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सफाई, कर्मी, हड़ताल

दिल्ली के नगर निगमों के सफाई कर्मचारियों की हड़ताल ने पहले से ही प्रदूषण से भरी दिल्ली को अब कूडे़ और बदबू से भर दिया. ऐसा नहीं कि हड़ताल से पहले दिल्ली साफ थी. देश की महान सभ्यता के हिसाब के अनुसार दिल्ली का चप्पाचप्पा, हर बस्ती, यहां तक कि हर रिहायशी सोसायटी पहले ही गंदी, बेतरतीब, बदबूदार और बजबजाती नालियों वाली थी, हड़ताल से हालत और खराब हो गई.

दिल्ली की सफाई का जिम्मा 3 नगर निगमों का है और तीनों पर लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है. स्वच्छ भारत का नारा लगाने वाली भाजपा देश को क्या साफ करेगी जब दिल्ली को ही कभी आदर्श शहर न बना पाई. मंत्रों और हवनों से शहर साफ नहीं होते, ऊपर से सफाई कर्मचारियों की हड़ताल.

सफाई का काम ऐसा है जिस के कर्मचारियों की हड़ताल कभी बर्दाश्त नहीं की जा सकती, हालांकि दुनिया के कितने ही शहरों में सफाई कर्मचारी अपनी धौंस जमाने के लिए हड़ताल के जरिए शहरी प्रशासन को डराते रहते हैं. शहरी कितने ही सफाईपसंद क्यों न हों, अगर हड़ताल हो जाए तो वे अपने कचरे का क्या करें, यह वे नहीं जानते. दिल्ली में तो हर रोज, हड़ताल हो या न हो, घर का कचरा महल्ले के कोने में फेंक कर विजयप्राप्ति का अनुभव किया जाता है. कोने से कचरा उठाने वाला नहीं आया, तो पक्का है शहर भभकेगा.

इस मामले में आग तब लग गई जब नगर निगम दिल्ली सरकार से पैसे की मांग करने लगे. दिल्ली में सरकार आम आदमी पार्टी की है, जिस से भाजपाई कुढ़ रहे हैं क्योंकि उस ने पिछले विधानसभा चुनाव में 67-03 से हरा कर नरेंद्र मोदी के चांद पर गहरा घाव दिया था. अरविंद केजरीवाल ने पैसे की मांग को यह कह कर ठुकरा दिया कि नगर निगमों का पैसा रिश्वतों में चला जाता है जबकि उन की आय कम नहीं है और राज्य सरकार को संवैधानिक रूप से स्वतंत्र नगर निकायों को संभालने का कोई दायित्व नहीं है.

अब पहले से ही गंदी दिल्ली कराहती रही. दिल्ली में होहल्ला इसलिए नहीं हुआ क्योंकि हमें गंद में जीने की आदत है. हमारे यहां लोग अपनी दुकान के सामने पेशाब कर लेते हैं, घरों की छतों पर कूड़ा जमा कर लेते हैं. जमा होते गंदे पानी पर एतराज नहीं करते. उन्हें शायद भान ही नहीं कि शहर पर हड़ताल थोपी गई. वे तो ऐसे ही जीने के आदी हैं. यहां तो राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री के घरों के पास कूड़े के ढेर, बेतरतीब उगी घास, मुरझाए पेड़, टूटी सड़कें दिख जाएंगी. सफाईकर्मी हड़ताल कर के इस तरह के शहर का क्या बिगाड़ेंगे.

प्यार की बदलती परिभाषा

21 वर्षीया सीमा होंठों पर प्यारी सी मुसकान लिए और हाथों में गुलाब का बड़ा सा गुलदस्ता लिए दिल्ली के आईटीओ बस स्टैंड पर किसी का इंतजार कर रही है. उसे देख यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि वह किस का इंतजार कर रही है. भले यह वैलेंटाइन डे की शाम न हो फिर भी उस के हावभाव कह रहे हैं, वह अपने दिलदार का इंतजार कर रही है. सीमा के हाथ में खूबसूरत से लिफाफे में बंद एक बड़ा डब्बा भी है, जो शायद उस के बौयफ्रैंड के लिए बर्थडे गिफ्ट होगा.

पिछले कुछ सालों में सीमा जैसी युवतियों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है. हालांकि प्यार चाहे आदिम युग में किया गया हो या इंटरनैट युग में, वह कभी नहीं बदला. लेकिन पिछले कुछ सालों में जिस तरह हर क्षेत्र में आमूलचूल ढंग से परिवर्तन देखने को मिले हैं, प्यार भी इन बदलावों से अछूता नहीं है. आज इजहार का तरीका बदल गया है, इकरार के अंदाज बदल गए हैं. इंटरनैट युग में हर चीज तुरतफुरत वाली हो गई है. ऐसे में भला प्यार कैसे पीछे रह सकता था? अब न कोई लड़का प्रेम प्रस्ताव देने के लिए कई दिनों का इंतजार करता है और न ही कोई लड़की उस की हामी में वक्त लगाती है.

