Download App

Top 10 Family Stories In Hindi: ‘रिश्तों की अजीब कशमकश’, पढ़ें टॉप 10 फैमिली स्टोरी हिंदी में

Top 10 family story In Hindi: हर किसी की जिंदगी को बेहतर बनाने में उसके परिवार का अहम योगदान होता है. हालांकि कई परिवार ऐसे भी होते हैं, जहां लड़के- लड़कियों के साथ कई तरह के भेदभाव किए जाते हैं. आज इस आर्टिकल में हम आपके लिए लेकर आए हैं सरिता की 10 Best Family Story in Hindi 2024. इन कहानियों में परिवार, समाज और रिश्तों से जुड़ी कई दिलचस्प कहानियां हैं जो आपके दिल को छू लेगी और रिश्तों को लेकर एक नया नजरिया और सीख भी देगी.

1. असली चेहरा: क्यों अवंतिका अपने पति की बुराई करती थी?

family story

नई कालोनी में आए मुझे काफी दिन हो गए थे. किंतु समयाभाव के कारण किसी से मिलनाजुलना नहीं हो पाता था. इसी वजह से किसी से मेरी कोई खास जानपहचान नहीं हो पाई थी. स्कूल में टीचर होने के कारण मुझे घर से सुबह 8 बजे निकलना पड़ता और 3 बजे वापस आने के बाद घर के काम निबटातेनिबटाते शाम हो जाती थी. किसी से मिलनेजुलने की सोचने तक की फुरसत नहीं मिल पाती थी. मेरे घर से थोड़ी दूर पर ही अवंतिका का घर था. उस की बेटी योगिता मेरे ही स्कूल में और मेरी ही कक्षा की विद्यार्थी थी. वह योगिता को छोड़ने बसस्टौप पर आती थी. उस से मेरी बातचीत होने लगी. फिर धीरेधीरे हम दोनों के बीच एक अच्छा रिश्ता कायम हो गया. फिर शाम को अवंतिका मेरे घर भी आने लगी. देर तक इधरउधर की बातें करती रहती.

अवंतिका से मिल कर मुझे अच्छा लगता था. उस की बातचीत का ढंग बहुत प्रभावशाली था. उस के पहनावे और साजशृंगार से उस के काफी संपन्न होने का भी एहसास होता था. मैं खुश थी कि एक नई जगह अवंतिका के रूप में मुझे एक अच्छी सहेली मिल गई है. योगिता वैसे तो पढ़ाई में ठीक थी पर अकसर होमवर्क कर के नहीं लाती थी. जब पहले दिन मैं ने उसे डांटते हुए होमवर्क न करने का कारण पूछा, तो उस ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, ‘‘पापा ने मम्मा को डांटा था, इसलिए मम्मा रो रही थीं और मेरा होमवर्क नहीं करा पाईं.’’ योगिता आगे भी अकसर होमवर्क कर के नहीं लाती थी और पूछने पर कारण हमेशा मम्मापापा का झगड़ा ही बताती थी.

2. अग्निपरीक्षा: श्रेष्ठा की जिंदगी में क्या तूफान आया?

family story

जीवन प्रकृति की गोद में बसा एक खूबसूरत, मनोरम पहाड़ी रास्ता नहीं है क्या, जहां मानव सुख से अपनों के साथ प्रकृति के दिए उपहारों का आनंद उठाते हुए आगे बढ़ता रहता है.

फिर अचानक किसी घुमावदार मोड़ पर अतीत को जाती कोई संकरी पगडंडी उस की खुशियों को हरने के लिए प्रकट हो जाती है. चिंतित कर, दुविधा में डाल उस की हृदय गति बढ़ाती. उसे बीते हुए कुछ कड़वे अनुभवों को याद करने के लिए मजबूर करती.

श्रेष्ठा भी आज अचानक ऐसी ही एक पगडंडी पर आ खड़ी हुई थी, जहां कोई जबरदस्ती उसे बीते लमहों के अंधेरे में खींचने का प्रयास कर रहा था. जानबूझ कर उस के वर्तमान को उजाड़ने के उद्देश्य से.

श्रेष्ठा एक खूबसूरत नवविवाहिता, जिस ने संयम से विवाह के समय अपने अतीत के दुखदायी पन्ने स्वयं अपने हाथों से जला दिए थे. 6 माह पहले दोनों परिणय सूत्र में बंधे थे और पूरी निष्ठा से एकदूसरे को समझते हुए, एकदूसरे को सम्मान देते हुए गृहस्थी की गाड़ी उस खूबसूरत पहाड़ी रास्ते पर दौड़ा रहे थे. श्रेष्ठा पूरी ईमानदारी से अपने अतीत से बाहर निकल संयम व उस के मातापिता को अपनाने लगी थी.

जीवन की राह सुखद थी, जिस पर वे दोनों हंसतेमुसकराते आगे बढ़ रहे थे कि अचानक रविवार की एक शाम आदेश को अपनी ससुराल आया देख उस के हृदय को संदेह के बिच्छु डसने लगे.

श्रेष्ठा के बचपन के मित्र के रूप में अपना परिचय देने के कारण आदेश को घर में प्रवेश व सम्मान तुरंत ही मिल गया, सासससुर ने उसे बड़े ही आदर से बैठक में बैठाया व श्रेष्ठा को चायनाश्ता लाने को कहा.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

3.  शक की निगाह : नीरा स्टूडैंट्स के आने से परेशान क्यों थी

family story

शाम को औफिस से घर आया तो पत्नी का उतरा हुआ चेहरा देख कर कुछ न कुछ गड़बड़ होने का अंदेशा हो गया. बिना कुछ पूछे मैं हाथमुंह धोने के लिए बाथरूम में चला गया. वापस आया तो नीरा चाय ले कर बैठी मेरा इंतजार कर रही थी. चाय के कप के साथ ही मैं ने अपनी प्रश्नवाचक निगाह उस के चेहरे पर टिका दी. प्रश्न स्पष्ट था, ‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘सामने वाले फ्लैट को रामवीर सहायजी ने स्टूडैंट्स को किराए पर दे दिया है,’’ नीरा के स्वर में झल्लाहट और रोष दोनों ही टपक रहे थे. ‘‘यह तो बहुत ही अच्छा हुआ. इतने महीने से फ्लैट खाली पड़ा हुआ था, अब चहलपहल रहेगी. वैसे भी जहां स्टूडैंट्स रहते हैं वहां चौबीसों घंटे रौनक रहती है. न कभी रात होती है न कभी दिन. एक सोता है तो दूसरा जागता है. पर तुम इतना परेशान क्यों हो रही हो?’’ मैं ने पूछा तो नीरा बिफर पड़ी, ‘‘तुम आदमियों का दिमाग तो जैसे घुटने में रहता है. आजकल के लड़के पढ़ाई के नाम पर घरों से दूर रह कर क्याक्या गुल खिलाते रहते हैं, क्या कभी सुना नहीं? मांबाप सोचते हैं उन का बेटा दिनरात एक कर के पढ़ाई में लगा होगा जबकि लड़के उन के पैसों पर गुलछर्रे उड़ाते रहते हैं.’’

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

4. दिस इज़ टू मच : हंसते- खेलते घर को किसकी नजर लग गई थी

family story

 ‘दिस इज़ टू मच’ यह शब्द शूल की तरह मेरे हृदय को भेद रहे हैं. मानो मेरे कानों में कोई पिघला शीशा उड़ेल रहा हो. मेरा घर भी अखबारों की सुर्खियां बनेगा यह तो मैंने स्वप्न में भी ना सोचा था. हमारे हंसते खेलते घर को न जाने किसकी बुरी नजर लग गई. हम चार जनों का छोटा सा खुशहाल परिवार – बेटा बी0टेक0 थर्ड ईयर का छात्र और बेटी बी0टेक0 फर्स्ट ईयर की.

कोरोन संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए जब सभी कॉलेजों और स्कूलों से विद्यार्थियों को घर वापस भेजा जाने लगा और मेरा भी विद्यालय बंद हो गया तो मैं प्रसन्न हो गई कि बरसों बाद अपने बच्चों के साथ मुझे समय बिताने का मौका मिलेगा.

कानपुर आईआईटी में पढ़ने वाला मेरा बेटा और बीबीडी इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने वाली मेरी बेटी जब घर आए तो मेरा घर गुलज़ार होगया. नरेंद्र अपनी पुलिस की ड्यूटी निभाने में व्यस्त रहते थे और मैं क्वेश्चन पेपर बनाने, वर्कशीट बनाने और लिखने पढ़ने में. बस यही व्यस्त दिनचर्या रह गई थी हमारी.

जब बच्चे घर आए तो उनसे बातें करते, मिलजुल कर घर के काम करते, और साथ बैठकर टीवी देखते तथा मज़े करते दिन कैसे बीत जाता पता ही नहीं चलता.

