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सच्चा प्यार : क्या शेखर की कोई गलत मंशा थी ? – भाग 1

‘‘उर्मी,अब बताओ मैं लड़के वालों को क्या जवाब दूं? लड़के के पिताजी 3 बार फोन कर चुके हैं. उन्हें तुम पसंद आ गई हो… लड़का मनोहर भी तुम से शादी करने के लिए तैयार है… वे हमारे लायक हैं. दहेज में भी कुछ नहीं मांग रहे हैं. अब हम सब तुम्हारी हां सुनने के लिए बेचैनी से इंतजार कर रहे हैं. तुम्हारी क्या राय है?’’ मां ने चाय का प्याला मेरे पास रखते हुए पूछा.

मैं बिना कुछ बोले चाय पीने लगी. मां मेरे जवाब के इंतजार में मेरी ओर देखती रहीं. सच कहूं तो मैं ने इस बारे में अब तक कुछ सोचा ही नहीं था. अगर आप सोच रहे हैं कि मैं कोई 21-22 साल की युवती हूं तो आप गलतफहमी में हैं. मेरी उम्र अब 33 साल है और जो मुझ से ब्याह करना चाहते हैं उन की 40 साल है. अगर आप मन ही मन सोच रहे हैं कि यह शादी करने की उम्र थोड़ी है तो आप से मैं कोई शिकायत नहीं करूंगी, क्योंकि मेरे मन में भी यह सवाल उठ चुका है और इस का जवाब मुझे भी अब तक नहीं मिला. इसलिए मैं चुपचाप चाय पी रही हूं.

सभी को अपनीअपनी जिंदगी से कुछ उम्मीदें जरूर होती हैं, इस बात को कोई नकार नहीं सकता. हर चीज को पाने के लिए सही वक्त तो होता ही है. जैसे पढ़ाई के लिए सही समय होता है उसी तरह शादी करने के लिए भी सही समय होता है. मेरे खयाल से लड़कियों को 20 और 25 साल की उम्र के बीच शादी कर लेनी चाहिए. तभी तो वे अपनी शादीशुदा जिंदगी का पूरा आनंद उठा सकेंगी. प्यारमुहब्बत आदि जज्बातों के लिए यही सही उम्र है. इस उम्र में दिमाग कम और दिल ज्यादा काम करता है और फिर प्यार को अनुभव करने के लिए दिमाग से ज्यादा दिल की ही जरूरत होती है. लेकिन मेरी जिंदगी की परिस्थितियां कुछ ऐसी थीं कि मेरे जीवन में 20 से 25 साल की उम्र संघर्षों से भरी थी. हम खानदानी रईस नहीं थे. शुक्र है कि मैं अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. यदि एक से अधिक बच्चे होते तो हमारी जिंदगी और मुश्किल में पड़ जाती. मेरे पापा एक कंपनी में काम करते थे और मां स्कूल अध्यापिका थीं. दोनों की आमदनी को मिला कर हमारे परिवार का गुजारा चल रहा था.

एक विषय में मेरे मातापिता दोनों ही बड़े निश्चिंत थे कि मेरी पढ़ाई को किसी भी हाल में रोकना नहीं. मैं भी बड़ी लगन से पढ़ती रही. लेकिन हमारी और कुदरत की सोच का एक होना अनिवार्य नहीं है न? इसीलिए मेरी जिंदगी में भी एक ऐसी घटना घटी, जिस से जिंदगी से मेरा पूरा विश्वास ही उठ गया.

एक दिन दफ्तर में दोपहर के समय मेरे पिताजी अचानक अपनी छाती पकड़े नीचे गिर गए. साथ काम करने वालों ने उन्हें अस्पताल में भरती करा कर मेरी मां के स्कूल फोन कर दिया. मेरे पिताजी को दिल का दौरा पड़ा था. मेरे पिताजी किसी भी बुरी आदत के शिकार नहीं थे, फिर भी उन्हें 40 वर्ष की उम्र में यह दिल की बीमारी कैसी लगी, यह मैं नहीं समझ पाई. 3 दिन आईसीयू में रह कर मेरे पिताजी ने अपनी आंखें खोलीं और फिर मेरी मां और मुझे देख कर उन की आंखों में आंसू आ गए. मेरा हाथ पकड़ कर उन्होंने बहुत ही धीमी आवाज में कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो बेटी… मैं अपना फर्ज पूरा किए बिना जा रहा हूं… मगर तुम अपनी पढ़ाई को किसी भी कीमत पर बीच में न छोड़ना… वही कठिन समय में तुम्हारे काम आएगी,’’ वे ही मेरे पिताजी के अंतिम शब्द थे.

पिताजी की मौत के बाद मैं और मेरी मां दोनों बिलकुल अकेली पड़ गईं. मेरी मां इकलौती बेटी थीं. उन के मातापिता भी इस दुनिया से चल बसे थे. मेरे पापा के एक भाई थे, मगर वे भी बहुत ही साधारण जीवन बिता रहे थे. उन की 2 बेटियां थीं. वे भी हमारी कुछ मदद नहीं कर सके. अन्य रिश्तेदार भी एक लड़की की शादी का बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं थे. मैं उन्हें दोषी नहीं ठहराना चाहती, क्योंकि एक कुंआरी लड़की की जिम्मेदारी लेना आज कोई आसान काम नहीं है. मेरी मां ने अपनी कम तनख्वाह से मुझे अंगरेजी साहित्य में एम.ए. तक पढ़ाया. मैं ने एम.ए. अव्वल दर्जे में पास किया और उस के बाद अमेरिका में स्कौलरशिप के साथ पीएच.डी. की. उसी दौरान मेरी पहचान शेखर से हुई. अमेरिका में भारतवासियों की एक पार्टी में पहली बार मेरी सहेली ने मुझे शेखर से मिलवाया. पहली मुलाकात में ही शेखर ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया. वह बहुत ही सरलता से मुझ से बात करने लगा. जैसे मुझे बहुत दिनों से जानता हो. पूरी पार्टी में उस ने मेरा साथ दिया.

बिखरते बिखरते : माया क्या सोचकर भावुक हो रही थी ? – भाग 1

महेश ने कहा, ‘‘माया, आज शाम को गाड़ी से मुझे मुंबई जाना है. मेरा सूटकेस तैयार कर देना.’’ ‘‘शाम को जाना है और अब बता रहे हैं, कल रात भी तो बता सकते थे,’’ माया को पति की लापरवाही पर क्रोध आ रहा था.

‘‘ऐसी कौन सी नई बात है. हमेशा ही तो मुझे बाहर आनाजाना पड़ता है,’’ महेश ने कुरसी से उठते हुए कहा.

‘‘कब तक लौटोगे?’’ आने वाले दिनों के अकेलेपन की कल्पना से माया भावुक हो गई.

‘‘यही कोई 10 दिन लग जाएंगे. तुम चाहो तो अपनी मौसी के यहां चली जाना. नहीं तो आया से रात को यहीं सो जाने को कहना,’’ कह कर महेश अपना ब्रीफकेस ले कर निकल पड़ा.

दरवाजा बंद कर माया सोफे पर आ बैठी तो उस का दिल भर आया. माया कुछ क्षण घुटनों में सिर छिपाए बैठी रही. अपनी कारोबारी दुनिया में खोए रहने वाले महेश के पास माया के लिए दोचार पल भी नहीं रह गए हैं. कम से कम सुषमा साथ होती तो यह दुख वह भूल जाती. इतने बड़े मकान में घंटों अकेले पड़े रहना कितना खलता है. माया के 12 वर्षों के दांपत्य जीवन में न कोई महकता क्षण है, न कोई मधुर स्मृति.

महेश शाम को औफिस से लौट कर झटपट तैयार हो कर निकल पड़ा. रसोई की बत्ती बुझा कर माया कमरे में चली आई. माया लेट चुकी थी. नींद तो आने से रही. अलमारी से यों ही एक किताब ले कर पलंग पर बैठ गई. पहला पन्ना उलटते ही माया की नजर वहीं ठहर गई : ‘प्यार सहित– सौरभ.’ माया के 20वें जन्मदिवस के अवसर पर सौरभ ने यह किताब उसे भेंट की थी. माया का मन अतीत की स्मृतियों में खो गया…

‘माया, मेरे सौरभ भैया अपनी पढ़ाई खत्म कर के कोलकाता से आ गए हैं. भैया भी तुम्हारी तरह बहुत अच्छा वायलिन बजाते हैं. शाम को आना,’ रिंकू कालेज जाते समय उसे न्योता दे गई. माया का संगीतप्रेम उसे शाम को रिंकू के घर खींच ले गया. सौरभ ने वायलिन बजाना शुरू किया और माया वायलिन की धुनों में खो गई. सौरभ की नौकरी, उस के पिता की फैक्टरी में ही लग गई. माया नईनई धुनें सीखने के लिए सौरभ के पास जाने लगी थी. सौरभ उस की खूबसूरती व मासूमियत पर फिदा हो गया था. एक दिन सौरभ ने अचानक ही पूछ डाला, ‘माया, अपने पापा से बात क्यों नहीं करती?’

‘किस बारे में?’

‘हम दोनों के विवाह के बारे में.’

माया वायलिन एक ओर रख कर खिड़की के पास जा खड़ी हुई. लौन में लाल गुलाब खिले हुए थे. वह उन फूलों को कुछ पल निहारती रही. आज तक वह पापा के सामने खड़ी हो बेझिझक कोई बात नहीं कह पाई है. फिर इतनी बड़ी बात भला कैसे कह पाएगी? किंतु आखिर कब तक टाला जा सकता है? देखतेदेखते 3 वर्ष बीत गए थे. उस ने एमएससी कर लिया था. अब तक तो पढ़ाई का बहाना कर के वह सौरभ को रुकने के लिए कहती आई थी.