अगर कहा जाए कि आज की तारीख में प्यार पहले की तुलना में ज्यादा वास्तविक हो गया है तो कतई गलत नहीं होगा. जी, हां. लैलामजनू, हीररांझा जैसे प्यार अब बमुश्किल ही देखने को मिलते हैं. इस का मतलब यह कतई नहीं है कि प्यार पहले के मुकाबले अब लोगों में कम हो गया है या फिर अब वादों और इरादों की जगह खत्म हो गई है. दरअसल, प्यार अब गिव ऐंड टेक की पौलिसी बन चुका है. बेशक ये शब्द थोड़े रूखे हैं लेकिन वास्तविकता यही है. ऐसा नहीं है कि यह बदलाव एकाएक देखने को मिल रहा है. पिछले कुछ सालों में धीरेधीरे चल कर यह बदलाव यहां तक पहुंचा है.

इस में सब से बड़ी वजह महिलाओं का आत्मनिर्भर होना है. इन बातों को बहुत समय नहीं गुजरा है जब प्रेमी जोड़े एकसाथ बाहर घूमने जाया करते थे, लड़कियां आमतौर पर लड़कों पर पूरी तरह निर्भर होती थीं. यहां तक कि कहां घूमने जाना है, क्या खाना है जैसे सारे फैसले लड़के ही करते थे. मगर अब ऐसा नहीं है.

आज लड़कियां पढ़ीलिखी हैं, समझदार हैं और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं. आर्थिक रूप से मजबूत होने के कारण ही अब वे किसी और पर फैसले नहीं छोड़तीं और न ही दूसरे के फैसले खुद पर लदने देती हैं. कहीं जाना हो, कुछ खाना हो या कोई तोहफा खरीदना हो तो वे मन मार कर नहीं रहती हैं. वे बिंदास हो कर इन बातों को अपने बौयफ्रैंड से साझा करती हैं.

यही कारण है कि अब प्यार बेफिक्री का नाम भी हो गया है. लड़कियों में बढ़ती आत्मनिर्भरता के कारण लड़कों में भी बेफिक्री की आदत आ गई है. बदलते दौर के प्यार के कारण लड़कों में बचपना भर गया है. अब तक माना जाता रहा है कि जिंदगी से जुड़े तमाम फैसले सिर्फ लड़के को ही करने होते हैं. आखिर वह भविष्य में घर का मुखिया बनता है. इसलिए जवानी के दिनों से ही उसे गंभीर होना होता है. यही वजह है कि वह हमेशा अपने संबंधों में भी गंभीर ही रहता था. लेकिन लड़कियों के फैसले लेने की ताकत ने लड़कों को बेफिक्र कर दिया है. ऐसा नहीं है कि लड़कियां परेशानियों और फैसले करने के बोझ तले दबती जा रही हैं. लड़कों ने इस संबंध में लड़कियों का हाथ बराबरी देने के लिए थामा है.

अब अजय को ही लें. 26 साल का अजय 2 साल बाद अपनी गर्लफ्रैंड रैना से शादी करने वाला है. रैना एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करती है. उस की मासिक आय इतनी है कि एक परिवार न सिर्फ गुजरबसर कर सकता है बल्कि ऐश की जिंदगी भी जी सकता है. अजय को आर्थिक रूप से घर के लिए ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है. रैना महत्त्वाकांक्षी है. लेकिन जब से उस की मुलाकात अजय से हुई है तब से रैना की जिंदगी में तमाम बदलाव हुए हैं.

पहले जहां काम के चलते रैना हमेशा परेशान दिखती थी, वहीं अब प्यार ने उस में मिठास भर दी है. उन की जिंदगी से जुड़े सारे फैसले दोनों मिल कर करते हैं. 2 साल बाद शादी का फैसला भी दोनों ने मिल कर किया है. अजय तो अपने भविष्य को ले कर बेफिक्र हुआ ही है, साथ ही रैना को भी अपनी आजादी, अपने फैसलों को लेने में कोई कठिनाई नहीं होती. वह जानती है कि अजय उस का हर मोड़ पर साथ देगा. इस संबंध में वह बिलकुल बेफिक्र है.

यह बात और है कि अब भी ऐसे प्रेमी युगलों की कमी नहीं है जहां फैसले आमतौर पर लड़के ही करते हैं. बावजूद इस के, यह कहने में हमें जरा भी गुरेज नहीं होना चाहिए कि प्यार पहले की तुलना में ज्यादा वास्तविक हो गया है. अब प्यार हवाहवाई नहीं रहा. अब प्रेमी जोड़े वादे करने से हिचकते हैं. क्यों? क्योंकि वे ऐसा कोई वादा नहीं करना चाहते जो उन्हें झूठा साबित करे. अगर कोई वादा करते हैं तो उसे हर हाल में पूरा करने की कोशिश करते हैं.

