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Hindi Romantic Story : दिल धड़कने दो – पुरुष और स्त्री के उथलपुथल मन की कहानी

Hindi Romantic Story :

एक

सुबह 6 बजे का अलार्म बजा तो तन्वी उठ कर हमारे 10 साल के बेटे राहुल को स्कूल भेजने की तैयारी में व्यस्त हो गई. मैं भी साथ ही उठ गया. फ्रैश हो कर रोज की तरह 5वीं मंजिल पर स्थित अपने फ्लैट में राहुल के बैडरूम की खिड़की के पास आ कर खड़ा हो गया. कुछ दूर वाली बिल्डिंग की तीसरी मंजिल के फ्लैट में उस के बैडरूम की भी लाइट जल रही थी.

इस का मतलब वह भी आज जल्दी उठ गई है. कल तो उस के बैडरूम की खिड़की का परदा 7 बजे के बाद ही हटा था. उस की जलती लाइट देख कर मेरा दिल धड़का, अब वह किसी भी पल दिखाई दे जाएगी. मेरे फ्लैट की बस इसी खिड़की से उस के बैडरूम की खिड़की, उस की किचन का थोड़ा सा हिस्सा और उस के फ्लैट का वाशिंग ऐरिया दिखता है.

तभी वह खिड़की के पास आ खड़ी हुई. अब वह अपने बाल ऊपर बांधेगी, कुछ पल खड़ी रहेगी और फिर तार से सूखे कपड़े उतारेगी. उस के बाद किचन में जलती लाइट से मुझे अंदाजा होता है कि वह किचन में है. 10 साल से मैं उसे ऐसे ही देख रहा हूं. इस सोसायटी में उस से पहले मैं ही आया था. वह शाम को गार्डन में नियमित रूप से जाती है. वहीं से मेरी उस से हायहैलो शुरू हुई थी. अब तो कहीं भी मिलती है, तो मुसकराहट और हायहैलो का आदानप्रदान जरूर होता है. मैं कोई 20-25 साल का नवयुवक तो हूं नहीं जो मुझे उस से प्यारव्यार का चक्कर हो. मेरा दिल तो बस यों ही उसे देख कर धड़क उठता है. अच्छी लगती है वह मुझे, बस. उस के 2 युवा बच्चे हैं. वह उम्र में मुझ से बड़ी ही होगी. मैं उस के पति और

बच्चों को अच्छी तरह पहचानने लगा हूं. मुझे उस का नाम भी नहीं पता और न उसे मेरा पता होगा. बस सालों से यही रूटीन चल रहा है.

अभी औफिस जाऊंगा तो वह खिड़की के पास खड़ी होगी. हमारी नजरें मिलेंगी और फिर हम दोनों मुसकरा देंगे.

औफिस से आने पर रात के सोने तक मैं इस खिड़की के चक्कर काटता रहता हूं. वह दिखती रहती है, तो अच्छा लगता है वरना जीवन तो एक ताल पर चल ही रहा है. कभी वह कहीं जाती है तो मुझे समझ आ जाता है वह घर पर नहीं है… सन्नाटा सा दिखता है उस फ्लैट में फिर. कई बार सोचता हूं किसी की पत्नी, किसी की मां को चोरीछिपे देखना, उस के हर क्रियाकलाप को निहारना गलत है. पर क्या करूं, अच्छा लगता है उसे देखना.

तन्वी मुझ से पहले औफिस निकलती है और मेरे बाद ही घर लौटती है. राहुल स्कूल से सीधे सोसायटी के डे केयर सैंटर में चला जाता है. मैं शाम को उसे लेते हुए घर आता हूं. कई बार जब वह मुझ से सोसायटी की मार्केट में या नीचे किसी काम से आतीजाती दिखती है तो सामान्य अभिवादन के साथ कुछ और भी होता है हमारी आंखों में अब. शायद अपने पति और बच्चों में व्यस्त रह कर भी उस के दिल में मेरे लिए भी कुछ तो है, क्योंकि रोज यह इत्तेफाक तो नहीं कि जब मैं औफिस के लिए निकलता हूं, वह खिड़की के पास खड़ी मुझे देख रही होती है.

वैसे कई बार सोचता हूं कि मुझे अपने ऊपर नियंत्रण रखना चाहिए. क्यों रोज मैं उसे सुबह देखने यहां खड़ा होता हूं  फिर सोचता हूं कुछ गलत तो नहीं कर रहा हूं… उसे देख कर कुछ पल चैन मिलता है तो इस में क्या बुरा है  किसी का क्या नुकसान हो रहा है

तभी वह सूखे कपड़े उतारने आ गई. उस ने ब्लैक गाउन पहना है. बहुत अच्छी लगती है वह इस में. मन करता है वह अचानक मेरी तरफ देख ले तो मैं हाथ हिला दूं पर उस ने कभी नहीं देखा. पता नहीं उसे पता भी है या नहीं… यह खिड़की मेरी है और मैं यहां खड़ा होता हूं. नीचे लगे पेड़ की कुछ टहनियां आजकल मेरी इस खिड़की तक पहुंच गई हैं. उन्हीं के झुरमुट से उसे देखा करता हूं.

कई बार सोचता हूं हाथ बढ़ा कर टहनियां तोड़ दूं पर फिर मैं उसे शायद साफसाफ दिख जाऊंगा… सोचेगी… हर समय यहीं खड़ा रहता है… नहीं, इन्हें रहने ही देता हूं. वह कपड़े उतार कर किचन में चली गई तो मैं भी औफिस जाने की तैयारी करने लगा. बीचबीच में मैं उसे अपने पति और बच्चों को ‘बाय’ करने के लिए भी खड़ा देखता हूं. यह उस का रोज का नियम है. कुल मिला कर उस का सारा रूटीन देख कर मुझे अंदाजा होता है कि वह एक अच्छी पत्नी और एक अच्छी मां है.

औफिस में भी कभीकभी उस का यों ही खयाल आ जाता है कि वह क्या कर रही होगी. दोपहर में सोई होगी… अब उठ गई होगी… अब उस सोफे पर बैठ कर चाय पी रही होगी, जो मेरी खिड़की से दिखता है.

औफिस से आ कर मैं फ्रैश हो कर सीधा खिड़की के पास पहुंचा. राहुल कार्टून देखने बैठ गया था. मेरा दिल जोर से धड़का. वह खिड़की में खड़ी थी. मन किया उसे हाथ हिला दूं… कई बार मन होता है उस से कुछ बातें करने का, कुछ कहने का, कुछसुनने का, पर जीवन में कई इच्छाओं को, एक मर्यादा में, एक सीमा में रखना ही पड़ता है… कुछ सामाजिक दायित्व भी तो होते हैं… फिर सोचता हूं दिल का क्या है, धड़कने दो.

दो

सुबह 6 बजे का अलार्म बजा. मैं ने तेजी से उठ कर फ्रैश हो कर अपने बैडरूम की लाइट जला दी. समीर भी साथ ही उठ गए थे.

वे सुबह की सैर पर जाते हैं. मैं ने बैडरूम की खिड़की का परदा हटाया. अपने बाल बांधे. जानती हूं वह सामने अपने फ्लैट की खिड़की में खड़ा होगा, आजकल नीचे लगे पेड़ की कुछ टहनियां उस की खिड़की तक जा पहुंची हैं. कई बार सोचती हूं वह हाथ बढ़ा कर उन्हें तोड़ क्यों नहीं देता पर नहीं, यह ठीक नहीं होगा. फिर वह साफसाफ देख लेगा कि मैं उसे चोरीचोरी देखती रहती हूं. नहीं, ऐसे ही ठीक है. तार से कपड़े उतारते हुए मैं कई बार उसे देखती हूं, कपड़े तो मैं दिन में कभी भी उतार सकती हूं, कोई जल्दी नहीं होती इन की पर इस समय वह खड़ा होता है न, न चाहते हुए भी उसे देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाती हूं.

मैं ने कपड़े उतारते हुए कनखियों से उसे देखा. हां, वह खड़ा था. मन हुआ हाथ हिला कर हैलो कर दूं पर नहीं, एक विवाहिता की कुछ अपनी मर्यादाएं होती हैं. मेरा दिल जोर से धड़कता है जब मैं महसूस करती हूं वह अपनी खिड़की में खड़ा हो कर मेरी तरफ देख रहा है. स्त्री हूं न, बहुत कुछ महसूस कर लेती हूं, बिना किसी के कुछ कहेसुने. मैं समीर और अपने बच्चों के नाश्ते और टिफिन की तैयारी मैं व्यस्त हो गई.

तीनों शाम तक ही वापस आते हैं. मेरी किचन के एक हिस्से से उस की खिड़की का थोड़ा सा हिस्सा दिखता है, जिस खिड़की के पास वह खड़ा होता है वह शायद बैडरूम की है. किचन में काम करतेकरते मैं उस पर नजर डालती रहती हूं. सब समझ आता रहता है, वह अब तैयार हो रहा है. मुझे अंदाजा है उस के कमरे की किस दीवार पर शीशा है. मैं ने उसे वहां कई बार बाल ठीक करते देखा है.

जानती हूं किसी के पति को, किसी के पिता को ऐसे देखना मर्यादासंगत नहीं है पर क्या करूं, कुछ है, जो दिल धड़कता है उस के सामने होने पर. 10 साल से कुछ है जो उसे कहीं देखने पर, नजरें मिलने पर, हायहैलो होने पर दिल धड़क उठता है. वह अपनी कामकाजी पत्नी की घर के काम में काफी मदद करता है, बेटे को ले कर आता है, घर का सामान लाता है, कभी अपनी पत्नी को छोड़ने और लेने भी जाता है… सब दिखता है मुझे अपने घर की खिड़की से. कुल मिला कर वह एक अच्छा पति और अच्छा पिता है. कई बार तो मैं ने उसे कपड़े सुखाते भी देखा है… न मुझे उस का नाम पता है न उसे मेरा पता होगा. बस, उसे देखना मुझे अच्छा लगता है. मैं कोई युवा लड़की तो हूं नहीं जो प्यारव्यार का चक्कर हो. बस, यों ही तो देख लेती हूं उसे. वैसे दिन में कई बार खयाल आ जाता है कि क्या काम करता है वह  कहां है उस का औफिस  वह औफिस से आते ही अपनी खिड़की खोल देता है. मुझे अंदाजा हो जाता है वह आ गया है, फिर वह कई बार खिड़की के पास आताजाता रहता है. वह कई बारछुट्टियों में बाहर चला जाता है तो बड़ा खालीखाली लगता है.

10 साल से यों ही देखते रहना एक आदत सी बन गई है. वह दिखता रहता है पेड़ की पत्तियों के बीच से. दिल करता है उस से कुछ बातें करूं, कुछ कहूं, कुछ सुनूं पर नहीं जीवन में कई इच्छाओं को एक मर्यादा में रखना ही पड़ता है… कुछ सामाजिक उसूल भी तो हैं, फिर सोचती हूं दिल का क्या है, धड़कने दो. Hindi Romantic Story :

Azad Bharath Movie Review : “फिल्म देशभक्ति की भावना जगाती है”

Azad Bharath Movie Review : यह तो सभी जानते हैं कि 15 अगस्त, 1947 को भारत को ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्ति मिली जिसे ‘आजाद भारत’ कहा जाता है. ब्रिटिश राज से आजाद भारत, जो अब एक संप्रभु लोकतांत्रिक राष्ट्र है. जो अपने नागरिकों को समान अधिकार और स्वतंत्रता देता है, जैसा कि संविधान में वर्णित है. भारत का स्वतंत्रता दिवस हर वर्ष 15 अगस्त को देश भर में हर्षोल्लास से मनाया जाता है. इस दिन 200 वर्ष से अधिक समय तक ब्रिटिश उपनिवेशवाद के चंगुल से छूट कर एक नए युग की शुरुआत हुई थी.

‘आजाद’ शीर्षक से पहले भी बहुत सी फिल्में बन चुकी हैं. सन 1955 में दिलीपकुमार, मीना कुमारी और प्राण की फिल्म ‘आजाद’ रिलीज हुई थी. 1978 में धर्मेंद्र, हेमामालिनी की फिल्म ‘आजाद’ आई थी. 2025 में आई एम ए (इंडियन नैशनल आर्मी पर आधारित फिल्म) आई, जिस में अजय देवगन, डायना पेंटी थे. यह फिल्म झांसी की रानी रेजिमैंट पर केंद्रित थी. इन के अलावा भी क्षेत्रीय भाषाओं में ‘आजाद’ शीर्षक से फिल्में बनीं, मगर इन सभी का भारत के आजाद होने या स्वतंत्रता संग्राम से कोई वास्ता न था.

