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क्या कांग्रेस का शुद्धिकरण कर रहे हैं सवर्ण भगोड़े

जितिन प्रसाद, अमरिंदर सिंह, परनीत कौर, नवीन जिंदल, सावित्री जिंदल, सुरेस पचोरी, हेमंत बिस्वा शर्मा, आलोक चंसोरिया, शैलेंद्र रावत, मनीष खंडूड़ी, महेश शर्मा, अशोक चव्हाण, वसव राज पाटिल, नारायण राठवा, कृष्णमूर्ति हुड्डा, हार्दिक पटेल, सुनील जाखड़, अल्पेश ठाकोर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, ललितेश त्रिपाठी, मिलिद देवड़ा, रीता बहुगुणा जोशी, शेखर तिवारी, अरुणोदय चौबे, संजय शुक्ला, शशांक भार्गव और हिमांशु व्यास वगैरहवगैरह

अब नजर मध्य प्रदेश पर डालें तो पहेली एक हद तक सुलझती हुई नजर आती है कि कांग्रेसी सवर्ण और ब्राह्मण इसलिए कांग्रेस छोड़ कर भाजपा ज्वाइन नहीं कर रहे हैं कि कांग्रेसी कढ़ाहे में सत्ता की मलाई खत्म हो चली है या कथित तौर पर कांग्रेस में ब्राह्मणों का पहले सा आदर सम्मान नहीं रहा और उन की अनदेखी की जा रही है. बल्कि सच सनातन और शाश्वत है कि डाक्टर राजेंद्र प्रसाद, गोखले, तिलक और बनर्जी, चटर्जी, आगरकर और मुखर्जी की इन ब्राह्मण और सवर्ण संतानों को मंदिर चाहिए, वर्ण व्यवस्था चाहिए, धर्म का राज चाहिए, मूर्तियां चाहिए और दक्षिणा चाहिए जिस की गारंटी आज की तारीख में सिर्फ भाजपा दे रही है.

इसे ही समझने वाले मोदी की गारंटी समझते हैं. बाकी सब तो मिथ्या है और सार्वजनिक मंच से दिए जाने वाले राजनीतिक भाषण हैं जो दलित, पिछड़ों और आदिवासियों के कानों को प्रिय लगने वाले होते हैं.

ऊपर जो जानेअनजाने मुट्ठीभर नाम बताए गए हैं उन में से सभी ने कांग्रेस के सुनहरे दिनों में सत्ता सुख भोगा है और इस के लिए सोनिया राहुल गांधी के तलवे चाटने से भी गुरेजपरहेज नहीं किया है. इन में से ही कईयों के बापदादा भी कांग्रेसी थे जो पंडित जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का थूका अपनी हथेली पर लेने से वे भी परहेज गुरेज नहीं करते थे, बल्कि गर्व महसूस करते थे क्योंकि इसी परिवार की कृपा से उन्हें विधायकी सांसदी और मिनिस्ट्री मिलती रही थी.

अब इन्हें लग रहा है कि यहां कुछ नहीं मिलने वाला तो ये भाजपा की तरफ भाग रहे हैं लेकिन यह वजह बहुत वजनदार नहीं है और सभी पर लागू नहीं होती. आम लोग बड़ी दिलचस्पी से रोजरोज का यह ड्रामा देखते हैं तो राय यही बनाते हैं कि भाजपा दिनों दिन मजबूत हो रही है और कांग्रेस कमजोर होती जा रही है. क्योंकि उस के छोटेबड़े नेता भाजपा ज्वाइन कर रहे हैं लेकिन जो नेता जा रहे हैं उन में से 99 फीसदी जमीनी नहीं हैं.

मसलन मध्य प्रदेश के सुरेश पचोरी जो लड़े तो 2 बार लेकिन कभी चुनाव जीते ही नहीं. उलट इस के कांग्रेस के जो नेता कोई भी चुनाव जीते तो वह नेहरु गांधी परिवार के दम पर जीते मसलन जितिन प्रसाद. यह हकीकत इन्हें भी मालूम है और भाजपा को भी जो रोज नए आने वालों की गिनती कर कुल टोटल बढ़ा देती है.

भाजपा ने सभी राज्यों में ज्वाइनिंग कमेटियां बना रखी हैं जिन का काम ही इन भगोड़ों को समारोह पूर्वक पार्टी में शामिल करना है. खुले तौर पर वह कहती भी है कि उस का मकदस खुद को मजबूत और कांग्रेस को कमजोर करना है, जिस से मोदी के अब की बार 370 के आंकड़े को छुआ जा सके. लेकिन क्या सिर्फ सवर्ण नेताओं की भर्ती से यह मुमकिन है.

इस सवाल का जवाब न में ही मिलता है क्योंकि सवर्ण कांग्रेसी तो हमेशा से प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष उस का साथ देते रहे हैं लेकिन जा इसलिए नहीं रहे थे कि उन्हें बैठेबिठाए बिना कुछ किए कुर्सी मिल रही थी. दूसरे भाजपा का हिंदुत्व का एजेंडा भी परवान चढ़ रहा था. दलित, आदिवासी न के बराबर भाजपा में जा रहे हैं क्योंकि वे भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे और मंदिर नीति से सहमत नहीं हैं. मुसलमान का उस से परहेज किसी सबूत का मोहताज कभी नहीं रहा जो हिंदुत्व और अयोध्या के बाद मथुरा काशी के होहल्ले से दहशत में है.

यानी भाजपा कांग्रेसी नेताओं को नहीं बल्कि कुछ हजार वोटों की भर्ती घोषित तौर पर कर रही है जो उसे पहले से ही मिलते ही रहे थे. अब तो यह जताने की कोशिश की जा रही है कि उस का कुनबा यानी मोदी का परिवार कांग्रेसियों के आने से बढ़ रहा है. इन भगोड़ों को भगवा शाल पहनाया जाता है तो लगता ऐसा है कि कट्टर हिंदूवादी नेता या संत घर वापसी मुहिम को अंजाम दे रहा है. फर्क इतना भर होता है कि घर वापस आने वाले इसाई या मुसलमान नहीं होते बल्कि सवर्ण ही होते हैं जिन्हें कांग्रेस में कुछ खास वजहों से घुटन होने लगी थी.

जैसे ही राहुल गांधी ने पिछड़ों की हिमायत करते जातिगत जनगणना की बात कही और कांग्रेस आलाकमान ने दलित समुदाय के कद्दावर वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया तो सवर्ण कांग्रेसी बिदक उठे क्योंकि कांग्रेस उन के हाथ से फिसल रही थी. जिस से बचने खुद इन्होने ही फिसलने का फैसला ले लिया. ये नेताओं की उस जमात के वंशज हैं जो दलित आदिवासी, पिछड़ों और मुसलमानों के वोटों पर विधायक सांसद से ले कर सरपंच तक बनते रहे थे.

सवर्ण वोट तो आजादी के बाद से ही रामराज्य परिषद, हिंदू महासभा, जनसंघ और फिर भाजपा को जा रहा था जिस में इत्तफाक से 2014 में अन्ना हजारे के आंदोलन की बदौलत छोटी जाति वालों के वोट भी शामिल हो गए तो भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ दिल्ली की कुरसी पर काबिज हो गई. प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने भगवा जाल बिछाना शुरू किया तो इस में कोई शक नहीं कि कई दलित पिछड़े और आदिवासी भी फड़फडा रहे हैं.

मोदी ने सवर्णों की राम मंदिर बनाने की जिद और मंशा पूरी की लेकिन साथ ही छोटी जाति वालों को उन के देवीदेवताओं के मंदिर पकड़ाना शुरू कर दिए जिस से वे भी पूजापाठ में उलझ कर ऊंची जाति वालों के मंदिर में न जाएं और भाजपा को वोट भी देते रहें.

हिंदी भाषी राज्यों में ऐसा हो भी रहा है और उसी के दम पर भाजपा 400 पार का नारा लगा रही है लेकिन दक्षिण भारत में उस का यह टोटका नहीं चल रहा. कर्नाटक उस के हाथ से छिन गया और तेलांगना में उस ने मुंह की खाई. तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल में तो पिछले लोकसभा चुनाव में उस का खाता भी नहीं खुला था.

हिंदी पट्टी के सवर्ण कांग्रेसियों को यह ज्ञान प्राप्त हो गया है कि हिंदू राष्ट्र जितना बन सकता था बन चुका है इसलिए अब यहां से फूट लो. इन कांग्रेसियों खासतौर से ब्राह्मणों का एक बड़ा दर्द यह भी है कि आलाकमान ने 22 जनवरी को अयोध्या के जलसे में शामिल होने से साफ मना कर दिया क्योंकि यह भगवा गैंग का सियासी इवेंट था.

सुरेश पचोरी जैसे नेताओं ने तो स्पष्ट कहा कि वे कांग्रेस इसलिए छोड़ रहे हैं कि उस ने राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का न्यौता ठुकरा दिया था. यह किसी कांग्रेसी नेता का नहीं बल्कि एक पूजापाठी ब्राह्मण का दर्द है जो अपनों यानी ऊंची जाति वालों की पार्टी में जाने का बहाना ढूंढ रहा था. बिना कोई चुनाव जीते जिस नेता को कांग्रेस ने 24 साल संसद पहुंचाया, केंद्र में मंत्री बनाया उस ने रत्तीभर भी लिहाज इस बात का नहीं किया और न ही यह सोच पाया कि देश और समाज धर्म से ऊपर हैं.

यही दर्द उन तमाम नेताओं का है जो भाजपा की तरफ भाग रहे हैं. यह तो खुद मध्य प्रदेश के एक मंत्री भूपेंद्र सिंह पब्लिक मीटिंग में कह चुके हैं कि जब सालों से भाजपा के लिए काम कर रहे नेताओं को ही कुछ नहीं मिला तो इन भगोड़ों को क्या मिलेगा. यानी ये लोग फर्श और दरिया बिछाने का काम करेंगे, मोदी शाह योगी और मोहन यादव की जयजयकार करेंगे. दोचार को विधायकी और सांसदी मिल भी जाएगी लेकिन इस के लिए जरुरी है कि वह ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा हो जो 20-22 विधायकों को साथ लाने की हैसियत रखता हो और अपनी रीढ़ की हड्डी भाजपाई और संघ की चौखट के बाहर रख कर आए.

इस पूरे ड्रामे में इकलौती अच्छी बात यह हो रही है कि कांग्रेस का शुद्धिकरण हो रहा है. जिस से आने वाले वक्त में वह मजबूत हो कर उभरेगी. कांग्रेस का समर्पित सवर्ण तो इस कचरे के छंटने से खुश हैं ही, साथ ही दलित पिछड़े आदिवासी भी राहत की सांस ले रहे हैं कि चलो अच्छा हुआ जो सामंती मानसिकता वाले ये पूजापाठी अपनों के पास चले गए.

