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खेल खिलाड़ी

क्या धौनी का दौर खत्म?

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धौनी के दिन कुछ ठीक नहीं चल रहे हैं. उन की असफलता को ले कर लोगों ने खुलेआम मुंह खोलना शुरू कर दिया है. पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन ने कहा कि धौनी अब वे पहले जैसे खिलाड़ी नहीं रहे इसलिए चयनकर्ताओं को इस दिशा में गंभीरता से सोचना चाहिए. यह बात सही भी है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से टीम इंडिया को लगातार शर्मनाक हार का सामना करना पड़ रहा है. विदेशी धरती पर तो टीम इंडिया फ्लौप साबित हो ही रही है और अब घरेलू मैदान में भी धौनी की रणनीति कुछ खास असर नहीं दिखा पा रही है. कानपुर में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ पहले एकदिवसीय मैच में रोहित शर्मा के 150 रन के बावजूद भारत 5 रन से मैच हार गया. धौनी भी टीम को लक्ष्य तक पहुंचाने में नाकाम रहे. हालांकि इस की भरपाई धौनी ने दूसरे एकदिवसीय मैच में पूरी कर ली. लेकिन इस से धौनी की गलतियों को ढका नहीं जा सकता.

कुछ वर्ष पहले तक अपनी चतुराई भरी कप्तानी से चयनकर्ताओं और आम दर्शकों में अपनी खासी पहचान बनाने वाले धौनी अब न तो दर्शकों का दिल जीत पा रहे हैं और न ही चयनकर्ताओं का. धौनी के खिलाफ आज से नहीं बल्कि बहुत पहले से आवाज उठ रही है. इधर लगातार उन के नेतृत्व में टीम इंडिया हार रही है जिस की आलोचना पूर्व खिलाडि़यों से ले कर वर्तमान खिलाड़ी भी कर रहे हैं. विराट कोहली से उन का मतभेद कुछ छिपा नहीं है. रवि शास्त्री भी धौनी को पसंद नहीं कर रहे हैं. अब तो धौनी को बचाने वाला एन श्रीनिवासन का वर्चस्व भी बीसीसीआई में खत्म हो गया है. एक वह दौर था जब धौनी को पारस पत्थर माना जाता था लेकिन अब उन पर फ्लौप कप्तान का लेबल चस्पां हो चुका है. अगर वाकई धौनी को अपनी इज्जत प्यारी है और पारस पत्थर का तमगा बरकरार रखना है तो उन्हें खुद ही पहल करनी चाहिए और दूसरे खिलाडि़यों के लिए रास्ता साफ कर देना चाहिए. यदि धौनी अब भी कप्तानी के मोहपाश से अपने को अलग नहीं करते तो हो सकता है कि एक दिन उन्हें स्वयं कहना पड़े, ‘बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले.’

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पेले की पहल

फुटबौल के किंग माने जाने वाले ब्राजील के महान फुटबौलर 74 वर्षीय एडिसन अरांटिस डो नैसिमैंटो, जिन्हें लोग पेले के नाम से जानते हैं, ने कोलकाता में कहा कि किसी भी तरह भारत की मदद करने में उन्हें खुशी होगी. मैं तैयार हूं इस में कोई समस्या नहीं है. एक समय फुटबौल में ब्राजील का दबदबा था पर अब ऐसी बात नहीं है. टीम की खस्ता हालत पर पेले ने मैनेजमैंट के बढ़ते दखल को जिम्मेदार बताया, जो अब हर देश में हर खेल पर होने लगा है. अब खेल संघों में मनमानी चलने लगी है और खेलों का स्तर गिरता जा रहा है. भारतीय फुटबौल टीम की बेहतरी के लिए पेले ने कहा कि यहां सब से पहले बुनियादी ढांचे को मजबूत करना होगा और बच्चों को स्कूली स्तर से ही खेल की ट्रेनिंग देनी होगी. उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय फुटबौलरों को विदेश भेजना भी मददगार साबित होगा, जहां वे अच्छे फुटबौलर्स के साथ खेल सकेंगे. भारत के पास फुटबौल में आगे बढ़ने का शानदार मौका है.

पेले के अनुसार भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं पर यहां खिलाडि़यों को परखने व प्रशिक्षण देने के लिए जो लोग हैं, क्या वे वाकई में काबिल हैं. हां, कुछ ऐसे खिलाडि़यों के उदाहरण जरूर मिल जाएंगे कि उन्हें चयन समितियों ने उन की प्रतिभा को देखते हुए मौका दिया और वे आगे निकल गए पर अब खेलों में भ्रष्टाचार और राजनीति हावी हो गई है. अगर सही प्रतिभाओं को चुनना है तो इस से ऊपर उठ कर आगे आना होगा तभी इस महान फुटबौलर की बातों को हम सही साबित कर पाएंगे. वैसे भी भारत में फुटबौल को शुरू से ही अनदेखा किया गया है जबकि क्रिकेट को भरपूर प्रोत्साहन मिला. इसीलिए खिलाड़ी क्रिकेट में अपना कैरियर तलाशते हैं. जबकि फुटबौल खिलाडि़यों को वे सुविधाएं नहीं दी जातीं. इसलिए वे इस खेल की ओर कम ही आकर्षित होते हैं. अगर सरकार को व खेल पदाधिकारियों को वाकई एक अच्छी राष्ट्रीय फुटबौल टीम बनानी है तो खिलाडि़यों को सुविधाएं देनी ही होंगी.

पाठकों की समस्याएं

मेरे विवाह को अभी 1 वर्ष हुआ है. मैं अपनी सास के व्यवहार से बहुत परेशान हूं. मैं उन की इकलौती बहू हूं फिर भी वे मेरी गलतियां निकाल कर आसपड़ोस में बताती रहती हैं लेकिन जब मैं उन की गलतियां बताती हूं तो वे रोनाधोना शुरू कर देती हैं. पति से इस बारे में कुछ कहती हूं तो वे कहते हैं कि सबकुछ चुपचाप सहन करो. मैं बहुत परेशान हूं समझ नहीं आ रहा, क्या करूं. समस्या का समाधान करें.

 आप ने बताया कि आप के विवाह को अभी 1 साल ही हुआ है इसलिए शुरुआती दौर में आप को अपनी सास का व्यवहार अजीब लग रहा है. अभी आप को और आप की सास को एकदूसरे को समझने में वक्त लगेगा. रिश्तों के शुरुआती दौर में ऐसी समस्याएं आती हैं क्योंकि दो लोग एकदूसरे के बारे में ज्यादा नहीं जानते. आप अपने अच्छे व्यवहार से उन का मन जीतने की कोशिश कीजिए और उन की गलतियां न निकालें. घर की बड़ी होने के नाते वे आप से मानसम्मान की उम्मीद रखती हैं और जहां तक हो सके पति को अपनी इन समस्याओं के बारे में तब तक न बताएं जब तक समस्या बहुत बड़ी और गंभीर न हो. इस से आप पतिपत्नी के रिश्ते में भी कड़वाहट आएगी.

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मैं एक लड़की को पसंद करता हूं और उस से शादी करना चाहता हूं. मेरी समस्या यह है कि अभी मैं कोई नौकरी नहीं करता यानी मेरी आय का कोई साधन नहीं है. ऐसे में मैं डरता हूं कि उस के घर वालों से किस आधार पर विवाह की बात करूं. ऊपर से वह लड़की बताती है कि उस के घर वाले हम दोनों के विवाह के लिए राजी नहीं हैं. मुझे डर है कि जब तक मेरी नौकरी लगती है तब तक कहीं उस का विवाह न हो जाए. मेरे लिए मेरा प्यार और कैरियर दोनों महत्त्वपूर्ण हैं. मैं ऐसा क्या करूं जिस से मुझे नौकरी और मेरा प्यार दोनों मिल जाएं?

विवाह करने के लिए आप का आर्थिक रूप से सक्षम होना बेहद जरूरी है. लड़की के घर वालों से विवाह के लिए बात करने से पहले आप अच्छी सी नौकरी की तलाश कीजिए. हां, अगर आप चाहें तो उस के घर वालों से मिल कर अपनी इच्छा जरूर जाहिर कर सकते हैं और उन्हें तब तक अपनी बेटी का विवाह कहीं और न करने के लिए मना सकते हैं. आप अपने अच्छे व्यवहार व स्वभाव से उन का मन जीतने की कोशिश करें. लेकिन जो भी करें जल्द ही करें. इस काम में अपनी प्रेमिका की मदद लें क्योंकि वही अपने घर वालों के समक्ष आप की अच्छी छवि प्रस्तुत करने में मददगार हो सकती है.

