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दोस्त, आखिर कब तक

फिल्मी तबके में अकसर अभिनेता व अभिनेत्रियों की बढ़ती नजदीकियां या दोस्ती को अफेयर की शक्ल में मिर्चमसाला लगा कर लपेटना पुरानी बात हो गई है. कई फिल्मी सितारे भी अब अपने लव इंटरैस्ट को सरेआम जाहिर करने से नहीं कतराते. अनुष्का शर्मा और विराट कोहली का प्रकरण सब के सामने है ही. लेकिन फिल्म आशिकी-2 व एक विलेन से स्टार बनीं अभिनेत्री श्रद्धा कपूर शायद अभी भी दोस्त वाले हैंगओवर से बाहर नहीं आईं. शायद इसलिए लंबे अरसे तक अभिनेता आदित्य राय कपूर के साथ उन्होंने अपने रिश्तों को कबूल नहीं किया और अब जब बे्रकअप की खबरें उड़ीं तो वे आदित्य की हमेशा अच्छी दोस्त रहेंगी जैसा जुमला दोहरा रही हैं. बहरहाल,? यह उन का निजी मामला है, हमें क्या करना.  

फिल्म समीक्षा

डिटैक्टिव ब्योमकेश बख्शी

जिस तरह उड़द की दाल को धीमी आंच पर 2-3 घंटे तक पकाया जाता है, तब कहीं जा कर वह स्वादिष्ठ बनती है, ठीक वैसी ही फिल्म है ‘डिटैक्टिव ब्योमकेश बख्शी’, जिसे निर्देशक ने धीरेधीरे डैवलप किया है, इसीलिए क्लाइमैक्स में जा कर ही फिल्म का टेस्ट पता चल पाता है. हालांकि इस चक्कर में फिल्म की गति काफी धीमी हो जाती है. डार्क शेड होने की वजह से आंखों पर जोर भी ज्यादा पड़ता है और इस डिटैक्टिव को समझने में दिमाग पर जोर लगाना पड़ता है, फिर भी यह फिल्म एकदम अलग है. इस का टेस्ट हर कोई नहीं उठा पाएगा. जासूसी की कहानियों और कौमिक्स में रुचि रखने वालों को यह कुछ रुचिकर लग सकती है. ‘डिटैक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ में न तो रोमांस है न ही डांस और न ही कोई चटपटापन. फिर भी डिटैक्टिव ब्योमकेश द्वारा मर्डर मिस्ट्री सुलझाने की जद्दोजहद देख कर लगा कि इस किरदार को जीवंत कर देने वाला कलाकार सुशांत सिंह राजपूत टीवी पर दिखने में जितना रोमांटिक व रंगीन नजर आता था, अब ब्योमकेश की भूमिका में उतना ही गंभीर व मुश्किल किरदार नजर आया है. उस ने शरलौक होम्स के किरदार को देसी अंदाज में निभाया है.

‘डिटैक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ शरदेंदु बंदोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित है. शरदेंदु बंदोपाध्याय ने अपने उपन्यास में ब्योमकेश को 25-26 साल का नौजवान बताया है, जो 1943 में कलकत्ता यूनिवर्सिटी से बाहर निकला है. वह हर वक्त डिटैक्टिव बनने के बारे में सोचता रहता है. उस की अपनी एक अलग स्टाइल है. वह खूबसूरत है. इस फिल्म के निर्देशक दिबाकर बनर्जी ने यही सारी खूबियां अपनी फिल्म के नायक सुशांत सिंह राजपूत में दिखाई हैं.

फिल्म की कहानी आज के दौर की नहीं, 1948 की है. उस वक्त के कलकत्ता शहर को निर्देशक ने विस्तार से दिखाया है. उस ने किरदारों के रहनसहन, कपड़े पहनने की स्टाइल, पान को मोड़ कर खाने की स्टाइल, अखबार, घड़ी, चश्मे को उसी माहौल के जैसा ही फिल्माया है. उस दौर में कलकत्ता की पुलिस कैसी थी, ट्राम कैसे चलती थी, फेरी वाले कैसे थे, सबकुछ माहौल के मुताबिक दिखाया है. 1942-43 में कलकत्ता में अफीम की स्मगलिंग भी होती थी और जापानियों द्वारा इसे ड्रग कैपिटल बनाने की कोशिश भी की गई थी, इसे भी विस्तार से दिखाया है. फिल्म की कहानी द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में 1943 तक चलती है. अजीत बनर्जी (आनंद तिवारी) के पिता भुवन बाबू लापता हो जाते हैं. वह डिटैक्टिव ब्योमकेश बख्शी (सुशांत राजपूत) से अपने पिता को ढूंढ़ने में मदद मांगता है.

ब्योमकेश उस बोर्डिंग हाउस में जाता है जहां भुवन बाबू रहते थे. बोर्डिंग हाउस के मालिक अनुकूल गुहा (नीरज काबी) उस की मदद करते हैं. वह अपनी जांच को आगे बढ़ाता है. वह एक गायिका अंगूरी देवी (स्वास्तिका मुखर्जी), एक क्रांतिकारी नेता सुकुमार घोष (शिवम) और उस की बहन सत्यवती (दिव्या मेनन) से मिलता है. वह और भी कई लोगों से मिलता है और यह पता लगाने में सफल रहता है कि भुवन बाबू की वास्तव में हत्या हो चुकी है. जैसेजैसे वह अपनी जांच में आगे बढ़ता है, हत्यारा उसे दिशा से भटकाने के लिए तिकड़में लड़ाता है. लेकिन जब ब्योमकेश सचाई को उजागर करता है, उस मर्डर मिस्ट्री को जान कर, हर कोई हैरान रह जाता है.

फिल्म की इस कहानी की लंबाई बहुत ज्यादा है, इसे आसानी से छोटा किया जा सकता था. दिबाकर बनर्जी वैसे तो बेहतरीन निर्देशक हैं लेकिन अपनी फिल्म में वे शरलाक होम्स वाली बात पैदा करने में कामयाब नहीं हुए हैं. फिल्म में कहींकहीं डबिंग दोष भी साफ नजर आता है. सुशांत सिंह राजपूत अपने किरदार में एकदम फिट है परंतु उस के बोलने में बंगालीपन कहीं नजर नहीं आता. अन्य कलाकार स्वास्तिका, नीरज काबी और आनंद तिवारी सुशांत सिंह को सपोर्ट करते नजर आते हैं. फिल्म का बैकग्राउंड संगीत अनुकूल है. फिल्म में 1-2 गाने हैं. संगीत मूड के अनुसार है. छायाकार ने पुराने कलकत्ता को प्रभावी तरीके से फिल्माया है.