अब कांग्रेस पर लोगों का भरोसा और बढ़ेगा जो इन सनातनियों के चलते डगमगा रहा था कि जब पूजापाठ और धार्मिक ढोंग पाखंड वालों को ही वोट देना है तो फिर भाजपा क्या बुरी है. इस में कोई शक नहीं कि कांग्रेस को अपने मूल स्वरूप में आने में अभी वक्त लगेगा क्योंकि हिंदी भाषी राज्यों के माहौल में पिछले 10 सालों में यज्ञ हवनों का इतना धुआ फैल चुका है कि सियासी तस्वीर साफ नहीं दिख रही.

बेंगलुरु जल संकट के बीच जानिए 2000 साल पहले रोमन ने कैसे घरघर पानी पहुंचा दिया था

Bengaluru water crisis: कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में भारी जल संकट खड़ा हो गया है. बेंगलुरु भारत का तीसरा सब से बड़ा नगर और पांचवा सब से बड़ा महानगर है जहां की आबादी लगभग 1 करोड़ है. बड़ीबड़ी इमारतों, पोश कालोनियों और चमचमाते सड़कों वाले बेंगलुरु के बोरवेल सूख गए हैं, बोरवेल मतलब जमीन से निकलने वाला पानी.

कुछकुछ इलाकों में तो लोगों को नहाने व कपड़े धोने की दिक्कत छोड़ो, पीने के पानी तक की किल्लत हो रही है. आलम यह है कि पीआर नगर (पांडुरंगा नगर), वाइटफील्ड, मराठाहल्ली, बलेंदुर जैसे पोश एरिया तक इस की चपेट में हैं. इन इलाकों में आरओ प्लांट पर लोग 5 रुपए दे कर 20 लीटर पानी खरीद रहे हैं. हर रोज इस प्लांट पर सुबह 7 बजे से पानी के लिए लंबी लाइन लगनी शुरू होती है, जो महज दो घंटों में बंद हो जाती है. यानी हालत ठीक वैसे ही है जैसे दिल्ली, मुंबई के झुग्गी बस्ती इलाकों में टैंकर के आगे लाइन लगने पर होती है.

और अगर इन इलाकों में सुबह 9 बजे तक पानी नहीं खरीदा गया तो पूरा दिन प्यासा रहना पड़ सकता है. हालत यह है कि लोगों की पानी की जरूरत पूरी करने के लिए बेंगलुरु वाटर सप्लाई और सीवरेज बोर्ड को एडवाइजरी जारी करनी पड़ रही है, जिस में पानी की बर्बादी करने वालों को लंबाचौड़ा जुर्माना थमाया जा रहा है. होली के दिन 26 मार्च को 22 परिवारों पर लगभग 1.1 लाख का जुर्माना लगाया भी गया.

हालांकि इस हालात को भारत की हर कच्ची झुग्गी बस्तियों में रहने वाले गरीब लोग आसानी से समझ सकते हैं पर मामला यहां अमीरों की कालोनी का आ बना है जो महंगे 3-4 बीएचके अपार्टमेंट्स, काली चमचमाती सड़कों, सुविधाओं से लेश जगहों में रहते हैं. मगर सवाल यह कि देश की इतनी हाईटेक सिटी जो हर मायने में एडवांस कही जा सकती है वहां पानी जैसी मूलभूत जरूरत के लिए लोगों को क्यों जूझना पड़ रहा है?

संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक, 2001 के मुताबिक दुनिया के शीर्ष आईटी सेंटरों में औस्टिन (यूएसए), सैन फ़्रान्सिस्को (यूएसए) और ताइपेई (ताइवान) के बाद बेंगलुरु चौथे नंबर पर है. तमाम पीएसयू और कपड़ा उद्योगों ने शुरू से ही बेंगलुरु की अर्थव्यवस्था चलाने में भूमिका निभाई थी. आज भले वे वहां नहीं हो पर इकोनौमिक सेंटर बनाने में उन की बड़ी भूमिका रही. यहां तक कि आज एफडीआई के रूप में निवेशकों के लिए बेंगलुरु को भारत का तीसरा सब से आकर्षित करने वाले शहर माना गया है. बेंगलुरु में 103 से अधिक केंद्रीय और राज्य अनुसंधान और विकास संस्थान हैं.

पर मामला यह है कि जहां दुनियाभर के निवेशकों का निवेश हो, जहां देश की आर्थिक तरक्की की नीव हो वहां पानी की किल्लत मामूली बात नहीं हो सकती. सवाल यह भी कि अच्छे सुंदर महानगरों के डेवलपमेंट और स्मार्ट सिटी की अंधी दौड़ में हम कहां चूक कर रहे हैं कि इतनी मामूली जरूरत को भी देख भांप नहीं पा रहे? आखिर क्यों बड़ीबड़ी गगनचुम्भी इमारतों को बनाने से पहले हम बुनियादी ढांचों पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं? और क्यों 21वीं सदी में भी दिल्ली, मुंबई, पुणे जैसे शहरों में पानी की व्यवस्था सुगम नहीं बना पा रहे हैं?

रोमन एक्वाडक्टों से सीख

आज हर घर पानी पहुंचाना संभव न हो यह बात कतई नहीं मानी जा सकती. वो भी तब जब हमारे पास 2000 साल पुराने रोमन साम्राज्य का शानदार उदाहरण हो, जिन्होंने बिना आधुनिक तकनीक के 11 एक्वाडक्ट यानी जलसेतु बना डाले. यह जलसेतु सुरंग, ब्रिज के माध्यम से शहरों में पहुंचे, जिस से 10 लाख नगर वासियों व आसपास के ग्रामीणों के हर घर में टेप वाटर पहुंचाया गया, वो भी बिलकुल साफसुथरा पानी.

इन एक्वाडक्टों से न सिर्फ शहर का सौंदर्यीकरण हुआ, जिस में शहरों के बीच सुंदर बगीचे, फव्वारे, पूल व नहरें बनीं बल्कि इन जलसेतु के फोर्स से वहां के उद्योगों को एनर्जी मिली, जिस ने वहां की अर्थव्यवस्था और साम्राज्य के विस्तार में बड़ी भूमिका निभाई. हैरानी यह कि इन में से कुछ एक्वाडक्ट आज भी काम कर रहे हैं.

आप खुद ही सोचिए, 2000 साल पहले, बिना आधुनिक मशीनी उपकरण, बुलडोजर, क्रेन, पहाड़ों को काटने वाली हैवी ड्रिल मशीन, बिजली के उपकरण की मदद से कैसे इतने बड़े लेवल पर यह तकनीक बनाई गई होगी? कैसे पहाड़ों में सुरंग खोद कर, ग्रेविटी का यूज कर पानी के लिए ब्रिज (एक्वाडक्ट) से रास्ता बनाने की सोची होगी? कैसे तो इतने बड़े ब्रिज बनाए गए होंगे? अंदाजा लगाइए कैसे 100 किलोमीटर दूर से पानी को जलसेतु के माध्यम से शहर में लाया गया होगा?

और यह पानी की सप्लाई सिर्फ रोम के लिए नहीं थी. लम्बी शताब्दियों तक रोमन साम्राज्य बढ़ता गया, उस का यूरोप, नार्थ अफ्रीका ओव वेस्टर्न एशिया तक राज फैला. राज फैलने से उस की संस्कृति कैलेंडर, भाषा और तकनीक भी फैली. रोमन बिल्डर्स ने यह मोनुमेंट्स और पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर ग्रेट ब्रिटेन और मोर्रोको में भी बनाया, ताकि वहां के नागरिकों को साफ पानी मिल सके. इन उदाहरणों से समझें –

• फ्रांस में पहली शताब्दी में रोमन एक्वाडक्ट को पोंट दु गार्ड के नाम से जाना गया, जिस ने दर्जनों मील से शहर में पानी पहुंचाया.

• स्पेन में, सेगोविया एक्वाडक्ट 100 फीट ऊंचा और लगभग दूसरी शताब्दी में बनाया गया, जिस ने नदी से लगभग 10 किलोमीटर दूर शहर में पानी पहुंचाया.

• सीरिया और जोर्डन में, रोमन साम्राज्य के बिल्डर्स ने गडारा एक्वाडक्ट बनाया, जिस ने सुरंगों और पुलों के माध्यम से लगभग 90 किलोमीटर दूर शहरों में पानी पहुंचाया. इस ने अब सूखे पड़ चुके जगह से 10 शहरों तक पानी पहुंचाया.

• दूसरी शताब्दी में ट्यूनीशिया में ज़गहोआन एक्वाडक्ट ने प्राचीन कार्थेज शहर को 100 किलोमीटर दूर से पानी की आपूर्ति की, जिस से यह सब से लम्बे एक्वाडक्ट में से एक बन गया.

हालांकि विशेषज्ञों ने रोमन जलसेतु प्रबंधन की प्रशंसा की पर उन के द्वारा पर्यावरणीय कुप्रबंधन की आलोचना भी की, क्योंकि रोम का कचरा सीधे टाइबर में बहाया जाता था. किन्तु उस के बावजूद यह अपने आप में उस समय का अजूबा से कम नहीं था, क्योंकि उस काल में इतनी दूर से पानी को शहरों तक लाना बहुत बड़ी बात थी. इस के लिए सुरंगे खोदने से ले कर मजबूत पुल बनाने (जो आज भी मौजूद हैं) जैसे काम किए गए. इतने साल पहले जलसेतु के ऐसे उदाहरण, जिन्होंने आम लोगों की पानी जैसे मूलभूत कमी को पूरा करने में भूमिका निभाई, बनाई गईं, मगर आधुनिक युग में सारे संसाधन होने के बावजूद शहरों में पानी की किल्लत सोचने का विषय तो है ही.

यह सिर्फ बेंगलुर की बात नहीं. बल्कि दिल्ली, पटना, लखनऊ, हैदराबाद जैसे बड़े शहरों की भी बात है. संयुक्त राष्ट्र ने इस साल के शुरू में चिंता जाहिर की थी कि भारत समेत 240 करोड़ की आबादी पानी की किल्लत से जूझ रही है और यह संख्या आने वाले समय में और भी बढ़ेगा.

रिपोर्ट्स में चिंताएं

कई रिपोर्ट्स और स्टडी इस बात का आगाह कर चुकी हैं कि भारत जल संकट की तरफ तेजी से बढ़ रहा है. यह चिंता की बात इसलिए भी है कि भारत में पूरी दुनिया की 17 फीसदी आबादी रहती है लेकिन उस अनुपात में जब पानी की बात की जाए तो यहां महज 4 प्रतिशत ही है.

इसी में अगर नीति आयोग की सीडब्ल्यूएमआई रिपोर्ट जोड़ दी जाए तो जल संकट और ज्यादा बड़ा दिखेगा. इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर 2 लाख लोगों की मौत सिर्फ इसलिए होती है कि उन्हें साफ पानी नहीं मिल पाता. प्रधानमंत्री हर घर जल की डींगे भले हांक ले पर 75 फीसदी घर ऐसे हैं जहां आज तक पीने का पानी नहीं आता. इस के लिए गांवदराज में जाने की जरूरत नहीं, बल्कि बड़ेबड़े शहरों में देखा जा सकता है.

बेंगलुरू में सब से बड़ी समस्या वहां के ग्राउंड वाटर का खत्म होना है. वहां 2015 के बाद सब से कम बारिश हुई और वैज्ञानिक बताते हैं कि उत्तर के मुकाबले दक्षिण के राज्यों में अंडरग्राउंड वाटर देरी से भरते हैं. दूसरा वहां जलाशयों की कमी है. वहां बोरवेल सूखे पड़े हैं.

