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Saras Salil Cine Award: इन कलाकारों को भी ओवरआल कैटेगिरी में मिला अवार्ड

‘5वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ में इस बार भारी संख्या में आवेदन आए थे. लेकिन जूरी द्वारा फिल्मों में ऐक्टिंग, ऐडिटिंग, संगीत, मारधाड़, कथापटकथा इत्यादि के आधार पर जिन लोगों का चयन किया गया, उस में सब से ऊपर नाम दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ और आम्रपाली दुबे का रहा, क्योंकि इन दोनों सितारों को ऐक्टिंग की ओवरआल श्रेणी में बैस्ट ऐक्टर का अवार्ड दिया गया.

दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ को जहां उन की फिल्म ‘माई प्राइड औफ भोजपुरी’ में की गई ऐक्टिंग के लिए बैस्ट ऐक्टर का अवार्ड दिया गया, वहीं आम्रपाली दुबे को फिल्म ‘दाग एगो लांछन’ के लिए बैस्ट ऐक्ट्रैस का अवार्ड दिया गया. रजनीश मिश्र को ‘माई प्राइड औफ भोजपुरी’ के लिए बैस्ट डायरैक्टर और बैस्ट म्यूजिक डायरैक्टर का अवार्ड मिला.

‘5वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ में सब से ज्यादा अवार्ड निशांत उज्ज्वल को मिला. उन्हें विभिन्न कैटेगिरी में कुल 3 अवार्ड मिले, जिस में ‘माई प्राइड औफ भोजपुरी’ को बैस्ट फिल्म का, ‘विवाह 3’ के लिए बैस्ट संपूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली फिल्म और बैस्ट डिस्ट्रीब्यूटर के अवार्ड से नवाजा गया. ‘माई प्राइड औफ भोजपुरी’ के लिए ही जनार्दन पांडेय ‘बबलू पंडित’ को बैस्ट लाइन प्रोड्यूसर, प्यारेलाल यादव ‘कविजी’ को बैस्ट गीतकार, प्रियंका सिंह को बैस्ट सिंगर, दिलीप यादव को बैस्ट ऐक्शन, कानू मुखर्जी को बैस्ट कोरियोग्राफर, ज्योति देशपांडेय को बैस्ट फिल्म निर्माता का अवार्ड दिया गया. ‘दाग एगो लांछन’ फिल्म के लिए जितेंद्र सिंह ‘जीतू’ को बैस्ट ऐडिटर, प्रेमांशु सिंह को बैस्ट डायरैक्टर भोजपुरी फैमिली वैल्यूज मूवी, मनोज कुशवाहा को ‘दाग एगो लांछन’ के लिए बैस्ट स्टोरी, विक्रांत सिंह को बैस्ट सैकंड लीड ‘दाग एगो लांछन’ के लिए प्रदान किया गया. ‘विवाह 3’ के आधार पर महेंद्र सेरला बैस्ट डीओपी रहे, वहीं ऐक्ट्रैस पाखी हेगड़े को महिला प्रधान फिल्मों में विशिष्ट योगदान के लिए अवार्ड दिया गया.

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सिनेमाघरों में लंबे समय तक चलने वाली भोजपुरी फिल्म ‘हीरा बाबू एमबीबीएस’ के हीरो विमल पांडेय को बैस्ट क्रिटिक ऐक्टर का अवार्ड प्रदान किया गया. इसी फिल्म से अखिलेश पांडेय को बैस्ट डायरैक्टर क्रिटिक अवार्ड से नवाजा गया.

इन लोगों को भी ओवरआल कैटेगिरी में मिला अवार्ड

ओवरआल कैटेगिरी में जिन्हें अवार्ड मिले, उन में संजय पांडेय को ‘संघर्ष 2’ में किए गए अभिनय के लिए बैस्ट विलेन का अवार्ड दिया गया, जबकि ‘सिंह साहब द राइजिंग’ के लिए बैस्ट ऐक्टर इन सपोर्टिंग रोल के लिए सुशील सिंह को अवार्ड प्रदान किया गया. विजय श्रीवस्तव को ‘डार्लिंग’ फिल्म के लिए बैस्ट आर्ट डायरैक्टर का अवार्ड मिला.

इस के अलावा राहुल शर्मा को फिल्म ‘डार्लिंग’ के लिए बैस्ट डैब्यू ऐक्टर, रंजन सिन्हा को बैस्ट पीआरओ, आनंद त्रिपाठी को बैस्ट फिल्म पत्रकार, सीपी भट्ट को फिल्म ‘पड़ोसन’ के लिए बैस्ट कौमेडियन, अनारा गुप्ता को फिल्म ‘सनक’ के लिए बैस्ट आइटम नंबर का अवार्ड, रवि तिवारी को फिल्म ‘आसरा’ के लिए बैस्ट असिस्टैंट डायरैक्टर का अवार्ड दिया गया. इस के अलावा फिल्म ‘दादू आई लव यू’ के लिए आर्यन बाबू को बैस्ट चाइल्ड ऐक्टर मेल, ‘अफसर बिटिया’ फिल्म के लिए आयुषी मिश्रा बैस्ट चाइल्ड ऐक्टर फीमेल, प्रमिला घोष को बैस्ट स्टेज परफौर्मेंस, विजय यादव को बैस्ट फोक डांस ‘फरूआही’ के लिए प्रदान किया गया.

राकेश त्रिपाठी और कन्हैया विश्वकर्मा को ‘अफसर बिटिया’ के लिए बैस्ट डैब्यू डायरैक्टर का अवार्ड दिया गया, जबकि ‘आसरा’ फिल्म से बैस्ट डैब्यू ऐक्ट्रैस का अवार्ड सपना चैहान को, हितेश्वर को बैस्ट भोजपुरी रैपर का अवार्ड प्रदान किया गया.

चुनाव आयोग विपक्ष के सवालों और आरोपों का जवाब देने में क्यों विफल हो रहा है ?

संपूर्ण देश में आज ईवीएम पर पृष्ठचिन्ह खड़ा हो गया है. जिस तरह छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में चुनाव परिणाम आए, उस से यह हवा बह चली कि कहीं न कहीं ईवीएम को ले कर कोई तो लोचा है. मगर भाजपा, उस के कद्दावर नेता और चुनाव आयोग किसी भी हालत में इसे तवज्जुह नहीं दे रहे. लाख टके का सवाल यह है कि जब दुनिया के अनेक देशों में ईवीएम से मतदान बंद हो चुका है तब हमारे देश में चुनाव आयोग, जिस का दायित्व है कि निष्पक्ष चुनाव संपन्न हो और सभी संतुष्ट हों, आखिर ईवीएम को छोड़ कर चुनाव संपन्न कराने को तैयार क्यों नहीं हो रहा है.