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एक पहेली लीला

फिल्म का नाम है एक पहेली लीला लेकिन इस में कोई पहेली नहीं है, न ही कोई सस्पैंस है. इसे सैक्सी वीडियो अलबम कहना उपयुक्त होगा. फिल्म के निर्देशक बौबी खान ने बहुत से वीडियो अलबम बनाए हैं. इसीलिए इस फिल्म में आप को थोड़ीथोड़ी देर बाद परदे पर एक गाना नजर आ जाएगा. गानों में सनी लियोनी ने खूबसूरत और महंगे कौस्ट्यूम्स पहन कर परफौर्म किया है. उस ने अपनी इस परफौर्मेंस में बहुत ज्यादा कामुकता परोसी है, अपने क्लीवेज दिखाए हैं. बौबी खान का पूरा ध्यान सनी लियोनी को ऐक्सपोज करने में ही लगा रहा है. उस ने सनी लियोनी से कामसूत्र के बहुत से आसन करवाए हैं. सनी लियोनी ने भी बढ़चढ़ कर अपनी अदाएं बिखेरी हैं. बस, उसे ऐक्ंिटग करनी नहीं आई है. चूंकि सनी लियोनी की इमेज एक पोर्न स्टार की रही है, इसलिए कोई बड़ा कलाकार उस के साथ काम करने को तैयार नहीं होता. निर्देशक को हार कर ऐसे 3 कलाकारों को लेना पड़ा जिन की कोई पहचान नहीं है. जय भानुशाली की 1-2 फिल्में रिलीज हो चुकी हैं. मोहित अहलावत को भी दर्शक नहीं जानते. राहुल देव थोड़ा जानापहचाना जरूर है परंतु असफल है.

फिल्म की कहानी पूर्वजन्म की है. पूर्वजन्म पर पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं. इन में ‘करन अर्जुन’ प्रमुख है. कहानी 300 साल पहले की है. राजस्थान के जैसलमेर में एक कुम्हार की बेटी लीला (सनी लियोनी) को एक युवक श्रवण से प्यार हो गया था. एक मूर्तिकार भैरव (राहुल देव) लीला के रूप पर मोहित हो गया था. उस ने लीला की एक मूर्ति भी बनाई थी. जब उसे पता चला था कि लीला श्रवण को चाहती है उसे नहीं तो उस ने दोनों को मार डाला था.

अब 300 साल बाद श्रवण और लीला दोबारा जन्म लेते हैं. इस जन्म में लीला एक सुपरमौडल मीरा (सनी लियोनी की दूसरी भूमिका) है जो लंदन में रहती है. श्रवण अब करन (जय भानुशाली) है, जो म्यूजीशियन है. करन को रहरह कर पूर्वजन्म की यादें परेशान करती हैं. इधर, मीरा जैसलमेर के कुंवर रणवीर (मोहित अहलावत) से शादी कर लेती है. परिस्थितियां करन को जैसलमेर ले आती हैं. वह मीरा को पूर्वजन्म की याद दिलाने की कोशिश करता है. मीरा को कुछकुछ याद आने लगता है, पर वह शीघ्र ही भूल भी जाती है. करन का टकराव कुंवर रणवीर से होता है, जिसे पूर्वजन्म के बारे में सबकुछ याद है. इधर, करन को लगता है कि पूर्वजन्म में वह श्रवण था और मीरा उस की थी. परंतु कुंवर रणवीर उसे बताता है कि पूर्वजन्म में वह श्रवण नहीं, भैरव था और वह खुद श्रवण था. वह पश्चात्ताप में भर कर खुद को खत्म करना चाहता है परंतु कुंवर और मीरा उसे मरने से रोक लेते हैं. इस फिल्म की विशेषता बेहतरीन लोकेशंस और गीतों का फिल्मांकन है. जहां तक कहानी की बात है, एकदम बासी लगती है. सनी लियोनी के ढेर सारे इंटीमेट सीन हैं जो युवाओं को लुभा सकते हैं.

फिल्म के निर्देशन में कोई विशेष बात नहीं है. निर्देशक ने पूर्व जन्म की कहानी को ले कर दर्शकों को भरमाने की ही कोशिश की है. फिल्म की लंबाई बहुत ज्यादा है. ऐक्ंिटग के लिहाज से सभी कलाकार निराश करते हैं. फिल्म का छायांकन अच्छा है. छायाकार ने राजस्थान की लोकेशनें खूबसूरती से फिल्माई हैं.

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धर्म संकट में

बौलीवुड के फार्मूलों की लिस्ट वैसे तो काफी लंबी है लेकिन उस लिस्ट में अब एक फार्मूला और जुड़ गया है और वह फार्मूला है धर्म के नाम पर कमाई करने का. बौलीवुड वालों का मानना है कि जब पंडेपुरोहित धर्म के नाम पर खूब कमाई कर रहे हैं तो वे पीछे क्यों रहें. इसीलिए पिछले दिनों ‘ओह माई गौड’ और ‘पीके’ जैसी फिल्मों ने खूब कमाई की, ‘धर्म संकट में’ में भी निर्देशक फवाद खान ने धर्म के नाम पर बवाल मचवा कर कमाई करने की कोशिश की है परंतु अपने इस प्रयास में वह एकदम फेल रहा है. ‘धर्म संकट में’ फिल्म की पूरी की पूरी वही टीम है जो ‘ओह माई गौड’ में थी, परंतु यह टीम फिसड्डी साबित हुई है. परेश रावल थकाथका सा लगा है तो अनु कपूर ओवर हो गया है. नसीरुद्दीन शाह को रामपाल और रामरहीम सरीखा बाबा बनाया गया है जो अपने भक्तों को खूब उल्लू बनाता है.

कहानी गुजरात में रहने वाले एक ब्राह्मण धर्मपाल त्रिवेदी (परेश रावल) की है. अपनी मां के मरने के बाद वह जब बैंक लौकर खोलता है तो उसे पता चलता है कि वह हिंदू नहीं, मुसलमान है. उसे गोद लिया गया था. इस बात की जानकारी वह अपनी पत्नी व बच्चों को नहीं देता. वह अपने पड़ोस में रहने वाले एक मुसलमान महमूद (अनु कपूर) को अपनी परेशानी बताता है, जो धर्मपाल के पिता के बारे में पता लगाता है. धर्मपाल का पिता अब 80 साल का है और मौत के कगार पर है. उस से मिलने के लिए धर्मपाल महमूद से मुसलमान बनने की टे्रनिंग लेता है. उधर धर्मपाल का बेटा, ढोंगी बाबा नीलानंद (नसीरुद्दीन शाह) का चेला है. वह जिस लड़की से शादी करना चाहता है, उस का बाप नीलानंद का खास आदमी है. बेटा धर्मपाल से धार्मिक होने को कहता है, परंतु अनजाने में धर्मपाल के हाथों मुसलमानों का अपमान हो जाता है. सारे मुसलमान धर्मपाल के विरोधी हो जाते हैं. अब धर्मपाल को सब के सामने यह कुबूल करना पड़ता है कि वह हिंदू नहीं, मुसलमान है. वह नीलानंद बाबा की पोल भरी सभा में खोलता है कि नीलानंद किसी जमाने का भंगड़ा डांसर मनजीत मनचला है. पुलिस नीलानंद को गिरफ्तार कर लेती है. धर्मपाल अपने पिता से मिलने अस्पताल जाता है लेकिन तब तक उस का पिता मर चुका होता है.

