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राम मंदिर प्राणप्रतिष्ठा में नहीं जाएंगे कांग्रेस और इंडिया, क्या हैं इस के मायने

रामलला की प्राणप्रतिष्ठा को ले कर हिंदू धर्माचार्य ही दोतीन फाड़ हैं तो फिर राजनीतिक दलों से एकजुट होने की उम्मीद करना फुजूल की बात है. इस मेगा धार्मिक इवैंट के आमंत्रण को एकएक कर सभी विपक्षी दलों ने ठुकरा कर साफ कर दिया है कि वे एक बड़ा जोखिम उठाने को तैयार हैं लेकिन धर्म की राजनीति के सामने झुकने को तैयार नहीं. सब से बड़ा रिस्क कांग्रेस और सोनिया गांधी ने लिया है, जिन्हें थाल भरभर कर गालियां स्मृति ईरानी और शिवराज सिंह चौहान जैसे दूसरी पंक्ति के भाजपाई नेताओं सहित बाबा बागेश्वर सरीखे कथावाचक दे रहे हैं.

कांग्रेस ने निहायत ही एहतियात से काम लेते कहा है कि यह भाजपा और आरएसएस का पौलिटिकल प्रोजैक्ट है. यह ऐसा सच है जिसे देश का बच्चा भी समझने लगा है कि भाजपा सिर्फ मंदिर की राजनीति करती है और उस ने राममंदिर बनाने का अपना वादा पूरा कर दिया है, एवज में यानी दक्षिणा में अब वह हिंदुओं से वोट मांग रही है. दक्षिणपंथियों के इस काम से दक्षिणापंथी ज्यादा खुश हैं क्योंकि यह उन के पेट से जुड़ी बात और मुद्दा है.

लेकिन इस मामले ने यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि राम पूरे देश के आदर्श और नायक नहीं हैं और भाजपा राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी सभी हिंदुओं की नहीं हो पाई है. खासतौर से दक्षिण भारत में जहां रामचरित मानस का प्रभाव उत्तर भारत के मुकाबले न के बराबर है.

लोकसभा चुनाव 2024 के मद्देनजर भाजपा वहां से बहुत ज्यादा उम्मीदें भी नहीं लगा रही है लेकिन जोर पूरा दे रही है. उस के निशाने पर हिंदीपट्टी ही है, बाकी जो इधरउधर से मिल जाए, वह उस के लिए बोनस ही होगा. ठीक इसी तर्ज पर कांग्रेस की कोशिश भी यही है कि उस की, तथाकथित ही सही, धर्मनिरपेक्ष इमेज बनी रहे.

यह कोई छिपी, ढकी, मुंदी या रहस्यमयी बात नहीं है बल्कि उजागर सच है. लेकिन भारतीय समाज के लिहाज से इस के अपने अलग माने हैं. भाजपा ने किसी उम्मीद में यह आमंत्रण ममता बनर्जी, अखिलेश यादव या नीतीश कुमार सरीखों को नहीं भिजवाया था. उसे एहसास था कि इन में से कोई नहीं आने वाला क्योंकि बात धर्म की नहीं, राजनीति की है. उस का मकसद सिर्फ यही दिखाना था कि ये लोग विधर्मी, नास्तिक, सनातनविरोधी हैं, इसलिए ये वोट के हकदार नहीं. उलट इस के, हम शुद्ध धार्मिक और आस्तिक हैं, इसलिए सत्ता हमें ही मिलनी चाहिए. हम ही इसे पौराणिक तौरतरीकों से चला सकते हैं.

सियासी पंडितों का यह विश्लेषण भी बहुत सतही और उथला है कि कांग्रेस ने यह आमंत्रण मुसलिम वोटबैंक की सलामती के लिए ठुकराया. हकीकत यह है कि भगवा गैंग के प्रभाव के चलते अब मुसलमान के पास कांग्रेस के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा है. 3 राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उस ने पूजापाठी राजनीति की तो उसे परंपरागत हिंदू वोट उम्मीद के मुताबिक नहीं मिले जबकि कर्नाटक और तेलंगाना में उस का यह वोट सलामत रहा.

ऐसे में अगर सोनिया गांधी अयोध्या के समारोह में बैठी दिखतीं तो संदेश यही जाता कि अब भाजपा और कांग्रेस में सैद्धांतिक व वैचारिक फर्क खत्म हो गया है. दलित, आदिवासी और कुछ पिछड़े भाजपा को 8-10 साल से अगर वोट कर रहे हैं तो इस की वजह यह नहीं है कि वे ऊंची जाति वाले हिंदुओं की तरह मुसलमानों को एक बड़े खतरे की शक्ल में देखते हैं, बल्कि यह है कि वे भी बड़े पैमाने पर पूजापाठी हो गए हैं.

वे यह जानतेसमझते हैं कि राम मंदिर उन के लिए नहीं बन रहा और न ही इस से उन की समस्याएं हल होने वाली हैं. वे एक प्रयोग के तौर पर भाजपा को वोट कर रहे हैं कि अगर वाकई समस्याएं राजशाही या ईश्वरवाद से हल होती हैं तो एक बार इसे भी आजमा लेने में हर्ज क्या है.
राजनीति का यह वह दौर है जिस में दुनियाभर में कट्टरपंथ हावी हो रहा है. हालिया एक ताजे सर्वे में डोनाल्ड ट्रंप बढ़त पर दिखाए गए हैं क्योंकि वे और उन की रिपब्लिकन पार्टी वहां दूसरे तरीके से वही कर रहे हैं जो भारत में भाजपा और नरेंद्र मोदी कर रहे हैं.

वामपंथ हर जगह हाशिए पर आ रहा है क्योंकि वह मोक्ष वगैरह की गारंटी नहीं लेता और न देता और न ही अपने सदियों पुराने सिलैबस में वक्त के मुताबिक फेरबदल करने को तैयार हो पा रहा है. वह स्थानीय लोगों को दक्षिणपंथियों की तरह डरा नहीं रहा.

राम मंदिर अधिसंख्य हिंदुओं के लिए आस्था का विषय है लेकिन रामपंथी मुश्किल से भी 12-15 करोड़ नहीं हैं. ऐसे में कांग्रेस ने भगवा गैंग की इस ढीली गेंद को बौलर की तरफ ही धकेल दिया है और दिमागीतौर पर इस बात के लिए तैयार भी है कि इस पर किस तरह का होहल्ला मचेगा. प्राणप्रतिष्ठा आयोजन का हिस्सा बन जाने से उस के वोट नहीं बढ़ जाते और न ही, न करने से कटने वाले हैं. हां, इतना जरुर हुआ है कि उस की विश्वसनीयता कायम रही है.

यहां बारीकी से गौर करने वाली बात यह भी है कि कांग्रेस को वोट सोनिया गांधी की वजह से नहीं मिलते, जबकि भाजपा को नरेंद्र मोदी की धार्मिक इमेज के चलते ही मिलते हैं. उन की गारंटियां ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ की तर्ज पर प्रचारित की जा रही हैं. उन्हें एक सनातनी योद्धा के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है जो कि दक्षिणापंथियों की खासियत रही है कि अपने नायक की जीत का जितना प्रचार कर सकते हो, कर लो. उसी से समर्थन और सहमति मिलते हैं.

इस शोरशराबे और धूमधड़ाके में कोई यह नहीं सोच पाता कि हमें चाहिए क्या और हमें मिल क्या रहा है. सारी हिंदीपट्टी इन दिनों एक धार्मिक उन्माद में डूबी हुई है और लोकसभा चुनाव तक माहौल यही रहे, इस के इंतजाम भी भगवा गैंग ने कर रखे हैं. अयोध्या में भाजपा 2 महीने तक भंडारा करेगी. देशभर के लोगों को भाजपा वहां ढो कर ले जाएगी क्योंकि यही 10 साल की उस की उपलब्धि है जिस का हिस्सा बनने से कांग्रेस ने मना कर दिया तो बेकार का हंगामा खड़ा किया जा रहा है.

