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स्वाद में कड़वा लेकिन गुणों की खान है करेला, जानें इसे खाने के ढेरों फायदे

अकसर घरों में माएं-दादियां करेले के गुणों का बखान करती मिलती हैं. कई बुजुर्गों को आपने करेले का जूस मजे से पीते देखा होगा मगर करेले का नाम सुनते ही युवाओं के मुंह का जायका बिगड़ जाता है. बच्चे तो उसके नाम से ही नाक-भौं चढ़ा लेते हैं. करेले की कड़ुवाहट झेलना सबके बस की बात नहीं है. करेला भले ही एक कड़ुवी सब्जी हो, लेकिन इसमें कई गुण होते हैं. यह खून तो साफ करता ही है, साथ ही डायबीटीज के रोगियों के लिए यह बेहद फायदेमंद है. करेला डायबीटीज में अमृत की तरह काम करता है. इससे खून में शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है. दमा और पेट के रोगियों के लिए भी यह लाभदायक है. इसमें फौस्फोरस पर्याप्त मात्रा में होता है जो कफ की शिकायत को दूर करता है.

करेले का इस्तेमाल एक नेचरल स्टेरौयड के रूप में किया जाता है क्योंकि इसमें केरेटिन नामक रसायन होता है. जो खून में शुगर का स्तर नियंत्रित रखता है. करेले में मौजूद ओलिओनिक ऐसिड ग्लूकोसाइड, शुगर को खून में न घुलने देने की क्षमता रखता है.

करेला जितना शुगर के स्तर को संतुलित करता है, शरीर को उतने ही पोषक तत्व मिलते हैं. इसके अलावा करेले में तांबा, विटमिन बी, अनसैचुरेटेड फैटी ऐसिड जैसे तत्व हैं. इनसे खून साफ रहता है और किडनी व लिवर भी स्वस्थ रहता है.

करेला खाने के फायदे

– कफ के मरीजों के लिए करेला बहुत फायदेमंद होता है.

– दमा होने पर बिना मसाले की सब्जी लाभदायक होती है.

– पेट में गैस की समस्या या अपच होने पर करेला राहत देता है.

– लकवे के मरीजों को कच्चा करेला खाने से फायदा होता है.

– उल्दी, दस्त या हैजा होने पर करेले के रस में पानी और काला नमक डालकर सेवन करने पर तुरंत फायदा होता है.

– पीलिया के रोग में भी करेला लाभकारी है. रोगियों को इसका रस पीना चाहिए.

– करेले के रस का लेप लगाने से सिरदर्द दूर होता है.

– गठिया रोगियों के लिए करेला फायदेमंद होता है.

– मुंह में छाले पड़ने पर करेले के रस का कुल्ला करने से राहत मिलती है.

भोर- राजवी को कैसे हुआ अपनी गलती का एहसास?

Story in Hindi

जिंदगी न मिलेगी दोबारा: भाग 2

एक दिन अनुज के एक मित्र ने अनाथाश्रम से बच्चा गोद लेने की बात कही जो हम दोनों को भी बहुत जंची पर जब हम ने मांजी के सामने इस बात की चर्चा की तो वे बिफर पड़ीं, “किस का बच्चा, कहां का बच्चा, किस का पाप होगा अनाथाश्रम का बच्चा… मेरे जीतेजी तो यह मुमकिन नहीं. पोते की चाह में तेरे पापा तो पहले ही चल बसे और अब मुझे यह किसी का पाप अपने घर में लाना कतई मंजूर नहीं…” कहतेकहते मांजी ने रोनापीटना शुरू कर दिया था.

कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें क्योंकि मेरा और अनुज का मानना था कि भले ही आज सेरोगेसी और आईवीएफ जैसे विकल्प बच्चे के जन्म के लिए मौजूद हैं पर किसी भी बेघर और बिना मातापिता के बच्चे को घर और मातापिता मिलना भी उस का बुनियादी हक है और जब हम यह काम करने में सक्षम हैं तो क्यों न करें.

इसी बीच एक दिन अनुज की बड़ी बहन ख्याति का आना हुआ. ख्याति दीदी और उन के पति एक कालेज में प्रोफैसर थे. दोनों ही बेहद सुलझे विचारधारा के हैं. उन के सुलझे व्यक्तित्व के कारण ही मेरी उन से बहुत पटती थी. मैं फोन पर भी उन से ऐडोप्शन के बारे में चर्चा कर चुकी थी और मां को मनाने का दायित्व भी उन्हें सौंप दिया था. दीदी और जीजा की लाख कोशिशों के बाद मांजी बच्चा गोद लेने को तैयार तो हो गईं पर शर्त थी कि अनाथाश्रम से गोद बेटा ही लेना होगा ताकि वंश चलता रहे.

एक दिन औपचारिक खानापूर्ति के बाद हम एक अनाथाश्रम से 1 माह के शोभित को घर ले आए थे. शोभित का आना मानों घर में खुशियों की सौगात आने जैसा था. मांजी के ताने अब हंसी के ठहाके और शोभित की प्यारीप्यारी हरकतों की नकल उतारने में बदल गए थे. ससुरजी के जाने के बाद अनेक बीमारियों से घिरी रहने वाली मम्मीजी की सारी बीमारियां अब उड़नछू हो गई थीं.

जीवन अपनी गति से चल रहा था और 12वीं के बाद शोभित का सिलैक्शन आईआईटी, कानपुर में हो गया और वहीं से उस का बैंगलुरु की एक मल्टीनैशनल कंपनी में प्लैसमेंट हो गया. हमारी तो खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था.

ऐसा लग रहा था मानों कुदरत ने हमें संसार का सारा सुख ही उपहार में दे दिया हो. अब हम तीनों ने शोभित की शादी के सपने देखने शुरू कर दिए थे पर वे तो सच होने से पहले ही टूट गए. हमारा जीवन, हमारा सबकुछ, हमारे बुढ़ापे का सहारा शोभित हमें बीच में ही छोड़ कर चला गया था. पर कहते हैं, किसी के जाने से क्या जीवन की गति रुकती है इसलिए हमारी जिंदगी भी बस चल ही रही थी… यह सब सोचतेसोचते कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला. अनुज चाय बना कर ले आए थे. दैनिक जीवन के कार्य निबटा कर हम दोनों ही अपने कर्तव्यस्थल की तरफ रवाना हो गए थे.

स्कूल पहुंची तो काम में ऐसे उलझी कि शाम का ही पता नहीं चला. रात को डिनर के समय अनुज ने अगले दिन अपनी मौसीजी के आने की सूचना दी. अनुज की एक ही मौसी हैं जो इतने वर्षों बाद हमारे यहां आ रही थीं इसलिए हमें भी बड़ा उत्साह था. मौसी के आने से मां को कंपनी मिल गई थी और वे बड़ी खुश भी थीं. आज संडे था इसलिए मैं ने मौसीजी की पसंद की आलू की कचौरियां बनाई थीं.

ब्रेकफास्ट करते समय डाइनिंग टेबल पर मौसीजी अपने इकलौते बेटे विनय के बारे में चर्चा करते हुए अनुज से बोलीं,”अनु, देख रूपएपैसे की तो तुझे कोई कमी है नहीं. रिटायरमैंट पर भी तुम दोनों को काफी धनराशी मिलेगी ही. तुम तो 2 ही जने हो. खर्चे ही क्या हैं. तू तो जानता ही है तेरा भाई विनय कब से अपना धंधा शुरू करना चाह रहा है पर हमेशा पैसों की कमी पड़ जाती है. इस बार मैं आ रही थी तो उस ने तुम से बात करने को कहा था. देख लो बेटा, हो सके तो अपने भाई की कुछ मदद कर देना.”

अनुज ऐसे अवसरों पर आमतौर पर चुप ही रहते हैं ताकि बड़ों का मान बना रहे. हमारी चुप्पी से शायद मौसीजी समझ गई थीं कि हम कोई मदद नहीं कर पाएंगे. हां, दूसरे दिन एकांत पाते ही मांजी जरूर बोलीं,
‘’देख लो तुम लोग… हो सके तो कुछ कर दो. अपना तो कोई है नहीं आगेपीछे, हारीबीमारी, आफत मुसीबत में ये ही लोग काम आएंगे.”

