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महिलाएं भी करें मर्दों वाले काम

सुमित्राजी अपनी भांजी अर्पिता को इस हाल में देख कर दंग रह गईं. अर्पिता अपनी कार के नीचे से निकल कर आई थी. हाथ में कुछ टूल्स थे. हाथ काले हो रहे थे और जींस व टौप पर जगहजगह काले धब्बे पड़ गए थे. सुबह भी उन्होंने घर में अर्पिता को एक ढीला स्विच निकाल कर नया लगाते देखा था, लेकिन कुछ बोल नहीं पाई थीं. वे कल रात को ही अपनी छोटी बहन विमला के घर आई थीं. विमला की शादी के बाद पहली बार ही कोलकाता आना हुआ था. विमला की 2 लड़कियां थीं, सुचिता और अर्पिता. सुचिता तो अभी 8वीं कक्षा में पढ़ रही थी, अर्पिता बी कौम फर्स्ट ईयर में थी और सीए भी कर रही थी. अर्पिता का रहनसहन बड़ा दबंग था. बोलचाल या हावभाव में स्त्रियों जैसा संकोच या लज्जाशीलता वगैरा न हो कर लड़कों जैसी बोल्डनैस और कौन्फिडैंस था. ये सब तो ठीक लेकिन अर्पिता द्वारा घर के बिजली के स्विच ठीक करना, गाड़ी की रिपेयरिंग करना वगैरह उन्हें बड़ा अजीब और आश्चर्यजनक लगा. उन के घर में बेटा न रहे तो फ्यूज का तार बदलने के लिए भी इलैक्ट्रीशियन आता है.

उन से रहा न गया. पूछ बैठीं, ‘‘अरे, अर्पिता बेटी, तुम गाड़ी ठीक कर रही हो?’’ अर्पिता बोली, ‘‘हां, मौसी. छोटीमोटी गड़बड़ हो तो मैं ही ठीक कर लेती हूं. हर इतवार को गाड़ी की धुलाई भी कर लेती हूं.’’ मौसी ने उस की पीठ पर धौल जमाते हुए कहा, ‘‘अरे बावली, ये सब तो मर्दों के काम हैं. तू भी बड़ी जबरी है भई.’’ सुमित्राजी जैसी सोच लगभग हर महिला की होती है. दरअसल, हमारे समाज में मर्दों वाले काम और जनानियों (महिलाओं) वाले कामों का विभाजन कर दिया गया है. कई ऐसे काम हैं जिन्हें मर्दों के वश की बात माना जाता है और आमतौर पर महिलाओं से उन कामों की उम्मीद नहीं की जाती, जैसे गाड़ी की रिपेयरिंग, इलैक्ट्रीशियन या प्लंबर का काम, टैक्सी या ट्रक चलाना या और भी बहुत कुछ. लेकिन अब जमाना बदल रहा है. महिलाएं बहुत सारे ऐसे काम करने लगी हैं जो कुछ समय पहले तक सिर्फ मर्दों के वश के माने जाते थे.

इस संबंध में ‘द सैकंड सैक्स’ किताब के लेखक सिमोन द बोउआर ने बहुत महत्त्वपूर्ण बात लिखी है, ‘‘कोई भी स्त्री के रूप में पैदा नहीं होती बल्कि बाद में महिला बन जाती है.’’ पूर्वाग्रह से ग्रस्त समाज ने स्त्रियों और पुरुषों के लिए कुछ खास काम गढ़ दिए हैं जिन्हें उस के उलट होते देख समाज को अटपटा या आपत्तिजनक लगता है. ब्रेन साइंस और सोशल साइकोलौजी में हुए ताजा शोध बताते हैं कि बायोलौजी और माहौल का जटिल संबंध किसी व्यक्ति का रहनसहन और व्यवहार तय करता है. महिलाओं को शैशवकाल से ही नाजुक, लज्जाशील, अंतर्मुखी रहने और पुरुषों से एक खास दूरी बनाए रखने की शिक्षा दी जाती है. लेकिन जिन शिक्षित, आधुनिक और उन्नत विचारों वाले परिवारों में बेटियों को शुरू से निडर, बेबाक, स्पष्टवादी और हरफनमौला बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है उन की बेटियां न सिर्फ पुरुषों के साथ ताल से ताल मिला कर चलने में सक्षम होती हैं बल्कि हर उस काम को भी सीखने व करने की ललक रखती हैं, जिन्हें कथित रूप से मर्दों का काम कहा जाता है.

अगर आप अपनी बेटी को दब्बू, डरपोक, कमजोर, शर्मीली और छुईमुई नहीं बनाना चाहतीं, तो उसे शुरू से ही उसी रूप में ढालें और आप खुद भी ऐसा करें. लड़कियां कई ऐसे कथित पुरुषोचित गुण सीख सकती हैं जो उन की जिंदगी को आसान बना सकते हैं.

सैल्फ डिफैंस टे्रनिंग

अपनी बेटी को बचपन से ही स्पोर्ट्स में सक्रिय होने के लिए प्रोत्साहित करें. वह जो भी खेलना चाहे, खेलने दें. क्रिकेट या फुटबौल जैसे खेल लड़कों के हैं, कह कर उसे रोकें या टोकें नहीं. स्कूल में व्यवस्था हो तो ठीक वरना किसी स्थानीय प्रशिक्षक के यहां उसे जूडोकराटे जैसी सैल्फ डिफैंस टे्रनिंग अवश्य दिलवाएं. वह लड़कों के साथ खेलकूद की गतिविधियों में हिस्सा लेती है तो लेने दें. इस से उस में आत्मविश्वास आएगा और वह लड़कों के हावभाव से भी कुछ हद तक वाकिफ हो जाएगी.

सीमा न बांधें

बेटी जरा बड़ी हो जाए तो उसे घर की भाजीतरकारी लाने तक सीमित न करें बल्कि राशन का सामान, वगैरा भी लाना सिखाएं. किसी पारिवारिक सदस्य के बीमार होने पर बेटी के साथ उसे डाक्टर के पास भेजें. घर में बल्ब बदलना हो, साइकिल में हवा भरवानी हो, स्कूटर की स्टैपनी बदलनी हो, फ्यूज में तार लगाना हो या दीवार में कील ठोंकनी हो, ये सब काम बेटी से भी करवाएं. शुरूशुरू में उसे ये काम सिखाने पड़ेंगे फिर उस का आत्मविश्वास खुद ही जाग जाएगा. संभव हो तो बेटी को छोटेमोटे ट्रेनिंग कोर्स करवा दें जहां उसे कंप्यूटर ठीक करना, बाइक या कार रिपेयरिंग, बिजली के छोटेमोटे काम आदि सीखने को मिल सकें.

प्रतिक्रिया करना सिखाएं

शोध के मुताबिक किशोर या जवान होती लड़कियों में डिप्रैशन लड़कों की तुलना में ज्यादा होता है. इस की वजह सिर्फ हार्मोन नहीं, बल्कि लड़कियों को शुरू से ही नकारात्मक माहौल में पालना है यानी ये मत कर, वह मत कर, उसे दीदे फाड़ कर मत देख, यों मत हंस, ऐसे मत झुक, ऐसे मटकमटक कर मत चल आदि. इतने सारे ‘न’ सुनतेसुनते लड़की के कान पकने लगते हैं और वह सहमीसहमी सी रहने लगती है. ऐसे में कठोर स्वभाव के पिता या भाई उस के साथ जब मारपीट या गालीगलौज करते हैं तो वह और भी दब जाती है. आप अपनी बेटी को नैगेटिव वातावरण न दें और बातबात में रोकाटोकी से बचें. उसे दृढ़तापूर्वक हर अत्याचार का विरोध करना सिखाएं. किसी गंदी टिप्पणी पर कठोर और दबंग प्रतिक्रिया करना सिखाएं. अध्ययन और अनुभव बताते हैं कि मुंहफट और दबंग छवि वाली लड़कियों से लड़के डरते हैं और उन के साथ छेड़छाड़ या बकवास की हिम्मत नहीं करते. दब्बू लड़कियों के बजाय इन लड़कियों की जिंदगी आसान होती है.

आत्मविश्वास करें बुलंद

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अधिकांश महिलाओं में आत्मविश्वास काफी कम होता है और वे स्वभावतन खुद को पुरुषों से कमजोर और कमतर आंकती हैं. इस की मूल वजह है उन के मातापिता, भाइयों, बौस या पतियों द्वारा उन्हें लगातार ‘बुद्धू’, ‘ट्यूबलाइट’, ‘बैलगाड़ी’ आदि पदवियों से नवाजना. धीरेधीरे इन महिलाओं का आत्मविश्वास इतना कम हो जाता है कि मामूली सा रिजैक्शन या आलोचना भी इन्हें भीतर तक परेशान कर देती है और ये खुद को कमगुणी या पुरुषों की तुलना में नासमझ महसूस करने लगती हैं. अपनी बेटी को शुरू से ही आत्मविश्वासी बनाएं, उस के अच्छे कार्यों की प्रशंसा करें और उस की क्षमताओं का बखान करें. इस से उसे खुद को निरंतर बेहतर करने की प्रेरणा मिलेगी और उस का आत्मविश्वास बुलंद होता चला जाएगा.

