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मुसकान की रोशनाई

कैसी फैली रोशनाई है

कि आज

मुसकान ही हाशिए पर आई है

ये कैसी

जीवन की आपाधापी

सूरतें मुरझाई हैं

न तो इस के दाम बढ़े हैं

जमाखोरों की करतूत

भी देती नहीं दिखाई है

न हो रही इस की अल्प पूर्ति

फिर क्यों लुप्तप्राय हो आई है

बैठ तरु तल

सोचो एक पल

बदल रहा जमाना है

ठहाके लगा के जोर से हंस लो

यही अनमोल खजाना है

पलीते लगी बस एक चिंगारी

खिला देगी

अनार-बम सी

मुसकान तुम्हारी

छोटी सी मुसकान ही तो

जीवन की धुरी.

          – प्रतिमा प्रधान

 

मेरे पापा

मेरी उम्र 12 वर्ष थी. बारिश का मौसम था. मेरी मम्मी एक शासकीय विद्यालय में प्रधानाध्यापिका थीं. एक रात को पापा को भोजन परोसते समय उन्होंने बताया कि शायद आज वे अपने कार्यालय की लाइट बंद करना भूल गई हैं और पंखा भी चल रहा होगा. भोजन के बाद मैं ने देखा कि पापा तैयार होते हुए मम्मी से बोले कि औफिस की चाबी ले लो, हम अभी स्कूल जाएंगे. बरसते पानी में 4 किलोमीटर दूर वे साइकिल से मम्मी को ले कर स्कूल गए और लाइट बंद कर के आए. इस घटना ने मेरे मनमस्तिष्क पर गहरा असर छोड़ा. आज नैतिक मूल्यों के अवमूल्यन के दौर में विचार आता है कि व्यक्ति अगर मेरे पापा जैसे हो जाएं तो देश की जो दुर्दशा दिखाई दे रही है उस से उसे बचाया जा सकता है.

– सुधीर शर्मा, इंदौर (म.प्र.)

*

मैं 10वीं की बोर्ड की परीक्षा देने वाली थी. हमारे शहर मथुरा में उसी समय रेडियो स्टेशन की स्थापना हुई. रेडियो स्टेशन वालों ने हमारे कालेज में पत्र भेज कर कुछ लड़कियों के नाम मांगे थे जो संगीत में अच्छी हों. मेरी अध्यापिका ने मेरा नाम भी दिया और कहा कि मातापिता की अनुमति के बाद तुम्हारा नाम आगे भेजा जाएगा. घर आ कर बताया तो मां ने साफ मना कर दिया, कहा कि पहले पढ़ाई पर ध्यान दो, बोर्ड की परीक्षा सिर पर है. पर मेरे पिताजी को जब यह पता चला तो वे बहुत खुश हुए. वे मुझे स्वयं औडीशन के लिए ले कर गए. मेरा चयन होने के बाद जबजब मेरी रिकौर्डिंग होती, वे मेरे साथ जाते और स्टूडियो के बाहर मेरा इंतजार करते रहते. पिताजी के बढ़ावा देने पर ही मैं ने रेडियो स्टेशन में और भी कई प्रोग्राम दिए. आज भी जब मैं गाती हूं तो मुझे उन की बहुत याद आती है और मेरी आंखें भर आती हैं.

–  मीना भाटिया, बरेली (उ.प्र.)

पिताजी आज हमारे बीच नहीं हैं. उन के नैतिक मूल्यों व सीख से मैं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की सेवा में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के पद पर कार्यरत हूं. परिवार में करुणामयी एवं वात्सल्य से परिपूर्ण मां है, हमेशा ध्यान रखने वाली, वफादार एवं हमसफर पत्नी है, जान न्योछावर करने वाले आज्ञाकारी भाई एवं बहनें हैं, साथ ही चरित्रवान, परिश्रमी एवं उद्यमी बेटे व बेटियां हैं. कमी है, तो केवल पिताजी की. कभी संसार के किसी झंझावात से जूझते हुए यदि मेरे पैर लड़खड़ाने लगते हैं एवं विश्वास कम होने लगता है तो मैं पिताजी की बताई बातें दोहरा लेता हूं.    

–  कृष्ण पाल सिंह गौतम, कोच्चि (केरल) 

रंगरोगन से रंगीन हो आशियाना

कहते हैं दीवारों के भी कान होते हैं लेकिन मैं दीवारों को कान नहीं बल्कि घर का आईना मानता हूं. जब यह आईना साफसफाई के बाद चमकतादमकता है तो घर भी उस चमक में रोशन हो जाता है. घर की यह चारदीवारी जितनी रंगीन और रोशन होती जाती है, घर का मिजाज भी उतना ही खुशनुमा और रंगीन हो जाता है. यों तो साल भर हम कई त्योहार मनाते हैं लेकिन जो इंतजार दीवाली उत्सव को ले कर होता है वह शायद ही किसी और के लिए होता हो. इस उत्साह की अपनी वजहें भी हैं. दीवाली ही एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस में घर की साफसफाई और पुताई पर जोर दिया जाता है. वरना बाकी त्योहार तो हुड़दंग और गंदगी फैलाने का मौका तो खूब देते हैं लेकिन सफाई की वकालत सिर्फ दीवाली पर की जाती है. सिर्फ साफसफाई ही नहीं बल्कि सजावट और रोशनी से सराबोर दीवाली मन के अंदर की तमाम अंधेरी गलियों को रोशन करने का संदेश देती है. घरद्वार की साफसफाई से रंगाईपुताई तक और मन को उजालों से भरने वाले त्योहार दीवाली को मनाने का अंदाज ही निराला होता है.