फिल्म की यह कहानी सुस्त और उबाऊ है. फिल्म का निर्देशन कमजोर है. निर्देशक ने अपनी तरफ से धर्म पर कोई चोट नहीं की है, न ही कोई व्यंग्य ही किया है, सीधेसीधे एक ढोंगी बाबा की पोल खोली है. फिल्म में गीतों की गुंजाइश नहीं थी, फिर भी 4-5 गीत डाले गए हैं. कोई गीत जबां पर नहीं आ पाता. छायांकन अच्छा है.    

दिव्येंदु शर्मा

दिल्ली में पलेबढ़े अभिनेता दिव्येंदु शर्मा ने फिल्म ‘प्यार का पंचनामा’ में लिक्विड का किरदार निभाते हुए कैरियर की शुरुआत की थी. उस के बाद वे ‘चश्मेबद्दूर’, ‘इक्कीस तोपों की सलामी’ और ‘दिल्ली वाली जालिम गर्लफ्रैंड’ फिल्मों में नजर आए. उन की एक फिल्म ‘द लास्ट रेब’ रिलीज होने वाली है, तो वहीं वे अनिल कपूर प्रोडक्शन की एक फिल्म कर रहे हैं. पेश हैं उन से हुई बातचीत के अंश :

2007 से अब तक के अपने कैरियर को किस तरह से देखते हैं?

सब से पहले तो मेरी चाह हमेशा अलग तरह का काम करने की रही है. मुझे अलग तरह का ही काम करने का मौका भी मिला. लोगों ने मेरे काम को सराहा. मेरी चाह हमेशा यही रही है कि जब मेरी कोई फिल्म रिलीज हो तो लोग कहें कि इस फिल्म में अगर दिव्येंदु है तो उस ने जरूर कुछ नया किया होगा. मुझे जो प्यार व सम्मान मिल रहा है, उस से लगता है कि मैं सही रास्ते पर जा रहा हूं. मेरा कैरियर भी सही रास्ते पर ही है.

पर बौलीवुड में फिल्म का हिट होना जरूरी है?

आप ने बहुत सही बात कही. मेरी पहली फिल्म ‘प्यार का पंचनामा’ और दूसरी फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ हिट थीं पर तीसरी फिल्म ‘इक्कीस तोपों की सलामी’ खास नहीं चली. पर यह फिल्म मेरे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण थी. मैं ने कुछ नया करने की कोशिश की थी. एक कलाकार के तौर पर मेरे लिए वह स्वीकार्यता बहुत जरूरी थी. फिल्म आलोचकों ने मेरे काम को सराहा था.

गड़बड़ कहां हुई?

आज की तारीख में मार्केटिंग बहुत महत्त्वपूर्ण हो गई है. शायद वहीं कहीं गड़बड़ी हुई.

हाल ही में आप की फिल्म ‘दिल्ली वाली जालिम गर्लफ्रैंड’ रिलीज हुई है. निजी जिंदगी में जालिम गर्लफ्रैंड से कभी आप का सामना हुआ?

नहीं. निजी जिंदगी में मुझे ऐसी लड़की का सामना नहीं करना पड़ा. मगर मैं ने अपने आसपास ऐसा होता हुआ देखा जरूर है. मेरे दोस्तों के साथ भी ऐसा कुछ हुआ है. पर पौइंट औफ व्यू का भी मसला है. कोई भी लड़की यह नहीं कहती कि पहले मैं इस लड़के को अपने प्यार में फांसती हूं, फिर इसे धोखा दे कर चली जाऊंगी. न ही कोई लड़का इस ढंग की बात कहता है. दोनों जो कुछ करते हैं, अपनी तरफ से सही होते हैं.

ऐसा क्यों हो रहा है?

यह तो मानव स्वभाव है. अब युवा पीढ़ी का एक्सपोजर बदल गया है. समाज में भी बदलाव आ चुका है. इमोशन नहीं बल्कि इंसान और उस के आसपास की परिस्थितियां बदलती हैं. आज की युवा पीढ़ी रिश्तों को ले कर पहले की पीढ़ी के मुकाबले ज्यादा ईमानदार है. आज की पीढ़ी का दिल टूटने पर उन्हें गम होता है. वह रिश्तों को जबरन ढोने में यकीन नहीं करती. पहले लोग रिश्ते से खुश न होते हुए भी बोल नहीं पाते थे. आज की युवा पीढ़ी में हिम्मत है कि वह कहती है कि जिस के साथ रहते हुए उसे दिमागी सुकून नहीं है, वह उस के साथ रिश्ते को साल दर साल नहीं ढोना चाहती. वह कहती है कि हमारे बीच प्यार था, पर अब हमारे बीच प्यार नहीं रहा. रिश्ते में पता चल जाता है कि कब प्यार था और कब प्यार खत्म हो गया. आज की पीढ़ी झूठ नहीं बोलती.

कुछ लोग इसे पलायनवाद मानते हैं. इस पर आप क्या सोचते हैं?

मुझे ऐसा नहीं लगता. मैं खुद एक युवा हूं. मैं ने भी आकांक्षा से प्यार किया है. और जिस से मैं ने प्यार किया, उसी से मैं ने शादी की है. कभी मेरी बेहतरीन दोस्त रही आज मेरी पत्नी है.

किसी रिलेशनशिप को बरकरार रखने के लिए क्या किया जाना चाहिए.

रिश्ते में ईमानदारी बहुत जरूरी है. आप जो कुछ हैं, उस में सामने वाले को भी हिस्सेदार मान कर चलिए. कोई भी समस्या दोनों में से कोई एक अकेले हल नहीं कर सकता. यह बात पति व पत्नी, नारी व पुरुष दोनों पर लागू होती है. पति व पत्नी दोनों को मिल कर काम करना चाहिए, दोस्तों की तरह रहना चाहिए.