शारीरिक सौंदर्य से परे

महिलाओं को दिनरात खूबसूरत, स्लिम और दमकतीचमकती दिखने के लिए इतनी बार उकसाया या प्रोत्साहित किया जाता है कि वे सचमुच इसी उलझन में फंस कर रह जाती हैं. उन्हें हर वक्त खुद को आकर्षक दिखने की चिंता सताती रहती है. चाहे परिजन होें या संगीसाथी, विज्ञापन जगत हो या मीडिया, सभी जगह महिलाओं की शारीरिक खूबसूरती का इतना बढ़ाचढ़ा कर बखान किया जाता है कि वे अपने वजन, रंग और शरीर की बनावट को ले कर अधिक सजग हो जाती हैं और खुद की प्रतिभा को निखारने के प्रति कुछ हद तक लापरवाह हो जाती हैं. पुरुष अपनी बौडी इमेज के प्रति सतर्क तो रहते हैं लेकिन अति सक्रिय नहीं. महिलाओं को पुरुषों का यह गुण अपना लेना चाहिए.

छोटीछोटी बात पर चिंता न करें

महिलाएं छोटी से छोटी बात पर बेहद चिंता कर लेती हैं जबकि पुरुष बड़ी से बड़ी बात को हवा में उड़ाने या उस के प्रति लापरवाह रहने की ताकत रखते हैं. विशेषरूप से जो बातें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित न करने वाली हों, उन के प्रति भी महिलाएं बेहद चिंतित हो जाती हैं. जिंदगी को आसान बनाना हो तो जरा बेपरवाह होना सीखें, ‘जो होगा देखा जाएगा’ वाला रवैया अपनाएं. वक्त आने पर ज्यादातर समस्याएं खुद ही सुलझ जाती हैं. इस से आप खुद को हलकी महसूस करेंगी.

महिलाओं के खास गुण

मर्दों वाले काम सीख कर अपना जीवन आसान बनाने में महिलाओं को मदद मिलेगी, इस में कोई संदेह नहीं. महिलाओं के कुछ खास गुण ऐसे भी हैं जिन पर हर महिला को गर्व होना चाहिए. मनोवैज्ञानिकों की मानें तो महिलाओं में दूरदर्शिता खूब होती है. उन में दूसरों के प्रति सहानुभूति और दूसरे के दर्द को महसूस करने की क्षमता भी अधिक होती है. महिलाएं जटिल परिस्थितियों में भी खुद को व्यवस्थित रखने में सक्षम होती हैं और एकसाथ कई भूमिकाओं का सफलतापूर्वक निर्वाह कर सकती हैं. अपने इन गुणों को बनाए रखें.

पेरिस का १३/११ धर्म का कर्म मरो और मारो

13 नवंबर, 2015. दिन शुक्रवार. समय 9 बज कर 49 मिनट. ‘‘रोज की तरह बताक्लां कंसर्ट हौल के कौफी बार में मैं शाम 5 बजे से अपने पाले का काम कर रहा था. मेरे साथ शेफ क्रिस्तफो, कौफी बार के संचालक बेख्तन, सर्विसमैन माकू और इवन भी अपनेअपने रोजमर्रा के काम में लगे हुए थे. कंसर्ट हौल में बैंड शो चल रहा था. अचानक भीतर से लगातार गोलियों की गड़गड़ाने की आवाज से पूरे बदन में सिहरन सी दौड़ गई. कुछ भी समझने से पहले भगदड़ मच गई. पता चला आतंकी हमला हुआ है. ‘कौफी बार के संचालक बेख्तन ने हमें स्टोररूम में जा कर छिप जाने का निर्देश दिया. हम ने ऐसा ही किया और स्टोररूम का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. बावजूद इस के दर्द से कराहतेचिल्लाते लोगों की आवाजों से हमारे रोंगटे खड़े हो रहे थे. किसी भी क्षण आतंकी यहां भी पहुंच सकते थे. बाहर चीखपुकार के बीच हम सब भी डर के मारे स्टोररूम में एकदूसरे से लिपट कर रो रहे थे, बिलख रहे थे. इस बीच बेख्तन ने पुलिस को खबर दी, तब जा कर हमें वहां से सुरक्षित निकाला गया.’’ उस दिन के आतंक के लमहों का विवरण देने वाला है तारिक अहमद.

तारिक बताक्लां कंसर्ट हौल के कौफी बार में 7 सालों से काम कर रहा है. रोजगार की तलाश में वह 2003 में बंगलादेश से पेरिस गया. पेरिस में बिताए 12 सालों में तारिक के लिए यह सब से भयावह दिन था. तारिक ने अपने सहयोगियों को इस हमले में मरते हुए देखा है. तारिक बताता है कि नातली को मरते देखना मेरे लिए बहुत तकलीफदेह रहा. आंखों के  सामने उस का बदन छलनी हो गया. वह थिएटर में काम करती थी. गोलियों की आवाज शुरू होने के बाद वास्तविक स्थिति से अनजान मैं ने थिएटर में जरा झांक कर देखा. तभी मैं ने नातली और कौफी बार के सर्विसमैन लूई को आतंकियों की अंधाधुंध गोलियों के आगे पड़ते देखा. नातली तो वहीं ढेर हो गई और लूई अस्पताल में अभी भी जिंदगी व मौत से पंजा लड़ा रहा है. फ्रैंच पत्रिका ला पौइंट का कहना है कि बताक्लां कंसर्ट हौल में बड़ी संख्या में अकसर यहूदी लोग आया करते हैं, संभवतया इसीलिए इसे टारगेट किया गया.

शार्ली एब्दो के कार्यालय में हमले के बाद पेरिस में अतिरिक्त सुरक्षा के इंतजाम के तहत रेलवे स्टेशन से ले कर शिक्षा प्रतिष्ठानों तक चौकसी बढ़ा दी गई थी. बावजूद इस के, 13 नवंबर को बड़े हमले को अंजाम देने में इसलामी स्टेट संगठन के आतंकवादी कामयाब रहे. अब चौकसी और बढ़ा दी गई है. यूरोप में शेनगेन इलाके में बसे 26 देशों में पासपोर्टवीजा के बिना घूमनेफिरने की आजादी पर भी इस का असर पड़ेगा. इस संबंध में यूरोपियन इकोनौमिक यूनियन के अधिकारियों ने आशंका भी जता दी है. इसी के मद्देनजर शेनगेन इलाके से जुड़े हरेक देश की सीमा में आनेजाने वालों से ले कर मालवाहनों पर कड़ी नजर रखी जा रही है. कुल मिला कर हमले में बेल्जियम और सीरिया के नागरिकों के शामिल होने के खुलासे के बाद बेल्जियम और जरमनी की सीमा पर चौकसी काफी बढ़ा दी गई है. कहा जा रहा है कि कुछ हमलावर शरणार्थी के रूप में पेरिस आए थे.

रूस-अमेरिका के बीच सहमति

हाल के दिनों में सीरिया में रूस के कूद पड़ने के कारण शीतयुद्ध की दूसरी पारी को ले कर सुगबुगाहट से दुनिया आशंकित थी. पेरिस की घटना ने रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच की दूरियां खत्म कर दी हैं. इस बर्बरता का उपयुक्त जवाब देने के लिए एकसाथ खड़े हो कर आईएस के नियंत्रण वाले तमाम इलाकों को मुक्त कराने पर सहमति बन चुकी है. हमले के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की बैठक हुई और दोनों देशों के बीच साथ मिल कर आईएस से निबटने के लिए सहमति बनी.

इस से पहले असद को बचाने से ज्यादा आईएस का खात्मा पुतिन का मकसद था. गौरतलब है कि हाल ही में मिस्र से उड़ान भरने वाले रूसी विमान को आईएस ने मार गिराने का दावा किया है, जिस में 224 लोग मारे गए थे. हालांकि रूस ने सीरिया पर कार्यवाही से पहले अमेरिका समेत यूरोपीय देशों को साथ आने का आह्वान किया था लेकिन तब अमेरिका अलग से अपना राग अलाप रहा था. यही कारण है कि सहमति के बावजूद पुतिन ने यह कहते हुए इन देशों को आड़े हाथ लिया कि जी 20 के कुछ देशों समेत दुनिया के और भी 40 देश आईएस की मदद कर रहे हैं.

एकजुट हुआ नाटो

फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने आईएस के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया है. नतीजतन, नाटो समझौते की धारा 5 के तहत नाटो के तमाम सदस्य देश कमर कस कर मैदान में उतरने को तैयार हो रहे हैं. दरअसल, नाटो समझौते की धारा 5 कहती है कि यूरोप और उत्तर अमेरिका के किसी एक देश पर हमला सब पर हमला माना जाएगा. फ्रांसीसी राष्ट्रपति ओलांद और अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के बीच बात हो चुकी है. जरमनी सहित नाटो के अन्य देश भी आईएस की निर्ममता का जवाब देने को साथ आने के लिए सहमति दे चुके हैं. आने वाले दिनों में इराक और सीरिया में आईएस को हराने के लिए नाटो सेना जोरदार हमला करेगी. लेकिन इराक और अफगानिस्तान में लंबे समय तक अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के लगातार हस्तक्षेप को देखते हुए यह सवाल उठना लाजिमी है कि नाटो की यह कार्यवाही रणनीतिक रूप से कहीं महंगी तो नहीं पड़ेगी. ऐसे ही हस्तक्षेप के कारण दुनिया के कट्टरपंथी इसलामी संगठनों में जबरदस्त नाराजगी है. इसी के नतीजे के तहत दुनिया के विभिन्न देशों के युवा आईएस का रुख कर रहे हैं. इसीलिए यह भी देखना होगा कि नाटो के हमले से आईएस की सदस्य संख्या में कहीं बढ़ोत्तरी तो नहीं होगी. नतीजा कुछ भी हो, इतना तय है कि नाटो के हमले से सीरिया में जानमाल का नुकसान होगा. और अधिक पलायन होगा. शरणार्थियों की संख्या बढ़ेगी. अब देरसबेर यूरोप इन शरणार्थियों को अपने यहां शरण देने से पीछे हटेगा, क्योंकि हमले के बाद इस दिशा में यूरोप के देश लामबंद हो रहे हैं.