पुताई और रंगों का बाजार

दीवाली के कुछ दिन पहले से ही इस की तैयारियों का दौर शुरू हो जाता है. जाहिर है इस में रंगाईपुताई से ही शुरुआत होती है. लेकिन आजकल बढ़ती महंगाई और बाजारी रंगों के दामों में हुई अनापशनाप वृद्धि ने रंगाईपुताई को ले कर भी दिक्कतें बढ़ा दी हैं. साथ ही पुताई करने वालों ने भी अपने दामों में अनापशनाप तरीके से वृद्धि कर दी है. आजकल दिहाड़ी पुताई वाले अमूमन एक कमरे के लिए 500 से 1 हजार रुपए तक वसूल रहे हैं. जबकि ठेकेदार 25 हजार रुपए एकदो कमरों के फ्लैट के लिए मांगते हैं. हालांकि यह बजट महानगरों के लिए है और पेंटों की डिजाइन व इस्तेमाल होने वाले सामान के आधार पर घटताबढ़ता रहता है. जबकि कलर्स काउंसलर की मदद से घर की रंगाईपुताई का काम और महंगा पड़ता है. उस पर सामान खुद खरीद कर देना पड़ता है. पिछले साल की अपेक्षा इस साल रंग और पेंट्स के दामों में तकरीबन 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. इसलिए इस से बचने के तरीके निकालने जरूरी हैं. कितना बढि़या हो इस दीवाली घर की रंगाईपुताई आप खुद करने की ठानें.

जरूरी नहीं है कि बाजार से खरीदे महंगे पेंट ही इस्तेमाल करें बल्कि चाहें तो चूना, खरी और मामूली रंगों के घालमेल से भी बेहतर परिणाम पाए जा सकते हैं. डिजाइन बदल कर भी क्वालिटी पेंट जैसा परिणाम पाया जा सकता है. लेकिन सब से बेहतर है कि बाजार की चीजों और मजदूरों पर निर्भर न रहा जाए बल्कि कुछ जरा हट कर आजमाया जाए. अगर रंग से बचना चाहें तो आजकल वालपेपर भी नए विकल्प बन कर उभरे हैं. इस के अलावा कोई दीवार किसी रंग की वजह से अच्छी न लगे तो उस हिस्से को पेंटिंग्स या घर की तसवीरों का इस्तेमाल कर उस कमी को ढका जा सकता है. इस दीवाली आप भी अपने घर की रंगाईपुताई की योजना बना रहे होंगे. अमूमन तो लोग विज्ञापनों की चमकधमक और हर रंग कुछ कहता है की जुमलेबाजी में आ कर बाजार से महंगे पेंट खरीद कर घर चमकाने की सोचते हैं. लेकिन यह तरीका न सिर्फ काफी महंगा पड़ता है बल्कि दीवाली का बजट शुरुआत से ही असंतुलित करने लगता है. अगर इस महंगे खर्चे को बचा लिया जाए तो दीवाली पर और भी जरूरी खर्चे पूरे किए जा सकते हैं. और रही घर की रंगाईपुताई की बात तो इस के लिए इस बार जरा खुद ही हाथ आजमाएं. इस के 2 फायदे हैं. पहला तो आर्थिक मोरचे पर बचत होगी लेकिन दूसरा और सब से जरूरी फायदा यह कि रंगाईपुताई के जरिए न सिर्फ अपने घर को सजाएंगे बल्कि रिश्तों के मोरचे पर प्रगाढ़ता आएगी. वह ऐसे कि जब सब मिल कर कोई काम हंसीखुशी करेंगे तो मन में माधुर्य छलकेगा ही.

बीते दौर का मजा

जरा सोचिए, पुराने दिनों की तरह किसी आर्ट क्लास का असाइनमैंट पूरा करते समय आंगन में अपनों के साथ कलर्स और क्राफ्ट का काम कितने मजे से पूरा हो जाता था और परिवार की अहमियत भी समझ आती थी. लेकिन अब चूंकि न्यूक्लियर फैमिली का जमाना है और उस में भी वर्किंग क्लास और तकनीकी दखल ने कोई काम ऐसा छोड़ा ही नहीं जो सपरिवार मिलजुल कर मस्ती में पूरा किया जाए. हर कोई अकेले ही स्मार्ट फोन और कंप्यूटर में अपनेअपने कमरों में आंखें फोड़ रहा है. किचन में कामवाली बाई खाना बनाती है और बाकी लोग टीवी सीरियल से फुरसत नहीं पा पाते. ऐसे में इस दीवाली के दौरान रंगाईपुताई वह मौका है जब रंगों की कसरत में आप अपने रिश्तों में भी नई जान फूंकेंगे.

अकसर यह सवाल जेहन में आता है कि त्योहार से पहले इतने बड़े पैमाने पर साफसफाई भला जरूरी क्यों हैं. दरअसल, इसी त्योहार के बहाने साल में एक बार घर के कोनेकोने को पूरी तरह साफ कर लिया जाता है. घर की धूलगंदगी दूर हो जाती है. इस के अलावा कार्तिक मास से पूर्व बारिश का समय रहता है. लिहाजा कई जगह दीवारें सीलन पकड़ लेती हैं और उन से चूना आदि झड़ने लगता है. साफसफाई और रंगाईपुताई की परंपरा के बहाने इन का भी समाधान हो जाता है. सफाई के दौरान सर्दियों के कपड़ों को धूप दिखाने का काम भी हो जाता है. वास्तविकता तो यह है कि इतनी सफाई और रंगाई के बाद घर एकदम नया सा लगने लगता है. कई बार गैरजरूरी सामान जो बेकार में पड़ा होता है सफाई के बहाने निकल आता है और किसी जरूरतमंद को देने के काम भी आ जाता है. तीजत्योहारों का असल मकसद आपसी संबंधों में सौहार्द पैदा करना और बीते साल की कमियों और बुराइयों को दूर कर नए सिरे से नई शुरुआत करना होता है. हर दीवाली हम अपने घरों की सफाई तो करते हैं लेकिन जिस तरह सफाई और रंग करने से घर में एक अलग चमक आ जाती है वैसे ही अगर हम अपने मन की सफाई करें तो जीवन में नई उमंग आ जाए.

जब तक मन साफ नहीं है, बाहर की सफाई और सौंदर्य व्यर्थ है. कितना अच्छा हो यदि हम अपने भीतर का भी सौंदर्यीकरण करें. अपने मन की उलझनों और पुराने विचारों को बाहर निकाल कर नकारात्मक विचारों के जाले साफ करें. घर की सजावट और रोशनी की झालरों के साथ मन के अंदर सद्विचारों की झालर लगाएं, फिर देखें कि कितनी रोशनी होती है मन की संकरी गलियों में. इस दीवाली कुछ सार्थक करें तभी सही माने में उत्सव का आनंद मिलेगा.