मगर 2026 के दस्तक देते ही श्रेयस तलपड़े अभिनीत की ‘आजाद भारत’ परदे पर नजर आई है. यह हिंदी भाषा की ऐतिहासिक फिल्म है. रूपा अय्यर द्वारा निर्देशित यह फिल्म भारतीय राष्ट्रीय सेना की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिस में इस की महिला इकाई “झांसी की रानी रेजिमैंट” पर ध्यान केंद्रित किया गया है. महिला क्रांतिकारियों के संघर्ष को प्रभावी ढंग से दिखाने वाली यह फिल्म भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महिला क्रांतिकारियों की अनकही कहानी दिखाती है. लगभग 2 घंटे की यह फिल्म नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ भारत की आजादी में शामिल हुई नीरा आर्य की ऐतिहासिक कहानी को दर्शाती है. इस फिल्म को आप नीरा आर्य की बायोपिक भी कह सकते हैं.

फिल्म की कहानी रानी औफ झांसी रेजिमैंट पर आधारित है. कुछ रेजिमैंट की स्थापना नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने की थी. कहानी मुख्यतया नीरा आर्य पर आधारित है परंतु नीरा के साथसाथ सरस्वती राजमणि और दुर्गा जैसी महिलाओं को भी दिखाया गया है.

फिल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित है और स्वतंत्रता संग्राम की अनकही कहानियों को सामने लाती है. खास कर महिला क्रांतिकारियों के बलिदान को. नीरा आर्य नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में काम करती थीं. उस ने नेताजी की जान की दुश्मन बनी अंग्रेज सरकार के सीआईडी इंस्पैक्टर अपने पति श्रीकांत को भी नीरा ने मार दिया था. क्योंकि वह नेताजी के लिए खतरा बन गया था. अंत में उसने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी.

फिल्म देशभक्ति की भावना जगाती है. इसे रिसर्च मेहनत के साथ बनाया गया है. फिल्म के कई सीन रोंगटे खड़े करते हैं. संवाद भी दिलों को छूने वाले हैं. निर्देशिका रूपा अय्यर ने नीरा आर्य की मुख्य भूमिका खुद निभाई है. उन्होंने अपने चेहरे पर गुस्से व आक्रोश के भाव दिखाए हैं. नेताजी सुभाषचंद्र बोस की भूमिका में श्रेयस तलपड़े ने बढ़िया अभिनय किया है. सरस्वती राजमणि बनी इंदिरा तिवारी का अभिनय भी देखने लायक है. सुरेश ओबेरौय ने हज्जूराम की भूमिका में काम किया है. कहानी में ट्विस्ट्स दिखने लायक हैं.

अंग्रेजों के अत्याचार सहते हुए भी नीरा का न टूटना, रूपा अय्यर के अभिनय की ताकत को दर्शाता है. उस की भूमिका चुनौतीपूर्ण है, वह अपने पति से कहती है, ‘तुम जैसे अंग्रेज’ के कुत्ते के हाथ में नेताजी कभी नहीं आने वाले.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रूप में श्रेयस तलपड़े ने छाप छोड़ी है. उस का यह संवाद ‘नारी जब ठान ले उसे कोई नहीं रोक सकता. मुझे नाज है हिंद की नारी पर’ दर्शकों में जोश भर देता है. बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी की गति के साथ तालमेल बैठाता है. गीत ‘जय हो’ देश भक्ति की भावना जगाता है. फिल्म का निर्देशन बढ़िया है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है.

नीरा आर्य की यह कहानी हर भारतीय को देखनी चाहिए, भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की कुछ अच्छी कहानियां हमारे युवाओं को अवश्य पढ़नी व देखनी चाहिए. Azad Bharath Movie Review :

Ikkis Movie Review : “भारतपाक विभाजन के दुख की कहानी से खास बनती फिल्म”

Ikkis Movie Review : आजकल रूस-यूक्रेन युद्ध जोरों पर है. रोजाना हजारों सैनिक मारे जा रहे हैं. पाकिस्तान की फौज बलूच फौजों से डर कर पीछे हट रही है और हथियार छोड़ कर भाग रही है. इसी तरह अन्य कई देशों में लड़ाइयां छिड़ी हुई हैं. जिन में फौजी जूझ रहे हैं, गोलियों को झेल कर मर रहे हैं. जिस की गति वही जाने, बड़े फौजी अकसर तो सिर्फ हुक्म देना जानते हैं, बेचारे फौजियों पर क्या गुजरती है, यह तो वही जानते हैं. अपने देश के खातिर भूखेप्यासे रह कर भी वे फ्रंट पर बहादुरी से लड़ते हैं और कुछ तो शहीद तलक हो जाते हैं.

ऐसे ही एक युद्ध की कहानी पर श्रीराम राघवन ने फिल्म ‘इक्कीस’ बनाई है. फिल्म में युद्ध के कई सीन ऐसे हैं जो झकझोरते हैं और सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर युद्ध होते क्यों हैं ?

फिल्म 1971 के भारतपाक युद्ध के नायक बहुत कम उम्र में शहीद हुए सैकंड लैफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की बायोपिक है, जिस में उन के शौर्य को दर्शाया गया है. उस वक्त वो महज 21 वर्ष के थे. वैसे फिल्म में देशभक्ति व इमोशनल ड्रायर भी भरपूर है. इस फिल्म में दिवंगत धर्मेंद्र ने भी अभिनय किया है. यह उन की आखिरी फिल्म है. उन के संवाद भावुक बन पड़े हैं. यह सिर्फ एक बायोपिक नहीं बल्कि साहस, बलिदान और रिश्तों की भी बात करती है.

कहानी की शुरुआत अरुण के 21 वें जन्मदिन से होती है. सैन्य अधिकारियों को उन की रेजिमैंट में लौटने का आदेश मिलता है. अरुण (अगस्त्य नंदा) सोचने लगता है कि क्या लड़ाई होने वाली है. कहानी 30 साल आगे बढ़ती है.

वर्ष 2002 में 80 वर्षीय ब्रिगेडियर मदन लाल (धर्मेंद्र) 3 दिन की पाकिस्तान यात्रा पर आते हैं. वह अपने पैतृक गांव गरगोधा में अपना घर देखने की ख्वाहिश रखते हैं. उन की मेजबानी पाकिस्तानी ब्रिगेडियर जान मोहम्मद निसार (जयदीप अहलावत) करता है. ब्रिगेडियर मदनलाल को अपने पुराने दोस्तों से मिलता है, साथ ही वह उस मिट्टी को भी छूना चाहता है जहां भारतीय सेना के सैकंड लैफ्टिलैंट यानी उस का 21 साल का  बेटा खेत्रपाल शहीद हुआ था. अरुण खेत्रपाल को मरणोपरांत परमवीर चक्र पाने का गौरव हासिल हुआ. मदन पाकिस्तान में निसार के घर में ठहरता है और अपने बेटे की वीरगाथा उसे सुनाता है. वही निसार जंग में अरुण के आमनेसामने था.

वर्तमान से अतीत में आतीजाती कहानी अरुण के जीवन की कई परतें खोलती है अरुण की मां (सुहासिनी मुते) उसे लड़ने की सीख दे कर विदा करती है. मोर्चे पर कमांडर हनूत सिंह (राहुल देव) उसे युद्ध में शामिल करने के लिए मना रहे होते हैं. वरिष्ठ सूबेदार सगत सिंह (1 सिकंदर खेर अरुण) को टैंट और युद्ध की रणनीति का प्रशिक्षण देते हैं. अरुण की योग्यतानुसार अरुण की रिजर्व के तौर पर युद्ध में शामिल कर लिया जाता है.

यहां पूरी कहानी मदन के नजरिए से चलती है. वह बताता है कि अरुण ने हाल ही में अपना 21वां जन्मदिन मनाया था. उसे किरण (सिमर भाटिया) से प्यार हो गया था. तभी 1971 के कारगिल युद्ध का ऐलान हो गया था. उसे फ्रंट पर भेजा गया था.

इस कहानी को कुछ इस तरह डेवलप किया गया है कि आप पहले अरुण को जानते हैं और फिर युद्ध की स्थिति को समझ पाते हैं. फिल्म को सिर्फ कार सीन अहलावत ने पूरी फिल्म में आप को इमोशनल बनाए रखा है. दोनों के कई सीन ऐसे हैं जो आप की आंखों में आंसू ला देंगे.
फिल्म की यह कहानी दिल छू लेने वाली है. फिल्म में मुख्य भूमिका अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा ने निभाई है. उस ने भरपूर मेहनत की है. अक्षय कुमार की भतीजी सिमर भाटिया ने डेब्यू किया है. एक छोटे से सीन में आने वाले दीपक जेबरियाल और असरानी भी प्रभावित करते है. नसीरुद्दीन शाह के बेटे विवान शाह का काम भी अच्छा है.

फिल्म का निर्देशन बढ़िया है. निर्देशक ने कार सीखैए और इमोशंस दोनों को बराबर जगह दी है. फिल्म की कहानी खास है. यह सिर्फ अरुण खेत्रपाल की कहानी नहीं है बल्कि इसे में भारतपाक के विभाजन का दुख भी दिखाया गया है. युद्ध के दृश्य कमजोर हैं, संपादन में भी गड़बड़ियां हैं. बैकग्राउंड संगीत अच्छा है ‘बन के, देखा इक्कीस’ गाना जोश भरता है.

फिल्म के अंत में दिखाया गया डिस्क्लेमर जरूर देखें. यदि आप इमोशनल और शांत स्वभाव वाली फिल्म नहीं देख पाते तो यह आप के लिए नहीं है. हां, सच्चे फौजी के शौर्य और बलिदान को याद करने के लिए इसे देखा जा सकता है, खास कर धर्मेंद्र के लिए सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Ikkis Movie Review :

Tu Meri Main Tera Main Tera Tu Meri Movie Review : “फिल्म आप के सिर पर बोझ नहीं डालती”

Tu Meri Main Tera Main Tera Tu Meri Movie Review : क्रिसमस के मौके पर रिलीज हुई करण जौहर के बैनर तले बनी यह 90 के दशक की प्रेम कहानियों से प्रेरित एक रोमांटिक कौमेडी फिल्म है. इसी शीर्षक से 2016 में एक पंजाबी फिल्म भी आई थी. कार्तिक आर्यन के साथ अनन्या पांडे की यह दूसरी फिल्म है. इस से पहले वे ‘पतिपत्नी और वो’ में परदे पर साथ आ चुके हैं.

रिश्तों में बराबरी होना लाजिमी है. अन्यथा रिश्ते बहुत आगे तक नहीं चल पाते, आपसी मनमुटाव बना रहता है और कभीकभी तो बात तलाक तक पहुंच जाती है. यह फिल्म रिश्तों में बराबरी और एकदूसरे को समझने और जिम्मेदारियों को निभाने की बात करती है. फिल्म संदेश देती है कि परिवार से प्यार करना ही सबकुछ है.

फिल्म में एक संवाद बारबार दोहराया गया है, जो मर्द अपनी पसंदीदा औरत के लिए कुरबानी न दे वह मर्द मर्द नहीं होता, मारकाट और खूनखराबे से अछूती है. इसे करण जौहर ने बताया है, इसीलिए इसे करण जौहर स्टाइल की फिल्म कह सकते हैं. करण जौहर की फिल्मों का एक खास दर्शक वर्ग है, उन्हें यह फिल्म पसंद आ सकती है.

फिल्म की कहानी रेहान उर्फ (कार्तिक आर्यन) और रूमी (अनन्या पांडे) से शुरू होती है, जो एक बेपरवाह किस्म का नवयुवक है और अपनी मां पिंकी (नीना गुप्ता) का वेडिंग प्लानर का काम संभालता है. दूसरी और रूमी एक लेखिका है. उस का परिवार आगरा में रहता है. पिता एक रिटायर्ड फौजी कर्नल अमर वर्धन सिंह (जैकी श्रौफ) और एक बहन से रूमी का भावनात्मक जुड़ाव है.

