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चुनावी नतीजे: हार से ज्यादा तकलीफदेह जीत क्योंकि सरकार धर्म चलाने लगी थी

लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शाम को जब कार्यकर्ताओं को संबोधित करने की परंपरा निभाने के लिए भाजपा कार्यालय पहुंचे तो पूरी तरह जैविक नजर आ रहे थे. स्वाभाविक तौर पर उन का चेहरा उतरा हुआ था और आवाज में भी 4 दिनों पहले सा दम नहीं था क्योंकि जो जीत भाजपा के हिस्से में आई है वह बेहद शर्मनाक है. 400 पार भले ही सियासी जुमला रहा हो लेकिन पार्टी का 240 सीटों पर सिमट जाना उतना ही अप्रत्याशित था जितना यह कि इस कार्यक्रम में भाषण की शुरुआत ही जय जगन्नाथ से करना था.

ओडिशा में मिली कामयाबी के बाबत जगन्नाथ के प्रति आभार और आस्था व्यक्त करने के साथसाथ उन्हें जय श्रीराम न बोलने का खूबसूरत बहाना भी मिल गया. यह बात किसी सबूत की मुहताज अब नहीं रही कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का भाजपा को कोई फल नहीं मिला, बल्कि उलटा मिला लेकिन इस से कोई सबक उन्होंने सीखा हो, ऐसा लगा नहीं. क्योंकि जय जगन्नाथ बोलने के बाद वे सीधे बड़े मंगल और हनुमान का जिक्र करते नजर आए.

साबित हो गया कि भाजपा का धर्म यानी हिंदुत्व की राजनीति छोड़ने का कोई इरादा नहीं है. हर कोई दिलचस्प तरीके से भाजपा और एनडीए को बौर्डर पर मिले बहुमत की अपने ढंग से व्याख्या और विश्लेषण कर रहा है लेकिन यह सच कहने की हिम्मत कोई नहीं कर रहा कि ज्यादा कुछ नहीं हुआ है. बस धर्म, हिंदुत्व और मंदिरों की राजनीति करते रहने से वोटर ने उसे खारिज कर दिया है. इसी पैटर्न की राजनीति करते भाजपा सत्ता के शिखर तक पहुंची थी और इसी पैटर्न की राजनीति ने उसे फर्श पर भी ला पटका है क्योंकि इस से आमआदमी का कोई भला नहीं हो रहा था, उलटे नुकसान बेशुमार होने लगे थे.

इसे समझने के लिए एक अमेरिकी राजनेता और संविधान विशेषज्ञ व सीनेटर सैम जे एर्विन का यह कथन कल के नतीजों पर बेहद सटीक बैठता है कि, ‘राजनीतिक स्वतंत्रता किसी भी देश में मौजूद नहीं हो सकती जहां धर्म राज्य को नियंत्रित करता है और धार्मिक स्वतंत्रता किसी भी देश में मौजूद नहीं हो सकती जहां राज्य धर्म को नियंत्रित करता है.’ मामला 1966 के एक विवाद का है जब अमेरिकी स्कूलों में प्रार्थना पर एक संवैधानिक संशोधन का विरोध हो रहा था और इस की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही थी.
खासतौर से पिछले 10 सालों से देश में हो यही रहा था कि शासन धर्म चला रहा था. कम हैरत की बात नहीं कि इस से लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता तक छिनने लगी थी जो संविधान ने उसे दी हुई है. यह कैसे हो रहा था, इस पर बहस की लंबीचौड़ी गुंजाइशें मौजूद हैं लेकिन उत्तरप्रदेश जहां भाजपा औंधेमुंह गिरी वहां तो धार्मिक तमाशे, उन्माद और हंगामे इतने होने लगे थे कि मुसलमान तो मुसलमान, दलित और पिछड़े तक इस से आजिज आ गए थे. कुछ शांतिप्रिय सवर्ण भी असहज महसूस करने लगे हों, तो भी बात हैरत की नहीं.

उत्तरप्रदेश में अयोध्या है और मथुरा, काशी भी है (योगी आदित्यनाथ तो हैं ही) जहां से मसजिद हटा कर मंदिर निर्माण के संकल्प लिए जाने लगे थे. भाजपा सहित कट्टर हिंदूवादी संगठन खुलेआम कहने भी लगे थे कि अब मथुरा-काशी की बारी है. संत समाज ने तो अतिउत्साह में हिंदू राष्ट्र का संविधान तक बनाना शुरू कर दिया था. इस हल्ले के खतरे देख, कुछ ही सही, लोगों को ज्ञान प्राप्त होने लगा कि धर्म तो व्यक्तिगत आस्था का विषय है जिस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए.

पूरे चुनावप्रचार में भाजपा का फोकस धर्म पर रहा तो लोगों को यह भी समझ आया कि सरकार का असल काम तो बुनियादी सहूलियतें जुटाना है, इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना है, प्रशासन चलाना और अर्थव्यवस्था सहित न्याय व्यवस्था संचालित करना है. ऐसे सैकड़ों काम हैं जिन के लिए हम सरकार चुनते हैं लेकिन हो यह रहा है कि सरकार मंदिरों से आगे कुछ सोचने और करने को तैयार ही नहीं. सो, जनता ने अपना फैसला सुना दिया.

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की धार्मिक इमेज और धार्मिक फैसलों ने आग में घी डालने का काम किया. हिंदूमुसलिम तो पूरे देश में हो ही रहा है लेकिन खासी दहशत दलितों और पिछड़ों में भी पैदा होने लगी थी जिन्हें यह एहसास है कि यह धर्म उन के लिए नहीं है या इस धर्म में उन के लिए कुछ नहीं रखा है. इस से तो ब्राह्मणों और बनियों की रोजीरोटी चलती है और डबल इंजन वाली सरकार इसे प्रोत्साहन दे रही है तो उन्होंने भाजपा से किनारा कर लेने में ही भलाई समझी.

ऐसा भी नहीं है कि दलितपिछड़े पूजापाठी न हों, उलटे, वे इस मामले में सवर्णों से उन्नीस नहीं. लेकिन अपनी सामाजिक और आर्थिक कमजोरियों का एहसास उन्हें है जिसे धर्म के जरिए दूर करने की कोशिश वे करते रहते हैं. वजह, उन्हें भी यह पट्टी पढ़ा दी गई है कि अपनी दुश्वारियों से नजात पाना है तो पूजापाठ करो, दानदक्षिणा दो और अपनी परेशानियों की बाबत सरकार से सवालजबाब मत करो सीधे ऊपर वाले से शिकवेशिकायत करो. इस जन्म की छोड़ो, धर्मकर्म कर अपना परलोक और अगला जन्म सुधारो.

ऐसा हो भी रहा था लेकिन इन तबकों की आस्था अभी इतनी गहरी नहीं हुई है कि वे अपनी बदहाली को किस्मत मान लें. इसी दौरान संविधान प्रचार का मुद्दा बना तो ये लोग और घबरा उठे कि कहीं ऐसा न हो कि हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए सरकार मनुस्मृति पर अमल करने लगे यानी आरक्षण भी खत्म कर दे. और ऊंची जाति वालों को उन पर पौराणिक युग या संविधान बनने के पहले होने वाले अत्याचार ढाने का लाइसैंस देदे. भगवान तो कुछ कर नहीं रहा और अब सरकारें भी धर्मकर्म में डूबी जा रही हैं तो घबराए दलितपिछड़े ‘इंडिया’ गठबंधन की तरफ मुड़े जो उन्हें सुरक्षा, बराबरी के दर्जे और आरक्षण सलामत रखने का आश्वासन दे रहा था.

यह कह देना कोई अनुसंधान वाली बात नहीं है कि उत्तरप्रदेश में भाजपा की दुर्गति की वजह बसपा के वोटबैंक का ‘इंडिया गठबंधन’ की तरफ ट्रांसफर हो जाना है. असल बात यह है कि मायावती ने मनुवादियों के सामने घुटने टेक रखे हैं जिस से दलित खुद को लाचार महसूसने लगे हैं. वे अगर पिछड़ों खासतौर से यादवों और मुसलमानों की कही जानेवाली सपा की तरफ गए तो,महज इसलिए कि वह आमतौर पर धार्मिक पाखंडों से दूर रहती है और इन पर कहने भर की राजनीति करती है. उस के साथ वह कांग्रेस भी है जिस ने उसे कई तरह के हक संविधान के जरिए दिए थे लेकिन जब कांग्रेस के सवर्णों की सनातनी और पूजापाठी मानसिकता उजागर हो कर गैरत पर भारी पड़ने लगी तो दलितों ने उस से किनारा कर लिया और बसपा संग हो लिए जो घोषित तौर पर दलितों की, दलितों द्वारा, दलितों के लिए चलने वाली पार्टी थी.

इन्हीं सनातनी कांग्रेसियों की वजह से मुसलमान सपा के साथ हो लिया. यह अलगअलग राज्यों में अलगअलग तरह से एक नियमित अंतराल से हुआ. लगभग सभी राज्यों में दलितों और पिछड़ों की पार्टियां बनीं. जिन राज्यों में नहीं बन पाईं वहां पहले कांग्रेस और अब भाजपा इन की मजबूरी हो गई.

मध्यप्रदेश में भाजपा को 29 में से 29 सीटें लगभग 60 फीसदी वोटों के साथ मिलीं तो इसी वजह से कि दलितपिछड़ों की हिमायती और हक की बात करने वाली कोई पार्टी है नहीं. हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी भाजपा को इस का फायदा मिला. इन राज्यों में भी कांग्रेस का कोई विकल्प या क्षेत्रीय दल नहीं हैं. लेकिन उत्तरप्रदेश में है तो उस ने अपना फैसला सुना दिया कि सियासत के असली भगवान हम हैं और हमें परलोक से पहले लोक सुधारना है.

शाम होतेहोते जैसे ही तसवीर साफ हुई, मठमंदिरों में बैठे हिंदुत्व के झंडाबरदार सकते में आ गए और सोशल मीडिया पर उन का विश्लेषण प्रवाहित होने लगा. ऐसी पोस्टें इफरात से इधरउधर होने लगीं जिन का सार यह है कि वे हिंदू गद्दार हैं जिन्होंने भाजपा को वोट न दे कर इंडिया गठबंधन को दिया जो मुसलमानों का है. ये पोस्टें बेहद भड़काऊ और कुछ तो इतनी भद्दी हैं कि उन का यहां जिक्र भी नहीं किया जा सकता. ये गालियां, दरअसल, उन दलितों के नाम थीं जिन्होंने हिंदू राष्ट्र का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया. इन दलितों को पीढ़ियों से एहसास है कि इस हिंदू राष्ट्र में उन की हैसियत मवेशियों सरीखी रही है.

रही बात मुसलमानों की, तो उन्हें हमेशा की तरह कोसा गया. 95 फीसदी मुसलमानों ने इंडिया गठबंधन को वोट दिया तो कोई गुनाह नहीं कर दिया. इस बाबत उन पर दबाव भी तो हिंदुत्व के दुकानदारों ने ही बनाया था. नरेंद्र मोदी आम कट्टरवादी हिंदू की तरह नहीं बोले लेकिन मीटिंगों में उन्होंने बारबार राहुल गांधी को शहजादा कह कर संबोधित किया. इस तंज के पीछे उन की मंशा यही जताने की थी कि राहुल हिंदू नहीं हैं बल्कि मुसलमान, पारसी और ईसाई सहित न जाने क्याक्या हैं. इस खेल में इकलौती सुखद बात यही रही कि वोटर ने इस पर ध्यान नहीं दिया.

कट्टर हिंदूवादी मुद्दत तक बौखलाए भी रहेंगे क्योंकि ये नतीजे उन की दुकान, मंशा और मिशन पर पानी फेरते हुए हैं. अधिकतर लोगों ने लोकतंत्र को प्राथमिकता दी है, धर्मतंत्र को नहीं और जिन लोगों ने दी है उन में से भी कई यह राग अलापते नजर आ रहे हैं कि अच्छा हुआ जो भाजपा और मोदी को और बेलगाम होने का मौका नहीं मिला.
लेकिन क्या इस से धर्म और मनुवाद की राजनीति पर लगाम लग गई या लग जाएगी, इस सवाल का जवाब दे पाना किसी के लिए आसान नहीं. हां, एक हद तक यह फैसला अब नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता के हाथों में होगा जिन की पार्टियों को हिंदुत्व के नाम या दम पर वोट नहीं मिले हैं. अपाहिज भाजपा इन 2 बैसाखियों के सहारे चलेगी, तो कहा जा सकता है कि वह कोई रिस्क नहीं उठाएगी.

तो फिर भाजपा अब क्या करेगी, यह देखना दिलचस्पी की बात होगी क्योंकि उसे तो मंदिरों और धर्म की राजनीति के अलावा कुछ आता नहीं. उसे एक नए भगवान जगन्नाथ मिल गए हों तो मुमकिन है आदिवासी बाहुल्य राज्य ओडिशा के मंदिर वह चमकाए, जगन्नाथ कौरीडोर बनवाए, कोणार्क के मंदिर का भी कायाकल्प कर दे, जिस से उड़िया ब्राह्मणों का भला हो और गरीब आदिवासी मोक्ष के चक्कर में आ कर उत्तरप्रदेश सहित देशभर के दलितों की तरह अभी अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारें और ज्यादा नहीं बल्कि 5-10 वर्षों बाद झींकता नजर आए कि इस से तो नवीन बाबू का राज ही भला था जिस में उन की जिंदगी में कोई खास बेचैनी या अशांति नहीं थी.

अब जो भी हो लेकिन यूपी के 2 लड़कों ने भाजपाई मंसूबों पर ग्रहण तो लगा ही दिया है. यह झटका जोर का ही है और लगा भी जोर से है जिस ने सवर्णों को भी सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि आखिर हमें हिंदू राष्ट्र के नाम पर मिला क्या है सिवा नफरत के जो दिलोदिमाग पर दीमक की तरह काबिज हो गई है. यह तबका भी महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से त्रस्त है लेकिन हिंदुत्व के चलते खामोश था. इस का रुख तय करेगा कि भविष्य की राजनीति का मिजाज कैसा होगा- मंदिरमसजिद वाला या अस्पतालों, सड़कों, बिजली, पानी और स्कूलकालेजों वाला.

लोकतंत्र की बुनियाद मजबूत विपक्ष होना, अब नहीं चलेगी मनमानी

अब की बार 400 पार का नारा दे कर सत्ता पाने का बीजेपी का सपना चूर हो गया. भारत में तानाशाही का सपना पालने वाले लोकसभा चुनाव में अपने दम पर 272 के आंकड़े को भी नहीं छू पाए. पुतिन और नेतन्याहू बनने की चाह थी, तालिबान के शरिया राज की तरह हिंदू राज बनाने की चाह थी, लेकिन अब गठबंधन में शामिल दलों की बैसाखियों के सहारे किसी तरह सरकार बनाने की जुगत करते नज़र आ रहे हैं. जनता ने साफ संदेश दे दिया कि लोकतंत्र में मनमानी और हिंसा नफरत की राजनीति लंबे समय तक नहीं चलेगी.

भारत दुनिया में सब से ज्यादा आबादी वाला देश है और सियासी निगाह से दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र. लोकतंत्र यानी लोगों का तंत्र, लोगों की मर्जी, उन की पसंद, उन के प्रतिनिधि, उन की समस्याएं और उन की चुनी हुई सरकार से उन समस्याओं का निदान. जनता की समस्या भूख, गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई थी, लेकिन मोदी सरकार जनता की समस्याओं को ताक पर रख कर मंदिरमंदिर, मुसलिममुसलिम खेलती रही. मोदी के शासन में भारत का लोकतंत्र निरंकुशता में तब्दील हो गया. बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट दिया गया. यह सब इसलिए संभव हो सका क्योंकि विपक्ष कमजोर था.

विपक्ष या विपक्षी पार्टियां जब मजबूत नहीं होती हैं तो सत्ताधारी पार्टी को मनमानी करने की गुंजाइश मिलती है. इस से लोकतंत्र के बाकी तीनों धड़े – विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया कमजोर पड़ जाते हैं. ऐसे हालात में मीडिया फायदे के लिए या दबाव में एकतरफा हो जाता है और उस में काम करने वाले लोगों को स्वतंत्रता और निष्पक्षता से काम करने में अड़चन आती है. जो कि मोदी सरकार में साफ देखा गया.

सब से मोटी बात तो यह है कि कोई सरकार चाहे दक्षिणपंथी हो, समाजवादी हो या फिर साम्यवादी. गलतियां सभी करती हैं और करेंगी भी. पर उन गलतियों पर किसी की नजर होनी बहुत जरूरी है. मीडिया या न्यायालय यह काम अकेले नहीं कर सकते, इसलिए संसद में सत्ताधारी पार्टी के सामने एक मजबूत विपक्ष आवश्यक होता है. लोकसभा चुनाव-2024 के नतीजों ने साफ कर दिया है कि जनता को केवल बहुमत की सरकार ही नहीं, देश में एक मजबूत विपक्ष भी चाहिए. कांग्रेस के नेतृत्व वाले ‘इंडिया’ गठबंधन को लोकसभा में मिली बड़ी कामयाबी इस बात का प्रमाण है.

चुनाव नतीजों में कांग्रेस ने जैसी वापसी की है, उस में सत्ता से वह भले दूर रह गई हो मगर यह तय हो गया है कि 18वीं लोकसभा में आधिकारिक रूप से नेता विपक्ष होगा. भाजपा-राजग गठबंधन की सरकार तीसरी बार कमान संभालती है तो उसे संसद में अब तक के सबसे ताकतवर विपक्ष से रूबरू होना पड़ेगा.

विपक्ष के मजबूत होने से संसद में आम सहमति के राजनीतिक दौर की वापसी का रास्ता बनेगा क्योंकि भाजपा-राजग सरकार को तीसरी पारी में संसद में अपने नीतिगत फैसलों से ले कर हर अहम विधायी कार्य के लिए विपक्ष के सहयोग की जरूरत पड़ेगी. इस बार के जनादेश की खूबसूरती यही है कि जनता ने सरकार और विपक्ष से देश के व्यापक हित से जुड़े सवालों पर एकदूसरे से संवाद करने और जहां जरूरत हो, सहयोग भी करने की अपेक्षा की है.

इस से पहले अटल बिहारी वाजपेयी की 1998 में बनी भाजपा-राजग की सरकार के समय विपक्ष काफी मजबूत था और यही वजह रही कि 1999 में जब अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था तब वाजपेयी सरकार एक वोट से हार गई थी. 2004 में जब कांग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग की सरकार बनी थी तो भाजपा 137 सीटों के साथ दमदार विपक्ष के रूप में थी मगर तब भी विपक्षी दलों की संयुक्त ताकत इतनी नहीं थी जितनी 2024 में चुनी गई लोकसभा में है.

2009 में भी कमोबेश स्थिति ऐसी ही थी मगर 2014 तथा 2019 में कांग्रेस के कमजोर संख्या बल के कारण पार्टी को विपक्ष का आधिकारिक दर्जा नहीं मिल पाया था. लोकसभा में विपक्ष के कमजोर होने से मोदी सरकार निरंकुश हो गई थी. तमाम राष्ट्रीय जांच एजेंसियों और मीडिया हाउसेस को अपने काबू में कर के विरोधियों के उत्पीड़न और दमन में लगी थी.

देश में पहली बार ऐसा हुआ कि चुनाव से कुछ महीनों पहले विपक्ष के प्रमुख नेता राहुल गांधी संसद से निलंबित कर दिए गए. यहां तक कि मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस और विपक्ष के कई नेताओं के बैंक खाते फ्रीज कर दिए गए. पहली बार ऐसा हुआ कि विपक्ष को दबाने के लिए जांच एजेंसियों का बेजा इस्तेमाल किया गया और दो मौजूदा मुख्यमंत्री चुनाव से ऐन पहले जेल भेज दिए गए. दिल्ली सरकार के तो मुख्यमंत्री सहित पहली पंक्ति के सारे मंत्री ही जेल में ठूंस दिए गए.

19वीं सदी में मशहूर इतिहासकार लौर्ड एक्टन ने एक पादरी को खत में लिखा था, ‘पावर टेंड्स टू करप्ट, एब्सोल्यूट पावर टेंड्स टू करप्ट एब्सोल्यूटली’. हिंदी में इस अर्थ है कि सत्ता-मोह आप को भ्रष्ट बना देता है और सत्ता पूरी तरह आप के हाथ में होना आप को पूरी तरह भ्रष्ट बना देता है. यह कहावत आज भी उतनी ही पुख्ता है, जितनी 19वीं सदी में रही होगी.

मोदी के 10 साल के शासन के दौरान, भारत बहुसंख्यकवाद की ओर बढ़ने लगा था. यह स्थिति न सिर्फ लोकतंत्र को कमजोर कर रही थी बल्कि अल्पसंख्यकों के लिए गंभीर असुरक्षा पैदा हो गई थी. मोदी की विभाजनकारी राजनीतिक बयानबाजी लगातार मुसलमानों को निशाना बना रही थी. हिंदू राष्ट्र बनाने की धुन में सांप्रदायिक हिंसा एक गंभीर मुद्दा बन गई थी. धार्मिक आधार पर सामाजिक ध्रुवीकरण तेज हो गया था. मोदी के शासन में घृणा अपराध और धार्मिक रूप से प्रेरित हिंसा – जिस में लिंचिंग भी शामिल है – में काफी वृद्धि हुई.