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हाल ही में मेरी मुलाकात फेसबुक के जरिए एक लड़की से हुई है. हम दोनों ही बीए फाइनल ईयर के छात्र हैं. फेसबुक में चैटिंग के जरिए हम एकदूसरे को पसंद करने लगे और हम दोनों ने एकदूसरे के बारे में अपने घर वालों को भी बता दिया है. हम दोनों विवाह करना चाहते हैं, हमारे घर वाले भी इस बात के लिए राजी हैं. पर समस्या यह है कि हम अभी तक न तो कभी एकदूसरे से आमनेसामने मिले हैं और न ही मैं ने उस की कोई तसवीर देखी है और न ही उस ने. ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?

फेसबुक पर चैटिंग के जरिए एकदूसरे को जाननापहचानना इतना आसान नहीं है क्योंकि चैटिंग के जरिए जब दो लोग एकदूसरे से बात करते हैं तो सिर्फ अच्छी बातें दिखाई देती हैं. आप के केस में आप ने तो एकदूसरे को देखा भी नहीं है और घर वालों से विवाह की भी बात कर ली और घर वालों ने भी बिना कुछ सोचेसमझे न जाने कैसे अपनी रजामंदी दे दी. हो सकता है सबकुछ ठीक हो लेकिन फिर भी आप दोनों एकदूसरे से जरूर मिलें. एकदूसरे के परिवार वालों से मिलें. आमनेसामने बैठ कर जिंदगी के हर पहलू पर बात करें. फिर ही कोई निर्णय लें. वैसे भी अभी आप दोनों पढ़ रहे हैं, पहले अपनी शिक्षा पूरी कीजिए, आर्थिक रूप से सैटल होइए उस के बाद ही विवाह के बारे में सोचिए. तब तक एकदूसरे को जाननेसमझने का और अधिक समय मिल जाएगा.

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मैं एक नवयुवक हूं. आएदिन मेरे मोबाइल पर मैसेज आते हैं कि उक्त मैसेज 11 लोगों को भेजें, आप की मनोकामना शीघ्र पूरी हो जाएगी. इस तरह के मैसेज देख कर मेरे अंदर अजीब द्वंद्व सा पैदा हो जाता है क्योंकि उस में लिखा होता है कि अगर आप ने यह मैसेज आगे फौरवर्ड किया तो मनवांछित फल मिलेगा और अगर बिना फौरवर्ड किए डिलीट किया तो भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. इस चक्कर में मेरा सारा मोबाइल बैलेंस खत्म हो जाता है. मुझे कोई लाभ हो या न हो लेकिन मेरा व्यर्थ का खर्च जरूर हो जाता है. ऐसे मैसेज आएदिन आते रहते हैं. मैं पसोपेश में पड़ जाता हूं, डिलीट करते भी नहीं बनता है और जबरदस्ती फौरवर्ड करना पड़ता है. आप ही मेरी दुविधा का समाधान कीजिए.

ऐसे मैसेज भेजने वाले और कोई नहीं वहमी व धार्मिक अंधविश्वासी लोग हैं जो स्वयं तो अंधविश्वासी हैं ही और चाहते हैं कि लोग भी उन का अनुसरण करें. उन का एकमात्र उद्देश्य लोगों की तार्किक शक्ति को नष्ट कर के अपना भ्रम जाल फैलाना है. आप ऐसे मैसेजेस पर बिलकुल ध्यान न दें और न ही मन में किसी प्रकार का द्वंद्व पालें. अगर इन धार्मिक अंधविश्वास से भरे मैसेज को फौरवर्ड करने से सब की मनोकामना पूरी हो जाती तो देश में कोई गरीब, भूखा नहीं होता, सब संपन्न व खुशहाल होते.     

सफर अनजाना

हम लोग अपने देवर के लिए लड़की देखने होशंगाबाद से बरेली जा रहे थे. हमारे साथ जेठजी के 2 बच्चे, एक चचेरा भाई व हमारी 2 बेटियां थीं. दूरी ज्यादा नहीं थी तो तय किया कि उसी दिन वापस आ जाएंगे. हम लोग जीप से रवाना हुए. लड़की देखने का कार्यक्रम हुआ. खाना खाया और उन के बहुत रोकने के बावजूद शाम को हम चल दिए.

बच्चे तो गाड़ी में बैठते ही सो गए. अचानक बीच जंगल में गाड़ी खराब हो गई थी. दूरदूर तक आबादी नहीं थी. रात हो चुकी थी. क्या करें, कुछ समझ नहीं आ रहा था. तभी पतिदेव का ध्यान गया कि सड़क निर्माण का कार्य ताजा ही था, जरूर आसपास मजदूर व ठेकेदार का निवास होगा. थोड़ी दूर पर एक अस्थायी निवास दिख गया. बातचीत करने पर वहां एक पुराने परिचित निकल आए. उन्होंने सलाह दी कि गाड़ी और ड्राइवर सहित यहीं रुकें. वे सुबह गाड़ी ठीक करवा देंगे. किसी अन्य गाड़ी में लिफ्ट ले कर हम लोग वापस बरेली चले जाएं. यही उचित था. आखिर एक नेताजी बड़ी सी गाड़ी में ड्राइवर के साथ जाते मिल गए. हम सब को उन्होंने बैठा भी लिया. लेकिन ड्राइवर ने बताया गाड़ी की बे्रक ठीक से काम नहीं कर रही. हम सब घबरा गए. अंधेरा, जंगल और गहरी खाई. हम सब गाड़ी रुकवा कर वहीं उतर गए. कई गाडि़यां निकलीं पर एक भी नहीं रुकी. आखिर एक ट्रक रुका, उस ने हम सब को बरेली पहुंचा दिया. रात हम वहीं रुके. सुबह हमारा ड्राइवर गाड़ी ठीक करवा कर ले आया और तब हम किसी तरह अपने घर पहुंच सके.

सुजाता गुप्ता, भोपाल (म.प्र.)

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मैं और मेरी पत्नी त्रिवेणी ऐक्सप्रैस से मिर्जापुर से लखनऊ जा रहे थे. गाड़ी लेट चल रही थी. दिन के 10 बजे गाड़ी रायबरेली पहुंची. रायबरेली स्टेशन पर उतर कर गाड़ी की तरफ पीठ कर के मेरी पत्नी नल पर हाथमुंह धोने लगी. इतने में गाड़ी चल दी. मैं पत्नी की तरफ देख कर चिल्लाया, जल्दी आओ. पत्नी ने दौड़ते हुए गेट के दोनों हैंडिल तो पकड़ लिए लेकिन पायदान पर पैर नहीं रख पा रही थी. पैर में साड़ी फंस गई थी. मैं देख रहा था, पत्नी गाड़ी के नीचे जा रही है. तभी एक व्यक्ति ने मेरी पत्नी को दोनों हाथों से फुरती से पकड़ कर प्लेटफौर्म पर खींच लिया. 2 मिनट बाद गाड़ी रुकी और फिर चल दी. बछरांवा स्टेशन पर पत्नी मेरे डब्बे में आई. मैं अभी तक नौर्मल नहीं हो पाया था. पत्नी ने बताया कि उस व्यक्ति ने गार्ड से गाड़ी रुकवा कर रायबरेली में ही गाड़ी में बिठा दिया था. मुझे अफसोस इस बात का है कि मैं उस व्यक्ति, जो अनजान था, को धन्यवाद तक न दे पाया.

एस पी सिंह, लखनऊ (उ.प्र.)

जर्जर स्कूलों में दम तोड़ती शिक्षा प्रणाली

‘‘जब तक पापा पढ़ाएंगे तब तक पढ़ेंगे. हम तो पढ़ना चाहते हैं. पढ़ने में मन भी बहुत लगता है. रोज स्कूल आते हैं. पढ़लिख कर बड़ा आदमी बनना है.’’ यह कहते हुए 10 साल की सोनम की आंखें चमक उठती हैं. 5वीं क्लास में पढ़ने वाली उस मासूम की आंखों में कुछ कर गुजरने का सपना साफ दिखाई देता है. उस के पिता भरोसा राम बढ़ई यानी कारपेंटर का काम कर के अपने परिवार का पेट पालते हैं. सोनम कहती है, ‘‘पिताजी दिनरात मेहनत कर के उसे पढ़ा रहे हैं. कभीकभी पैसे की कमी होने पर कौपी, कलम, पैंसिल खरीदने में दिक्कत होती है, लेकिन पापा किसी भी तरह से इंतजाम कर देते हैं.’’