समस्या की जड़ की पड़ताल

पेरिस हमले के लिए आधुनिक मलयेशिया के जनक पूर्व प्रधानमंत्री महाथिर बिन मोहम्मद ने इसराईल को जिम्मेदार ठहराया है. महाथिर मोहम्मद का मानना है कि 1948 में एक राष्ट्र के रूप में इसराईल की स्थापना से पहले दुनिया में कहीं इस तरह की आतंकी वारदात का नामोनिशान नहीं था. अपने बयान में उन्होंने यह भी कहा कि जब तक फिलिस्तीनी समस्या का समाधान नहीं होगा तब तक इस तरह के हमले की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है.

वैसे इसलामी आतंकवाद के लिए केवल फिलिस्तीन समस्या को ही जिम्मेदार कतई नहीं ठहराया जा सकता. अमेरिका ने इराक में जो कुछ किया उस के नतीजे में भी मौजूदा इसलामी आतंकवाद को देखा जाना चाहिए. सद्दाम हुसैन इराक में तानाशाही भले ही चला रहा था, लेकिन अपने रहते इराक में सद्दाम हुसैन ने अलकायदा को घुसने तक नहीं दिया. लेकिन उस के बाद अलकायदा ने न केवल इराक में पैर जमाए बल्कि उस से भी कहीं अधिक खूंखार गुट आईएस को पूरे दमखम के साथ पनपने का मौका मिला. इस समय खाड़ी के देशों में अराजक स्थिति बनी हुई है. इस के लिए एक बड़ी हद तक अमेरिका, सऊदी अरब और इसराईल जिम्मेदार हैं. जहां सीरिया में रूसी कार्यवाही का सवाल है तो सीरिया में असद सरकार से बातचीत व समझौते के बाद रूस वहां कूदा है.  

जहां तक अमेरिका का सवाल है तो साबित हो चुका है कि वही भस्मासुर पैदा कर के बारबार अपनी गलती दोहरा रहा है. पहले अफगानिस्तान में रूसी कार्यवाही को प्रभावित करने के लिए अमेरिका ने वहां के कबीलाई दलों को इसलाम बचाने की गाजर दिखा कर रूस के खिलाफ तैयार किया. सीरिया के विद्रोहियों को भी अमेरिका हथियार सप्लाई कर के अपनी गलतियों को दोहरा रहा है. आज पूरी दुनिया जानती है कि अफगानिस्तान का यही कबीलाई ग्रुप आगे चल कर तालिबान बना. इसी तालिबान से ओसामा बिन लादेन खड़ा हुआ. तालिबान का विकसित रूप आईएस है, जो पूरी दुनिया में अपना शरीया लागू करना चाहता है.

पेरिस पर हमले का नतीजा

तय है कि पेरिस पर हमले के नतीजे बहुमुखी, दूरगामी और दीर्घमियादी होंगे. हमले के प्रभाव को सीरिया में शांति स्थापना की कोशिश में पश्चिमी देशों के सैन्य हस्तक्षेप, यूरोप में शरणार्थी समस्या, ‘बौर्डरलैस’ यूरोपीय देशों की सुरक्षा के मद्देनजर देखना होगा. यह हमला ऐसे समय में हुआ जब हजारोंलाखों की तादाद में मुसलिम शरणार्थी यूरोप में शरण लेने को आ रहे हैं. पड़ोसी देश जौर्डन, तुर्की और लेबनान के अलावा समुद्र पार कर लगभग 2 लाख लोग अब तक यूरोपीय देशों में शरण ले चुके हैं. इन में केवल सीरियाई नहीं हैं बल्कि इराकी और अफगानिस्तानी भी शामिल हैं. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप इस समय भयंकर शरणार्थी समस्या से जूझ रहा है और यूरोपीय देशों की विभिन्न सरकार सीरिया के शरणार्थियों को अपने यहां समायोजित करने की दिशा में काम कर रही थीं पर शरणार्थियों के खिलाफ यहां जनमत भी तैयार हो रहा था. ऐसे में पेरिस पर हमले के बाद शरणार्थियों के लिए संकट तो गहराएगा ही, साथ में यूरोपीय देशों की सरकार के लिए भी अपनी जनता को नाराज कर के इस समस्या का समाधान ढूंढ़ पाना कठिन हो जाएगा. इस बीच पोलैंड शरणार्थियों को आश्रय देने में पीछे हट चुका है. वहीं शरणार्थियों के लिए अपने द्वार खोल देने के लिए जरमनी की चांसलर एंजेला मर्केल की समालोचना की जा रही है. बावरिया के मिनिस्टर प्रैसिडैंट हौर्स्ट सीहोफर ने जरमनी की ‘ओपन बौर्डर’ नीति की समालोचना की है. और तो और, स्वीडन भी शरणार्थियों के खिलाफ होने लगा है.

उधर, सीरिया में गृहयुद्ध की समाप्ति, इसलामी जिहादियों के दमन और बशर अल असद को सत्ता से बेदखल करने के लिए अमेरिका समेत यूरोपीय देशों की सक्रियता बढ़ जाएगी. फ्रांस इसलामी आतंकवाद से निबटने के लिए तमाम पश्चिमी देशों के नेताओं को मतभेद भूला कर एकसाथ आने के लिए दबाव बनाएगा. बहरहाल, अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक प्रभाव के अलावा आर्थिक प्रभाव भी पड़ना लाजिम है. सब से पहले तो यूरोपीय पर्यटन उद्योग पर बड़ा झटका लगेगा. आने वाले दिनों में क्रिसमस और नए साल के फैस्टिवल में खलल पड़ना लाजिम है. माना जा रहा है कि फैस्टिवल के दौरान इन देशों के सीमांत इलाकों में चौकसी के कारण सामान की आवाजाही में दिक्कत पेश आनी ही है. आईएस से मुकाबले में इन देशों का बजट भी प्रभावित होगा.

हथियारों का कारोबार

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का एक आर्थिक पहलू भी है और इसे तेल की राजनीति से जोड़ कर देखा जाता है. मध्यपूर्व के देशों में तेल का अकूत भंडार है जिस पर अमेरिका समेत कई देशों की नजर है. वैसे, अमेरिका का स्वार्थ उस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए रखना भी है. यही कारण है कि इन देशों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप का कोई मौका अमेरिका गंवाना नहीं चाहता है.  इस का दूसरा आर्थिक पहलू हथियारों का कारोबार है. दुनिया में बहुत सारे देश हैं जो हथियारों के कारोबार में लगे हुए हैं. अमेरिका को लें. एक तरफ वह दुनिया में शांति का पैरोकार बनता फिरता है वहीं हथियारों के धंधे में भी लगा हुआ है. वहीं, पेरिस में आतंकियों द्वारा इस्तेमाल की गई गाडि़यों से जो हथियार बरामद हुए हैं उन में मेड इन रशिया लिखा हुआ पाया गया है. स्टौकहोम इंटरनैशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट की सालाना रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में इस कारोबार में पहले पायदान पर अमेरिका और दूसरे पर रूस है, तीसरे नंबर पर चीन व उस के नीचे फ्रांस और जरमनी हैं.

दुनियाभर में जिहादी आतंकवाद के मद्देनजर निशाने पर मुसलिम आबादी है. 13 नवंबर को आतंकवादी हमले के बाद पेरिस की जनता प्रभावित लोगों की मदद के लिए बड़े पैमाने पर आगे आई है. इन सब में पेरिस के मुसलिम भी शामिल हैं. पर इन्हें शक की नजर से देखे जाने के कारण ये खुद भी एक अलग तरह के आतंक में जी रहे हैं. गौरतलब है कि फ्रांस की 8 प्रतिशत आबादी मुसलिम है. इस पूरी कौम को लोग अपना आतंकी समझने लगेंगे. कहते हैं कि फ्रांस में पहले से ही वर्णभेद है, हमले के बाद तो ऐसी सोच को और अधिक बल मिलेगा. तसवीर का दूसरा पहलू यह भी है कि आतंकवाद की जड़ें धर्म की अंधशिक्षा से जुड़ी हैं. जिहाद के नाम पर ही आतंकवादी बरगलाए जाते हैं जो खुद को बम से उड़ा कर यह समझते हैं कि उन्होंने अपने मजहब का भला किया है. अगर धार्मिक कट्टरता का पाठ दुनिया में न पढ़ाया जाता तो शायद आतंकवाद का नामोनिशान ही नहीं होता.

भाजपा में विद्रोह

बिहार में शर्मनाक हार से भारतीय जनता पार्टी को इतना नुकसान नहीं हो रहा जितना उस को अंदरूनी विद्रोह से हो रहा है. लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा, शांता कुमार और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नामी नेताओं ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह की धौंसबाजी के खिलाफ खुल कर लिखित बयान जारी कर के या टीवी पर बोल कर जता दिया है कि भारतीय जनता पार्टी कोई दूध की धुली, दूसरी पार्टियों से अलग नहीं है. नरेंद्र मोदी ने बिहार के चुनावों में अपनी पार्टी के दूसरे नेताओं की अवहेलना कर यह जताने की कोशिश की कि वे दूसरे स्टालिन या माओत्से-तुंग हैं और उन्हीं की बदौलत यह देश चल सकता है, दलदल से उबर सकता है. वास्तव में यह भारतीय जनता पार्टी के लिए घातक था. नरेंद्र मोदी बड़ेबड़े वादों पर चढ़ कर चुनाव जीत पाए थे पर उन वादों में से कुछ ही पूरे हुए थे और ऐसे में सब को साथ ले चलना ही बुद्धिमानी थी ताकि जीत का सेहरा तो उन के सिर पर बंधता पर हार सब की सामूहिक होती.