इस के अलावा एक बड़ा कारण बेंगलुरु प्रशासन का बड़े पैमाने पर भ्रष्ट होना है. बड़े बिल्डरों और निर्माण कंपनियों के साथ बीबीएमपी, केआईएडीबी, केएसपीसीबी आदि विभागों के बीच सांठगांठ जो बड़े नेताओं से हो कर गुजरती है, ने शहर के जल निकायों को तबाह कर दिया है. इस में हैरानी नहीं होनी चाहिए कि बाकी राज्यों की तरह यहां भी झीलों, झरनों और नहरों के जल निकायों को बिल्डरों द्वारा हड़प लिया गया है.

पानी बचाने की कोशिशें बढ़ानी पड़ेंगी

पानी को ले कर दिल्ली में भी जंग हर साल चलती ही रहती है. दिल्ली में भी पानी का कोई व्यवस्थित ढांचा नहीं है. बड़ी आबादी यमुना और जहां पानी का साधन नहीं वो ग्राउंड वाटर पर जी रही है. मुख्य रूप से यमुना के पानी के अलावा दिल्ली में कुछ नहरों से भी पानी लिया जाता है, जैसे हरियाणा से निकलने वाली 2 नहरें ‘दिल्ली सब ब्रांच’ और ‘कैरियर लाइन्ड कैनाल’ जिसे हथिनी कुंद बैराज से पानी छोड़ा जाता है. इस के बावजूद हर साल गर्मियों में पानी का हाहाकार मचता है.

समस्या यह कि जहांजहां पानी की समस्या है वहां की सरकारें व प्रशासन कोई ठोस कदम नहीं उठा पाई है. और यह बात साधनों से लैश देश, पकेपकाए लोकतंत्र और पढ़ीलिखी आबादी के बीच घट रही है. जो चीज प्राचीन रोमन ने अपनी जनता के लिए की वह करने की हिम्मत और कुव्वत सरकारों में बची नहीं है. हालत यह है कि देश के पहले जल निकाय गणना में यह बात सामने आई थी कि भारत में लगभग 24 लाख जल निकाय हैं. इन में बारिश और बूजल-पुनर्भरण (रिचार्ज) किए जाने वाले जल स्रोत भी शामिल हैं, वे भी धीरेधीरे कम हो रहे हैं.

इन जलनिकायों को बचाया नहीं गया तो हालत बद से बदत्तर होने में देर नहीं लगेगी. बेंगलुरु का उदाहरण सामने है ही. ऐसे बहुत से शहर हैं जहां का पानी लगातार सूखता जा रहा है. हम अच्छी तरह से जानते हैं कि पहले की तुलना में बारिश की स्थिति हुई है. यानी बरसात कुछ गिनेचुने दिनों में हो रही है और वो भी बहुत तेज और धुआधार होती है. यह बहुत जरुरी हो गया है कि जहां भी जितनी भी बारिश हो रही है उसे बचाया जाए. जरुरी है कि सरकार इस में पहल करे और इस में क्षेत्रीय स्तर पर लोगों का सहयोग लिया जाए.

अगर एक साथ खाते हैं ठंडा-गर्म तो होंगी ये परेशानियां

हमें अपने खानपान को ले कर ज्यादा सचेत रहने की जरूरत है. हमारा खानपान कई मायनों में संतुलित होना चाहिए. ज्यादा तीखा-ज्यादा मीठा, ज्यादा ठंडा-ज्यादा गर्म खाने से हमें दूरी बनानी चाहिए. दो तरह का खाना हमें एक साथ नहीं खाना चाहिए. इससे पाचन प्रक्रिया में काफी परेशानी होती है. बेहतर स्वास्थ के लिए जरूरी है कि हम अपने खाने के कौंबिनेशन पर खासा ध्यान दें.

सही संचय और संतुलित आहार लेना हमारे शरीर के लिए सकारात्मक होता है. जानकार भी उसे ही अच्छा खाना मानते हैं जो आसानी से पच जाए. खाते वक्त धयान दें कि आप जो भी खाएं उसका सीधा असर आपकी सेहत पर पड़ता है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हर खाना पेट में जा कर कार्बोहाइड्रेट, फैट और शुगर में बदल जाता है. ऐसे में तासीर से कोई खासा फर्क नहीं पड़ता.

पर हां, बहुत ज्यादा ठंडा या गर्म खाना खाने से जरूर बचना चाहिए क्योंकि हमारा खून गर्म होता है. असंतुलित खाने के बाद शरीर के तापमान को समान्य करने के लिए शरीर को काफी मेहनत करनी पड़ती है.

हमारे शरीर का समान्य तापमान 37°C होता है. अगर आप एक साथ ठंडे और गर्म का सेवन करेंगे तो आपके शरीर को तापमान समान्य करने में काफी मेहनत करनी पड़ होती है. जिसके कई नुकसान होते हैं. इसलिए हिदायत दी जाती है कि  हमेशा सामान्‍य तापमान का भोजन ही खाएं.

क्या हो सकती है परेशानियां

खराब फूड कौंबिनेशन रखने से कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं. इससे आपकी स्‍किन हमेशा ड्राई बनी रहेगी, हमेशा कफ, पेट में गैस और अपच रहेगा और फेंफड़ों में कफ का जमाव हो जाएगा.

धीरे धीरे ये परेशानियां बढ़ती जाती हैं और आपके लिए काफी परेशानियां खड़ी हो जाती हैं. इसलिए हमेशा सेहतमंद रहने के लिए जरूरी है कि आपका आहार बेहद संतुलित होना चाहिए.

कायनात मुस्कुरा उठी- भाग 2: पराग की मनोदशा आखिर क्यों बिगड़ी?

उस कठिन दौर में तानी ने उसे बहुत सहारा दिया. वे दोनों एकदूसरे को बेहद चाहते थे.

सीए पूरा कर सैटल हो जाने के बाद दोनों की अपनेअपने परिवार की सहमति के साथ विवाह बंधन में बंधने की योजना थी, लेकिन पराग के घर घटी दुर्घटना ने उन दोनों के मनसूबों पर पानी फेर दिया.

सीए की फाइनल परीक्षा क्लीयर करने के बाद तानी  की नौकरी पुणे में एक प्रतिष्ठित एमएनसी में लग  गई.

उस दुर्घटना को 6 माह होने आए, परंतु पराग की दशा में कोई सुधार नहीं था. वह दिनदिन भर प्रस्तर प्रतिमा की मानिंद गुमसुम अपने ही खयालों में खोया हुआ एक जगह पर बैठा रहता. वह उसे लाख समझाते, “बेटा जाने वालों के साथ मरा तो नहीं जाता न. अब  पढ़ाईलिखाई में मन लगा. तुझे अपने मम्मीपापा के सपनों को पूरा करना है. उन का कितना मन था कि उन के दोनों बेटे सीए बनें. अब संकल्प तो रहा नहीं, अब तुझ पर ही उन के और मेरे सपनों को पूरा करने का दारोमदार है,” लेकिन पराग पर वयोवृद्ध दादाजी की मिन्नतों का कोई असर न होता.

जब तक तानी उस के सामने होती, वह थोड़ाबहुत अपने मन की बातें उस से साझा करता, लेकिन उस के घर से जाते ही वह फिर से गूंगा बन जाता.

एक दिन उन्हें किसी कुटुंबी की मौत पर घर से एक पूरे दिन के लिए बाहर जाना पड़ा. वह पोते को घर की एक बहुत पुरानी सेविका के सुपुर्द कर यह कह कर गए कि शाम तक वापस आ जाएंगे.

उस सेविका ने उन्हें उन के घर लौटने पर बताया कि उन के घर से निकलते ही पराग ने फोन कर तानी को अपने घर बुला लिया, और फिर उस ने उस को अपने घर भेज दिया.

दादाजी की अनुभवी आंखों से वस्तुस्थिति छुपी न रही थी. अब वह तानी के उन के घर आने पर पहले की तरह गर्मजोशी से उस से बातचीत न करते. उस के प्रति अपने ठंडे रवैए से उसे यह जताते कि वह उन के घर में अनचाही मेहमान है. वह बातबात पर उस से टोकाटाकी करते. जानबूझ कर उस से कड़वा बोलते.

वह समझ रहे थे कि दोनों बच्चे भटक गए थे और जिंदगी के इस मुकाम पर जब पराग का कोई कैरियर नहीं बन पाया था, उन का यह भटकाव उन्हें ले डूबेगा.

उन की आशंका सही निकली. उस दिन उन के पांव तले जमीन न रही थी, जब पराग उन्हें अकेला  छोड़ कर तानी के पीछेपीछे पुणे चला गया था.

घर छोड़ कर जाते समय उस का लिखा खत उन्हें जबानी याद हो गया था, “दादाजी, मैं तानी के पास पुणे जा रहा हूं. अब मैं उस के साथ ही रहूंगा. मैं उस के बिना जिंदगी नहीं गुजार सकता. मैं उस से शादी करना चाहता हूं. मेरी चिंता मत करिएगा. अपना खयाल रखिएगा. लव यू. पराग

एक पराई लड़की के लिए उन्हें छोड़ कर चले जाना दादाजी के दिल को छलनी कर  गया. उस के उन्हें यों अकेला छोड़ जाने के इस कदम से वह बेहद आहत थे, लेकिन इसे भी हरि इच्छा समझ उन्होंने दिल पर पत्थर रख लिया.

जिंदगी अब उन के लिए सजा बन कर रह गई थी. वह दिनरात ईश्वर से अपनी मौत मांगते.

पराग को घर छोड़े एक अरसा बीत चला. तभी पराग का एक घनिष्ठ मित्र, जो तानी की कंपनी में काम करता था, उस का जयपुर आना हुआ. एक दिन अचानक उस की मुलाकात उन से हुई, और उस ने उन्हें कोविड-19 के प्रकोप से आई मंदी के चलते तानी की नौकरी चले जाने और उन की बदहाली के बारे में बताया.

पोते पर आए संकट के बारे में सुन कर दादाजी बेहद परेशान हो गए. बहुत सोचविचार कर उन्होंने फैसला किया कि वे दोनों बच्चों को अपने घर ले आएंगे और उन दोनों की शादी करवा देंगे. इस के अलावा अब और कोई विकल्प न था.

अगले ही दिन वह अपने एक भतीजे के साथ पुणे में तानी के घर पहुंचे और पराग और तानी को अपने साथ जयपुर ले आए.

कि तभी कहीं झींगुर की आवाज ने उन के विचार में व्यवधान डाला, और वह यथार्थ में वापस आए.

कल उन के लाड़ले पोते पराग की शादी है, इस सोच ने उन्हें बेइंतहा तरावट पहुंचाई और वह करवट बदल कर सोने की कोशिश करने लगे.

उधर दादाजी के कमरे के सामने वाले कमरे में लेटी तानी आज पराग के नाम की अंगूठी पहन सातवें आसमान में थी. वह सोच रही थी, ‘कल वह पराग के साथ सात जन्मों के बंधन में बंध जाएगी. कितने संघर्षों के बाद आज यह दिन आया है.’