टिमटिमाता सितारा : सोनम कपूर

अभिनेत्री सोनम कपूर की पहचान अभिनेता अनिल कपूर की बेटी और एक बड़बोली अभिनेत्री की रही है. कभी ऐश्वर्या राय बच्चन को आंटी कहने तो कभी दीपिका या कैटरीना से कैट फाइट के चलते उन्हें सुर्खियां भले ही मिलती रही हों लेकिन इस से उन के अभिनय का स्तर नहीं सुधरा. अपने 7 साल लंबे कैरियर में उन्हें बड़ा ब्रेक संजय लीला भंसाली ने फिल्म ‘सांवरिया’ में दिया. फिल्म असफल रही लेकिन फिल्मी परिवार की होने के चलते उन्हें काम मिलता रहा. कई असफल फिल्मों के बावजूद उन की फिल्में रिलीज होती रहीं. इतने मौके किसी संघर्षरत कलाकार को शायद ही मिलते. बहरहाल अति आत्मविश्वास की शिकार सोनम खुद को फैशन आइकन व सुपरस्टार समझती हैं लेकिन उन का कैरियर ग्राफ उन्हें औसत कलाकार ही साबित करता है. सोनम ने अपनी बहन व पिता के साथ मिल कर फिल्म ‘खूबसूरत’ का निर्माण भी किया लेकिन वह फिल्म भी नहीं चली. जबकि इस से पहले वे ‘आयशा’ जैसी फ्लौप फिल्म भी निर्मित कर चुकी हैं. हालांकि उन के अभिनय की तारीफ फिल्म ‘रांझणा’ में हुई लेकिन इतने सालों बाद किसी कलाकार के पास सफलता के नाम पर एक या दो फिल्में होना जाहिर करता है कि उस का कामयाबी का सफर अभी शुरू हुआ है. उन्हें अभी कुछ और यादगार फिल्में करनी होंगी. हाल ही में सोनम कपूर से हुई बातचीत में उन से कई बातें जानीं.

दीवाली पर रिलीज फिल्म ‘प्रेम रतन धन पायो’ में वे सलमान खान की हीरोइन बन कर आईं तो वहीं वे नीरजा भानोट की बायोपिक फिल्म के अलावा एक पौलीटिकल व रोमांटिक फिल्म ‘बैटल फौर बिटोरा’ भी कर रही हैं. सफलता व असफलता को ले कर सोनम कहती हैं, ‘‘मैं इस से काफी आगे निकल चुकी हूं. ‘रांझणा’ से पहले मेरी फिल्में असफल हुई थीं. ‘रांझणा’ के बाद तो मेरी सारी फिल्में बौक्स औफिस पर सफल हो रही हैं. कभी कोई फिल्म बहुत बड़ी हिट हुई है, तो कभी कोई फिल्म औसत रही. ‘बेवकूफियां’ औसत चली, तब मुझे थोड़ा सा दुख हुआ था क्योंकि ‘बेवकूफियां’ के लिए मैं ने बहुत मेहनत की थी. लोगों को मेरा काम भी पसंद आया था.’’

‘रांझणा’ की सफलता से क्या बदलाव आए, इस बाबत सोनम बताती हैं, ‘‘‘रांझणा’ ने मुझे कलाकार के तौर पर बड़ी पहचान दी. लोगों को एहसास हुआ कि सोनम कपूर अभिनय भी कर सकती है. मुझे कई नौमीनेशन मिले. अवार्ड भी मिले. इस फिल्म के बाद लोग मुझे एक उत्कृष्ट अभिनेत्री के साथसाथ साफ हिंदी व उर्दू भाषा बोलने वाली अदाकारा मानने लगे हैं. दर्शकों को यही सब चाहिए होता है.’’ वे आगे कहती हैं, ‘‘एक कलाकार के तौर पर भाषा का सही उच्चारण बहुत माने रखता है. मेरी उर्दू भाषा अच्छी होने की ही वजह से मुझे ज्यादातर मुसलिम किरदार मिलते रहते हैं. आज समकालीन अभिनेत्रियों में से बहुत कम हैं, जिन का उर्दू भाषा का उच्चारण सही है.’’

‘प्रे्रम रतन धन पायो’ की रिलीज से पहले सलमान खान ने उन की तुलना माधुरी दीक्षित से की थी. इस पर वे कहती हैं, ‘‘यह उन का मजाक था. उन्होंने खुद कहा कि फिल्म प्रचार के लिए ऐसा कह रहे हैं. उन की बातों को गंभीरता से मत लीजिए. मैं खुद अपनी तुलना किसी से नहीं करती. माधुरी दीक्षित तो मेरी पसंदीदा हीरोइनों में से हैं. जब मैं ने ‘सांवरिया’ की थी तो लोगों ने मेरे बारे में कहा था कि यह तो नूतन की तरह लगती है. कुछ लोगों ने कहा था कि वहीदा रहमान की तरह लगती है. कुछ लोगों ने मेरी तुलना रेखा से की थी. पहली फिल्म से ले कर अब तक तमाम अभिनेत्रियों के साथ मेरी तुलना की जा रही है. मुझे इस तरह की तुलना से बहुत डर लगता है. आज तक मुझे किसी भी अदाकारा के साथ तुलना किए जाने पर खुशी नहीं मिली, पर डर जरूर लगा.’’ मुझे लगता है कि दूसरों के साथ मेरी तुलना नहीं की जानी चाहिए. मुझे पता है कि लोगों को मेरा काम पसंद आता है. पर मुझे खुद नहीं पता कि उन्हें मेरा काम क्यों पसंद है. मुझे लगता है कि अभी बहुत अच्छा काम करने के लिए मेरे पास समय है. सच कह रही हूं जब भी लोगों ने मेरे बारे में बहुत अच्छा लिखा है या कहा है तब भी मुझे नहीं लगा कि मैं ने इतना अच्छा काम किया है.’’

