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उस का वजूद : दीनू की धडकनें क्यों बेकाबू हो रही थी ?

“दीनू नहीं रहा,” मांबाप के ज़माने से पुश्तैनी घर में काम करने वाली शांति मासी ने खबर दी.

दीनू, दीनानाथ हांड़ी, उस का क्लासमेट. खबर सुन कर वह 3 दशक पीछे चला गया…

जैसे ही सिनेमाहौल के बाहर लगे हाउसफुल के बोर्ड पर नज़रें पड़ीं, सब के चेहरे बुझ गए. बुझेमन से सब वापस कार में जा बैठे. किशन कुमार अभी कार स्टार्ट करने ही वाला था कि कोई खिड़की के पास आ कर फुसफुसाया, ‘सा’ब, कहे को वापिस होना. अपने पास 8 टिकट हैं, 10 का 15 में दूंगा, बाल्कोनी का है. ले लो सा’ब.’

किशन कुमार सिर घुमा कर अभी कुछ कहता कि सामने वाला ब्लैकिया आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी से चिल्ला पड़ा, ‘अरे, तुम किसना है न? पहिचाना? मैं, दीनानाथ, तेरा दीनू हूं, बचपन का…’

‘शटअप, तमीज़ से बात करो. मैं किसी दीनूवीनू को नहीं जानता.’ और गाड़ी झटके से स्टार्ट हो गई. वह हक्काबक्का वहीँ खड़ेखड़े पैट्रोल और धूल की दुर्गंध फेफड़े में निगलता रहा. ‘स्साला अब काहे को पहिचानेगा. बड़का आदमी जो बन गया है,’ वह फुसफुसाया.

सारी रात किशन कुमार सोने के प्रयास में करवटें बदलता रहा. जैसे ही आंखें बंद करता, दीनू का चेहरा सामने आ जाता, जिसे आज उस ने अपने बीवीबच्चों के सामने पहचानने से एकदम इनकार कर दिया था. वह कई साल और पीछे लौट गया…

कसबे का सरकारी स्कूल. पहली से 7वीं कक्षा तक दीनानाथ हांड़ी उस के साथ था. किशन कुमार शुक्ल के पिता नगरपालिका के एक किरानी और दीनू के मातापिता उसी नगरपालिका के स्वीपर थे. जातपांत और सामाजिक स्तर कभी उन की मित्रता में दीवार नहीं बन पाए थे. क्या घर, क्या बाहर, क्या स्कूल सब जगह दोनों गलबहियां डाले बेपरवाह घूमा करते थे. दीनू का परिवार आर्थिक दृष्टि से संपन्न था. मांबाप दोनों कमाने वाले. खाने वाला केवल एक बेटा. उस की जेब में हमेशा पांचदस रुपए के नोट फड़फड़ाते रहते. चाट, छोले, बादाम, सिनेमा आदि का खर्च दीनू की जेब के जिम्मे रहता था.

किशन को अपनी जेब के कोने में एकदो रुपए के सिक्के ही दुबके मिलते थे. दीनू द्वारा लाए गए हलवा, मिठाइयां, केक आदि पर किशन भी हक़ जमाता था. किशन को दीनू किसना कहा करता था. टिफ़िन के वक़्त स्कूल के किसी खाली कमरे में बैठ कर खुद कम खाना और किसना को जीभर खिलाना दीनू की आदत सी बन गई थी.

उस समय एकदो रुपए के सिक्के किसना के लिए बहुत बड़ी धनराशि हुआ करती थी. सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले उस के 5 भाईबहनों को एकदो रुपए के ही सिक्के मिला करते थे. अगर किसी माह उस के पापा को तनख्वाह न मिलती तो उन्हें ये सिक्के भी न मिल पाते. उस महीने पापा को परिवार के 7 प्राणियों के लिए राशनपानी का इंतजाम करना बेहद मुश्किल हो जाता. इस बीच परिवार का कोई सदस्य शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो गया तो उस के इलाज के मद में खर्च होने वाले पैसों का बंदोबस्त करना पापा के लिए टेढ़ी खीर बन जाती थी. मैडिकल स्टोर के उधार खाते में नाम दर्ज़ करवाने के अलावा कोई उपाय नहीं रहता था.

टिफिन के वक्त वह झिझकते हुए अकसर जेब में दुबके पड़े 2 रुपए का सिक्का निकाल कर दीनू को थमाना चाहता. दीनू के खर्च में शामिल होने की उस की भी इच्छा होती. लेकिन दीनू उस के कंधों पर हाथ रख कर विनम्रता से मना कर देता, ‘इन्हें जमा कर के रख. कभी अगर कड़की आ गई तो मैं तुम से बोलूंगा.’ लेकिन कड़की उस के पास कभी फटकी ही नहीं.

किशन कुमार को मिलने वाले एकदो के सिक्के जब बीसपचास के नोट में बदलने लगते तो कोईनकोई आफ़त उस पर आन पड़ती. कभी पैंसिल खो जाती, कभी क़लम तो कभी ज्योमिट्री बौक्स. उन्हें दोबारा खरीदने के लिए पापा से पैसे मांगने का मतलब एक और बड़ी ‘आफ़त’ को निमंत्रण देना. ऐसे मामलो में पापा का रौद्र रूप की कल्पना कर ही वह कांप जाता. एक बार जब उस की जेब के सिक्के दस-दस के 5 नोट के रूप में उछलकूद मचाने लगे तो उस ने दीनू से जोर दे कर कहा, ‘अगले सप्ताह के टिफिन का सारा खर्च मेरा रहेगा.’ लेकिन अफ़सोस, यह हो नहीं सका.

उस दिन स्कूल से लौटते वक्त गली में फुटबौल खेलते हमउम्र बच्चों को देखने के लिए रुका था. अचानक एक बच्चे की किक से बौल उस की तरफ आ गई. बौल को वापस बच्चों के पास भेजने के लिए उस ने एक ज़ोरदार किक मारी. अरे, यह क्या हो गया, बौल के साथ उस के जूते का तल्ला भी हवा में लहराने लगा. लो, एक और नई आफ़त. बड़े प्यार से सहेजे गए दसदस के 5 नोट में से 4 नोट छिटक कर रवि काका के पास चले गए. जूते का नया तल्ला खरीदने और मरम्मती में पूरे 40 रुपए खर्च हो गए.

पता नहीं फिर क्या हुआ कि अचानक दीनू का स्कूल आना बंद हो गया. दीनू का पता लगाने के लिए वह उस कालोनी में गया जहां दीनू रहता था. उस के पड़ोसियों ने उसे इस ख़बर से वाकिफ़ कराया कि किन्हीं पारिवारिक कारणों से उस के मातापिता ने नौकरी छोड़ दी है और खड़गपुर की किसी बस्ती में जा बसे हैं. वहीं दीनू का ननिहाल भी था.

इस बीच किशन कुमार की पढ़ाई उसी सरकारी स्कूल में ही जारी रही. चूंकि वह अपने भाईबहनों की तुलना में सब से ज़्यादा कुशाग्र बुद्धि पाई थी, इसलिए पढ़ाईलिखाई के मामले में उस ने कोई शिकायत का मौका नहीं दिया. मातापिता पूर्ण संतुष्ट थे. कक्षा में अव्वल रहने का सिलसिला 10वीं तक जारी रहा. आगे की पढ़ाई के लिए उसे निकटवर्ती शहर दुर्गापुर भेज दिया गया. वहीं उस ने स्नातक की डिग्री हासिल की. रोजगार की तलाश की शुरुआती कोशिश में ही उसे कामयाबी मिल गई. इंडियन रेलवे सर्विस में उस का चयन हो गया. द्वितीय श्रेणी के अधिकारी की 3 वर्षीय ट्रेनिंग के बाद दक्षिणपूर्व रेलवे के खड़गपुर डिविजन में वाणिज्य प्रबंधक के रूप में उस की पोस्टिंग हो गई.

आज एक मुद्दत के बाद दीनू मिला भी तो उस के सामाजिक स्तर ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया. गाली भी दे डाली. दीनू के प्रति उस की बदसुलूकी ने उसे बेहद उद्विग्न कर डाला. उसे लगा कि उस के स्तर ने उसे मिली ऊंची तालीम का मज़ाक उड़ाया है. ऊंची तालीम ने तो यह नहीं सिखाया कि उंचाईयों पर पहुंच कर अपनी ज़मीन को भूल जाओ. लेकिन वह ज़मीन को भूल गया और इस धारणा को और भी पुख्ता कर डाला कि मित्रता समान स्तर के ही बीच होती है. लेकिन नहीं, वह इस धारणा को तोड़ेगा. दीनू को शिद्दत से एहसास दिलाएगा कि वह उसे भूला नहीं है. बचपन में उस के संग गुज़ारे एकएक पल अभी भी उस के ज़ेहन में बदस्तूर जिंदा हैं. वह एहसानफरामोश नहीं है. उस के हरेक एहसान को वह अपने सीने में संजोए रखे है.

उस की उद्विग्नता में थोड़ी सी नरमी आई इस फैसले से. उस ने निश्चय कर लिया कि वह दीनू से मिलेगा, ज़रूर मिलेगा, एक अफ़सर की तरह नहीं बल्कि किसना की तरह, बचपन के दोस्त की तरह. उस से माफ़ी मांगेगा उस बदसुलूकी के लिए. वह जानता है, दीनू का दिल बहुत बड़ा है. उस की गुस्ताख़ी को वह नज़रअंदाज़ कर देगा, जैसे बचपन में उस की कई गुस्ताखियों को हंस कर माफ़ कर देता था. उसे पूरी उम्मीद है अपने सामने उसे देखते ही मोम की मानिंद पिघल जाएगा. उसे गले लगाएगा. बचपन की दोस्ती फिर से जिंदा करेगा.

दूसरे दिन वह अपनी गाड़ी ले कर सिनेमाहौल पहुंचा. इधरउधर नज़रें दौडाईं. दीनू नज़र नहीं आया. एक ब्लैकिए से पता पूछा. पता मिल गया, और वह जा पहुंचा उस बस्ती में जहां दीनू रहता था. बस्ती में चमचमाती गाड़ी घुसते ही हलचल मच गई. बस्ती के लोग अपनेअपने झोंपड़ीनुमा घरों से बाहर निकल आए. कई तरह के सवाल, जिज्ञासाएं, आशंकाएं छिपकली की कटी दुम की तरह इधरउधर छटपटाने लगीं.

आननफानन चर्चाओं का बाज़ार गरम हो गया. जैसे ही वह कार से उतरा, हरिया भौचक रह गया, ‘अरे ये तो हमरे डिपाट के बड़े सा’ब हैं,

लेकिन हमारी बस्ती में इन का का काम?’ हरिया रेल का सफाईकर्मी था. इस नाते जबतब बड़े सा’ब से उस का वास्ता पड़ता रहता था. तत्काल बड़े सा’ब के पास पहुंच कर हरिया ने सलाम ठोंका, “सर, मैं हरिया, स्टेशन का सफाईवाला. आप यहां?”

किशन कुमार ने उसे न पहचानते हुए भी पहचानने का नाटक किया, “अरे हां, हरिया, यह बताओ दीनू हांड़ी यहां कहां रहता है. मुझे उस से मिलना है.”

“सर, उसी के द्वार पर तो आप खड़े हैं.”

किशन कुमार की गाड़ी के आसपास बस्ती के बाशिंदों की तादाद धीरेधीरे बढ़ गई थी. हलकी दबी फुसफुसाहटें माहौल को रहस्मयी बना रही थीं. दीनू घर के ही अंदर था. हलका दबा शोर जब उस के कानों में पड़ा तो मामले को जानने के लिए दरवाजा खोल कर बाहर आ गया.

