कह रहे हो.  सुबह माधव का बेटा टिंकू आया था. वह जले पर और नमक छिड़क गया.’’

‘‘तो ऐसा करते हैं कि पहले यह खाना घर में दे कर हम दोनों बाजार का एक चक्कर लगा आते हैं. देखते हैं कि बाजार में औरतों के लिए क्याक्या चीजें मिलती हैं.’’

‘‘मगर हम खरीदेंगे क्या. मैं ने तो जिंदगी में कभी औरतों का कोई सामान नहीं खरीदा,’’ मैं ने दीनहीन बन कर कहा.

‘‘तो क्या हुआ? अब सीखेंगे,’’ सुमित हेकड़ी बघार कर बोला, ‘‘हम हमेशा उन्हें अपना पर्स सौंप देते हैं. इस से 2 नुकसान होते हैं. पहला हमारा बजट बिगड़ता है. दूसरा नुकसान यह है कि हमारे ही पैसों से चीजें खरीद कर हम को धत्ता बताती हैं.’’

‘‘मगर मेरे पास तो 500-600 से अधिक रुपए नहीं हैं. सारे पैसे वह पहले सप्ताह में ही उड़ा देती है,’’ मैं ने मायूसी से कहा.

‘‘वही हाल मेरा भी है और उस पर पूरा महीना आगे पड़ा है. खैर, फिलहाल घर जा कर पैसे  ले कर आओ. बाद की बाद में सोचते हैं.’’

दोनों अपनेअपने घरों में खाना रख कर पैसे ले कर वापस आए.

हमारे पास अब भी इतने पैसे नहीं थे कि हम सोनेचांदी की कोई चीज खरीद सकें. सो इधरउधर देखते हुए आगे बढे़ जा रहे थे.

मैं ने कहा ‘‘चलो, कोई अच्छी सी साड़ी ले लेते हैं,’’ इस पर सुमित बोला, ‘‘नहीं, यार, साड़ी तो उसे तोहफा भी नहीं लगेगी. उसे ऐसे रख लेगी जैसे सब्जियों का थैला रख लिया हो.’’

हम ने तरहतरह के तोहफों के बारे में सोचा मगर कुछ भी नहीं जंचा. कुछ देर बाद मुझे लगा कि मैं अकेला चला जा रहा हूं. मेरे साथ सुमित नहीं है. चारों ओर देखा मगर वह कहीं नजर न आया. मैं पलट कर वापस चल पड़ा. थोड़ी दूर चलने के बाद वह नजर आया. वह भी शायद मुझे ही ढूंढ़ रहा था.

‘‘कहां चला गया था यार? कब से तुझे ढूंढ़ रहा हूं,’’ मैं ने डांटा.

‘‘वाह, उलटा चोर कोतवाल को डांटे. एक तो मुझे छोड़ कर खुद आगे निकल गया, ऊपर से अब मुझे ही डांट रहा है.’’

‘‘यार, मेरे दिमाग में एक आइडिया आया है. यहीं सामने मैं ने एक आर्टीफिशियल ज्वेलरी की दुकान देखी. 1 ग्राम सोने की कोटिंग वाली. हम कह देंगे असली है.’’

‘‘पागल हो गया है? सुबह उठ कर औरतें इन्हीं गहनों और साडि़यों की दुकानों पर मंडराती रहती हैं. ?ाट पहचान जाएंगी. उन के सामान्य ज्ञान का इतना कम अंदाजा मत लगा,’’ डांटने की बारी सुमित की थी, ‘‘पकडे़ गए तो बीवी से ऐसी धुनाई होगी कि जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो जाओगे,’’ उस ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘शाम तक हम दोनों यों ही भटकते रहे. कुछ भी खरीद नहीं पाए. हार कर घर लौटने ही वाले थे कि मेरी नजर एक इत्र की दुकान पर पड़ी.

‘‘यार, सुमित, चल, परफ्यूम ही खरीद लेते हैं,’’ मैं ने कहा.

‘‘पर मेरे वाली तो कभी परफ्यूम लगाती ही नहीं.’’

‘‘मेरे वाली भी कहां खरीदती है? मेरे खयाल से खरीदे हुए परफ्यूम के बजाय तोहफे में मिले हुए को इस्तेमाल करना औरतें ज्यादा पसंद करती हैं, ‘‘मैं ने ज्ञान बघारा.

‘‘ऐसा क्यों?’’ सुमित ने भोलेपन से पूछा.

‘‘क्योंकि इन की कीमत उन की नजर में ज्यादा होती है और किसी को दिखती भी नहीं.’’

‘‘वाह यार, तू तो गुरु हो गया है. मेरी बीवी परफ्यूम का प्रयोग तब करती है जब उसे किसी अच्छे फंक्शन में जाना हो और जाने से पहले मु?ा पर भी 2-4 छींटे मार देती है.’’

हम दोनों परफ्यूम की दुकान में घुस गए. वहां विविध रंगों और आकृतियों की छोटीबड़ी सुदर कांच की बोतलें इस प्रकार सजी हुई थीं कि जिस ने जिंदगी में कभी परफ्यूम का प्रयोग न किया हो उस का मन भी उन्हें खरीदने को बेचैन हो उठे.

हम दोनों थोड़ी देर तक दुकान में मोलभाव कर यह सम?ा गए कि 150-200 रुपए  में बढि़या परफ्यूम मिल जाता है. हम ने जांचपरख कर एकएक परफ्यूम की बोतल खरीद ली. बाहर निकलने के बाद सुमित के दिमाग में एक संदेह उठा.

‘‘यार, इन लोगों को तो कीमती तोहफे चाहिए. भला ये 200 रुपए वाली छोटी सी शीशी उन की नजर में क्या चढ़ेगी. मुझे तो लगता है इसे हमारे ही सिर पर दे मारेंगी.’’

‘‘तू फिकर क्यों करता है? मैं ने उस का भी उपाय सोच लिया है. कह देंगे हमारे दफ्तर का कोई दोस्त दुबई से लौट कर आया है या हम ने उसी से यह परफ्यूम 1,500 रुपए दे कर खरीदा है.’’

‘‘अरे वाह, तेरा दिमाग तो उपायों से भरा पड़ा है. इन लोगों को तो यह भी पता नहीं होगा कि विदेशी परफ्यूम क्या होता है.’’

‘‘हां, मगर आज इसे कहीं छिपा कर रखना होगा. कल शाम को आफिस से आने के बाद ही तो दे पाएंगे.’’

यही तय हुआ. हम ने अच्छे से गिफ्ट पैक करा कर उसे अपनेअपने स्कूटर की डिक्की में छिपा दिया. हम खुशीखुशी घर वापस लौटे. पत्नी ने चुपचाप खाना लगा दिया. हम खाने के कार्यक्रम के बाद चुपचाप मुंह ढांप कर पड़ गए.

अगली शाम कुछ समय यहांवहां बिता कर शाम ढलतेढलते घर पहुंचे. सुमित सीधे अपने घर चला गया. मेरा घर थोड़ा आगे था. गाड़ी से उतर कर मैं ने देखा कि दरवाजे पर ताला लटक रहा है. सारे खिड़कीदरवाजे बंद. मैं सिर पकड़ कर वहीं सीढि़यों पर बैठ गया. हो गई हमारी खटिया खड़ी. हमारी धर्मपत्नी हम से बहुत नाराज है. हमें निकम्मा करार देते हुए घर छोड़ कर मायके चली गई. हम गलीमहल्ले में मुंह दिखाने लायक नहीं रहे.