रात का एक बजने को आया था, लेकिन बावरा मन था कि पुरानी यादों के झुरमुट में अटकभटक रहा था.

एक समय ऐसा भी था, जब पराग के दादाजी के साथसाथ उस के अपने मातापिता भी उन दोनों के रिश्ते के खिलाफ हो गए थे.

उस के पिता को यह हरगिज गवारा नहीं था कि उन की खूबसूरत, सुशिक्षित, जहीन बेटी एक ऐसे लड़के से प्यार की पेंगे बढ़ाए, जिस के कैरियर का कोई अतापता नहीं था, और  साथ ही करेला और नीम चढ़ा, दुर्घटना के बाद उस की डिप्रेस्ड मानसिकता उन्हें डरा देती.

एक दिन उस के पापा ने उसे पराग के साथ अपने संबंध पूरी तरह से तोड़ने का नादिरशाही फरमान सुना दिया.

पर नई पौध पुरानी पीढ़ी के चश्मे से अगर दुनिया देख पाती, तो जेनरेशन गैप जैसी कोई शै अस्तित्व में ही न होती.

दोनों पक्षों के पेरेंट्स का अपने रिश्ते के लिए कड़ा विरोध भांप कर उस ने और पराग दोनों ने फैसला लिया कि उसे पहले पुणे जा कर नौकरी पर लग जाना चाहिए, और एक बार नई नौकरी में सैट होने के बाद पराग भी पुणे उस के पास चला आएगा.

योजना के मुताबिक, उस ने पुणे जा कर एमएनसी में अपनी नौकरी जौइन कर ली और फिर पहली तनख्वाह आने पर उस ने पराग के लिए जयपुर से पुणे की हवाई यात्रा की टिकट भेज दी. यात्रा के नियत दिन वह उन के लिए एक चिट्ठी छोड़ कर घर से निकल गया, और पुणे में तानी के पास पहुंच गया.

उधर उस ने पिता को अपना  निर्णय बताने की मंशा से यह मैसेज भेजा, “मम्मीपापा, जिंदगी के इस मोड़ पर मैं अब बिना पराग के जिंदगी गुजारने की सोच भी नहीं सकती. पराग यहां आ गया है और हम दोनों ने बहुत सोचसमझ कर यह डिसीजन लिया है कि हम जल्दी ही शादी कर लेंगे. मैं आप दोनों की ब्लेसिंग के बिना शादी नहीं करना चाहती. प्लीज, पुणे आ जाइए. हम दोनों आप का इंतजार करेंगे,” लेकिन तानी की उम्मीद के मुताबिक तानाशाह प्रवृत्ति के बेहद गरम स्वभाव के तानी के पिता ने बेटी के मैसेज के जवाब में यह मैसेज भेजा, “तू हमारे लिए मर गई. अब हमारा तुझ से कोई नाता नहीं. अब हमें कभी अपनी शक्ल मत दिखाना.”

दोनों को लिव इन करते हुए कुछ माह होने आए. थोड़ीबहुत एडजस्टमैंट की शुरुआती दिक्कतों के अलावा दोनों को और कोई खास समस्या न थी.

वक्त के साथ जिंदगी पटरी पर आ चली थी. तानी के  बेशुमार प्यार के साए में पराग धीरेधीरे अपना गम भूलने लगा.

तानी एक बेहद समझदार और पक्के इरादों वाली युवती थी. जो ठान लेती वह येनकेन प्रकरेण पूरा कर के ही दम लेती. उसे यह गवारा नहीं था कि उस का भावी जीवनसाथी उस से किसी तरह भी कमतर हो. उस की नजरों में एक अच्छे संतुष्टिदायक जीवन के लिए जीवनसाथी का एक अच्छा प्रतिष्ठित कैरियर बेहद जरूरी था. उस ने मन ही मन सोच रखा था कि वह पराग का कैरियर संवार कर ही दम लेगी.

पराग के साथ नईनई अंतरंग नजदीकी का खुमार उतरने के बाद वह उसे अपनी पढ़ाई के छूटे सिरों  को एक बार फिर से जोड़ने के लिए प्रेरित करने लगी. तभी कोविड-19 का प्रकोप हुआ और पूरे देश में लौकडाउन लग गया. उस का वर्क फ्रोम होम शुरू हो गया. वर्क फ्रोम होम शुरू होते ही उस ने पराग को कहकह कर सीए फाइनल की तैयारी शुरू करवाई.

अपनी परेशान मनःस्थिति के कारण पराग पढ़ाई में कंसंट्रेट नहीं कर पाता. आधे घंटे की पढ़ाई कर के ही उसे मानसिक थकान हो जाती. उस का कंसंट्रेशन टूट जाता. कभीकभी मां, पापा और भाई की याद कर के वह सुबकने लगता.

उस दिन भी यही हुआ. सुबहसवेरे नाश्ता कर पराग पढ़ने के लिए बैठा, लेकिन उसे पढ़ते हुए कुछ देर ही हुई थी कि उस का हौसला टूटने लगा और वह  रोआंसा होते हुए बोला, “तानी, मैं कंसंट्रेट नहीं कर पा रहा हूं. जैसे ही मैं पढ़ाई में डीप जाता हूं, मां, पापा और भैया की शक्ल मेरे सामने आ जाती है और मेरा मन भटकने लगता है.”

फिर अचानक वह रोने लगा और उस से बोला, “तानी,  तुम चाहो तो मुझे छोड़  सकती हो. मैं अब तुम्हारे लायक नहीं रहा. कहां तुम जिंदगी में वेल सैटल्ड हो और कहां मैं. मैं टूट चुका हूं तानी. पूरी तरह से खत्म हो गया हूं. अब मेरा और तुम्हारा  कोई मैच नहीं. मेरे साथ जिंदगी बिताने का ख्वाब छोड़ दो और मूव औन इन लाइफ. मुझ से बंध कर तुम्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला, सिवाय फ्रस्ट्रेशन, होपलैसनेस और दर्द के.”

मैं मेनोपौज के दौर से गुजर रही हूं,जिस वजह से मेरी सेक्स लाइफ खराब हो रही है, क्या करुं बताएं?

सवाल

मेरी उम्र 49 साल है और मैं मेनोपौज के दौर से गुजर रही हूं. इस दौरान मेरी सैक्स लाइफ बहुत प्रभावित रही. पीरियड कभी भी आ जाते थे. कहीं आनेजाने में भी घबराहट होती थी कि कहीं पीरियड आ गए तो क्या करूंगी क्योंकि ब्लड फ्लो इतना ज्यादा होता था कि पैड के बाहर फ्लो आ जाता था और बड़ी ही औक्वर्ड सिचुएशन हो जाती थी. मेरे पति भी मेरी हालत देख कर परेशान हो जाते थे. खैरअब 3 महीने हो गए हैंमुझे पीरियड नहीं हुए लेकिन इतना सब होने के बाद अब मुझे सैक्स में कोई रुचि नहीं रही.

जवाब

मेरे पति मेरा काफी साथ देते हैं. मुझे समझते हैं लेकिन फिजिकल रिलेशन बनाते समय मेरा ठंडापन देख कर अब वे भी अपसैट रहने लगे हैं. मुझे खुद अच्छा नहीं लगता लेकिन मैं क्या करूं. क्या मुझे डाक्टर के पास सलाह के लिए जाना चाहिए या ऐसा सब के साथ होता है?

मेनोपौज से गुजर रही महिलाएं अपने यौन जीवन में कई बदलाव महसूस करती हैं. इन बदलावों से दांपत्य जीवन और मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है. न सिर्फ महिलाएं खुद परेशान होती हैं बल्कि उन के पार्टनर को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है और उन का इस से रिश्ता प्रभावित होने लगता है.

यौन उत्तेजना का ज्यादा या कम होना महिला यौन विकारों के सब से आम विकारों में से एक है. यह समस्या वैजाइना में लुब्रिकेशन की कमी के कारण भी हो सकती है.

आप सैक्सोलौजिस्ट से मिलें और अपनी समस्या बताएं. इस का भी उपचार है. बाकी खुद को स्ट्रैस फ्री रखने की कोशिश करें. पौष्टिक आहार लें. ऐक्सरसाइज करें. पति के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं.

अब पतिपत्नी को सम?ाना चाहिए कि यह रोमांस का एक दूसरा दौर है. इस में आप दोनों को मानसिक रूप से एकदूसरे के साथ जुड़ना है. एकदूसरे का साथ देना है. फीलिंग्स रिश्ते में बहुत माने रखती हैं. इसी का असर सैक्स लाइफ पर पड़ता है. 

प्रेरणा: क्या शादीशुदा गृहस्थी में डूबी अंकिता ने अपने सपनों को दोबारा पूरा किया?

‘‘बड़ी मुद्दत हुई तुम्हारा गाना सुने. आज कुछ सुनाओ. कोई भी राग उठा लो,  बागेश्वरी, विहाग या मालकोश, जो इस समय के राग हैं,’’ रात का भोजन करने के बाद मनोहर लाल ने अंकिता से इच्छा व्यक्त की. वे बड़े लंबे समय के बाद अपनी बेटी और दामाद के यहां उन से मिलने आए थे.

इस से पहले कि अंकिता कुछ कहती, उस की 14 साल की बेटी चहक पड़ी, ‘‘सुना तो है कि मां बड़ा अच्छा गाती थीं, संगीत विशारद भी हैं, लेकिन मैं ने तो आज तक इन के मुख से कोई गाना नहीं सुना.’’

‘‘यह मैं क्या सुन रहा हूं? तुम तो इतना बढि़या गाती थीं. कुछ और समय लखनऊ में रहना हो गया होता तो तुम ने संगीत में निपुणता प्राप्त कर ली होती.’’

‘‘अभ्यास छूटे एक युग बीत गया. अब गला ही नहीं चलता. मेरे पास शास्त्रीय संगीत के अनेक कैसेट पड़े हैं, उन में से कोई लगा दूं?’’

‘‘नहीं, वह सब कुछ नहीं. इतने परिश्रम से सीखी हुई विद्या तुम ने गंवा कैसे दी? शाम 4 बजे के बाद कालेज से लौटती थीं तो जल्दीजल्दी कुछ नाश्ता कर रिकशे से भातखंडे कालेज चल देती थीं. वहां से लौटतेलौटते रात के साढ़े 7 बज जाते थे. थक जाने पर भी रियाज करती थीं. जाड़ों में रात जल्दी घिर आती है. तब मैं तुम्हें लेने साइकिल से कालेज पहुंचता था. उस ओर से रिकशे के पैसे बचाने के लिए तुम कितने उत्साह से पैदल ही उछलतीकूदती चली आती थीं. हम लोगों के कैसे कठिन दिन थे वे. वह सारी साधना धूल में मिल गई.’’

‘‘पिताजी, आप तो समझते नहीं. शादी के बाद बराबर तो असम में रहना पड़ा. उस पर नौकरी के आएदिन के तबादले और दौरे. उस अनजाने क्षेत्र में अकेली कलपती मैं क्या अभ्यास करती. मुझे तो हर समय डर लगा रहता था. आप ने देख तो लिया, इतने सालों के बाद आप आए हैं, लेकिन फिर भी इन का दौरे पर जाना जरूरी है.’’