Social Interest : जनवरी 2026 के फर्स्ट इश्यू में “आप के पत्र व अनुभव”

Social Interest :
एक से बढ़ कर एक लेख
दिसंबर (प्रथम) अंक ध्यान से पढ़ा. इस अंक में प्रकाशित कहानी ‘बदलते एहसास’ विशेषरूप से दिल को छू गई, इसलिए इस की लेखिका साधुवाद की पात्र हैं. बाकी कहानियां भी अच्छी थीं. इस बार के सभी लेख भी प्रभावशाली लगे. हर लेख एक से बढ़ कर एक था. स्थायी स्तंभ पाठकों की समस्याएं, इन्हें आजमाइए, चंचल छाया भी पठनीय थे. पत्रिका में कोई आर्थिक लेख नहीं होता, जिस की कमी खलती है. – हर ज्ञान सिंह सुथार हमसफर
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एक गुजारिश
नवंबर (द्वितीय) अंक में प्रकाशित सभी लेख व कहानियां बेहद पसंद आईं और पूरा अंक पसंद आया. स्थायी स्तंभ बच्चों के मुख से पढ़ कर हमें अपने बचपन की याद आ जाती है.
एक छोटी सी गुजारिश है कि कृपया पत्रिका में चुटकुले, पहेलियां और हास्य प्रसंगों का विशेष स्तंभ भी नियमित रूप से प्रकाशित करें ताकि आज की भागदौड़भरी जिंदगी में ऐसे हलकेफुलके कौलमों से मुसकराने की खुराक
मिलती रहे. – विमल वर्मा
बच्चों के मुख से
मैं एक स्कूल में प्राइमरी की अध्यापिका हूं. मैं ने तीसरी कक्षा के बच्चों को सामान्य ज्ञान पढ़ाया और फिर उन का टैस्ट लिया. टैस्ट में प्रश्न थे-इंडिया में रहने वालों को क्या कहते हैं? पोलैंड, जरमनी और हौलैंड में रहने वालों के बारे में भी पूछा था.
मेरी कक्षा के बहुत से बच्चों के उत्तर ने मुझे हंसने पर मजबूर कर दिया. उत्तर थे : इंडियन, पोल्स, जर्म्स और होल्स. – रजनी गोयल
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मेरा 10 वर्षीय भांजा एक दिन अपनी मां के पास जा कर जोरजोर से रोने लगा, नाटक करने लगा. मां ने पूछा, ‘‘क्या हुआ बेटा.’’ वह बोला, ‘‘मां, मेरे मित्र के पास वीडियो गेम है, मेरे पास नहीं है.’’ मां भी उस की बात सुन कर जोरजोर से रोने का नाटक करने लगी. बेटा बोला, ‘‘मां, आप रो क्यों रही हैं.’’
मां बोली, ‘‘बेटा, मेरी सहेली का बेटा 95 फीसदी नंबरों से पास हुआ है और मेरा बेटा मुश्किल से 40 फीसदी नंबरों से ही पास हुआ है.
बेटा बोला, ‘‘मां, हम दोनों की समस्या नैचुरली है, इसलिए चलो हम दोनों गले मिल कर जोरजोर से रोते हैं.
उस की यह बात सुन कर हम सब हंसतेहंसते लोटपोट हो गए. – सपना कहार
*
मैं और मेरे पति मार्केटिंग कर घर आए. मेरा 6 वर्षीय बेटा अपनी फूफी के साथ बैठा टीवी देख रहा था. हम दोनों को देखते ही उस ने कहा, ‘‘तुम लोग कानूनन जुर्म कर रहे हो.’’
हम दोनों चौंक गए चूंकि मेरे पति केवी में टीचर हैं और मैं स्वयं बीएड कर टीचर बनने वाली हूं. हम लोग कानूनन जुर्म कर रहे हैं, यह सोचसोच कर परेशान हो गए कि क्या गलती हम से हो रही है. काफी सोचने के बाद जब कुछ समझ में न आया तब उस से ही पूछा कि क्या
बात है.
उस ने सटीक बात कही, ‘‘बाल मजदूरी कानूनन जुर्म है या नहीं?’’
हम ने कहा, ‘‘वो तो है.’’ वो बोला, ‘‘मैं ने फूफी से पूछा कि बाल मजदूरी क्या है? तो वो बताईं कि बच्चों से काम करनवा बाल मजदूरी है और तुम लोग मुझ से दिनभर में पचास काम करवाते हो, जैसे छत से कपड़े उठा लाओ, अपनी बुक उठा लाओ, दादा की दुकान से कुछ सामान ले लाओ. इसलिए, तुम लोग कानूनन जुर्म कर रहे हो.’’
यह सुन कर हम दोनों पतिपत्नी हंसे बिना न रहे सके. – चंदा बानो
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मैं सपरिवार अपनी बेटी के घर गई थी. उस का 3 वर्षीय बेटा चीकू बहुत नटखट व भोला है. खाना खाने के बाद हम सभी गप्पें कर रहे थे और चीकू की शरारतों का आनंद ले रहे थे.
मेरे पति को एसिडिटी रहती है. उन्हें भारीभारी 2 डकारें आईं. चीकू ने तुरंत खेलना छोड़ कर इन के कंधे पर हाथ रख कर पूछा, ‘‘नानू, पानी पियोगे, मैं आप को पुदीनहरा दूं?’’
बच्चे की इस मासूम चिंता को देख कर उस समय सभी का मन गदगद हो गया और हम सभी मुसकरा दिए. – संध्या
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मेरी बहू के पास कुछ बच्चे ट्यूशन पढ़ने को आते हैं. एक बच्चा चौथी कक्षा का भी पढ़ने आता है. जिस स्कूल में मेरी बहू पढ़ाने जाती है उस में ही वह पढ़ता है. एक दिन वह पढ़ने आया तो मेरी बहू ने उस से पूछा, ‘‘कल तुम्हारे मम्मीपापा स्कूल आए थे, तुम्हारी क्लासटीचर से बात कर रहे थे.’’
वह बोला, ‘‘मैं ने एक लड़के को मारा था, इसलिए मेरी मैडम ने उन्हें मेरी शिकायत करने के लिए बुलाया था.’’
उस ने इतने भोलेपन से कहा कि ‘मैं ने उस को खूब मारा था, सुन कर उस के सच व सीधेपन को महसूस कर सब हंसने लगे. – काशी चौहान
*
मेरे 5 वर्षीय पुत्र को पत्नी ने समझाते हुए कहा, ‘‘बेटा, अब तुम बड़े हो गए हो, घर का छोटामोटा काम कर दिया करो. थोड़ी मेरी मदद किया करो.’’
नटखट छोटू ने भोली सूरत बना कर जवाब दिया, ‘‘मैं मदद कलता तो हूं.’’
मेरी पत्नी ने उस से पूछा, ‘‘कैसे मदद करते हो?’’
छोटू अपनी तोतली भाषा में बोला, ‘‘आप की साड़ी पकड़ कर पीछेपीछे घूमता हूं.’’
उस के इस मासूम जवाब पर मेरा ठहाका लगा कर उसे प्यार करना स्वाभाविक था तो पत्नी ने भी उसे सीने से लगा कर खूब प्यार किया. वह बहुत खुश नजर आ रहा था. – सतीश शर्मा
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08588843415
Social Interest :

Readers’ Problems : “कामवाली का व्यवहार”, “पड़ोसियों से संबंध”, “बच्चे को मोबाइल की लत”, “रिश्ते बचाऊं या खुद को”

Readers’ Problems :

मेरे घर की कामवाली बाई का व्यवहार ठीक नहीं है.
मैं 35 वर्ष की महिला हूं. मेरी शादी हो चुकी है और मैं एक निजी कंपनी में काम करती हूं. पति भी नौकरी करते हैं. घर और औफिस दोनों संभालने के लिए कामवाली बाई पर निर्भर रहना पड़ता है, लेकिन वह न समय की पाबंद है न काम की. कई बार मन करता है नौकरी छोड़ दूं, लेकिन करनी जरूरी है. हर दिन गुस्से और अपराधबोध के बीच निकल जाता है.

आज की नौकरीपेशा महिला के लिए घर और औफिस दोनों संभालना आसान नहीं है. कामवाली बाई पर निर्भर रहना मजबूरी बन जाता है, लेकिन जब वह समय की पाबंद न हो या काम ठीक से न करे तो गुस्सा और अपराधबोध स्वाभाविक है. ऐसे में सब से जरूरी है यह समझना कि हर दिन सबकुछ परफैक्ट होना संभव नहीं. घर के कामों में प्राथमिकता तय करें, जो जरूरी है वही रोज हो, बाकी काम जरूरत के अनुसार रखें. कामवाली से शांति से अपनी अपेक्षाएं स्पष्ट करें और पति को घर की जिम्मेदारियों में भागीदार बनाएं. नौकरी छोड़ने के बजाय खुद पर से अनावश्यक दबाव कम करें और यह स्वीकार करें कि थकान कमजोरी नहीं, बल्कि मेहनत का संकेत है. थोड़ी समझदारी, संवाद और आत्म देखभाल से इस स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है.

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कुछ समय से पड़ोसियों से संबंध खराब हो गए हैं.
मैं 44 वर्ष का पुरुष हूं. मेरी शादी हो चुकी है और 2 बच्चे हैं. मैं प्राइवेट नौकरी करता हूं और परिवार के साथ अपने ही मकान में रहता हूं. पिछले कुछ वर्षों से हमारे पड़ोसी हर छोटी बात में दखल देने लगे हैं. कभी बच्चों के खेलने पर, कभी गाड़ी पार्क करने पर तो कभी मेहमानों को ले कर.

यह समस्या सिर्फ पड़ोस की नहीं, सीमाओं के टूटने की है. आप ने देर तक चुप रह कर यह संकेत दे दिया कि आप सब सह लेंगे.
अब जरूरी है कि सम्मानजनक लेकिन स्पष्ट संवाद किया जाए. हर बात पर सफाई देने के बजाय, कुछ बातों पर ‘यह हमारा निजी मामला है’ कहना सीखें.
पत्नी और बच्चों को भी मानसिक रूप से मजबूत रखें. पड़ोसी बदल नहीं सकते, लेकिन उन के असर को सीमित किया जा सकता है.

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मेरे बच्चे को मोबाइल की लत लग गई है. क्या करूं?
मेरा 10 साल का बेटा दिनभर मोबाइल में लगा रहता है. पढ़ाई करते समय भी उस का ध्यान सिर्फ गेम्स और वीडियो पर रहता है. मैं ने कई बार समझाया, डांटा भी, लेकिन उस से वह उलटा और चिड़चिड़ा होने लगा है. मुझे डर है कि उस का व्यवहार और पढ़ाई दोनों बिगड़ न जाएं. कैसे उसे समझाऊं?

बच्चों में मोबाइल की आदत आजकल बहुत आम है. इसे शांत तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है. सब से पहले यह जरूरी है कि आप उस के साथ बैठ कर उसे समझाएं कि मोबाइल का उपयोग सीमित क्यों होना चाहिए. नियम थोपने के बजाय आप उस के साथ मिल कर एक रूटीन बनाएं जिस में पढ़ाई, खेल और मोबाइल – तीनों के लिए समय तय हो. बच्चे जब प्रक्रियाओं में साझेदार बनते हैं तो वे नियम आसानी से मानते हैं. घर में उसे ऐसे औप्शन दें जिन में वह मोबाइल के बिना भी मजा ले सके, जैसे बोर्डगेम, आउटडोर एक्टिविटी या कोई नया क्रिएटिव शौक. धीरेधीरे उस का ध्यान स्वाभाविक रूप से स्क्रीन से हटने लगेगा और उस का व्यवहार भी सुधरेगा.

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मुझे समझ नहीं आ रहा कि रिश्ते बचाऊं या खुद को.
मैं 36 वर्ष की महिला हूं. मेरी शादी नहीं हुई है. मातापिता के निधन के बाद मैं अपने बड़े भाई और भाभी के साथ उन के ही घर में रहती हूं. मैं एक प्राइवेट औफिस में नौकरी करती हूं और घर के खर्च में भी योगदान देती हूं. शुरुआत में सबकुछ सामान्य था, लेकिन धीरेधीरे भाभी का व्यवहार बदलने लगा. छोटीछोटी बातों पर तंज कसना, हर काम में कमी निकालना और यह जताना कि मैं उन के घर पर बोझ हूं. आदि बातें अब आम हो गई हैं. भाई पहले जैसा नहीं रहा. वह ज्यादातर चुप रहता है और भाभी की बातों का विरोध नहीं करता. अंदर ही अंदर मैं घुटन महसूस करती हूं.

आप की समस्या सिर्फ साथ रहने की नहीं है, यह सम्मान और जगह की समस्या है. अकसर ऐसे हालात तब पैदा होते हैं जब एक घर में रहने वाले लोगों की भूमिकाएं स्पष्ट नहीं होतीं. भाभी का बदला हुआ व्यवहार असुरक्षा, सामाजिक दबाव या यह भावना भी हो सकती है कि घर पर उन का नियंत्रण कम हो रहा है. भाई का चुप रहना टकराव से बचने की कोशिश हो सकती है, लेकिन इस का असर आप पर पड़ रहा है.