हमारी आधी घरवाली, जिस की हम चुपकेचुपके आराधना करते हैं (आजकल पुरानी वस्तु दे कर नई लेने की बहुत सी स्कीमें चल रही हैं. काश, ऐसी कोई स्कीम होती) उस की नजरों में हमारी क्या इज्जत रह जाएगी? सुमित हमेशा कहता है कि यार तू बहुत लकी है जो तुझे खूबसूरत साली मिली. मुझे तु?ा से जलन होती है, क्योंकि मेरी कोई साली नहीं है. तू अपनी साली को हमेशा अच्छे से पटा कर रख क्योंकि बीवी अगर केक है तो साली क्रीम है. तू तो जानता है कि लोग केक  से ज्यादा क्रीम के ही दीवाने होते हैं.

हम वहां अंधेरे में बैठे बिसूरते रहे कि हमें किसी की आवाज सुनाई दी. हम ने आंखें खोलीं तो पाया कि सामने सुमित का बेटा समीर खड़ा था. उस ने मुझे घूरते हुए दोबारा आवाज दी, ‘‘अंकल, घर चलिए, पापा बुला रहे हैं.’’

इस से पहले कि मैं उस से कुछ पूछता वह वहां से हवा हो गया. मैं 2 मिनट तक यों ही बैठा रहा, फिर धीरे से उठा और अपने पांव को घसीटते हुए सुमित के घर पहुंचा. दरवाजे पर ही मुझे सुमित की पत्नी ने दबोच लिया, ‘‘क्यों भाई साहब, कहां रह गए थे? आप लोगों को समय पर घर की याद भी नहीं आती.’’

‘‘नहीं भाभी, ऐसी बात नहीं है…’’

‘‘बसबस, कहानियां मत सुनाओ, चलो अंदर.’’

मैं सिर झुकाए भाभी के पीछेपीछे अंदर चला आया.

सुगंध : धन दौलत के घमंड में डूबे लड़के की कहानी – भाग 2

जिस घटना ने नवीन के जीवन की दिशा को बदला, वह लगभग 3 साल पहले घटी थी.

उस दिन मेरे बेटे विवेक का जन्मदिन था. नवीन उसे नए मोबाइल फोन का उपहार देने के लिए अपने साथ बाजार ले गया.

वहां दौलत की अकड़ से बिगडे़ नवीन की 1 फोन पर नीयत खराब हो गई. विवेक के लिए फोन खरीदने के बाद जब दोनों बाहर निकलने के लिए आए तो शोरूम के सुरक्षा अधिकारी ने उसे रंगेहाथों पकड़ जेब से चोरी का मोबाइल बरामद कर लिया.

‘गलती से फोन जेब में रह गया है. मैं ऐसे 10 फोन खरीद सकता हूं. मुझे चोर कहने की तुम सब हिम्मत कैसे कर रहे हो,’ गुस्से से भरे नवीन ने ऐसा आक्रामक रुख अपनाया, पर वे लोग डरे नहीं.

मामला तब ज्यादा गंभीर हो गया जब नवीन ने सुरक्षा अधिकारी पर तैश में आ कर हाथ छोड़ दिया.

उन लोगों ने पहले जम कर नवीन की पिटाई की और फिर पुलिस बुला ली. बीचबचाव करने का प्रयास कर रहे विवेक की कमीज भी इस हाथापाई में फट गई थी.

पुलिस दोनों को थाने ले आई. वहीं पर चोपड़ा और मैं भी पहुंचे. मैं सारा मामला रफादफा करना चाहता था क्योंकि विवेक ने सारी सचाई मुझ से अकेले में बता दी थी, लेकिन चोपड़ा गुस्से से पागल हो रहा था. उस के मुंह से निकल रही गालियों व धमकियों के चलते मामला बिगड़ता जा रहा था.

उस शोरूम का मालिक भी रुतबेदार आदमी था. वह चोपड़ा की अमीरी से प्रभावित हुए बिना पुलिस केस बनाने पर तुल गया.

एक अच्छी बात यह थी कि थाने का इंचार्ज मुझे जानता था. उस के परिवार के लोग मेरे दवाखाने पर छोटीबड़ी बीमारियों का इलाज कराने आते थे.

उस की आंखों में मेरे लिए शर्मलिहाज के भाव न होते तो उस दिन बात बिगड़ती ही चली जाती. वह चोपड़ा जैसे घमंडी और बदतमीज इनसान को सही सबक सिखाने के लिए शोरूम के मालिक का साथ जरूर देता, पर मेरे कारण उस ने दोनों पक्षों को समझौता करने के लिए मजबूर कर दिया.

हां, इतना उस ने जरूर किया कि उस के इशारे पर 2 सिपाहियों ने अकेले में नवीन की पिटाई जरूर की.

‘बाप की दौलत का तुझे ऐसा घमंड है कि पुलिस का खौफ भी तेरे मन से उठ गया है. आज चोरी की है, कल रेप और मर्डर करेगा. कम से कम इतना तो पुलिस की आवभगत का स्वाद इस बार चख जा कि कल को ज्यादा बड़ा अपराध करने से पहले तू दो बार जरूर सोचे.’

मेरे बेटे की मौजूदगी में उन 2 पुलिस वालों ने नवीन के मन में पुलिस का डर पैदा करने के लिए उस की अच्छीखासी धुनाई की थी.

उस घटना के बाद नवीन एकाएक उदास और सुस्त सा हो गया था. हम सब उसे खूब समझाते, पर वह अपने पुराने रूप में नहीं लौट पाया था.

फिर एक दिन उस ने घोषणा की, ‘मैं एम.बी.ए. करने जा रहा हूं. मुझे प्रापर्टी डीलर नहीं बनना है.’

यह सुन कर चोपड़ा आगबबूला हो उठा और बोला, ‘क्या करेगा एम.बी.ए. कर के? 10-20 हजार की नौकरी?’

‘इज्जत से कमाए गए इतने रुपए भी जिंदगी चलाने को बहुत होते हैं.’

‘क्या मतलब है तेरा? क्या मैं डाका डालता हूं? धोखाधड़ी कर के दौलत कमा रहा हूं?’

‘मुझे आप के साथ काम नहीं करना है,’ यों जिद पकड़ कर नवीन ने अपने पिता की कोई दलील नहीं सुनी थी.

बाद में मुझ से अकेले में उस ने अपने दिल के भावों को बताया था, ‘चाचाजी, उस दिन थाने में पुलिस वालों के हाथों बेइज्जत होने से मुझे मेरे पिताजी की दौलत नहीं बचा पाई थी. एक प्रापर्टी डीलर का बेटा होने के कारण उलटे वे मुझे बदमाश ही मान बैठे थे और मुझ पर हाथ उठाने में उन्हें जरा भी हिचक नहीं हो रही थी.

‘दूसरी तरफ आप के बेटे विवेक के साथ उन्होंने न गालीगलौज की, न मारपीट. क्यों उस के साथ भिन्न व्यवहार किया गया? सिर्फ आप के अच्छे नाम और इज्जत ने उस की रक्षा की थी.

‘मैं जब भी उस दिन अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को याद करता हूं, तो मन शर्म व आत्मग्लानि से भर जाता है. मैं आगे इज्जत से जीना चाहता हूं…बिलकुल आप की तरह, चाचाजी.’

अब मैं उस से क्या कहता? उस के मन को बदलने की मैं ने कोशिश नहीं की. चोपड़ा ने उसे काफी डराया- धमकाया, पर नवीन ने एम.बी.ए. में प्रवेश ले ही लिया.