अचानक उसे एक बात सूझ गई. वह बोली, ‘सौरभ, तुम स्वयं ही आ कर पापा से कह दो न, मुझे बड़ी झिझक हो रही है.’

‘माया, झिझक नहीं. डर कहो. समस्या से दूर भागने की यह सोच ही तुम्हारी कमजोरी है. खैर, ठीक है. मैं कल शाम को आऊंगा,’ सौरभ ने हंसते हुए माया से विदा ली. पापा ने दफ्तर से आ कर चाय पी और अखबार ले कर आरामकुरसी पर बैठ गए. माया का दिल यह सोच कर धकधक कर रहा था कि बस, अब सौरभ आता ही होगा.

थोड़ी देर बाद सौरभ आया. हाथ जोड़ कर उस ने कहा, ‘नमस्ते, अंकल.’ कुछ देर तक इधरउधर की आम बातें हुईं. फिर सौरभ ने अपने स्वभाव के मुताबिक सीधे प्रस्ताव रख दिया, ‘अंकल, मैं और माया एकदूसरे को पसंद करते हैं. मैं आप से माया का हाथ मांगने आया हूं.’ ‘क्या?’ उन के हाथ से अखबार गिर गया. उन्हें अपनी सरलसंकोची बेटी के इस फैसले पर विश्वास ही नहीं हो रहा था. कुछ पलों बाद उन्होंने स्वयं को संयत करते हुए कठोर आवाज में कहा, ‘देखो सौरभ, मुझे यह बचकाना तरीका बरदाश्त नहीं है. तुम लोग खुद विवाह का निर्णय करो, यह गलत है. अच्छा, तुम अपने पापा को भेजना.’

एक साथी की तलाश : आखिर मधुप और बिरुवा का रिश्ता था क्या ? – भाग 1

शाम गहरा रही थी. सर्दी बढ़ रही थी. पर मधुप बाहर कुरसी पर बैठे  शून्य में टकटकी लगाए न जाने क्या सोच रहे थे. सूरज डूबने को था. डूबते सूरज की रक्तिम रश्मियों की लालिमा में रंगे बादलों के छितरे हुए टुकड़े नीले आकाश में तैर रहे थे.

उन की स्मृति में भी अच्छीबुरी यादों के टुकड़े कुछ इसी प्रकार तैर रहे थे. 2 दिन पहले ही वे रिटायर हुए थे. 35 सालों की आपाधापी व भागदौड़ के बाद का आराम या विराम, पता नहीं, पर अब, अब क्या…’ विदाई समारोह के बाद घर आते हुए वे यही सोच रहे थे. जीवन की धारा अब रास्ता बदल कर जिस रास्ते पर बहने वाली थी, उस में वे अकेले कैसे तैरेंगे.

‘‘साहब, सर्दी बढ़ रही है, अंदर चलिए’’, बिरुवा कह रहा था.

‘‘हूं,’’ अपनेआप में खोए मधुप चौंक गए, ‘‘हां चलो.’’ और वे उठ खड़े हुए.

‘‘इस वर्ष सर्दी बहुत पड़ रही है साहब,’’ बिरुवा कुरसी उठा कर उन के साथ चलते हुए बोला, ‘‘ओस भी बहुत पड़ती है. सुबह सब भीगाभीगा रहता है, जैसे रातभर बारिश हुई हो,’’ बिरुवा बोलते जा रहा था.

मधुप अंदर आ गए. बिरुवा उन के अकेलेपन का साथी था. अकेलेपन का दुख उन्हें मिला था पर भुगता बिरुवा ने भी था. खाली घर में बिरुवा कई बार अकेला ही बातें करता रहता. उन की आवश्यकता से अधिक चुप रहने की आदत थी. उन की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न पा कर, बड़बड़ाता हुआ वह स्वयं ही खिसिया कर चुप हो जाता.

पर श्यामला खिसिया कर चुप न होती थी, बल्कि झल्ला जाती थी, ‘मैं क्या दीवारों से बातें कर रही हूं. हूं हां भी नहीं बोल पाते, चेहरे पर कोई भाव ही नहीं रहते, किस से बातें करूं,’ कह कर कभीकभी उस की आंखों में आंसू आ जाते.

उन की आवश्यकता से अधिक चुप रहने की आदत श्यामला के लिए इस कदर परेशानी का सबब बन गई थी कि वह दुखी हो जाती थी. उन की संवेदनहीनता, स्पंदनहीनता की ठंडक बर्फ की तरह उस के पूरे व्यक्तित्व को झुलसा रही थी. नाराजगी में तो मधुप और भी अभेद हो जाते थे. मधुप ने कमरे में आ कर टीवी चला दिया.

तभी बिरुवा गरम सूप ले कर आ गया, ‘‘साहब, सूप पी लीजिए.’’

बिरुवा के हाथ से ले कर वे सूप पीने लगे. बिरुवा वहीं जमीन पर बैठ गया. कुछ बोलने के लिए वह हिम्मत जुटा रहा था, फिर किसी तरह बोला, ‘‘साहब, घर वाले बहुत बुला रहे हैं, कहते हैं अब घर आ कर आराम करो, बहुत कर लिया कामधाम, दोनों बेटे कमाने लगे हैं. अब जरूरत नहीं है काम करने की.’’

मधुप कुछ बोल न पाए, छन्न से दिल के अंदर कुछ टूट कर बिखर गया. बिरुवा का भी कोई है जो उसे बुला रहा है. 2 बेटे हैं जो उसे आराम देना चाहते हैं. उस के बुढ़ापे की और अशक्त होती उम्र की फिक्रहै उन्हें. लेकिन सबकुछ होते हुए भी यह सुख उन के नसीब में नहीं है.

बिरुवा के बिना रहने की वे कल्पना भी नहीं कर पाते. अकेले में इस घर की दीवारों से भी उन्हें डर लगता है, जैसे कोनों से बहुत सारे साए निकल कर उन्हें निगल जाएंगे. उन्हें अपनी यादों से भी डर लगता है और अकेले में यादें बहुत सताती हैं.

‘सारा दिन आप व्यस्त रहते हैं, रात को भी देर से आते हैं, मैं सारा दिन अकेले घर में बोर हो जाती हूं,’ श्यामला कहती थी.

‘तो, और औरतें क्या करती हैं और क्या करती थीं, बोर होना तो एक बहाना भर होता है काम से भागने का. घर में सौ काम होते हैं करने को.’

‘पर घर के काम में कितना मन लगाऊं. घर के काम तो मैं कर ही लेती हूं. आप कहो तो बच्चों के स्कूल में एप्लीकेशन दे दूं नौकरी के लिए, कुछ ही घंटों की तो बात होती है, दोपहर में बच्चों के साथ घर आ जाया करूंगी,’ श्यामला ने अनुनय किया.

‘कोई जरूरत नहीं. कोई कमी है तुम्हें?’ अपना निर्णय सुना कर जो मधुप चुप हुए तो कुछ नहीं बोले. उन से कुछ बोलना या उन को मनाना टेढ़ी खीर था. हार कर श्यामला चुप हो गई, जबरदस्ती भी करे तो किस के साथ, और मनाए भी तो किस को.

‘नौवल्टी में अच्छी पिक्चर लगी है, चलिए न किसी दिन देख आएं, कहीं भी तो नहीं जाते हैं हम?’

‘मुझे टाइम नहीं, और वैसे भी, 3 घंटे हौल में मैं नहीं बैठ सकता.’

‘तो फिर आप कहें तो मैं किसी सहेली के साथ हो आऊं?’

‘कोई जरूरत नहीं भीड़ में जाने की, सीडी ला कर घर पर देख लो.’

‘सीडी में हौल जैसा मजा कहां

आता है?’

लेकिन अपना निर्णय सुना कर चुप्पी साधने की उन की आदत थी. श्यामला थोड़ी देर बोलती रही, फिर चुप हो गई. तब नहीं सोच पाते थे मधुप, कि पौधे को भी पल्लवित होने के लिए धूप, छांव, पानी व हवा सभी चीजों की जरूरत होती है. किसी एक चीज के भी न होने पर पौधा मर जाता है. फिर, श्यामला तो इंसान थी, उसे भी खुश रहने के लिए हर तरह के मानवीय भावों की जरूरत थी. वह उन का एक ही रूप देखती थी, आखिर कैसे खुश रह पाती वह.

‘थोड़े दिन पूना हो आऊं मां के

पास, भैयाभाभी भी आए हैं आजकल, मुलाकात हो जाएगी.’

‘कैसे जाओगी इस समय?’ मधुप आश्चर्य से बोले, ‘किस के साथ जाओगी?’

‘अरे, अकेले जाने में क्या हुआ, 2 बच्चों के साथ सभी जाते हैं.’

‘जो जाते हैं, उन्हें जाने दो, पर मैं तुम लोगों को अकेले नहीं भेज सकता.’

फिर श्यामला लाख तर्क करती, मिन्नतें करती. पर मधुप के मुंह पर जैसे टेप लग जाता. ऐसी अनेक बातों से शायद श्यामला का अंतर्मन विरोध करता रहा होगा. पहली बार विरोध की चिनगारी कब सुलगी और कब भड़की, याद नहीं पड़ता मधुप को.

‘‘साहब, खाना लगा दूं?’’ बिरुवा कह रहा था.

‘‘भूख नहीं है बिरुवा, अभी तो सूप पिया.’’

‘‘थोड़ा सा खा लीजिए साहब, आप रात का खाना अकसर छोड़ने लगे हैं.’’