मोदी सरकार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट दिया था, खासकर उन लोगों के लिए जो सरकार या उस की नीतियों की आलोचना करते थे. भारत में न्यायपालिका, चुनाव आयोग और कानून प्रवर्तन एजेंसियां जैसी लोकतांत्रिक संस्थाएं राजनीतिक हस्तक्षेप और सत्तारूढ़ दल के दबाव के कारण कमजोर हो गईं और न्याय और समानता के सिद्धांतों को कायम रखने में बुरी तरह विफल होने लगीं.

इन तमाम संवैधानिक सुरक्षा उपायों और संस्थाओं के लड़खड़ाने के साथ, अगर मोदी नीत एनडीए पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर विराजती तो इस में कोई संदेह नहीं था कि भारत के 20 करोड़ मुसलमानों को दूसरे दर्जे की नागरिकता दे दी जाती या उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जाता. वहीं दलितों और ओबीसी के लिए आरक्षण भी समाप्त कर उन को पुनः सवर्ण जातियों का दास बना दिया जाता. इस में कोई शक नहीं कि तानाशाह जब अपनी पर आता तो आने वाले वर्षों में भारत अपने धर्मनिरपेक्ष चरित्र को त्याग कर संवैधानिक रूप से एक हिंदू देश बन जाता.

मगर इस बार के जनादेश ने एनडीए का आंकड़ा 300 तक भी नहीं पहुंचने दिया. जनता ने लोकतंत्र को तानाशाही में तब्दील होने से रोक लिया. जनादेश में एनडीए को जीत भले दिलवाई मगर कई सबक भी सीखा दिए. इंडिया गठबंधन को भले सत्ता नहीं दी मगर इतनी मजबूती दे दी कि अब विपक्ष की आवाज दबने वाली नहीं है. सही मायनों में मजबूत विपक्ष सत्ता के सामने सीना तान कर खड़ा है, यही लोकतंत्र की बुनियाद है.

संजय लीला भंसाली की वेब सीरीज ‘हीरामंडी’ और लाहौर की ‘अय्याशी’ में क्या हैं अंतर

Reel vs Real Heeramandi : संजय लीला भंसाली की फेमस वेब सीरीज ‘हीरामंडी’ को लोगों ने काफी पसंद किया. इस सीरीज को OTT प्लेटफौर्म नेटफ्लिक्स पर 1 मई को रिलीज किया गया. क्या आप जानते हैं, यह सीरीज लाहौर के कोठे (अब पाकिस्तान में है) मुजरा करने वाली की कहानी है. हालांकि इस साीरीज में ‘हीरामंडी’ की कहानी को काफी बढ़ाचढ़ा कर दिखाया गया है, लेकिन हकीकत में हीरामंडी की स्थिति कुछ और ही है. आज हम आपको इस आर्टिकल में लाहौर के ‘अय्याशी का अड्डा’ से रूबरू कराएंगे.

इस तरह दिखता है पाकिस्तान का हीरामंडी

‘हीरामंडी’ पाकिस्तान के लाौहर जिले का रेडलाइट एरिया है. इस मंडी में पहले हीरे जवाहरात बिका करते थे, इसलिए इसे हीरामंडी कहा जाने लगा, लेकिन ‘हीरामंडी’ सीरीज में वेश्याओं के बसेरा को आलीशान महल के रूप में दिखाया गया है. मुजरा करने वाली महिलाओं के रहनसहन का तरीका भी बिलकुल ही अलग दिखाया गया है.

असलियत में हीरामंडी की तवायफ पहनती थीं ये कपड़े

 

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हीरामंडी में मुजरा करने वाली

‘हीरामंडी’ की एक्ट्रेसेस जो तवायफ के किरदार में हैं, इनके परिधान को यूरोपियन टच देकर बनाया गया है. यूं कहें तो इन तवायफों को शाही लुक दिया गया है, जो महलों में रानियां पोशाक पहनती हैं और उनके अलग ठाठबाट होते हैं, लेकिन असलियत में हीरामंडी झुग्गी-झोपड़ी जैसा दिखता है और यहां पर रहने वाली वेश्याएं भी गरीबी के दौर से गुजरी हैं.

‘हीरामंडी’ क्यों रखा गया यह नाम

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‘हीरामंडी’ की गली

हीरामंडी का नाम हीरा सिंह के बेटे ध्यान सिंह डोगरा के नाम पर रखा गया है, जो महाराजा रणजीत सिंह के प्रधानमंत्री थे. ब्रिटिश शासन के दौरान यह जगह शुरू में हीरा दी मंडी नामक अनाज की मंडी थी. हालांकि बाद में यह मुगल काल के दौरान तवायफों का बसेरा बन गया.

उस समय हीरामंडी में अलग-अलग देशों से संगीत, नृत्य, तहजीब और कला से जुड़ी औरतों को यहां लाया जाता था. कुछ समय बाद इस मोहल्ले में विदेशियों द्वारा हमला भी किया गया, जिसके बाद तवायफों का बसेरा उजड़ने लगा.

90 के दशक के बाद से हीरामंडी मोहल्ला बिखरने लगा था. साल 2010 में हीरामंडी मोहल्ले में तरन्नुम सिनेमा के आसपास दो बम धमाके हुए थे. इस ब्लास्ट ने तवायफों का बिजनेस ठप्प कर दिया था.

कहा जाता है कि पाकिस्तान में हीरामंडी आज भी मौजूद है और यह वेश्याओं का अड्डा है. एक रिपोर्ट के अनुसार, हीरामंडी दिन के समय आम बाजार की तरह दिखता है, यहां खानेपीने की चीजें मिलती हैं, इसके अलावा संगीत से जुड़ी इंस्ट्रुमेंट्स भी बिकते हैं. रात के समय में हीरामंडी में वेश्याएं अपना धंधा करती हैं.

संजय लीला भंसाली की वेब सीरीज ‘हीरामंडी’ की कहानी को मौडर्न तरीके से दिखाया गया है. कहा जाता है न कि रील और रियल लाइफ में काफी अंतर होता है, कुछ ऐसा ही हाल है संजय लीला भंसाली की ‘हीरामंडी’ और लाहौर के ‘अय्याशी का अड्डा’  की कहानी. सोनाक्षी सिन्हा, अदिति राव हैदरी, मनीषा कोइराला, शर्मिन सेगल इस सीरीज में मुख्य कलाकार की भूमिका में हैं. इस वेब सीरीज को लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है. हीरामंडी के दूसरे सीजन की भी घोषणा की गई है.

मां की खुशबू : बुआ ने कैसे संभाली रिश्तों की डोर

ट्रिन…ट्रिन…ट्रिन…

प्रिया ने फोन उठाया, उधर सुशीला बूआ थीं.

‘‘हैलो बूआ, इतनी रात में फोन किया, कुछ खास बात है क्या?’’

‘‘खास ही है प्रिया, तुम से तो बताने में भी डर लग रहा है.’’

‘‘बूआ, पहेलियां मत बु झाओ, साफसाफ बताओ क्या हुआ?’’

वह घबरा कर बोली. ‘‘प्रिया, अभीअभी बनारस से उमा जीजी का फोन आया था, कह रही थीं कि बड़े भैया ने ब्याह कर लिया है.’’

‘‘क्या…’’ ‘‘जीजी ने ही किसी तलाकशुदा से रिश्ता करवाया है.’’

सुनते ही प्रिया के हाथ से रिसीवर छूट गया. वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई. उसे शर्म भी आ रही थी. सास, जेठानी और ननदें सभी उस का मजाक बनाएंगी. वह किसी को अपना मुंह कैसे दिखाएगी. प्रपुंज से कैसे कहेगी कि पापा ने शादी कर ली है. वह अपने आंसुओं को रोक नहीं पा रही थी.

अपनी शादी के समय भी बड़ी बूआ पर वह कितनी जोर से नाराज हो उठी थी जब उन्होंने कहा था, ‘अब रघुनाथ के लिए बड़ी मुश्किल आ जाएगी, उस का तो जीना भी दूभर हो जाएगा. उसे दूसरी शादी कर लेनी चाहिए.’

उसे याद आने लगा जब वह आगरा जाती थी तो कितने हक से मां के सारे सामान को सहेजती थी. पापा कहते भी थे, ‘अब इन्हें सहेजने का क्या फायदा? कौन सा जानकी अब दोबारा लौट कर आने वाली है? बिटिया, तुम्हें जो भी चाहिए वह तुम ले जाओ.’

‘नहीं पापा, प्रपुंज मेरा खयाल रखते हैं. मु झे ससुराल में बहुत आराम है. किसी चीज की कोई कमी नहीं है,’ वह कहती फिर भी आते समय पापा रुपयों की गड्डी उस की मुट्ठी में बंद कर देते थे. उस की शादी में भी पापा ने दिल खोल कर खर्च किया था. सिर से पैर तक जेवर दिए थे. उसे सबकुछ दिलवाया था.

अपनी शादी में प्रिया रोतेरोते विदा के समय बेहोश हो गई थी. ससुराल वाले भी परेशान हो गए थे कि कैसी लड़की उन के घर आ रही है? वह ससुराल जरूर आ गई थी परंतु मन उस का वहीं रहता था. वह सोचती थी कि उस के 2 नेत्रहीन विकलांग जवान भाई पापा के लिए बहुत बड़ी जिम्मेदारी हैं. अभी तक तो उस के कारण पापा, घर और भाइयों की तरफ से बिलकुल निश्ंिचत थे. अब तो घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारी उन्हीं की होगी.

आमतौर पर दिन में 2-3 बार पापा से बात करे बिना वह नहीं रह पाती थी. पापा ने तो हवा भी नहीं लगने दी. कल ही तो बात हुई थी, यह तो बताया था कि उमा बूआ के यहां जरूरी काम से जा रहे हैं पर इतनी बड़ी बात छिपा गए. यह सोच कर वह खीज उठी और उस के आंसू निकल आए. रोतेरोते उसे अपनी मां की बातें याद आने लगीं.

छुटपन में प्यार से कहानी सुनाती हुई वे एकएक कौर उसे मुंह में खिलाती थीं. कितने प्यार भरे अच्छे दिन थे वे.

प्रपुंज के आने की आहट से वह चौंक गई. उस की ओर देखते हुए वे बोले, ‘‘क्या हुआ? बड़ी उदास लग रही हो, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?’’ प्रिया अपने को रोक न सकी. वह प्रपुंज से लिपट कर फफक पड़ी. प्रपुंज उसे चुप कराने का प्रयास कर रहे थे परंतु प्रिया की सिसकी रुक ही नहीं रही थी. काफी देर के बाद वह बोली, ‘‘प्रपुंज, पापा ने शादी कर ली है.’’

प्रपुंज आश्चर्य से बोले, ‘‘क्या? पापा को इस बुढ़ापे में क्या सू झी… प्रिया? पापा ने दूल्हा बनते समय बालों में डाई लगा ली होगी न, सफेद बालों में पापा दूल्हा बन कर कैसे लग रहे होंगे.’’

प्रिया फिर से सिसकने लगी. ‘‘छोड़ो यार, आओ हम दोनों भी पापा की शादी की खुशी मनाएं,’’ प्रपुंज ने माहौल थोड़ा हलका करने का प्रयास किया.

क्रोधित हो कर प्रिया पैर पटकती हुई कमरे से बाहर चली गई. काफी वादविवाद के बाद दोनों में तय हुआ कि वे पापा से सारे संबंध तोड़ लेंगे.

रात को सोते समय भी प्रिया सोचने लगी. महीने भर पहले ही तो वह चचेरी बहन रोली की शादी में गई थी, तो तभी बड़ी बूआ कह रही थीं, ‘भैया की जिंदगी में तो मुसीबत ही मुसीबत है. घरवाली के बिना घर सूना है. कोई थाली परोसने वाला तो चाहिए ही.’

सुनते ही प्रिया नाराज हो उठी थी, ‘आप कहना क्या चाह रही हैं? पापा क्या इस उम्र में शादी करेंगे?’

बूआ बोलीं, ‘तो क्या हुआ? आगे की जिंदगी आसान हो जाएगी, लड़कों को भी तो कोई देखभाल करने वाला चाहिए.’

उन का इशारा उस के नेत्रहीन विकलांग जवान भाइयों की ओर था. वह क्रोध से तिलमिलाती हुई पापा के पास पहुंची थी. सारी बात जान कर पापा ने उसे अपने पास बिठाया, प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा, परंतु उस की बात का कोई उत्तर नहीं दिया. उन की चुप्पी उसे चुभ गई थी. वह पापा से नाराज हो गई थी. प्रपुंज ने उस से रास्ते में कई बार पूछा भी कि वह क्यों नाराज है? लेकिन वह क्या बताती? वह गुमसुम हो गई थी. फिर भी उसे विश्वास था कि पापा ऐसा नहीं कर सकते. लेकिन प्रश्न तो यह है कि अब यह बात वह सब को कैसे बताएगी, इसी उधेड़बुन में सुबह हो गई.

प्रिया संयुक्त परिवार में रहती थी. सास से उसे मां का प्यार मिला था. जेठानी रीता भाभी से भी उस की पटती थी. हां, बच्चों के कारण कभी- कभी आपस में खींचतान हो जाती थी. पापा जो सामान उसे देते थे उस को देख कर भाभी को ईर्ष्या अवश्य होती थी परंतु वे उस को चेहरे या व्यवहार पर नहीं आने देती, यह बात प्रिया जानती थी. रीता भाभी का मायका संपन्न नहीं था, जबकि प्रिया अपने पापा के पैसे पर थोड़ा घमंड भी करती थी. सब से ज्यादा चिंता उसे यह थी कि अब रीता भाभी उस के पापा का मजाक उड़ाएंगी.

वह उठी, नहाधो कर किचन में गई. वहां उस की सास शकुंतलाजी प्रिया के उतरे हुए चेहरे को देखते ही सम झ गईं, कहीं कुछ गड़बड़ है. उन्होंने पूछा, ‘‘क्या बात है, बहू? क्या तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है? तुम कमरे में जा कर आराम करो, मैं चाय बना कर तुम्हारे कमरे में भेज देती हूं.’’

‘‘नहीं, मां, मैं एकदम ठीक हूं,’’ उस ने कहा. जेठानी रीता भाभी ने भी कई बार जानने का प्रयास किया पर वह कुछ न बोली.

पलपल में ठहाके लगाने वाली प्रिया का रोना सा चेहरा घर में सभी को परेशान कर रहा था.

शकुंतलाजी ने प्रपुंज से भी पूछा, ‘‘प्रिया क्यों परेशान है? क्या तुम से  झगड़ा हुआ है?’’

‘‘नहीं, मां,’’ प्रपुंज ने सकुचाते हुए बताया, ‘‘मां, आप किसी से मत कहना, उस के पापा ने दूसरी शादी कर ली है इसलिए प्रिया का मूड बहुत खराब है. वह अपने पापा से बहुत नाराज है.

‘‘मां, देखिए जरा, 60 साल की उम्र में सारे बाल सफेद हो चुके हैं, अब उन्हें शादी करने की सू झी?’’ प्रपुंज बोला.

शकुंतलाजी सुल झी हुई सम झदार प्रौढ़ा थीं. वे सोचने लगीं तो उन्हें रघुनाथजी का निर्णय सही लगा, साथ ही प्रिया का क्रोध एवं अवसाद स्वाभाविक लगा. प्रपुंज के जाने के बाद उन्होंने स्वयं अपने हाथों से चाय बनाई. प्लेट में गरमागरम आलू के परांठे रखे. यह प्रिया का पसंदीदा नाश्ता था. वे स्वयं नाश्ता ले कर प्रिया के कमरे में पहुंचीं. प्रिया उदास लेटी थी. उन्हें देखते ही हड़बड़ा कर उठ बैठी.

उस की सूजी हुई लाल आंखें उस के मन का हाल बता रही थीं. शकुंतलाजी बोलीं, ‘‘लो, पहले नाश्ता करो. फिर बात करेंगे.’’ प्रिया उन के आग्रह को ठुकरा न सकी. उस ने चुपचाप सिर  झुका कर नाश्ता कर लिया. वह जब से ससुराल आई थी, सास से उस को मां का प्यार मिला था. निश्छल प्रिया अपने दिल की हर बात शकुंतलाजी से कह देती थी. जब वह नाश्ता कर चुकी तो उन्होंने उस से पूछा, ‘‘क्या बात है?’’

प्रिया अपने को संभाल न पाई. वह फूटफूट कर रोने लगी. सिसकती हुई वह बोली, ‘‘मां, पापा ने शादी कर ली है.’’ शकुंतलाजी ने उसे गले से लगा लिया और प्यार से उस का सिर सहलाया. फिर बोलीं, ‘‘बेटी, धीरज रखो, यदि पापा ने शादी कर ली है तो तुम दुखी क्यों हो? तुम्हें तो खुश होना चाहिए. अपने पापा की स्थिति को सम झने की कोशिश करो.

‘‘तुम्हारे पापा की ढलती उम्र है. उन के ऊपर तुम्हारे 2 नेत्रहीन विकलांग जवान भाइयों की जिम्मेदारी है, जो स्वयं कुछ भी करने लायक नहीं हैं. तुम स्वयं सोचो उन को वे किस तरह संभालेंगे. तुम ने मु झे कई बार बताया है कि आया सामान चुरा कर ले जाती है, अकसर छुट्टी भी कर लेती है इसलिए पापा को ब्रैड खा कर गुजारा करना पड़ता है. कभीकभी तो भूखे भी सो जाते हैं, कभी कच्चापक्का पका कर भाइयों को खिला देते हैं, कभी दूध पी कर ही सो जाते हैं. इन सब से छुटकारा पाने का इस से अच्छा उपाय हो ही नहीं सकता.

‘‘तुम्हारा क्रोध उचित है, यदि मैं तुम्हारी जगह होती तो शायद मेरी भी यही प्रतिक्रिया होती. परंतु बेटी, बचपना छोड़ो. अपने मन पर नियंत्रण रखो. क्रोध एवं पश्चात्ताप की कोई आवश्यकता ही नहीं है. तुम्हारे पिता ने तुम्हारे प्रति सारे कर्तव्य पूरे किए हैं. उन्हें अपनी तरह से जीने दो. शांत मन से विचार करो,’’ वे उसे तरहतरह से सम झाती रहीं.

प्रिया के मन की क्रोध रूपी धूल थोड़ी साफ होने लगी थी. थकी हुई प्रिया को  झपकी लग गई थी. उस ने स्वप्न में देखा कि मम्मी उस के सिर पर प्यार से हाथ फेर रही हैं, उस के आंसू पोंछ रही हैं.

वह चौंक कर उठ बैठी. अपने मन के बो झ को वह थोड़ा हलका महसूस कर रही थी. वह नीचे जा कर गृहस्थी के कामों में लग गई. पर अब वह उदास और गंभीर रहने लगी थी. बातबात में खिलखिलाने वाली प्रिया घरवालों से खिंचीखिंची रहती थी. बच्चों से भी ज्यादा बात नहीं करती थी. रीता भाभी ने उसे बड़े प्यार से सम झाया, ‘‘प्रिया, तुम्हारी बूआ ने तो तुम्हारा बो झ हलका किया है. अब तुम्हें हर समय परेशान रहने की जरूरत नहीं है. तुम्हारे पापा और भाइयों की देखभाल करने वाला वहां कोई है. इस के लिए तुम्हें स्वयं पहल एवं प्रयास करना चाहिए था. खैर, अब अपने पापा से सामान्य रूप से बात करो. अपनी नई मां से मिलने जाओ. जो हो रहा है या हो चुका है उसे स्वीकार करो, इस के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है.’’

रीता भाभी की बातें उसे अच्छी तो लगीं परंतु वह पापा से बात करने का मन न बना सकी. एक हफ्ते के बाद सुशीला बूआ उस से मिलने आईं. वह उन को देखते ही लिपट कर गले मिली. उस की आंखें भर आई थीं.

सुशीला बूआ से उस की बचपन से पटती थी. मां के देहांत के बाद उन्होंने ही उसे संभाला था. 2-3 महीने अपना घरद्वार छोड़ कर उस के साथ रही थीं. उस को प्यार से सम झाती रहती थीं. उन की गोद में सिर रख कर वह घंटों आंसू बहाती रहती थी. बूआ ने ही उस की हिम्मत बंधाई थी, उसे जीना सिखाया था. सब से अधिक तो बूआ की इसलिए भी एहसानमंद है क्योंकि उन्होंने ही उस का रिश्ता प्रपुंज से करवाया था. उन से वह घंटों फोन पर बात करती थी, दिल की सारी बातें कह देती थी. घर भी पास में ही था इसलिए जबतब वह उन के घर भी जाती रहती थी.

‘‘अरे, पगली, क्या हुआ? तुम्हें तो खुश होना चाहिए. कल बड़े भैया का फोन आया था, कह रहे थे कि प्रिया से कैसे बात करूं, वह मु झ से बहुत नाराज है. बचपन से ही वह जिद्दी है.’’

‘‘और क्या कह रहे थे पापा?’’

‘‘बस, तुम सब के बारे में पूछ रहे थे, मु झ से बोले कि तुम प्रिया से मिल आओ. सब के हालचाल ले आओ. प्रिया को सम झाने की कोशिश करो, वह अपना गुस्सा छोड़ दे,’’ बूआ ने बताया.

कुछ देर बैठ कर बूआ अपने घर लौट गईं. धीरेधीरे प्रिया ने अपने मन को सम झा लिया. पापा की शादी की बात मन से निकाल अपनी गृहस्थी में रम गई थी.

लगभग 3 महीने हो चुके थे. न तो पापा का फोन उस के पास आया था न उस ने खुद किया था. वह उन्हें याद तो हर पल करती थी परंतु उस की जिद बापबेटी के बीच में बाधा बनी हुई थी.

