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Tara Sutaria Hot Buzz : सोशल मीडिया पर हौट बज बनीं तारा सुतारिया

Tara Sutaria Hot Buzz : तारा सुतारिया सोशल मीडिया पर काफी चर्चित सैलिब्रिटीज में से एक हैं. हाल में मुंबई कौन्सर्ट में ए पी ढिल्लों के साथ गले मिलने और फिर टौक्सिक के पोस्टर में एआई के इस्तेमाल वाले दावे के मामले में वे चर्चा में आईं. अब क्या वे अदाकारी में भी चर्चा में आएंगी?

‘टौक्सिक’ से तारा सुतारिया का फर्स्ट लुक पोस्टर रिलीज हुआ. रिलीज होते ही यह पोस्टर इंटरनैट पर बुरी तरह ट्रोल होने लगा. सोशल मीडिया यूजर्स इसे एआई जेनरेटेड बताने लगे. उन का कहना था कि पोस्टर में जिस तरह तारा ने रिवौल्वर पकड़ी हुई है, उन की उंगलियां नैचुरल नहीं लग रहीं. ऐसा लग रहा है कि इस पोस्टर में रिवौल्वर बाद में जोड़ा गया और एडिटिंग क्लीन नहीं है.

सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि इतने बड़े बजट के बावजूद मेकर्स अच्छा पोस्टर नहीं बना पा रहे हैं. पोस्टर में देखा भी जा सकता है, तारा शौर्ट हेयर में हैं और उन्होंने ब्लैक ड्रैस पहनी हुई है. तारा इस में खूबसूरत तो दिखाई दे रही हैं मगर उन के हाथ ब्लर दिखाई पड़ रहे हैं. ऐसा लग रहा है मानो एडिटिंग टेबल पर इस पोस्टर को ठीकठाक एडिट किया गया है.

हालांकि ठीक ऐसा ही विवाद थालापति विजय की बताई जा रही लास्ट फिल्म ‘जन नयगन’ के ट्रेलर में भी सामने आया है. वहां कुछ शौट्स में जेमेनई के इस्तेमाल की बात हो रही है.

हालांकि, इस विवाद से तारा सुतारिया को चर्चाओं में बने रहने का अवसर मिला है. दरअसल, तारा सुतारिया ए पी ढिल्लों के मुंबई कौन्सर्ट में बौयफ्रैंड वीर पहाड़िया के साथ पहुंची थीं. इस दौरान वो मंच पर गईं, जहां सिंगर ने उन्हें गले लगाया और गाल पर किस कर लिया.

इस के बाद ही वीर पहाड़िया का एक वीडियो वायरल हुआ, जिस में वो तारा-एपी ढिल्लों को साथ देख नाराज नजर आ रहे थे. वीडियो वायरल होने के बाद तारा सुतारिया की जम कर आलोचना हुई और उन के रिश्ते पर सवाल खड़े किए गए, जिसे ले कर तारा ने सफाई भी दी थी.

तारा सुतारिया ने विवाद पर इंस्टा पर रिऐक्ट करते हुए लिखा, “झूठे नैरेटिव, चालाक एडिटिंग और पैसे दे कर चलाए गए पीआर कैंपेन हमें न तो डरा सकते हैं और न ही हिला सकते हैं. आखिर में प्यार और सच्चाई ही जीतती है. और फिर मजाक उड़ाने वालों का ही मजाक बनता है.”

इस कौन्सर्ट में तारा बहुत खूबसूरत दिखाई दे रही थीं. उन्होंने ब्लैक कलर का वन पीस पहना हुआ था जो उन पर सूट कर रहा था. यह इंसिडैंट भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ. कुछ लोग वीर पहाड़िया के प्रति सहानुभूति दिखाने लगे तो वहीं कुछ तारा सुतारिया की पर्सनैलिटी की तारीफ करने लगे.

हाल के ये विवाद तारा सुतारिया के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं. उन की पब्लिक अपील में एकदम से उछाल आया है. उन्हें अटैंशन मिलने लगी है. तारा का फिल्मी ग्राफ ढलान की तरफ बढ़ रहा है. ऐसे में कैसे भी चर्चाओं में आना उन के लिए पौजिटिव सिग्नल ही है.

तारा का फिल्मी कैरियर

तारा सुतारिया ने फिल्मों और टैलीविजन में काम किया है. वे टीवी से वर्ष 2010 में ही जुड़ गई थीं. उन्होंने सब से पहले ‘बिग बड़ा बूम’ नाम का शो किया था. उस के बाद रिऐलिटी शो ‘एंटरटेनमैंट के लिए कुछ भी करेगा’ के चौथे सीजन में नजर आईं. उन का लास्ट टीवी शो ‘शेक इट अप’ नाम से 2013 में आया. फिर उन्होंने फिल्मों की तरफ मूव किया. हालांकि, इस में उन्हें काफी लंबा समय लगा.

साल 2019 में उन्हें पहला ब्रेक करण जौहर की फिल्म ‘स्टूडैंटट औफ द ईयर’ से मिला. इस फिल्म में तारा ने डैब्यू किया था. इस में उन्हें खूबसूरती के लिहाज से खूब पसंद किया गया था. इस फिल्म में लीड ऐक्टर के तौर पर टाइगर श्रौफ थे. अनन्या पांडे की भी यह पहली फिल्म थी. इस फिल्म को असफलता का सामना करना पड़ा.

इस दौरान करण जौहर पर भी नेपोटिज्म के खूब आरोप लगे. इसी साल तारा की एक और फिल्म ‘मरजावा’ आई. यह फिल्म भी फ्लौप हुई. इस के 2 वर्षों बाद 2021 में ‘तड़प’ फिल्म आई. इस फिल्म में सुनील शेट्टी के बेटे अहान शेट्टी को लौंच किया गया. मगर यह फिल्म भी बौक्स औफिस पर बुरी तरह फ्लौप साबित हुई.

अगले 2 सालों में तारा ने ‘हीरोपंती 2’, ‘एक विलेन रिटर्न्स’ और ‘अपूर्वा’ की. इन तीनों में से ‘अपूर्वा’ के लिए तारा को खूब तारीफें मिलीं. मगर फ्लौप तीनों फ़िल्में हुईं. साल 2023 से तारा लगभग फिल्मों से गायब रहीं. उन्हें जो मौके मिले वे सब असफल साबित हुए. मगर इस साल आने वाली फिल्म ‘टौक्सिक’ से दर्शकों को उन से खूब सारी उम्मीदें हैं.

बचपन से था फिल्मों का शौक

19 नवंबर, 1995 को तारा का जन्म मुंबई में हुआ. उन के पिता हिंदू हैं और मां टीना सुतारिया जोरोएस्ट्रियन पारसी थीं. दिलचस्प यह कि तारा जुड़वां पैदा हुईं और उन की बहन का नाम पिया है. दोनों ने यूनाइटेड किंगडम की रौयल एकेडमी औफ डांस में मौडर्न और क्लासिकल डांस सीखा.

तारा 7 साल की उम्र में प्रोफैशनल सिंगर बन गई थीं. तारा ने अपनी बैचलर डिग्री मास मीडिया में सैंट एंड्रयूज आर्ट्स एंड कौमर्स कालेज से हासिल की. उस के बाद उन्होंने बतौर रेडियो जौकी काम भी किया.

टैलेंट तो है पर…

बेशक तारा सुतारिया टैलेंटेड हैं मगर उन की फ़िल्मी शुरुआत अच्छी नहीं रही. जिस समय वे फिल्मों में आईं उस समय नैपोटिज्म की बहस जोरों पर थी. ‘स्टूडैंट्स औफ द ईयर’, ‘हीरोपंती’, ‘तड़प’ और ‘एक विलेन रिटर्न्स’ जैसी बड़े बजट वाली फिल्मों में मौका तो मिला पर साथ में उन फिल्मों में नैपोटिज्म के विवाद में प्राइम टारगेट पर चल रहे ऐक्टर भी मिले.

यही वजह है कि ऐक्टिंग में अच्छीखासी स्किल होने के बावजूद वे विवादों में रहीं और उन की फ़िल्में फ्लौप होती रहीं. हालांकि, यह समझने वाली बात है कि उन्हें बड़ेबड़े मौके भी मिलते रहे. शुरुआत में ही इतने बड़े डायरैक्टर्स, ऐक्टर्स के साथ काम करने का मौका मिला. बावजूद इस के, उन के हिस्से चंद फ्लौप फिल्मों के अलावा कुछ नहीं. सोशल मीडिया पर वे चर्चा में रहती हैं. सवाल यह कि क्या वे अपनी ऐक्टिंग स्किल के चलते भी चर्चा हासिल कर पाएंगी, इस का जवाब फिलहाल भविष्य के गर्त में है. Tara Sutaria Hot Buzz :

Sexual Awareness : क्या सैक्स बुरी चीज है ?

Sexual Awareness : अगर कोई चीज आनंद देती है तो वह बुरी कैसे हो सकती है? फिर क्यों सब से विकसित और शिक्षित समाज भी सैक्स पर खुल कर बात करने से हिचकिचाते हैं? क्यों इसे फुसफुसा कर कहा जाता है. छुपाया जाता है, शर्म से ढका जाता है या नैतिक समस्या बना दिया जाता है. क्या सैक्स हानिकारक है? नहीं, विज्ञान के अनुसार सैक्स मैंटल और फिजिकल हेल्थ के लिए बहुत अच्छा है. तो क्या सैक्स समाज के लिए हानिकारक है?

नहीं, दो लोगों के मिलने होने से समाज टूट नहीं जाता. तो फिर समाज ने सैक्स के खिलाफ युद्ध क्यों छेड़ रखा है?

दुनिया के कई धार्मिक कल्चर में लोगों को सैक्स के कारण दंडित किया जाता है, शर्मिंदा किया जाता है, यहां तक कि मार दिया जाता है. सैक्स को पाप या ऐसी चीज मान लिया गया है जिसपर कंट्रोल जरूरी है. किस का कंट्रोल? यह धर्म तय करता है. लेकिन अगर हम ईमानदारी से देखें, तो सैक्स के मामले में कंट्रोल सिर्फ जवान होने तक का होना चाहिए बाकि बातें सिर्फ समाज को मुट्ठी में रखने की साजिश है.

दरअसल समाज को डेमोक्रेसी कंट्रोल नहीं कर पा रहा क्योंकी यह धर्म के हाथों की कठपुतली बन गया है. डेमोक्रेसी के उसूल सामाजिक विज्ञान को समझते हैं लेकिन धर्म के नियम रूढ़िगत होते हैं. धर्म किसी तरह विज्ञान को नहीं मानता. विज्ञान से खतरा है. डर है की विज्ञान युगों की संस्कृतियों को निगल न जाए. अगर विज्ञान डेमोक्रेसी के साथ आगे बढ़ा तो सबकुछ तहस नहस हो जाएगा.

विज्ञान ने चिकित्सा, तकनीक और अंतरिक्ष में बड़ी प्रगति की. शरीर को समझा, हार्मोंस को जाना, मनोविज्ञान को पढ़ा. अब तक सैक्स से जुड़ी गलतफहमियां खत्म हो जानी चाहिए थीं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. क्यों? क्योंकि सैक्स के बारे में हमारे विचार एक्सीपेरिमेंटल नहीं हैं बल्कि विरासत में मिले हुए हैं. ये हजारों साल पुराने पैटर्न हैं. हम ने इन्हें खुद नहीं बनाया. हम ने बस स्वीकार कर लिया. कल्पना कीजिए अगर किसी बच्चे को दूध पीते समय छुपना पड़े क्योंकि बड़ों को यह शर्मनाक लगता हो. यह कितना अजीब लगेगा.