अभिनय को ले कर एप्रोच में आए बदलाव के बारे में सोनम का मानना है, ‘‘फिल्मों के चयन में मैं बहुत ध्यान देती हूं. किसी भी फिल्म को चुनने में बहुत समय लगाती हूं. हर फिल्म पर मैं कड़ी मेहनत करती हूं. मैं भले ही सब से बेहतरीन कलाकार नहीं हूं पर मुझे लगता है कि धीरेधीरे मैं अपने अंदर की प्रतिभा को विकसित कर रही हूं. फिल्म दर फिल्म अनुभव के आधार पर मेरा व्यक्तित्व व मेरी कला निखर रही है.’’ अच्छी डांसर होने के बावजूद उन्हें गानों के फिल्मांकन से डर क्यों लगता है, इस सवाल का जवाब सोनम कुछ यों देती हैं, ‘‘मुझे ड्रामैटिक सीन करना अच्छा लगता है पर किसी भी गाने पर डांस करना मुझे कठिन लगता है, क्योंकि उस गाने में मेरी अपनी आवाज नहीं होती है. मैं ने कत्थक डांस की ट्रेनिंग ले रखी है. अच्छी डांसर हूं पर गाने के बोल मेरी आवाज में न हो कर किसी गायिका की आवाज में होते हैं. इस वजह से मुझे तकलीफ होती है. उस वक्त मुझे लगता है कि यह तो मैं नहीं गा रही हूं. दूसरे की आवाज को अपना बनाने में समय लगता है.’’

सोनम समाजसेवा से भी जुड़ी हुई हैं. 4 साल पहले उन्होंने पतंग उड़ाने के लिए शीशायुक्त मांझा के खिलाफ आवाज उठाई थी. उस वक्त महाराष्ट्र के गृहमंत्री को उन्होंने पत्र भी लिखा था. जिस का जवाब उन्हें आज तक नहीं मिला. सोनम बताती हैं, ‘‘मैं ने इस मुहिम को सोशल मीडिया पर भी डाला. इस से लोगों में अवेयरनैस जरूर पैदा हुई है. मैं लोगों से कह रही हूं, ‘आप पतंग उड़ाएं, पर शीशे वाले मांझे का उपयोग न करें.’ शीशे वाला मांझा इंसानों के साथसाथ पशुपक्षियों के लिए भी खतरनाक है.’’ सरकार की तरफ से पत्र का जवाब न मिलना, क्या सरकार की उदासीनता है? इस पर वे कहती हैं, ‘‘मेरा मकसद लोगों के बीच जागरूकता पैदा करना है. कैंसर पीडि़तों का मनोबल बढ़ाना भी है. मैं अपने हिस्से का काम कर रही हूं. मैं ने ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ भी मुहिम चलाई थी. मैं महिलाओं को सलाह देती रहती हूं कि वे समयसमय पर अपनी जांच कराती रहें. यदि छाती के कैंसर का पता जल्दी लगेगा तो उस का इलाज ज्यादा आसानी से व जल्दी संभव है. मैं उन से कहती हूं कि कैंसर के खिलाफ आप लड़ाई लड़ कर जीत हासिल कर सकती हैं. कैंसर का अर्थ सिर्फ मौत नहीं होता है.

नारी सशक्तीकरण पर वे गंभीर हैं. उन के मुताबिक, ‘‘यदि आप मेरी फिल्मों पर नजर दौड़ाएंगे तो आप को एहसास होगा कि मैं नारी सशक्तीकरण को ध्यान में रख कर ही अपने किरदारों का चयन करती हूं. मैं अपनी हर फिल्म में सशक्त नारी किरदार निभाती आ रही हूं. मुझे नहीं लगता कि मैं ने अब तक किसी फिल्म में ऐसा किरदार निभाया है जो कमजोर रहा हो या उसे पता न हो कि उसे क्या चाहिए, फिर चाहे फिल्म ‘रांझणा’ का जोया का ग्रे किरदार ही क्यों न हो. जोया को पता है कि उसे इस आदमी से शादी करनी है. उसे पता है कि उसे सोशल वर्क करना है, और वह कर सकती है. ‘बेवकूफियां’ में मेरा किरदार अपने प्रेमी की अपेक्षा ज्यादा पैसा कमाने वाली का है. ‘खूबसूरत’ में मेरा किरदार पिं्रस से कहता है, ‘प्रिं्रस को तुम अपने घर में रखो. मैं किसी के लिए भी अपनेआप को बदलने वाली नहीं हूं.’ इतना ही नहीं, ‘डौली की डोली’ में भी मेरा किरदार सशक्त था. फिल्म ‘प्रेम रतन धन पायो’ का मेरा पिं्रसैस मैथिली का किरदार भी कम सशक्त नहीं है. मैथिली को पता है कि उसे जिंदगी से क्या चाहिए. वह अपने प्रेमी से कहती है कि यदि हमारे बीच कुछ नहीं हो रहा है तो फिक्र मत करो. मैं अपनी दादी से बात कर लूंगी.’’

यदि बौलीवुड में नारी सशक्तीकरण और नरनारी समानता की बात हो रही है तो फिर पुरुष और महिला कलाकारों की पारिश्रमिक राशि में लंबा अंतर क्यों है? इस बाबत सोनम बताती हैं, ‘‘यह सारा मसला बिजनैस का है. यदि मैं सलमान खान के साथ कोई फिल्म करती हूं तो उस फिल्म का रिलीज के पहले दिन का बौक्स औफिस कलैक्शन 20-30 करोड़ रुपए होता है पर यदि मैं अकेले कोई फिल्म करती हूं तो पहले दिन उस का बौक्स औफिस कलैक्शन 4 करोड़ रुपए होता है. इस हिसाब से ही हमें पारिश्रमिक राशि मिलती है. ‘प्रेम रतन धन पायो’ एक ऐसी फिल्म है जिस में हीरो को मुझ से कहीं अधिक पैसे मिले हैं.  लेकिन ‘रांझणा’, ‘खूबसूरत’, ‘आएशा’, ‘डौली की डोली’ ऐसी फिल्में हैं जिन में मुझे हीरो से ज्यादा पैसे मिले. ‘भाग मिल्खा भाग’ में तो मेरा एक छोटा सा किरदार था, तो उस में पैसे का कोई मसला नहीं था. मेरी आने वाली फिल्म ‘नीरजा भानोट’ में तो कोई हीरो ही नहीं है, वहां तो मुझे ही सारे पैसे मिले हैं. ‘रांझणा’ से ले कर अब तक मुझे हर फिल्म में मेरे हिस्से के सही पैसे मिलते रहे हैं.