पर मेरी यह खुशी ज्यादा दिन नटिक पाई. सौरभ और सुरभि ने कुछ दिनों तो मेरे साथ खुशी-खुशी समय बिताया, फिर बोर होने लगे, बातों का खज़ाना खाली हो गया और घर का काम बोझ लगने लगा, उमंग और उल्लास का स्रोत सूखने लगा. दोनों अपने-अपने कमरों में अपने-अपने मोबाइल और लैपटॉप के साथ अपनी ही दुनिया में मगन रहते.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

5. सोच : सलोनी को अपनी जेठानी गंवार क्यों लगती थी

family story

‘‘तो कितने दिनों के लिए जा रही हो?’’ प्लेट से एक और समोसा उठाते हुए दीपाली ने पूछा.

‘‘यही कोई 8-10 दिनों के लिए,’’ सलोनी ने उकताए से स्वर में कहा.

औफिस के टी ब्रेक के दौरान दोनों सहेलियां कैंटीन में बैठी बतिया रही थीं.

सलोनी की कुछ महीने पहले ही दीपेन से नईनई शादी हुई थी. दोनों साथ काम करते थे. कब प्यार हुआ पता नहीं चला और फिर चट मंगनी पट ब्याह की तर्ज पर अब दोनों शादी कर के एक ही औफिस में काम कर रहे थे, बस डिपार्टमैंट अलग था. सारा दिन एक ही जगह काम करने के बावजूद उन्हें एकदूसरे से मिलनेजुलने की फुरसत नहीं होती थी. आईटी क्षेत्र की नौकरी ही कुछ ऐसी होती है.

‘‘अच्छा एक बात बताओ कि तुम रह कैसे लेती हो उस जगह? तुम ने बताया था कि किसी देहात में है तुम्हारी ससुराल,’’ दीपाली आज पूरे मूड में थी सलोनी को चिढ़ाने के. वह जानती थी ससुराल के नाम से कैसे चिढ़ जाती है सलोनी.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

6. चिराग : रिश्तों की अजीब कशमकश

family story

कानपुर रेलवे स्टेशन पर परिवार के सभी लोग मुझ को विदा करने आए थे, मां, पिताजी और तीनों भाई, भाभियां. सब की आंखोें में आंसू थे. पिताजी और मां हमेशा की तरह बेहद उदास थे कि उन की पहली संतान और अकेली पुत्री पता नहीं कब उन से फिर मिलेगी. मुझे इस बार भारत में अकेले ही आना पड़ा. बच्चों की छुट्टियां नहीं थीं. वे तीनों अब कालेज जाने लगे थे. जब स्कूल जाते थे तो उन को बहलाफुसला कर भारत ले आती थी. लेकिन अब वे अपनी मरजी के मालिक थे. हां, इन का आने का काफी मन था परंतु तीनों बच्चों के ऊपर घर छोड़ कर भी तो नहीं आया जा सकता था. इस बार पूरे 3 महीने भारत में रही. 2 महीने कानपुर में मायके में बिताए और 1 महीना ससुराल में अम्मा व बाबूजी के साथ.

मैं सब से गले मिली. ट्रेन चलने में अब कुछ मिनट ही शेष रह गए थे. पिताजी ने कहा, ‘‘बेटी, चढ़ जाओ डब्बे में. पहुंचते ही फोन करना.’’ पता नहीं क्यों मेरा मन टूटने सा लगा. डब्बे के दरवाजे पर जातेजाते कदम वापस मुड़ गए. मैं मां और पिताजी से चिपट गई. गाड़ी चल दी. सब लोग हाथ हिला रहे थे. मेरी आंखें तो बस मां और पिताजी पर ही केंद्रित थीं. कुछ देर में सब ओझल हो गए. डब्बे के शौचालय में जा कर मैं ने मुंह धोया. रोने से आंखें लाल हो गई थीं. वापस आ कर अपनी सीट पर बैठ गई. मेरे सामने 3 यात्री बैठे थे, पतिपत्नी और उन का 10-11 वर्षीय बेटा. लड़का और उस के पिता खिड़की वाली सीटों पर विराजमान थे. हम दोनों महिलाएं आमनेसामने थीं, अपनीअपनी दुनिया में खोई हुईं.

7. सबक : सुधीर के नए संबंधों के बारे में जान कर क्या थी अनु की कशमकश

family story

रक्षाबंधन पर मैं मायके गई तो भैया ने मेरे ननदोई सुधीर जीजाजी के विषय में कुछ ऐसा बताया जिसे सुन कर मुझे विश्वास नहीं हुआ.

‘‘नहीं भैया, ऐसा हो ही नहीं सकता, जरूर आप को कोई भ्रम हुआ होगा.’’

‘‘नहीं अनु, मुझे कोई भ्रम नहीं हुआ. पिछले महीने औफिस के काम से दिल्ली गया तो सोचा, सुधीर से भी मिल लूं क्योंकि उन से मुलाकात हुए काफी अरसा हो चुका था. काम से फारिग होने के बाद जब मैं सुधीर के घर पहुंचा तो वे मुझे अचानक आया हुआ देख कर कुछ घबरा से गए. उन्होंने मेरा स्वागत वैसा नहीं किया जैसा कि मेरे पहुंचने पर अकसर किया करते थे. तभी मेरी नजर शोकेस में रखी एक तसवीर पर गई. उस तसवीर में सुधीर के साथ संध्या नहीं, कोई और युवती थी. जब मैं बाथरूम से फ्रैश हो कर आया तो वह तसवीर वहां से गायब थी लेकिन वह तसवीर वाली युवती ही उन की रसोई में चायनाश्ता तैयार कर रही थी.’’

‘‘भैया, हो सकता है वह उन की मेड हो.’’

‘‘शायद मैं भी यही समझता, अगर मैं ने वह तसवीर न देखी होती.’’

‘‘देखने में कैसी थी वह युवती?’’ मैं अपनी उत्सुकता छिपा न सकी.

देखने में सुंदर मगर बहुत ही साधारण थी. एक बात और मैं ने नोटिस की, मेरे अचानक आ जाने से वह सुधीर की तरह असहज नहीं थी, बिलकुल सामान्य नजर आ रही थी. उस के हाथ की चाय और नाश्ते में आलूप्याज की पकौडि़यों और सूजी के हलवे के स्वाद से ही मैं ने जान लिया था कि वह साक्षात अन्नपूर्णा होने के साथसाथ एक कुशल गृहिणी है.

8. रिश्तों का कटु सत्य : अपने जब छलकपट से दुख देते हैं तो क्या होता है

family story

उस दिन दोनों ने अपनेअपने काम से छुट्टी ली थी. कई दिनों से दोनों ने एक फैसला लिया था कि वे अपने पुश्तैनी मकान में रहेंगे, क्योंकि आंटी का रिटायरमैंट करीब था और अंकल भी अपनी सेहत के चलते कचहरी के अपने काम को ज्यादा नहीं ले रहे थे. शुगर होने के चलते थक जाते थे. अंकल और आंटी को हालांकि आंटी के अनुज के बच्चों का पूरा प्यार और अपनत्व मिल जाता था, लेकिन वास्तविकता में दोनों ही एकदूसरे का सच्चा सहारा थे.

पारिवारिक मूल्यों को बखूबी समझने वाले अंकल ने अब तक जो कमाया, सारा का सारा अपनी मां और अपने भाईभतीजों को ही दिया था. आंटी की एक निजी विद्यालय में नौकरी थी, उसी से उन का घरखर्च चल रहा था. इसी सब के चलते दोनों ने किराए के मकान को छोड़ कर अपने पुश्तैनी मकान के फर्स्टफ्लोर के अपने कमरे में जा कर रहने का फैसला लिया था.

लगभग 30 वर्षों पहले दोनों किराए के मकान में आ गए थे. आंटी जब से ससुराल में ब्याह कर आई थीं, वहां उन्होंने कलहक्लेश, झगड़े जैसा माहौल ही देखा था. घर के किसी भी सदस्य का व्यवहार अच्छा नहीं था. ताने, उलाहने, मारपीट, भद्दी भाषा और चरित्रहीनता जैसे उन के आचरण से तंग आ कर ही अंकल और आंटी ने एक दिन अपना जरूरी सामान बांधा और एक रिकशा में सवार हो कर घर से निकल पड़े.

मानसिक अशांति से थोड़ी राहत तो पाई, लेकिन बहुत सी कठिनाइयों से उन्हें दोचार होना पड़ा, क्योंकि उन के पास पलंगबरतन कुछ भी नहीं था. हर चीज पर घरवालों ने अधिकार जमा रखा था. वह घर नहीं, मुसीबतों का एक अड्डा नजर आता था. पानी की एक बूंद को तरसते थे.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

9. अनाम रिश्ता : नेहा और अनिरुद्ध के रिश्ते का क्या था हाल

family story

आज मेरे लिए बहुत ही खुशी का दिन है क्योंकि विश्वविद्यालय ने 15 वर्षों तक निस्वार्थ और लगनपूर्वक की गई मेरी सेवा के परिणामस्वरूप मुझे कालेज का प्रिंसिपल बनाने का निर्णय लिया था. आज शाम को ही पदग्रहण समारोह होने वाला है. परंतु न जाने क्यों रहरह कर मेरा मन बहुत ही उद्विग्न हो रहा है.