‘‘ठीक है, थोड़ा सा यहीं ला दे,’’ मधुप बाथरूम से हाथ धो कर बैठ गए.

इस एकरस दिनचर्या से वे दो ही दिन में घबरा गए थे, तो श्यामला कैसे बिताती पूरी जिंदगी. वे बिलकुल भी शौकीन तबीयत के नहीं थे. न उन्हें संगीत का शौक था, न किताबें पढ़ने का, न पिक्चरों का, न घूमने का, न बातें करने का. श्यामला की जीवंतता, मधुप की निर्जीवता से अकसर घबरा जाती. कई बार चिढ़ कर कहती, ‘ठूंठ के साथ आखिर कैसे जिंदगी बिताई जा सकती है.’

Valentine’s Day 2024 : कांटे गुलाब के – अमरेश और मिताली की अनोखी प्रेम कहानी – भाग 1

सुबह के 8 बज रहे थे. किचन में व्यस्त थी. तभी मोबाइल की घंटी बज उठी. मन में यह सोच कर खुशी की लहर दौड़ गई कि अमरेश का फोन होगा. फिर अचानक मन ने प्रतिवाद किया. वह अभी फोन क्यों करेगा? वह तो प्रतिदिन रात के 8 बजे के बाद फोन करता है.

अमरेश मेरा पति था. दुबई में नौकरी करता था. मोबाइल पर नंबर देखा, तो झट से उठा लिया. फोन मेरी प्रिय सहेली स्वाति ने किया था. बात करने पर पता चला कि कल उस की शादी होने वाली है. शादी में उस ने हर हाल में आने के लिए कहा. शादी अचानक क्यों हो रही है, यह बात उस ने नहीं बताई. दरअसल, उस की शादी 2 महीने बाद होने वाली थी. जिस लड़के से शादी होने वाली थी, उस की दादी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गईर् थी. डाक्टर ने उसे 2-3 दिनों की मेहमान बताया था. इसीलिए घर वाले दादी की मौजूदगी में ही उस की शादी कर देना चाहते थे.

स्वाति मेरी बचपन की सहेली थी. ग्रेजुएशन तक हम दोनों ने एकसाथ पढ़ाई की थी. उस के बाद मुंबई में उसे जौब मिल गई. वह मातापिता के साथ वहीं बस गई. अब वहीं के लड़के से शादी कर रही थी. अमरेश को बताना जरूरी था कि मुंबई जा रही हूं. उसे फोन किया, नंबर नहीं लगा. रौंग नंबर बताया गया. वह आश्चर्यचकित थी. रौंग नंबर क्यों?

अमरेश ने दुबई का जो नंबर दिया था, उस पर कभी फोन नहीं किया था. फोन करती भी तो कैसे करती? उस ने फोन करने से मना जो कर रखा था.

उस ने कहा था, ‘औफिस के काम से हर समय व्यस्त रहता हूं. सो, फोन मत करना. मैं खुद तुम्हें रोज फोन करूंगा.’ वह रोज फोन करता भी था.

फोन ट्राई करतेकरते अचानक मोबाइल हाथ से छूट गया और फर्श पर गिर कर बंद हो गया. उस ने बहुत कोशिश की ठीक करने की, मगर ठीक नहीं हुआ. हर हाल में मुंबई आज ही जाना था. सो, एजेंट से टिकट की व्यवस्था कर प्लेन से बेटे सुमित के साथ चली गई.

मुंबई एयरपोर्ट से बाहर आईर् तो शाम के 6 बज गए थे. टैक्सी से सहेली के घर जा रही थी कि एक मोड़ पर लालबत्ती देख कर ड्राइवर ने टैक्सी रोक दी. उसी समय एक गाड़ी बगल में आ कर खड़ी हो गई. अचानक गाड़ी के अंदर नजर पड़ी तो चौंक गई. बगल वाली गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर अमरेश था. उस की बगल में एक युवती बैठी थी. अमरेश को आवाज देने न देने की उधेड़बुन में थी कि हरी बत्ती हो गई और वाहन गंतव्य की ओर दौड़ने लगे.

टैक्सी वाले को उक्त गाड़ी का पीछा करने के लिए कहा तो वह तैयार हो गया. लगभग 20 मिनट बाद सफेद गाड़ी एक शानदार बिल्डिंग के अहाते में दाखिल हो गई. बिल्डिंग किस की थी? अमरेश का युवती से कैसा नाता था? मुझे दुबई बता कर मुंबई में क्या कर रहा था? यह सब जानना जरूरी था.

गेट पर गार्ड था. ड्राइवर को समझाबुझा कर गार्ड से पूछताछ करने के लिए भेज दिया. गार्ड से बात कर के 10 मिनट बाद ड्राइवर आया तो बताया कि बिल्ंिडग यहां के मशहूर बिल्डर रत्नेश्वर चौधरी की है. गाड़ी से उतर कर जो युवक व युवती मकान के अंदर गए हैं, वे चौधरी साहब की बेटी सारिका और दामाद अमरेश हैं. मुझे लगा, भूचाल आ गया है. अंदर तक हिल गई. जी चाहा कि फफकफफक कर रो पड़ूं. बड़ी मुश्किल से अपनेआप को संभाला और सहेली के घर गई.

वह अमरेश को विवाह से पहले से जानती थी. जिस कालेज में पढ़ती थी, वह भी उसी में पढ़ता था. बहुत स्मार्ट और हैंडसम था. लड़कियां उस की दीवानी थीं. मगर वह उस का दीवाना था. उस की खूबसूरती पर आहें भरता था और उस के आगेपीछे घूमता रहता था.

वह उसे चांस नहीं देती थी. दरअसल, प्रेममोहब्बत के चक्कर में पड़ कर वह पढ़ाई में पीछे नहीं होना चाहती थी. उस का इरादा ग्रेजुएशन के बाद पहले अपने पैरों पर खड़ा होना था, फिर विवाह करना था. उस के मातापिता भी यही चाहते थे.

इस तरह 2 वर्ष बीत गए. उस के बाद वह महसूस करने लगी कि वह अमरेश के इश्क में गिरफ्त हो चुकी है, क्योंकि सोतेजागते वही नजर आने लगा था. 2 साल तक जिस जज्बात को इनकार करती रही थी, वह संपूर्ण चरमोत्कर्ष के साथ उस पर छा चुका था. शायद अमरेश की लगातार कोशिश और उस के अच्छे व्यवहार ने उस की जिद के पांव उखाड़ दिए थे. 2 साल में अमरेश ने उस के साथ कभी कोई आपत्तिजनक हरकत नहीं की थी.

हमेशा उस से दोस्ताना तरीके से मिलता था. अपने जज्बात का इजहार करता था. लेकिन कभी भी जवाब के लिए तकाजा नहीं करता था. कभी कालेज से दूर तनहाई में मिलने के लिए मजबूर भी नहीं किया था.

सरिता : मुन्ना को किस बात की चिंता हो रही थी ? – भाग 1

कितना मुश्किल हो जाता है कभीकभी कोई निर्णय ले पाना. जिंदगी जैसे किसी मुकाम पर पहुंच कर आगे ही नहीं बढ़ना चाहती. बस, दिल चाहता है कि वक्त यहीं रुक जाए और हम आने वाले उस वक्त से अपना दामन बचा सकें, जो अपने साथ पता नहीं कितने अनसुलझे सवाल ले कर आ रहा है. परंतु ऐसा कहां हो पाता है, किसी के चाहने से वक्त भला कहीं रुकता है. उस की तो अपनी ही गति है. जिंदगी के सवाल चाहे जितने उलझे हों परंतु उन के उत्तर तो हमें तलाशने ही पड़ते हैं.

‘‘क्या बात है, तुम सो क्यों नहीं रहे…’’ पत्नी की आवाज सुन कर थोड़ी देर के लिए मेरी विचार तंद्रा भंग हो गई, ‘‘क्या बात है, आफिस में कुछ हुआ है क्या?’’ उसे मेरी बेचैनी की वजह नहीं समझ में आ रही थी.

‘‘नहीं, बस, यों ही… नींद नहीं आ रही, तुम सो जाओ, शुभी,’’ मैं ने धीरे से थपकी दे कर उसे आश्वस्त किया तो दिनभर की थकीमांदी शुभी कुनमुना कर सो गई.

घड़ी की टिकटिक निरंतर अपनी आवाज से मुझे बीतते वक्त का बोध करा रही थी. क्या होगा कल…कल जीजाजी फिर मुझ से पूछेंगे तब क्या जवाब दूंगा मैं उन्हें…मेरी नजरों के सामने उन की कातर छवि घूम गई थी. पता नहीं कैसे वह कांपते पैरों से मेरे आफिस में आए थे. कितने भीगे हुए स्वर में उन्होंने कहा था, ‘मुन्ना, अब मैं थक गया हूं…तन से भी और मन से भी. जिंदगी में जो गलती मैं ने की थी उस का प्रायश्चित्त तो शायद ही हो पर एक बार, सिर्फ एक बार मैं सरिता से मिलना चाहता हूं. मन में अब इतनी शक्ति शेष नहीं है कि मैं खुद उस के सामने जा सकूं. मुन्ना, बस एक बार मुझे उस से मिलवा दे. फिर शायद मैं सुकून से मर सकूं.’