वास्तव में वे अपनी भावनाओं का सम्मान करते हैं. इसलिए दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने से डरते हैं. कहने का मतलब यह बिलकुल नहीं है कि पहले के लोग दूसरों की भावनाओं का सम्मान नहीं करते थे. असल में पहले प्यार आदर्शवादी किस्म का हुआ करता था. अब वह आदर्शवादी ढांचा टूट चुका है.

लोग अब अपनी जिंदगी को महत्त्व देते हैं. वे नहीं चाहते कि उन के द्वारा लिया गया कोईर् भी फैसला उन के लिए मुसीबत बन जाए. इसलिए कुछ समय साथ गुजारने के बाद अगर वे एकदूसरे के साथ रहना नापसंद करें तो एकदूसरे को हंसतेहंसते अलविदा कह देते हैं. यह आदर्शवादी किस्म का प्यार नहीं है. आप कह सकते हैं यहां तो बात वही हो गई कि तू नहीं कोई और सही, और नहीं कोई और सही…लेकिन समझने की बात यह है कि दूसरों के सामने मिसाल बनने के लिए खुद को सूली पर चढ़ाना सही नहीं है. कुल मिला कर कहने की बात यह है कि आज की तारीख में लड़केलड़कियां दोनों कामकाजी हो गए हैं और बदलती जीवनशैली ने प्यार की परिभाषा भी बदल दी है.

हक चाहती हैं लड़कियां

यह बात कहने और सुनने में बड़ी अजीब लगती है मगर सच यही है कि लड़कों ने लड़कियों को हमेशा दबा कर रखा है. अब से पहले कभी लड़कियों को बराबरी का दरजा नहीं दिया. फिर चाहे वे दोनों एकदूसरे को बेइंतहा क्यों न चाहते रहे हों. एक बार लड़की ने किसी का हाथ थामा, उसी क्षण से उसे अपने फैसले करने का हक जाता रहा. लड़कियों की इच्छाओं को दरकिनार कर दिया जाता था. जी हां, इस किस्म के परिवेश को अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है. लड़की भी लड़के की कही हर बात को पत्थर की लकीर समझ कर मान लिया करती थी.

लेकिन अब माहौल में खासा बदलाव आया है. लड़कियां हां और ना में जवाब देने लगी हैं, अपने फैसले सुनाने लगी हैं. यहां तक कि अगर कोई लड़का उसे बीच चौराहे पर छोड़ने का फैसला कर ले तो वे उसे रोकने की जहमत भी नहीं उठातीं. सवाल है, ऐसा क्यों है? क्या लड़कियां अब भावुक नहीं रहीं? नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है. असल में लड़कियां अब दूसरों के फैसलों पर सिर्फ हामी नहीं भरती हैं. प्यार के मसले में भी यह बात सौ फीसदी लागू हो रही है.

रिश्तों में पनपती साफगोई

ताज्जुब होता है कि कुछ साल पहले तक अगर लड़की को उस का बौयफ्रैंड छोड़ने की बात तक कहता था तो उस का रोरो कर बुरा हाल हो जाता था. लेकिन अब स्थिति ईद का चांद हो गई है. असल में अब रिश्तों में पहले से ज्यादा साफगोई देखने को मिलती है. कोई भी किसी को भी गले की फांस नहीं बनाना चाहता. यही बात लड़कियों के साथ भी है. अगर वह किसी को छोड़ना चाहती है तो बेझिझक एक फोन कौल से, मैसेज से या फिर मेल के जरिए अपने दिल की बात उस तक पहुंचा देती है.

कुछ लोग कह सकते हैं कि अब प्यार मजाक बन कर रह गया है. लोगों में सहनशीलता नहीं है. लोग संवेदनाहीन हो रहे हैं. लोगों में अपने प्यार को बांधे रखने की ताकत खत्म हो रही है. जबकि यह हकीकत नहीं है. अब प्यार में खुलापन आ गया है. प्यार पहले से भी ज्यादा नाजुक हो गया है. जैसा कि पहले ही जिक्र किया गया है कि कोई भी किसी की भी गले की फांस नहीं बनना चाहता है. लड़कियां अब ऐसे लड़के को एक दिन भी बरदाश्त नहीं कर सकतीं जो उन्हें अपने संबंध में बराबरी नहीं दे सकता. यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि लड़कियों को प्यार भीख में नहीं चाहिए. लड़कियां इस बात को सहज ही समझ जाती हैं कि कौन उसे प्यार करता है और कौन उस का इस्तेमाल कर रहा है. आज प्यार का सीधा सा सिद्धांत है, प्यार करोगे तो प्यार पाओगे. लड़कियां अब किसी एक लड़के को अपना सब कुछ नहीं समझ लेतीं. वे आजादीपसंद हो चुकी हैं.