‘अभी तो सिर्फ 9 बजे हैं और ड्राइवर 2 बजे तक आएगा. तब तक मैं क्या करूं…’ मैं मन ही मन बुदबुदाई और रसोई की ओर चल दी. सोचा कौफी पी लूं, क्या पता तब मन को कुछ राहत मिले.

कौफी का मग हाथ में ले कर जैसे ही मैं सोफे पर बैठी, हमेशा की तरह मुझे कुछ पढ़ने की तलब हुई. मेज पर कई पत्रिकाएं रखी हुई थीं. लेकिन मेरा मन तो आज कुछ और ही पढ़ना चाह रहा था. मैं ने यंत्रवत उठ कर अपनी किताबों की अलमारी खोली और वह किताब निकाली जिसे मैं अनगिनत बार पढ़ चुकी हूं. जब भी मैं इस किताब को हाथ में लेती हूं, एक अलग ही एहसास होता है मुझे, मन को अपार सुख व शांति मिलती है.

‘आप मेरी जिंदगी में गुजरे हुए वक्त की तरह हैं सर, जो कभी लौट कर नहीं आ सकता. लेकिन मेरी हर सांस के साथ आप का एहसास डूबताउतरता रहता है,’ अनायास ही मेरे मुंह से अल्फाज निकल पड़े और मैं डूबने लगी 30 वर्ष पीछे अतीत की गहराइयों में जब मैं परिस्थितियों की मारी एक मजबूर लड़की थी, जो अपने साए तक से डरती थी कि कहीं मेरा यह साया किसी को बरबाद न कर दे.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

 

10. सुधरा संबंध: निलेश और उस की पत्नी क्यों अलग हो गए?

family story

शादी की वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर हम दोनों पतिपत्नी साथ बैठे चाय की चुसकियां ले रहे थे. संसार की दृष्टि में हम आदर्श युगल थे. प्रेम भी बहुत है अब हम दोनों में. लेकिन कुछ समय पहले या कहिए कुछ साल पहले ऐसा नहीं था. उस समय तो ऐसा प्रतीत होता था कि संबंधों पर समय की धूल जम रही है.

मुकदमा 2 साल तक चला था तब. आखिर पतिपत्नी के तलाक का मुकदमा था. तलाक के केस की वजह बहुत ही मामूली बातें थीं. इन मामूली सी बातों को बढ़ाचढ़ा कर बड़ी घटना में ननद ने बदल दिया. निलेश ने आव देखा न ताव जड़ दिए 2 थप्पड़ मेरे गाल पर. मुझ से यह अपमान नहीं सहा गया. यह मेरे आत्मसम्मान के खिलाफ था. वैसे भी शादी के बाद से ही हमारा रिश्ता सिर्फ पतिपत्नी का ही था. उस घर की मैं सिर्फ जरूरत थी, सास को मेरे आने से अपनी सत्ता हिलती लगी थी, इसलिए रोज एक नया बखेड़ा. निलेश को मुझ से ज्यादा अपने परिवार पर विश्वास था और उन का परिवार उन की मां तथा एक बहन थीं. मौका मिलते ही मैं अपने बेटे को ले कर अपने घर चली गई. मुझे इस तरह आया देख कर मातापिता सकते में आ गए. बहुत समझाने की कोशिश की मुझे पर मैं ने तो अलग होने का मन बना लिया था. अत: मेरी जिद के आगे घुटने टेक दिए.

दोनों ओर से अदालत में केस दर्ज कर दिए गए. चाहते तो मामले को रफादफा भी किया जा सकता था, पर निलेश ने इसे अपनी तौहीन समझा. रिश्तेदारों ने मामले को और पेचीदा बना दिया. न सिर्फ पेचीदा, बल्कि संगीन भी. सब रिश्तेदारों ने इसे खानदान की नाक कटना कहा. यह भी कहा कि ऐसी औरत न वफादार होती है न पतिव्रता. इसे घर में रखना, अपने शरीर में मियादी बुखार पालते रहने जैसा है.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

हिंदी सिनेमा में सीनियर कलाकारों को लेकर कम फिल्म बनने की वजह क्या है, जानें यहां

पुराने कलाकारों की सफल फिल्मों की अगर बात करें, आज भी ऐसे कलाकारों की फिल्में दर्शक पसंद करते हैं, फिर चाहे वह धर्मेंद्र, शबाना आजमी, अमिताभ बच्चन, शर्मिला टैगोर, अनुपम खेर, नीना गुप्ता, वहीदा रहमान, नाना पाटेकर, अनिल कपूर, जैकी श्रौफ आदि किसी की भी फिल्म हो, दर्शक देखना पसंद करते हैं लेकिन इन्हें ले कर फिल्म बनाने वाले निर्माता निर्देशक की संख्या कम है.

इन कलाकारों की फिल्मों का क्रेज पहले भी था और आज भी है. वे फिल्मों में अभिनय, स्क्रिप्ट से अच्छा करते हैं, साथ ही उन की फिल्मों से अधिकतर दर्शक खुद को जोड़ पाते हैं. इस में सब से अधिक अमिताभ बच्चन और अनिल कपूर हैं, जिन की फिल्मों को देखने दर्शक थिएटर हौल तक खींचे चले आते हैं.

क्या है कलाकारों की सोच

ऐसी फिल्मों की सफलता का राज होता है, जो दमदार स्क्रिप्ट, जिस में कलाकर अपनी प्रतिभा को पूरी तरह से झोंक देते हैं. अभिनेत्री शर्मिला टैगोर एक जगह कही है कि पुराने पुरुष अभिनेताओं के लिए बहुत सारी पटकथाएं आज भी लिखी जाती हैं. महिला अभिनेत्रियों के लिए ये चीजें कम हैं. कुछ बदलाव नई जेनरेशन के लिए हुआ है, लेकिन पुरानी हीरोइनों के लिए ये बहुत कम है.

किसी को यह स्वीकार करना होगा कि जीवन कम उम्र में नहीं रुकता. मेरे समय में, जीवन 30 या 40 पर रुक जाता था, लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए, क्योंकि जीवन चलता रहता है और इस में कई दिलचस्प चरण आते हैं, जो दर्शकों को पसंद आ सकता है, उस पर कहानी लिखी जानी चाहिए.
नीना गुप्ता ने भी फिल्म साड़ की आंख में तापसी पन्नू और भूमि पेडनेकर को प्रोस्थेटिक मेकअप लगा कर अभिनय करते देख कर अपना दुख जताया था और कहा था कि 60 साल के बुजुर्गों पर फिल्म अगर बनाई जाती है, तो असली अधिक उम्र वाली अभिनेत्रियों को कास्ट, क्यों नहीं किया जाता ? अभिनेत्री सोनी राजदान भी नीना गुप्ता के बात पर अपनी सहमति जताई थी.

उम्र के हिसाब से स्क्रिप्ट जरूरी

अभिनेता अमिताभ बच्चन एक ऐसे अभिनेता है, जिन्होंने अपने उम्र के हिसाब से अभिनय किया और सफल रहे, उन की फिल्में आज भी दर्शकों को हौल तक लाने मे सफल रहती है, यही वजह है कि फिल्म निर्माता, निर्देशक उन्हे किसी भी ब्लौक बस्टर फिल्म में उन्हे लेने की कोशिश करते हैं.
उन्होंने एक बार कहा है कि वे अपने उम्र के हिसाब से फिल्में चुनते हैं जो सफल होती हैं. इस उम्र में कोई उन्हें पेड़ के पीछे घूमते हुए गाना गाते हुए देखना पसंद नहीं कर सकता. वे कहते हैं, “उम्र के हर पड़ाव की एक कहानी होती है, जिसे दर्शक पसंद करते हैं और वैसी कहानी होने पर ही मैँ अभिनय करता हूं.”

सार्थक फिल्मों की कमी

देखा जाए तो सभी पुराने कलाकारों की सोच यही है, क्योंकि वे अपने उम्र के हिसाब से ही अच्छी और सार्थक स्क्रिप्ट चाहते हैं, जिसे लिखने वाले कम हैं. नसीरुद्दीन शाह ने भी हिंदी फिल्मों में सार्थकता की कमी पर सवाल उठाते हुए एक जगह कहा है कि “आजकल एक तरह की फिल्में अधिक बन रही है. बहुत जल्द लोग एक ही तरह की फिल्में देख कर बोर हो जाएंगे. यह वास्तव में मुझे निराश करता है कि हिंदी सिनेमा 100 साल पुराना है, लेकिन अच्छी और गंभीर फिल्मों की कमी है. मैं ने हिंदी फिल्में देखना बंद कर दिया है, मुझे एक जैसी फिल्मों की कहानी बिल्कुल पसंद नहीं हैं.”