दो लड़कियां भी बन सकती हैं एकदूसरे की हमसफर

Same-Sex Marriage in India : उत्तर प्रदेश के देवरिया में 8 जनवरी को एक अलग तरह की शादी हुई. इस में दूल्हा और दुलहन दोनों ही लड़कियां थीं. और्केस्ट्रा में बतौर डांसर काम करने वाली इन 2 युवतियों ने मंदिर में शादी रचा ली. दोनों युवतियां पश्चिम बंगाल की रहने वाली हैं और 2 साल से पतिपत्नी की तरह साथ रह रही थीं.

दोनों ने अपनी शादी का पहले बाकायदा नोटरी शपथपत्र बनवाया. उस के बाद मंदिर में पूरे विधिविधान व मंत्रोच्चार के साथ शादी की. एकदूसरे को वरमालाएं भी डालीं. एक युवती ने दूसरी युवती के मांग में सिंदूर भरा. इतना ही नहीं, एक युवती वर के ड्रैस में यानी शेरवानी और सिर पर टोपी पहने हुए थी तो दूसरी युवती ने शादी का जोड़ा यानी साड़ी पहन रखी थी. अब यह समलैंगिक शादी पूरे क्षेत्र और सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है.

दरअसल, देवरिया के एक और्केस्ट्रा में ये 2 युवतियां करीब 3 वर्षों से डांस करती आई हैं. डांस के दौरान दोनों में दोस्ती हो गई. यह दोस्ती कब प्यार में बदल गई, पता नहीं लगा. इस के बाद दोनों ने एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खा लीं और समाज की चली आ रही रीति से विद्रोह करते हुए आपस में शादी करने का फैसला लिया. दोनों लड़कियां पश्चिम बंगाल की रहने वाली हैं. एक लड़की का नाम जयश्री राउल है जिस की उम्र 28 साल है. वहीं दूसरी लड़की का नाम राखी दास है जिस की उम्र 23 साल है.

30 दिसंबर को और्केस्ट्रा संचालक और उस के कुछ साथी दीर्घेश्वर नाथ मंदिर पहुंचे थे और दोनों युवतियों की शादी करने की बात कही. लेकिन मंदिर के महंत ने उच्च अधिकारियों की अनुमति न होने का हवाला देते हुए उन्हें वहां से लौटा दिया. उस के बाद मायूस हो कर सभी लोग वापस लौट गए और भाटपाररानी तहसील जा कर दोनों ने शादी के लिए स्टांपपेपर खरीदा. फिर दूसरे मंदिर में जा कर शादी रचा ली.
इश्क जब परवान चढ़ता है तो फिर वह किसी की भी नहीं सुनता, ऐसा ही कुछ यहां पर भी हुआ है.

कानून ने भले ही सेम सैक्स मैरिज को मान्यता न दी हो मगर इन्होंने दिल की सुन कर यह फैसला लिया. दोनों का कहना है कि भले ही जिंदगी के बंधन से ही मुक्त कर दो लेकिन रहेंगे तो हम साथ ही. वैसे, परिजनों की रजामंदी के बाद ही उन्होंने मंदिर में सात फेरे लिए. राखी खुद को पत्नी व जयश्री को पति मान रही है.

कोई भी हो सकता है हमसफर

हमसफर यानी कोई ऐसा शख्स जो जिंदगी के सफर में आप के साथ रहे, ताउम्र आप का साथ दे और आप की जिंदगी के सफर को खूबसूरत बनाए. आप एक लड़की हैं तो भी आप का हमसफर कोई लड़की भी हो सकती है. जरूरी नहीं कि आप का पार्टनर एक लड़का ही हो. बात दिल मिलने की है. अगर कोई लड़की पसंद आ रही है तो उस के साथ भी आप पूरी जिंदगी बिता सकती हैं.

खासकर 35-40 की उम्र तक शादी नहीं की है और जिंदगी अकेले बिताने में डर लग रहा है तो आप एक लड़की के साथ सैटल हो सकती हैं. वह आप की बीमारीहारी में आप का साथ तो देगी ही, साथ ही, उस के रूप में आप के पास अपने मन की बात शेयर करने के लिए भी कोई खास शख्स भी होगा.

वैसे भी, प्यार पर किसी का वश नहीं होता है. अगर प्यार दोतरफा हो तो इसे मंजिल मिल ही जाती है. इस से फर्क नहीं पड़ता कि प्यार समलिंगी के साथ हुआ या विषमलिंगी के साथ. अकसर 2 लड़कियों के बीच इतना गहरा रिश्ता बन जाता है कि उन्हें एकदूसरे की आदत हो जाती है. वे अलग हो कर जीने की कल्पना नहीं कर पातीं. 2 लड़कियां किसी घर में साथ रह रही हैं तो आसपास वाले उंगली भी नहीं उठाते. उन के लिए एकदूसरे के साथ एडजस्ट करना आसान होता है. साथ रहते हुए वे फिजिकल हों तो भी प्रैगनैंसी का डर नहीं रहता. वे आराम से साथ घूमनाफिरना, शौपिंग या मूवी देखना कर सकती हैं. इस में न तो सोसाइटी वालों को परेशानी होती है और न रिश्तेदारों को. इसे 2 सहेलियों का खूबसूरत बौंड माना जाता है.

मगर कभीकभी यह गहरा रिश्ता दोस्ती से बढ़ कर हो जाता है. तब दोनों एकदूसरे को हमसफर बनाने को आतुर हो उठती हैं. इस में उन्हें समाज और कानून की बंदिशों का सामना करना पड़ता है. लोग इस रिश्ते को कोई नाम देने की बात पर मजाक उड़ाने लगते हैं क्योंकि वे इस रिश्ते को दोस्ती के आगे देखने की बात सोच ही नहीं पाते. जब 2 लड़कियां रिश्ते को आगे बढ़ाने की सोचने लगतीं हैं तो उन्हें शुरू में कुछ व्यवधानों व लोगों की असहमति का सामना करना पड़ सकता है. मगर समय के साथ सब सही हो जाता है.

अगर 2 लड़कियां शादी करने की बात सोचती हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि कानून ने हमें इस की अनुमति नहीं दी है. यानी, कानून की नजर में सेम सेक्स मैरिज जायज नहीं है. फिर भी यदि 2 लड़कियां इस बंधन में बांधती हैं तो उन्हें कुछ मामलों में क्लियर रहना चाहिए और शादी के बाद इन बातों का खयाल रखना चाहिए.

पार्टनर को बनाएं नौमिनी

आप दोनों एकदूसरे की हमसफर हैं. समय के साथ आप की उम्र बढ़ेगी और हो सकता है कि किसी एक की मृत्यु पहले हो जाए. ऐसे में शादी के बाद अपने पार्टनर को फाइनैंशियली स्ट्रौंग बनाए रखने के लिए पहले से सोच कर रखिए. ऐसे रिश्तों में अकसर घरवाले नाराज रहते हैं या सपोर्ट नहीं करते. इसलिए अपने पार्टनर के भविष्य को सिक्योर करने के लिए आप उसे अपनी इनकम व बाकी वैल्थ के बारे में पूरी जानकारी दें. बैंक अकाउंट्स और जहां भी संभव हो, उसे ही अपना नौमिनी बनाएं. अपने बहन भाई के बच्चों के बजाय अपनी प्रौपर्टी का हकदार अपने पार्टनर को बनाएं.