‘‘यह तो नौकरी की विवशता है. इस में तुम दोनों क्या कर सकते हो? अकेलेपन की जो समस्या तुम ने उठाई, उस में तो संगीत या पुस्तकों से उत्तम और कोई साथी होता ही नहीं. अच्छा, यह बताओ कि तुम ने संगीत सीखा क्यों था?’’

‘‘मां और आप को शास्त्रीय संगीत का शौक था. जिस काम से आप लोग प्रसन्न हों उसे करने में हम सभी भाईबहनों को तब आनंद आता था.’’

‘‘यह सही नहीं है. रुचि न होने पर कहीं पुरस्कार जीते जाते हैं? अच्छा, अब कुछ शुरू करो.’’

‘‘पिताजी, घर में तानपूरा तक तो है नहीं.’’

‘‘कोई बात नहीं, बिना तानपूरे के भी चलेगा. किसी संगीत सभा में थोड़े ही गा रही हो?’’

कुछ देर शांत रहने के बाद अंकिता ने गला साफ कर के खांसा. तुहिना किलक उठी, ‘‘आज आईं मां पकड़ में.’’

कुछ गुनगुनाने के बाद अंकिता का स्वर उभरा :

‘कौन करत तोसों विनती पियरवा,

मानो न मानो मोरी बात.’

गाने की इस प्रथम पंक्ति को 3-4 बार दोहराने के बाद अंकिता ने राग के अंतरे को उठाया :

‘जब से गए मोरी सुधि हू न लीनी,

कल न परत दिनरात.’

लेकिन वह खिंच नहीं सका और अंकिता हताशा में सिर झटकते हुए चुप हो गई.

मनोहर लाल, जो आंखें बंद किए बेटी का गायन सुन रहे थे, बोले, ‘‘अगर मुझे ठीक याद है तो बागेश्वरी के इसी गीत पर तुम्हें अंतरविद्यालय संगीत समारोह में पुरस्कार मिला था. आज यह हालत है कि तुम यह भी भूल गईं कि बागेश्वरी में 2 स्वर कोमल लगते हैं. तुम ने तो उन की जगह शुद्ध स्वर लगा दिए. अंतरा भी तुम इसलिए नहीं खींच पाईं क्योंकि अभ्यास छूटा हुआ है.’’

‘‘अब क्या करूं, पिताजी?’’ अंकिता ने झींक कर कहा.

‘‘मेरी बात मानो तो एक तानपूरा खरीद लो. तुहिना अब बड़ी हो गई है. उसे तबला सिखवा दो. मैं सच कहता हूं कि यह जो तुम्हें हर समय बोरियत सी महसूस होती रहती है, सब दूर भाग जाएगी.’’

‘‘कोशिश करूंगी.’’

‘‘कोशिश नहीं, समझ लो कि यह तो करना ही है. लोग इस देश से प्रतिभा पलायन को ले कर हंगामा खड़ा करते हैं. लेकिन यहां तो प्रत्यक्ष प्रतिभा पराभव को देख रहा हूं. यह कहां तक उचित है?’’

अगले दिन अचल भी दौरे से लौट आए. उन्होंने जब तुहिना से अंकिता की छीछालेदर की बात सुनी तो अपने ससुर को सफाई देने लगे, ‘‘पिताजी, मैं ने तो न जाने कितनी बार इन से कहा कि अपने संगीत ज्ञान को नष्ट न होने दें और रुचि बनाए रखें. कैसेट तो घर में दर्जनों आ गए हैं लेकिन गाने के नाम पर हमेशा यही सुनने को मिला कि गला ही साथ नहीं देता. शायद अब आप के कहने का कुछ असर पड़े.’’

मनोहर लाल तो 4 दिन रहने के बाद लौट गए परंतु अपने पीछे बेटी के घर में मोटरकार के पीछे उठे धूल के गुबार जैसा वातावरण छोड़ गए. अंकिता खिसियानी बिल्ली की तरह कई दिनों तक बातबात पर नौकर और तुहिना पर बरसती रही.

अभी इस घटना को बीते एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ था कि एक शाम चपरासी ने अंदर आ कर अंकिता को सूचना दी, ‘‘छोटे साहब आए हैं. साथ में उन की पत्नी भी हैं. उन को बैठक में बैठा दिया है.’’

‘‘ठीक किया. हम लोग अभी आते हैं. रसोई में चंदन से कहना कि कुछ खाने की चीजें और 4 गिलास शरबत बैठक में पहुंचा जाए.’’

ठीक है कहता हुआ चपरासी रसोईघर की ओर चला गया.

‘‘अभी नए असिस्टैंट इंजीनियर की नियुक्ति हुई है. शायद वही मिलने आए होंगे,’’ अचल ने अंकिता को बताया.

अचल और अंकिता ने बैठक में जा कर देखा कि एक आकर्षक युवा दंपती बैठे प्रतीक्षा कर रहे हैं. शुरुआती शिष्टाचार के बाद दोनों पुरुषों में तो बातचीत शुरू हो गई लेकिन आगंतुक महिला को चुप देख अंकिता ने उस से पूछा, ‘‘आप कहां की हैं?’’

‘‘मेरी ससुराल तो बरेली में है लेकिन मायका लखनऊ में है.’’

‘‘मैं भी लखनऊ की हूं. इसलिए तुम मुझे ‘दीदी’ कह सकती हो. वैसे तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘जी, सिकता.’’

फिर तो अंकिता ने उस से उस के महल्ले, स्कूल, कालेज आदि सभी के बारे में पूछ डाला. यह भी पता चला कि सिकता ने भी भातखंडे संगीत विद्यालय में संगीत की शिक्षा पाई थी.

‘‘जब भी खाली समय हुआ करे और मन न लगे तो मेरे पास चली आया करो. अब संकोच न करना.’’

‘‘खाली समय तो बहुत रहता है क्योंकि ये तो जब देखो तब दौरे पर जाते रहते हैं और मैं अकेली घर में पड़ी ऊबती रहती हूं. अकेले घर में गाया भी नहीं जा सकता. नौकरचाकर न जाने क्या सोचें?’’

अंकिता के मस्तिष्क में सहसा बिजली सी कौंधी. वह बोली, ‘‘हम लोगों के क्लब में एक महिला समिति भी है, जिस में अफसरों की पत्नियां या तो ताश खेलती रहती हैं या फिर कभी ‘हाउसी’. क्यों न हम दोनों मिल कर कालोनी की लड़कियों के लिए संगीत की कक्षाएं शुरू करें. तुम्हारा तो अभी सबकुछ नया सीखा हुआ है. तुम्हारे सहारे मैं भी अपने पुराने अभ्यास पर धार लगाने का प्रयास करूंगी.’’

‘‘सच दीदी, आप ने तो मेरी बिन मांगी मुराद पूरी कर दी. आप जैसा भी कहेंगी, मैं करती रहूंगी. आप शुरू तो करें,’’ सिकता उत्साह से चहक उठी.

अंकिता ने अपने प्रभाव से क्लब की महिला समिति में एक कमरे में संगीत कक्षाएं चालू करा दीं, लेकिन शुरूशुरू में तथाकथित संभ्रांत महिलाओं ने खूब नाकभौं सिकोड़ी. कुछ ने तो यहां तक कह डाला कि यह 4 दिन की चांदनी है, फिर तो टांयटांय फिस्स होना ही है.

परंतु अंकिता को यह सब सुनने की फुरसत नहीं थी. सिकता और स्वयं के अतिरिक्त उस ने एक अन्य अध्यापक तथा तबलावादक को वेतन दे कर 3 घंटे प्रतिदिन के लिए नियुक्त कर लिया. कालोनी से संगीत सीखने की इच्छुक 10-12 लड़कियां और महिलाएं भी एकत्र हो गईं.

सिकता को तो संगीत सिखाना सहज लगता था लेकिन अंकिता को कुछ कक्षाएं पढ़ाने के लिए पहले घर पर घंटों अभ्यास करना पड़ा. उस पर एक नशा सा छाया हुआ था और वह जीतोड़ परिश्रम में लगी हुई थी. महिला समिति के फंड के अलावा वह अपने पास से भी काफी धन संगीत विद्यालय के लिए खर्च कर चुकी थी.

अंकिता को जैसेजैसे संगीत विद्यालय की आलोचना सुनने को मिलती, वैसेवैसे उस का संकल्प और दृढ़ होता जाता. देखतेदेखते 2 साल के अंदर ही इस संगीत विद्यालय ने अपनी पहचान बनानी आरंभ कर दी. महल्ले में क्या, पूरे शहर में उस की चर्चा होने लगी.

जहां किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता वहां संगीत विद्यालय की छात्राओं को भेजने के अनुरोध भी अंकिता को प्राप्त होने लगे. उस को इस से काफी आत्मसंतोष मिलता. वह इस तरह के सभी प्रस्तावों का स्वागत करती और हरेक कार्यक्रम को प्रस्तुत करने से पहले भाग लेने वाली छात्राओं को जम कर अभ्यास कराती. अधिकांश कार्यक्रमों का संचालन वह खुद ही करती.

क्लब में होली, तीज, ईद, दीवाली तथा राष्ट्रीय पर्वों पर होने वाले समारोहों में वह संगीत विद्यालय के विशेष कार्यक्रम रखती, जिन की सभी प्रशंसा करते. स्थानीय अखबारों में उन की रिपोर्ट छपती. कभीकभी आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी निमंत्रण मिलने लगा.

अचल का जल्द ही होने वाला तबादला अंकिता को अब चिंतित करने लगा था क्योंकि इस स्थान पर उन के 4 साल पूरे हो चुके थे. उसे डर था कि कहीं उस के जाने के बाद विद्यालय बंद न हो जाए, इसलिए अंकिता ने संगीत विद्यालय की संचालन समिति के मुख्य पदों को पदेन रूप से परिवर्तित कर दिया था, जिस से किसी व्यक्ति विशेष के रहने अथवा न रहने से विद्यालय के संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े. स्थानीय वेतनभोगी अध्यापकों की संख्या भी बढ़ा दी थी. कुछ प्रमुख रुचिसंपन्न महिलाओं को उस ने विद्यालय का संरक्षक भी बना दिया था.

अचल अकसर अंकिता को खिजाते, ‘‘तुम तो अब पूरी तरह संगीत विद्यालय को समर्पित हो गई हो. कहीं ऐसा न हो कि मैं भी काट दिया जाऊं.’’

‘‘कैसी बात करते हैं. आप के ही सहयोग से तो मुझे सार्थक जीवन की ये घडि़यां देखने को मिली हैं.’’

‘‘मेरे कहने की तुम ने कब चिंता की? यह तो पिताजी की झिड़की का प्रभाव है.’’

‘‘सच, हमारे विद्यालय के कार्यक्रमों में बड़ा निखार आ रहा है. डर यही लगता है कि कहीं हमारे तबादले के बाद यह उत्साह ठंडा न पड़ जाए.’’

‘‘तुम ने नींव तो इतनी मजबूत डाली है कि अब उसे चलते रहना चाहिए.’’

‘‘क्यों जी, हम लोगों का तबादला

1-2 साल के लिए रुक नहीं सकता?’’

‘‘इस बार तबादला तरक्की के साथ होगा. उसे रुकवाना हानिकारक होगा. चिंता क्यों करती हो, जिस जगह भी जाएंगे, वहां एक नया विद्यालय शुरू किया जा सकता है.’’

‘‘यहां सब जम गया था. कहांकहां नए गड्ढे खोदें और पौधे रोपें.’’

‘‘तो क्या हुआ? अब तो माली निपुण हो गया है. फिर वहां तुम्हारा स्तर ऊंचा होने का भी तो लाभ मिलेगा. वहां कौन काट सकेगा तुम्हारी बात?’’

‘‘अब जो होगा, देखूंगी. पर जगहजगह तंबू गाड़ना मुझे भाता नहीं.’’

‘‘भई, हम लोग तो गाडि़या लुहार हैं. दिन में सड़क किनारे गाड़ी रोकी, कुदाल, खुरपी, हंसिए बनाए, बेचे और बढ़ चले. इस जीवन का अपना अलग रस है.’’

‘‘हर कोई आप की तरह दार्शनिक नहीं होता.’’

बात पर तो विराम लग गया परंतु अंकिता के मन की चंचलता बनी रही.

वसंतपंचमी के अवसर पर दूरदर्शन के प्रादेशिक प्रसारण में संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत करने के प्रस्ताव को अंकिता ने स्वीकार तो कर लिया परंतु उस के लिए 2 गीत तैयार कराने में उसे और छात्राओं को बड़ा परिश्रम करना पड़ा. कार्यक्रम का सफल मंचन हो जाने पर उसे बड़ा संतोष मिला.

अंकिता अभी वसंत के कार्यक्रम की अपनी थकान उतार भी नहीं पाई थी कि उसे अपने पिता का पत्र मिला.

‘‘टीवी के प्रादेशिक कार्यक्रम में तुम्हारे विद्यालय द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम देखा. संचालिका के रूप में तुम्हें पहचान लिया. कार्यक्रम बहुत अच्छा था. मन बहुत प्रसन्न हुआ. लेकिन बेटी, एक बात याद रखना कि विद्या के क्षेत्र में प्रसाद वर्जित है.’’

पत्र पाने के बाद अंकिता आत्मसंतोष से भर उठी.

सिंगल पेरैंट: अभिशाप या वरदान

इक्कीसवीं सदी में शब्दकोश में सिंगल पेरैंट के नाम से एक नया शब्द जुड़ गया है. भारत में भी सिंगल पेरैंट का रिवाज बड़ी तेजी से बढ़ रहा है. पहले बीमारी, युद्ध, मृत्यु के कारण सिंगल पेरैंट होना  विवशता थी. तब विधवा या विधुर बच्चों का पालन करते थे. बच्चे वाली विधवा या बच्चे वाले विधुर को सिंगल पेरैंट के नाम से नहीं पुकारा जाता था. पहले कुंआरी मां की कल्पना भी नहीं की जाती थी, सभ्य समाज में कुंआरी मां बहुत घृणात्मक शब्द गिना जाता था, परंतु अब यह एक सामान्य शब्द है. अब इसे पसंद किया जाने लगा है. केवल इतना ही नहीं, अब तो यह रिवाज और स्टेटस सिंबल बन गया है. वैसे तो उस समय कोई कुंआरी मां नहीं थी, यदि होती भी तो ऐसी महिला को कोई किराए पर भी मकान नहीं देता था.

यही स्थिति कुंआरे पुरुष की भी थी, परंतु अब समय बदल गया है. उस समय केवल विवाहित दंपती को ही बच्चे पैदा करने का अधिकार था. पतिपत्नी दोनों मिल कर बच्चों का पालनपोषण करते थे.  पहले जब 2 विवाहित महिलाएं मिलती थीं, एक महिला अपने लड़के की ओर संकेत करती हुई कहती थी, इस के पिता बाहर गए हुए हैं, कहना नहीं मानता तथा बहुत परेशान करता है. कहने का तात्पर्य है कि मातापिता दोनों मिल कर ही बच्चों का पालनपोषण करने में समर्थ थे, अकेले नहीं. यद्यपि माता की गरिमा पृथ्वी से भी भारी है तो पिता का सम्मान आकाश से भी उच्चतर है. इस के विपरीत अब सिंगल मदर सहर्ष फुलटाइम काम भी करती है तथा बच्चों को पालती भी है.

यूरोप व अमेरिका में 2 प्रकार के सिंगल पेरैंट हैं. एक तो वे हैं जो विवाह के पश्चात तलाक ले कर सिंगल पेरैंट बने, दूसरे वे हैं जो अविवाहित रहते हुए बच्चे को जन्म देते हैं. तलाक ले कर अलग हुए पतिपत्नी के बीच अकसर बच्चों के संरक्षण को ले कर विवाद होता है. बच्चों को दोनों अपने पास रखना चाहते हैं. यह कैसी विडंबना है, दोनों को फल से तो लगाव है, परंतु वृक्ष से शत्रुता साफ देखने को मिलती है जब वे बच्चों का संरक्षण प्राप्त करने के लिए न्यायालय की शरण लेते हैं.

एक अनुमान के मुताबिक, रूस में वर्ष 2009 में 7 लाख तलाक हुए थे. अमेरिका में 1960 में सिंगल पेरैंट्स की संख्या 9 फीसदी थी जोकि वर्ष 2000 में बढ़ कर 28 फीसदी हो गई. 1 करोड़ 50 लाख बच्चों की देखभाल केवल आर्थिक कमजोरी में होती है. विवाहित दंपती की आय लगभग 8 लाख डौलर तथा सिंगल मदर की औसतन आय 24 हजार डौलर है. चीन में 19वीं शताब्दी में केवल 15 वर्ष की आयु में लगभग 33 फीसदी बच्चों ने अपने पिता या मातापिता को विवाहविच्छेद के कारण खो दिया.

अमेरिका में 2010 में कुल पैदा हुए बच्चों में से 40.7 फीसदी अविवाहित मांओं से जन्मे थे. एक अनुमान के मुताबिक, संसार में लगभग 15.9 फीसदी बच्चे सिंगल पेरैंट के साथ रहते हैं. यूएस जनगणना ब्यूरो के अनुसार, अकेले बच्चों में से 84 फीसदी बच्चे सिंगल मदर के साथ तथा 16 फीसदी बच्चे अकेले पिता के साथ रहते हैं.  45 फीसदी माताएं तलाकशुदा या फिर पति से अलग रहती हैं, 34.2 फीसदी माताएं अविवाहित हैं, जबकि विधवा माताओं की संख्या मात्र 1.7 फीसदी थी.

सिंगल पेरैंट के रिवाज का सब से अधिक लाभ व्यापारी वर्ग को होता है. सिंगल पेरैंट से व्यापारी वर्ग अधिक खुश है. सिंगल पेरैंट सभ्य समाज के लिए एक अभिशाप तथा व्यापारी वर्ग के लिए एक वरदान है. जब भी एक परिवार तलाक लेने का निर्णय लेता है, वकील, न्यायालय को काम तथा पैसा मिलता है. यद्यपि मित्र तथा दादादादी, नानानानी को दुख होता है, तो कुछ लोग हंसी भी उड़ाते हैं.

नामी लोगों का जब तलाक होता है तो इस की प्रिंट तथा इलैक्ट्रौनिक मीडिया में खूब चर्चा होती है. तलाक के पश्चात सिंगल पेरैंट (महिला, पुरुष) डाक्टर, मानसिक रोग विशेषज्ञ, विवाह काउंसलर के औफिस के चक्कर काटते हैं.  उदासीन सिंगल पेरैंट ऐसे में दवाओं का सहारा लेते हैं तथा कुछ लोग नशा करने लगते हैं, कभीकभी तो आत्महत्या जैसा जघन्य काम करने से भी परहेज नहीं करते.

महिलाओं की सोच

सर्वे के अनुसार, वर्ष 2011 में 41 लाख महिलाओं ने बच्चों को जन्म दिया, जिन में से सर्वे के समय 36 फीसदी महिलाएं अविवाहित थीं जोकि 2005 के मुकाबले 31 फीसदी अधिक हैं.

आश्चर्य की बात है कि 20-24 वर्ष की आयु की महिलाओं में यह 62 फीसदी रहा. सर्वे में भाग लेने वाली 30 फीसदी महिलाओं ने यह भी बताया कि सिंगल मदर बच्चों का पालनपोषण एक दंपती की तरह ही कर सकती है, जबकि 27 फीसदी का जवाब न में था. 43 फीसदी का कहना था कि यह सब परिस्थितियों पर निर्भर करता है. आगे चल कर 42 फीसदी महिलाओं ने तथा 24 फीसदी पुरुषों ने भविष्य में सिंगल पेरैंट रहने पर विचार करने को कहा तथा 37 फीसदी महिलाओं ने बच्चा गोद लेने का समर्थन किया.

शोध में यह भी पता लगा है कि 37 फीसदी विवाहित महिलाएं अपने पति से अधिक वेतन पाती हैं. वर्ष 1960 में केवल 11 फीसदी परिवार ही माता की आय पर आश्रित थे. वर्ष 2007 में अधिक महिलाओं ने फुलटाइम काम करने की इच्छा प्रकट की, जबकि कुछ बिलकुल काम न करने के पक्ष में थीं. 

बिखर जाता है परिवार

अकेलेपन को दूर करने के लिए महिला व पुरुष समय व्यतीत करने के लिए साथी खोजते हैं. वे नाचगाना, बार, सिनेमाघर का सहारा ज्यादा लेते हैं या नई महिला मित्र या पुरुष मित्र को बाहर घुमाने ले जाते हैं. वीकेंड में बच्चे पिता के साथ रहते हैं, ऐसे में पिता को बच्चों के लिए बाहर के खाने तथा आइसक्रीम पर भी व्यय करना पड़ता है. निश्चित रूप से सिंगल पेरैंट को अधिक व्यय तो करना पड़ता ही है, साथ ही सरकार को भी अधिक कर देना पड़ता है. कार्यालय में अफसरों को मौजमस्ती के लिए आसानी से सिंगल पेरैंट (मदर) या फिर सिंगल पेरैंट (पति) का साथ मिल जाता है. इस प्रकार एक सुखी परिवार बिखर जाता है.

तलाक के पश्चात अमेरिका में जोड़े द्वारा खरीदा मकान आमतौर पर महिला को मिलता है. यदि किसी महिला का 2 बार तलाक होता है तो उसे निश्चित तौर पर 2 मकान मिल जाते हैं. बच्चों का संरक्षण भी अकसर महिला को मिलता है. पति को प्रत्येक बच्चे के निर्वाह के लिए महिला को व्यय देना होता है. आमतौर पर बच्चे वीकैंड पर तलाकशुदा पिता को मिल सकते हैं.

कुल मिला कर सिंगल पेरैंट का बच्चों के भविष्य पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है. व्यापार बढ़ता तो प्रतीत होता है परंतु समाज के कमजोर होने की चिंता किसी के मुख पर दिखाई नहीं देती. तलाक को रोका नहीं जा सकता, परंतु समाज का हित इस में है कि तलाक कम से कम हों. हमें पारिवारिक स्नेह को अधिक महत्त्व देना होगा तथा व्यापारिक लाभ को तलाक से अलग रख कर सोचना होगा.

एक सर्वे के मुताबिक, लगभग 40 फीसदी अविवाहित महिलाओं ने बिना विवाह बच्चा पैदा करने की इच्छा प्रकट की है. सर्वे में भाग लेने वाली एकतिहाई सिंगल मदर ने बच्चा गोद लेने की इच्छा प्रकट की है. यूएस जनगणना ब्यूरो ने तेजी से बदल रही पारिवारिक संरचना में बहुत से विषयों पर सर्वे करने के बाद पाया कि सिंगल मदर का रिवाज बढ़ रहा है.

आफत: सासू मां के आने से क्यों दुखी हो गई रितु?

Writer- Neha Chachra

औफिस से घर पहुंचते ही मैं ने छेड़ने वाले अंदाज में रितु से कहा, ‘‘हम 2 से 3 होने जा रहे हैं, मैडम.’’

रितु फौरन मेरे गले में बांहों का हार डाल कर बोली, ‘‘ओह, सुमित, मेरी खुशियों को ध्यान में रखते हुए आखिरकार तुम ने उचित फैसला कर ही लिया न. मैं अभी सारी गर्भनिरोधक गोलियां कूड़े की टोकरी के हवाले करती हूं.’’

‘‘इतनी जल्दी भी न करो, स्वीटहार्ट,’’

मैं ने उस का हाथ पकड़ कर उसे शयनकक्ष में जाने से रोका, ‘‘हम 2 से 3 होने जा रहे हैं, क्योंकि तुम्हारी मम्मी कुछ दिनों के लिए हमारे पास रहने…’’

‘‘ओह नो…’’ रितु ने जोर से अपने माथे पर हाथ मारा.

‘‘अरे, वे तुम्हारी सगी मम्मी हैं, कोई सौतेली मां नहीं… उन के आने की खबर सुन कर जरा मुसकराओ, यार,’’ मैं ने उसे छेड़ना चालू रखा.

मुझे तो उन के आने की खबर ने खुश कर दिया है, यार

‘‘मेरी सगी मां किसी सौतेली मां से ज्यादा बड़ी आफत लगती हैं मुझे, यह तुम अच्छी तरह जानते हो न. उन का आना टालने के लिए कोई बहाना बना देते तो क्या बिगड़ जाता तुम्हारा?’’ यों शिकायत करते हुए वह मुझ से झगड़ने को तैयार हो गई.

‘‘अरे, मैं क्यों कोई झूठा बहाना बनाता? मुझे तो उन के आने की खबर ने खुश कर दिया है, यार.’’

‘‘मुझे पता है कि जब वे मेरी खटिया खड़ी करेंगी तो तुम्हें खुशी ही होगी. मेरी तबीयत वैसे ही ढीली चल रही है और अब ऊपर से नगर निगम की चेयरमैन मेरे घर में पधार रही हैं,’’ वह सिर पकड़ कर सोफे पर बैठ गई.

‘‘अब ज्यादा नाटक मत करो और एक कप गरमगरम चाय पिला दो.’’

मैं ने हंसते हुए उसे बाजू से पकड़ कर उठाना चाहा तो उस ने मेरा हाथ जोर से झटका और तुनक कर बोली, ‘‘अब अपनी लाड़ली सासूमां के हाथ की बनी चाय ही पीना.’’

‘‘तुम गुस्से में बहुत प्यारी लगती हो,’’ मैं ने आंखें मटकाते हुए उस की तारीफ की तो वह मुंह बनाती हुई रसोई में मेरे लिए चाय बनाने चली गई.

मेरी सासूमां स्कूल टीचर हैं. पिछली गरमियों की छुट्टियों में वे हमारे पास 2 सप्ताह रह कर गई थीं. अब दशहरे की छुट्टियों में उन्होंने फिर से आने का कार्यक्रम बनाया है. मेरे मातापिता नहीं रहे हैं, इसलिए मुझे उन का आना अच्छा लगता है, लेकिन रितु की हालत पतली हो रही है.

‘‘मैं शादीशुदा हूं, पराए घर आ गई हूं पर अभी भी मम्मी के सामने पड़ते ही मन अजीब सा डर व घबराहट का शिकार हो जाता है. कोई गलती नहीं की है, लेकिन ऐसा लगता है कि किसी गलत काम को करने के बाद प्रिंसिपल के सामने पेशी हो रही है. मेरी इस दशा का फायदा उठा कर ही वे मुझ पर हिटलरी अंदाज में हुक्म चला लेती हैं,’’ रितु ने पिछली बार अपनी मम्मी के आने के अपने मनोभावों से मुझे  अवगत कराया.

मेरी सासूमां अनोखे व्यक्तित्व की मालकिन हैं. घर में अधिकतर जीन्स व टौप पहनती  हैं. नियम से ऐरोबिक्स करने की शौकीन हैं और पार्क में कभी भी घूमने जाने के लिए तैयार रहती हैं. उन्हें घर में गंदगी बिलकुल बरदाश्त नहीं. आलसी व लापरवाह इंसान उन्हें दुश्मन नजर आते हैं.

पिछली बार सासूमां आई थीं तो रितु को खूब खींच कर गई थीं. रितु आरामपसंद इंसान है पर अपनी मां के सामने डट कर काम करने को बेचारी मजबूर हो गई थी. उसे मेरी सासूमां ने शनिवारइतवार की छुट्टियों में 1 मिनट भी आराम नहीं करने दिया था.

वे सारे घर का कायापलट करा गई थीं. परदे, सोफे के कवर, चादरें, पंखे, खिड़कियां आदि सब की साफसफाई हुई थी. घर का फर्श सारे समय जगमगाता रहा था. रसोई में हर चीज अपनी जगह पर मिलने लगी थी. धूलमिट्टी ढूंढ़ने पर भी घर में कहीं नजर नहीं आती थी.

यह तो रही घर में आए बदलाव की बात, इस के अलावा उन्होंने आते ही अपनी बेटी को तंदुरुस्त करने की भी मुहिम छेड़ दी थी.

‘‘शादी के बाद अगर तेरा वजन इसी स्पीड से बढ़ता रहा तो तू एकदम बेडौल हो जाएगी, रितु. फिर अगर अमित ने नई गर्लफ्रैंड बना ली तो क्या करेगी? नो, नो, ऐसी लापरवाही बिलकुल नहीं चलेगी. आज से ही अपनी फिटनैस ठीक करने को कमर कस ले,’’ सासूमां की आंखों में सख्ती के ऐसे भाव मौजूद थे कि रितु चूं भी नहीं कर पाई थी.

घर के सफाई अभियान के साथसाथ रितु की सेहत सुधारने का बीड़ा भी सासूमां ने उठा लिया था. रातदिन बेचारी का पसीना बहता रहता था. ऊपर से खाने में से सारी तलीभुनी चीजें भी गायब हो गई थीं. सासूमां खड़ी हो कर अपनी बेटी से सिंपल व पौष्टिक खाना बनवाती थीं.

मैं बहुत खुश था, अपने घर व रितु में आए परिवर्तन को देख कर. सासूमां की प्रशंसा करते हुए मेरी जबान नहीं थकती थी. ऐसे मौकों पर अपनी मां की नजरें बचा कर रितु मुझे यों घूरती थी मानो कच्चा चबा जाएगी, पर अपनी मां के सामने उस बेचारी की मुझ से लड़ने की हिम्मत नहीं होती थी.

अगले दिन रविवार की सुबह सासूमां 9 बजे के करीब हमारे घर आ पहुंचीं. मैं प्रसन्न था जबकि रितु कुछ बुझीबुझी सी नजर आ रही थी.

‘‘तेरी शक्ल पर क्यों 12 बज रहे हैं, गुडि़या?’’ मुझे ढेर सारे आशीर्वाद देने के बाद उन्होंने पहले अपनी बेटी का ऊपर से नीचे तक मुआयना किया और फिर माथे पर बल डाल कर यह सवाल पूछा.

‘‘आप के सुपरविजन में अब इसे जो ढेर सारे घर के काम करने पड़ेंगे, उन के बारे में सोचसोच कर ही इस बेचारी की जान निकल रही है, मम्मी,’’ मैं मजा लेते हुए बोला.

‘‘नहीं, दामादजी, इस बार तो यह मुझे बहुत कमजोर और उदास लग रही है. क्या तुम मेरी बेटी का ठीक से खयाल नहीं रख रहे हो?’’ वे अचानक मुझ से नाखुश नजर आने लगीं तो मैं हड़बड़ा गया.

‘‘ऐसी बात नहीं है, मम्मी. इस की तलाभुना खाने की आदत इसे स्वस्थ नहीं रहने…’’ मुझे आधी बात बोल कर चुप होना पड़ा, क्योंकि उन्होंने मुझ पर से ध्यान हटा लिया था.

सासूमां ने अपनी बेटी का हाथ पकड़ा और कोमल स्वर में बोलीं, ‘‘अपने मन की हर चिंता को तू मुझे खुल कर बताना, गुडि़या. इन 10 दिन में मैं तेरे चेहरे पर भरपूर रौनक देखना चाहती हूं.’’

‘‘जब ये परदे, सोफे के कवर वगैरह धुल जाएंगे और…’’

‘‘लगता है कि इस बार मुझे घर के बजाय तेरे व्यक्तित्व को निखारने पर ध्यान देना पड़ेगा.’’

‘‘और व्यक्तित्व निखारने के लिए सुबहशाम घूमने जाने से बढि़या तरीका और क्या हो सकता है, मम्मी?’’

‘‘तू थकीथकी सी लग रही है, बेटी. मैं जब तक यहां हूं, तू खूब आराम कर. कुछ दिनों की छुट्टी जरूर ले लेना. हमें अपने मनोरंजन के पक्ष को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.’’

‘‘इंसान जितना ज्यादा प्रकृति के साथ रहेगा, उतना ज्यादा स्वस्थ…’’

‘‘जब 2-4 फिल्में देखेंगे, खूब घूमेंगेफिरेंगे, कुछ मनपसंद शौपिंग करेंगे तो देखना, तेरे मन की सारी उदासी छूमंतर हो जाएगी, मेरी गुडि़या.’’

मेरे जोश के गुब्बारे की हवा सासूमां की बातें सुन कर निकलती चली गई तो मैं ने अपना राग अलापना बंद कर दिया. मेरी समझ में बिलकुल नहीं आ रहा था कि वे इस बार ऐसी अजीबोगरीब बातें रितु से क्यों कर रही हैं.

‘‘ओह, मम्मी, यू आर गे्रट,’’ रितु उछल कर अपनी मां के गले लग गई और साथ ही मुझे जीभ चिढ़ाना भी नहीं भूली.

मैं कुछ बुझाबुझा सा हो गया तो सासूमां ने हंस कर कहा, ‘‘दामादजी, चिंता मत करो. हमारे साथ मौजमस्ती करने तुम भी साथ चलोगे. मैं तुम्हें अपनी बेटी से ज्यादा पसंद करती हूं, कम नहीं. लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है जैसे इस बार तुम्हारे घर में मेरा मन नहीं लगेगा.’’

‘‘ऐसा क्यों कह रही हैं आप?’’ मैं ने औपचारिकतावश पूछा.

‘‘अब बिना नाती या नातिन के घर सूना सा लगता है.’’

‘‘मम्मी, अभी तो हमारी शादी को साल भर ही हुआ है. जब 3 साल बीत जाएंगे, तब आप की यह इच्छा भी पूरी हो जाएगी.’’

‘‘हां, मुझे मालूम है कि आजकल की पीढ़ी पहले खूब धन जोड़ना चाहती है, जी भर कर मौजमस्ती करना चाहती है. उन की प्राथमिकताओं की सूची में बड़ा मकान, महंगी कार और तगड़े बैंक बैलैंस के बाद बच्चे पैदा करने का नंबर आता है.’’

‘‘यू आर राइट, मम्मी. जिस बात को आप इतनी आसानी से समझ गईं, उसे मैं रितु को आज तक नहीं समझा पाया हूं.’’

‘‘मम्मी, मैं ने 28 साल की उम्र में शादी की है, 22-23 की उम्र में नहीं. मेरा कहना है कि अगर मैं जितनी ज्यादा बड़ी उम्र में मां बनूंगी, बच्चा स्वस्थ न पैदा होने की संभावना उतनी ज्यादा बढ़ जाएगी. शादी के 3 साल बाद बच्चा पैदा करना चाहिए, ऐसा कोई नियम थोड़े ही है. इंसान के अंदर समझदारी नाम की भी तो कोई चीज होती है,’’ मौका मिलते ही रितु भड़की और मेरे साथ बहस शुरू करने के मूड में आ गई.

‘‘मम्मी, इस मामले में आप इस की तरफदारी मत करना, प्लीज,’’ मैं ने नाराजगी भरे अंदाज में एक बार रितु को घूरा और फिर ड्राइंगरूम से उठ कर अपने कमरे में चला आया.

मैं घर में मुंह फुला कर घूम रहा हूं, इस बात की मांबेटी को कोई चिंता ही नहीं हुई. दोनों नाश्ता करने के बाद तैयार हुईं और घूमने निकल गईं. मुझ से 2-3 बार साथ चलने को कहा मगर मैं ने नाराजगी भरे अंदाज में इनकार किया तो दोनों ने खास जोर नहीं डाला था.

लंच के नाम पर मेरे लिए रितु ने आलू के परांठे बना दिए. वे दोनों 12 बजे के करीब घूमने निकलीं और रात को 8 बजे लौटी थीं. इन 8 घंटों में मेरा कितना खून फुंका होगा, इस का अंदाजा लगाना कठिन नहीं है.

उन के घर में घुसते ही मैं ने 2 बातें नोट की थीं. पहली तो यह कि वे दोनों 7-8 लिफाफे पकड़े घर लौटी थीं और दूसरी यह कि दोनों के चेहरे जरूरत से ज्यादा दमक रहे थे.

कुछ ही देर में मुझे पता लग गया कि उन दोनों ने 8 हजार की खरीदारी एक दिन में कर ही डाली. रही बात चेहरों पर नजर आते नूर की तो खरीदारी करने से पहले दोनों ब्यूटीपार्लर गई थीं. कुल मिला कर 10 हजार का खर्चा मांबेटी ने 1 दिन में ही कर डाला था.

‘‘देखा, दामादजी, इस वक्त रितु कितनी खुश और स्वस्थ दिख रही है. 10 दिन में तो देखना, यह फिल्मी हीरोइनों को मात करने लगेगी,’’ सासूमां अपनी बेटी को प्रशंसा भरी नजरों से निहार रही थीं.

‘‘मम्मी, 10 दिन में 10 हजार रोज के हिसाब से 1 लाख खर्च कर के अगर इस ने फिल्मी हीरोइनों को मात कर भी दिया तो मैं इस की तारीफ करने के लिए जिंदा कहां रहूंगा? सदमे से मेरी जीवनलीला समाप्त हो चुकी होगी न,’’ मैं दुखी अंदाज में मुसकराया तो सासूमां ठहाका मार कर हंस पड़ीं.

‘‘कभीकभी बड़ा अच्छा मजाक करते हो, दामादजी. अच्छा, तुम दोनों बैठ कर गपशप करो. मैं बढि़या सा पुलाव बनाने रसोई में जाती हूं,’’ सासूमां रसोई में चली गईं.

मेरे कुछ कहने से पहले ही रितु ने तीखे लहजे में सफाई देनी शुरू कर दी, ‘‘मैं ने तो मम्मी को बहुत मना किया, पर वे तो कुछ भी सुनने का तैयार नहीं थीं. कह रही थीं कि खरीदारी करने के कारण वे आप को नाराज नहीं होने देंगी. अब आप को जो भी कहना हो, उन्हीं से कहना. मैं तो पहले ही कह रही थी कि इन के यहां आने के कार्यक्रम को कोई बहाना बना कर टाल दो. आप ही अपनी लाड़ली सासूमां को बुलाने का भूत सवार था, अब भुगतो.’’

आगे की बहस से बचने के लिए उठ कर वह शयनकक्ष की तरफ चल दी. मैं ने नाराज स्वर में उसे हिदायत दी, ‘‘अब आगे से एक पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं है.’’

‘‘मम्मी तो कह रही हैं कि मैं उन के साथ घूमनेफिरने के लिए औफिस से हफ्ते भर की छुट्टियां ले लूं. अब इस बाबत जो कहना हो, आप उन से कहो. आप को पता तो है कि उन के सामने मुंह खोलने की मेरी हिम्मत नहीं होती है,’’ अपनेआप को साफ बचाती हुई रितु मेरी आंखों से ओझल हो गई.

मैं रितु को औफिस से छुट्टियां लेने से नहीं रोक सका. वे दोनों अगले दिन भी शौपिंग करने गईं और इस बार सासूमां ने रितु को 40 हजार की सोने की चेन खरीदवा दी.

‘‘मम्मी, आप क्या इस बार मुझे कंगाल करने का कार्यक्रम बना कर यहां आई हैं?’’ मैं ने दोनों हाथों से सिर थाम कर उन से यह सवाल पूछा तो वे उदास सी हंसी हंस पड़ीं.

‘‘दामादजी, आज सोने की चेन तो सचमुच मैं ने जबरदस्ती रितु को खरीदवाई है. मन सुबह से बड़ा उचाट था. रात को नींद भी अच्छी नहीं आई थी. सच बात तो यह है कि मन की उदासी दूर करने के चक्कर में ही मैं ने 40 हजार खर्च किए हैं. मन लग ही नहीं रहा है इस बार तुम्हारे यहां. अगर खेलने के लिए कोई नातीनातिन होती…’’

‘‘मम्मी, आप फालतू के खर्च को बंद कर मुझे कंगाल होने से बचाइए और मैं आप से वादा करता हूं कि बहुत जल्द ही आप का कोई नातीनातिन घर में नजर आएगा.’’

मेरे मुंह से इन शब्दों का निकलना था कि मांबेटी दोनों ने पहले खुशी से उछलते हुए तालियां बजानी शुरू कर दीं, फिर सासूमां ने उठ कर मुझे छाती से लगा लिया और रितु मेरा हाथ उठा कर उसे बारबार चूमे जा रही थी.

‘‘थैंक यू, दामादजी,’’ खुशी के मारे सासूमां का गला भर आया, ‘‘मुझे तुम ने इतना खुश कर दिया है कि कल और आज का सारा खर्चा मेरे खाते में गया.’’

‘‘सच?’’ मेरे मन की सारी चिंता पल भर में खत्म हो गई.

‘‘तुम ने जो मुझे नानी बनाने का वादा किया है, वह सच है न?’’

‘‘हां.’’

‘‘तो मैं भी सच बोल रही हूं, दामादजी. अब लगे हाथ जल्दी पापा बनने की पेशगी मुबारकबाद भी कबूल कर लो.’’

‘‘क्या मतलब?’’ सासूमां को रहस्यमय अंदाज में मुसकराते देख मैं चौंक पड़ा.

‘‘जल्द ही इस घर में नन्हेमुन्हे किलकारियां जो गूंजने वाली हैं.’’

‘‘क्या मम्मी सच कह रही हैं?’’ मैं ने रितु से पूछा.

उस ने गरदन ऊपरनीचे हिला कर ‘हां’ कहा  और टैंशन भरी नजरों से मेरे चेहरे के भावों को पढ़ने की कोशिश करने लगी.

‘‘रितु तुम्हें यह खुशखबरी सुनाने से डर रही थी, दामादजी. यह बेवकूफ सोचती थी कि तुम 3 साल बाद बच्चा पैदा करने वाली अपनी जिद पर अड़ कर इस के ऊपर गर्भपात कराने के लिए दबाव डालोगे. तब इस की तसल्ली के लिए मुझे 50 हजार खर्च कर तुम्हारे मुंह से यह कहलवाना पड़ा कि तुम पापा बनने को तैयार हो. मेरे लिए तो यह बड़ा फायदेमंद सौदा रहा है. मैं बहुत खुश हूं, दामादजी,’’ सासूमां ने हम दोनों को इस बार एकसाथ गले लगा लिया.

मैं ने रितु की आंखों में प्यार से झांकते हुए भावुक लहजे में कहा, ‘‘रितु, मैं कंजूस

हूं. पैसे जोड़ने के लिए बहुत झिकझिक करता हूं, क्योंकि मातापिता के न रहने से

मेरा बचपन बहुत अभावों और दुखों से भरा हुआ था. असुरक्षा का एहसास मेरे मन में बहुत गहरे बैठा हुआ है और उसी के चलते मैं पहले अपनी आर्थिक जड़ें मजबूत कर लेना चाहता था. लेकिन मैं ऐसा पत्थरदिल इंसान नहीं हूं कि आर्थिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए तुम्हारी कोख में पल रहे अपने बच्चे को मारने का फैसला…’’

‘‘मैं ने आप को समझने में भारी भूल की है. मुझे माफ कर दीजिए, प्लीज,’’ मेरी आंखों में भर आए आंसुओं को देख रितु फफकफफक कर रोने लगी.

मेरे कुछ बोलने से पहले ही सासूमां शुरू हो गईं, ‘‘रितु, कल से घर की सफाई का काम शुरू हो जाएगा. सुमित, तुम परदे उतरवाने में मेरी हैल्प करना. कल से ही पार्क घूमने भी चला करेंगे हम सब. सेहत को ठीक रखना अब तो और ज्यादा जरूरी हो गया है तुम्हारे लिए, रितु. सिर्फ सप्ताह भर ही है मेरे पास और कितने सारे काम…’’

सासूमां अपनी पुरानी फौर्म में लौट आई हैं, यह देख कर रितु ने ऐसा मुंह बनाया मानो कोई बहुत कड़वी चीज मुंह में आ गई हो और फिर हम तीनों एकसाथ ठहाका मार कर हंसने लगे.

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