दीनू को देखते ही किशन कुमार उस के सामने जा खड़ा हुआ. बांहें फैला कर भीतर के उफान को तोड़ा, “दीनू, मेरे दीनू. मैं किसना ही हूं, तेरे बचपन का यार.”

दीनू अपने सामने बचपन के यार को देख कर एकबारगी अचकचा गया. उस के लिए यह अप्रत्याशित था. उसे इस की कतई उम्मीद नहीं थी कि किसना उस से मिलने उस की बस्ती पहुंच जाएगा.

“अरे यार, ऐसे भकुआ कर देखता क्या है? आ जा, गले लग जा. देख, तुझ से मिलने को मैं खुद पहुंच गया.”

दीनू के भीतर का बांध टूटने वाला था. अपने यार की मौजूदगी की तपिश से यादों के बर्फ़ कईकई टुकड़ों में बंट कर पिघलने वाले थे. उस की धडकनें बेकाबू हो रही थीं. सांसें भी तेज हो कर उस के नियंत्रण से बाहर हो रही थीं. उस का जी चाहा कि बांहों में जकड़ ले अपने किसना को. वह आगे बढ़ने ही वाला था. आगे बढ़ कर अपने यार को सीने से भींचने ही वाला था. उस के कदम बढ़ते कि भीतर से किसी ने बुरी तरह झिंझोड़ा. झिंझोड़ कर उस की नज़रों के करीब सिनेमाहौल में लगे होर्डिंग की तरह उसे बेइज़्ज़्त किया जाने वाला मंजर ला खड़ा कर दिया. उसे पहचानने से इनकार कर दिया जाने वाला दृश्य उस के सीने में कांटों की तरह चुभने लगा. ज़ज्बात की उफनती नदी में किसी ने एक बड़ा सा पत्थर फेंका, ‘खबरदार, आगे मत बढ़. तेरा भी अपना एक वजूद है.’

उस ने स्वयं को संयत किया. बढ़ते कदम रुक गए. चेहरे को भावहीन बना कर कहा, “नहीं, सा’ब, हम दीनू नहीं. आप गलत ठिकाने पर आ गए हैं” और वह झटके से झोंपड़ी में समा गया .

किशन को लगा, बचपन के यार ने ऊंचाइयां छूते उस के वजूद और उसे मिली ऊंची तालीम के दमकते मुखड़े पर ढेर सारा थूक उगल दिया.

अब आज उस के इस दुनिया से हमेशा के लिए चले जाने की खबर ने उसे घोर चिंता में डाल दिया.

छंटती हुई काई : क्या निशात के ससुराल वाले दकियानूसी सोच छोड़ पाएं ?

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विलासिनी : क्या नीलिमा अपनी गृहस्थी में फिट हो पाई ?

जिंदगी में ऊंचाइयां हासिल करने के लिए महत्त्वाकांक्षी होना बहुत जरूरी है, लेकिन यही महत्त्वाकांक्षा यदि अति में बदल जाए तो फिर पतन का कारण भी बन जाती है. मजे की बात तो यह है कि बहुत से व्यक्ति इस अति की महीन रेखा को पहचान ही नहीं पाते.

नीलिमा भी कहां पहचान पाई थी इस विभाजन रेखा को. बचपन से ही आसमान में उड़ने के सपने देखने वाली नीलिमा ने कभी जमीन पर पांव रखने का सोचा भी नहीं था.

हालांकि उस के घरपरिवार में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी. पिता सरकारी कर्मचारी और मां गृहिणी थी. एक बड़ा भाई और फिर नीलिमा… सब से छोटी होने के नाते स्वाभाविक रूप से अति नेह की अधिकारिणी थी. बरसात चाहे प्रेम की ही क्यों न हो, यदि टूट कर बरसे तो फिर छत हो या छाता… क्षतिग्रस्त कर ही देती है.

नीलिमा भी परिवार के प्रेम की धारा में बहती एक तरह से मनमौजी झरना हुई जा रही थी. चांद छूने को उतावली लड़की को साधारण वस्तुएं तो कभी रास ही नहीं आईं.

बचपन में जब पिता को अपने वरिष्ठ अधिकारी के सामने झुकते देखती तो अपनेआप को बड़ा अधिकारी बनते देखने की उस की लालसा और भी अधिक जोर मारने लगती थी. स्कूल पहुंची तो अन्य अध्यापकों के मुकाबले प्रधानाध्यापक का रुतबा उसे अधिक आकर्षित करता. इसी तरह की अनुभूति उसे कालेज में प्रिंसिपल और उस के बाद यूनिवर्सिटी में कुलपति को देख कर होती थी.

यही वे पल होते थे, जो उसे सपनों को हकीकत में बदलने के लिए उकसाते थे. यही वे लमहे होते थे, जो उस की महत्त्वाकांक्षाओं को पोषित करते थे. यही वो समय होता था, जो उसे अपने साधारण से व्यक्तित्व को असाधारण में परिवर्तित करने की तरफ धकेलता था.

नीलिमा जानती थी कि अधिक ऊंची उड़ान भरने के लिए पंखों को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है. वह भी कर रही थी. पढ़ाईलिखाई का लक्ष्य पूरा होने के बाद अब वह विभिन्न तरह की प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी में जुट गई.

पिता अपनी सोच की सीमा के अनुरूप बेटी को राह दिखाने लगे, लेकिन नीलिमा को उन के सुझाए गए क्लर्क, अध्यापक और इसी तरह के तृतीय श्रेणी के जौब बिलकुल नहीं सुहाते थे. उस के सपनों में तो बड़ी सी सरकारी गाड़ी, आगेपीछे घूमते मातहत, सलाम ठोंकते अर्दली और चारों ओर हरेभरे लौन से घिरा, गेट पर दुनाली लिए खड़ा चैकीदार वाला बंगला दस्तक देते थे.

नीलिमा ने राजपत्रित अधिकारी की पोस्ट के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी, लेकिन जितना मीठा चाहिए, शक्कर भी उसी अनुपात में डालनी पड़ती है. एक तो उच्च स्तर पर पदों की सीमित संख्या, दूसरे प्रतिभागियों की बेपनाह भीड़, ऊपर से विभिन्न तरह के आरक्षण… हर बार नीलिमा की डोंगी तट पर लगतेलगते ही रह जाती. अपनी बचीखुची हिम्मत समेट कर नीलिमा फिर से डोंगी को संवारती, लेकिन अंततः उस का हश्र भी यही होता.

4 साल के कठिन प्रयासों के बाद भी जब नीलिमा को वांछित सफलता नहीं मिली, तो वह थकने लगी. हार कर उस ने शादी करने के पिता के प्रस्ताव के आगे हथियार डालना तय कर लिया. तभी अचानक एक विचार उस के दिमाग में कौंध गया.

‘‘मैं बड़ी अफसर नहीं बन सकी तो क्या हुआ? किसी बड़े अधिकारी की पत्नी भी तो बना जा सकता है. उस स्थिति में भी रोब में तो किसी तरह की कोई कमी नहीं आएगी. अलबत्ता, नौकरी वाले दिनभर के काम और माथापच्ची से जरूर नजात मिली रहेगी. अपनी तो बस ऐश ही ऐश होगी,‘‘ यह खयाल दिमाग में आते ही उस ने घर में ऐलान कर दिया कि वह शादी किसी बड़े अधिकारी से ही करेगी, चाहे लड़का तलाश करने में 2 के 4 साल लग जाएं.

बेटी की घोषणा सुन कर पिता ने अपनी हैसियत का अनुमान लगाया और मां ने अपनी तिजोरी और बैंक खाता खंगाला. भाई ने भी इकलौती बहन के लिए हर संभव मदद की पेशकश की, तो पिता को कुछ राहत मिली और इस तरह उन की तलाश विजय पर जा कर खत्म हुई. विद्युत विभाग में सहायक अभियंता विजय की हालांकि तनख्वाह तो अधिक नहीं थी, लेकिन जो सुविधाएं नीलिमा अपने लिए चाह रही थी, वे सब विजय को हासिल थीं. कुलमिला कर नीलिमा ने सीधेसाधे विजय को आसमान तक जाने वाली सीढ़ी के रूप में चुना.

विजय नीलिमा को पत्नी के रूप में पा कर बहुत खुश था. नीलिमा के पिता को भी अपनी खोज पर गर्व था. विजय की पोस्टिंग एक छोटे कसबे में थी. छोटी जगह होने की वजह से वहां विजय का अच्छाखासा रुतबा था. सड़क पर निकलता तो कई लोग नमस्कार करते थे. अनगिनत सलाम कबूल करती नीलिमा का माथा भी दर्प से 2 इंच अधिक तन जाता था.

कुछ दिन तो नीलिमा को पति के पद और पावर का नशा चढ़ा रहा, लेकिन जल्दी ही वह वहां की जीवनशैली से ऊब गई. न सिनेमा, न मौल… न दोस्त, न पार्टी… जिंदगी में कोई थ्रिल ही नहीं. उधर विजय भी अपने काम में बहुत बिजी रहता. ऐसे में नीलिमा का मन वहां से उखड़ने लगा. उस ने विजय से विभाग मुख्यालय में ट्रांसफर कराने की जिद की.

विजय ने बहुत समझाया कि जनता से जुड़े विभागों में ट्रांसफर इतना आसान नहीं होता, बहुत बड़ी सिफारिश लगवानी पड़ती है. तबादला होने के बाद भी वहां टिके रहने की कोई गारंटी नहीं होती. कोई आप से भी बड़ी सिफारिश ले आएगा, तो आप को उठ कर कहीं दूर फेंक दिया जाएगा, लेकिन नीलिमा कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी. जिद पर आई स्त्री कभी मानी है भला? आखिर पत्नी की जीत हुई और जोड़तोड़ के साथ कुछ चेक और कुछ जेक का जुगाड़ लगा कर विजय अपना ट्रांसफर कराने में सफल हो ही गया.

मुख्यालय तो अधिकारियों का अथाह सागर होता है. जहां विभाग का प्रबंधन निदेशक बैठता हो, वहां भला एक सहायक अभियंता की पूछ कितनी हो सकती है? छोटे शहर की तरह यहां तो सहायक अभियंता को कोई पहचानता तक नहीं. विजय से ऊंचे पद वाले अनेक अधिकारी होने के कारण न तो विजय को सरकारी गाड़ी मिली और न ही सरकारी आवास. लोगों से सीधे जुड़ाव न होने के कारण उपभोक्ता भी नमस्कार नहीं करते.

विजय को भले ही यहां का माहौल रास न आया हो, लेकिन नीलिमा यहां आ कर खुश थी. बहुत जल्दी उस ने अपने आसपास की महिलाओं से दोस्ती कर ली और मैट्रो लाइफ को ऐंजौय करने लगी. कभी किटी पार्टी, तो कभी पिकनिक… कभी फिल्म, तो कभी शौपिंग… नीलिमा पति की तनख्वाह मजे से उड़ा रही थी.

इधर जब सैलरी खर्च होने के बाद धीरेधीरे बैंक से बचत की रकम भी लगातार कम होने लगी, तो विजय ने उसे अपने खर्च सीमित करने की नसीहत दी. हाथ में तंगी आते ही नीलिमा को कसबे की जिंदगी याद आने लगी. वहां लोग इज्जत तो करते ही थे, विजय को अच्छीखासी ऊपरी कमाई भी हो जाती थी. लोग अपने खेतबड़ियों से कभी ताजा सब्जी, तो कभी फल आदि खुशीखुशी घर पहुंचा देते थे. यहां तो पाव धनिया भी खुद की जेब से खरीदना पड़ता है. नीलिमा परेशान रहने लगी.