‘‘‘नीरजा भानोट’ पूरी हो गई है, फिल्म का ट्रेलर बाजार में आने वाला है. मैं खुश हूं कि नीरजा भानोट की कहानी लोगों तक पहुंचेगी. इस फिल्म में अभिनय करने के बाद मेरी अपनी जिंदगी बदल गई है. नीरजा 23 साल की लड़की, उस के अंदर अद्भुत ताकत, अदम्य साहस था. यह काल्पनिक किरदार नहीं है. वह हम सब के बीच की एक ऐसी जिंदा लड़की थी जिस में कई गुण थे. वह बुद्धिमान थी वह नेकदिल थी. वह अपने परिवार के अलावा दूसरों के लिए बहुतकुछ करती रहती थी. इस किरदार को निभा कर मेरी समझ में आया कि यदि वह ऐसी लड़की थी, तो हम इस तरह की लड़की क्यों नहीं बन सकते.’’ डैड के साथ कोई फिल्म न करने के पीछे का कारण बताते हुए सोनम कहती हैं, ‘‘डैड के साथ फिल्म करने में डर लगता है. अन्यथा मैं ने फरहान अख्तर सहित कई कलाकारों के साथ फिल्में की हैं.’’

सोनम लंबे समय से सोशल मीडिया व ट्विटर पर व्यस्त हैं. ऐसे में वे इस समस्या को कितना गंभीर मानती हैं कि अब लोगों के बीच बातचीत कम होती है, लोग सोशल मीडिया पर ही व्यस्त रहते हैं. वे कहती हैं, ‘‘मैं पार्टी में जाती हूं तो वहां पर मैं सभी को मोबाइल पर ही व्यस्त पाती हूं. मुझे भी सोशल मीडिया पर रहना अच्छा लगता है. पर मुझे लगता है कि जिंदगी व परिवार की तरफ भी ध्यान देना चाहिए. अपनों व अपने रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए. मैं घर पर ज्यादातर समय अपना मोबाइल फोन सायलैंट पर रख कर पापा से, मम्मी से या भाई हर्षवर्धन या बहन रिया से बातें करती हूं. दरअसल, लोगों को सोशल मीडिया की लत लग गई है. सोशल मीडिया का उपयोग करना चाहिए, पर एक सीमा के अंदर.’’ सोशल मीडिया हालांकि लड़ाई का क्षेत्र बनता जा रहा है. हालांकि लड़ाईझगड़े तो हर जगह होते हैं, फिर चाहे वह सोशल मीडिया हो, कुरुक्षेत्र हो या ट्विटर हो. अब सबकुछ सार्वजनिक हो गया. यदि आप को अपनी निजी जिंदगी को निजी रखना है तो वह भी सार्वजनिक हो जाता है.

खूबसूरती को ले कर सोनम का कहना है, ‘‘‘खूबसूरती’ का मतलब खुश रहना है. किसी दूसरे की नकल करने के बजाय अपनी पसंद के कपड़े पहनने चाहिए. हर किसी को अपनी खुद की स्टाइल बनानी चाहिए. हमेशा सकारात्मक सोच रखनी चाहिए.’’ आज सोनम जिस आत्मविश्वास के साथ हर विषय पर अपनी राय रखती हैं वही आत्मविश्वास उन्हें अपने अभिनय में लाना होगा. तब शायद उन को वह कद हासिल हो पाए जो उन के पिता अनिल कपूर ने सालों की मेहनत के बाद हासिल किया है.

शाहरुख से पूछताछ

अभिनेता शाहरुख खान सहिष्णुता पर दिए गए अपने बयान को ले कर आलोचनाओं से घिरे थे कि उन पर एक और मुश्किल आ पड़ी. हुआ यह कि प्रवर्तन निदेशालय ने उन की कंपनी नाइट राइडर्स स्पौर्ट्स प्राइवेट लि. के शेयर मौरीशस स्थित कंपनी को बेचे जाने में कथित अनियमितता के मामले में उन से पूछताछ की है. विदित हो कि शाहरुख आईपीएल की एक टीम के मालिक हैं और कुछ शेयर बेचने को ले कर ईडी जांच कर रही है. वैसे यह कोई आज का मामला नहीं है, 2008-09 में खान की रेड चिलीज एवं अभिनेत्री जूही चावला व उन के पति की अगुआई वाली केआरएसपीएल के शेयर मौरीशस स्थित कंपनी को बेचे जाने से संबद्ध है. इस से पहले, ईडी ने करीब 100 करोड़ रुपए के विदेशी मुद्रा विनिमय कानून के कथित उल्लंघन को ले कर खान से 2011 में भी पूछताछ की थी.

खांसी भगाने वाले लोकप्रिय सिरप की जांच

खांसी की दवाओं में सिरप ज्यादा प्रचलन में हैं और कई बार कुछ लोग डाक्टर की सलाह लिए बिना भी ज्यादा लोकप्रिय सिरप का इस्तेमाल करते हैं. यह दवा की लोकप्रियता का परिणाम है लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं है. एक अखबार की खबर के अनुसार, खांसी के लिए इस्तेमाल एक सिरप में कुछ नुकसानदायक तत्त्व ज्यादा पाए जाने की खबर पर औषधि महानियंत्रक ने इस दवा के नमूने लिए हैं और परीक्षण के वास्ते भेजे हैं. यह सिरप कंपनी की हिमाचल प्रदेश स्थित फैक्टरी में बनता है और यह बहुत लोकप्रिय है. वर्ष 2014 में खांसी की दवा के रूप में 10 शीर्ष सिरप में इस का 7वां स्थान था और कंपनी ने 247 करोड़ रुपए इस दवा की बिक्री से कमाए थे.

यहां चिंता किसी दवा की लोकप्रियता अथवा उस के बिक्री के कारोबार को ले कर नहीं है. परेशानी यह है हम जिन कंपनियों के उत्पाद पर आंख मूंद कर भरोसा कर रहे हैं वही धोखेबाज निकले तो इस से बड़ा अपराध कुछ नहीं हो सकता. यदि सचमुच उस दवा में मात्रा से अधिक कोई घातक तत्त्व पाया जाता है तो यह चिंता का विषय होना स्वाभाविक है. इस विश्वासघात के लिए कंपनी को जरूर दंडित किया जाना चाहिए. साथ ही, इस बात की पड़ताल भी होनी चाहिए कि कंपनी ने क्या ज्यादा लाभ अर्जित करने के मकसद से यह अपराध किया है अथवा लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने की यह किसी बड़ी साजिश का हिस्सा है?