कम लिखी जा रही है स्क्रिप्ट

फिल्म भूल भुलैया 3 की शूटिंग कर रहे निर्माता, निर्देशक अनीस बजमी ने अपनी कई फिल्मों में सीनियर कलाकारों को लिया और फिल्म हिट साबित हुई. इतना ही नहीं, कई फिल्म की धुरी भी ऐसे सीनियर आर्टिस्ट ही रहे हैं. उन का कहना है कि “इतने सालों तक इंडस्ट्री पर राज करने वाले सीनियर कलाकारों की कोई तो वजह अवश्य होगी, जिस की वजह से वे इतने प्रसिद्ध है.

“असल में दर्शक उन्हें प्यार करते हैं और उन के अभिनय को बारबार देखना चाहते हैं. जब ऐसे ऐक्टर को फिल्मों मे लेना है, तो स्क्रिप्ट भी वैसी ही होनी चाहिए, क्योंकि ऐसे कलाकारों के जैसे ऐक्टिंग कोई आज नहीं कर सकता. दुर्भाग्यवशतः ऐसी स्क्रिप्ट कम लिखी जा रही हैं. इसलिए फिल्में भी कम बन रही है. इस के अलावा कोई कारण नहीं हो सकता. मेरे हिसाब से ये कलाकार पुराने नहीं, बल्कि एवरग्रीन है. ये जब किसी फिल्म मे काम करते हैं, तो उस फिल्म मे चार चांद ही लगा देते हैं.

“सीनियर कलाकारों को ले कर काम करना सब से अच्छा होता है, क्योंकि उन्हें जितना स्क्रिप्ट दिया जाता है, उस से कहीं अधिक उन का परफौरमेंस देखने को मिलता है. यही वजह है कि मैंने भूल भुलैया 2 में अभिनेत्री तब्बू को कास्ट किया, क्योंकि उन के साथ काम करने की मेरी बहुत इच्छा थी. फिल्म सब को अच्छी लगी.”

ऐक्टिंग होती है अद्भुत

अनीस आगे कहते है “मैं ने सालों पहले जब वेलकम फिल्म लिखी और बनाई थी, तब मैं ने सीनियर ऐक्टर को ले कर फिल्म बनाने के बारें मे नहीं सोचा था. मैं ने जब लिखना शुरू किया तब भी मेरे मन में फिरोज खान, नाना पाटेकर या अनिल कपूर कोई नहीं था. लिखतेलिखते चरित्र इतना मजेदार बना कि मैँ सोचने पर मजबूर हुआ कि आखिर इस में लिया किसे जाए ? अनिल कपूर को तो मैँ जानता था कि वे अच्छी कौमेडी कर लेते हैं, लेकिन उदय शेट्टी की भूमिका मे नाना पाटेकर को लेना मेरे लिए थोड़ी चिंता की बात रही, क्योंकि नाना पाटेकर कौमेडी की फिल्में नहीं करते थे.

“मैं ने मन में सोचा कि कलाकार चाहे तो हर किरदार को निभा सकता है और नाना ने वाकई बहुत अच्छी भूमिका निभाई. नाना पाटेकर की बौस के लिए मुझे अभिनेता फिरोज खान को लाना था, लेकिन उन की तबीयत की कुछ गड़बड़ी की वजह से वे काम करना नहीं चाह रहे थे. मैँ उन के पीछे पड़ा हुआ था, अंत में उन की सहमति मिली, भूमिका बड़ी नहीं थी, लेकिन बहुत दमदार थी, जिसे दर्शकों ने पसंद किया.”

 

निर्देशक भी जाते हैं चौंक

निर्देशक अनीस कहते हैं कि “सीनियर ऐक्टर्स के साथ काम करने पर बहुत मजा आता है, एक स्क्रिप्ट इन्हें देने पर ये इतना अच्छा काम करते हैं कि निर्देशक भी चौंक जाते हैं. स्क्रिप्ट से भी अधिक इन की परफौरमेंस होती है. अभी मेरी फिल्म भूल भुलैया 3 आने वाली है, जिस में मैं ने कई सीनियर कलाकारों को लिया है. बहुत अलग तरीके की इस फिल्म पर काम चल रहा है.”

देखा जाय तो ऐसी कई फिल्में है, जिस में सीनियर कलाकारों ने काम किया और बौक्स औफिस पर फिल्म हिट रही, जिस में पिकू, इंग्लिश विंगलिश, बधाई हो, ऊंचाई, मस्त में रहने का आदि कई फिल्में हैं, जिसे दर्शकों ने पसंद किया है और इन की कमाई भी अच्छी रही, लेकिन कुछ निर्देशक नए जमाने की चर्चित कलाकारों को ले कर फिल्में बनाना पसंद करते हैं, क्योंकि इस शो बिजनेस में वे सोचसमझ कर कदम रखना चाहते हैं, ताकि उन्हें किसी नुकसान का सामना न करना पड़े. यही वजह है कि ऐसे एवरग्रीन कलाकारों को अभिनय करने का मौका कम मिल पाता है, जबकि वे एक अच्छी कहानी के साथ अच्छी फिल्म दर्शकों को दे सकते हैं.

मार्च का चौथा सप्ताह कैसा रहा बौलीवुड का कारोबार

एक तरफ हिंदी फिल्में बौक्स औफिस पर लगातार धराशाई होती जा रही हैं तो दूसरी तरफ कुछ फिल्मकार खुद को तीस मार खां बताने के साथ ही प्रोपगेंडा और इतिहास को नए तरीके से पढ़ाने वाली फिल्म ले कर आ रहे हैं. ऐसी फिल्मों को दर्शक सिरे से नकारता जा रहा है. इसी वजह से दर्शकों ने लेखक, सह निर्माता, अभिनेता व निर्देशक रणदीप हुडा की फिल्म को भी धूल चटा दी.

मार्च माह के चौथे सप्ताह यानी कि 22 मार्च को रणदीप हुडा की फिल्म “स्वातंत्र्य वीर सावरकर” प्रदर्शित हुई. पहले इस की लागत 40 करोड़ बताई जा रही थी, अब 20 करोड़ बताया जा रहा. फिल्म ने पूरे सप्ताह में मुश्किल से 10 करोड़ कमाए. इस में से निर्माता के हाथ सिर्फ 5 करोड़ आएंगे. मजेदार बात यह है कि इस फिल्म में एक नहीं बल्कि चारचार निर्माता हैं. यह 10 करोड रुपए तब इकट्ठा हुए हैं, जब मुंबई के कई सिनेमाघर में एक राजनीतिक दल ने टिकट खरीद कर दर्शकों में बांटकर उनसे मुफ्त में देखने का आग्रह किया.

फिल्म “स्वातंत्र्य वीर सावरकर” के प्रदर्शन से पहले रणदीप हुडा ने कुछ गिनेचुने पत्रकारों को इंटरव्यू दिया था, जिन का चयन उन के पीआर में काफी मशक्कत के बाद की थी. रणदीप हुडा ने इंटरव्यू के समय धमकी देते हुए कहा था, “वीर सावरकर को ‘माफीवीर’ कहने वालों की कंटाप पर मैं थप्पड़ मारना चाहता हूं.” अब फिल्म देख कर दर्शक कह रहे हैं कि फिल्म “स्वातंत्र्य वीर सावरकर” में गलत इतिहास पेश करने के लिए वह रणदीप हुडा के कनटाप पर थप्पड़ लगाना चाहते हैं.

इस फिल्म के माध्यम से रणदीप हुडा ने एक नया इतिहास लिखने का प्रयास किया, जिसे दर्शकों ने सिरे ने नकार दिया. मजेदार बात यह है कि वीर सावरकर ने जो सच खुद अपनी किताब में लिखा है, उसे भी रणदीप हुडा अपनी फिल्म में झूठला दिया. अंधभक्ति में डूबे रणदीप हुडा ने इतिहास के साथ जिस तरह से खिलवाड़ किया है उस से लोग काफी नाराज हैं.

यही वजह है कि दर्शक मुफ्त में भी “स्वातंत्र्य वीर सावरकर” नहीं देखना चाहता. इस फिल्म की असफलता के साथ ही रणदीप हुडा का कैरियर भी डूब गया जबकि उन्होंने इस फिल्म से निर्देशक बनते हुए अपने नाम की स्पेलिंग तक बदली है.

रणदीप हुडा ने एक इंटरव्यू में कहा है कि वह इस फिल्म को लोगों तक पहुंचाने के लिए अपना तन मन धन सब कुछ लगा चुके हैं. उन्होंने इस फिल्म को बड़ी मुसीबत के साथ बनाया है. यहां तक कि उन्हें इस फिल्म के लिए अपने पिता की प्रौपर्टी तक बेचनी पड़ी. यदि यह सच है, तो रणदीप हुडा को एक सही फिल्म बनानी चाहिए थी, जिसे दर्शक देखता.