फिर वयस्कों से यह अपेक्षा क्यों कि वे सैक्स पर बात भी न करें जबकि वह उतना ही नेचुरल है? अगर दो जवान लोगों के बीच सैक्स में कोई बड़ी बुराई नहीं है तो इस पर इतनी चुप्पी क्यों?

नेचर का सब से गलत समझा गया उपहार है सैक्स. सैक्स सिर्फ आनंद नहीं है. यह सृजन है. पूरा जीवन इसी से उत्पन्न होता है. यह जीवन है. जीवन का दुश्मन नहीं.

सैक्स के लिए बने अंग सिर्फ अंग हैं. यौन ग्रंथियां सिर्फ ग्रंथियां हैं. यौन हार्मोन भी अन्य हार्मोनों जैसे ही हैं. वे हृदय या फेफड़ों से अलग नहीं हैं. फिर भी समाज इन्हें गंदा मानता है. सैक्स इच्छा को दबाया जाता है तो वह खत्म नहीं होती. वह चिंता, कुंठा, जुनून, आक्रामकता, अपराध या बीमारी में बदल जाती है. कई मानसिक और शारीरिक समस्याएं सैक्स के कारण नहीं बल्कि उसे समझने और स्वीकार न करने के कारण पैदा होती हैं. तो जब यह इतनी नेचुरल, सुंदर और जरूरी चीज है तो इसे गंदा क्यों बना दिया गया?

धारणाएं कैसे बनती हैं? फूल की खुशबू अच्छी क्यों लगती है? क्योंकि हम फूल को सुंदर मानते हैं. समाज ने धीरेधीरे यह मानसिक पैटर्न बना लिया कि फूल सुंदर है तो उस की खुशबू भी सुंदर होगी.

अब गंदे नाले के बारे में सोचिए. उस की गंध बुरी मानी जाती है क्योंकि नाला गंदा है लेकिन सोचिए, अगर वही खुशबू शुरू से नाले से आती तो वही खुशबू बदबू कहलाती. गंध नहीं बदलती. धारणा बदलती है. सैक्स के साथ भी यही होता है. सैक्स पाप नहीं है. पाप वह विचार है जो उस पर चिपका दिया गया है.

हम धारणाओं के भीतर रहते हैं और हमें पता भी नहीं चलता. जैसे मछली समुद्र को नहीं जान सकती क्योंकि वह उसी में रहती है वैसे ही हम अपनी कंडीशनिंग को नहीं देख पाते क्योंकि हम उसी में जीते हैं.

हम सैक्स, नैतिकता, महानता और पाप के विचार बिना सवाल किए ढोते रहते हैं. “महान व्यक्ति” की धारणा भी अक्सर सामाजिक सहमति होती है कोई परम सत्य नहीं. हम इन मानसिक पैटर्न्स को विरासत में लेते हैं उन के कारण दुख झेलते हैं और फिर उन्हें अगली पीढ़ी को सौंप देते हैं और इसे ही हम परंपरा कह देते हैं.

सैक्स सिर्फ एक उदाहरण है. यही बात डर, महत्वाकांक्षा, शर्म, सफलता और असफलता पर भी लागू होती है. यह लेख सैक्स को बढ़ावा देने परंपरा को नकारने या विद्रोह करने के बारे में नहीं है. यह सिर्फ नजरिया बदलने के बारे में है. जब आप उधार लिए गए विचारों के बिना देखते हैं तो वास्तविकता अलग दिखती है. नरम, ईमानदार, और मानवीय और शायद तब प्राकृतिक चीजों से लड़ने के बजाय हम जागरूकता के साथ जीना शुरू कर सकते हैं. Sexual Awareness :

Palak Paneer Controversy USA : अमेरिका में पालक पनीर की जीत, यूनिवर्सिटी को देना होगा हर्जाना

Palak Paneer Controversy USA : आज अमेरिका दुनिया में सुपरपावर है. अमेरिका की इकोनौमी और डिफेंस दुनिया में सब से मजबूत हैं लेकिन सिर्फ अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत की बदौलत ही अमेरिका महाशक्ति नहीं बना है. अमेरिका में पिछले 250 सालों में डेमोक्रेसी मजबूत बनी रही इसलिए अमेरिका ताकतवर बन पाया हालांकि यह अलग बात है की अब डोनाल्ड ट्रंप इस मजबूत लोकतंत्र को खोखला करने पर तुले हैं. डेमोक्रेसी की बुनियाद न्याय पर टिकी होती है. अमेरिका की न्याय व्यवस्था भी दुनिया में सब से मजबूत है. इस बात के उदाहरण समयसमय पर अमेरिकी अदालतें पेश करती रहती हैं.

2023 में अमेरिका के कोलोराडो बोल्डर यूनिवर्सिटी में 34 साल के आदित्य प्रकाश और 35 वर्षीय उर्मी भट्टाचार्य सेकंड ईयर में पढ़ाई कर रहे थे. दोनों ने पीएचडी की डिग्री हासिल करने के लिए कालेज में दाखिला लिया था. 5 सितंबर 2023 को प्रकाश यूनिवर्सिटी के ओवन में अपना लंच गर्म करने पहुंचा. प्रकाश के टिफिन में पालक पनीर की सब्जी थी. ऐसे में यूनिवर्सिटी की स्टाफ ने उन्हें सब्जी गर्म करने से मना कर दिया. स्टाफ का कहना था कि सब्जी से अजीब सी स्मेल आ रही है इसलिए इसे ओवन में गर्म नहीं किया जा सकता है.

मामला बढ़ा तो इस इंडियन कपल ने यूनिवर्सिटी पर भेदभाव का आरोप लगाया. दोनों को सीनियर्स के साथ कई बार मीटिंग में बुलाया गया. बिना कारण बताए दोनों को यूनिवर्सिटी ने पीएचडी की डिग्री देने से इनकार कर दिया. प्रकाश और उर्मी ने कोलाराडो की जिला न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. दोनों ने यूनिवर्सिटी पर आरोप लगाया कि पनीर की सब्जी पकाने के कारण यूनिवर्सिटी ने डिग्री देने से मना कर दिया.

अदालत ने कालेज को आदेश दिया की वे प्रकाश और उर्मी की डिग्री जारी करे और दोनों को 2 लाख डौलर मुआवजा भी दे. कालेज ने दोनों को पीएचडी की डिग्री तो देदी लेकिन प्रकाश और उर्मी को हमेशा के लिए बैन कर दिया. अब वे न इस कालेज में दाखिला ले सकेंगे और न ही नौकरी कर सकेंगे.

इस मामले पर इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए प्रकाश ने कहा “मेरा खाना मेरा गर्व है. कोई और तय नहीं करेगा कि वह खुशबूदार है या बदबूदार. अजीब खुशबू की वजह से कालेज का अमेरिकी स्टाफ ओवन में ब्रोकली भी गर्म नहीं करने देते हैं. ब्रोकली खाने की वजह से कितने ही भारतीय लोगों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है?”

प्रकाश और उर्मि को अपने तरीके से खाना खाने की पूरी आजादी है लेकिन अगर कालेज के अमेरिकी स्टाफ को उस खाने की आदत नहीं है और उन्हें उस खाने की गंध पसंद नहीं तो इस में गलत क्या है? हर जगह का खानपान और रहनसहन अलग होता है. किसी और देश में जा कर आप अपनी मर्जी नहीं चला सकते. किसी को आप की सब्जी पसंद नहीं तो इसे भेदभाव नहीं कहते हैं. भेदभाव वह होता है जो उर्मी भट्टाचार्य के अपने देश में जाति के नाम पर किया जाता है. कोई घोड़ी पर नहीं चढ़ सकता क्योंकी उस ने छोटी जात में जन्म लिया है. कोई निचली जात का आदमी कुर्सी पर नहीं बैठ सकता. जाति के नाम पर हिंसा और बलात्कार तक होते हैं.

ऊंचनीच के नाम पर हर कदम पर भेदभाव होता है और इस भेदभाव के लिए कहीं कोई मुआवजा नहीं मिलता. इसे असली भेदभाव कहते हैं जिसे प्रकाश और उर्मी भट्टाचार्य जैसे उच्च जातीय मानसिकता वाले लोग कभी नहीं समझ सकते.

अमेरिका की अदालत ने तो इतनी सी बात के लिए कोई भेदभाव किए बिना दो करोड़ का मुआवजा दिलवा दिया लेकिन भारत में उर्मी भट्टाचार्य जैसी मानसिकता वाले लोग तो सदियों से उत्पीड़न झेलने वाले एससी वर्ग को मिले आरक्षण के भी खिलाफ होते हैं. Palak Paneer Controversy USA :

Social Story in Hindi : जातपात : मायके की जातपात की बेड़ियां तोड़ती दबंग लड़की की कहानी

Social Story in Hindi : निर्मला अपने पति राजन के साथ जिद कर के अपनी दादी के श्राद्ध में मायके आई थी. हालांकि राजन ने उसे बारबार यही कहा था कि बिन बुलाए वहां जाना ठीक नहीं है, फिर भी वह नहीं मानी और अपना हक समझते हुए वहां पहुंच ही गई. निर्मला ने सोचा था कि दुख की इस घड़ी में वहां पहुंचने पर परिवार के सभी लोग गिलेशिकवे भूल कर उसे अपना लेंगे और दादी की मौत का दुख जताएंगे. पर उस का ऐसा सोचना गलत साबित हुआ.

सभी ने निर्मला को देख कर भी नजरअंदाज कर दिया, मानो वह कोई अजनबी हो. इस के बावजूद भी निर्मला को उम्मीद थी कि परिवार वाले भले ही उसे नजरअंदाज करें, मां ऐसा नहीं कर सकतीं. तभी निर्मला ने राजन की तरफ इस तरह देखा, मानो वह मां के पास जाने की उस से इजाजत ले रही हो. फिर वह अकेली ही मां की तरफ बढ़ गई.

उस समय निर्मला की मां औरतों के हुजूम में आगे बैठी हुई थीं. जब मां ने निर्मला को अपने करीब आते देखा, तो वे उठ कर तेजी से दूसरे कमरे में चली गईं. मां के पीछेपीछे निर्मला भी वहां पहुंच गई और प्यार से बोली, ‘‘मां, यह सब कैसे हुआ? क्या दादी बहुत दिनों से बीमार थीं?’’

‘‘तुम से मतलब? आखिर तुम पूछने वाली होती कौन हो? चली जाओ यहां से. फिर कभी भूल कर भी इस घर की तरफ मत देखना, नहीं तो तुम मेरा मरा हुआ मुंह देखोगी,’’ गुस्से से चीखते हुए उस की मां बोलीं.

‘‘ऐसा न कहो, मां. नहीं तो मैं अनाथ हो जाऊंगी. आखिर तुम्हारा ही तो सहारा है मुझे. मां हो कर भी तुम मेरे मन की भावना को नहीं समझोगी, तो और कौन समझेगा?’’ रोते हुए निर्मला बोली.

‘‘नहीं समझना है मुझे. कुछ नहीं समझना,’’ चीखते हुए उस की मां ने कहा.

‘‘क्यों नहीं समझना है, मां? तुम्हें समझना ही पड़ेगा. अपनी बेटी के दुख को महसूस करना ही पड़ेगा. आखिर मेरा इतना ही कुसूर था न कि मैं ने राजन से सच्चा प्यार किया? उस से शादी की, जो हमारी बिरादरी का नहीं है?