उन्हीं दिनों आयशा उन की कालोनी में रहने आई. आयशा खुद एक सरकारी अधिकारी है और नीलिमा के घर के सामने वाला मकान उस ने किराए पर लिया है. विजय को औफिस के लिए विदा करती नीलिमा आयशा के घर के बाहर खड़ी लाल पट्टी लगी सरकारी गाड़ी को देख कर ठिठक जाती है. वह तब तक अपने घर के मुख्य दरवाजे पर खड़ी रहती है, जब तक कौटन की कलफ लगी साड़ी का पल्लू संभालती मोबाइल पर बात करती आयशा गाड़ी में बैठ नहीं जाती. ड्राइवर के हाथ में थमा उस का लंच बौक्स और पानी की बोतल नीलिमा को एक अलग ही तिलस्मी दुनिया में ले जाते हैं. नीलिमा की आंखें सम्मोहित सी गाड़ी का आंखों से ओझल होने तक उस का पीछा करती हैं.

इस महीने की किटी पार्टी शिवानी के घर थी. शिवानी सब को एक खास मेहमान से मिलाना चाह रही थी. उस मेहमान के रूप में आयशा को देख कर नीलिमा की बांछें खिल गईं. अपने बिजी समय में से कुछ मिनट निकाल कर आयशा ने उन का निमंत्रण स्वीकार किया था.

नीलिमा उस के व्यक्तित्व से तो पहले ही सम्मोहित थी, आज उस की व्यवहार कुशलता की भी कायल हो गई. अभी औपचारिक परिचय ही हुआ था कि जरूरी फोन आने पर फिर मिलने और आवश्यकता पड़ने पर मदद का आश्वासन देती आयशा चली गई. उस के जाते ही पार्टी में एक सन्नाटा सा पसर गया.

‘‘भई मजे हैं इन के भी. हमारे पिया घर नहीं, हमें किसी का डर नहीं,‘‘ मिसेज शर्मा ने चुप्पी तोड़ी, तो शिवानी हंस पड़ी.

‘‘मैं कुछ समझी नहीं. क्या इन के पति कहीं बाहर रहते हैं?‘‘ नीलिमा ने पूछा.

‘‘हां, बाहर ही समझो. घर से ही नहीं, जिंदगी से भी बाहर ही हैं,‘‘ कहती हुई मानसी ने व्यंग्य से होंठ तिरछे किए. नीलिमा अभी भी उन की बातचीत का सिरा नहीं पकड़ पाई थी. उस ने आंखों ही आंखों से अगला प्रश्न किया.

‘‘अरे, ये तलाकशुदा हैं. मेरे ये तो ये भी कह रहे थे कि मैडम को सरकारी कोटे में ये कुरसी मिली है. भई, ऐसी नौकरी मिल जाए तो तलाक भी बुरा नहीं है,‘‘ रीता के इतना कहते ही एक जोरदार ठहाका हाल में गूंज गया और पार्टी फिर से अपनी रंगत में आ गई.

घर लौटने के बाद भी नीलिमा के दिमाग में आयशा ही घूमती रही. वह रहरह कर अपने लिए भी वैसी ही जिंदगी की कल्पना करने लगी. लेकिन उस के लिए आयशा बनना इतना आसान नहीं था.

‘‘विजय तो मुझे बहुत चाहते हैं. किस आधार पर तलाक की मांग करूं? यों भी हमारे समाज में तलाक को अच्छा नहीं समझा जाता. मम्मीपापा भी मुझे ये कदम नहीं उठाने देंगे,‘‘ आजकल कुछ इसी तरह की उधेड़बुन में नीलिमा उलझी हुई थी. लेकिन इतना तो वह समझ ही गई थी कि तलाक के अतिरिक्त कोई दूसरी राह उसे कुरसी तक नहीं ले जा सकती.

उस की झुंझलाहट अब उस के व्यवहार में झलकने लगी थी. नीलिमा बातबात में पति को जलीकटी सुनाने लगी, तो विजय का गुस्सा भी फटने लगा. देखते ही देखते घर की शांति बीते दिनों की बात हो गई. अब न वहां खिलखिलाहटें थीं और न ही शरारतें… दोनों ही एकदूसरे को नीचा दिखाने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने दे रहे थे. इसी की अगली कड़ी में एक दिन बात इतनी बिगड़ गई कि विजय का हाथ उठ गया. नीलिमा भी कहां कम थी. एक की उधारी दो से चुकाई. बढ़तेबढ़ते बात यहां तक आ पहुंची कि नीलिमा अपना सूटकेस उठा कर मायके आ गई.

ससुराल और मायका… दोनों पक्षों की तरफ से कुछ दिन समझाइश भी चली, लेकिन नीलिमा को तो कुछ समझना ही नहीं था.
एक दिन मम्मीपापा के लाख विरोध के बावजूद उस ने विजय को तलाक का लीगल नोटिस भिजवा दिया. 2 साल लगे और आपसी रजामंदी से आखिर नीलिमा को तलाक मिल गया. यह डिक्री उस के लिए जैसे आने वाले सुनहरे कल की चाबी थी.

नीलिमा कुछ दिन तो अनमनी सी रही. अपने अलगाव का मातम मनाने का दिखावा भी किया, लेकिन जल्दी ही वापस अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट आई. उन्हीं दिनों राज्य प्रशासनिक सेवाओं की भरती निकली. नीलिमा ऐसे ही किसी अवसर की तलाश में थी. उस ने अप्लाई कर दिया.

नीलिमा अपने चयन को ले कर निश्चिंत थी. वह जानती थी कि विधवा, परित्यक्ता और तलाकशुदाओं को मिलने वाले सरकारी आरक्षण की सीढ़ी के सहारे जरा सी अतिरिक्त मेहनत उसे जिंदगी के उस मुकाम पर पहुंचा देगी, जिस के वह सपने देखती आई है. अपनी सफलता को सुनिश्चित करने के लिए उस ने एक कोचिंग संस्थान में भी प्रवेश ले लिया.

कई बार जब आत्मविश्वास आत्ममुग्धता में बदल जाता है, तो व्यक्ति को चारों खाने चित भी कर देता है. नीलिमा के साथ भी यही हुआ. कोटे की चाशनी में लिपटी प्रतियोगिता की पहली कड़वी खुराक जब उसे मिली, तो सफलता का जायका बेस्वाद हो गया. नीलिमा यह परीक्षा पास नहीं कर सकी. अगली भरती के लिए उसे 2 साल और इंतजार करना पड़ा.

इस बार वह थोड़ी संजीदा हुई, क्योंकि भाईभाभी के प्रेम में वह पहली सी गरमाहट अब नदारद थी. मां तो सदा उसे ही दोष देती रही थीं. इस बार प्रतियोगिता की प्रीपरीक्षा उस ने पास कर ली. मुख्य परीक्षा लगभग सालभर बाद आयोजित हुई. इस तरह की भरतियों में देरी होना स्वाभाविक सी बात होती है, क्योंकि भरती प्रक्रिया को कई चरणों से गुजरना होता है.

मुख्य परीक्षा प्राथमिक की तुलना में कहीं अधिक कठिन थी. मेहनत अधिक ही मांग रही थी. नीलिमा कर भी रही थी, लेकिन सभी प्रयासों के बावजूद वह इस बार मुख्य परीक्षा में पास नहीं हो सकी.

पहली बार उसे कुछ निराशा हुई. जहां से चली थी वहीं वापस आ गई. फिर से 2 साल का इंतजार और शून्य से शुरुआत… नीलिमा पर हताशा हावी होने लगी. इस बार किसी तरह प्राथमिक और मुख्य परीक्षा पास की, तो नीलिमा के सपनों की सूखी घास फिर से हरी होने लगी. इधर साक्षात्कार की तिथि घोषित हुई और उधर भरती से जुड़े दलाल दल सक्रिय हो गए. कुछ ने नीलिमा से भी संपर्क किया, लेकिन नीलिमा में अब आत्मविश्वास वापस जगह बना चुका था.

नीलिमा ने साक्षात्कार दिया और परिणाम की प्रतीक्षा करने लगी. इसी बीच किसी असंतुष्ट प्रतिभागी ने मुख्य परीक्षा के परिणामों पर न्यायालय में रिट लगा दी और स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया. इस के साथ ही परीक्षा के नतीजों पर रोक लग गई.

सालभर तक सुनवाई चलती रही, आखिर किसी तरह नजीजे घोषित हुए. उत्साह से भरी नीलिमा ने परिणाम देखने के लिए आधिकारिक वैबसाइट खंगाली, लेकिन उसे अपना रोल नंबर कहीं भी नहीं दिखा. नीलिमा के होश उड़ गए. एक तरफ बढ़ती उम्र… सामाजिक प्रताड़ना… और घर वालों की व्यंग्यात्मक निगाहें, तो दूसरी तरफ इंचइंच दूर खिसकती कुरसी… नीलिमा की निराशा हताशा में होती हुई अब अवसाद में बदलने लगी थी.

‘‘उफ्फ, अब फिर वहीं से शुरुआत करनी पड़ेगी. मैं जिसे आसान सीढी समझ रही थी, उस पर हो कर मंजिल तक पहुंचने वालों की कतार भी कोई कम छोटी नहीं है. यहां भी बहुत प्रतिस्पर्धा है,‘‘ नीलिमा धीरेधीरे जिंदगी की सचाई से वाकिफ हो रही थी.

नीलिमा को विजय से अलग हुए लगभग 10 साल हो गए. इस बीच पिता भी ये दुनिया छोड़ कर अनंत यात्रा पर निकल गए. मां पूरी तरह से भाई पर आश्रित हो गईं. भाई घर का मुखिया भी बन गया था. भाभी भी यदाकदा सुनाते हुए नीलिमा को बोझ करार देने लगीं. नीलिमा की स्थिति त्रिशंकु सी होने लगी.

‘‘अब अधिक समय नहीं है. या तो अपने पैरों पर खड़ी हो जाओ या भाभी की गुलामी स्वीकार कर लो. पति के पास लौटने का रास्ता तो अब शायद ही खुले,‘‘ कुछ इसी तरह के विचार इन दिनों नीलिमा के मनमस्तिष्क में उमड़ने लगे थे.

अखबार में बैंक क्लर्क की भरती का विज्ञापन देखा तो बिना अधिक विचार किए नीलिमा ने फार्म भर दिया. कोचिंग की मदद भी ली और दिनरात मेहनत भी की. इस बार शायद समय उस के पक्ष में था, नीलिमा इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो गई. मां ने अपनी खुशी जाहिर की, वहीं भाभी ताना देने से बाज नर्हीं आइं.

“नौ दिन चले अढ़ाई कोस,” कह कर उस ने मुंह सिकोड़ दिया. नीलिमा भी अपनेआप को बेहद पराजित सी महसूस कर रही थी. उसे लग रहा था मानो किसी ने उस की थाली में बासी भोजन परोस दिया हो और भूख की अधिकता के कारण ये भोजन करना उस की मजबूरी बन गया हो.

कहते हैं कि नियति जब बदला लेने पर उतारू हो जाती है, तब व्यक्ति को हरेक कोण से आईना दिखाती है. अभी नीलिमा सामान्य हो भी नहीं पाई थी कि एक वज्रपात और हुआ. कल शाम जब भाई ने घर में घुसते ही उस की तरफ हिकारत से देखते हुए कहा, “विजय का प्रमोशन हो गया. इसी शहर में अधीक्षण अभियंता बन कर आया है. क्या ठाठ हैं बंदे के. विभाग की कालोनी में सब से शानदार बंगला उसी का है. रिश्ता बना रहता तो आज चार लोगों में अपनी भी इज्जत होती, लेकिन फूटी किस्मत का कोई क्या करे?”