सब से पहले, अपने मन में यह स्पष्ट कर लें कि आप किसी का एहसान नहीं ले रहीं. आप आत्मनिर्भर हैं और जिम्मेदारी निभा रही हैं. सही समय देख कर भाई से अकेले में शांत मन से बातचीत करें. आरोप नहीं, बल्कि अपनी भावनाएं रखें. भाभी के व्यवहार को ले कर सीधे बहस में पड़ने के बजाय सीमाएं तय करें.

अगर लंबे समय तक स्थिति न सुधरे तो अलग रहने के विकल्प पर विचार करना गलत नहीं है. रिश्ते निभाना जरूरी है, लेकिन अपनी मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा उस से भी ज्यादा जरूरी है. रिश्ते मजबूरी से नहीं, सम्मान से चलते हैं. – कंचन

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पता : कंचन, सरिता
ई-8, झंडेवाला एस्टेट, नई दिल्ली-55.
समस्या हमें एसएमएस या व्हाट्सऐप के जरिए मैसेज/औडियो भी
कर सकते हैं.
08588843415

Readers’ Problems :

Punjabi Music Industry : पंजाबी पौप – उगाही और हिंसा का नया दौर

Punjabi Music Industry : हाल के दिनों में गैंगस्टरों द्वारा पंजाबी गायकों व कलाकारों पर हमले से ले कर धमकियां बढ़ी हैं. इन गैंगस्टर्स का नैटवर्क भारत में ही नहीं, विदेशों में भी फैला हुआ है. सिद्धू मूसेवाला की हत्या इसी से जुड़ा मामला है, मगर सरकार व सिस्टम इस पर काबू नहीं कर पा रहे.

बीते कुछ सालों में कई पंजाबी गायकों की हत्याओं की खबरों ने संगीत जगत को हिला रखा है. इस में सब से चर्चित मामला सिद्धू मूसेवाला की हत्या का था. 29 मई, 2022 को गायक सिद्धू मूसेवाला की मंशा (पंजाब) में गोली मार कर हत्या कर दी गई. लौरेंस बिश्नोई-गोल्डी बराड़ नैटवर्क पर साजिश का आरोप लगा. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने इस गिरोह पर ‘टेरर-गैंगस्टर’ केस में चार्जशीटें दायर कीं. यह केस ‘खौफ के जरिए वसूली’ मौडल का सब से चर्चित उदाहरण था. इस हाईप्रोफाइल टारगेटिंग से पूरे उद्योग में डर का माहौल पैदा हो गया. इस गिरोह ने सोशल मीडिया पर पोस्ट डाल कर और अपने बयानों के जरिए हत्या की जिम्मेदारी ले कर अपना दबदबा दिखाया.

इस से पहले अप्रैल 2018 में मोहाली में गायक व डायरैक्टर परमिश वर्मा पर हमला हुआ था. वर्मा को गोलियां मारी गई थीं. पुलिस के मुताबिक यह 2 महीनों से चल रही धनउगाही कौल्स न मानने का नतीजा था. आरोपी दिलप्रीत ‘बाबा’ ने हमले का क्रैडिट लिया. बाद में उसी गिरोह पर गिप्पी ग्रेवाल से वसूली की कोशिशों के आरोप भी सामने आए.

नवंबर 2022 में बब्बू मान को बंबीहा ग्रुप से जान से मारने की धमकी मिली. धमकी के बाद पुलिस ने उन की सुरक्षा बढ़ाई. यह मामला दिखाता है कि प्रतिद्वंद्वी गिरोह कलाकारों को अपने खेमे से जोड़ कर भी टारगेट करते हैं.

2023-24 में गिप्पी ग्रेवाल को धमकियां मिलने लगीं. वैंकूवर (कनाडा) स्थित गिप्पी के घर के बाहर फायरिंग हुई और उन को औनलाइन धमकियां मिलने का सिलसिला शुरू हो गया. इस के पीछे बिश्नोई/बराड़ नैटवर्क का नाम सामने आया.

2024 में ब्रिटिश कोलंबिया में ए पी ढिल्लों के घर पर फायरिंग हुई. हमले को कनाडा में जारी दक्षिण एशियाई कम्युनिटी टारगेटेड उगाही की शृंखला से जोड़ा गया. गोल्डी बराड़ गैंग ने पैसा निकलवाने के लिए डर पैदा करने की कोशिश की.

पंजाबी सिंगर चन्नी नत्तन के घर पर कनाडा में फायरिंग हुई. इस हमले की जिम्मेदारी लौरेंस बिश्नोई गैंग ने ली. उस का कहना है कि यह संबंध एक दूसरे गायक व कलाकार से जुड़े विवाद के कारण था. 14 जुलाई, 2025 की रात गुड़गांव (गुरुग्राम) में हरियाणवी सिंगर व रैपर राहुल फजलिपुरिया की कार पर 2 बार फायरिंग हुई. वे भागने में सफल रहे और खुद को बचा पाए.

धन वसूली के चलते हमले

पंजाबी गायकों पर ही नहीं बल्कि अन्य विधा के महारथियों पर भी धन वसूली के लिए हमले हो रहे हैं. इस में पहला नाम है हास्य के धुरंधर कपिल शर्मा का. कपिल शर्मा के कनाडा स्थित कैफे-रैस्टोरैंट पर अब तक 3 बार गोलीबारी हो चुकी है. सब से पहले 10 जुलाई, 2025 को उन के कैफे में जब कर्मचारी अंदर थे तब लगभग 8-10 गोलियां चलाई गईं. हालांकि, इस में किसी को चोट नहीं आई. इस घटना की जिम्मेदारी बब्बर खालसा इंटरनैशनल से जुड़े हरजीत सिंह लद्दी ने ली.

दूसरी घटना अगस्त 2025 में हुई जब इसी कैफे पर 25 राउंड गोलियां चलीं, हालांकि इस में भी कोई घायल नहीं हुआ. इस बार हमले की सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी गोल्डी ढिल्लन ने ली, जो लौरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़ा हुआ है. उस ने कहा कि यह एक चेतावनी हमला है. अगर कपिल शर्मा ने उस की कौल नहीं उठाई तो उस पर अगला ऐक्शन मुंबई में होगा.

अक्तूबर 2025 में कपिल शर्मा के कैफे पर फिर गोलीबारी हुई. इस फायरिंग की घटना ने न सिर्फ कपिल शर्मा को ?ाक?ार दिया, बल्कि उन के कैफे ‘द कपिल शर्मा कैफे’ की साख और कारोबार पर भी गहरा असर डाला. उस के कैफे का बिजनैस लगभग ठप हो चुका है. वहां अब नाममात्र के ग्राहक आते हैं. पुलिस के अनुसार, कपिल शर्मा को पहले से धमकियां मिल रही थीं, लेकिन उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया था.

कपिल के करीबी बताते हैं कि कलाकार अब अपने परिवार और सुरक्षा को ले कर बेहद सतर्क हैं. वे मुंबई छोड़ने पर भी विचार कर रहे हैं. इस हमले के बाद कपिल शर्मा ने मीडिया और पब्लिक इवैंट्स से दूरी बना ली है. इस मामले में लौरेंस बिश्नोई गैंग या उस से जुड़े स्थानीय नैटवर्क की भूमिका मानी जा रही है, क्योंकि हाल के वर्षों में सैलिब्रिटीज, पंजाबी सिंगर्स और कौमेडियंस को ले कर ऐसे धमकीभरे पैटर्न देखे गए हैं.

इन तमाम घटनाओं के पीछे नाजायज धन उगाही, हवाला, ड्रग/हथियार सप्लाई और विदेशी ठिकानों से रिमोट कंट्रोल्ड औपरेशन जुड़े हुए हैं. कनाडा में बिश्नोई नैटवर्क का आतंकी घोषणा स्तर तक पहुंचना दिखाता है कि डायस्पोरा पर वसूली अब राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बन गया है.
इन धमकियों और हमलों में ‘कौल-स्क्रिप्ट’ एकजैसी है. पहले व्हाट्सऐप/ वीओआईपी से रकम मांगना, फिर फायरिंग से ‘सैंपल’ दिखाना, डर पैदा करना ताकि बाकी लोग स्वेच्छा से ‘मैनेज’ हो जाएं. मुख्य वजह धन उगाही ही है. बाकी का नैरेटिव सिर्फ डर का बाजार गरम रखने के लिए है.

म्यूजिक इंडस्ट्री में अंडरवर्ल्ड

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि संगीत कंपनियों में अंडरवर्ल्ड से जुड़े लोगों का बड़ा पैसा निवेश हो रहा है, खासकर पंजाब के म्यूजिक अलबम्स में. हाल के वर्षों में पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री बहुत तेजी से बढ़ी है. इस का टर्नओवर आकार बहुत बढ़ा है. तो इतनी तेजी से बढ़ती इंडस्ट्री में नियमकानून, लेखाजोखा, कौपीराइट, डिजिटल रौयल्टी आदि का ढांचा अकसर पर्याप्त पारदर्शी नहीं होता है. इस तरह की जगहों पर काली कमाई का प्रवाह बहुत आसान बन जाता है और संगठित अपराध नैटवर्क के लिए यह बहुत आकर्षक जगह है.

गौरतलब है कि पंजाबी संगीत अब केवल पंजाब तक सीमित नहीं रहा है. विदेशों में प्रवासी पंजाबी समुदाय रहता है. कनाडा, यूके, अमेरिका आदि में भी इस का बहुत बड़ा बाजार है. जब मल्टीमिलियन-रुपए का धंधा चलता है तो अंडरवर्ल्ड नैटवर्क्स का ध्यान उस व्यवसाय की ओर जाना स्वाभाविक है. निवेश करने, ब्लैक मनी को वाइट बनाने तथा नियंत्रण बनाए रखने के लिए अंडरवर्ल्ड धमकी-हत्या जैसे कदम उठाता है. बीते दोतीन सालों के भीतर गैंगस्टर्स ने पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री को 80 और 90 के दशक में ला दिया है, जब मुंबई फिल्म इंडस्ट्री अंडरवर्ल्ड की उंगलियों पर नाचती थी.

90 के दशक में डी-कंपनी यानी दाऊद इब्राहिम द्वारा संचालित गिरोह और कुछ अन्य माफिया गिरोहों ने बौलीवुड के तमाम डायरैक्टर-प्रोड्यूसर और संगीत बिजनैस को अपने खूनी पंजों में जकड़ रखा था. मुंबई में 1970-80 के दशक से ही फिल्म इंडस्ट्री और अंडरवर्ल्ड के बीच गठजोड़ शुरू हो गया था.

हाजी मस्तान जैसे अंडरवर्ल्ड डौन ने फिल्मों से रिश्ते बनाए. 90 के दशक में यह गठजोड़ और खुल कर सामने आया जब दाऊद गैंग का नैटवर्क फिल्म इंडस्ट्री में फैला. उस वक्त फिल्म निर्माण के लिए कानूनी बैंकिंग व्यवस्था ठीक नहीं थी. 2001 से पहले फिल्म इंडस्ट्री को ‘इंडस्ट्री’ का दर्जा नहीं मिला था. उस समय फिल्मों के लिए बैंक से लोन लेना मुश्किल था, जिस के चलते गैरकानूनी धन स्रोतों की जरूरत बढ़ गई. बहुत सी फिल्में, संगीत अलबम्स और स्टेज शो अंडरवर्ल्ड द्वारा फंड किए जाने लगे और इस तरह यह गठजोड़ ब्लैकमनी को वाइट करने का माध्यम भी बन गया.

बौलीवुड को अंडरवर्ल्ड का सपोर्ट मिला तो बौलीवुड से अंडरवर्ल्ड की तगड़ी कमाई भी होने लगी. धमकी और नाजायज वसूली का धंधा अपनी चरम पर पहुंच गया. किसी ने पैसा पहुंचाने में जरा सी आनाकानी की तो ?ाट उस की लाश गिरा दी जाती थी. कई उधार लोन अंडरवर्ल्ड द्वारा भी दिए गए, ताकि ब्लैकमनी को सफेद किया जा सके और इस के बदले फिल्मों और संगीत में हिस्सेदारी या दबदबा बनाया जा सके.

