मेरी बहन के पति की छोटी सी बीमारी के चलते मृत्यु हो गई. बहन की आयु अधिक नहीं थी. पति के अचानक चले जाने पर वे बहुत सहम सी गईं. वे दिनरात रोती रहतीं और अपने खानेपीने व पहननेओढ़ने पर ध्यान न देतीं. उन्होंने अपनेआप को जैसे दुनिया से अलग ही कर लिया, सदा सफेद कपड़े पहनतीं, हारशृंगार का तो प्रश्न ही नहीं उठता था. एक दिन टीवी पर खबर आ रही थी कि एक विधवा महिला को इसलिए पैंशन नहीं मिली क्योंकि फौर्म पर लगी फोटो में उस के माथे पर बिंदी लगी हुई है. इस बात की चर्चा घर में भी होने लगी कि यह क्या दलील है. बिंदी लगाना कोई जुर्म तो नहीं. फोटो पुरानी भी हो सकती है अथवा और भी कोई कारण हो सकता है. ये सब बातें बहन की 13 साल की पोती सुन रही थी, झट से बोली, ‘‘यह तो कोई बात नहीं है. आज बिंदी पर ऐतराज है, सफेद कपड़े पहनने को कहा जाता है. इस तरह तो सतीप्रथा को दोबारा वापस ले आया जाएगा. हमारा समाज फिर से पुरानी प्रथाओं से घिर जाएगा.’’ बहन ने पोती की बातें सुनीं तो उन के मन में उथलपुथल होने लगी.

उसी दिन से उन्होंने अपनेआप को थोड़ा बदला. सफेद कपड़ों के बदले पहले की तरह सादगी से सभी कपड़े पहनने शुरू कर दिए. खुद ही कहने भी लगीं, ‘दुख तो अंदर सदैव ही रहेगा लेकिन इन पुराने रिवाजों को छोड़ना ही पड़ेगा.’ सच है यदि जीवन ठीक रखना है तो सामाजिक बेडि़यों को काटना ही होगा.

कमलेश नागरथ, ग्रेटर कैलाश-2 (न.दि.)

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