‘’नहीं मां, यह संभव नहीं है. अपनी खूनपसीने की कमाई हम यों ही जाया नहीं करेंगे. हम ने भी मेहनत की है, वह भी मेहनत करे…आज की दुनिया में मेहनत से क्या संभव नहीं है. आगेपीछे कोई नहीं है का क्या मतलब है? हम 2 तो हैं और बुढ़ापे में किसी पर आश्रित भी नहीं रहना चाहते. बुढ़ापे में इंसान के 2 ही सहारे होते हैं उत्तम स्वास्थ्य और उस का अपना पैसा,” स्पष्टवादी अनुज चाह कर भी इस बार खुद को नहीं रोक पाए थे.

बिहार में पावर ट्रांसफर तो हो गया लेकिन वोट ट्रांसफर भी होगा क्या

बिहार तो बिहार, बिहार के बाहर के लोग भी, जो वहां की सियासत का मिजाज नहीं समझते, हैरान हैं कि आखिर यह ड्रामा है क्या और इस से नीतीश कुमार व भाजपा को हासिल क्या होगा. राजनीतिक पंडित जरूर नीतीश कुमार की पाला बदलने की लत में अब इंडिया गठबंधन का फायदा देखने लगे हैं क्योंकि इस बार की पलटी से नीतीश कुमार की इमेज जनता के बीच एक ऐसे नेता की बन चुकी है जो उस के वोट और समर्थन यानी जनादेश का बेजा इस्तेमाल करने में कोई लिहाज नहीं करता बल्कि सिर्फ अपनी खुदगर्जी देखता है.

सत्ता हस्तांतरित करना संवैधानिक तौर पर कितना आसान होता है, यह 28 जनवरी को देशभर के लोगों ने बिहार में देखा जिस का जिम्मेदार लोग नीतीश कुमार को ही ज्यादा मान रहे हैं, जिन की इमेज कल तक एक धीरगंभीर और वजनदार नेता की हुआ करती थी और जिन्हें वाकई लोहिया और जेपी की विचारधारा के उत्तराधिकारियों में से एक माना जाता था. भले ही उन की विचारधारा पूरी तरह अमल में न लाई जाए लेकिन उसूल, बातों और भाषणों में ही वह विचारधारा हो तो जनता नेता से बहुत ज्यादा नाराज नहीं होती. मगर इस बार कितने हलके में नीतीश कुमार को लिया जा रहा है उस की बानगी सोशल मीडिया पर उन की खिल्ली उड़ाती वायरल होती पोस्टों में से एक यह है-

यह मामला तीन तलाक का ज्यादा लग रहा है. भाजपा हर बार नीतीश को तीन तलाक देती है तो वे हलाला कराने लालू के पास चले जाते हैं और हलाला करा कर वापस भाजपा के पास लौट जाते हैं. एक और पोस्ट में कहा गया है, चच्चा इंजीनियर हैं और इंजीनियर हमेशा पैकेज देखता है.

ऐसी पोस्टों के अपने अलग माने होते हैं जिन में गुस्सा, भड़ास, कुंठा और खिल्ली सब होते हैं. इसे महज व्यंग्य या हासपरिहास कहते नजरअंज नहीं किया जा सकता. अब देखें नीतीश के व्यक्तित्व और राजनीति का दूसरा पहलू जिस के तहत चंद महीनों पहले ही वे भाजपा को केंद्रीय सत्ता से हटाने के लिए तमाम उन विपक्षी दलों को एक छत के नीचे लाने का गंभीर प्रयास कर रहे थे जो भगवा गैंग के हिंदुत्व से इत्तफाक नहीं रखते और उसे देश की एकता व अखंडता के लिए खतरा मानते हैं. अब उसी गठबंधन को टाटा कहते नीतीश भगवा गैंग से फिर जा मिले हैं. उन की हैसियत इस में क्या होगी, सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां भी उन्हें प्रधानमंत्री बनाने को कोई तैयार नहीं. यह सीट तो नरेंद्र मोदी के नाम रिजर्व है. गठबंधन में तो फिर भी उन की संभावनाएं ममता बनर्जी या मल्लिकार्जुन खड़गे से कम न थीं.

वोटों का बहीखाता

ऐसा मान लिया गया है कि नीतीश कुमार अपना वोटबैंक शिफ्ट कराने में माहिर हैं. लेकिन वे भी अकेले अपने दम पर बहुमत और सत्ता हासिल नहीं कर पाते. इसलिए कभी महागठबंधन का आंचल पकड़ लेते हैं तो कभी भाजपा का दामन थाम लेते हैं और इस के लिए उन की कोई हद नहीं है. अब तक 6 बार वे पाला बदल चुके हैं. इसीलिए लोग उन्हें पलटूराम वगैरह के ख़िताब से नवाजने लगे हैं. वोटों का बहीखाता खोलने से पहले यह दोहरा लेना जरूरी है कि 15 दिनों पहले तक ही भाजपा नीतीश को और नीतीश भाजपा को पानी पीपी कर कोस रहे थे. अब राजद नीतीश को कोस रहा है और नीतीश राजद यानी लालू यादव पर परिवारवाद का आरोप लगा रहे हैं. यानी, बिहार में मौका देख दोस्ती और दुश्मनी की जाती है. इस में जनता का कितना और कैसा नुकसान होता है, यह कोई नहीं देखता .

इस बार की पलटी में सिर पर खड़े लोकसभा चुनाव बड़ा फैक्टर माने जा रहे हैं. 2014 के चुनाव में भाजपा, जद यू और राजद अलग अलग लड़े थे. जद यू ने 40 में से 38 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे जिन में से महज 2 ही जीत पाए थे. भाजपा को मोदी लहर का फायदा मिला था और उस ने 22 सीटें जीती थीं. राजद 4 सीटों पर सिमट कर रह गई थी. कांग्रेस को 2, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को 3 सीटें मिली थीं. एक सीट एनसीपी के खाते में गई थी. हैरतअंगेज तरीके से रामविलास पासवान की लोजपा 6 सीटों पर जीती थी. यानी, सभी को कुछ न कुछ मिला था. वोट शेयर के हिसाब से देखें तो भाजपा को 29.40, राजद को 20.10, जद यू को 15.80, कांग्रेस को 8.40 फीसदी वोट मिले थे. 6.40 फीसदी वोट लोजपा को और रालोसपा को 3 फीसदी वोट हासिल हुए थे.

2019 के लोकसभा चुनाव में नीतीश ने भाजपा से हाथ मिला लिया था. उस बार वे अकेले दम पर लड़ने की हिम्मत नहीं कर पाए थे. एनडीए का हिस्सा बनने पर उन्हें जबरदस्त फायदा हुआ भी था क्योंकि उस बार जद यू को 16 सीटें, 21.81 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं जबकि भाजपा का वोट शेयर 23.58 फीसदी रह गया था और उसे लगभग 6 फीसदी वोटों और 5 सीटों का नुकसान हुआ था. लोजपा का प्रदर्शन पहले जैसा ही रहा था जिस ने 6 सीटें 7.86 फीसदी वोटों के साथ हासिल कर ली थीं. महागठबंधन ने इस चुनाव में मुंह की खाई थी जिस के हिस्से में कांग्रेस के जरिए सिर्फ एक सीट किशनगंज की आई थी. राजद का तो खाता भी इस चुनाव में नहीं खुल पाया था और उसे कोई 5 फीसदी वोटों का नुकसान भी हुआ था.

2020 के विधानसभा चुनाव में राजद ने शानदार वापसी की जिस के 75 उम्मीदवार 23.11 फीसदी वोटों के साथ जीते थे. कांग्रेस को 19 सीटें 9.48 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं. वामदलों की वापसी हुई जिन्होंने 243 सीटों वाले बिहार में 16 सीटें जीती थीं. एनडीए को 125 सीटों पर सिमटना पड़ा था जो बहुमत से महज 3 ज्यादा थीं. भाजपा को 74 सीटें 19.46 फीसदी वोटों और जद यू को 43 सीटें 19.46 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं. जीतनराम मांझी की हम को 7 और मुकेश साहनी विकासशील इंसान पार्टी को 11 सीटें मिली थीं.