22 मार्च को ही अभिनेता से निर्देशक बने कुणाल खेमू की फिल्म “मडगांव एक्सप्रैस” भी रिलीज हुई. सभी जानते हैं कि कुणाल खेमू अभिनेता सैफ अली खान की बहन सोहा अली खान के पति हैं. इस फिल्म के निर्माता रितेश सिधवानी और फरहान अख्तर हैं. लगभग 50 करोड़ की लागत में बनी फिल्म “मडगांव एक्सप्रैस” ने पहले सप्ताह सिर्फ 11 करोड़ ही इकट्ठा किया. यानी कि यह फिल्म पूरी तरह से डूब चुकी है.

सुपरफूड्स के हैं शौकीन तो हो जाएं सावधान!

श्यामली 45 वर्ष की उम्र में भी काफी चुस्त थी. पूरे घर का काम, खाना बनाना, सफाई करना, कपड़े धोना, बाजार जा कर राशन लाना सब अकेले ही करती थी. कभी सिरदर्द की शिकायत उस को नहीं हुई. वजन भी काबू में था. जबकि उस की ही उम्र की उस की सहेलियां थुलथुल और बेडौल हो चुकी थीं. श्यामली और उस के पति आशीष ने कमरतोड़ मेहनत की और अपने दोनों बेटों को इंजीनियर बनाया. बेटों के इंजीनियर बन कर नौकरी में लगते ही उन के परिवार के रहनसहन में फर्क आ गया. जल्दी ही यह परिवार एक बड़े फ्लैट में शिफ्ट हो गया. स्टैंडर्ड हाई हुआ तो घर में 2 नौकर भी आ गए. बड़े बेटे की शादी हुई, बहु के आने के बाद तो श्यामली घर के काम से बिलकुल फ्री हो गई. पति और दोनों बेटों की मेहनत से घर में पैसे बरसने लगे. मगर श्यामली के स्वास्थ्य के लिए यह अमीरी मुसीबत बन गई.

दरअसल बिना काम के दिनभर बैठे रहने या सोते रहने के कारण उस का वजन बढ़ने लगा. पहले 57 किलो वजन वाली श्यामली जहां खूब चुस्तदुरुस्त थी, दौड़दौड़ के काम करती थी, बीते 10 सालों में उस का वजन बढ़ कर 70 किलोग्राम हो गया. इस बढ़े वजन ने न सिर्फ उस की खूबसूरती हर ली बल्कि डबल चिन, डबल कमर और मोटेमोटे हाथपैरों को देख कर उस में हीनभावना आने लगी. हर कपड़ा बदन पर कसने लगा. श्यामली की बहू ने उस को सलाह दी कि वह फिटनैस के लिए पास की जिम जौइन कर ले. उस ने कहा, ‘वहां हलकेफुलके व्यायाम आदि से बौडी शेप में आ जाएगी और आप हलका महसूस करेंगी.’

श्यामली ने बहू की बात मानी और घर के पास वाला जिम जौइन कर लिया. वहां उस को काफी अच्छा लगा. व्यायाम आदि करने से बौडी भी खुली. एक दिन उस की ट्रेनर ने उस को सलाह दी कि अगर आप 50 वर्ष की उम्र में भी जवान और खूबसूरत दिखना चाहती हैं तो आप सुपरफूड्स भी खाइए. ये आप की खूबसूरती बढ़ाएंगे और आप खुद को 20 साल की लड़की जैसा फील करने लगेंगी. माधुरी दीक्षित से ले कर मलाइका अरोड़ा तक 50 वर्ष की उम्र में भी एकदम फिट और जवां नजर आती हैं तो इस के पीछे का राज उन की सुपरफूड डाइट, फिटनैस रूटीन और लाइफस्टाइल है. आजकल लोग फिटनैस का काफी खयाल रखते हैं. तो अगर आप भी 50 की उम्र में जवां दिखना चाहती हैं, तो खानेपीने में उन खास चीजों को शामिल कर लीजिए जिन को सूपरफूड्स कहते हैं.

श्यामली तो यह सुन कर ख़ुशी से उछल पड़ी. सुपरफूड्स के बारे में जिम ट्रेनर से उस ने खूब सारी जानकारी इकट्ठा कर ली. 24 साल की ट्रेनर ने उस को बताया कि आप सुबह नट्स खाया कीजिए. इस के अलावा जूस पीजिए. काली किशमिश, आंवला, नारियल, तिल के बीज, अंडा, बेरीज, हरी सब्जियां, टमाटर, मछली, पनीर, औलिव औयल और डार्क चौकलेट ये सब सुपरफूड्स हैं, इन को अपने भोजन में शामिल करिए. बस, फिर क्या था, श्यामली ने घर आते ही नौकर को एक लंबी लिस्ट के साथ बाज़ार दौड़ा दिया. काजू, बादाम, पिस्ता, सूखा आंवला, किशमिश, डार्क चौकलेट्स के पैकेट्स, फिश, पनीर और न जाने क्याक्या उसी दिन मंगा कर अलमारी और फ्रिज में भर लिए.

6 महीने जम कर सुपरफूड्स खाए. साथ में, रोटी, सब्जी, दाल, चावल भी खाती रही. अब उस के बिना तो लगता था जैसे भूख ही नहीं मिटी. नतीजा यह हुआ कि उस का वजन बढ़ कर 85 किलो हो गया. जोड़ों में दर्द, घुटनों में सूजन और शरीर हर वक़्त थकाथका सा लगने लगा. थकान के चलते जिम जाना छोड़ दिया था. फ्लैट की सीढ़ियां चढ़ने में सांस फूलने लगती. कहीं जरूरी जाना होता तो अब सिर्फ लिफ्ट का इस्तेमाल करती थी. 20 साल की लड़की जैसी सुंदर और चुस्त दिखने के चक्कर में श्यामली 75 साल की बुजुर्ग नज़र आने लगी. जब जोड़ों का दर्द और सूजन गरम पानी की सिंकाई और दर्द की दवाइयां खाने पर भी बना रहने लगा तो उस ने डाक्टर को दिखाया. डाक्टर ने कई तरह के टैस्ट लिखे. किडनी फंक्शन टैस्ट, लिवर फंक्शन टैस्ट, यूरिक एसिड टैस्ट, कोलैस्ट्रौल, शुगर टैस्ट और न जाने क्याक्या करवाया.

लंबे समय तक सुपरफूड्स खाने का नतीजा यह हुआ था कि श्यामली का कोलैस्ट्रौल हद से ज़्यादा बढ़ा हुआ था. वह हाईब्लडप्रैशर, फैटी लिवर और जोड़ों में यूरिक एसिड के जमाव का शिकार हो गई थी. बढे हुए कोलैस्ट्रौल और ब्लडप्रैशर ने उस के हृदय पर असर करना शुरू कर दिया था, जिस वजह से उस की धड़कन बढ़ी हुई थी और सांस फूलती थी. श्यामली अब डाक्टरी देखभाल में है. डाक्टर ने सारे सुपरफूड्स पर रोक लगा दी है. उबली सब्जियां और दाल के साथ एक चपाती दिन में और यही भोजन रात में उस को दिया जाता है. सुपरफूड्स ने जहां उस की सुंदरता पर ग्रहण लगा दिया वहीं उस के शरीर को रोगों से भर दिया.

दरअसल सुपरफूड्स अच्छे हैं मगर उन्हें किसी डाक्टर के परामर्श के बगैर नहीं खाना चाहिए. ड्राईफ्रूट्स बड़ी तेजी से वजन बढ़ाते हैं. वहीं टमाटर, पनीर और नौनवेज का अधिक सेवन यूरिक एसिड में वृद्धि करता है. अगर इस को समय से नियंत्रित न किया जाए तो यूरिक एसिड के कारण आप की किडनी डैमेज हो सकती है. हमारा शरीर बचपन से जिस प्रकार के खाने का आदी होता है, उस को एकदम से बदलना ठीक नहीं है, बल्कि उम्र बढ़ने के साथसाथ हमारे भोजन की आवश्यकता कम होती जाती है. युवावस्था में हमें दौड़भाग और काम के लिए अधिक ऊर्जा चाहिए, इसलिए हम जितना भी खाते हैं वह जल्दी पच जाता है मगर प्रौढ़ावस्था तक आतेआते हम उतने क्रियाशील नहीं रहते. लिहाजा, शरीर को भोजन की आवश्यकता भी कम पड़ती है. यदि भोजन कम न किया जाए और ऊपर से सुपरफूड्स भी खाए जाएं तो हृदय रोग, किडनी, लिवर से जुड़े रोगों की गिरफ्त में आते देर नहीं लगेगी. जिम ट्रेनर तो सुंदरता पाने और बौडी बनाने के लिए अनेक सलाहें देते हैं. प्रोटीन डाइट लेने को कहते हैं, अनेक प्रोटीन सप्लीमैंट्स रखते व बेचते हैं, इस में उन को बड़ा कमीशन मिलता है. पर शरीर आप का है और यह आप को देखना है कि क्या चीज आप को नुकसान पहुंचा सकती है. इस के लिए 40 वर्ष की उम्र के बाद समयसमय पर कुछ जांचें करवाते रहना चाहिए, जैसे शुगर, यूरिक एसिड, कोलैस्ट्रौल और ब्लडप्रैशर आदि.