मगर 10 साल प्यार, फिर शादी, उस के बाद भी शादी नहीं टिकती?

जिन की शादी चल रही है उन पर गौर करता हूं तो पाता हूं कि हमारे देश में सौ प्रतिशत सुखद वैवाहिक जीवन किसी का नहीं चल रहा. लोग एकदूसरे से बात नहीं करते पर वैवाहिक जीवन में बंधे हुए हैं. मेरी राय में आप किसी इंसान के साथ रह रहे हैं और आप को लगता है कि यह इंसान अब वह नहीं रहा जिस से आप ने प्यार किया था, जो मेरी इज्जत करता था, तो उस रिश्ते में बंधे रहने का कोई औचित्य नहीं रहता. रिश्ते में पहले इज्जत और फिर प्यार खत्म होता है. सामने वाले इंसान को ‘टेकन फौर ग्रांटेड’ नहीं लेना चाहिए. जहां इज्जत खत्म वहां प्यार खत्म. जहां प्यार खत्म हो जाए उस रिश्ते को तोड़ देना चाहिए, फिर वह रिश्ता चाहे जो हो.

आप लिव इन रिलेशनशिप व शादी में से किस के पक्षधर हैं?

मैं तो दोनों के पक्ष में हूं. शादी में हम एक समारोह में लोगों को बताते हैं कि हम अब एकसाथ रहने वाले हैं. ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में हम यह बात कोई समारोह कर लोगों को नहीं बताते. जिस को जैसे रहना हो, वह वैसे रह सकता है. यदि हम खुश हैं तो दुनिया खुश है.

आप एक तरफ डेविड धवन जैसे स्थापित निर्देशक के साथ ‘चश्मेबद्दूर’ करते हैं तो दूसरी तरफ जपिंदर जैसी नई निर्देशक के साथ फिल्म ‘दिल्ली वाली जालिम गर्लफ्रैंड’ करते हैं. किस के साथ काम करना ज्यादा सहज होता है?

स्थापित या बड़े फिल्मकारों के साथ काम करते समय कलाकार के तौर पर हमें टैंशन लेने की जरूरत नहीं होती है. डेविड धवन के साथ चश्मेबद्दूर कर रहा था तो हमें पता था कि वे 40 फिल्में निर्देशित कर चुके हैं, इसलिए मुझे थोड़ा सा उन से डर था कि मैं उन की अपेक्षाओं पर खरा उतर पाऊंगा या नहीं. नए लोगों के साथ काम करते समय उन के अंदर का स्पार्क हमें उत्साहित करता रहता है. नए लोग किसी भी बात या सीन को ‘ग्रांटेड’ ले कर नहीं चलते. पर इस सवाल का सही जवाब मैं 10-15 फिल्में करने के बाद ज्यादा सही ढंग से दे पाऊंगा.

कोई किरदार या फिल्म का कोई सीन क्या आप की जिंदगी पर असर करता है?

कुछ किरदार या कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं जोकि हम कलाकारों की निजी जिंदगी पर भी असर करती हैं. मुझे अच्छी तरह से याद है कि मैं ने पुणे फिल्म संस्थान में एक फिल्म की थी, जिस में बस कंडक्टर सुधीर का किरदार निभाया था, जो दिल्ली के बस कंडक्टरों जैसा था. किस तरह से उस की दुर्गति होती है, किस तरह से गांव से शहर आया हुआ मृदुभाषी युवक धीरेधीरे गुस्सैल होता जाता है. पैसेंजर उस के साथ झगड़ा व बदतमीजी करते हुए उसे भी बदतमीज बना देते हैं. एक दिन हालात ऐसे होते हैं कि वह एक पैसेंजर की हत्या कर देता है. यानी बदलते समाज के साथ वह भी बदतमीज होता गया. आज भी जब उस किरदार की चर्चा करता हूं तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. मुझे लगता है कि ऐसे किरदार पता नहीं कितने होंगे, जो अभी भी होंगे. कहने का अर्थ यह कि कलाकार के तौर पर कई किरदार ऐसे होते हैं जिन्हें हम निभाते हैं और वे किरदार हमेशा के लिए हमारे साथ रह जाते हैं.

कोई खास किरदार करने की तमन्ना है?

निजी स्तर पर मुझे डार्क किरदार निभाना ज्यादा पसंद है. मुझे थ्रिलर में काम करना ज्यादा पसंद है. डिटैक्टिव फिल्म करने की इच्छा है. नए किरदार ढूंढ़ता रहता हूं.

खेल खिलाड़ी

त्योहार नहीं तमाशा

विश्व कप की खुमारी अब खत्म हो चुकी है और इन दिनों इंडियन प्रीमियर लीग की खुमारी क्रिकेट प्रेमियों में सिर चढ़ कर बोल रही है. खिलाडि़यों के किस्से और मोटी रकम के किस्सेकहानियां अखबारों में खूब छप रहे हैं. चैनलों में इसे त्योहार कह कर प्रचारित किया जा रहा है. कोलकाता में इस का भव्य उद्घाटन हुआ जिस में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी शिरकत की. कई नामीगिरामी हस्तियां भी स्टेडियम में क्रिकेट का खूब मजा ले रही हैं. बड़ेबड़े कौर्पोरेट घराने और उद्योगपति इस से सीधे जुड़े हुए हैं और करोड़ों रुपयों में खिलाडि़यों को खरीद कर उन्हें अपना गुलाम बना चुके हैं. इस में कई विदेशी खिलाड़ी भी हैं. यह खेल न रह कर दौलत और शोहरत का तमाशा बन गया है. इस चकाचौंध में खिलाडि़यों के वारेन्यारे हो रहे हैं क्योंकि धनकुबेरों ने उन्हें इतना धन दे दिया है कि वे मालामाल हो चुके हैं और मशीनों की तरह क्रिकेट खेल रहे हैं.

चिंता का विषय यह है कि इस का असर खिलाडि़यों के खेल पर पड़ रहा है. आईपीएल में 20 ओवरों के मैच होते हैं. इस में नए खिलाडि़यों को एक मंच मिल जाता है पर पुराने खिलाडि़यों के लिए अकूत दौलत कमाने का यह अच्छा जरिया है. यह चौकेछक्कों का खेल है जो सीरियस क्रिकेट को बरबाद कर रहा है. खिलाड़ी टैस्ट मैचों में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं और धीरेधीरे हम क्लासिकल क्रिकेट से दूर होते जा रहे हैं. नए खिलाडि़यों में लगातार 5 दिन खेलने का स्टैमिना देखने को नहीं मिल रहा है.