यह था डर

जातिवादी राजनीति के लिए कुख्यात बिहार में इस बार नीतीश का डर यह था कि जद यू का वोट शेयर और सीटें दोनों चुनाव दर चुनाव कम हो रहे थे. उलट इस के, तेजस्वी की धाक राज्य में बढ़ रही थी. नीतीश बूढ़े भी हो चले हैं, लिहाजा, डेढ़ साल पहले उन्होंने फिर लालू यादव से हाथ मिला लिया और तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनाते उन्हें बिहार का अगला मुख्यमंत्री भी पेश कर दिया था.

22 जनवरी को अयोध्या का जलसा बिहार में दूसरे हिंदीभाषी राज्यों सरीखा चमकीला नहीं था. यह भाजपा के लिए चिंता की बात थी. इधर इंडिया गठबंधन भी नीतीश की हैसियत और घटते जनाधार के चलते उन्हें बतौर प्रधानमंत्री पेश करने का जोखिम नहीं उठा पा रहा था. यह नीतीश के अहं और अहंकार को बरदाश्त न हुआ. सो, एक बार फिर उन्होंने पाला बदल लिया. अब वे और भाजपा अब की बार 40 की 40 का नारा जरूर लगा रहे हैं पर जनता उन पर भरोसा करेगी, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. जिस विकास की बातें की जा रही हैं वह दरअसल पैसे वालों का है, मसलन चमचमती सड़कें, रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डे वगैरह. फिर मंदिरों की तो बात करना ही बेकार है.

बिहार की 85 फीसदी आबादी दलित, पिछड़ों, मुसलमानों की है. लालू यादव हिंदुत्व की राजनीति के धुरविरोधी रहे हैं लेकिन नीतीश नहीं रहे. बिहार में दूसरे हिंदीभाषी राज्यों की तरह रामचरितमानस का प्रभाव भी कम है. पिछड़े, दलित और महादलित, जो जद यू, हम और लोजपा सहित किसी भी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बने मोरचे को वोट करते थे, का असमंजस अब दूर हो सकता है क्योंकि लड़ाई अब भाजपा और जदयू बनाम कांग्रेस और राजद है.

इंडिया गठबंधन की बड़ी आस 20 फीसदी मुसलिम और 15 फीसदी यादव वोट हैं. उलट इस के, एनडीए की इकलौती आस 15 फीसदी सवर्ण और 2.85 फीसदी कुर्मी हैं. बाकी 45 फीसदी बराबर बंटे भी तो एनडीए को ज्यादा फायदा इस नई शादी से नहीं होने वाला. पिछले साल जारी जातिगत जनगणना के आंकड़ों से यादव समुदाय आक्रोश में है क्योंकि सरकारी नौकरियों में उस की भागीदारी 1.55 फीसदी ही है जबकि 3.11 फीसदी कुर्मी सरकारी नौकरियों में हैं. समुदायों के लिहाज से देखें तो भी हालात दलित, पिछड़ों और मुसलमानों के हक में भी नहीं हैं. 20 फीसदी दलितों की सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी केवल 1.13 फीसदी ही है. उलट इस के, सामान्य वर्ग के 3.19 फीसदी लोग सरकारी नौकरियों में हैं जबकि उन की आबादी 15 फीसदी ही है. पिछड़े वर्ग की आबादी 27 फीसदी होते हुए भी उस के पास महज 1.75 फीसदी सरकारी नौकरियां हैं.

ऐसे में भाजपा अगर बिहार में जरूरत से ज्यादा राम नाम जपेगी तो बजाय फायदे के, उसे नुकसान ही होगा क्योंकि सामाजिक न्याय के मामले में बिहार के लोग कहीं ज्यादा जागरूक हैं और इस का जिम्मेदार वे भाजपा और धर्म को मानते हैं. जीतनराम मांझी भले ही सियासी तौर पर भाजपा के साथ खड़े हों लेकिन हिंदुत्व के हिमायती या पैरोकार कभी नहीं रहे वे जो खुद को गर्व से बौद्ध कहते हैं. वे रामचरितमानस के बारे में पिछले साल 23 अप्रैल को कह चुके हैं कि इस में कचरा भरा है, इसे मत मानो. इस के एक महीने पहले ही उन्होंने रावण को राम से ज्यादा महान बताया था. बहुत ज्यादा नहीं, 5 दिनों पहले ही उन्होंने एक आयोजन में राम को काल्पनिक बताते याद दिलाया था कि मेरे एक जगजीवन मंदिर में जाने के बाद उसे धुलवाया गया था.

ऐसी बातें बिहार में आएदिन होती रहती हैं फिर चाहे मुंह राजद विधायक और मंत्री रहे चंद्रशेखर यादव का हो या किसी छोटेमोटे दलित नेता का हो . नीतीश कुमार इस पिक्चर में कहीं फिट नहीं बैठते. वे भले ही रामविरोधी न हों लेकिन उस हिंदुत्व के वकील कभी नहीं रहे जिस का विरोध बिहार का वंचित तबका करता रहता है. हालांकि हैरानी नहीं होगी अगर कल को वे भी भाजपा के सुर में सुर मिलाते नजर आएं क्योंकि जिस समाजवादी सिद्धांत और दर्शन की वे, कहने को ही सही, राजनीति करते रहते थे उस का श्राद्ध उन्होंने 28 जनवरी को कर दिया है. तय है, इसलिए पीके यानी प्रशांत किशोर यह कहने लगे हैं कि 2025 के विधानसभा चुनाव में जद यू व भाजपा का गठबंधन नहीं चल पाएगा. जद यू 20 सीटें भी नहीं ले जा पाएगा. इस से भाजपा को नुकसान होगा.लेकिन नीतीश कुमार किसी की परवा नहीं कर रहे हैं जबकि उन के पैरों के नीचे से वोटों की जमीन खिसकती जा रही है. वैसे तो हर कोई उन के बारे में कुछ न कुछ कह ही रहा है लेकिन कांग्रेसी नेता शशि थरूर ने उन के लिए ‘स्नोलीगोस्टर’ शब्द का इस्तेमाल किया है जिस का मतलब होता है, धूर्त, चतुर और सिद्धांतहीन राजनीतिज्ञ.

Mahatma Gandhi: देश को गांधीवाद से ज्यादा संविधानवाद की जरूरत

महात्मा गांधी को उन के सत्याग्रह, सत्य और अहिंसा के लिए याद किया जाता है. आज के दौर में इन चीजों का महत्त्व बचा है, यह देखना बाकी है. पूरे देश के नेता महात्मा गांधी के विचारों का गुणगान कर रहे हैं. ऐसे दक्षिणपंथी लोग जो गांधी से अधिक उन के हत्यारे नाथूराम गोड्से के विचारों को सही मानते हैं, वे भी गांधी का महिमामंडन कर रहे हैं. एक तरह से 30 जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि केवल सरकारी रस्मअदायगी जैसा आयोजन बन कर रह गया है. किसी भी महापुरूष की जब चर्चा हो तो सब से पहले उस के विचारों का पालन हो.

आज की राजनीति में सरकार के खिलाफ धरनाप्रदर्शन करना कठिन ही नहीं नाममुकिन सा हो गया है. राजनीति में धर्म हावी हो गया है. विरोधियों को डरानेधमकाने के लिए सत्ता द्वारा ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स जैसी एजेंसियों का दुरूपयोग किया जा रहा है. ऐसेऐसे कानून बन रहे जो जनता पर शिकंजा कसने में प्रयोग किए जा रहे हैं. लेकिन उन का विरोध तो छोड़िए, आलोचना तक संभव नहीं है. राजनीति में भ्रष्टाचार इस कदर होगा, कभी गांधी ने सोचा भी न होगा.

महात्मा गांधी की जन्मतिथि 2 अक्टूबर को भी ऐसी ही रस्मअदायगी होती है. गांधी के चरखे के साथ फोटो खिंचवाने से गांधी के विचारों को नहीं समझा जा सकता. गांधी को समझने के लिए कस्तूरबा को भी साथ रखना होता है और राजनीतिक वैभव को त्यागना पड़ता है. देश के लिए महात्मा गांधी से कहीं अधिक काम पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया, साथ ही कांग्रेस में भी गांधीवाद को जगह दी. नेहरूवाद राजनीति का विमर्ष नहीं बन सका. गांधी को राजनीति का विमर्ष तो बनाया गया लेकिन उस राह पर चलना कठिन था.