एशिया के 10 शीर्ष अमीरों में 4 भारतीय

अमीरों की सूची तैयार करने वाली फोर्ब्स पत्रिका ने इस बार एशिया के अमीरों की सूची तैयार की है. सूची में पूरे महाद्वीप से 50 अमीरों को शामिल किया गया है. इन अमीरों में 14 भारतीय शामिल हैं और 10 शीर्ष अमीरों में 4 भारतीय हैं. सूची में शामिल होने के लिए 2.9 अरब डौलर यानी करीब 18 हजार करोड़ रुपए की नैट संपत्ति होने की न्यूनतम पात्रता तय की गई थी. 2 से 3 भारतीय इस पात्रता सूची के बहुत नजदीक रहे हैं. गोयनका परिवार की कुल संपत्ति 2.8 अरब डौलर के करीब आंकी गई है. सूची में चीन के अमीरों की संख्या सब से अधिक है. भारत के मुकेश अंबानी, अजीम प्रेमजी, एस पी हिंदुजा तथा पी मिस्त्री शीर्ष 10 अमीरों की सूची में शामिल हैं. इन की संपत्ति पात्रता सूची से कई गुणा अधिक है. अंबानी के रिलायंस समूह की संपत्ति 21.5 अरब डौलर, अजीम प्रेमजी के विप्रो समूह की संपत्ति 17 अरब डौलर, हिंदुजा समूह की संपत्ति 15 अरब डौलर तथा मिस्त्री समूह 14.9 अरब डौलर की है.

एशिया के अमीरों की इस सूची में सैमसंग कंपनी का मालिक कोरिया का ली समूह पहले स्थान पर है. इस समूह की कुल संपत्ति करीब 27 अरब डौलर है. भारत का अंबानी समूह इस सूची में शायद पहले स्थान पर होता लेकिन अंबानी परिवार महज कुछ साल पहले 2 हिस्सों में बंटा है. धीरूभाई अंबानी के दोनों पुत्रों मुकेश तथा अनिल अंबानी ने अलगअलग कारोबार करने का फैसला किया और संपत्ति का बंटवारा हो गया. सूची में दूसरे स्थान पर हौंगकौंग की हंडरसन लैंड डैवलपमैंट कंपनी है. इस कंपनी की कुल संपत्ति 24.1 अरब डौलर है. अरबपतियों की सूची तेजी से बढ़ रही है लेकिन भारत जैसे देश में महंगाई बढ़ने और आय के सीमित साधन होने के कारण गरीबों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. रोजगार के अवसर आबादी के मुकाबले घट रहे हैं जिस से जनसामान्य में गरीबी बढ़ रही है. जरूरत गरीबों पर भी ध्यान देने, उन की आवाज सुनने और उन के लिए अवसर पैदा करने की है.

लघु बचत योजनाओं पर ध्यान देने की जरूरत

करीब डेढ़ दशक पहले तक हर नौकरीपेशा व्यक्ति आयकर में छूट पाने के लिए सरकारी लघु बचत योजनाओं में निवेश करने के लिए पोस्ट औफिस और बैंकों में लाइन लगाए रहता था. इस के जरिए लोग अपने भविष्य के लिए गाढ़ी और मेहनत की कमाई से बचत कर लेते थे. राष्ट्रीय बचत सर्टिफिकेट (एनएससी), किसान विकास पत्र (केवीपी), वरिष्ठ नागरिक बचत योजना तथा एफडी (फिक्स्ड डिपौजिट) के खासे प्रचलन के साथ ही इसे ले कर लोगों में खासा उत्साह भी देखने को मिलता था. इन सब योजनाओं के लिए सरकार साढ़े 8 प्रतिशत से ज्यादा ब्याज देती थी और यह ब्याज दर आज भी लागू है.

पहले इस तरह के बचतपत्र पर 5 साल बाद दोगुना पैसा मिलता था. फिर करीब 8 साल में दोगुना होने लगा. इन बचत योजनाओं की जीडीपी में अच्छीखासी हिस्सेदारी होती थी. वर्ष 2008 में जीडीपी में इन योजनाओं की हिस्सेदारी 38.1 प्रतिशत थी जो 2012-13 में घट कर 30.1 प्रतिशत रह गई. कई संगठनों का मानना है कि सरकार को जीडीपी में इन पत्रों की भागीदारी बढ़ानी चाहिए. एचएसबीसी ने एक रिपोर्ट में कहा है कि सरकार को यह हिस्सेदारी 35 प्रतिशत अवश्य बढ़ानी चाहिए. इधर चर्चा थी कि सरकार इन योजनाओं की ब्याज दरों में कटौती करने पर विचार कर रही है. इस पर सरकार ने विचार तो जरूर किया लेकिन ब्याज दरों में कमी करने का फैसला बदल दिया. इन में सुकन्या समृद्धि जैसी योजना आज भी अत्यधिक लोकप्रिय है. इस योजना के तहत सरकार ने 70 लाख खाते खोले हैं. बाद में यह योजना सरकार की बेटी बचाओ योजना का हिस्सा बन गई.

सरकार ने इन योजनाओं के लिए ब्याज दरों को यथावत बनाए रखने का ठीक फैसला लिया है लेकिन अच्छा होता कि जनसाधारण को ज्यादा फायदा पहुंचाने के लिए इन योजनाओं की ब्याज दर को बढ़ाने का निर्णय ले लिया होता. यह सामान्य व्यक्ति की बचत करने का एक सरल तरीका है. अपनी सामान्य अथवा कम आमदनी में भी वह बचत करना चाहता है और उस के लिए बचत के ये सब से सरल तरीके हैं. वह इन सरल तरीकों को बचत के लिए इस्तेमाल करे, इस के लिए उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.