यह मोदी का अतिविश्वास था कि बिहार में जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और कांगे्रस का गठबंधन होने के बाद भी वे ही जीतेंगे. अगर पूरी भाजपा अपना दम वैसे ही लगाती जैसा उस ने 2014 के लोकसभा चुनावों में लगाया था तो या तो हार होती ही नहीं, होती भी तो सब उस हार के जिम्मेदार होते. अब नरेंद्र मोदी को बारबार कदमकदम पर सफाई देनी होगी, जोकि उन के व्यक्तित्व के खिलाफ है. वे जल्दी ही विद्रोह पर उतारू हो सकते हैं और इन नाराज नेताओं को पार्टी से निकालने की जिद पकड़ सकते हैं. भारतीय जनता पार्टी के नेताओं में आज इतनी हिम्मत नहीं कि वे नरेंद्र मोदी की बात ठुकरा सकें और अगर यह हुआ तो बात सुधरेगी नहीं, बिगड़ेगी.

नरेंद्र मोदी ने वैसे भी सुशासन लाने के लिए डेढ़ सालों में खास कदम नहीं उठाए. विदेशी पूंजी आने का रास्ता खोलना, काम करना नहीं है क्योंकि यह तो सरकारी कागज पर 4 पेज का नोटिस निकालना मात्र होता है. देश में सड़कों का जाल बिछवाना, हर बेघर को घर दिलवाना, करोड़ों की गिनती में नौकरियां उपलब्ध कराने के लिए हजारों छोटेबड़े कारखाने शुरू करवाने, नहरें बनवाने, जंगलों को ठीक करवाने, शहरगांवों को साफ करवाने, न्याय दिलवाने वाले कौन से काम उन्होंने करवा लिए हैं कि भाजपा के घिसेपिटे वृद्ध नेता मुंह सी कर बैठे रहें. क्या नरेंद्र मोदी बदलेंगे? शायद समय उन्हें बदलवा दे जैसे नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और राहुल गांधी चुपचाप महागठबंधन के लिए मान गए और न सीटों पर, न मंत्री पदों के लिए सिरफुटौवल की. कम से कम अब तक तो बदले हुए हैं. आशा करिए कि नरेंद्र मोदी बदलेंगे, भगवाई तालिबानियों पर रोक लगाएंगे और सब को साथ ले कर चलेंगे. 

बिहार चुनावी नतीजे के माने

फरवरी 2015 में दिल्ली में करारी हार के बाद लगा था कि दिल्ली की जनता से कहीं अनजाने में गलती हुई है कि उस ने सदियों बाद फिर विशुद्ध हिंदू सरकार को एक छोटे से राज्य में उसे इस बुरी तरह हराया कि भारी भीड़ वाली पार्टी पालकी वाली पार्टी बन कर रह गईं. उस के बाद कई और बार कलई खुली कि मई 2014 में हुए आम चुनावों में जो भारीभरकम प्रचार, देशीविदेशी पैसे, ऊंची जातियों वालों की एकजुट आक्रमणता, कांगे्रस के दिमागी दिवालिएपन से भाजपा को जीत मिली थी वह जनता से अनजाने में हुई गलती के कारण थी. बाद के चुनावों में कहीं नाममात्र का बहुमत पाने या कहीं विरोधी पक्ष न होने पर जो विजय भाजपा को मिल रही थीं वे पेशवाई जीतें थीं, शत्रुओं में फूट डाल कर पाई गई थीं.

8 नवंबर, 2015 को बिहार ने पुन: फिर इतिहास लिख दिया और जयप्रकाश नारायण के नारे ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ को फिर जीवित कर डाला. जो हार का कूड़ा नीतीश, लालू और राहुल ने नरेद्र मोदी के दरवाजे पर डाला है वह अप्रत्याशित और राहतकारी दोनों है. पेशवाई राज में जो हाल मराठा राजाओं का ऊंची जाति के देशस्थ ब्राह्मणों ने किया था जबकि सिंहासन पर हक शिवाजी के वारिसों का ही था, वही हाल भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी को आगे कर के देश की स्वतंत्रता, एकता, कानूनों के साथ करना चाह रही थी जिसे पहले अरविंद केजरीवाल ने, फिर ममता बनर्जी ने और उस के बाद अब पूरी तरह नीतीश-लालू-राहुल की तिकड़ी ने कर दिया है. नरेंद्र मोदी ने 2014 के आम चुनावों में जो वादे किए थे वे ऐसे ही थे जैसे सोने की वर्षा के लिए यज्ञ करने या मोटा दान करने के बाद मिलने वाले करते हैं. कोरे थोथे और बेवकूफ बनाने वाले वादों पर दुनियाभर में धर्मगुरु कम से कम 5 हजार साल से राज कर रहे हैं.

1947 के बाद 40-50 साल कांगे्रस ने भी उन्हीं नारों पर राज किया था. भाजपाई नारों में भगवाई अंगोछा और तिलकजनेऊ था तो कांगे्रसी नारों में खादी और गांधी टोपी थी. जनता कांगे्रसी नारों से त्रस्त थी और पहले 1977 में फिर 1988 में उस ने कांगे्रस को सबक सिखाया भी. मई 2014 में वह कांगे्रसी नाली से निकल कर भाजपाई दलदली समुद्र में गिर गई. बिहार की जनता ने नीतीश-लालू-राहुल की संकरी गली में जाना पसंद किया बजाय भाजपाई समुद्र में, जिस में कुछ तो साफसुथरे बजरों में होंगे, बाकी जनता दलदल में खड़े हो कर उसे खेवे. 178 के मुकाबले सिर्फ 58 सीटें पाने के बाद भाजपा चाहे जो सफाई दे, उस की असलियत छिप नहीं सकती. भारतीय जनता पार्टी केवल सुशासन व स्वच्छता की वकालत नहीं कर रही, वह तो संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों की सामाजिक व्यवस्था समाज पर जबरन थोपना चाहती है. उसे शासन से ज्यादा उन रीतिरिवाजों की चिंता है जो देश की 2000 साल की गुलामी की वजह रह  हैं और जिन का लाभ उठा कर ग्रीक, शक, हूण, फारसी, मुगल, अफगान, चीनी, पुर्तगाली, फ्रैंच, ब्रिटिश और अब अमेरिका भारत पर कब्जा जमाते रहे हैं. नरेंद्र मोदी ने देश से अधिक विदेश की चिंता की. महाभारत के युद्ध में भी कौरव व पांडव अपनी सेनाओं की शक्तियों पर नहीं लड़े, उन्होंने दूरदूर के राजाओं को फुसलाया ताकि भाई, भाई को मार सके. कृष्ण इसी महाभारत के युद्ध के नायक थे और यह वही काल था जिस में एकलव्य, घटोत्कच, शिखंडी, व्यास, कर्ण का जाति या जन्म के कारण अपमान किया गया था.

आज भारतीय जनता पार्टी के लिए लोकतंत्र, संविधान, वैयक्तिक स्वतंत्रताओं, न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रैस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण गीतापाठ, योग, संस्कृत, मंदिरों में पूजन, गो पूजा हैं जिन के लिए उस के समर्थकों के डंडे तैयार हैं और जिन की रक्षा पर आपत्ति करने वालों के लिए जेलें सुरक्षित हैं. नीतीश-लालू-राहुल की तिकड़ी ने और अरविंद केजरीवाल व ममता बनर्जी ने पहले ही संदेश दे दिया था कि धर्म से ऊपर लोकतंत्र है और जनता मुट्ठीभर लोगों के हितों की रक्षा करने के लिए जिहादी बनने को तैयार नहीं है. बिहार का चुनाव भाजपा की अंतिम हार नहीं है. भाजपा जानती है कि दूसरे पक्ष में कैसे फूट डाली जाए. वह रामविलास पासवान और जीतनराम मांझियों को चारा फेंकने में माहिर है. हारने के बाद पहले ही दिन भाजपा के नेता प्रतिद्वंद्वी नीतीश और लालू में बिखराव की बातें कहते रहे ताकि बारबार बछड़े को गधे का बच्चा कह कर बछड़ा छीना जा सके. गनीमत है कि लोकतंत्र और स्वतंत्र प्रैस थोड़ाबहुत ही बिक सकता है, पूरी तरह नहीं.

नीतीश-लालू-राहुल ने जनता के सामने थाली रख दी है, खाना बनाने की विधि बता दी है. अब यह जनता को देखना है कि वह मंदिर के प्रसाद की ओर भागती है या मेहनत के साथ खाना बनाने में जुटती है.

जीरो टिलेज विधि गेहूं के लिए वरदान

अकसर गेहूं की खेती करने वाले किसान इस के कम उत्पादन और ज्यादा लागत की वजह से परेशान रहते हैं. हर साल धान की फसल की कटाई में देरी होने और उस के बाद खेतों को सूखने में काफी समय लगने की वजह से गेहूं की बोआई समय पर नहीं हो पाती है,  जिस का खमियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है. मिसाल के तौर पर बिहार में 16 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की खेती की जाती है. इस के बाद भी गेहूं की बेहतरीन और भरपूर फसल का उत्पादन नहीं हो पाता है. गेहूं की खेती में जीरो टिलेज तकनीक को अपना कर किसान विपरीत हालात में भी बेहतरीन और ज्यादा उत्पादन कर सकते हैं. कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि उत्तर बिहार के निचले इलाकों में गेहूं की ज्यादातर खेती की जाती है. उन इलाकों में धान की कटाई काफी देर से होने की वजह से गेहूं की बोआई में देरी हो जाती है. इसी तरह से सूबे के दक्षिणी इलाके में मिट्टी सूखने में समय लगने से गेहूं की बोआई में 20 से 40 दिनों की देरी हो जाती है.