एक बार गौतम गंभीर ने भी कहा था कि नए खिलाडि़यों में तकनीक का अभाव है. लेकिन खेल संघों के आकाओं को इस से कोई लेनादेना नहीं. शायद यही वजह है कि प्रथम श्रेणी क्रिकेट में हमें अच्छे खिलाड़ी नहीं मिल पा रहे हैं. इस ओर न तो बीसीसीआई के अधिकारी ध्यान दे रहे हैं और न ही खेल संघों के अधिकारी. बीसीसीआई अध्यक्ष जगमोहन डालमिया और आईपीएल-8 के मुखिया राजीव शुक्ला को इस ओर ध्यान देना होगा नहीं तो आईपीएल की चकाचौंध में क्रिकेट तो बरबाद होगा ही, साथ ही खिलाड़ी भी कहीं के नहीं रहेंगे. उन्हें इस बात की परवा नहीं कि खेल बरबाद हो रहा है. खेल को कारोबार बना देने वालों को तो पैसों से मतलब है. धन कुबेरों के लिए तो यह विलासिता का साधन है और उन्होंने खेल को त्योहार नहीं बल्कि तमाशा बना कर रख दिया है.

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हौकी कोच की चिंता

मलयेशिया के इपोह में कांस्य पदक के लिए खेले गए मुकाबले में भारत को दक्षिण कोरिया को पेनल्टी के आधार पर हराने के साथ 24वें सुल्तान अजलान शाह कप टूर्नामैंट में कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा. भारतीय गोलकीपर पी आर श्रीजेश मैच के हीरो रहे क्योंकि उन्होंने शूटआउट में 3 गोल बचाए. वर्तमान में नए कोच पौल वान ऐस भी खिलाडि़यों में जोश भरने में सफल रहे हैं. उन के कोच बनने के बाद से भारतीय टीम का यह पहला टूर्नामैंट था. जीत से कोच ऐस बहुत ज्यादा खुश नहीं हैं क्योंकि वे ऐसा मानते हैं कि कमजोर पिछली पंक्ति भारतीय पुरुष हौकी टीम की पुरानी समस्या रही है और कमजोर रक्षापंक्ति भी बड़ी चिंता रही है. इस टूर्नामैंट में कम रैंकिंग वाली कनाडा टीम को हराने में भारत को काफी मशक्कत करनी पड़ी. जीत के बाद उन्होंने कहा, ‘‘मैं टीम की रक्षापंक्ति को ले कर चिंतित हूं, और मैं भारत आने से पहले ही इसे ले कर चिंतित था. हमारा डिफैंस बहुत खराब है.’’

भारतीय हौकी में यह कोई नई बात नहीं है. ऐसा अकसर देखने को मिला है कि वह अपने आखिरी मिनटों में मैच को गंवा बैठती है. भारत के खिलाड़ी पूरा मैच अच्छा खेलते हैं लेकिन अंत में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिन से मैच उन के हाथों से फिसल जाता है. कोच पौल वान ऐस की चिंता बिलकुल जायज है. लेकिन उन के सामने बड़ी चुनौती यह भी है कि भारत हौकी में अपनी पुरानी लय में वापस लौटे और विपक्षी टीम को मात दे कर पूरे विश्व में भारत का परचम लहराए.

समस्याएं अब नहीं रहेंगी अनसुलझी

मैं विवाहित महिला हूं. मेरे व पति की उम्र में 9 साल का अंतर है. समस्या यह है कि पति मेरी फीलिंग्स को नहीं समझते. मैं अपने पति में ही अपना दोस्त, अपना बौयफ्रैंड देखना चाहती हूं, लेकिन वे मुझे सिर्फ अपने बच्चों की मां समझते हैं. मैं नहीं चाहती कि मेरी जिंदगी में कोई और आए. मैं अपने पति के साथ ही खुशहाल जिंदगी बिताना चाहती हूं लेकिन वे मेरी फीलिंग्स को इग्नोर कर के मुझे अकेला छोड़ देते हैं. मैं क्या करूं, सलाह दीजिए.

वैवाहिक संबंधों में उम्र का अंतर अधिक माने नहीं रखता अगर पतिपत्नी के बीच आपसी अंडरस्टैंडिंग व प्यार हो. ऐसे अनेक वैवाहिक जोड़े हैं जो उम्र के अंतर के बावजूद खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं. आप अपने पति को अपना दोस्त, बौयफ्रैंड बनाना चाहती हैं तो पहले खुद उन की गर्लफ्रैंड बनें, वैसा व्यवहार करें. क्योंकि अधिकांश महिलाएं पति से तो प्रेमी बनने की अपेक्षा करती हैं लेकिन खुद विवाह व बच्चे हो जाने के बाद अपनी फिटनैस व लुक्स को अनदेखा करती हैं. वे पति की बातों को इग्नोर करती हैं. बातबात पर बहस करने लग जाती हैं. छोटीछोटी बातें बतंगड़ बनने में देर नहीं लगती. धीरेधीरे रिश्तों में भी खटास आने लगती है. इसलिए ऐसा न करें. पति की नजदीकी पाने के लिए आप उन्हें आकर्षित करने के तरीके अपनाएं व उन्हें एहसास कराएं कि उन के व आप के बीच उम्र का अंतर कोई माने नहीं रखता व वे ही आप के लिए महत्त्वपूर्ण हैं और पूरी तरह स्वीकार्य हैं.

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मैं विवाहित महिला हूं. समस्या यह है कि मेरा वजन बहुत कम है, जबकि अधिकांश महिलाओं का विवाह के बाद वजन बढ़ जाता है. कृपया कुछ ऐसे तरीके बताएं जिन से मैं अपना वजन बढ़ा सकूं और अपने व्यक्तित्व में निखार ला सकूं.

जिस तरह से वजन घटाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है ठीक उसी तरह वजन बढ़ाने के लिए भी कुछ उपाय करने पड़ते हैं. वजन बढ़ाने के लिए आप स्वस्थ व सही तरीका अपनाएं. कई लोग वजन बढ़ाने के लिए सप्लीमैंट्स लेना शुरू कर देते हैं लेकिन इस के फायदे कम नुकसान अधिक होते हैं. वजन बढ़ाने के लिए अपनी खानपान की आदतों में बदलाव करें. आधाअधूरा भोजन न करें. स्वस्थ व संतुलित भोजन के समय में अधिक अंतराल न रखें. भोजन के अनुसार श्रम करें. डाइट में प्रोटीन व कार्बोहाइड्रेट जैसे दूध, बादाम, मूंगफली, ब्राउन राइस, फल, सब्जियां, केले का मिल्क शेक लें. डाइट वह लें जिस में लो फैट व हाईकैलोरी हो. साथ ही, व्यायाम भी करें. इस से हार्मोंस की गतिविधि बढ़ती है व भूख लगती है जिस से स्वस्थ तरीके से वजन बढ़ाने में मदद मिलती है. यह सर्वथा सत्य है कि किसी भी चीज की अति खराब होती है. इसलिए डाइट लेते समय इस बात को ध्यान में रखें.