‘‘लेकिन मां, तुम मुझे गौर से देखो कि मैं राजन के साथ कितनी खुश हूं. मुझे किसी बात का दुख नहीं है,’’ खुशी जताते हुए निर्मला ने कहा.

‘‘मुझे कुछ नहीं देखना है और न ही सुनना है, बस. तुम अभी और इसी समय उस राजन को ले कर यहां से चली जाओ, ताकि तुम्हारी दादी का श्राद्ध शांति से पूरा हो सके,’’ मां बोलीं.

‘‘हम यहां से चले जाएंगे, मां, रहने के लिए नहीं आए हैं. केवल दादी के श्राद्ध में आए हैं. बस, उसे पूरा हो जाने दो. क्योंकि दादी से मेरा और मुझ से उन का कितना गहरा लगाव था, यह तुम अच्छी तरह से जानती हो. मेरे बिना तो वे कुछ भी नहीं खातीपीती थीं,’’ सुबकते हुए निर्मला ने कहा.

‘‘इसीलिए तो तुम उस कलमुंहे राजन के साथ भाग गई और कोर्ट में जा कर शादी कर ली. तब तुम्हें दादी का इतना खयाल नहीं था, जबकि उन्होंने तुम्हारी याद में अपनी जान दे दी?’’

‘‘मुझे दादी का बहुत खयाल था, मां. परंतु मैं क्या करती, आप सभी तो मुझ से खफा थे. डर के चलते मैं नहीं आ सकी,’’ रोते हुए निर्मला ने कहा.

‘‘बड़ी आई डर वाली. जब इतना ही डर था, तो घर से कदम बाहर निकालते समय हजार बार सोचती? फिर भी कुछ नहीं सोचा.

‘‘अरे, क्या अपनी बिरादरी में लड़कों की कमी हो गई थी, जो उस नाशपीटे राजन के साथ भाग गई?’’ तीखी आवाज में उस की मां ने कहा.

मां के सवालों का जवाब देने के बजाय निर्मला ने कहा, ‘‘मां, मुझे जी भर कर कोस लो, लेकिन उन्हें कुछ न कहो, क्योंकि अब वे मेरे पति हैं.’’

‘‘तुम तो ऐसे कह रही हो, जैसे दुनिया में केवल एक तुम ही पति वाली हो, बाकी सब दिखावे वाली हैं,’’ खिल्ली उड़ाते हुए उस की मां बोलीं.

‘‘मां, मेरी अच्छी मां, तुम तो मुझे ऐसा न कहो. हर मांबाप का सपना होता है कि मेरी बेटी अच्छे घर में ब्याहे, सुखशांति से रहे. उन्हीं में से मैं एक हूं.

‘‘तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि मैं ने अपने जीवनसाथी का खुद ही चुनाव कर तुम लोगों की परेशानी को दूर किया है. इस के बावजूद भी सभी की तरह तुम भी मुझे नजरअंदाज कर रही हो?’’ दुखी हो कर निर्मला ने कहा.

‘‘हां, तुम इसी काबिल हो, इसीलिए नहीं मिलेगा अब तुम्हें वह लाड़प्यार और अपनापन, जो कभी यहां मिला करता था…’’

निर्मला की मां की बातें अभी पूरी भी नहीं हो पाई थीं कि पिता, भाई, बहन व भाभी सभी वहां आ गए और गुस्से से निर्मला को घूरने लगे.

तभी उस के पिता दयाशंकर ने गुस्से में कहा, ‘‘कलंकिनी, मुझे तो तेरा नाम लेते हुए भी नफरत हो रही है. आखिर तुम ने मेरे घर में कदम रखने की हिम्मत कैसे की?’’

‘‘ऐसा न कहिए, पापा. आखिर इस घर से मेरा भी तो कोई रिश्ता है? उसी रिश्ते के वास्ते तो मैं यहां आई हूं. मुझे और मेरे पति को अपना लीजिए, पापा,’’ रोतेगिड़गिड़ाते हुए निर्मला ने कहा.

‘‘खबरदार, जो मुझे पापा कहा. तेरा पापा तो उसी दिन मर गया था, जिस दिन तू इस घर को छोड़ कर गई थी. रहा सवाल अपनाने का, तो यह हक अब तुम खो चुकी हो.’’

‘‘नहीं, पापा नहीं. ऐसा न कहो और ठंडे दिमाग से सोचो कि प्यार करना क्या कोई जुर्म है?

‘‘आखिर मैं भी तो बालिग हूं. जब मैं अपना भलाबुरा सोचसमझ सकती हूं, तो फिर मुझे फैसला लेने का हक क्यों नहीं है? और फिर चाहे बातें भविष्य की हों या जीवनसाथी चुनने की, लड़कियों को यह हक जरूर मिलना चाहिए,’’ थोड़ा खुश हो कर निर्मला ने कहा.

‘‘तू मुझे हक के बारे में समझा रही है? अगर तू इतनी ही समझदार होती, तो अपनी ही जाति के लड़के से शादी करती, न कि किसी दूसरी जाति के लड़के से,’’ निर्मला के पिता ने कहा.

‘‘दूसरी जाति के लड़के क्या इनसान नहीं होते? क्या उन में समझदारी नहीं होती? इस की मिसाल तो राजन ही हैं, जिन्होंने मुझे जिंदगी की सारी खुशियां दे रखी हैं, कोई कमी महसूस नहीं होने दी है उन्होंने. मैं इस तरह के जातपांत के भेदभाव को नहीं मानती, जो एक इनसान को दूसरे इनसान से अलग करता हो, आपस में दूरियां बढ़ाता हो…

‘‘मैं केवल इनसानियत की जात को जानती व मानती हूं,’’ निर्मला बोलती चली गई.

‘‘बस करो अपनी यह बकवास और उस राजन के साथ यहां से चलती बनो,’’ इस बार चीखते हुए निर्मला का भाई विशाल बोला.

‘‘भैया, मुझे जो चाहो कह लो, मैं सब बरदाश्त कर लूंगी. लेकिन उन के बारे में कुछ भी नहीं सुन सकती. क्योंकि एक पत्नी अपने सामने पति की बेइज्जती कभी बरदाश्त नहीं कर सकती.’’

‘‘अच्छा, तब तो मुझे तुम्हारे पति की बेइज्जती करनी ही होगी, वह भी तुम्हारे सामने,’’ नजरें तिरछी करते हुए विशाल बोला.

‘‘क्या…? यह तुम कह रहे हो? जबकि तुम भी किसी के पति हो और तुम्हारी पत्नी तुम्हारे सामने खड़ी है. महाभारत मचा दूंगी मैं यहां. तुम क्या समझते हो अपनेआप को कि वे तुम से कमजोर हैं?

‘‘वे जूडोकराटे में ब्लैकबैल्ट हैं और साथ ही पुलिस में भी हैं. उन से टकराना तुम्हें महंगा पड़ेगा, भैया.

‘‘हां, मैं यदि चाहूं, तो तुम्हारी पत्नी के सामने तुम्हारी बेइज्जती जरूर करवा सकती हूं, ताकि तुम बेइज्जती के दर्द को महसूस कर सको.

‘‘लेकिन, मैं इतनी बेवकूफ भी नहीं हूं कि तुम्हारी तरह कुछ करने से पहले कुछ सोचसमझ न सकूं. औरत हूं, इसलिए औरत का दर्द समझती हूं. लिहाजा, ऐसा कुछ नहीं करना चाहूंगी, जिस से कि भाभी के मन में दुख हो.’’

निर्मला की बातें सुन कर उस की भाभी सुबक पड़ी और उस ने आगे बढ़ कर निर्मला को गले लगा लिया.

‘‘माधुरी, यह तुम क्या कर रही हो? दूर हटो उस से. इस से हमारा कोई रिश्ता नहीं है,’’ चीखते हुए विशाल बोला.

‘‘रिश्ता है क्यों नहीं? खून का रिश्ता है हमारा, इसलिए अपनी बहन को अपना लीजिए. इस ने ठीक ही कहा है कि जातपांत कुछ नहीं होता. होती है तो केवल इनसानियत, और इनसानियत का रिश्ता,’’ निर्मला की तरफदारी लेते हुए उस की भाभी माधुरी ने कहा, मानो वह भी इनसानियत के रिश्ते को ही अहमियत दे रही हो.

लेकिन माधुरी की बातें सुन कर विशाल बौखला गया. वह गुस्से से बोला, ‘‘माधुरी, लगता है इस के साथसाथ तुम्हारा भी दिमाग खराब हो गया है, कहीं…’’

अभी विशाल अपनी बातें पूरी भी नहीं कर पाया था कि तभी वहां राजन आ गया और सूझबूझ का परिचय देते हुए गंभीरता से बोला, ‘‘निर्मला, अब चलो यहां से. बहुत हो चुकी तुम्हारी बेइज्जती. मैं अब और सहन नहीं कर सकता.

‘‘मैं ने सबकुछ सुन लिया है और जान लिया है कि ये लोग ऐसे पत्थरदिल इनसान हैं, जो जातपांत का ढोंग रच कर समाज को गंदा करते हैं.’’

‘‘आप बिलकुल ठीक कहते हैं. अब मुझे समझ में आया कि मैं ने यहां आ कर कितनी बड़ी भूल की है?

‘‘ले चलिए मुझे. अब एक पल भी मैं यहां रुकना नहीं चाहूंगी,’’ उठते हुए निर्मला बोली और अपने पति राजन का हाथ थाम कर घर से बाहर जाने लगी.

उस की छोटी बहन उर्मिला ने दौड़ कर निर्मला का हाथ थाम लिया और सिसकते हुए बोली, ‘‘दीदी, मत जाओ. मुझे छोड़ कर मत जाओ.’’

‘‘पगली, मैं कहां तुम्हें छोड़ कर जा रही हूं? हां, जातपांत और उन बुरे रिवाजों को छोड़ कर जा रही हूं, जिसे मां, पापा व भैया ने अपनी मुट्ठियों में जकड़ रखा है.

‘‘मैं यहां नहीं आऊंगी तो क्या हुआ, तुम तो अपनी दीदी के घर आ सकती हो?’’ निर्मला बोली.

‘‘जरूर आऊंगी दीदी,’’ उर्मिला ने खुश हो कर कहा.

‘‘मैं इंतजार करूंगी,’’?प्यार से उस के सिर पर अपना हाथ फेरते हुए निर्मला ने कहा और अपने पति राजन के साथ घर से बाहर निकल गई. Social Story in Hindi :

Social Story in Hindi : पुलिस का एक अलग चेहरा – भारतीय पुलिस के निकम्मेपन की एक झलक

Social Story in Hindi :

मैं कार से आफिस जा रहा था. अचानक मोबाइल की घंटी बजी. कार किनारे लगा कर फोन उठाया.

‘‘सिंगापुर पुलिस.’’ उधर से आवाज आई.

एक क्षण के लिए दिमाग घूम गया. सबकुछ कुशल तो है. सिंगापुर में मेरे बेटेबहू हैं. 2 बार मैं भी वहां जा चुका हूं. बेटेबहू ने कुछ ऐसा तो

नहीं कर डाला कि वहां की पुलिस

को मु   झे फोन करना पड़ गया. दिमाग

में एक के बाद एक बुरे खयाल आते रहे.

‘‘आप मिस्टर दत्त हैं?’’

‘‘जी…’’ मैं ने कहा.

‘‘कविता दत्त, जो सिंगापुर में रहती हैं, आप की डौटर इन ला हैं…’’

‘‘जी हां. क्या बात है. सबकुछ ठीक तो है?’’