पिछले कई सालों से राज्य में 10 जनवरी से पहले गेहूं की बोआई नहीं हो पाई है, जबकि नवंबर व दिसंबर में गेहूं की बोआई का समय होता?है. गेहूं की बोआई में देरी होने से उस की पैदावार के साथ क्वालिटी पर भी बुरा असर पड़ता?है. कृषि वैज्ञानिक वीएन सिंह बताते हैं कि जीरो टिलेज तकनीक को किसान आसानी से अपना सकते हैं. इस से उत्पादन लगात में भी कमी आती?है. इस तकनीक के जरीए खेतों की जुताई के बगैर ही गेहूं की सही समय पर बोआई की जा सकती है. धान की फसल की कटाई के तुरंत बाद उसी खेत को बिना जोते हुए जीरो सीड ड्रिल से गेहूं को बोया जाता है. इसी को जीरो टिलेज तकनीक कहा जाता है. इस की खास बात यह?है कि इस में बीज और उर्वरक का एकसाथ इस्तेमाल किया जा सकता?है.

खेती के जानकारों का मानना है कि आमतौर पर गेहूं को बोने से पहले खेत को तैयार करने के लिए 5 से 6 बार जुताई करने की जरूरत होती है. इस से भी गेहूं की बोआई में देरी हो जाती?है, जिस वजह से फसल की उपज कम होती?है और क्वालिटी भी ठीक नहीं होती है. अगर 10 दिसंबर के बाद गेहूं की बोआई की जाती है तो अच्छी लागत के बाद भी प्रति हेक्टेयर 30-35 किलोग्राम कम गेहूं की पैदावार होती है. जीरो टिलेज तकनीक अपना कर किसान इस नुकसान से बच सकते?हैं. यह तकनीक हर तरह की मिट्टी के लिए फायदेमंद है और इस से बारबार खेतों की जुताई पर प्रति हेक्टेयर डेढ़ से ढाई हजार रुपए की बचत भी हो जाती है.

जीरो टिलेज तकनीक के जरीए गेहूं की खेती करने वाले पटना से सटे बिहटा के किसान मधेश्वर कहते?हैं कि इस तकनीक की खूबी यही?है कि धान की कटाई के बाद खेतों में काफी नमी रहने के बाद भी गेहूं की बोआई कर के फसल की अवधि में 20 से 25 दिन ज्यादा पा सकते हैं, जिस से उपज का बढ़ना लाजिम है. इस तकनीक के जरीए गेहूं को बोने पर उस के बीज 3 से 5 सेंटीमीटर नीचे जाते?हैं और बीज के ऊपर मिट्टी की हलकी परत पड़ जाती है. इस से बीज का जमाव अच्छा होता है और कल्ले अच्छे फूटते?हैं. इस में बीजों का अंकुरण गेहूं की परंपरागत खेती से 2-3 दिन पहले ही हो जाता है. खास बात यह?है कि बीजों का अंकुरण होने पर उन का रंग पीला नहीं पड़ता है. गेहूं की साधारण खेती के मुकाबले कम लागत व समय लगने और बेहतरीन व ज्यादा पैदावार होने की वजह से गेहूं की जीरो टिलेज तकनीक किसानों को रास आने लगी है. अब तो इस की मशीन किराए पर भी मिलने लगी है. लगातार मशीन चलाने पर 1 दिन में 8 एकड़ खेत में बोआई की जा सकती है. इस मशीन का किराया 200 से 300 रुपए तक प्रति एकड़ है.

सूखे की मार टोटकों से रहे सावधान

सदियों से भारत का दस्तूर रहा है कि यहां दिक्कतों के निबटारे के लिए वजहों को दूर नहीं किया गया, बल्कि टोटकों व ढकोसलों को तरजीह दी गई. मौजूदा समय में देश बुरी तरह से सूखे की चपेट में है. वैसे यह कोई नई बात नहीं है. पहले के जमाने में भी सूखा पड़ता था, मगर अब कुछ ज्यादा ही पड़ने लगा है. मौसम विज्ञानी इस बार के सूखे को अलनीनो तूफान का नतीजा मान रहे हैं. अलनीनो के असर से साल 2002, साल 2004, साल 2009 और साल 2014 भी सूखे की गिरफ्त में थे और यह साल भी सूखे की भेंट चढ़ चुका है.

मौसम के माहिर इस से बचने के लिए केवल सिंचाई के इंतजाम को दुरुस्त रखने की नसीहत देते हैं. दूसरी तरफ देश के तमाम किसान अपने धर्म के मुताबिक केवल पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे टोटकों में यकीन रखते हैं. वैसे इन टोटकों से पानी बरसने के बजाय सिर्फ पानी बरबाद होता है. देश के अलगअलग हिस्सों में अजीबोगरीब टोटके अपनाए जा रहे हैं. मध्य प्रदेश के तमाम किसानों का वर्ग जहां शिवलिंग पर जल छोड़ता है, तो वहीं उत्तर प्रदेश में टोटकों की झड़ी लगी हुई है. बिहार के कुछ हिस्सों में भी तरहतरह के टोटके बारिश होने के लिए आजमाए जाते हैं. कुछ खास टोटके जो बीते दिनों मीडिया की सुर्खियों में थे, इस प्रकार हैं :

कालकलौटी : उत्तर प्रदेश में सूखे से निबटने का यह सब से मशहूर खेल है, जिसे सूबे की कुछ जगहों पर कालकलौजी के नाम से भी जानते हैं. इस खेल में किसान बच्चों के ज्यादातर कपड़े उतार कर उन से कीचड़ वाली होली खेलने को कहते हैं. छतों के ऊपर से महिलाएं बच्चों को पानी से सराबोर करती हैं. बच्चे खूब हुड़दंग करते हैं और जम कर पानी बरबाद करते हैं. इस दौरान ‘कालकलौजी, कालकलौटी उज्जर धोती, मेघा सारे पानी दे, नहीं तो आपन नानी दे’ सरीखे कई फूहड़ गीत गाए जाते हैं. लोगों का मानना है कि ऐसा करने से बारिश के देवता खुश हो कर पानी बरसाते हैं.

पिछले दिनों इस खेल को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की कुंडा तहसील के सहावपुर गांव में खेला गया. इसे वहां की जलबिरादरी के मुख्य कार्यकर्ता व ग्राम प्रधान राजेश प्रभाकर सिंह की देखरेख में किया गया था. जलबिरादरी पानी के संरक्षण जैसे मुद्दों पर काम करने वाली संस्था है, जो जलपुरुष का दर्जा पाए व रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह की अगवाई में पूरे देश में काम करती है. इसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस के पिपरी पोखरा गांव में 40 से ज्यादा बच्चों ने जम कर डीजे की धुन पर कीचड़ और पानी बहा कर कालकलौटी खेला. उत्तर प्रदेश के जिले सिद्धार्थनगर के गदाखौव्वा गांव में भी यह खेल खूब हुआ. इस तरह से कालकलौटी खेल कर पानी और मिट्टी बरबाद करने की फेहरिस्त बहुत लंबी है. यह बात अलग है कि इस खेल से पानी की एक बूंद भी नहीं बरस सकी.

सहावपुर की 47 साला सरिता त्रिपाठी ने बताया कि इस खेल को खेलने में कम से कम 2 बड़े ड्रम (तकरीबन 400 लीटर) पानी बरबाद हो जाता है. उस के बाद नहानेधोने में भी काफी पानी खर्च होता है. इसी तरह कीचड़ के रूप में मिट्टी की बरबादी की बात करें, तो इस खेल में कई किलोग्राम मिट्टी बह जाती है, जबकि मिट्टी की सतह की 1 इंच परत बनाने में कुदरत को 300 से 1000 साल लग जाते हैं. शासकप्रशासक पर पानी उड़ेल देने का खेल : इस खेल में महिलाएं राजा (शासकप्रशासक) पर लोटे व बाल्टी से जी भर कर पानी उड़ेलती हैं. मान्यता के हिसाब से राजा के भीगने पर पानी के भगवान खुश होते हैं और बारिश होती है. पिछले दिनों इसी मान्यता के मुताबिक उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में कपिलवस्तु कोतवाली में 2 दर्जन महिलाओं का हुजूम उमड़ पड़ा. यह देख कर कोतवाली का सारा स्टाफ भाग खड़ा हुआ, मगर कोतवाली प्रभारी रणविजय सिंह रुक गए. बस फिर क्या था उन्हें महिलाओं द्वारा जम कर नहलाया गया. लीटरों पानी बरबाद हो गया. रणविजय सिंह का कहना है कि उन्होंने महिलाओं के जज्बातों की इज्जत की है.

हंडि़यों में कीचड़ भरने का खेल : यह खेल बिहार के कुछ हिस्सों में बहुत मशहूर है. मुजफ्फरपुर जिले के लौतन और पिलखी गांवों के रहने वाले किसानों हनुमान प्रसाद व रघुवीर महतो ने बताया कि उन के इलाके में कुछ जगहों पर एक हंडि़या में कीचड़ और पानी भर कर रात में गानाबजाना करते हुए किसी के दरवाजे के सामने फेंक देते हैं. लोगों की मान्यता है कि ऐसा करने से पानी बरसता है.

मकबरे और कब्रगाह की दुआएं: उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के परियावां गांव के ऐफाज खान व आल मियां का दावा है कि 41 मुसलमान किसी मकबरे या कब्रगाह में जा कर दुआ करें, तो आदमी भीगते हुए ही आएगा. ऐसा करने से पानी बरसना तय है.

बहुत गहरी हैं टोटकों की जड़ें : उत्तर प्रदेश समेत अन्य सूबों में बरसाती टोटकों की जड़ें बहुत ही गहरी हैं. उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, बस्ती व बहराइच समेत तराई के कई जिले बहुत जल्दी बाढ़ग्रस्त हो जाते हैं. इन जिलों में बाढ़ आना आम बात है. ऐसे में वहां के किसानों का तो इन टोटकों से दूरदूर तक कोई मतलब ही नहीं होना चाहिए. पर इस बार इन जिलों में भी खूब टोटके आजमाए गए. कोतवाल प्रभारी को जम कर नहलाए जाने वाली घटना तो सिद्धार्थनगर की ही है. जल जैसी कुदरती दौलत को खूब बहाया गया, लेकिन बारिश का पानी फिर भी खेतों को तर नहीं कर पाया.

बेशर्म मीडिया : पिछले दिनों जब पानी जैसी कीमती कुदरती दौलत तमाम तरह के बरसाती टोटकों में बरबाद हो रही थी, तो देश की मुख्य धारा के मीडिया ने इसे बढ़चढ़ कर प्रकाशित और प्रसारित किया. कालकलौटी का खेल जब बनारस और प्रतापगढ़ में चला, तो देश के 2 नामी अंगरेजी अखबारों ने इसे पहले पेज की खबर बना दिया. देश के नामी हिंदी अखबार भी कहां पीछे रहने वाले थे. उन में भी इन बेसिरपैर की हास्यास्पद खबरों को भरपूर जगह मिली. दिक्कत यही है  कि मीडिया लोगों को जागरूक करने के बजाय टोटकों को फैलाने का काम करती है.

कैसे होगा बचाव : इस बारे में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, लखनऊ के वैज्ञानिक जेपी गुप्ता ने कहा कि सूखा अलनीनो के असर से है. बचाव के लिए किसानों को नहरों, तालाबों व पोखरों की मदद से सिंचाई करनी चाहिए. ऐसी फसलें जिन को पानी बहुत जरूरी है और सिंचाई की कोई सुविधा नहीं है, उन की नलकूपों से सिंचाई की जानी चाहिए. बरसाती टोटकों के बारे में जेपी गुप्ता का कहना है कि इन से कुछ भला नहीं होगा.

एक रिपोर्ट के मुताबिक गांवों के बारिश के पानी को यदि मात्र 14-15 फीसदी तक पोखरों व तालाबों में जमा कर दिया जाए, तो गांवों की सिंचाई से ले कर पीने के पानी तक की दिक्कत दूर हो जाएगी. मगर देश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश के पानी को जमा नहीं किया जाता?है.नई प्रधानमंत्री सिंचाई योजना में नदी जोड़ो परियोजना शामिल है. सोलर लाइट से चलने वाले नलकूपों को लगा कर पानी लेने के साथसाथ हम बिजली की भी बचत कर सकते हैं. सूक्ष्म सिंचाई प्रक्रिया के तहत ड्रिप व स्प्रिंकलर सिंचाई के जरीए भी  सूखे से मुकाबला किया जा सकता है. इन के लिए सूबों की सरकारें तमाम योजनाओं के जरीए अनुदान भी मुहैया कराती हैं. इस से तेजी से गिर रहे भूमि जल स्तर पर?भी काबू किया जा सकता है.

दुनिया के आकर्षण का केंद्र है गारो पहाड़ का काजू

महंगे मेवों में काजू की खास जगह है. मेघालय पूर्वोत्तर का इकलौता सूबा?है, जहां काजू का भरपूर उत्पादन होता?है. यही वजह है कि मेघालय को काजूबादाम का तालाब भी कहा जाता है. मेघालय सूबे का गारो पहाड़ इलाका इस का मुख्य केंद्र है. यहां पैदा किए गए काजू की मांग देश में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में है. मेघालय के गारो पहाड़ के रांगरा, महेद्रगंज, बाछमारा, महिरा खोला, शिववारी, गेल खोला, भालू वेतासींग, जिकजाक, गारोवाछा और डूबा वगैरह स्थानों में बड़ी मात्रा में काजू का उत्पादन किया जाता है.

काजू के बीज को रोपने के बाद जो पौधा निकलता है, वह बड़ा हो कर आम के पेड़ जैसा हो जाता है. बीज लगाने के 4 या 5 साल बाद मईजून महीनों में फूल लगने शुरू हो जाते हैं और नवंबरदिसंबर महीनों में काजू पेड़ से तोड़ने लायक हो जाते हैं.

1 पेड़ से तकरीबन 2 सौ से 3 सौ किलोग्राम तक काजू निकाले जाते हैं. गौरतलब है कि मौसम के हिसाब से काजू का रंग भी बदलता रहता?है. बरसात के मौसम में भीग जाने से काजू का रंग काला हो जाता है और खिली धूप में इस का रंग सफेद रहता है. मेघालय के गारो पहाड़ इलाके के लोग पेड़ से काजू तोड़ कर 2 या 3 दिनों तक धूप में सुखाने के बाद बोरी में भर कर साप्ताहिक बाजार में ले कर जाते?हैं और व्यापारियों के हाथों कम कीमत में बेच दिया करते हैं. कम कीमत पर काजू खरीदने वाले व्यापारी इसे?ऊंची कीमतों पर मिलमालिकों के हाथों बेच देते हैं. इस प्रकार विश्व बाजार में गारो पहाड़ के काजू की मांग रहते हुए भी गारो पहाड़ के काजू उत्पादकों को खास लाभ नहीं मिलता?है.

कच्चे काजू को खाने लायक बनाने के लिए खास तरीके से तैयार किया जाता है. मिल में काजू को पहले छिलके के साथ भूना जाता है और फिर छिलके को अलग किया जाता है और छिलका रहित भूना जाता?है. इस प्रकार से कच्चे काजू को खाने के लिए तैयार किया जाता है. तैयार किए गए काजू को पैकेटों में भर कर बिक्री के लिए देशविदेश के तमाम बाजारों में भेजा जाता है. क्वालिटी को आधार बना कर काजू को 8 किस्मों में बांटा गया है. किस्मों के हिसाब से काजू के मूल्य भी अलगअलग होते?हैं. गारो पहाड़ के काजू को गुवाहाटी, शिलांग, तिनसुकिया, जोरहाट के अलावा अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और मणिपुर वगैरह सूबों में भेजा जाता है. गारो पहाड़ के काजू को तैयार करने के लिए कई मिलें भी हैं.

कर्मचारी वर्ग बेहाल

देखने वाली बात यह है कि काजू मिलमालिक जहां काजू से मुनाफा कमा रहे हैं, वहीं मिल के कर्मचारियों की हालत दयनीय है. कर्मचारियों की समस्या का अंत नहीं है. मिलमालिकों द्वारा उन का शोषण किया जाता है. काजूमिल के कर्मचारियों की सब से बड़ी दिक्कत यह?है कि कच्चे काजू का प्रसंस्करण करते समय कच्चे काजू से एक प्रकार का एसिड निकलता है, जिस से कर्मचारियों की सेहत पर खराब असर पड़ता है और वे कई बीमारियों के शिकार हो जाते हैं.

नकली उर्वरकों से सावधान

भारत जैसे कृषिप्रधान देश में किसान की कमाई का पूरा जिम्मा खेती पर टिका होता है. फसलों की लागत तेजी से बढ़ रही है और उपज प्रभावित हो रही है. उर्वरक खेती की अहम जरूरत होते हैं. कृषि में उपज बढ़ाने व पेड़पौधों की बढ़वार के लिए आमतौर पर इन का इस्तेमाल किया जाता है. ये जरूरी तत्त्वों की फौरन पूर्ति करते हैं. इन की मांग में कोई कमी नहीं आती. सभी फसलों के लिए ये जरूरी होते हैं. बाजार में मिलावटी व नकली उर्वरकों का भी बड़ा कारोबार है. नकली उर्वरकों की कीमत लगभग असली के बराबर ही होती है. इस धोखे व मुनाफे के गोरखधंधे में नक्कालों से ले कर एजेंट व दुकानदार तक शामिल होते हैं.

बेचारे किसान असलीनकली उर्वरकों के जाल में उलझ कर दोहरी मार झेलने को मजबूर होते हैं. नकली व मिलावटी उर्वरकों से फसल बरबाद हो जाती है और किसानों को बरबाद फसलों का कोई मुआवजा भी नहीं मिलता, लिहाजा वे सिर पीट कर रह जाते हैं. नकली उर्वरक बिल्कुल असली जैसे ही नजर आते हैं. जरूरी है कि इन से सावधान रह कर फसलों को बरबादी से बचाया जाए. वैसे वैज्ञानिक जैविक उर्वरकों को रासायनिक उर्वरकों से बेहतर मानते हैं. खास रासायनिक उर्वरकों में यूरिया, डाई अमोनियम फास्फेट (डीएपी), सुपर फास्फेट, जिंक सल्फेट व पोटाश खाद शामिल हैं. इन का इस्तेमाल चूंकि ज्यादातर फसलों में किया जाता है, इसलिए इन की मांग और खपत भी ज्यादा है. मिलावटखोरों ने इन्हें भी नहीं बख्शा. पोटाश में नमक व डीएपी में कंकड़पत्थर तक की मिलावट की जाती है.

नकली उर्वरकों को बेचने के लिए किसानों को सस्ते का लालच दिया जाता है. कभीकभी लुभाने के लिए कोई छोटेमोटे गिफ्ट रख दिए जाते हैं. दुकानदारों को इस में चूंकि काफी मुनाफा मिलता है, इसलिए वे चाहते हैं कि असली के बजाय नकली ही ज्यादा बिके. किसान दोहरी मार झेलते हैं. वैज्ञानिक दीपक शर्मा कहते हैं कि नकली खादें न केवल स्वास्थ्य बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी ठीक नहीं है. इन का असर बेहद खराब होता है. ये जहर समान हैं और मिट्टी की सरंचना तक को बदल देती हैं. मिट्टी का न्यूट्रल 6 से 7 पीएच रहना चाहिए. नकली खाद के इस्तेमाल से न्यूट्रल प्रभावित होता है. सभी तरह के खतरों से बचने के लिए जैविक खादों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहिए.           

ऐसे करें असली की पहचान

किसान जागरूक हो कर असलीनकली की पहचान आसान तरीकों से कर सकते हैं. आर्थिक चोट व फसलों की बरबादी से बचने के लिए यह जरूरी भी है कि सावधानी बरती जाए.

यूरिया : यूरिया के सफेद, चमकदार व कड़े दाने लगभग एक ही आकार के होते हैं. ये दाने पानी में डालने पर घुल जाते हैं और हाथ से छूने पर ठंडे महसूस होते हैं. दानों को यदि तवे पर डाला जाए तो वे पिघल जाते हैं. अधिक ताप बढ़ने पर ये पूरी तरह भाप बन कर उड़ जाते हैं. यदि ऐसा होता है, तो समझ लेना चाहिए कि यूरिया एकदम असली है.

डीएपी : इस के कठोर दाने भूरे, काले व बादामी रंग के होते हैं. इन्हें नाखून से तोड़ा नहीं जा सकता. पहचान के लिए कुछ दाने हथेली पर ले कर तंबाकू की तरह चूना मिला कर रगड़ने पर तीखी गंध आती है. इस गंध को सूंघना कठिन हो जाए, तो समझना चाहिए कि डीएपी असली है. इस की पहचान का एक और सरल तरीका है. इस तरीके में डीएपी के कुछ दाने तवे पर रख कर गरम कीजिए. गरम होने पर ये दाने फूल जाएं, तो असली हैं.

पोटाश : इस में सफेद नमक व लाल मिर्च जैसा मिश्रण होता है. पहचान के लिए इस के कुछ दानों पर पानी की बूंदें डालनी चाहिए. यदि पानी डालने पर ये आपस में नहीं चिपकते, तो समझ लीजिए कि असली पोटाश है. असली पोटाश पानी में घुलने पर इस का लाल रंग पानी के ऊपर तैरने लगता है. ऐसे लक्षण नहीं दिखते, तो पोटाश नकली होता है.

जिंक सल्फेट : इस में असलीनकली की पहचान करना थोड़ा मुश्किल होता है. पहचान के लिए डीएपी का घोल तैयार कर के उस में जिंक सल्फेट का घोल मिलाना चाहिए. असली जिंक सल्फेट होने पर थक्केदार घना अवशेष बन जाता है. जिंक सल्फेट के घोल में पतला कास्टिक का घोल मिलाएं तो सफेदमटमैला मांड़ जैसा अवशेष बनता है. यदि इस में कास्टिक का गाढ़ा घोल मिला दें, तो अवशेष पूरी तरह घुल जाता है.

सुपर फास्फेट : इस के भूरे, काले व बादामी रंग के दाने सख्त होते हैं. इस के दानों को तवे पर रख कर गरम करें, यदि ये नहीं फूलते हैं, तो समझ लीजिए असली हैं. गरम करने पर डीएपी के दाने फूल जाते हैं, जबकि सुपर फास्फेट के नहीं फूलते.

खेतों और किसानों का दोस्त सबमर्सीबल पंप

सबमर्सीबल पंप घरेलू, औद्योगिक, व्यावसायिक और कृषि के कामों के लिए काफी उपयोगी है. साधारण सिंचाई पंप या जेट पंप की तुलना में यह काफी ज्यादा पानी फेंकता है और इस की सब से खास बात यह है कि यह जरा भी आवाज नहीं करता?है. इस के रखरखाव पर काफी कम खर्च आता है और आम पंपों की तरह इस में एयर लेने और पानी छोड़ देने की समस्या को नहीं झेलना पड़ता है. इस पंप को बोरिंग पाइप में ही अंदर डाल दिया जाता है.

‘विशाल पंप एंड हार्डवेयर’ के डायरेक्टर अजय कुमार बताते?हैं कि सिंचाई के पंपों और जेट पंपों की तुलना में सबमर्सीबल पंप की तकनीक और कूवत काफी ज्यादा होती?है. इस के साथ ही बाकी पंपों के मुकाबले सबमर्सीबल पंप में बिजली की खपत भी कम होती है. जेट पंप जहां अधिकतम 25-30 फुट गहराई से पानी उठाता है, वहीं सबमर्सीबल पंप उस से कई गुना ज्यादा गहराई से पानी उठाने की कूवत रखता है. जेट पंप की तुलना में सबमर्सीबल पंप से निकलने वाले पानी का दबाव 30 फीसदी ज्यादा होता?है, जिस से पानी ज्यादा ऊपर या दूर तक पहुंच सकता?है. खेती के कामों के लिए सबमर्सीबल पंप किसानों को कम समय में ज्यादा पानी देता है. ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई के लिए यह पंप काफी मुफीद है.

ड्रिप सिंचाई की एक उन्नत तकनीक है, जिस में पानी और उर्वरकों को साथसाथ पौधों की जड़ों के पास तरल के रूप में पहुंचाया जाता है. सबमर्सीबल पंप इस सिंचाई तकनीक के लिए काफी कारगर है. सिंचाई की इस तकनीक के जरीए पानी का करीब 95 फीसदी तक इस्तेमाल हो जाता?है, जिस से पानी की बरबादी न के बराबर होती?है. ड्रिप सिंचाई से पौधों की जड़ों में पानी, उर्वरक और हवा सही मात्रा में पहुंचते हैं. इस तकनीक में ड्रिपर के जरीए बूंदबूंद पानी को सीधे पौधों की जड़ों में डाला जाता है. सबमर्सीबल पंप स्प्रिंकलर सिंचाई के लिए काफी मुफीद?है. रेतीले इलाकों और बलुई मिट्टी में सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर तकनीक फायदेमंद है. इस के जरीए बारिश के पानी की तरह खेतों में पानी का छिड़काव किया जाता?है, जिस से पानी की बरबादी बहुत ही कम होती है. गेहूं, चना, कपास, सोयाबीन, चाय, कौफी, चारा फसलों और सब्जियों की सिंचाई इस तकनीक के जरीए बेहतरीन तरीके से की जा सकती?है.

खेतों की सिंचाई के अलावा सबमर्सीबल पंप का इस्तेमाल बड़े मकानों, अपार्टमेंटों, होटलों, अस्पतालों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, मौलों व कारखानों वगैरह में भी किया जा रहा है. सबमर्सीबल पंप का इस्तेमाल तेल के कुंओं से तेल निकालने के लिए भी किया जाता है. बाजार में सबमर्सीबल पंप की कीमत 30 हजार रुपए से ले कर 80 हजार रुपए तक है. 3 हार्स पावर और 100 एमएम व्यास वाले पंप की कीमत 30 से 45 हजार रुपए तक होती है. वहीं 7.5 हौर्स पावर और 100 एमएम व्यास वाले पंप की कीमत 70 से 80 हजार रुपए होती है. अलगअलग कंपनियों के सबमर्सीबल पंपों की खासीयतों के हिसाब से कीमत कम और ज्यादा भी हो सकती है. क्राम्पटन, जीई, सीआरआई, फाल्कन, जास्को व श्री शिवशक्ति वगैरह कंपनियों के सिंगल फेज और थ्री फेज के सबमर्सीबल पंप बाजार में मिलते हैं

खेतीकिसानी के तहत होने वाले दिसंबर महीने के अहम काम

साल के आखिरी लमहों की याद दिलाने वाले दिसंबर महीने में जहां एक ओर साल खत्म होने की कसक छिपी होती है, तो दूसरी ओर नएनवेले साल के आगमन का जोश भी छिपा होता है. फिर आनाजाना तो कुदरत का नियम है, लिहाजा कर्मयोगियों को अपने काम से ही मतलब होता है. जज्बातों से जुड़े बेहद ठंडे महीने दिसंबर में भी खेतीकिसानी की दुनिया का खजाना छिपा है. जागरूक किस्म के किसानों के लिए दिसंबर की अहमियत भी बहुत ज्यादा है. दिसंबर की कड़ाके की हाड़ कंपा देने वाली सर्दी से जिम्मेदार किस्म के किसानों पर कोई फर्क नहीं पड़ता. वे तो अपना गमछा व कंबल ओढ़े लगातार खेतों की खैरखबर लेते रहते हैं, उन्हें सींचते हैं और सफाई वगैरह का खयाल रखते हैं.

आइए डालते हैं एक पैनी नजर दिसंबर में होने वाली खेतीकिसानी संबंधी तमाम गतिविधियों पर :

* पिछले यानी नवंबर महीने की खास मुहिम थी गेहूं की बोआई, तो अब नंबर आता है गेहूं के खेतों की देखभाल का. अगर गेहूं की बोआई को 3 हफ्ते हो चुके हों तो फौरन खेतों की पहली सिंचाई का काम निबटा दें.