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मैं अविवाहित युवती हूं. एक लड़के से प्यार करती हूं. वह बहुत जल्दी ही मुझ से विवाह करना चाहता है. पर मेरी समस्या यह है कि न जाने उस को क्यों लगता है कि मैं उस की मां की सेवा नहीं कर पाऊंगी, साथ ही वह मुझ से छोटीछोटी बातों पर झगड़ता भी है. मुझे सलाह दीजिए कि मैं उस लड़के से विवाह करूं या नहीं?

सब से पहले यह जानने की कोशिश कीजिए कि आप के बौयफ्रैंड को ऐसा क्यों लगता है कि आप उस की मां की सेवा नहीं कर पाएंगी. क्या आप के व्यवहार में उसे ऐसा कुछ लगा? अगर ऐसा है तो अपने व्यवहार में बदलाव लाएं. उसे प्यार से समझाने का प्रयास करें कि ऐसी बात नहीं है. मैं भी आप की मां का उतना ही ध्यान रखूंगी जितना कि आप रखते हैं. उन्हें किसी भी तरह की परेशानी नहीं होने दूंगी. दूसरा यह जानने की कोशिश करें कि उस के आप से झगड़ने के कारण क्या हैं? उस के आप से झगड़ने के पीछे उस की मंशा उस का प्यार व देखभाल है, तो ठीक है. लेकिन अगर झगड़ने का कारण आप पर हावी होना है, आप में गलतियां ढूंढ़ना है तो पहले उस लड़के को अच्छी तरह जानेंपरखें, फिर कोई निर्णय लें.

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मैं 23 वर्षीय विवाहित पुरुष हूं. विवाह को 3 वर्ष हो चुके हैं लेकिन अभी तक मैं पिता बनने का सुख प्राप्त नहीं कर पाया हूं. विवाह से पूर्व मैं हस्तमैथुन करता था. क्या यह मेरे पिता न बन पाने का कारण हो सकता है? शंका का समाधान कीजिए व राह सुझाइए.

आप के पिता न बन पाने का संबंध आप के विवाह से पूर्व हस्तमैथुन करने की आदत से हरगिज नहीं हो सकता. यह एक सामान्य क्रिया है. पिता न बन पाने के कारणों को जानने के लिए आप सर्वप्रथम किसी विशेषज्ञ से मिल कर अपनी मैडिकल जांच कराएं और यदि विशेषज्ञ पत्नी की भी जांच कराने के लिए कहें तो उन की भी जांच कराएं व कारण का पता लगाएं. अगर जांच में सबकुछ सामान्य आता है तो हो सकता है आप सही समय पर संभोग न करते हों. क्योंकि बच्चे को जन्म देने के लिए पुरुष के शुक्राणु हमेशा लगभग एकजैसे रहते हैं लेकिन महिला के गर्भवती होने के लिए एक निश्चित अवधि होती है. 28 दिन के मासिक धर्म में 14वां दिन ओव्यूलेशन का होता है जिसे मासिक धर्म शुरू होने के बाद से गिना जा सकता है. इस दौरान 12वें से 18वें दिन के बीच संभोग करने से गर्भ ठहरने के चांसेज अधिक होते हैं. गर्भधारण की यह फर्टाइल स्टेज होती है. इस दौरान संभोग करें, इस प्रक्रिया को समझने के लिए आप चाहें तो किसी विशेषज्ञ से मिल कर उस से सलाह ले सकते हैं. आप के पिता बनने की संभावना बढ़ जाएगी.    

जातिधर्म का बाजार, दुलहनों का कारोबार

लड़की के जवान होते ही मातापिता को चिंता सताने लगती है कि कम से कम दहेज में ज्यादा से ज्यादा पैसे व प्रतिष्ठा वाला घरवर मिल जाए तो जिम्मेदारी खत्म हो और लड़की सुखचैन से ससुराल में रहे. इस बाबत कितनी भागादौड़ी करनी पड़ती है और कैसेकैसे पापड़ बेलने पड़ते हैं, यह बात वही व्यक्ति बता सकता है जो विवाहयोग्य बेटी का पिता हो. राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश में निवास कर रहे जैन समुदाय में स्थिति उलट है. वहां चिंता जवान होते लड़के के मातापिता करते हैं. फर्क इतना है कि पैसे वाले माने जाने वाले इस समाज में अभिभावकों की चिंता लड़के का नकारा होना या पैसों की कमी नहीं, बल्कि यह है कि गरीब ही सही लड़की अपनी जाति की मिल जाए जिस से वंशानुगत शुद्धता बनी रहे ताकि समाज में इस बाबत सिर नीचा न करना पड़े कि लड़के की शादी दूसरी बिरादरी में करनी पड़ी.

जैन समाज में लड़कियों का टोटा नहीं है. भौगोलिक रूप से देश की आबादी के 70 लाख जैनी देशभर में फैले हुए हैं. लिहाजा, उन्हें वैवाहिक रिश्ते जोड़ने में कई तरह की कठिनाइयां पेश आने लगी हैं जिन के चलते वे वैवाहिक विज्ञापनों के अलावा मैरिज ब्यूरो की सेवाएं लेने से हिचकिचाते नहीं. आमतौर पर धनी माने जाने वाले जैन समाज में गरीबों की भी कमी नहीं है, पर इस जाति का गरीब भी किसी गैर खासतौर से हिंदुओं के मध्यवर्ग के शख्स की आमदनी की हैसियत वाला होता है. कुछ इलाकों में ही सही, जैनियों ने लड़कियों की कमी से निबटने व शादी के मामले में अमीरीगरीबी की खाई पाटना शुरू की तो देखते ही देखते यह जिम्मेदारी कुछ ठगों ने उठानी शुरू कर दी. इन में मैरिज ब्यूरो संचालक बड़े पैमाने पर शामिल हैं. दिलचस्प बात यह है कि अधिकतर ये पकड़े भी गए तो मध्य प्रदेश के मालवानिमाड़ अंचलों को जोड़ते औद्योगिक शहर इंदौर में, जहां इस समुदाय के लोग काफी संख्या में रहते हैं.साल 2014 में शिकायतों की बिना पर 2 मैरिज ब्यूरो वाले ऐसे पकड़े गए थे जिन्होंने फर्जी लेकिन दिलचस्प तरीके से गैर जैनी लड़कियां पैसे वाले जरूरतमंद जैन घरानों को टिका दी थीं और रिश्ता तय कराने में भारीभरकम फीस वसूली थी. 