इन बापबेटे के बीच टकराव की स्थिति आगे भी बनी रही. नवीन बिलकुल बदल गया था. अपने पिता के नक्शेकदम पर चलने में उसे बिलकुल रुचि नहीं रही थी. किसी भी तरह से बस, दौलत कमाना उस के जीवन का लक्ष्य नहीं रहा था.

फिर उसे अपने साथ पढ़ने वाली शिखा से प्यार हो गया. वह शिखा से शादी करना चाहता है, यह बात सुन कर चोपड़ा बेहद नाराज हुआ था.

‘अगर इस लड़के ने मेरी इच्छा के खिलाफ जा कर शादी की तो मैं इस से कोई संबंध नहीं रखूंगा. फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी इसे मेरी दौलत की,’ ऐसी धमकियां सुन कर मैं काफी चिंतित हो उठा था.

दूसरी तरफ नवीन शिखा का ही जीवनसाथी बनना चाहता था. उस ने प्रेमविवाह करने का फैसला किया और पिता की दौलत को ठुकरा दिया.

नवीन और शिखा ने कोर्ट मैरिज की तो मेरी पत्नी और मैं उन की शादी के गवाह बने थे. इस बात से चोपड़ा हम दोनों से नाराज हो गया पर मैं क्या करता? जिस नवीन को मैं ने गोद में खिलाया था, उसे कठिन समय में बिलकुल अकेला छोड़ देने को मेरा दिल राजी नहीं हुआ था.

नवीन और शिखा दोनों नौकरी कर रहे थे. शिखा एक सुघड़ गृहिणी निकली. अपनी गृहस्थी वह बड़े सुचारु ढंग से चलाने लगी. चोपड़ा ने अपनी नाराजगी छोड़ कर उसे अपना लिया होता तो यह लड़की उस की कोठी में हंसीखुशी की बहार निश्चित ले आती.

चोपड़ा ने मेरे घर आना बंद कर दिया. कभी किसी समारोह में हमारा आमनासामना हो जाता तो वह बड़ा खिंचाखिंचा सा हो जाता. मैं संबंधों को सामान्य व सहज बनाने का प्रयास शुरू करता, तो वह कोई भी बहाना बना कर मेरे पास से हट जाता.

अब उसे दिल का दौरा पड़ गया था. शराब, सिगरेट, मानसिक तनाव व बेटेबहू के साथ मनमुटाव के चलते ऐसा हो जाना आश्चर्य की बात नहीं थी.

दयादृष्टि : वसंती क्यों डरी-डरी रहती थी ?

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महिला सशक्तीकरण का उदाहरण उच्च पदों पर बैठी महिलाएं नहीं, विनेश फोगाट हैं

हरियाणा की रहने वाली 29 साल की विनेश फोगाट महिला पहलवान हैं. विनेश राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान हैं. इसके अलावा विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में कई पदक जीतने वाली एकमात्र भारतीय महिला पहलवान भी वे हैं. फोगाट 2019 में लौरियस वर्ल्ड स्पोर्ट्स अवार्ड्स के लिए नामांकित होने वाली पहली भारतीय ऐथलीट भी हैं. कुश्ती से विनेशका पारिवारिक रिश्ता सा है. उनके चचेरे भाई अंतर्राष्ट्रीय पहलवान और राष्ट्रमंडल खेलों के पदक विजेता रहे हैं. विनेश के पिता राजपाल फोगाट भी पहलवान रहे हैं. पहलवान गीता और बबीता विनेश की चचेरी बहनें हैं.

कुश्तीमें आने के लिए विनेश के परिवार को काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. उन्हें हरियाणा में अपने गांव में समुदाय के भारी दबाव और विरोध का सामना करना पड़ा. लड़कियों का पहलवानी में आगे आना मुश्किल था. इसके बाद भी विनेश ने हर मुश्किल से लड़ कर पहलवानी की और पदक जीत कर अपने को श्रेष्ठ साबित भी किया. इसके बाद उन्होंने अपनी पंसद के लड़के पहलवान सोमवीर राठी से शादी की.

कुश्ती महासंघ के खिलाफ विरोध प्रदर्शन

विनेश फोगाट सहित 30 भारतीय पहलवानों, ओलिंपिक पदक विजेता साक्षी मलिक, अंशू मलिक और बजरंग पुनिया सहित अन्य ने जनवरी 2023 में एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया. इसके बाद भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) को भंग करने की मांग की. इन सभी का आरोप था कि कोच और अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह वर्षों से महिला खिलाड़ियों का यौन उत्पीड़न कर रहे हैं. दावों की जांच के लिए एक निगरानी समिति बनाने की सरकार की पहल के बाद विरोध प्रदर्शन खत्म कर दिया गया.

इसके बाद अप्रैल 2023 में विनेश और महिला पहलवानों ने कहा कि बृजभूषण द्वारा प्रधानमंत्री मोदी और खेल मंत्री अनुराग ठाकुर को रिपोर्ट करने के बादउन्हें मानसिक रूप से परेशान किया जा रहा है. उनको प्रताड़ित किया गया और जान से मारने की धमकी दी गई. विरोध कर रही महिला पहलवान यह चाहती थीं कि बृजभूषण शरण सिंह को कुश्ती महासंघ से हटाया जाए. उनके खिलाफ मुकदमा कायम हो. किसी महिला को कुश्ती महासंघ का अध्यक्ष बनाया जाए. सरकार ने हर मांग मान ली तो खिलाड़ियों ने भी अपना विरोध छोड़ दिया.

चुनाव में जीता बृजभूषण का सहयोगी

कुश्ती महासंघ से बृजभूषण के बाहर होने के बाद नए चुनाव हुए. उसमें महिला पहलवान अनीता को केवल 7 वोट मिले. 40 वोट पाकर बृजभूषण के करीबी संजय सिंह चुनाव जीत गए. इसके बाद महिला पहलवानों का विरोध फिर से शुरू हो गया. संजय सिंह के कुश्ती महासंघ का चुनाव जीतने के बाद साक्षी मलिक ने भी कुश्ती से संन्यास की घोषणा कर दी.

साक्षी मलिक प्रैस कौन्फ्रेंस में संवाददाताओं से बात करने के बाद अपने जूते वहीं टेबल पर छोड़कर चली गईं. साक्षी मलिक ने कहा, ‘अगर प्रैसिडैंट बृजभूषण जैसा आदमी जो उसका सहयोगी है, उसका बिजनैस पार्टनर है, फैडरेशन में रहेगा तो मैं अपनी कुश्ती को त्यागती हूं. मैं आज के बाद आपको कभी भी वहां नहीं दिखूंगी.’

साक्षी मलिक के खेल से संन्यास लेने की घोषणा के बाद पहलवान बजरंग पुनिया ने भी अपना पद्मश्री पुरस्कार सरकार को लौटा दिया. बजरंग पुनिया ने पद्मश्री पुरस्कार लौटाते हुए कहा, ‘जब तक न्याय नहीं मिलता उन्हें सम्मान नहीं चाहिए.’ अपने सोशल मीडिया हैंडल पर बजरंग पुनिया ने लिखा, ‘हमें सिर्फ भगवान पर भरोसा है. मैंने अपना पद्मश्री सम्मान बहनबेटियों के लिए वापस किया था, उनके सम्मान के लिए वापस किया था और जब तक उन्हें न्याय नहीं मिल जाता तब तक मुझे कोई सम्मान नहीं चाहिए.’ प्रधानमंत्री के नाम सोशल मीडिया पर एक खुला खत लिखा, ‘महिला पहलवानों को अपमानित किए जाने के बाद मैं सम्मानित होकर अपनी जिंदगी नहीं जी पाऊंगा.’