बाजार में दहशत का माहौल

दशहरे से पहले बौंबे स्टौक एक्सचेंज में कभी तेजी तो कभी गिरावट का सामान्य माहौल रहा. दशहरे के अगले सत्र में बाजार में जबरदस्त तेजी आई तथा सूचकांक 2 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. लेकिन अक्तूबर के आखिरी सप्ताह में बाजार में जम कर बिकवाली हुई और सूचकांक लगातार 5 सत्र तक गिरावट पर बंद हुआ. इस सप्ताह की शुरुआत ही गिरावट से हुई और यह सिलसिला आखिरी कारोबारी दिन तक जारी रहा. इसी तरह शेयर सूचकांक 27000 अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे पहुंच गया. नवंबर की शुरुआत भी गिरावट के साथ हुई और सूचकांक 5 माह के निचले स्तर पर पहुंच गया. नैशनल स्टौक एक्सचेंज 8000 अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे उतर गया.

जानकारों का कहना है कि कंपनियों के तिमाही परिणाम कमजोर रहने, अमेरिकी फैडरल रिजर्व की ब्याज दरों में कटौती के संकेत तथा वैश्विक बाजारों से उत्साहपूर्वक संकेत नहीं मिलने के कारण बाजार में गिरावट का माहौल रहा. बाजार का मूड बिगड़ने की वजह एक सर्वेक्षण में औद्योगिक विकास के 22 माह के निचले स्तर पर पहुंचना भी बताया जा रहा है.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस: बरकरार है गुमशुदगी का राज

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को समझने में नेताजी सुभाष चंद्र बोस चूक गए थे, फिर भी पूर्वी भारत में एक आम धारणा है कि अगर नेताजी जीवित होते तो देश की तसवीर कुछ और होती. यही बात पश्चिम भारत में सरदार वल्लभभाई पटेल के लिए भी कही जाती रही है. बहरहाल, नेताजी की गुमशुदगी और उन की मृत्यु के रहस्य से परदा उठाने की मांग हमेशा से की जाती रही है. इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने नेताजी से संबंधित 64 फाइलों को सार्वजनिक कर के केंद्र पर अन्य 120 या 180 गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक करने का दबाव बना दिया है.

गोपनीय फाइलों में नए तथ्य

सार्वजनिक की गई 64 फाइलों के लगभग साढ़े 12 हजार पृष्ठों में क्या है, यह बड़ा सवाल है. इन का अध्ययन करना कोई खेल नहीं. जाहिर है फाइलों के अध्ययन में लंबा समय लगेगा. हालांकि इन के आधार पर बगैर जांचेपरखे किसी नतीजे पर पहुंचना उचित भी नहीं होगा. कई बार किसी खास मकसद या मामले को मनचाहा मोड़ देने के लिए भी रिपोर्ट तैयार की जाती है या कराई जाती है. इसीलिए ऐसे गोपनीय दस्तावेजों के अध्ययन के मामले में विशेष सावधानी बरतने व तथ्यों को अच्छी तरह खंगालने की जरूरत होती है. इन फाइलों में साल 1945 की और यहां तक कि 1953 की भी कुछ फाइलें हैं. ज्यादातर फाइलों में नेताजी के लिए एस सी बोस यानी सुभाष चंद्र बोस लिखा हुआ है. इन में से एक पूरी फाइल बंगाल कैमिकल्स के आचार्य प्रफुल्ल राय पर है. दरअसल, अंगरेजों को शक था कि नेताजी आचार्य प्रफुल्ल राय के साथ मिल कर सशस्त्र लड़ाई के लिए बम बनाने का काम कर रहे थे. सार्वजनिक हुई फाइलों में 1939 में किसानों का सम्मेलन और 1940 में छात्र आंदोलन पर अलग से फाइलें हैं. 1 फाइल में 15 मई, 1940 में अविभाजित 24 परगना जिले में युवा सम्मेलन में नेताजी द्वारा बंगला में दिए गए भाषण का विवरण है, जहां विश्व राजनीति के साथ नेताजी ने बंगाल के युवा समाज को देश की आजादी की लड़ाई में शामिल होने का आह्वान किया था.

परिवार की जासूसी का मामला

ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया विभाग की संयुक्त रिपोर्ट एक फाइल में पाई गई है, जिस में कहा गया है कि 1948 में नेताजी न केवल जीवित थे, बल्कि अपने परिवार के सदस्यों, खासतौर पर अमिय बोस व शिशिर बोस के संपर्क में भी थे. इसीलिए लंबे समय से उन के परिवार की जासूसी करवाई जा रही थी. इस बात की सचाई एक अन्य फाइल से साबित हो जाती है. पता चला है कि 1939 में इंडियन पोस्ट औफिस ऐक्ट का उल्लेख करते हुए ब्रिटिश सरकार के अंडर सैक्रेटरी डब्लू एच स्यूमरेज स्मिथ द्वारा कालीघाट, बऊबाजार (कोलकाता) समेत विभिन्न डाकघरों के पोस्टमास्टरों को पत्र लिख कर नेताजी के घर से निकली और नेताजी के पते पर आई तमाम चिट्ठियों को ‘इंटरसैप्ट’ करने का आदेश दिया गया था.

फाइल नंबर 10 के तथ्य के अनुसार, 5 मार्च, 1948 को केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्रालय के एक कर्मचारी चो हुया कुंग ने अमिय नाथ बोस को पत्र लिख कर कहा कि मुझे भरोसा है कि नेताजी जीवित हैं. लेकिन इसी के साथ इसी फाइल में एक जगह से यह भी पता चलता है कि 16 नवंबर, 1947 में उत्तर कोलकाता के नीमतला श्मशान घाट में नेताजी की मूर्ति का अनावरण हुआ और इस मौके पर 2 मिनट का मौन भी रखा गया. 15 नवंबर, 1945 को ब्रिटिश सेना की बैंकौक यूनिट ने दिल्ली खुफिया ब्यूरो के डब्ल्यू राइट नामक एक अंगरेज अधिकारी को खबर दी कि उन के पास पक्की खबर है कि बोस रूस चले गए हैं. दिल्ली ब्यूरो को यह संदेश 16 नवंबर को प्राप्त हुआ. इस का मैमो नंबर टीएयू/1435 है. सार्वजनिक हुई फाइलों में से एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण फाइल के सिर्फ पहले पृष्ठ की फोटोकौपी है. यह फाइल नेताजी की गुमशुदगी की जांच से संबंधित है. माना जा रहा है कि इस के बाकी पृष्ठों के साथ अन्य बहुत सारी फाइलों को 1972 में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन कांगे्रसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने नष्ट करवा दिया था.