गुलशन कुमार की हत्या

फिल्म उद्योग का कानूनी ढांचा कमजोर था, इसलिए अंडरवर्ल्ड को जहां अवसर मिला वहां उस ने दबदबा बनाया. अंडरवर्ल्ड के लिए यह फायदेमंद था. उसे सिर्फ वसूली नहीं बल्कि फिल्मों में हिस्सेदारी, अधिकार और प्रभाव भी मिल रहा था. धमकियों और हथियारों के दम पर अंडरवर्ल्ड बौलीवुड पर हावी था. जिस ने सहयोग नहीं किया वह अपनी जान से गया. इस पूरे परिदृश्य की एक प्रमुख घटना है टी सीरीज के मालिक गुलशन कुमार की हत्या.

गुलशन कुमार अग्रणी संगीत निर्माता और फिल्म प्रोड्यूसर थे. उन्होंने अपनी कंपनी टी सीरीज सुपर कैसेट्स के माध्यम से भारत में म्यूजिक इंडस्ट्री में मजबूत पकड़ बनाई. सस्ते सीडी/कैसेट लौंच कर गुलशन कुमार ने संगीत के बाजार में क्रांति ला दी. गुलशन कुमार का सार्वजनिक जीवन भी काफी सक्रिय था, धीरेधीरे उन्होंने राजनीतिक व सामाजिक मामलों में भी रुचि लेनी शुरू कर दी. ऐसे में अंडरवर्ल्ड अपनी हिस्सेदारी कैसे नहीं मांगता? कहते हैं कि गुलशन कुमार ने अंडरवर्ल्ड को संरक्षण राशि देने से मना किया था या कम राशि दी थी. उन्होंने कहा था, ‘मैं उस राशि को मंदिर को दान कर दूंगा. इस बात से गिरोह नाराज हो गया.’

कुछ लोगों का मानना है कि गुलशन कुमार की हत्या सिर्फ वसूली का मामला नहीं थी, बल्कि प्रतियोगिता और व्यापार युद्ध का हिस्सा भी थी. संगीत निर्देशक नदीम सैफी का नाम भी इस कांड में उछला था. कहा गया कि नदीम ने गुलशन कुमार के कारण अपने एक अलबम को सही प्रचार न मिलने की शिकायत दाऊद गिरोह से की थी और बदले में गुलशन कुमार को मौत की नींद सुला दिया गया.

12 अगस्त, 1997 को गुलशन कुमार जूहुअंधेरी इलाके में मंदिर से बाहर आ रहे थे जब 3 बंदूकबाजों ने उन पर 16 गोलियां चलाईं, जिस के कारण गुलशन कुमार ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. पुलिस के मुताबिक उन की हत्या कुछ महीने पहले ही प्लान की गई थी. आरोपपत्र में कहा गया कि यह साजिश अबू सलेम और दाऊद इब्राहिम के छोटे भाई अनीस इब्राहिम के दुबई कार्यालय में रची गई थी. इस हत्या को अंडरवर्ल्ड द्वारा एक सशक्त संदेश बताया गया कि यदि कोई बड़ा उद्योगपति या निर्माता मूव न करे तो उस के गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

गैंगस्टर्स का लौटता दौर

दाऊद इब्राहिम और उन के गिरोहों ने फिल्मों, संगीत और मनोरंजन व्यवसाय को एक ऐसा प्लेटफौर्म बना लिया था जहां सिर्फ क्रिएटिविटी नहीं बल्कि पैसा, दबदबा और डर भी काम करता था. दो दशकों बाद वही दौर एक बार फिर लौटता नजर आ रहा है पर इस बार उस के निशाने पर मुंबई नहीं, बल्कि पंजाब है.

पंजाबी संगीत उद्योग ने जब बड़े पैमाने पर मुनाफा, वैश्विक फैलाव और निवेश क्षमता दिखानी शुरू की तो संगठित अपराध नैटवर्क्स ने इसे निवेश के रूप में देखना शुरू कर दिया. पैसा लगाओ, सफेद करो, नियंत्रण रखो. शुरू में तो कुछ कलाकारों को एक अच्छा अवसर लगा मगर जब इस के दुष्परिणाम धमकियों, बलपूर्वक समझोतों और कौपीराइट के नुकसान के रूप में सामने आने लगे तो गायकों के पैरोंतले से जमीन खिसकने लगी.

गौरतलब है कि पंजाबी पौप संस्कृति पिछले एक दशक में भारत, कनाडा, यूके तक फैले करोड़ों दर्शकों और सैकड़ों करोड़ की लाइव शो/ब्रैंडिंग/स्ट्रीमिंग कमाई से जुड़ गई है.

इसी तेज उभार के साथ गैंगस्टर नैटवर्क, खासकर लौरेंस बिश्नोई, गोल्डी बराड़ और उन के प्रतिद्वंद्वी बंबीहा सर्किट आदि ने गायक व कलाकारों, इवैंट आयोजकों और संगीत कंपनियों को उच्च दृश्यता वाले आसान लक्ष्य के रूप में निशाना बनाना शुरू कर दिया. इन नैटवर्कों का प्राथमिक मकसद धन उगाही यानी एक्सटौर्शन है. जांच एजेंसियों ने इसे खुलेतौर पर ‘गैंगस्टर-टेरर-नार्को नेक्सस’ कहा है अर्थात हथियार/ड्रग तस्करी से फंडिंग, सोशल मीडिया से डर पैदा करना और टारगेटेड हिंसा के जरिए वसूली. Punjabi Music Industry :

Legalization Of Prostitution : सभ्य समाज में वेश्यावृत्ति लीगल होने से क्या फर्क पड़ेगा ?

Legalization Of Prostitution : भारत की सर्वोच्च अदालत ने भारत में वेश्यावृत्ति को कानूनी तौर पर जायज करार दिया है. दुनिया के लगभग सभी विकसित देशों में ऐसा कानून पहले से है, मतलब वहां वेश्यावृत्ति लीगल है. न्यूजीलैंड में वेश्यावृत्ति को साल 2003 में कानूनी मान्यता मिल चुकी है. न्यूजीलैंड में लाइसैंसप्राप्त वेश्यालय भी संचालित होते हैं, साथ ही, वहां सैक्स वर्कर्स को सभी सामाजिक लाभ भी मिलते हैं.

जरमनी में वेश्यावृत्ति को कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त है और वेश्यालय भी लीगल हैं. वहां सैक्सवर्कर को स्वास्थ्य बीमा दिया जाता है. उन्हें टैक्स का भुगतान करना पड़ता है. इतना ही नहीं, उन्हें पैंशन जैसे सामाजिक लाभ भी मिलते हैं. ग्रीस में भी सैक्सवर्कर्स को समान अधिकार मिलते हैं. उन्हें स्वास्थ्य जांच के लिए जाना पड़ता है.

भारत और पश्चिमी देशों में चल रहे जिस्मफरोशी के इस धंधे में एक बड़ा अंतर है जो भारतीय लोगों की उस फितरत को दर्शाता है जिस में इंसानी संवेदनाएं गायब नजर आती हैं. बाहर के देशों में वेश्यावृत्ति के लिए नाबालिग लड़कियों की मंडी नहीं लगती. विदेशों में भी पूरा खेल डिमांड और सप्लाई का है लेकिन वहां हैवानियत के पेशे में भी थोड़ी इंसानियत नजर आती है. इस के उलट, भारत में वेश्यावृत्ति के लिए बेची या खरीदी गई कम उम्र की लड़कियों की दास्तानें सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

हमारे यहां गरीब परिवारों में बेटी होना अभिशाप होता है. जिस्मफरोशी के लिए सब से ज्यादा लड़कियां गरीब परिवारों से ही आती हैं. देश के कई इलाकों में देह के धंधे के लिए बेटियां बेची जाती हैं, उठाई जाती हैं, किराए पर दी या ली जाती हैं. तो वहीं घरेलू हिंसा की शिकार हो कर कोई महिला मजबूरी में किसी चकलाघर तक पहुंचती है. आस्ट्रेलिया महाद्वीप की कुल आबादी से ज्यादा हमारे देश में वे लड़कियां हैं जो वेश्यावृत्ति के दलदल में फंसी हुई हैं.

मजबूर लड़कियां फंसती वेश्यावृत्ति के दलदल में

भारत में वेश्यावृत्ति की कड़वी हकीकत यह है कि अपनी मरजी से शायद ही कोई लड़की किसी कोठे तक पहुंचती हो. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने वेश्यावृत्ति की इस विडंबना पर कोई टिप्पणी नहीं की. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार वेश्यावृत्ति भी एक पेशा ही है.

बंगाल, नेपाल, ओडिशा, ?ारखंड, बिहार के दूरदराज इलाकों में बेटियों की खरीदफरोख्त का नैटवर्क खड़ा है. पुलिस और कानून की नाक के नीचे यह सब होता है. एक लड़की की कुरबानी से कई जेबें गरम होती हैं और कइयों की हवस शांत होती है. सोनागाछी, जीबी रोड या भारत के किसी भी रेड लाइट एरिया की जमीनी हकीकत यही है.

ह्यूमन राइट्स वाच की ताजा रिपोर्ट देश में जिस्मफरोशी के धंधे की जो जमीनी हकीकत बयान करती है उसे जान कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार पूरे भारत में 2 करोड़ सैक्सवर्कर्स हैं जिन में सिर्फ मुंबई में ही 2 लाख हैं. ये वे अभागी लड़कियां हैं जिन्हें हमारा सभ्य समाज वेश्या के नाम से जानता है. जिस्म के इस धंधे में लगी लड़कियों में 12 प्रतिशत नाबालिग बच्चियां हैं. 1997 से 2004 के बीच जिस्मफरोशी में लगी लड़कियों की संख्या में 50 फीसदी इजाफा हुआ. इस रिपोर्ट के अनुसार कम उम्र की 12 लाख बच्चियां भी इस धंधे का हिस्सा हैं.

कड़वी हकीकत

देश की सब से बड़ी जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में देह व्यापार में लिप्त लड़कियों में से 90 प्रतिशत वे हैं जिन की खरीदफरोख्त हुई यानी कि इस धंधे में लगी 90 प्रतिशत लड़कियों को जबरन वेश्या बनना पड़ा.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार 6 प्रतिशत लड़कियां बलात्कार किए जाने के बाद बेच दी जाती हैं और इस तरह वे देह के इस धंधे में फंस जाती हैं. बाकी बची 4 प्रतिशत वे हैं जो घरेलू हिंसा की शिकार होने के बाद मजबूरी में यह रास्ता चुनने को मजबूर होती हैं.

दुनियाभर में करीब 2 करोड़ वेश्याएं यौन संक्रमित बीमारियों से ग्रसित हैं, जिन में से आधी तो सिर्फ भारत में हैं.

कोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस को यह आदेश दिया कि जब भी पुलिस किसी जगह छापा मारे तो सैक्सवर्कर्स को गिरफ्तार या परेशान न करे, क्योंकि इच्छा से वेश्यावृत्ति में शामिल होना अवैध नहीं है, सिर्फ वेश्यालय चलाना गैरकानूनी है.

कोर्ट के इस नजरिए से जिस्मफरोशी में लिप्त लड़कियों को भले ही पुलिसिया उत्पीड़न से थोड़ीबहुत राहत मिले लेकिन इस से बड़े बदलाव की उम्मीद करना व्यर्थ है.

फैसला सुनाने वाले न्यायाधीशों का वेश्यावृत्ति की जमीनी हकीकत से वास्ता क्या? ठीक वैसे ही जैसे हमारे यहां बाल विवाह निषेध कानून बना कर हम मान बैठे कि अब बाल विवाह खत्म हो गया लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है. आज भी देश में 56 प्रतिशत लड़कियों की शादी 15 साल से कम उम्र में कर दी जाती है.

वेश्यावृत्ति गैरकानूनी थी, तब भी तो धंधा चल ही रहा था. अब लीगल हो जाने के बाद यह धंधा और जोरों से चलेगा. बेरोजगारी के आलम में थोड़ी राहत तो मिलेगी. सभ्य समाज में वेश्यावृत्ति क्यों कायम है, न्यायाधीशों के लिए यह सवाल जरूरी नहीं है.