क्या कहता मैं उन से. एक बार तो सोचा कि कह दूं, ‘जीजाजी, आप जिस भगवान की तलाश में उस बेसहारा औरत को एक बच्चे की जिम्मेदारी के साथ छोड़ गए थे, क्या वह भगवान आप को नहीं मिला. उसी से कहिए न कि वह बीते वक्त को वापस ला दे, क्यों मिलेगी वह आप से? जिंदगी के 20 साल तो उस ने अपने आंसुआें को अपने आंचल में छिपाए आप के बगैर काट दिए, अब कौन से नए आंसू देने के लिए आप मिलना चाहते हैं?’ लेकिन नहीं कह सका, बिस्तर पर पड़े मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे उस व्यक्ति से कोई कठोर बात कहने की हिम्मत ही नहीं पड़ी.

यह वह जीजाजी नहीं थे, जो कभी दमकते चेहरे वाले सुंदर, सुगठित नौजवान थे. घर छोड़ते वक्त जब साधुओं वाले वस्त्र पहने थे तब भी मैं ने इन्हें देखा था. उस दुखद वातावरण में भी मुझे इन का सौंदर्य खिला सा लग रहा था, लेकिन आज बीमारी से जर्जर शरीर के साथ सरकारी अस्पताल के बेड पर जाने लायक यह व्यक्ति जैसे निरीहता की प्रतिमूर्ति लग रहा था.

परंतु अब मैं क्या करूं, उन की हालत से पिघल कर मैं उन्हें मौन आश्वासन तो दे आया था, लेकिन कैसे कहूं दीदी से और क्या कहूं. 20 साल से दीदी अपने अंदर पता नहीं कितने तूफानों को समेटे चुपचाप जीती चली जा रही हैं.

जीजा के संन्यास लेने के बाद भी शायद ही किसी ने कभी उन के मुंह से जीजा की कोई शिकायत सुनी हो, वह तो बस निरंतर समय की गति के साथ किसी नदी की भांति बहती चली जा रही हैं. न किसी से कोई शिकवा न शिकायत. बीते वक्त का कोई भी दंश उन के व्यक्तित्व से नहीं झलकता. आज भी जो उन से मिलता है, प्रभावित हुए बिना नहीं रहता.

अब तो प्रियांशु ने ही सारा घर संभाल लिया है. वह दीदी के ही नक्शेकदम पर गया है. वही बोलने का मधुर अंदाज, वही सपनीली आंखें, अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा. दीदी ने प्रियांशु में अपने संस्कार कूटकूट कर भर दिए हैं. उन दोनों की जिंदगी किसी मधुरमंद हवा की भांति बह रही है. ऐसे में मैं कैसे उन दोनों की जिंदगी में एकाएक कोई तूफान भर दूं, कैसे कहूं दीदी से कि आज जीजा तुम से मिलने के लिए व्याकुल हैं, प्रियांशु पर क्या प्रभाव पड़ेगा उस का…

5 साल का था जब जीजा ने उन दोनों को छोड़ कर संन्यास ले लिया था. इस की खबर पा कर मैं भी बाबूजी के साथ दीदी के घर गया था. 2 साल ही तो बड़ी थीं दीदी मुझ से पर उस समय मुझे उन्हें देख कर ऐसा लगा था जैसे वह अपनी उम्र से 10 साल आगे निकल गई हों.

जीजाजी के पिताजी भी तब जीवित थे. उन की हालत तो दीदी से भी बुरी थी. बाबूजी के आगे हाथ जोड़ कर उन्होंने कहा था, ‘भाई साहब… कैसे भी वापस लौटा लाइए उसे, उसे जो भी करना है घर में रह कर करे, आखिर उस के अलावा हम लोगों का कौन है? कैसे जीएगी बहू, जवान बहू को ले कर मैं बूढ़ा गृहस्थी की गाड़ी को खींच नहीं पाऊंगा, मेरी तो उस ने सुनी नहीं अब आप ही…’ कह कर रो पड़े थे वह.

Valentine’s Day 2024 : रूह का स्पंदन – दीक्षा के जीवन की क्या थी हकीकत ? – भाग 1

शादी के लिए सुदेश और दीक्षा एक रेस्टोरेंट में मिले. दोनों को ही उम्मीद नहीं थी कि वे एकदूसरे की कसौटी पर खरे उतरेंगे. तब तो बिलकुल भी नहीं, जब दीक्षा ने अपने जीवन की हकीकत बताई. लेकिन सुदेश ने जब 5 मिनट दीक्षा का हाथ अपने हाथों में थामा तो नतीजा पल भर में सामने आ गया. आखिर ऐसा…

‘‘डूयू बिलीव इन वाइब्स?’’ दक्षा द्वारा पूरे गए इस सवाल पर सुदेश चौंका. उस के चेहरे के हावभाव तो बदल ही गए, होंठों पर हलकी मुसकान भी तैर गई. सुदेश का खुद का जमाजमाया कारोबार था. वह सुंदर और आकर्षक युवक था. गोरा चिट्टा, लंबा, स्लिम,

हलकी दाढ़ी और हमेशा चेहरे पर तैरती बाल सुलभ हंसी. वह ऐसा लड़का था, जिसे देख कर कोई भी पहली नजर में ही आकर्षित हो जाए. घर में पे्रम विवाह करने की पूरी छूट थी, इस के बावजूद उस ने सोच रखा था कि वह मांबाप की पसंद से ही शादी करेगा.

सुदेश ने एकएक कर के कई लड़कियां देखी थीं. कहीं लड़की वालों को उस की अपार प्यार करने वाली मां पुराने विचारों वाली लगती थी तो कहीं उस का मन नहीं माना. ऐसा कतई नहीं था कि वह कोई रूप की रानी या देवकन्या तलाश रहा था. पर वह जिस तरह की लड़की चाहता था, उस तरह की कोई उसे मिली ही नहीं थी.

सुदेश का अलग तरह का स्वभाव था. उस की सीधीसादी जीवनशैली थी, गिनेचुने मित्र थे. न कोई व्यसन और न किसी तरह का कोई महंगा शौक. वह जितना कमाता था, उस हिसाब से उस के कपड़े या जीवनशैली नहीं थी. इस बात को ले कर वह हमेशा परेशान रहता था कि आजकल की आधुनिक लड़कियां उस के घरपरिवार और खास कर उस के साथ व्यवस्थित हो पाएंगी या नहीं.

अपने मातापिता का हंसताखेलता, मुसकराता, प्यार से भरपूर दांपत्य जीवन देख कर पलाबढ़ा सुदेश अपनी भावी पत्नी के साथ वैसे ही मजबूत बंधन की अपेक्षा रखता था. आज जिस तरह समाज में अलगाव बढ़ रहा है, उसे देख कर वह सहम जाता था कि अगर ऐसा कुछ उस के साथ हो गया तो…

सुदेश की शादी को ले कर उस की मां कभीकभी चिंता करती थीं लेकिन उस के पापा उसे समझाते रहते थे कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा. सुदेश भी वक्त पर भरोसा कर के आगे बढ़ता रहा. यह सब चल रहा था कि उस से छोटे उस के चचेरे भाई की सगाई का निमंत्रण आया. इस से सुदेश की मां को लगा कि उन के बेटे से छोटे लड़कों की शादी हो रही हैं और उन का हीरा जैसा बेटा किसी को पता नहीं क्यों दिखाई नहीं देता.

चिंता में डूबी सुदेश की मां ने उस से मेट्रोमोनियल साइट पर औनलाइन रजिस्ट्रेशन कराने को कहा. मां की इच्छा का सम्मान करते हुए सुदेश ने रजिस्ट्रेशन करा दिया. एक दिन टाइम पास करने के लिए सुदेश साइट पर रजिस्टर्ड लड़कियों की प्रोफाइल देख रहा था, तभी एक लड़की की प्रोफाइल पर उस की नजर ठहर गई.

ज्यादातर लड़कियों ने अपनी प्रोफाइल में शौक के रूप में डांसिंग, सिंगिंग या कुकिंग लिख रखा था. पर उस लड़की ने अपनी प्रोफाइल में जो शौक लिखे थे, उस के अनुसार उसे ट्रैवलिंग, एडवेंचर ट्रिप्स, फूडी का शौक था. वह बिजनैस माइंडेड भी थी.

उस की हाइट यानी ऊंचाई भी नौर्मल लड़कियों से अधिक थी. फोटो में वह काफी सुंदर लग रही थी. सुदेश को लगा कि उसे इस लड़की के लिए ट्राइ करना चाहिए. शायद लड़की को भी उस की प्रोफाइल पसंद आ जाए और बात आगे बढ़ जाए. यही सोच कर उस ने उस लड़की के पास रिक्वेस्ट भेज दी.

सुदेश तब हैरान रह गया, जब उस लड़की ने उस की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. हिम्मत कर के उस ने साइट पर मैसेज डाल दिया. जवाब में उस से फोन नंबर मांगा गया. सुदेश ने अपना फोन नंबर लिख कर भेज दिया. थोड़ी ही देर में उस के फोन की घंटी बजी. अनजान नंबर होने की वजह से सुदेश थोड़ा असमंजस में था. फिर भी उस ने फोन रिसीव कर ही लिया.

दूसरी ओर से किसी संभ्रांत सी महिला ने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘मैं दक्षा की मम्मी बोल रही हूं. आप की प्रोफाइल मुझे अच्छी लगी, इसलिए मैं चाहती हूं कि आप अपना बायोडाटा और कुछ फोटोग्राफ्स इसी नंबर पर वाट्सऐप कर दें.’’

सुदेश ने हां कह कर फोन काट दिया. उस के लिए यह सब अचानक हो गया था. इतनी जल्दी जवाब आ जाएगा और बात भी हो जाएगी, सुदेश को उम्मीद नहीं थी. सोचविचार छोड़ कर उस ने अपना बायोडाटा और फोटोग्राफ्स वाट्सऐप कर दिए.