हो सके तो बच्चा गोद लें

भले ही आप का फिजिकल रिश्ता खूबसूरत हो और आप अपनी जिंदगी से संतुष्ट हों मगर ऐसे रिश्तों में कहीं न कहीं एक कमी रह ही जाती है. और वह है पेरैंट्स न बन पाने की. आप को इस शादी से संतानसुख नहीं मिल सकता. ऐसे में बुढ़ापे में अकेलापन तकलीफ पहुंचा सकता है. इसलिए पहले से इस का भी समाधान ढूंढ कर रखें. कानूनी तौर पर एक अकेली लड़की भी बच्चा गोद ले सकती है. इसलिए शादी के पहले या बाद, आप में से कोई एक बच्चे को गोद ले ले. इस से आप का परिवार पूरा बन जाएगा. बच्चा आप दोनों को बड़ी मम्मी और छोटी मम्मी कह कर बुला सकता है. बच्चा आप के रिश्ते को और भी मजबूत करेगा.

एकदूसरे की पूरक बनें

आप दोनों में से एक जौब कर रही है और एक नहीं, तो आप दोनों पतिपत्नी की भूमिका निभा सकते हैं. जो जौब करती है वह पैसे कमाने पर ध्यान दें और दूसरी लड़की घर और बच्चे की साजसंभाल में समय लगा सकती है. एक परिवार को चलाने के लिए दोनों ही भूमिकाएं महत्त्वपूर्ण होती हैं. इसलिए अपने पार्टनर के पूरक की भूमिका निभाएं और दिल खोल कर जिंदगी का सुख लें.

बिलकिस की लड़ाई में शामिल रहीं कई महिलाएं

बिलकिस बानो केस में राधेश्याम शाही, जसवंत चतुरभाई नाई, केशुभाई वदानिया, बकाभाई वदानिया, राजीवभाई सोनी, रमेशभाई चौहान, शैलेशभाई भट्ट, बिपिन चंद्र जोशी, गोविंदभाई नाई, मितेश भट्ट और प्रदीप मोढिया वो 11 अपराधी हैं, जिन्होंने 2002 में हुए गुजरात दंगों के दौरान 5 माह की गर्भवती 21 वर्षीया बिलकिस बानो से सामूहिक बलात्कार किया, उस की आंख के सामने उस के परिवार के 7 लोगों का कत्ल किया और उस की 3 साल की मासूम बेटी को जमीन पर पटकपटक कर मार डाला.

इतनी जघन्यता करने वाले इन नरपिशाचों के अतिरिक्त 7 और लोग इस जघन्य कृत्य में शामिल थे, उन के खिलाफ भी एफआईआर हुई थी, मगर सुबूतों के अभाव में वे कानून के शिकंजे से बच निकले. 11 नरपिशाचों, जिन के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं, को सजा तक पहुंचाने के लिए बिलकिस ने बहुत लंबी लड़ाई लड़ी है.

मानवता को शर्मसार करने वाले इन खूंखार कातिलों को तो उसी वक्त सरेआम फांसी पर चढ़ा दिया जाना चाहिए था, लेकिन भारतीय कानून ने इस बिना पर कि उकसावे में बहक कर उन्होंने ऐसा जघन्य कांड किया, उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी. लेकिन जिन अपराधियों के सिर पर गुजरात सरकार का वरदहस्त है, उन के लिए आजीवन कारावास तो पिकनिक मनाने जैसा रहा. सरकारी दामाद बन कर वे जेल में भी ऐश करते रहे और फिर गुजरात सरकार ने उन्हें ‘अच्छे चालचलन’ का तमगा दे कर समय पूर्व ही उन की जेल से रिहाई करवा दी.

अब भले ही सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें फिर वापस जेल भेजने का हुक्म सुनाया है मगर बिलकिस की लड़ाई का अभी अंत नहीं हुआ है. इस फैसले के बाद भी बिलकिस को न्याय मिलने का सवाल चर्चा में है. अपना फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को भले लताड़ा और कहा कि जिस राज्य में ट्रायल पूरा हुआ, जिस राज्य में उन को सजा सुनाई गई, अगर समय पूर्व रिहाई का फैसला करना था तो वही राज्य कर सकता था, गुजरात नहीं. ऐसा कह कर कोर्ट ने गेंद महाराष्ट्र के पाले में डाल दी है. महाराष्ट्र में भी बीजेपी की सरकार है, ऐसे में अपराधी कितने दिन जेल में रहेंगे, यह आने वाले समय में पता चलेगा?

8 जनवरी को जब सुप्रीम कोर्ट ने आज़ाद घूम रहे अपराधियों को फिर जेल भेजने का फैसला सुनाया तब वकील शोभा ग्रोवर के हवाले से बिलकिस का बयान आया- ‘मैं डेढ़ साल में पहली बार मुसकराई हूं…’ बिलकिस के इस छोटे से बयान से उस तनाव, डर और परेशानी को समझा जा सकता है जिस का सामना वह और उस का परिवार बीते 22 सालों से कर रहा है. न्याय पाने और अपराधियों को सजा दिलवाने की इस लड़ाई में बिलकिस और उस के परिवार को कभी सहज जीवन नहीं जीने दिया है. इस दौरान उस ने और उस के परिवार ने डर के कारण कई कई बार घर बदले. डर था कि कहीं उन की हत्याएं न हो जाएं. यह डर अभी भी कायम है.

खैर, बिलकिस को थोड़ी राहत तो मिली है. उस ने उन सभी महिलाओं को धन्यवाद दिया है जिन की मदद के बिना वह इस लड़ाई को आगे नहीं बढ़ा सकती थी. 2002 गुजरात दंगों में अनेक बिलकिस मारी गईं, उन का बलात्कार हुआ, उन की कोख उजाड़ दी गई, उन के परिवार को ख़त्म कर दिया गया मगर अदालत के दरवाजे तक सिर्फ एक ही बिलकिस पहुंची और उस को भी न्याय पाने के लिए 22 साल का लंबा वक़्त लगा. यह बिलकिस भी कभी अदालत न पहुंच पाती अगर देश की कुछ जागरूक महिलाओं ने उस की मदद न की होती.

गौरतलब है कि बिलकिस बानो को इंसाफ दिलाने में कुछ महिलाओं ने बेहद अहम रोल निभाया है, जिन में पहला नाम है एडवोकेट वृंदा ग्रोवर का. वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर सुप्रीम कोर्ट की वकील हैं. उन्होंने बिलकिस के लिए न सिर्फ कानूनी लड़ाई लड़ी बल्कि न्याय दिलाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी. ह्यूमन राइट से जुड़े आंदोलनों में सक्रिय रहने वाली वृंदा ग्रोवर सांप्रदायिक और टारगेट हिंसा जैसे मामलों के खिलाफ सख्त कानून बनाने की पक्षधर हैं.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर वृंदा ग्रोवर ने कहा- “यह एक बहुत अच्छा निर्णय है, जिस ने क़ानून के शासन और इस देश के लोगों, विशेष रूप से महिलाओं की कानूनी व्यवस्था और अदालतों में विश्वास को बरकरार रखा है और न्याय को सुनिश्चित किया है. गुजरात सरकार ने बिना अधिकार के दोषियों को सजा में छूट दे दी. सरकार का आदेश कानून के खिलाफ था.”

सामाजिक कार्यकर्ता सुभाषिनी अली बिलकिस बानो का गैंगरेप होने के 2 दिनों बाद गुजरात के एक राहत शिविर में उन से मिली थीं और बिलकिस के साथ हुए भयावह कृत्य को सुनने के बाद उन के रोंगटे खड़े हो गए थे. सुभाषिनी अली ने कोर्ट में बिलकिस को न्याय दिलाने के लिए याचिका दाखिल की थी.