इस में लगी औरतों की जिंदगियों में झांकने की भी जरूरत न्यायाधीशों को नहीं. वेश्यावृत्ति के अब लीगल हो जाने के बाद वेश्या कही जाने वाली लड़कियों की जिंदगी में क्या बदलाव आएगा, यह तो मालूम नहीं लेकिन इन के छोटे दलालों को बड़ी राहत जरूर मिल जाएगी. Legalization Of Prostitution :

Sexuality Disclosure : पति या पत्नी में से जब कोई एक समलैंगिक बन जाए

 

Sexuality Disclosure : औरत औरत से और मर्द मर्द से प्यार करते हों तो ऐसे रिश्तों को भारत का समाज बरदाश्त ही नहीं करता. समलैंगिक रिश्तों का मजाक उड़ाने वाली ढेरों फिल्में बनीं लेकिन ऐसे रिश्तों की जटिलताओं को समझने और इन मुद्दों पर खुल कर बात करने वाली फिल्में बौलीवुड में बहुत ही कम बनी हैं.

दो दिलों के बीच तीसरे की घुसपैठ कोई नई बात नहीं है. साहित्य और सिनेमा के लिए यह मुद्दा सब से रोमांचक रहा है. दिल टूटने वाले गाने, बेवफाई के तराने, तीसरे के लिए ठुकराए जाने का गम, किसी तीसरे के आने से आंसुओं से भरे नगमे और वापस लौट के आने की फरियादें. तीसरे के आने के वियोग पर पूरी म्यूजिक इंडस्ट्री जुड़ी हुई है. गायक, लेखक और अदाकार पैदा हुए. इसी वियोग को भुनाने के लिए कभी बौलीवुड का पूरा बिजनैस चला करता था लेकिन अब समय थोड़ा बदल गया है.

लड़कियां पहले से ताकतवर हुई हैं. अब अगर उस की रिलेशनशिप के बीच कोई तीसरा आ भी जाता है तो वह वियोग में तड़पती नहीं बल्कि ऐसे रिश्ते को खुद से ठुकरा कर आगे बढ़ जाती है और खुद किसी नए रिश्ते में चली जाती है. ऐसे में लड़के भी अब जुदाई के गीत नहीं गाते, दिल चीर कर प्रेमिका का नाम नहीं लिखते, खून से खत नहीं लिखते और रातरातभर जाग कर माशूका की याद में शराब नहीं पीते बल्कि गुलाब का फूल ले कर अगले इश्क का इंतजार करते हैं.

शादीशुदा लोगों के बीच अगर तीसरा आ जाए तो भी अब पहले जैसा गम नहीं होता, इसलिए तलाक के मामलों में बढ़ोतरी हुई है. यह पहले से बेहतर स्थिति है. तलाक के बढ़ते ट्रैंड का सब से ज्यादा फायदा औरतों को ही है. औरतें सक्षम हुई हैं तो वे पति की ज्यादती सहने को तैयार नहीं हैं.

तलाक के बढ़ते मामलों में एक सब से बड़ी वजह दोनों के बीच तीसरे की घुसपैठ ही है. शादीशुदा औरत का एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर मर्द बरदाश्त नहीं कर पाते तो औरतें भी अब पहले की तरह अबला नारी नहीं रह गई हैं. जब पति घर में दूसरी ले आता था और औरत कुछ नहीं बोल पाती थी, अब पति के एकस्ट्रा मैरिटल को औरतें बरदाश्त नहीं कर पातीं और मामला तलाक तक पहुंच जाता है. पत्नी के पुरुष दोस्तों को पति बरदाश्त नहीं करता तो पति की महिला मित्र पत्नी के लिए हमेशा संभावित सौतन ही होती है. कई बार मामला थोड़ा पेचीदा भी हो जाता है जब यह तीसरा या तीसरी क्या है, यही समझ नहीं आए.

श्वेता गुप्ता अपने पति के साथ लखनऊ के आलमबाग इलाके में रहती थी. श्वेता के पति राकेश गुप्ता की मार्केट में हार्डवेयर की शौप थी. शादी को अभी 2 साल ही हुए थे, दोनों के कोई बच्चा नहीं हुआ था. श्वेता अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती थी. एक दिन श्वेता के घर उस की सहेली पूनम आ गई. पूनम को लखनऊ के एक पैरा मैडिकल इंस्टिट्यूट से 6 महीने का कोर्स करना था, इसलिए वह लखनऊ आ गई. उस ने श्वेता से संपर्क किया ताकि वह पीजी ढूंढ़ने में उस की मदद कर सके. श्वेता ने अपने पति राकेश से बात की और पूनम को अपने घर में ही रहने की जगह दे दी.

दोनों स्कूल के वक्त की सहेलियां थीं, इसलिए राकेश को भी इस बात में कोई बुराई नहीं नजर आई. कुछ महीने बीते. राकेश को अपने और श्वेता के बीच दूरियां बढ़ती हुई नजर आईं. श्वेता और पूनम सिर्फ दोस्त नहीं थीं. दोनों के बीच दोस्ती से ज्यादा भी कुछ था.

राकेश को यह सब अच्छा नहीं लगा तो वह पूनम को पीजी में भेजने की बात करता तो उस की पत्नी श्वेता इस बात पर नाराज हो जाती. एक रात राकेश को श्वेता और पूनम के रिश्ते की असलियत पता चल गई. दोनों सिर्फ सहेलियां नहीं थीं बल्कि एकदूसरे की जान थीं. राकेश के लिए यह बेहद चौंकाने वाली बात थी. 2 औरतें कैसे एकदूसरे के साथ इंटिमेट हो सकती हैं, राकेश को तो यह बात सोच कर ही घिन आती थी.

राकेश ने श्वेता से सख्ती से कह दिया कि अब पूनम इस घर में नहीं रह सकती. राकेश के गुस्से को देखते हुए श्वेता ने पूनम को घर से विदा कर दिया और कुछ दिनों बाद खुद भी लखनऊ से गायब हो गई. राकेश ने थाने में अपनी बीवी की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाई और एफआईआर में पूनम का भी नाम दर्ज करवाया. पुलिस ने पूनम के इंस्टिट्यूट में पता किया तो वह भी गायब थी. कुछ दिनों बाद राकेश के व्हाट्सऐप पर वीडियो आया कि श्वेता और पूनम ने

4 दोस्तों के साथ हिंदू विवाह का मंडप किसी के घर बना कर, एक कुंड में आग जला कर और एक दोस्त को पंडित की वेशभूषा पहना कर शादी कर ली और दोनों अब खुश हैं.

राकेश के लिए यह सदमे से कम नहीं था. उस के लिए सब से बड़ी हैरानी की बात यह थी कि वह इतने दिन एक लैस्बियन औरत के साथ रह रहा था.

किसी भी जैंडर के 2 लोग अपनी मरजी से साथ रह सकते हैं. ऐसे मामलों में पुलिस और कानून भी कुछ नहीं कर सकते.

तबस्सुम के घर उस के पति का दोस्त फैजान अकसर आताजाता. फैजान पड़ोस में ही रहता था और तबस्सुम के हस्बैंड के साथ एयरपोर्ट पर नाइट शिफ्ट में काम करता था. तबस्सुम ब्यूटीपार्लर चलाती थी. उस के पति शादाब दिन में जब भी घर में रहते तो फैजान भी घर आ जाता. दोनों दोस्त शाम तक घर में रहते. सिलसिला कई महीनो तक यों ही चलता रहा. तबस्सुम को फैजान का घर पर रहना बिलकुल पसंद नहीं था लेकिन अपने पति का सब से करीबी दोस्त होने की वजह से वह फैजान को बरदाश्त करती थी.

फैजान की ड्यूटी दिन की हो गई तो अब वह रात को घर पर रहने लगा. तबस्सुम थोड़ी हैरान थी कि उस का पति उसे कैसे अपने दोस्त के साथ अकेले छोड़ कर चला जाता है. ज्यादा हैरानी यह थी कि फैजान हमेशा अदब से पेश आता और एकदो बार तबस्सुम ने फ्लर्टिंग करने की कोशिश की तो वह कन्नी काट गया.

वह इस बात से बेहद खुश थी लेकिन उस की यह खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई. एक रात फैजान घर आया तो तबस्सुम को मालूम चला कि फैजान ने भी अपनी ड्यूटी दिन की करवा ली है. फैजान ने शादाब को घर का ऊपर वाला कमरा रहने को दे दिया. अब रात को खाना खाने के बाद फैजान अपने दोस्त के पास चला जाता और देररात तक वहीं पड़ा रहता.

तबस्सुम को शक हुआ तो एक रात उस ने चुपके से फैजान और शाहिद के बीच के रिश्ते की गहराई को अपनी आंखों से देख लिया. नीचे आ कर उस ने उलटियां कीं और अगली सुबह ही अपने मायके के लिए निकल गई. तबस्सुम किसी से बता भी नहीं पा रही थी कि उस के पति का किसी मर्द से जिस्मानी संबंध है. आखिरकार उस ने अपने पति से तलाक ले लिया.

समलैंगिकता पर फिल्में

इस तरह के रिलेशनशिप को, जहां औरतें औरत से और मर्द मर्द से प्यार करते हों, हमारे समाज में कोई जगह नहीं. समाज ऐसे रिश्तों को बरदाश्त ही नहीं करता. समलैंगिक रिश्तों का मजाक उड़ाने वाली ढेरों फिल्में बनीं लेकिन ऐसे रिश्तों की जटिलताओं को समझने और इन मुद्दों पर खुल कर बात करने वाली फिल्में बौलीवुड में बहुत ही कम बनी हैं.

ऐसे ही रिश्तों पर मनोज बाजपेयी की सब से चर्चित फिल्म ‘अलीगढ़’ है. इस में वे एक गे प्रोफैसर का किरदार निभाते हैं. यह फिल्म अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर श्रीनिवास रामचंद्र सिरास की सच्ची कहानी पर आधारित है. श्रीनिवास को उन की सैक्सुअल ओरिएंटेशन की वजह से नौकरी से निकाल दिया गया था.

प्रोफैसर सिरास (मनोज बाजपेयी) एक शांत और विद्वान व्यक्ति हैं, जो अपनी निजी जिंदगी में समलैंगिक रिश्ते में होते हैं. एक स्टिंग औपरेशन के बाद उन की प्राइवेसी उजागर हो जाती है, जिस से उन्हें सामाजिक और संस्थागत उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है. राजकुमार राव एक पत्रकार की भूमिका में हैं जो प्रोफैसर सिराज की कहानी को उजागर करने की कोशिश करते हैं.

मनोज बाजपेयी को इस रोल के लिए खूब सराहना मिली. उन्होंने प्रोफैसर की नरमी, अकेलापन और मजबूती को इतनी बारीकी से निभाया कि फिल्म को नैशनल अवार्ड मिला. यह फिल्म समलैंगिकता पर एक संवेदनशील नजरिया पेश करती है.

समलैंगिक औरतों को लैस्बियन और ऐसे पुरुषों को गे कहा जाता है. सदियों से समलैंगिकता को बुराई माना जाता रहा. कई देशों में समलैंगिकता का पता चलने पर लोगों को मार दिया जाता था लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान, विज्ञान और मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से इसे स्वाभाविक और सामान्य माना जाता है.

यह एक व्यक्ति की यौनाचार स्थिति (सैक्सुअल ओरिएंटेशन) का हिस्सा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन और दुनियाभर के मनोवैज्ञानिक संगठन इस कंडीशन को सामान्य स्थिति मानते हैं. यही वजह है कि दुनिया के ज्यादातर देशों में समलैंगिकता गैरकानूनी नहीं है पर इसे सामाजिक तौर पर स्वीकृति नहीं मिली है.

समलैंगिकों पर कानून

भारत में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में धारा 377 को निरस्त कर समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया. यह कानूनी स्वीकृति की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित हुआ लेकिन समाज में आज भी ऐसे रिश्तों के लिए कोई जगह नहीं है हालांकि नई जनरेशन के बीच समलैंगिकता को ले कर स्वीकृति धीरेधीरे बढ़ रही है. यूरोप और अमेरिका में कैथोलिक चर्चों के पादरियों में यह बुरी तरह से फैला हुआ है क्योंकि वे शादी प्रेम या चर्च के नियमों के कारण सैक्स नहीं कर सकते.

समलैंगिकता एक सामान्य स्थिति है लेकिन यह स्थिति जनसंख्या अनुपात में बेहद कम लोगों में होती है. विभिन्न वैश्विक सर्वेक्षणों के आधार पर, विश्व स्तर पर समलैंगिक (गे/लैस्बियन) लोगों का प्रतिशत लगभग 2-4 है. यदि एलजीबीटीक्यू प्लस (लैस्बियन, गे, बाइसैक्सुअल, ट्रांसजैंडर आदि) को शामिल करें तो यह 5-9 प्रतिशत तक हो सकता है.