विनेश ने उठाया बड़ा कदम

विनेश फोगाट प्रधानमंत्री तक अपनी बात पहुंचा कर अपने सम्मान वापस करना चाहती थीं. विनेश फोगाट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अपने फैसले की घोषणा की थी. विनेश फोगाट ने अपने पुरस्कार लौटाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचने का प्रयास किया. पुलिस ने उन्हें रोक दिया. विनेश का कहना था कि ऐसे समय में इस तरह के सम्मान बेमतलब हो गए हैं जब पहलवान न्याय पाने के लिए जूझ रहे हैं.

विनेश फोगाट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम लिखे पत्र को अपने सोशल मीडिया हैंडल पर पोस्ट किया. इसमें उन्होंने लिखा, ‘साल 2016 में जब साक्षी ओलिंपिक में मैडल जीतकर आई थी तो उसे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का ब्रैंडएंबेसडर बना दिया गया. लेकिन अब उन्हें कुश्ती छोड़नी पड़ रही है. क्या महिला खिलाड़ी सरकार के विज्ञापनों में छपने के लिए ही बनी हैं ? हम न्याय के लिए बीते एक साल से सड़कों पर हैं, लेकिन कोई हमारी सुध नहीं ले रहा.

‘हमने अपने न्याय के लिए आवाज उठाई तो हमें देशद्रोही बताया गया. बजरंग ने जिस हालत में अपना पद्मश्री वापस करने का फैसला लिया होगा, मुझे नहीं पता, लेकिन मैं उसकी फोटो देखकर अंदर दी अंदर घुट रही हूं. अब मुझे भी अपने पुरस्कारों से घिन्न आने लगी है. मुझे मेजर ध्यानचंद खेलरत्न और अर्जुन पुरस्कार दिया गया था लेकिन अब इसका मेरी जिंदगी में कोई मतलब नहीं रह गया है. मैं ये पुरस्कार वापस करना चाहती हूं ताकि सम्मान से जीने की राह में ये पुरस्कार हम पर बोझ न बनें.’

व्यवस्था के खिलाफ विनेश की जंग

उस दौर में जब शासनसत्ता के डर से विरोध में कोई भी कुछ भी कहने से डर रहा हो वहां विनेश फोगाट ने अपनी बात कहने के लिए प्रधानमंत्री से मिलकर बात कहने का साहस दिखाया. वे पीएमओ तक जाने के लिए निकलीं. उनके हाथ में खेल सम्मान थे जो वे पीएम को वापस करना चाहती थीं. लेकिन उनको यह मौका नहीं मिला. इसके बाद भी विनेश फोगाट ने हार नहीं मानी.

वे अपने पुरस्कार लेकर ‘कर्तव्य पथ’ पर गईं. वहां पुलिस ने उनको मना किया. तब विनेश ने ‘कर्तव्य पथ’ पर ही अपने पर पुरस्कार छोड़ दिए. इसके बाद दिल्ली पुलिस सम्मान उठा ले गई. विनेश फोगाट ने ‘कर्तव्य पथ’ का चुनाव इसलिए किया क्योंकि मोदी सरकार ने ‘राजपथ’ का नाम बदल कर ‘कर्तव्य पथ’ रखते समय देश का कर्तव्य याद दिलाया था. सरकार अपने कर्तव्य भूल गई, जिसके कारण विनेश जैसी महिला पहलवान को यह कदम उठाना पड़ा.

क्या है ‘कर्तव्य पथ’ ?

‘कर्तव्य पथ’ देश की सबसे महत्त्वपूर्ण स्ट्रीट का नाम है. इसका नाम 3 बार बदल चुका है. रायसीना हिल परिसर से इंडिया गेट तक जाने वाली सड़क का नाम पहले ‘किंग्सवे’ था. इसके बगल ‘क्वीन्सवे‘ था. ब्रिटिशकाल में किंग जौर्ज पंचम द्वारा जब राजधानी को कलकत्ता (कोलकाता) से दिल्ली लाया गया तब इसका निर्माण किया गया था. किंग जौर्ज पंचम के निर्देश पर वास्तुकार सर एडविन लुटियन और सर हर्बर्ट बेकर ने नई राजधानी का निर्माण किया. किंग जौर्ज पंचम और उनकी पत्नी क्वीन मैरी ने 15 दिसंबर, 1911 को ब्रिटिशराज की ‘नई राजधानी’ की आधारशिला रखी थी.

किंग के निर्देश पर वास्तुकार सर एडविन लुटियन और सर हर्बर्ट बेकर ने नई राजधानी का निर्माण किया, जिसकी भव्यता और स्थापत्य कला ने यूरोप और अमेरिका के सर्वश्रेष्ठ शहरों को टक्कर दी. इस राजधानी का केंद्र बिंदु रायसीना हिल परिसर था. ‘किंग्सवे’ पर वायसराय हाउस (राष्ट्रपति भवन) और नौर्थ ब्लौक और साउथ ब्लौक शाही सचिवालय थे. ‘क्वीन्सवे‘ पर ग्रेट प्लेस (विजय चैक) से इंडिया गेट तक एक भव्य मार्ग बनाया गया, जिसके दोनों तरफ हरेभरे लौन, फौआरे और सजावटी लैंप पोस्ट थे.

बेकर ने राष्ट्रपति भवन के पास एक गोलाकार संसद भवन बनाया, जिसका उद्घाटन जनवरी 1927 में तत्कालीन वायसराय लौर्ड इरविन ने किया था. 2 विश्वयुद्धों के बीच शहर का निर्माण किया गया था और इसे बनने में 20 साल से अधिक का समय लगा था. वायसराय इरविन ने ही 13 फरवरी, 1931 को इसका उद्घाटन किया था. राजाओं के चलने के लिए ‘किंग्सवे’ और उनकी रानियों को चलने के लिए ‘क्वीन्सवे‘ का प्रयोग होता था.

15 अगस्त, 1947 को भारत के आजाद होने पर रायसीना हिल से इंडिया गेट तक के मार्ग किंग्सवे का नाम बदलकर ‘राजपथ’ कर दिया गया. भारत 26 जनवरी, 1950 को गणतंत्र बन गया और राजपथ 1951 से सभी गणतंत्र दिवस समारोहों का स्थल बन गया. केवल पहला गणतंत्र दिवस समारोह इंडिया गेट परिसर के पीछे इरविन स्टेडियम (कैप्टन ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम) में आयोजित किया गया था, जहां राजपथ समाप्त होता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक जाने वाली सड़क का नाम ‘राजपथ’ से बदल कर ‘कर्तव्य पथ’ कर दिया. इस तरह से तीसरी बार इसका नाम बदला गया. नाम बदलने के बाद भी इसका काम नहीं बदला. यहां आज भी गणतंत्र दिवस समारोह आयोजित होते हैं. जिनमें पहले की तरह राष्ट्र प्रमुख सेना की सलामी लेते हैं. जनता केवल दर्शक की तरह होती है. पहले आम जनता यहां गणतंत्र दिवस समारोह को देखने आ भी जाती थी, अब सुरक्षा कारणों से आम जनता कम ही आ पाती है.