‘‘घबराने जैसा या नर्वस होने जैसा कुछ नहीं है. कविता दत्त के फादर का नाम?’’

‘‘के.के. शर्मा.’’

‘‘कविता दत्त की आयु और उस के पति का नाम?’’

थोड़ी देर की खामोशी के बाद फिर…

‘‘सुबह से उस का कोई फोन आप के पास आया…उस ने आप को कुछ बताया?’’ सिंगापुर पुलिस पूछती है.

‘‘नहीं तो…’’

‘‘कविता दत्त को भूलने की आदत है. वह भुलक्कड़ है?’’

मैं हंसा, ‘‘यह बात तो उस की मदर इन ला बेहतर बता सकती हैं या उस के फादर.’’

‘‘ऐनी वे…वे अपना मोबाइल टैक्सी में भूल गई हैं. टैक्सी ड्राइवर ने पुलिस स्टेशन में मोबाइल फोन जमा कर दिया है. हम उसे फोन कर रहे हैं. आप भी उसे फोन कर दें कि वे पुलिस स्टेशन से आ कर अपना मोबाइल ‘कलैक्ट’ कर लें.’’

पुलिस का यह आचरण आश्चर्य- जनक लगा. मु   झे सहज भरोसा नहीं हुआ कि पुलिस इस तरह की अप्रत्याशित सहायता भी कर सकती है.

‘‘आप धन्यवाद के, बधाई के, प्रशंसा के पात्र हैं,’’ मैं ने कहा.

‘‘इस में प्रशंसनीय कुछ नहीं. नागरिकों की सहायता करना पुलिस का कर्तव्य है. आप को धन्यवाद देना ही है तो उस टैक्सी ड्राइवर को दीजिए जो अपना पैट्रोल खर्च कर पुलिस स्टेशन आया,’’ सिंगापुर की पुलिस ने कहा.

आगे कहने को कुछ नहीं था. मैं ने कविता को फोन कर दिया. सहसा मु   झे अपना मोबाइल खोने का प्रसंग याद आ गया.

प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए मु   झे 300 रुपए देने पड़े थे. प्राथमिकी दर्ज कराने के दौरान मैं ने पुलिस वाले से पूछा था कि मेरा मोबाइल तो मिल जाएगा.

‘‘मोबाइल मिल जाएगा,’’ वह आश्चर्य से हंसा, ‘‘यहां आदमी नहीं मिलता और आप मोबाइल मिलने की बात कर रहे हैं. उम्मीद कम ही है, सम   झ लीजिए नहीं है.’’

मैं चुपचाप बाहर निकल आया. मोबाइल तो गया. ऊपर से 300 रुपए और गए. तब जा कर प्राथमिकी की प्रति मिली, जिस से मोबाइल कंपनी मेरे मोबाइल नंबर को ‘लौक’ कर देगी ताकि मेरे नंबर का अनुचित उपयोग न हो सके.

मैं यही सोच रहा हूं कि हम भारतीय उस स्तर पर कभी पहुंच पाएंगे? या ऐसा व्यवहार यहां अविश्वसनीय और कपोल कल्पित ही रहेगा.

कुछ देर बाद कविता का फोन आया. वह पुलिस स्टेशन से अपना मोबाइल ले आई थी.

‘‘कुछ पैसे लगे?’’

‘‘दिस इज नौट इंडिया, पापा,’’ उस ने हंस कर कहा.

मेरा सिर कुछ इस तरह झुक गया जैसे यहां की पुलिस का मैं कोई प्रतिनिधि होऊं. Social Story in Hindi :

Hindi Social Story : अमेरिका जैसा मैंने देखा – अमेरिका से लौटे कर क्या कसक थी मां के मन में ?

Hindi Social Story : अमेरिका पहुंचने के 2 महीने बाद ही बेटी श्वेता ने जब अपनी मां शीतल को फोन पर उस के नानी बनने का समाचार सुनाया तो शीतल की आंखों से खुशी और पश्चात्ताप के मिश्रित आंसू बह निकले. शीतल को याद आने लगा कि शादी के 4 वर्ष बीत जाने के बाद भी श्वेता का परिवार नहीं बढ़ा तो उस के समझाने पर, श्वेता की योजना सुन कर कि अभी वे थोड़ा और व्यवस्थित हो जाएं तब इस पर विचार करेंगे, उस ने व्यर्थ ही उस को कितना लंबाचौड़ा भाषण सुना दिया था. उस समय दामाद विनोद के, कंपनी की ओर से, अमेरिका जाने की बात चल रही थी. अब उस को एहसास हो रहा है कि पहले वाला जमाना तो है नहीं, अब तो मांबाप अपनेआप को बच्चे की परवरिश के लिए हर तरह से सक्षम पाते हैं, तभी बच्चा चाहते हैं.

4-5 महीने बाद श्वेता ने मां शीतल से फोन पर कहा, ‘‘ममा, आप अपना पासपोर्ट बनवा लीजिए, आप को यहां आना है.’’

‘‘क्यों क्या बात हो गई? तेरी डिलीवरी के लिए तेरी सास आ रही हैं न?’’

‘‘हां, पहले आ रही थीं लेकिन डाक्टर ने उन्हें इतनी दूर फ्लाइट से यात्रा करने के लिए मना कर दिया है, इसलिए अब वे नहीं आ सकतीं.’’

‘‘ठीक है, देखते हैं. तू परेशान मत होना.’’ फोन पर बेटी ने यह अप्रत्याशित सूचना दी तो वह सोच में पड़ गई, लेकिन उस ने मन ही मन तय किया कि वह अमेरिका अवश्य जाएगी.

पासपोर्ट बनने के बाद वीजा के लिए सारे डौक्युमैंट्स तैयार किए गए. श्वेता ने फोन पर शीतल को समझाया कि अमेरिका का वीजा मिलना बहुत ही कठिन होता है, साक्षात्कार के समय एक भी डौक्युमैंट कम होने पर या पूछे गए एक भी प्रश्न का उत्तर संतोषजनक न मिलने पर साक्षातकर्ता वीजा निरस्त करने में तनिक भी संकोच नहीं करता. उस के बाद वह कोई भी तर्क सुनना पसंद नहीं करता. अमेरिका घूमने जाने वालों को, वहां अधिक से अधिक 6 महीने ही रहने की अनुमति मिलती है, इसलिए उन की बातों से उन को यह नहीं लगना चाहिए कि वे वहीं बसने जा रहे हैं, लेकिन उन की कल्पना के विपरीत जब साक्षातकर्ता ने 2-3 प्रश्न पूछने के बाद ही मुसकरा कर वीजा की अनुमति दे दी तो उन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. सारे डौक्युमैंट्स धरे के धरे रह गए. बाहर प्रतीक्षा कर रहे अपने बेटे को जब उन्होंने हाथ हिला कर उस की जिज्ञासा पर विराम लगाया तो उस ने उन का ऐसे अभिनंदन किया, जैसे वे कोई मुकदमा जीत कर आए हों.

अंत में शीतल का अपने पति के साथ अमेरिका जाने का दिन भी आ गया. वे पहली बार वहां जा रहे थे. सीधी फ्लाइट नहीं थी, इसलिए बेटे ने पूछा, ‘‘यदि आप लोगों को यात्रा करने में तनिक भी असुविधा लग रही है तो व्हीलचेयर की सुविधा ले सकते हैं? पूरा समय आप लोग एक गाइड के संरक्षण में रहेंगे?’’

 ‘‘नहीं, इस की आवश्यकता नहीं है,’’ उन्होंने उत्तर दिया.

मुंबई से 9 घंटे की उड़ान के बाद वे लंदन के हीथ्रो हवाईअड्डे पर पहुंचे. वहां से अमेरिका के एक राज्य टेक्सास के लिए दूसरे विमान से जाना था. अब फिर उन को 9 घंटे की यात्रा करनी थी. उन लोगों ने एक बात का अनुभव किया कि घरेलू विमान से यात्रा करते समय जो झटके लगते हैं, वो इस में बिलकुल नहीं लग रहे थे. उड़ान मंथर गति से निर्बाध अपनी मंजिल की ओर अग्रसर थी.

टेक्सास हवाईअड्डे के बाहर श्वेता अपने पति विनोद के साथ उन की प्रतीक्षा कर रही थी. बेटी पर निगाह पड़ते ही शीतल को एहसास हुआ कि औरत मातृत्व के रूप में सब से अधिक गरिमा से परिपूर्ण लगती है, वह बहुत सुंदर लग रही थी.

उस का चेहरा कांति से दमक रहा था. उस का मन अपनी बेटी के लिए गर्व से भर उठा. भावातिरेक में उस ने उस को गले लगा लिया. वहां से वे लोग कार से डेलस, उन के घर पहुंचे, जो कि लगभग 40 किलोमीटर दूर था. शाम हो गई थी.

बेटी ने घर पहुंचने के लगभग 1 घंटे बाद कहा, ‘‘मेरी क्लास है, यहां डिलीवरी के पहले बच्चे की होने वाली मां को जन्म के बाद बच्चे की कैसे देखभाल की जाए, समझाया जाता है. आप लोग आराम कीजिए, मैं क्लास अटैंड कर के आती हूं.’’

रास्ते की थकान होने के कारण  हम दोनों जल्दी ही गहरी नींद में सो गए. जब जोरजोर से दरवाजा खटखटाने की आवाज हुई तो वह जल्दी से उठ कर दरवाजा खोलने के लिए भागी. उस को याद आया कि बेटी ने जातेजाते चौकस हो कर सोने के लिए कहा था, जिस से कि वे दरवाजा खोल सकें, क्योंकि वहां दरवाजे की घंटी नहीं होती है.

अंदर आते हुए श्वेता बड़बड़ा रही थी, ‘‘अरे ममा, यहां पर जरा सी आवाज होते ही पड़ोसी अपनेअपने दरवाजों को खोल कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगते हैं.’’ जब उस ने बताया कि लगभग आधे घंटे से वह बाहर खड़ी थी तो उस को बड़ी ग्लानि हुई.

लेकिन तुरंत ही वह अपनी मां को सांत्वना देती हुई बोली, ‘‘कोई बात नहीं, जेट लैग (अमेरिका में जब रात होती है, तब भारत में दिन होता है इसलिए शरीर को वहां के क्रियाकलापों के अनुसार ढालने में समय लगता है, उसी को जेट लैग कहते हैं) में ऐसी ही नींद आती है.’’ आगे उस ने अपनी बात को जारी रखते हुए बताया, ‘‘यहां पर आप की किसी भी गतिविधि से यदि पड़ोसी को असुविधा होती है तो वे पुलिस को बुलाने में जरा भी संकोच नहीं करते. यहां तक कि ऊपरी फ्लोर में रहने वालों के छोटे बच्चों के भागनेदौड़ने की आवाज के लिए भी निचले फ्लोर में रहने वाले एतराज कर सकते हैं, यहां का कानून बहुत सख्त है.’’

श्वेता के साथ जब कभी शीतल बाजार जाती तो भारत के विपरीत वह देखती कि सड़क पार करते समय पैदल यात्री की सुविधा के लिए ट्रैफिक रुक जाता था. कहीं पर भी कितनी भी भीड़ क्यों न हो, कोई किसी से टकराता नहीं था. हमेशा एक दूरी निश्चित रहती थी, चाहे वह आम लोगों में हो या यातायात के साधनों में हो. किसी भी मौल में या किसी भी सार्वजनिक स्थल पर अजनबी भी मुसकरा कर हैलो अवश्य कहते हैं. गर्भवती स्त्रियों के साथ उन का बड़ा सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार होता है.

घरों में कामवाली मेड के अभाव में सभी गृहकार्य और बाजार के कार्य स्वयं करने के कारण भारत में जो उन से सुविधा मिलने से अधिक जो मानसिक यंत्रणा को भोगना पड़ता है, वह न होने से जीवन सुचारु रूप से चलता है. गृहकार्य को सुविधाजनक बनाने के लिए बहुत सारे उपकरण भी घरों में उपलब्ध होते हैं. वातानुकूलित घर होने के कारण निवासियों की ऊर्जा का हृस नहीं होता. सड़क पर टै्रफिक जाम न होने के कारण समय बहुत बचता है और उस से उत्पन्न मानसिक तनाव नहीं होता. वहां पर इंडियन स्टोर्स के नाम से बहुत सारी दुकानें खुली हैं, जहां लगभग सभी भारतीय खा- पदार्थ और चाट आदि मिलती हैं. वहां जा कर लगता ही नहीं कि हम भारत में नहीं हैं.

श्वेता की ससुराल में गर्भकाल के 7वें या 9वें महीने में बहू की गोदभराई की रस्म होती है. शीतल के वहां पहुंचने की प्रतीक्षा हो रही थी, इसलिए 9वें महीने में समारोह के आयोजन का विचार किया गया. जिन को बुलाना था उन को उन की  ईमेल आईडी पर निमंत्रण भेजा गया. उन लोगों ने अपनी उपस्थिति के लिए हां या न में लिखने के साथ यह भी लिखा कि वे कितने लोग आएंगे, साथ में अपना बजट लिख कर यह भी पूछा कि उपहार में क्या चाहिए. अमेरिका में अजन्मे बच्चे के लिंग के बारे में पहले से ही डाक्टर बता देते हैं, इसलिए उपहार भी उसी के अनुकूल दिए जाते हैं. उस को यह देख कर आश्चर्य हुआ कि अपने बच्चे के प्रयोग में आई हुई कीमती वस्तुओं को भी वहां के लोग उपहार में देने और लेने में तनिक भी संकोच नहीं करते. इस से समय और पैसे की बहुत बचत हो जाती है.

समारोह में जितने भी लोग आए थे, लगभग सभी भारतीय पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित हो कर आए थे और हिंदी में बात कर रहे थे. उन की जिज्ञासा को उस की बेटी ने यह कह कर शांत किया कि हमेशा मजबूरी में पाश्चात्य कपड़े पहन कर और अंगरेजी बोल कर सब ऊब जाते हैं, इसलिए समारोहों में ऐसा कर के अपने भारतीय होने के सुखद एहसास को वे खोना नहीं चाहते. उस ने सोचा कि यह कैसी विडंबना है कि भारत में भारतीय पाश्चात्य सभ्यता को अपना कर खुश होते हैं.

वहां पर सभी कार्य स्वयं करने होते हैं, इसलिए जितने भी मेहमान आए थे, सब ने मिलजुल कर सभी कार्य किए और कार्यक्रम समाप्त होने के बाद सब पूरे हौल को साफ कर के सारा कूड़ा तक कूड़ेदान में डाल कर आए. और तो और, बचा हुआ खा- पदार्थ भी जिन को जितना चाहिए था, सब ने मिल कर बांट लिया.

अंत में श्वेता के डिलीवरी का दिन भी आ गया. विनोद उस को डाक्टर को दिखाने के लिए अस्पताल ले कर गए तो वहां से उन का फोन आया कि उसे आज ही भरती करना पड़ेगा. सुन कर शीतल के मन में खुशी और चिंता के मिश्रित भाव उमड़ने लगे. अस्पताल गई तो बेटी को हलके दर्द में ही कराहते देख कर उस ने कहा, ‘‘बेटा, अभी से घबरा रही है, अभी तो बहुत दर्द सहना पड़ेगा.’’ उसे अपना समय याद आ गया था. आगे की तकलीफ कैसी झेलेगी, यह सोच कर उस का मन व्याकुल हो गया. इतने में डाक्टर विजिट पर आ गईं. उस ने शीतल का परिचय श्वेता से पाना चाहा तो उस के बताने पर मुसकरा कर ‘हैलो’ कह कर उस ने उस का स्वागत किया और बेटी व दामाद से आगे की प्रक्रिया के बारे में बातचीत करने लगी. उस के बाद डाक्टर ने श्वेता को एक इंजैक्शन दिया और सोने के लिए कह कर चली गई.

जब डाक्टर ने बेटी को सोने के लिए कहा तो उसे आश्चर्य हुआ कि दर्द में कोई कैसे सो सकता है? जिस का समाधान बेटी ने किया कि जो इंजैक्शन दिया है उस से दर्द का अनुभव नहीं होगा. उस के मन में जो दुश्चिंता थी कि कैसे वह अपनी बेटी को दर्द में तड़पते देख पाएगी, लुप्त हो चुकी थी और उस ने राहत की सांस ली. विज्ञान के नए आविष्कार को मन ही मन धन्यवाद दिया. बेटी ने कहा, ‘‘ममा, आप भी सो जाइए.’’ डाक्टर बारबार आ कर श्वेता को संभाल रही थी तो उस को वहां अपनी उपस्थिति का कोई औचित्य भी नहीं लगा, इसलिए वेटिंगरूम में जा कर सो गई. वहां की व्यवस्था से संतुष्ट होने और अपने थके होने के कारण शीतल तुरंत ही गहरी नींद में सो गई.

सुबह 5 बजे के लगभग विनोद ने उसे जगाया और कहा, ‘‘औपरेशन करना पड़ेगा, चलिए.’’ अपनी नींद को कोसती हुई औपरेशन के नाम से कुछ घबराई हुई बेटी के पास गई तो उस ने देखा कि वह औपरेशन थिएटर में जाने के लिए तैयार हो रही है. शीतल को देख कर वह मुसकराने लगी तो उस ने सोचा कि बेकार ही वह उस की हिम्मत पर शक कर रही थी. मन ही मन उस को अपनी बेटी पर गर्व हो रहा था.

औपरेशन थिएटर में विनोद भी श्वेता के साथ पूरे समय रहे. उन्होंने वहां सारी प्रक्रिया की फोटो भी खींची जो देख कर वह आश्चर्यचकित रह गई, जैसे कोई खेल हो रहा है. भारत में तो उस ने ऐसा कभी देखासुना भी नहीं था. वहां पर मां को प्रसव के लिए मानसिक रूप से इतना तैयार कर देते हैं कि परिवार वालों को चिंता करने की या उसे संभालने की आवश्यकता ही नहीं होती. आधे घंटे में ही दामाद बच्चे को गोद में ले कर बाहर आ गए. चांद सी बच्ची की नानी बन कर शीतल फूली नहीं समा रही थी. उस ने देखा बच्चे की दैनिक क्रियाकलापों को सुचारु रूप से करने की पूरी जानकारी नर्स दामाद को दे रही थी. उस की तो किसी भी कार्य में दखलंदाजी की आवश्यकता ही नहीं महसूस की जा रही थी. वह तो पूरा समय केवल मूकदर्शक बनी बैठी रही.

उस ने सोचा, तभी बेटी ने वीजा के साक्षात्कार के समय भूल कर भी बेटी की डिलीवरी के लिए जा रहे हैं, ऐसा न कहने के लिए समझाया था. उस ने चैन की सांस ली कि उस की यह चिंता भी कि कैसे वह मां और बच्चे को संभालेगी, उस को तो कुछ पता ही नहीं है, निरर्थक निकली. घर आ कर बेटी ने बच्चे को संभाल कर पूरी तरह साबित भी कर दिया.

वहां पर बच्चे को अस्पताल से ले जाने के लिए कारसीट का होना अति आवश्यक है, उस के बिना बच्चे को डिस्चार्ज ही नहीं करते. इसलिए उस की भी व्यवस्था कर के उसे नियमानुसार कार की पिछली सीट पर स्थापित किया गया. अस्पताल की साफसफाई और रखरखाव किसी फाइवस्टार होटल से कम नहीं था. डाक्टर और नर्स सभी कमरे में मुसकराते हुए प्रवेश करते थे और उस को ‘हैलो’ कहना नहीं भूलते थे, जो उस की उपस्थितिमात्र को महत्त्वपूर्ण बना देता था. जिस दिन डिस्चार्ज होना था, उस दिन उन सब ने श्वेता को काफी देर बैठ कर बच्चे से संबंधित बातें समझाईं. उस के लिए ये सारी प्रक्रिया किसी सपने से कम नहीं थी.

घर आने के बाद, भारत के विपरीत, मिलने आने वालों के असमय और बिना सूचित किए न आने से बच्चे के किसी भी कार्यकलाप में विघ्न नहीं पड़ता था. बच्चे के कमरे में भी बिना अनुमति के कोई प्रवेश नहीं करता था. बच्चे को दूर से ही देखने की कोशिश करते थे और गोद में उठाने से पहले हाथ अवश्य धोते थे, जिस से उस को किसी भी संक्रमण से बचाया जा सके. वह विस्मित सी सब देखती रहती थी. बेटी से पर्याप्त बातचीत करने का समय मिल जाता था.

बातों ही बातों में उस ने बताया कि वहां पर एकल मातृत्व के कारण और एक उम्र के बाद मांबाप और बच्चों के बीच में मानसिक, शारीरिक व आर्थिक जुड़ाव न होने के चलते अवसाद की समस्या भारत की तुलना में बहुत अधिक है. लेकिन अब वे बहुतकुछ भारतीय संस्कृति से प्रभावित हो कर उसे अपना रहे हैं. दूसरी ओर भारतीय उन की अच्छी बातों को न सीख कर, बुराइयों का अनुकरण कर के गर्त में जा रहे हैं. वहां दूसरी गंभीर समस्या मोटापे को ले कर है क्योंकि वहां अधिकतर डब्बाबंद खा- पदार्थों का अत्यधिक सेवन किया जाता है. इस का भी असर भारत की नई पीढ़ी में देखा जा सकता है.

अमेरिका में 6 महीने कब बीत गए, शीतल को पता ही नहीं चला. वहां के सुखद एहसासों और यादों के साथ भारत लौटने के बाद, एक कसक उस को हमेशा सालती रहती है कि यदि हर भारतीय वहां की बुरी बातों के स्थान पर अच्छी बातों को अपना ले और युवापीढ़ी को उन के बौद्धिक स्तर के अनुसार नौकरी व वेतन मिले तो कोई भी अपनों को छोड़ कर अमेरिका पलायन का विचार भी मन में न लाए. Hindi Social Story :

Hindi Social Story : गेट नंबर चार – गार्ड की दरियादली की दिल छूती कहानी

Hindi Social Story : अशोक सुबह उठ कर व्यायाम कर रहा था. सुबह उठने की उस की बचपन की आदत है. आज भी उसी क्रम मे लगा हुआ था. तब तक रीमा भी उठ कर आ गई और बोली, “चाय का इंतजार तो नहीं कर रहे हो?” “हां, वह तो स्वाभाविक है” अशोक बोल पड़ा.“तो जाओ दूध ले आओ, रात ही बोला था कि दूध खत्म हो गया है.”

“ओह, मैं तो भूल ही गया था. अभी लाया,” कहता हुआ अशोक अपना मास्क लगा कर चल दिया.

जब से कोरोना की महामारी आई है सोसायटी में बिना मास्क लगाये घूमने और निकलने की इजाजत नहीं है.

जैसे ही अशोक लिफ्ट से बाहर निकल कर सोसायटी में अंदर बने मार्केट की ओर चला तभी गेट नंबर चार के पास बैठे गार्ड के सामने खड़े सोसायटी के पदाधिकारियों को खरीखोटी सुनाते हुए देख अशोक के कदम रुक गए.

किस बात पर वे लोग गार्ड को बातें सुना रहे थे यह जानने की थोड़ी उत्सुकता उसे जरुर हो रही थी, पर दूध लाने की जल्दी में ज्यादा समय न बर्बाद करते हुए अशोक दूध लेने चल दिया. दूध ले कर लौटते समय देखा तो वह गार्ड उस गेट से नदारद था.

अशोक ने चारो तरफ निगाह दौड़ाई तो उसे वह गार्ड जाता हुआ दिखाई दिया. लगभग दौड़ते हुए अशोक उस के पास पहुंच गया और पूछ ही लिया, “क्या कह रहे थे वे लोग आप से? अरे, भई बोलो तो सही …” अशोक ने दो बार कहा तो कुछ अस्फुट से शब्द गार्ड के मुंह से निकले जो अशोक को समझ नहीं आए, तो अशोक ने फिर पूछा, “भाई क्या हुआ?”

गार्ड की आंखों में आंसू थे जो आधी कहानी तो ऐसे ही कह रहे थे. फिर कुछ थोड़ा स्थिर हो कर वह बोला, “साहब ये नौकरी तो नौकर से भी बद्तर है. रात भर जाग कर पहरेदारी करो, फिर इन सब की चार बात सुनो.”

“हुआ क्या यह तो बताओ,” अशोक ने फिर पूछा तो वह कहने लगा, “सर जी, चार नंबर गेट के पास कुछ मजदूर परिवार रहते हैं. रोज उन के बच्चों को दूध के लिए बिलखता हुआ मुझ से  देखा नहीं जाता है तो रोज एक दूध का पैकेट और ब्रैड उन्हें अपने पैसों से खरीद कर देता हूं. शायद सीसीटीवी कैमरा में यही कई दिन से रिकौर्ड हो रहा होगा तो सिक्योरिटी वाले साहब तक बात पहुंच गई कि मैं सुबह इन सब से पैसे ले कर इन सब को दूध और ब्रैड बेच रहा हूं,” कहते कहते वह रोने लगा. “साहब इन गरीबो की कौन सुनेगा जो दिन भर एक ब्रेड के सहारे अपना दिन काटते हैं और बड़ी मुश्किलों से रात काट कर सुबह का इंतजार करते हैं कि मैं कब इन्हें दूध और ब्रैड दे दूं.”

अब तक अशोक की आंखों में भी पानी भर चुका था पर गार्ड की बात अभी खत्म नहीं हुई थी. “साहब, आप ये लो पैसे और उन को दूध और ब्रैड दे आइए, उन के बच्चे इंतजार कर रहे होंगे.”

अशोक ने उस को कहा, “आप बिल्कुल परेशान न हों.  उन बच्चों को दूध और ब्रैड जरुर मिलेगी,” और अशोक घर जाने के बजाय गेट नंबर  चार की ओर चल दिया. Hindi Social Story :

Hindi Social Story : एक और कटौती – इंटरनेट से जुड़ते परिवार के माहौल की दिलचस्प कहानी

Hindi Social Story : दिन में कईकई बार इंटरनैट कनैक्शन जब डाउन होने लगता, तो मुझे परदेस गए प्रीतम से भी ज्यादा इंटरनैट का बिछोह सताने लगता और सताता भी क्यों न, इंटरनैट के बिना पूरे घर की हर चीज ही बेकार है, जिंदगी भी बेकार हो जाती है.

मैं ने गैस पर दूध का भगोना रखा. डबलरोटी की 2 स्लाइस टोस्टर में डाली ही थीं कि व्हाट्सऐप चैट की घंटी बजने लगी और एकएक कर के हम 4 सहेलियों की बातें शुरू हो गईं. एक ने अपने रोमांस के नए किस्से को शुरू ही किया था.

मनपसंद गौसिप सुन कर मैं फौरन गैस बंद कर के सोफे पर जा बैठी और चारू, रमा, तिस्ता की बातों में डूबने लगी. अभी बात आधी भी खत्म नहीं हुई थी कि मेरा इंटरनैट कनैक्शन चला गया. स्क्रीन फ्रीज हो गई.

हाय रे, इंटरनैट चला गया. नैट के जाते ही हमारा उल्लास भी तिरोहित हो गया. काफी दिनों बाद तो ग्रुप चैट हो रही थी और उसे में पूरा सुनने की तमन्ना दिल में ही रह गई. अब वे चारों अपनीअपनी बातें कह रही होंगी और मैं घर में ही फिर रही थी.

पिछले महीने ओटीटी पर जो फिल्में आई थीं, पूरा परिवार अपनेअपने मोबाइलों पर घंटों देखता रहा था, सो, नैट का बैलेंस खत्म हो गया होगा. जिस समय हमारा मूड होता, तभी इंटरनैट बंद हो जाता. इंटरनैट वाले न दिन देखते, न रात, न घंटे, न मिनट. पैसा खत्म, बात आधीपूरीकटी.

पिछली गरमी की एकएक घड़ी याद दिलाती है. इंटरनैट चले जाने से व्हाट्सऐप भी बंद हो गया और मेल आने भी बंद हो गए. बाहर निकलना मुश्किल होता.

प्रीतम से भी ज्यादा इंटरनैट का बिछोह सताने लगा. प्रीतम विदेश गए हुए थे. वह पिछले दिन आंधी आई थी और न जाने कहांकहां के तार टूट गए थे. इंटरनैट चला गया था. फोन करने की हिम्मत नहीं रही थी क्योंकि इंटरनेशनल कौल तो बहुत महंगी होती है. बेटी गुस्से में गुसलखाने में नहाने घुस गई. मैं अपने रोज के कामकाज में लग गई थी.

इतनी देर में 6 वर्षीय चिंटू बड़बड़ करता हुआ मेरे पास आया, ‘‘मां, स्कूल टीचर ने सारा होमवर्क व्हाट्सऐप पर भेजा है पर नैट नहीं चल रहा. सो, कैसे देखूं.”

कोई चारा न देख कर पता किया कि उस के किस क्लासफ्रैंड के पास नैट होगा. अब उबर मंगा कर उस के घर जाना पड़ेगा, वहां से सारा होमवर्क पैनड्राइव में लेना होगा और रास्ते में साइबर कैफे से प्रिंट लेना होगा क्योंकि चिंटू जी का होमवर्क जो है. हालांकि मैं ने कहा भी कि शाम तक नैट चालू हो जाएगा लेकिन वह जिद करने लगा. फिर लंबी कवायद की.

8 बजने वाले थे रात को. तो फिर वही बात, ओटीटी पर तो कुछ देख ही नहीं सकते. मोबाइल में डेटा क्यों नहीं लिया, यह झुनझुनाते हुए एक किताब उठा कर पढऩे की कोशिश करने लगी.

अगले दिन बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद मैं ने फ्रिज खोल कर देखा कि खाने में क्या है. सुबह 6 बजे के बाद बिग बास्केट शुरू होती थी और मैं उसी से ग्रौसरी खरीदती थी. अभी 9 बजने में भी 5 मिनट थे. अब मुझे औलाइन और्डर करना था या तो फोन करना था या फिर जा कर खरीदारी करनी थी, क्योंकि नैट नहीं चल रहा था.

लो, हो गई छुट्टी, अब क्या होगा. कल की ग्रौसरी तो सारी खत्म हो गई. अभी तो खाना बनाना है और पीने के लिए सारा दिन पानी चाहिए. लिहाजा, बास्केट लाई, स्टोर गई और 3 थैले भर कर गरमी में ढोतेढोते मैं हांफ गई और पसीनापसीना हो गई. पर क्या किया जा सकता था. क्या करूं समझ नहीं आ रहा.

रहरह कर खयाल आ रहा था कि किट्टी ग्रुप में क्याक्या बातें हो रही होंगी. एक को फोन किया तो उस ने काट दिया कि वह वीडियो चैट पर लगी है.

दोपहर करीब एक बजे खाना खाने के बाद बदन अलसाया सा हो रहा था. सोचा, थोड़ी देर लेट ही लूं. झपकी आ जाएगी तो ठीक रहेगा. पर अब नैट देखतेदेखते सोने की आदत हो गई है.

जैसे ही मैं ने बिस्तर छोड़ा कि दनदन करता हुआ पंखा चल पड़ा. ऐसा गुस्सा आया कि पंखे पर एक डंडा मार दूं. पर नुकसान तो अपना ही होगा, यह सोच कर रुक गई. यह भी भला कोई तुक हुई कि मेरा मूड बिगाड़ कर बिजली ने अपना मूड ठीक कर लिया. खैर, कई दिनों से अपनी जो कहानी अधूरी पड़ी थी, उसे ही पूरा करने बैठ गई.

शाम को 7 बजे सारे कामों से फ्री हो कर मैं ने दोनों बच्चों को पढऩे के लिए बैठाया. मेरे बैठे बिना तो बच्चे पढ़ते ही नहीं हैं और चूंकि परीक्षाएं चल रही थीं, इसलिए उन को पढ़ाना भी जरूरी था. मैं ने उन्हें पढ़ाना शुरू किया. अभी एक पाठ ही खत्म हुआ था कि दोनों तरहतरह के सवाल पूछने लगे. ‘‘ममी, भारत का लैंड मास कितना है?” ‘‘ममी, डीएनए का फुलफौर्म क्या है?’’ अब गूगल होता तो जवाब दे पाती. इंटरनैट नहीं, तो गूगल गुरु की छुट्टी पर पुरानी किताबों से ढूंढढांढ कर जवाब लिखाए.

मैं खीझ उठी थी और बच्चे पढ़ाई से छुट्टी मिल जाने से खुश हो कर चिल्लाने लगे, ‘‘मां, नैट गया. अब हम नहीं पढ़ सकते.’’ यह  कह कर दोनों उस बिस्तर पर चढ़ कर मस्ती करने लगे.

नैट न आने का क्रोध अब मैं ने शोर करते बच्चों पर निकाला, ‘‘इतनी देर से तुम किताब पढऩे क्यों नहीं बैठे. जब तक डांट नहीं पड़ती, सुनते ही नहीं हो. 2 दिन नैट के बिना नहीं रह सकते. परीक्षा के समय में भी तुम्हें अपनी पढ़ाई का ध्यान नहीं रहता.’’ और एकएक चपत मैं ने उन दोनों को लगा दी.

अब दोनों का बैंड पूरे स्वर में बज रहा था. दोनों चुप नहीं हो रहे थे. मैं ने ही फिर धैर्य का मुखौटा चढ़ाया और बच्चों को पुचकार कर स्टोर से निकाल कर किताबें पढऩे को बैठाया.

उसी शाम को 4 पड़ोसिनें आ गईं. आते ही उन्होंने वाईफाई का पासवर्ड मांगा.

मेरा मुंह उतर गया. “नैट चल नहीं रहा,’’ मैं ने धीरे से कहा यानी किसी का क्या कर दिया हो. अब स्वीगी से कुछ और्डर करना तो संभव ही था. गरमी में किचन में घुसना पड़ा, बैठेबैठे और्डर दे डाला, ‘‘सुम्मी, 4 गिलास ठंडी कौफी तो बना कर भेजना.’’

सुम्मी का जवाब आया, ‘‘मम्मी, दूध तो खत्म हो गया.’’ नौकर को मैं ने डेरी पर दूध लाने को भेज दिया था. आधा घंटा हो गया था, आता ही होगा, यह सोचते हुए मैं ने कोल्ड कौफी बना कर दी. पड़ोसिनें तो कोल्ड हो गईं पर मैं इंटरनैट न होने की वजह से हौट हो रही थी.

सब ने कौफी पी, किसी ने यह नहीं कहा कि कौफी कैसी बनी है. उन का चोरीछिपे मुंह बनाना मुझ से छिपा नहीं रहा. वे सोच रही होंगी कि कैसी फूहड़ है, जिस का इंटरनैट तक काम नहीं करता.

अब मुझे नौकर का ध्यान आया, जिसे बाजार गए एक घंटा हो गया था और अभी तक दूध ले कर नहीं लौटा था. बहुत देर बाद जब वह आया तो अपनी उतरी हुई सूरत ले कर. बड़ी भीड़भाड़ में धक्के खा कर आ रहा हूं. स्टोर में सिस्टम खराब था, इसलिए बिल्डिंग में लाइन बहुत लंबी थी. वे लोग मैनुअल बिल काट रहे थे और उस में बहुत समय लग रहा था. इस वजह से देरी हो गई.

रविवार का दिन था. उस दिन सब आराम से उठते हैं और आराम से ही नहाते हैं. पूरी सुबह व्हाट्सऐप मैसेजों को देखने में लगाई जाती है. अभी खोला ही था कि इंटरनैट गायब. लगता है, शहर में कहीं कोई घटना घट गई है और सरकार ने इंटरनैट पर पाबंदी लगा दी. फोन का सिग्नल भी कभी आता, कभी जाता. दोस्तों से मुलाकात तय थी पर अब कंफर्म कैसे किया जाए.

हम ने सुना था कि नैट पर एक अच्छा धारावाहिक आ रहा है. खाना बना कर उसे मेज पर रख  पूरा परिवार उसे देखने में उत्सुक था. फिल्म में कोई कामुक सीन आ रहा था और पतिदेव आंख गड़ाए देख रहे थे कि इंटरनैट गायब. बच्चों को तो पहले ही भगा दिया गया था. अब हम दोनों एकदूसरे का मुंह ताक रहे थे.

फोन करने पर पता चला कि आंधी के कारण कहींकहीं तार टूट गए हैं, 2-4 घंटे लग सकते थे.

एक दिन सुबह से ही इन्होंने कह दिया था, ‘‘मेरे दफ्तर के 4 अफसर दिल्ली से आए हैं, वे शाम को यहीं खाना खाएंगे. जरा खाना अच्छा बनाना और घर भी ठीक तरह संवार लेना.’’

मैं ने बड़े यत्न से 4 सब्जियां, दही की गुझिया, मूंग की दाल का हलवा और शाही पुलाव बनाया. मैं बनाती जा रही थी और सोचती जा रही थी कि आज खाने की बहुत तारीफ होगी. शाम को साढ़े 6 बजे तक सारे काम से फ्री हो कर मैं खुद भी तैयार हो गई. फिर नौकर के संग लग कर मेज भी बढिय़ा सजा दी.

7 बजे के करीब ये आ गए. तभी मेहमानों का फोन आया कि घर का पता दो और लोकेशन दो. इंटरनैट नहीं चल रहा था. मेहमान भटक रहे थे. पतिदेव उन्हें डायरैक्शन समझाने की काशिश में थे. पता चला कि वे कीर्तिनगर की जगह जानकीपुरम में हमारा घर ढूंढ रहे थे. 3 घंटे बाद मेहमान आए. सारा खाना ठंडा हो गया था. उसे फिर गरम किया गया पर अब वह स्वाद कहां.

खाना खातेखाते ही सब को नींद आने लगी थी. सारा इंप्रैशन जमाने का कार्यक्रम चौपट हो गया.

सब इस तरह खा रहे थे मानो फ्लाइट पकडऩी है. न कुछ गपशप और न हंसी के ठहाके ही गूंज रहे थे. सब इंटरनैट को ही कोस रहे थे. मेरे सोचे हुए इंद्रधनुषी रंग भी बिखर गए थे, खैर, जैसेतैसे खाना खत्म हुआ और मेहमान भागे.

जैसेजैसे भगवा गैंगों की हरकतें बढ़ रही थीं, इंटरनैट की कटौती ज्यादा होने लगी. वाईफाई भी नहीं चल रहा था. कितने ही स्मार्टफैन, लाइटें अब उठ कर खुद बंद करनी पड़ती थीं. एक दिन एक आदमी आया और उस ने कहा कि आप ने 80 जीवी का पैकेज लिया था पर यूज 120 जीवी कर लिया. एडीशनल पैसे दीजिए. क्या करती, अतिरिक्त पैसे देने पड़े.

एक दिन शाम को ये आए, एक पैकेट मुझे पकड़ा दिया. मैं ने पूछा, ‘‘क्या है इस में?’’

मुसकराते हुए ये बोले, ‘‘पोस्टकार्ड और लिफाफे. इंटरनैट का भरोसा नहीं, इसलिए अब फिर से पक्की बात पत्र लिख कर ही किया करो.’’
मैं ने सोचा, लो फिर आ गए 1980 के जमाने में.

जैसेजैसे गरमी बढ़ रही थी, बिजली की कटौती ज्यादा होती चली जा रही थी.

मिट्टी का तेल व फ्लिट बाजार में आसानी से मिलता नहीं था. हम मन में किसी तरह संतोष कर मिलने वाली रोशनी और पंखों का सदुपयोग कर रहे थे कि एक भरी दोपहर में बिजली विभाग की गाड़ी हमारे घर के दरवाजे पर आ कर रुकी.

उस में से 3 आदमी उतरे. उस दिन मेरे पति घर पर ही थे. एक आदमी ने कहा, ‘‘आप को 30 यूनिट का कोटा दिया गया था. पर आप ने इस महीने में 70 यूनिट बिजली खर्च की है. इसलिए हम कनैक्शन काट रहे हैं.’’

यह कहते हुए उन्होंने खच्च से हमें हमारे प्राणों से जुदा कर दिया. ये हक्केबक्के से देखते रहे. मैं घर में पड़ी एक बोतल मिट्टी के तेल को प्रश्नसूचक मुद्रा में देखने लगी. इतने में ये शर्ट पहन कर आए.

मैं ने पूछा, ‘‘कहां चल दिए?’’

हाथ में डब्बा ले मुसकराते हुए ये बोले, ‘‘मिट्टी का तेल लाने.’’

इन शब्दों के साथ ही उन गमगीन क्षणों में भी हम दोनों जोरों से हंस पड़े. Hindi Social Story :

Hindi Romantic Story : दिल धड़कने दो – पुरुष और स्त्री के उथलपुथल मन की कहानी

Hindi Romantic Story :

एक

सुबह 6 बजे का अलार्म बजा तो तन्वी उठ कर हमारे 10 साल के बेटे राहुल को स्कूल भेजने की तैयारी में व्यस्त हो गई. मैं भी साथ ही उठ गया. फ्रैश हो कर रोज की तरह 5वीं मंजिल पर स्थित अपने फ्लैट में राहुल के बैडरूम की खिड़की के पास आ कर खड़ा हो गया. कुछ दूर वाली बिल्डिंग की तीसरी मंजिल के फ्लैट में उस के बैडरूम की भी लाइट जल रही थी.

इस का मतलब वह भी आज जल्दी उठ गई है. कल तो उस के बैडरूम की खिड़की का परदा 7 बजे के बाद ही हटा था. उस की जलती लाइट देख कर मेरा दिल धड़का, अब वह किसी भी पल दिखाई दे जाएगी. मेरे फ्लैट की बस इसी खिड़की से उस के बैडरूम की खिड़की, उस की किचन का थोड़ा सा हिस्सा और उस के फ्लैट का वाशिंग ऐरिया दिखता है.

तभी वह खिड़की के पास आ खड़ी हुई. अब वह अपने बाल ऊपर बांधेगी, कुछ पल खड़ी रहेगी और फिर तार से सूखे कपड़े उतारेगी. उस के बाद किचन में जलती लाइट से मुझे अंदाजा होता है कि वह किचन में है. 10 साल से मैं उसे ऐसे ही देख रहा हूं. इस सोसायटी में उस से पहले मैं ही आया था. वह शाम को गार्डन में नियमित रूप से जाती है. वहीं से मेरी उस से हायहैलो शुरू हुई थी. अब तो कहीं भी मिलती है, तो मुसकराहट और हायहैलो का आदानप्रदान जरूर होता है. मैं कोई 20-25 साल का नवयुवक तो हूं नहीं जो मुझे उस से प्यारव्यार का चक्कर हो. मेरा दिल तो बस यों ही उसे देख कर धड़क उठता है. अच्छी लगती है वह मुझे, बस. उस के 2 युवा बच्चे हैं. वह उम्र में मुझ से बड़ी ही होगी. मैं उस के पति और

बच्चों को अच्छी तरह पहचानने लगा हूं. मुझे उस का नाम भी नहीं पता और न उसे मेरा पता होगा. बस सालों से यही रूटीन चल रहा है.

अभी औफिस जाऊंगा तो वह खिड़की के पास खड़ी होगी. हमारी नजरें मिलेंगी और फिर हम दोनों मुसकरा देंगे.

औफिस से आने पर रात के सोने तक मैं इस खिड़की के चक्कर काटता रहता हूं. वह दिखती रहती है, तो अच्छा लगता है वरना जीवन तो एक ताल पर चल ही रहा है. कभी वह कहीं जाती है तो मुझे समझ आ जाता है वह घर पर नहीं है… सन्नाटा सा दिखता है उस फ्लैट में फिर. कई बार सोचता हूं किसी की पत्नी, किसी की मां को चोरीछिपे देखना, उस के हर क्रियाकलाप को निहारना गलत है. पर क्या करूं, अच्छा लगता है उसे देखना.

तन्वी मुझ से पहले औफिस निकलती है और मेरे बाद ही घर लौटती है. राहुल स्कूल से सीधे सोसायटी के डे केयर सैंटर में चला जाता है. मैं शाम को उसे लेते हुए घर आता हूं. कई बार जब वह मुझ से सोसायटी की मार्केट में या नीचे किसी काम से आतीजाती दिखती है तो सामान्य अभिवादन के साथ कुछ और भी होता है हमारी आंखों में अब. शायद अपने पति और बच्चों में व्यस्त रह कर भी उस के दिल में मेरे लिए भी कुछ तो है, क्योंकि रोज यह इत्तेफाक तो नहीं कि जब मैं औफिस के लिए निकलता हूं, वह खिड़की के पास खड़ी मुझे देख रही होती है.

वैसे कई बार सोचता हूं कि मुझे अपने ऊपर नियंत्रण रखना चाहिए. क्यों रोज मैं उसे सुबह देखने यहां खड़ा होता हूं  फिर सोचता हूं कुछ गलत तो नहीं कर रहा हूं… उसे देख कर कुछ पल चैन मिलता है तो इस में क्या बुरा है  किसी का क्या नुकसान हो रहा है

तभी वह सूखे कपड़े उतारने आ गई. उस ने ब्लैक गाउन पहना है. बहुत अच्छी लगती है वह इस में. मन करता है वह अचानक मेरी तरफ देख ले तो मैं हाथ हिला दूं पर उस ने कभी नहीं देखा. पता नहीं उसे पता भी है या नहीं… यह खिड़की मेरी है और मैं यहां खड़ा होता हूं. नीचे लगे पेड़ की कुछ टहनियां आजकल मेरी इस खिड़की तक पहुंच गई हैं. उन्हीं के झुरमुट से उसे देखा करता हूं.