सब से बड़ा सवाल यह है कि भारतीय जनता पार्टी, जिस की देश में सत्ता है, के नेता ईवीएम पर प्रश्न खड़े होते ही बौखलाने क्यों लगते हैं? अब जब कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने चुनाव आयोग के समक्ष देश की लगभग सभी महत्त्वपूर्ण विपक्षी पार्टियों के गठबंधन ‘इंडिया’ के छत्र तले मिलने का वक्त मांगा तो वह नहीं मिल पा रहा है.

दरअसल, कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने निर्वाचन आयोग द्वारा उन के द्वारा प्रस्तुत वीवीपेट संबंधी चिंताओं को खारिज किए जाने के बाद 8 जनवरी को एक बार फिर मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार को पत्र लिख कर आरोप भी लगाया कि निर्वाचन आयोग विपक्षी दलों के प्रश्नों और ईवीएम से संबंधित ‘वास्तविक चिंताओं’ का ठोस जवाब देने में विफल रहा है.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने यह आग्रह भी किया कि विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के एक प्रतिनिधिमंडल को मिलने का समय दिया जाए ताकि विपक्षी दल कम से कम वीवीपैट के विषय में आयोग के समक्ष अपनी बात रख सकें. जयराम रमेश ने पिछले साल 30 दिसंबर को भी निर्वाचन आयोग को पत्र लिख कर अनुरोध किया था कि ‘इंडिया’ के एक प्रतिनिधिमंडल को वीवीपैट पर्चियों पर अपने विचार रखने के लिए समय दिया जाए.

निर्वाचन आयोग ने वीवीपेट पर रमेश की चिंताओं को खारिज करते हुए कहा था कि इस के माध्यम से ऐसा कोई नया दावा या उचित एवं वैध संदेह नहीं उठाया गया है.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने आग्रह किया कि ‘इंडिया’ के एक प्रतिनिधिमंडल को मिलने का समय दिया जाए ताकि विपक्षी दल कम से कम वीवीपेट के विषय में आयोग के समक्ष अपनी बात रख सकें, जिस के लिए और स्पष्टीकरण की आवश्यकता है.

मगर आयोग ने जवाबी पत्र में यह कहा, “पेपरपर्चियों संबंधी नियम कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा 2013 में पेश किए गए थे. रमेश ने 8 जनवरी को राजीव कुमार को लिखे पत्र में कहा, “मैं ने आयोग के साथ ‘इंडिया’ के घटक दलों के नेताओं की मुलाकात के लिए समय देने का स्पष्ट अनुरोध किया था. मुलाकात के एजेंडे में वीवीपीएटी के उपयोग पर चर्चा करना और सुझाव देना शामिल थे.”

उन्होंने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग विपक्षी दलों के मिलने के आग्रह को खारिज करने के साथ ही उन के प्रश्नों और ईवीएम पर वास्तविक चिंताओं का ठोस जवाब देने में विफल है.

कांग्रेस नेता ने कहा, “ईवीएम या वीवीपेट पर राजनीतिक प्रतिभागियों के साथ बातचीत करने से आप का साफ इनकार सिर्फ ‘इंडिया’ से संबंधित पार्टियों के लिए नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक दलों के लिए गंभीर चिंता का विषय है.” उन का कहना था, “यह जान कर भी आश्चर्य होता है कि आयोग न्यायिक आदेशों की आड़ ले रहा है. हमें यह भी याद दिला रहा है कि ईवीएम और वीपीपेट के मुद्दे पर दायर जनहित याचिकाओं को खारिज कर दिया गया है. आयोग अच्छी तरह जानता है कि वीवीपेट से संबंधित किसी भी न्यायिक प्रक्रिया के लंबित रहने की वजह से आयोग को ‘इंडिया’ के घटक दलों के सुझावों पर चर्चा करने या सुनने से नहीं रोका जा सकता.”

उन्होंने यह भी कहा, “वास्तव में, ऐसा कोई न्यायिक आदेश नहीं है जो आयोग को ईवीएम वीवीपैट के मुद्दे पर ‘इंडिया’ के घटक दलों नेताओं से मिलने से रोकता हो.” इधर कांग्रेस महासचिव के अनुसार, यह अनुरोध भारतीय राजनीतिक पार्टियों की ओर से किया जा रहा है, जिन्होंने देश को प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और बहुत बड़ी संख्या में प्रतिष्ठित राजनेता दिए हैं. मगध चुनाव आयोग की यह तलवारबाजी और हठधर्मिता किसी भी तरह लोकतंत्र के हित में नहीं कहीं जा सकती.

एक लोकतांत्रिक देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर अगर कोई एक शख्स भी प्रश्न उठता है तो उस का निराकरण करना चुनाव आयोग का दायित्व है.

सर्दियों में आप भी हैं High Blood Pressure की समस्या से परेशान, तो कंट्रोल करने के लिए अपनाएं ये तरीके

How To Control High Blood Pressure In Winter : सर्दियों के मौसम में जैसे-जैसे पारा गिरने लगता है, वैसे-वैसे ही कई स्वास्थ्य समस्याएं होने का खतरा भी बढ़ जाता है. ठंड की चपेट में आने से सबसे पहले व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है, जिसके बाद सर्दी-जुकाम, खांसी और बुखार आदि की दिक्कतों का भी सामना करता पड़ता है. इसके अलावा इस मौसम में  बीपी बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है.

दरअसल, ठंड में रक्त धमनियां अपने आप संकुचित होने लगती है, जिसके कारण शरीर में रक्त प्रवाह का संतुलन बनाए रखने के लिए ज्यादा फोर्स लगता है. इसी वजह से विंटर में ब्लड प्रेशर अपने आप बढ़ने लगता है. इसके अलावा हवा, ह्यूमिडिटी, वजन बढ़ना, एटमॉस्फेयर प्रेशर, बादल और फिजिकल एक्टिविटी की कमी आदि के कारण भी ब्लड प्रेशर बढ़ सकता हैं. ऐसे में ये मौसम उन लोगों के लिए ज्यादा खतरनाक हो जाता है, जिन्हें पहले से ही हाई बीपी की समस्या है. हालांकि यह समस्या बुजुर्गों में सबसे अधिक देखी जाती है, लेकिन अब ये युवाओं को भी अपनी चपेट में ले रही है.

