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कवि सम्मेलन और हंसमुखजी

इस बार कई वर्षों बाद जब मैं कानपुर गया तो वहां अपने एक पुराने मित्र घीसूराम ‘हंसमुख’ से मिलने का लोभ संवरण न कर सका. मैं आज से लगभग 10 वर्ष पूर्व जब कानपुर में एक फर्म में नौकरी करता था उस समय हंसमुखजी एक इंटर कालेज में साधारण अध्यापक थे.यद्यपि उन के पत्रों से पता तो यही लगता था कि वे अब भी उसी कालेज में मास्टरी कर रहे हैं किंतु जैसा उन्होंने सूचित किया था तथा कानपुर आने पर मुझे अपने अन्य मित्रों से भी पता लगा कि कविनगर कालोनी में उन्होंने अपनी एक शानदार कोठी बनवा ली है और उन का बैंक बैलेंस भी कुछ वर्षों में 99 लाख रुपए तक पहुंच जाएगा.

इन सूचनाओं पर मुझे सहसा विश्वास नहीं हुआ क्योंकि 10 वर्ष पहले तो हंसमुखजी के पास पैरों में पहनने के लिए चप्पलें तक न थीं. वे अकसर नंगे पांव ही, पैदल चल कर, कालेज जाया करते थे. तन ढकने के लिए उन के पास कुछ मैलेकुचैले, फटे कपड़े थे, जिन में जगहजगह सिलाई की हुई थी. अब उन के रंगढंग इतने कैसे बदल गए? खैर, मिलने से पहले जब हंसमुखजी की विशेषताओं पर विचार करने के लिए मैं ने अपने दिमाग पर विशेष जोर डाला तो मुझे स्मरण हो आया कि कालेज में निम्न कक्षाओं को पढ़ाने के अतिरिक्त हंसमुखजी हास्य रस में कुछ कविताएं भी लिखा करते थे और उन्हें वे अकसर कालेज के साथी अध्यापकों के मध्य सुनाया करते थे जिन्हें सुन कर उन के साथी बहुत फूहड़ सी हंसी हंस देते थे. दरअसल, हंसमुखजी का हास्य अकसर चुटकुलों का हास्य होता था.

कभीकभी वे किसी शब्द को धुन कर हास्य की रुई धुनते थे या कभी किसी चित्रपट के गीत की प्रथम पंक्ति को अपनी 4 पंक्तियों में अंतिम पंक्ति का स्थान दे कर अपने साथियों का मनोरंजन किया करते थे.  हंसमुखजी से मेरी मुलाकात मेरे एक पंसारी मित्र ने कराई थी. उस मुलाकात के बाद तो मैं हंसमुखजी से अनेक बार मिला, अनेक बार अपनी कविताएं उन्हें सुनाईं और उन के मुखारविंद से अनेक बार चुटकुलों को हास्य कविता की पंक्तियों के रूप में सुना. एक बात तो कहना मैं भूल ही गया कि हंसमुखजी केवल हास्य कविताएं ही नहीं पढ़ते थे, बल्कि बीचबीच में वे गद्य में भी कोई चुटकुला या सूक्ति सुना कर लोगों के आनंद में वृद्धि करते रहते थे. मैं ने तो यहां तक अनुभव किया था कि हंसमुखजी का गद्य उन की कविताओं की अपेक्षा लोगों को अधिक प्रभावित करता था और एकाध बार तो मैं ने उन से गद्य में ही बोलने व सुनाने के लिए आग्रह किया. किंतु इस से जब मुझे यह अनुभव होने लगा कि मेरे इस परामर्श के लिए हंसमुखजी मुझ से हमेशा के लिए मित्रता के संबंध तोड़ लेंगे तो मैं ने उन्हें सहर्ष कवि रूप में ही स्वीकार कर लिया था.

और अब जब लगभग 10 वर्ष बाद कानपुर गया तो अपने उस पुराने कवि मित्र को देखे बिना कैसे वापस आ सकता था? मैं ने एक दिन सुबह उठते ही होटल में नित्यकर्म से निवृत्त हो कर कपड़े पहने और अपने कमरे का ताला लगा कर कविनगर कालोनी की ओर चल पड़ा. मार्ग में रिकशे वाले की कछुआ गति देख कर मुझे कभीकभी बहुत कोफ्त होती कि न जाने कैसा रिकशा वाला है, जो मेरे मन में उठते हुए उफान को भी नहीं समझ पा रहा है और ‘नौ दिन चले, अढ़ाई कोस’ वाली कहावत चरितार्थ कर रहा है, किंतु मजबूरी थी. और मैं कुछ देर लगने के बाद ही सही, पता लगातेलगाते आखिर हंसमुखजी की कोठी पर पहुंच ही गया.

पैसे दे कर मैं ने रिकशे वाले को तो विदा किया और कोठी के द्वार पर खड़े हो कर कई बार अपनी निगाहें ऊंची उठा कर हंसमुखजी की 3 मंजिली कोठी को नजर भर कर निहारा. कई बार दरवाजे पर लगी उन की नेमप्लेट पढ़ी, फिर साहस कर के कोठी के दरवाजे पर लगी घंटी का बटन दबा दिया. एक लड़का ऊपर से झांका और मेरा नाम पूछ कर वापस चला गया. थोड़ी देर बाद फिर वही लड़का नीचे आया और मुझे नीचे की मंजिल में बने ड्राइंगरूम में बैठा कर बोला, ‘‘आप बैठिए, बाबूजी अभी नीचे आ रहे हैं.’’

मैं आराम से उन के ड्राइंगरूम में रखे एक नए चमकीले सोफे पर बैठ गया. ड्राइंगरूम में जब मैं ने ऊपर की ओर अपनी नजरें दौड़ाईं तो देखा कि हिंदी के अनेक महान कवियों के चित्रों के साथसाथ कवि सम्मेलनों में खींचे गए हंसमुखजी के भी अनेक चित्र करीने से लगे हुए हैं. मैं कक्ष की कुछ और वस्तुओं पर सुधबुध खोए कुछ देर दृष्टिपात करता, किंतु तभी सहसा हंसमुखजी ने प्रवेश किया. पहले के इकहरे बदन के हंसमुखजी अब दोहरे बदन के प्रतीत होते थे. वे कुरतापायजामा धारण किए हुए थे तथा उन के पैरों में बाथिंग स्लीपर थे. आते ही ‘नमस्कार बंधु’ कहने के साथ बड़े तपाक से उन्होंने मुझ से हाथ मिलाया और बड़े मिठास से बोले, ‘‘कहो बंधु, कब आए? कानपुर एकाएक कैसे आना हुआ?’’ और उन के किसी प्रश्न का मैं उत्तर दे सकूं, इस से पहले ही वे बोल उठे, ‘‘चलो, अच्छा हुआ, तुम सुबह 7 बजे तशरीफ ले आए और मैं घर पर मिल गया, वरना अभी 9 बजे की ट्रेन से मैं कोल्हापुर के लिए रवाना हो रहा हूं, वहां कल हास्यरस का एक विराट कवि सम्मेलन है.’’

फिर उन्होंने सामने रखी मेज की दराज खोल कर एक डायरी निकाली और उस के पृष्ठ पलटते हुए, अपने भाल पर रेखाएं सिकोड़ते हुए बोले, ‘‘आज… तारीख… 13 तारीख है न, बंधु? बस, अब 2 हफ्ते घर से बाहर कटेंगे. 30 तारीख तक 5 कवि सम्मेलन तो बुक हैं ही, बाकी बहुत से आसपास के कसबों के संयोजक दूसरेतीसरे दिन के लिए वही स्टेज पर ही बुक कर लेते हैं तथा कुछ कवि सम्मेलन अपने कवि बंधु ही दिला देते हैं.’’ और फिर अपने स्वर को कुछ जोशीला बनाते हुए वे बोले, ‘‘और वे कुछ मुफ्त में थोड़े ही दिला देते हैं, अपने इलाके के कवि सम्मेलनों में हम भी उन्हें आमंत्रित करा देते हैं.’’ फिर उन्होंने अपने लड़के को आवाज लगाई, ‘‘गांडीव.’’

और जब गांडीव उन के सामने आया तो उन्होंने आदेश के स्वर में कहा, ‘‘देखो, 2 कप चाय और एक प्लेट में नमकीन काजू तुरंत भेज दो,’’ फिर वापस जाते हुए गांडीव को रोक कर बोले, ‘‘हां, सुनो, तुम अपनी अटैची अलग से लगा लो और अपनी जरूरत की सभी चीजें उस में रखना मत भूलना.’’ मैं ने इस विषय में जब प्रश्नसूचक निगाहों से हंसमुखजी की ओर देखा तो एक बड़ी मीठी मुसकराहट के साथ वे बोले, ‘‘बंधु, तुम हमारे पुराने मित्र हो, इसलिए तुम से क्या छिपाना. इस लड़के का पढ़नेलिखने में तो ध्यान है नहीं, परीक्षा में हमेशा जीरो आता है और घर का कामकाज भी कुछ इस के बस का है नहीं, ऊपर से महल्ले में इस की शिकायतें सुनने को और मिलती रहती हैं. सो, मैं ने सोचा कि क्यों न जीतेजी इसे भी लाइन पर लगा दूं, इसलिए इसे मैं ने कुछ वीर रस की कविताएं लिख कर दे दी हैं. जब किसी कवि सम्मेलन में मैं जाता हूं तो इसे भी साथ ले जाता हूं और इस का परिचय वीर रस के कवि के रूप में ही देता हूं.

‘‘देश के सभी प्रमुख संयोजक, हमारा अत्यंत मान करते हैं, हमें दक्षिणा देने के साथसाथ इसे भी कुछ प्रसाद अवश्य दे देते हैं. अभी वैसे शुरुआत है, लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि ऊंट सीधी करवट ही बैठेगा. मैं हास्य रस का कवि और मेरा लड़का वीर रस का कवि…’’ और उन्होंने इस वाक्य को पूरा करने से पूर्व ही कमरे में बड़े जोर का ठहाका लगाया. एक प्लेट में नमकीन काजू और 2 कप गरम चाय आ चुकी थी और हम दोनों मित्र चायपान का आनंद ले रहे थे कि तभी मैं ने उन से पूछा, ‘‘आप नौकरी करते हुए इतने अधिक समय तक बाहर रहते हैं, क्या आप का पिं्रसिपल आप से कुछ नहीं कहता? वह आप की इतनी छुट्टियां कैसे मंजूर कर देता है?’’

चाय की एक चुस्की ले कर हंसमुखजी ने दर्दभरी आंखों से मुझे देखते हुए कहा, ‘‘पिं्रसिपल, वह क्या कहेगा? मैं जब भी कवि सम्मेलनों की यात्रा से लौटता हूं तो उस के लिए कुछ न कुछ तोहफा ले ही आता हूं. अभी कुछ दिन पहले जयपुर गया था तो उस के लिए मैं एक जोड़ी जयपुरी जूते ले आया था.’’ फिर एक काजू मुंह में डालते हुए वे बोले, ‘‘फिर, बंधु, मेरी प्रसिद्धि से उस के स्कूल का नाम भी तो चमकता है. और उसे मैं 1 वर्ष में जितना छीजता हूं, उतना तो कोई अन्य प्राध्यापक आजीवन नहीं कर सकता. बंधु, आर्थिक दृष्टि से कालेज की यह नौकरी अब हमारे लिए है क्या? हम इसे आज चाहें तो छोड़ दें, पर देश के सभी भागों से हमारे पत्र वहीं के पते से आते हैं. कोठी तो हम ने अभी बनवाई है, देश की जनता तो हमारे उसी पते से परिचित है, इसलिए इस कालेज की नौकरी हम छोड़ेंगे नहीं. और जब इस का पिं्रसिपल हर समय हमारी मुट्ठी में रहता है तब हमें किस बात की चिंता?’’

अपने कप की चाय समाप्त कर के मैं फिर कुछ चुस्त हो कर उन के स्प्रिंगदार सोफे पर बैठ गया और आखिर उन से पूछ ही बैठा, ‘‘हंसमुखजी, एक कवि सम्मेलन से कितनी आय हो जाती है?’’ ?इस प्रश्न का उत्तर देने से पूर्व हंसमुखजी के भाल पर कई रेखाएं उभरीं और फिर मिट गईं. वे बड़े संयत स्वर में बोले, ‘‘बंधु, शुरूशुरू में जब हम ने कवि सम्मेलन में जाना स्टार्ट किया था तो हम को 10 से 25 हजार रुपए तक मिल जाते थे लेकिन अब हम 40 हजार रुपए से तो कम कहीं लेते ही नहीं. और बड़े कवि सम्मेलनों में हमें 1 लाख रुपया बड़ी आसानी से मिल जाता है. और जिस कवि सम्मेलन में हास्य की कविता सुना कर हमें 1 लाख रुपए की प्राप्ति हो जाती है, गांडीव को भी उसी कवि सम्मेलन से वीर रस की कविता पढ़ने पर 40 हजार रुपए की प्राप्ति मैं करा ही देता हूं.’’

फिर वे मेरे हाथ पर अपनी हथेली की थपकी देते हुए बोले, ‘‘सब से बड़ा लाभ तो इन कवि सम्मेलनों से हमें यह है कि 1 वर्ष में बस दोचार कविताएं लिख लीं और फिर कई वर्षों तक उन्हीं को सुनाते रहते हैं. और कवि सम्मेलनों में तो श्रोतागण पुरानी कविताओं की ही फरमाइश करते रहते हैं. नई कौन सुनना चाहता है.’’ यह कह कर उन्होंने अपनी घड़ी की ओर देखा. मुझे भी उन की कवि सम्मेलनी यात्रा का ध्यान आ गया. मैं ने भी अपनी घड़ी देखी. सवा 8 हो चुके थे. मैं तुरंत सोफे से उठ खड़ा हुआ और हंसमुखजी से विदा लेने के लिए जब उन की ओर अपने हाथ बढ़ाए तो जैसे हंसमुखजी के नयन प्रेम से सजल हो उठे. दरवाजे पर मुझे विदा करते हुए वे बड़े मधुर स्वर में बोले, ‘‘बंधु, इस वर्ष अपने कालेज में भी अब एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन करा डालो. हमारी कविताओं से तो खैर पब्लिक हंसतेहंसते लोटपोट हो ही जाएगी, पर गांडीव की कविताएं सुन कर लोगों की बांहें फड़क उठेंगी. इस बहाने मिलना भी हो जाएगा.’’ ‘‘अच्छा, देखूंगा,’’ कह कर मैं ने उन्हें नमस्ते की और भारी कदमों से पैदल चल कर मैं फिर अपने होटल वापस लौट आया.

कितनी असली हैं ये फाइट

उत्तराखंड के हल्द्वानी में फाइट के दौरान विदेशी रेसलर्स कनाडा के ब्रौडी स्टील, अमेरिका के माइक नौक्स और अपोलो ने भारत के मशहूर रेसलर दलीप सिंह राणा उर्फ खली को पीटपीट कर लहूलुहान कर दिया. इस के बाद खली को अस्पताल में भरती करा दिया गया. इस खबर से रिंग और रिंग के बाहर खलबली मच गई. डाक्टरों ने खली को फाइट न करने की सलाह दी. 3 दिन बाद खली को उन विदेशी पहलवानों से मुकाबला करना था, इसलिए खली ने डाक्टरों की बात न मानते हुए फाइट की और विदेशी पहलवानों को पीटपीट कर चित कर दिया और ‘द ग्रेट खली रिटर्न्स मेगा शो’ का टाइटल अपने नाम कर लिया. सवाल उठता है कि क्या इस तरह की फाइट वाकई असली होती है? दरअसल, इस की स्क्रिप्ट पहले से ही तैयार कर ली जाती है और हारजीत का फैसला पहले से ही तय होता है. कभीकभी हारने वालों को ज्यादा पैसा मिलता है. कई बार आप देखते होंगे कि फाइट के दौरान ये पहलवान थूकते हैं, थूक में खून दिखता है. कई मौकों पर ये पहलवान ब्लड कैप्सूल का इस्तेमाल करते हैं और कई बार यह असली भी होता है. इस तरह की फाइट को इतना रोचक बना दिया जाता है कि देखने वालों को भी जोश आ जाता है.

इस तरह की लड़ाइयां पेशेवर खिलाडि़यों द्वारा ही लड़ी जाती हैं जिस के लिए वे ट्रेनिंग लेते हैं. खुद रेसलर्स भी ये मानते हैं कि यह सिर्फ मनोरंजन के लिए होता है. यह साफसुथरा मनोरंजन है. इस तरह की फाइट का केवल मजा लें. कौन पहलवान किसे पीट रहा है, किस का सिर फोड़ रहा है, किस का दांत टूट रहा है, इसे देख कर आप को विचलित और भावुक होने की जरूरत नहीं है. ये सब पैसों के लिए होता है. इस के लिए उस को ढेरों पैसा मिल रहा है पर आप को? सो, आप इस की नकल न करें, सिर्फ आनंद लें.

बजट में बुनियादी ढांचे में सुधार को तरजीह

आम बजट 2016-17 से महज 4 दिन पहले रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने रेल बजट पेश किया. उस में सुधार पर जोर दिया गया था लेकिन शेयर बाजार को यह रास नहीं आया और बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई का सूचकांक 113 अंक लुढ़क गया. इसी तर्ज पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपना आम बजट तैयार किया तो बाजार ने फिर वही रुख अपनाया और सूचकांक 153 अंक तक ढह गया. वित्त मंत्री जब संसद में भाषण दे रहे थे तो सूचकांक कारोबार के दौरान 500 अंक तक लुढ़क गया था.

रेल बजट और आम बजट के 1 दिन बाद शेयर बाजार ने जबरदस्त खुशी जताते हुए 7 सालों का रिकौर्ड तोड़ दिया. सूचकांक 777 अंक बढ़ कर 23,779 अंक पर बंद हुआ. पिछले 7 सालों के दौरान किसी एक दिन में सूचकांक में यह सब से बड़ी छलांग है. माना जा रहा है कि इस की वजह रिजर्व बैंक द्वारा रेट कट की उम्मीद है. हालांकि, ब्रोकर्स का कहना है कि रुपए की मजबूती के साथसाथ एशिया व यूरोपीय बाजारों में सकारात्मक संकेतों का भी इस पर असर हुआ है.

बहरहाल, बजट में वित्त मंत्री ने राजनीति का खेल खेला है. उन्होंने गरीब, किसान, मजदूर तथा गांव में रहने वाले लोगों को रिझाने का पूरा प्रयास किया है. निश्चित रूप से वित्त मंत्री के समक्ष इसी साल होने वाले 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव भी थे. भाजपा को इन चुनावों में बिहार जैसी स्थिति से बचाना है. बजट में किसानों से सरकार के खिलाफ उन की नाराजगी को दूर करने का प्रयास है. इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने बजट में गांव और किसानों को समर्पित आधारभूत ढांचे को तरजीह दी है, हालांकि सेवा कर बढ़ा कर हर वर्ग पर अतिरिक्त बोझ भी डाला है. सरकार ने 19.76 लाख करोड़ रुपए का बजट पेश किया है. जिस में बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए 2.21 लाख करोड़ रुपए की व्यवस्था की है. किसानों के कल्याण के लिए 35,984 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है.

खर्च के मामले में यह समझ लेना चाहिए कि बजट में प्रावधान रखने के बाद भी वर्षों लगते हैं उन योजनाओं को बनाने और लागू करने में जिन पर बजट स्वीकृत किया गया हो. कितनी सुविधाएं असल में किसानों को कब मिलेंगी, कहा नहीं जा सकता. उस का श्रेय हो सकता है राज्य सरकारें ले जाएं क्योंकि किसान कल्याण तो राज्य सरकार के हिस्से में आता है.

बजट में कौशल विकास का नया फंडा

सरकार युवकों को रोजगार देने के अपने चुनावी वादे को पूरा करने के लिए कौशल विकास केंद्रों की स्थापना को महत्त्व दे रही है. इस के लिए छात्रों की कमी के कारण खाली पड़े इंजीनियरिंग कालेजों की ढांचागत व्यवस्था का इस्तेमाल कौशल विकास के लिए किया जा रहा है. बजट में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना को तरजीह दी गई है.

बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अगले वित्त वर्ष में देश के विभिन्न हिस्सों में 1,500 कौशल विकास केंद्र खोलने का लक्ष्य निर्धारित कर के इस के लिए 1,700 करोड़ रुपए की व्यवस्था करने का प्रस्ताव किया है. इसी योजना के तहत 100 मौडल कैरियर केंद्र स्थापित करने की घोषणा के साथ ही देश के इन सभी रोजगार कार्यालयों को राष्ट्रीय कैरियर सेवा प्लेटफौर्म से संबद्ध करने का भी ऐलान किया गया है. सरकार ने यह कदम राष्ट्रीय कौशल विकास की अपनी घोषणा के अनुरूप 76 लाख युवाओं को प्रशिक्षित कर के उन्हें रोजगार के लिए तैयार करने के लिए उठाया है. इस के लिए उद्योगों तथा अकादमियों के साथ मिल कर राष्ट्रीय कौशल विकास प्रमाणन बोर्ड स्थापित करने की भी घोषणा की गई है. अगले 3 साल में सरकार ने इस योजना के तहत 3 करोड़ और युवकों को प्रशिक्षित करने का ऐलान किया है.

सवाल यह है कि सरकार के पास आईटीआई और पौलिटैक्निक जैसे संस्थान हैं, उन के जरिए युवकों का ज्यादा ट्रेड में प्रशिक्षित क्यों नहीं किया जा रहा है. सरकार आईटीआई के कई ट्रेडों के जरिए बेरोजगारों की फौज खड़ी कर रही है. सिर्फ प्रशिक्षण देने से कुछ नहीं होगा. युवकों को रोजगार देना होगा. प्रशिक्षित युवक घर बैठेंगे तो उन की कुंठा बढ़ेगी.

म्यांमार : आंग सान सू की से बदलाव की उम्मीद

म्यांमार में आखिरकार लोकतंत्र की जीत हुई. 54 सालों के फौजी शासन का अंत हुआ. 1 फरवरी, 2016 का दिन म्यांमार के लिए ऐतिहासिक बन गया. इस दिन लोकतांत्रिक पद्धति से चुनाव में जीत के 3 महीनों के बाद आंग सान सू की और उन के सांसदों ने संसद में कदम रखा. आंग सू की का राजनीतिक जीवन बड़ा कठिन रहा है. छुटपन में पिता की हत्या ने उन में संघर्ष का मद्दा पैदा किया.

विश्व इतिहास में राजनीतिक बंदियों का अगर नाम लेने को कहा जाए तो इन में से एक नेलसन मंडेला का और दूसरा नाम आंग सू की का होगा. मंडेला की तरह आंग सू की को जेल के कठिन दौर से नहीं गुजरना पड़ा. देशवासियों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. अपने परिवार, अपनी पार्टी और समर्थकों से लंबे समय तक दूर रह कर निरंकुश जूंटा सरकार की नजरबंदी में रहना पड़ा. ऐसी नजरबंदी में अच्छेअच्छे राजनीतिज्ञ टूट जाते हैं, लेकिन आंग सू की अपने इरादों में अडिग बनी रहीं.

संघर्ष का लंबा दौर

आंग सू की का जन्म 19 जून, 1945 को म्यांमार (तत्कालीन बर्मा) की राजधानी इयांगन (तत्कालीन रंगून) में हुआ. उस समय आंग सू की के पिता आंग सन म्यांमार के मेजर जनरल हुआ करते थे. ब्रिटिश उपनिवेश के शासकों के साथ एक समझौते के तहत आंग सन ने 2 साल बाद बर्मा को आजाद कराने का बंदोबस्त किया. उन्होंने बर्मा आजाद फौज बनाई. लेकिन देश की आजादी के 6 महीने पहले सेनावाहिनी में उन के विरोधी जनरल ने उन की हत्या करवा दी. तब आंग सू की महज 1 महीने की थीं. उन की मां खिन पति की सीट से चुनाव जीत कर आजादी के बाद पहली सरकार में शामिल हुईं.

1960 में वे भारत में म्यांमार की पहली राजदूत नियुक्त की गईं. इसी दौरान भारत आंग सू की का ठिकाना बना. बीमार मां की सेवा शुश्रूषा के लिए 1988 में आंग सू की म्यांमार वापस चली आईं. उस समय म्यांमार पर फौजी शासन का पूरी तरह से कब्जा हो गया था. लोकतंत्र की स्थापना के लिए आंग सू की की अगुआई में फौजी शासक जनरल ने विन के पदत्याग की मांग उठी और जनता आंदोलन के लिए सड़क पर उतर आई. वहीं, आंदोलन के दमन के लिए फौजी शासक ने भी कमर कस ली. फौजी दमन ने सैकड़ों लोगों की जान ली. आंग सू की के आंदोलन को पूरी तरह से पश्चिमी देशों का समर्थन मिला.

मार्टिन लूथर किंग और महात्मा गांधी की अनुयायी आंग सू की ने शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन के जरिए लोकतंत्र की बहाली पर जोर दिया. इस के लिए आंग सू की ने एनएलडी यानी नैशनल लीग फौर डैमोके्रसी की स्थापना की. आम जनता पर आंग सू की के बढ़ते प्रभाव से घबरा कर जूंटा सरकार ने उन्हें अपने समर्थकों, संगठन और पार्टी कार्यकर्ताओं से अलगथलग करने की प्रक्रिया शुरू कर दी. इसी के तहत आंग सू की को उन के अपने ही आवास में नजरबंद कर लिया गया. युवावस्था तक का एक लंबा समय भारत में गुजार चुकी आंग सू की के सामने महात्मा गांधी का उदाहरण रहा है. इसीलिए गांधीजी के आदर्श का प्रभाव भी उन पर है. लेकिन अगर अहिंसा की बात की जाए तो इस मामले में आंग सू की नेलसन मंडेला से जरा अलग हैं. मंडेला ने सत्ताधारियों के साथ नस्लवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए एक हद तक अपने अनुयायियों को हथियार उठाने की अनुमति दी थी, लेकिन आंग सू की हमेशा अहिंसा के रास्ते पर ही चलीं.

बर्मा की आजादी

आंग सू की से पहले भी बर्मा और बाद में म्यांमार के रूप में इस देश में संघर्ष का लंबा दौर चला. ब्रिटिश बर्मा की बात करें तो अपनी आजादी के लिए बर्मा ने 3-3 लड़ाइयां लड़ीं. 1824 में पहला एंग्लोबर्मीज युद्ध और 1852 में दूसरे एंग्लोबर्मीज युद्ध के बाद 1885 में तीसरा एंग्लोबर्मीज युद्ध. इस के बाद बर्मा पर पूरी तरह से ब्रिटिश कब्जा हो गया और बर्मा ब्रिटिश भारत का अंग बन गया. लेकिन 1900-1911 तक आइरिश बौद्ध भिक्षु यू धम्मलोका ब्रिटिश राज के लिए चुनौती बने. वे यहां मजदूर के रूप में आए लेकिन बाद में बौद्ध भिक्षु बन गए. ईसाई धर्म और मिशनरी के साथ ब्रिटिश राज के लिए सिरदर्द बने. धम्मलोका को बर्मा की जनता का समर्थन मिला. अंगरेजों ने उन पर मुकदमा चलाया पर साक्ष्य के अभाव में उन्हें मामूली सजा ही हुई.

1937 से पहले ब्रिटिश ने बर्मा को भारत का राज्य घोषित किया था. लेकिन फिर अंगरेज हुकूमत ने बर्मा को भारत से अलग कर के उसे ब्रिटिश क्राउन कालोनी बना दिया. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापान ने बर्मा के जापानियों द्वारा प्रशिक्षित बर्मा आजाद फौज के साथ मिल कर हमला किया. बर्मा पर जापान का कब्जा हो गया. बर्मा में सुभाषचंद्र बोस के आईएनए की वहां मौजूदगी का प्रभाव पड़ा. 1945 में आंग सन की एंटीफासिस्ट पीपल्स फ्रीडम लीग की मदद से ब्रिटेन ने बर्मा को जापान के कब्जे से मुक्त किया. लेकिन 1947 में आंग सन और उन के 6 सदस्यीय अंतरिम सरकार के राजनीतिक विरोधियों ने आजादी से 6 महीने पहले उन की हत्या कर दी.

आज आंग सन म्यांमार के राष्ट्रपिता कहलाते हैं. आंग सन की सहयोगी यू नू की अगुआई में 4 जनवरी, 1948 में बर्मा को ब्रिटिश राज से आजादी मिली और ब्रिटिश सेना ने बर्मा की संसद से यूनियन जैक हटा लिया.

सांप्रदायिक तनाव

आजादी के बाद बहुसांस्कृतिक बर्मा में गृहयुद्ध और सांप्रदायिक हिंसा का लंबा दौर चला. बर्मा ने न केवल फौजी शासन झेला, बल्कि धार्मिक तनाव के खूनी सिलसिले ने भी इसे लहूलुहान किया है. 2001 से मुसलिम, विशेष रूप से रोहिंग्या मुसलिमों और बौद्ध भिक्षुओं के बीच खूनी संघर्ष अपने चरम पर पहुंच गया. सैकड़ों लोग मारे गए. इस दौरान म्यांमार में बुद्ध के अनुयायी बौद्ध भिक्षु शिन विराथु ने राष्ट्रवादी और मुसलिम विरोधी गुट ‘969’ तैयार किया. विराथु अपने भाषणों में अकसर सांप्रदायिक आग उगलते रहे हैं. उन के हिंसक और कट्टरपंथी भाषणों ने आग में घी का काम किया. म्यांमार में सांप्रदायिक दंगे भड़के. आपातकाल की घोषणा कर दी गई. 2003 में विराथु को 25 साल की सजा हुई. लेकिन 2010 में आंग सू की के साथ बहुत सारे राजनीतिक बंदियों को रिहा किया, उस में विराथु भी शामिल हैं.

भारत-म्यांमार संबंध

भारत की सीमा का लगभग 1,643 किलोमीटर से बड़ा इलाका म्यांमार से जुड़ा हुआ है. अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड की सीमा म्यांमार से सटी हुई है. यह इलाका दुर्गम पहाड़ और जंगल से घिरा हुआ है. इस के एक तरफ भारतीय सीमा में चीन की तत्परता भारत के लिए चिंता का विषय है तो दूसरी तरफ भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में अलगाववादी ताकतों की सक्रियता और घुसपैठ की संभावनाओं को देखते हुए जूंटा सरकार से संबंध बनाए रखना भारत की मजबूरी रही है.

जाहिर है भारत म्यांमार के साथ अपने संबंध को बिगाड़ने के पक्ष में कभी नहीं रहा है. वहीं म्यांमार की फौजी सरकार भी भारत के साथ संबंध बिगाड़ने के पक्ष में नहीं रही है क्योंकि पूर्वोत्तर के भारतीय राज्यों से सीमा के सटे होने के अलावा म्यांमार का पूरा तटवर्तीय क्षेत्र बंगाल की खाड़ी के जरिए भारत से जुड़ा हुआ है. इस की कुल लंबाई लगभग 2,276 किलोमीटर है. जाहिर है भारत के लिए म्यांमार का बड़ा महत्त्व है. म्यांमार न केवल सार्क, आसियान का सदस्य है, बल्कि तेजी से बढ़ते पूर्व और दक्षिणपूर्व एशिया की अर्थव्यवस्था का एक द्वार भी है. इस के अलावा पूर्वोत्तर भारत में बढ़ती अलगाववादी गतिविधियों के मद्देनजर भी म्यांमार से भारत के रिश्ते का महत्त्व है. 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद फौजी सरकार के सूचना मंत्री ने असम के उल्फा, मणिपुर के पीएलए और नागालैंड के एनएससीएन पर कार्यवाही के लिए तत्पर होने का भरोसा जताया था. भारत म्यांमार के जरिए थाईलैंड और वियतनाम के साथ संबंध मजबूत कर सकता है.

आंग सू की को म्यांमार में लोकतंत्र की स्थापना में भारत से जिस तरह की उम्मीद थी वह नहीं मिली. वाकई भारत सरकार चाहती तो म्यांमार के फौजी शासकों पर दबाव बना सकती थी पर तब की कांग्रेस सरकार ने ऐसा नहीं किया. जाहिर है कि पूरे उपमहादेश में लोकतंत्र की स्थापना के लिए एक शक्तिशाली लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भारत की भूमिका से वे कतई संतुष्ट नहीं रही हैं. मोदी सरकार बनने के बाद विदेश नीति में बदलाव आया और भारत सरकार ने ‘पहले पड़ोसी’ की नीति पर जोर दिया है. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने म्यांमार की यात्रा की. ऐसे में जब म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली हो चुकी है तब इस देश को ले कर मोदी सरकार का रवैया देखना बाकी है.

पड़ोसी देशों का समर्थन

संघर्ष के दिनों में आंग सू की को पश्चिमी देशों का पूरा समर्थन मिला. जापान, दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया के साथ यूरोप, उत्तर और दक्षिण अमेरिकी देशों ने भरपूर समर्थन दिया. म्यांमार पश्चिमी देशों की आर्थिक नाकेबंदी के दौर से गुजर रहा था, लेकिन इस का बहुत गहरा प्रभाव म्यांमार की जूंटा सरकार पर नहीं पड़ पा रहा था. इस की वजह यह है कि खनिज संपदा से भरपूर, भौगोलिक और सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण म्यांमार की जूंटा सरकार को उस के 4 पड़ोसी देशों–चीन, लाओस, थाईलैंड और बंगलादेश से पूरी तरह से मदद मिल रही है. भारत भी म्यांमार का एक पड़ोसी है लेकिन भारत और म्यांमार के संबंधों की बात की जाए तो भारत की स्थिति जरा भिन्न है. चीन की म्यांमार में सक्रियता को देखते हुए जूंटा सरकार के साथ संबंध को कायम रखना भारत का निहित स्वार्थ या मजबूरी है. थाईलैंड, फिलिपींस, सिंगापुर जैसे दक्षिण एशियाई राष्ट्रसंघ के सदस्य देश आंग सू की के साथ खड़े रहे हैं. वैसे इस के पड़ोसी देश थाईलैंड और बंगलादेश की मजबूरी भी कुछकुछ भारत जैसी ही है. थाईलैंड की लगभग 2,096 किलोमीटर और बंगलादेश की लगभग 256 किलोमीटर सीमा म्यांमार को छूती है. बंगाल की खाड़ी का कुछ हिस्सा म्यांमार की सीमा से जुड़ा है. यानी खाड़ी का तटवर्तीय क्षेत्र भारत, बंगलादेश और म्यांमार तीनों देशों के लिए चिंता का विषय है.

म्यांमार के लिए अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक नाकेबंदी चीन के लिए फायदेमंद है. इसी कारण आंग सू की रिहाई के समय चीन ने कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की थी. प्राकृतिक तेल भंडार, खनिज संपदा से समृद्ध और यहां का सस्ता तथा उन्मुक्त बाजार चीन के लिए कम आकर्षक नहीं रहा है. मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति का लाभ उठाने के लिए चीन म्यांमार में 817 करोड़ अमेरिकी डौलर तक निवेश करने जा रहा है. अकेले जलविद्युत परियोजना में वह 500 करोड़ अमेरिकी डौलर और प्राकृतिक तेल व गैस निकालने व उस के परिशोधन में 200 करोड़ अमेरिकी डौलर का निवेश कर रहा है. बदले में म्यांमार सरकार ने उसे हिंद महासागर में सैन्य अड्डा बनाने में मदद करने का आश्वासन दे रखा है.

एक नई शुरुआत

म्यांमार में बहरहाल नई शुरुआत हो चुकी है. नवंबर में चुनाव के बाद संसद का पहला सत्र नेपेडा में शुरू हुआ. लंबे समय के संघर्ष के बाद म्यांमार में आंग सू की के नैशनल लीग फौर डैमोक्रेसी पार्टी की सरकार बनी. गौरतलब है कि पिछले साल नवंबर में म्यांमार की संसद के निचले सदन और ऊपरी सदन को मिला कर 80 प्रतिशत सीटों पर कब्जा कर के एनएलडी ने बहुमत हासिल कर लिया था. एशियाई राजनीति के जानकार अभिजीत सिराज का मानना है कि आंग सू की के लिए सत्ता कोई फूलों की सेज नहीं बनने वाली. क्योंकि संसद में अभी भी 56 सीटें यानी 20 प्रतिशत सीटें फौजी प्रतिनिधियों के लिए सुरक्षित हैं. एक सब से बड़ी अड़चन है और यह अड़चन बहुत कुछ भारत में सोनिया गांधी की स्थिति से मिलतीजुलती है. आंग सू की ने चूंकि विदेश में ब्याह रचाया, इसलिए वे और उन की संतान म्यांमार के राष्ट्रपति के पद को कभी प्राप्त नहीं कर सकती हैं.

आंग सू की के मामले में म्यांमार का कानून ही उन के राष्ट्रपति बनने की राह में अड़चन है. उन्हें इस पद पर किसी और को बिठा कर शासन चलाना होगा. हालांकि आंग सू की ने चुनाव से पहले संविधान की इस धारा में बदलाव की बहुत कोशिश की लेकिन फौजी शासन ने दाल नहीं गलने दी. चुनाव में भारी जीत के बाद आखिरकार आंग सू की को यह घोषणा करनी पड़ी कि वे राष्ट्रपति के पद पर किसी और को बिठाएंगी. हालांकि इस पर वे किसे बिठाएंगी, अभी यह साफ नहीं है. म्यांमार में मौजूदा फौजी राष्ट्रपति थेन सेन का कार्यकाल मार्च महीने में पूरा होने जा रहा है. आंग सू की के पास राष्ट्रपति चुनने के लिए 31 मार्च तक का समय है.

फौजी शासन से चुनाव तक

म्यांमार में 1962 से फौजी शासन रहा है. इस बीच कई बार फौजी शासन का कू्रर चेहरा दुनिया के सामने आया. लंबे समय तक म्यांमार में जहां एक तरफ गृहयुद्ध की स्थिति रही, वहीं उस दौरान बड़ी संख्या में बौद्ध धर्मावलंबियों का कत्लेआम हुआ. बारबार म्यांमार की सड़कें बौद्ध भिक्षुओं के खून से लथपथ हुईं. 20 जुलाई, 1989 से लगभग 2 दशकों से भी अधिक समय तक नजरबंद रहने के बाद आंग सू की को 13 नवंबर, 2010 को म्यांमार की जूंटा सरकार ने रिहा किया. यह रिहाई भी एक रणनीति के तहत की गई थी. दरअसल, अंतर्राष्ट्रीय नाकेबंदी को शिथिल करने और राष्ट्रसंघ द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन की जांच प्रक्रिया को दबाने के लिए आंग सू की को रिहा किया गया था. इस से पहले 1990 में फौजी सरकार ने चुनाव कराया, जिस में आंग सू की एनएलडी को भारी जीत मिली. चुनाव के नतीजे से घबराई फौजी सरकार ने चुनाव को अवैध घोषित कर दिया. इतना ही नहीं, उस ने रातोंरात एनएलडी के नेताओं व कार्यकर्ताओं को फिर से जेल में डाल दिया. आंग सू की को नजरबंद कर दिया. लगातार 15 सालों तक नजरबंद रखने के बाद 2010 में उन्हें रिहा किया गया. 2010 में चुनाव हुए. इस में यूएसडीपी यानी यूनाइटेड सौलिडरिटी ऐंड डैवलपमैंट पार्टी की जीत हुई. सेना के पूर्व जनरल थेन सेन की सरकार बनी. दरअसल, फौजी सरकार पर सौतेले व्यवहार का आरोप लगा कर एनएलडी ने चुनाव ही नहीं लड़ा था.

2012 में सांसद की 48 सीटों के लिए उपचुनाव हुए. इस उपचुनाव में आंग सू की के नेतृत्व में उन की पार्टी ने लगभग सभी सीटों पर जीत हासिल की. इस के बाद 2015 में संसद की 224 सीटों के लिए चुनाव हुए. नतीजा आंग सू की के पक्ष में रहा. इस चुनाव में एनएलडी को 135 सीटों पर जीत मिली. संसद के निचले और ऊपरी सदन को मिला कर एनएलडी के 390 सांसद चुने गए हैं. वहीं थेन सेन की यूएसडीपी को महज 11 सीटों पर सफलता मिली. 56 सीटें फौजी प्रतिनिधियों के लिए आरक्षित थीं.

बहरहाल, भारी जीत के बाद आंग सू की ने फौजी प्रतिनिधियों और सेना के उच्च पदाधिकारियों के साथ कई बैठकें कीं. पदाधिकारियों ने शासन में आंग सू की को हर संभव सहयोग देने का वादा किया. 1 फरवरी, 2016 को पहली बार एनएलडी के नवनिर्वाचित विधायकों ने अपनी नारंगी यूनिफौर्म में संसद में पहली बार कदम रखा. म्यांमार में वहां की राजनीति के जानकार खिन जावा को बहुत ज्यादा उम्मीद नजर नहीं आती. हाल ही में खिन ने म्यांमार नैटवर्क को दिए गए अपने एक बयान में कहा है कि एनएलडी की जीत म्यांमार के लिए ऐतिहासिक क्षण जरूर है लेकिन ध्यान रखने वाली बात यह भी है कि आंग सू की को सत्ता मिलने के साथ ही साथ देश में हजारों किस्म के बखेड़े भी खड़े हो जाएंगे.

बदहाली से बेजार

म्यांमार में लोकतंत्र की स्थापना के लिए स्थानीय जनता भले ही आंग सू की पर विश्वास रख रही हो पर सदियों से भूख, बेरोजगारी और दरिद्रता से बेजार हो चुकी म्यांमार की जनता के लिए लोकतंत्र से बड़ा सवाल पेट की आग का है. लंबे समय से फौजी शासन के कारण देश की आर्थिक स्थिति, जीडीपी, भ्रष्टाचार, राजस्व, रोजगार और धार्मिक संघर्ष आदि वहां चिंता के विषय हैं. ऐसे में जाहिर है आंग सू की और उन की पार्टी एनएलडी से म्यांमार की जनता को बड़ी उम्मीदें हैं. नवनिर्वाचित सांसद राजनीति में नए ही नहीं हैं, प्रशासन का भी उन्हें कोई अनुभव नहीं है. उस पर तुर्रा यह कि आंग सू की खुद राष्ट्रपति बन नहीं सकतीं. उन की जगह में उन का कोई विश्वस्त ही इस पद पर आसीन होगा. पर सवाल है कि वह आंग सू की का कब तक भरोसेमंद बना रहेगा  बहरहाल, कुल मिला कर 54 सालों के बाद म्यांमार की फिजां बदली है और लोकतंत्र की बहाली हुई है. देखना यह है कि लोकतंत्र का रास्ता वहां कितना सुगम होगा. नई पीढ़ी सकारात्मक बदलाव के इंतजार में है.

बजट में कीमतें नियंत्रण करने के उपाय

मोदी सरकार सत्ता में आई तो इस के प्रमुख कारणों में एक कांगे्रस राज में महंगाई की मार थी. पूरा देश महंगाई से त्रस्त था और नरेंद्र मोदी ने जनता की इस संवेदनशील नब्ज पर हाथ रख कर वोट के लिए इस का सफल इस्तेमाल किया. लोगों को भी लगा कि मोदी पूरा कायाकल्प ही कर देंगे. सभी के पास रोजगार होगा और सभी को सस्ती दर पर भरपेट भोजन मिलेगा लेकिन हुआ इस का ठीक उलट. सभी आवश्यक वस्तुओं के दाम लगातार चढ़ते गए, हालांकि थोक मूल्य सूचकांक का आंकड़ा निरंतर लुढ़क रहा है.

गरीब का भोजन कही जाने वाली दाल गरीब की थाली से अचानक गायब हो गई. दाल की जम कर कालाबाजारी हुई और उस के दाम प्रति किलो 200 रुपए तक पहुंच गए. सरकार ने दिखावे के लिए छापेमारी की लेकिन उस का जमीनी स्तर पर कोई असर देखने को नहीं मिला. दाल आज भी 175 रुपए प्रति किलो तक बिक रही है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट पेश करते हुए बजट में मूल्य स्थिरीकरण निधि 500 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 900 करोड़ रुपए कर दी है. इस निधि से आवश्यक वस्तुओं खासकर दाल की कीमत को नियंत्रित किए जाने का प्रयास किया जाएगा. अलग निधि आवंटित कर सरकार ने मूल्यों को नियंत्रित करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता तो व्यक्त कर दी है लेकिन इस में वह कितना सही साबित होती है, यह समय बताएगा. बहरहाल, जिस रफ्तार से कीमतें बढ़ रही हैं उसे देखते हुए लगता नहीं है कि सरकार आसमान छूती कीमतें रोकने में सफल होगी.

होली का गहराता रंग

होली पर देवर ने भाभी को

रंग के साथ गुलाल भी लगाया

मन भर कर भिगोया

पूरे घर में दौड़ाया

देवर के गालों पर

भाभी का ऐसा रंग चढ़ा

जितना धोया और छुड़ाया

वो उतना गहराया और बढ़ा

बजट में हुआ रेल और सड़क का खेल

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2016-17 का बजट पेश करते हुए ढांचागत अवसंरचना को विशेष महत्त्व दिया है. उस घोषणा का उद्देश्य देश में सड़क और रेल यातायात को मजबूती प्रदान करना है. रेल में ढांचागत विकास के लिए रेल बजट में पूरी व्यवस्था है लेकिन किस काम के लिए, कितनी निधि देनी है, आम बजट में यह व्यवस्था की जाती है.

आम बजट में रेल ढांचागत व्यवस्था को महत्त्व दिया गया है. इसी तरह सड़क परिवहन पर भी विशेष ध्यान दिया गया है. इन दोनों क्षेत्रों के लिए कुल 2,18,000 करोड़ रुपए के लिए प्रावधान का प्रस्ताव किया गया है. इस में राष्ट्रीय राजमार्ग में ढांचागत विकास के लिए बजट में 55,000 करोड़ रुपए के आवंटन की व्यवस्था की गई है जबकि प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के लिए 27,000 करोड़ रुपए का प्रावधान है. जल मार्ग आदि के लिए 15,000 करोड़ रुपए रखे गए हैं.

पूर्वोत्तर में सीमांत इलाकों में सड़क परिवहन को मजबूत बनाने तथा उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के लिए सड़क यातायात बारामासा सुचारुरूप से चलने वाली सड़क बनाई जाएगी. दिल्ली-मेरठ ऐक्सप्रैसवे की तर्ज पर कई राज्यों में भीड़भाड़ कम करने के लिए इसी तरह के ऐक्सप्रैसवे बनाए जाएंगे.

सरकार का यह प्रयास परिवहन नैटवर्क को मजबूत बनाने के साथ ही मतदाताओं को रिझाना भी है. विपक्ष इसे भले ही वोट पाने का लक्ष्य बता रहा हो लेकिन सचाई यह है कि मजबूत ढांचागत विकास के बिना देश को आर्थिक खुशहाली की राह पर आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है.

कहीं फूटे पटाखे, कहीं टूटे टीवी

भारत और पाकिस्तान का मैच जब भी होता है तो ऐसा लगता है मानो दोनों देशों के बीच युद्ध हो रहा हो. एशिया कप टी-20 में भी कुछ ऐसा ही दिखा. भारत ने पाकिस्तान को लीग मैच में 5 विकेट से हरा दिया. जीत के जश्न में जहां भारतीय प्रशंसकों ने पटाखे फोड़े वहीं पाकिस्तान में कई जगह टैलीविजन तक तोड़ दिए गए. सोशल मीडिया पर भी कई कमैंट्स किए गए. किसी ने लिखा, ‘नवाज मियां, बच्चा दिल्ली का है, धीरे से मारता है पर लगती जोर से है.’ तो किसी ने लिखा, ‘अफरीदी : विराट कोहली को 100 नहीं बनाने देंगे, मगर कैसे? अफरीदी : हम 90 पर औल आउट हो जाएंगे.’ जेएनयू मामले को जोड़ते हुए भी कई मजेदार टिप्पणियां की गईं.

एशिया कप में भले ही दर्शकों को चौकेछक्के देखने को नहीं मिल रहे हों पर भारतीय खिलाडि़यों का परफौर्मैंस लाजवाब है. भारत के पास जहां अनुभवी खिलाड़ी थे वहीं पाकिस्तान के पास अनुभव की कमी थी पर गेंदबाजी के मामले में पाकिस्तान हमेशा से भारी रहा है. हां, भारतीय बल्लेबाजी के सामने पाकिस्तान कई मामलों में पीछे है. 80 और 90 के दशक की बात करें तो उस समय पाकिस्तान के पास अच्छे बैट्समैन और गेंदबाज भी थे पर अब ऐसा नहीं है. इस दरम्यान पाकिस्तान के खिलाडि़यों का मनोबल भी टूटा है. कई खिलाड़ी फिक्ंिसग मामले में फंसे तो कोई राजनीति का शिकार हो गया. कई बार आतंकवाद के चलते दूसरे देशों से मैच नहीं हो पाया. ऐसे में जाहिर है इस का असर खिलाडि़यों पर पड़ता ही है.

भारतीय टीम भी उस दौरान बेहतरीन थी पर पाकिस्तान के पास अच्छे औलराउंडर थे. उन के पास ऐसे गेंदबाज थे जो तेज गति से गेंद को फेंक सकते थे और रिवर्स स्विंग करा सकते थे पर अब वह बात नहीं. पाकिस्तान को नए सिरे से सोचना होगा तभी वह भारतीय खिलाडि़यों का सामना कर पाएगा अन्यथा उसे ऐसे ही हार झेलनी पड़ेगी.

सिर किसी का, धड़ किसी का

अपना शरीर चिरयुवा रखने की इच्छा रखने वाले अपना सिर अपनी चाहत वाले स्वस्थ, सुंदर शरीर में फिट करवा सकते हैं. यह साइंस फिक्शन या हवाई सोच नहीं है, अपने पिछले प्रयोगों के बूते वैज्ञानिकों को यकीन है कि बस 22 महीने के बाद इस का जीवंत मानवीय नमूना सब को दिखेगा. यह तय पाया गया है कि वियतनाम और जरमनी के सहयोग से बने अस्पताल में 25 दिसंबर, 2017 को मानवीय सिर के प्रत्यारोपण को अंजाम दे दिया जाए. चिकित्सकों, वैज्ञानिकों का मानना है कि यह परीक्षण पूरी तरह सफल रहेगा. अभी इसी साल जनवरी में एक बंदर के शरीर पर सिर प्रत्यारोपण की प्रक्रिया पूरी तरह सफल रही है. उन्हें यह भी यकीन है कि इस औपरेशन के महज 2 दशकों के भीतर ही इस सिर प्रत्यारोपण की तकनीक  विकसित हो कर इतनी आसान बन जाएगी कि लोग अपने बगल के अस्पताल में जा कर अपनी सुविधानुसार सिर या शरीर बदलवा सकेंगे.

पिछले साल जून की 12 तारीख को यह साफ हो गया कि मनुष्य अमरता के इस नए रास्ते पर चलेगा. इतालवी न्यूरो सर्जन सेर्जियो कनावेरो ने उसी दिन अमेरिका के मेरीलैंड के एन्नापोलिस में होने वाली एक बैठक में अपनी उस योजना का ब्योरा रखा, जिस के तहत वे शल्य चिकित्सकों के एक दल के साथ एक व्यक्ति का सिर दूसरे व्यक्ति के स्वस्थ शरीर पर प्रत्यारोपित करेंगे. शल्य चिकित्सकों के संगठन एकेडमी औफ न्यूरोलौजिकल एंड और्थोपेडिक सर्जंस की इस सालाना बैठक में उन्होंने विशेषज्ञों के हर सवाल का जवाब दिया जो इस विवादित मगर महत्त्वपूर्ण और महत्त्वाकांक्षी औपरेशन से जुड़े थे. सहमति, सम्मति इस पर बनी कि अगले साल इस औपरेशन को अंजाम देने से पहले बाकी तैयारियां कर ली जाएं. 2 साल पहले से ही इस प्रयोग के लिए अपना सिर समर्पित करने वाले वलेरी स्पिरिदोनफ का सिर वे एक दूसरे व्यक्ति के धड़ पर रोप देंगे.

बस दो साल

सालभर का इंतजार और इस औपरेशन की उलटी गिनती शुरू, फिर सबकुछ सही रहा तो इसी रास्ते पर चल कर जो भी लोग अपने शरीर से बेजार महसूस कर रहे होंगे, नए शरीर अपनाकर कायाकल्प कर सकेंगे. कनावेरो ख्यातिप्राप्त न्यूरो सर्जन होने के साथसाथ त्यूरिन एडवांस न्यूरोमौड्यूलेशन ग्रुप जैसे अग्रणी थिंकटैंक के मुखिया भी हैं, ऐसे में उन के दावे और वादों को हलके में नहीं लिया जा सकता. उन के दावे के पुख्ता वैज्ञानिक आधार हैं. कनावेरो दिमागी रूप से मृत घोषित व्यक्ति का सिर उस व्यक्ति पर स्थापित करेंगे जिस का शरीर नष्टता को प्राप्त है. स्वस्थ शरीर का मेल स्वस्थ दिमाग से होगा, और सालभर में दोनों मिल कर सक्रिय हो जाएंगे. कनावेरो के अनुसार, एक बार बस यह मौड्यूल व्यावहारिक तौर पर परख लिया जाए फिर तो इस सिर बदल प्रक्रिया में 1 घंटे से भी कम समय लगेगा. कनावेरो अपने इसी औपरेशन का पूरा ब्योरा संबंधित विशेषज्ञ, शल्य चिकित्सकों के सामने रखेंगे. उन्होंने अपने इस न्यूरो मौड्यूल का नाम दिया है हैवेन जेमिनी.

सिर समर्पित

 कनावेरो के प्रयोग को अपना सिर समर्पित करने वाला मिल गया है. बचपन से अब तक व्हीलचेयर पर गुजार रहे 30 वर्षीय रूसी वलेरी स्पिरिदोनफ का जीवन मौत से भी बदतर है. वे शरीर की मांसपेशियों के लगातार बेकार होती जाने वाली दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी वर्डनिग हौफमैन से ग्रस्त हैं. उन्होंने  कनावेरो का यह प्रस्ताव मान लिया है कि उन का सिर उतार कर किसी दूसरे शरीर में लगा इस नष्ट होते शरीर को बदल दिया जाएगा. दुनिया के वे पहले शख्स कहलाएंगे, जिन के सिर का प्रत्यारोपण किया जाएगा.

कैसे होगा यह सब

सिर के प्रत्यारोपण के लिए हड्डी, दिमाग, मैडिसिन और तमाम क्षेत्रों के 100 विशेषज्ञ चिकित्सक कुल 36 घंटे चलने वाला औपरेशन करेंगे और खर्च आएगा 15 से 20 मिलियन अमेरिकी डौलर. बीमार शरीर पर स्वस्थ, सक्रिय सिर और उसे निष्क्रिय दिमाग वाला जिस्म, दोनों से सिर एक ही वक्त में और बेहद तेज धार वाले अल्ट्रा शार्प ब्लेड से पहले से तय जगह से बड़ी सफाई से अलग किया जाएगा. धड़ और सिर को शून्य से 10-15 डिगरी नीचे के तापमान में रखा जाएगा ताकि देर तक औक्सीजन न मिलने के बावजूद कोशिकाएं मरें नहीं. शीतल शरीर पर ठंडा सिर कटने के सैकंडों के भीतर सावधानी से फिट किया जाएगा.

कल्पना करें बेहद तेज चाकू से तेजी से कटे केले के 2 टुकड़े. इस के पहले खून की नलियों से वे कृत्रिम नलियां जोड़ी जा चुकी होंगी जिन्हें एकदूसरे से जुड़ना है. खासतौर पर खाने को भीतर ले जाने वाली ग्रसनी और फेफड़ों से जुड़ने वाली ट्रैकिया जिस से आवाज प्रभावित होती है तथा कुछ और नलियां, नस, नाडि़यां. इस के साथ ही, गले के इर्दगिर्द की मांसपेशियों को भी इस लायक बना लिया जाएगा कि सिर रखने के तुरंत बाद उन्हें चिपकाया जा सके. सिर को धड़ से सफलतापूर्वक चिपकाने और रीढ़ की हड्डी के आखिरी सिरे से जोड़ने के बाद पौलीएथिलीन ग्लायीकौल से उन्हें लगातार तर रखा जाएगा और घंटेभर बाद से इसी के इंजैक्शन भी लगातार लगाए जाते रहेंगे.

असल में ग्लायीकौल एथिलीन फैट सैल या कोशिका की बाहरी झिल्ली या मेंब्रेन को गला कर नई कोशिकाएं बनाने में भी मदद करती है.

इस पूरी प्रक्रिया में 2 सब से अहम बातें हैं. पहली, धड़ और सिर दोनों की रीढ़ की हड्डी और उस के भीतर के तंत्रिकाओं का आपस में जुड़ना. दूसरी, शरीर के इम्यून सिस्टम का नए सिर को स्वीकारना. मांसपेशियां जल्दी से जुड़ जाती हैं, चमड़ी, हड्डियां और नलिकाएं भी समय पर जुड़ जाती हैं मगर तंत्रिकातंत्र वाली नसें अपनी धीमी रफ्तार या तकरीबन बिलकुल न बढ़ने के लिए कुख्यात हैं. अगर एक्सौन और भूरी परत के नीचे उस के सफेद तंतु भोथरे तरीके से कटफट गए हैं तो काम असंभव की हद तक मुश्किल है. ऐसे में पौलिएथिलीन ग्लायीकौल का घोल या घंटों दिया जाने वाला इंजैक्शन इस में मदद करेगा. पर अगर यह युक्ति कामयाब कम होती दिखी तो कनावेरो के पास एक दूसरा रामबाण सरीखा रास्ता भी है. इस के तहत वे या तो मरीज की रीढ़ की हड्डी के भीतर स्टेम सैल पहुंचाएंगे या दिमाग और नाक के बीच पाई जाने वाली झिल्ली की कोशिका यानी औलीफैक्ट्री एंसीथिंग सैल का इस्तेमाल करेंगे, अपनेआप बढ़ने वाली ये कोशिकाएं रीढ़ की हड्डी की तंत्रिकाओं को बढ़ने और जुड़ने के लिए प्रेरित करेंगी. इन के अलावा जुड़ाव के लिए भी कनावेरो के पास एक दूसरी तरह की झिल्ली का जुगाड़ है जो शरीर के भीतर ही पाई जाती है.

कई बार एक शरीर का इम्यून सिस्टम या प्रतिरक्षा प्रणाली दूसरे शरीर के अंगों को अपनाने से नकार देता है, कनावेरो को इस की फिक्र नहीं, क्योंकि अब ऐसी दवाएं, रसायन और तरीके विकसित

किए जा चुके हैं कि ऐसी स्थिति से सफलतापूर्वक निबटा जाए. गले की मांसपेशियों और खून की नलियों को साथ में सिल कर कुछ ही मिनटों में जोड़ देने के बाद सबकुछ ठीक रहा तो 15 मिनट बाद रक्तवाहिकाएं फिर से सिर को रक्त आपूर्ति शुरू कर देंगी. अगले 36 घंटे तक इस औपरेशन से संबंधित अन्य कार्य निबटाए जाएंगे, जैसे उन एलेक्ट्रोडों की स्थापना जो बिजली के धीमे झटके दे कर खून का संचार जारी रखेंगे और तंत्रिकातंत्र तथा मांसपेशियों की बढ़त को उकसाते रहेंगे.

औपरेशन के बाद रक्त संचार शुरू होने के समय से मरीज कम से कम 4 हफ्तों के लिए कोमा में चला जाएगा. कई शारीरिक बदलावों और दूसरी जरूरतों के लिए मरीज का कोमा में जाना भी जरूरी ही है. जब उसे होश आएगा तो वह अपने सिर के नीचे एक स्वस्थ मगर अजनबी शरीर को पाएगा. दिमाग के लिए इस अजनबी शरीर से तालमेल बिठाने के लिए फिजियोथैरेपी के तहत ढेर सारी शारीरिक अभ्यास, कसरतें करनी होंगी जिस से साल के भीतर ही यह नए सिर वाला शरीर चलनेफिरने, बोलनेबतियाने और उस के बाद दूसरे कामकाज के काबिल हो जाएगा

पहले के प्रयास

वर्ष 1908 : गुदरे नामक वैज्ञानिक ने बड़े कुत्ते की गरदन पर छोटे कुत्ते का सिर प्रत्यारोपित किया. इस विचित्र प्राणी का चित्र और बनाए जाने की प्रक्रिया का वर्णन किताब में मौजूद है. खून की नलियों ने 20 मिनट के भीतर ही उस के दिमाग तक खून पहुंचा दिया और नए लगे सिर ने बाकायदा हरकत की. आंख की पुतलियों में हरकत देखी गई, जीभ भी लपलपाई.

वर्ष 1950 : रूसी चिकित्सा वैज्ञानिक देमीखोव ने डेढ़ दशक में लगभग 2 दर्जन पिल्लों के सिरों का प्रत्यारोपण कर सिर काटे जाने और प्रत्यारोपण के बीच के समय को कम करने, बिना औक्सीजन के इसे देर तक रखने और औपरेशन जल्दी निबटाने  में सफलता पाई. नसों को सिलने के लिए खास मशीन का इस्तेमाल किया. प्रत्यारोपण के बाद ज्यादातर कुत्ते 2 से 6 दिन तक जिंदा रहे. एक मामले में तो यह आंकड़ा 29 दिन तक भी पहुंच गया था. 1954 में इस तरह के किए गए एक औपरेशन के बाद प्राणी ने दूध पीने

तक में सफलता पाई. इस बीच, 1959 में चीन ने घोषणा की कि उस के वैज्ञानिकों ने 2 कुत्तों के सिर के प्रत्यारोपण  में कामयाबी पा ली है.

वर्ष 1970 : अमेरिकी न्यूरो सर्जन रौबर्ट जे व्हाइट ने एक बंदर का सिर दूसरे बंदर के धड़ पर प्रत्यारोपित कर दिखाया. व्हाइट की टीम ने दावा किया कि बंदर का प्रत्यारोपित सिर सूंघ सकता है, स्वाद ले सकता है, अपने आसपास के वातावरण को देखसुन, महसूस कर सकता है. दिमाग तक खून का दौरा बनाने में उन्होंने सफलता पाई थी. पर बंदर औपरेशन के बाद कुछ देर ही जिंदा रहा. व्हाइट के साथियों ने इस सफलता को फिर एक दूसरे बंदर के साथ दोहराया पर सबकुछ होने के बावजूद पहले ही की तरह बंदर का निचला हिस्सा लकवाग्रस्त या असंवेदनशील ही बना रहा, रीढ़ का तंत्रिकातंत्र विकसित नहीं हुआ और शरीर के इम्यून सिस्टम ने सिर को नहीं स्वीकारा, बंदर मर गया.

वर्ष 2002 : इस मामले में रूस और अमेरिका की बराबरी को आतुर चीन ने 2002 में दावा किया कि उस ने चूहे के साथ यह सफलता अर्जित की. ठीक ऐसा ही दावा जापानी वैज्ञानिकों ने भी किया. पूरे दशक बाद चीन और जापान के वैज्ञानिकों ने सिर प्रत्यारोपण के मामले में अपने अनुभव साझा किए.

वर्ष 2013 : इतालवी न्यूरो सर्जन ने दावा किया कि उस के पास डा. रौबर्ट व्हाइट से अलग और खास तकनीक तथा योजना है जिस के तहत वे सिर का प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक कर सकते हैं. 2015 में उन्हें सिर देने वाला भी मिल गया. अब वे 2017 तक सिर के प्रत्यारोपण के सफल परिणाम सब को दिखाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

जनवरी 2016 : डा. कनावेरो ने दावा किया कि उन की टीम के एक शल्य चिकित्सक ने बंदर का सिर जोड़ने का काम सफलतापूर्वक किया. उन्होंने एक प्रैस कौन्फैं्रस कर के न सिर्फ औपरेशन के बाद का उस बंदर का चित्र दिखाया बल्कि शल्य प्रक्रिया से जुड़ी कई बातें भी साझा कीं और कहा कि वे दिसंबर में ऐसा ही प्रयोग मानव सिर के साथ करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

रास्ते के रोड़े

कनावेरो सिर बदलने का औपरेशन चीन में करना चाहते थे पर चीन ने साफ मना कर दिया. अब वे चाहते हैं कि चूंकि सिर देने वाले वलेरी स्पिरिदोनफ रूसी नागरिक हैं सो औपरेशन रूस में हो. उन का एक और तर्क यह भी है कि सिर प्रत्यारोपण के विश्वपितामह व्लदिमीर देमिखोव रूस के ही थे, सो रूस को इतिहास बनाने का श्रेय मिलना चाहिए. जाहिर है कनावेरो को इस विवादित औपरेशन के लिए कोई ऐसा देश ढूंढ़ना पड़ेगा जिस का कानून और समाज इस तरह की कवायद की इजाजत दे. धर्म, नैतिकता और समाज के साथ तमाम वैज्ञानिक भी कनावेरो के इस कृत्य के विरोध में है.

कनावेरो ने 2013 में पहली बार इस तरह का विचार सामने रखा था. सर्जिकल न्यूरोलौजी इंटरनैशनल पत्रिका में उन की शोध रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी. तभी से इस का समर्थन और विरोध चालू है. अंगों के प्रत्यारोपण के संबंध में हर देश में अपने नियमकायदे, कानून हैं, बिना इन के बदले इस तरह के तजरबे की इजाजत नहीं दी जा सकती. कनावेरो को पता है समर्थित देश न हुआ तो जेल तय है. फिलहाल, वियतनाम के अस्पताल द्वारा हामी भर देने से और तैयारियां शुरू कर देने से अस्थायी तौर पर इस किए जाने वाले औपरेशन के रास्ते से एक बड़ा रोड़ा हट गया लगता है. 

औपरेशन अगर सफल हो गया तो यह कारनामा अमरत्व की दिशा में एक कदम होगा यह धर्माधिकारियों को कतई रास नहीं आता, किसी का सिर किसी का धड़ यह नैतिकतावादी और परंपरावादियों को पसंद नहीं. दुनिया के तमाम दूसरे चिकित्सक, जिन्हें अपनी बिरादरी का होने के नाते कनावेरो का समर्थन करना चाहिए, वे डा. कनावेरो को सनकी करार दे रहे हैं. उन के मुताबिक ऐसा सोचना जनूनी फंतासी मात्र है, कर पाना नामुमकिन है. रूस इस क्षेत्र में खासा काम कर चुका था और अमेरिकी न्यूरोलौजिस्ट ने भी आगे के समय में शानदार काम किया. ऐसे में एक इतालवी वैज्ञानिक की सफलता से इस क्षेत्र में किए गए सारे काम की सफलता का सेहरा उस के सिर बंध सकता है. इस मामले में महाशक्तियों की राजनीति भी रोड़ा बनी हुई है.

मैं अलग प्रजाति का न्यूरो साइंटिस्ट हूं

–डा. ऐर्जियो कनावेरो, न्यूरोसर्जन

डा. रौबर्ट व्हाइट की बंदर के साथ कोशिश सफल नहीं रही, उन में और आप में अंतर?

उन के पास हैवेन जेमिनी तकनीक नहीं थी. अब सिर को बेहद सलीके से काटने की नई तकनीक बहुत उन्नत है. अब हालिया उदाहरण को लीजिए, मेरे दल के शल्य चिकित्सक श्योपिंग रेन ने बंदर के सिर का सफल प्रत्यारोपण कर साबित कर दिया कि मेरा मौड्यूल बिना दिमाग को नुकसान पहुंचाए सफल है. व्हाइट फंक्शनल तंत्रिका विज्ञानी नहीं थे. मैं अलग प्रजाति का न्यूरोसाइंटिस्ट हूं.

आप को इस में कुछ अनैतिक नहीं लगता?

नहीं. मैं तो बेहद खुश हूं. जरा उस से पूछ कर देखिए जो दर्दनाक चिकित्सकीय परिस्थितियों में पड़ा है. मैं उस से उस को मुक्ति दिलाने का नैतिक व मानवीय प्रयास कर रहा हूं. और्थोडौक्स चर्च ने कहा है कि अगर यह औपरेशन हुआ तो एक शरीर की आत्मा दूसरे शरीर से भिड़ जाएगी, मेरा मानना है कि वे अज्ञानी हैं जो इसे नैतिकता व धर्म का प्रश्न बना रहे हैं.

क्या यह बहुत जल्दी नहीं है, और तजरबे नहीं किए जाने चाहिए थे?

मैं आलोचनाओं से सहमत हूं. आदमी के हवा में उड़ने की अवधारणा का उपहास और आज के बोइंग के बीच कितना कम फासला है.

एक औपरेशन में खर्च 15-20 मिलियन डौलर? अधिक नहीं है?

इस से ज्यादा फुटबौल की टीमों पर खर्च हो जाता है. मैं तो बिल गेट, जुकरबर्ग जैसे लोगों से औपरेशन प्रायोजित करने को कहूंगा. आखिर यह मानवीय इतिहास का एक मोड़ जो है.

इस का भविष्य?

आज 100 चिकित्सक, 36 घंटे, खास अस्पताल और 15 मिलियन डौलर खर्च हो रहे हैं. कल यह सुविधा आप के नजदीकी अस्पताल में होगी और बेहद सस्ती, महीनेभर में सब दुरुस्त. दुनिया में कई अरब लोग होंगे जो इस के आधार पर मरने से मना कर देंगे. यह क्लोनिंग से बढि़या विकल्प होगा.

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