असल में एक बार रिश्ते में बंध जाने के बाद लड़के को लगता है कि उस की प्रेमिका से जुड़े सारे फैसले करने का हक सिर्फ उसे ही है. लेकिन लड़कियों को अब अपनी आजादी का एहसास हो गया है. वे न तो प्यार भीख में लेती हैं और न ही आजादी. लड़कियां इस बात को भलीभांति समझ गई हैं कि आजादी और प्यार दोनों में ही उन का हक है. इन में किसी एक को ज्यादा महत्त्व देना, प्यार से बेमानी होगी.

प्यार एक मीठा एहसास है. प्यार में एकदूसरे के लिए जान लुटाने का माद्दा होता है. लेकिन वहीं प्यार का एक पहलू यह भी है कि इस में बराबरी और सम्मान का एहसास महत्त्वपूर्ण हो गया है. महिलाओं की बदलती आर्थिक स्थिति ने उन्हें यह फैसला करने का हक दिया है कि उन्हें किस के साथ बंधना है, किस के साथ रहना है. हैरानी की बात तो यह है कि लड़कियों के दोस्तों की सूची कितनी लंबी होगी, यह फैसला भी एक जमाने में लड़के ही किया करते थे. मगर अब कहानी पलट गई है. समझौता सिर्फ एक पर आश्रित बन कर नहीं रह गया है. क्योंकि प्यार अब भीख में लीदी जाने वाली चीजभर नहीं है. प्यार जरूरत भी है और चाहत भी.

क्या कहते हैं लड़कियों जैसे ये लड़के…

यह मुंबई का छत्रपति शिवाजी टर्मिनस हो सकता है और राजधानी दिल्ली का कनौट प्लेस भी. यह कोलकाता का सौल्ट लेक हो सकता है और हैदराबाद का बंजारा हिल्स भी. आप को ऐसे दृश्य कहीं भी देखने को मिल सकते हैं जब आप को भ्रम हो जाए कि लड़का कौन है और लड़की कौन है. एक जैसे जूते, एक जैसे ओवरकोट, एक जैसा हेयरस्टाइल. यहां तक कि पैंट और शर्ट में भी अब बहुत फर्क नहीं बचा. जी हां, यह यूनीसैक्स का दौर है. जी हां, यह बराबरी की एक नई दुनिया है.

कुछ लोगों को लग सकता है लड़कों का पतन हो रहा है. कुछ पुराने खयालों के मर्दवादी मन कह सकते हैं आजकल के लड़के तो मर्द जाति के नाम पर धब्बा हैं. लेकिन गौर से सोचें, ध्यान से देखें तो यह व्यवहार में अब दिखने लगी वह बराबरी है जिस की कहे, अनकहे ईमानदारी से सदियों से बातें की जाती रही हैं. शायद यह पहला ऐसा दौर है जब लड़के व लड़कियों में बहुत सारी चीजें एक जैसी होने लगी हैं या फिर यों कहा जाए कि जिंदगी में अब बड़ी सहजता आ गई है.

अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता जब पहनावा, बोलनेचालने का ढंग और यारदोस्तों के साथ मौजमस्ती के तमाम रंग लड़के और लड़कियों के बिलकुल अलहदा होते थे. सच बात तो यह थी कि खानेपीने में भी लड़के और लड़कियों का फर्क साफ दिखता था. पिछली सदी के 70, 80 और किसी हद तक 90 के दशक तक लड़के चाटपकौडि़यां खाने से झिझकते थे. लड़कियों की तरह सूंसूं करते मिर्च की चटनी खाते और उंगलियां चाटते लड़के नहीं दिखते थे. गोलगप्पे, पानीपूरी, दहीभल्ले इन से लड़के दूर रहते थे मगर अब बहुतकुछ बदल गया है. लड़के लड़कियों के साथ चाटपकौडि़यों की दुकान में दिखने लगे हैं.

बोलना और यहां तक कि चलना भी एक जमाने में लड़कियों और लड़कों के लिए पूरी भिन्न सीख हुआ करती थी. लड़कियों को बड़े से बड़े संकट में भी अदब से और अव्यक्त शब्दों में मदमाते हुए चलने की सीख दी जाती थी और लड़कों को तेजतेज, बेफिक्र अंदाज में कदम बढ़ाने की सीख दी जाती थी. आज लड़कियां भी लड़कों की तरह लंबेलंबे डग भरते दिख जाएंगी. वे भी उन्हीं की तरह गला फाड़ कर चिल्लाने में गुरेज नहीं करतीं जबकि एक जमाने में ऊंची आवाज में लड़कियों का बोलना बुरा समझा जाता था. माना जाता था ऐसी लड़कियों में लड़कीपन नहीं रहता…तो बदलते दौर में बहुतकुछ बदल रहा है. ये जो लड़कियों जैसे लड़के दिख रहे हैं या लड़कों जैसी लड़कियां दिख रही हैं, उन्हें हम मजाक में कुछ भी कहें, लेकिन सचाई यही है कि यह बदलाव का एक व्यावहारिक व दिखने वाला तरीका है.