‘‘हम बड़े हो कर अच्छे आदमी बनना चाहते हैं. अच्छा घर हो और अच्छा खाने को मिले. मास्टर साहब कहते हैं कि बड़ा आदमी बनने के लिए पढ़नालिखना जरूरी है.’’ चौथी क्लास में पढ़ने वाली निभा कुमारी मुसकराते हुए एक झटके में अपनी जिंदगी की सीख और प्लानिंग बता देती है. वह कहती है कि उस के पिता विनोद प्रसाद आटोरिकशा चलाते हैं और 6 लोगों के परिवार का पेट पालते हैं. निभा बताती है, ‘‘मेरी कई सहेलियों ने पैसे की कमी या कमाई करने के लिए पढ़ाई छोड़ दी है, लेकिन मैं कभी स्कूल नहीं छोड़ूंगी, ऊपर के क्लास तक पढ़ाई करूंगी. मैं अपने पिता से कहती रहती हूं कि मैं पढ़ाई छोड़ कर दूसरा काम नहीं करूंगी.’’

फिसड्डी सरकारी योजनाएं

पटना शहर के कंकड़बाग आटो स्टैंड के पास राजकीय पब्लिक प्राथमिक विद्यालय है. इस की अपनी इमारत नहीं है. रैंटल फ्लैट नंबर-310 के 3 कमरों में यह स्कूल चलता है. इस स्कूल में 175 बच्चे हैं. पढ़ाई सुबह 7 बजे से ले कर दोपहर साढ़े 11 बजे तक चलती है. इस के बाद उसी फ्लैट में 12 बजे दिन से खुल जाता है राजकीय कन्या मध्य विद्यालय. इस स्कूल की कक्षाएं साढ़े 4 बजे शाम तक चलती हैं. स्कूल में 240 लड़कियां पढ़ती हैं. बिहार विधानसभा भवन से केवल 6 किलोमीटर की दूरी पर चल रहे इन दोनों स्कूलों तक सरकारी योजनाओं और तालीम की तरक्की को ले कर की जाने वाली बयानबाजी व दावों का रत्तीभर हिस्सा भी नहीं पहुंच सका है. 3 छोटेछोटे कमरों में 140-150 बच्चे कबाड़ की तरह ठूंस कर बैठाए जाते हैं. जगह की कमी की वजह से आधे से ज्यादा बच्चे तो मकान के बाहर धूप में दरी या चादर बिछा कर क से कमल, ल से लालटेन, त से तीर, झ से झोपड़ी, ह से हाथ की रट लगाते हैं. लेकिन इन मासूमों की सिसकियों, गरमी के दिनों में चिलचिलाती धूप से शरीर में भरी घमोरियों को सुननेदेखने के लिए तरक्की का दावा करने वाले कभी नहीं आते हैं. न तो ‘कमल’ निशान वाली भाजपा, न ‘लालटेन’ वाली राजद, न ‘तीर’ वाली जदयू, न ‘झोपड़ी’ वाली लोजपा और न ही ‘हाथ’ छाप वाली कांग्रेस के किसी नेता की नजर इस स्कूल की बदहाली पर पड़ी है.

बेपरवाह प्रशासन

5वीं क्लास में पढ़ने वाली प्रमिला कुमारी से जब पूछा गया कि स्कूल में क्या दिक्कत होती है तो उस ने तुरंत कहा कि बाथरूम जाने में दिक्कत होती है. कहने को स्कूल में छोटा सा बाथरूम है लेकिन वह गंदगी से भरा है और उस के बाहर गंदा पानी जमा रहता है. बाथरूम की परेशानी बता रही प्रमिला ने केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही ‘घरघर शौचालय’ की योजना की धज्जियां उड़ा दीं. जिस स्कूल में 400 से ज्यादा लड़केलड़कियां पढ़ाई करने आते हैं वहां तरीके से एक शौचालय तक नहीं बना हुआ है. ऐसे में बच्चे जाएं तो कहां जाएं? इस सवाल के जवाब में स्कूल की प्रिंसिपल बेबसी से कहती हैं कि महकमे के अफसरों को कई दफे चिट्ठी लिखी गई है, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हो सका है.

राजकीयकृत पब्लिक प्राथमिक स्कूल के 175 बच्चों में से 17 ही जनरल कैटेगरी के हैं, बाकी सभी बच्चे पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों के हैं. सोशल वर्कर उमेश कुमार कहते हैं कि सरकारें दलितों और महादलितों के नाम पर केवल राजनीति की रोटियां सेंकती रही हैं. इस स्कूल की हालत देख कर साफ हो जाता है कि राजनीतिबाजों को दलितों और महादलितों की असली तरक्की से कोई लेनादेना नहीं है. पटना शहर के बीचोंबीच स्थित इस सरकारी स्कूल की खस्ता हालत को देख कर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दूरदराज के इलाकों के स्कूलों की हालत कैसी होगी? दलितों और पिछड़ों की तरक्की व उन के बच्चों को तालीम दिलाने की बात कह कर अपनी पीठ थपथपाने वाली सरकार और उस के झंडाबरदारों को यह समझ में नहीं आता कि स्कूल पढ़ाई करने की जगह है न कि मुफ्त में खाना, कपड़ा, साइकिल और बाकी खैरात बांटने की. राजकीयकृत पब्लिक प्राथमिक स्कूल की 11 साल की लड़की मनीषा से जब पूछा गया कि वह स्कूल क्यों आती है तो उस ने झट से कहा कि वह पढ़लिख कर बड़ी अफसर बनने के लिए स्कूल आती है. उस से अगला सवाल पूछा गया कि क्या स्कूल में खाना, कपड़ा, साइकिल वगैरह मिलने पर मजा नहीं आता? वह तपाक से कहती है, ‘‘स्कूल में बच्चा पढ़ाई करने आता है, न कि खाना खाने. पढ़ाई का इंतजाम ठीक से होना चाहिए. हम लोगों को स्कूल में ठीक से बैठने की जगह भी नहीं मिलती है, जिस से पढ़ने में काफी दिक्कत होती है.’’

11 साल की बच्ची को यह समझ है कि स्कूल पढ़ाई की जगह है, लेकिन सरकार के मंत्रियों और अफसरों को यह बात समझ में नहीं आती है. सरकार की सोच है कि मुफ्त में दोपहर का खाना, स्कूल ड्रैस और साइकिल बांटने से बच्चों में स्कूल आने की लालसा बढ़ेगी, लेकिन 5वीं क्लास में पढ़ने वाली मनीषा की सोच है कि स्कूल में बढि़या से पढ़ाई होगी तभी बच्चे स्कूल पहुंचेंगे. वह साफतौर पर कहती है, ‘‘साइकिल, ड्रैस, दोपहर का खाना बांटना बंद कर दें. इस से यह होगा कि वही बच्चे स्कूल आएंगे जिन्हें पढ़ने में रुचि होगी.’’ छोटी सी बच्ची की इस सोच पर क्या सरकार और पढ़ाई की तरक्की का दावा करने वाले ठेकेदारों को गौर फरमाने की जरूरत नहीं होगी? ड्रौपआउट यानी बीच में ही स्कूल की पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों के आंकड़े के बारे में स्कूल की प्रिंसिपल और टीचर चुप्पी साध लेते हैं. नाम नहीं छापने का भरोसा दिलाने पर एक टीचर कहते हैं कि 60 फीसदी बच्चे 5वीं और छठी क्लास के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं. इस के पीछे की वजह बताते हुए वे कहते हैं कि परिवार की गरीबी की वजह से ज्यादातर मांबाप कहते हैं कि उन के बच्चे पढ़ाई छोड़ कर काम में लग जाएं. इस से परिवार की आमदनी में कुछ तो इजाफा हो सकेगा.

दूसरे टीचर बताते हैं कि एक दिन उन्होंने सुबह की सैर के दौरान देखा कि कंकड़बाग पंचमंदिर के पास की चाय की दुकान में उन के स्कूल का एक बच्चा काम कर रहा है. वह पिछले 1 महीने से स्कूल नहीं आ रहा था. जब उस बच्चे से स्कूल नहीं आने के बारे में पूछा तो उस का सपाट सा जवाब था कि उस के पिता ने कहा है कि स्कूल छोड़ो और कुछ कामकाज करो, नहीं तो जीना मुश्किल हो जाएगा.

शिक्षा की बदतर हालत

स्कूल में एक प्रिंसिपल समेत 12 टीचर हैं. इन सब के वेतन पर करीब 2 लाख रुपया सरकार हर महीने खर्च करती है. इस के अलावा चपरासी, बिजली बिल और स्कूल के रखरखाव आदि पर हर महीने 20 हजार रुपए खर्च होते हैं. कुल मिला कर उस स्कूल पर सालाना 25 लाख रुपए से ज्यादा खर्च करने के बाद भी शिक्षा की हालत बद से बदतर है. इतना खर्च करने के बाद भी 60 फीसदी बच्चे हर साल स्कूल छोड़ कर चले जाते हैं. दोपहर का खाना, स्कूल ड्रैस, साइकिल बांटने के बाद भी बच्चों का रुझान स्कूल जाने और पढ़ाई करने में कतई नहीं है. स्कूल के बरामदे की दीवार पर बड़े से बोर्ड पर दोपहर को मिलने वाले खाने की लिस्ट लगी हुई है. सोमवार और गुरुवार को दाल, चावल और सब्जी, मंगलवार को चावल और सब्जी, बुध और शनिवार को खिचड़ी और चोखा एवं शुक्रवार को पुलाव, छोला और सलाद बच्चों को खिलाए जाने का इश्तिहार लगा हुआ है. एक टीचर से पूछा गया कि बच्चों को दोपहर का खाना मिल रहा है, तो बताया गया कि पिछले 1 साल से खाना देना बंद है. पिछले साल पटना के ही बहादुरपुर इलाके के सरकारी स्कूल में दोपहर के खाने में मरा हुआ चूहा मिलने के बाद हंगामा मचा था, उसी के बाद से जिले के स्कूलों में मिड डे मील बंद कर दिया गया है.

ऐसी ही हालत पटना के फुलवारीशरीफ प्रखंड के मलाही पकड़ी गांव के राजकीय प्राथमिक स्कूल की भी है. बांस से बने गेट को खोल कर स्कूल में घुसते ही बच्चों का शोरशराबा सुनाई देता है. स्कूल कैंपस में नए चेहरे को देखते ही टीचर चिल्लाने लगती है, ‘‘सभी ठीक से बैठो. हल्ला नहीं करो. चलो अपनीअपनी किताबें खोलो. अनिल, तुम बाहर क्या कर रहे हो?’’ ऐसा कह कर शायद वह यही जताना चाह रही थी कि स्कूल में वह अपना काम ठीक से कर रही है. टीचर के मन में रहता है कि स्कूल के कैंपस में घुसने वाला नया चेहरा कहीं स्कूलों की जांचपड़ताल करने वाले महकमे का अफसर तो नहीं है.

गैर सामाजिक तत्त्व

जब टीचर को इस संवाददाता के बारे में पता चला तो उस के तेवर ही बदल गए. पत्रकार का नाम सुनते ही वह अकड़ गईं और बोलने लगी कि प्रिंसिपल आज छुट्टी पर हैं. वे आएंगी तो ही कुछ बात हो सकेगी. जब इस संवाददाता ने कहा कि मुझे प्रिंसिपल से नहीं, बच्चों से मिलना है और स्कूल की हालत को देखना है तो वह खामोश हो गई. स्कूल में 1 से 5वीं क्लास तक की पढ़ाई होती है और कुल 70 बच्चे हैं. रोज करीब 30-35 बच्चे स्कूल आते हैं. स्कूल में घुसते ही सभी अपनीअपनी मरजी के काम में लगे हुए नजर आते हैं. कुछ क्लास में रट्टा लगा रहे थे तो कुछ बरामदे में बैठ कर ड्राइंग बनाने में मसरूफ थे. कुछ कैंपस में धमाचौकड़ी मचा रहे थे. तीसरी क्लास में पढ़ने वाली नेहा कहती है कि उस का पढ़ने में मन लगता है, लेकिन उस के बाबूजी उसे पढ़ने के लिए कौपीकलम नहीं देते हैं.

स्कूल के बाहर की दीवार पर मास्टरों ने लिख रखा है, ‘यहां पर लट्टू नचाना नहीं है. यहां पर जुआ खेलना नहीं है’. स्कूल के कुछ शरारती बच्चों ने दोनों ही हिदायतों में से ‘नहीं’ को मिटा दिया है. इस के बाद उस का मतलब ही नजर आता है, ‘यहां पर लट्टू … नचाना है. यहां पर जुआ खेलना … है. ‘नहीं’ शब्द पर हरे रंग से पेंट कर के मिटा दिया गया है. इस से साफ है कि स्कूल दबंग और असामाजिक लोगों का अड्डा बना हुआ है. वे लोग बच्चों को बहकाने में लगे रहते हैं. जब स्कूल प्रशासन ने इस बारे में नोटिस लगाया तो उस का भी मजाक उड़ाया गया. 120 घरों वाले मलाही पकड़ी गांव में ज्यादातर मल्लाह जाति के लोग रहते हैं और कुछ घर यादवों के हैं. गांव के रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता श्याम साहनी कहते हैं कि पिछले 45 सालों से गांव में स्कूल चल रहा है. लेकिन कभी भी स्कूल की हालत ठीक नहीं रही. पहले तो टीचर कभीकभार ही आते थे पर पिछले कुछ सालों से टीचर तो रोज आने लगे हैं, पर पढ़ाई के नाम पर हल्ला ही होता है.

पढ़ाई पर भारी साइकिल

बच्चों को पढ़ाई और स्कूल के प्रति ललक पैदा करने के लिए चलाई जा रही साइकिल और स्कूल ड्रैस योजनाओं में अकसर गड़बडि़यों का खुलासा होता रहा है. बिहार के प्राइमरी और मिडिल स्कूलों के बच्चों को साइकिल और पोशाक दी जाती है, जिस को लाखों बच्चे 2-2 और 4-4 दफे गलत तरीके से ले कर सरकार को चूना लगाते रहे हैं. लाखों बच्चों ने 3-4 स्कूलों में दाखिला ले कर साइकिल और पोशाक उठा ली. इतना ही नहीं, हजारों ऐसे बच्चे भी सामने आए हैं जो पढ़ तो रहे हैं प्राइवेट स्कूल में पर साइकिल और पोशाक पाने की नीयत से उन्होंने सरकारी स्कूलों में भी दाखिला ले रखा है. साल 2013 में सेवा यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की निगाह में इस तरह की गड़बड़ी को लाया गया था और उन्होंने सभी सरकारी स्कूलों में बच्चों के दाखिले व उपस्थिति के आंकड़ों की जांच का हुक्म दिया था. जांच में हजारों स्कूलों में बच्चों के दाखिले और उपस्थिति में भारी अंतर पाया गया था. साइकिल और पोशाक पाने के खेल में शिक्षा महकमे के अफसर, स्कूल प्रिंसिपल, मास्टरों और बच्चों के अभिभावकों की मिलीभगत से घपले का बड़ा खेल खेला गया, जिस ने सरकार को करोड़ों रुपए की चपत लगाई.

सूबे के तकरीबन हर जिले में एक ही बच्चे के एक से ज्यादा स्कूलों में गलत तरीके से दाखिला लेने के फर्जीवाड़े की परत दर परत खुलने से सरकार की काफी किरकिरी हो चुकी है. शिक्षा महकमे के सूत्र बताते हैं कि करीब 3 लाख से ज्यादा बच्चों का दाखिला 2 स्कूलों में कर लिया गया है. वहीं डेढ़दो लाख बच्चों ने 3-4 स्कूलों में दाखिला ले लिया है. 2-2 और 3-3 बार साइकिल व पोशाक पाने के लालच में पढ़ाई की ओट में यह खेल खेला गया, जो स्कूलों के प्रिंसिपल और शिक्षा महकमे के कई अफसरों की मिलीभगत के बगैर मुमकिन ही नहीं था. साइकिल के लिए हर बच्चे को 2,500 रुपए दिए जाते हैं. सूबे के 71,031 प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में 1 करोड़ 95 लाख बच्चे हैं. 

बदहाली की शिकार खेतिहर जातियां

हरितक्रांति को सफल बनाने वाले जाट, नकदी फसलों की खेती करने वाले मराठा और श्वेतक्रांति को सफल बनाने वाले पटेल अपनी मेहनत से खेती को रोजगार बनाने में सफल हो गए थे. खेती की कम होती जमीन, खेती की बढ़ती लागत और पैदावार में कम होते मुनाफे ने अब इन खेतिहर जातियों को बदहाली के कगार पर ला खड़ा कर दिया है. 10 सालों में 3 करोड़ से अधिक किसानों ने खेती छोड़ दी है. आज खेती करने वाली जातियां परेशान हैं तो वहीं अनाज की कीमतें आसमान छू रही हैं. दाल और प्याज की बढ़ती कीमतों का एक कारण इन की खेती को कम रकबे में किया जाना भी है. सरकार की गलत नीतियों के चलते 200 रुपए प्रति किलो दाल बिकने लगी है. इस के बाद भी किसानों को मुनाफा नहीं मिल रहा है. यही वजह है कि खेती करने वाली जातियां बदहाली का शिकार हो रही हैं.

खेती इस देश की आजीविका का आज भी सब से बड़ा साधन है. अगड़ी और पिछड़ी जातियों की बहुत बड़ी संख्या खेती पर निर्भर है. ये जातियां गांव में रह कर खेती करती थीं. इन के पास जमीन अच्छीखासी होती थी. इन के खेतों में काम करने वाली दूसरी जातियों के लोगों के साथ भी इन के संबंध मधुर होते थे. पिछले 7-8 सालों से खेती की खराब होती हालत के चलते इन खेतिहर जातियों की परेशानियां बढ़ती जा रही हैं. इन के पास खेती के अलावा आजीविका का दूसरा साधन न होने से ये बदहाल होती जा रही हैं. यही वजह है कि ये जातियां भी अब अपने लिए आरक्षण मांगने वालों की श्रेणी में शामिल हो गई हैं. इन में गुजरात के पटेल, महाराष्ट्र के मराठा, राजस्थान, हरियाणा के जाट और गुज्जर और उत्तर प्रदेश के कुर्मी प्रमुख हैं. बड़ी संख्या में गांव में रहने वाली ठाकुर बिरादरी के लोग भी इस बदहाली का शिकार हो रहे हैं.

समाजसेवी प्रकाश कुमार कहते हैं, ‘‘अगड़ी और पिछड़ी बिरादरी के पास जो जमीनें थीं वे जमींदारी उन्मूलन के नाम पर सरकार ने बहुत पहले ले ली थीं. सरकारी योजनाओं में इन जातियों को संपन्न और अगड़ा मान कर दरकिनार कर दिया गया. दिनोंदिन इन जातियों के लोगों की परेशानियां बढ़ने लगीं. जब तक खेती से मुनाफा हो रहा था, इन जातियों के लोगों को कम परेशानी हो रही थी. अब जब खेती से मुनाफा घटने लगा, खेती की जमीन कम होने लगी, तब से खेतिहर जातियों की स्थिति खराब हो गई. खेती का रकबा घटने से ये लोग वैज्ञानिक ढंग से खेती भी नहीं कर पा रहे हैं. खेती में मजदूरी बढ़ने और सिंचाई व जुताई का खर्च बढ़ने से खेती का लागत मूल्य बढ़ता जा रहा है. खेती से होने वाली पैदावार से उत्पादन लागत निकालनी मुश्किल हो गई है.’’

3 करोड़ लोगों ने छोड़ दी खेती

गुजरात को देश का सब से संपन्न प्रदेश माना जाता है. पटेल जाति इस प्रदेश की सब से संपन्न जाति मानी जाती है. देश की तरक्की में इस जाति के लोगों का बड़ा हाथ है. इस जाति के बहुत सारे लोग विदेशों में अच्छा काम कर रहे हैं. गुजरात में रहने वाले पटेलों ने श्वेतक्रांति को सफल बनाने में सब से बड़ा योगदान दिया, जिस की वजह से देश में दूध की कमी को पूरा किया जा सका. देश में दूध की बहुत कमी थी. ऐसे में श्वेतक्रांति की शुरुआत गुजरात से हुई. गुजरात की खेतिहर पटेल जाति के लोगों ने दूध का उत्पादन बढ़ाने के लिए गाय और भैंस को पालना शुरू किया. उस से प्राप्त होने वाले दूध को सहकारी समितियों को दिया. इस से न केवल किसानों को मुनाफा हुआ बल्कि गुजरात प्रदेश में भी संपन्नता आई. पूरे देश के अलगअलग क्षेत्रों में श्वेतक्रांति की सफलता के लिए गुजरात मौडल का प्रयोग किया गया.

गुजरात में जब पटेल बिरादरी के लोगों ने युवा नेता हार्दिक पटेल की अगुआई में आरक्षण की मांग के लिए प्रदर्शन किया तो देश का ध्यान इस ओर गया कि अगड़ी समझी जाने वाली पटेल जाति में भी गरीब और मजबूर लोग हैं. बात केवल गुजरात की पटेल बिरादरी की नहीं है. महाराष्ट्र के रहने वाले मराठा और राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के रहने वाले जाट बिरादरी के लोग भी अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं. पटेल की तरह जाट और मराठा भी अगड़ी बिरादरी में गिने जाते थे. पटेल बिरादरी ने अगर श्वेतक्रांति को सफल बनाने में मदद की तो मराठा बिरादरी के लोगों ने कपास, गन्ना और प्याज जैसी नकदी फसलों की पैदावार का विकसित मौडल देश के सामने रखा. कपास, गन्ना और प्याज इस देश की नकदी फसलों में शामिल हैं. इन की खेती से न केवल किसानों को लाभ हुआ बल्कि देश ने भी कृषि मामलों में तरक्की की. नकदी फसलों की खेती में महाराष्ट्र के किसानों ने बहुत मेहनत की. इस के बाद पूरे देश में किसानों ने नकदी फसलों की खेती शुरू कर दी.

इसी तरह से जाट बिरादरी ने देश की जरूरत के लिए हरितक्रांति को सफल बनाया. पहले हमारा देश गेहूं और धान के लिए दूसरे देशों पर आश्रित था. अब ऐसा नहीं है. हरितक्रांति की सफलता का बड़ा श्रेय पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के किसानों को जाता है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश के नाम से अलग प्रदेश तक बनाने की मांग ने जोर पकड़ लिया है. इस मांग में जाट बिरादरी का बड़ा योगदान है. पटेल, जाट और मराठा तीनों ही जातियां खेती पर अपना जीवनयापन करने वाली जातियां हैं. बहुत ज्यादा पढ़ाईलिखाई पर इन का ध्यान नहीं रहा. पिछले 10 सालों में खेती में बदलाव आया. खेती में लागत अधिक लगने लगी, मुनाफा कम हो गया. कभी ओले पड़ने से तो कभी बरसात तो कभी सूखा पड़ने के कारण खेती को नुकसान होने लगा. इस से खेती पर जीवन गुजरबसर करने वाली जातियों में गरीबी आने लगी. खेती का रकबा घटने लगा. आंकड़े बताते हैं कि साल 2004 से ले कर 2012 के बीच 3 करोड़ से अधिक लोगों ने खेती के पेशे को छोड़ दिया. वे मजदूर बनना बेहतर समझने लगे हैं.

अरहर की घटती बोआई

आज बाजार में अरहर की दाल की कीमत 200 रुपए प्रति किलो है. रसोई में प्रयोग होने वाली चीजों में सब से अधिक भाव दाल का ही बढ़ा है. इस की सब से बड़ी वजह है कि अब किसानों ने अरहर की बोआई कम कर दी है. अनाज में अरहर ऐसी फसल होती है जिस की पैदावार में 9 माह का समय लगता है. पहले लोगों के पास जमीनें ज्यादा होती थीं तो कुछ खेत अरहर की खेती के लिए छोड़ दिए जाते थे. जिन जगहों पर सिंचाई की सुविधा कम होती थी, जहां पर गेहूं और धान जैसी फसलें नहीं होती थीं, अरहर की खेती वहीं की जाती थी. खेत के लगातार घटने से किसान अपना खेत 9 माह के समय के लिए फंसाना नहीं चाहता है. दूसरे, जिन जगहों पर सिंचाई के साधन नहीं होते थे, किसान कम सिंचाई वाली फसलों की खेती करता था. अब वहां पर सिंचाई के साधन होने लगे हैं जिस से किसान अरहर की खेती बंद कर दूसरी फसलों की खेती करने लगा है. अरहर की पैदावार में बड़ी बाधा नीलगाय भी है. अरहर के खेत को यह बरबाद कर देती है. ऐसे में किसानों ने अरहर की खेती को कम कर दिया है.

अरहर दाल में कार्बोहाइड्रेट, आयरन, कैल्शियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है. अरहर की दाल की सब से बड़ी खासीयत यह है कि यह खाने के बाद पाचन में आसान होती है. इस वजह से रोगियों को देने में भी इस का खूब प्रयोग होता है. पहले गांव में दाल का प्रयोग खाने में खूब होता था, जिस से कम खाने के बाद भी लोगों में पोषण की कमी नहीं होती थी. अब खाना खाने के बाद भी शरीर में पोषण की कमी होने लगी है, खासकर बच्चों पर इस का ज्यादा प्रभाव पड़ रहा है. शरीर में प्रोटीन की कमी से दूसरे तमाम रोग जन्म लेने लगे हैं. पूर्वी उत्तर भारत में दाल की मुख्य फसलों में अरहर आती है. उत्तर प्रदेश में इस की सब से अधिक खेती की जाती है. करीब 30 लाख एकड़ खेत में इस की खेती होती है. अरहर के लिए दोमट मिट्टी वाले ऊंचे खेत उपयोगी होते हैं, जहां बरसात के पानी का जमाव न होता हो. अरहर की बोआई बरसात के समय की जाती है. यह फसल मार्चअप्रैल में तैयार होती है. किसान अरहर के साथ मिक्स क्रौप की खेती करता है. अरहर के साथ कोदों, ज्वार, बाजरा, तिल और मूंगफली की खेती की जाती है. एक ही खेत में एकसाथ 2 फसलें लेने से किसान का मुनाफा बढ़ जाता है. अब किसानों ने अरहर के साथ दूसरी फसलों की बोआई कम कर दी है. वे अपने खेतों में केला, आलू, टमाटर और दूसरी सब्जियों की कैश क्रौप तैयार करने लगे हैं जिस में कम समय में ही अरहर से ज्यादा मुनाफा हो रहा है.

किस काम का समर्थन मूल्य

अरहर के साथ बोने वाली दूसरी फसलें दिसंबर माह में तैयार हो जाती हैं. इस के बाद अरहर तेजी से बढ़ती है. अप्रैल में अरहर तैयार हो जाती है तो इस को पीट कर पौधे से अलग कर लिया जाता है. अरहर से अरहर की दाल बनाने का काम किया जाता है. देश में अरहर की दाल की पैदावार करीब 180 से 200 लाख टन तक होती थी. पिछले कुछ सालों से यह पैदावार घट रही है. पिछले साल देश में 170 लाख टन ही अरहर का उत्पादन हुआ. जो मांग से करीब 40 से 50 लाख टन कम है. इस की वजह से अरहर की दाल का भाव बढ़ रहा है. केंद्रीय खाद्यमंत्री रामविलास पासवान और वित्त मंत्री अरुण जेटली इस बात को समझते हैं. दाल की बढ़ती कीमत सरकार के लिए मुसीबत का कारण न बने, इस के लिए सरकार ने करीब 5 हजार टन अरहर की दाल विदेश से मंगाने की तैयारी कर ली है.

यही नहीं, सरकार ने दाल की पैदावार को बढ़ाने के लिए किसानों के लिए दाल के समर्थन मूल्य में भी 275 रुपए प्रति कुंतल की बढ़ोत्तरी कर दी है. अब किसानों को सरकार 4,625 रुपए प्रति कुंतल देगी. सरकार ने अरहर की दाल की कीमतों को कम करने का प्रयास शुरू कर दिया है. अरहर दाल की जमाखोरी कर मुनाफा कमाने की राह देख रहे आढ़तियों पर सरकार शिकंजा कसने की तैयारी कर रही है. वहीं, बाजार भाव के जानकार और कुछ अनाज का कारोबार करने वालों का मानना है कि अरहर की दाल की देश में खपत बढ़ रही है. अरहर की पैदावार पहले से कम हो गई है जिस की वजह से इस की कीमतों का कम होना आसान नहीं है. सरकार के प्रयासों के बाद भी अरहर की दाल की कीमतें पहले की तरह कम नहीं होंगी. 

भारत भूमि युगे युगे

पौराणिक गालियां

बिहार चुनाव में नेता एकदूसरे को बड़ी दिलचस्प गालियां बक रहे हैं. लालू यादव ने अमित शाह को नरभक्षी कहा तो जवाबी हमले में नरेंद्र मोदी ने उन्हें शैतान करार दे दिया. उम्मीद है आखिरी चरण आतेआते संस्कृतनुमा इन गालियों का प्रयोग और बढ़ेगा. वैसे, गालियां धर्मग्रंथों से भी ली जा सकती हैं जैसे नीच, पतित, कामी, लंपट, दुष्ट, राक्षस वगैरहवगैरह. इन गालियों से भाषाई संपन्नता ही प्रदर्शित होती है जिन पर कानून भी कुछ ज्यादा नहीं कर पाता. इंडियन पीनल कोड में गाली की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है. अदालतें भी प्रचलित गालियों को ही अपमानजनक मानती हैं. इसलिए अगले चुनावों के मद्देनजर सभी दलों को ऐसे प्रकांड विद्वानों की सेवाएं लेनी चाहिए जो पौराणिक ग्रंथों से अभिजात्य किस्म की गालियां निकाल कर दे सकें.

जर्नलिस्ट सीएम

कुछकुछ चीजें जिन्हें ज्ञान कहा जा सकता है, उम्र के साथ ही समझ आती हैं. मीडिया से मधुर संबंध इन में से एक है. यह ज्ञान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को मिला तो वे बीते दिनों लखनऊ में एक अखबार के दफ्तर में बतौर अतिथि संपादक जा पहुंचे और अखबारी दुनिया को नजदीकी और बारीकी से देखा सबकुछ समझ लेने की एक्ंिटग करने के बाद अखिलेश ने एक ऐसी बात कही जो आमतौर पर बुजुर्ग करते हैं कि मुखपृष्ठ पर पे्ररक खबरें होनी चाहिए. बात सच है कि जमाना और माहौल खराब है. आम लोग डर, निराशा और अवसाद से घिरे हैं. ऐसे में यह अखबारों की जिम्मेदारी है कि वे पहले पेज पर डेल कार्नेगी, स्वेट मार्डेन और उन के देसी संस्करण शिव खेड़ा को छाप कर लोगों को नैतिकता का नशा देते रहें.

बांके बोल

अब कम ही लोग बचे हैं जो धर्म की परवा किए बगैर सच बोलते हुए इस के नुकसान गिना पाएं. अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के कुलपति रिटायर्ड लैफ्टिनैंट जनरल जमीरुद्दीन शाह ने विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में बोलते हुए मुसलिम समाज की दुर्दशा की जो वजहें बताईं वे गलत नहीं थीं. इन से मुसलमानों को सबक लेना चाहिए. बकौल जमीरुद्दीन-मुसलमान जुम्मे की नमाज से वक्त जाया करते हैं, रमजान के महीने में काम नहीं करते और औरतों को गुलाम सा बना कर रखते हैं.

प्रतीकात्मक रूप में कही इन बातों की व्याख्या करते हुए उन का यह कहना भी एक तरह का दर्शन ही है कि जो भी सभ्यता महिलाओं को गुलाम बनाती है वह आधी आबादी को अनुत्पादक बना देती है. उम्मीद कम है कि लोग उन की बातों पर कान देंगे, जो ये बता गईं कि कैसेकैसे धर्म में पड़ कर लोग वक्त और पैसा बरबाद करते हैं.

वंश पर बाबा

बिहार चुनाव में भाजपा के पास सबकुछ है. नहीं है तो बस यादव जाति का कोई बड़ा नेता जिसे पेश कर वह लालू यादव का जादू तोड़ पाए. गोमांस पर विवादित बयान लालू यादव ने दिया तो योग गुरु बाबा रामदेव, जो इन दिनों पूरी तरह अपने कारोबार में व्यस्त रहते हैं, को गुस्सा आ गया और इसी गुस्से में उन्होंने डीएनए के बजाय  जीन्स (वंश) की बात यह कहते कर डाली कि लालू यादव कृष्ण के नहीं कंस के वंशज हैं. रामदेव चूंकि खुद यादव हैं इसलिए बेहतर जानते हैं कि आखिरकार कंस और कृष्ण के पूर्वज भी एक ही थे. भागवत कथा में इस बात का विस्तृत उल्लेख है कि क्यों विष्णु को कृष्ण के रूप में अवतरित होना पड़ा था. द्वापर युग में जो यदुवंशी उत्पात करते रहते थे वे कंस गुट के थे इसलिए कृष्ण ने अपना नया गुट बना लिया था. वंश की बातभर कर देने से रामदेव ने भाजपा का साथ देने के धर्म को निभा दिया और फिर हरिद्वार अपने कारोबार का हिसाबकिताब करने चले गए. 

जगाएं बच्चों में पढ़ने की प्रवृत्ति

बाल्यावस्था से बच्चों में पढ़ने के प्रति प्रवृत्ति, रुचि जगाना लाभकारी होता है. पढ़ने से जहां एक ओर बच्चों का मानसिक विकास होता है वहीं दूसरी ओर समय का भी सदुपयोग होता है, अच्छी आदतों का निर्माण व विकास होता है. बच्चों में पढ़ने के प्रति प्यार सकारात्मक अनुभवों से ही उत्पन्न किया जा सकता है.  वे मांबाप या अध्यापक बच्चों में पढ़ने के प्रति प्यार जगा सकते हैं जो धैर्यपूर्वक घंटों, दिनों बच्चों का एकएक शब्द सुनते हुए उन्हें आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर सकें जब तक कि बच्चे पढ़ने में आश्वस्त व आत्मविश्वासी न हो जाएं. पढ़ने में निपुण होने पर बच्चों के मुख पर जो उल्लास झलकता है वह देखने योग्य होता है. बच्चों को इस उल्लास की स्थिति में लाने व उन्हें शौकीन पाठक बनाने के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें शुरू से ही ऐसे सकारात्मक अनुभव प्रदान किए जाएं जिस से वे प्रोत्साहित हो स्वयं ही पढ़ने के लिए प्रेरित हों.

बच्चों में पढ़ने की प्रवृत्ति जगाने में सब से सहायक बात होती है कि उन्हें  उन की क्षमता, स्तर व उन की पसंद की किताबें पढ़ने के लिए दी जाएं जिस से उन की पढ़ने में रुचि बनी रहे और वे बोर हो कर पढ़ना न छोड़ दें. जब बच्चों को उन की क्षमता से बढ़ कर किताबें पढ़ने के लिए दी जाती हैं तो वे उन्हें ठीक से न पढ़ पाने पर हतोत्साहित हो जाते हैं, डर जाते हैं और फिर पढ़ने से कतराने लगते हैं. इसलिए उन्हें प्रेरित करने के लिए ऐसी पुस्तकें दी जानी चाहिए जिन्हें वे पढ़ सकें व आसानी से समझ सकें.

बच्चों को करें प्रोत्साहित

बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें जब भी संभव हो जोरजोर से पढ़ कर सुनाना चाहिए. सुनसुन कर बच्चे उसे पढ़ने का प्रयास करने लगते हैं. बच्चों की किताबें 2 प्रकार की होती हैं– एक तो वे जो बड़ों द्वारा जोरजोर से पढ़ कर सुनने वाली होती हैं और दूसरी वे जिन्हें पढ़ना सीखने वाले बच्चे खुद पढ़ सकें. ये दोनों ही प्रकार की पुस्तकें बच्चों के लिए लाभकारी होती हैं. साक्षर होने के लिए ये दोनों ही अनुभव उपयोगी होते हैं. इस बात की चिंता जरूरी नहीं है कि बच्चा कब पढ़ना शुरू करता है, वरन इस बात की चिंता आवश्यक है कि बच्चा पढ़ने के प्रति रुचि व्यक्त करे. बच्चे में पढ़ने के प्रति रुचि जाग्रत हो जाए और जब वह उंगली बाएं से दाएं हर अक्षर व फिर हर शब्द के साथ आगे बढ़ाने लगे तब समझना चाहिए कि वह अक्षर और शब्दों को पहचानने लगा है. सब से पहले छोटे बच्चों को तसवीरों से अवगत कराना चाहिए. जब वे तसवीरों को पहचानने लगें तब उन्हें उन शब्दों के नाम, उन के उच्चारण से परिचित कराना चाहिए. बच्चों को सदा आश्वस्त करना चाहिए कि जब भी वे पढ़ने में अटकेंगे आप उन की सहायता करेंगे. बच्चों को डांटफटकार कर भयभीत नहीं करना चाहिए.

3 सैकंड का नियम बना लीजिए. जब भी बच्चा अटके उसे वह शब्द बताने में 3 सैकंड से ज्यादा समय न लें. अधिक समय लेने से कहानी की रोचकता में बाधा आ जाती है और साथ ही बच्चा हतोत्साहित हो कर उस में अपनी रुचि खो बैठता है. बच्चे के पास 3 सैकंड का समय होता है स्वयं को ठीक करने का. पर यदि वह उस समय में स्वयं को ठीक नहीं कर पाता है, तो जहां आप के बताने से कहानी का तारतम्य बना रहता है वहीं बच्चों के दिल से शब्द न जानने का भय निकल कर यह आश्वस्तता पैदा होती है कि भूल करना स्वाभाविक है, यह भी सीखने का एक सामान्य भाग है, तरीका है. बच्चा यदि बारबार एक ही किताब पढ़ना चाहता है तो उसे इस के लिए हतोत्साहित न करें बल्कि ऐसा करने के लिए उसे प्रोत्साहित करें. एक ही पुस्तक को बारबार पढ़ कर अच्छी तरह पढ़ने पर बच्चा और भी उत्साह से पढ़ेगा.

कुछ बच्चे पढ़ते हुए हिलतेडुलते रहते हैं. इसी तरह वे पढ़ने में अपना ध्यान केंद्रित करते हैं. अत: ऐसे बच्चों को पढ़ते हुए हिलनेडुलने से रोकिए मत. शुरूशुरू में बच्चों को शब्दों को उच्चारित कर के पढ़ने के लिए मत कहिए. जबतक उन में शब्द उच्चारित करने की क्षमता नहीं आ जाती तबतक उन्हें शब्द उच्चारित करने के लिए मजबूर करने से उन की पढ़ने से रुचि हट जाती है क्योंकि वे उच्चारित कर शब्द पढ़ नहीं पाते और हतोत्साहित हो जाते हैं. जब भी बच्चे किन्हीं प्रतीकों, संकेतों, सूत्रों, सुरागों का उपयोग करें तो उन्हें शाबाशी दें. प्रतीकों, तसवीरों द्वारा अनुमान लगा कर या रटे हुए शब्दों को याद करकर के पढ़ना भी पढ़ने का, शिक्षा प्राप्त करने का एक ढंग है. बच्चों को उस की अपनी भाषा में पुस्तकें पढ़ने दीजिए जो वे रोजाना बोलते हैं. यह आदत बाद में भी दूसरी भाषा में पुस्तकें पढ़ने में सहायक होगी क्योंकि आदत और क्षमता हस्तांतरित व स्थानांतरित होती हैं. बच्चों को बाल्यावस्था से शब्द शक्ति से परिचित कराएं ताकि उन के भविष्य की सर्वोच्च प्रगति का आधार बन सके.

ऐसे जगाएं रुचि

बच्चों को उन की रुचि व उम्र के अनुसार जानवरों की कहानियां, एडवैंचर, रहस्य, लोककथाओं की किताबें पढ़ने के लिए दें. ऐसा करने से बच्चा धीरेधीरे किताब पढ़ना भी सीख जाएगा. बच्चा जो भी किताब पढ़े उस से उस किताब के बारे में पूछें, उस के चरित्रों के बारे में पूछें, जानें कि उस ने किताब से क्या सीखा. इस से बच्चे की पढ़ने में रुचि और जगेगी.बच्चों में पढ़ने के प्रति रुचि जगाने के लिए जरूरी है आप खुद उस के समक्ष किताबें पढ़ें. न कि टीवी, मोबाइल व लैपटौप में व्यस्त रहें. उस के जन्मदिन पर उसे और उस के दोस्तों को किताबों का उपहार दीजिए. यह एक सतत प्रक्रिया है जिस का परिणाम धीरेधीरे दिखाई देता है.    

बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें जब भी संभव हो जोरजोर से पढ़ कर सुनाना चाहिए. सुनसुन कर बच्चे उसे पढ़ने का प्रयास करने लगते हैं.

दुनिया के बच्चे ऐसे सीखते हैं भाषा

जापान के स्कूली बच्चों को 9वीं कक्षा तक हर साल नए अक्षर सिखाए जाते हैं. मूल जापानी शब्द लिखना सीखने के लिए उन्हें 2100 अक्षर सीखने पड़ते हैं. इस के लिए वे हर रोज अभ्यास करते हैं ताकि भूलें नहीं.

जरमनी में सुन कर लिखने की परंपरा कई स्कूलों में शुरू हुई थी पर बाद में यह बहस का मुद्दा बन गई. पहली कक्षा में अक्षरों के साथ एक तसवीर होती है, जो उस अक्षर का उच्चारण बताती है, ठीक अंगरेजी के ए फोर ऐप्पल जैसा. जरमन में एफ तो उच्चारण में एफ होता है लेकिन वी का उच्चारण फ जैसा और जे का य जैसा. इस कारण शब्दों का उच्चारण बदल जाता है.

चीन में 3 साल के बच्चे पहली बार अक्षर देखते हैं और 6 साल की उम्र से लिखना शुरू करते हैं. जब वे 5वीं में जाते हैं तो उन्हें 10 हजार अक्षर सीखने होते हैं. इस के लिए बच्चों को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है

मिस्र के बच्चे जब लिखना सीखते हैं तो इस के लिए उन्हें नई भाषा सीखनी पड़ती है क्योंकि इलाकों में बोली जाने वाली बोली मानक अरबी से बहुत अलग है. सरकारी स्कूलों में हर कक्षा में करीब 80 बच्चे होते हैं, इसलिए हर बच्चा उतने अच्छे से सीख नहीं पाता. कुछ बच्चे तो अच्छे से लिखना और पढ़ना कभी नहीं सीख पाते.

भारत की राष्ट्रीय भाषा भले ही हिंदी हो लेकिन हर राज्य की अपनी अलग भाषा है और अलग लिपि भी. इसलिए पहली कक्षा में बच्चे को हिंदी, अंगरेजी और राज्य की भाषा सिखाईर् जाती है. यह जरूरी नहीं कि बच्चे की अपनी मातृभाषा भी इन तीनों में से एक हो. भारत में 22 आधिकारिक भाषाएं हैं. 

 सर्बियाई भाषा किरील लिपि में लिखी जा सकती है और लैटिन में भी. बच्चों को दोनों ही सीखनी पड़ती हैं. पहली कक्षा में बच्चे किरील लिपि सीखते हैं और दूसरी कक्षा में लैटिन. कुछ समय बाद बच्चे खुद तय करते हैं कि वे कौन सी लिपि में लिखना चाहते हैं.

में पहली कक्षा से नहीं बल्कि शून्य से स्कूल शुरू होता है यानी एक तरह का किंडरगार्टन. इस क्लास में जाना बच्चों के लिए अनिवार्य है. यहां बच्चों को खेलखेल में अक्षरों की पहचान कराई जाती है.

हमारी बेडि़यां

हमारी एक परिचिता प्रतिवर्ष सावन माह के सभी सोमवार को व्रत रखती हैं, जिस में वे केवल फलाहार करती हैं. इस वर्ष उन्होंने अपने पति को जबरदस्ती व्रत रखवाया. तीसरे सोमवार को उन के पति का ब्लडप्रैशर एकदम लो हो गया और वे औफिस में ही चक्कर खा कर गिर पड़े. आननफानन उन्हें अस्पताल में भरती कराना पड़ा. डाक्टरों के अनुसार, लंबे समय तक भूखे रहने के कारण उन का बीपी लो हो गया, जिस के कारण उन की जान भी जा सकती थी. एक सप्ताह तक अस्पताल में रहने के बाद वे घर आ सके.

प्रतिभा अग्निहोत्री, उज्जैन (म.प्र.)

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हमारे एक साथी हैं जो वन विभाग में नौकरी करने के बाद रिटायर हो कर गांव में अपने परिवार के साथ रहते हैं. परिवार में उन की बूढ़ी मां भी हैं. वे काफी बुजुर्ग होने के कारण अब चलनेफिरने से मुहताज हैं. उन को गांव के ही एक पंडित ने बताया कि आप गाय को रोज एक रोटी दो, गाय को खिलाने से आप के सारे पाप कट जाएंगे और इस योनि से आप को मुक्ति मिल जाएगी. पंडित की यह बात उन के दिल में घर कर गई और प्रतिदिन वे एक रोटी गाय को खिलाने लगीं. एक दिन मेरे मित्र ने कहा, ‘‘मां, इन सब झंझटों में न पड़ो, जानवर का क्या भरोसा, किसी दिन वह हूंफ देगी तो आप गिर पड़ोगी, हाथपैर टूट जाएंगे,’’ लेकिन उन पर असर नहीं पड़ा. एक दिन वही गाय उन के हाथ से रोटी लेने के लिए दरवाजे पर ऐसी चढ़ी कि वे उस के धक्के से गिर पड़ीं और हाथपैर की हड्डियां टूट गईं. अब लाचार हो कर बिस्तर पर पड़ी रहती हैं, अपने हाथ से खाना खाने से भी मजबूर हैं. अंधविश्वास पता नहीं कितने लोगों को सताएगा?

कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

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मेरे छोटे भाई की बस अड्डे के समीप कन्फैक्शनरी की दुकान है. वह साधुसंतों की खूब सेवा करता है. एक दिन जब मेरा छोटा भाई किसी शादी को अटैंड करने गया हुआ था, तब दुकान पर मेरे पास एक साधु आया. उस ने 1 रुपया मुझे देते हुए 5 रुपए वाली सिगरेट मांगी. मैं ने उस से 4 रुपए और मांगे, वह आगबबूला हो कर मुझ से कहने लगा कि यदि उसे गुस्सा आ गया तो वह यह सारा बिजनैस चौपट कर देगा और उस के एक मंत्र से मैं भी रहस्यमय बीमारियों की गिरफ्त में आ जाऊंगा. फिर उस साधु ने लोगों की भीड़ इकट्ठी कर ली और मुझ पर तरहतरह के लांछन लगाता रहा. धर्मभीरु भीड़ की नजर में मैं गुनाहगार था, जबकि मुफ्तखोर साधु एक सज्जन.

प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर (हि.प्र.)

बच्चों के मुख से

मेरी नातिन रिशिता 6 वर्ष की थी. वह कक्षा 1 में पढ़ती थी. उस की टीचर ने उसे सिखाया था कि ‘पैट एनिमल्स ऐंड प्लांट्स आर अवर फ्रैंडस.’ परीक्षा में पूछा गया, ‘वैजिटेबल्स आर अवर फ्रैंड्स’? सही या गलत.

रिशिता ने जवाब दिया : गलत.

जब मम्मी को उस ने बताया तो मम्मी ने कहा, ‘‘बेटा, यह तो सही था, आप ने गलत क्यों लिखा.’’ इस पर रिशिता ने जवाब दिया कि वैजिटेबल्स तो हम खाते हैं. यदि ये सही हैं तो क्या हम अपने फ्रैंड को खाएंगे?’’

उस की यह बात सुन कर उस की मम्मी उसे देखती ही रह गईं.

मीना गर्ग, आनंद (गुज.)

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3 साल की पोती को नहला कर जैसे ही मैं फ्रौक पहनाने लगी, वह रोतीरोती चीख उठी, ‘‘ममाममा, मेरा पेट क्रैक हो गया है. अब उस से पानी बहने लगेगा और आप मुझे बाहर फेंक दोगी.’’ असल में एक दिन पहले प्लास्टिक की बालटी में क्रैक हो गया था और उस का पानी बह रहा था. सो, उसे बाहर फेंक दिया गया था. रोने की आवाज सुन कर मेरी बहू भाग कर बाहर आई, पूछा, ‘‘बेबी, तुम्हारा पेट कहां से क्रैक हुआ है?’’ वह तुरंत झुक कर अपना पेट दिखाने लगी. नहाने के बाद पेट पर बड़ा सा बाल चिपक गया था. उस बाल को बच्ची पेट में क्रैक होना समझ बैठी. मैं ने तुरंत उस के पेट से बाल हटा दिया. वह हैरान हो कर हंस पड़ी. यह बाल उस के सिर के लंबे बालों का ही था.

– कैलाश भदोरिया, गाजियाबाद (उ.प्र.)

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मेरे किचनगार्डन में बहुत सारी तोरई लगी हैं. एक दिन मैं अपने माली से उन्हें तुड़वाना भूल गई तो मैं अपने पति से बोली, ‘‘अरे, माली चला गया और मैं तोरई तुड़वाना तो भूल ही गई. अब अगली बार तक तो बहुत मोटी हो जाएंगी.’’ मेरे इतना कहते ही पास बैठी 4 वर्षीया बेटी बोली, ‘‘अरे, तो उन्हें डायटिंग करने को बोल दो.’’ उस के इतना कहते ही हम सब हंस पड़े.

– प्रतिभा अग्निहोत्री, उज्जैन (म.प्र.)

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मेरी सहेली अपने 6 वर्षीय बेटे को पढ़ा रही थी कि 1 अंक से पहले जीरो आता है. दूसरे दिन जब वह परीक्षा देने स्कूल जाने लगा तो उसे समझाया, सब अच्छे से करना, नहीं तो टीचर तुम्हें जीरो दे देगी. बच्चे ने भोलेपन से कहा, ‘‘आप ही तो कल कह रही थीं कि जीरो एक से पहले आता है. तो अच्छा ही है न टीचर जीरो दे दे.’’ उस की बात  सुन कर सब हंसने लगे.    

– सिम्मी बवेजा, सूरत (महा.)

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