ऐसे होता है फर्जीवाड़ा

कहनेसुनने में बात नामुमकिन लगती है कि कोई मैरिज ब्यूरो या मध्यस्थ किसी दूसरी जाति की लड़की की शादी जैन या किसी दूसरे समुदाय में करवा दे. वजह, वक्त कितना भी बदल जाए, दोनों पक्ष ठोकबजा कर जानकारी हासिल करने के बाद ही शादी करते हैं. लेकिन जैन समाज के कुछ लोग इस हालत में नहीं है. लिहाजा, आसानी से उन्हें दलालों और मैरिज ब्यूरो संचालकों के झांसे में आ कर ठगा जा रहा है. वे पछताते तब हैं जब यह राज खुलता है कि दुलहन उन की जाति की नहीं है जबकि जाति की दुलहन पाने के लिए वे शादी में लाखों रुपए लड़के वाले होते हुए भी खुशीखुशी खर्च कर चुके होते हैं.

मालवा, निमाड़ इलाकों में यह ठगी और धोखाधड़ी इतनी आम हो चली है कि जब भी किसी मैरिज ब्यूरो पर छापा पड़ता है तो लोगों का लगाया यह अंदाजा अकसर सच निकलता है कि जरूर यह जैनी लोगों का मामला होगा. बीते 10 सालों के दौरान मारे गए 15 छापे इन अंदाजों की पुष्टि करते हैं. जान कर हैरानी होती है कि इस फर्जीवाड़े की शुरुआत अब से कोई 8 साल पहले खरगौन के एक सब्जी विक्रेता कैलाश नाम के शख्स ने की थी या यों कह लें कि उस के पकड़े जाने से फर्जीवाड़ा सामने आया था. ठेले पर इंदौर की गरीब बस्तियों की गलीगली जा कर सब्जी बेचने वाले कैलाश ने मांग और आपूर्ति के अर्थशास्त्र के सिद्धांत को सीधेसीधे समाज से जोड़ कर लाखोंकरोड़ों के वारेन्यारे करते कइयों को सफलतापूर्वक चूना लगाया था.

मालवा और निमाड़ इलाके अपनी गरीबी, पिछड़ेपन और आदिवासी बाहुल्य होने के कारण भी जाने जाते हैं, जहां लड़की का होना ही अपनेआप में मातापिता के लिए तनाव की बात होती है कि जब यह बड़ी हो जाएगी तो दहेज के लिए भारीभरकम रकम कहां से जुटाएंगे. कैलाश ने इन दोनों वर्गों की परेशानियों और जरूरत को नजदीक से समझा और एक खतरनाक ख्ेल खेलना शुरू कर दिया जिस की शुरुआत उस ने प्रयोगात्मक तौर पर की. फेरी लगा कर बैगन ले लो, आलू ले लो की आवाजें लगाने वाले खुराफाती दिमाग के मालिक कैलाश की नजर जब गरीब खूबसूरत लड़कियों पर पड़ती तो एक खयाल उस के दिमाग में यह भी आता कि यह कैसी विसंगति है कि एक तरफ तो मालदार जैनी अपनी जाति की बहू हासिल करने के लिए पैसा लुटाने को तैयार बैठे हैं और दूसरी तरफ ये गरीब खूबसूरत लड़कियां हैं जिन के मातापिता पैसों के अभाव में इन के हाथ पीले नहीं कर पा रहे. इस से उसे न केवल जैनियों बल्कि तमाम लोगों की खूबसूरत बहू पाने की कमजोरी समझ आ गई थी.

पहली ही बार में उस ने अपने एक ट्रक ड्राइवर दोस्त की मदद से एक गरीब लड़की को मालदार घराने की बहू बनवाने में कामयाबी पा ली तो देखते ही देखते वह इस धंधे का माहिर खिलाड़ी बन गया. पहली सफलता के बाद ही उसे समझ आ गया कि अगर लड़की बिरादरी की हो, खूबसूरत हो और थोड़ी सलीके वाली हो तो लोग ज्यादा छानबीन नहीं करते. लिहाजा, उस ने गरीब लड़कियों के मातापिता से संपर्क साध उन्हें पूरे आत्मविश्वास से यह लालच देना शुरू कर दिया कि वह उन की एक कौड़ी खर्च करवाए बगैर बेटी को महलों की रानी बनवा देगा. यह बात ‘अंधा क्या चाहे दो आंखें’ वाली साबित हुई. कैलाश की गारंटी और आत्मविश्वास और पहले कराई गई शादी के उदाहरण के चलते जरूरतमंद गरीब लोग इस बाबत तैयार होने लगे. बड़े पैमाने पर रिश्ता जोड़ते कैलाश ने कितनों को सहीगलत जाति की लड़की दिलाई, इस की गिनती नहीं लेकिन कामयाबी के कुछ मंत्र उसे रट गए थे कि जिस लड़की के मातापिता बगैर ज्यादा झिकझिक किए तैयार हो जाएं उन्हें कुछ बातों का प्रशिक्षण देना जरूरी है जिन में अहम था जैन धर्म के रीतिरिवाजों और कायदेकानूनों से अवगत कराना.

एक सधे खिलाड़ी की तरह मालदार जैनियों से कैलाश यह झूठ बोलने लगा कि मेरी नजर में एक लड़की है जो आप की जाति की है लेकिन गरीब है. जैनियों को गरीबी पर कोई एतराज न होता था. वे खुशीखुशी शादी का खर्च उठाने को तैयार हो जाते थे और लड़की वालों को भी कुछ पैसा बतौर मदद दे देते थे. उन की अघोषित शर्त यह होती थी कि लड़की मायके से ज्यादा संबंध नहीं रखेगी. जाहिर है बहू गरीब घर की है, यह बात उजागर होने पर उन की समाज में खिल्ली उड़ती. कैलाश का खेल जनवरी 2007 में खत्म हुआ जब इंदौर के सुदामा नगर इलाके में पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर एक झुग्गी में छापा मार कर 4 लड़कियों को पकड़ा जिन्हें दुलहन बना कर बेचने की सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं. इन चारोंलड़कियों को कैलाश किराए की क्वालिस कार में पुणे ले जा कर मालदार घरानों में उन की शादी का सौदा पक्का कर चुका था लेकिन ऐन वक्त पर धरा गया.