एक दिन अचानक बड़ी बूआ उस के घर उस से मिलने आईं. मन ही मन वह बूआ से नाराज थी. उन्हें देख कर सोचा, सारा कियाधरा तो इन्हीं का है, अब आई हैं प्यार जताने को. बूआ उस के लिए बहुत सारा सामान लाई थीं.

प्रिया ने देखा, गोलू के लिए सुंदर सी ड्रैस थी. प्रपुंज के लिए भी शर्ट थी. उस के लिए साड़ी थी. एक पेटी आम की थी. घर के बने मेवे के लड्डू और मठरी. वह हैरानी से सब सामान देख रही थी. उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह सब बूआ लाई हैं.

आज बूआ इतना लाड़ क्यों दिखा रही हैं? वह बूआ से पूछना चाह रही थी. अचानक ही उस की निगाह उस थैले पर पड़ गई जिस में से बूआ ने लड्डूमठरी का डब्बा निकाला था. क्षण भर में ही वह सब सम झ गई. यह थैला वही है जिसे ले कर पापा हमेशा बाजार जाते थे. इस थैले में तो पापा की महक बसी थी, भला वह कैसे भूल सकती थी. उस के मुंह से अनायास निकल पड़ा, ‘‘बूआ, क्या पापा आए हैं?’’

‘‘हां, बिटिया, तुम्हारे सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. ये सब चीजें तो तुम्हारी नई मां ने ही तुम्हारे लिए भेजी हैं. तुम्हारे पापा तो तुम से मिलने के लिए तड़प रहे हैं.’’

मांपापा बाहर गाड़ी में ही थे. वह दौड़ कर नीचे गई. उसे देख पापा बोले, ‘‘बेटी, मु झे माफ कर दो, मैं ने तुम्हारी मां की जगह किसी और को दे दी है.’’

यह सुन प्रिया का क्रोध आंसुओं की धारा बन कर बहने लगा. वह भरे हुए गले से बोली, ‘‘नई मां कहां हैं? इस लड्डूमठरी से तो मेरी मां की खुशबू आ रही है.’’

सबकुछ भूल कर वह मां के गले से लिपट गई.

मोड़ ऐसा भी : जब बहन ने ही छीन लिया शुभा का प्यार

ऐसा उन के चेहरे से साफ झलक रहा था. फिर कुछ अनचाहा घटा है, मैं ने अनुमान लगा लिया. लड़के वालों की ओर से हर बार निराशा ही उन के हाथ लगी है. मैं ने जानबूझ कर मां की उदासी का कारण न पूछा क्योंकि दुखती रग पर हाथ धरते ही वे अपना धैर्य खो बैठतीं और बाबूजी को याद कर के घंटों रोती रहतीं.

मां ने मेरी ओर बिना देखे ही चाय का प्याला आगे बढ़ा दिया, जिसे थामे मैं बरामदे में कुरसी पर आ बैठी. मां अपने कमरे में चली गई थीं. विषाद से मन भर उठा. पिछले 4 साल से मां मेरे लिए वर की खोज में लगी थीं, लेकिन अभी तक एक अदद लड़का नहीं जुटा पाई थीं कि बेटी के हाथ पीले कर संतोष की सांस लेतीं.

मां अंतर्जातीय विवाह के पक्ष में नहीं थीं. अपने ब्राह्मणत्व का दर्प उन्हें किसी मोड़ पर संधि की स्थिति में ही नहीं आने देता था. मेरी अच्छीखासी नौकरी और ठीकठाक रूपरंग होते हुए भी विवाह में विलंब होता जा रहा था. जो परिवार मां को अच्छा लगता वह हमें अपनाने से इनकार कर देता और जिन को हम पसंद आते, उन्हें मां अपनी बेटी देने से इनकार कर देतीं.

शहर बंद होने के कारण मैं सड़क पर खड़ीखड़ी बेजार हो चुकी थी. कोई रिकशा, बस, आटोरिकशा आदि नहीं चल रहा था. घर से मां ने वनिता की मोपेड भी नहीं लाने दी, हालांकि वनिता का कालेज बंद था. मुझे दफ्तर पहुंचना था, कई आवश्यक काम करने थे. न जाती तो व्यर्थ ही अफसर की कोपभाजन बनती. इधरउधर देखा, कोई जानपहचान का न दिखा. घड़ी पर निगाह गई तो पूरा 1 घंटा हो गया था खड़ेखड़े. मैं सामने ही देखे जा रही थी. अचानक स्कूटर पर एक नौजवान आता दिखा. वह पास आता गया तो पहचान के चिह्न उभर आए. ‘यह तो शायद उदयन…हां, वही था. मेरे साथ कालेज में पढ़ता था, वह भी मुझे पहचान गया. स्कूटर रेंगता हुआ मेरे पास रुक गया.

‘‘उदयन,’’ मैं ने धीरे से पुकारा.

‘‘शुभा…तुम यहां अकेली खड़ी क्या कर रही हो?’’

‘‘बस स्टाप पर क्या करते हैं? दफ्तर जाने के लिए खड़ी थी, लेकिन लगता नहीं कि आज जा पाऊंगी?’’

‘‘आज कितने अरसे बाद दिखी हो तुम, शहर बंद न होता तो शायद आज भी नहीं…’’ कह कर वह हंसने लगा.

‘‘और तुम…बिलकुल सही समय पर आए हो,’’ कह कर मैं उस के पीछे बैठने का संकेत पाते ही स्कूटर पर बैठ गई. रास्ते भर उदयन और मैं कालेज से निकलने के बाद का ब्योरा एकदूसरे को देते रहे. वह बीकौम कर के अपना व्यवसाय कर रहा था और मैं एमकौम कर के नौकरी करने लगी थी. मेरा दफ्तर आ चुका था. वह मुझे उतार कर अपने रास्ते चला गया.

गोराचिट्टा, लंबी कदकाठी के सम्मोहक व्यक्तित्व का स्वामी उदयन कितने बरसों बाद मिला था. कालेज के समय कैसा दुबलापतला सरकंडे सा था. मैं उसे भूल कर दफ्तर के काम में उलझ गई. होश में तब आई जब छुट्टी का समय हुआ. ‘अब जाऊंगी कैसे घर लौट कर?’ सोचती हुई बाहर निकल ही रही थी कि सामने गुलमोहर के पेड़ तले स्कूटर लिए उदयन खड़ा दिखाई दिया. उस ने वहीं से आवाज दी, ‘‘शुभा…’’

‘‘तुम?’’ मैं आश्चर्य में पड़ी उस तक पहुंच गई.

‘‘तुम्हें काम था कोई यहां?’’

‘‘नहीं, तुम्हें लेने आया हूं. सोचा, छोड़ तो आया लेकिन घर जाओगी कैसे?’’

मैं आभार से भर उठी थी. उस दिन के बाद तो रोज ही आनाजाना साथ होने लगा. हम साथसाथ घूमते हुए दुनिया भर की बातें करते. एक दिन उदयन घर आया तो मां को  उस का विनम्र व्यवहार और सौम्य  व्यक्तित्व प्रभावित कर गए. छोटी बहन वनिता बड़े शरमीले स्वभाव की थी, वह तो उस के सामने आती ही न थी. वह आता और मुझ से बात कर के चला जाता. मैं वनिता को चाय बना कर लाने के लिए कहती, लेकिन वह न आती.

एक बात मैं कितने ही दिनों से महसूस कर रही थी. मुझे बारबार लगता कि जैसे उदयन कुछ कहना चाहता है, लेकिन कहतेकहते जाने क्या सोच कर रुक जाता है. किसी अनकही बात को ले कर बेचैन सा वह महीनों से मेरे साथ चल रहा था.

एक दिन उदयन मुझे स्कूटर से उतार कर चलने लगा तो मैं ने ही उसे घर में बुला लिया, ‘‘अंदर आओ, एक प्याला चाय पी कर जाना.’’ वह मासूम बालक सा मेरे पीछेपीछे चला आया. मां घर में नहीं थीं और वनिता भी कालेज से नहीं आई थी. सो चाय मैं ने बनाई. चाय के दौरान, ‘शुभा एक बात कहूं’ कहतेकहते ही उसे जोर से खांसी आ गई. गले में शायद कुछ फंस गया था. वह बुरी तरह खांसने लगा. मैं दौड़ कर गिलास में पानी ले आई और गिलास उस के होंठों से लगा कर उस की पीठ सहलाने लगी. खांसी का दौर समाप्त हुआ तो वह मुसकराने की कोशिश करने लगा. आंखों में खांसी के कारण आंसू भर आए थे.

‘‘उदयन, क्या कहने जा रहे थे तुम? अरे भई, ऐसी कौन सी बात थी जिस के कारण खांसी आने लगी?’’

सुन कर वह हंसने लगा, ‘‘शुभा…मैं तुम्हारे बिना नहीं रह…’’ अधूरा वाक्य छोड़ कर नीचे देखने लगा और मैं शरमा कर गंभीर हो उठी और लाज की लाली मेरे मुख पर दौड़ गई.

‘‘उदयन, यही बात कहने के लिए तो मैं न जाने कब से सोच रही थी,’’ धीरे से कह कर मैं ने उस के प्रेम निवेदन का उत्तर दे दिया था. दोनों अपनीअपनी जगह चुप बैठे रहे थे. लग रहा था, इन वाक्यों को कहने के लिए ही हम इतने दिनों से न जाने कितनी बातें बस ऐसे ही करे जा रहे थे. एकदूसरे से दृष्टि मिला पाना कैसा दूभर लग रहा था.

शाम खुशनुमा हो उठी थी और अनुपम सुनहरी आभा बिखेरती जीवन के हर पल पर उतर रही थी. मौसम का हर दिन रंगीन हो उठा था. मैं और उदयन पखेरुओं के से पंख लगाए प्रीति के गगन पर उड़ चले थे. हम लोग एक जाति के नहीं थे, लेकिन आपस में विवाह करने की प्रतिज्ञा कर चुके थे.

झरझर बरसता सावन का महीना था. चारों ओर हरियाली नजर आ रही थी. पत्तों पर टपकती जल की बूंदें कैसी शरारती लगने लगती थीं. अकेले में गुनगुनाने को जी करता था. उदयन का साथ पा कर सारी सृष्टि इंद्रधनुषी हो उठती थी.

‘‘सोनपुर चलोगी…शुभा?’’ एक दिन उदयन ने पूछा था.

‘‘मेला दिखाने ले चलोगे?’’

‘‘हां.’’

मां हमारे साथ जा नहीं सकती थीं और अकेले उदयन के साथ मेरा जाना उन्हें मंजूर नहीं था. अत: मैं ने वनिता से अपने साथ चलने को कहा तो उस ने साफ इनकार कर दिया.

‘‘पगली, घर से कालेज और कालेज से घर…यही है न तेरी दिनचर्या. बाहर निकलेगी तो मन बहल जाएगा,’’ मैं ने उसे समझा कर तैयार कर लिया था. हम तीनों साथ ही गए थे. मैं बीच में बैठी थी, उदयन और वनिता मेरे इधरउधर बैठे थे, बस की सीट पर. इस यात्रा के बीच वनिता थोड़ाबहुत खुलने लगी थी. उदयन के साथ मेले की भीड़भाड़ में हम एकदूसरे का हाथ थामे घूमते रहे थे.

उदयन लगभग रोज ही हमारे घर आता था, लेकिन अब हमारी बातों के बीच वनिता भी होती. मैं सोचती थी कि उदयन बुरा मानेगा कि हर समय छोटी बहन को साथ रखती है. इसलिए मैं ने एक दिन वनिता को किसी काम के बहाने दीपा के घर भेज दिया था, लेकिन थोड़ी देर वनिता न दिखी तो उदयन ने पूछ ही लिया, ‘‘वनिता कहां है?’’

‘‘काम से गई है, दीपा के घर,’’ मैं ने अनजान बनते हुए कह दिया. उस दिन तो वह चला गया, लेकिन अब जब भी आता, वनिता से बातें करने को आतुर रहता. यदि वह सामने न आती तो उस के कमरे में पहुंच जाता. मैं ने उदयन से शीघ्र शादी करने को कहा था, लेकिन वह कहां माना था, ‘‘अभी क्या जल्दी है शुभा, मेरा काम ठीक से जम जाने दो…’’

‘‘कब करेंगे हम लोग शादी, उदयन?’’

‘‘बस, साल डेढ़साल का समय मुझे दे दो, शुभा.’’

मैं क्या कहती, चुप हो गई…मेरी भी तरक्की होने वाली थी. उस में तबादला भी हो सकता था. सोचा, शायद दोनों के ही हित में है. अब जब भी उदयन आता, वनिता उस से खूब खुल कर बातें करती. वह मजाक करता तो वह हंस कर उस का उत्तर देती थी. धीरेधीरे दोनों भोंडे मजाकों पर उतर आए. मुझ से सुना नहीं जाता था. आखिर कहना ही पड़ा मुझे, ‘‘उदयन, अपनी सीमा मत लांघो, उस लड़की से ऐसी बातें…’’

मेरी इस बात का असर तो हुआ था उदयन पर, लेकिन साली के रिश्ते की आड़ में उस ने अपने अनर्गल बोलों को छिपा दिया था. अब वह संयत हो कर बोलता था, फिर भी कहीं न कहीं से उस का अनुचित आशय झलक ही जाता. वनिता को मेरा यह मर्यादित व्यवहार करने का सुझाव अच्छा न लगा. मैं दिन पर दिन यही महसूस कर रही थी कि वनिता उदयन की ओर अदृश्य डोर से बंधी खिंची चली जा रही है. उदयन से कहा तो वह यही बोला था, ‘‘शुभा, यह तुम्हारा व्यर्थ का भ्रम है. ऐसा कुछ नहीं है जिस पर तुम्हें आपत्ति हो.’’

छुट्टी का दिन था, मां घर पर नहीं थीं. वनिता, दीपा के घर गई थी. अकेली ऊब चुकी थी मैं, सोचा कि घर की सफाई करनी चाहिए. हफ्ते भर तो व्यस्तता रहती है. मां की अलमारी साफ कर दी, फिर अपनी और फिर वनिता की. किताबें हटाईं ही थीं कि किसी पुस्तक से उदयन का फोटो मेरे पांव के पास आ गिरा. फोटो को देखते ही मेरा मन कैसी कंटीली झाड़ी में उलझ गया था कि निकालने के सब प्रयत्न व्यर्थ हो गए. लाख कोशिशों के बावजूद क्या मैं अपने मन को समझा पाई थी, पर मेरी आशंका गलत कहां थी? वनिता शाम को लौटी तो मैं ने उसे समझाने की चेष्टा की थी, ‘‘देख वनिता, क्यों उदयन के चक्कर में पड़ी है? वह शादी का वादा तो किसी और से कर चुका है.’’

जिस बहन के मुख से कभी बोल भी नहीं फूटते थे, आज वह यों दावानल उगलने लगेगी, ऐसा तो मैं ने सोचा भी नहीं था. वनिता गुस्से से फट पड़ी, ‘‘क्यों मेरे पीछे पड़ी हो दीदी, हर समय तुम इसी ताकझांक में लगी रहती हो कि मैं उदयन से बात तो नहीं कर रही हूं.’’

‘‘मैं क्यों ताकझांक करूंगी, मैं तो तुझे समझा रही हूं,’’ मैं ने धीरे से कहा.

‘‘क्या समझाना चाहती हो मुझे, बोलो?’’

क्या कहती मैं? चुप ही रही. सोचने लगी कि आज वनिता को क्या हो गया है. इस का मुख तो ‘दीदी, दीदी’ कहते थकता नहीं था, आज यह ऐसे सीधी पड़ गई.

‘‘देख वनिता, तुझे क्या मिल जाएगा उदयन को मुझ से छीन कर,’’ मैं ने सीधा प्रश्न किया था.

‘‘किस से? किस से छीन कर?’’ वह वितृष्णा से भर उठी थी, ‘‘मैं ने किसी से नहीं छीना उसे, वह मुझे मिला है. फिर तुम उदयन को क्यों नहीं रोकतीं? मैं बुलाती हूं क्या उसे?’’ उस ने तड़ाक से ये वाक्य मेरे मुख पर दे मारे. अंधे कुएं में धंसी जा रही थी मैं. मां बुलाती रहीं खाने के लिए, लेकिन मैं सुनना कहां चाहती थी कुछ… ‘‘मां, सिर में दर्द है,’’ कह कर किसी तरह उन से निजात पा गई थी, लेकिन वह मेरे बहानों को कहां अंगीकार कर पाई थीं.

‘‘शुभा, क्या हुआ बेटी, कई दिन से तू उदास है.’’

मेरी रुलाई फूट पड़ी थी. रोती रही मैं और वे मेरा सिर दबाती रहीं. क्या कहती मां से? कैसे कहती कि मेरी छोटी बहन ने मेरे प्यार पर डाका डाला है…और क्या न्याय कर पातीं वे इस का. उन के लिए तो दोनों बेटियां बराबर थीं.

वनिता ने मेरे साथ बोलचाल बंद कर दी थी. उदयन ने भी घर आना छोड़ दिया था. हम दोनों बहनों की रस्साकशी से तंग आ कर वह किनारे हो गया था. मेरी रातों की नींद उड़ गई थी. अजीब हाल था मेरा. रुग्ण सी काया और संतप्त मन लिए बस जी रही थी मैं. दफ्तर में मन नहीं लगता था और घर में वनिता का गरूर भरा चेहरा देख कर कितने अनदेखे दंश खाए थे अपने मन पर, हिसाब नहीं था मेरे पास. तनाव भरे माहौल को मां टटोलने की कोशिश करती रहतीं, लेकिन उन्हें कौन बताता.

‘‘वनिता, तू ने मुझ से बोलना क्यों बंद कर रखा है?’’ एक दिन मैं हारी हुई आवाज में बोली थी. सोचा, शायद सुलह का कोई झरोखा मन के आरपार देखने को मिल जाए, समझानेबुझाने से वनिता रास्ते पर आ जाए क्योंकि मुझे लगता था कि मैं उदयन के बिना जी नहीं पाऊंगी.

‘‘क्या करोगी मुझ से बोल कर, मैं तो उदयन को छीन ले गई न तुम से.’’

‘‘क्या झूठ कह रही हूं?’’

‘‘बिलकुल सच कहती हो, लेकिन मेरा दोष कितना है इस में, यह तुम भी जानती हो,’’ उस का सपाट सा उत्तर मिल गया मुझे.

‘‘तो तू नहीं छोड़ेगी उसे?’’ मैं ने आखिरी प्रश्न किया था.

‘‘मुझे नहीं पता मैं क्या करूंगी?’’ कहती हुई वह घर से बाहर हो गई.

मैं ने इधरउधर देखा था, लेकिन वह कहीं नजर न आई. मुझे डर लगने लगा था. दौड़ कर मैं दीपा के घर पहुंची. वहां जा कर जान में जान आई क्योंकि वनिता वहीं थी.

‘‘तुम दोनों बहनों को क्या हो गया है? पागल हो गई हो उस लड़के के पीछे,’’ दीपा क्रोध में बोल रही थी. वह मुझे समझाती रही, ‘‘देखो शुभा, उदयन वनिता को चाहने लगा है और यह भी उसे प्यार करती है. ऐसी स्थिति में तू रोक कैसे सकती है इन्हें? पगली, तू कहां तक रोकबांध लगाएगी इन पर? यदि तू उदयन से विवाह भी कर लेगी तब भी इन का प्यार नहीं मिट पाएगा बल्कि और बढ़ जाएगा. जीवन भर तुझे अवमानना ही झेलनी पड़ेगी. तू क्यों उदयन के लिए परेशान है? वह तेरे प्रति ईमानदार ही होता तो यह विकट स्थिति आती आज?’’

रात भर जैसे कोई मेरे मन के कपाट खोलता रहा कि मृग मरीचिका के पीछे कहां तक दौड़ूंगी और कब तक? उदयन मेरे लिए एक सपना था जो आंख खुलते ही विलीन हो गया, कभी न दिखने के लिए.

एक दिन मां ने कहा, ‘‘बेटी, उदयन डेढ़ साल तक शादी नहीं करना चाहता था, अब तो डेढ़ साल भी बीत गया?’’ उन्होंने अंतर्जातीय विवाह की मान्यता देने के पश्चात चिंतित स्वर में पूछा था.

‘‘मां, अब करेगा शादी…वह वादा- खिलाफी नहीं करेगा.’’

शादी की तैयारियां होने लगी थीं. मैं ने दफ्तर से कर्ज ले लिया था. मां भी बैंक से अपनी जमापूंजी निकाल लाई थीं. कार्ड छपने की बारी थी. मां ने कार्ड का विवरण तैयार कर लिया था, ‘शुभा वेड्स उदयन.’

मैं ने मां के हाथ से वह कागज ले लिया. वह निरीह सी पूछने लगीं, ‘‘क्यों, अंगरेजी के बजाय हिंदी में कार्ड छपवाएगी?’’

‘‘नहीं, मां नहीं, आप ने तनिक सी गलती कर दी है…’’ ‘वनिता वेड्स उदयन’ लिख कर वह कागज मैं ने मां को लौटा दिया.

‘‘क्या…? यह क्या?’’ मां हक्की- बक्की रह गई थीं.

‘‘हां मां, यही…यही ठीक है. उदयन और वनिता की शादी होगी. मेरी मंजिल तो अभी बहुत दूर है. घबराते नहीं मां…’’ कह कर मैं ने मां की आंखों से बहते आंसू पोंछ डाले.

सोच का विस्तार : जब रिया ने सुनाई अपनी आपबीती

रियाअपनी दादी के कंधे पर सिर रख कर रो रही थी. रिया की मां ने देखा कि दादी रिया के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे शांत होने को कह रही थीं. पापा बाहर के कमरे में कुरसी पर बैठे दोनों हाथों से सिर पकड़े रो रहे थे कि जान से प्यारी बेटी रिया को विदेश भेज क्या मिला?

वह तो उन्हें छोड़ जाना ही नहीं चाहती थी. मगर पत्नी की सहेली के बेटे से शादी का प्रस्ताव आया तो विदेश में बसे लड़के का मोह रिया की मां रेखा नहीं छोड़ सकीं. सोचा घर बैठे रिश्ता मिल रहा है… आजकल लड़के ढूंढ़ना और फिर उन की डिमांड्स पूरी करना क्या आसान है?

रिया ने तो अपने लिए साथ काम करते स्मार्ट, अच्छे परिवार व अच्छी पोस्ट पर लगे लड़के से विवाह करने की सोची थी. पापा सुरेश की इस में पूरी सहमति भी थी पर दादी बिदक गई थीं यह जान कर कि लड़का ब्राह्मण परिवार से नहीं है.

सुरेशजी ने मां को समझाने का पूरा प्रयास किया कि आज के समय की सोच अलग है पर रूढि़वादी मां को मनाना नामुमकिन था. रिया ने पापा से कहा था कि जल्दी न करें. शायद दादी अपनी सोच बदल लें. मगर ऐसा नहीं हो पाया.

2 साल पहले दादाजी के गुजर जाने के बाद दादी और भी जिद्दी हो गई थीं. अपने कमरे में ही रहतीं. उन्हें स्नान करना, अलग बरतनों में अलग खाना बनाना, मां के अलावा किसी और से कोई काम न करवाना मां के लिए कठिन होता जा रहा था. पर क्या करें. अपने ही बेटे को पराया कर दिया. उन के दरवाजे की चौखट पर खड़े पापा प्रणाम कहते और वे वहीं बैठी हाथ उठा आशीर्वाद दे देतीं.

सहेली ने सूचना दी और बेटे अमन को ले रिया को देखने चली आईं. काफी समय अमेरिका की बातें करती रहीं.

रेखाजी ने पूछा, ‘‘तो तुम घूम आई वहां?’’

‘‘नहीं. अब इन की शादी के बाद जाऊंगी. देखो हमें कोई दहेजवहेज नहीं चाहिए. बस बेटीदामाद के लिए अमेरिका के टिकट करवा दें.’’

रिया को अजीब लगी थीं आंटी, आंटी का बेटा और उन की सोच… पर मां ने कहा, ‘‘बेटा यहां से क्या कुछ ले जाना… वहां अच्छीअच्छी चीजें मिलती हैं… फिर हमारा ढेरों आशीर्वाद जो होगा तुम्हारे साथ.’’

रिया के मम्मीपापा खुश थे, दादी नाराज कि कहां गए सब ब्राह्मण जाति के लोग और उन के बेटे… रिया को तो देखो पहले अपनी मरजी का लड़का ढूंढ़ बैठी और अब जब दूसरा मिल रहा है, तो वह है तो ब्राह्मण पर विदेश में रहता… क्या भरोसा मांसाहारी हो… शराब भी पीता हो… आज रिया के दादाजी होते तो यह रिश्ता कभी नहीं मानते.

मगर दादी को क्या पता कि पढ़लिखे व सरकारी नौकरी में अफसर वे दादी की हां में हां इसलिए मिलाते थे कि वे जानते थे कि मायके से लाई सोच को पत्नी कभी नहीं बदलेगी. पढ़ालिखा, कमाता व संस्कारी लड़का उन की रिया को खुश रखे और ससुराल वाले सब एकदूसरे का मान, सम्मान करें यही सोच होती दादाजी की.

अचानक सहेली के घर से आई सूचना कि अमन आ रहा है, जल्दी शादी करनी है ने सब को व्यस्त कर दिया. अकेली बेटी को बहुत धूमधाम से ब्याहने के सपने को छोटा कर साधारण ढंग से ब्याह कर विदा किया. अमेरिका के अनजाने शहर में पहुंच रिया थोड़ा अकेला महसूस कर रही थी, पर औफिस के बाद का समय अमन उसे न्यूयौर्क घुमाने में बिताता, कभी वर्डट्रेड सैंटर, कभी स्टेटन आईलैंड फेरी और आज ऐंपायर स्टेट बिल्डिंग की 104वीं मंजिल पर खड़े न्यूयौर्क शहर के कई फोटो खींचते रोमांच हो आया रिया को. कई फोटो भेजते मैसेज भी लिख डाला कि मैं बहुत खुश हूं. मम्मीपापा को तसल्ली हुई.

1 महीना खुशीखुशी बीत गया. फिर एक दिन अमन ने झिझकते बताया कि उसे 3 दिनों के लिए औफिस के काम से बाहर जाना है. तब रिया ने भी साथ चलने को कहा तो अमन बोला कि नहीं, वह उसे फोन करता रहेगा.

मगर न तो स्वयं फोन किया और न ही रिया के किए फोन को उठाया. 3 दिन की कह 25वें दिन लौटे अमन को देख रिया घबरा गई. ऐसा लगा जैसे कुछ पीछे छोड़ आया हो. उस के गले लगने लगी तो हाथ से रोकते कहा कि वह बहुत थका है. आराम करेगा. क्या हुआ शायद काम ज्यादा हो या कुछ काम बिगड़ गया हो.

बिगड़ ही तो गया था. पिछले 3 सालों से साथ रह रही गर्लफ्रैंड कैसे बरदाश्त करती अमन की पत्नी को. पहले तो अमन भी टालता रहा मां की इस जिद को कि शादी कर लो. वहां अकेले रहते हो. उन्हें चिंता होती है. पर उन का थोपा विवाह उसे रास आया.

कितनी प्यारी और उस का ध्यान रखने वाली है रिया. उस के स्पर्श में कितना अपनापन है. उस की मुसकराहट देख उस के अंदर तक प्यार की लहर झूम उठती है. मगर अब अचानक आए बदलाव से कैसे बचे?

कहीं नहीं गया था वह औफिस के काम से…गर्लफ्रैंड अमीलिया की धमकी से उस के घर में छिपा था… बिना विवाह किए साथ रह रहे थे, उस के चलते 2 बार गर्भपात करवाया था अमीलिया ने. अस्पताल के कागज पू्रफ  थे, जिन पर पिता के नाम के आगे अमन का नाम लिखा था. क्या वह ये सब बता पाएगा रिया को?

परेशान रिया जानने की कोशिश कर रही थी कि अमन में अचानक आए बदलाव का क्या कारण हो सकता है. जल्दी परदाफाश हो गया. औफिस से लौटते एक लड़की बड़ा सा सूटकेस लिए अमन के साथ आई तो बताया गया कि उस के मकानमालिक ने जल्दी में उस से मकान खाली करवा लिया. दूसरा मिलते ही चली जाएगी.

भोली रिया खुश हुई कि कुछ दिन अच्छी कंपनी रहेगी. दूसरा बैडरूम उसे दे दिया. दोनों सुबह इकट्ठे निकलते और रात देर से आते. चौथे ही दिन सुबह अमन को अमीलिया के कमरे से निकलते देख रिया का तो रंग ही फक हो गया. सोचने लगी कि सही सुना था अमेरिका के कल्चर के बारे में… बिना बात किए अमन तैयार हो चला गया. अमीलिया घर पर ही रुकी.

थोड़ी देर बाद अमीलिया सीधी रिया के सामने जा खड़ी हुई. धमकाते हुए अमीलिया ने कहा कि चाहे तुम्हारी अमन से इंडिया में शादी हो चुकी है, पर उस पर अभी भी उस का हक ज्यादा है. इस देश में बिना शादी किए भी बच्चे पैदा करने की मान्यता है और यदि पिता चाहे तो बच्चे का खर्चा उठा अलग हो सकता है. सरकार भी ऐसी स्थिति में सिंगल मदर की सहायता करती है.

ये सब सुन रिया का सिर घूम गया. कुछ समझ न पाने की स्थिति में वह धम्म से पास रखी कुरसी पर जा गिरी. जब होश आया तो अमीलिया को वहां नहीं पाया. उस रात वह लौटी भी नहीं.

अमन औफिस से जल्दी लौटा तो बिस्तर पर बैठी रिया को शून्य में ताकते पाया. न कुछ पूछा न कहा. चाय व नाश्ता ला सामने आ बैठा. रो दी रिया. क्यों किया अमन ऐसा? का उत्तर उस ने संक्षेप में दिया कि तुम चाहो तो यहां रहो नहीं तो लौट जाओ. रिया का जवाब था कि कौन है मेरा यहां तुम्हारे सिवा. बीचबीच में अमीलिया आती रहती. रिया ने सोच लिया कि वह पति को नहीं बांटेगी. क्या मां से बात कर सलाह ले? पर फिर घबरा उठी.

एक बार पापा को आए हार्ट अटैक को वह देख चुकी थी. तभी ध्यान आया कि शादी के बाद विदाई के समय मां ने एक तह किया कागज देते कहा था कि तुम्हारी मौसी का बेटा विनय यूएसए में रहता है. उसे फोन कर लेना. खुश होगा यह जान कर कि अब तुम भी वहां हो.

नंबर मिलाया तो आंसरिंग मशीन में भरा मैसेज सुना कि विनय हेयर प्लीज लीव ए मैसेज. काम पर होंगे भैया. अब क्या कहे. अगले दिन शाम को अमन के आने से पहले ही फोन पर बात हो गई. विनय ने बताया कि उस की बहन निधि रिसर्च प्रोग्राम पर आई थी और बाद में यहीं शादी कर ली थी. अब प्रैगनैंट है. महीने बाद मम्मी आ रही हैं 3 महीने के लिए उस की मदद करने. निधि से रिया कभी नहीं मिली थी पर मौसी अंबाला से पापा को अस्पताल देखने आई थीं जब वे हार्ट अटैक आने पर 2 हफ्ते अस्पताल रहे थे.

बहुत सोचने के बाद रिया ने तय किया कि वह सारी बात निधि को बता सलाह मांगेगी. मौका जल्दी मिला जब अमन और अमीलिया कहीं जाने वाले थे. निधि ने समझाया कि उसे अमन से सख्ती से बात कर जल्दी तय कर लेना चाहिए कि वह अमीलिया को छोड़ेगा या नहीं. अकसर ऐसी लड़कियां इतनी आसानी से टलती नहीं.

निधि की सलाह थी कि वह फौरन उस के पास आ जाए. वह उसे टिकट व पैसे भेज रही है.

रिया की समझ में भी आ गया कि वह जिस जंजाल में फंस गई है अकेली ही छटपटाएगी और अमीलिया उस का फायदा उठाएगी. अमन लौटा तो उस की डरावनी सी शक्ल देख रिया सहम गई. फिर भी उस ने अपना प्रश्न सख्ती से पूछा तो अमन ने सारा सच उगल दिया.

एक रात अमीलिया बहुत देर से नशे की हालत में एक आदमी के साथ घर लौटी.

वह प्रैगनैंट थी. औंधे मुंह बिस्तर पर जा गिरी. सुबह उठी तो उस के माथे पर घाव था. अमन ने न कुछ पूछा न कहा.

उसी दोपहर पुलिस अमन को घरेलू हिंसा के आरोप में गिरफ्तार कर ले गई. अमीलिया ने फोन कर पुलिस स्टेशन झूठी रिपोर्ट लिखवाई थी कि अमन ने उसे धक्का दिया… वह प्रैगनैंट है. अमन को 2 दिन जेल में काटने पड़े. जब लौटा तो पता नहीं किस डाक्टर का परचा पकड़ाते हुए कहा कि उस के धक्का देने से अब उस का गर्भपात हो गया है.

झूठा आरोप… सब बताते अमन के चेहरे पर आए हावभाव देख रिया ने कहा कि अमन मेरी बात मानों सब छोड़छाड़ इंडिया चलते हैं हमेशा के लिए. अपनों के बीच रहेंगे तो सब ठीक होगा. पर अमन का सिर न में हिलते देख रिया को बहुत गुस्सा आया. शांत रहते रिया ने कुछ पैसे देने को कहा तो झट जेब से 500 डालर निकाल पकड़ाते हुए कहा कि अमीलिया को न बताना.

मौका तलाश फोन कर रिया ने निधि का पता लिया. निधि ने अपने पति जारेद का फोटो भी भेज दिया ताकि वह उसे एअरपोर्ट लेने आए तो वह उसे पहचान ले. अमेरिकन से शादी की थी निधि ने. 1/2 घंटे बाद ही निधि ने ई टिकट भेजते लिखा था कि जल्दी आ जाओ.

बड़ी उलझन में थी रिया कि क्या करे. क्या इंडिया में मां को सब बता दे. नहीं, पापा ये सब जान बहुत घबरा जाएंगे. कहीं उन्हें फिर हार्ट अटैक न आ जाए. अंदरबाहर परेशानी में घूमती रिया ने दोनों कमरों की तलाशी ली.

अमीलिया का बिस्तर उठा कर देखा. डै्रसर के खाने पता नहीं किस तरह की दवाइयों से भरे थे. नीचे रखे एक डब्बे पर निगाह पड़ी तो खींच कर बाहर निकाला. ड्रग्स के छोटेछोटे पैकेट निकले. जल्दी से उन्हें वैसे ही रख दूसरे कमरे में जा जल्दी से अपना पासपोर्ट, शादी की तसवीरें, कुछ कपड़े, पैसे रखे और निधि को फोन कर दिया.

धड़कते दिल से टैक्सी पकड़ एअरपोर्ट जा पहुंची. जब तक प्लेन उड़ा

नहीं वह डरीसहमी सी रही. फीनिक्स पहुंचने का ढाई घंटे का सफर रिया का सोच में ही कटा कि रहे अमीलिया के साथ, गड्डे में गिरे या कुएं में मुझे क्या लेनादेना. कभी स्वयं को कोसती तो कभी अमन को.

जल्दी में अमन के लिए बड़े अक्षरों में लिखा नोट छोड़ आई कि ऐंजौय योर लाइफ. आई एम लीविंग फौरऐवर. सोचता होगा कि मैं इंडिया वापस चली गई. निधि का तो उसे पता ही नहीं था.

फीनिक्स एअरपोर्ट उतर इधरउधर देख रही थी. तभी एक स्मार्ट आदमी ने सीधा सामने आ कर रिया पुकारा. थोड़े से लोगों के बीच इंडियन लड़की को ढूंढ़ना मुश्किल न था. रास्ते में जारेद बस इधरउधर की बातें करता रहा पर घर के पास पहुंच सीधा कहा कि अच्छा किया उसे छोड़ आई वरना तुम्हारी जिंदगी नर्क हो जाती. यहां सब मिल कर कुछ अच्छा सोचेंगे तुम्हारे लिए.

रिया से मिल निधि खुश हुई. अगली सुबह जारेद के औफिस जाते ही दोनों बहनें बातों में व्यस्त हो गईं. पहले रिया से सब पता किया फिर निधि ने अपने व जारेद के बारे में बताया. फिर तसल्ली दी कि जारेद सब खोजबीन कर कुछ अच्छा हल ढूंढ़ेगा. रिया ने विनय भैया के बारे में जानना चाहा, तो निधि ने जो कुछ बताया उसे सुन रिया हैरान हुई.

वे यहां 4 साल की पढ़ाई कर अभी नौकरी पर लगे ही थे कि उन के साथ पढ़ने वाली लड़की रूबी अचानक उन के साथ रहने आ गई और फिर उन से शादी करने पर जोर देने लगी. उस के दबाव में आ विनय ने अपने मम्मीपापा की जानकारी के बिना शादी कर ली. बाद में जो सच सामने आया वह यह कि रूबी किसी लड़के से रिलेशनशिप में रहते हुए 2 महीनों से प्रैगनैंट थी. जब वह लड़का मुकर गया तो रूबी ने भैया को फंसा लिया.

रूबी की तबीयत खराब हुई तो उसे डाक्टर के पास ले जाने पर वास्तविकता सामने आई. घबराए विनय ने यह बात दोस्त को बताई, जिस की सलाह थी कि रूबी को डीएनए टैस्ट करवाने पर जोर दो. यह जान वह एक दिन घर से गायब हो गई. पुलिस में रिपोर्ट लिखाई और फिर उसे एक अस्पताल में ढूंढ़ लिया गया जहां वह अपने ऐक्स बौयफ्रैंड के साथ पाई गई.

दोनों की सहमति से बच्चे को जन्म के बाद अडौप्शन के लिए रजिस्टर करवाया गया. रूबी ने भैया से माफी मांगते हुए तलाक लेने की बात स्वयं की. विनय भैया को इस सब से उबरने में काफी समय लगा. यह तो अच्छा हुआ कि निधि रिसर्च प्रोग्राम में यहां आ गई तो सब जान दुखी तो हुई पर विनय को सहारा हुआ.

रिया ये सब जान बहुत परेशान हुई पर तभी उसे अपनी परेशानी का भी ध्यान आया.

आज मौसी निधि के पास पहुंचने वाली थीं. रिया बहुत परेशान थी कि मौसी उस के बारे में जाने क्या कहेंगी. मम्मीपापा को कौन और कैसे बताएगा? क्या उसे अमन के पास लौट जाना चाहिए? उसे क्या पता था कि निधि और जारेद उस की परेशानी सुलझाने में पहले से ही लगे हैं.

योजनानुसार शाम की चाय पी सब बैठे बातों में लगे थे. मौसी सब के बारे में जानकारी दे रही थी. तभी जारेद एक लिफाफा लिए आया और निधि को देते कहा कि उसे इस विषय में रिया को अभी बता देना चाहिए.रिया यह सुन घबराई. वास्तव में जारेद ने अमन व अमीलिया की खोजबीन कर जाना कि वे दोनों इललिगल ड्रग बेचते पकड़े गए और अब जेल में हैं. वह पुलिस रिपोर्ट भी ले आया और साथ ही रिया से उस के तलाक के पेपर भी.

रिया ये सब जान कर घबरा उठी. मौसी ने प्यार से कंधा थपथपाते हुए अपने पास बैठाया. अब जब बात खुल ही गई तो निधि ने हर बात की जानकारी दे दी.

रात भर रिया खुद को कोस सिसकती रही और मौसी उस का सिर थपथपा तसल्ली देती रहीं. सुबह नाश्ते के बाद जारेद निधि को ले उस की डाक्टर अपौइंटमैंट पर चला गया. मौसी ने रिया को समझाया कि अच्छा होगा तुम अमन को तलाक दे नई जिंदगी की शुरुआत करो. मैं तुम्हारे मम्मीपापा से पूरी बात करूंगी. जारेद तुम्हारी पूरी मदद करेंगे.

निधि ने बेटी को जन्म दिया. नाम रखा जूली. छोटी बच्ची के आने से सब व्यस्त हो गए. इसी बीच रिया ने मम्मीपापा से बात कर उन्हें पूरी बात बता दी. सब की सलाह से तलाक के पेपर फाइल करवा दिए गए. जूली के 2 हफ्ते का होते ही आज जो व्यक्ति उन्हें घर बधाई देने आया उसे जारेद का कजन विलियम बताया गया. निधि उस से बातें करती रही. जूली नानी की गोद में सो रही थी. नाश्ते का प्रबंध रिया ने ही किया. जब जारेद बाहर से लौटे तो सब बातें करने लगे पर रिया चुप. क्या बात करे अनजाने आदमी से.

उस के जाते ही निधि ने विलियम के बारे में बताया कि पिछले साल कार ऐक्सीडैंट में पत्नी का देहांत हो गया था. अब उस की ढाई साल की बेटी की दादी, जो एक नर्स हैं, देखभाल कर रही हैं. विली यानी विलियम अकेला रहता है और आंटी उस का जल्दी ब्याह करना चाहती हैं. जारेद बीच में ही बोल पड़े कि विली बहुत अच्छा इंसान है. यदि रिया तुम उस की बेटी को अपनाने को तैयार हो तो तुम्हें उस से अच्छा साथी नहीं मिलेगा.

रिया बात पूरी सुन अपने कमरे में चली गई. क्या… 1 साल में ही शादी, तलाक, दूसरी शादी और एक बच्ची की मां. सोचतेसोचते उस का सिर घूमने लगा. चूंकि निधि भी रिया के पीछे आ गई, इसलिए उसे बेहोश होते देखा तो पकड़ कर कुरसी पर बैठा दिया. उस रात मौसी रिया के साथ सोईं.

दिखावे को रिया सो रही थी पर उस की आंखें जैसे कोई चलचित्र देख रही हों… मम्मीपापा की परेशानी, दादी की फटकार, अमन सलाखों के पीछे, विली की उस की ओर देखती आंखें, मौसी की सलाह और अचानक वह घबराहट से उठ बैठी.

मौसी ने पूछा कि क्या कोई सपना देख रही थी. सपना कहां यह तो उस की जीतीजागती कहानी है. अब रिया को स्वयं इस कहानी का अंत तलाशना है.

निधि से रिया ने 2 दिन का समय मांगा.

2 दिन बाद कठोर दिल कर उत्तर दिया कि ठीक है जैसे जारेद जीजू सोचें मुझे मंजूर है. इसी इतवार विली उस की बेटी काइरा और मां रिया से मिलने आईं. रिया किचन में नाश्ते का इंतजाम करने गई तो विली मदद करने पहुंचा. बोला कि रिया प्लीज नो प्रैशर, इफ यू ऐग्री आई प्रौमिस टू कीप यू आलवेज हैप्पी. रिया ने उस की ओर देख सिर हिलाया जैसे वह उस की कही बात से सहमत हो. उसी रात फिर फोन कर निधि के कहने पर रिया ने अपने मम्मीपापा को सहमति बताई, पर साथ ही सारी बात दादी को बताने पर जोर दिया.

2 दिन बाद शाम को विली बेटी काइरा को ले निधि के घर पहुंचा. अकेले में रिया से मिलते हुए उस ने कहा कि वह उस के साथ इंडिया जा उस की फैमिली से मिल उन्हें पूरा विश्वास दिलाना चाहता है कि सब ठीक होगा और हां वह काइरा को भी साथ ले जाएगा.

जाने का दिन तय हुआ. जाने वाले दिन रिया को बड़ा अजीब सा लग रहा था. अभी बिना बने रिश्ते के आदमी व बच्चे के साथ यात्रा करना. प्लेन में रिया काइरा से ऐसे जुड़ गई जैसे वह उसी की बच्ची हो. उस के साथ बातें करते, खिलाते, सुलाते एक संबंध सा जुड़ गया.

एअरपोर्ट पर अकेले पापा आए. बेटी और विली को गले लगाया

और फिर बच्ची को गोद ले कर कार में बैठाया. घर पहुंच अंदर जाते ही रिया सीधी दादी के कमरे में पहुंची और उन की गोद में सिर रख सुबकसुबक कर देर तक रोती रही. दादी प्यार से सिर सहला उसे शांत रहने को कहती रहीं.

विली ने आगे बढ़ मां के चरण स्पर्श किए. वह ये सब यहां आने से पहले निधि से जान गया था. थोड़ा समय बीता तो दादी ने रिया को उसे बुलाने को कहा यानी विली से मिलना चाहा. विली ने दादी के सामने माथा टेका. यह देख रिया हैरान हुई.

दादी ने उस के सिर पर हाथ रखते कहा कि मेरी रिया को सदा खुश रखना, सुखी रहो. दरवाजे की आड़ में काइरा को गोदी में उठाए रेखा यह देख रो पड़ीं जिस सास ने सारी उम्र छूतछात, वहमों, नियमों में अपने को बांधे रखा आज एकाएक सब भूल एक विदेशी मांसाहारी को आशीर्वाद दे रही हैं.

शायद उन की सोच का विस्तार तब हुआ था जब रिया ने फोन कर दादी को सारी बात सच बताने पर जोर दिया था. बेटे सुरेश से रिया के दुख, अमन की हरकतें, जेल जाने और अब तलाक का जान मां दुखी हो बोली थीं कि मेरी फूल सी पोती को इतनी यातना देने वाला तो राक्षस निकला. अब जेल में पड़ा सड़ता रहेगा. सुरेशजी ने मां को समझाया एक इंसान का अच्छा होना धर्मजाति पर नहीं उस के व्यवहार पर निर्भर होता है.

अचानक दादी को ध्यान आया कि बच्ची कहां है. लाओ उसे, मिलूं मैं उस से. दरवाजे की आड़ से निकल बहू रेखा काइरा को लिए अंदर पहुंचीं. आज सुरेशजी मां से आज्ञा लिए बगैर उन के कमरे में आ बैठे. दादी ने बच्ची को गोद में ले माथा चूमा. इतने दिनों बाद मां को बातें करते देख सब खुश थे.

तभी दादी ने कहा कि सुरेश कल सुबह पंडितजी से रिया की शादी करवाने का कह आओ. इन के पास समय कम है. घर को भी सजा लो. हां, एक बात और पंडितजी से जो सामान चाहिए हो लाने को कह दोे. पैसे हम दे देंगे. तुम अकेले कहांकहां भागोगे… और बहू कल दोपहर बाजार जा कर दूल्हादुलहन के कपड़े खरीद लाना. छोटी बेटी को घाघराचोली अच्छा लगेगा. सब के कपड़ों के पैसे मैं दूंगी. जेवर मत खरीदना. मेरे पास हैं. बस अंगरेजी बाबू की अंगूठी खरीद लेना. दादी एक ही सांस में सब कह गईं.

बेटे ने जब पूछा कि मां बुलाना किसकिस को है, तो बोली कि अरे किसी को नहीं. हम ही बराती और हम ही घर वाले.

घर में हलचल थी. सब किसी न किसी काम में व्यस्त थे. पर सब से बड़ी खुशी इस बात की भी थी कि मां ने (दादी) कितने सालों बाद अपने कमरे की दहलीज लांघी. उन के लिए पहले जैसे ही दीवान पर गद्दा बिछा 2 बड़े तकिए लगा दिए गए. शादी का मुहूर्त 4 दिन बाद शुक्रवार का निकला. शनिवार शाम को उन की वापसी.

दुलहन के वेश में रिया और शेरवानी पहने दूल्हे विलियम को सब के बीच बैठा दादी ने अपने संदूक से निकाल अपनी शादी में मिला भारी भरकम सोने का जड़ाऊ रानी हार रिया को और बड़े मोतियों का 4 लड़ी वाला हार विलियम को पहनाया.

बहू ने कहा कि इतने सालों से समेटा ये सब उसे क्यों नहीं दिया गया? फिर अगर रिया को ही देना था तो पहली शादी में क्यों नहीं दिया?

उत्तर मिला कि तब दामाद पर मेरा दिल नहीं बैठा था पर अब ये हमारे बेटाबेटी सदा सुखी रहेंगे.

शादी का दिन. कुछ जानेपहचाने लोगों को बुलाया गया था. आवभगत चल रही थी पर अचानक एक गोरे सूटेडबूटेड को देखा तो जाना कि वह विलियम का कजन है. उन्हें देख रिया हैरानी से बोली कि हाय जीजू. जीजू ने कहा हाय रिया… सरप्राइज, रेखाजी हैरान… निधि का पति पर बहन ने तो कभी नहीं बताया कि उन का दामाद गोरा है. शादी रीतिरिवाज से हो रही थी. विदाई के समय नवदंपती ने दादी के पैर छुए तो आशीर्वाद देते दादी की आंखें भर आईं.

विलियम ने दादी के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले उन्हें आश्वासन दिया कि वह रिया का अच्छा पति बनेगा. भर आई आंखों से रिया ने दादी की आंखों में ममता का प्रतिबिंब देखा. उन के गले लग कहा कि धन्यवाद दादी. मगर दादी ने कहा कि वह क्यों बिटिया, अब रिया क्या बताए कि दादी ने जो अपनी सोच का विस्तार कर लिया था, अपनी सारी उम्र के धर्म, कर्म, पाबंदियां, रूढि़वादिता त्याग कर पोती की खुशी के लिए जो चुना वह इतना सहज नहीं था.

जारेद रात की फ्लाइट से यूएस लौटने वाले थे. रेखाजी ने निधि के लिए झुमके व नन्ही जूली के लिए सोने की छोटी सी चेन खरीद ली, पर अब जारेद को क्या दें. तभी सासूजी एक पुरानी डिबिया ले आईं और फिर बोलीं कि बहू दामाद पहली बार आया है. उसे दे दो. डिबिया खोली तो उस में सोने की गिन्नी थी. रेखाजी ने मुसकराते कहा कि मां आप तो सोने का खजाना हैं. उत्तर मिला कि वह तो हूं ही.

एक रात होटल में रह सुबह रिया व विलियम घर आए. नन्ही काइरा नानी के पास रही. दिन खुशी से बीता और शाम मम्मीपापा उन्हें एअरपोर्ट छोड़ने जाने लगे तो रिया ने दादी को भी चलने को कहा.

रिया दादी के चेहरे पर आए भावों को पहचानती थी. दादी का हाथ सहलाते रिया ने कहा कि दादी आप को अमेरिका में मेरे घर आना होगा.

इस पर दादी ने कहा कि जरूर पर जब तू काइरा के भाई या बहन को जन्म देगी और मैं परदादी बनूंगी तब.

विली ने रिया की ओर देख मुसकराते हुए कहा कि वह तो आप अब हो गई हैं. काइरा की ग्रेट ग्रांड मां, अगली सीट पर बैठे सुरेशजी ने मुड़ रिया और विली को आशीर्वाद दिया.

मेरे मोबाइल पर हर रोज धर्म से संबंधित मैसेज आते रहते हैं,अपने डर को कैसे खत्म करूं?

सवाल

मैं कालेज का छात्र हूं. मेरे मोबाइल पर हर रोज धर्म व पूजापाठ से संबंधित मैसेज आते रहते हैं जिन में लिखा होता है कि उक्त मैसेज 11 लोगों को भेजें आप की मनोकामना शीघ्र पूर्ण होगी. इस मंत्र का जाप करें और अपने जानने वालों को भी भेजें तो पूरे साल आप के साथ अच्छाअच्छा होगा. मुझे ऐसे मैसेज देख कर बहुत गुस्सा आता है, साथ ही भय भी होता है कि अगर मैं ने मैसेज में कही बात नहीं मानी तो कहीं मेरे साथ कुछ बुरा न हो जाए. इस चक्कर में मजबूरीवश मुझे वे मैसेज आगे फौरवर्ड करने पड़ते हैं कि जिस से मेरा सारा डाटा बैलेंस तो खत्म होता ही है, साथ ही कुछ अच्छा भी नहीं होता. मैं क्या करूं? अपने डर को कैसे खत्म करूं?

जवाब

ऐसे मैसेज भेजने वाले और कोई नहीं पाखंडी व धार्मिक अंधवश्विसी लोग होते हैं जो अपने भ्रमजाल में लोगों को फंसा कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि लोग अपनी तार्किक शक्ति का प्रयोग न करें और उन का अनुसरण करें.

आप ऐसे मैसेज पर बिलकुल ध्यान न दें और तुरंत डिलीट कर दें. आप खुद सोचें, अगर मैसेज फौरवर्ड करने से कुछ अच्छा होता तो कभी किसी का कुछ बुरा नहीं होता. सब मैसेज फौरवर्ड कर के अपना भला कर लेते.

आप तो मैसेज फौरवर्ड कर के भी परिणाम देख चुके हैं. इसलिए मन में व्यर्थ का द्वंद्व या डर न पालें और इन पाखंडभरे, धार्मिक मैसेजस पर बिलकुल ध्यान न दें.

अपनी खूबी ले डूबी : ताराचंद संतोष से क्यों नाराज थे?

‘‘तुम चिल्लाते क्यों हो जी. कुरतापाजामा वहीं खूंटी पर तो टंगा है. लेकिन ठहरो, अभी तुम कपड़े मत बदलना…’’ संतोष ने भीतर से आते हुए कहा.

‘‘क्यों…?’’ ताराचंद ने पूछा.

संतोष मुसकरा कर बोली, ‘‘क्योंकि तुम्हारी इच्छा चाय पीने की होगी. ऐसा करो तुम दुर्गा ताई के घर हो आओ. ताऊ को कल शाम से बुखार है. वहां चाय के साथ नमकीन भी मिल जाएगी…’’ थोड़ा रुक कर वह फिर बोली, ‘‘कल हम दोनों ही वहां जा कर सुबह की चाय पी लेंगे. आज दिनभर वहां बैठेबैठे मैं तो 2 बार की चाय पी आई थी. लौटते समय 6 संतरे भी साथ ले आई थी.’’

‘‘संतरे?’’ ताराचंद ने पूछा.

संतोष फिर मुसकरा कर बोली, ‘‘हां, ताऊ का हालचाल पूछने जो भी आ रहा था, ज्यादातर संतरे ही ला रहा था. मैं ने ताई के कान में फुसफुसा कर कह दिया था कि किसीकिसी बुखार में संतरा जहर का काम करता है. बस, ताई ने सारे संतरे आसपड़ोस में बांट दिए. मेरे हाथ भी 6 संतरे लग गए.’’

‘‘मिल ही रहे थे, तो पूरे दर्जनभर ले आती,’’ ताराचंद ने कहा.

‘‘ले तो आती, मगर सोचा कि शाम को 6 ही तो खा सकेंगे. बाकी रखेरखे सड़ गए तो फेंकने ही पड़ेंगे. अब कपड़े बदल लो. शाम के लिए कटोरा भर कर आलूपालक की सब्जी सुशीला दे गई है. भूख लग आए तो बता देना. मैं रोटियां सेंक दूंगी,’’ संतोष ने कहा.

‘‘सुशीला के घर की सब्जी में तो मिर्च बहुत होगी,’’ ताराचंद बोले.

‘‘अरे, मुफ्त की तो मिर्च में भी मजा ले लेना चाहिए. तुम्हें तो मुझे शाबाशी देनी चाहिए, जो मौका मिलते ही मुफ्त का जुगाड़ कर लेती हूं,’’ संतोष ने कहा.

ताराचंद हंस कर बोले, ‘‘तुम्हारी खूबी का तो मैं शुरू से ही कायल रहा हूं. कोई सोच भी नहीं सकता कि इस छोटी सी खोपड़ी के भीतर अक्ल का इतना बड़ा भंडार है.’’

तभी ताराचंद को अपनी बात याद आई, ‘‘तुम्हारी तो बात हो गई, लेकिन आज मैं ने भी कुछ कम अक्ल का काम नहीं किया है. मेज पर लिफाफे में

4 आम रखे हैं.’’

‘‘आम,’’ संतोष चौंकी.

‘‘तुम जरा इन की खुशबू तो लो,’’ ताराचंद बोले.

‘‘अब बता भी दो कि कहां से लाए हो…’’ इतराते हुए संतोष ने पूछा.

‘‘आज एक आदमी हमारे खन्ना साहब के लिए तोहफे में थैला भर कर आम ले आया था. साहब ने मुझ से ही कह दिया कि एकएक सब को बांट

दो. बस, मैं ने मौका देख कर उन में से 4 आम चुरा लिए,’’ उन्होंने बताया.

‘‘अरे, चुराने ही थे, तो कम से कम 6 तो चुराते,’’ संतोष ने मुंह बिचकाया.

ताराचंद कुछ कहने ही वाले थे कि आवाज सुन कर रुक गए.

‘‘संतोष बहन…’’

आवाज पहचान कर संतोष बोली, ‘‘अरी कमलेश बहन, बाहर से क्या आवाजें दे रही हो, अंदर आ जाओ.’’

‘‘नमस्ते भाई साहब. मैं कह रही थी कि तुम्हारे घर में थोड़ा सा गरम मसाला होगा. मैं तो आज मंगाना ही भूल गई और ये हैं कि बिना गरम मसाले के खाने में स्वाद ही नहीं मानते,’’ कमलेश ने अंदर आ कर कहा.

संतोष दुनियाभर का अफसोस अपने चेहरे पर लाते हुए बोली, ‘‘तुम भी कैसे समय पर आई हो बहन, गरम मसाला मेरे यहां भी सुबह ही खत्म हुआ है. इन से मंगाया तो था, लेकिन मर्दों की भूलने की आदत तुम जानती ही हो, सो ये भी भूल गए. लो, ये 2 आम तुम भी ले जाओ.’’

‘‘वह तो ठीक है… लौकी के कोफ्ते बना रही थी, मगर अब गरम मसाला…’’

कमलेश की बात पूरी होने से पहले ही संतोष बोल पड़ी, ‘‘लौकी के कोफ्ते तो एक दिन सरोज ने खिलाए थे हमें. कह रही थी कि उस के जैसे कोफ्ते पूरे महल्ले में कोई नहीं बना सकता.’’

कमलेश ने मुंह बनाया, ‘‘अपने मुंह से अपनी तारीफ करना मुझे तो नहीं आता. कल दोबारा बनाऊंगी, तो तुम्हारे यहां भी भिजवा दूंगी. फिर तुम खुद ही देख लेना कि कोफ्ता किसे कहते हैं.’’

कमलेश के बाहर जाते ही संतोष मुसकराई, ‘‘देखा, कल की सब्जी का भी इंतजाम हो गया.’’

‘‘वह तो देखा, लेकिन उसे इतने महंगे आम क्यों दे दिए? देने ही थे तो संतरे दे दिए होते,’’ ताराचंद बोले.

संतोष हंसी, ‘‘अक्ल से काम लेना सीखो. हो सकता है कि दुर्गा ताई ने उसे भी संतरे दे दिए हों.’’

अचानक ताराचंद के चेहरे पर आई उदासी देख कर संतोष को हैरानी हुई. उस ने वजह पूछी, तो ताराचंद परेशान हो कर बोले, ‘‘खन्ना साहब कल रात घर आ रहे हैं, वह भी पत्नी के साथ.’’

यह सुन कर संतोष भी सोच में डूब गई. कुछ देर बाद थोड़ा खुश हो कर वह इतमीनान से बोली, ‘‘आसपड़ोस में मेरा दबदबा तो तुम ने देख ही लिया है. सब्जियों का जुगाड़ हो जाएगा. हमें केवल रोटियों और सलाद का इंतजाम करना पड़ेगा.’’

‘‘सुनो, खन्ना साहब की मिसेज को पिछली बार खीर बहुत पसंद आई थी. खन्ना साहब दफ्तर में भी बहुत दिनों तक उसी की चर्चा करते रहे थे,’’ ताराचंद ने याद दिलाया.

‘‘वह सुशीला के यहां से आई थी,’’ कहते हुए संतोष 2 समोसे और थोड़ी सी बरफी साथ ले कर सुशीला के घर निकल गई.

2 दिन बाद उन्होंने खन्ना साहब को बड़े आदर के साथ अपने घर आने की दावत दी, जिसे खन्ना साहब ने खुशीखुशी मंजूर कर लिया.

शाम को वे दोनों इतमीनान से घर पर खन्ना साहब के आने का इंतजार करने लगे. महल्लेभर से दाल, सब्जी, रायता का एकएक डोंगा शाम को साढ़े 7 बजे से पहले ही उन के घर पहुंच चुका था. बस, सुशीला के घर से खीर आने की कमी रह गई थी.

जब पौने 8 बजे तक खीर नहीं पहुंची तो ताराचंद को थोड़ी चिंता सताने लगी.

तभी बाहर खन्ना साहब की कार के रुकने की आवाज सुनाई दी. खन्ना साहब अपनी पत्नी के साथ उन्हीं के घर की ओर बढ़ रहे थे.

‘‘लो, ये लोग तो आ गए. लेकिन तुम्हारी सुशीला अभी तक नहीं आई,’’ ताराचंद फुसफुसाए.

संतोष भी उसी अंदाज में बोली, ‘‘तुम इन लोगों का स्वागत करो. मैं सुशीला के घर से हो कर आती हूं.’’

वह तेजी के साथ सुशीला के घर की ओर चल दी. सुशीला उसे घर में कहीं दिखाई नहीं दी.

संतोष सीधे उस के रसोईघर में पहुंच गई. यह देख कर उसे बड़ी राहत मिली कि सुशीला खीर तैयार करने के बाद ही कहीं गई थी. खीर भरी पतीली सामने ही रखी थी. उस ने फटाफट डोंगा भरा और अपने घर पहुंच गई.

डोंगा रसोईघर में रख संतोष भी उन के बीच चली आई. मिसेज खन्ना बोलीं, ‘‘मिसेज चंद, आप हैं कहां? हमारे पास बैठिए. खाना तो एक बहाना है. हम तो प्यार के भूखे हैं, इसीलिए तो मुंह उठाए किसी भी छोटेमोटे आदमी के यहां जा टपकते हैं.’’

‘जी,’ ताराचंद और संतोष के मुंह से एकसाथ निकल पड़ा.

खन्नाजी ने समझाने के अंदाज में कहा, ‘‘इन का मतलब है कि हम किसी को भी छोटा नहीं समझते.’’

संतोष ने कुछ ही देर में खाना मेज पर सजा दिया. ढेर सारी चीजें देख कर मिसेज खन्ना बोलीं, ‘‘अरे, इतना सबकुछ करने की क्या जरूरत थी…’’

‘‘यह तो कुछ भी नहीं है, आप शुरू करें,’’ संतोष ने एक डोंगा उन की तरफ बढ़ाया. वे सब खाने में जुट गए.

बीच में संतोष ने ताराचंद को इशारा किया कि वह खन्ना साहब से अपने प्रमोशन की बात छेड़ दें.

‘‘सर, आप बुरा न मानें तो…’’ ताराचंद हकलाने लगे.

‘‘अरे, अब कह भी डालिए,’’ खन्ना साहब ने कुछ तेजी के साथ कहा.

ताराचंद सकपका गए और बोले, ‘‘मेरा मतलब है सर, आप ने यह बैगन का भरता तो छुआ ही नहीं है. थोड़ा यह भी लीजिए न.’’

‘‘ओ… जरूर लेंगे, जरूर लेंगे. लेकिन इस में इतना हकलाने की क्या बात थी,’’ खन्ना साहब बोले.

‘‘भाई साहब, अब यह खीर तो लीजिए. आप लोगों के लिए खासतौर से बनवाई है,’’ कुछ देर बाद संतोष ने खन्ना साहब से कहा.

‘‘भई, खीर तो हमारी श्रीमतीजी की पसंद है. वे जी भर कर खा लें,’’ खन्ना साहब बोले.

‘‘आप लीजिए न, मैं तो 2 कटोरी ले चुकी हूं,’’ मिसेज खन्ना ने खीर का डोंगा खन्ना साहब के सामने सरका दिया.

वे बड़े चाव से खीर खा ही रहे थे कि अचानक सुशीला वहां चली आई और बोली, ‘‘संतोष बहन, जो खीर तुम मेरे घर से उठा लाई थीं, वह तुम ने खाई तो नहीं? उसे खाना मत. वह कौशल्या है न, उस का कुत्ता आज पता नहीं कैसे खुला रह गया और मेरी रसोई में घुस कर उस खीर में मुंह मार गया.

‘‘मैं ने तो खीर अलग रख दी थी कि रामकली की गाय को खिला दूंगी, मगर इस बीच तुम उसे उठा लाईं. मैं उस समय कौशल्या की खबर लेने चली

गई थी.’’

अचानक सुशीला की नजर खाने की मेज पर पड़ी और वह ठिठक गई.

मेहमानों को देख कर उस ने वहां रुकना ठीक नहीं समझा और उलटे पैर वापस चली गई.

उस के जाते ही वहां कुछ देर

के लिए सन्नाटा छा गया. फिर मिसेज खन्ना अचानक चीखीं, ‘‘खीर कुत्ते की जूठी थी.’’

इस के साथ ही उन्होंने एक उबकाई ली और सारा खायापीया वहीं मेज पर उगल दिया.

‘‘डार्लिंग… डार्लिंग…’’ खन्ना साहब ने घबरा कर कहा और अचानक ताराचंद की ओर देखते हुए दहाड़े, ‘‘यू… मिस्टर ताराचंद… तुम्हारी यह हिम्मत, हमें भिखारी समझते हो. भीख में मांगा हुआ खाना हमें खिलाते हो, वह भी कुत्ते का जूठा…

‘‘हम तुम्हें दरदर का भिखारी बना देंगे. ऐसा भिखारी जिसे कुत्ते का जूठा भी कभी नसीब नहीं होगा, समझे तुम.’’

‘‘सर… सर, माफ कर दीजिए सर, कुछ नहीं होगा सर. कुत्ते को इंजैक्शन लगे हुए हैं सर,’’ ताराचंद के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था.

तभी मिसेज खन्ना की उबकाइयां बढ़ती गईं.

‘‘अपनेआप को संभालो डार्लिंग,’’ कहते हुए खन्ना साहब फिर से उन्हें संभालने लगे.

ताराचंद के मुंह से खन्ना साहब के अंदाज में ही निकला, ‘‘हांहां, डार्लिंग, अपनेआप को संभालो.’’

‘‘मिस्टर ताराचंद, तुम्हारी यह मजाल कि तुम हमारी बीवी को डार्लिंग कह रहे हो, वह भी हमारे ही सामने…’’ खन्ना साहब चीखे.

वह शायद ताराचंद के कपड़े भी फाड़ देते, लेकिन मिसेज खन्ना फिर उबकाई लेने लगीं.

अपनी बातों के तीरों से ताराचंद को अच्छी तरह से छलनी करने के बाद वे लोग चले गए.

ताराचंद और संतोष काटो तो खून नहीं की हालत में खड़े रह गए. कुछ देर बाद ताराचंद संतोष पर बिफर पड़े, ‘‘भाड़ में गई तुम्हारी खूबी, तुम्हारे चलते डूब गई न नैया…’’

इतना सुनना था कि संतोष रोने लगी और भीतर जा कर ताराचंद नाक रगड़रगड़ कर माफी मांगने के अभ्यास में जुट गए.

संविधान की शक्ति, गुलामी और भेदभाव से मुक्ति

इस बार के लोकसभा चुनाव प्रचार में जो हलकापन देखने में आया उसे छिछोरापन कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी. हद तो यह भी थी कि राजद नेता तेजस्वी यादव के मांसमछली खाने तक को मुद्दा बनाने की कोशिश की गई. आम लोगों की दिलचस्पी पहले से ही इस आम चुनाव में नहीं थी, ऊपर से घटिया चुनावप्रचार ने उसे और उकता कर रख दिया. पहले ही चरण के कम मतदान से विपक्ष और खासतौर से सत्तारूढ़ भाजपा सहित सभी पार्टियां कम मतदान से सकते में आ गई थीं. लिहाजा, वोटर को लुभाने और मतदान बढ़ाने के लिए क्याक्या हथकंडे व टोटके नहीं अपनाए गए, यह बहुत जल्दी भूलने वाली बात नहीं है.

भाजपा को जब समझ आ गया कि धर्म, हिंदुत्व और राममंदिर का कार्ड उम्मीद के मुताबिक नहीं चल रहा है तो उस ने बारबार मुद्दे बदले. उस के पास उपलब्धियों के नाम पर गिनाने को कुछ खास नहीं था तो इंडी गठबंधन के पास भी उसे घेरने के लिए आकर्षक मुद्दे नहीं थे. बेमन से वोट करते लोग चौकन्ने तब हुए जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने यह कहना शुरू किया कि भाजपा अगर तीसरी बार सत्ता में आई तो संविधान नष्ट कर देगी.

इस से ऐसा लगा मानो जानेअनजाने में उन्होंने नरेंद्र मोदी और भाजपा की दुखती रग पर हाथ रख दिया है. जिस का न केवल अतीत बल्कि भविष्य से भी गहरा संबंध है. इस के बाद आरक्षण पर घमासान मचा. दोनों ही गठबंधन पूरे प्रचार में एकदूसरे पर आरक्षण खत्म करने और संविधान बदलने का आरोप लगाते रहे.

400 पार का नारा लगा रहे नरेंद्र मोदी की बौखलाहट तब देखने लायक थी जिन्हें एक झटके में घुटनों के बल आते बारबार यह सफाई देना पड़ी थी कि मोदी तो छोड़िए खुद बाबासाहेब आंबेडकर भी आ कर कहें तो भी कोई संविधान नहीं बदल सकता. उन्होंने कांग्रेस पर भीमराव आंबेडकर के अपमान और पीठ पर छुरा भोकने का भी आरोप लगाया और 21 मई को तो पूरे नेहरू खानदान को लपेटे में यह कहते ले लिया कि हम नहीं बल्कि ये लोग बारबार संविधान में संशोधन करते रहे हैं. बकौल मोदी, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान की पहली प्रति डस्टबिन में डाल दी थी क्योंकि उस पर धार्मिक चित्र लगे थे. इमरजैंसी के दौरान भी संविधान को डस्टबिन में डाल दिया गया था. इन आरोपों के जवाब में राहुल गांधी भी अपनी रट पर कायम रहे.

यह सब इतनी तेजी से हुआ कि गैरसवर्णों यानी आरक्षित वर्ग में खासी हलचल मच गई जिस के लिए संविधान उतना ही अहम होता है जितना कि सवर्णों के लिए रामायण और गीता होते हैं. जब एक पब्लिक मीटिंग में नरेंद्र मोदी संविधान की तुलना तमाम धर्मग्रंथों से कर बैठे तो आरक्षित वर्ग का शक और घबराहट दोनों और गहरा उठे.
अब जब सबकुछ सामने है तो तय है कि यह बहस या मुद्दा चुनाव के बाद ही खत्म नहीं हो जाने वाला. यह भी साबित हो गया कि सरकार किसी की भी हो, वह संविधान को खत्म करना तो दूर की बात है उस से बहुत ज्यादा छेड़छाड़ करने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाएगी. यह बहुत जरूरी भी था कि संविधान को ले कर दोनों दलों और गठबंधनों का रुख सार्वजनिक तौर पर सपष्ट हो कि भले ही जरूरत के मुताबिक इस में मामूली फेरबदल होता रहे लेकिन इस की नींव और बुनियादी ढांचे से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी.

संविधान को ले कर हुए आरोपप्रत्यारोपों को केवल सियासी नजरिए से देखना एक नादानी वाली बात होगी. वजह, इस ने भारतीय समाज में वो बदलाव किए हैं जिन की कल्पना भी आजादी के पहले कोई नहीं कर सकता था. लेकिन एक निराशाजनक बात जो आज भी साफसाफ नजर आती है वह यह है कि संविधान भारतीय समाज की पौराणिक मानसिकता नहीं बदल पाया. भारतीय संविधान की मिसाल दुनियाभर में दी जाती है लेकिन भारत में उतनी नहीं जितनी कि दी जानी चाहिए. मुमकिन है इस की वजह इतनी भर हो कि सवर्णों की नजर में इस दस्तावेज का गैरजरूरी होना हो और गैरसवर्णों की नजर में खुद के लिए एक रक्षाकवच जो उन के अधिकारों की हिफाजत करने के साथ समानता, स्वतंत्रता, न्याय वगैरह का अधिकार देता है.

संविधान का बनना और उस का लागू होना आसान काम नहीं था क्योंकि एक बहुत बड़ा वर्ग, जो मुख्यधारा में था, इस के विरोध में था. इस वर्ग का अंगरेजों से भी पहले समाज पर राज चलता था यानी उन की हुकूमत चलती थी. जाहिर है, यह वर्ग सनातनियों का था जिन का इकलौता मकसद आज भी देश को हिंदू राष्ट्र बनाना है. हालांकि हिंदू राष्ट्र के हिमायती और पैरोकार अब डगमगाते दिख रहे हैं लेकिन उन्होंने अपनी जिद या कोशिशें छोड़ दी हों, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. लेकिन ऐसा कहने की बहुत वजहें हैं कि उन के पास इस के सिवा दूसरा कोई काम या मकसद है ही नहीं.

संविधान बनाने वाली टीम में तरहतरह की विचारधारा वाले लोग, मसलन कांग्रेसी, वामपंथी समाजवादी, कम्युनिस्ट और मध्यमार्गी वगैरह शामिल थे लेकिन कट्टर हिंदूवादियों ने खुद को इस से दूर रखा था.

40 के दशक में महात्मा गांधी, भीमराव आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे दर्जनों नेता विदेशों से पढ़ कर आए थे, लिहाजा उन में, अपनेअपने आइडियों से ही सही, देश को नए तरीके से गढ़ने का जज्बा था. उन के दिमाग में नए दौर की रोशनी थी. कुलजमा उन में आदमी को आदमी समझने का सलीका और तमीज थी.

जब संविधान को लिखने और संपादित करने की बात आई तो इस के केंद्र में 2 नेता ही प्रमुखता से रह गए. पहले थे डाक्टर भीमराव आंबेडकर और दूसरे जवाहरलाल नेहरू. हालांकि संविधान को तैयार करने में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, डाक्टर राधाकृष्णन, के एम मुंशी, वल्लभभाई पटेल, राजकुमारी अमृत कौर, सी राजगोपालाचारी, जे बी कृपलानी, हंसा मेहता, बी आर राजन, अल्लादी कृष्णा स्वामी अयंगर वगैरह की भूमिकाएं भी गौण नहीं थीं लेकिन इन दोनों (आंबेडकर और नेहरू) जितनी अहम न थीं. ये दोनों विकट के प्रतिभावान, महत्त्वाकांक्षी और बदलाव के हिमायती थे. जबकि, दोनों में भारी वैचारिक और राजनीतिक मतभेद भी थे जिन्हें उन्होंने संविधान निर्माण में आड़े नहीं आने दिया.

धोतीकुरता और तिलकधारी नेताओं की भीड़ में ये दोनों अलग ही दिखते थे. ये सूटबूट वाले नेता थे जिन में फर्क यह भी था कि आंबेडकर धर्म सहित दूसरे विषयों पर रिसर्च और तर्क ज्यादा करते थे जबकि नेहरू सीधे निष्कर्ष देते थे. इस मिजाज के चलते एक वक्त में उन के भी अर्धतानाशाह हो जाने की पूरी गुंजाइश थी लेकिन वह लोकतांत्रिक और संवैधानिक दबाव ही था जिस ने उन्हें जरूरत से ज्यादा छूट नहीं दी.

अहम लड़ाई सनातनियों से थी (और है)

 

1945 आतेआते यह स्पष्ट हो चुका था कि अंगरेज भारत छोड़ देंगे लेकिन भारत को भगवान भरोसे नहीं छोड़ जाएंगे. इस के लिए भारत को एक संविधान और चुनी गई सरकार के अलावा मानवाधिकारों और कानून सहित वे तमाम गारंटियां लोगों को देनी होंगी जो यूरोपीय देशों में दी जाने लगी थीं. यानी, एक व्यवस्थित लोकतांत्रिक देश बनना होगा. तब शीर्ष भारतीय नेताओं ने अपने वैचारिक और सैद्धांतिक मतभेद त्यागते एकजुट हो कर तय किया कि जैसे भी हो आजादी ले ली जाए. ऐसा हुआ भी जिस में पाकिस्तान बनने की कहानी भी शामिल है जिस का अफसाना इतना भर है कि मुसलमान अलग देश चाहते थे लेकिन उन में हिंदुओं की तरह धार्मिक और जातिगत मतभेद तब नहीं थे.

40 का दशक दुनियाभर में उथलपुथल से भरा था. भारत में यह कुछ ज्यादा थी क्योंकि कोई भी इस बाबत आश्वस्त नहीं था कि आजादी अगर मिली तो वह बहुत ज्यादा दिनों तक कायम रह पाएगी. इस हताशा और निराशा के पीछे छिपी वजहें थीं धर्म और घोषित ब्राह्मण राज, जिस में दलितों (तब पिछड़े भी दलितों यानी शूद्रों में शुमार किए जाते थे), आदिवासियों और सवर्ण औरतों की स्थिति जानवरों व गुलामों सरीखी थी. यह स्थिति लंबे समय तक रही और कमोबेश आज भी है.

इस बारे में ‘सरिता’ इकलौती पत्रिका है जो लगातार 70 सालों से पाठकों को आगाह करती रही है. इसलिए यह धर्म के दुकानदारों और ठेकेदारों की आखों में चुभती भी रही है. सरिता ने हमेशा ही तथ्य और तर्क आधारित लेखन व पत्रकारिता की है. यह आवश्यक नहीं कि उस के सभी पाठक प्रकाशित सभी रचनाओं और संपादकीय ‘सरित प्रवाह’ से हमेशा सहमत हों लेकिन उन की असहमति को भी सरिता ने जगह दी है और उन की आपत्तियों व आलोचनाओं का यथोचित उत्तर हमेशा दिया है और आगे भी देती रहेगी. सरिता का डिजिटल संस्करण भी उस के प्रिंट संस्करण की तरह लोकप्रिय हो कर उत्सुकता और दिलचस्पी से पढ़ा जाता है. इस में रोज सामयिक मुद्दों पर नईनई रचनाएं पाठकों को पढ़ने मिलती हैं.

समाज और परिवारों को अपने संविधान यानी धर्मग्रंथों, उस में भी खासतौर से मनु स्मृति, से हांकने वालों से 40 के दशक में कोई लड़ पाया था तो वे आंबेडकर और नेहरू ही थे, जिन के विचार धर्म के बारे में बहुत स्पष्ट थे. थोड़े से में भी इन के विचारों को देखें तो समझ आता है कि एक दफा अंगरेजों से लड़ कर उन के खिलाफ जनसमर्थन तैयार करना आसान काम था बनिस्बत इन देसी शासकों के.

1936 में लिखी अपनी आत्मकथा ‘टुवर्ड्स फ्रीडम’ के पेज 240-41 पर जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, “भारत और दूसरी जगहों पर जिसे धर्म कहा जाता है कम से कम जिसे संगठित धर्म कहा जाता है उस के तमाशे ने मुझे हमेशा आतंकित किया है और मैं ने बारबार उस की भर्त्सना की है और उन से मुक्ति की बात की है. लगभग हमेशा ही उस ने वहम और प्रतिक्रिया, हठधर्मिता और कट्टरता, अंधश्रद्धा, शोषण और निहित स्वार्थी हितों को बचाए रखने की हिमायत की है.”

आंबेडकर ज्यादा आक्रामक थे

जवाहरलाल नेहरू के मुकाबले भीमराव आंबेडकर हिंदू धर्म में पसरे भेदभाव छुआछूत, शोषण और पितृसत्ता के खिलाफ ज्यादा मुखर थे. ऐसा इसलिए कि शूद्र होने के नाते उन्होंने धार्मिक और जातिगत अत्याचारों को बहुत नजदीक से देखा और भुगता भी था. उन्होंने इस ‘बीमारी’ का निदान ही नहीं, बल्कि उपचार भी किया जो संविधान की शक्ल में सामने आया भी. यह और बात है कि बीमारी कैंसर सरीखी है जो आज भी मुंहबाए खड़ी है.

अपने आखिरी दिनों में 14 अक्तूबर, 1956 को नागपुर में आंबेडकर ने हिंदू धर्म छोड़ कर बौद्ध धर्म अपना लिया था. तब उन के साथ लगभग 5 लाख हिंदू बौद्ध हो गए थे. यह उतनी अहम बात नहीं है जितनी यह कि हिंदू धर्म और हिंदू राष्ट्र के बारे में उन की राय, चिंतन या दर्शन, कुछ भी कह लें, क्या था. बिलाशक वह आज भी प्रासंगिक और मौजूद है जिस की छाप संविधान पर दिखती भी है.

तब उन्होंने 22 प्रतिज्ञाओं की घोषणा की थी जिन के मुताबिक वे और उन के अनुयाई किसी हिंदू देवीदेवता का पूजनपाठ नहीं करेंगे; व्रत, उपवास, श्राद्धकर्म नहीं करेंगे और ब्राह्मण से किसी भी तरह का धार्मिक कर्मकांड नहीं कराएंगे वगैरहवगैरह. इस के पहले 25 दिसंबर, 1927 को उन्होंने महाराष्ट्र के कोलाबा (अब रायगढ़) में ब्राह्मणवादियों के संविधान मनुस्मृति की प्रतियां जलाते समय कहा था कि भारतीय समाज में जो कानून चल रहा है वह मनुस्मृति पर आधारित है. यह एक ब्राह्मण पुरुष सत्तात्मक भेदभाव वाला कानून है, इसे जला कर खत्म किया जाना चाहिए.

उन्होंने यह काम जानबूझ कर बाकायदा वैदिक तौरतरीकों से ही किया था. मनुस्मृति जलाने के लिए एक वेदी बनाई गई थी जिस में चंदन की लकड़ियां डाली गई थीं. वेदी के आसपास 3 बैनर लगे थे जिन पर लिखा था- ‘मनुस्मृतिदहन भूमि’, ‘छुआछूत का नाश हो’ और तीसरे पर लिखा था- ‘ब्राह्मणवाद को दफन करो’.

मनुस्मृति के पेज एकएक कर फाड़े गए थे और उन की आहुतियां ठीक वैसे ही दी गई थीं जैसे यज्ञ और हवन में हवन सामग्री की दी जाती है. कहींकहीं आज भी दलित समुदाय के लोग और संगठन 25 दिसंबर को मनुस्मृति दहन दिवस समारोहपूर्वक मनाते हैं, जिस पर स्वाभाविक तौर पर बवाल मचता है.

इस का फर्क क्या पड़ा, यह और बात है लेकिन तब आंबेडकर ने बड़े दिलचस्प तर्क दिए थे. मसलन, गांधी ने विदेशी वस्त्रों की होली क्यों जलाई थी, न्यूयौर्क में मिस मेयो की मदर इंडिया पुस्तक को क्यों जलाया गया था, साइमन कमीशन का बहिष्कार क्यों किया गया था आदि. मनुस्मृति का दहन उस का विरोध जताने का तरीका है और मनुस्मृति को पूजने वाले जातिव्यवस्था के समर्थक हैं. महार जाति में पैदा हुए भीमराव बचपन से विभिन्न ज्यादतियों के शिकार, साक्षी और भुक्तभोगी भी थे लेकिन उन की भड़ास इस बार इसलिए फूटी थी क्योंकि एक तालाब से दलितों को पानी भरने से दबंगों ने रोका था जो उन दिनों देशभर में आएदिन की बात थी.

 

लेकिन यह भड़ास बहुत तार्किक थी. उन्होंने तब मनुस्मृति जलाने की तुलना फ़्रांस की सामाजिक क्रांति से करते हुए कहा था कि लुईस 16वें ने 24 जनवरी, 1789 को जनप्रतिनिधियों की मीटिंग बुलाई थी जिस में राजा और रानी मारे गए थे, उच्चवर्ग के लोगों को परेशान किया गया था और कुछ मारे भी गए थे. बाकी भाग गए और अमीर लोगों की संपत्ति जब्त कर ली गई थी. इस से फ्रांस में 15 साल का लंबा गृहयुद्ध चला था.

लोगों ने इस क्रांति के महत्त्व को नहीं समझा है. यह क्रांति केवल फ़्रांस के लोगों की खुशहाली की शुरुआत नहीं थी बल्कि इस से पूरे यूरोप और दुनिया में क्रांति आ गई थी. उन्होंने पेट्रोशियंज का उदाहरण भी दिया था कि कैसे धर्म के नाम पर प्लेबियंस को बेवकूफ बनाया गया था.

यह सोचना ही अपनेआप में दुष्कर है कि ब्राह्मणों के दबदबे वाले उस दौर में उन्होंने अंतरजातीय शादियों की जरूरत पर यह कहते जोर दिया था कि जातिप्रथा को इसी से तोड़ा जा सकता है. हालांकि, इस दिशा में कुछ खास नहीं हुआ है. 1955 के हिंदू विवाह कानून में विवाह में जाति की शर्त को समाप्त ही कर दिया गया. दलित सवर्णों में रोटीबेटी के संबंध अपवादस्वरूप ही देखने को मिलते हैं और उन में से भी आधे धार्मिक और जातिगत पूर्वाग्रहों के चलते आधे रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं. लेकिन आज किसी की हिम्मत नहीं कि वह पब्लिक ट्रांसपोर्ट में बराबर वाले की जाति पूछ कर उस से उठने को कह सके. इस का यह मतलब नहीं कि आंबेडकर की कोशिशें और सुझाव अव्यावहारिक थे बल्कि यह है कि ब्राह्मणों और दूसरे कुछ सवर्णों ने वक्त रहते इस खतरे को भांप लिया था और होशियार हो गए थे. उन का खुला विरोध हर स्तर पर तब भी हुआ था और आज भी होता रहता है. जातपांत, छुआछुत, धार्मिक और दीगर भेदभाव अगर पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं तो दरके तो हैं.

 

ऐसा क्या है मनुस्मृति में

असल में सारे फसाद की जड़ भीमराव आंबेडकर मनुस्मृति को ही मानते थे हालांकि दूसरे धर्मग्रंथों से भी वे नाखुश थे. लेकिन वे मनुस्मृति की तरह उन आदेशों और निर्देशों का संकलन नहीं थे जिन्हें कानून का दर्जा दे दिया गया था. जगहजगह शूद्रों को प्रताड़ित करने की बात मनुस्मृति में अधिकारपूर्वक कही गई है और जगहजगह ही ब्राह्मण को महज जाति की बिना पर पूजनीय, भगवान का दूत या प्रतिनिधि बताया गया है.

शिक्षित तो शिक्षित, अशिक्षत दलित भी जानतासमझता है कि ब्राह्मणों के पास एक ऐसी किताब है जिस में यह सब लिखा हुआ है और यह भगवान ने लिखवाया है कि छोटी और नीच जाति में पैदा होना पिछले जन्म के पापों का फल है जिस की सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी. ब्राह्मण की गुलामी ढोना और मुफ्त में सेवा करना इन में से एक है जिस से पाप कटते हैं और अगर ऐसा नहीं किया तो अगले जन्म में कुत्ता, सूअर या किसी दूसरे पशु योनि में जन्म लेना पड़ेगा.

लेकिन सवर्ण महिलाओं को आज तक यह एहसास नहीं कि उन की शूद्रों सरीखी पारिवारिक और सामाजिक हैसियत की वजह भी यही मनुस्मृति है. दूसरे धर्मग्रंथों में तो उस की टुकड़ेटुकड़े नकलभर है जिसे सवर्ण महिलाएं,  बड़ी श्रद्धा और भक्तिभाव से रोज बांचती हैं, पूजापाठ करती हैं और व्रतउपवास भी करती हैं. ये हैरत और तरस खाने वाली बात है. एक बड़ा फर्क उन में और शूद्रों में शुरू से ही यह रहा है कि वे पीरियड्स के दिनों को छोड़ कर अछूत नहीं मानी जातीं और शूद्र उन की तरह धार्मिक आयोजनों की कलश यात्राओं में सिर पर भार ढोती नजर नहीं आतीं. यानी, शूद्र फिर भी बदतर होने के पैमाने पर सवर्ण महिलाओं से कहीं बेहतर स्थिति में हैं. बकौल मनुस्मृति:

  • महिला को किसी भी स्थिति में स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए; उसे बचपन में पिता, युवावस्था में भाई और शादी के बाद पति के संरक्षण में रहना चाहिए.
  • स्त्रियां दूसरे पुरुषों को आकृष्ट करने और संभोग करने के लिए हमेशा आतुर रहती हैं.
  • स्त्रियों में 8 अवगुण हमेशा रहते हैं, इसलिए उन पर भरोसा नहीं करना चाहिए.
  • पति चाहे जैसा भी हो, पत्नी को देवता की तरह उस की पूजा करनी चाहिए.
  • पति चाहे दुराचारी हो, व्यभिचारी हो और सभी गुणों से रहित हो, तब भी स्त्री को हमेशा पति की सेवा देवता की तरह करते रहना चाहिए.
  • स्त्री को संपत्ति रखने का अधिकार नहीं है, वगैरह वगैरह.

बदहाल हैं महिलाएं  

संविधान के संरक्षण में मौजूदा यानी तथाकथित आधुनिक महिला की जिंदगी में कोई खास बदलाव आए नहीं हैं सिवा इस के कि उसे शिक्षा का अधिकार मिल गया है, वह भी इसलिए कि वह नौकरी या व्यवसाय कर पैसा कमा सके और जोजो बदलाव दिखते हैं वे बनावटी हैं. महिला इसी में खुश और संतुष्ट है कि उसे मेकअप करने की आजादी है, गहने पहनने का शौक पूरा हो रहा है और थोड़ीबहुत आजादी घूमनेफिरने की मिल गई है. अगर संविधान न होता तो यह भी न मिलता जैसे पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान में औरतों को नहीं मिल रहा.

हकीकत तो यह है कि आज की भारतीय महिला, जो खुद के आधुनिक होने की गलतफहमी पाल बैठी है, दिनभर कोल्हू के बैल की तरह खटती रहती है. सुबह के नाश्ते से ले कर डिनर तक वह कोई 12-14 घंटे काम करती है जिस के एवज में उसे मिलता है तो, बस, एक अदृश्य तिरस्कार और त्याग का उपदेश जो बचपन से ही उस के दिलोदिमाग में भर दिया जाता है कि तुम्हें ही घर और बाकी सब संभालना है. यह इसलिए हो रहा है कि वह संवैधानिक अधिकारों की जगह पौराणिक उत्तरदायित्व को सीने से लगाए बैठी है.

घर के पुरुष जगह पर बैठेबैठे उस पर हुक्म चलाते रहते हैं कि चाय, नाश्ता, खाना लगाओ और तो और, वे पानी तक अपने हाथ से भर कर नहीं पीते. बिरले ही घर होंगे जहां पुरुष बिस्तर ठीक करते हों. कामकाजी महिलाओं पर तो दोहरा भार है. दफ्तर के साथसाथ उन्हें घर के सारे कामकाज करने पड़ते हैं. लेकिन फिर भी कोई पुरुष एक पत्नी को इसलिए छोड़ नहीं सकता की वह पौराणिक पंडों की कही बातें पूरी नहीं कर रही. यह संविधान की सुरक्षा है.

बात यहीं खत्म नहीं होती. पति और बेटे की सलामती के लिए उसे करवाचौथ और संतान सप्तमी जैसे ढेरों व्रत रखना पड़ते हैं. यानी, मनुस्मृति, कुछ डिस्काउंट और संशोधनों के साथ ही सही, लागू है और महिलाओं ने इसे शूद्रों की तरह भाग्य और नियति मान लिया है. पर उस के लिए धर्म को बुरी तरह बेचा गया है. इस बारे में रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी एक कविता में कहा है जो आज भी प्रासंगिक है-

  • हे प्रभु आप ने स्त्री को अपने भाग्य पर विजय प्राप्त करने का अधिकार क्यों नहीं दिया
  • उसे सिर झुका कर इंतजार क्यों करना पड़ता है, सड़क के किनारे थके हुए धैर्य के साथ इंतजार करते हुए.

बिलाशक संविधान महिलाओं को कई हक देता है लेकिन वे उतने ही अमल में आते दिखाई देते हैं जितने कि शूद्रों के हक, लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि चूंकि संविधान सफल नहीं हो पाया है, इसलिए इसे बदल देना चाहिए. यह मांग अकसर तरहतरह से सनातनी लोग संविधान निर्माण के समय से ही उठाते रहे हैं जो, दरअसल, मनुस्मृति को दोबारा थोपने की साजिश है.

जिन किन्हीं ने संविधान के दिए अधिकारों की अवहेलना देख कर भेदभाव फैलाते और वर्णव्यवस्था की हिमायत करते इन धर्मग्रंथों का विरोध किया उन्हें जान से मारने तक की धमकियां मिलीं. इन में एनसीपी के नेता छगन भुजबल भी शामिल हैं जिन्होंने मनुस्मृति के खिलाफ इतनाभर कहा था कि भारत में हम संविधान के मार्गदर्शन में रहना चाहते हैं न कि मनुस्मृति के तहत. उन्हें धमकी मिली थी कि अगर आप मनुस्मृति का विरोध बंद नहीं करते हैं तो आप का हश्र भी दाभोलकर और पानसरे जैसा होगा.
ऐसी ही धमकी एक दलित पत्रकार और न्यूज वैबसाइट ‘मूक नायक’ की फाउंडर मीना कोटवाल को भी मिली थी जिन्होंने मनुस्मृति जलाते हुए अपना एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया था.

बेहद दिलचस्प बात यह है कि आखिर क्यों छगन भुजबल और मीना कोटवाल जैसों को जान से मारने की धमकी दी जाती है जबकि उन के बराबर ही मनुस्मृति को समारोहपूर्वक जलाने का गुनाह करने वाले भीमराव आंबेडकर को देशभर में घंटेघड़ियाल बजा कर सनातनी न केवल भगवान की तरह पूज रहे हैं बल्कि उन के बनाए संविधान की दुहाई भी दे रहे हैं?

यह दोहरापन, दरअसल, बुद्ध को भी विष्णु अवतार घोषित कर देने वाले सनातनियों की एक नपीतुली साजिश है कि जितना ज्यादा हो सके, दलितों को भी पूजापाठी बना दो चाहे वे आंबेडकर की ही पूजा क्यों न करें जिस से संविधान में लिखी बातें उसी किताब में कैद हो कर रह जाएं. पहले उन्हें प्रताड़ित कर गुलाम बनाया जाता था, अब गले लगाने का और पूजापाठ का हक दे कर आखिरकर पाखंड पुराना ही रचा जा रहा है. नहीं तो आरएसएस और हिंदू महासभा सहित तमाम सनातनियों ने संविधान की भ्रूणहत्या करने की कोशिशों में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी. इस में सवर्ण तबका तब की तरह आज भी उन के साथ है और सवर्ण औरतें इस की भारी कीमत भी अदा कर रही हैं.

 

संविधान ने दी महिलाओं को मजबूती

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14 की व्याख्या करते हुए कहा कि औरतों को सेना में परमानैंट कमीशन का अधिकार है. और्केस्ट्रा बैंड में कितनी औरतें नाचेंगी जैसे मनमाने सरकारी आदेश को संविधान के तहत कूड़े में फेंक दिया गया. रेप के मामलों में टू फिंगर टैस्ट संविधान के खिलाफ माना गया क्योंकि यह बलात्कार की पीडि़ता की डिगनिटी के खिलाफ है और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है.

संविधान के अनुच्छेद 14 ने ही अविवाहित युवतियों को गर्भपात कराने का कानूनी हक दिया वरना उन्हें अपनी जिंदगी क्रूर दाइयों के हवाले करनी पड़ती थी. अनुच्छेद 21 ने ही एक औरत को अपनी मरजी से ऊंची या नीची जाति वाले पुरुष से विवाह का हक दिया. इसी अनुच्छेद ने पत्नी पर पति के मालिक होने के हक से मुक्ति दिलाई जो भारतीय दंड संहिता की धारा 497 में पत्नी के प्रेमी को सजा दिलाने का हक रखता था.

संविधान ने ही औरतों को पति के बराबर एक बच्चे के अभिभावक बनने का हक दिलाया है. संविधान के अनुच्छेदों 15 व 21 के कारण कार्यस्थल पर औरतों को छेड़छाड़ से मुक्ति के प्रावधानों का संरक्षण मिला है. संविधान ने ही एक एयरहोस्टेस को शादी के बाद भी नौकरी पर बने रहने का हक दिया जबकि तब सरकारी कंपनी एयर इंडिया का नियम था कि विवाहित युवतियां यह नौकरी नहीं कर सकतीं.

क्यों जारी है विरोध

संविधान पर मौजूदा चुनावीप्रचार और बहस सहित आरोपप्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है जिन का निष्कर्ष यही निकलता है कि धार्मिक शासन की मंशा रखने वाले ही इस का विरोध, बदलाव या फिर इसे नष्ट कर सकते हैं. कांग्रेस की मंशा इस में कुछ बदलावों की हमेशा से ही रही है जो उस ने कुछ देश के और कुछ अपनी मनमानी के लिए किए. यहां यह याद रखना बेहद जरूरी है कि संविधान बनाने का हक उसे देश की जनता ने ही दिया था. संविधान सभा के लिए जो सभा निर्वाचित की गई थी उस में उसे तीनचौथाई बहुमत मिला था, इसलिए कांग्रेस संविधान नष्ट करेगी, यह सोचना उतना ही बेमानी है जितना यह कि आरएसएस या भाजपा कभी मनुस्मृति नष्ट करेंगे.

धर्म समर्थक तो संविधान चाहते ही नहीं थे क्योंकि उन के सिर पर तो अनंतकाल से मनुस्मृति रखी हुई थी और आज भी है लेकिन उतने खुलेतौर पर रखने की हिम्मत भाजपाई नहीं जुटा पाए जितनी कि ‘इंडिया’ के दलों ने संविधान को सीने से लगा कर चुनावप्रचार किया. संविधान के बारे में हिंदूवादियों की राय तो सावरकर ने वक्त रहते ही प्रगट कर दी थी जिस का उल्लेख प्रभात प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘वुमेन इन मनुस्मृति’ सावरकर समग्र के वाल्यूम-4 के पृष्ठ 416 पर इन शब्दों में मिलता है-

“भारत के संविधान के बारे में सब से बुरी बात तो यह है कि इस में कुछ भी भारतीय नहीं है…वेदों के बाद मनुस्मृति हमारे हिंदू राष्ट्र के लिए सर्वाधिक पूजनीय है जो प्राचीनकाल से ही हमारे रीतिरिवाज, संस्कृति, विचार व कर्म का आधार बनी हुई है. इस ग्रंथ ने सदियों से हमारी आध्यात्मिक व पारलौकिक उन्नति का पथ प्रशस्त किया है. यहां तक कि आज भी करोड़ों भारतीय अपने जीवन और व्यवहार में मनुस्मृति की मान्यताओं का अनुपालन कर रहे हैं. मनुस्मृति हिंदू लौ है.”

जब तत्कालीन हिंदू ह्रदय सम्राट, हिंदूमहासभा के मुखिया ने बेबाकी से अपनी राय प्रदर्शित कर दी तो भला आरएसएस क्यों खामोश रहता. उस ने 30 नवंबर, 1949 को अंगरेजी के अपने मुखपत्र आर्गेनाइजर की अपनी संपादकीय में लिखा-

“लेकिन हमारे संविधान में प्राचीन भारत के विशिष्ट संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है. मनु ने जो कानून बनाया वह यूनानी और फारसी दार्शनिकों से बहुत पहले बनाया. मनुस्मृति में स्पष्टतया वह कानून व्यवस्था आज की तारीख में दुनियाभर के लिए विशेष आदर का विषय है क्योंकि उस में स्वाभाविक आज्ञापालन और निश्चितता बोध के गोपनीय सूत्र हैं. लेकिन हमारे संविधान विशेषज्ञों का ध्यान उधर नहीं गया.”

इस पर किसी ने गौर नहीं किया, उलटे, दुनियाभर में आरएसएस की आलोचना उस की संकीर्णता के बाबत होने लगी. अंगरेजी लेखक द्वय पी बाचेटा और शहनाज जे रोउसे ने अपनी किताब ‘जैंडर इन द हिंदू नैशन: आरएसएस वुमेन एज आइडियोलौग्स’ में लिखा भी है कि- “आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल लिखा जिस का मकसद हिंदू पर्सनल लौ में सुधार करना और महिलाओं को पैतृक संपत्ति में अधिकार व अन्य अधिकारों की गारंटी करना था. आरएसएस हिंदू कोड विरोधी बिल का हिस्सा था. गोलवलकर ने घोषणा की कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिलने से पुरुषों के लिए भारी मनोवैज्ञानिक संकट खड़ा हो जाएगा, जो मानसिक रोग व अवसाद का कारण बनेगा.”

धर्म वालों की बौखलाहट

सहज समझा जा सकता है कि संविधान और फिर हिंदू कोड बिल से सनातनी किस हद तक बौखला कर अनर्गल अनापशनाप बातें करने लगे थे जबकि संविधान उन से कुछ छीन नहीं रहा था सिवा इस के कि अब ब्राह्मण राज और मनुस्मृति का कोई वैधानिक मूल्य या महत्त्व नहीं रह गया है. अब जो भी होगा, संविधान और कानून के मुताबिक होगा और सभी इसे मानने के लिए बाध्य होंगे. तब वाराणसी के एक संत राम राज पार्टी के मुखिया करपात्री महाराज ने तो साफ कह दिया था कि मैं एक अछूत का लिखा संविधान नहीं मानूंगा. इस संत ने हिंदू कोड बिल के विरोध में आसमान सिर पर उठा लिया था.

11 दिसंबर, 1949 को भी आरएसएस ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक रैली के जरिए हिंदू कोड बिल का विरोध किया था. एक वक्ता ने तो इसे हिंदुओं के लिए एटम बम तक करार दिया था. इस दिन हिंदू कोड बिल मुर्दाबाद के नारे भी संघियों ने लगाए थे और भीमराव आंबेडकर के पुतले भी जलाए थे. आज वही आरएसएस और उस की राजनीतिक संतान भाजपा अगर संविधान को कांग्रेस से बचाने पर तुल ही गए हैं तो इस से बड़ा मजाक और क्या होगा जबकि हर कभी संविधान को ले कर उन की कसक, बेचैनी, व्यथा, जिसे बकौल गोलवलकर, अवसाद कहना ज्यादा सटीक रहेगा, तरहतरह से सामने आती रहती है जिसे नफरत भी कहा जा सकता है. कुछ चर्चित उदाहरण देखें-

3 अप्रैल, 2016 को उत्तर प्रदेश भाजपा महिला मोरचा की मुखिया मधु मिश्रा ने अलीगढ़ में ब्राह्मण महासभा के होली मिलन समारोह में दलितों की तरफ इशारा करते कहा था, “आज तुम्हारे सिर पर बैठ कर संविधान के सहारे जो राज कर रहे हैं, याद करो वो कभी तुम्हारे जूते साफ करते थे, आज तुम्हारे हुजूर हो गए हैं.”
मधु मिश्रा ने इस सभा में और भी काफीकुछ बकबास की थी जिस से भाजपा का संघी चेहरा उजागर हुआ था. उसे ढकने के लिए भाजपा ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर चेहरे पर घूंघट डालने की कोशिश की थी.

इन सनातनियों के मन में कितनी नफरत दलित, आदिवासी और मुसलमानों के प्रति भरी है, अगर इस का संकलन किया जाए तो 19वां पुराण तैयार हो जाएगा. लेकिन मोदी राज के दौरान कुछ न भूलने वाले और नाकाबिले माफी अहम वाकेयों का जिक्र जरूरी है जो यह साबित करते हैं कि हम 70-75 सालों में शिक्षित तो हो गए लेकिन सभ्य नहीं हो पाए. हम में से कुछ इंसानियत के सही और लोकतांत्रिक माने क्यों नहीं स्वीकार पा रहे? क्यों वे कुछ यानी भगवा गैंग के छोटेबड़े मैंबर दलितों और मुसलमानों से नफरत करने और उसे जताने का हक कानूनी तौर पर चाहते हैं? क्यों ये लोग संवैधानिक आरक्षण खत्म कर देना चाहते हैं? और इस बाबत अब वे दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को यह कहते डराने व भड़काने लगे हैं कि तुम्हारे हिस्से का आरक्षण छीन कर मुसलमानों को दे दिया जाएगा. दरअसल, इन लोगों को नफरत समानता और बराबरी से है जो संविधान ने दी है, सो, ये लोग, बकौल गोलवलकर, मानसिक रोगियों जैसा बरताव करने से खुद को आज भी रोक नहीं पाते.

तभी तो फरीदाबाद में 2 दलित बच्चों, 11 महीने की दिव्या और ढाई साल के वैभव को जला दिए जाने पर उन्हें न बचा पाने की अपनी सरकार की नाकामी ढकते केंद्रीय मंत्री वी के सिंह ने 22 अक्तूबर, 2015 को कहा था कि कोई अगर कुत्तों पर पत्थर फेंके तो उस के लिए क्या सरकार जिम्मेदार है. यानी, उन के मुताबिक मनुस्मृति में गलत नहीं लिखा कि दलित पशुतुल्य हैं और संविधान में गलत लिखा है कि सब बराबर हैं. साल 2002 में झझ्झर में जब गौकशी के आरोप में 5 दलित युवकों को विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने मार डाला था तब आचार्य गिरिराज किशोर ने कहा था, हमारे शास्त्रों के हिसाब से गौ का जीवन बहुमूल्य है. संविधान ऐसे दलितों का रक्षक है.

संविधान पर ही पुनर्विचार क्यों

हिंदूवादियों की मंशा अगर संविधान बदलने की न होती तो वे इस पर पुनर्विचार की बात न करते. इस बार का बवाल तब मचना शुरू हुआ था जब भाजपा सांसदों अनंत हेगड़े और रंजन गोगोई ने आम चुनाव में लोकसभा की 400 सीटें जीत कर संविधान में बदलाव किए जाने की बात कही थी. इस के पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष विवेक देवराय ने 15 अगस्त, 2023 को कहा था कि अब धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, समानता, न्याय और बंधुत्व जैसे शब्दों का कोई मतलब नहीं है, संविधान औपनिवेशिक विरासत है इसलिए इसे हटा कर नया संविधान लिखा जाना चाहिए. यह बेहद खतरनाक मंशा है जिस का उम्मीद के मुताबिक राजनीतिक विरोध हुआ.

इस के पहले सितंबर 2017 में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी हैदराबाद में कहा था कि संविधान के बहुत सारे हिस्से विदेशी सोच पर आधारित हैं और जरूरत है कि आजादी के 70 साल बाद इस पर गौर किया जाए. इस के पहले 24 जनवरी, 2016 को तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भी अहमदाबाद में कहा था कि अब आरक्षण पर पुनर्विचार होना चाहिए. उस वक्त भी विपक्षी दल उन सहित पूरी भगवा गैंग पर यह कहते टूट पड़े थे कि ये लोग अपने हिडन एजेंडे को थोपने की कोशिश कर रहे हैं. सीपीआई एम के महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा था, ‘आरएसएस चाहता है कि हमारा भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य न रह कर, उन के उद्देश्य के मुताबिक, एक हिंदू राष्ट्र के रूप में बदल जाए.’

जबकि जरूरत इस बात की है कि भगवा गैंग मनुस्मृति जैसे भेदभाव फैलाते धर्मग्रंथों पर पुनर्विचार करे कि दरअसल हिंदुओं को वर्ण, जाति और गोत्र में बांटा तो इन्होंने ही है, संविधान ने तो उन्हें, खासतौर से दलितों, आदिवासियों, औरतों और किसानों को, उन के वाजिब हक दिए हैं (देखें बौक्स) जो एक लोकतंत्र की बुनियाद और खूबी सहित खूबसूरती भी हैं. इसे नष्ट करना या मनमरजी से बदलना अब आसान काम नहीं रह गया है क्योंकि यह संविधान अब आम आदमी की शक्ति है जो धर्मग्रंथों की तरह भ्रमित नहीं करती, भाग्य और चमत्कारों का झांसा दे कर ठगी नहीं करती. आम आदमी की ही भाषा में दो टूक कहा जाए तो इस से जो टकराएगा वह चूरचूर हो जाएगा.

लेकिन ऐसा होगा नहीं

ऐसा लगता है कि संविधान बनने से ले कर भगवा गैंग उस में बदलाव की बात कर वक्त ही काट रहा है जिस से उसे कहने को एक काम और ब्राह्मणों को दानदक्षिणा मिलती रहे. भगवा गैंग का मकसद किसी से छिपा नहीं है कि उस का काम सिर्फ और सिर्फ हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना है, जो बिना भारी बहुमत हासिल करने के बाद भी दुष्कर काम है. लेकिन इस के बाद भी भीमराव आंबेडकर की ही हिंदू राष्ट्र को ले कर दी गई इस चेतावनी को याद रखा जाना चाहिए कि हिंदू राष्ट्र अगर बना तो वह वंचितों यानी दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और सवर्णों की महिलाओं के लिए बड़ी आपदा साबित होगा. हिंदूवादी अब अंगरेजों से भी ज्यादा क्रूर साबित होंगे. वे अपने धर्म, ईश्वर और पाखंडों के जरिए इन का शोषण करेंगे.

उन की एक और यह नसीहत भी याद रखनी जरूरी है कि यदि हम संविधान को सुरक्षित रखना चाहते हैं, जिस में जनता की जनता के लिए और जनता द्वारा बनाई गई सरकार का सिद्धांत प्रतिष्ठापित किया गया है, तो हमें यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि हम हमारे रास्ते में खड़ी बुराइयों, जिन के कारण लोग जनता द्वारा बनाई सरकार के बजाय जनता के लिए बनी सरकार को प्राथमिकता देते हैं, की पहचान करने और उन्हें मिटाने में ढिलाई नहीं करेंगे.

 

 संविधान ने दिया दलितों को सम्मान

हम मंदिरों में किसी को भी जाने की सलाह नहीं देंगे लेकिन सार्वजनिक स्थान होने के नाते किसी को केवल हिंदू मंदिर में न जाने दिया जाए, यह पौराणिक भेदभाव सदियों चला आ रहा है जिसे संविधान के अनुच्छेद 25 (2) ने समाप्त कर दिया. संविधान की बदौलत दलितों को 1955 के अनटचेबिलिटी कानून से अछूत होने के बिल्ले से मुक्ति मिली.

अनुसूचित जातियों के लिए 1989 का कानून भी संविधान के संरक्षण के कारण बना जिस में पब्लिक प्रौपर्टी पर किसी को निम्नजाति में जन्म लेने के कारण रोका नहीं जा सकता था. संविधान ने तो दलित, अछूतों के मंदिरों में पुजारी बनने के रास्ते भी खोल डाले हालांकि पुजारी बन कर वे दलितों या सवर्णों का कोई भला नहीं करने वाले थे.
यह न भूलें कि अनुसूचित जातियों व जनजातियों को आरक्षण संविधान ने दिलाया जो सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में आज भी लागू है. आरक्षण विरोधी इसे हटाने के लिए ही संविधान के बदलने की बात कर रहें. सदियों से समाज द्वारा कुचले लोग मुट्ठीभर नौकरियों व स्कूलों में सीटों पर कुछ को मंजूर नहीं हैं.
संविधान दलितों, पिछड़ों की एक बड़ी ताकत है जिसे कमजोर करने की कोशिश पिछले सालों में कौंट्रैक्ट नौकरियां या लेटरल अपौयंटमैंट के जरिए कम करने की कोशिश भारतीय जनता पार्टी सरकार द्वारा की जा रही है.

यह दिया था संविधान ने

दरअसल, संविधान ने वह सबकुछ दे दिया था जो धर्म ने छीन रखा था. दलितों और औरतों को बराबरी का हक न तो तब मनुवादियों को हजम हो रहा था, न आज हो रहा है. इस पर राजनीति और सरकारी नौकरियों में जातिगत आरक्षण की व्यवस्था से तो उन के कलेजे पर सांप लोटने लगे थे.

संविधान के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 12 से 35) ही धर्म का दबदबा तोड़ने के लिए काफी थे, जिन में समता, समानता, संस्कृति और शोषण के विरुद्ध अधिकारों ने ही मनुस्मृति के श्लोकों को ध्वस्त कर दिया था. दलितों को आम नागरिक की तरह अधिकारों का दिया जाना भी सवर्णों को रास नहीं आया था.

अनुच्छेद (15) ने तो और भी कहर ढाया था कि जो यह निर्देश देता है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर या इन में से किसी एक आधार पर राज्य भेदभाव नहीं करेगा. सार्वजनिक स्थलों पर सुविधाओं के सभी के लिए उपयोग की बात भी इसी में वर्णित है. अनुच्छेद 15 (4) में पहले संशोधन के तहत जातिगत आरक्षण दिया गया जिसे ले कर हर कभी विवादफसाद होते रहते हैं. सवर्ण हर कभी योग्यता का राग आलापा करते हैं जो महज जाति की बिना पर नौकरियों पर अपना हक समझते थे.
दलितों के बाद सब से शोषित तबके महिलाओं को मतदान का अधिकार (अनुच्छेद 326) के तहत मिला तो उन में एक अलग आत्मविश्वास पैदा हुआ जो उन्हें उन के अस्तित्व का आभास कराता हुआ था कि हम भी कुछ हैं. इस की खास बात यह थी कि यह अधिकार अमेरिकी महिलाओं को 133 साल बाद मिला था, तो भारत में संविधान बनते ही मिल गया था.

पुरुषों के समान अधिकार मिलना भी महिलाओं के लिए एक सरप्राइज गिफ्ट था लेकिन सनातनियों ने जम कर बवाल उस वक्त काटा जब हिंदू कोड बिल वजूद में आया- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956. इस के तहत हिंदू विवाह अधिनयम, हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षता अधिनयम, और हिंदू दत्तक भरणपोषण अधिनियम से महिलाओं को उन के वास्तविक हक मिले जिन में अंतरजातीय विवाह को कानूनी मान्यता, द्वि विवाह को अपराध घोषित करना, महिलाओं को भी तलाक का अधिकार सहित दूसरे कई अधिकार मिले तो धर्म के ठेकेदार और हिंदूवादी सड़कों पर आ कर कहने व चिल्लाने लगे थे कि इस से हमारा धर्म भृष्ट हो रहा है, संस्कृति नष्ट हो रही है. इसलिए, इन्हें वापस लिया जाए.

यह तिलमिलाहट बेवजह नहीं थी क्योंकि यह बिल, जो टुकड़ोंटुकड़ों में पारित हुआ, पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर निर्णायक प्रहार था जिस ने संपन्न परिवारों की महिलाओं को हर स्तर पर बराबरी का दर्जा देते उन के पैरों में जकड़ी धार्मिक बेड़ियों से उन्हें आजाद कराया. आज वही संपन्न महिलाएं धर्म की रक्षक भी बनी बैठी हैं क्योंकि उन्हें बताया ही नहीं जाता कि जो संविधान ने दिया है वह किस तरह का हीरा है.

बिलाशक इस के, उम्मीद के मुताबिक, नतीजे नहीं निकले हैं तो इस के लिए भी धर्म की साजिश जिम्मेदार है जिस की समाज पर पकड़ इतनी मजबूत है कि विधवा विवाह अभी भी अपवादस्वरूप ही होते हैं. उन की तरह तलाकशुदा महिलाओं को भी मनहूस करार दे दिया जाता है. महिलाओं की दूसरी शादी आसानी से नहीं होती और परित्यक्ताओं को शक की निगाह से देखा जाता है. लेकिन कुछ नहीं हुआ है, यह कहना भी निराशाजनक बात होगी. जो हुआ है उस में प्रमुख यह है कि अब पुरुष पहले की तरह एक पत्नी के रहते दूसरी शादी नहीं कर सकते, नहीं तो सवर्ण महिला पहले इसी दहशत में पति को परमेश्वर का दर्जा देते पूजती रहती थी कि वह न जाने कब ढोलधमाके के साथ दूसरी, तीसरी, चौथी या पांचवीं ले आए और उसे घर के किसी कोने की कोठरी में धकेल दे या फिर बाहर ही निकाल दे क्योंकि उसे रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था. उलटे, इस बाबत प्रोत्साहन देने के लिए एक पूरी सेना साथ देती थी.

लेकिन अब ऐसा नहीं है. संविधान सभी को न्याय की गारंटी देता है. कोई भी पीड़ित थाने और अदालत जा कर न्याय हासिल कर सकता है. मनुस्मृति की दुहाई देने वाले दुखी इसीलिए भी रहते हैं कि अब गरीब, दलित और महिलाओं की हिफाजत संवैधानिक कानूनों के तहत होती है. पहले यह काम राजा, जमींदार, जाति का मुखिया या पुजारी किया करते थे. यही ज्यूडीशियरी मनमाने फैसले धर्मग्रंथों में वर्णित कानूनों के तहत जाति और जैंडर के आधार पर देती थी.

भीमराव आंबेडकर का मानना था कि धर्म, दरअसल, आदेशों और निर्देशों का एक ऐसा संकलन है जिस में कमजोरों और औरतों को न्याय के नाम पर सताया जाता है, उन का शोषण किया जाता है. खूबी तो यह भी है कि संविधान दोषी को भी अपना पक्ष रखने का अधिकार देता है. पौराणिक काल की न्यायव्यवस्था में अपने पक्ष रखने और साक्ष्यों को कोई जगह नहीं थी राजा, मंत्री और ऋषिमुनि जो फैसला दे देते थे उसे मानना एक बाध्यता थी. यानी, वही निचली अदालत से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक थे जिन में कैदियों के भी कोई अधिकार नहीं थे लेकिन अब हैं. भले ही कुछ कानून अंगरेजों ने बनाए लेकिन सभी के लिए भेदभाव रहित न्याय संविधान ने सुनिश्चित किया.

संविधान बनाने वाले कितने दूरदर्शी थे, इस का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उन्होंने किसानों के अधिकारों का भी पूरापूरा खयाल रखा. आजादी के वक्त 80 फीसदी लोग गांवों में बसते थे और इन में से भी कोई 70 फीसदी मजदूर थे. जमीनों पर कब्जा दबंगों का हुआ करता था. शोषण और अत्याचार के हाल तो ये थे कि जमींदार छोटी जाति वालों से बैल की तरह काम लेते थे और उन्हें जिंदा रहने लायक ही खाना देते थे. 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘मदर इंडिया’ की तरह गांवगांव में सूदखोर लाला सुखीलाल हुआ करते थे जो किसानों के अशिक्षित होने का नाजायज फायदा ब्याज पर ब्याज की शक्ल में उठाते थे ब्रिटिश हुकूमत के पहले. गरीब किसानों की जमीन राजा और दबंग जब चाहे, जैसे चाहे हड़प लेते थे.

संविधान के अनुच्छेद 300 (ए) के तहत सरकार भी आसानी से किसानों की जमीन नहीं ले सकती. हालांकि सब से पहले 1894 में ब्रिटिश सरकार ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 बनाया था लेकिन राजशाही और जमींदारी के दौर में यह बहुत ज्यादा प्रभावी नहीं हो पाया था. नए प्रावधानों के तहत भूमि अधिग्रहण का पहला स्टैप किसान को नोटिस देना है और जमीन की जरूरत है ही, इसे भी सरकार को बताना पड़ेगा और कीमत भी बाजारभाव के मुताबिक तय होगी. नोटिस हर जगह जरूरी है. सरकार नागरिक से कभी भी, कुछ भी नहीं छीन सकती. यह और बात है कि क़ानूनी खामी के चलते बुलडोजर कल्चर भी देश में पनप रहा है जिस के अधिकतर शिकार वही लोग होते हैं जो मनुवादियों को हमेशा से खटकते रहे हैं.

इन सब से भी ज्यादा क्रांति और बदलाव शिक्षा के क्षेत्र में संविधान के जरिए आए जिस के चलते अब हर कोई पढ़ रहा है वरना तो मनुस्मृति जैसे धर्मग्रंथ तो पढ़ने का हक सिर्फ ब्राह्मणों को ही देते थे. कोई और अगर पढ़ता था तो वह अपराधी माना जाता था और राजा को उसे मौत की सजा तक देने का हक धर्म ने दे रखा था. भीमराव आंबेडकर दलितों और महिलाओं के शोषण और पिछड़ेपन की वजह उन्हें न पढ़ने देने की साजिश को ही मानते थे, इसलिए उन्होंने कहा था कि शिक्षा शेरनी का दूध है, इसे जो पिएगा वो दहाड़ेगा.

संविधान का अनुच्छेद 21 (ए) सभी को शिक्षा की गारंटी देता है. 46वें संशोधन के तहत साल 2002 में 6 से ले कर 14 साल तक के सभी बच्चों को शिक्षा मूल अधिकार के तौर पर दी जाने लगी है, वह भी निशुल्क. इस से जाहिर है, हाहाकारी बदलाव आया है बावजूद इस हकीकत के कि अभी भी सौ फीसदी बच्चे नहीं पढ़ पा रहे हैं. दलितों के पढ़ने को ले कर सवर्ण तबका हमेशा ही एतराज जताता रहा है जो संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के आगे कसमसा कर रह जाता है.

स्वास्थ सेवाएं भी सभी के लिए उपलब्ध हैं वरना तो एक दौर था जब वैद्य सिर्फ सवर्णों का ही इलाज करते थे क्योंकि अछूत शूद्र को छूने से उन्हें पाप लगता था. अब अस्पतालों की सहज उपलब्धता से सभी को इलाज मिल रहा है. हालत यह है कि हजारों की तादाद में दलित डाक्टर ब्राह्मणों को जन्दगी दे रहे हैं. इस से किसी का धर्म भृष्ट नहीं हो रहा.

ऐसी कई बातों से बदलाव भारतीय समाज में हो रहे हैं तो सिर्फ संविधान की वजह से, जिस पर आएदिन बखेड़ा खड़ा किया जाने लगा है.

युवा वोटर सोशल मीडिया पर आगे, वोटिंग में पीछे

2024 लोकसभा चुनाव की शुrउआत में युवा वोटरों की बहुत चर्चा थी. इस की वजह सोशल मीडिया पर युवाओं का दिख रहा उत्साह था. लोगों को लग रहा था कि बेरोजगारी, परीक्षा पेपर का आउट होना, महंगाई जैसे तमाम ऐसे मुददे हैं जिन पर युवा वोट कर सकते थे. लेकिन सब से कम उम्र के मतदाता यानी 18 साल से ले कर 25 साल तक के युवा अपना वोट डालने के लिए अनिच्छुक दिखे.

2024 में देशभर के कुल युवाओं में से 40 फीसदी से कम ने मतदान के लिए रजिस्ट्रेशन कराया. बिहार, दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में रजिस्ट्रेशन की दर और भी कम थी. चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि इस आयुवर्ग में अनुमानित 4.9 करोड़ नए वोटर्स थे जिन में से केवल 38 फीसदी ने ही अपने वोटर कार्ड बनवाए.
जिन की चुनाव में हिस्सेदारी है, उन से ही सब से ज्यादा उम्मीद थी मगर उन की ही रुचि चुनावी प्रक्रिया में सब से कम दिखी. जबकि यह वर्ग स्कूलकालेजों में मतदान करने के पक्ष में प्रचार करते दिखा. कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और युवा कलाकारों को चुनाव आयोग ने मतदान करने के प्रचार में लगाया. चुनाव आयोग का सोचना था कि युवाओं को अपने वर्ग के लोगों का प्रचार पंसद आएगा. वह अपने वर्ग के लोगों को वोट देने को निकलेगा.

चुनाव के 7 चरणों में कहीं ऐसी बड़ी लाइन या भीड़ नहीं दिखी जिस में युवा वोटर दिखे हों. जबकि, सोशल मीडिया पर चुनावी कमैंट में यह वर्ग आगे था. इस की कुछ वजहें थीं. सोशल मीडिया पर कमैंट करने में समय कम लगता है. अधिकतर युवा कट पेस्ट करते हैं. मतदान देने के लिए घर से बाहर जा कर लाइन लगने के बाद वोट डालना था. आलसी स्वभाव के कारण वे वोट डालने नहीं गए. सोशल मीडिया ने ऐसे युवाओं को आलसी बना दिया है. वे लिखनेपढ़ने में भी अपने विचार नहीं दे पाते.

युवाओं में बढ़ती विचारों की शून्यता

सोशल मीडिया पर इन की पोस्ट कम होती है. यह दूसरे की पोस्ट को ही लाइक, शेयर, कमैंट करते हैं. जिन अखबारों या पत्रिकाओं को ये सब्सक्राइब भी करते हैं उन के भी पूरे लेख और समाचार को नहीं पढ़ते हैं ये. इन को खबर या लेख के जितने हिस्से को पढ़ने की जरूरत होती है उस को ही पढ़ते हैं. सामान्यतौर पर जैसे पहले अखबारों और पत्रिकाओं को युवा पढ़ते थे, उन के नोट्स बनाते थे, अपने विचारों को लेख, खबर या संपादक के नाम पत्र में लिखते थे, अब वह नहीं दिख रहा है.

आज के युवा सामान्य ज्ञान की छोटीछोटी चीजों के लिए गूगल पर निर्भर होते हैं. इन का सामान्य ज्ञान बेहद कमजोर होता जा रहा है. यह सोशल मीडिया पर आरक्षण और संविधान के बारे में जितना बोलते दिखे वह व्हाट्सऐप पर आए मैसेज से होता है. अगर वह गलत है तो उस को ये सही नहीं कर पाते. पहले युवा को याद रहता था कि कितने संविधान संशोधन हुए, आरक्षण के पीछे की वजहें क्या हैं आदि. ये आरक्षण की पैरवी केवल सरकारी नौकरी के हिसाब से करते हैं. धर्म किस तरह से जीवन को प्रभावित करता है, इन को नहीं पता. युवाओं के सामने विचारों की शून्यता आती जा रही है. इस कारण ये चुनाव और मतदान के महत्त्व को समझ नहीं पा रहे हैं.

सोच का अभाव

चुनाव में युवाओं की सहभागिता बढ़ाने के लिए राजनीतिक दल को भी कदम उठाने होंगे. पहले छात्रसंघ के चुनाव होते थे, जिस की वजह से कालेज के दिनों से ही युवा चुनाव और मतदान के महत्त्व को समझ लेता था. आज छात्रसंघ के चुनाव सीमित होने लगे हैं. युवाओं को यह लगता है कि राजनीति करने की उम्र 45-50 साल होती है. अभी उन के दिन मौजमस्ती करने के हैं. राजनीतिक दलों में युवा इकाई अभी भी है पर वह सक्रिय नहीं है. ऐसे में युवा की राजनीति में रुचि नहीं रह गई. राजनीति उन की सोच का हिस्सा नहीं रह गई.

जिस तरह से राजनीतिक दलों में परिवारवाद चल रहा है उस में युवा को लगता है कि उन के सक्रिय होने से क्या होना है. टिकट तो नेताजी के बेटे को ही मिलना है. अगर युवाओं को टिकट मिलते तो युवा वोटर के मन में भी उत्साह आता. आज वह सोचता है कि पुराने नेताओं को वोट दे कर क्या मिलेगा वे करेंगे तो अपने ही मन की.

राजनीतिक व्यवस्था से उदासीनता

युवाओं में मतदान के प्रति उदासीनता की भावना इसलिए भी आ रही है क्योंकि प्रमुख दलों का नेतृत्व वरिष्ठ नेता कर रहे हैं. पर्याप्त युवा नेता या उम्मीदवार नहीं होते जिन से युवा जुड़ सकें. अब राजनीतिक दलों को सोचना है कि वे युवाओं को राजनीतिक और चुनावी प्रणाली से किस तरह जोड़ें. पिछले कुछ चुनावों में राजनीतिक दलों ने नौकरी और रोजगार को ले कर जो वादे किए थे वे पूरे नहीं हुए, इस से भी इस चुनाव में युवा वोटर मतदान करने नहीं गया. उसे लगा कि वोट देने के नाम पर उस को ठगा जाता है.
चुनाव में युवा के मुद्दे नहीं होते, न उन की शादी की बात होती है और न ही युवाओं में बढ़ते डिप्रैशन की बात होती है. जाति और धर्म के नाम पर उन को बांटने का काम होता है. युवाओं में जाति और धर्म की भावना कम होती है. कालेज में उन के दोस्त हर जाति और धर्म से होते हैं, जबकि चुनाव में जाति और धर्म के नाम पर बांटा जाता है. यह भी एक बड़ा कारण है युवाओं के मोहभंग का. सोशल मीडिया पर भले ही युवा राजनीति में रुचि दिखा रहा हो पर वोट डालने का नंबर आया तो वह पीछे हो गया.

युवाओं को वोटिंग प्रणाली से जोड़ने के लिए आमूलचूल बदलाव करने होंगे. केवल प्रचार करने से काम नहीं चलने वाला. देश में युवा वर्ग की संख्या अधिक है. जब तक उस का जुड़ाव नहीं होगा, चुनाव का असली मकसद पूरी नहीं होगा. सरकार बनाने और हटाने दोनों प्रक्रिया में युवाओं को अपनी जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी और अपने महत्त्व को समझना होगा.

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