सामाजिक धारणाएं, धर्म और परंपराएं हमेशा बहुसंख्यक का समर्थन करती हैं और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करती हैं लेकिन संविधान सभी नागरिकों को बराबरी का दर्जा देता है, इसलिए नागरिकों की उन्नति के लिए संविधान का मजबूत होना बेहद जरूरी है. किसी के सैक्सुअल बिहेवियर या सैक्सुअल इंट्रैस्ट के आधार पर उस से भेदभाव या नफरत करना जायज नहीं है. कोई किसी भी जैंडर, नस्ल, जाति या धर्म से हो, हर व्यक्ति को सम्मान और स्वतंत्रता का अधिकार मिलना चाहिए.

समलैंगिक अपने सामान्य व्यवहार में दूसरों की तरह के ही दिखते हैं और समाज को उन से कोई परेशानी नहीं होती पर पंडित, पादरी चिढ़ते हैं क्योंकि इन संबंधों से उन की रोजीरोटी मारी जाती है. खुद करते हों तो ठीक है पर भक्त करें तो उन का बस चले तो फांसी पर चढ़ा दें. Sexuality Disclosure :

Indira-Menaka Gandhi Case : अलग धर्मों में शादी, बच्चों का क्या होगा धर्म ?

Indira-Menaka Gandhi Case : अलग धर्मों में शादी से हुए बच्चों का धर्म क्या है ? जानिए इंदिरा गांधी और मेनका गांधी के मुकदमे से.
आजादी के बाद से ही किसी व्यक्ति का धर्म तय करने का अधिकार दरअसल अदालतों को मिले हुए हैं जिस पर धर्म के ठेकेदारों, पंडों, पादरियों और मौलवियों का तिलमिलाना स्वाभाविक बात है. पितृसत्तात्मक व्यवस्था यह मानती है कि पति का धर्म ही पत्नी का धर्म होगा और संतान का धर्म वही होगा जो पिता का है लेकिन उत्तराधिकार और विशेष विवाह के कानून कुछ और कहते हैं.

एक मुहिम अब से कोई 20 साल पहले आकार लेना शुरू हो गई थी लेकिन अंजाम पर पहुंची  थी 2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा अप्रत्याशित बहुमत से सत्ता में आई थी. तब सोशल मीडिया पर तरहतरह की पोस्ट इस आशय की वायरल होना रोज की बात थी कि राहुल गांधी का धर्म क्या है क्योंकि उन की मां सोनिया गांधी ईसाई हैं और पिता राजीव गांधी पारसी इस लिहाज से थे कि उन के पिता फिरोज गांधी पारसी थे.

कट्टर सवर्णों को यह कहते सुना जा सकता था कि पहले हमें मुगलों ने लूटा, फिर अंगरेजों ने लूटा और आजादी के बाद से नेहरूगांधी खानदान सनातन धर्म को भी नष्टभ्रष्ट कर रहा है क्योंकि वे हिंदू हैं ही नहीं.

कट्टर हिंदू धार्मिक भावनाओं को भड़का कर भाजपा ने सत्ता तो हासिल कर ली और अपने एजेंडे व हिंदुओं से किए वादे के तहत उस ने राम मंदिर बनवाया, जम्मूकश्मीर से धारा 370 को बदला, तीन तलाक वाले कानून को खत्म कर दिया और भी ऐसे काम बाद में उस ने किए हैं जैसे तीर्थयात्राएं बढ़वाना, दान का काम कराना, घाट बनवाना, मौब लिंचिंग पर पुलिस का चुप रहना वगैरह जो उन 8-10 करोड़ सवर्णों का दिल खुश कर देने वाले थे. इन्हीं लोगों ने एवज में नोटबंदी और जीएसटी की कड़वी खुराक हलक में उड़ेल ली थी. इस दौरान छिटपुट सोशल मीडिया पर राहुल गांधी के धर्म के बारे में बासी पोस्टें आतीजाती रहती हैं जिन का मकसद नए सवर्ण वोटरों और पिछड़ों से ऊंचे वर्गों को बरगलाना रहता है.

दक्षिणपंथ एक नुकीला हथियार है जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कमला हैरिस के खिलाफ इस्तेमाल करते सत्ता हासिल की थी और इजराइल के बेंजामिन नेत्यानाहू एडोल्फ हिटलर से ज्यादा क्रूर व्यवहार फिलिस्तीनियों पर कर रहे हैं. उन का प्रहार रंग और नस्ल पर था. इस खेल या साजिश का नतीजा ही यह है कि अमेरिका की राजनीति या समाज का अलिफ बे न जानने वाला भी मानने लगा है कि दुनिया का सब से पुराना लोकतांत्रिक देश पतन और बदहाली के कगार पर है पर इजराइल अब इसलामी देशों सा खतरनाक बन चुका है.

राहुल गांधी के धर्म के प्रकरण के संबंध में एक रोचक बात यह है कि वरुण गांधी के धर्म को ले कर कभी हायहाय नहीं होती कि उन की मां सिख और पिता भी पारसी थे तो वे किस लिहाज से हिंदू हुए. यह पूरा ड्रामा दरअसल महाभारत से उधार लिया गया लगता है जिस में जो भी पांडवों के खेमे यानी कृष्ण की शरण में आ जाता था, वह पवित्र, धर्मयोद्धा और धर्मरक्षक वगैरह घोषित हो जाता था, बाकी सब ऋषि विदुर और वर्ण की तरह वर्णसंकर.

मेनका गांधी और वरुण गांधी के भाजपा की शरण लेने भर से ये दोनों राजनीतिक युयुत्सु (धृतराष्ट्र का 101वां बेटा जिस ने धर्म के लिए पांडवों का साथ दिया था) साबित हुए. अब अपने वंश से गद्दारी करने का या भाजपा के प्रति निभाई गई वफादारी का इनाम उन्हें मिल चुका है. सनातनियों ने अपनी बात इतनी बार दोहराई तो कईयों को राहुल गांधी अहिंदू नजर आने लगे. राहुल गांधी उस वक्त मात खा गए थे जब उन्होंने सार्वजनिक मंच से अपने हिंदू होने की बात कहनी शुरू की थी. 10 सितंबर, 2021 को एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था, ‘मेरा परिवार कश्मीरी पंडितों का है. जब भी मैं जम्मूकश्मीर आता हूं, मुझे घर जैसा लगता है.’

इस के पहले राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने 27 नवंबर, 2018 को पुष्कर के एक मंदिर में पूजापाठ किया था, तब एक पुरोहित ने दावा किया था कि राहुल गांधी का गोत्र दत्तात्रय है और वे कश्मीरी ब्राह्मण हैं. एक दफा कथिततौर पर उन्होंने खुद को जनेऊधारी भी बताया था.

राहुल गांधी भूल गए थे कि जिन लोगों को वे खुद का हिंदू होना दिखाना चाहते हैं वे कट्टर मानसिकता वाले सवर्ण हिंदू हैं और उन का हल्ला, मुख्यधारा में होने के चलते, इतना ज्यादा मचता है कि वही सच लगने लगता है और बाकी 80-85 फीसदी लोगों, जिन में दलित, मुसलमान, आदिवासी और पिछड़े हैं, को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन का धर्म क्या है.

यही कांग्रेस का परंपरागत वोट रहा है जिस ने इंदिरा गांधी को कभी पारसी की पत्नी या पारसी नहीं माना बल्कि एक उदारवादी नेत्री के तौर पर उन पर बारबार भरोसा किया. यही ट्रीटमैंट जनता ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को दिया था. राहुल अगर बजाय धर्म और उस के प्रतीक चिह्नों के 14 अगस्त, 1984 को दिए गए अपने ही परिवार से ताल्लुक रखते सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते तो वह ज्यादा कारगर और असरदार साबित होता.

इंदिरा गांधी बनाम मेनका गांधी

कौन किस धर्म का है और किस बिना पर है, अव्वल तो यह बात ही बेमानी है लेकिन चर्चित भारतीय मुकदमों के नजरियों से देखें तो राहुल गांधी हिंदू ही हैं. एक दिलचस्प मुकदमे की दास्तां कुछ यों है-

साल 1980 में इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी की मौत एक हवाई हादसे में हुई थी, तब मेनका गांधी प्रधानमंत्री आवास में इंदिरा गांधी के साथ ही रहती थीं लेकिन 2 साल में ही सास-बहू में सियासी खटपट शुरू हो कर इस मुकाम तक पहुंच गई थी कि इंदिरा गांधी ने 1982 में मेनका को बाहर का रास्ता दिखा दिया था. तब मीडिया में यह चर्चा सुर्खियों में रही थी कि मेनका गांधी खुद को नेहरूगांधी परिवार के राजनीतिक वारिस के तौर पर देखने और मानने लगी थीं क्योंकि उस समय तक राजीव गांधी सिर्फ इंडियन एयरलाइंस में पायलट थे और संतुष्ट लगते थे. इंदिरा गांधी ऐसा नहीं चाहती थीं, इसलिए उन्होंने अपने पायलट बेटे राजीव गांधी को अमेठी उपचुनाव से लड़वा कर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था.

बाद में मेनका ने पति के नाम पर संजय विचार मंच का गठन किया था जो कुछ साल तो चर्चा में रहा लेकिन जल्द ही दम तोड़ गया था क्योंकि लोगों की सहानुभूति उन से खत्म होने लगी थी. इस लड़ाई में मेनका खुल कर अपनी सास व जेठ राजीव गांधी सहित कांग्रेस के खिलाफ भी आग उगलने लगी थीं. इस के लिए उन्हें जनसंघ, हिंदू महासभा, जनता पार्टी और हिंदूवादी संगठनों का साथ मिला.

बात यानी उत्तराधिकार की लड़ाई अदालत तक भी पहुंची. पति की मौत के बाद मेनका गांधी ने बेटे वरुण गांधी के नाम पर दिल्ली जिला न्यायालय में संपत्ति (तब लगभग एक करोड़) का प्रशासनिक पत्र यानी लैटर औफ एडमिनिस्ट्रेशन प्राप्त करने के लिए एक याचिका दाखिल की थी.

गौरतलब है कि संजय और मेनका ने साल 1974 में स्पैशल मैरिज एक्ट 1954 के तहत शादी की थी. अपनी याचिका में मेनका गांधी ने दावा किया था कि संजय गांधी एक पारसी व्यक्ति थे, इस नाते उत्तराधिकार के लिए व्यक्तिगत कानून लागू होता है, हिंदू विरासत कानून 1956 नहीं. इसलिए इस मामले पर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम यानी इंडियन सक्सेशन एक्ट 1925 लागू होना चाहिए जिस में पत्नी को पूरा हिस्सा मिलता है, मृतक की मां को हिस्सा नहीं मिलता.

यह मुकदमा मेनका गांधी बनाम इंदिरा गांधी था. मेनका गांधी ने अपनी सास इंदिरा गांधी और अपने 4 साल के अवयस्क बेटे वरुण गांधी को प्रतिवादी बनाया था जिन का प्रतिनिधित्व यानी गार्जियनशिप स्वाभाविक तौर पर इंदिरा गांधी कर रही थीं.

इस मुकदमे के शुरू होते ही देश की राजनीति में हलचल मच गई थी क्योंकि विवाद संपत्ति के उत्तराधिकार के साथसाथ धार्मिक पहचान का भी था और देश के सब से बड़े राजनीतिक परिवार का था. तब इंदिरा गांधी सब से बड़ी सियासी हस्ती हुआ करती थीं जिन से कानूनी या गैरकानूनी किसी भी ढंग से उलझना जोखिमभरा काम था. यह सब और इस से भी ज्यादा बहुतकुछ जानतेसमझते हुए भी मेनका गांधी ने यह रिस्क लिया था लेकिन राजनीति के बाद कानूनन भी वे इंदिरा गांधी से मात खा गई थीं.

इंदिरा गांधी ने कहा था कि संजय गांधी हिंदू थे क्योंकि उन की मां यानी वे खुद भी हिंदू हैं. उन्होंने ये तर्क भी दिए थे कि संजय का कोई संस्कार पारसी रीतिरिवाज खासतौर से नवजोत नहीं हुआ है इसलिए मामले पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 लागू होना चाहिए जिस के तहत मृतक के वारिसों में उस की पत्नी, बच्चे और उस की मां बराबर के हिस्सेदार होते हैं. सो, संजय गांधी की संपत्ति के 3 हिस्से इंदिरा, मेनका और वरुण के नाम होने चाहिए.