गौरतलब है कि बढ़ते ब्लड प्रेशर से हार्ट अटैक और हृदय से जुड़ी कई समस्याओं के होने का जोखिम भी बढ़ जाता है. ऐसे में जरूरी है कि आप पहले से ही उन चीजों का अपनी डाइट में शामिल करें व अपनाएं, जिससे ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहे. आइए जानते हैं कि सर्दियों में बढ़ते ब्लड प्रेशर (Control High Blood Pressure Tips) को आप कैसे कंट्रोल कर सकते हैं.

शराब से बनाएं दूरी

जिन लोगों को हाई बल्ड प्रेशर की समस्या रहती है, उन्हें तो सर्दियों के दौरान शराब पीने से परहेज करना चाहिए.

कैफीन का सेवन करना पड़ सकता है भारी

विंटर में रोजाना कैफीन का सेवन करना भी आपके लिए खतरनाक हो सकता है. कैफीन युक्त पदार्थों को खाने व पीने से शरीर का कोर टेम्परेचर गिरने लगता है, जिससे ठंड ज्यादा लगती है. ऐसे में हाई ब्लड प्रेशर (Control High Blood Pressure Tips) मरीजों को  इस मौसम में कैफीन से दूरी ही बनाकर रखनी चाहिए.

पौष्टिक आहार लें

स्वस्थ रहने के लिए सबसे जरूरी है कि आप पौष्टिक आहार लें. इसलिए अपनी डाइट में ज्यादा से ज्यादा मौसमी फल, लो फैट फूड, डेयरी उत्पाद, होल ग्रेन्स और सब्जियों का शामिल करें. इससे ब्लड प्रेशर (Control High Blood Pressure Tips) मेंटेन करने में मदद मिलेगी. इसके अलावा ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए आप एक्सरसाइज कर सकते हैं.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

सवाल: भाग 2- सुरैया की खुशी बनी अनवर के लिए परेशानी का सबब

लेखक- शेख विकार अहमद

‘‘अरे बाबा, रहने भी दो,’’ अनवर ने कहा, ‘‘एक दिन बाहर खाना खा लूंगा. मैं ने तो जातेजाते तुम्हारा हाल जानने के लिए आवाज दी थी. अगर तबीयत ठीक न हो तो पहले डाक्टर के यहां चलते हैं. मैं आधे दिन की छुट्टी ले लूंगा.’’

‘‘नहीं, वैसा कुछ नहीं है. आप चिंता न करें. थोड़ी देर में मैं ठीक हो जाऊंगी,’’ सुरैया ने कहा तो अनवर औफिस के लिए निकल पड़े.

अनवर बगैर लंच लिए औफिस गए, यह सोच कर सुरैया का दिल अपनेआप को कोसने लगा. सुबह से न जाने क्यों उस का मन ठीक नहीं था. कल रात को ऐसा कुछ खाया भी नहीं था कि बदहजमी हो जाती. वह अपनेआप से अचरज करती हुई फिर सुबह के काम निबटाने में लग गई.

10 बजे तक घर में अम्मा यानी उस की सास और वह दोनों ही रह गए. रोज की तरह उस ने सारे काम निबटा लिए. उधर अम्मा रोज की तरह किताब पढ़ने के बाद खाली बैठी थीं. उन्हें खाना खाने को कहने आई थी और उन से बात कर ही रही थी कि उसे जोर से उबकाई आई और वह वाशबेसिन की तरफ दौड़ पड़ी. अम्मा उस की उबकाई देख कर हैरान हो गईं.

‘‘क्या हो गया, बहू?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘पता नहीं, अम्मा. बस, सुबह से ही मेरा मन ठीक नहीं है. पता नहीं कैसे बदहजमी हो गई. कल तो ऐसा कुछ खाया भी नहीं था,’’ उस ने वाशबेसिन से लौट कर जवाब दिया.

अम्मा ने दुनिया देखी थी. कहीं यह इस उम्र में मां तो नहीं बनने जा रही है. यह सोच कर उन के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा, ‘‘हाय, अब क्या होगा?’’

सुरैया ने सुना तो उस का दिल धक्क से रह गया, ‘‘क्या हो गया, अम्मा? कहीं मेरी तबीयत को ले कर आप परेशान तो नहीं हो रही हैं?’’

‘‘धत्त, पगली है. यह बात नहीं है. अरे, तेरा जी मिचला रहा है. कहीं तू मां तो नहीं बनने जा रही है?’’

सुरैया कुछ देर के लिए सोच में पड़ गई. फिर एकदम उस के चेहरे पर लाली आ गई और वह शरमा कर तेज कदमों से बैडरूम में चली गई.

सुरैया के चेहरे पर आतेजाते रंग को देख कर अम्मा को अलग से कुछ बताने की जरूरत नहीं थी. वे गहरी सोच में पड़ गईं कि कोई सुनेगा तो क्या कहेगा. लाख सौतेले ही सही पर इस के बच्चे जवान हो गए हैं. लड़की भी सयानी हो गई है. और तो और, इस की उम्र भी 40 की हो रही है. क्या इस की उम्र अब मां बनने की है?

अम्मा को आज भी अच्छी तरह याद है कि अनवर ने दूसरी शादी के लिए मंजूरी ही इस शर्त पर दी थी कि वे उन की उम्र को नजर में रख कर ही उन के लिए बहू तलाश करेंगी. अम्मा भी चाहती थीं कि ऐसी ही बहू लाएंगी जो बच्चों की मां जैसी दिखे और बच्चे जिसे मां के रूप में कुबूल करें.

उन्होंने सुरैया का चुनाव काफी सोचविचार के बाद इसीलिए किया था कि उस का तलाक हुए 10 साल हो चुके थे. उस वक्त उस की उम्र 35 पार हो चुकी थी. उन के हिसाब से इस उम्र में मां बनना जरा मुश्किल होता है. फिर शादी के बाद जब 3 साल खाली गए तो उन्हें भी इस तरफ से इत्मीनान हो गया था. मगर आज का नजारा देख कर वे मन ही मन परेशान हो गईं. अम्मा की सम?ा में नहीं आ रहा था कि अनवर को जब यह खबर मालूम होगी, वह उसे किस तरह लेगा.