फोन रखते ही दक्षा ने मां से पूछा, ‘‘मम्मी, लड़का किस तरह बातचीत कर रहा था? अपने ही इलाके की भाषा बोल रहा था या किसी अन्य प्रदेश की भाषा में बात कर रहा था?’’

‘‘बेटा, फिलहाल वह दिल्ली में रह रहा है और दिल्ली में तो सभी प्रदेश के लोग भरे पड़े हैं. यहां कहां पता चलता है कि कौन कहां का है. खासकर यूपी, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान वाले तो अच्छी हिंदी बोल लेते हैं.’’ मां ने बताया.

घर लौट जा माधुरी : जवानी की दहलीज पर पैर रखते ही माधुरी की जिंगदी में क्या बदलाव आया ? – भाग 1

रात के साढ़े 10 बज रहे थे. तृप्ति खाना खा कर पढ़ने के लिए बैठी थी. वह अपने जरूरी नोट रात में 11 बजे के बाद ही तैयार करती थी. रात में गली सुनसान हो जाती थी. कभीकभार तो कुत्तों के भूंकने की आवाज के अलावा कोई शोर नहीं होता था.

तृप्ति के कमरे का एक दरवाजा बनारस की एक संकरी गली में खुलता था. मकान मालकिन ऊपर की मंजिल पर रहती थीं. वे विधवा थीं. उन की एकलौती बेटी अपने पति के साथ इलाहाबाद में रहती थी.

नीचे छात्राओं को देने के लिए 3 छोटेछोटे कमरे बनाए गए थे. 2 कमरों के दरवाजे अंदर के गलियारे में खुलते थे. उन दोनों कमरों में भी छात्राएं रहती थीं.

दरवाजा बाहर की ओर खुलने का एक फायदा यह था कि तृप्ति को किसी वजह से बाहर से आने में देर हो जाती थी तो मकान मालकिन की डांट नहीं सुननी पड़ती थी.

तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया. तृप्ति किसी अनजाने डर से सिहर उठी. उसे लगा, कोई गली का लफंगा तो नहीं. वैसे, आज तक ऐसा नहीं हुआ था. रात 10 बजे के बाद गली की ओर खुलने वाले दरवाजे को किसी ने नहीं खटखटाया था.

कभीकभार बगल वाली छात्राएं कुछ पूछने के लिए साइड वाला दरवाजा खटखटा देती थीं. उन दोनों से वह सीनियर थी, इसलिए वे भी रात में ऐसा कभीकभार ही करती थीं.

पर जब ‘तृप्ति, दरवाजा खोलो… मैं माधुरी’ की आवाज सुनाई पड़ी, तो तृप्ति ने दरवाजे की दरार से झांक कर देखा. यह माधुरी थी. उस के बगल के गांव की एक सहेली. मैट्रिक तक दोनों साथसाथ पढ़ी थीं. बाद में तृप्ति बनारस आ गई थी. बीए करने के बाद बीएचयू की ला फैकल्टी में एडमिशन लेने के लिए वह एडमिशन टैस्ट की तैयारी कर रही थी.

माधुरी बगल के कसबे में ही एक कालेज से बीए करने के बाद घर बैठी थी. पिता उस की शादी करने के लिए किसी नौकरी करने वाले लड़के की तलाश में थे.

‘‘अरे तुम… इतनी रात गए… कहां से आ रही हो?’’ हैरान होते हुए तृप्ति ने पूछा.

‘‘बताती हूं, पहले अंदर तो आने दे,’’ कुछ बदहवास और चिंतित माधुरी आते ही बैड पर बैठ गई.

‘‘एक गिलास पानी तो ला… बहुत प्यास लगी है,’’ माधुरी ने इतमीनान की सांस लेते हुए कहा. ऐसा लग रहा था मानो वह दौड़ कर आई थी.

तृप्ति ने मटके से पानी निकाल कर उसे देते हुए कहा, ‘‘गलियां अभी पूरी तरह सुनसान नहीं हुई हैं… वरना अब तक तो इस गली में कुत्ते भी भूंकना बंद कर देते हैं,’’ फिर उस ने माधुरी की ओर एक प्लेट में बेसन का लड्डू बढ़ाते हुए कहा, ‘‘पहले कुछ खा ले, फिर पानी पीना. लगता है, तुम दौड़ कर आ रही हो?’’

माधुरी ने लड्डू खाते हुए कहा, ‘‘इतनी संकरी गली में कमरा लिया है कि तुम्हारे यहां कोई पहुंच भी नहीं सकता. यह तो मैं पिछले महीने ही आई थी इसलिए भूली नहीं, वरना जाने इतनी रात को अब तक कहां भटकती रहती.’’

‘‘पहले मैं गर्ल्स होस्टल में रहना चाहती थी, पर अगलबगल में कोई ढंग का मिल नहीं रहा था, महंगा भी बहुत था. यह बहुत सस्ते में मिल गया. यहां बहुत शांति रहती है, इसलिए इम्तिहान की तैयारी के लिए सही लगा. बस, आ गई. अगर मेरा एडमिशन बीएचयू में हो जाता है, तो आगे से वहीं होस्टल में रहूंगी.

‘‘अच्छा, अब तो बता कैसे आई हो? इतना बड़ा बैग… लगता है, काफी सामान भर रखा है इस में. कहीं जाने का प्लान है क्या?’’ तृप्ति ने पूछा.

‘‘हां, बताती हूं. अब एक कप चाय तो पिला,’’ माधुरी बोली.

‘‘खाना खाया है या बनाऊं… लेकिन, तुम ने खाना कहां से खाया होगा. घर से सीधे आ रही हो या…’’

‘‘खाना तो नहीं खाया है. मौका ही नहीं मिला, लेकिन रास्ते में एक दुकान से ब्रैड ले ली थी. अब इतनी रात को खाने की चिंता छोड़ो. ब्रैडचाय से काम चला लूंगी मैं,’’ माधुरी ने कहा.

चाय और ब्रैड खाने के बाद माधुरी की थकान तो मिट गई थी, पर उस के चेहरे पर अब भी चिंता की लकीरें साफ दिखाई पड़ रही थीं.

माधुरी बोली, ‘‘तृप्ति, तुम्हें याद है, जब हम लोग 9वीं जमात में थे, तब सौरभ नाम का एक लड़का 10वीं जमात में पढ़ता था. वही लंबी नाक वाला, गोरा, सुंदर, जो हमेशा मुसकराता रहता था…’’

‘‘हां, जिस के पीछे कई लड़कियां भागती थीं… और जिस के पिता की गहनों की मार्केट में बड़ी सी दुकान थी,’’ तृप्ति ने याद करते हुए कहा.

‘‘हां, वही.’’

‘‘पर, बात क्या है… तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘वही तो मैं बता रही हूं. वह 2 बार मैट्रिक में फेल हुआ तो उस के पिता ने उस की पढ़ाई छुड़वा कर दुकान पर बैठा दिया. पिछले साल भैया की शादी थी. मां भाभी के लिए गहनों के लिए और्डर देने जाने लगीं तो साथ में मुझे भी ले लिया.

‘‘मैं गहनों में बहुत काटछांट कर रही थी, इसलिए उस के पिता ने गहने दिखाने के लिए सौरभ को लगा दिया, तभी उस ने मुझ से पूछा था, ‘तुम माधुरी हो न?’

‘‘मैं ने कहा था, ‘हां, पर तुम कैसे जानते हो?’

‘‘उस ने बताया, ‘भूल गई क्या… हम दोनों एक ही स्कूल में तो पढ़ते थे.’

‘‘मैं उसे पहचानती तो थी, लेकिन जानबूझ कर अनजान बन रही थी. फिर उस ने मेरी ओर देखा तो शर्म से मेरी आंखें झुक गईं. उस दिन गहनों के और्डर दे कर हम लोग घर चले आए, फिर एक हफ्ते बाद मां के साथ मैं भी गहने लेने दुकान पर गई थी.

‘‘मां ने मुझ से कहा था, ‘दुकानदार का बेटा तुम्हारा परिचित है, तो दाम में कुछ छूट करा देना.’

‘‘मैं ने कहा था, ‘अच्छा मां, मैं उस से बोल दूंगी.’

‘‘पर, दाम उस के पिताजी ने लगाए. उस ने पिता से कहा, तो कुछ कम हो गया… घर आने पर मालूम हुआ कि भाभी के लिए जो सोने की अंगूठी खरीदी गई थी, वह नाप में छोटी थी. मां बोलीं, ‘माधुरी, कल अंगूठी ले जा कर बदलवा देना, मुझे मौका नहीं मिलेगा. कल कुछ लोग आने वाले हैं.’

‘‘मैं दूसरे दिन जब दुकान पर पहुंची तो सौरभ के पिताजी नहीं थे. मुझे देख कर वह मुसकराते हुए बोला, ‘आओ माधुरी, बैठो. आज क्या और्डर करना है?’

‘‘मैं ने कहा था, ‘कुछ नहीं… बस, यह अंगूठी बदलवानी है. भाभी की उंगली में नहीं आएगी. नाप में बहुत छोटी है.’‘‘वह बोला था, ‘कोई बात नहीं,

इसे तुम रख लो. भाभी के लिए मैं दूसरी दे देता हूं.’

‘‘मैं ने छेड़ते हुए कहा था, ‘बड़े आए देने वाले… दाम तो कम कर नहीं सकते… मुफ्त में देने चले हो.’

‘‘यह सुन कर उस ने कहा था, ‘कल पिताजी मालिक थे, आज मैं हूं. आज मेरा और्डर चलेगा.’

‘‘सचमुच ही उस ने वही किया, जो कहा. मैं ने बहुत कोशिश की, लेकिन उस ने अंगूठी वापस नहीं ली. भाभी के नाप की वैसी ही दूसरी अंगूठी भी दे दी.

Valentine’s Day 2024 : काश – श्रीकांत किसे देखकर हैरान हो गया था ? – भाग 1

सारिका को देख श्रीकांत सन्न रह गया था. उसे समझ नहीं आया कि सारिका का सामना कैसे करे और उसे क्या कहे. आखिर उस के साथ गलत भी तो उसी ने किया था.

‘‘लगता है जब तक तू पिटेगा नहीं, तेरे भेजे में इत्ती सी बात घुसेगी नहीं…,’’ आज फिर शांता ने घर सिर पर उठा रखा था. बेचारा नन्हा विपुल डर के मारे तितरबितर भाग रहा था. रोज का काम था यह. शांता के बदमिजाज व्यक्तित्व ने सारे घर में क्लेश घोल रखा था. शाम को दफ्तर से घर लौट रहे श्रीकांत ने घर के बाहर ही चीखने की आवाजें सुन ली थीं. ‘‘क्या शांता, आज फिर तुम विपुल पर चिल्ला रही हो? ऐसा क्या कर दिया इस नन्ही सी जान ने?’’

‘‘चढ़ा लो सिर, बाद में मुझ से मत कहना, तुम्हारे लाड़प्यार से ही बिगड़ रहा है यह. पता है आज क्या किया इस ने…’’ पंचम सुर में शांता ने विपुल की बालक्रियाओं की शिकायतें आरंभ कर दीं. श्रीकांत सोच रहा था कि यदि वह भी विपुल को दुलारना बंद कर दे तो बेचारा बच्चा मातापिता के होते हुए भी प्यार नहीं पा सकेगा. इतनी रूखी, इतनी चिड़चिड़ी क्यों थी शांता? श्रीकांत ने शादी की शुरुआत में जानने की काफी कोशिश की, उस के मातापिता से भी पूछा लेकिन हर बार यही सुनने को मिला कि स्वभाव की थोड़ी कड़वी जरूर है पर दिल की बहुत अच्छी है शांता. किंतु उस अच्छे दिल का दीदार गाहेबगाहे ही हुआ करता था.

शांता के ऐसे टेढ़े स्वभाव के कारण श्रीकांत के मातापिता ने भी उस की गृहस्थी में आना कम कर दिया था. वे दोनों अपने शहर में ही संतुष्ट थे. नौकरी की वजह से श्रीकांत को अलग शहर में रहना पड़ रहा था. ऐसा नहीं था कि श्रीकांत और शांता कभी मातापिता के साथ रहे ही नहीं. शादी के बाद कुछ समय तक सब साथ ही रहे थे. पर ऐसी कलहप्रिया पत्नी के साथ मातापिता के घर में रहना बहुत कठिन था.

श्रीकांत के पिता की गिनती अपने शहर के उच्च श्रेणी के पंडितों में हुआ करती थी. वे धार्मिक प्रवृत्ति के थे. शादी से पहले श्रीकांत वडोदरा में नौकरी करता था. श्रीकांत ने घरवालों के कहने पर अपने ही शहर के दूसरे उच्च कुलीन ब्राह्मण की बेटी से शादी कर ली.

पंडितजी ने बताया था, ‘‘दोनों के पूरे 30 गुण मिले हैं. शुक्र बहुत उच्च का है, इसलिए बहुत पैसा आएगा. बृहस्पति सुग्रही है, इसलिए ऊंचा नाम होगा. ऐसा कुंडली मिलान कम ही देखने को मिलता है.’’

‘‘जिस घर जाएगी वहां शांतिसमृद्धि की वर्षा कर देगी शांता. मैं ने स्वयं पत्री देखी है उस की,’’ पिताजी ने पूर्व विश्वास के साथ दावे भरे थे. परंतु शादी के कुछ समय बाद ही शांता ने घर की शांति भंग करनी शुरू कर दी थी. बातबेबात मां से झगड़े, यहां तक कि पिताजी को भी उलटे जवाब देती. वह इतनी बेशर्मी से लड़ती कि मातापिता अपनी इज्जत का खयाल कर के अपने कमरे में छिप जाते. एक वर्ष में विपुल गोद में आ गया. लेकिन शांता का स्वभाव बद से बदतर होता गया. पहले सोचते थे लड़कपन है, बच्चा होगा तो ममताबाई गुण अपना रंग दिखाएंगे.

विपुल के होने के बाद भी जब कोई बदलाव नहीं आया, उलटा सास से लड़ाइयां बढ़ती गईं तो श्रीकांत ने अलग शहर में नौकरी करने का निश्चय किया. शांता तो आज भी लड़ाई में ताने दे मारती है कि सासससुर ने उस की गृहस्थी के कामों में मदद न करने के लिए अपने बेटे की अलग शहर में नौकरी लगवा दी.

‘‘अगले हफ्ते मुझे टूर पर जाना है. इस बार थोड़ा लंबा टूर है, करीब 10 दिन लग जाएंगे,’’ श्रीकांत ने खाने की मेज पर बताया.

‘‘याद से अपनी दवाइयां ले जाना,’’ शांता के कहने पर श्रीकांत के मन में एक टीस उठी. बीमारी भी इसी के स्वभाव के कारण लगी और अब उच्च रक्तचाप की दवाईर् लेने की याद भी यही दिलाती है.

बेंगलुरु के सदा सुहावने मौसम के बारे में श्रीकांत ने सुन रखा था. शहर में पहुंच कर उस मौसम का आनंद लेना उसे और भी अच्छा लग रहा था. किसी अन्य मैट्रो शहर की भांति चौड़ी सड़कें, फ्लाईओवर, और अब तो मैट्रो का भी काम चल रहा था. लेकिन भीड़ हर जगह हो गई है. यहां भी कितना ट्रैफिक, गाडि़यों का कितना धुआं है, सोचता हुआ वह अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच गया.

सारा दिन दफ्तर में काम निबटाने के बाद शाम को वह व्हाइटफील्ड मौल में कुछ देर तरोताजा होने चला गया. इस मौल में अकसर कोई न कोई मेला आयोजित होता रहता है, ऐसा दफ्तर के सहकर्मियों ने बताया था. आज भी मौल के प्रवेशद्वार पर जो लंबाचौड़ा अहाता है वहां गोल्फ की नकली पिच बिछा कर खेल चल रहा था. श्रीकांत को कुछ अच्छे पल बिताने के अवसर कम मिलते थे. वह भी वहां खेलने के इरादे से चला गया. अपना नाम दर्ज करवा कर जब वह काउंटर पर गोल्फस्टिक लेने पहुंचा तो सामने सारिका को गोल्फस्टिक वापस रखते देख चौंक गया. आंखों के साथसाथ मुंह भी खुला रह गया.

‘‘तुम? यहां?’’ अटकते हुए उस के मुंह से अस्फुटित शब्द निकले. सारिका भी अचानक श्रीकांत को यहां देख अचंभित थी. शाम ढल चुकी थी. श्रीकांत पहले ही अपने दफ्तर का काम निबटा कर फ्री हो चुका था. सारिका भी खाली हो गई. दोनों उसी मौल के तीसरे माले पर इटैलियन क्विजीन खाने कैलिफोर्निया पिज्जा किचन रैस्तरां की ओर चल दिए. वहां सारिका ने चिकन फहीता पिज्जा और इटैलियन सोडा मंगवाया. सारिका ने जिस अंदाज और आत्मविश्वास से और्डर किया, उस से श्रीकांत समझ गया कि सारिका का ऐसी महंगी जगहों पर आनाजाना आम होता होगा.

‘‘और तुम क्या लोगे?’’ सारिका के पूछने पर श्रीकांत थोड़ा सकुचाया, कहा, ‘‘क्या अच्छा है यहां का?’’

‘‘मैं और्डर करती हूं तुम्हारे लिए. अ… तुम तो शाकाहारी हो न, तो तुम्हारे लिए कैलिफोर्निया वेजी पिज्जा और तुम्हें नींबूपानी पसंद था न, तो लेमोनेड,’’ कहते हुए सारिका ने वेटर को चलता किया.

‘‘तुम्हें अब भी मेरी पसंदनापसंद याद है?’’ श्रीकांत आश्चर्यचकित था और थोड़ा शर्मिंदा भी.

‘‘क्यों, तुम भुला पाए मुझे?’’ सारिका के इस प्रश्न ने श्रीकांत की आंखों से अतीत का परदा सरका दिया. उस की आंखों के सामने पुरानी बातें फिल्मी रील की तरह प्रतिबिंबित होने लगीं.

वडोदरा में नौकरी के पहले दिन ही श्रीकांत अपनी सहकर्मी सारिका पर आसक्त हो गया था. अप्रतिम सौंदर्य की मलिका, हंसे तो लगता था जैसे पंखुरी से होंठ नाच रहे हों, नयनकटारी ऐसी तीखी जैसे तेजधार तलवार, काजल की रेखा नयनों को और भी पैना बना देती. लेकिन वहीं, इतनी कठोर कि दफ्तर में किसीकी हिम्मत नहीं थी सारिका को कुछ ऐसावैसा कहने की.

‘अपनी दृष्टि काबू में रख, अभीअभी नौकरी शुरू की है, अभी से छोड़ने का इरादा है क्या?’ दफ्तर के एक दोस्त के पूछने पर श्रीकांत ने हैरतभरी दृष्टि उस पर डाली थी. ‘तेरी आंखें सारे राज खोल रही हैं. पर कुछ ऐसावैसा सोचना भी मत. सारिका देखने में जितनी सुंदर है उतनी ही सख्त भी. किसी को नहीं बख्शती.’