महात्मा गांधी कई बार अपनी ही बातों का खडंन करते नजर आते हैं. एक तरफ वे राजनीति में धर्म के खिलाफ थे, दूसरी तरफ खुद ही रामराज्य की बात करते थे. रामराज्य और धर्म की राजनीति को अलग कर के कैसे देखा जा सकता है. असल में राजनीति में बहुत सारी बातों को यह कह कर स्वीकार कर लिया गया कि यह गांधीवाद है. देश को गांधीवाद की जगह पर संविधानवाद चाहिए था, पर देश के नेताओं ने गांधीवाद को ले कर आगे बढ़ना पंसद किया. अपनी पंसद पर मोहर लगाने के लिए हर साल 2 बार गांधी को याद कर हम यह मान लेते हैं कि गांधी के बताए रास्ते पर चल रहे हैं.

धर्म और राजनीति पर चर्चा करने के क्रम में धर्म को समझना आवश्यक है. धर्म को पूजापाठ मान लिया गया. धर्म की जगह पर कर्म की चर्चा होनी चाहिए थी. हमें जो जिम्मेदारी दी गई है, हम उस का सही तरह से पालन करें, यही हमारा धर्म है. गांधी का धर्म यही था कि हर व्यक्ति अपने काम को सही तरह से करे, जिस से देश व समाज का भला हो. जैसे पानी का धर्म है प्यास बुझाना, चावल का धर्म है भूख मिटाना, ठीक उसी तरह देश में रहने वालों का धर्म है देश और समाज की प्रगति के लिए काम करना. नेता, अफसर और कोर्ट अपने धर्म का सही से पालन करें जिस से संविधान ने जो सोचा, वह हो सके.

राजा का कोई धर्म नहीं होना चाहिए. देश के प्रधानमंत्री, प्रदेश के मुख्यमंत्रियों का कोई धर्म नहीं होना चाहिए, उन का धर्म सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना होता है. इस के लिए सत्ता या विपक्ष नहीं होना चाहिए. चुनावप्रचार में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के तौर पर उन को किसी पार्टी का प्रचार नहीं करना चाहिए. इसलिए ही तो चुनाव आचार संहिता लागू होती है. आज क्या इस का पालन होता है? चुनाव खर्च की एक सीमा चुनाव आयोग तय करता है, क्या उस सीमा में चुनाव लड़ा जाता है? सत्ता पर आसीन लोगों से संविधान ने जो उम्मीद की थी, क्या उस का पालन हो रहा है?

ऐसे सवालों के जवाब न में ही मिलेंगे. इस के बाद भी हम नेताओं का गुणगान करते हैं. हम साल में 2 बार गांधी को याद कर के यह दावा करते हैं कि गांधी के पदचिन्हों पर चल रहे हैं. गांधी के रास्ते पर चलने की जगह संविधान के रास्ते पर चलना जरूरी है. तभी संविधान के हिसाब से देश को चलाया जा सकता है. आजादी के बाद जैसेजैसे नेताओं में सत्ता की भूख बढ़ी, संविधान को हाशिए पर रखा जाने लगा. संविधान की शपथ खाने वाले नेता संविधान के खिलाफ काम करने लगे.

कानून और संविधान को तोडने के रास्ते बनाए जाने लगे. जो जितनी अच्छी तरह से संविधान को तोड़ ले और अपने काम को सही ठहरा ले, उसे उतना ही बड़ा जानकार ‘चाणक्य’ मान लिया जाता है. गांधी ने देश के गरीब और वंचित लोगो के अधिकार और कानून की बात की थी. आज गांधी की पुण्यतिथि मना रहे नेता खुद अमीर हो रहे हैं. सत्ता के लिए कपड़ों की तरह दलबदल करना न तो गांधी का रास्ता था और न ही लोहिया, जयप्रकाश नारायण का. मजेदार बात यह है कि नेता आज इन महापुरूषों का नाम ले कर अपने स्वार्थ को पूरा कर रहे हैं.

गांधी और उन के जैसे तमाम महापुरुषों ने देश के कमजोर और वंचित समाज को न्याय और अधिकार देने की बात कही. जो दक्षिणपंथी लोग इन के विचारों से सहमत नहीं थे, आज दक्षिणाबैंक के लिए उन की मूर्तियों की पूजा कर रहे हैं. कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दे कर उन के विचारों को कुचलने का काम किया गया. इसी तरह से साल में 2 बार महात्मा गांधी का महिमामंडन कर यह बताया जाता है कि हम उन के बताए रास्ते पर चल रहे हैं. असल में हम न केवल देश के लोगों को बल्कि उन महापुरुषों को भी धोखा दे रहे हैं.

लड़कियों को 25 वर्ष की उम्र तक कर लेनी चाहिए शादी, लेकिन क्यों?

हमारे समाज में पढ़ाई और शादी से ले कर बच्चे पैदा करने तक की उम्र तय है. बचपन से ले कर किशोरावस्था को शिक्षा ग्रहण करने के लिए उत्तम माना गया है तो वहीं 20 की उम्र के बाद का समय नौकरी या आजीविका खोजने के लिए रखा गया है. 25 की उम्र गृहस्थ जीवन में प्रवेश के लिए सर्वोत्तम माना जाता है और इस के बाद आती हैं बच्चे पैदा करने, घर खरीदने, प्रमोशन जैसी चीजें. जीवन का यही चक्र है जो सदियों से चलता आ रहा है.

हालांकि, अब लोगों की सोच पहले से बहुत बदल गई है. भारत के बड़े शहरों में लड़कियां पढ़ाई और कैरियर को अहमियत देने लगी हैं और इस चक्कर में वे अपनी शादी अमूमन 30-35 साल की उम्र तक टालती रहती हैं. पेरैंट्स भी अपनी बेटियों को अपने पैरों पर खड़ा देखना चाहते हैं और इस वजह से उन पर जल्दी शादी के लिए दबाव नहीं डालते. इस का नतीजा होता है कि वे 30-35 साल तक अपनी बेटी के नखरे सहते रहते हैं.

उन्हें क्या पढ़ना है, कैसे रहना है, क्या कपड़े पहनने हैं, क्या खाना है, किस के साथ पार्टी करनी है, किन दोस्तों के साथ वक्त बिताना है, कितने महंगे गैजेट्स लेने हैं, कितनी औनलाइन शौपिंग करनी है, कितना समय मोबाइल में घुस कर बिताना है आदि सब लड़कियां खुद तय करती हैं और पेरैंट्स इन तमाम सुविधाओं को मुहैया कराने कि जद्दोजहेद में लगे रहते हैं. वे अपने कमाए रुपए अपने युवा बच्चों की ख़ुशी के लिए खर्च करते रहते हैं. अपने शौक दबा कर इन बच्चों के शौक पूरा करने की कोशिश में लगे रहते हैं. मांएं अपनी तबीयत की चिंता छोड़ अपने युवा बेटे/ बेटी और उन के दोस्तों के लिए खाना व स्नैक्स बनाने में लगी रहती हैं.

क्या ऐसे में एक लड़की कभी यह सोचती है कि अब उस की मां की उम्र हो चुकी है. वह मां को इस उम्र में इतनी तकलीफ क्यों दे रही है? क्या युवा लड़केलड़कियां यह सोचते हैं कि अब पेरैंट्स पर निर्भर नहीं रहना बल्कि खुद सारी जिम्मेदारियां उठानी हैं?

दरअसल, शादी की सही उम्र 25 साल के आसपास ही होती है. इस उम्र में युवा लड़कियां शादी कर लें तो उन्हें जिंदगी में जिम्मेदारियां उठानी आ जाएंगी. उन्हें सही समय पर परिवार चलाना और रिश्तों को निभाना आएगा. आटेदाल के भाव समझ आएंगे. घर के कोने में बैठे मोबाइल में आंखें घुसा कर मां से चायनाश्ते या खाने की डिमांड करना और फिर उस खाने की बुराई करते हुए आधाअधूरा खा कर थाली खिसका देना बहुत आसान है. मगर अपने रुपयों से बाजार जा कर सब्जी व राशन खरीद कर लाना और फिर मेहनत व प्यार से बना कर सामने वाले को खिलाना और उस के नखरे सहना बहुत कठिन है. एक घरपरिवार को चलाने के लिए कितने ही एफर्ट्स लगाने होते हैं. इस की समझ एक लड़की को तभी आती है जब वह शादी करती है और अपनी गृहस्थी चलाती है.