कई बार सोचता हूं हाथ बढ़ा कर टहनियां तोड़ दूं पर फिर मैं उसे शायद साफसाफ दिख जाऊंगा… सोचेगी… हर समय यहीं खड़ा रहता है… नहीं, इन्हें रहने ही देता हूं. वह कपड़े उतार कर किचन में चली गई तो मैं भी औफिस जाने की तैयारी करने लगा. बीचबीच में मैं उसे अपने पति और बच्चों को ‘बाय’ करने के लिए भी खड़ा देखता हूं. यह उस का रोज का नियम है. कुल मिला कर उस का सारा रूटीन देख कर मुझे अंदाजा होता है कि वह एक अच्छी पत्नी और एक अच्छी मां है.

औफिस में भी कभीकभी उस का यों ही खयाल आ जाता है कि वह क्या कर रही होगी. दोपहर में सोई होगी… अब उठ गई होगी… अब उस सोफे पर बैठ कर चाय पी रही होगी, जो मेरी खिड़की से दिखता है.

औफिस से आ कर मैं फ्रैश हो कर सीधा खिड़की के पास पहुंचा. राहुल कार्टून देखने बैठ गया था. मेरा दिल जोर से धड़का. वह खिड़की में खड़ी थी. मन किया उसे हाथ हिला दूं… कई बार मन होता है उस से कुछ बातें करने का, कुछ कहने का, कुछसुनने का, पर जीवन में कई इच्छाओं को, एक मर्यादा में, एक सीमा में रखना ही पड़ता है… कुछ सामाजिक दायित्व भी तो होते हैं… फिर सोचता हूं दिल का क्या है, धड़कने दो.

दो

सुबह 6 बजे का अलार्म बजा. मैं ने तेजी से उठ कर फ्रैश हो कर अपने बैडरूम की लाइट जला दी. समीर भी साथ ही उठ गए थे.

वे सुबह की सैर पर जाते हैं. मैं ने बैडरूम की खिड़की का परदा हटाया. अपने बाल बांधे. जानती हूं वह सामने अपने फ्लैट की खिड़की में खड़ा होगा, आजकल नीचे लगे पेड़ की कुछ टहनियां उस की खिड़की तक जा पहुंची हैं. कई बार सोचती हूं वह हाथ बढ़ा कर उन्हें तोड़ क्यों नहीं देता पर नहीं, यह ठीक नहीं होगा. फिर वह साफसाफ देख लेगा कि मैं उसे चोरीचोरी देखती रहती हूं. नहीं, ऐसे ही ठीक है. तार से कपड़े उतारते हुए मैं कई बार उसे देखती हूं, कपड़े तो मैं दिन में कभी भी उतार सकती हूं, कोई जल्दी नहीं होती इन की पर इस समय वह खड़ा होता है न, न चाहते हुए भी उसे देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाती हूं.

मैं ने कपड़े उतारते हुए कनखियों से उसे देखा. हां, वह खड़ा था. मन हुआ हाथ हिला कर हैलो कर दूं पर नहीं, एक विवाहिता की कुछ अपनी मर्यादाएं होती हैं. मेरा दिल जोर से धड़कता है जब मैं महसूस करती हूं वह अपनी खिड़की में खड़ा हो कर मेरी तरफ देख रहा है. स्त्री हूं न, बहुत कुछ महसूस कर लेती हूं, बिना किसी के कुछ कहेसुने. मैं समीर और अपने बच्चों के नाश्ते और टिफिन की तैयारी मैं व्यस्त हो गई.

तीनों शाम तक ही वापस आते हैं. मेरी किचन के एक हिस्से से उस की खिड़की का थोड़ा सा हिस्सा दिखता है, जिस खिड़की के पास वह खड़ा होता है वह शायद बैडरूम की है. किचन में काम करतेकरते मैं उस पर नजर डालती रहती हूं. सब समझ आता रहता है, वह अब तैयार हो रहा है. मुझे अंदाजा है उस के कमरे की किस दीवार पर शीशा है. मैं ने उसे वहां कई बार बाल ठीक करते देखा है.

जानती हूं किसी के पति को, किसी के पिता को ऐसे देखना मर्यादासंगत नहीं है पर क्या करूं, कुछ है, जो दिल धड़कता है उस के सामने होने पर. 10 साल से कुछ है जो उसे कहीं देखने पर, नजरें मिलने पर, हायहैलो होने पर दिल धड़क उठता है. वह अपनी कामकाजी पत्नी की घर के काम में काफी मदद करता है, बेटे को ले कर आता है, घर का सामान लाता है, कभी अपनी पत्नी को छोड़ने और लेने भी जाता है… सब दिखता है मुझे अपने घर की खिड़की से. कुल मिला कर वह एक अच्छा पति और अच्छा पिता है. कई बार तो मैं ने उसे कपड़े सुखाते भी देखा है… न मुझे उस का नाम पता है न उसे मेरा पता होगा. बस, उसे देखना मुझे अच्छा लगता है. मैं कोई युवा लड़की तो हूं नहीं जो प्यारव्यार का चक्कर हो. बस, यों ही तो देख लेती हूं उसे. वैसे दिन में कई बार खयाल आ जाता है कि क्या काम करता है वह  कहां है उस का औफिस  वह औफिस से आते ही अपनी खिड़की खोल देता है. मुझे अंदाजा हो जाता है वह आ गया है, फिर वह कई बार खिड़की के पास आताजाता रहता है. वह कई बारछुट्टियों में बाहर चला जाता है तो बड़ा खालीखाली लगता है.

10 साल से यों ही देखते रहना एक आदत सी बन गई है. वह दिखता रहता है पेड़ की पत्तियों के बीच से. दिल करता है उस से कुछ बातें करूं, कुछ कहूं, कुछ सुनूं पर नहीं जीवन में कई इच्छाओं को एक मर्यादा में रखना ही पड़ता है… कुछ सामाजिक उसूल भी तो हैं, फिर सोचती हूं दिल का क्या है, धड़कने दो. Hindi Romantic Story :

Azad Bharath Movie Review : “फिल्म देशभक्ति की भावना जगाती है”

Azad Bharath Movie Review : यह तो सभी जानते हैं कि 15 अगस्त, 1947 को भारत को ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्ति मिली जिसे ‘आजाद भारत’ कहा जाता है. ब्रिटिश राज से आजाद भारत, जो अब एक संप्रभु लोकतांत्रिक राष्ट्र है. जो अपने नागरिकों को समान अधिकार और स्वतंत्रता देता है, जैसा कि संविधान में वर्णित है. भारत का स्वतंत्रता दिवस हर वर्ष 15 अगस्त को देश भर में हर्षोल्लास से मनाया जाता है. इस दिन 200 वर्ष से अधिक समय तक ब्रिटिश उपनिवेशवाद के चंगुल से छूट कर एक नए युग की शुरुआत हुई थी.

‘आजाद’ शीर्षक से पहले भी बहुत सी फिल्में बन चुकी हैं. सन 1955 में दिलीपकुमार, मीना कुमारी और प्राण की फिल्म ‘आजाद’ रिलीज हुई थी. 1978 में धर्मेंद्र, हेमामालिनी की फिल्म ‘आजाद’ आई थी. 2025 में आई एम ए (इंडियन नैशनल आर्मी पर आधारित फिल्म) आई, जिस में अजय देवगन, डायना पेंटी थे. यह फिल्म झांसी की रानी रेजिमैंट पर केंद्रित थी. इन के अलावा भी क्षेत्रीय भाषाओं में ‘आजाद’ शीर्षक से फिल्में बनीं, मगर इन सभी का भारत के आजाद होने या स्वतंत्रता संग्राम से कोई वास्ता न था.

मगर 2026 के दस्तक देते ही श्रेयस तलपड़े अभिनीत की ‘आजाद भारत’ परदे पर नजर आई है. यह हिंदी भाषा की ऐतिहासिक फिल्म है. रूपा अय्यर द्वारा निर्देशित यह फिल्म भारतीय राष्ट्रीय सेना की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिस में इस की महिला इकाई “झांसी की रानी रेजिमैंट” पर ध्यान केंद्रित किया गया है. महिला क्रांतिकारियों के संघर्ष को प्रभावी ढंग से दिखाने वाली यह फिल्म भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महिला क्रांतिकारियों की अनकही कहानी दिखाती है. लगभग 2 घंटे की यह फिल्म नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ भारत की आजादी में शामिल हुई नीरा आर्य की ऐतिहासिक कहानी को दर्शाती है. इस फिल्म को आप नीरा आर्य की बायोपिक भी कह सकते हैं.

फिल्म की कहानी रानी औफ झांसी रेजिमैंट पर आधारित है. कुछ रेजिमैंट की स्थापना नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने की थी. कहानी मुख्यतया नीरा आर्य पर आधारित है परंतु नीरा के साथसाथ सरस्वती राजमणि और दुर्गा जैसी महिलाओं को भी दिखाया गया है.

फिल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित है और स्वतंत्रता संग्राम की अनकही कहानियों को सामने लाती है. खास कर महिला क्रांतिकारियों के बलिदान को. नीरा आर्य नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में काम करती थीं. उस ने नेताजी की जान की दुश्मन बनी अंग्रेज सरकार के सीआईडी इंस्पैक्टर अपने पति श्रीकांत को भी नीरा ने मार दिया था. क्योंकि वह नेताजी के लिए खतरा बन गया था. अंत में उसने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी.

फिल्म देशभक्ति की भावना जगाती है. इसे रिसर्च मेहनत के साथ बनाया गया है. फिल्म के कई सीन रोंगटे खड़े करते हैं. संवाद भी दिलों को छूने वाले हैं. निर्देशिका रूपा अय्यर ने नीरा आर्य की मुख्य भूमिका खुद निभाई है. उन्होंने अपने चेहरे पर गुस्से व आक्रोश के भाव दिखाए हैं. नेताजी सुभाषचंद्र बोस की भूमिका में श्रेयस तलपड़े ने बढ़िया अभिनय किया है. सरस्वती राजमणि बनी इंदिरा तिवारी का अभिनय भी देखने लायक है. सुरेश ओबेरौय ने हज्जूराम की भूमिका में काम किया है. कहानी में ट्विस्ट्स दिखने लायक हैं.

अंग्रेजों के अत्याचार सहते हुए भी नीरा का न टूटना, रूपा अय्यर के अभिनय की ताकत को दर्शाता है. उस की भूमिका चुनौतीपूर्ण है, वह अपने पति से कहती है, ‘तुम जैसे अंग्रेज’ के कुत्ते के हाथ में नेताजी कभी नहीं आने वाले.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रूप में श्रेयस तलपड़े ने छाप छोड़ी है. उस का यह संवाद ‘नारी जब ठान ले उसे कोई नहीं रोक सकता. मुझे नाज है हिंद की नारी पर’ दर्शकों में जोश भर देता है. बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी की गति के साथ तालमेल बैठाता है. गीत ‘जय हो’ देश भक्ति की भावना जगाता है. फिल्म का निर्देशन बढ़िया है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है.

नीरा आर्य की यह कहानी हर भारतीय को देखनी चाहिए, भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की कुछ अच्छी कहानियां हमारे युवाओं को अवश्य पढ़नी व देखनी चाहिए. Azad Bharath Movie Review :

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