सुभाषिनी अली कहती हैं कि जब उन्होंने गुजरात सरकार द्वारा दोषियों की रिहाई के फैसले को सुना तो लगा यह न्याय की समाप्ति जैसा है. मेरे लिए यह बिजली के शौक जैसा था. लेकिन हम ने फिर याचिका दाखिल की और कपिल सिब्बल, अपर्णा भट्ट व अन्य फेमस वकीलों ने इस मामले में हमारी मदद की.

सुभाषिनी अली कहती हैं, “हम सब ने देखा कि एक ओर प्रधानमंत्री लालकिले से भाषण दे रहे थे और दूसरी तरफ इन दोषियों की रिहाई का स्वागत माला पहना कर किया जा रहा था. इस घटना के बाद बिलकिस ने कहा था कि क्या यह न्याय का अंत है. उसी के बाद ऐसा लगा जैसे हमें बिजली छू गई हो. हम ने तभी सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने का फैसला किया. कई सालों में ऐसा फ़ैसला आया है जो किसी सरकार के खिलाफ है. मैं जजों की हिम्मत की दाद देती हूं. मगर यह भी सोचा जाना चाहिए कि कौन इतनी लंबी लड़ाई लड़ सकता है और कितने लोग सुप्रीम कोर्ट तक जा सकते हैं?”

बिलकिस मामले में पत्रकार रेवती लाल तीसरी याचिकाकर्ता थीं. रेवती कहती हैं, ”जब याचिका तैयार हुई तब 2 याचिकाकर्ता थे और एक तीसरे की जरूरत थी. तब उन्होंने मुझ से संपर्क किया तो मैं तुरंत इस के लिए तैयार हो गई. बिलकिस बानो के गैंगरेप के बाद जब मैं उन से मिली तो याचिकाकर्ता बनने के लिए बिना किसी इफ-बट के मैं ने हामी भर दी.”

मूलतया दिल्ली की रहने वाली रेवती लाल कहती हैं, “गुजरात दंगों के बाद मैं ने एक निजी चैनल के लिए वहां पर पत्रकार का काम किया और मेरे जेहन में यह मामला बैठा हुआ था. जब इस मामले में 11 लोगों को दोषी ठहराया गया तो मैं वहां थी और मैं बिलकिस की प्रैसवार्त्ता में भी मौजूद थी.” रेवती लाल गुजरात दंगों पर ‘द एनाटौमी औफ हेट’ नाम से किताब लिख चुकी हैं.

प्रोफैसर रूपरेखा वर्मा भी बिलकिस मामले में अहम याचिकाकर्ता हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय में पिछले 40 वर्षों से अध्यापन कार्य से जुड़ीं 80 वर्षीय प्रोफैसर रूपरेखा कहती हैं कि गुजरात सरकार के फैसले से मानवाधिकार कार्यकर्ता काफी अधिक आहत थे. इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल करने की योजना बन रही थी. मुझ से संपर्क किया गया तो मैं सहज तैयार हो गई. मैं गुजरात सरकार के फैसले से काफी हर्ट थी. किसी महिला के साथ ऐसा भयानक व्यवहार हुआ था और उस के अपराधियों को सरकार ने आजाद कर दिया, इस से शर्मनाक बात कोई नहीं हो सकती.

प्रोफैसर रूपरेखा वर्मा कहती हैं, “न्याय को ले कर हमारी पूरी उम्मीदें ख़त्म हो चुकी थीं लेकिन अब वो जगी हैं और निराशा का बादल थोड़ा सा छंट गया है.”

प्रोफैसर रूपरेखा वर्मा लखनऊ यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र पढ़ाती थीं और लंबे समय से सामाजिक और जैंडर मुद्दों पर काम करती रही हैं. हालांकि, प्रोफैसर रूपरेखा वर्मा ने कभी बिलकिस बानो से मुलाकात नहीं की क्योंकि वे उन्हें परेशान नहीं करना चाहती थीं. अब प्रोफैसर रूपरेखा वर्मा सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुश हैं.

वे मानती हैं कि कोर्ट के फैसले से न केवल दोषियों की बदनामी हुई है बल्कि उन्हें एक सबक भी मिला है क्योंकि उन्होंने झूठ बोल कर छूट ली थी. लेकिन अभी डर है क्योंकि महाराष्ट्र में बीजेपी की सरकार है. मगर महिलाओं को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए. आज बहुत से संगठन हैं जो उन की मदद करने के लिए तैयार हैं. उन्हें अपने खिलाफ हुए अन्याय पर मुंह सील कर नहीं बैठना चाहिए, बल्कि आगे बढ़ कर दोषियों को सबक सिखाना चाहिए.

विवादों में क्यों होता है विधानसभा स्पीकर ?

Shiv Sena vs Shiv Sena Verdict : महाराष्ट्र में शिवसेना के 16 विधायकों की अयोग्यता मामले में फैसला सुनाते हुए विधानसभा स्पीकर राहुल नार्वेकर ने शिंदे गुट को सही ठहराया. जिस के बाद शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे ने स्पीकर पर तंज कसा और कहा कि आज लोकतंत्र की हत्या हुई है. महाराष्ट्र में असली शिवसेना कौन है, इसे ले कर पिछले डेढ़ साल से चल रही दावेदारी की लड़ाई में एक बड़ा मोड़ तब सामने आया जब महाराष्ट्र के विधानसभा स्पीकर राहुल नार्वेकर ने सुप्रीम कोर्ट की बारबार की फटकार के बाद दी गई मोहलत के आखिरी दिन यानी 10 जनवरी को अपना फैसला सुनाया.

स्पीकर राहुल नार्वेकर ने चुनाव आयोग का हवाला देते हुए एकनाथ शिंदे गुट को राहत दी है. नार्वेकर ने अपने फैसले में कहा कि असली शिवसेना शिंदे गुट की है और उद्धव ठाकरे गुट ने नियमों को ताक पर रख कर विधायकों को सस्पैंड किया था.
स्पीकर के फैसले पर पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे ने कहा कि हम जनता को साथ ले कर लड़ेंगे और जनता के बीच जाएंगे. स्पीकर का आज जो आदेश आया है, वह लोकतंत्र की हत्या है और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी अपमान है.

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि राज्यपाल ने अपने पद का दुरुपयोग किया है और गलत किया है. अब हम इस लड़ाई को आगे भी लड़ेंगे और हमें सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है. सुप्रीम कोर्ट जनता और शिवसेना को पूरा न्याय दिए बिना नहीं रुकेगा.

शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने स्पीकर के फैसले पर सवाल उठाते हुए बीजेपी पर शडयंत्र करने का आरोप लगाया है. शिवसेना के पास यही विकल्प भी बचा है क्योंकि इस से पहले चुनाव आयोग भी शिंदे गुट के पक्ष में ही फैसला सुना चुका है.

न्याय मिलना सरल नहीं

महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर के फैसले से शिवसेना संतुष्ट नहीं है. इस के खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है. संवैधानिक संस्थाओं को इसलिए बनाया गया था कि वे ज्यादा प्रभावी फैसला कर सकती हैं. हाल के कुछ सालों में संवैधानिक संस्थाओं ने ऐसे फैसले दिए जो विवादित रहे हैं.

महाराष्ट्र के इस मसले में चुनाव आयोग और विधानसभा स्पीकर दोनों के फैसलों से शिवसेना उद्धव गुट संतुष्ट नहीं रहा. यह पहली बार नहीं है कि विधानसभा स्पीकर के फैसले पर सवाल उठे हों. जब भी राजनीतिक दलों में दलबदल या तोड़तोड़ होती है, विधानसभा स्पीकर का फैसला मान्य होता है.

लोकसभा और राज्यसभा से ले कर विधानसभाओं तक एकजैसा ही दस्तूर चल निकला है. लोकसभा में अभी 142 सांसदों को निलंबित किया गया. वहां भी सवाल खड़े हो रहे हैं. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ काफी चर्चा में रहे हैं. अब सदन में सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन रखना सरल नहीं रह गया है. फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाना सरल हो गया है. संवैधानिक संस्थाओं के फैसले जिस तरह से विवादों में फंस रहे हैं उस से न्याय में देरी होगी और अब ये फैसले सरल नहीं होंगे.

क्यों खास है विधानसभा स्पीकर ?

विधानसभा के अध्यक्ष किसी भी राज्य में राजनीतिक उठापटक को देखते हुए साल 1985 में पास किए गए दलबदल कानून का सहारा ले सकते हैं. इस कानून के तहत सदन के अध्यक्ष कई हालात में फैसला ले सकता है. अगर कोई विधायक खुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, अगर कोई निर्वाचित विधायक पार्टी लाइन के खिलाफ जाता है, अगर कोई विधायक पार्टी व्हिप के बावजूद मतदान नहीं करता है, अगर कोई विधायक विधानसभा में अपनी पार्टी के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करता है, तो संविधान की 10वीं अनुसूची में निहित शक्तियों के तहत विधान सभा अध्यक्ष फैसला ले सकता है.

बदलबदल कानून के तहत विधायकों की सदस्यता रद्द करने पर विधानसभा अध्यक्ष का फैसला आखिरी हुआ करता था. 1991 में सुप्रीम कोर्ट ने 10वीं सूची के 7वें पैराग्राफ को अवैध करार दिया. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि स्पीकर के फैसले की कानूनी समीक्षा हो सकती है.

विधानसभा स्पीकर को ले कर होते थे समझौते

सरकार चलाने में विधानसभा स्पीकर की भूमिका बहुत प्रभावी होती है. ऐसे में गठबंधन की सरकार चलाने में दल यह चाहते थे कि स्पीकर उन का हो. उत्तर प्रदेश में 1995 से 2004 तक गठबंधन की सरकारों का दौर चल रहा था. बसपा और भाजपा का गठबंधन होता था. जिस में यह तय होता था कि पहले 6 माह बसपा नेता मायावती मुख्यमंत्री रहेंगी, उस के बाद भाजपा नेता कल्याण सिंह मुख्यमंत्री होंगे. मायावती पहले मुख्यमंत्री बनीं. जब कल्याण सिंह का नंबर आया तो मायावती ने विधानसभा भंग करने का फैसला किया. उधर भाजपा ने मायावती के पैतरें का जवाब देने के लिए बहुजन समाज पार्टी में दलबदल करा दिया. यहां पर विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका खास हो जाती थी.

भाजपा ने उस दौर में केसरीनाथ त्रिपाठी को अपना विधानसभा स्पीकर बनवाया था. केसरीनाथ त्रिपाठी अच्छे वकील थे. उन के फैसले ऐेसे होने लगे जिन का लाभ भाजपा को मिलता था. वे जो फैसला देते थे उस की काट कोर्ट में भी नहीं हो पाती थी. इस के बाद यह परिपाटी शुरू हो गई कि गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री एक गुट का होता था तो विधानसभा स्पीकर दूसरे गुट का. इस से यह पता चलता है कि गठबंधन सरकारों में विधानसभा स्पीकर का महत्त्व कितना और क्यों होता है ?

साल 2011 में कर्नाटक में भी इसी तरह का मामला सामने आया था. तब कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष ने बीजेपी के 11 विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी थी. जब यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो विधायकों की सदस्यता रद्द किए जाने के पक्ष में फैसला आया. लेकिन जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली पीठ ने विधायकों की सदस्यता रद्द नहीं करने का फैसला सुनाया.

साल 1992 में एक विधायक की सदस्यता रद्द किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट और मणिपुर के विधानसभा अध्यक्ष एच बोडोबाबू के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई थी. कई बार ऐसे मौके आए, जब विधानसभा अध्यक्षों की भूमिका और उन के अधिकारों को ले कर अदालतों में बहस हुई हैं. संविधान ने जिस तरह से विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को अधिकार दिए थे, अब ये उस तरह से फैसले नहीं कर रहे.

इस वजह से इन संस्थाओं के भरोसे पर सवाल उठाने लगे हैं. न्याय कठिन हो गया है. हर व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट से ही राहत की उम्मीद करने लगा है. वहां तक पहुंचना सरल नहीं रह गया है. खर्च वाला काम है. संवैधानिक संस्थाओं के फैसले लोगों को संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं.

वैडिंग लोन से ही सही, युवा खुद उठा रहे अपनी शादी का खर्च

लड़कियों को पेट में ही मार डालने या पैदा होने के तुरंत बाद मार डालने का रिवाज पूरी तरह खत्म भले ही न हुआ हो लेकिन काफी हद तक नियंत्रित जरूर हुआ है. शिक्षा और जागरूकता सहित इस की एक बड़ी वजह यह भी है कि अब बेटी के पैदा होते ही मांबाप को उस की शादी और दहेज की चिंता इतना नहीं सताती कि उन्हें 60 से ले कर 80 तक के दशक के फिल्मों की तरह गहनों की पोटली या जमीनजायदाद के कागजात ले कर सूदखोर लाला के पास भारीभरकम ब्याज पर कर्ज लेने जाना पड़ता हो.

हालांकि हर दौर की तरह शादी आज भी मकान के बाद दूसरा बड़ा खर्च है बल्कि शादियां अब पहले से ज्यादा खर्चीली हो चली हैं लेकिन इतनी कतई नहीं कि बाप को पगड़ी किसी के पांवों में रख कर इज्जत की दुहाई देते गिड़गिड़ाना पड़े या दोस्तों व रिश्तेदारों से पैसा उधार मांगना पड़े. इस की वजह, दोटूक कहें तो, अधिकतर युवा अपनी शादी का खर्च खुद उठाने लगे हैं. आंकड़ों में दाखिल होने से पहले इसे कुछ उदाहरणों से बेहतर समझा जा सकता है.

भोपाल का 29 वर्षीय आदित्य पुणे की एक सौफ्टवेयर कंपनी में 18 लाख रुपए सालाना के पैकेज पर जौब करता है. 5 साल की नौकरी में उस ने कोई 15 लाख रुपए इकट्ठा कर लिए हैं. कुछ एफडी की शक्ल में तो कुछ यहांवहां इन्वैस्ट कर के उस ने पैसा बढ़ाया ही है. पिता भी सरकारी कर्मचारी हैं और अब रिटायरमैंट कि कगार पर हैं.

रिश्ते की बात चली तो उन्हें खर्च की भी चिंता सताने लगी, जिसे आदित्य ने यह कहते आधा कर दिया कि आप तो चिल करो, पैसों का टैंशन मत लो. मेरे पास 20 लाख रुपए तक का इंतजाम हो जाएगा. इतने से ज्यादा लगा, तो फिर आप देख लेना.

उस के पापा, जो जीपीएफ से पैसा निकालने के लिए दफ्तर से फौर्म तक ले आए थे, यह सुनते ही निश्चिंत हो गए क्योंकि 8-10 लाख रुपए का इंतजाम तो उन्होंने भी कर रखा था. 30 लाख रुपए बहुत हैं आजकल धूमधाम और शान से शादी करने के लिए. सो, उन्होंने आदित्य को अपनी पसंद की लड़की दिखाई जो उसे भा गई तो तुरंत एंगेजमैंट भी हो गई. अब इस साल आदित्य रश्मि के साथ शादी के बंधन में बंध जाएगा जो खुद 12 लाख रुपए के पैकेज पर जौब मुंबई की एक नामी कंपनी में करती है.

लड़कियां भी पीछे नहीं

27 वर्षीया तपस्या एक राष्ट्रीयकृत बैंक में अधिकारी है. घर भोपाल में ही है, लिहाजा 90 हजार रुपए महीने की सैलरी में से बमुश्किल 25-30 हजार रुपए ही खर्च होते थे. घरखर्च में हाथ बंटाने की पहल करती थी तो पापा यह कहते टाल जाते थे कि हम लड़कियों की कमाई नहीं लेते, हालांकि, ऐसी कोई कसम भी नहीं खाई है. अगर जरूरत पड़ी तो तुम्हें बेटा समझ कर ले भी लेंगे. अभी तुम ये पैसे अपने पास ही रखो और जैसे चाहे इस्तेमाल करो. तुम तो बैंक में हो, सो, इस बारे में ज्यादा जानती हो.

तपस्या के पास 20 लाख रुपए इकट्ठा हो गए हैं. जैसे ही खुद उस ने अपनी पसंद का लड़का बताया तो मम्मीपापा पुरानी हिंदी फिल्मों के सोहराब मोदी या नासिर हुसैन जैसे किलपने के बजाय खुश हो उठे और खुद रिश्ता ले कर स्वप्निल के यहां जा पहुंचे. शादी हुए एक साल हो गया है लेकिन इस में तपस्या के पापा का महज 8 लाख रुपए ही खर्च हुआ. वह भी उन्होंने जबरन कर दिया नहीं तो वह और उस की कुलीग स्वप्निल सबकुछ तय कर चुके थे. दोनों ने अपनी ही कमाई और बचत से 40 लाख रुपए शादी पर खर्च किए और दोनों पक्षों में से किसी को भी किसी से धेला भर भी बतौर कर्ज या उधार नहीं लेना पड़ा.

यह एक नहीं, बल्कि हजारोंलाखों तपस्याओं की कहानी है जो अपनी शादी का खर्च खुद उठा रही हैं. पूरा न सही तो आधा और अकसर उस से भी ज्यादा. इस बात का खुलासा करते भोपाल के सरकारी कालेज की एक प्रोफैसर सोना शुक्ला बताती हैं, “असल में परिवार अब छोटे हो चले हैं. संयुक्त परिवारों में संतानें 4 या ज्यादा होती थीं, लिहाजा पिता की कमाई उन की परवरिश और पढ़ाईलिखाई में ही खर्च हो जाती थी. ऐसे में शादी के लिए फंड जुटाने की समस्या चुनौती की शक्ल में पेश आती थी. पहले के लोग किफायती होते थे और दूरदर्शी भी, इसलिए कोई अड़चन नहीं आती थी.

वे जाने कैसे शादी के खर्च का इंतजाम कर ही लेते थे. सरकारी नौकरी में हों तो भविष्यनिधि उन का बहुत बड़ा सहारा होती थी और अगर व्यापारी हुए तो वे अच्छी कमाई के दिनों में सोने और जमीनों में पैसा लगा देते थे. शादी का वक्त आतेआते उसे बेचने पर खासा अमाउंट मिल जाता था. अगर फिर भी कम पड़ता था तो बाजार से ब्याज और उठा लेते थे और धीरेधीरे चुकाते रहते थे.

शादी और लोन का गणित

युवा अपनी शादी का खर्च खुद उठा सकें, इस के लिए अब बैंक और दूसरी कई एजेंसियां भी वेडिंग लोन देने लगी हैं. एक नामी औनलाइन कंपनी इंडिया लेंड्स ने हाल ही में जारी की अपनी एक सर्वे रिपोर्ट में बताया है कि आज के युवा अपनी शादी के खर्च का बोझ पेरैंट्स पर न डाल कर उसे खुद उठाना चाहते हैं. इस सर्वे के मुताबिक, 42 फीसदी युवा यह खर्च खुद उठाना चाहते हैं. इस में भी दिलचस्प बात यह है कि 60 फीसदी युवतियां अपनी शादी का खर्च खुद जुटा रही हैं जबकि ऐसा करने वाले युवकों की तादाद 52 फीसदी है.

जरूरी नहीं कि सभी युवाओं के पास एकमुश्त इतना पैसा हो कि वे 25-30 लाख रुपए शादी में खर्च कर सकें. इस परेशानी को देखते अब वैडिंग लोन लेने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है. इस सर्वे की मानें तो 26.3 फीसदी युवा वैडिंग लोन को प्राथमिकता दे रहे हैं जबकि 42.1 फीसदी युवाओं ने शादी के लिए फंड इकट्ठा कर रखा है. यह लोन भी कोई भारीभरकम नहीं है बल्कि 67.7 फीसदी युवा महज एक से ले कर 5 लाख रुपए तक का लोन लेना पसंद कर रहे हैं.

युवाओं के नजरिए में आते बदलाव पर एक नजर डालें तो सर्वे में शामिल 70 फीसदी युवाओं ने कम खर्चीली शादी की बात कही, जिस का बजट 10 लाख रुपए से ज्यादा का न हो. 21.6 फीसदी युवा 25 लाख रुपए तक शादी पर खर्चना चाहते हैं तो महज 8.4 फीसदी युवा ही 25 लाख रुपए से ज्यादा शादी पर खर्च करने की बात सोचते हैं. सर्वे यह भी बताता है कि एक औसत शादी का खर्च इन दिनों 20 – 25 लाख रुपए है.

सहूलियत से मिलता है

वैकडिंग लोन अब लगभग सभी बैंक दे रहे हैं लेकिन देश का सब से बड़ा एसबीआई इन में अग्रणी है. क्या है और किसे मिल सकता है वैडिंग लोन, यह जानने से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि वैडिंग लोन, दरअसल, एक तरह का पर्सनल लोन ही है. ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कुछ औफर्स के साथ इसे वैडिंग लोन नाम दे दिया गया है. बड़ा फर्क यह है कि वैडिंग लोन जल्द मिल जाता है. इसे ‘मेरी नाऊ पे लेटर’ नाम से भी जाना जाने लगा है लेकिन हकीकत में दोनों में थोड़ा फर्क है.

अपनी आमदनी के मुताबिक कोई भी नौकरीपेशा 40 लाख रुपए तक का वैडिंग लोन जितनी जरूरत हो, ले सकता है लेकिन इस के लिए सभी खानापूर्तियां करना जरूरी होता है जो किसी भी लोन में की जाती हैं, मसलन एड्रेस प्रूफ, पैनकार्ड, आईटीआर फौर्म-16 और इनकम प्रूफ वगैरह. सिविल स्कोर का ठीक यानी 750 से ज्यादा होना भी जरूरी होता है. अलगअलग बैंकों की ब्याज दरों में मामूली अंतर वैडिंग लोन में होता है. आमतौर पर यह 11 से 20 फीसदी तक होता है. वैडिंग लोन 5 साल तक मासिक किस्तों में चुकाना होता है, हालांकि, बड़े बैंक 7 साल तक की सहूलियत देते हैं.

वैडिंग लोन के लिए न्यूनतम मासिक आय 15 हजार रुपए होना जरूरी होता है और आवेदक की उम्र 21 से 60 साल के बीच होनी चाहिए. यह लोन चाहने वाले औफ या औनलाइन भी आवेदन कर सकते हैं.

हर्ज नहीं बशर्ते

अपनी मरजी की शादी करने के लिए वैकडिंग या मैरिज लोन लेना हर्ज की बात नहीं लेकिन दूसरे किसी भी लोन की तरह चुकाने की क्षमता होनी जरूरी है. गृहस्थ जीवन में प्रवेश के पहले इस की मासिक किस्तों को बजट में शामिल करना बाद की परेशानियों से बचाता है. आमतौर पर युवा 5 से 10 लाख तक का वैडिंग लोन कपड़ों, गहनों और हनीमून सहित दूसरे व्यक्तिगत खर्चों के लिए ज्यादा लेते हैं. हालांकि, आप लोन का इस्तेमाल कैसे और कहां करते हैं, इस पर बैंक की कोई बंदिश नहीं रहती है.

भोपाल के ही एक इंजीनियर अभिषेक श्रीवास्तव की मानें तो शादी एक बार होती है जिस में युवाओं की कई ख्वाहिशें और इच्छाएं ऐसी होती हैं जिन्हें वे पेरैंट्स के सामने व्यक्त करने में हिचकते हैं. ऐसे में वैडिंग लोन एक अच्छा विकल्प है.

आखिर अधिकतर युवा व्हीकल लोन भी तो लेते हैं और किस्तें वक्त पर चुकाते रहते हैं. अलावा इस के, अगर युवा पेरैंट्स का हाथ बंटा पाएं तो इस में हर्ज क्या है. हां, शादी में फुजूलखर्ची और दिखावे से बचना चाहिए लेकिन अपनी इच्छाओं की हत्या भी थोड़े से पैसों के पीछे करना जिंदगीभर सालता रहता है. इसलिए, 5-7 साल तक का वैडिंग लोन लेना हर्ज की बात नहीं.

Mushroom Benefits : डायबिटीज से लेकर हृदय तक, सर्दियों में मशरूम है कई रोगों का इलाज

Mushroom Health Benefits : वैसे तो बाजार में हर मौसम में मशरूम मिलता है, लेकिन सर्दियों में इसे खाना शरीर के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है. मशरूम में विटामिन, मिनरल्स और सभी जरूरी अंतिओक्सीडेंट्स की उच्च मात्रा होती है. जो प्रतिरोधक प्रणाली को मजबूत बनाता है. साथ ही कई बीमारियों के होने के खतरे को भी कम हो सकता है. इसी वजह से ज्यादातार लोग विंटर में मशरूम को अपनी डाइट का हिस्सा बनाते हैं. आइए जानते हैं, पोषक तत्वों से भरपूर मशरूम (Mushroom Health Benefits) खाने के फायदों के बारे में.

हृदय को रखता है स्वस्थ

आपको बता दें कि मशरूम में प्रोटीन, विटामिन, मैग्नीशियम, पोटैशियम, जिंक, टामिन बी-कॉम्प्लेक्स सेलेनियम और डाइटरी फाइबर की उच्च मात्रा होती है. इसके अलावा इसमें अंतिओक्सीडेंट गुणों की भी कमी नहीं होती हैं. इसलिए जो लोग सर्दियों में मशरूम का सेवन करते हैं, उनका शरीर रैडिकल्स के प्रभाव से मुक्त रहता है. साथ ही उन्हें हृदय रोग होने की संभावनाएं भी कम हो जाती है. इसके अलावा मशरूम में मौजूद सेलेनियम नामक अंटिओक्सीडेंट स्ट्रोक और अन्य अस्थायी बीमारियों से शरीर को बचाता है.

प्रतिरोधक प्रणाली होती है मजबूत

मशरूम (Mushroom Health Benefits) के नियमित सेवन से शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली व इम्यूनिटी मजबूत होती है, जिससे बाहरी संक्रमण होने का खतरा कम होता है. साथ ही शरीर को विभिन्न बीमारियों से लड़ने की क्षमता मिलती है.

वजन रहता है नियंत्रण में

मशरूम में फाइबर की उच्च मात्रा होती है, जो पाचन तंत्र को मजबूत करता है. इससे लंबे समय तक पेट भरा-भरा रहता है और भूख नहीं लगती है, जिससे वजन को नियत्रंण करने में मदद मिलती है.

शुगर कंट्रोल करता है

डायबिटीज मरीजों के लिए भी मशरूम (Mushroom Health Benefits) का सेवन करना फायदेमंद होता है. इसमें इंसुलिन-लाइक नामक प्रॉपर्टीज होता है, जो ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में सहायक होता है. इसके अलावा मशरूम में कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट दोनों की कम मात्रा होती है, जिससे शरीर में खून शर्करा का स्तर संतुलित रहता है. साथ ही डायबिटीज से संबंधित समस्याओं के होने का जोखिम  भी कम हो जाता हैं.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

Cold Home Remedies : सर्दी-जुकाम और खांसी से हैं परेशान, तो ये देसी इलाज आएंगे आपके बहुत काम

Cold-Cough & Flu Home Remedies : ठंड के मौसम में सर्दी, जुकाम और खांसी आदि की समस्या होना आम बात है. श्वसन तंत्र का यह संक्रमण खांसने या छींकने से फैलता है. इसी वजह से इस मौसम में हर घर में कोई न कोई व्यक्ति वायरल की चपेट में आ ही जाता है. ऐसे में कुछ घरेलू उपायों को अपनाने से मौसमी बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है.

आइए जानते हैं उन देसी उपायों (Cold-Cough & Flu Home Remedies) के बारे में, जिन्हें अपनाने से सर्दी-जुकाम और खांसी में  आपको राहत मिलेगी ही. साथ ही उन्हें अपनाने से शरीर को भी कोई नुकसान नहीं होगा.

लहसुन

मौसमी बीमारियों से बचने का सबसे अच्छा उपाय है कि आप अपने खाने में ज्यादा से ज्यादा लहसुन का इस्तेमाल करें. दरअसल, लहसुन में एलिसिन नामक रसायन होता है, जिसे एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-वायरल और एंटी-फंगल भी कहा जाता है. जो वायरल इंफ्क्शन को फैलने से रोकता है.

हल्दी वाला दूध

सर्दियों के मौसम में रोजाना एक गिलास गर्म हल्दी वाला दूध (Cold-Cough & Flu Home Remedies) पीना शरीर के लिए काफी फायदेमंद होता है. इससे गले की खराश और नाक बहने की समस्या में बहुत आराम मिलता है.

काली मिर्च

नाक बहने की समस्या में काली मिर्च के चूर्ण को चाटने से काफी राहत मिलती है. काली मिर्च में मौजूद पोषक तत्व संक्रमण को फैलने से रोकते है. साथ ही गले में खराश की परेशानी में भी आराम मिलता है.

तुलसी

कडाके की ठंड से बचने के लिए आप प्रतिदिन तुलसी की पत्तियों या इसके काढ़े का भी सेवन कर सकते है. तुलसी के काढ़े को पीने से जुकाम और खांसी दोनों में बहुत आराम मिलता है.

अदरक

सर्दी में अदरक (Cold-Cough & Flu Home Remedies) की चाय पीने से जुकाम में आराम मिलता है. इसके अलावा आप खाने में भी अदरक को डाल सकते हैं, जिससे नाक बहने की समस्या भी दूर हो जाएगी. साथ ही इम्यूनिटी भी स्ट्रांग होगी.

सरसों का तेल

रात को सोने से पहले नाक में 2-2 बूंदे सरसों का तेल ड़ालना भी काफी फायदेमंद होता है. इससे नाक के विभिन्न रोगों से छुटकारा मिलता है.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

इन चीजों को खाएं भिगोकर, कई बीमारियां रहेंगी कोसों दूर

Foods that are healthy for Body : कई ऐसे फूड्स हैं जिन्हें हम पूरी रात भिंगोकर खाएं तो हमारे स्वास्थ्य के लिए ज्यादा लाभकारी होते हैं. क्योंकि ये अंकुरित होने के बाद इनके न्यूट्रीशन वैल्यू बढ़ जाती है. साथ ही यह आशानी से पच भी जाते हैं जो हमारे सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद होता है.

इन फूड्स में फाइबर भरपूर मात्रा में पाएं जाते हैं. जो डाइबिटीज के रोगियों के लिए ज्यादा फायदेमंद होता है. वहीं कुछ फूड्स तो ऐसे होते हैं जो महिलाओं के पीरिय़ड्स में होने वाले दर्द में भी राहत देता है.