जलवायु परिवर्तन: नक्शे से गायब होते देश

छोटे द्वीपदेशों में से एक टूवालू गणराज्य का नामोनिशान अगले कुछेक महीनों में दुनिया के नक्शे से लुप्त होने जा रहा है. यह अकेला द्वीपदेश या द्वीप नहीं है जिस के वजूद पर खतरा मंडरा रहा है. माना जा रहा है कि 2020 तक कई द्वीप और द्वीपदेश दुनिया के नक्शे से गायब हो जाएंगे. ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन पर हाल ही में पेरिस सम्मेलन हुआ. नतीजे कुछ खास नहीं निकले. ग्रीन गैस व कार्बन डाइऔक्साइड के उत्सर्जन के मामले में विकसित देश विकासशील देशों पर जोरआजमाइश करते रहे और इसी रस्साकशी में क्लाइमेट चेंज समिट खत्म हो गया.

जहां तक ग्लोबल वार्मिंग के असर का सवाल है तो यह पूरी दुनिया पर हावी है. तमाम नियमों, बंधनों को ताक पर रख कर मौसम मनमौजी हो गया है. कहीं रिकौर्ड बारिश तो कहीं भयंकर सूखा, कहीं तबाही का तूफान. आजकल तो रेगिस्तान के माने तक बदल गए हैं. रेगिस्तान में रिकौर्ड बारिश और बाढ़ ही नहीं, कभीकभी ओस तक को जमा देने वाली ठंड पड़ रही है. दुनिया के लिए 2014 रिकौर्ड गरमी का साल रहा. इन सब के बीच, चिंता का विषय ग्लेशियरों का सिकुड़ना और समुद्र का जलस्तर बढ़ना है. इस का सब से अधिक खमियाजा भुगत रहे हैं अनगिनत द्वीप और द्वीपदेश. इस के कारण दुनिया के नक्शा बदलता नजर आ रहा है.

मालद्वीप, मौरीशस, लक्षद्वीप का बड़ा भूभाग पानी में डूब चुका है. ऐसे में आशंका सिर उठाने लगी है कि दुनिया के नक्शे पर जितने भी द्वीप हैं, एकएक कर के सब समुद्र, महासमुद्र और खाड़ी के गर्त में समा जाएंगे. देरसवेर अंडमान द्वीपसमूह, बंगलादेश, श्रीलंका जैसे देशों का वजूद भी मिट सकता है.

बहरहाल, अभी आशंका टूवालू को ले कर है. इस समय हवाई और आस्ट्रेलिया के करीब प्रशांत महासागर में बसे पौलनेशियन द्वीपदेश टूवालू पर उस के डूबने का खतरा मंडरा रहा है. यह महज 26 वर्ग किलोमीटर भूभाग वाला देश है, जिस की आबादी महज 12,373 है और यह समुद्रतल से सिर्फ 5 मीटर ऊपर है. यह दुनिया का चौथा सब से छोटा द्वीप है और दूसरा सब से छोटा द्वीपदेश. मार्च 2015 में जबरदस्त चक्रवाती तूफान आने के बाद इस के बड़े भूभाग पर भयावह तबाही का मंजर देखने को मिला था. इस के बाद देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया था. लेकिन अब समुद्र का जल स्तर बढ़ने से पूरे देश के डूबने का खतरा बढ़ गया है. इसी चिंता के मद्देनजर टूवालू के प्रधानमंत्री एनेल सोपोआगा ने राष्ट्रसंघ में गुहार लगाई है. जवाब में राष्ट्रसंघ ने टूवालू को बचाने का हर संभव प्रयास करने का आश्वासन दिया है. कभी ब्रिटिश उपनिवेश रहा टूवालू 1978 में आजाद हो गया था. एक आजाद देश के रूप में यह अपनी पहचान बना ही रहा था कि 1993 में समुद्र जलस्तर के बढ़ने से इस के वजूद पर खतरा मंडराने लगा.