शादी सही समय पर हो जाए तो जिंदगी में एक ठहराव और समझ बढ़ती है. घरपरिवार की जिम्मेदारियां उठाने से इंसान का व्यक्तित्व निखरता है. आत्मनिर्भरता बढ़ती है. वह ज्यादा सामर्थ्यवान और समझदार बनता है. मन में संतोष की भावना पैदा होती है. समय बरबाद करने के बजाय सही अर्थों में समय का सदुपयोग करना सीखता है. घर के छोटेबड़े काम करने से मांबाप या दूसरों पर निर्भरता की भावना दूर होती है. अपनी एक दुनिया बना कर उसे सजानेसंवारने का आनंद ही अलग है. इस आनंद को समय पर महसूस कर जीवन में आगे बढ़ने से ही वास्तव में आप का व्यक्तित्व निखरता है.

जरूरी नहीं कि शादी करते ही लड़की मां बने और इस वजह से अपने कैरियर से समझौता करे. यहां बात 25 साल तक शादी कर लेने की है, बच्चे पैदा करने की नहीं. बच्चों के लिए आप 4-6 साल का गैप ले सकती हैं. 30-32 की उम्र में जब आप कैरियर के नजरिए से सैटल हो जाएं और पति के साथ सही तालमेल बैठने लगे तब बच्चों की सोचें. यही नहीं, अगर आप को आगे जा कर लगे कि आप ने सही जीवनसाथी का चुनाव नहीं किया है तो तलाक का रास्ता भी खुला होता है. अपने मन में यह वहम न रखें कि आप की जिंदगी खराब हो जाएगी. रास्ते हमेशा खुले होते हैं, बस, जरूरत है सही समय पर सही फैसले लेने की और अपनी जिम्मेदारियां उठाने की.

6 साल के बच्चों से दुष्कर्म के मामलों में 96 प्रतिशत की बढ़ोतरी

एनसीआरबी के आंकड़ों के आधार पर देशभर में बच्चों के प्रति होने वाली आपराधिक घटनाओं पर जारी रिपोर्ट बहुत चौंकाने वाली है. इस ताजा रिपोर्ट के मुताबिक़ 2016 से 2022 के बीच बच्चों से दुष्कर्म और उन पर हमले के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है. बीते 6 वर्षों में बच्चों से दुष्कर्म के मामले 96 प्रतिशत से अधिक बढ़े हैं. बाल अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली स्वयंसेवी संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (सीआरवाई) ने भी इस संबंध में एक रिपोर्ट जारी की है, जो डराने वाली है.

राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के डाटा विश्लेषण के आधार पर जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि 2016 से 2022 के बीच बच्चों से दुष्कर्म और उन पर हमले के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है. हालांकि, 2020 में कम मामले देखने को मिले. इस की वजह शायद यह रही कि उस दौरान कोरोना महामारी के कारण ज़्यादातर बच्चे घर में ही रहे. वे स्कूल नहीं गए, खेलने के लिए पार्क या खेलग्राउंड या पड़ोसियों के घर नहीं गए. कोरोना के दौरान रिश्तेदारों के घर आने पर भी पाबंदी रही. भारतीय घरों में बच्चियों के साथ शोषण और बलात्कार में अकसर घर के नौकर या नजदीकी रिश्तेदार शामिल होते हैं. मगर कोरोना के चलते जहां नौकरों के घर में आने पर पाबंदी थी वहीं चाचा, मामा, कजन भाई जैसे लोगों, जो मातापिता की अनुपस्थिति में घर की बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बना लेते हैं, का आना भी बंद रहा, लिहाजा 2020 में ऐसी घटनाओं में कमी दर्ज हुई. मगर कोरोनाकाल ख़त्म होते ही घटनाएं तेजी से बढ़ीं. विश्लेषण से पता चलता है कि 2020 को छोड़ कर 2016 के बाद से बच्चों के साथ दुष्कर्म के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है.

सीआरवाई के निदेशक सुभेंदु भट्टाचार्जी का कहना है कि लोगों में जागरूकता के कारण अब बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामले में रिपोर्टिंग बढ़ी है. वहीं हैल्पलाइनों, औनलाइन पोर्टलों और विशेष एजेंसियों के माध्यम से भी इन अपराधों को सामने लाने में आसानी हो रही है. संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा करने से समाज में चुप्पी की संस्कृति को तोड़ने में मदद मिली है. मगर अभी भी सारी घटनाएं पुलिस में दर्ज नहीं होती हैं.

दरअसल, भारतीय समाज में कौमार्य का इतना हौवा बना कर रखा गया है कि इस के नष्ट होने पर परिवार को लगता है कि उस की बेटी अपवित्र हो गई और अब उस की कभी शादी नहीं होगी. वहीं बदनामी का डर उन पर हावी हो जाता है. इन वजहों से घर के भीतर घटने वाली ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट ही नहीं की जाती है. कई बार तो मां ही बेटी को खामोश रहने के लिए मजबूर करती है. ऐसी हालत में कभी कभी तो पिता को भी नहीं पता चल पाता है कि उस की बेटी के साथ बलात्कार हो गया है. कई बार बच्चियां ही डर की वजह से घर वालों को कुछ नहीं बताती हैं और बलात्कारी के हाथों लगातार शोषण का शिकार होती रहती हैं, कई बार अखबारों में ऐसी ख़बरें छपती हैं कि जब 13-14 साल की लड़की प्रैग्नैंट हो जाती है तब मांबाप को पता चलता है कि उन की बेटी के साथ बलात्कार हो रहा था.

देशभर के अनाथाश्रमों में जिस तेजी से नवजात शिशुओं की संख्या बढ़ रही है, वह इस खुलासे के लिए काफी है कि समाज में अपराध की क्या स्थिति है. कई बार छोटी लड़कियों को बलात्कार के चलते गर्भ ठहरने पर मातापिता समाज में बदनामी के डर से उस को ले कर अन्य जगह चले जाते हैं और वहां डिलीवरी के बाद बच्चे को किसी अनाथाश्रम के बाहर लगे पालने में फेंक कर बेटी को ले कर वापस चले जाते हैं. ऐसे लोग कभी भी अपनी बेटी के साथ हुई हैवानियत की पुलिस में रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाते.

दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित अनेक प्राइवेट नर्सिंग होम या क्लीनिक में बच्चों की खरीदफरोख्त का धंधा होता है. अनेक डाक्टर्स, नर्स और दाइयां इस काम में लगी हैं. इन के पास अधिकांश ऐसे लोग आते हैं जिन की बच्चियों को बलात्कार के चलते गर्भ ठहर जाता है. ये क्लीनिक या नर्सिंग होम अच्छा पैसा ले कर या तो उन का अबौर्शन कर देते हैं या अबौर्शन न होने की स्थिति में बच्चा पैदा करवा कर उन लोगों को ऊंचे दामों में बेच देते हैं जिन के औलाद नहीं होती हैं. ये डील 5 से 7 लाख या इस से भी ज़्यादा रुपए में तय होती है. ऐसे केसेस की भी कभी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज नहीं होती है, इसलिए बच्चों के प्रति दुष्कर्म के जो आंकड़े जारी होते हैं वे मात्र 30 या 40 फ़ीसदी ही होते हैं. वास्तविक संख्या तो होश उड़ाने वाली है.

हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 6 वर्षों में दुष्कर्म, बलात्कार और उस की कोशिश से जुड़े मामलों में कुल वृद्धि 96.8 फीसदी रही. 2016 में जहां कुल 19,500 से अधिक मामले दर्ज हुए वहीं 2022 में ये बढ़ कर करीब 39,000 हो गए. देश के 5 राज्यों में ऐसी घटनाएं सब से ज़्यादा हुई हैं. उन में ओडिशा में बीते 6 सालों में 8,240 घटनाएं दर्ज हुईं, राजस्थान में 9,370, उत्तर प्रदेश में 18,682, मध्य प्रदेश में 20,415 और महाराष्ट्र में सब से ज़्यादा 20,762 मामले दर्ज किए गए हैं.