भारतीय रसोई में बनने वाला भोजन पहले ही काफी घी-तेल और मसाले वाला होता है. दुनिया के किसी देश में सुबह के नाश्ते में आलू, गोभी, पनीर के परांठे शायद ही खाए जाते हों, मगर हमारे बच्चे तो बचपन से ही सुबह के नाश्ते में भारीभरकम परांठे वह भी दही और मक्खन मार के खाते हैं. दोपहर में कढ़ी, राजमा, छोले-चावल या दोतीन सब्जियां, दाल, चावल, रोटी, दही आम भारतीय खाना है. रात में भी हम हैवी डाइट लेते हैं. अकसर भारतीय घरों में नौनवेज रात के खाने में होता है, जब पूरा परिवार साथ होता है. प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट्स से भरा ऐसा रिच भोजन करने के बाद अगर इस के ऊपर सुपरफूड्स के नाम पर मुट्ठी भरभर के ड्राई फ्रूट्स भी खाएंगे तो निश्चित रूप से बीमार पड़ेंगे ही.

ट्रेंडिंग में है डोपामाइन फैशन, जानें इसे जिंदगी में कैसे करें शामिल

दुनिया में तरहतरह के फैशन आतेजाते रहते हैं. जो फैशन ट्रैंड में होता है, ज्यादातर लोग उसी को फौलो करना ज्यादा पसंद करते हैं. आजकल डोपामाइन फैशन काफी ट्रैंड में है. होली जैसे उत्सव का माहौल हो या रैगुलर लाइफ में दूसरों पर पौजिटिव इंप्रैशन जमाना हो, डोपामाइन फैशन के रंग में आप भी रंग जाइए.

डोपामाइन फैशन आखिर है क्या? यह शब्द खुशी और सैटिस्फैक्शन के साथ जुड़ा होता है जो हमारे मूड और फीलिंग्स को बेहतर बनाने का काम करता है. आप सब ने डोपामाइन हार्मोन के बारे में सुना ही होगा.

डोपामाइन एक हार्मोन है जो हमारे शरीर में मौजूद होता है. इसे हैप्पी हार्मोन कहा जाता है क्योंकि जब भी हम खुश होते हैं तो दिमाग में डोपामाइन रिलीज़ होता है जिस से हमें खुशी का एहसास होता है. आप में किसी रंग, वीडियो, व्यक्ति, एक्टिविटी, सौंग या अन्य चीज़ों से डोपामाइन रिलीज़ हो सकता है. नैशनल इंस्टिट्यूट औन ड्रग एब्यूज के अनुसार डोपामाइन आप के मस्तिष्क में एक संदेशवाहक रसायन है जो आप को खुशी लाने वाले काम करने के लिए प्रोत्साहित करता है.

इस कौन्सैप्ट से ही प्रेरित है डोपामाइन ड्रैसिंग. यानी, ऐसी ड्रैसिंग जिसे देख कर और पहन कर आप का और सामने वाले का मूड अच्छा हो जाए. कपड़ों का हमारी भावनात्मक स्थिति पर गहरा असर पड़ता है. इस फैशन में वाइब्रैंट और ब्राइट कलर शामिल किए जाते हैं. साथ ही, ऐसे फैब्रिक और टैक्सचर लिए जाते हैं जिन्हें पहन कर अच्छा महसूस हो.

इस तरह कहा जा सकता है कि डोपामाइन ड्रैसिंग व्यक्तियों को ऐसे कपड़े पहनने के लिए प्रोत्साहित करती है जो उन्हें शारीरिक व भावनात्मक रूप से अच्छा महसूस कराते हैं. डोपामाइन ड्रैसिंग आमतौर पर जीवंत रंगों के चयन से जुड़ी होती है. इस में ऐसे कपड़ों की मांग शामिल है जो आराम और आत्मविश्वास पैदा करते हैं और चेहरे पर मुसकराहट लाते हैं. इस का मतलब कि आप जो भी और जिस भी रंग के कपड़े पहनते हैं वो आप के मूड को प्रभावित करते हैं. यह सिर्फ अच्छा दिखने के लिए नहीं, बल्कि बेहतर महसूस करने के साथ जुड़ा है. वो कपड़ें पहनें जिन्हें पहन कर आप अच्छे लगें भी और आप को खुशी भी मिले.

चलिए जानते हैं डोपामाइन ड्रैसिंग को अपनी जिंदगी में कैसे शामिल करें;

खिलने वाले रंग पहनें

सब से पहले एक लिस्ट बनाएं जिस में आप वे सभी रंग शामिल करें जो आप के व्यक्तित्व से मेल खाते हों, जिन्हें पहन कर आप को अच्छा महसूस होता है, जो रंग आप पर सब से ज्यादा अच्छे लगते हों और जो रंग ब्राइट हों. आप अपनी अलमारी में खिले रंग यानी ब्राइट कलर के कपड़े शामिल करें. लाल, नारंगी, आसमानी, सनी पीला, गाढ़ा बैगनी, सुर्ख गुलाबी जैसे खिलने वाले रंगों के कपड़े पहनें. लाल रंग ऊर्जा और जनून के साथ जुड़ा होता है, पीला खुशी और आशावाद के लिए जाना जाता है और नीला शांति का प्रतीक है. ऐसे रंग चुनें जो उन भावनाओं से मेल खाते हों जिन्हें आप खुद में जगाना चाहते हों. साथ ही, जिन्हें पहनने के बाद आप को अच्छा और एनर्जेटिक महसूस हो. ये रंग लोगों का ध्यान आप की ओर आकर्षित करेंगे.

बोल्ड एक्सेसरीज को मिक्स एंड मैच करें

अगर आप को इस तरह के रंग पहनना ज्यादा पसंद नहीं है तो आप बोल्ड एक्सेसरीज कैरी कर सकती हैं. आप एक बेहतर लुक देना वाला हैंडबैग कैरी कर सकती हैं जो आप की आउटफिट के साथ सूट करता हो. इसी के साथ आप स्टाइलिश इयररिंग्स वियर करें जो आप की लुक को कंप्लीट करें और आप को अच्छा महसूस हो. इन दिनों स्टेटमेंट इयररिंग्स काफी चलन में हैं. इन की एक जोड़ी आप के लुक को निखार देगी. कलरफुल सैंडल्स या बेल्ट्स भी आजमा सकती हैं.

प्रिंट, फैब्रिक और पैटर्न

आप अपने कपड़ों को सेलेक्ट करते समय अट्रैक्टिव प्रिंट और पैटर्न को अपनाएं जिन्हें पहनने के बाद आप को कौन्फिडेंस महसूस हो. आजकल मार्केट में कई तरह के प्रिंट और डिजाइनों में ड्रैस उपलब्ध हैं. खूबसूरत प्रिंट और पैटर्न वाले पहनावे मन में आनंद भरते हैं. आकर्षक रंग, लाइनिंग्स, फ्लावर प्रिंट्स, ब्लौक्स या जियोमेट्रिक पैटर्न आप के अंदर के उत्साह को बढ़ाते हैं. इस के अलावा एनिमल प्रिंट वाले कपड़े भी खास लगते हैं. फैब्रिक भी ऐसा हो जो अच्छा फील कराए.

फुटवियर

फुटवियर भी आप ऐसी ही चुनें. अगर आप को हील्स पहन कर अच्छा महसूस होता है तो हील्स चुनें. अगर आप को शूज पसंद हैं तो शूज के साथ थोड़े एक्सपैरिमैंट करें और नए स्टाइल को ट्राई कर के देखें. कलर भी ब्राइट लें.

आत्मविश्वास जरूरी है

याद रखें कि डोपामाइन ड्रैसिंग का मतलब है कि आप जो भी पहनते हैं उस में आप को अच्छा और कौन्फिडेंस महसूस हो. ऐसे में वही कपड़े चुनें जिन्हें पहन कर आप कंफर्टेबल महसूस कर पाएं.

व्यवसाय में घाटा, भारी कर्ज, व्यापारियों की बढ़ती आत्महत्याएं चिंता का विषय

जब कोई शख्स या व्यापारी छोटेबड़े कर्ज में डूब जाता है तो डिप्रैशन में आ कर आत्महत्या कर लेता है. ऐसी अनेक घटनाएं घटित होती रहती हैं. दरअसल, यह ऐसा समय होता है जब शख्स कुछ भी सकारात्मक सोच नहीं पाता और उस की आंखों के आगे अंधेरा छाता चला जाता है.

वस्तुत: ऐसी स्थिति में धैर्य व बुद्धि से काम लेना चाहिए. अगर थोड़ा समय बीत जाए तो व्यापार के घाटे में डूबा शख्स आत्महत्या करने के विचारों के भंवर से निकल सकता है. ऐसी अनेक घटनाएं घटित हुई हैं जिन पर विस्तार से चर्चा करने से पहले कुछ घटनाक्रम पर दृष्टिपात कर लीजिए.

  • प्रथम घटना- एक व्यक्ति ने बेटी की शादी के लिए ब्याज में रुपए लिए और जब वह नहीं अदा कर पाया तो व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली.
  • द्वितीय घटना- एक व्यापारी ने व्यापार चलाने के लिए उधार लिया मगर घाटा होने के कारण उस का दीवाला निकल गया, आखिरकार आत्महत्या कर ली.
  • तृतीय घटना- छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बेसन मिल के मालिक ने जब रुपयों की रिकवरी नहीं हो पाई तो त्रासदी में आत्महत्या कर ली.

अकसर हमारे आसपास आत्महत्या की खबरें मीडिया के माध्यम से आती रहती हैं, जिन्हें आम आदमी पढ़ कर आगे बढ़ जाता है. दरअसल, इस तरह की घटनाएं यह बताती हैं कि मनुष्य कितना संवेदनशील होता है वह जब किसी से रुपए उधार लेता है या कोई बिजनैस करता है और उस में नुकसान झेलता है तो वह एक तरह से सन्नीपात में चला जाता है. उसे कुछ भी दिखाई नहीं देता और जिंदगी से दूर जा कर इस अवसाद से बचने की कोशिश करता है. मगर वह भूल जाता है कि किसी भी समस्या का हाल आत्महत्या नहीं हो सकता.

ऐसे में अगर वह थोड़ा ध्यान से काम ले, विवेक से सोचे तो इस भंवरजाल से निकल सकता है और आगे की जिंदगी खुशहाली से व्यतीत कर सकता है.

प्रवासी व्यवसायी की आत्महत्या

हाल ही में महाराष्ट्र में अपने व्यापार में नुकसान खाने के बाद छत्तीसगढ़ आ कर एक होटल में रुके व्यवसायी ने आत्महत्या कर ली. वह थोड़ा धैर्य दिखाता, किसी मनोवैज्ञानिक से रायमशवरा कर लेता तो उस की जान सहज बच सकती थी.

छत्तीसगढ़ के स्टील सिटी भिलाई में एक होटल के कमरा नंबर 312 में पिछले 20 दिनों से रुके महाराष्ट्र के एक कारोबारी ने फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली. दरअसल उस पर करोड़ों रुपए का कर्जा था. कर्ज नहीं चुका पाने के चलते वह छिप कर भिलाई में रह रहा था. जब कर्जदारों का दबाव बढ़ा तो उस ने खुदकुशी कर ली. सुपेला पुलिस ने शव को मोर्च्युरी में रखवा कर मामले की जांच शुरू कर दी है.

सुपेला पुलिस के मुताबिक मृतक की पहचान गोविंद तायाप्पा पवार (41 साल) पिता तायाप्पा पवार, निवासी 1098/2 मार्केट कमेटी शेजरील, दिघंची, आटपाड़ी, सांगली महाराष्ट्र के रूप में हुई है. वह दिसंबर 2023 से भिलाई लगातार अपनी हर्बल कंपनी के काम के सिलसिले में आ रहा था. वह इस होटल में 3 मार्च, 2024 से ठहरा हुआ था.

यहीं उस ने पहले हाथ की नस काटने की कोशिश की. लेकिन जब वह ऐसा नहीं कर सका तो चादर फाड़ कर उस का फंदा बनाया और पंखे पर बांध कर लटक गया. होटल के मैनेजर के मुताबिक गोविंद पवार पिछले 3 मार्च से होटल के कमरा नंबर 312 में रुका हुआ था. वह समय पर पैसा देता था. शनिवार दोपहर जब गोविंद लंच के लिए कमरे से नहीं निकला तो स्टाफ उसे बुलाने गया. काफी आवाज‌ लगाने और डोरबेल बजाने पर भी उस ने कमरा नहीं खोला. ‌इस से होटल स्टाफ को किसी अनहोनी का शक हुआ.

इस के बाद होटल स्टाफ ने मास्टर चाबी से दरवाजा खोलने की कोशिश की. अंदर से बंद होने के चलते दरवाजा नहीं खुला. स्टाफ ने सुपेला पुलिस को इस की सूचना दी. पुलिस होटल पहुंची और दरवाजा तोड़ कर देखा तो गोविंद फंदे पर लटका हुआ था. बैड पर एक चाकू पड़ा हुआ मिला है. हाथ में चाकू से काटने का निशान था. यह घटना अनेक घटनाओं की तरह यह बताती है कि कर्ज लेने के बाद जब व्यवसाय में नुकसान हो जाता है तो छोटा व्यापारी हो या बड़ा व्यवसायी, आत्महत्या का रास्ता अख्तियार कर लेता है.

शिक्षाविद और मनोवैज्ञानिक डाक्टर संजय गुप्ता के मुताबिक जीवन में उतारचढ़ाव की परिस्थितियां आनी स्वाभाविक है. ऐसे घटनाक्रम के दरमियान व्यक्ति को तत्काल परिजनों को सारी घटना से वाकिफ कराना चाहिए और इष्ट मित्रों से परामर्श लेना चाहिए. साथ ही, किसी मनोवैज्ञानिक अथवा अधिवक्ता यानी लीगल एडवाइजर से परामर्श करना चाहिए. ऐसी स्थितियों में इस तरह बड़ी आसानी से भंवरजाल से निकला जा सकता है.

बोझ नहीं रिश्ते दिल के: भाग 2

अब तो अनुजा का नित्य का क्रम बन गया था. जब तक वह स्कूल से आ कर उस बच्चे के साथ घंटाआधघंटा बिता न लेती, उस का खाना ही हजम न होता था. एक दिन वह उस के साथ खेल रही थी कि अचानक सविता मेम आ गईं.  वह उन्हें देख कर डर गई. अपनी सफाई में कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि वे संजीदा स्वर में बोलीं, ‘अच्छा, तो वह तुम ही हो जिस के साथ खेल कर मेरा बेटा विपुल इतना खुश रहता है. यहां तक कि छोटेछोटे वाक्य भी बोलने लगा है.’

कहां तो अनुजा सोच रही थी कि उन की आज्ञा के बिना उन के घर घुसने तथा उन के बच्चे के साथ खेलने के लिए उसे खरीखोटी सुननी पड़ेगी पर उन्होंने न केवल उस से प्यार से बातें कीं बल्कि उसे सराहा भी. उन का सराहनाभर  स्वर सुन कर वह भी उत्साह के स्वर में बोली, “मेम, मुझे बच्चों के साथ खेलना बहुत अच्छा लगता है, घर में कोई छोटा बच्चा नहीं है, सो इस के साथ खेलने आ जाती हूं.’ बहुत ही प्यारी बच्ची हो तुम. बस, आगे यह ध्यान रखना कि जो काम अच्छा लगता है उसे छिप कर करने के बजाय सब के सामने करो, जिस से ग्लानि का एहसास नहीं होगा,’ कहते हुए उन्होंने उस की पढ़ाई के बारे में जानकारी ली. 

मां को जब अपने इस वार्त्तालाप के विषय में बताया तो वह बोली, ‘क्यों व्यर्थ अपना समय बरबाद कर रही है. आज उसे तेरी आवश्यकता है तो मीठामीठा बोल रही है, कल जब आवश्यकता नहीं रहेगी तो वह तुझे दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंकेगी. आखिर ऐसे लोगों की यही फितदरत होती है. वैसे भी, जो अपनों का न हो सका वह भला दूसरों का क्या होगा?’

मां की बात उस समय उसे अटपटी लगी. दरअसल मां की एक मित्र उसी कालेज में अध्यापिका थीं, जिस में सविता मेम पढ़ाती हैं. उन से उन्हें पता चल चुका था कि उन्होंने अपने पति को छोड़ दिया है. उस समय ऐसा फैसला लेना, वह भी स्त्री द्वारा, उसे अहंकारी, घमंडी तथा बददिमाग की पदवी से विभूषित करने के लिए काफी था. उस का दिल कहता कि किसी का किसी के साथ रहना न रहना उन का निजी फैसला है, इस पर किसी को आपत्ति क्यों?

अगर सविता मेम ने यह कदम उठाया है तो अवश्य ही कोई बड़ा कारण होगा. एक औरत अकारण घर की चारदीवारी नहीं लांघती, वह भी एक छोटे बच्चे को गोद में लिए. उन का व्यवहार देख कर उसे कभी नहीं लगा कि वे झगड़ालू या दंभी किस्म की औरत हैं. उस समय उसे यह प्रश्न बारबार झकझोरता था कि हमारा समाज सारी बुराइयां औरत में ही क्यों ढूंढ़ता है, क्यों उसे शांति से जीने नहीं देता? मां से मन की बात कही तो वे उस पर ही बरस पड़ीं- ‘दो बित्ते की छोकरी है और बातें बड़ीबड़ी करती है. अरे, घर की सुखशांति बरकरार रखने के लिए औरत को ही त्याग करना पड़ता है, नहीं तो चल चुकी घर की गाड़ी. और हां, उस घर में ज्यादा मत जाया कर, कहीं उस के कुलक्षण तुझ में भी न आ जाएं.’ 