‘राजपथ’ का नाम बदल कर ‘कर्तव्य पथ’ रखने से नेताओं, अफसरों में कोई कर्तव्यबोध बढ़ गया हो, ऐसा भी नहीं है. अगर सरकारी अफसरों, खासकर पीएमओ के अफसरों, का कर्तव्यबोध बदला होता तो विनेश फोगाट का अपने खेल सम्मान वापस करने के लिए ‘कर्तव्य पथ’ तक न आना होता. इससे साफ है कि नाम बदलने से हालात नहीं बदलते. विनेश के पक्ष में पूरा भारत खड़ा है. इसके बाद खेल मंत्रालय ने डब्ल्यूएफआई के नवनिर्वाचित पैनल को निलंबित कर दिया. भारतीय ओलिंपिक संघ (आईओए) ने कुश्ती संघ का कामकाज देखने के लिए एक तदर्थ समिति का गठन कर दिया. कुश्ती संघ को भंग नहीं किया गया है. जिससे साफ है कि कुछ दिनों के बाद इसको बहाल किया जा सकता है.

विनेश फोगाट के पक्ष में राहुल गांधी

कर्तव्य पथ पर विनेश फोगाट का एक वीडियो साझा करते हुए राहुल ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में लिखा कि ‘देश की हर बेटी के लिए आत्मसम्मान पहले है, अन्य कोई भी पदक या सम्मान उसके बाद. आज क्या एक घोषित बाहुबली से मिलने वाले राजनीतिक फायदे की कीमत इन बहादुर बेटियों के आंसुओं से अधिक हो गई है? राहुल गांधी ने विनेश फोगाट के खेलरत्न और अर्जुन पुरस्कार लौटाने के बाद पीएम मोदी की आलोचना की है. राहुल ने कहा कि ‘प्रधानमंत्री देश के अभिभावक होते हैं और उनकी तरफ से ऐसी निष्ठुरता देखकर दुख होता है.’

अपनों का सुख: बूढ़े पिता के आगे शुभेंदु को अपना कद बौना क्यों लग रहा था- भाग 1

खेतीकिसानी करने वाले 70 वर्षीय कृषक शिवजी साह अपनी 65 वर्षीया बीमार पत्नी सुनंदा के साथ झरिया जैसे छोटे शहर के एक गांव में रहते थे. जबकि उन का 25 वर्षीय इकलौता पुत्र शुभेंदु और उन की 22 वर्षीया बहू सुधा पुणे में नौकरी करते थे. दोनों अच्छा पैसा कमाते थे. लेकिन शुभेंदु भूल कर भी मातापिता को जीवनयापन के लिए एक रुपया नहीं भेजता था. वह सुधा के साथ उन्मुक्त जीवन जीने में सारा पैसा फूंक मार कर सिगरेट के धुएं की तरह उड़ा देता था. उन का दांपत्य जीवन अतिआधुनिकता की चकाचौंध में खोता जा रहा था.

रोजाना महंगे होटलों में खानापीना और नित्य नाइट क्लबों में वक्त बिताना उन की आदत सी बन गई थी. बीचबीच में दोनों अपने दोस्तों के साथ बार और पब में जा कर मस्ती लूटते थे. इसी क्रम में एक जाट ग्रुप के कुछ युवकों से शुभेंदु के दोस्तों का झगड़ा हो गया.

तब शुभेंदु ने अपने मोबाइल पर तुरंत किसी को घटना की सूचना दी. उस के बाद बीचबचाव के मकसद से वहां चला गया. जाट ग्रुप के युवक उसी की पिटाई करने लगे. जवाब में शुभेंदु भी उन के ऊपर अपने हाथ साफ करने लगा. दोनों तरफ से जम कर मारपीट होने लगी.

सूचना पा कर पुलिस घटनास्थल पर पहुंची. पुलिस को देखते ही झगड़ा करने वाले दोनों पक्षों के युवक भाग खड़े हुए. लेकिन शुभेंदु भाग नहीं सका और पुलिस के हत्थे चढ़ गया.

सुबह में सुधा को शुभेंदु के पकड़े जाने की खबर मिली तो वह हैरान रह गई. वह भागीभागी दत्तावाड़ी थाना पहुंची और थाना प्रभारी राजेश कुमार से मिल कर अपने पति को छोड़ने की गुहार लगाई.

“सर, मेरे पति शुभेंदु को छोड़ दीजिए. व़ह बिलकुल निर्दोष है. आज तक उस ने किसी से झगड़ा नहीं किया है. हम पर रहम कीजिए, सर.”

“मौका ए वारदात से पुलिस ने शुभेंदु को गिरफ्तार किया है. वह हर हाल में जेल भेजा जाएगा. तुम उसे जेल से जमानत करा लेना. वैसे भी, होली को ले कर कोर्ट 7 दिनों तक बंद रहेगा. अब जाओ यहां से.”

“सर, मेरे पति को थाना से ही छोड़ दीजिए. जो भी खर्चा लगेगा, मैं देने को तैयार हूं. जेल भेज दीजिएगा तो अकेले जीतेजी मर जाऊंगी. पुणे जैसे महानगर में हमारा कोई नहीं है.”

“शोभना, इसे बाहर निकालो, फालतू बकवास कर रही है.”

“प्लीज़ सर, प्लीज़ सर, हम पर दया कीजिए.”

थानेदार का आदेश पा कर लेडी कान्स्टेबल शोभना सुधा के पास गई और उसे इशारे से बाहर निकल जाने को कहा.

पब मालिक सुबोध वर्मा के लिखित बयान पर थाना में शुभेंदु सहित 5 अज्ञात लोगों पर तोड़फोड़, मारपीट और 50 हजार नकद राशि लूटने का मामला दर्ज किया गया. उस के बाद पुलिस ने शुभेंदु को जेल भेज दिया.

थाना से लौटने के बाद सुधा ने बड़े अरमान से सब से पहले अपने मायके में अपने बड़े भाई श्याम को फोन किया और वस्तुस्थिति की जानकारी दी. साथ ही, शुभेंदु को जेल से बाहर निकालने का आग्रह किया. लेकिन श्याम ने एक सप्ताह बाद पुणे आने की बात कही. उस का जवाब सुन कर वह औंधेमुंह बिस्तर पर गिर गई. उस की आंखों के सामने अंधेरा छा गया.

पति के जेल चले जाने से उस का घर भूतों का डेरा बन गया था. हर तरफ सन्नाटा पसरा था. न खाने की सुध न सोने की फ़िक्र. हर समय शुभेंदु उस की आंखों में नाचता रहता था. इसी तरह उस के भाई श्याम के इंतजार में 2 सप्ताह बीत गए. लेकिन उस का भाई यह भी देखने नहीं आया कि उस की बहन सुधा किस हाल में है.

उस के सुख के साथी इस दुख की घड़ी में उसे देखते ही रास्ता बदल दिया करते थे. कुछ ने अगर हमदर्दी जताई तो निस्वार्थ भाव से नहीं, बल्कि सुधा पर आईं मुसीबत का लाभ उठा कर.

सुधा के एक मित्र थानापुलिस की दलाली करने वाले शिवशंकर ने केस कमजोर करने और शुभेंदु को थाने से घर लाने के लिए लिए 10 हजार रुपए लिए थे, लेकिन पुलिस ने शुभेंदु को नहीं छोड़ा. तब उस ने शिवशंकर से रुपए वापस मांगा तो उस ने थाने में खर्च हो जाने का बहाना बना दिया.

इतना ही नहीं, थाने से एफआईआर की कौपी निकालने के लिए सुधा ने एक हजार रुपए जब अपने करीबी दोस्त राजन बाबू को दिए तो 2 हफ्ते बाद भी नहीं मिल सकी. राजन बाबू जैसे शरीफ़ लोग प्रतिदिन उस से झूठ बोलते रहे कि एफआईआर की कौपी आजकल में मिल जाएगी. वह किन लोगों पर भरोसा करे, उसे समझ नहीं आ रहा था.

शाम को कौलबेल की आवाज सुन कर सुधा अपने बिस्तर से उठी और थकेमन से दरवाजा खोल दिया. सामने दाई मीणा खड़ी थी. उसे देख कर सुधा के मन को थोड़ी ठंडक पहुंची, क्योंकि मीणा उस के सुखदुख की साथी थी.

मीणा ने अंदर आने के बाद दरवाजा बंद कर लिया. किचन में जा कर कौफी बनाने लगी. इसी बीच, एक गिलास पानी देने सुधा के पास गई और बोली,

“मैम, सुना है कि शुभेंदु सर को जेल हो गई है तो अपने मित्र राजन बाबू किस दिन काम आएंगे? उन से मदद लेने में क्या कोई दिक्कत है?”

“क्या कहूं, दिमाग काम नहीं कर रहा है.”

“तो शुभेंदु सर जेल में सड़ते रहेंगे. परसों जेल में आप से मिल कर कितना रो रहे थे. क्या आप भूल गईं?”

“नहीं मीणा, भूली नहीं हूं. राजन बाबू को एफआईआर की कौपी निकालने के लिए एक हजार नकद रुपए दे दिया है. लेकिन 2 सप्ताह बीत गए. एफआईआर की कौपी नहीं मिल पाई है, अब किस से मदद ली जाए?”

“मैम, शुभेंदु सर के डैडीमम्मी को फोन कीजिए न. वे जरूर मददगार साबित होंगे. आखिर अपने लोग अपने नहीं होंगे तो कौन अपना होगा?”

“अपने भाई को फोन किया था, वह नहीं आया. अब किस मुंह से अपने ससुर को फोन करूं? आज से 20 वर्ष पहले अपनी बीमार सासुमां को छोड़ कर हम दोनों पुणे आ गए थे. पता नहीं वे किस हाल में होंगे.”

इतना कह कर सुधा चुप हो गई, जैसे कुछ सोच रही हो. तब मीणा किचन में चली गई.

अपने खयालों में खोई सुधा को लगा कि उस की सासुमां आवाज दे रही हैं-

‘अरे बहू, कहां हो, मारे दर्द के सिर फटा जा रहा है. जल्द मेरे पास आओ न. ठंडा तेल लगा कर थोड़ी मालिश कर दो. अरे, कहां मर गई रे. ओह.’

‘पता नहीं यह बुढ़िया कब मरेगी. रोज़ाना मुझे ही मरने के लिए कोसती रहती है,’ बहू सुधा ने अपनी सास पर अपने मन की भड़ास निकाली.

‘मुझे ही मरने के लिए बोल रही है. हे प्रकृति, कैसा जमाना आ गया है?’ बहू की आवाज सुन कर सुनंदा माथा पकड़ कर रोने लगी.

‘आई मांजी, मरे आप का दुश्मन. आप तो अमृत घट पी कर आई हैं, आप को कुछ नहीं होगा. हमेशा बकबक करना बंद कीजिए तो चैन मिले,’ बोलती हुई सुधा अपनी आंखें मोबाइल फोन से हटाई और चौकी पर लेटी अपनी सास सुनंदा की ओर देखा, जो दोनों हाथों से अपना सिर दबाए कराह रही थीं. उस ने स्टूल पर रखे हुए तेल की शीशी अपने बाएं हाथ में उठाई. शीशी का ढक्कन खोल कर दाएं हाथ की हथेली पर थोड़ा सा तेल लिया और अपनी सास के माथे पर डाल दिया. फिर दोनों हाथों की उंगलियों से ज़ोरज़ोर से मालिश करने लगी.

‘अरे बाप रे बाप, इतने जोर की मालिश. आज ही मार डालोगी क्या? रहने दो बहू, रहने दो. मेरी तो जान ही निकल जाएगी.’

‘सिरदर्द का बहाना करना तो कोई आप से सीखे. जब मालिश करने लगी तो आप ‘रहने दो रहने दो’ की रट लगाने लगीं. आप हमेशा मेरे नाक में दम किए रहती हैं. पता नहीं आप की यह बीमारी कब ठीक होगी.’

‘अरे बहू, मालिश कैसे की जाती है, मुझे तू सिखाएगी, वह भी बाल नोचनोच कर. खैर, जाने दे. तेरी दया की मुझे जरूरत नहीं. मुझे मेरी हालत पर छोड़ दो.’

‘ठीक है, ठीक है. कभी फिर न कहना मालिश के लिए.’

सुधा बीच में ही बोल कर अपने कमरे की ओर चली, तभी बाहर शुभेंदु और उस के ससुर शिव जी की बतकही सुनाई पड़ी. वह दरवाजा की ओट में छिप कर उन की बातें सुनने लगी. उस का पति शुभेंदु कह रहा था,

‘बैंक में काम का लोड बढ़ गया है. जिस के कारण रोजाना समय पर बैंक निकल जाना पड़ता है. शाम को बैंक से डेरा पहुंचने में लेटलतीफ़ हो जाती है. समय से खानापीना नहीं हो पाता है. जिस के कारण शारीरिक कमजोरी महसूस होती है. ऐसे हालात में सुधा को अपने साथ रखूंगा.’

‘लेकिन बेटा, तेरी मां तो बीमार है. अगर बहू तुम्हारे पास रहेगी तो तेरी मां की कौन देखभाल करेगा? उस की कुछ तो चिंता करो.’

‘मां को कुछ नहीं होगा, देखने से तो भलीचंगी लग रही हैं. आप हैं न, उन की देखभाल के लिए. कुछ रुपए भेज दूंगा, उन्हें किसी अच्छे डाक्टर से दिखा दीजिएगा. आज़ हम दोनों पुणे के लिए निकल जाएंगे.’

‘लेकिन बेटा, एकदो सप्ताह और ठहर जाते तो बहुत अच्छा होता,’ पुत्रमोह में शिवजी साह ने आग्रह किया.

साथी : भाग 1

‘‘आप अभी तक होटल में ही रह रही हैं? मगर क्यों?’’ यह कहने के साथ ही कपिल के हाथ क्षणभर को थम गए. प्याले पर उंगलियों की पकड़ कमजोर पड़ने लगी. एक लड़खड़ाहट सी महसूस हुई उन में और होंठों तक आते न आते प्याला वापस टेबल से जा टकराया.

कविता करीब 2 महीने पहले कपिल के औफिस में दिल्ली ब्रांच से ट्रांसफर हो कर आई थी. निराला ही व्यक्तित्व था उस का, सब में घुलमिल कर भी सब से अलग. कुछ ही दिनों में उस ने खुद को यहां के परिवेश में इस कदर ढाल लिया कि नएपन का एहसास ही कहीं खो गया.

‘‘आप ने तो पहले कभी बताया ही नहीं कि अभी तक आप होटल में ही रह रही हैं,’’ कपिल ने अटकते हुए कहा.

‘‘वो, ऐसा है न कपिल साहब, कोई मन की जगह ही नहीं मिली अभी तक. अब दोचार दिन की बात तो है नहीं, क्या पता दोचार महीने रहना हो या दोचार साल, सोचती हूं दोचार जगह और देख लूं.’’

‘‘अभी तक आप को अपने रहने लायक कोई जगह ही पसंद नहीं आई? कमाल है. इतना बुरा भी शहर नहीं है हमारा. एक बात कहूं, तब तक आप मेरे घर में ही शिफ्ट क्यों नहीं कर लेतीं?’’ कहने के साथ ही कपिल स्वयं ही झेंप गया.

माना कि पिछले कुछ हफ्तों में वह औरों की अपेक्षा कविता के कुछ ज्यादा ही करीब आ गया है पर इस का मतलब क्या हुआ.

वह फिर बोला, ‘‘मेरा मतलब है कि मेरा घर बहुत बड़ा है और रहने वाले बहुत कम लोग हैं. जब तक आप का अपना कोई ठिकाना नहीं मिलता, आप भी वहां रह सकती हैं. वैसे भी मकान का वह हिस्सा उपेक्षित पड़ा हुआ है, घर से बिलकुल अलगथलग. मैं वादा करता हूं, मैं खुद मदद करूंगा आप के लिए घर ढूंढ़ने में. मुझे पूरा विश्वास है कि आप को जल्द अपना मनपसंद घर मिल जाएगा.’’

प्रस्ताव बुरा नहीं था. कविता मन ही मन मुसकराती रही. कहना तो चाहती थी कि चलिए, आप की बात मान ली मैं ने पर प्रत्यक्ष में कुछ न कह सकी.

‘‘अरे, आप तो किसी सोच में डूब गईं.’’

‘‘नहीं तो, मैं तो बस यह सोच रही थी कि क्या यह उचित होगा? लोग क्या कहेंगे?’’ कविता एकदम सकपका कर बोली.

‘‘अच्छा, आप भी सोचती हैं यह सब? आप कब से लोगों की परवा करने लग गईं? मैं इतने दिनों में आप को जितना जान सका हूं, इस से तो इसी

सोच में था कि आप के बारे में उचितअनुचित’, ‘लोग क्या कहेंगेजैसी बातों का कोई असर नहीं होता. मगर आप तो इन बातों के लिए बिलकुल विपरीत ही नजर आ रही हैं.’’

‘‘कपिल साहब, मेरी बात छोडि़ए, मुझे सचमुच कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ कविता के स्वर में वही पुरानी बेफिक्री थी. साधारण सी कदकाठी वाली कविता इन्हीं विशेषताओं के कारण औरों से अलग दिखती थी. हलके रंग की प्लेन साड़ी, माथे पर छोटी सी काली बिंदी, एक हाथ में घड़ी और एक हाथ में चंद चूडि़यां, बस, यही था उस का साजशृंगार.

सच भी था, कोई फर्क नहीं पड़ता उसे इन बातों से. अगर फर्क पड़ता तो क्या वह किसी की परवा किए बिना अपना मायका और अपनी ससुराल छोड़ आती पर आज उस के माथे पर चिंता की रेखाएं उभर आईं.

‘‘बात सिर्फ मेरी होती तो और बात थी कपिल, मगर मेरे इस फैसले से तो आप भी प्रभावित होंगे ही न. बस, इसीलिए ही सोचना पड़ रहा है.’’

‘‘अजी, आप मेरी छोडि़ए, मुझे इन सब से कोई फर्क नहीं पड़ता. बस, आप हांकहें तो मां से इजाजत ले लूं. वैसे भी उन्हें तो कोई आपत्ति हो ही नहीं सकती, बल्कि वे तो खुश होंगी.’’

हैरान रह गई कविता. उस के जेहन में सवाल उठे, मां से क्यों? क्या वह अकेला है? उस की पत्नी? कोई बच्चे नहीं हैं?

‘‘कहां खो गईं?’’

‘‘कुछ नहीं, बस,’’ इस के आगे कुछ नहीं कह सकी वह. कहती भी तो क्या कपिल से तो कुछ पूछ ही नहीं सकती इस विषय में. उन्होंने तो एकदूसरे से वादा किया है कि वे एकदूसरे के अतीत में झंकने का कभी कोई प्रयास नहीं करेंगे, मगर यह कैसे संभव होगा? शर्तों के दायरे में दोस्ती? चलो, यही सही पर इस की शुरुआत कविता की तरफ से तो कतई नहीं होनी चाहिए. वह किसी भी कीमत पर कपिल जैसे दोस्त को खोना नहीं चाहती. कपिल के विषय में जितना कुछ भी पता था सिर्फ उसी से. उस ने कभी भी किसी और से कपिल के बारे में कुछ भी जानने की कोशिश नहीं की. न ही कभी किसी ने कुछ बताया. शायद बताने जैसा कुछ हो भी न. बहुत सारी बातें समय के साथसाथ अपनेआप ही पता चल गईं, जैसे वह बहुत रिजर्व रहता है, कम बोलता है, गिनेचुने लोगों के साथ उठताबैठता है. शादी हुई है? शायद नहीं, क्या पता, पता नहीं.’’

‘‘लीजिए, बातोंबातों में कौफी तो एकदम ठंडी हो गई,’’ कपिल कौफी की बेहाली पर हंस पड़ा. उस ने दोबारा कौफी और्डर की.

इस बार कौफी ठंडी करने का इरादा दोनों का ही नहीं था, सो दोनों ही खामोश थे. कविता की उंगलियां लगातार प्याले से ही खेलती रही थीं. शायद वह कुछ और ही सोच रही थी. कपिल के विषय में, उस के घर के विषय में या फिर कुछ और?

उसे अच्छी तरह याद है, कपिल के बहुत कहने पर जब वह पहली बार उस के घर गई थी तब भी मुलाकात सिर्फ उस की मां से ही हुई थी. वहां जा कर पता चला कि कपिल का ही जन्मदिन है आज. इस अवसर पर हर साल की तरह उस की मां सुनंदा देवी ने कुछ खास लोगों को ही आमंत्रित किया था, इस बार उन खास लोगों में वह भी शामिल थी.

मां ने ही सबकुछ अपने हाथों से रचरच कर बनाया था. कितने प्यार से खिला रही थीं सभी को. ममता की जीतीजागती मिसाल लग रही थीं वे. कविता तो देखती ही रह गई, क्या अभी भी इस धरती पर हैं ऐसे लोग?

अपनी अपनी तैयारी : भाग 1

‘‘आप ही बताइए मैं क्या करूं, अपनी नौकरी छोड़ कर तो आप के पास आ नहीं सकता और इतनी दूर से आप की हर दिन की नईनई समस्याएं सुलझ भी नहीं सकता,’’ फोन पर अपनी मां से बात करतेकरते प्रेरित लगभग झंझला से पड़े थे.

जब से हम लोग दिल्ली से मुंबई आए हैं, लगभग हर दूसरेतीसरे दिन प्रेरित की अपने मम्मीपापा से इस तरह की हौटटौक हो ही जाती है. चूंकि प्रेरित को अपने मम्मीपापा को खुद ही डील करना होता है, इसलिए मैं बिना किसी प्रतिक्रिया के बस शांति से सुनती हूं.

अब तक गैस पर चढ़ी चाय उबल कर पैन से बाहर आने को आतुर थी, सो, मैं ने गैस बंद की और 2 कपों में चाय डाल कर टोस्ट के साथ एक ट्रे में ले कर बालकनी में आ बैठी. कुछ ही देर में अपना मुंह लटकाए प्रेरित मेरी बगल की कुरसी पर आ कर बैठ गए और उखड़े मूड से पेपर पढ़ने लगे.

‘‘अब क्या हुआ, क्यों सुबहसुबह अपना मूड खराब कर के बैठ गए हो? मौर्निंग वाक करने का कोई फायदा नहीं अगर आप सुबहसुबह ही अपना मूड खराब कर लो,’’ मैं ने प्रेरित को कुछ शांत करने के उद्देश्य से कहा.

‘‘पापा कल पार्क में गिर पड़े, मां को गठिया का दर्द फिर से परेशान कर रहा है. अभी 15 दिन पहले ही तो लौटा हूं कानपुर से, डाक्टर से पूरा चैकअप करवा कर और जहां तक हो सकता था, सब इंतजाम कर के आया था. जैसेजैसे उम्र बढ़ेगी, नितनई समस्याएं तो सिर उठाएंगी ही न. यहां आने को वे तैयार नहीं. बिट्टू के पास जाएंगे नहीं तो क्या किया जाए? नौकरी करूं या हर दिन इन की समस्याएं सुलझता रहूं? इस समस्या का कोई सौल्यूशन भी तो दूरदूर तक नजर नहीं आता,’’ प्रेरित कुछ झंझलाते हुए बोले.

‘‘चलो, अब शांत हो जाओ और अच्छे मन से औफिस की तैयारी करो. आज वैसे भी तुम्हारी इंपौर्टेंट मीटिंग है. कल वीकैंड है, इन 2 दिनों में हमें अम्माबाबूजी की समस्याओं का कोई परमानैंट हल निकालना पड़ेगा वरना इस तरह की समस्याएं हर दूसरेतीसरे दिन उठती रहेंगी,’’ यह कह कर मैं ने प्रेरित को कुछ शांत करने का प्रयास किया और इस के बाद हम दोनों ही अपनेअपने औफिस की तैयारी में लग गए थे.

मैं और प्रेरित दोनों ही आईसीआईसीआई बैंक में सीनियर मैनेजर की पोस्ट पर हैं. अभी हमें मुंबई शिफ्ट हुए 3 माह ही हुए थे. सो, बहुत अच्छी तरह मुंबई शहर से परिचित नहीं थे. हमारी इकलौती बेटी आरुषी 3 माह पहले ही 12वीं पास कर के वीआईटी वेल्लोर से इंजीनियरिंग करने चली गई. उस के जाने के बाद हम अकेले रह गए थे. हम तो अभी तक उस के जाने के दुख में ही डूबे रहते यदि हमारा ट्रांसफर मुंबई न हुआ होता. ट्रांसफर हो जाने पर शिफ्ंिटग में इतने अधिक व्यस्त हो गए हम दोनों कि बेटी का जाना तक भूल गए यद्यपि सुबहशाम उस से बात हो जाती थी.

हम दोनों को ही 10 बजे तक निकलना होता है, इसलिए 8 बजे मेड आ जाती है. टाइम के अनुसार सुशीला मेड आ गई थी. उसे नाश्ताखाने की कुछ जरूरी हिदायतें दे कर मैं बाथरूम में घुस गई.

नहातेनहाते वह दिन भी याद आ गया जब मैं पहली बार प्रेरित से मिली थी. मैं और प्रेरित दोनों ही इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से थे और अब भोपाल के आईआईएएम कालेज से फौरेस्ट मैनेजमैंट में एमबीए कर रहे थे. एक दिन कालेज के ग्रुप पर मैं ने एक मैसेज देखा, ‘इफ एनीवन इंट्रेस्टेड फौर यूपीएससी एग्जाम, प्लीज डी एम टू मी.’

मेरे मन के किसी कोने में भी यूपीएससी बसा हुआ था, सो, मैं ने दिए गए नंबर पर मैसेज किया और एक दिन जब कालेज की लाइब्रेरी में हम दोनों मिले तो अपने सामने लंबी कदकाठी, गौरवर्णीय, सलीके से ड्रैसअप किए सुदर्शन नौजवान को देखती ही रह गई. इस के बाद तो कभी कोचिंग, कभी नोट्स और कभी तैयारी के बहाने मिलनाजुलना प्रारंभ हो गया था और कुछ ही दिनों के बाद हम दोनों के बीच से यूपीएससी तो गायब हो गया और रह गया हमारा प्यार, एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें, एकदूसरे की तारीफ में पढ़े गए कसीदे और भविष्य की लंबीचौड़ी प्लानिंग.

भोपाल के कलिया सोत डैम के पास चारों ओर हरीतिमा से ओतप्रोत एक छोटी सी पहाड़ी पर नेहरू नगर में स्थित आईआईएफएम कालेज में हमारा प्यार पूरे 2 साल परवान चढ़ता रहा. कोर्स के पूरा होतेहोते हम दोनों का ही प्लेसमैंट आईसीआईसीआई बैंक में हो गया था और अब हम दोनों ही विवाह के बंधन में बंध जाना चाहते थे. चूंकि हम दोनों की जाति ब्राह्मण ही थी, इसलिए आश्वस्त थे कि विवाह में कोई बाधा नहीं आएगी. मैं अपने मातापिता की इकलौती संतान थी और प्रेरित 2 भाई थे. उन का छोटा भाई प्रेरक (बिट्टू) मैडिकल की पढ़ाई कर रहा था. प्रेरित की मां एक होममेकर थीं और पापा एक राजपत्रित अधिकारी के पद से इस वर्ष ही रिटायर हुए थे.

मेरी मां एक मनोवैज्ञानिक काउंसलर और पापा बैंक मैनेजर थे. अभी उन के रिटायरमैंट में 2 वर्ष थे. हम दोनों ने ही घर में अपने प्यार के बारे में पहले ही बता दिया था. सो, अब औपचारिक मोहर लगनी ही बाकी थी. हम दोनों की मम्मियों ने फोन पर बातचीत भी कर ली थी. इसी सिलसिले में एक दिन प्रेरित के मम्मीपापा कानपुर से इंदौर मुझे देखने या यों कहें कि विधिवत रूप से गोद भराई की रस्म करने आए.

उन लोगों के आने की सूचना मात्र से ही मांपापा खुशी से दोहरे हुए जा रहे थे आखिर उन की इकलौती संतान के हाथ पीले होने का प्रथम चरण का आयोजन जो होने जा रहा था. आने वाले मेहमानों के लिए पूरे घर को पापा ने फूलों से सजा दिया था. मम्मी ने कांता मेड के साथ मिल कर डाइनिंग टेबल पर न जाने कितने व्यंजनों की लाइन लगा दी थी जिन के मसालों की महक से किचन ही नहीं, पूरा घर ही महक उठा था.

अतिथियों को कोई परेशानी न हो, इस के लिए पापा ने हमारे घर के पास में ही स्थित होटल रेडिसन में उन के रुकने की व्यवस्था कर दी थी. होटल से सुबह ही तैयार हो कर प्रेरित और उस के मम्मीपापा हमारे यहां आ गए थे.

चायनाश्ते के बाद मेरी गोदभराई की रस्म के तहत प्रेरित की मम्मी ने साथ लाए फल, मिठाई और कपड़ों के साथसाथ शगुन के नाम पर एक सोने की चेन मेरे गले में डाल दी थी. लंच के बाद जब सब लोग हंसीखुशी के माहौल में बातचीत कर रहे थे तभी प्रेरित की मम्मी मेरे मांपापा की ओर मुखातिब हो कर बोलीं, ‘आप लोग बुरा न मानें तो एक बात पूछ सकती हूं?’

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