कौन होते हैं बच्चों का शोषण करने वाले

बच्चों को टारगेट करने वाले लोगों को पीडोफाइल कहा जाता है. इन का रुझान शुरू से बच्चों की तरफ़ होता है. वो वयस्कों के बजाय बच्चों को देख कर उत्तेजित होते हैं. बच्चों का यौनशोषण करने वाले लोग सैक्सुअल डिसऔर्डर का शिकार होते हैं. उन्हें बच्चों के यौनशोषण में ही मज़ा मिलता है और अपनी इन हरकतों का सुबूत मिटाने के लिए वो बच्चों की हत्या तक कर देते हैं. हालांकि, इस तरह का हर मानसिक रोगी बच्चों की जान नहीं लेता. ऐसे लोग दूसरी असामाजिक हरकतें भी करते हैं. ये यौनशोषण के अलावा कई बार चोरी या हत्या जैसे अपराधों में भी शामिल होते हैं.

बच्चों के ख़िलाफ़ अपराधों को अंजाम देने वाले लोग अकसर घरों में ही होते हैं या कई बार निचले तबके के होते हैं. या फिर ये ऐसे लोग होते हैं जिन्होंने बचपन में बहुत नकारात्मकता देखी हो. जिन्होंने अपने आसपास घरेलू हिंसा, नशाखोरी या दूसरे जघन्य अपराध होते हुए देखे हों. कई बार पीडोफाइल खुद बचपन में यौनशौषण का शिकार हुए होते हैं. दूसरी बीमारियों की तरह ही इस तरह की पर्सनैलिटी डिसऔर्डर का अगली पीढ़ी में जाने का भी ख़तरा रहता है. अकसर बलात्कारी का बेटा भी बलात्कारी निकलता है.

पीडोफाइल अकसर बच्चों के आसपास रहने की कोशिश करते हैं. वो ज्यादातर स्कूलों या ऐसी जगहों को चुनते हैं जहां बच्चों का आनाजाना ज्यादा हो. वो ऐसे घरों में आनाजाना रखते है जहां बच्चे ज्यादा हों. वो ऐसा काम भी ढूंढ लेते हैं जो बच्चों के बीच रह कर हो सके. 2012 में इलाहाबाद, जिसे अब प्रयागराज कहते हैं, के राजकीय बाल संरक्षण गृह में काम करने वाले चौकीदार और चपरासी सहित कुछ मर्द टीचर्स छोटीछोटी बच्चियों के यौनशोषण में संलिप्त पाए गए थे. यह मामला भी तब खुला था जब बारह-तेरह वर्षीय एक बच्ची इन की दरिंदगी के कारण प्रैग्नैंट हो गई थी. अधिकांश मामलों में बच्चों को शिकार बनाने वाले उन के करीबी ही होते हैं. ये स्कूल बस का ड्राइवर, कंडक्टर, शिक्षक या स्कूल के कर्मचारी हो सकते हैं.

दूसरी तरफ घर के लोग जैसे चाचा, मामा, पड़ोसी भी ऐसी हरकतें करते हैं. दूसरी तरह के ये लोग ज्यादा ख़तरनाक होते हैं. ऐसे लोग आसानी से शक के दायरे में भी नहीं आते. कई बार बच्चों के शिकायत करने पर अभिभावक बच्चों का यकीन नहीं करते. बच्चों के ख़िलाफ़ हो रहे अपराध, ख़ासतौर पर यौन अपराध के ज्यादातर मामले सामने नहीं आ पाते, क्योंकि बहुत छोटे बच्चे समझ ही नहीं पाते हैं कि उन के साथ कुछ गलत हो रहा है. अगर वो समझते भी हैं तो डांट के डर से अभिभावकों से इस बारे में बात नहीं करते हैं. अकसर उन के साथ गलत काम करने वाले उन्हें टौफी या चौकलेट का लालच दे कर बहला लेते हैं या उन को मार डालने का डर दिखा कर जबान बंद रखने के लिए मजबूर करते हैं. जिन बच्चों के मातापिता गुस्सैल किस्म के होते हैं वो बच्चे तो खुद ही घर में कुछ नहीं बताते क्योंकि डांट या मार खाने का भय उन को घेरे रहता है.

कैसे समझाएं बच्चों को?

  • बच्चों से खुल कर बात करें. उन की बात सुनें और समझें. अगर बच्चा कुछ ऐसा बताता है तो उसे गंभीरता से लें. इस समस्या को हल करने की कोशिश करें. पुलिस में बेझिझक शिकायत करें.
  • बच्चों को ‘गुड टच बैड टच’ के बारे में बताएं. उन को बताएं कि किस तरह किसी का उन को छूना ग़लत है. उन्हें समझाएं कि अगर कोई उन्हें ग़लत तरह से छूता है तो वो तुरंत इस का विरोध करें और मातापिता को इस बारे में बताएं.
  • अभिभावक बच्चों के साथ हर वक्त नहीं रह सकते, इसलिए बच्चों को जागरूक करना जरूरी है. बच्चों को घरों में परिवार और स्कूल में टीचर इस बारे में जागरूक करें.

जागरूकता ज़रूरी

  • बच्चों के ख़िलाफ़ बढ़ रहे उत्पीड़न के मामलों पर जागरूकता के ज़रिए ही रोक लगाई जा सकती है. इस की 2 स्तरों पर ज़रूरत होती है. बच्चों के साथ ही अभिभावकों को भी जागरूक किया जाना ज़रूरी है.
  • यौन अपराधों पर लगाम लगाने के लिए स्कूली पाठ्यक्रम में इसे शामिल किया जा सकता है. अभिभावकों और शिक्षकों के बीच बेहतर तालमेल से बच्चों को समझाना आसान होगा.
  • बच्चों के व्यवहार पर भी नजदीकी नज़र रहनी चाहिए. उन के व्यवहार में बदलाव दिखे, वे बाहर अकेले जाने में घबराएं, या दोस्तों के साथ खेलने से मना करें, चुपचाप अपने कमरे में बंद रहें, उन्हें भूख न लगे तो तुरंत दोस्ताना माहौल में उन की परेशानी की वजह जानने की कोशिश होनी चाहिए.
  • मांबाप या बड़े भाईबहनों का व्यवहार छोटी बच्चियों के साथ इतना फ्रैंडली होना चाहिए कि वे अपनी सभी बातें बेझिझक अपने घर वालों से कह सकें.
  • बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध के ज्यादा मामले बाल सुरक्षा अधिनियम 2012 आने के बाद सामने आए हैं. पहले अपराधों को दर्ज नहीं कराया जाता था लेकिन अब लोगों में जागरूकता आने के कारण बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध के दर्ज मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है. मगर ये मामले भी अभी आधे ही या उस से भी कम संख्या में ही दर्ज कराए जाते हैं.

बुल्डोजर के दम पर म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन का आतंक, कौन जिम्मेदार?

लखनऊ में माफिया मुख्तार अंसारी के करीबी बिल्डर के एफआई टावर पर बुलडोजर चल गया. सरकार का कहना है कि माफिया मुख्तार अंसारी के करीबी बिल्डरों की ओर से बनाया गया एफआई टावर पूर्ण रूप से अवैध बना है. इस का मानचित्र भी नहीं पास कराया गया था. अवैध तरह से अपार्टमैंट बनाए गए और लोगों की जान से खिलवाड़ किया गया. योगी सरकार ने सख्त कार्रवाई के आदेश दिए.

यह कोई पहला मसला नहीं है. जब कोई निर्माण हो रहा होता है तब म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन चुप रहता है. उसे इस बात का खयाल नहीं रहता कि क्या हो रहा है. अकबर नगर सहित कई कालेज और रैस्त्रां को इसलिए बुलडोजर चला कर तोडा गया क्योंकि वे सही तरह से नहीं बने थे. कोई भी निर्माण रातोंरात नहीं होता. बिना म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन की मिलीभगत के भी नहीं होता है.