खत्म नहीं हुई कहानी

एक कैलाश पकड़ा गया लेकिन धंधा मुनाफेदार था, इसलिए देखते ही देखते दर्जनों कैलाश पैदा हो गए जो गरीब खूबसूरत लड़कियों को मालदार घराने की बहू बनाने का कारोबार बाकायदा मैरिज ब्यूरो खोल कर करने लगे. लेकिन कैलाश के पकड़े जाने से लोग, खासतौर से जैनी, सतर्क हो गए थे. यह सावधानी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह पाई. फिर तो हर दूसरे साल 2-3 ऐसे गिरोह पकड़े जाने लगे. यह धंधा अभी भी कोई किसी नाम से कर रहा हो तो बात कतई हैरत की नहीं होगी. वजह, बीते साल सर्दियों में ऐसा ही एक मैरिज ब्यूरो संचालक पकड़ा गया था जिस के निशाने पर जैन समुदाय के लोग ज्यादा रहते थे. ठगी के इस धंधे में वैवाहिक विज्ञापनों को चारे की तरह इस्तेमाल किया जाता था. मालवांचल में ऐसे कितने मैरिज ब्यूरो चल रहे होंगे, यह शायद इस इलाके की पुलिस भी न बता या गिना पाए. दबी जबान में ही सही, इंदौर के एक इंस्पैक्टर ने इस बात को स्वीकारा कि कहा नहीं जा सकता कि कितने मैरिज ब्रोकर सक्रिय हैं.

खोट से खराब हुआ धंधा

हर गलत धंधे में कोई न कोई खोट रह ही जाती है जो उस की पोल खोल देती है. ऐसा ही इस धंधे में भी हुआ. कैलाश की तर्ज पर शादियों का कारोबार कर रही इंदौर की ही शारदा नाम की महिला ने एक गरीब खूबसूरत लड़की को राजस्थान के भीलवाड़ा के संपन्न घराने की बहू बनवा दिया. मगर उस के ससुराल पहुंचते ही शारदा के मन में लालच आ गया. उस ने उसी लड़की की मदद से इस परिवार के 3 लोगों का कत्ल कर के लाखों रुपए लूट लिए. दूसरी तरफ यह बात भी सामने आने लगी थी कि खरीदी गई लड़कियों से खरीदार जबरिया देह व्यापार करवा रहे हैं. लिहाजा, लोग चौकन्ने हो गए. कुछ मामलों में लड़कियों का मन ससुराल में नहीं लगा तो वे वापस घर भाग आईं. शुरुआती दौर में ब्याही गई लड़कियों ने तमाम सावधानियां बरतीं और उन की जिंदगी संवर गई. बगैर कुछ किए महज खूबसूरती की बिना पर और जाति के बारे में झूठ बोल कर वे मालदार घरानों में ऐशोआराम की जिंदगी जी रही हैं. वे अपनी तरफ से की गई इन कोशिशों में कामयाब रहीं कि राज को राज ही रखना है और निर्धन मायके का मोह नहीं करना है.

कैलाश और शारदा जैसे दलाल रईसों की इस कमजोरी को भी समझते हैं कि अगर किसी वजह से लड़की का राज खुल भी गया तो उन का कुछ बिगड़ने वाला नहीं क्योंकि अमीरों को पैसों की तरह अपनी इज्जत भी प्यारी होती है. लिहाजा, वे खुद मन मसोस कर गैर जाति की लड़की को घर से नहीं निकालेंगे और अगर कहीं निकाल भी दें तो वे (रईस) उन का कुछ बिगाड़ने की स्थिति में नहीं होंगे. उधर, बहू बन चुकी गरीब लड़की कानूनी तौर पर भी काफी भारी पड़ेगी, यह एहसास भी उन्हें था. भले ही कैलाश और दूसरे मैरिज ब्यूरो अमीरगरीब की खाई पाट रहे हों पर इस बाबत जो चार सौ बीसी वे कर रहे थे और अब उन जैसे मैरिज ब्रोकर व ब्यूरो भी कर रहे हैं, वह है तो अपराध ही, जिस से सहमत होने की कोई वजह नहीं. हां, इस से इतना जरूर समझ आता है कि अगर जाति की ही लड़की चाहने वाले अमीर, सुशील, गरीब लड़कियों को बहू बनाएं तो बात हर्ज की नहीं. इस से वे धोखा खाने के अलावा एक अपराध को बढ़ावा देने के आरोप से भी बच जाएंगे.      

सूक्तियां

नम्रता

नम्रता से अच्छी कोई नीति नहीं. जहां होशियार से होशियार जबान असफल हो जाती है, वहां अच्छा व्यवहार बहुत काम कर जाता है.

विवेक

सारी स्थितियों में विवेक ही प्रमुख रहना चाहिए, जिद्दी होना एक बात है, अपने मत के विषय में दृढ़ रहना बिलकुल दूसरी बात.

विश्वास

जो आदमी यह दिखाए कि उस में कोई भी कमी नहीं है, वह या तो बेवकूफ है या पाखंडी और हमें उस का विश्वास नहीं करना चाहिए.

शक्ति

जीवन में दुर्बलताओं का स्थान नहीं, मन की शक्ति जीवन की सारी शक्तियों का स्रोत है.

शांति

जो चिंतित रहता है उसे शांति कहां? और जब शांति ही नहीं, तब सुख कहां से होगा?

बुद्धि

व्यक्ति की अपनी बुद्धि उसे मीनार में बैठे हुए पहरेदारों से कहीं ज्यादा सही रास्ता बता सकती है.

वाणी

वाणी ही मनुष्य का ऐसा आभूषण है जो अन्य आभूषणों की तरह कभी घिसता नहीं

सूक्तियां

नम्रता

नम्रता से अच्छी कोई नीति नहीं. जहां होशियार से होशियार जबान असफल हो जाती है, वहां अच्छा व्यवहार बहुत काम कर जाता है.

विवेक

सारी स्थितियों में विवेक ही प्रमुख रहना चाहिए, जिद्दी होना एक बात है, अपने मत के विषय में दृढ़ रहना बिलकुल दूसरी बात.

विश्वास

जो आदमी यह दिखाए कि उस में कोई भी कमी नहीं है, वह या तो बेवकूफ है या पाखंडी और हमें उस का विश्वास नहीं करना चाहिए.

शक्ति

जीवन में दुर्बलताओं का स्थान नहीं, मन की शक्ति जीवन की सारी शक्तियों का स्रोत है.

शांति

जो चिंतित रहता है उसे शांति कहां? और जब शांति ही नहीं, तब सुख कहां से होगा?

बुद्धि

व्यक्ति की अपनी बुद्धि उसे मीनार में बैठे हुए पहरेदारों से कहीं ज्यादा सही रास्ता बता सकती है.

वाणी

वाणी ही मनुष्य का ऐसा आभूषण है जो अन्य आभूषणों की तरह कभी घिसता नहीं

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