* सिंचाई के अलावा इस दौरान उग आए खरपतवारों को भी निराईगुड़ाई कर के निकाल दें. गेहूंसा नाम के खरपतवार के खात्मे के लिए आइसोप्रोट्यूरान दवा का इस्तेमाल करें. अगर चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों का असर नजर आए तो 2-4 डी सोडियम साल्ट का इस्तेमाल करें. इन कैमिकल दवाओं का इस्तेमाल बोआई के 4 हफ्ते बाद करना ही ठीक रहता है, इस से पहले खुरपी की मदद से ही खरपतवार निकालें.

* आमतौर पर ज्यादातर किसान नवंबर में ही गेहूं की बोआई का काम खत्म कर देते हैं, मगर किसी वजह से गेहूं की बोआई बाकी रह गई हो, तो उसे पक्के तौर पर दिसंबर के दूसरे हफ्ते तक यानी 15 दिसंबर के आसपास तक जरूर कर दें.

* दिसंबर में गेहूं की पछेती किस्मों की बोआई ही की जाती है. इस बोआई के लिए प्रति हेक्टेयर 125 किलोग्राम बीज का इस्तेमाल करें. बोआई के दौरान कूंड़ों के बीच 15 सेंटीमीटर की दूरी रखनी चाहिए.

* दिसंबर महीने का अहम काम गन्ने की फसल की कटाई का होता है. इस दौरान गन्ने की तमाम किस्में कटाई के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती हैं. किसान भाई जरूरत व सुविधा के मुताबिक गन्ने की कटाई का काम निबटा सकते हैं.

* शरदकालीन गन्ने के खेतों में अगर नमी कम महसूस हो, तो जरूरत के मुताबिक सिंचाई करना न भूलें.

* गन्ने के साथ अगर तोरिया या राई वगैरह फसलें भी लगी हों, तो जरूरत के मुताबिक उन की निराईगुड़ाई करें. इस से गन्ने की फसल को भी फायदा होगा.

* दिसंबर के दौरान मटर की फसल में फूल आने का वक्त होता है, इसलिए फूल आने से पहले मटर के खेतों की सिंचाई ध्यान से कर दें. ऐसा करने से फूल व फलियां बेहतर तरीके से आती हैं.

* मटर की फसल को इस मौसम में तनाछेदक व फलीछेदक कीटों का खतरा रहता है, लिहाजा उन के प्रति जागरूक रहना जरूरी है.

* मटर की फसल में तनाछेदक कीट की रोकथाम के लिए डाइमिथोएट 30 ईसी दवा की 1 लीटर मात्रा करीब 700 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. फलीछेदक कीट की रोकथाम के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी दवा की 1 लीटर मात्रा या मोनोक्रोटोफास 36 ईसी दवा की 750 मिलीलीटर मात्रा करीब 700 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

* मटर की फसल को रतुआ बीमारी से बचाने के लिए मैंकोजेब दवा की 2 किलोग्राम मात्रा करीब 700 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

* आमतौर पर जौ की बोआई नवंबर महीने में निबटा दी जाती है, फिर भी अगर अब तक यह काम न हुआ हो तो दिसंबर के शुरू में ही निबटा लें. जौ बोने के लिए 100 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

* पिछले महीने बोई गई जौ की बोआई को अगर 1 महीना हो चुका हो, तो खेतों की सिंचाई करें और निराईगुड़ाई कर के खरपतवार निकाल दें.

* सरसों के खेत में अगर पौधे ज्यादा घने लगे हों तो बीचबीच से फालतू पौधे उखाड़ कर अपने मवेशियों को चारे के तौर पर खिला दें. सरसों के फालतू पौधों के साथसाथ खेत से तमाम खरपतवार भी निकाल दें.

* दिसंबर में वसंतकालीन गन्ने की बोआई की तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए. जिस खेत में गन्ना बोना हो उस की कई बार अच्छी तरह जुताई करें. जुताई के बाद खेत में कंपोस्ट खाद, सड़ी हुई गोबर की खाद व केंचुआ खाद मिलाएं. खेत में दीमक के घर नजर आएं तो उन्हें चुनचुन कर नष्ट करें. ज्यादा दीमक हो तो असरदार दवा का इस्तेमाल करें.

* अमूमन मशहूर दाल मसूर की बोआई का काम भी नवंबर में कर लिया जाता है. फिर भी चाह होते हुए भी अभी तक मसूर की बोआई न हो पाई हो, तो उसे फौरन करें. बोआई के लिए 50 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. बीज की उन्नतशील किस्म का ही चुनाव करें और बोने से पहले बीजों को उपचारित करना न भूलें.

* कड़ाके की ठंड वाले दिसंबर महीने में आलू के खेतों का पूरा ध्यान रखना चाहिए. जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें और पौधों में बाकायदा मिट्टी चढ़ा दें. निराईगुड़ाई कर के खेत से खरपतवारों का सफाया करें.

* अपने मवेशियों के लिए अगर बरसीम चारा लगाया है, तो उस की समयसमय पर कटाई करते रहें. कटाई हमेशा 6-7 सेंटीमीटर की ऊंचाई पर ही करें. कटाई के बाद हर बार सिंचाई करना न भूलें, इस से बरसीम पाले से बची रहेगी.

* प्याज की नर्सरी का खयाल रखें और रोपाई का इंतजाम करें. तैयार पौधों की रोपाई इस महीने के आखिर तक कर दें.

* लहसुन के खेतों में अगर नमी कम नजर आए तो हलकी सिंचाई कर दें. खेत की निराईगुड़ाई करें ताकि खरपतवार न पनप सकें.

* अपनी शलजम, गाजर व मूली की क्यारियों में जरूरत के मुताबिक हलकी सिंचाई करें. सिंचाई के साथसाथ नाइट्रोजन वाली खाद भी डालें, इस से फसल बेहतर होती है. क्यारियों की निराईगुड़ाई करें ताकि खरपतवार न पनप सकें.

* धनिया की फसल का मुआयना करें. उस में इस दौरान चूर्णिल आसिता बीमारी का खतरा रहता?है. यह बीमारी होने पर इलाज के लिए 0.20 फीसदी सल्फेक्स दवा का छिड़काव करें.

* अपनी मिर्च की फसल का मुआयना करें, क्योंकि इस दौरान डाईबैक बीमारी का खतरा रहता है. ऐसा होने पर रोकथाम के लिए डाइथेन एम 45 या डाइकोफाल 18 ईसी दवा के 0.25 फीसदी घोल का छिड़काव करें.

* ज्यादा सर्दी की वजह से दिसंबर में अकसर लीची के छोटे पेड़ पाले की गिरफ्त में आ जाते हैं. बचाव के लिए इन पेड़ों को 3 तरफ से छप्पर से कवर कर दें. सिर्फ पूर्वीदक्षिणी सिरा देखभाल के लिए खुला रखें. 

* लीची के फल वाले बड़े पेड़ों में 50 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद प्रति पेड़ की दर से डालें. सभी पेड़ों में 600 ग्राम फास्फोरस भी डालें. रोगी और खराब शाखाओं को पेड़ों से तोड़ कर बाग से दूर ले जा कर जला दें.

* बेशक अभी आम का मौसम नहीं है, मगर आम के बागों की सफाई जरूर करें. आम के 10 साल या उस से पुराने पेड़ों में 1 किलोग्राम पोटाश और 750 ग्राम फास्फोरस प्रति पेड़ की दर से डालें. ये चीजें तनों से 1 मीटर फासला छोड़ कर थालों में डालें.

* मिली बग कीटों से आम के पेड़ों को महफूज रखने के लिए तनों के चारों ओर 2 फुट की ऊंचाई पर 400 गेज वाली 30 सेंटीमीटर पौलीथीन शीट की पट्टी बांधें. पट्टी के निचले किनारे पर अच्छी तरह ग्रीस लगा दें.

* मिली बग कीट अगर तनों पर दिखाई दें, तो 250 ग्राम क्लोरोपाइरीफास पाउडर प्रति पेड़ की दर से तने व उस के आसपास छिड़कें. थाले में छिड़के पाउडर को मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें.

* नए बागों में लगे आम के छोटे पौधों को दिसंबर में पड़ने वाले पाले से बचाना जरूरी है. इस के लिए फूस के छप्पर का इस्तेमाल करें. बीचबीच में सिंचाई करते रहें.

* अपने मुरगेमुरगियों को दिसंबर की जबरदस्त ठंड से बचाने का पूरा इंतजाम करें.

* अगर मुरगीपालन का ज्यादा तजरबा न हो, तो कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक से सलाह ले कर मुरगेमुरगियों की हिफाजत का बंदोबस्त करें.

* इस अंतिम महीने की भयंकर सर्दी मवेशियों के लिए भी बेहद खतरनाक होती है, लिहाजा सजग रहें. रात के वक्त गायभैंसों को बंद कमरों में रखें व लाइट लगातार जलने दें. रोशनी के लिए पीली लाइट इस्तेमाल करें, क्योंकि वह दूधिया लाइट के मुकाबले ज्यादा गरम होती है.

* अगर पशुओं को बरामदे में बांधते हों तो रात के वक्त मोटेमोटे परदे जरूर लगाएं.

* सुबहशाम कंडे की आंच जला कर पशुओं को गरमी दें. धुएं से मच्छर भी भाग जाते हैं.

* दिन के वक्त पशुओं को धूप में जरूर बांधें. यह सेहत के लिहाज से जरूरी है.

* जानवरों को सर्दीबुखार वगैरह होने पर डाक्टर को बुलाना न भूलें.

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