चेतावनी पाने पर श्रीकांत चुप हो गया था पर वह दिल ही क्या जो दिमाग की बात मान जाए. घूमफिर कर सारिका का खयाल जेहन में घूमता रहता. नियति को भी तरस आ गया. एक प्रोजैक्ट पर सारिका और श्रीकांत को साथ काम करने को कहा गया. दोस्ती हो गई. सारिका भी श्रीकांत की तरह अपने घरपरिवार से दूर यहां नौकरी के लिए आई थी. श्रीकांत की तरह वह भी एक फ्लैट में रहती थी.

‘क्या हुआ, आज बड़े उखड़े हुए लग रहे हो?’ सारिका ने उस दिन श्रीकांत का खराब मूड भांपते हुए पूछा.

‘क्या बताऊं, आज फिर मकानमालिक से झगड़ा हो गया. वह बहुत झगड़ालू है. सोच रहा हूं घर बदल लूं. कोई नजर में हो तो बताना.’ लेकिन उसी रात श्रीकांत, सारिका के दरवाजे पर अपना सामान लिए खड़ा था. ‘सौरी सारिका, इस समय कहीं और जाने का ठिकाना न हुआ. मकानमालिक ने मेरे घर पहुंचने से पहले से सामान बाहर कर दिया था. प्लीज, आज रात रुक जाने दो. कल से कोई और इंतजाम कर लूंगा.’

रात्रिभोजन के बाद श्रीकांत के मुंह से निकल गया, ‘इतना स्वादिष्ठ खाना, तुम में तो आदर्श बीवी बनने के सारे गुण हैं,’ श्रीकांत की आंखों ने भी उस की भावनाओं का साथ दे डाला. शायद सारिका के मन में भी कुछ पनप रहा था श्रीकांत के लिए, वह बस, शरमा कर मुसकरा दी.

श्रीकांत की हिम्मत बढ़ गई. वह फौरन सारिका के पास आ बैठा और धीरे से उस के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए बोला, ‘सारिका, कभी हिम्मत नहीं हुई तुम से कहने की पर…मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूं. तुम हो ही ऐसी.’ सारिका खामोशी से सब सुनती, नीची नजर किए मुसकराती रही. उस के मुखमंडल पर एक अलग ही लालिमा छाई थी. उस सौंदर्य को पी जाने की लालसा में श्रीकांत ने अपने अधर सारिका के अधरों पर अंकित कर दिए. फिर दोनों को किसी भी सीमा का आभास न रहा. कुंआरे प्यार ने सारे बांध तोड़ दिए.

अब दोनों साथ रहने लगे थे. दोनों एकदूसरे के साथ बेहद खुश थे. तृप्ति उन के चेहरों से झलकती थी. धीरेधीरे दफ्तर में भी यह बात खुल गई. सब को पता चल गया. युवा समाज वाकई काफी बदल गया है. अधिकतर सहकर्मियों ने इस बात को सहर्ष स्वीकारा. लेकिन जब बात परिवार तक आती है तब अकसर समाज अपना पुराना, जीर्ण, संकुचित रूप ही दिखाता है. यहां भी यही हुआ. सारिका के परिवार वाले उस पर शादी के लिए जोर डालने लगे. श्रीकांत ने अपने परिवार में बात छेड़ी, तो वहां मानो जंग छिड़ गई.

‘हाय, यह किस कलमुंही को हमारे घर की बहू बनाने की बात कर रहा है? ऐसी निर्लज्ज, जो ब्याह से पहले ही…मुझे तो कहने में भी लज्जा आती है,’ मां ने घर सिर पर उठा लिया.

‘और नहीं तो क्या, आदमी का क्या है, वह तो बहक ही जाता है. पर औरत को तो खुद पर संयम रखना चाहिए. ऐसे नीच संस्कारों वाली भाभी नहीं चाहिए मुझे,’ दीदी भी चुप नहीं थीं.

‘अरे, चुप हो तुम सब. बिना पत्रीमिलान करे मैं इस की शादी की इजाजत नहीं दे सकता. पहले उस लड़की की पत्री मंगवा कर मुझे दे,’ पिताजी ने आखिरी फरमान सुनाया.

सब की बातों को दरकिनार कर श्रीकांत ने सारिका की पत्री अपने पिता को दी. उस ने सोचा, एक बार शादी हो जाएगी, तो सारिका अपने व्यवहार और निपुणता से सब का दिल स्वयं ही मोह लेगी.

‘इस लड़की की उम्र बहुत कम है, अधिक से अधिक एकडेढ़ वर्ष, और तब तक यह बीमारियों का शिकार रहेगी. इस के संसार छोड़ने से पहले श्रीकांत ने इसे गृहस्थ सुख का वरदान दिया, इस के लिए श्रीकांत को अवश्य लाभ मिलेगा. किंतु, अब बस. अब इस से नाता तोड़ो और जहां कुंडली मिलान हो वहां गृहस्थी बसाओ,’ पिताजी की इस अप्रत्याशित बात से श्रीकांत के पांवतले की जमीन सरक गई. वह तो सारिका के साथ जीवन के सुनहरे स्वप्न संजो रहा था और यहां तो बात ही खत्म. आगे किसी बहस की कोई गुंजाइश नहीं थी. श्रीकांत को नौकरी छोड़ कर अपने शहर लौटने का आदेश दे दिया गया था. फटाफट अपने ही शहर की एक कुलीन कन्या से पत्री मिलान करवाया जा चुका था.

जब श्रीकांत अपना सामान लेने आखिरी बार वडोदरा गया था तब सारिका उस के समक्ष फूटफूट कर रोई थी. ‘मेरी क्या गलती है, श्रीकांत? तुम मुझे यों मझधार में नहीं छोड़ सकते. सब को हमारे रिश्ते के बारे में पता है. तुम तो शादी कर लोगे, मेरा क्या होगा? मुझे कोई बीमारी नहीं है. मैं स्वस्थ हूं. बेकार की बातों में तुम हमारा भविष्य खराब करने पर राजी कैसे हो गए?’ पर श्रीकांत चुप रहा. आखिरी समय तक, स्टेशन पर गाड़ी में सवार होने तक सारिका प्रयास करती रही कि शायद श्रीकांत कुछ नम्र पड़ जाए.

अनकहा प्यार : 40 साल की औरत की जिंदगी को दर्शाती कहानी – भाग 1

वे फिर मिलेंगे. उन्हें भरोसा नहीं था. पहले तो पहचानने में एकदो मिनट लगे उन्हें एकदूसरे को. वे पार्क में मिले. सबीना का जबजब अपने पति से झगड़ा होता, तो वह एकांत में आ कर बैठ जाती. ऐसा एकांत जहां भीड़ थी. सुरक्षा थी. लेकिन फिर भी वह अकेली थी. उस की उम्र 40 वर्ष के आसपास थी. रंग गोरा, लेकिन चेहरा अपनी रंगत खो चुका था. आधे से ज्यादा बाल सफेद हो चुके थे. जो मेहंदी के रंग में डूब कर लाल थे. आंखें बुझबुझ सी थीं.

वह अपने में खोईर् थी. अपने जीवन से तंग आ चुकी थी. मन करता था कि  कहीं भाग जाए. डूब मरे किसी नदी में. लेकिन बेटे का खयाल आते ही वह अपने झलसे और उलझे विचारों को झटक देती. क्याक्या नहीं हुआ उस के साथ. पहले पति ने तलाक दे कर दूसरा विवाह किया. उस के पास अपना जीवन चलाने का कोई साधन नहीं था. उस पर बेटे सलीम की जिम्मेदारी.

पति हर माह कुछ रुपए भेज देता था. लेकिन इतने कम रुपयों में घर चलाए या बेटे की परवरिश अच्छी तरह करे. मातापिता स्वयं वृद्ध, लाचार और गरीब थे. एक भाई था जो बड़ी मुश्किल से अपना गुजारा चलाता था. अपना परिवार पालता था. साथ में मातापिता भी थे. वह उन से किस तरह सहयोग की अपेक्षा कर सकती थी.

उस ने एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने का काम शुरू कर दिया. वह अंगरेजी में एमए के साथ बीएड भी थी. सो, उसे आसानी से नौकरी मिल गई. सरकारी नौकरी की उस की उम्र निकल चुकी थी. वह सोचती, आमिर यदि बच्चा होने के पहले या शादी के कुछ वर्ष बाद तलाक दे देता, तो वह सरकारी नौकरी तो तलाश सकती थी. उस समय उस की उम्र सरकारी नौकरी के लायक थी. शादी के कुछ समय बाद जब उस ने आमिर के सामने नौकरी करने की बात कही, तो वह भड़क उठा था कि हमारे खानदान में औरतें नौकरी नहीं करतीं.

उम्र गुजरती रही. आमिर दुबई में इंजीनियर था. अच्छा वेतन मिलता था. किसी चीज की कमी नहीं थी. साल में एकदो बार आता और सालभर की खुशियां हफ्तेभर में दे कर चला जाता. एक दिन आमिर ने दुबई से ही फोन कर के उसे यह कहते हुए तलाक दे दिया कि यहां काम करने वाली एक अमेरिकन लड़की से मुझे प्यार हो गया है. मैं तुम्हें हर महीने हर्जाखर्चा भेजता रहूंगा. मुझे अपनी गलती का एहसास तो है, लेकिन मैं दिल के हाथों मजबूर हूं. एक बार वापस आया तो तलाक की शेष शर्तें मौलवी के सामने पूरी कर दीं और चला गया. इस बीच एक बेटा हो चुका था.

आमिर को कुछ बेटे के प्रेम ने खींचा और कुछ अमेरिकन पत्नी की प्रताड़ना ने सबीना की याद दिलाई. और वह माफी मांगते हुए दुबई से वापस आ गए. लेकिन सबीना से फिर से विवाह के लिए उसे हलाला से हो कर गुजरना था. सबीना इस के लिए तैयार नहीं हुई. आमिर ने मौलवी से फिर निकाह के विकल्प पूछे जिस से सबीना राजी हो सके. मौलवी ने कहा कि 3 लाख रुपए खर्च करने होंगे. निकाह का मात्र दिखावा होगा. तुम्हारी पत्नी को उस का शौहर हाथ भी नहीं लगाएगा. कुछ समय बाद तलाक दे देगा.

‘ऐसा संभव है,’ आमिर ने पूछा.

‘पैसा हो तो कुछ भी असंभव नहीं,’ मौलाना ने कहा.

‘कुछ लोग करते हैं यह बिजनैस अपनी गरीबी के कारण. लेकिन यह बात राज ही रहनी चाहिए.’

‘मैं तैयार हूं,’ आमिर ने कहा और सबीना को सारी बात समझई. सबीना न चाहते हुए भी तैयार हो गई. सबीना को अपनी इच्छा के विरुद्ध निकाह करना पड़ा. कुछ समय गुजारना पड़ा पत्नी बन कर एक अधेड़ व्यक्ति के साथ. फिर तलाक ले कर सबीना से आमिर ने फिर निकाह कर लिया.

साथ साथ : उस दिन कौन सी अनहोनी हुई थी रुखसाना और रज्जाक के साथ ? – भाग 1

आपरेशन थियेटर के दरवाजे पर लालबत्ती अब भी जल रही थी और रुखसाना बेगम की नजर लगातार उस पर टिकी थी. पलकें मानो झपकना ही भूल गई थीं, लग रहा था जैसे उसी लालबत्ती की चमक पर उस की जिंदगी रुकी है.

रुखसाना की जिंदगी जिस धुरी के चारों तरफ घूमती थी वही रज्जाक मियां अंदर आपरेशन टेबल पर जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे. जिन बांहों का सहारा ले कर वह कश्मीर के एक छोटे से गांव से सुदूर कोलकाता आई थी उन्हीं बांहों पर 3-3 गोलियां लगी थीं. शायद उस बांह को काट कर शरीर से अलग करना पड़े, ऐसा ही कुछ डाक्टर साहब कह रहे थे उस के मकान मालिक गोविंदरामजी से. रुखसाना की तो जैसे उस वक्त सुनने की शक्ति भी कमजोर पड़ गई थी.

क्या सोच रहे होंगे गोविंदरामजी और उन की पत्नी शीला उस के और रज्जाक के बारे में? कुछ भी सोचें पर भला हो शीला बहन का जो उन्होंने उस के 1 साल के पुत्र रफीक को अपने पास घर में ही रख लिया, वरना वह क्या करती? यहां तो अपने ही खानेपीने की कोई सुध नहीं है.

रुखसाना ने मन ही मन ठान लिया कि अब जब घर लौटेगी तो गोविंद भाई साहब और शीला भाभी को अपने बारे में सबकुछ सचसच बता देगी. जिन से छिपाना था जब उन्हीं से नहीं छिपा तो अब किस का डर? और फिर गोविंद भाई और शीला भाभी ने उस के इस मुसीबत के समय जो उपकार किया, वह तो कोई अपना ही कर सकता है न. अपनों की बात आते ही रुखसाना की आंखों के आगे उस का अतीत घूम गया.

ऊंचेऊंचे बर्फ से ढके पहाड़, हरेभरे मैदान, बीचबीच में पहाड़ी झरने और उन के बीच अपनी सखियों और भाईबहनों के साथ हंसताखेलता रुखसाना का बचपन.

वह रहा सरहद के पास उस का बदनसीब गांव जहां के लोग नहीं जानते कि उन्हें किस बात की सजा मिल रही है. साल पर साल, कभी मजहब के नाम पर तो कभी धरती के नाम पर, कभी कोई वरदीधारी तो कभी कोई नकाबधारी यह कहता कि वतन के नाम पर वफा करो… धर्म के नाम पर वफा करो, बेवफाई की सजा मौत है.

रुखसाना को अब भी याद है कि दरवाजे पर दस्तक पड़ते ही अम्मीजान कैसे 3 बहनों को और जवान बेवा भाभी को अंदर खींच कर तहखाने में बिठा देती थीं और अब्बूजान सहमेसहमे दरवाजा खोलते.

इन्हीं भयावह हालात में जिंदगी अपनी रफ्तार से गुजर रही थी.

कहते हैं हंसतेखेलते बचपन के बाद जवानी आती ही आती है पर यहां तो जवानी मातम का पैगाम ले कर आई थी. अब्बू ने घर से मेरा निकलना ही बंद करवा दिया था. न सखियों से हंसना- बोलना, न खुली वादियों में घूमना. जब देखो इज्जत का डर. जवानी क्या आई जैसे कोई आफत आ गई.

उस रोज मझली को बुखार चढ़ आया था तो छोटी को साथ ले कर वह ही पानी भरने आई थी. बड़े दिनों के बाद घर से बाहर निकलने का उसे मौका मिला था. चेहरे से परदा उठा कर आंखें बंद किए वह पहाड़ी हवा का आनंद ले रही थी. छोटी थोड़ी दूरी पर एक बकरी के बच्चे से खेल रही थी.

सहसा किसी की गरम सांसों को उस ने अपने बहुत करीब अनुभव किया. फिर आंखें जो खुलीं तो खुली की खुली ही रह गईं. जवानी की दहलीज पर कदम रखने के बाद यह पहला मौका था जब किसी अजनबी पुरुष से इतना करीबी सामना हुआ था. इस से पहले उस ने जो भी अजनबी पुरुष देखे थे वे या तो वरदीधारी थे या नकाबधारी…रुखसाना को उन दोनों से ही डर लगता था.

लंबा कद, गठा हुआ बदन, तीखे नैननक्श, रूखे चेहरे पर कठोरता और कोमलता का अजीब सा मिश्रण. रुखसाना को लगा जैसे उस के दिल ने धड़कना ही बंद कर दिया हो. अपने मदहोशी के आलम में उसे इस बात का भी खयाल न रहा कि वह बेपरदा है.

तभी अजनबी युवक बोल उठा, ‘वाह, क्या खूब. समझ नहीं आता, इस हसीन वादी को देखूं या आप के हुस्न को. 3-4 रात की थकान तो चुटकी में दूर हो गई.’

शायराना अंदाज में कहे इन शब्दों के कानों में पड़ते ही रुखसाना जैसे होश में आ गई. लजा कर परदा गिरा लिया और उठ खड़ी हुई.

अजनबी युवक फिर बोला, ‘वैसे गुलाम को रज्जाक कहते हैं और आप?’

‘रुखसाना बेगम,’ कहते हुए उस ने घर का रुख किया. इस अजनबी से दूर जाना ही अच्छा है. कहीं उस ने उस के दिल की कमजोरी को समझ लिया तो बस, कयामत ही आ जाएगी.

‘कहीं आप अब्दुल मौला की बेटी रुखसाना तो नहीं?’

‘हां, आप ने सही पहचाना. पर आप को इतना कैसे मालूम?’

‘अरे, मुझे तो यह भी पता है कि आप के मकान में एक तहखाना है और फिलहाल मेरा डेरा भी वहीं है.’

अजनबी युवक का इतना कहना था कि रुखसाना का हाथ अपनेआप उस के सीने पर ठहर गया जैसे वह तेजी से बढ़ती धड़कनों को रोकने की कोशिश कर रही हो. दिल आया भी तो किस पत्थर दिल पर. वह जानती थी कि तहखानों में किन लोगों को रखा जाता है.

पिछली बार जब महजबीन से बात हुई थी तब वह भी कुछ ऐसा ही कह रही थी. उस का लोभीलालची अब्बा तो कभी अपना तहखाना खाली ही नहीं रखता. हमेशा 2-3 जेहादियों को भरे रखता है और महजबीन से जबरदस्ती उन लोगों की हर तरह की खिदमत करवाता है. बदले में उन से मोटी रकम ऐंठता है. एक बार जब महजबीन ने उन से हुक्मउदूली की थी तो उस के अब्बू के सामने ही जेहादियों ने उसे बेपरदा कर पीटा था और उस के अब्बू दूसरी तरफ मुंह घुमाए बैठे थे.

तब रुखसाना का चेहरा यह सुन कर गुस्से से तमतमा उठा था पर लाचार महजबीन ने तो हालात से समझौता कर लिया था. उस के अब्बू में तो यह अच्छाई है कि वह पैसे के लालची नहीं हैं और जब से उस के सीधेसादे बड़े भाई साहब को जेहादी उठा कर ले गए तब से तो अब्बा इन जेहादियों से कुछ कटेकटे ही रहते हैं. पर अब सुना है कि अब्बू के छोटे भाई साहब जेहादियों से जा मिले हैं. क्या पता यह उन की ही करतूत हो.

एक अनजानी दहशत से रुखसाना का दिल कांप उठा था. उसे अपनी बरबादी बहुत करीब नजर आ रही थी. भलाई इसी में है कि इस अजनबी को यहीं से चलता कर दे.

कुछ कहने के उद्देश्य से रुखसाना ने ज्यों ही पलट कर उस अजनबी को देखा तो उस के जवान खूबसूरत चेहरे की कशिश रुखसाना को कमजोर बना गई और होंठ अपनेआप सिल गए. रज्जाक अभी भी मुहब्बत भरी नजरों से उसी को निहार रहा था.

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