समाचारपत्र में छपे वैवाहिक विज्ञापनों को देख कर मेरी चाचीजी ने अपनी बेटी के विवाह के बारे में बात करने को फोन नंबर मिलाया. दूसरी ओर से लड़के की मां बोल रही थीं. कुछ देर बेटे की शिक्षा आदि के बारे में जानकारी ली. एक ही शहर में होने के कारण बेटे की मां ने कहा, ‘‘आप लोग हमारे घर आ जाइए.’’ और वे पता बताने लगीं. इस पर मेरी चाचीजी बोलीं, ‘‘वहां पर हमारी बहन भी रहती है.’’
वे नाम पूछने लगीं. नाम सुन कर फोन पर वे हंसीं और बोल उठीं, ‘‘अरे, छोटी तू है, तभी तेरी आवाज जानीपहचानी लग रही थी.’’ अब तक चाचीजी भी कहने लगीं, ‘‘अरे दीदी, आप हैं. वाह, यह भी खूब रही.’’
स्वाति पटेल, कानपुर (उ.प्र.)

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हम तीनों बहनें, भैया के साथ इंडियन हिस्ट्री कांगे्रस का सैशन अटैंड करने मैसूर जा रहे थे. भैया, जोकि बहुत मजाकिया हैं, जब भी कोई विशेष चीज नजर आती, हम सब से कहते, ‘देखोदेखो.’
सफर मजे से कट रहा था. तभी भैया अचानक जोर से चिल्लाए, ‘‘देखोदेखो ट्रेन की पूंछ.’’
हम सब खिड़की की तरफ लपके. हमें देख कर भैया हंसने लगे. तभी हम ने देखा कि हमारे पूरे कंपार्टमैंट के यात्री खिड़कियों से बाहर झांक रहे थे. उन्हें देख हम हंसतेहंसते लोटपोट हो गए. सभी यात्रियों के चेहरे देखने लायक थे.
हुआ यों कि किसी मोड़ पर ट्रेन के पीछे का हिस्सा दिख रहा था, उसे ही भैया ने पूंछ कहा था.

नेहा प्रधान, कोटा (राज.)

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मेरे पति डाक्टर हैं. एक दिन हम लोग बड़ी दीदी को देखने उन के घर गए. दीदी इन से बोलीं कि उन की स्टिक एक जगह से टूट गई है, उसे ठीक करा दें. इन्होंने देखा और बोले कि यह तो अभी ठीक हो जाएगी. बस, आप जरा नौकर को भेज कर एरलडाइट की ट्यूब मंगा दें. मैं अभी जोड़ दूंगा. उन्होंने नौकर हरिराम को बुला कर कहा कि दौड़ कर जाओ और यह ट्यूब ले आओ. नाम थोड़ा कठिन था तो इन्होंने एक परचे पर लिख कर दे दिया. एक घंटा तक हरीराम नहीं आया. देर हो जाने के कारण हम निकलने को ही थे कि देखा, हरिराम सिर झुकाए खड़ा है. दीदी ने डांटा कि इतनी देर कहां लगा दी और ट्यूब कहां है?
हरिराम रोंआसा हो कर बोला, ‘‘सारी दवा की दुकानें देख डालीं, यह कहीं न मिली.
जैसे ही उस ने ‘दवा की दुकान’ कहा, हम सारी बात समझ गए. फिर तो हंसी का जो दौर शुरू हुआ कि देर तक सब हंसते रहे. उसे जाना था हार्डवेयर की दुकान पर, पहुंच गया कैमिस्ट के पास.

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