विदेश में नेताजी की फाइल

विदेशों में भी नेताजी से संबंधित गोपनीय फाइलें हैं. गोपनीय फाइल के सार्वजनिक होने पर यह एक नया तथ्य भी सामने आया है, जो तत्कालीन सोवियत रूस से संबंधित है. दरअसल, 1995 में एशियाटिक सोसाइटी का एक प्रतिनिधि मंडल सोवियत रूस आर्काइव देखने गया था. इस प्रतिनिधिमंडल में कोलकाता विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के एक प्रोफैसर हरि बासुदेवन भी थे. चूंकि लंबे समय से इस बात की चर्चा रही है कि नेताजी कुछ समय सोवियत के साइबेरिया जेल में थे, इसीलिए प्रतिनिधिमंडल ने इस बारे में जानना चाहा था. वहां से लौटे हरि बासुदेवन बताते हैं कि केजीबी या ब्रिटिश एमआई 5 नामक गोपनीय फाइल देखने की अनुमति प्रतिनिधिमंडल को नहीं मिली. इस से एक हद तक साफ हो जाता है कि रूस में भी नेताजी से संबंधित कुछ गोपनीय फाइलें हैं, जिन्हें सार्वजनिक करने में वहां की सरकार आनाकानी कर रही है. माना जा रहा है कि रूस की ही तरह इंगलैंड, मंगोलिया, सिंगापुर, चीन, जापान और जरमनी में भी नेताजी से संबंधित कुछ फाइलें होंगी. ऐसी ही फाइलों को मंगवाने की बात फौरवर्ड ब्लौक कर रही है.

आर्काइव फाइल का मजमून

अब सवाल है कि केंद्र सरकार के पास सुरक्षित 120 या 180 गोपनीय फाइलों में आखिर क्या कुछ है? इस में कोई दोराय नहीं कि इन 64 फाइलों की तुलना में केंद्र के अधीन 120 फाइलें कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हैं. साल 1945 के बाद नेताजी को ढूंढ़ा जा रहा था, क्योंकि विमान दुर्घटना में उन की मौत हो गई है, इस बात को सभी मानने को तैयार नहीं थे. यहां तक कि लौर्ड माउंटबेटन भी. नेताजी को ले कर माउंटबेटन और नेहरू द्वारा एकदूसरे को लिखे गए पत्र ‘टौप सीके्रट’ की मुहर के साथ फाइल में बंद हैं और केंद्र सरकार के अधीन हैं.बंगाल के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों के पास दिल्ली में सुरक्षित फाइलों के मजमून की जानकारी है. ऐसे ही एक पत्रकार हैं कृष्ण कुमार दास. इन्होंने कुछ मैमो नंबर और फाइल नंबर की जानकारी दी, जिन में नेताजी से संबंधित सनसनीखेज जानकारी होने का वे दावा करते हैं. उन के अनुसार, नेताजी को ले कर समयसमय पर रूस, इंगलैंड, सिंगापुर, जापान, मंगोलिया समेत बहुत सारे देश के सामरिक और खुफिया विभाग दिल्ली में ब्रिटिश सरकार को रिपोर्ट भेज रहे थे.

ऐसी तमाम रिपोर्टें केंद्र सरकार के राष्ट्रीय आर्काइव में तालाबंद हैं. हालांकि बड़ी कोशिश के बाद मुखर्जी आयोग को कुछ गिनीचुनी फाइलें देखने को मिली थीं. गौरतलब है कि सत्ता के हस्तांतरण के दौरान बहुत सारे दस्तावेज भारत के प्रशासकों को सौंपे गए थे. उन में नेताजी की गुमशुदगी से संबंधित सनसनीखेज तथ्य हैं. खासतौर पर इस के छठे वौल्यूम के 137-139 पृष्ठों में, जिन में लौर्ड वावेल से लौर्ड माउंटबेटन द्वारा नेताजी की विमान हादसे में मृत्यु को ले कर शंका जाहिर की गई थी.एक फाइल, जिस का विवरण इस प्रकार है – इंडिया 6 (1), सीक्रेट एन/10005/6/जीएसआई (बी), 26 अक्तूबर, 1945. इस में आजाद हिंद फौज के 370 लड़ाकों के मामले की सुनवाई से संबंधित तथ्य हैं. इस फाइल से पता चलता है कि 1945 में दक्षिण एशिया में ब्रिटिश सेना के कमांडर ने अपने संदेश में कहा है, सभी 370 सिपाहियों ने माना कि नेताजी जीवित हैं. 10 दिसंबर, 1945 को बर्मा की तत्कालीन सरकार की ओर से नेताजी से संबंधित एसएसी 1104/ओए मैमो के तहत एक गुप्त संदेश भेजा गया था, जिस के आधार पर 31 दिसंबर, 1945 को नैशनल हेराल्ड ने, ‘नेताजी अब तक जीवित हैं’-इस आशय की खबर को प्रकाशित किया था. उन दिनों इस अखबार को कांग्रेस का मुखपत्र माना जाता था, क्योंकि यह अखबार जवाहरलाल नेहरू की गाइडलाइन पर ही चलता था. लेकिन ऐसे अखबार में यह खबर कैसे प्रकाशित हो गई, इस को ले कर बहुत चर्चा थी. इस घटना के बाद अखबार के पत्रकार को कड़ी पूछताछ का सामना करना पड़ा. इस पूरे मामले से संबंधित तथ्यात्मक दस्तावेज केंद्र सरकार के आर्काइव में हैं.

कुल मिला कर पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा सार्वजनिक किए गए गोपनीय दस्तावेजों से बारबार यही तथ्य निकल कर सामने आ रहा है कि 18 अगस्त, 1945 में ताइपे में विमान हादसे के बाद भी नेताजी जीवित थे या नहीं. 12 हजार से भी अधिक पृष्ठों के दस्तावेज इस रहस्य को और उलझाने का काम कर रहे हैं. सुभाष चंद्र बोस कैसे भी नेता हों, यह पक्का है कि 1945-1947 के बाद देश के लिए निरर्थक हो गए थे. जापान व जरमनी की हार के बाद व भारत की स्वतंत्रता के बाद उन का महत्त्व केवल इतिहास की किताबों तक रह गया था. वे जीवित थे या नहीं, यह केवल उत्सुकता पैदा करने वाला सवाल था.

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