बढ़ता खतरा

हालांकि, अकेले टूवालू ही नहीं, दुनिया के बहुत सारे द्वीप देश और द्वीपों के डूबने या मटियामेट हो जाने का खतरा दिनोंदिन गहराता जा रहा है. फिलहाल 40 देशों में समुद्र का जलस्तर बढ़ने से हजारों की संख्या में लोग बेघर हो चुके हैं. बंगाल की खाड़ी में स्थित न्यू मूर भी पूरी तरह जलमग्न हो चुका है. यह न्यू मूर भारत में पूर्वाशा और बंगलादेश में दक्षिण तलपट्टी के नाम से जाना जाता है. इस पर भारत और बंगलादेश दोनों अपना दावा करते रहे हैं लेकिन अब यह लगभग बंगाल की खाड़ी की गोद में समा चुका है. जो जमीन रह गई है वह एक हद तक निर्जन है. इस के अलावा भारत का पश्चिम बंगाल और बंगलादेश डेल्टाई क्षेत्र हैं जो समुद्र की सतह से बहुत कम ऊंचाई पर बसे हुए हैं. यहां हिमालय से निकली गंगा, पद्मा, मेघना, ब्रह्मपुत्र जैसी भारत और बंगलादेश की बहुत सारी नदियों का मुहाना है. जलवायु परिवर्तन की वजह से खाड़ी का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है जिस के कारण डेल्टा के बहुत सारे द्वीप खाड़ी में समा रहे हैं.

प्रशांत महासागर के माइक्रोनेशिया, मेलानेशिया के द्वीप सब से अधिक खतरे में हैं. अकेले माइक्रोनेशिया में किरीबाती, मार्शल द्वीपसमूह और नौरू संप्रभु देश हैं. दुनिया के सब से छोटे द्वीपदेश में नौरू भी एक ऐसा ही द्वीपदेश है जो टूवालू से भी छोटा द्वीपदेश है. इस के भूभाग का क्षेत्रफल केवल 21 वर्ग किलोमीटर है. इस की आबादी लगभग साढ़े 13 हजार है. फिलहाल इस पर खतरा इतना गहरा नहीं है. ऐसा ही एक द्वीप समूह है कार्टरिट, जो दक्षिणपश्चिम प्रशांत महासागर में बसा है. 2,500 आबादी वाले इस द्वीपसमूह में हालात इतने खराब हो चुके हैं कि यह भी निर्जन होने के कगार पर है, क्योंकि समुद्र का जलस्तर बढ़ने से यहां उगाए जाने वाली फसलों पर असर पड़ रहा है. खेत बरबाद हो चुके हैं. कुएं नष्ट हो चुके हैं. कुल मिला कर जीवन की सहूलियतें खत्म हो रही हैं.

नई जगह की तलाश

हिंद महासागर में लगभग 1,200 द्वीपों पर बसा मालद्वीप गणराज्य समुद्र से महज 1.3 मीटर की ऊंचाई पर है. यह भी जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहा है. यहां के राष्ट्रपति मोहम्मद नशीर ने समुद्र जल स्तर बढ़ने की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के मद्देनजर समुद्र के नीचे संसद की कार्यवाही की थी. नशीर ने भावी खतरों को देखते हुए अपने द्वीपदेश को नई जगह बसाने के लिए जमीन खरीदने की बात कह कर दुनिया को चौंका दिया था.

इसी तरह प्रशांत महासागर में स्थित किरीबाती गणराज्य पर जलस्तर का खतरा मंडरा रहा है. किरीबाती सरकार भी 5 हजार एकड़ जमीन खरीदने पर विचार कर रही है, ताकि आबादी को वहां बसाया जा सके. गौरतलब है कि यह किरीबाती 32 प्रवाल द्वीपों का एक समूह है. देश की आबादी इन्हीं द्वीपों में बसती है. प्रशांत महासागर का जलस्तर बढ़ने से ज्वार के दौरान समुद्र की लहरें घरों तक में पहुंच जाती हैं. जाहिर है ये सभी द्वीप डूबने के कगार पर हैं. इसी तरह कोरल सागर, अराफुरा सागर और कारपेनटारिया खाड़ी में टौरेस स्टे्रट के 274 द्वीपों में से बहुत सारे पहले ही डूब चुके हैं. जो बचे हैं उन में बसे घरों में ज्वार के समय समुद्र का पानी घुस जाता है. खारे पानी से खेती तबाह हो चुकी है. यहां की विस्थापित आबादी तरावा के द्वीप में पनाह लेरही है लेकिन यह कोई स्थायी इंतजाम नहीं है. प्रशांत महासागर का सोलोमन द्वीपसमूह भी सुरक्षित नहीं है.

पर्यावरण से खिलवाड़

जाहिर है दुनिया की आबादी का अच्छाखासा हिस्सा (लगभग ढाई करोड़) विस्थापित हो चुका है. भविष्य में और भी विस्थापन के शिकार होंगे. हालांकि ऐसे लोगों को विस्थापन के लिए कृत्रिम द्वीप बनाने पर विचार हो रहा है लेकिन आखिरकार समस्या का यह कोई अंतिम समाधान नहीं है. पश्चिम के बढ़ते औद्योगिकीकरण का खमियाजा विकासशील, अविकसित और कमजोर देशों को उठाना पड़ रहा है. ऐसे में पर्यावरण से खिलवाड़ देरसवेर पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है. वर्ष 1900 से ले कर अब तक दुनिया में समुद्र जलस्तर औसतन 19 सैंटीमीटर बढ़ा है. अनुमान है कि इस शताब्दी के अंत तक यह जलस्तर 26 सैंटीमीटर से ले कर 83 सैंटीमीटर के बीच बढ़ने वाला है. 2050 तक और 2 करोड़ लोग विस्थापित होंगे.