ट्रायल कोर्ट ने इंदिरा गांधी की दलीलों से इत्तफाक रखते हिंदू उत्तराधिकार अधिनयम 1956 के तहत ही फैसला दिया कि संजय गांधी चूंकि हिंदू थे इसलिए उन की संपत्ति के 3 बराबर के हिस्से होंगे. इस फैसले के खिलाफ मेनका गांधी हाईकोर्ट गईं लेकिन हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते यह भी कहा कि संजय गांधी के पारसी होने के कोई सुबूत पेश नहीं किए गए हैं.

1984 में मेनका ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया लेकिन वहां से भी उन के हाथ निराशा ही लगी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसले को यथावत रखा. कोर्ट ने साफ तौर पर अपने फैसले में कहा कि संजय हिंदू ही थे, इसलिए मामले पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम ही लागू होता है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रही हैं कि संजय गांधी ने नवजोत संस्कार करवा कर या अन्य किसी दूसरे तरीके से पारसी धर्म अपनाया था. ऐसे किसी प्रमाण के अभाव में उन्हें जन्म और पालनपोषण के आधार पर हिंदू ही माना जाना चाहिए.’’

अपनी बात रखते इंदिरा गांधी ने डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में ही 15 मार्च, 1983 को एक हलफनामा पेश किया था जिस में उन्होंने कहा था, ‘‘मेरे पति श्री फिरोज गांधी का नवजोत संस्कार 1923 में वाडिया अगियारी बोम्बे में हुआ था. वे जन्म से पारसी थे लेकिन मेरे पुत्र संजय गांधी का कोई नवजोत संस्कार नहीं हुआ, उन का पालनपोषण हिंदू परंपराओं में हुआ और वे हिंदू ही थे. मैं स्वयं जन्म से हिंदू हूं और नेहरू परिवार की हिंदू परंपराओं का पालन करती हूं.’’

नवजोत एक पारसी धार्मिक संस्कार है जिस की अहमियत उतनी ही होती है जितनी हिंदू धर्म में उपनयन या जनेऊ संस्कार में और इसलाम में खतना की होती है. पारसी (जोरो आस्ट्रियन) धर्म में बच्चे का औपचारिक प्रवेश या धर्मांतरण संस्कार है जो पारसी होने या पारसी बनने की अनिवार्य शर्त है. 

मुकदमे का महत्त्व

ट्रायल कोर्ट से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक ने माना कि इंदिरा गांधी भी हिंदू थीं और संजय गांधी भी हिंदू थे तो कईयों, खासतौर से हिंदूवादी संगठनों और दलों, के चेहरे उतर गए जो यह आस लगाए बैठे थे कि बस एक दफा अदालत इंदिरा गांधी और उन के परिवार को पारसी घोषित कर दे तो उन के धर्म पर सियासी रोटियां सेंकी जा सकें.

ऐसा नहीं हुआ तो यह मामला उन्होंने अपने हाथ में ले लिया और जबतब नेहरूगांधी परिवार को ईसाई, मुसलमान और पारसी धर्म को प्रचारित करने लगे. भारत में आदमी का नाम बाद में पूछा जाता है, धर्म और जाति पहले पूछे जाते हैं. इस के बाद उसी हिसाब से संबंधित से व्यवहार यानी डील की जाती है.

संविधान के बजाय मनु स्मृति को मानने वालों के लिए यह मुकदमा एक झटके और सदमे की तरह था क्योंकि यही लोग धर्मग्रंथों के हवाले से यह तय करते आ रहे थे कि हिंदू कौन और हिंदू कौन नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी तौर पर ऐसी दुकानें बंद कर दीं तो ये लोग बौखला उठे लेकिन कर कुछ न सके.

यह तबका या गिरोह बौखलाया तो तब भी था जब आजादी के बाद देश में धर्मनिरपेक्ष संविधान लागू हुआ था और तब भी तिलमिलाया था जब हिंदूकोड बिल की ड्राफ्टिंग हो रही थी. इन लोगों ने सड़क से ले कर संसद तक में बवाल काटा था. यह सब विस्तार से सरिता के पिछले कई अंकों में पाठक शृंखलाबद्ध तरीके से पढ़ चुके हैं.

आम धारणा यह थी और अभी भी है कि अंतर्धार्मिक शादी, चाहे स्पैशल मैरिज एक्ट में हो, उस में पत्नी का धर्म खुद ही वही हो जाता है जो पति का होता है लेकिन मेनका गांधी बनाम इंदिरा गांधी मुकदमे के फैसले ने इस मिथक को तोड़ा और यह मैसेज समाज में गया कि ऐसा होना कोई बाध्यता या अनिवार्यता नहीं.

इसी मुकदमे के नजरिए से देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि-

इंदिरा गांधी जन्म से हिंदू थीं (हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 2 (1) (ए).

उन्होंने कभी पारसी धर्म को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया और उन का पालनपोषण हिंदू परंपराओं से हुआ था (हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 2 ( 1 ) ( बी).

इसी तरह स्पैशल मैरिज एक्ट 1954 की धारा 21ए के तहत यह सुनिश्चित किया गया कि इस मामले पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होगा क्योंकि दोनों क्रमश: सिख व हिंदू हैं. इस कानूनी ढांचे से ही इंदिरा गांधी के हिंदू होने की पुष्टि होती है जो संजय गांधी, राजीव गांधी और वरुण गांधी से ले कर राहुल गांधी तक बरकरार रहती है.

सुलझ कई उलझनें

यह मुकदमा राजनीति के साथसाथ समाज और कानूनी रूप से भी बहुत अहमियत वाला साबित हुआ जिस ने विशेष विवाह अधिनियम और उत्तराधिकार संबंधी कई भ्रम दूर किए. मसलन, यह कि यह जरूरी नहीं कि पति का धर्म ही पत्नी का भी धर्म हो और संतान का भी धर्म पिता का धर्म हो. अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते धार्मिक पहचान पर जोर दिया जिसे इसी मुकदमे से समझें तो स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह करने वाले दोनों पक्ष हिंदू, जैन, सिख या बौद्ध हैं तो उन के उत्तराधिकार पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 लागू होता है.

संजय-मेनका दोनों स्पैशल मैरिज एक्ट की धारा 21ए के तहत हिंदू माने गए. अगर संजय पारसी साबित हो जाते तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत मेनका पूरी संपत्ति की स्वामी हो जातीं.

बाद में इतना जरूर हुआ कि इंदिरा गांधी ने अपना 1/3 हिस्सा पोते वरुण गांधी को दे दिया. इस तरह नाबालिग वरुण को अपने पिता की जायदाद का 2/3 हिस्सा और 1/3 मेनका गांधी को मिला. कोर्ट और कानून के मुताबिक वरुण के नाम की संपत्ति को उन के बालिग होने के नाते कोई यानी मेनका गांधी बेच नहीं सकती थीं. इस के लिए उन्हें अदालत की इजाजत लेना पड़ती जो आमतौर पर ऐसे मामलों में आसानी से नहीं मिलती. इस के लिए कोई ठोस वजह होनी चाहिए.

अगर कोई एक पक्ष गैरहिंदू उत्तराधिकारी हो तो क्या होगा, यह सवाल किसी के भी जेहन में उठना स्वाभाविक बात है. इस सवाल का बेहद आसान और सटीक जवाब यह है कि तो फिर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 लागू होगा जिस में समयसमय पर संशोधन सुधार के लिए होते रहे हैं.

इस अधिनयम की धारा (1 )  (सी) कहती है कि कोई भी व्यक्ति जिस का धर्म मुसलिम, ईसाई, पारसी या यहूदी साबित न हो तो हिंदू कानून उस पर लागू होगा. यह दरअसल एक डिफौल्ट प्रावधान है जो नास्तिकों और अज्ञेयवादियों पर भी लागू होता है बशर्ते उन का नाम हिंदू जैसा हो और उन का जन्म हिंदू परिवार में हुआ हो.

केरल हाईकोर्ट के एक फैसले के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति हिंदू होने से इनकार करता हो लेकिन कोई औपचारिक धर्मांतरण नहीं करता तो उसे हिंदू ही माना जाएगा. अभी तक कोई ऐसा कानून नहीं है जो किसी व्यक्ति को बिना किसी धर्म का मानने का मौका देता हो.

निश्चित रूप से नास्तिकों को कोर्ट से राहत नहीं मिलती. ऐसा इसलिए कि अधिकतर शादियां धार्मिक रीतिरिवाजों से होती हैं. शादी अगर स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत की जाए तो धार्मिक होने की झंझट और बाद की उलझनों से मुक्ति पाई जा सकती है. भारत में कई अंतर्धार्मिक शादियां स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत होती हैं.

चर्चित उदाहरण फिल्म अभिनेत्री शर्मिला टैगोर और क्रिकेटर मंसूर अली खां पटौदी का लें तो उन की शादी स्पैशल मैरिज एक्ट के अंतर्गत हुई थी लेकिन दोनों का धर्म व्यक्तिगत तौर पर बरकरार रहा. उत्तराधिकार के मामले में उन के बेटे सैफ अली खान पर हिंदू कानून उसी सूरत में लागू होता जब यह साबित हो जाता कि उन की परवरिश हिंदू परंपराओं के तहत हुई.

कविता बनाम भारत संघ 1981 के मुकदमे में एक हिंदू महिला की मुसलिम पुरुष से शादी स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत हुई थी. इस मामले में भी अदालत ने माना था कि विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी करने वालों का धर्म परिवर्तित नहीं होता. यदि दोनों पक्ष हिंदू हैं तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 लागू होता है (धारा 21ए). इस मामले में महिला का हिंदू धर्म बरकरार रहा, इसलिए संपत्ति के मामले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू हुआ. इस अधिनयम के 1976 के संशोधन के मुताबिक अगर दोनों पक्ष अलगअलग धर्मों के हैं तो उन पर इंडियन सक्सेशन एक्ट 1925 लागू होता है.

इस बात को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले आए हैं. जस्टिस चिनप्पा रेड्डी के मुताबिक स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करने पर उत्तराधिकार पर्सनल ला से बाहर हो जाता है. हालिया 2024 के एक दिलचस्प मुकदमे सफिया बनाम भारत संघ में एक पूर्व मुसलिम महिला ने शरीयत से बाहर निकल कर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम अपनाने या लागू करने की मांग की. सुप्रीम कोर्ट ने इसे सुनवाई के लिए तो स्वीकार किया लेकिन मामला इस वजह के चलते लंबित है कि यह शादी स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत नहीं हुई थी.

यह मामला दिलचस्प इसलिए भी है कि इस में याचिकाकर्ता सफिया केरल की रहने वाली हैं और एक मुसलिम संगठन ‘एक्स मुसलिम औफ केरल’ की महासचिव हैं. इसलाम में जन्मी सफिया अब कुछ व्यक्तिगत कारणों से नौन बिलीवर यानी नास्तिक हो गई हैं. बकौल सफिया, वे अब मुसलिम पर्सनल ला यानी शरिया कानून से बंधी नहीं रहना चाहतीं. वे चाहती हैं कि अब उन के मामले में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 लागू हो.

जाहिर है, यह मामला यूनिफौर्म सिविल कोड की बहस को मजबूत करता है जो सभी धर्मों पर समान कानून की वकालत करता है. मामला अभी लंबित है जिस में केंद्र सरकार और केरल सरकार भी शामिल हैं. लेकिन उदारवादी, नौन बिलीवर मुसलमान इस से सहमत हैं कि उन्हें और सभी मुसलमानों को शरिया कानून की घुटन से आजादी दिलाई जाए. अब देखना दिलचस्प होगा कि कोर्ट का फैसला क्या आता है.

सार यह कि धार्मिक घुटन से मुक्ति के लिए शादी स्पैशल मैरिज एक्ट से करने से बाद की झंझटों से बचा जा सकता है. इसलिए हर किसी को शादी इसी के तहत करनी चाहिए लेकिन धरमकरम के मारे लोग ऐसा करने की हिम्मत जुटा पाएंगे, इस में शक है. इस में तलाक की प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत सरल है.

हिंदू मैरिज एक्ट की परस्पर सहमति से तलाक वाली धारा (13 बी) की तरह इस में भी धारा 28 है. तलाक के बाकी प्रावधान हिंदुओं जैसे ही हैं, मसलन व्यभिचार, संक्रामक यौन रोग, परित्याग यानी छोड़ देना, मानसिक विकार और अज्ञातवास वगैरह. इसलिए हर किसी को इस धर्मनिरपेक्ष और सहुलियतें देते इस अधिनियम के तहत शादी करना बेहतर साबित होगा. Indira-Menaka Gandhi Case :

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