पहले ये चुप रहते हैं. अचानक एक दिन बुजडोजर ले कर गिराने आ जाते हैं. अवैध निर्माण को आतंक की तरह से देखा जा रहा है. उस का मुकाबला करने के लिए कहीं कोई सुनवाई और बहस नहीं होती है. एफआई टावर को ले कर कमिश्नर कोर्ट से हाईकोर्ट तक मसला पहुंचा लेकिन राहत नहीं मिली. इन अपार्टमैंट में रहने वालों की एक नहीं सुनी गई. एफआई टावर को गिराने का काम जारी है.

प्रौपर्टी टैक्स का आतंक

म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन का सब से बड़ा आतंक प्रौपर्टी टैक्स है. यह हर जगह एकजैसा है. हरियाणा के पानीपत में म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन ने प्लौट, मकान या संपत्ति संबंधी किसी भी रजिस्ट्री के लिए निगम से हाउस टैक्स क्लीयरेंस लेना अनिवार्य कर दिया है. पहले नगर निगम ने रजिस्ट्री के लिए एनओसी की अनिवार्यता पूरी तरह से खत्म कर दिया था. अब निगम ने पानीपत के तहसीलदार को लैटर लिख कर रजिस्ट्री के लिए हाउस या प्रौपर्टी टैक्स क्लीयरेंस अनिवार्य कर दिया है. हाउस टैक्स जमा करने की रसीद के बाद ही रजिस्ट्री होगी.

नगर निगम ने प्रौपर्टी टैक्स को निगम के आय का मुख्य स्रोत बताया है. ज्यादा से ज्यादा आय के लिए प्रौपर्टी टैक्स को जरिया बनाया जा रहा है. यह प्रौपर्टी टैक्स आतंक बनता जा रहा है. 2020 में नगर निगम के सदन ने हर साल के बजाय तीसरे साल प्रौपर्टी टैक्स की दर में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी करने के फैसले को सदन में पारित किया था. हर 3 साल में प्रौपर्टी टैक्स बढ़ाया जा रहा है. नगर निगम अपने खर्च घटाने के बजाय टैक्स बढ़ाता जा रहा है. नगर निगम के चुनावों के बाद शहरवासियों पर टैक्स का बोझ बढ़ जाता है.म्युनिसिपल कारपोरेशन भी लोकल ‘पीएमओ’ ही चलाता है जिस को नगर आयुक्त कहते हैं. मेयर और सभासद केवल तमाशा देखते हैं. जितने भी टैक्स कानून बनते हैं वे सभी ये नगर आयुक्त ही बनाते हैं. टैक्स अफसर वसूली करते हैं. ये ही पैसा ले कर टैक्स की रकम कमज्यादा भी कर देते हैं.

पानीपत की हर तरह से शिमला में भी नगर निगम चुनाव समाप्त होने के बाद भवन मालिकों को प्रौपर्टी टैक्स की बढ़ोतरी की मार झेलनी पड़ रही है. नगर निगम ने पूर्व में हर 3 साल के बाद 10 प्रतिशत प्रौपर्टी टैक्स बढ़ाने का प्रस्ताव पारित कर रखा है. इस के मुताबिक, शहर में भवन मालिकों को चालू वित्त वर्ष में संपत्ति कर यानी प्रौपर्टी टैक्स पिछले साल के मुकाबले 10 प्रतिशत ज्यादा देना होगा.

नगर निगम ने जब अपना वार्षिक बजट पेश किया था, उस में प्रौपर्टी टैक्स बढ़ाने का जिक्र नहीं किया गया था. नगर निगम जो भी टैक्स व अन्य दरें शहर में पानी, कूड़े समेत अन्य तरह की बढ़ाता है उसे बजट में शामिल किया जाता है. आय के संसाधनों को बढ़ाने के बहाने नगर निगम ऐसे फैसले लेता है. नगर निगम जिस हिसाब से टैक्स बढ़ाता है उस हिसाब से सुविधाएं नहीं बढ़ाता. बरसात के दिनों में शिमला जैसे शहर की हालत गांव जैसी हो जाती है. सफाई की नजर से देखें तो भी कोई खास बदलाव नहीं दिखता. लगातार बरसात के कारण सड़कों पर गड्ढे बढ़ रहे हैं, जो अकसर जानलेवा भी साबित होते रहते हैं.

बुलडोजर का खतरा

देहरादून में नगर निगम का आतंक अलग तरह का है. नगर निगम के रिकौर्ड के मुताबिक, दून में करीब 128 बस्तियां हैं. इन में से अभी तक कोई बस्ती नियमित नहीं है लेकिन नगर पालिका के समय से नगर निगम बनने तक इन से लगातार हाउस टैक्स वसूला जाता रहा है. वर्ष 2018 से नगर निगम ने बस्तियों से टैक्स वसूली बंद कर दी है. अब नगर निगम उन्हें हटाने की तैयारी कर रहा है. बस्तीवासी इस आतंक से परेशान हैं. वे रोज अपनी टैक्स जमा की पुरानी परचियां ले कर नगर निगम पहुंच रहे हैं और हाउस टैक्स जमा करने की अपील कर रहे हैं.

बस्तियों में बने कई निर्माण ऐसे हैं जिन को नगर निगम अवैध मान रहा है. वह इन अवैध निर्माणों को चिह्नित कर रहा है. इस वजह से भी बस्तीवासियों से टैक्स नहीं वसूला जा रहा. निगम को डर है कि कहीं अवैध निर्माण करने वाले खुद को टैक्स के आधार पर वैध घोषित न कर दें. नगर निगम जब चाहे टैक्स जमा करे और जब चाहे टैक्स न जमा कर के बस्ती को अवैध घोषित कर दे. इस तरह से उस का आतंक रहने वालों को डरा रहा है.

गाजियाबाद नगर निगम ने प्रौपर्टी टैक्स के बकायदारों के खिलाफ सीलिंग की कार्रवाई शुरू कर बकाया वसूलने का अभियान शुरू किया है. नगर निगम ऐसे बड़े बकाएदारों के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई कर रहा है. इस के साथ ही, जो लोग टैक्स जमा नहीं करेंगे उन के खिलाफ कर अधिनियम के तहत कुर्की की कार्रवाई की जाएगी. टैक्स जमा नहीं करने वालों के खिलाफ सीलिंग की कार्रवाई तेज कर दी गई है.

शहर के कई प्रतिष्ठानों व मकानों पर सीलिंग की कार्रवाई की गई. जो पिछले काफी वर्षों से बकाया टैक्स जमा नहीं कर रहे थे. बड़े मकानों के साथ छोटे मकानों पर भी प्रौपर्टी टैक्स के आंतक की तलवार लटकी हुई है. शहर में कर वसूली को ले कर चलाए जा रहे अभियान को देखते हुए कई बकायदारों द्वारा स्वयं अपना टैक्स जमा कराया जा रहा है. जिन के पास पैसे नहीं हैं वे परेशान हैं.

ताजमहल पर म्यूनिसिपल आंतक

आगरा जिले में विश्वप्रसिद्ध इमारत ताजमहल पर कुर्की का खतरा मंडरा रहा है. अगर वह समय पर हाउस टैक्स नहीं चुका पाता है तो यह कार्रवाई की जा सकती है. ताजमहल पर 1.47 लाख रुपए का प्रौपर्टी टैक्स का एएसआई को नोटिस दिया गया है. विश्व धरोहर ताजमहल से गृह कर वसूली का नोटिस आगरा नगर निगम की ओर से जारी किया गया है.

निगम ने 1.47 लाख रुपए का गृह कर चुकाने का यह नोटिस 15 दिनों पहले दिया है. पहली बार गृह कर का नोटिस पा कर भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) के अफसर भी हैरत में हैं. इस नोटिस में 31 मार्च, 2022 तक ताजमहल के बकाया हाउस टैक्स का जिक्र है. नोटिस में 88,784 रुपए गृह कर और 47,943 रुपए ब्याज दर्शाया गया है. ताजमहल राष्ट्रीय स्मारक है. यह केंद्र और राज्य सरकार की संपत्ति है.