खसखस

यह फोलेट विटामिन और पेंटोथेनिक एसिड़ का अच्छा स्त्रोत होता है. इसमें मौजूद विटामिन मेटाबोलिज्म को बढ़ाता है. जो वजन को नियंत्रित करने में काम करता है.

अलसी 

अलसी एक ऐसा फूड्स है जिसे ओमेगा 3 का सबसे अच्छा स्त्रोत माना जाता है. यह एक मात्र ऐसा शाकाहारी सोर्स है जिसे लोग खाना पसंद करते हैं.

मुनक्का

यह मैग्नेशियम पोटैशियम का एक मात्र ऐसा स्त्रोत है, जिसे लोग खूब खआना पंसद करते हैं. यह कौलस्ट्रोल को भी कम करता है.

इसमें आयरन की काफी ज्यादा मात्रा होती है. इसके नियमित सेवन से कब्ज की समस्या दूर हो जाती है. बीपी के मरीजों को इसका रोज सेवन करना चाहिए.

ईसीआई, एससी और पीएमओ

देश की मौजूदा केंद्र सरकार भारतीय चुनाव आयोग (इलैक्शन कमीशन औफ इंडिया- ईसीआई) और सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट- एससी) को भी पंगु बना कर अपने अभिन्न मगर अदृश्य व अनिर्वाचित प्राइम मिनिस्टर औफिस (पीएमओ) के फंदे में ले आना चाहती है. नए प्रस्तावित चुनाव आयोग के कानून में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में जो परदे डालने का प्रावधान है वह चुनाव आयोग को पूर्व चुनाव आयुक्त टी एन शेषन के पहले वाले युग में ले जाने वाला है जिस में चुनाव आयोग सरकार का एक अंग होता था.

आज सरकार का मतलब संसद या विधानसभाएं नहीं रह गई हैं. आज सभी फैसले प्राइम मिनिस्टर औफिस द्वारा लिए जा रहे हैं. पीएमओ यानी प्रधानमंत्री कार्यालय ही आज नई योजनाएं बनाता है और वह ही उन्हें लागू करता/करवाता है. आज संसद में बहस नहीं होने दी जाती. केंद्रीय मंत्री केवल पीएमओ से स्वीकृत भाषण पढ़ते हैं. नीतियां पीएमओ बनाता है और संसद आंख मूंद कर उन्हें पास करती है. यहां तक कि भाजपा के नएपुराने मुख्यमंत्री भी जनादेश की नहीं,  मंत्रियों की नहीं, मंत्रिमंडल की नहीं बल्कि पीएमओ पर निर्भर होने को मजबूर हैं.

जहां भी शब्द ‘सरकार’ आता है वहां अर्थ पीएमओ हो गया है क्योंकि वही तय करता है कि देश कब वहां कैसा फैसला लेगा. चुनाव आयुक्त की नीति, उस के कार्यकाल, आयुक्त की शक्तियां, सुविधाएं, पहुंच अब धीरेधीरे खिसक कर पीएमओ के हाथ में पहुंच रही हैं. देश को दिशा देने के लिए यूपीएससी की परीक्षाओं से निकल कर आए व 20-25 वर्ष की नौकरी के बाद घाघ बन गए सरकारी अफसर अब जनता के माईबाप बन गए हैं. मंत्रियों की तो कोई पूछ है ही नहीं, खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह जो फैसले लेते हैं, उन की सारी पृष्ठभूमि भी पीएमओ तैयार करता है.

भारतीय जनता पार्टी का हर नेता जानता है कि पीएमओ ने इतने अधिकार अपने पास रख रखे हैं और इतने राज वहां फाइलों में रखे हैं कि वह जब चाहे किसी की भी बांहें मरोड़ सकता है. चुनाव आयुक्त भी आमतौर पर इसी पीएमओ के तहत आते हैं और वे यह जानते हैं कि पीएमओ की सामूहिक शक्ति कितनी है, कैसी है और कहांकहां तक फैली है.

आज पीएमओ में वे वरिष्ठ आईएएस और आईपीएस अफसर हैं जो कभी न कभी गुजरात में रहे हैं और एक तरह से उन पर मोदी व शाह का विश्वास है. यह विश्वास इस तरह का हो गया है कि मोदी और शाह अब उन की सहमति के बिना कोई काम नहीं करते.

नेहरू और इंदिरा के शासन में फैसले मंत्रिमंडल लेता था जिस का जमीन से जुड़ाव था. आज जमीन से जुड़े लोगों के हक गायब हो गए हैं. वे मोहरे बना दिए गए हैं और चुनाव आयोग भी ऐसा ही एक मोहरा है.

अगर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता कम होती गई तो एक दिन देश की जनता का लोकतंत्र से विश्वास उठ जाएगा. और तब, जनता पर थानेदार, टैक्स कलैक्टर, इंस्पैक्टर, नगरनिकाय विभाग उसी तरह से कहर ढाने लगेंगे जैसे मुगलराज के पतन के बाद हुआ था, जिस का पूरा लाभ ईस्ट इंडिया कंपनी ने उठाया जो व्यापार करतेकरते शासक बन बैठी.

चुनाव आयुक्त वह नियंत्रक है जो देश के लोकतंत्र को बचा सकता है पर अगर वह लोकतंत्र की लूट होते देख चुप रहता है तो इस लूट का भागीदार उसे भी माना जाएगा. विपक्षी दल इस ओर दबे मुंह से शिकायत कर रहे हैं पर वे मुखर नहीं हो रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि चुनाव आयोग भी पीएमओ के कीकर के जंगल का हिस्सा ही है.

हिस्टेरेक्टौमी सर्जरी के बाद भी क्या सैक्स किया जा सकता है या नहीं ?

सवाल 

मेरी उम्र 48 साल है, 2 बच्चों की मां हूं. कई सालों से मुझे पीरियड्स की प्रौब्लम हो रही थी. बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होती थी. आखिरकार डाक्टर ने लास्ट औप्शन हिस्टेरेक्टौमी सर्जरी ही बताया और मैं ने सर्जरी करवा ली. अभी तक मैं और मेरे पति अपनी सैक्सलाइफ काफी एंजौय कर रहे थे. क्या इस सर्जरी के बाद पहले जैसी बात रहेगी?

जवाब

आप ही नहीं, कई महिलाओं के जेहन में यह सवाल आता है क्योंकि कई महिलाएं हिस्टेरेक्टौमी यानी यूट्रस रिमूवल सर्जरी से गुजरती हैं और सर्जरी के बाद हैल्थ की चिंता के अलावा वे इस बारे में भी चिंतित होती हैं कि उन की सैक्सलाइफ अब कैसी होगी. जबकि इस सर्जरी के बाद सैक्सलाइफ पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है.

एक अध्ययन से पता चला है कि हिस्टेरेक्टौमी का एक महिला के यौन जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. खासकर, अगर वह सर्जरी से पहले, चिकित्सकीय रूप से संबंधित सैक्सुअल प्रौब्लम का सामना कर रही थी. हालांकि हर किसी की स्थिति अलग होती है.

डाक्टर सलाह देते हैं कि हिस्टेरेक्टौमी के बाद सैक्स के लिए महिलाओं को तब तक परहेज करना चाहिए जब तक वैजाइनल डिस्चार्ज बंद न हो जाए और घाव ठीक न हो जाएं. कुछ महिलाओं को सर्जरी के बाद कई हफ्तों तक वैजाइनल ब्लीडिंग और दर्द का अनुभव हो सकता है और उन्हें सैक्स में बहुत कम रुचि हो सकती है. शारीरिक प्रभावों के अलावा भावनात्मक प्रभाव भी हो सकता है. यह महिला की सैक्स करने की इच्छा को भी कम कर सकता है. हालांकि हिस्टेरेक्टौमी के बाद सैक्स में रुचि हर महिला की व्यक्तिगत स्थिति पर अलगअलग हो सकती है.

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