मां – भाभी ने भी नीलिमा को कोसते हुए अपनी नाराजगी जाहिर की. नीलिमा अपनेआप को उस दोराहे पर खड़ा हुआ महसूस कर रही थी, जिस की हरीभरी पगडंडी को वह न केवल छोड़ आई थी, बल्कि उस तरफ लौटने की राह पर भी उस ने गहरी खाई खोद डाली थी. अब सिर्फ और सिर्फ कांटों वाले रास्ते पर चलना ही उस की नियति थी. कौन जाने इस सेहरा में आगे कोई फूल मिलेगा भी या नहीं.

बुलडोजर संस्कृति : समाज और रिश्तों पर खतरनाक असर

3 अप्रैल, 2022 को लखनऊ में इंस्पैक्टर जगत नारायण सिंह के 3 मंजिला घर को बुलडोजर से ढहा दिया गया. जगत नारायण सिंह वही पुलिसकर्मी हैं जिन पर कानपुर के व्यापारी मनीष गुप्ता की हत्या का आरोप है. इस से पहले 2 अप्रैल को प्रयागराज विकास प्राधिकरण ने बड़ी कार्रवाई करते हुए 150 बीघा में फैले प्लौट को ध्वस्त कर दिया था. धूमगंज और कौशांबी में ये कार्रवाइयां हुईं. प्रशासन की तरफ से प्लौटिंग को अवैध बताया गया.

समाजवादी पार्टी के विधायक शहजिल इसलाम के पैट्रोल पंप पर भी बुलडोजर चला दिया गया था. आरोप लगाया गया कि यह अवैध जमीन पर बनाया गया था. स्थानीय स्तर पर लोगों में इस के प्रति गुस्सा भी दिखा.

इसी तरह से नोएडा के सैक्टर 134 और 135 स्थित डूब क्षेत्र में बने एक फार्महाउस पर बुलडोजर चला. बुलडोजर चलाने की कार्रवाई सहारनपुर में भी हुई. वहां गैंगरेप के आरोपियों के घर पर पुलिस ने बुलडोजर चला दिया. लखनऊ, बाराबंकी, कानपुर, नोएडा, जालौन, बुलंदशहर जैसे तमाम जिलों में रोज बुलडोजर से अवैध निर्माण गिराने की खबर सामने आई. इन का काफी विरोध भी किया गया.

सवाल उठता है कि केवल आरोप लग जाने पर ही बुलडोजर कार्रवाई करना जायज है? बुलडोजर से संपत्ति ढहाने की कार्रवाई ‘उत्तर प्रदेश अर्बन प्लानिंग एंड डैवलपमैंट एक्ट 1973’ के तहत होती है. इस कानून में एक धारा 27 है और इस के तहत ही प्रशासन को अवैध संपत्तियों को ढहाने का अधिकार मिला हुआ है. मगर इस एक्ट के मुताबिक संपत्ति गिराने का आदेश उस संपत्ति के मालिक को अपना पक्ष रखने का एक मौका दिए बिना जारी नहीं किया जा सकता.

आदेश जारी होने के 30 दिनों के भीतर संपत्ति का मालिक आदेश के खिलाफ चेयरमैन से अपील भी कर सकता है. मगर क्या केवल आरोपी होने पर किसी की संपत्ति पर बुलडोजर चला देना उचित है और अगर कोई आरोपी बाद में निर्दोष साबित हो गया तो क्या होगा?

करीब 100 साल पहले आविष्कार किए गए बुलडोजर का उपयोग दुनियाभर में हमेशा से घरों, कार्यालयों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए किया गया है. लेकिन आजकल यह सरकार के हाथों में एक हथियार जैसा बनता जा रहा है.

जब एक बुलडोजर किसी के घर को जमींदोज कर देता है तो इस का तात्पर्य है कि वह न केवल एक संरचना को ध्वस्त करना चाहता है बल्कि उस इंसान की आवाज और सुकून से उस के जीने के अधिकार को भी ध्वस्त किया गया और वह भी आरोप साबित होने से पहले.

बुलडोजर सिर्फ किसी संरचना को ध्वस्त कर सकता है, बना नहीं सकता. यह एक तरह से ‘ठोक दो’ की आक्रामक नीति है. मगर कानून का रिप्लेसमैंट बुलडोजर नहीं हो सकता. यह रवैया समाज में अराजकता ला सकता है. जिस तरह बिल्डिंग गिराई गई, ऐसे तो बड़ेबड़े शहर मरघट बन जाएंगे. बुलडोजर जहां मन हुआ वहां चला देना कानून के अंतर्गत नहीं आ सकता है.

घरों में घुसने लगी है बुलडोजर संस्कृति

बुलडोजर यूपी की कानून व्यवस्था का प्रतीक बनता जा रहा है. इस का असर पूरे देश पर पड़ने लगा है. सिर्फ देश ही नहीं, यह सोच देश के घरों तक घुसने लगी है. आज लोग बिना आगेपीछे देखे, सामने वाले को बिना किसी एक्सक्यूज या अपना पक्ष रखने का मौका दिए, बिना उस की कोई बात सुने और बिना कोई हल निकाले बस सामने वाले इंसान को ही खत्म कर देते हैं.

29 जनवरी को पुणे की टौप आईटी कंपनी में वरिष्ठ पद पर काम कर रही वंदना द्विवेदी की उसी के बौयफ्रैंड द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई. दरअसल, ऋषभ और वंदना के बीच 10 साल से रिलेशनशिप था. ये दोनों अलगअलग शहरों में रहते थे. ऋषभ लखनऊ तो वंदना पुणे में रह कर काम करती थी. ऋषभ वंदना से मिलने के लिए अकसर पुणे आता रहता था. इसी सिलसिले में 25 जनवरी को दोनों ने होटल में अपनी बुकिंग करवाई.

ऋषभ को कुछ दिनों से वंदना के चरित्र पर शक होने लगा था कि उस के कई लड़कों से संबंध हैं. इसी शक के आधार पर ऋषभ ने वंदना की हत्या का प्लान बनाया और उसे गोली से उड़ा दिया.

29 जनवरी को ही कानपुर में अवैध संबंध का विरोध करने पर एक पत्नी ने अपने शिक्षक पति को कमरे में बंद कर जिंदा जला दिया. पतरसा गांव के स्कूल में उस का अधजला शव मिला. पत्नी ने प्रेमी, वकील एवं एक अन्य के संग मिल कर इस वारदात को अंजाम दिया.

27 दिसंबर, 2023 को पानीपत के एक गांव में एक प्रौपर्टी डीलर पिता ने 17 वर्षीया बेटी की गोली मार कर हत्या कर दी. दोपहर के समय बाप और बेटी में किसी बात को ले कर विवाद हुआ तो पिता ने एक के बाद एक कई गोलियां बेटी को मार दीं. मृतका का नाम भावना है. वह 10वीं तक पढ़ाई करने के बाद घर पर रहती थी. उस के पढ़ाई न करने और घर के कामकाज में हाथ न बंटाने से पिता नाराज था. इसी बात को ले कर बाप बेटी के बीच झगड़ा हुआ और पिता ने अपनी लाइसैंसी रिवौल्वर से बेटी को गोली मार दी.

9 जनवरी को यूपी के ललितपुर जिले में दिल दहला देने वाली घटना सामने आई जिस में पति ने पत्नी और 11 महीने की बेटी को बड़ी बेरहमी से मार डाला. नीरज कुशवाहा नाम के शख्स ने अपनी पत्नी को क्रिकेट बैट से पीटपीट कर हत्या कर दी. उस की शादी से पहले एक महिला से प्रेम प्रसंग चला आ रहा था. एक रात पत्नी के सो जाने पर नीरज अपनी प्रेमिका से मोबाइल फोन पर बात कर रहा था. इतने में पत्नी की आंख खुल गई. उस ने नीरज को प्रेमिका से बात करते हुए रंगेहाथ पकड़ लिया. इसी बात को ले कर झगड़े में नीरज ने पास में रखे क्रिकेट बैट से अपनी पत्नी मनीषा के सिर पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया जिस से वह लहूलुहान हो कर गिर पड़ी. इसी बीच बच्ची भी चोटिल हो गई जिस से उस की भी मौत हो गई.

2 जनवरी को उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में बेटी के प्रेम प्रसंग से नाराज एक पिता ने बेटी और उस के कथित प्रेमी की फावड़े से वार कर हत्या कर दी. घटना को अंजाम देने के बाद पिता ने खून से सना फावड़ा ले कर कोतवाली पहुंच कर आत्मसमर्पण कर दिया.

दरअसल, अनुसूचित जाति का सचिन (20) और इसी गांव की सजातीय महेश की बेटी नीतू (20) लगभग 2 साल से एकदूसरे से प्रेम करते थे. सचिन और नीतू के रिश्ते को ले कर दोनों परिवारों के बीच तनाव की स्थिति थी. आधी रात को सचिन नीतू से मिलने उस के घर पर आया था. दोनों नीतू के घर के दरवाजे पर ही बैठे थे. नीतू के पिता महेश ने फावड़े से प्रहार कर दोनों की हत्या कर दी.

जिंदगी ले लेना जायज कैसे

आईआईटी में काम करने वाली प्रेमिका की हत्या का ही मामला लीजिए, अगर प्रेमिका पर शक है और उस की वजह से आप के दिल को तकलीफ मिल रही है तो इस का समाधान प्रेमिका को गोली से उड़ा देने या गला काट देने में कैसे हो सकता है ? आप का शक गलत भी हो सकता है. मान लीजिए शक सही है तो भी दूसरे समाधान निकाले जा सकते हैं. लड़की को अपना पक्ष रखने का मौका तो मिलना चाहिए. अगर आप उसे अब कोई मौका नहीं देना चाहते तो ठीक है आप उस लड़की से ब्रेकअप कर लो. दूर हो जाओ उस से. उसे अपनी जिंदगी से हटा दो. मगर उस की जिंदगी ले लेना कहां तक जायज है?

बुलडोजर संस्कृति एक तरह की सोच है जिस में आप सामने वाले को कोई मौका दिए बिना अपना फैसला सुना देते हैं और यह फैसला विध्वंसक नतीजे को जन्म देता है. किसी इंसान ने कुछ गलत किया है तो उसे सजा देने से पहले अपना पक्ष रखने या गलती मानने का मौका देना चाहिए. गलती की सजा गलती करने वाले को साफ कर देना यानी खत्म कर देना नहीं हो सकता. किसी इंसान की कोई बात आप को नागवार गुजरे तो अपनी बात कह कर उसे समझाना या उसे दोषी ठहराना उचित है. मगर उस दोष के लिए उस के वजूद को ही मटियामेट करना उचित नहीं. कोई चीज आप को परेशान कर रही है, गलत जगह पर है तो उसे वहां से हटा देना सही है मगर उसे नष्ट कर देना सही कैसे हो सकता है.

जहां तक बात रिश्तों की है तो इन्हें बहुत केयर की जरूरत होती है. रिश्तों की डोर बहुत नाजुक होती है. इन रिश्तों को हिटलर वाली मानसिकता के साथ आप ज्यादा दूर तक नहीं ले जा सकते. रिश्तों को आप एक झटके से तोड़ भी नहीं सकते. जब इंसान बुलडोजर संस्कृति अपनाते हुए अपने रिश्तों का खत्म करता है तो कहीं न कहीं उस शख्स को भी सुकून नहीं मिलता. अपने किसी अजीज के कत्ल के आरोप में वह भी सलाखों के पीछे चला जाता है. ऐसे में 2 जिंदगियां खराब हो जाती हैं. एक वह जिसे आप ने मारा और एक खुद आप की जिंदगी. याद रखिए अपने रिश्तों के साथ बहुत प्यार और धैर्य से काम लेना पड़ता है. पल भर के आवेश में आ कर ऐसा कदम न उठाएं कि बाद में उम्र भर पछताना पड़े.

जब भाई दूसरे धर्म, जाति, देश, रंग की पत्नी लाए

बिहार का अम्बुज अफ्रीका के इथियोपिया जौब के लिए गया. वहां उस की मुलाकात ईसाई धर्म की पढ़ीलिखी इंजीनियर लड़की सोनिया से हुई. सोनिया शांत स्वभाव की होने की वजह से अम्बुज को भा गई और उन दोनों ने शादी का मन बनाया. परिवार में मातापिता को कोई एतराज न था, लेकिन रिश्तेदारों और उस के बड़े भाई ने उस रिश्ते को मानने से मना किया. इस पर अम्बुज ने अपने रिश्तेदारों और भाई को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने.

अम्बुज ने अपने पेरैंट्स का आशीर्वाद ले कर सोनिया से इथियोपिया में ही कोर्ट मैरिज कर ली और अफ्रीका में ही रहने लगा. दोनों को एक बेटा हुआ और जब वे तीनों बिहार में अपने घर आए, तो भाईभाभी ने पहले तो बात नहीं की, बाद में सोनिया के व्यवहार से इतने खुश हुए कि दोनों ने उन्हें स्वीकार कर लिया. आज किसी को भी उस के किसी गैरधर्म या जाति या अलग देश की होने का मलाल नहीं.

सोनिया को भारत में रहना और यहां की लाइफस्टाइल बहुत पसंद है. वह यहां अपने तरीके से ही जी पा रही है, जहां उस का पति और ससुराल पक्ष उस के अलग खानपान को भी मानने लगे हैं. आज सोनिया खुश है और भारत में ही जौब भी कर रही है.

यह सही है कि भारत में इंटरकास्ट मैरिज को आज भी लोग नहीं मान पाते और ऐसी सोच तक़रीबन हर घर में है, जिस से निकलना आज भी मुश्किल है. यह एक सामाजिक टैबू है, जिस के दोषी परिवार, समाज और धर्म सभी हैं जो इस की दुहाई देते हुए प्रेमियों को अलग करने की कोशिश लगातार करते रहते हैं. जबकि, एक सर्वे में यह पाया भी गया है कि इंटरकास्ट मैरिज का असर परिवार और समाज पर हमेशा सकारात्मक होता है.

एकजैसी भावना

यहां यह कहना गलत न होगा कि देश चाहे कोई भी हो, भावनाएं सब की एक ही होती हैं. ऐसे में परिवार अगर थोड़ा साथ दे, तो शादी का रिश्ता अच्छा बन सकता है. दूसरी जाति और दूसरे धर्म में शादी करने को कुछ लोग गलत मानते हैं और कई जगहों पर यह वर्जित भी समझा जाता है. किसी दूसरे धर्म को मानने वाले से प्यार करने या ऐसे किसी शख्स से शादी करने की कोशिश पर कई बार गलत वारदातें हुई हैं, जो किसी से छिपी नहीं हैं जब परिवार वालों ने प्रेमी जोड़े पर हमला किया या उन की हत्या कर दी, जो कि गलत है.

संस्कार होते हैं गलत

मनोवैज्ञानिक राशिदा कपाडिया कहती हैं कि इंटरकास्ट मैरिज हमेशा ही अच्छा होता है क्योंकि इस से उन के बच्चे अलग परिवेश, उन के खानपान, रहनसहन और तौरतरीकों को जान पाते है, उन्हें सैलिब्रेट कर पाते हैं. जब कोई दूसरे देश या प्रदेश से पत्नी लाता हो, फिर चाहे वह भाई हो या बेटा, तो परिवार के सभी का रवैया उस लड़की के प्रति सही नहीं होता. दरअसल, बचपन से मां, दादी और नानी ने अपने बेटों का ऐसे पालनपोषण करती हैं कि वे किसी दूसरी जाति या धर्म की पत्नी घर में न लाएं, क्योंकि वह यहां एडजस्ट नहीं कर सकती. ऐसी उन की सोच होती है.

न बने जजमैंटल

मनोवैज्ञानिक राशिदा कहती आगे हैं, “मेरी मां मुंबई में सालों से रहते हुए मुझे हमेशा सतर्क करती रहती हैं कि मेरा कोई भी बेटा कैथोलिक बहू घर न ले कर आए क्योंकि उन्हें खाना बनाना नहीं आता और वे बाहर से खाना मंगा कर खाते हैं. यह एक छोटी सी बात है, लेकिन उन्हें समझाना मुश्किल होता है और धीरेधीरे यही बातें बड़ा रूप ले लेती हैं और फिर घर में कलह शुरु हो जाती है. यह एक तरह की मानसिकता और सोच हो जाती है कि अलग धर्म, जाति से आने वाली के संस्कार या मूल्य अच्छे नहीं होंगे. वह अच्छी बहू साबित नहीं होगी. वह पेरैंट्स का सम्मान नहीं करेगी और स्वाधीन खयाल की होगी. हमारे परिवार के लोग जजमैंटल बन जाते हैं और वे बिना सोचे ही कुछ भी कहने लगते हैं, ऐसी सोच की वजह से किसी दूसरे जाति, रंग या धर्म की लड़की को स्वीकारना मुश्किल होता है.

इस के लिए टौलरैंस का स्वभाव में लाना जरूरी है. पहले से किसी बात को जज नहीं करना चाहिए.”

अपने अनुभव के बारे में राशिदा कहती हैं कि उस के घर की ही एक लड़की को जैन लड़के से प्यार हुआ और यह पिछले 30 साल पहले की बात है. तब किसी परिवार को भी यह मानना संभव नहीं था कि एक बोरी मुसलिम लड़की, जैन परिवार में जाए. लड़के वाले भी इसे मान नहीं रहे थे कि उन के घर में एक मुसलिम लड़की ब्याह कर आए. लेकिन तब लव बहुत स्ट्रौंग था. दोनों ने कह दिया था कि उन्हें शादी करनी है, नहीं तो वे कहीं दूसरी जगह शादी नहीं करेंगे. अंत में परिवारों को मानना पड़ा. दोनों रीतिरिवाजों को मानते हुए शादी हुई. आज लड़की भी उस माहौल में रम गई है और 2 बेटो की मां है.

व्यक्तित्व बदलने की न करें कोशिश

राशिदा आगे कहती हैं कि इस में यह जरूरी होता है कि जो लड़की जैसी है, उसे उसी रूप में स्वीकार करें, उसे बदलने की कोशिश परिवार वाले कभी न करें, क्योंकि किसी की आइडैंटिटी को बदलना ठीक नहीं है और इस की कोशिश में दोनों परिवार के रिश्ते और पतिपत्नी के रिश्तों में खटास आती है. हर इंसान का व्यक्तित्व अच्छा होता है, उस की अच्छाइयों का परिवार को सम्मान करना जरूरी है. देखा जाए तो कोई भी लड़की शादी के बाद सब अपना छोड़ कर किसी के घर आती है, जो अकेली होती है. इसलिए उसे जितना भी अच्छा माहौल मिलेगा, सामंजस्य उतना ही अच्छा होगा. किसी भी नए परिवेश में आने वाली लड़की अपनी सुरक्षा, सम्मान और आज़ादी की हकदार होती है. अगर उसे वह न मिले, तो रिश्ते बिगड़ जाते हैं. आज की हर लड़की पढ़ीलिखी और स्वावलंबी है, जिसे किसी गलत माहौल में रहना पसंद नहीं होता. यही वजह है कि आज डिवोर्स के मामले बढ़े हैं. लडकियां आज शादी करने से घबराती हैं, वे शादी करना नहीं चाहतीं. जरूरी है लड़की के तौरतरीके को अपनाया जाए और उस से कुछ नई चीजे सीखें. इस में मज़ा भी आता है और इस में किसी प्रकार की कोई गलती भी नहीं होती. इसे सभी परिवार और समाज को अपनाने की जरूरत है.

इंटरकास्ट मैरिज के फायदे

• दोनों के थौट्स और प्रोसैस लिमिट नहीं होते. दोनों अपने उद्देश्य को पूरा करने या संस्कृति को बनाए रखने में एकदूसरे का साथ देते हैं.
• नई चीजों को सीखने का एकदूसरे में लगातार प्रयास रहता है, जिस से उन का भविष्य अच्छा बन जाता है.
• एक सर्वे के अनुसार इंटरकास्ट मैरिज से उत्पन्न हुए बच्चे स्मार्ट और तंदुरुस्त होते है, क्योंकि उन के जींस अलग होते हैं.
• पेरैंटिंग अच्छे तरीके से होती है, क्योंकि अलग समुदाय के होने की वजह से उन की सोच और मानसिकता आधुनिक होती है, जिस से उन्हें अपने अनुसार भविष्य को चुनने की आज़ादी होती है.
• अलग कास्ट या धर्म होने की वजह से सामंजस्यता बैठने की इच्छा दोनों पक्षों में होती है.

सीवेज समस्या बढ़ाती है बाढ़ का खतरा

इंग्लैंड के बर्कशायर में स्थित टौप पब्लिक स्कूल ‘ईटोन कालेज’, जिसे वर्ष 1440 में स्थापित किया गया था, को ओवरलोडेड सीवेज के होने और पास के एरिया में बाढ़ आ जाने की वजह से बंद कर देना चौंकाने वाली बात थी, क्योंकि यह लंदन का एक प्रैस्टीजियस स्कूल माना जाता है. यहां से काफी प्रसिद्ध लोगों ने पढ़ाई की है. यूनाइटेड किंगडम के प्रथम प्रधानमंत्री सर रोबर्ट वाल्पोले, बोरिस जौनसन, डेविड कैमरून, प्रिंस विलियम, प्रिंस हैरी आदि जैसी महान हस्तियों ने इसी कालेज से पढ़ाई की है. यहां पर किसी छात्र का पढ़ना अपनेआप में सम्मानित बात होती है. लेकिन इस साल कालेज में सीवेज की व्यवस्था सही न होने और पास के एरिया में अधिक बारिश व थेम्स नदी के पानी में उफान आने की वजह से बाढ़ आ जाने से इसे बंद करना पड़ा है.

बाढ़ से करीब 2,000 प्रौपर्टीज के जलमग्न होने की वजह इंजीनियर्स सीवेज को मानते हैं. यह सही है कि बढ़ती जनसंख्या और काफी अधिक लोगों के एक जगह पर निवास करने से सीवेज की समस्या उत्पन्न होने व बाढ़ आने की आशंका बन जाती है. इस ओर विश्व ही नहीं, भारत को भी ध्यान देने की जरुरत है. पुरानी पद्धति के सीवेज और उन के आकार को आज की नई तकनीकों के जरिए बदलने की जरूरत है. ऐसा न करने से जान, माल और सरकारी संपत्ति की क्षति होने से कोई देश बच नहीं सकता.

परेशान मुंबईकर

मुंबई से इस का एक उदाहरण लिया जा सकता है, जहां हर साल मानसून की तेज बारिश से पूरी मुंबई ठप हो जाती है, जिस का हल आज तक किसी के पास मिलता नजर नहीं आता. मुंबई के लोग सब से अधिक टैक्स भरते हैं, लेकिन मानसून में उन्हें जलभराव से कोई राहत नहीं मिलती. क्या मुंबई का सीवेज इस का मुख्य कारण है, क्या मुंबई की आबादी के आकार के आधार पर जलनिकासी की व्यवस्था में कमी है? ऐसी कई बातों को आज समझने की आवश्यकता है.