मां आम घरेलू औरत की तरह थीं, जिन का दायरा अपने पति और बच्चों तक ही सीमित था. औरत घर की चारदीवारी में शोभित ही अच्छी लगती है.ऐसा दादी का मानना था. दादी के विचारों, कठोर अनुशासन ने सामाजिक समारोह के अतिरिक्त उन्हें घर से बाहर निकलने ही नहीं दिया. दादी के न रहने के पश्चात् भी उन के द्वारा थोपे विचार, अंधविश्वास मां के मन में ऐसे रचबस गए कि वे उन से मुक्ति न पा सकीं. आज उसे लगता है कि व्यक्ति की सोच का दायरा तभी बढ़ता है जब वह दुनियाजहान घूमता है. विभिन्न समुदायों तथा संप्रदायों के लोगों से मिलता है, तभी उस के स्वभाव और व्यक्तित्व में लचीलापन आ पाता है. तभी वह समझ पाता है कि व्यक्ति के आचारविचार में परिवर्तन समय की देन है. जो समय के साथ नहीं चल पाता या समय को अपने अनुकूल बनाने की सामर्थ्य नहीं रखता वह एक दिन तिनकातिनका टूट कर बिखरता जाता है. वह इंसान ही क्या जो अपने आत्मसम्मान की रक्षा न कर पाए तथा परिस्थतियों के आगे घुटने टेक दे.

सविता मेम उसे सदा परिष्कृत रुचि की लगीं. सो, मां के मना करने के बावजूद कभी छिप कर तो कभी उन की जानकारी में वह उन के घर जाती रही. धीरेधीरे लगाव इतना बढ़ा कि विपुल के साथ खेलने के लिए उन की अनुपस्थिति में तो वह जाती ही थी, अब वह उन के सामने भी, जब भी मन हो, बेहिचक जाने लगी थी. कभी उन के साथ चाय बनाती तो कभी सब्जी और कुछ नहीं तो उन के साथ अपनी पढ़ाई से संबंधित मैटर ही डिस्कस कर लेती थी. 

वे कैमिस्ट्री की टीचर थीं. हायर सैकंडरी में फिजिक्स, कैमिस्ट्री उन के विषय थे. सविता मेम कैमिस्ट्री के अतिरिक्त फिजिक्स से संबंधित समस्याएं भी हल करवा दिया करती थीं. उन का समझाने का तरीका इतना रुचिकर था कि गंभीर से गंभीर विषय भी सहज हो जाता था.

उसे उन के साथ बैठकर, बातें करना अच्छा लगता था. उन की सोच उन्हें अन्य महिलाओं से अलग करती थी. वे साड़ी, जेवरों की बातें नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर बातें किया करती थीं. यहां तक कि उन्होंने उसे कालेज में हो रही वादविवाद प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए न केवल प्रेरित किया बल्कि विषयवस्तु भी तैयार करवाया. उन के प्रयत्नों का ही नतीजा था कि वह अपने स्कूल में ही प्रथम नहीं बल्कि इंटर-स्कूल वादविवाद प्रतियोगिता में भी प्रथम आई.

उस के पढ़ाई और अन्य प्रतियोगिताओं में अच्छे प्रदर्शन के कारण मां अब उसे उन के घर जाने से रोकती तो नहीं थी पर अभी भी मां की धारणा उन के प्रति बदल नहीं पाई थी जबकि वह अपने सुलझे विचारों तथा आत्मविश्वास के कारण उस की आदर्श ही नहीं, प्रेरणा भी बन चुकी थीं. कम से कम वे उन औरतों से तो अच्छी थीं जो हर काम में मीनमेख निकालते हुए एकदूसरे की टांगें खींचने में लगी रहती हैं. कम से कम उन के जीवन का कोई मकसद तो है. वे जीवन में आई हर कठिनाई को चुनौती के रूप में लेती हुई जिंदादिली से लगातार आगे बढ़ रही हैं तो लोगों को आपत्ति क्यों

उस समय वह ग्रेजुएशन कर रही थी. ज़िंदगी के अच्छेबुरे पहलुओं को थोड़ाथोड़ा  समझने लगी थी. एक दिन उस ने उन की जिंदगी में झांकने का प्रयास किया तो वे उखड़ गईं तथा तीखे स्वर में कहा, ‘पता नहीं लोगों को किसी की निजी जिंदगी में झांकने में क्यों मजा आता है? मेरी जिंदगी है चाहे जैसे भी जीऊं.’

‘सौरी मेम, मेरा इरादा आप को दुख पहुंचाने का नहीं था लेकिन जब आसपड़ोस के लोग आप के बारे में अनापशनाप कहते हैं तो मुझ से सहा नहीं जाता, इसीलिए सचाई जानने के लिए आज मैं ने आप से पूछा. पर मुझे नहीं पूछना चाहिए था. आप को दुख हुआ, प्लीज, मुझे क्षमा कर दीजिए.’

इस में तुम्हारी कोई गलती नहीं हैं, अनु. गलती हमारी, समाज की सोच और धारणा की है. सचाई यह है कि हमारा समाज आज भी अकेली औरत को सहन नहीं कर पाता. वह उस के लिए एक पहेली बन कर रहती है. उस पहेली को सब अपनीअपनी तरह से सुलझाना चाहते हैं. बस, यहीं से बेसिरपैर की बातें प्रारंभ होती हैं. पर मैं ने अपने आंख, कान और मुंह बंद कर रखे हैं. अगर खोल कर रखे होते तो शायद जीवित न रह पाती,’ कहते हुए उन की आंखें छलछला आई थीं.

 

परदे: क्या स्नेहा के सामने आया मनोज ?

स्नेहा से चैटिंग का सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो फिर चलता ही गया. अजीब सा नशा आ गया था इस बातचीत में. मैं स्नेहा के बारे में दिन पर दिन उत्सुक होता जा रहा था. उस की एक झलक देखने की कशिश ने मुझे उस के सामने खड़ा कर दिया, पर चाह कर भी क्यों मैं उस के सामने न आ सका?

मेरा बॉयफ्रेंड शादी नहीं करना चाहता है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 26 वर्षीय अविवाहित, सरकारी कार्यरत युवती हूं. पिता की मृत्यु हो चुकी है. मु झ से छोटी 2 बहनें और हैं. मां ने जैसेतैसे हमें पढ़ायालिखाया. एक बहन पार्लर में काम कर रही है. उस से छोटी प्राइवेट कंपनी में रिसैप्शनिस्ट का काम कर रही है. मैं 45 वर्षीय आदमी से प्यार करती हूं और उस से शादी करना चाहती हूं. लेकिन वह शादी करने से मना करता है. मैं उसे छोड़ भी नहीं सकती क्योंकि फाइनैंशियली वह मेरे परिवार की मदद करता है. मु झ पर बहनों की शादी की भी जिम्मेदारी है. उस आदमी को छोड़ती हूं तो आर्थिक मदद बंद हो जाएगी. कुछ सम झ नहीं आ रहा, क्या करूं?

जवाब

पिता न होने के कारण बड़ी होने के नाते छोटी बहनों की जिम्मेदारी भी आप पर है. दोनों बहनें अब थोड़ाबहुत कमाने लगीं हैं. उन के लिए लड़का खोजना शुरू कर दें. काम आसान नहीं है लेकिन कोशिश करने में क्या हर्ज है. शादी सादी या कोर्ट मैरिज ही करें. लड़के ऐसे ही ढूंढ़ें जिन्हें आप के घर की माली हालत अच्छी तरह पता हो, जिन्हें दानदहेज का लालच न हो. ऐसा घरबार मिल जाए तो अच्छा है. आप को अपने बारे में भी सोचना पड़ेगा क्योंकि शादी की उम्र तो आप की भी हो रही है.

वह आदमी आप से शादी नहीं करना चाहता, आप की मजबूरी सम झता है और उसे लगता है कि आर्थिक मजबूरी आप को उस के साथ बंधे रहने को मजबूर करती है तो आप उस की यह गलतफहमी दूर कर दें. उस आदमी से रिश्ता तोड़ दें. बेमेल प्यार की उम्र वैसे भी ज्यादा नहीं होती. अपने लिए दूसरा कोई लड़का ढूंढें़. लड़के को बता दें कि छोटी बहनों के प्रति जिम्मेदारी भी आप की है.

जहां चाह होती है वहां राह निकल ही जाती है. आप के सामने 2 विकल्प हैं. सोचसम झ कर सम झदारी से मिलजुल कर आगे की जिंदगी के बारे में सोचिए. बहनें अपने को और भी ज्यादा स्वावलंबी बनाना चाहती हैं तो उन्हें उत्साहित करें. विवाह भी हर समस्या का हल नहीं. यदि जीवन में नई राह की ओर चलते हैं तो कई रास्ते मिलते हैं. इसलिए अपने बूते पर कुछ करने का दम रखें.

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें