Download App

परदे: क्या स्नेहा के सामने आया मनोज ?

स्नेहा से चैटिंग का सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो फिर चलता ही गया. अजीब सा नशा आ गया था इस बातचीत में. मैं स्नेहा के बारे में दिन पर दिन उत्सुक होता जा रहा था. उस की एक झलक देखने की कशिश ने मुझे उस के सामने खड़ा कर दिया, पर चाह कर भी क्यों मैं उस के सामने न आ सका?

मेरा बॉयफ्रेंड शादी नहीं करना चाहता है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 26 वर्षीय अविवाहित, सरकारी कार्यरत युवती हूं. पिता की मृत्यु हो चुकी है. मु झ से छोटी 2 बहनें और हैं. मां ने जैसेतैसे हमें पढ़ायालिखाया. एक बहन पार्लर में काम कर रही है. उस से छोटी प्राइवेट कंपनी में रिसैप्शनिस्ट का काम कर रही है. मैं 45 वर्षीय आदमी से प्यार करती हूं और उस से शादी करना चाहती हूं. लेकिन वह शादी करने से मना करता है. मैं उसे छोड़ भी नहीं सकती क्योंकि फाइनैंशियली वह मेरे परिवार की मदद करता है. मु झ पर बहनों की शादी की भी जिम्मेदारी है. उस आदमी को छोड़ती हूं तो आर्थिक मदद बंद हो जाएगी. कुछ सम झ नहीं आ रहा, क्या करूं?

जवाब

पिता न होने के कारण बड़ी होने के नाते छोटी बहनों की जिम्मेदारी भी आप पर है. दोनों बहनें अब थोड़ाबहुत कमाने लगीं हैं. उन के लिए लड़का खोजना शुरू कर दें. काम आसान नहीं है लेकिन कोशिश करने में क्या हर्ज है. शादी सादी या कोर्ट मैरिज ही करें. लड़के ऐसे ही ढूंढ़ें जिन्हें आप के घर की माली हालत अच्छी तरह पता हो, जिन्हें दानदहेज का लालच न हो. ऐसा घरबार मिल जाए तो अच्छा है. आप को अपने बारे में भी सोचना पड़ेगा क्योंकि शादी की उम्र तो आप की भी हो रही है.

वह आदमी आप से शादी नहीं करना चाहता, आप की मजबूरी सम झता है और उसे लगता है कि आर्थिक मजबूरी आप को उस के साथ बंधे रहने को मजबूर करती है तो आप उस की यह गलतफहमी दूर कर दें. उस आदमी से रिश्ता तोड़ दें. बेमेल प्यार की उम्र वैसे भी ज्यादा नहीं होती. अपने लिए दूसरा कोई लड़का ढूंढें़. लड़के को बता दें कि छोटी बहनों के प्रति जिम्मेदारी भी आप की है.

जहां चाह होती है वहां राह निकल ही जाती है. आप के सामने 2 विकल्प हैं. सोचसम झ कर सम झदारी से मिलजुल कर आगे की जिंदगी के बारे में सोचिए. बहनें अपने को और भी ज्यादा स्वावलंबी बनाना चाहती हैं तो उन्हें उत्साहित करें. विवाह भी हर समस्या का हल नहीं. यदि जीवन में नई राह की ओर चलते हैं तो कई रास्ते मिलते हैं. इसलिए अपने बूते पर कुछ करने का दम रखें.

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

उम्र लंबी, साथ पुराना, फिर भी दिल न लगे तो क्या करें

वैश्विक स्तर पर, 2000 और 2019 के बीच जीवन प्रत्याशा यानी लाइफ एक्सपेक्टेंसी में 6 साल से अधिक की वृद्धि हुई है. 2000 में 66.8 वर्ष से 2019 में 73.4 वर्ष हो गई है. 1970-75 में भारत में लोगों की औसत आयु 49.7 साल थी. अगले 45 साल के दौरान इस में करीब 20 साल का इजाफा हुआ. वर्ल्ड हैल्थ और्गेनाइजेशन द्वारा की गई एक स्टडी के मुताबिक अनुमान है कि वर्ष 2030 तक बहुत से देशों में औसत आयु 90 साल हो जाएगी.

जाहिर है हमारी उम्र तो लंबी हो रही है मगर परिवार छोटे हो रहे हैं. पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे तो पूरे दिन इंसान बिजी रहता था. भले ही यह व्यस्तता घर वालों से लड़नेझगड़ने या बुराईभलाई करते रहने की वजह से होती थी या फिर बच्चों के कोलाहल और शरारतों की वजह से. लेकिन यह सच है कि बुजुर्गों के आसपास बहुत से लोग बने रहते थे. मगर अब एकल परिवार में पतिपत्नी और बच्चे होते हैं. बच्चे भी एक या दो से ज्यादा नहीं होते और 18 – 20 की उम्र होतेहोते उन की दुनिया अलग हो जाती है.

ज्यादातर घरों में बच्चे नौकरी या शादी के बाद वैसे भी अलग दूसरे शहर या विदेश में रहने लगते हैं. पतिपत्नी 50 की उम्र के बाद घर में नितांत अकेले रह जाते हैं. सामान्य रूप से उन के पास दिनभर एकदूसरे की शक्ल देखने, एकदूसरे से बातें करने के अलावा कोई और औप्शन नहीं होता.

कभी कोई रिश्तेदार भूलेबिसरे आ जाए तो उस से बातें हो जाती हैं. वह भी आजकल एकदो घंटे से ज्यादा रिश्तेदारों के पास बैठने का समय कहां होता है. घर में टीवी है तो उसे चला कर बोरियत कुछ देर के लिए दूर करने की कोशिश की जाती है मगर टीवी भी कोई भला कितनी देर देख सकता है. बुजुर्ग पतिपत्नी के बीच कुछ नया शेयर करने की बातें भी नहीं होतीं. वही पुरानी बातें रह जाती हैं जिन्हें आखिर कितनी दफा सुना जाए. कुछ नया करने का भी मिजाज नहीं होता. आखिर पतिपत्नी पहले ही सब कर चुके होते हैं. उन दोनों के पास एकदूसरे के लिए कुछ नया देने या करने को नहीं होता.

अब जरा विचार कीजिए, इसी तरह की बोरियतभरी जिंदगी उन्हें और 30 साल एकदूसरे के साथ गुजारनी है तो यह कितना बड़ा टौर्चर है.
वही पुरानी शक्ल देखना जो अब बुढ़ापे में खास आकर्षक भी नहीं रह जाती. वही एकदूसरे की छोटीबड़ी शारीरिक तकलीफों में राहत पहुंचाने की कोशिशें और वही एकदूसरे की खामियों व बुरी आदतों को नजरअंदाज करते हुए समय काटने की मजबूरी. बुढ़ापे में पतिपत्नी आपस में ज्यादा लड़ते भी नहीं क्योंकि उन्हें पता होता है कि लाख समझा लो, मियां तो ऐसे ही रहेंगे.

अब जरा विचार करें कि उन के पास औप्शन क्या बच जाता है? अगर वे किसी और के साथ आंखें चार करने की सोचें तो जमाने की नजरें उन पर उठ जाएंगी. वे किसी पड़ोसिन/पड़ोसी के साथ ज्यादा उठेंबैठें तो भी लोग बातें बनाने लगेंगे और उन्हें एक दायरे में रहने की सलाह देने लगेंगे. अपने किसी रिश्तेदार के साथ हंसीमजाक और शरारतें करना भी उन्हें भारी पड़ेगा क्योंकि समाज बुढ़ापे में संस्कारशील बनने की अपेक्षा रखता है और यह सब जमाने की नजरों में ओछापन कहलाएगा.

इस तरह की तथाकथित घटिया हरकतों का हवाला दे कर समाज उन से कटऔफ करने में ज्यादा समय नहीं लगाएगा. इस वजह से अपने समाज में सम्मान के साथ जीने के लिए ऐसी तमाम सोच पर लगाम रखना जरूरी हो जाता है.

तब ले-दे कर उन्हें औप्शन दिए जाएंगे कि धार्मिक कार्यों, भजनकीर्तनों में शामिल हों, सुबहशाम पार्क जाएं, दानदक्षिणा करें और परलोक सुधारें. बुढ़ापे में परलोक की बात होती है मगर लोग इस लोक की नहीं सोचते. आखिर जो जन्म मिला है और लंबी उम्र भी मिली है, उसे यों ही बोरियत में बिताना आसान है? उसी एक इंसान के साथ अगले 30 साल का साथ कितनी बड़ी नाइंसाफी है. वैसे, हमारे यहां तो यह साथ सात जन्मों का होता है, तो फिर क्या कोई और रास्ता नहीं?

सोचिए, पति व पत्नी को अलग होने का मौका मिल भी जाए तो वे जाएंगे कहां? बुजुर्ग पत्नी के पास अपने बूढ़े पति और उस के घर के अलावा कौन सा ठिकाना है? इस बुढ़ापे में वह और कहां जाने का सोच सकती है? बच्चों की दुनिया अलग हो चुकी होती है. उस में बुजुर्ग एडजस्ट नहीं कर सकते. बच्चे खुद उन को साथ रखना नहीं चाहते. आखिर उन्हें भी अपने बच्चों को अपने हिसाब से बड़ा करना है. पेरैंट्स की दखलंदाजी उन्हें पसंद नहीं आती.

एक रास्ता है तलाक ले कर दूसरी शादी करने का. मगर यहां भी तलाक की प्रक्रिया कोई आसान नहीं. सालों लग जाते हैं. कानून प्रक्रिया सरल की जाए और बुढ़ापे में लोग आपसी सहमति से सहजता से तलाक ले कर अलग हो सकें तो बात बन सकती है. मगर बच्चे कहीं न कहीं इस से अपसेट होंगे. वे नहीं चाहेंगे कि इस उम्र में आ कर उन के पेरैंट्स अलग हों या किसी और के साथ घर बसाएं. इस से वे खुद को मजाक का पात्र बनता हुआ महसूस करेंगे. तो फिर उपाय क्या है?

जीवनसाथी बदलना तो बुजुर्गों के लिए हमारे समाज में आसान नहीं है मगर वे अपनी जिंदगी की बोरियत कुछ उपायों द्वारा कम कर सकते हैं. मसलन, वे समाजसेवा के कामों में लग जाएं, कुछ क्रिएटिव काम जैसे लिखना, पेंटिंग करना, गाना, डांस आदि में इन्वौल्व हों, किताबें पढ़नी शुरू करें. जवानी की व्यस्त जिंदगी में किताबें और मैगजीन पढ़ने का समय नहीं मिलता. मगर जब अब आप के पास समय है तो तरहतरह की बुक्स पढ़ें और ज्ञान बढ़ाएं. अपडेट रहें तब आप के पास दूसरों से बातें करने के टौपिक्स रहेंगे.

हमउम्र महलाओं, पुरुषों से दोस्ती बढ़ाएं. एकदूसरे से मिलेंजुलें. कहीं साथ घूमने जाएं. इस से आप को उन लोगों के साथ समय बिताने, बातें करने और कुछ अच्छी यादें जमा करने का मौका मिलेगा. आप चाहें तो सोशल मीडिया पर भी ऐक्टिव हो सकते हैं. इस तरह नए दोस्त बना सकते हैं ताकि जीवनसाथी न बदल पाने का गम कुछ हलका हो जाए. कम से कम नए दोस्त तो मिल जाएंगे.

तेलंगाना में रेड्डीयों और वेलम्माओं के वर्चस्व की लड़ाई, कौन मारेगा जीत की बाजी

पृथक तेलंगाना का चुनावी इतिहास और आंकड़े बताते हैं कि यहां सीधा मुकाबला कांग्रेस और बीआरएस के बीच है. 2019 के लोकसभा चुनाव में जरूर भाजपा ने 17 में 4 सीटें जीत कर हर किसी को चौंका दिया था तब उसे 19.65 फीसदी वोट मिले थे. बीआरएस को 9 सीटें 34.54 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं. कांग्रेस का प्रदर्शन दयनीय था उसे 3 सीटें 29.79 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं.

एआईएमआईएम को एक सीट 2.80 फीसदी वोटों के साथ मिली थी. यह सीट हैदरावाद थी जिस पर 2004 से ही असद्दुदीन ओवेसी जीत दर्ज करते आ रहे हैं. इस के पहले मुसलिमबाहुल्य हैदराबाद सीट 1984 से उन के पिता सुल्तान सलाउद्दीन जीतते रहे थे.

इस से पहले 2018 के विधानसभा चुनाव में बीआरएस 119 में से (तब टीआरएस) को 88 सीटें 46.87 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं. कांग्रेस 19 सीटें 28.43 फीसदी वोटों के साथ ले गई थी. भाजपा को तब एक सीट 6.98 फीसदी वोटों के साथ मिलीं थीं. एआईएमआईएम को 7 सीटें 2.71 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं.

लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने वापसी करते बीआरएस को सत्ता से बेदखल कर दिया था. उस ने 64 सीटें 39.40 फीसदी वोटों के साथ हासिल की थी जबकि बीआरएस 39 सीटों पर सिमट कर रह गई थी. उसे 37.35 फीसदी वोट मिले थे. भाजपा ने 8 सीटें 13.90 फीसदी वोटों के साथ जीती थीं. एआईएमआईएम 7 सीटें 2.7 फीसदी वोटों के साथ ले गई थी. हमेशा की तरह भाजपा और एआईएमआईएम का प्रभाव क्षेत्र हैदराबाद के इर्दगिर्द ही रहा था जहां वोटों का ध्रुवीकरण हिंदूमुसलिम बिना पर होने लगा है.

केसीआर का ग्राफ बेवजह नहीं गिर रहा है जिस का जातियों और धर्म की राजनीति से गहरा ताल्लुक है. पिछले विधानसभा चुनाव में दलित, आदिवासी, मुसलिम और पिछड़े तबके के वोट भी कांग्रेस को बेवजह नहीं गए थे. अपने सियासी कैरियर की शुरुआत कांग्रेस से करने वाले केसीआर 1985 में टीडीपी से जुड़ गए थे.

2001 में उन्होंने तेलंगाना राष्ट्र समिति पार्टी बना ली थी जिस का इकलौता मकसद पृथक तेलंगाना की मांग था जिस के लिए उन्होंने लंबी लड़ाई भी लड़ी. इस का इनाम भी उन्हें 2 बार मुख्यमंत्री बना कर जनता ने दिया. पृथक तेलांगना आंदोलन में उन के साथ सभी वर्गों और समुदायों के लोग थे जो उन के मुख्यमंत्री बनने के बाद छंटते गए.
इस के जिम्मेदार भी केसीआर खुद थे जो तेलंगाना बनने के बाद कोई नए मकसद नहीं गढ़ पाए और धरमकरम की राजनीति में उलझ कर रह गए. वह भी कुछ इस तरह कि दलित, आदिवासी, मुसलमान और पिछड़े खुद को ठगा महसूस करने लगे जो राज्य की आबादी का 80 फीसदी हिस्सा होते हैं. तेलांगना आंदोलन में इन्हीं तबकों की भागीदारी अहम थी जिस के चलते केसीआर ने वादा किया था कि राज्य का पहला मुख्यमंत्री दलित समुदाय का ही बनाया जाएगा और हरेक दलित परिवार को खेती के लिए मुफ्त जमीन व एक परिवार से एक सदस्य को सरकारी नौकरी भी दी जाएगी. इन और ऐसे कई वादों के चलते दलितों ने उन्हें 2 मौके दिए लेकिन नाउम्मीदी हाथ लगी तो यह तबका कांग्रेस के साथ हो लिया.

इन तबकों का माथा उस वक्त ठनका जब केसीआर ने साल 2017 में बालाजी मंदिर में सरकारी खजाने से कोई साढ़े 5 करोड़ का सोना दान में दे दिया. यह सोना गहनों की शक्ल में था. ये गहने पंडेपुजारियों द्वारा किए गए पूजापाठ के साथ समारोहपूर्वक चढ़ाए गए थे. केसीआर का परिवार और भारीभरकम लावलश्कर 2 हवाई जहाजों से तिरुपति मंदिर पहुंचा था. इस के कुछ महीने पहले ही उन्होंने साढ़े 3 करोड़ रुपए की कीमत का मुकुट वारंगल के देवी भद्रकाली मंदिर को तोहफे में दिया था. बकौल केसीआर, उन्होंने मन्नत मांगी थी कि तेलंगाना बना तो वे इन मंदिरों में दानदक्षिणा देंगे.

जाहिर है, वे भाजपा की तर्ज पर चलने लगे थे और सार्वजनिक सभाओं में खुद को सच्चा हिंदू भी घोषित करने लगे थे जिस से इस शुष्क खेती वाले राज्य के लोगों को कोई सरोकार न तब था न आज है.

इस से पहले भी तेलंगाना के लोगों को उन की निष्ठा और नियत पर तब शक हुआ था जब उन्होंने हैदराबाद के बीचोंबीच बेगमपेट इलाके में भव्य 50 करोड़ रुपए की लागत से सीएम हाउस बनवाया था. बुलेट प्रूफ इस आवास के होम थिएटर में ही 250 लोगों के बैठने की व्यवस्था की गई थी. अपना अतीत और इरादे भूल चुके केसीआर जब सामंतों और राजाओं की तरह महल में शाही ठाटबाट से मंदिरों में सोना दान करने लगे तो हिंदुत्व की उग्र और कट्टर राजनीति से डरा मुसलिम समुदाय भी उन से कट गया. उस के लिए भी इकलौता मुफीद और महफूज ठिकाना कांग्रेस ही बचा था. हालांकि हैदराबाद के मुसलमान ओवैसी पर भरोसा जताते रहे. लेकिन बाकी जगहों पर उन्होंने कांग्रेस पर भरोसा जताया.

तेलंगाना के 13 फीसदी मुसलमान 45 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं. लेकिन उस ने बाकी इलाकों में बीआरएस और एआईएमआईएम गठबंधन को नकारना शुरू कर दिया है तो चिंता अब ओवैसी को करना चाहिए कि जरूरी नहीं कि हैदराबाद के मुसलमान भी उन्हें वोट करते रहेंगे जिन के दिलोदिमाग में यह बात घर कर गई है कि बीएसआर भाजपा के इशारे पर नाचते उस के हिंदूवादी एजेंडे पर चलने लगे हैं. उस के संगठन पर भी वेलम्माओं का कब्जा कुछ इस तरह है कि वह वेलम्मा राष्ट्रीय समिति ज्यादा लगती है.

ठीक यही डर 18 फीसदी दलितों और 12 फीसदी आबादी वाले आदिवासियों सहित 50 फीसदी पिछड़ों के मन में भी बैठ गया है जिन्होंने 2 बार बीआरएस को वोट दे कर केसीआर को मुख्यमंत्री बनाया. लेकिन वे हिंदुत्व और पंडेपुजारियों के जाल में ऐसे उलझे कि उस से निकल ही नहीं पा रहे.

दरअसल एनटीआर के चेले रहे केसीआर यह मान बैठे थे कि ये वर्ग तो उन का साथ देते ही रहेंगे और इन्हीं के कंधों पर चढ़ कर दिल्ली भी सब से बड़ी कुरसी तक पहुंचा जा सकता है. पिछले विधानसभा चुनाव में उन की यह गलतफहमी किस हद तक दूर हुई, यह तो उन का व्यंकटेश जाने लेकिन यह प्रचार भी तेजी से तेलंगाना के चौपालों पर होने लगा है कि केसीआर रसूख वाली वेलम्मा जाति के हैं जिन का बड़ा मकसद 5 फीसदी वेलम्माओं की तरह ही रसूख वाली जाति रेड्डी की राजनीति खत्म करना है. यही सपना कभी एनटीआर ने भी देखा और दिखाया था.

लेकिन आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में रेड्डी रहित राजनीति की कल्पना करना ठीक वैसी ही बात है जैसी उत्तरप्रदेश और बिहार में बगैर यादवों के राजनीति की बात सोचना जो सत्ता में रहें न रहें समाज और राजनीति की धुरी बने ही रहते हैं. और जब इन्हें मुसलमानों व दलितों का साथ मिल जाता है तो ये सत्ता झटक ले जाते हैं.

कांग्रेस ने तेलंगाना में रेवंत रेड्डी को मुख्यमंत्री तो बनाया लेकिन अपने तजरबों से सबक लेते सभी तबकों का ध्यान वह रख रही है और इसी दम पर इस लोकसभा चुनाव में ताल ठोक रही है कि इस बार बीआरएस का बचाखुचा वोट भी समेट ले जाएगी. भाजपा ने यहां दलित समुदाय पर डोरे डालने की कम कोशिशें नहीं कीं लेकिन दलितों ने उस पर भरोसा नहीं किया. नतीजतन, वह 3 फीसदी ब्राह्मण सहित दूसरे सवर्णों के सहारे चुनाव लड़ रही है.

केसीआर को अब एहसास हो रहा है कि अगर इस बार पिछला सा प्रदर्शन नहीं दोहरा पाए तो फिर मौका मिलना मुश्किल हो जाएगा, इसलिए उन्होंने पूरी ताकत झोंक रखी है. भाजपा भले ही अब की बार 400 पार का नारा तेलांगना में लगाते 10 सीटों का टारगेट ले कर चल रही हो पर मालूम उसे भी है कि यहां भी उस का धर्म और हिंदुत्व का एजेंडा नहीं चलने वाला. इसलिए उस का फोकस पिछली जीती सीटों पर है. दूसरे, उस के पास असरदार प्रादेशिक नेतृत्व का भी अभाव है. कभी वेकैंया नायडू और बंगारू लक्ष्मण जैसे कद्दावर राष्ट्रीय नेता उस की ताकत हुआ करते थे. रेवंत रेड्डी के साथसाथ तेलंगाना में कांग्रेस को बड़ा फायदा राहुल गांधी की लोकप्रियता का यहां से मिलना तय है जिन की भारत जोड़ो यात्रा ने विधानसभा की जीत में अहम रोल निभाया था.

मंदिर में आग: जिम्मेदार भगवान नहीं तो फिर कौन ?

धार्मिक नगर उज्जैन के मशहूर महाकाल मंदिर के गर्भगृह में ऐन होली के दिन सुबहसुबह आग लगने से 14 पंडे पुजारी झुलस गए थे. हादसा मंदिरों में आएदिन होने वाले हादसों के मुकाबले बहुत ज्यादा गंभीर व नुकसानदेह नहीं था लेकिन राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री द्वारा सोशल मीडिया पर चिंता जताए जाने के बाद जरूरत से ज्यादा गंभीर हो गया.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की यह बहैसियत मुख्यमंत्री पहली होली थी जिसे वे भोपाल में मना भी रहे थे लेकिन जैसे ही महाकाल मंदिर के इस तथाकथित भीषण अग्निकांड की खबर उन्हें लगी तो वे तुरंत उज्जैन के मंदिर पहुंच गए. हालांकि प्रशासन उन्हें पहले ही सूचित कर चुका था कि कोई हताहत नहीं हुआ और न ही इस में आतंकियों या विधर्मियों या शरारती तत्त्वों का हाथ है तो उन्होंने बेफिक्री की लंबी सांस ली होगी लेकिन मामला चूंकि उन के गृहनगर का भी था और प्रधानमंत्री ने उन्हें खासतौर से फोन भी किया था, इसलिए भी उन्हें फ़ौरन पहुंचना पड़ा.

मंदिर पहुंच कर उन्होंने पहले हादसे की जानकारी ली और फिर पूजापाठ करने के बाद उज्जैन के सरकारी अस्पताल जा पहुंचे जहां अग्निपीड़ितों का इलाज चल रहा था. शुरुआती जानकारी के मुताबिक कुल 14 लोग झुलसे थे जिन में 3 पुजारी व अन्य सेवादार थे. मूर्ति के श्रृंगार के बाद कपूर आरती के दौरान स्प्रे गुलाल उड़ाने से यह आग लगी और तेजी से फैली इसलिए कि चांदी की दीवार पर लगे कपड़ों ने आग पकड़ ली थी.

यह भूमिका या प्रस्तावना ही इस अग्निकांड का उपसंहार भी है. इस से ज्यादा जांच में कुछ सामने आएगा, ऐसा लगता नहीं. प्रधानमंत्री ने इसे दर्दनाक बताया तो युवा मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बुजुर्गों के से अंदाज में लाख टके की बात यह कह दी कि भगवान की कृपा से कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ. यानी, जो छोटा हादसा हुआ वह भी भगवान की ही मरजी थी. फिर जांच कमेटी की तुक क्या? धार्मिक लोग बड़े दिलचस्प होते हैं जो हर अच्छेबुरे का जिम्मेदार ऊपर वाले को ठहराते खुद को भूमिका और दोषमुक्त कर लेते हैं. इस फलसफे का कोई तोड़ आज तक कोई नहीं निकाल पाया है कि जो भी होता है ऊपर वाले की इच्छा से होता है.

लेकिन उज्जैन के इस अग्निकांड में जले सभी पंडेपुजारी यानी भगवान के सेवक ही थे, इसलिए यह हैरानी होना भी स्वाभाविक बात है कि अगर यह भगवान ने किया तो वह ही दोषी क्यों नहीं. परेश रावल अभिनीत फिल्म ‘ओ माई गौड’ का वह दृश्य भूलने की चीज नहीं है जिस में वह भरी अदालत में सभी धर्मों के ग्रंथों के हवाले से साबित कर देता है कि भूकंप से क्षतिग्रस्त हुई उस की दुकान का जिम्मेदार चूंकि ऊपर वाला ही है, इसलिए मुआवजा और हर्जाना भी वही दे. फिल्मी अदालत में इस मुकदमे का फैसला हो पाता, इस के पहले सैंसर की कैंची से बचने के लिए निर्देशक ने बड़ी खूबसूरती से कहानी का अंत कर दिया लेकिन एक तार्किक सवाल उठाने के श्रेय और साधुवाद से उन्हें वंचित करना उमेश शुक्ला के साथ ज्यादती ही होगी.

इधर, पुजारियों को कम से कम एक एक लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा करने के साथ मोहन यादव ने अपनी संवेदनशीलता जताने का मौका नहीं गंवाया. मुफ्त इलाज की घोषणा की तो बात ही क्या, जो उज्जैन के सरकारी अस्पताल में हुआ. फिर भगवान के सेवकों को इंदौर के ब्रैंडेड अरविंदो अस्पताल रैफर कर दिया गया. इस से साबित हो गया कि खुद मुख्यमंत्री के गृहनगर का सरकारी अस्पताल इतना घटिया है कि वहां 30-40 फीसदी जले लोगों का इलाज भी नहीं हो सकता. इस बाबत वहां की बर्न यूनिट के स्टाफ को सस्पैंड नहीं किया गया तो यह भी भगवान की ही मरजी रही होगी.

एक बात जो साबित नहीं हुई लेकिन पूरी शिद्दत से मौजूद है वह यह है कि न केवल उज्जैन बल्कि देशभर के सरकारी अस्पतालों में गंद रहती है. वे कपूर-चंदन की महक से नहीं, बल्कि दुनियाभर के अवशिष्ट पदार्थों की बदबू से पहचाने जाते हैं. इस से पुजारियों को घुटन हो सकती थी. इस के अलावा डर भगवान के इन सेवकों के धर्म के भृष्ट हो जाने का भी था क्योंकि सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने जाने वाले अधिकतर मरीज छोटी जाति वाले होते हैं. इन्हें धर्मग्रंथ शूद्र और संविधान अनुसूचित जाति, जनजाति वाला और राजनेता व मीडियाकर्मी दलित, आदिवासी, पिछड़ा कहते हैं. संविधान की किसी एक अनुसूची में इन्हें बराबरी देने की बात कही गई है जिसे समाज को मानने को बाध्य नहीं किया जा सकता.

अरविंदो जैसे आलीशान, चमचमाते, वातानुकूलित, प्राइवेट लक्जरी अस्पताल की शान और बात ही कुछ और है जहां आधा मर्ज तो साफसुथरे, सुंदर, स्मार्ट स्टाफ और माहौल को देख कर ही छू हो जाता है. उलट इस के, सरकारी अस्पतालों का माहौल देख बीमारी और बढ़ जाती है और अच्छेखासे स्वस्थ आदमी को भी बीमार बना देने का माद्दा रखता है. अरविंदो जैसे अस्पतालों में शूद्र फटक भी नहीं सकते और जो फटक सकते हैं उन की जेब में लक्ष्मी होती है. जिस की अधिकता उन्हें शूद्र्पने यानी शूद्र होने के पौराणिक श्राप से मुक्त कर चुकी होती है.

तो मध्य प्रदेश सरकार ने पुजारियों का धर्म भृष्ट होने से बचा लिया. नहीं तो इलाज तो उन का उज्जैन के सरकारी अस्पताल में भी हो सकता था क्योंकि उज्जैन में जलने वाले सभी इंदौर के अरविंदो नहीं जाते. वे वहीँ ठीक हो जाते हैं. जांच बिंदुओं में इसे अगर शामिल किया जाता तब लगता कि सरकार ने निष्पक्षता और ईमानदारी बरती.

सवाल तो यह भी जवाब का मुहताज है कि अगर ये पंडेपुजारी घर में या किसी और जगह जले होते तो भी क्या उन्हें इतनी ही सुविधाओं के साथ अरविंदो भेजा जाता, तब भी क्या मंदिरप्रेमी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री इतनी ही संवेदनशीलता और फुरती दिखाते? जवाब है- नहीं. असल में मामला उस चमत्कारी और भव्य मंदिर का है जिस पर सरकार करोड़ों रुपए फूंक चुकी है और अभी भी कोई कंजूसी नहीं कर रही और न आगे करेगी.

ऐसे में अगर कोई अनहोनी हो जाती जो, बकौल मोहन यादव, भगवान की कृपा से नहीं हुई तो जरूर भक्तों की आस्था दरकती. हालांकि, तार्किक और व्यावहारिक लोग अभी भी यह सवाल दागने से चूक नहीं रहे कि सर्वशक्तिमान ईश्वर ने अपने सेवकों और पुजारियों को जलने से बचाया क्यों नहीं. और यह आग अगर इन्ही लोगों की लापरवाही से लगी है तो क्या उन्हें दोषी मानते सजा दी जाएगी जैसा कि जांच के बिंदुओं में से एक में कहा गया है कि दोषियों को सजा दी जाएगी.

आग इसलिए लगती है, भगदड़ इसलिए मचती है कि मंदिरों में अब ज्यादा से ज्यादा चढ़ावे के चक्कर और लालच में तीजत्योहारों पर जरूरत से ज्यादा शोबाजी होने लगी है. पत्थर की मूर्तियों के लिए गरमी में एसी लगाए जाने लगे हैं. ठंड में मूर्तियों को स्वेटर पहनाए जाते हैं, अलाव जलाए जाते हैं और गरम हवा वाले हीटर भी लगाए जाने लगे हैं. मूर्तियों को सैकड़ों तरह के व्यंजनपकवान खिलाए जाने लगे हैं जबकि हकीकत में इन्हें खाते पंडेपुजारी हैं.

कुछ हिस्सा प्रसाद के नाम पर मौजूद भक्तों को दे दिया जाता है जिस से कोई हायतोबा न मचे. एसी और अलाव का सुख भी यही सेवक भोगते हैं. अब यह सब व्यावसायिक तौर पर होगा, तो फैक्टरियों और कारखानों की तरह हादसे भी स्वाभाविक रूप से होंगे, जिन के जिम्मेदार यही नीचे वाले होते हैं जो शाश्वत धूर्तता दिखाते सारी जिम्मेदारी ऊपर वाले के सिर मढ़ देते हैं (इन्हें ‘ओ माई गौड’ फिल्म में कांजी भाई के मुंह से ऊपरवाले का एजेंट और मैनेजर कहलवाया गया है). इन का मकसद दुकानदारी और ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना होता है. मंदिरों में भीड़ ज्यादा आती है तो चढ़ावे की तादाद में भी इजाफा होता है जिस से दक्षिणापंथियों की बांछें खिली रहती हैं. इस बाबत वे मदिरों में दुनियाभर के ड्रामे करते हैं.

किसी फैकटरी, कारखाने या रेल में आग लगती है तो पहली गाज संबंधित जिम्मेदारों पर गिरती है और कई बार तो उन पर जुर्माना भी लगता है और कोर्ट से सजा भी होती है. लेकिन मंदिर इस के अपवाद हैं, क्यों हैं, यह सवाल उतना ही बेमानी है जितना यह कि भगवान कहीं है भी या नहीं. रही बात आलीशान अस्पतालों में महंगे से महंगा इलाज कराने यानी पैसे खर्च कर छुआछूत से बचने की, तो दुनियाभर के ब्रैंडेड धर्मगुरु आप को वहां स्वास्थ्यलाभ लेते मिल जाएंगे.

एक महीने पहले मशहूर वैष्णव संत स्वामी रामभद्राचार्य को इलाज के लिए देहरादून के सिनर्जी इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंसेज में भरती कराया गया था. उन की सांस कथा सुनातेसुनाते ही फूल गई थी. बीती 17 मार्च को ही आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव अपनी ब्रेन सर्जरी के लिए दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भरती हुए थे. उन्हें ब्रेन हेमरेज हुआ था. इन और ऐसे धर्मगुरुओं के उपदेश और प्रवचन इस नसीहत से भरे पड़े हैं कि सात्विक आहार लो, योग करो और जरूरत पड़े तो आयुर्वेदिक व चमत्कारिक प्राक्रतिक चिकित्सा अपनाओ.

यानी, एलोपैथी की तरफ मत जाओ क्योंकि वह विदेशी चिकित्सा पद्धति है जिस से ठीक होने के बजाय बीमारी और बढ़ती है. इस से भी बात न बने तो भजन, पूजन, कीर्तन, ध्यान वगैरह करो, ईश्वर सब ठीक करेगा. बस, यह कीमती मशवरा देने की फीस दानपेटी में डालते जाओ.

एक-दूसरे से बातचीत करना है बेहद जरुरी

हर शादी में एक ऐसा समय आता है जब आप और आपके साथी दोनों के बीच ठहराव आ जाता है. अगर आप दोनों अपनी बातों को शेयर नहीं करेंगे तो यह धीरे-धीरे आपके रिश्ते को कमजोर बनाता जाता है. पुरानी यादें, दिल टूटने की भावना और जिद रिश्तों में दूरी आने का सबसे बड़ा कारण होती है.

लेकिन इसके बावजूद अगर आप अपनी समस्याओं के बारे में एक-दूसरे से बात करके आपके बीच होने वाली गलतफहमी और दूरियों को कम कर सकते हैं. आइए आपको बताते हैं कैसे.

  1. अपने गुस्से को काबू में रखें: गुस्से में कुछ भी ना बोले और हमेशा बोलने से पहले आपको सोचना चाहिए क्योंकि अगर आपने अपने साथी से कोई ऐसी बात बोल दी जिसके कारण उसको बुरा लग जाए तो इसका असर आपके रिश्ते पर भी पड़ सकता है. कभी भी गुस्से में ऐसा कुछ ऐसा नहीं बोलना चाहिए जो आपके साथी के दिल पर लग जाए. इसलिए हमेशा कोशिश करें कि अपने गुस्से को नियंत्रित रखें.
  2. अपने साथी की बात को समझें: जब भी आप गुस्से में होते हैं तो आप सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं लेकिन ऐसा करना आपके रिश्ते में दूरी बढ़ा सकता है. आपका बुरा व्यवहार आपके साथी के ऊपर बुरा प्रभाव डाल सकता है. ऐसे समय में कोशिश करें कि आप अपनी परेशानी के बारे में अपने साथी से बातचीत करें और एक दूसरे की बातों को समझें ताकि रिश्ते में आई कड़वाहट को दूर किया जा सके.
  3. अपने साथी से खुलकर बात करें: हमेशा कोशिश करें कि आप अपनी समस्याओं के बारे में अपने साथी से बात करें ताकि वह आपकी समस्या का समाधान निकालने में आपकी मदद कर सके. अगर आप अपने दिल की बात नहीं बोलेंगे तो आप कभी अपने साथी से नहीं जुड़ पाएंगे. अगर आपका साथी कम बोलने वालों में से है तो आपको उनकी बात समझने की जरूरत है, ऐसा करने से उन्हें अच्छा महसूस होगा.
  4. अपने साथी को समय दें: व्यस्त जीवनशैली होने के कारण लोग एक-दूसरे को समय नहीं दे पाते हैं जिसकी वजह से उनके बीच दूरी बढ़ती जाती है. इसलिए उन्हें जरूरत है कि वह एक लंबी छुट्टी लें और अपने साथी से बात करें. ऐसा करने से दोनों के पास एक-दूसरे को समझने का मौका मिल जाएगा, जिससे उनमें प्यार बढ़ेगा.
  5. नकारात्मक बातों की जगह सकारात्मक बातें करें: एक शोध के अनुसार ऐसा माना गया है कि जो कपल्स सकारात्मक सोच रखते हैं उनका रिश्ता अधिक मजबूत होता है उन कपल्स की अपेक्षा जिनमें नकारात्मक सोच होती है. हमेशा अपने रिश्ते को लेकर अच्छी-अच्छी बातें सोचें और हमेशा एक-दूसरे के प्रति सकारात्मक भावनाएं बनाए रखें. यह आपके रिश्ते को गहरा करेगा और टूटने से बचाएगा. सकारात्मक सोच रखेंगे तो आपके बीच प्यार बना रहेगा.

मेरा चेहरा सुबह नौर्मल रहता है, लेकिन दोपहर तक लाल हो जाता है, इसका क्या कारण है?

सवाल
मेरा चेहरा सुबह नौर्मल रहता है, लेकिन दोपहर तक लाल हो जाता है. इस का क्या कारण है?

जवाब
धूप, चिंता, चौकलेट, मसालेदार खाना खाने आदि से इस बीमारी को बढ़ावा मिलता है. इस से बचाव के लिए चेहरे को ठीक से साफ करें और खानपान का विशेष ध्यान रखें. धूप में निकलने से 15 से 20 मिनट पहले यूवीए और यूवीबी से बचाव वाली सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें. धूप में ज्यादा देर रहने पर सनस्क्रीन 2 घंटे बाद दोबारा इस्तेमाल करें. खूब पानी पीएं.

ये भी पढ़ें…

हम में से कई लोगों की सैंसिटिव स्किन (अति संवेदनशील त्वचा) होती है. लेकिन हमें इस का पता ही नहीं होता. नतीजतन, ऐसी त्वचा की हम जरूरी देखभाल नहीं कर पाते हैं, जिस का बुरा असर हमारी त्वचा को झेलना पड़ता है.

सैंसिटिव स्किन की पहचान

अगर आप की त्वचा पर लाल निशान पड़ते हैं, उस में खुजली होती है, दर्द के साथ सनसनाहट होती है, त्वचा जल्दी डैमेज हो जाती है, मौसम बदलने और प्रदूषण का उस पर असर होता है तो संभल जाइए, क्योंकि आप की त्वचा काफी सैंसिटिव है. अगर उपरोक्त समस्याओं में से एक भी समस्या आप की त्वचा की है तो जान लीजिए कि उसे देखभाल की ज्यादा जरूरत है.

सैंसिटिव स्किन होना किसी तरह की बीमारी का लक्षण नहीं है, बल्कि यह तो कई बीमारियों का कारण बन सकती है. सैंसिटिव स्किन वालों को रोजेसिया, ऐग्जिमा, सोरायसिस, मुंहासे या ऐलर्जी हो सकती है. कई लोग इन लक्षणों को केवल सैंसिटिविटी मानते हैं और असल समस्या तक पहुंच नहीं पाते हैं. ऐसे किसी भी लक्षण का पता लगने पर तुरंत डर्मेटोलौजिस्ट से सलाह लें.

सैंसिटिव त्वचा वालों में अन्य लक्षण भी देखने को मिल सकते हैं जैसे किसी प्रोडक्ट के इस्तेमाल से रेशेज पड़ना, जलन होना या फिर धूप में ज्यादा देर तक रहने पर त्वचा में खिंचाव महसूस होना, झनझनाहट होना आदि. इस के अलावा कभीकभी चेहरे पर लाल निशान पड़ जाना भी धूप के कारण होता है. शेविंग के बाद भी अकसर देखा गया है कि दाने निकल आते हैं.

सैंसिटिव स्किन के कारण

सैंसिटिव स्किन होने के कई कारण हैं और हर व्यक्ति पर इस का अलगअलग असर हो सकता है. सैंसिटिव स्किन आनुवंशिक कारण से भी हो सकती है या फिर पर्यावरण में भी इस के कारण छिपे हो सकते हैं. अगर आप की त्वचा जल्दी लाल हो जाती है, उस में खुजली होती है, झांइयां आदि पड़ जाती हैं, तो यह समस्या आनुवंशिक हो सकती है. कुछ ऐलर्जिक रिएक्शन भी आप को परिवार से ही मिलते हैं.

कई बार आप जो खाना खाते हैं, वह भी आप की स्किन को सैंसिटिव बना देता है या कुछ ऐलर्जिक रिएक्शन को बढ़ावा दे सकता है. कौफी व अन्य गरम पेयपदार्थ और गरममसाले भी आप की स्किन में होने वाले रिएक्शन का कारण बनते हैं. इस के अलावा आप की स्किन कुछ खास स्किनकेयर और हैल्थ प्रोडक्ट्स को ले कर भी सैंसिटिव हो सकती है. ऐसी हालत में आप की स्किन को अतिरिक्त देखभाल की जरूरत पड़ती है.

त्वचारोग विशेषज्ञ को दिखाएं

अगर आप त्वचा की सैंसिटिविटी की परेशानी से जूझ रहे हैं, तो आप तुरंत त्वचारोग विशेषज्ञ के पास जा कर अपना चैकअप करवाएं. आप को अपनी त्वचा के बारे में पता होना चाहिए कि किन वजहों से आप की स्किन इतनी सैंसिटिव हो रही है. त्वचारोग विशेषज्ञ को दिखा लेने के बाद आप के पास इस समस्या से निबटने के बेहतर तरीके व साधन होंगे.

स्किन की नाजुकता का रखें खयाल

अगर आप की स्किन कोमल है, तो उस पर सख्त, खुरदरे प्रोडक्ट का इस्तेमाल न करें. हां, त्वचा को साफ रखें. लेकिन स्क्रबिंग व गरम पानी से बचें. क्लींजिंग के इस्तेमाल के बाद चेहरे को अच्छी तरह साफ कर लें. यह प्रोडक्ट हलका और सोप फ्री होनी चाहिए जो आप की स्किन में से ज्यादा औयल न निकाले. सैंसिटिव स्किन के लिए बने मौइश्चराइजर और सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें. चेहरे को बारबार व ज्यादा देर तक न धोएं और चेहरे को धोने के लिए कुनकुने पानी का इस्तेमाल करें. बदलते मौसम के बदलते समय में त्वचा का खास ध्यान रखें. सर्दियों में त्वचा में हो जाने वाली ड्राईनैस से खुजली होना आम बात है. ऐसे मौसम में त्वचा में पानी की कमी हो जाने पर उसे औयल बनाने में कुछ ज्यादा समय लगता है.

सैंसिटिव स्किन प्रोडक्ट्स ही चुनें

सैंसिटिव स्किन के लिए हमेशा सैंसिटिव प्रोडक्ट्स ही इस्तेमाल करें. ऐसे प्रोडक्ट्स चेहरे पर किसी भी प्रकार की जलन व खुजली पैदा नहीं करते. प्रोडक्ट्स पर दिए गए निर्देशों का जरूर पालन करें.

पावरफुल प्रोडक्ट्स से रहें दूर

सोप बेस्ड क्लींजर से दूरी बनाए रखें. अगर आप सैंसिटिव स्किन के लिए बने प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल भी नहीं करते हैं, तो ऐसे प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल से बचें, जिन में फ्रूट ऐसिड, तेज खुशबू, कलर, ऐंटीबैक्टीरियल जैसे तत्त्व मौजूद हों. डियोड्रैंट और स्क्रब वाले पदार्थों से भी बचें. किसी भी प्रोडक्ट को खरीदने से पहले उस में मौजूद तत्त्व चैक कर लें. कठोर कैमिकल वाले सोप, शैंपू, बौडी क्लींजर, क्रीम, बाथ औयल और बबल बाथ से बचें. सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि चेहरे पर स्क्रब न करें. इस के लिए आप मुलायम पफ या कपड़ा चेहरे को साफ करने के लिए इस्तेमाल किया करें.

अच्छे सनप्रोटैक्शन का इस्तेमाल करें

सैंसिटिव स्किन वालों सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों से बचने के लिए यह जरूरी है कि उन का मौइश्चराइजर एसपीएफ 30 वाला ही हो और वे सैंसिटिव स्किन के लिए बने सनस्क्रीन का ही इस्तेमाल करें.

खाने में रखें परहेज

कुछ खाद्यपदार्थों की वजह से भी सैंसिटिव स्किन वालों को ऐलर्जी हो सकती है, इसलिए ऐसे खाद्यपदार्थ पहचानें और उन से दूरी बनाए रखें. इस में आप डर्माटोलौजिस्ट से सलाह भी ले सकते हैं.

तनाव से बचें

तनाव से आप के नैचुरल ऐंटीऔक्सीडैंट मारे जाते हैं, जो त्वचा की बढ़ती उम्र को रोकने में मददगार होते हैं. इस के अलावा शरीर में ऐसे हारमोन भी तेजी से बढ़ने लगते हैं जो चेहरे पर दाने पैदा करते हैं. ऐसा कुछ न हो इस के लिए तनावमुक्त रहने की पूरी कोशिश करें.

पौष्टिक आहार लें

स्किन को स्वस्थ रखने के लिए हमेशा संतुलित और पौष्टिक डाइट लें. सैंसिटिव स्किन वाले ईएफए फैटी ऐसिड वाले खाद्यपदार्थ भी अपनी खुराक में शामिल करें.

नैचुरल फैब्रिक चुनें

सैंसिटिव स्किन वालों के लिए कौटन और सिल्क फैब्रिक का चुनाव करना सही रहेगा. सिंथैटिक वस्त्रों के मुकाबले ये रिएक्शन कम करते हैं. मेकअप उतारते समय भी कौटन बौल्स का इस्तेमाल करें न कि सिंथैटिक बौल्स का.

-डा. वरुण कात्याल (कंसल्टैंट डर्मैटोलौजिस्ट ऐंड कौस्मैटोलौजिस्ट)

 

किशमिश: मंजरी और दिवाकर गंगटोक क्यों गए थे?

Story in Hindi

लोकसभा चुनाव : 50 फीसदी महिला वोटों के रहमोकरम पर मर्द नेता

चुनाव जैसे ही नजदीक आते हैं, सभी पार्टियां जीतने के लिए बड़ेबड़े वादे करती हैं. 13 मार्च, 2024 को कांग्रेस ने महिलाओं के लिए ‘नारी न्याय गारंटी’ का ऐलान किया. बताया गया कि यह पार्टी के घोषणापत्र का हिस्सा भी है. इस व दूसरे अन्य वादों को राहुल गांधी ने अनाउंस किया. ‘नारी न्याय गारंटी’ का वादा तो विशेषकर महिलाओं की आर्थिक व सामाजिक पृष्ठभूमि को मजबूत करने को ले कर था, जिस में 5 बिंदु रखे गए-

– देश की गरीब महिलाओं को सालाना 1 लाख रुपए की वित्तीय सहायता.
– केंद्र सरकार की नई नियुक्तियों में 50 फीसदी महिलाओं को हक.
– आंगनवाड़ी, आशा और मिडडे मील वर्कर्स के मासिक वेतन डबल.
– हर पंचायत में महिला जागरूकता के लिए कानूनी सहायक की नियुक्ति.
– हर जिले में महिलाओं के लिए कम से कम 1 होस्टल.

एक तरह से देखा जाए तो यह वादा अपनेआप में खासा दिलचस्प हैं क्योंकि जिस तरह संपत्ति और अधिकारों पर पुरुषों का कब्जा है उसे एक हद तक संतुलन करने के लिए इस तरह के काम किए जाने जरूरी हैं.

दूसरे, यह जरूरी इसलिए भी है कि आज आम लोगों के पास परचेजिंग पावर कम हो रही है. मार्केट में वैल्थ सर्कुलेशन हो नहीं पा रहा. धन कुछ ख़ास लोगों के हाथों में ही संकुचित हो रहा है. ऐसे में गरीबों को डायरैक्ट कैश ट्रांसफर से देश की अर्थव्यवस्था को चलाए रखना बेहद जरूरी भी है. पर समस्या यह कि इस तरह के बड़े वादे अकसर डूबते खेमे से ही आते हैं जिस पर बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं लगाई जा सकतीं.

हालांकि इस से एक सवाल तो बनता ही है कि 75 वर्षों बाद भी ऐसी नौबत क्यों है कि पक्षविपक्ष द्वारा महिलाओं के लिए ऐसे वादे करने पड़ रहे हैं? आखिर क्यों देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को लुभाने के लिए चुनावी पार्टियों को तरहतरह के वादे करने पड़ रहे हैं?

इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी ने 8 मार्च को सिलैंडर पर 100 रुपए की छूट देने का ऐलान किया. अपने चुनावी घोषणापत्र में भाजपा की तरफ से कहा गया है कि वह जीतने के बाद सभी बीपीएल परिवारों की छात्राओं को केजी से पीजी तक मुफ्त शिक्षा का लाभ देगी. पीएम उज्ज्वला योजना में महिलाओं को 450 रुपये में सिलैंडर दिया जाएगा. 15 लाख ग्रामीण महिलाओं को लखपति योजना के अंतर्गत कौशल प्रशिक्षण दिया जाएगा. एक करोड़ 30 लाख से अधिक महिलाओं को आर्थिक सहायता के साथ आवास का लाभ मिलेगा. बीपीएल परिवारों की लड़कियों को 21 वर्ष तक कुल 2 लाख रुपए का लाभ दिया जाएगा.

हालांकि सवाल यह भी है कि भाजपा की घोषणाओं से कितनी उम्मीद लगाईं जाए? साल 2014 से पहले भाजपा ने ‘अच्छे दिन’, ‘हर साल 2 करोड़ नौकरियां’, ‘महंगाई कम करने’, ‘कालाधन वापस लाने’ और ‘हर व्यक्ति के बैंक अकाउंट में 15 लाख रुपए डालने’ जैसे तमाम वादे किए थे. हालांकि, चुनाव के बाद सवाल पूछा गया तो तब के भाजपा अध्यक्ष व वर्तमान में गृहमंत्री अमित शाह ने इसे चुनावी जुमला बता दिया.

चुनाव में महिलाओं को लुभाने के लिए राष्ट्रीय पार्टियां ही कोशिश नहीं कर रहीँ, बल्कि क्षेत्रीय पार्टियां भी वादे कर रही हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने ट्विटर हैंडल से 4 मार्च को ट्वीट करते हुए कहा, “महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए आप की दिल्ली सरकार ने एक कदम आगे बढ़ते हुए अब महिलाओं को सालाना 12 हजार रुपए की सौगात दी है. 18 साल से अधिक उम्र की हमारी सभी बहनबेटियों, माताओं और बहनों को अब मुख्यमंत्री सम्मान योजना के तहत 1,000 रुपए प्रतिमाह दिए जाएंगे.” इसी तरह तमिलनाडु में भी डीएमके सरकार व पश्चिम बंगाल में टीएमसी सरकार हर महीने 1,000 रुपए डायरैक्ट ट्रांसफर कर रही हैं. लगभग सभी पार्टियां महिलाओं के लिए जरूरी घोषणाएं जरूर कर रही हैं.

यह सोचा जा सकता है कि अचानक इन पार्टियों में महिलाओं के प्रति ऐसा रुझान क्यों होने लगा? इस की वजह पिछले एक दशक में महिलाओं के चुनावी भागीदारी में बड़ा बदलाव आना है. महिलाएं सब से बड़ा वोटबैंक बनकर उभरी हैं. इतना ही नहीं, विधानसभा चुनाव में बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल जैसे बड़े राज्यों में महिलाओं ने पिछले कुछ चुनावों में पुरुषों से अधिक वोट डाले.

लोकसभा से ले कर विधानसभा चुनाव तक सभी जगह इन की वोटिंग में 10 से 15 फीसदी तक का भारी इजाफा देखने को मिला है. इसे इन आंकड़ों से समझते हैं- 2014 के लोकसभा चुनाव में पुरुष और महिला मतदाताओं के मतदान प्रतिशत में सिर्फ डेढ़ प्रतिशत का अंतर था, जबकि 2019 में वे पुरुषों से आगे निकल गईं. 2019 के चुनाव में पुरुषों का मतदान प्रतिशत जहां 67.02 था, वहीं महिलाओं का 67.18 प्रतिशत था.

इस बढ़ते ट्रैंड और महिलाओं को ले कर हो रही घोषणाओं से ऐसा लग रहा है कि 2024 के चुनाव में महिला मतदाताओं की संख्या पिछली बार की तुलना में ज्यादा होगी. चुनाव आयोग के मुताबिक 2024 के चुनाव में कुल 96.8 करोड़ मतदाता हिस्सा ले सकते हैं. इन में 49.7 करोड़ पुरुष और 47.1 करोड़ महिला मतदाताओं के होने का अनुमान है.

खासकर, ग्रामीण क्षेत्रों में तो इन की संख्या और भी बढ़ी है. आज किसी भी पार्टी की सियासत को ऊपर या नीचे करने में महिला वोटर बड़ी भूमिका निभा रही हैं. कहा जाता है कि मोदी के सत्ता में रहने का एक बड़ा कारण महिलाएं ही हैं. यही वजह भी है कि केंद्र से ले कर राज्य सरकारों में सरकार चला रही पार्टियां महिलाओं के लिए कई खास योजनाएं व घोषणाएं संचालित कर रही हैं.

यदि इस का श्रेय 2005 में आए ‘मनरेगा’ एक्ट व पैतृक संपत्ति पर बेटी के अधिकार और 2009 में मिले शिक्षा के अधिकार जैसे अधिकारों को दिया जाए जिन्होंने महिला उत्थान में बड़ा योगदान दिया तो गलत न होगा, क्योंकि इन अधिकारों ने निचले से निचले वर्ग को छूने की कोशिश की, जिन में दोयम दर्जे में महिलाएं ही थीं.

एक तरह से महिलाओं के लिए ये नीतियां संजीवनी बूटी बन कर आईं, जिन्होंने उन्हें राजनीतिक रूप से ज्यादा सजग और अपने हकों के लिए लड़ना सिखाया, उन के हाथों में थोड़ीबहुत आर्थिक शक्ति देने की कोशिश की, सही मानों में आत्मनिर्भर बनाने में योगदान दिया.

मगर इस के बावजूद अगर 2024 के चुनावों में महिलाओं के लिए स्पैशल घोषणाएं की जा रही हैं तो जरूर सोचा जा सकता है कि आज भी महिलाएं उस स्तर पर नहीं पहुंच पाई हैं जहां उन्हें होना चाहिए था. आज भी सारी आर्थिक और कानूनी शक्तियां पुरुषों के हाथों में हैं. इस की पुष्टि वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी की गई नई रिपोर्ट ‘वीमेन, बिजनैस एंड द ला’ और उस के आंकड़े भी करते हैं.

इस रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि कार्यस्थल पर महिलाओं और पुरुषों के बीच का अंतर पहले की तुलना में अधिक व्यापक है. वहीं जब हिंसा और बच्चों की देखभाल से जुड़े कानूनी मतभेदों को ध्यान में रखा जाता है, तो महिलाओं को पुरुषों की तुलना में दोतिहाई से भी कम अधिकार प्राप्त हैं. हैरानी यह कि दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है जो इस असमानता से अछूता हो, यहां तक कि दुनिया की समृद्ध अर्थव्यवस्थाएं भी इस अंतर को पाटने में सफल नहीं हो पाई हैं, बाकि भारत में मामला गंभीर है, क्योंकि भारत में लैंगिक असमानता दुनिया के कई देशों के मुकाबले बेहद ख़राब स्थिति में है.

‘वैश्विक लैंगिक अंतर रिपोर्ट 2023’ में भारत का स्थान 146 देशों में शर्मनाक 127वें नंबर पर है. भारत के कामकाजी और शीर्ष पदों पर असमानता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि संसद में महिलाओं की भागीदारी महज 14 फीसदी है. वहीँ देश के कुल 119 अरबपतियों की सूची में मात्र 9 महिला अरबपति हैं.

आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि पुरुषों को महिलाओं के मुकाबले ज्यादा मौके हैं, वरना देश की कामकाजी महिलाओं की भागीदारी मात्र 23 फीसदी और पुरुषों की 72 फीसदी न होती. यानी, देखा जाए तो 50 फीसदी महिलाएं चुनावी घोषणाएं करने वाली पार्टियों के मुखिया से ले कर संसद में चुने पुरुष नेताओं के रहमोकरम पर हैं, यह महिलाओं के लिए गुलामी से कम नहीं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें