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ये पाकिस्तानी क्रिकेटर करता है धोनी की पूजा

पाकिस्तान के विकेटकीपर-बल्लेबाज सरफराज अहमद ने कहा है कि वह भारतीय टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को अपना आदर्श मानते हैं और उनके जैसा 'फिनिशर' बनना चाहते हैं.

अहमद ने कहा कि निश्चित तौर पर धोनी से मुझे प्रेरणा मिलती है. वह विकेटकीपिंग और बल्लेबाजी दोनो बहुत ही बेहतर तरीके से करते हैं. वह एक बेहतरीन विकेटकीपर हैं. मैं उन्हें पूजता हूं. जिस तरह से वह एक पारी को पूरा करते हैं, मैं वहीं पाकिस्तान के लिए करना चाहता हूं.

सफराज ने अस्थायी रूप से पाकिस्तानी टीम के लिए बल्लेबाज की भूमिका निभाई है और वह अपनी टीम की जरूरत के हिसाब से इस क्रम को जारी रखना चाहते हैं. एशिया कप में पाकिस्तान को बांग्लादेश के हाथों हार मिली थी. वह एशिया कप के फाइनल में नहीं पहुंच सका था. भारत ने फाइनल में बांग्लादेश को हराया था.

अपने एशिया कप अभियान के बारे में सरफराज ने कहा कि बांग्लादेश में स्थिति काफी खराब थी. हर टीम के लिए पहले छह ओवर काफी मुश्किल थे, लेकिन अब हमने सभी चीजें सुलझा ली हैं और आशा है कि हम यहां बेहतर प्रदर्शन करेंगे.

ईडन गार्डन्स स्टेडियम में पाकिस्तान का सामना भारत से 19 मार्च को होगा और सरफराज का मानना है कि दोनों टीमों पर समान दबाव होगा. सरफराज ने कहा कि यह बहुत बड़ा खेल है. दोनों टीमों पर समान दबाव होगा. हम यहां बेहतर क्रिकेट खेलने की पूरी कोशिश करेंगे.

यह भी खूब रही

मेरे मित्र के 3 वर्षीय पुत्र मानू को दूसरों की उंगली अपने मुंह में डाल कर काटने की बुरी आदत थी. एक दिन मैं अपने 7 वर्षीय भतीजे हर्ष के साथ वहां गया तो मानू ने मेरी उंगली भी अपने मुंह में रख कर काट ली. यह देख कर हर्ष ने मेरी जेब से स्टील का पैन निकाला और उंगली के नीचे छिपा कर मानू को अपना मुंह खोलने को कहा. मानू के मुंह खोलते ही हर्ष ने अपनी उंगली उस के मुंह में रख दी और मुंह बंद होने से पहले ही अपनी उंगली निकाल कर पैन मुंह में ही छोड़ दिया. मानू ने 2-3 बार पैन में दांत मारे और फिर ‘आह’ कर के छोड़ दिया. उस के बाद तो मित्र ने भी यही उपाय बारबार अपनाकर उस की यह बुरी आदत सदा के लिए छुड़वा दी.

मुकेश जैन ‘पारस’, बंगाली मार्केट (न.दि.)

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सुनीता अस्पताल में काफी दिनों से भरती थी. ठीक होने पर उसे अस्पताल से छुट्टी मिली तब वह वापस घर जाने को तैयार नहीं थी. पति ने व बेटेबहुओं ने समझाया तब भी वह जिद पर अड़ी रही. पास की मरीज महिला सुधा यह नजारा काफी देर से देख रही थी. वह सुनीता के पास आ कर बोली, ‘‘बहन, अस्पताल से सब को घर जाने की जल्दी होती है. वे खुश होते हैं. तुम्हें यह खुशी का मौका मिला, फिर भी तुम घर जाने से इनकार कर रही हो, क्यों?’’

‘‘बहन, अस्पताल में एसी का जो सुख है वह घर पर नहीं मिलेगा. मैं इस सुख से वंचित होना नहीं चाहती.’’ अस्पताल के गमगीन माहौल में भी सुनीता के उत्तर ने सब को हंसाहंसा कर लोटपोट कर दिया.

रेणुका श्रीवास्तव, लखनऊ (उ.प्र.)

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घर में मामाजी आए हुए थे. वे मजाकिया स्वभाव के हैं. मार्च का महीना था. रात होते ही मच्छरों ने भिनभिनाना और काटना शुरू कर दिया. उन दिनों औलआउट नहीं था. चेहरे व हाथों पर ओडोमास का प्रयोग किया जाता था. यह क्रीम लगाने से मच्छर नहीं काटते थे. रात को सोते समय मामाजी ने भी क्रीम लगाई. वे हर 10 मिनट बाद शरीर खुजाते हुए बोलते, ‘‘मच्छर काट रहे हैं.’’ मम्मी बोली, ‘‘क्रीम थोड़ी ही सही पर अपना असर जरूर दिखाएगी.’’ पर मामाजी की रट जारी रही और फिर वे अचानक चुपचाप सो गए. दूसरे दिन सुबह मम्मी ने कहा, ‘‘भैया, अच्छी नींद आई न, आखिर क्रीम का असर जो हुआ.’’ मामाजी बोले, ‘‘हां बिलकुल, मैं ने क्रीम शरीर पर लगाने के साथसाथ पूरी चादर पर भी लगा दी और मजे से सो गया.’’ मामाजी की बात सुन कर हम सब हंसतेहंसते लोटपोट हो गए.

रेणुका चिंचोलकर, नागपुर (महा.)

बजट : सरकार के लिए

जिन लोगों ने सामूहिक रूप से हल्ला मचाते हुए नरेंद्र मोदी को विकास का देवदूत बना कर लोकसभा चुनाव जिताया था और उम्मीदें की थीं कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनते ही अमीरों व समर्थों के भाग्य के दरवाजे खुल जाएंगे, उन्हें वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा संसद में पेश किए गए आम बजट से फिर निराशा हुई होगी क्योंकि बजट में व्यापारियों, उद्योगपतियों, शेयर बाजार के कर्ताधर्ताओं, मकानमालिकों, भवन निर्माताओं आदि के लिए कुछ नहीं है. उन्हें न कर में छूट दी गई है न उन के लिए नए कानूनों की प्रस्तावना है. छिटपुट ऊंचनीच है जो बेमतलब की, शायद धार्मिक सी रस्म निभाने की कोशिश है.

सरकार का बजट आजकल देश के लिए बहुत ज्यादा महत्त्व का होता है क्योंकि आम जनता के हाथ क्या बचेगा, क्या उस से छीना जाएगा, उसी से तय होता है. बजट में उम्मीद थी कि उदासीन हालात में चमक डालने के लिए कुछ किया जाएगा और उद्योगों व व्यापारों को बढ़ाने की कोशिशें होंगी पर ऐसा नजर नहीं आया.

सरकार अपना राजस्व खोए बिना भी बहुतकुछ ऐसा कर सकती है जिस से जनता को लाभ हो सके. आज जनता कर देने से उतना नहीं घबराती जितना कर को वसूलने वाली प्रक्रिया के कारण भयभीत रहती है. ठीक है केंद्र सरकार जनरल सेल्स ऐंड सर्विस टैक्स यानी जीएसटी लाना चाहती है पर संसद के गतिरोध के कारण ऐसा हो नहीं पा रहा लेकिन फिर भी बजट में सैकड़ों छोटेछोटे प्रावधान लाए जा सकते थे जिन से जीवन सरल बनाया जा सके. ऐसा हुआ कुछ नहीं.

सरकार ने न फालतू के कर, उपकर कम किए न उत्पादन, सेवा कर कम किए, न नियम सुधारे और न ही सपने दिखाए. यह कहना कि 5 साल में बैठेबिठाए किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी, यह केवल राजनीतिक जुमला है. 5 सालों के दौरान महंगाई कितनी बढ़ेगी, क्या इस का भी अंदाजा है? देश में जो तरक्की दिख रही है वह असल में उस तकनीक के कारण है जो हम ने न बनाई है न उस में कुछ जोड़ा है. हम से गाडि़यां और मोबाइल तक नहीं बनते. हमारे उद्योग विदेशी इशारों पर चलते हैं, विदेशी मशीनों पर फलतेफूलते हैं. खेती की आमदनी में थोड़ा बदलाव आया है पर उस के लिए राज्य सरकारें श्रेय लेंगी, केंद्र सरकार नहीं.

यह न भूलें कि भारत में ही दुनिया के सब से अधिक गरीब हैं. प्रसव के वक्त भारत में ही सब से ज्यादा औरतें मरती हैं. भारत में ही सब से ज्यादा अनपढ़ हैं. भारत में ही बीमारों की संख्या सब से ज्यादा है. हम 7 प्रतिशत की प्रगति पर फूल नहीं सकते. भारत की जनसंख्या दुनिया में सब से ज्यादा बढ़ रही है और पिछले 15-20 सालों में देश में जो चमक बढ़ी थी, अब बढ़नी बंद हो चुकी है. मानवीय अधिकारों की हत्या के इस नए दौर में केंद्र सरकार का आम बजट किसी भी वर्ग को संतुष्ट न करेगा. यह निराशाजनक है. यह बजट हमेशा की तरह केवल सरकार द्वारा, सरकार के लिए है.

 

बौलीवुड टू हौलीवुड

इरफान खान ने जहां हौलीवुड में अपना एक दशक पूरा किया वहीं अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने भी पीपुल चौइस अवार्ड जीत कर हौलीवुड में अपनी धमक जाहिर कर दी है. अब तक हौलीवुड की फिल्मों में चंद मिनटों के रोल में सिमटे रहने वाले बौलीवुड कलाकार अब ‘ए’ ग्रेड फिल्मों में लीड रोल हथिया रहे हैं. पहले प्रियंका ने क्वांटिको में यही काम किया और अब दीपिका पादुकोण ने हौलीवुड में अपना डेब्यू हौलीवुड ऐक्टर विन डीजल के साथ आने वाली फिल्म ‘एक्सएक्सएक्स : द रिटर्न औफ जैंडर केज’ से किया है.  जिस तरह से सिनेमा अपनी सीमाओं को तोड़ कर दर्शकों तक पहुंच रहा है, उस से इस उद्योग के बढ़ते कदमों का अंदाजा लगाया जा सकता है. शायद सिनेमा का स्वर्णिम ग्लोबल दौर यही है.

जेल से निकले संजय

1993 के मुंबई बम धमाके मामले में सजा काट रहे संजय दत्त अब रिहा हो चुके हैं. रिहा होते ही संजय ने बाकायदा प्रैस कौन्फ्रैंस कर जेल में बिताए दिनों के अनुभवों को साझा किया. संजय कहते हैं कि वे अपने मातापिता को मिस करते हैं. वे होते तो देखते कि उन का बेटा आजाद हो गया है. संजय दत्त का फिल्म उद्योग में जम कर स्वागत हो रहा है. उन के हाथ में अभी से 7 बड़े प्रोजैक्ट हैं. जिन्हें वे कुछ दिन परिवार के साथ बिताने के बाद, शुरू करेंगे. उन का कहना है कि सोहम शाह की फिल्म ‘शेर’ जो काफी समय से उन की वजह से अधर में लटकी है, उसे पूरा करना प्राथमिकता है. फिलहाल वे अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अपनी आजादी का जश्न मनाने में मसरूफ हैं.

कमबैक करेंगी पूजा

अभिनेत्री पूजा भट्ट ने अपने कैरियर की लगभग सभी फिल्में अपने पिता के निर्देशन में ही की हैं. फिर चाहे वह ‘दिल है कि मानता नहीं’, ‘सड़क’, ‘फिर तेरी कहानी याद आई’ हो या ‘जख्म’. आखिरी बार उन्हें महेश भट्ट निर्देशित फिल्म ‘जख्म’ में देखा गया था. लगभग 18 साल के बाद अब वे फिर से बड़े परदे पर वापसी कर रही हैं. इस बार फिल्म का निर्देशन भले ही उन के पिता महेश भट्ट नहीं कर रहे हों लेकिन उस की पटकथा महेश भट्ट ने ही लिखी है.

सालों बाद वापसी को ले कर पूजा का कहना है कि काफी समय तक उन्हें अपने पिता की तरह गंभीर विषय की फिल्में नहीं मिलीं, लिहाजा उन्होंने अभिनय भी छोड़ दिया. पर अब कुछ लोगों के पास ऐसी अच्छी कहानियां हैं जो मेरे पिता की लिखी कहानियों से कहीं बेहतर हैं, इसलिए दोबारा अभिनय की नई शुरुआत कर रही हूं.

फिल्म संरक्षण मुहिम

भारतीय सिनेमा की कई अहम फिल्मों के प्रिंट जल चुके हैं और कई इतनी खराब स्थिति में हैं कि उन का इस्तेमाल नहीं हो सकता. हमारे यहां किसी भी तरह की विरासत को संरक्षित करने की परंपरा नहीं रही है. लेकिन बीते दिनों फिल्म हैरिटेज फाउंडेशन ने वायकौम 18 के साथ जुड़ कर भारतीय सिनेमाई विरासत को बचाए रखने के लिए ‘फिल्म प्रिजर्वेशन ऐंड रैस्टोरेशन वर्कशौप 2016’ का आयोजन किया. यह कार्यक्रम पुणे के ‘नैशनल फिल्म आर्काइव औफ इंडिया’ में हुआ. इस मुहिम को समर्थन देने के लिए नसीरुद्दीन शाह और बिग बी भी आगे आए. नसीरुद्दीन शाह की 50 फिल्में आर्काइव सूची में शामिल की गईं.

हंसल का पत्रलेखा कनैक्शन

हंसल मेहता की फिल्म ‘सिटी लाइट’ में बौलीवुड में अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली अदाकारा पत्रलेखा हंसल मेहता को अपना गुरु मानती हैं. किसी भी फिल्म को साइन करने से पहले या किसी प्रोजैक्ट के लिए हामी भरने से पहले वे हंसल से जरूर राय लेती हैं. पत्रलेखा का मानना है, ‘अब तक मैं ने ऐक्ंिटग और सिनेमा के बारे में जो कुछ सीखा है, सब उन से ही सीखा है.’ वैसे पत्रलेखा कथित तौर पर राजकुमार राव के साथ डेट कर चुकी हैं और ‘सिटी लाइट’ भी शायद राजकुमार के जरिए ही मिली होगी. हंसल जैसा मार्गदर्शक कौन नहीं चाहेगी जिन की फिल्में जम कर अवार्ड बटोर रही हों.

क्या है मिस्र के पिरामिडों का रहस्य

संसार के 7 आश्चर्यों में से एक मिस्र के पिरामिडों का रहस्य जानने की नए सिरे से कोशिश हो रही है. इस अभियान में मिस्र के अलावा फ्रांस, कनाडा और जापान के विशेषज्ञ एकसाथ जुटे हैं, जिन का मुख्य उद्देश्य है पिरामिडों की तकनीक और इन के अंदर के चैंबर के रहस्य जानना. प्राचीन मिस्रवासियों की धारणा थी कि उन का राजा किसी देवता का वंशज है, अत: वे उसी रूप में उसे पूजना चाहते थे. मृत्यु के बाद राजा दूसरी दुनिया में अन्य देवताओं से जा मिलता है, इस धारणा के चलते राजा का मकबरा बनाया जाता था और इन्हीं मकबरों का नाम पिरामिड रखा गया था. दरअसल, प्राचीन मिस्र में राजा अपने जीवनकाल में ही एक विशाल एवं भव्य मकबरे का निर्माण कराता था ताकि उसे मृत्यु के बाद उस में दफनाया जा सके. यह मकबरा त्रिभुजाकार होता था. ये पिरामिड चट्टान काट कर बनाए जाते थे. इन पिरामिडों में केवल राजा ही नहीं बल्कि रानियों के शव भी दफनाए जाते थे. यही नहीं, शव के साथ अनेक कीमती वस्तुएं भी दफन की जाती थीं. चोरलुटेरे इन कीमती वस्तुओं को चुरा कर न ले जा सकें, इसलिए पिरामिड की संरचना बड़ी जटिल रखी जाती थी. प्राय: शव को दफनाने का कक्ष पिरामिड के केंद्र में होता था.

पिरामिड बनाना आसान नहीं था. मिस्रवासियों को इस कला में दक्ष होने में काफी समय लगा. विशाल योजना बना कर नील नदी को पार कर बड़ेबड़े पत्थर लाने पड़ते थे. पिरामिड बनाने में काफी मजदूरों की आवश्यकता होती थी. पत्थर काटने वाले कारीगर भी अपने फन में माहिर होते थे. ऐसी मान्यता है कि पिरामिड ईसापूर्व 2690 और 2560 शताब्दियों में बनाए गए. सब से पुराना पिरामिड सक्कारा में स्थित जोसीर का सीढ़ीदार पिरामिड है. इसे लगभग 2650 ईसापूर्व बनाया गया था. इस की प्रारंभिक ऊंचाई 62 मीटर थी. वैसे काहिरा में गीजा के दूसरी शताब्दी ईसापूर्व के पिरामिड संसार के 7 आश्चर्यों में शामिल हैं.

वर्तमान में मिस्र में अनेक पिरामिड मौजूद हैं, इन में सब से बड़ा पिरामिड राजा चिओप्स का है. राजा चिओप्स के पिरामिड के निर्माण में 23 लाख पत्थर के टुकड़ों का इस्तेमाल हुआ था. इसे बनाने में एक लाख मजदूरों ने लगातार काम किया था. इसे पूरा होने में करीब 30 वर्ष का समय लगा. इस के आधार के किनारे 226 मीटर हैं तथा इस का क्षेत्रफल 13 वर्ग एकड़ है. मिस्र के पिरामिडों का रहस्य जानने के लिए नवीनतम टैक्नोलौजी का उपयोग किया जा रहा है. इस दौरान जानने का प्रयास किया जाएगा कि इन पिरामिडों को किस तकनीक से बनाया गया है और इन के अंदर ऐसे चैंबर तो नहीं हैं, जिन्हें अब तक नहींखोला जा सका है. इस के लिए इन्फ्रोटड कार्योग्राफी का इस्तेमाल किया जाएगा. यह तकनीक किसी चीज से निकलने वाली इन्फ्रारैड ऊर्जा और उस के आकार वगैरा की पहचान करती है. फिर उस के जरिए छिपी हुई चीज का पता चलना आसान हो जाता है.

3डी लेजर स्कैन तकनीक में से किसी चीज के अंदरूनी हिस्से के आकलन में मदद मिलेगी. इस से स्कैनिंग के बाद उस की 3डी इमेज बनाई जाएगी. कौस्मिक डिटैक्टर तकनीक के जरिए भवनों के अंदर गए बिना भी उन के अंदर रखी चीजों का पता चल जाता है और उस चीज को नुकसान भी नहीं पहुंचता. विचार यह है कि पिरामिड की बनावट की अंदरूनी जानकारी जुटा कर 3डी इमेज बनाई जाए. मिस्र के गीजा के पिरामिड पर किए जा रहे एक थर्मल स्कैन प्रोजैक्ट में रहस्यमयी हीट स्पौट्स नजर आए हैं. ‘स्कैन पिरामिड’ नाम से चलाए जा रहे इस प्रोजैक्ट में पिरामिड के इन्फ्रारैड थर्मल को स्कैन किया गया. सूर्योदय व सूर्यास्त के समय जब तापमान में बदलाव आता है तो उस समय इन स्कैनर्स के जरिए ये स्पष्ट नजर आए. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन पिरामिडों में खासतौर पर सब से बड़े खुफू पिरामिड में और कब्रें व गलियारे मौजूद हैं, जिन के बारे में अभी दुनिया के लोग नहीं जानते. मिस्र, जापान, कनाडा और फ्रांस के वैज्ञानिक और आर्किटैक्ट इस प्रोजैक्ट पर काम कर रहे हैं. एक समय था जब यहां लोगों की इतनी भीड़ होती थी कि मिस्र के पिरामिडों की तसवीर लेना भी दूभर होता था. 2010 में जहां यहां डेढ़ करोड़ पर्यटक आए थे वहीं 2014 में उन की संख्या घट कर 90 लाख रह गई. आज आईएस के बढ़ते खौफ के चलते पर्यटक हजारों साल पुरानी इन अद्भुत कलाकृतियों को देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. आतंकी घटनाओं के चलते पर्यटक अपनी जान जोखिम में नहीं डालना चाहते. कभी लाखों पर्यटकों की भीड़ से गुलजार रहने वाला यह विश्वविख्यात पर्यटन स्थल आज वीरान पड़ा है और इक्केदुक्के लोग ही यहां नजर आते हैं.

पर्यटन व्यवसाय को हुए बड़े नुकसान का खमियाजा स्थानीय लोगों को भुगतना पड़ रहा है. हालत यह है कि उन्हें फाके करने पर मजबूर होना पड़ रहा है. मिस्र में कुछ समय से पिरामिडों पर चल रहे शोध में वैज्ञानिकों को बड़ी जानकारी हाथ लगी है. वैज्ञानिकों और मिस्र सरकार के अधिकारियों का दावा है कि ‘वैली औफ किंग्स’ में तूतनखामन की ममी के नीचे और भी कमरे हैं, जिन में ऐसे राज हैं जिन के बारे में अभी कोई जानकारी नहीं है. आर्कियोलौजिस्ट निकोलस रीव्स के अनुसार तूतनखामन की ममी को एक बाहरी चैंबर में रखा गया है, जिस के नीचे और कमरे या गलियारे हो सकते हैं, जिन में सामान व ममीज भी हो सकती हैं. रीव्स का कहना है कि तूतनखामन की कब्र को असल में रानी नेफरतीती के लिए बनाया गया था. विशेषज्ञों के अनुसार तूतनखामन की कब्र के नीचे ही किसी अन्य कमरे में नेफरतीती की भी कब्र हो सकती है. ऐसा माना जाता है कि लगभग 3 हजार से 3,500 साल पहले तूतनखामन की मौत हुई उस समय उन की उम्र 19 साल के आसपास थी.

1922 में तूतनखामन की ममी को खोजा गया था. ब्रिटिश पुरातत्त्ववेत्ता हौवर्ड कार्टर ने फराओ (राजा) की इस ममी को ढूंढ़ा था. ममी ने तावीज पहन रखा था और पूरा चेहरा सोने से बने मास्क से ढका हुआ था. कार्टर और उन की टीम ने फराओ के चेहरे से मास्क भी उतारा था. कहा जाता है कि अब तक केवल 50 लोगों ने तूतनखामन के चेहरे को देखा है. इस ममी को एक ताबूत में रखा गया था और जब इस प्राचीन शासक के शरीर को इस से बाहर निकाला गया तो उस का चेहरा झुर्रीदार और काला था. हालांकि बाद में वापस मास्क लगा दिया गया था. उन की कब्र से सोने और हाथी दांत की बनी ढेरों कीमती चीजें मिली थीं.

क्या इंसान पहुंच गया है अमर होने के करीब

दरअसल, अभी हम ने सिर्फ पौराणिक कथाओं या जनश्रुतियों में ही अमरता की मनगढ़ंत रोमांचक कहानियां पढ़ी या सुनी थीं. मगर पिछले दिनों एक रूसी वैज्ञानिक अनातोली ब्रौउचकोव किस्सेकहानियों में अटकी इस अमरता को किसी हद तक वास्तविक जीवन तक खींच लाए हैं. लगता है उन्होंने वह नुसखा भी हासिल कर लिया है, जो इंसान को बारबार के जीवनमरण के झंझट से मुक्त कर देगा.