इस तरह से म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन का आंतक पूरे देश में छाया है. इन की खाता बही में कब किस का नंबर लग जाए, पता नहीं. एक तरफ अवैध मान कर एक बिल्डिंग पर बुल्डोजर चल रहा होता है, दूसरी तरफ एक और बिल्डिंग अवैध बन रही होती है. सब से बड़ी बात, इन की निगाह सरकारी कर्मचारियों और सत्ता पक्ष के नेताओं पर नहीं पड़ती है.

फ्रैंड से फ्रैंडली होने में होती है परेशानी, तो अपनाएं ये टिप्स

नई उम्र की फ्रैंडशिप भी नईनई होती है, जिस से मिले जो अच्छा लगा, जिस ने अच्छे से बात की, जो साथ घूमने, बातचीत करने लगा, जिस के मोबाइल से अच्छे मैसेज आने लगे, जो फेसबुक और इंस्टाग्राम पर हमारे फोटो पर लाइक और कमैंट करने लगे, वही फ्रैंड बन जाता है. जितनी जल्दी फ्रैंडशिप होती है उतनी ही जल्दी फ्रैंडशिप टूटने भी लगी है. कई बार तो सोशल मीडिया से शुरू और वहीं पर खत्म हो जाती है. स्कूल और कालेज में भी जो फ्रैंड बनते हैं उन से भी बड़ी जल्दी लड़ाई हो जाती है.

महिलाओं के मुद्दों पर पीएचडी करने वाली और समाजसेवी डाक्टर रेनू सिंह कहती हैं, ‘‘टीनऐज की जो उम्र होती है उस में विचार जल्दीजल्दी बदलते हैं. आज के किशोरों के पास बहुत सारे साधन हैं जहां वे तमाम लोगों से रोज मिलते हैं, उन की अलगअलग अच्छाइयों को देख कर फ्रैंडशिप करते हैं. जब एकदूसरे से रोज मिलते हैं, ज्यादा मिलते हैं तो उन को लगता है कि फ्रैंड जैसा दिख रहा था वैसा नहीं है. कई बार खुद की ही रुचि बदल जाती है. ऐसे में बड़ी जल्दी फ्रैंडशिप टूट जाती है.

‘‘यह सीखने की उम्र होती है. इस तरह की गलतियों से ही बच्चे सीखते हैं. फ्रैंड बनाने और अगर दिक्कत हो तो फ्रैंडशिप छोड़ने को ले कर परेशान होने की जरूरत नहीं है. बच्चों में अकेलापन बढ़ रहा है. ऐसे में पहले यह जरूरी है कि वह फ्रैंडशिप करे. इस के जरिए वे फ्रैंडशिप को बनाना या छोड़ना भी सीख लेंगे. आमतौर पर फ्रैंडशिप उन लोगों में अधिक होती है जिन की रुचियां आप में मिलती हैं. फ्रैंडशिप करने के साथ ही साथ यह जरूरी है कि यह जरूर जानें कि नए फ्रैंड के साथ कैसे व्यवहार करें?’’

फ्रैंडशिप को मजबूत होने का समय दें

फ्रैंड बनाना 2 मिनट के नूडल्स बनाने जैसा हो सकता है पर फ्रैंडशिप को मजबूत बनाने और करीबी बनाने के लिए समय देने की जरूरत होती है. जब 2 लोग फ्रैंड बनते हैं तो धीरेधीरे एकदूसरे की कमियों, अच्छी बातों, रुचियों, नापसंद होने वाली सारी बातों को सम  झ लेते हैं. कुछ दिनों बाद आप को यह भी सम  झ आ जाता है कि फ्रैंड कैसा व्यवहार पसंद करता है. जरूरी है कि फ्रैंडशिप को मजबूत होने के लिए समय दें.

फ्रैंडशिप में व्यवहार शालीन रखें

कहते हैं कि अच्छा और करीबी फ्रैंड वही होता है जो गाली दे कर बात करने का अधिकार रखता हो और सामने वाला उस की गाली का भी बुरा न माने. लेकिन पहले ही दिन अगर कोई फ्रैंड ऐसा करने लगेगा तो अच्छा नहीं लगेगा, फ्रैंडशिप टूट जाएगी. ऐसे में पहले फ्रैंड की फीलिंग्स, उस की सम  झदारी और सहनशीलता को सम  झें. फिर उस के व्यवहार के अनुकूल बात करें.

अपने पेरैंट्स से दोस्तों को मिलवाएं

फ्रैंड लड़का हो या लड़की, उसे अपने पेरैंट्स से जरूर मिलवाएं. इस से पेरैंट्स को फ्रैंड के बारे में पता होगा तो वे समयबेसमय टीकाटिप्पणी नहीं करेंगे. दोस्तों के मन में भी किसी तरह का संकोच नहीं रहेगा. अपने घर पर ही फ्रैंड्स से आप मिल सकेंगे.

गलत कामों में साथ न दें

किशोरावस्था में कई तरह के गलत काम करने का मन भी करता है. इस की वजह यह है कि इस उम्र में सहीगलत का अर्थ और उस के परिणाम का पता नहीं होता. छोटेछोटे गलत काम तो सुधारे या संभाले जा सकते हैं पर सैक्स, नशे जैसे गलत काम ऐसे हो जाते हैं जिन का खमियाजा लंबे समय तक भुगतना पड़ता है. अगर कोई फ्रैंड इस में शामिल होने के लिए कहता है तो उस को मना कर दें.

कैसे समझें गलत काम को

जब भी हम कोई गलत काम करने के लिए तैयार होते हैं, हमारे दिल के अंदर से एक आवाज आती है कि यह काम नहीं करना चाहिए. कई बार लोग दिल की आवाज को सुन कर उस काम को नहीं करते. कई बार दिल की बात को नजरअंदाज कर के उस काम को कर जाते हैं. जिस काम को करने के लिए हमें लोगों की नजरों से खुद को बचाना पड़ता है वह गलत काम होता है.

जो पंसद न हो वह काम न करें

हर किसी की अपनी पसंद और नापसंद होती है. फ्रैंडशिप में जरूरी नहीं कि हर पसंद और नापसंद एकजैसी हो. किसी को कुछ खाने में पसंद है, किसी को कुछ. ऐसा हर क्षेत्र में हो सकता है. ऐसे में अपने से अधिक दूसरे की पसंद का खयाल रखें. इस से फ्रैंडशिप गहरी होगी.

सोशल मीडिया पर कमैंट्स संभल कर करें

नया जमाना सोशल मीडिया का है. हर फ्रैंड सोशल मीडिया पर ऐक्टिव है. ऐसे में उस की पोस्ट पर कमैंट्स करते समय सावधान रहें. कुछ ऐसे कमैंट्स न करें जो फ्रैंड को पसंद न हो या उस के दूसरे फ्रैंड्स को पसंद न आए. कोई आलोचना करनी है या सु  झाव देने हैं जिन के बुरे लगने का खतरा हो तो उसे अकेले में कारण सहित बताएं.

ऐसे उत्साह बढ़ाएं

टीनऐज में बहुत सारे ऐसे काम होते हैं जिन में लोग फेल भी हो जाते हैं. ऐसे में आलोचना करने वालों की बाढ़ सी आ जाती है. जब कभी ऐसा हो तो फ्रैंड का उत्साह बढ़ाएं. उसी समय उस की गलतियों का एहसास न कराएं.

गलतफहमियों को आपस में सुलझाएं

फ्रैंडशिप में गलतफहमी भी बड़ी जल्दी फैलने लगती है. कई बार फ्रैंडशिप से परेशान लोग इस का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं. ऐसे में जरूरी है कि गलतफहमी होने पर उस को आपस में सुल  झाएं. अगर कोई शिकायत किसी से है तो उस को उस से ही कहें. किसी दूसरे से कहने का लाभ नहीं होता है. उलटे, फ्रैंडशिप टूट जाती है.

समय और सीमाओं का ध्यान रखें

टीनऐज ऐसा दौर होता है जब कैरियर को बनाने की दिशा में युवा बढ़ रहे होते हैं. ऐसे में केवल फ्रैंडशिप को ही प्रमुखता न दें. अपने कैरियर को भी महत्त्व दें. आपस में एकदूसरे का सहयोग कर के अपने कैरियर की अच्छी बुनियाद तैयार करें.

अपनों का सुख: बूढ़े पिता के आगे शुभेंदु को अपना कद बौना क्यों लग रहा था

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