उधर बिस्तर पर लेटी सुरैया दूसरे ही खयालों में गुम थी. वह मां बन सकती है, यह खयाल ही उसे गुदगुदा रहा था. आज तक वह अपनेआप को बां?ा ही सम?ाती आई थी. बल्कि जिस समय उसे लोगों ने जबरदस्ती बां?ा घोषित किया था वह इस सचाई को मानने के लिए दिमागी रूप से तैयार न थी. मगर गुजरते समय के साथ उस ने इस हकीकत को मंजूर कर लिया था. अपने अतीत को याद कर के उस के मन में खुशी के बजाय एक दर्द की लहर दौड़ गई.

सुरैया जब 12वीं कक्षा में पढ़ रही थी. उस की शादी साहिल से हुई थी. पढ़ाई बीच में छोड़ कर उसे घरसंसार की दुनिया में धकेल दिया गया था. वैसे, उस के अब्बा इतने पुराने खयालात के न थे मगर जमाने का चलन ही कुछ ऐसा है. सुरैया के लिए जब साहिल का रिश्ता आया तो उन के पास मना करने की कोई वजह ही नहीं थी. लड़का पढ़ालिखा था. अच्छी नौकरी करता था. घरबार अच्छा था. उन्होंने फौरन हां कर दी.

सुरैया की शादी बड़ी धूमधाम से हुई थी. ससुराल पहुंचने पर उस ने पाया कि जिस ने भी उसे दुलहन के रूप में देखा, उस ने ही शाहिदा बेगम को खूबसूरत दुलहन लाने की बधाई दी थी. दुलहन बनी सुरैया अपनी खूबसूरती की तारीफ सुन कर अंदर ही अंदर खुश हो रही थी.

शादी के बाद सुरैया ने पाया कि उस के अब्बू का चुनाव गलत नहीं था. साहिल सचमुच उसे अच्छा लगा था. पढ़ालिखा तो था ही, वह सम?ादार भी था. घर का इकलौता लड़का था. एक बड़ी बहन थी जिस की शादी हो चुकी थी और वह अपनी ससुराल में खुश थी. कभीकभार मायके आती तो घर में खुशियां आ जातीं. जिंदगी बड़े मजे से गुजर रही थी. घर की माली हालत ऐसी थी कि दुनिया का कोई अरमान अधूरा न रहता.

शादी को जब एक साल पूरा होने को आया तो जो भी महिला रिश्तेदार मिलने को आती वह इशारे से उस से पूछ ही लेती, ‘कोई खुशी की खबर है?’

सुरैया शरम से सिर हिला कर मना कर देती. पूछने वाली उस का दिल रखने को कह देती, ‘कोई बात नहीं, अभी समय ही कितना हुआ है. एक साल ही तो गुजरा है.’

मगर जैसेजैसे दिन गुजरने लगे, खुद सुरैया को भी पूछने वालों का सामना करने से डर लगने लगा. किसी भी त्योहार व फंक्शन के मौके पर जब भी रिश्तेदारों का जमघट लगता तो उस के मन में यह सवाल कि ‘कोई खुशी की खबर है?’ बवंडर मचा देता. उसे हमेशा डर लगा रहता कि अब वह औरत पूछेगी. उस की सम?ा में नहीं आ रहा था कि वह हर किसी के एक ही सवाल का जवाब कैसे दे.

फिर साहिल उस खानदान का इकलौता लड़का था. उस की सास को अपने खानदान का चिराग देखने की आस थी. वह अंदर ही अंदर खोखली होती जा रही थी. कभीकभी सुरैया को इन औरतों की इस फुजूल की पूछताछ पर गुस्सा भी आता मगर फिर वह सोचती कि अगर कोई उस से उस की खुशी के बारे में पूछ रहा है तो इस में कुछ भी गलत नहीं है और फिर उस ने भी तो खुद अपनी सहेलियों से उन की शादी के बाद हंसतेहंसते यही सवाल पूछा था.

जैसेजैसे दिन गुजरते गए, दबी जबान से शिकायत करने वाली शाहिदा बेगम अब खुल कर कहने लगीं. उस के औलाद न होने की बात जबतब घर में उठने लगी. सुरैया अब घर में आने वाले मेहमानों के सामने जाने से कतराने लगी. उस के मन में बारबार यही सवाल उठता कि कहीं वह बां?ा तो नहीं?

शादी को 6 साल हो गए तब भी उस की गोद हरी नहीं हुई थी. पहले प्यार की बौछार करने वाली शाहिदा बेगम अब उस से मुंह मोड़ चुकी थीं. उन दोनों के बीच जैसे एक अजीब सी दीवार खिंच गई थी. फिर भी उस का मन यह मानने को तैयार नहीं था कि वह मां नहीं बन सकती है. उस के अंदर अपनेआप से ही एक तरह का संघर्ष चल रहा था.

उस का मन तो उस वक्त और भी टूट गया जब साहिल ने भी उस से इस बारे में शिकायत कर दी. उस रात काफी देर तक वह बिस्तर पर चुपचाप पड़ी अंदर ही अंदर रोती रही. उस के बाद तो जैसे यह सिलसिला ही चल पड़ा. आएदिन उस की इस कमजोरी को उजागर किया जाने लगा. रोजरोज की इस चखचख से वह परेशान हो गई थी. उस की सम?ा में नहीं आ रहा था कि इस मुसीबत का हल कैसे निकाले.

एक बार जब उस ने डरतेडरते साहिल से कहा कि एक बार हम दोनों डाक्टर से मिल कर इस मामले में राय ले कर देखते हैं तो साहिल ऐसे गुस्सा हुआ था कि दोबारा इस बात का जिक्र करने की उस की हिम्मत ही नहीं हुई. उस की सम?ा में नहीं आता था कि इस में बुराई क्या थी? अगर उस में कमी होगी तो वह सचाई को कुबूल कर लेगी. यह बात बस उन दोनों के बीच ही रह गई और खत्म हो गई.

इन 5 चीजों को भूल कर भी ना खाएं खाली पेट, नहीं तो पड़ जाएंगे लेने के देने

Foods To Avoid On An Empty Stomach : आपकी सेहत अच्छी रहे इस लिए आप अपने खानपान को ले कर काफी सजग रहते हैं. आप जो भी खाते हैं उसका सीधा असर आपकी सेहत पर होता है. ऐसे में आपके खाने की समय से भी आपकी सेहत प्रभावित होती है. कुछ चीजों को खाने का एक सही वक्त होता है. अगर आप उस वक्त पर उसे नहीं खाते हैं तो आपकी सेहत बुरी तरह से प्रभावित होती है.

खाने की टाइमिंग सेहत को काफी प्रभावित करती है. सही चीज को भी अगर आप गलत वक्त पर खाते हैं तो उसका असर बुरा ही होगा. ऐसे में हम आपको कुछ चीजों के बारे में बताने वाले हैं जिनका खाली पेट सेवन करना सेहत के लिए नुकसानदायक होता है.

तो आइए शुरू करें.

खट्टे फल

खट्टे फल जैसे  संतरा, अंगूर और नींबू जैसी चीजों में विटामिन सी की मात्रा अधिक होती है. सुबह में खाली पेट इनका सेवन पेट के लिए काफी बुरा होता है.

टमाटर

टमाटर विटामिन्स और एंटीऔक्सिडेंट्स से भरपूर होता है. पर खाली पेट इसका सेवन करना काफी नुकसानदायक होता है. जब आप इसे खाली पेट खाते हैं तो अपने एसिडिक नेचर की वजह से पाचन में ये काफी वक्त लेता है. जिसके कारण कई बार लोगों को पेट दर्द की शिकायतें देखी गई हैं.

कार्बोनेटेड ड्रिंक्स

आम तौर पर कार्बोनेटेड ड्रिंक्स सेहत के लिए बुरी होती हैं. अगर आप इनका सेवन खाली पेट करते हैं तो ये और अधिक हानिकारक हो जाते हैं. इससे कैंसर और दिल की गंभीर बीमारियों के होने का खतरा अधिक रहता है.

चाय या कौफी

बहुत से लोग सुबह में जागते ही चाय या कौफी के शौकीन होते हैं. उन्हें जागते ही चाय या कौफी चाहिए होती है. पर लोगों को पता नहीं होता कि ये आदत उनके लिए कितना हानिकारक है, उनकी सेहत पर इसका कितना नकारात्मक असर है.  खाली पेट कौफी पीने से हाइड्रोक्लोरिक एसिड की मात्रा बढ़ जाती है और इससे कब्ज व वोमिटिंग की समस्या बढ़ जाती है. इससे पाचन की प्रक्रिया भी धीमी हो जाती है. खाली पेट पानी पीने की आदत डालिए. फिर थोड़े समय बाद कैफीन वगैरह लीजिए.

पेस्ट्रीज

सुबह के नाश्ते में पेस्ट्रीज अच्छा औप्शन है, सुबह खाली पेट इसे खाने से बचना चाहिए. इसमें पाए जाने वाला यीस्ट (खमीर) खाली पेट के लिए काफी हानिकारक होता है.

जब शादीशुदा महिला को हो जाए प्यार, तो इन खतरों के लिए रहे तैयार

6 जनवरी, 2024 को एक महिला अपने 2 बच्चों को ले कर उस तथाकथित प्रेमी के साथ फरार हो गई जिस के साथ फेसबुक पर हुई दोस्ती हाल ही में प्यार में तब्दील हुई थी. महिला का पति विक्की पत्नी के अचानक गायब होने से उसे खोजते हुए दरदर भटकने लगा. यह घटना बिहार के मुंगेर जिले की है. जाहिर है महिला ने फेसबुकप्रेमी के लिए अपने 15 साल पुराने रिश्ते को एक झटके में तोड़ दिया.

दोनों की शादी 2009 में हिंदू रीतिरिवाज के अनुसार हुई थी. शादी के बाद 2 बेटियों का जन्म हुआ. 3 जनवरी को उस की पत्नी अपने छोटे भाई के साथ मायके जाने की बात कह कर घर से निकली थी. जमालपुर रेलवे स्टेशन पर अपने भाई को धरहरा (मायके) की ट्रेन पर बैठा कर खुद पीछे से दूसरी ट्रेन से आने की बात कह कर वह दोनों बच्चों के साथ फरार हो गई.

14 दिसंबर, 2023 को हरियाणा के महेंद्रगढ़ में 4 बच्चों की मां अपने प्रेमी संग भाग गई. साथ ही, वह घर से जातेजाते पति को लाखों रुपयों का चूना लगा गई. अपने साथ ढाई लाख रुपए नकद, 2 तोले सोने के जेवर, ढाई सौ ग्राम चांदी के जेवरात और जमीन के कागज भी ले गई.

16 अक्टूबर, 2023 को कोटा में 38 साल की 6 बच्चों की मां अपने प्रेमी विशाल के साथ भाग गई. वह नरेगा काम पर गई तो वापस ही नहीं लौटी. यही नहीं, पत्नी के चले जाने के गम और सदमे में उस के पति ने सुसाइड कर लिया. इस तरह उस के 6 बच्चों का भविष्य दांव पर लग गया.

ऐसा ही कुछ 10 अगस्त, 2023 को भी हुआ जब 2 बच्चों की मां अपने पति को छोड़ रिश्ते में लगने वाले मौसेरे भाई के साथ फरार हो गई. पति जब जोरजबरदस्ती अपनी पत्नी को वापस घर ले कर लाया तो पत्नी ने गुस्से में जहर खा लिया. जिस के बाद उसे गंभीर हालत में अस्पताल में भरती करवाया गया.

यह घटना बिहार की है. 3 साल पहले अभिषेक यादव की शादी काजल के साथ धूमधाम से हुई थी. काजल के पति अभिषेक यादव नासिक में बाहर रह कर काम करता है. शादी के बाद दोनों के काफी अच्छे मधुर संबंध थे. दोनों के 2 बच्चे भी हुए. इसी दौरान शादी के 2 सालों बाद काजल की नजदीकियां रिश्ते में लगने वाला मौसेरे भाई के साथ बढ़ने लगीं. नजदीकी प्यार में बदल गई और दोनों ने एकसाथ जीनेमरने की कसमें खा लीं. वे कभीकभी घर से बाहर भी जा कर मिलने लगे. फिर एक दिन वह अपने मौसेरे भाई के साथ कहीं भाग गई. एक सप्ताह बाद वापस लौटी मगर गुस्से में चूहे मारने वाली दवा खा ली. काजल ने कहा कि मौसेरा भाई ही उस का सच्चा प्यार है और उसे दोनों बच्ची को भी अपने साथ रखना है मगर पति से तलाक चाहिए.

इस तरह के मामले अकसर देखेसुने जाते हैं जब शादीशुदा महिला किसी के प्यार में पड़ जाती है और अपने बच्चों को ले कर या पति के पास छोड़ कर भाग जाती है. ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं है. कई दफा महिलाएं अपनी शादीशुदा जिंदगी में परेशान रहती हैं. पति के साथ बनती नहीं या घर का माहौल दमघोंटू होता है. ऐसे में उस माहौल में उसी पति के साथ रह कर घुटने और अपनी जिंदगी बरबाद करने से बेहतर कई बार किसी और का हाथ थाम लेना होता है. जब महिला को कोई औप्शन मिलता है, कोई शख्स उसे खूबसूरत जिंदगी के सपने दिखाता है तो बहुत संभव है कि वह सबकुछ पीछे छोड़ कर अपने प्रेमी के साथ आगे बढ़ जाए. इसे आप गलत भी नहीं कह सकते क्योंकि अपनी जिंदगी में खुशियां ढूंढने का हक सब को है.

धर्म का दखल

हमारा समाज और धर्म इस बात को गलत नजरिए से देखता है. समाज हम से मिल कर बनता है मगर इस समाज का नजरिया धर्म ने गढ़ा है. धर्म हमें समझाता है कि एक औरत की डोली किसी घर में आती है तो फिर अर्थी ही वापस जाएगी. जिस पुरुष के साथ उस का रिश्ता जुड़ा है वह 7 जन्मों का है और हर तरह की यातनाएं सहने के बावजूद उसे किसी दूसरे पुरुष के बार में सपने में भी सोचना उसे पापिन बना देगा. उसे नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी.

स्त्रीपुरुष के बीच इस दोगले नियमों ने सदियों महिलाओं को अबला बना कर रखा मगर अब महिलाएं अपने हक और ख़ुशी के लिए आवाज उठाने लगी हैं. वे इन बंधनों से खुद को आजाद करने के लिए कोई भी कदम उठाने से नहीं हिचकतीं. जज्बातों में बह कर अगर वह किसी दूसरे के साथ जाती है तो इसे पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता.

मगर समस्या तब आती है जब महिला के छोटे बच्चे होते हैं. ऐसे में उन बच्चों की जिंदगी दांव पर लग जाती है. उन का भविष्य अनिश्चित हो जाता है क्योंकि कोई नहीं जानता कि महिला का नया प्रेमी बच्चों के साथ कैसा बरताव करे या फिर बच्चे मां के नए पति के साथ सुरक्षित रह पाएं या नहीं. कभीकभी सौतेले बाप द्वारा यौनशोषण की घटनाएं भी आती रहती हैं. वैसे भी, इंसान किसी और के बच्चों को सहजता से अपना नहीं पाता.

नए घर में संभव है कि उन्हें पूरा अधिकार भी न मिले. पत्नी अगर पति के पास बच्चों को छोड़ कर जाती है तब भी बच्चों की जिंदगी पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है. कई दफा पत्नी के बाद पति शराबी हो जाता है. वह घर, बच्चों और अपनी जिंदगी के प्रति भी लापरवाह हो जाता है. मानसिक तनाव उस पर हावी होने लगता है. धोखा दिए जाने के गम से उबरने में उसे काफी समय लगता है. अगर वह दूसरी शादी करता है तो नई मां का व्यवहार बच्चों के प्रति कैसा हो, यह पहले से कहा नहीं जा सकता.

इसलिए अगर कोई शादीशुदा महिला अपने बच्चों को ले कर घर छोड़ने का फैसला लेती है तो उसे बच्चों से जुड़े ये जोखिम उठाने को तैयार रहना चाहिए. उसे पता होना चाहिए कि वह बच्चों के साथ सबकुछ कैसे मैनेज करेगी और बच्चों के भविष्य को बिगड़ने से कैसे बचाएगी. इंसान कदम उठता है तो रास्ते मिल ही जाते हैं मगर आने वाली मुसीबतों का एहसास और उस का समाधान पहले से सोच कर रखना जरूरी होता है.

कोई और नहीं आप ही छीन रहे हैं अपने बच्चों की मासूमियत 

आजकल के मां-बाप अपने जैसे दूसरे मां-बापों से मिलने पर बच्चों को लेकर रोना शुरु कर देते हैं कि वे अब पहले के बच्चों की तरह मासूम नहीं हैं और इसके लिए वे जमाने और नई तकनीक पर तोहमत का ठीकरा फोड़ते हैं. लेकिन न तो तकनीक और न ही जमाना बच्चों से उनकी मासूमियत छीन रहा है, यह आप हैं जो उनकी मासूमियत के जानी दुश्मन बने हुए हैं.

हम अकसर घरों में अपने छोटे बच्चों के सामने न केवल न अपने तमाम रिश्तेदारों बल्कि आस पड़ोस के उन लोगों की खूब बुराईयां करते रहते हैं जिन्हें सामने बहुत सम्मान देते हैं. मां-बाप की इस रवैय्ये से छोटे बच्चे बहुत कंफ्यूज हो जाते हैं कि लोगों पर भरोसा करना चाहिए या उनको चालाक और काईयां समझना चाहिए. इस द्वंद के अंत में वे आपके ही नक्शेकदम पर चलते हुए दोहरा व्यवहार करने लगते हैं.

यही वह कारण है, जिसकी वजह से बहुत कम उम्र में ही बच्चे अपनी मासूमियत खो देते हैं. हम इसके लिए जमाने को दोषी ठहराते हैं, टीवी को दोषी ठहराते हैं, मोबाइल को दोषी ठहराते हैं. लेकिन कभी गौर से देखने और समझने की कोशिश नहीं करते कि कोई और नहीं हम खुद ही इसके सबसे बड़े गुनाहगार हैं. याद रखिये बच्चे आधुनिक तकनीक की वजह से रिश्तों का अनादर नहीं करते, रिश्तों का तकनीक से कोई नकारात्मक मेल नहीं है. उल्टे तकनीक तो रिश्तों को बेहतर बनाने में काम आ सकती है. बच्चे कहीं गये हों और उन्हें दादा-दादी की याद आ रही हो तो मोबाइल के जरिये दादा-दादी से बात कर लेना उनके प्रेम और लगाव को बढ़ायेगा ही, कम नहीं करेगा.

इसलिए तकनीक पर रिश्तों के प्रति संवेदनहीनता का ठीकरा मत फोड़िये. वास्तव में ये घर के बड़े लोग ही होते हैं, जो बच्चों को रिश्तों के संबंध में कई तरह की नकारात्मक सोच और भावनाओं से भरते हैं. सिर्फ मां-बाप ही नहीं, यही काम दादा-दादी या घर के दूसरे बड़े सदस्य भी करते हैं. एक छोटा बच्चा नहीं जानता कि कौन व्यक्ति छोटी जात का है, कौन बड़ी जात का, वह यह भी नहीं जानता कौन गरीब है और कौन अमीर. इसलिए छोटे बच्चों के व्यवहार में इस तरह के भाव नहीं होते. लेकिन घर के बड़े लोग छोटे बच्चों के दिमाग में ठंूस ठंूसकर ये बातें भरते हैं कि फलां, छोटी जात का है, फलां बड़ी जात का है. इन्हें नमस्ते करना चाहिए, इनकी पैर छूना चाहिए. इन्हें नहीं छूना चाहिए या इनके साथ नहीं खेलना चाहिए. बच्चों को ये तमाम संस्कार घर के बड़े लोग देते हैं. इसलिए बच्चों में रिश्तों को लेकर जितनी संवेदनहीनता होती है, उस सबके लिए वे नहीं बल्कि मां-बाप से लेकर घर के तमाम बड़े लोग जिम्मेदार होते हैं.

अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे रिश्तों के प्रति संवेदनशील रहें, उनमें भोलापन बना रहे, भावुकता बनी रहे, तो हमें उनके दिलोदिमाग में किसी को लेकर अपनी धारणा नहीं भरनी चाहिए. हमें बच्चों के सामने किसी को खलनायक बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. बर्नाड शाॅ ने सदियों पहले कहा था बच्चे वैसा ही करते हैं, जैसा करते हुए बड़ों को देखते हैं. क्योंकि अंततः इंसान एक सामाजिक प्राणी है, वह अपने से आगे के लोगों का ही अनुशरण करता है. लब्बोलुआब यह कि अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे अपने रिश्तेदारों और दूसरे आम लोगों के प्रति मानवीय हों, सहज हों और ईमानदार हों तो हमें उनके दिलो दिमाग में अपनी धारणाएं नहीं घुसानी चाहिए. बच्चों को खुद तमाम चीजों के प्रति अपनी धारणाएं बनाने देना चाहिए. तभी वह सहज, संवेदनशील और मासूम रह सकेंगेे.

मैं 55 वर्षीय महिला हूं, क्या इस उम्र में दोबारा शादी करना ठीक होगा ?

सवाल

मैं 55 वर्षीय महिला हूं. 2 साल पहले पति की मृत्यु पहले हो गई थी. 1 बेटी है जो अपने परिवार सहित विदेश में सैटल हो गई है. मैं यहीं रह कर बाकी की जिंदगी गुजारना चाहती हूं. घर के पास मेरी ही तरह एक और भी व्यक्ति है. हम दोनों ही अकेलेपन के शिकार हैं. वह व्यक्ति मुझ से शादी करने को तैयार है. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

अकेलेपन से मुक्ति के लिए हर किसी को एक अदद साथी की जरूरत होती है. अगर आप की बेटी विदेश में सैटल है और आप यहां अकेली जिंदगी काट रही हैं तो जाहिर है आप को अकेलापन काटने को दौड़ता होगा.

ऐसे में आप अगर उस व्यक्ति को नजदीक से जानती हैं और उस में कोई ऐब नहीं है तो शादी करने में बुराई नहीं. हां, आप अपनी बेटी से इस विषय पर सलाहमशवरा कर सकती हैं.

अगर आप की बेटी आधुनिक सोच वाली होगी तो उसे भी इस शादी से कोई ऐतराज नहीं होगा और अगर ऐतराज करे भी तो परवाह न करते हुए मन की सुनें और शादी कर लें, क्योंकि यह जीवन आप का है जिसे आप अपनी तरह जी सकती हैं. इस में किसी को दखलंदाजी करने का अधिकार नहीं है.

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Saras Salil Cine Award: इस भोजपुरी एक्टर की होती है ‘अमिताभ बच्चन’ से तुलना

भोजपुरी सिनेमा के लिए दिया जाने वाला ‘5वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ हाल ही में अयोध्या में शानदार तरीके से हुआ था, जिस में भोजपुरी सिनेमा के दिग्गज कलाकारों ने शिरकत की थी. इस अवार्ड शो में दर्शक भोजपुरी के तमाम कलाकारों को अपने सामने पा कर दंग थे. वे कड़ाके की ठंड में भी भोजपुरी कलाकारों का दीदार कर रहे थे.

वैसे तो इस अवार्ड शो में दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, आम्रपाली दुबे, अंजना सिंह, अनारा गुप्ता, पाखी हेगड़े, संजय पांडेय, देव सिंह सरीखे कई दिग्गज कलाकार मौजूद थे, लेकिन इन सब के बीच भोजपुरी सिनेमा के एक खास कलाकार की मौजूदगी ने दर्शकों का हौसला बढ़ा दिया था. वह नाम है भोजपुरी सिनेमा में तकरीबन 43 सालों से अपनी ऐक्टिंग का सिक्का जमाए कुणाल सिंह का.

कुणाल सिंह भोजपुरी सिनेमा के शुरुआती दौर के उन गिनेचुने कलाकारों में शामिल हैं, जिन्होंने भोजपुरी सिनेमा को बुलंदियों पर पहुंचाया और भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को आगे बढ़ाया.

विधायक का बेटा मुंबई में हीरो बनने आया

साल 1977 में कुणाल सिंह जब मुंबई में फिल्मों में काम करने आए, तब उन के पिता बुद्धदेव सिंह एक चर्चित नेता के साथसाथ विधायक भी थे. वे काफी दिनों तक मंत्री भी रहे थे.

कुणाल सिंह ने बताया, “जब मैं मुंबई आया, तब पिताजी खर्च भेजते रहे. मैं ने हीरो बनने के लिए काफी हाथपैर मारे, लेकिन कामयाबी नहीं मिल पा रही थी. पर मैं ने तय कर लिया था कि हीरो ही बनना है. उधर, पिताजी ने उम्मीद के मुताबिक कामयाबी न मिलने पर कुछ दिन बाद पैसा भेजना बंद कर दिया. ऐसा नहीं था कि वे मुझे पसंद नहीं करते थे, बल्कि वे मुझ से बहुत ज्यादा प्यार करते थे. फिर भी उन्हें मेरे भविष्य की चिंता थी, लेकिन मैं कुछ और ही समझ बैठा. मुझे लगा कि मैं उन पर बोझ बन गया हूं, इसीलिए मैं ने भी कह दिया कि अब मैं नौकरी कर रहा हूं और अपना खर्च खुद चला लूंगा.”

हिंदी फिल्म से हुई शुरुआत

कुणाल सिंह ने बताया कि जब वे मुंबई में संघर्ष कर रहे थे, तभी उन्हें एक हिंदी फिल्म औफर हुई थी, जिस का नाम था ‘कल हमारा है’. इस फिल्म की कहानी बिहार के माहौल पर थी और इसीलिए उस में एक भोजपुरी बोलने वाले कलाकार की जरूरत थी. यह फिल्म जब रिलीज हुई, तो पटना में तकरीबन 37 हफ्ते तक चली थी.

इस फिल्म की कामयाबी ने न केवल कुणाल सिंह के लिए दूसरी फिल्मों में आने का रास्ता खोला, बल्कि इस फिल्म के जरीए मिले भोजपुरी किरदार ने उन्हें भोजपुरी फिल्मों का स्टार बना दिया.

फिल्मों की लगी लाइन

कुणाल सिंह ने बताया, “जब मेरी यह फिल्म हिट हुई, तो फिल्म निर्माताओं ने मुझ से फिल्मों में काम करने के औफर देने शुरू किए, जिन में से ज्यादातर फिल्म निर्माता भोजपुरी सिनेमा बनाने की इच्छा ले कर आ रहे थे. चूंकि मेरे पास उस समय काम नहीं था, इसलिए मैं ने भी फिल्में साइन करनी शुरू कर दीं. लेकिन यह जरूर खयाल रखा कि कभी ऐसी फिल्म न करूं, जिस से खुद की नजरों में ही गिर जाऊं. आज फिल्म इंडस्ट्री में मुझे काम करते हुए तकरीबन 43  साल हो गए हैं, लेकिन कोई मुझ पर सवाल नहीं उठा सकता. मुझे इस बात का गर्व भी है.”

इन फिल्मों ने मचाया धमाल

कुणाल सिंह बताते हैं, “जब मैं बतौर हीरो फिल्मों में काम कर रहा था, तब टीवी और यूट्यूब का जमाना नहीं था, इसलिए सभी फिल्में सिनेमाघरों में ही रिलीज होती थीं. ऐसे में जब मेरी फिल्में सिनेमाघरों में लगती थीं, तो हफ्तों तक सिनेमाघरों के आगे दर्शकों की लाइन लगी रहती थी.”

कुणाल सिंह ने बताया कि उन की फिल्में ‘धरती मईया’, ‘हमार भौजी’, ‘चुटकी भर सिंदूर’, ‘गंगा किनारे मोरा गांव’, ‘दूल्हा गंगा पार के’, ‘दगाबाज बलमा’, ‘हमार बेटवा’, ‘राम जइसन भइया हमार’, ‘बैरी कंगना’, ‘छोटकी बहू’, ‘घरअंगना’, ‘साथ हमारतोहार’ आज भी सब से हिट और ज्यादा चलने वाली फिल्मों में शामिल हैं.

इस फिल्म ने तोड़ा था रिकौर्ड

कुणाल सिंह ने साल 1983 में भोजपुरी फिल्म ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ में बतौर लीड हीरो काम किया था. जब यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई, तो इस ने इतिहास ही रच दिया, क्योंकि यह फिल्म वाराणसी के एक थिएटर में लगातार 1 साल 4 महीने तक चली थी.

अमिताभ बच्चन से तुलना

कुणाल सिंह को भोजपुरिया बैल्ट में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की तरह भोजपुरी का महानायक कहा जाता है. कई लोग तो उन्हें ‘भोजपुरी का अमिताभ बच्चन’ कहते हैं. भोजपुरी और बौलीवुड के इन दोनों महानायकों ने भोजपुरी फिल्म ‘गंगोत्री’ में एकसाथ काम भी किया है.

Kunal Singh

चुनाव में भी आजमा चुके हैं हाथ

एक समय ऐसा भी आया था, जब कुणाल सिंह ने राजनीति में भी हाथ अजमाने का फैसला किया था और अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए राजनीति में भी कदम रखा था. उन्होंने कांग्रेस से टिकट ले कर पटना साहिब से शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ चुनाव लड़ा था और दूसरे नंबर पर रहे थे.

कभी रेप सीन नहीं किया

कुणाल सिंह जब पौजिटिव रोल करतेकरते ऊब गए थे, तब उन्होंने कुछ फिल्में बतौर विलेन भी करने का फैसला किया, लेकिन उन्होंने फिल्म निर्माताओं के सामने एक शर्त रखी थी कि वे विलेन के रूप में कभी भी फिल्मों में रेप सीन नहीं करेंगे.

कुणाल सिंह ने बताया, “मैं ने भोजपुरी में बतौर विलेन महज 2-3 ऐसी फिल्में ही की हैं, लेकिन इस शर्त के साथ कि इस फिल्म में न तो मैं किसी औरत के साथ रेप करूंगा, न उसे टच करूंगा.”

लाइफटाइम अचीवमैंट अवार्ड

हाल ही में अयोध्या में हुए ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ शो में कुणाल सिंह को भोजपुरी सिनेमा में योगदान के लिए लाइफटाइम अचीवमैंट अवार्ड से नवाजा गया. इस मौके पर उन्होंने कहा कि इस लाइफटाइम अवार्ड ने ऐक्टिंग के प्रति उन की जवाबदेही और भी बढ़ा दी है. इस दौरान उन्होंने अपनी दमदार संवाद अदायगी से दर्शकों का मनोरंजन भी किया.

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