सीवरेज प्रणाली की विफलता

ऐसा माना जाता है कि सीवरेज प्रणाली की विफलता ही सब से अधिक बाढ़ का कारण बनती है. जलनिकासी पाइपों में रुकावट या जब सीवरेज सिस्टम में प्रवेश करने वाले सीवेज में पानी की मात्रा को वहन करने की तुलना में पाइप छोटा हो, तो भी जलनिकासी में बाधा आती है. वर्ष 1950 में मुंबई की जनसंख्या 30,88,811 थी. पिछले वर्ष मुंबई में 3,35,044 की वृद्धि हुई है, जो 1.6 फीसदी वार्षिक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है. यहां की सीवेज और सीवरेज की व्यवस्था सालों पुरानी है, जिस में शहर के गंदे पानी को ट्रीट कर समुद्र में पाइपलाइन के सहारे छोड़ा जाता है.

सीवेज और सीवरेज में अंतर है क्या ?

यह जानना जरूरी है कि सीवेज और सीवेरेज में अंतर क्या है. सीवेज वह मानव अपशिष्ट है जो आप के घर से निकल कर सीवरों में बह जाता है. इस के विपरीत, सीवरेज या सीवर वह संरचना है जिस के माध्यम से अपशिष्ट बहता है. इस में आमतौर पर वे पाइप और नालियां शामिल होती हैं जिन में सीवेज बहता है, कसबों और शहरों में रास्ते के नीचे सीवर व्यवस्था बनाई जाती है जो मुख्य सीवर से जुड़ती है, जो फिर कचरे को बहा देती है.

बढ़ती आबादी है समस्या

मुंबई की 12 मिलियन आबादी के साथ प्रतिदिन 2,700-3,000 मिलियन लिटर सीवेज उत्पन्न होता है, जिस के लिए सामूहिक रूप से 8 सीवेज उपचार यंत्र यानी एसटीपी निजी परिसरों और हाउसिंग सोसाइटीज में केंद्रित हैं जहां इसे ट्रीट कर उपचारित सीवेज को निकटवर्ती जलाशय या अरब सागर में छोड़ दिया जाता है. आज की बढ़ती जनसंख्या के मद्देनजर इन की संख्या काफी कम है. ये एसटीपी शुष्क मौसम में 1,226 एमएलडी सीवेज का उपचार करते हैं, जबकि मानसून में बढ़ कर इन की मात्रा 2,584 हो जाती है, जो अधिक वर्षा के जल के सीवेज में मिश्रित होने की वजह से होता है. ऐसे में बाढ़ का आना स्वाभाविक हो जाता है.

अधिक पानी बढ़ाता है मुश्किलें

मुंबई हर साल मानसून में बाढ़ के पानी से लबालब हो जाती है. 6 घंटे की मूसलाधार बारिश से मुंबई का जनजीवन अस्तव्यस्त हो जाता है. ऐसे में अगर हाई टाइड की संभावना हो, तो जलनिकासी की संभावना और भी कम हो जाती है. बाढ़ को रोकने के लिए मुंबई की बीएमसी पंपों का उपयोग कर के अतिरिक्त वर्षाजल को पाइपलाइन नैटवर्क के माध्यम से संग्रह क्षेत्र से टैंकों तक ले जाती है, लेकिन हाई टाइड के समय इस से यह करना मुश्किल होता है. संग्रहीत पानी को वापस पाइपलाइन में पंप कर तूफानी जल को नालियों के माध्यम से समुद्र में छोड़ दिया जाता है. लेकिन बढ़ती आबादी और बढ़ते वाहनों की वजह से हर साल बाढ़ की मात्रा में बढ़ोतरी होती जा रही है, जो चिंता का विषय है.

नई तकनीकों का इस्तेमाल जरूरी

मुंबई में मानसूनी बारिश के वक्त बाढ़ का खतरा केवल जलवायु परिवर्तन कि वजह से नहीं, बल्कि सही तरीके से जलनिकासी के न होने के चलते बना रहता है. विश्व बैंक के अनुसार, मुंबई में बारबार आने वाली बाढ़ का एक प्रमुख कारण अनियोजित जलनिकासी व्यवस्था और अनौपचारिक रूप से लोगों का जहांतहां बस जाना भी है. इसे आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर कम करने की आवश्यकता है. मुंबई 7 प्रायद्वीपों को जोड़ कर बनाया हुआ शहर है. पिछले कुछ दशकों में इस नगर में जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई, लेकिन अपशिष्ट प्रबंधन और जलनिकासी की व्यवस्था ठीक नहीं की गई. इन क्षेत्रों से वर्षा का पानी भारी मात्रा में निचले शहरी क्षेत्रों की ओर बहता है, जिन में कुछ मलिन बस्तियां और ऊंची इमारतें शामिल हैं.

परिणामस्वरूप, झुग्गियां या तो पानी में बह जाती हैं, या ढह जाती हैं, जिस से भारी क्षति होती है, और बाढ़ के बाद जलजमाव लंबे समय तक रहता है, जिस से रेलवे लाइनों में रुकावट आती है, यातायात जाम हो जाता है, बाढ़ आ जाती है. मुंबई में बाढ़ को कम करने की प्रक्रिया में महाराष्ट्र सरकार ने बाढ़ शमन योजना अपनाई, जिस के अनुसार जलनिकासी व्यवस्था का पुनर्गठन, मीठी नदी का जीर्णोद्धार और अनौपचारिक बस्तियों की पुनर्स्थापना किया जाना है, हालांकि इन पर किए गए काम फिलहाल नगण्य हैं.

डूबेंगे तटीय क्षेत्र

उधर, ‘नैविगेटिंग द फ्यूचर औफ एशियन कोस्टल सिटीज’ के विशेषज्ञों ने समुद्र के बढ़ते स्तर से निबटने के लिए मुंबई जैसे तटीय शहरों को पर्याप्त कदम उठाने की आवश्यकता के बारे में बात की है और कहा है कि क्लाइमेट चेंज की वजह से आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ का पिघलना जारी है, जिस से समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ता जा रहा है. ऐसे में कोई ठोस कदम न उठाने पर मुंबई के अधिकांश तटीय क्षेत्र डूब सकते हैं, साथ ही, मानसून में बाढ़ की समस्या अधिक बढ़ सकती है.

एसडीएम पत्नी की हत्या : कहीं मुश्किल तलाक प्रक्रिया तो जिम्मेदार नहीं

हत्या करने की मंशा और तरीका दोनों पर 80-90 के दशक के जासूसी उपन्यासों की छाप साफ़साफ़ दिख रही है. मनीष शर्मा अपनी पत्नी निशा नापित को ले कर अस्पताल पहुंचा था और डाक्टरों को उस ने बताया यह था कि निशा का पिछले दिन शनिवार का व्रत था. उन्होंने अमरूद खाया था जिस से उन की तबीयत बिगड़ गई. उन्होंने सीने में दर्द उठने की शिकायत की थी. उन्हें उलटियां भी हुई थीं और नाक से खून भी निकला था.

डाक्टरों ने शक होने पर पुलिस को खबर दे कर निशा का इलाज शुरू किया. लेकिन निशा तो कोई 4-5 घंटे पहले ही मर चुकी थी. यह वाकेआ 28 जनवरी का मध्यप्रदेश के आदिवासी जिले डिंडोरी की शहपुरा तहसील का है. पिछले साल ही तहसीलदार पद से प्रमोट हुई निशा एसडीएम बनी थीं, इसलिए कसबे में उन्हें हरकोई जानता था. पुलिस आई और उस ने मनीष से पूछताछ की तो वह एक ही कहानी दोहराता रहा. मामला चूंकि संदिग्ध था, इसलिए निशा के शव का पोस्टमार्टम किया गया तो जल्द ही अंधे कत्ल के तथाकथित रहस्य से परदा उठ गया.

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर की रहने वाली निशा और ग्वालियर के रहने वाले मनीष शर्मा ने लव मैरिज की थी जो कुछ अलग हट कर इन मानों में थी कि निशा नाई जाति की थीं और मनीष ब्राह्मण जाति का था. दोनों की मुलाकात एक मैट्रोमोनियल साइट शादी डौट कौम के जरिए हुई थी. तब मनीष जायदाद की खरीदफरोख्त का काम करता था यानी प्रौपर्टी ब्रोकर था. इस के पहले वह बस कंडक्टरी कर चुका था. और तो और, उस की एक शादी 2018 में हो चुकी थी लेकिन 6 महीने बाद तलाक भी हो गया था.

निशा की जानकारी में मनीष का यह अतीत था या नहीं, इस का खुलासा जब होगा तब होगा लेकिन दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर लिया और अक्तूबर 2020 में मंडला के गायत्री मंदिर में शादी कर ली. शादी लगभग गुपचुप हुई थी क्योंकि निशा ने अपने घर वालों को अपनी जिंदगी के इस अहम फैसले के बारे में नहीं बताया था. तय है इसलिए कि वे राजी न होते और विरोध करते.

मनीष बेरोजगार था, इस से पुलिस का शक और बढ़ा. इसलिए जब उस ने सख्ती की तो मनीष ने अपना गुनाह स्वीकार कर लिया कि उस ने ही निशा की हत्या की थी. उस की वजह यह थी कि बारबार कहने के बाद भी निशा सरकारी दस्तावेजों, मसलन सर्विस बुक, बैंक अकाउंट्स और इंश्योरैंस वगैरह में उसे अपना नौमिनी नहीं बना रही थी. इस बात पर दोनों में आएदिन कहासुनी और झगड़ा भी हुआ करता था जो 28 जनवरी को भी हुआ तो मनीष ने तकिए से मुंह दबा कर पत्नी का नामोनिशान मिटा दिया.

हत्या के बाद सुबूत मिटाने की गरज से उस ने निशा के खून से सने कपड़े वाशिंग मशीन में धोए और अपने बचाव के लिए जो कहानी गढ़ी उस के चिथड़े भी जासूसी उपन्यासों की तरह उड़ गए. बाद में निशा की बड़ी बहन नीलिमा नापित ने पुलिस को बताया कि शादी के तीसरे दिन से ही मनीष निशा को पैसों के लिए प्रताड़ित करने लगा था. उस के कई दूसरी महिलाओं से भी अफेयर थे. पति की इन हरकतों से हैरानपरेशान निशा ने नीलिमा के बेटे स्वप्निल को सरकारी दस्तावेजों में अपना नौमिनी बना दिया था. इस से मनीष झल्लाया रहता था क्योंकि आमतौर पर तमाम रिकौर्डों में जीवनसाथी ही नौमिनी बनाया जाता है.

क्या है लोचा ?

शादी के चंद दिनों बाद ही निशा को समझ आ गया था कि अकसर घर से गायब रहने वाले मनीष ने उस के रुतबेदार ओहदे, पगार और पैसों से शादी की है. आएदिन वह निशा से पैसे मांगता रहता था. एक बार तो धंधे-रोजगार के लिए निशा ने बैंक लोन ले कर भी उसे 5 लाख रुपए दिए थे. मनीष शराब भी पीता था और आवारा, मनचले भंवरों की तरह तितलियों पर मंडराना भी उस की फितरत थी. जाहिर है, प्यार का भूत निशा के सिर से उतर चुका था. जाहिर यह भी है कि वह जल्दबाजी में लिए अपने इस यानी शादी के फैसले पर पछताई भी होगी. लेकिन उस की हालत पर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत वाली कहावत भी लागू हो रही थी.

मनीष जैसे अर्धबेरोजगार युवकों की समाज में कमी नहीं जो कमाऊ लड़की ढूंढ़ते हैं, जिस से मुफ्त में ऐशोआराम की जिंदगी जी जाए. दूसरी तरफ निशा जैसी युवतियों की भी भरमार है जो प्रतिभावाशाली होती हैं और महत्त्वाकांक्षी भी लेकिन बात जब जीवनसाथी चुनने की आती है तो मनीष जैसे युवकों के झांसे में आ कर बहुत दूर तक कि नहीं सोच पातीं और छली जाती हैं. 50 की उम्र पार कर चुकी निशा ने शादी 46 की होने के बाद की थी.

अपने होने वाले पति में जो जो खूबियां निशा जैसी महिलाएं चाहती हैं वे मैनर्स (attitude) मनीषों में उन्हें दिखते हैं, मसलन बनसंवर कर रहना, लच्छेदार बातें करना और ऐसे पेश आना मानो वे औरतों की बहुत इज्जत करते हैं. ऐसे लोगों को प्लेबौय और वीमेनाइजर के बीच की किस्म का माना जा सकता है. खुद को मजनू, रांझा और महिवाल साबित करने में ये पीछे नहीं रहते जिस से लड़कियां कुछ ऐसे इंप्रैस होती हैं कि उन्हें फिर आगापीछा कुछ नहीं दिखता.

कैंसर की बीमारी जैसा तलाक

जब हकीकत दिखना शरू होती है तो निशा जैसी महिलाएं तलाक लेने में कतराती हैं. मुमकिन है इसलिए कि वे शादी के अपने फैसले को सही साबित करना चाहती हैं. हालांकि, हर पत्नी की कोशिश यह रहती है कि तलाक की नौबत न आए. निशा अहम पद पर थीं, इसलिए भी तलाक लेने में उन्हें झिझक लग रही होगी. पर जब घर, परिवार और समाज की परवा न करते हुए उन्होंने शादी का फैसला लिया था तो इसी तर्ज पर तलाक का भी ले सकती थीं. एक एसडीएम अगर इतनी हिम्मत न जुटा पाए तो आम महिलाओं से क्या खा कर यह उम्मीद की जा सकती है. एक आवारा, ऐयाश और निकम्मे शख्स से वे बंधी रहीं तो इस की एक वजह तलाक की लंबी क़ानूनी प्रक्रिया भी है जिस की तुलना कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी की पहली स्टेज से की जा सकती है.

कैंसर के इलाज में देरी की तुलना तलाक में देरी से करना इसलिए अहम है कि दोनों में ही हालत बिगड़ती जाती है. पहले मामले में मौत और दूसरे में मौत जैसी जिंदगी ही मिलती है. पहली स्टेज पर ही अगर निदान और इलाज हो जाए तो जिंदगी हाथ में रखी जा सकती है. तलाक के मामले में हर कोई जानता है कि मुकदमा सालोंसाल भी चल सकता है जो बेहद तकलीफदेह हर लिहाज से होता है. तलाक के कानून और उस की प्रक्रिया उबाऊ, जटिल और लंबी होती है.

पतिपत्नी इस से बचने के लिए तनाव और कलहभरी जिंदगी ढोते रहते हैं. उन्हें यह बेहतर इसलिए भी लगता है कि तलाक में सरकारी दखल भी जरूरत से ज्यादा है जबकि जरूरत इस बात की है कि इसे रत्तीभर भी नहीं होना चाहिए. जब पतिपत्नी तलाक के लिए अदालत जाते हैं तो पहली सलाह ही उन्हें काउंसलिंग की दी जाती है जिस के लिए कुटुंब न्यायालय, परिवार परामर्श केंद्र, वन स्टौप सौल्यूशन जैसी ढेरों सरकारी और गैरसरकारी एजेंसियां दुकानों की शक्ल में खुली पड़ी हैं. इन का दखल सुलह कम कराता है, पतिपत्नी की कलह को और बढ़ाने वाला ज्यादा होता है.

सोचा जाना बेहद जरूरी है कि अगर सुलह की कोई गुंजाइश होती या बचती तो पतिपत्नी तलाक के लिए अदालत जाते ही क्यों. वैसे भी, आजकल के पतिपत्नी कोई दूध पीते नासमझ बच्चे नहीं होते जिन्हें सलाह के लिए किसी ज्ञानी-ध्यानी की जरूरत महसूस होती हो. अधिकतर कपल्स आखिरी स्टेज पर ही तलाक की पहल करते हैं.

फिर उन्हें साथ रहने का या वैवाहिक जीवन को बनाए रखने का मशवरा क्यों दिया जाता है. यह बात समझ से परे नहीं रही. वजह, अदालतों से ले कर तमाम एजेंसियां और धर्म व समाज के ठेकेदार भी यही चाहते हैं कि तलाक कम से कम हों जिस से उन की दुकानें चमकती रहें और कोई भी धर्म व संस्कृति पर उंगली न उठाए. हम पश्चिम को कोसते इसी आधार पर हैं कि वहां तलाक ज्यादा होते हैं. ये लोग कितने क्रूर और स्वार्थी हैं जिन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं रहता कि लाखों कपल्स घुटघुट कर जी रहे हैं.

और जो साथ नहीं रह रहे, वे भी अलगअलग मौत रोज मरते हैं. इस की वजह वे खुद कम, तलाक में क़ानूनी खामियां और सरकारी दखल ज्यादा है. यदि शादी की तर्ज पर तलाक भी झट से होने लग जाए तो लाखों लोगों को नई जिंदगी मिलेगी. पतिपत्नी दोनों आजादी से और सुकून से जी सकेंगे. और सब से अहम बात, निशा जैसी कई पत्नियां बेवक्त मरने से बच जाएंगी. निशा ने ऐसा नहीं की कोशिश न की हो, वह परेशानी के दौर में मंडला के एसपी से मिली थी लेकिन उन्होंने भी उसे समझाबुझा कर भेज दिया कि कोशिश करो कि इस की नौबत न आए, तलाक तो आखिरी विकल्प है ही. हम में से हर किसी को शादी को सात जन्मों का बंधन नहीं बल्कि एक ऐसा अनुबंध जिसे दोनों में से कोई भी पक्ष कभी भी तोड़ने का अधिकार रखता है, यह मानने की समझ विकसित करनी होगी.

जबकि, तलाक कलह, अनबन, घुटन वगैरह की स्थिति में पहला विकल्प होना चाहिए.

काश, आप ने ऐसा न किया होता: भाग 1

‘‘भैया, वह आप के साथ इतनी बदतमीजी से बात कर रहा था…क्या आप को बुरा नहीं लगा? आप इतना सब सह कैसे जाते हैं. औकात क्या है उस की? न पढ़ाईलिखाई न हाथ में कोई काम करने का हुनर. मांबाप की बिगड़ी औलाद…और क्या है वह?’’

‘‘तुम मानते हो न कि वह कुछ नहीं है.’’

भैया के प्रश्न पर चुप हो गया मैं. भैया उस की गाड़ी के नीचे आतेआते बड़ी मुश्किल से बचे थे. क्षमा मांगना तो दूर की बात बाहर निकल कर इतनी बकवास कर गया था. न उस ने भैया की उम्र का खयाल किया था और न ही यह सोचा था कि उस की वजह से भैया को कोई चोट आ जाती.

‘‘ऐसा इनसान जो किसी लायक ही नहीं है वह जो पहले से ही बेचारा है. अपने परिवार के अनुचित लाड़प्यार का मारा, ओछे और गंदे संस्कारों का मारा, जिस का भविष्य अंधे कुएं के सिवा कुछ नहीं, उस बदनसीब पर मैं क्यों अपना गुस्सा अपनी कीमती ऊर्जा जाया करूं? अपने व्यवहार से उस ने अपने चरित्र का ही प्रदर्शन किया है, जाने दो न उसे.’’

अपनी किताबें संभालतेसंभालते सहसा रुक गए भैया, ‘‘लगता है ऐनक टूट गई है. आज इसे भी ठीक कराना पड़ेगा.’’

‘‘चलो, अच्छा हुआ, सस्ते में छूट गया मैं,’’ सोम भैया बोले, ‘‘मेरी ही टांग टूट जाती तो 3 हफ्ते बिस्तर पर लेटना पड़ता. मु?ा पर आई मुसीबत मेरी ऐनक ने अपने सिर पर ले ली.’’

‘‘मैं जा कर उस के पिता से बात करूंगा.’’

‘‘कोई जरूरत नहीं किसी से कुछ भी बात करने की. बौबी की जो चाल है वही उस की सब से बड़ी सजा बन जाने वाली है. जो लोग जीवन में बहुत तेज चलना चाहते हैं वे हर जगह जल्दी ही पहुंचते हैं…उस पार भी.’’

कैसे विचित्र हैं सोम भैया. जबजब इन से मिलता हूं, लगता है किसी नए ही इनसान से मिल रहा हूं. सोचने का कोई और तरीका भी हो सकता है यह सोच मैं हैरान हो जाता हूं.

‘‘अपना मानसम्मान क्या कोई माने नहीं रखता, भैया?’’

‘‘रखता है, क्यों नहीं रखता लेकिन सोचना यह है कि अपने मानसम्मान को हम इतना सस्ता भी क्यों मान लें कि वह हर आम आदमी के पैर की जूती के नीचे आने लगे. मैं उस की गाड़ी के नीचे आ जाता, आया तो नहीं न. जो नहीं हुआ उस का उपकार मान क्या हम प्रकृति का धन्यवाद न करें?’’

भैया मेरा कंधा थपक कर चले गए और पीछे छोड़ गए ढेर सारा धुआं जिस में मेरा दम घुटने लगा. एक तरह से सच ही तो कह रहे हैं भैया. आखिर मु?ा में ही इतनी दिलचस्पी लेने का क्या कारण हो सकता है.

दोपहर लंच में वह सदा की तरह चहचहाती हुई ही मु?ो मिली. बड़े स्नेह, बड़े अपनत्व से.

‘‘आप भैया से पहली बार कब मिली थीं? सिर्फ सहयोगी ही थे आप या कंपनी का ही माध्यम था?’’

मुसकान लुप्त हो गई थी उस की.

‘‘नहीं, हम सहयोगी कभी नहीं रहे. बस, कंपनी के काम की ही वजह से मिलनाजुलना होता था. क्यों? तुम यह सब क्यों पूछ रहे हो?’’

‘‘नहीं, आप मेरा इतना खयाल जो रखती हैं और फिर भैया का नाम सुनते ही आप की दिलचस्पी मु?ा में बढ़ गई. इसीलिए मैं ने सोचा शायद भैया से आप की गहरी जानपहचान हो. भैया के पास समय ही नहीं होता वरना उन से ही पूछ लेता.’’

‘‘अपनी भाभी को ले कर कभी आओ न हमारे घर. बहुत अच्छा लगेगा मु?ो. तुम्हारी भाभी कैसी हैं? क्या वह भी काम करती हैं?’’

तनिक चौंका मैं. भैया से ज्यादा गहरा रिश्ता भी नहीं है और उन की पत्नी में भी दिलचस्पी. क्या वह यह नहीं जानतीं, भैया ने तो शादी ही नहीं की अब तक.

‘‘भाभी बहुत अच्छी हैं. मेरी मां जैसी हैं. बहुत प्यार करती हैं मु?ा से.’’

‘‘खूबसूरत हैं, तुम्हारे भैया तो बहुत खूबसूरत हैं,’’ मुसकराने लगी वह.

‘‘आप के घर आने के लिए मैं भाभी से बात करूंगा. आप अपना पता दे दीजिए.’’

उस ने अपना कार्ड मु?ो थमा दिया. रात वही कार्ड मैं ने भैया के सामने रख दिया. सारी बातें जो सच नहीं थीं और मैं ने उस महिला से कहीं वह भी बता दीं.

‘‘कहां है तुम्हारी भाभी जिस के साथ उस के घर जाने वाले हो?’’

भाभी के नाम पर पहली बार मैं भैया के होंठों पर वह पीड़ा देख पाया जो उस से पहले कभी नहीं देखी थी.

‘‘वह आप में इतनी दिलचस्पी क्यों लेती है भैया? उस ने तो नहीं बताया, आप ही बताइए.’’

‘‘तो चलो, कल मैं ही चलता हूं तुम्हारे साथ…सबकुछ उसी के मुंह से सुन लेना. पता चल जाएगा सब.’’

अगले दिन हम दोनों उस पते पर जा पहुंचे जहां का श्रीमती गोयल ने पता दिया था. भैया को सामने देख उस का सफेद पड़ता चेहरा मु?ो साफसाफ सम?ा गया कि जरूर कहीं कुछ गहरा था बीते हुए कल में.

‘‘कैसी हो शोभा? गिरीश कैसा है? बालबच्चे कैसे हैं?’’

पहली बार उन का नाम जान पाया था. आफिस में तो सब श्रीमती गोयल ही पुकारते हैं. पानी सजा लाई वह टे्र में जिसे पीने से भैया ने मना कर दिया.

‘‘क्या तुम पर मु?ो इतना विश्वास करना चाहिए कि तुम्हारे हाथ का लाया पानी पी सकूं?

‘‘अब क्या मेरे भाई पर भी नजर डाल कुछ और प्रमाणित करना चाहती हो. मेरा खून है यह. अगर मैं ने किसी का बुरा नहीं किया तो मेरा भी बुरा कभी नहीं हो सकता. बस मैं यही पूछने आया हूं कि इस बार मेरे भाई को सलाखों के पीछे पहुंचा कर किसे मदद करने वाली हो?’’

हेयरस्टाइल बनाते समय बालों में बाउंस लाने के लिए क्या करूं ?

सवाल

मेरे सिर पर बहुत कम बाल हैं जो पतले, सौफ्ट व तैलीय हैं. स्वीमिंग के बाद बाल बेजान और रूखे हो जाते हैं. उन्हें स्वस्थ रखने के लिए मुझे क्या करना चाहिए? कृपया यह भी बताएं कि हेयरस्टाइल बनाते समय मुझे बालों में बाउंस लाने के लिए क्या करना चाहिए?

जवाब

स्वीमिंग पूल में पानी को क्लीन रखने के लिए क्लोरीन का इस्तेमाल किया जाता है. इसी कारण बाल रूखे व बेजान हो जाते हैं. ऐसे में जब भी बालों को शैंपू करें, उस के बाद लैंथ पर कंडीशनर जरूर अप्लाई करें. यदि बाल बचपन से ही पतले हैं, तो कुछ कर पाना मुश्किल है.

वैसे चाहें तो ये घरेलू उपाय आजमा कर देख सकती हैं. दही में मेथी पाउडर, बालछड़, आंवला व शिकाकाई को भिगो दें. अब इस मिक्सचर में जितना पानी है, उतना तेल डाल कर उबाल लें. जब यह लिक्विड आधा रह जाए तब इसे छान कर इस से बालों की मसाज करें. साथ ही प्रोटीनयुक्त आहार लें. इस के अलावा हेयरस्टाइल बनाने से पहले बालों में जैल या मूज अप्लाई करें और फिर सारे बालों को आगे ला कर फ्लैट ब्रश से कौंब करें. फिर पीछे की ओर झटक दें. ऐसा करने से बालों में बाउंस आ जाएगा. स्कैल्प से ऊपर की तरफ उंगलियां फिराने से भी बाल बाउंसी नजर आते हैं.

रहना चाहते हैं स्वस्थ, तो इन 11 काली चीजों को बनाएं अपनी डाइट का हिस्सा

अकसर काले रंग की चीजों को हिकारत से देखा जाता है. इस रंग को गम का प्रतीक भी माना जाता है. किसी लड़की की आबरू लुट जाए तो कहा जाता है कि उस का तो मुंह काला हो गया. काली गाडि़यों में चलने वालों की छवि गुंडेबदमाशों की मानी जाती है. हराम के या दो नंबर के पैसों को काला धन कहा जाता है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि काला रंग महज बुराई या खराबी का ही प्रतीक होता है. यह रंग खूबियों से भी भरपूर होता है. काली पोशाक में सजी गोरी हसीनाएं बिजलियां गिराती नजर आती हैं.

बहरहाल, यहां काले रंग की चीजों का मामला खानेपीने से जुड़ा है. कुदरत के खजाने में मौजूद कई काले रंग की खानेपीने की चीजें लाजवाब खूबियों से भरपूर होती हैं. ये तमाम काले खानेपीने के सामान न सिर्फ खाने  जायका बढ़ाते हैं, बल्कि सेहत के लिहाज से भी बेमिसाल होते हैं. कई बीमारियां दूर करने में भी काली चीजें कमाल की साबित होती हैं.

पेश हैं कुछ ऐसी ही काली चीजों की दास्तां, जो हमारी सेहत के लिए मुफीद हैं :

काले अंगूर

यों तो साधारण हरा अंगूर भी सेहत के लिए मुफीद होता है, मगर काले अंगूर कुछ ज्यादा ही खासीयतों से भरपूर होते हैं. इसी वजह से ये हरे अंगूरों के मुकाबले महंगे भी मिलते हैं. काले अंगूर दिल की बीमारियों के लिहाज से उम्दा होते हैं. ये फेफड़े के कैंसर में भी फायदा पहुंचाते हैं. काला अंगूर अल्जाइमर यानी यादाश्त गड़बड़ होने की बीमारी में भी फायदा पहुंचाता है. इन के सेवन से कोलेस्ट्राल भी सही रहता है. और जहां तक जायके की बात है तो काले अंगूर बेहद स्वादिष्ठ होते हैं.

काले जामुन

ऊंचे पेड़ों में लगने वाला काला जामुन बेहद फायदेमंद फल होता है. इस का खास जायका सभी को पसंद आता है. इस की गुठली बेर की सख्त गुठली के मुकाबले बेहद नरम होती है और अकसर दांतों से कट जाती है. पेट के मरीजों के लिए जामुन बेहद फायदेमंद साबित होता है. जामुन खाने वाले का हाजमा एकदम दुरुस्त हो जाता है. जामुन का सिरका भी बहुत कारगर होता है. स्वाद से भरपूर जामुन काफी महंगे मिलते हैं.

ब्लैकबेरी

यह भी काफी स्वादिष्ठ और महंगा फल होता है. इस में मौजूद विटामिन सी, ए, ई, के और फाइबर शरीर में मेटाबालिज्म का स्तर दुरुस्त रखते हैं. ये विटामिन और फाइबर शरीर का वजन भी काबू में रखते हैं. ब्लैकबेरी टाइप टू डायबिटीज और दिल की बीमारियों से बचाने में मददगार है. इसे खाने से स्तन कैंसर और सर्वाइकल कैंसर का खतरा कम हो जाता है. कुल मिला कर काले रंग की ब्लैकबेरी कमाल की होती है.

कालीमिर्च

काले रंग की गोलगोल नजर आने वाली कालीमिर्च को आकार की वजह से गोलमिर्च भी कहा जाता है. हरी व लाल मिर्ची से एकदम अलग नस्ल की कालीमिर्च गरममसालों की बिरादरी में शामिल होती है. यह खाने का जायका बढ़ाने में कारगर रहती है. यह मैग्नीशियम, विटामिन सी, के और फाइबर वगैरह से भरपूर होती है. इस के इस्तेमाल से गैस, कब्ज, डायरिया, खून की कमी व सांस के रोगों में आराम मिलता है. रोजमर्रा की सब्जियों में इसे नियमित मसाले के तौर पर शामिल किया जाता है. उबले अंडों के साथ भी इस का इस्तेमाल किया जाता है.

काले तिल

यों तो सफेद तिलों का नियमित तौर पर ज्यादा इस्तेमाल होता है. रेवड़ी व गजक जैसी चीजों में आमतौर पर सफेद तिल ही इस्तेमाल किए जाते हैं, मगर काले तिलों की अहमियत बहुत ज्यादा होती है. दिल की बीमारियों, सांस की बीमारियों, कालोन कैंसर, माइगे्रन का दर्द व जलन वगैरह में काले तिलों के इस्तेमाल से बहुत फायदा होता है. तमाम घरों में काले तिल के लड्डू भी बनाए जाते हैं.

काली सेम

बेशक हरी सेम ज्यादा तादाद में बाजार में नजर आती है, मगर उस के मुकाबले काली सेम ज्यादा कारगर होती है. काली सेम में तमाम किस्म के प्रोटीन मौजूद होते हैं और ये प्रोटीन डायबिटीज की तकलीफ से बचाते हैं. काली सेम के इस्तेमाल से धमनियां भी दुरुस्त रहती हैं और दिल के रोगों का भी खतरा कम हो जाता है. इस में मौजूद फाइबर सेहत के लिए मुफीद होता है.

काले चावल

बिरयानी या जर्दा खाने के शौकीन बेशक सफेद और लंबे चावलों के कायल होते हैं, पर उम्दा से उम्दा बासमती चावल से भी कहीं ज्यादा गुणी होते हैं काले चावल. काले चावल विटामिन (ई, बी), कैल्शियम और आयरन से भरपूर होते हैं और तमाम बीमारियों से नजात दिलाने में कारगर साबित होते हैं. खासतौर पर कैंसर, अल्जाइमर व डायबिटीज की तकलीफों में काला चावल बेहद फायदेमंद साबित होता है.

काली चाकलेट

चाकलेट आमतौर पर ब्राउन कलर की होती है और गजब की जायकेदार होती है. सफेद चाकलेट का भी अपना निराला जायका होता है. मगर इन दोनों के मुकाबले काली चाकलेट बेहद कमाल की होती है. काली चाकलेट में मौजूद अमीनो एसिड केशों यानी सिर के बालों को चमकीला बनाता है और चेहरे पर झुर्रियां नहीं पड़ने देता. इसे खाने से ब्लड प्रेशर व वजन भी काबू में रहता है.

काली चाय

दूध वाली सफेद या गुलाबी सी चाय तो सभी पीते हैं, मगर काली चाय के गुण बेमिसाल होते हैं. काली चाय में संक्रमण से लड़ने वाले पालीफेनल्स मौजूद होते हैं, जो धमनियों की दीवारों को नुकसान से महफूज रखते हैं. काली चाय का सेवन खून के थक्के बनने से रोकता है. इस के इस्तेमाल से पेट व स्तन के कैंसर में आराम मिलता है.

काला सिरका

काला सिरका ज्वार, गेहूं व भूरे चावलों को मिला कर तैयार किया जाता है. यह आमतौर पर प्रचलित सिरके के मुकाबले बहुत ज्यादा कारगर होता है. इस के इस्तेमाल से कोलेस्ट्राल व हाइपरटेंशन काबू में रहता है. काले सिरके के इस्तेमाल से शरीर में खून का संचार भी ठीक रहता है.

काला जैतून

यह भी बेहद कारगर होता है. पुराने चीन में काले जैतून का इस्तेमाल खांसी के इलाज के लिए किया जाता था. अभी भी दुनिया भर में इस का औषधीय इस्तेमाल किया जाता है. यह कोलेस्ट्राल सही रखता है और दिल के रोगों में कारगर साबित होता है. इस का इस्तेमाल कांटीनेंटल पकवानों में भी किया जाता है. यह काफी महंगा होता है.

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