अभी भी समय है. विश्व को विकसित, विकासशील और अविकसित देश का भेदभाव भुला कर दुनिया को बचाने के लिए बेहतर से बेहतर तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए. कृत्रिम द्वीपों के अलावा समुद्र से शहरों के बचाव के लिए नीदरलैंड तकनीक पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. आज से लगभग एक हजार साल पहले नीदरलैंड ने समुद्र से शहरों के बचाव की तकनीक विकसित की थी. आज भी नीदरलैंड की सैंड इंजन तकनीक बाढ़ के नियंत्रण में बहुत ही कारगर है. इस के अलावा, समुद्र में बढ़ते जलस्तर पर लगाम लगाने के लिए अंडरवाटर गेट प्रोजैक्ट मोस, तैरते गांव, तैरती खेती की तकनीक को दुनियाभर के तटवर्ती देशों और द्वीपों में अपनाई जानी चाहिए.

मेरे पापा

मेरे पापा स्वभाव से बहुत सख्त थे. घर के सभी सदस्य उन से कुछ भी कहने से डरते थे. मुझे जो भी बात करनी होती थी, वह मैं पहले अपने बड़े पापा (ताऊजी) से कहती, फिर बड़े पापा मेरे पापा से वह बात कहते थे. पर पापा जितना गुस्सा करते थे उतना ही हम सब बच्चों से प्रेम भी करते थे. मेरी शादी जब तय हुई तो मुझे पापा के प्यार का पता चला. मेरी शादी बनारस में तय हुई. मेरे पति उस समय लखनऊ में पोस्टेड थे. पापा यही सोच कर खुश थे कि बनारस और लखनऊ, दोनों शहर जबलपुर के पास हैं. रात में ट्रेन से चलेंगे तो सुबह मेरे पास पहुंच जाया करेंगे. कोई परेशानी भी नहीं होगी. पर सगाई के एक महीने बाद ही मेरे पति की पोस्टिंग कोचीन (केरल) हो गई.

पापा को यह खबर पता चली तो वे रो पड़े. कहने लगे, ‘‘अब तो मेरी बेटी बहुत दूर हो जाएगी. पता नहीं, शादी के बाद कब तुम्हारे यहां आना होगा. ट्रेन भी हफ्ते में एक ही दिन चलती है. बनारस, लखनऊ जान कर मैं बहुत खुश था. वहां अपने रिश्तेदार भी थे. कोचीन तो एकदम अनजान शहर है. जानेआने का 2 दिन का सफर है. अब तो सारे समय तुम्हारी चिंता लगी रहेगी.’’ ये सारी बातें कर के पापा खूब रोए. तब मुझे अपने प्रति पापा के प्यार और चिंता का एहसास हुआ. आज पापा हमारे बीच  नहीं हैं पर उन का प्यार मेरे साथ हमेशा रहेगा.

मनीषा अविनाश, द्वारका (न.दि.)

*

मेरी नईनई शादी हुई थी. मेरे ससुराल वाले दहेज के विरुद्ध थे अत: मेरा विवाह सादे ढंग से, दहेज रहित हुआ था. विवाह के बाद लखनऊ आवास विकास परिषद में स्ववित्त पोषित भवनों के लिए विज्ञापन निकला था. मैं ने अपने पति से सलाह कर भवन के लिए आवेदन कर दिया. ड्रा निकाला तो मेरा नाम आ गया. मकान के लिए 88 हजार रुपए की त्रैमासिक किस्त भरनी थी. हम लोगों के पास कुछ पैसे कम पड़ रहे थे. सो, हम ने मकान न खरीदने का मन बनाया.

पापा को पता चला तो उन्होंने मकान देखने की इच्छा व्यक्त की. मकान देख कर पापा बोले, ‘‘इतनी खुली जगह वाले मकान आजकल नहीं दिखते, तुम मकान मत छोड़ो.’’ फिर पति से हिचकिचाते हुए बोले, ‘‘ऐसा करो, तुम पैसा मुझ से ले लो समझो, बैंक से लोन लिया है, बाद में किस्तों में लौटा देना.’’ हम लोगों ने उन से 25 हजार रुपए उधार लिए. आज भी कोई जब मकान की तारीफ करता है तो हमें पापाजी की याद आ जाती है. वे अब इस संसार में नहीं हैं पर उन के सुझाव से लिए मकान में हम रह रहे हैं.