जी हां, हम ऐसी ही वास्तविक अमरता की बात कर रहे हैं, जिसे हासिल करने में दुनिया के तमाम खोजी वैज्ञानिक सदियों से लगे हुए हैं. अनातोली ने अपने इस प्रयोग के लिए जो शुरुआती मानक तय किए थे, वे तकरीबन सही मालूम पड़ रहे हैं.

जिस प्रयोग की बदौलत यहां अमरता की बात की जा रही है, लगता है उस ने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है, क्योंकि अमरता का खुद पर प्रयोग करने वाले वैज्ञानिक पिछले 2 साल में एक बार भी बीमार नहीं पड़े. उन का इम्यून सिस्टम कुछकुछ वैसा ही रिऐक्ट कर रहा है, जैसी उन्होंने कल्पना की थी. इस वैज्ञानिक प्रयोग की यह सफलता इसे अब तक के दूसरे प्रयोगों से अलग और विश्वसनीय बनाती है.

दरअसल, 35 लाख साल पुराने बैक्टीरिया पर प्रयोगशाला में रिसर्च कर रहे रूसी वैज्ञानिक अनातोली ब्रौउचकोव ने सोचा अगर इस बैक्टीरिया को इंसान के शरीर में प्रविष्ट कराया जाए तो हमें शायद यह पता चल सके कि लाखों साल से जिंदा रहने वाला यह बैक्टीरिया इंसान के लिए कितना उपयोगी हो सकता है.

क्या इंसान इस से सुरक्षित होने के बाद दुनिया के किसी भी बैक्टीरिया से सुरक्षित हो जाएगा  क्या उस का इम्यून सिस्टम सभी तरह के बैक्टीरिया से लड़ने में सक्षम होगा  रूसी वैज्ञानिक के दिलोदिमाग में इंसान के इम्यून सिस्टम को बेजोड़ बनाए जाने की कल्पना को ले कर ऐसी अनगिनत बातें चल रही थीं.

अनातोली ने अपने इस प्रयोग के लिए लोगों को तलाशा पर जब कोई तैयार नहीं हुआ तो उन्होंने खुद पर ही प्रयोग करने की ठानी. यह समझने के लिए कि इस से इंसानी जीवन पर क्या फर्क पड़ता है  यह उन का दावा नहीं एक अनुमान है और यह हर उस इंसान का अनुमान हो सकता है जो उन्हीं की तरह अमरता की तलाश कर रहा हो.

उन का मानना है कि यदि कोई बैक्टीरिया 35 लाख साल से जिंदा है तो क्या वह अपने प्रभाव से इंसान को भी लंबा जीवन प्रदान नहीं कर सकता  अभी तक तो उन का अनुमान आशानुकूल है, क्योंकि जब से उन्होंने अपने शरीर में अवैज्ञानिक ढंग से इस तथाकथित बैक्टीरिया का प्रवेश किया है, तब से वे एक बार भी किसी तरह की बीमारी विशेषकर फ्लू तक की चपेट में नहीं आए.

उन का दावा है कि करोड़ों साल से जिंदा यह बैक्टीरिया बेहद शक्तिशाली है, जो मर ही नहीं रहा है. ऐसे में संभव है कि यह मनुष्य को भी अमरता प्रदान करे.

इंगलैंड के अखबार ‘द टैलिग्राफ’ में छपी खबर के मुताबिक, रूसी वैज्ञानिक अनातोली ब्रौउचकोव मास्को विश्वविद्यालय में जियोक्रौयोलौजी डिपार्टमैंट के मुखिया हैं जिन्होंने पिछले लगभग सवा 2 साल से इस करामाती बैक्टीरिया को अपने शरीर में पनाह दी है, तब से वे बिना जिम गए भी बेहद फिट हैं.

इस बैक्टीरिया का नाम बसिलस एफ है. उन्हें यह ध्रुवीय इलाके में मिला. जांचने से मालूम हुआ कि यह बैक्टीरिया 35 लाख साल से जिंदा है. इस बैक्टीरिया पर अनातोली अपनी टीम के साथ काफी समय से काम कर रहे थे. उन के मुताबिक, ‘‘हम ने 2 साल तक इस का प्रयोग चूहों पर किया, लेकिन निर्णायक रूप से कुछ समझ नहीं आ रहा था. इसलिए अंतत: मैं ने इसे खुद पर प्रयोग करने की सोची. जब से मैं ने इस का खुद पर प्रयोग किया है तब से मुझे जुकाम तक नहीं हुआ है.’’

वे कहते हैं, ‘‘हो सकता है हम जो उम्मीद लगाए बैठे हैं वह पूरी न हो, लेकिन मेरा अनुभव यही है कि यह बैक्टीरिया खतरनाक तो नहीं है. ऐसे में अमरता न सही अगर जीवन को यह बैक्टीरिया लंबा भी करता है तो क्या बुराई है ’’

अनातोली ने इस बैक्टीरिया को बिना कोई सावधानी बरते सीधे अपने शरीर में इंजैक्ट किया था.

वैसे यह प्रयोग कितना सफल है  अनातोली कहते हैं, ‘‘इस का मेरे पास कोई आंकड़ा नहीं है, क्योंकि इसे मैं ने अपने शरीर में किसी आधिकारिक अनुमति से प्रविष्ट नहीं कराया है. इस का कोई रिकौर्ड नहीं है. मगर इस की सफलता की गारंटी मेरा सवा 2 साल तक पूरी तरह से स्वस्थ रहना है.’’

अमरता के लिए हमेशा से कई वैज्ञानिक खोजों में लगे रहे हैं और अंतत: असफल हो कर शांत बैठ गए. ऐसे में अनातोली ब्रौउचकोव की यह अधूरी खोज किसी अनमोल सपने से कम नहीं लगती.

जैली फिश से भी हो सकता है अमरता का चमत्कार

 

अमरता के लिए आज तक दुनिया में दोचार नहीं बल्कि करोड़ों प्रयोग व खोजें हो चुकी हैं लेकिन अमरता इंसान के हाथ नहीं लगी.

 

कुछ साल पहले ऐसी ही उम्मीद सागर की अतल गहराइयों से पैदा हुई थी. तब भी काफी विश्वास के साथ घोषणा की गई थी कि अमरता की कुंजी मिल गई है. हिंदू माइथोलौजी में भी संजीवनी यानी अमृत की उत्पत्ति, समुद्र से ही होती है. शायद हमारे पुरखों को यह आभास था कि अमरता का मूलमंत्र कहीं न कहीं सागर की गहराइयों में ही छिपा है. कहीं न कहीं आधुनिक विज्ञान भी समुद्र में ही अमरता का मूलतंत्र तलाश रहा है.

 

कुछ साल पहले इंसान की अमरता की चाहत की खोज उसे एक समुद्री मछली की ओर ले गई थी जो तकनीकी दृष्टि से कभी नहीं मरती. घोर विपरीत परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर भी वह फिर से जवान और बच्चा होने के उलटे चक्र की ओर चल पड़ती है. यह कोई तिलिस्म नहीं है. यह है अपनी जानीपहचानी जैली फिश. अगर कोई शिकारी इसे खा न ले या फिर यह दुर्घटनावश या बीमारी की चपेट में आ कर अपनी जान न गवां बैठे तो यह अमर है. जैली फिश प्रजाति का वैज्ञानिक नाम है, ट्यूरीटोप्सिस न्यूट्रीकुला, जिसे इम्मार्टल जैली फिश भी कहते हैं. यह प्रजाति जवान होने पर यानी अपने जीवनकाल के मेड्यूसा अवस्था से फिर अपने बाल्यकाल अर्थात पालिप अवस्था को लौटने की अद्भुत क्षमता रखती है. वैज्ञानिकों की भाषा में जैली फिश, जो प्राणी समुदाय के मेटाजोआ श्रेणी की नुमाइंदगी करती है, में रिवर्स एजिंग यानी जीवन के उलटे चक्र की विशेषता पाई जाती है, जिसे ट्रांसडिफरैंसिएशन कहा जाता है.

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