– अलका कुलश्रेष्ठ, इंदिरा नगर (लखनऊ)

जीतें अकेलेपन की लड़ाई

फोन की घंटी बजती है. रिसीवर उठाने पर उधर से एक बच्चे की आवाज आती है, ‘‘हैलो आंटी, क्या आप मुझ से थोड़ी देर के लिए बात कर सकती हैं? मैं घर पर अकेला हूं. मम्मीपापा दोनों औफिस गए हैं. मुझे बहुत डर लग रहा है. मुझे टीवी देखने और खिलौनों से खेलने का भी मन नहीं कर रहा, मैं बाहर भी नहीं जा सकता. प्लीज, मुझ से थोड़ी देर के लिए बात कर लीजिए.’’ फिर आधे घंटे तक वह अनजान बच्चा और अनजान आंटी एकदूसरे से बात करते रहे.

पति बरसों पहले दुनिया छोड़ कर जा चुके हैं. एक विवाहित बेटी है जो विदेश में है. न जाने इन दिनों तबीयत को क्या हो गया है, दिन तो किसी तरह गुजर जाता है लेकिन जैसेजैसे शाम ढलने लगती है, अकेलापन काटने को दौड़ता है. घर की दीवारों से डर लगने लगता है. दिल जोर से धड़कने लगता है. दम घुटने लगता है. लगता है कोई हो ऐसा जिस से अपना अकेलापन बांट सकूं, हाथ थाम सकूं. पहले टीवी चलाने से लगता था कोई आसपास है, परदे पर कुछ चलतेफिरते लोग दिख रहे हैं पर अब वह भी बेमानी लगने लगा है. अकेलापन किसी की भी जिंदगी के उजाले को धुंधला कर देता है और मन में निराशा को हावी कर देता है. कभी कोई इंसान भीड़ में भी खुद को अकेला पाता है. कभी यह अकेलापन किसी अपने के दूर चले जाने से होता है, कभी बे्रकअप के कारण होता है, कभी बातचीत के लिए कोई न हो तो होता है.

अकेले होने का अर्थ शारीरिक रूप से अकेले होने के अलावा किसी से जुड़ाव महसूस न होना या परवा न किया जाना भी होता है. घर के एक कमरे में बैठे पतिपत्नी भी अकेलापन महसूस करते हैं क्योंकि दोनों एकदूसरे से जुड़ाव महसूस नहीं करते. दरअसल, अकेला होना और अकेलेपन में भी अंतर है. कुछ लोग भीड़ में, घरपरिवार में रहते हुए भी अकेले होते हैं. ऐसे लोग जो आत्मकेंद्रित होते हैं वे अकेलेपन के अधिक शिकार होते हैं.

नई दिल्ली, प्राइमस सुपर स्पैशलिटी हौस्पिटल के मनोचिकित्सक डा. संजू गंभीर का मानना है, ‘‘अकेलापन अर्थात लोनलिनैस आप की सोच को इस कदर प्रभावित करता है कि सेहत भी इस के शिकंजे में आ जाती है. अपनी इच्छा से अकेले रहना अलग बात है और समूह में रहते हुए भी अकेलापन महसूस करना पूरी तरह से एक अलग बात है. जीवन में कई लोगों के होते हुए भी आप अकेलापन तभी महसूस करते हैं, जब आप को लोगों से कनैक्ट करने के लिए कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं मिल पाता. ऐसे में जाहिर है कि आप अपनी उलझनों से छुटकारा पाने के लिए मन ही मन अपनी बातों को प्रकट करते हैं और किसी से शेयर नहीं कर पाते जिस के कारण आप को बहुत तकलीफ होती है और आप डिप्रैशन में भी जा सकते हैं.

डा. संजू गंभीर आगे कहते हैं, ‘‘आमतौर पर अवसाद के नाम से जानी जाने वाली इस स्थिति को बहुत से लोग बहुत हलके में लेते हैं, जबकि इसी के चलते कहीं कोई व्यक्ति धीरेधीरे समाज से कट कर इतना अकेला पड़ जाता है कि आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम तक उठा लेता है.

‘‘वर्तमान समय में सामाजिक, आर्थिक या मानसिक कारणों से हम सभी को जीवन में तनाव का सामना करना ही पड़ता है. आज चुनौतियां, अपेक्षाएं, महत्त्वाकांक्षाएं, समस्याएं ज्यादा हैं और समाधान व संसाधन कम. तनाव से अछूता शायद ही कोई हो, मगर चिंता मत करो, तनाव से दूर रहो जैसी बिना मांगी नसीहतें देने वाले कदमकदम पर मिल जाते हैं.

‘‘इस मामले में चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है जब तनाव जिंदगी का एक छोटा हिस्सा न बन कर, पूरी जीवनशैली पर हावी हो जाता है और बड़े से ले कर छोटेछोटे काम तक इस से प्रभावित होने लगते हैं. यह उस स्थिति की शुरुआत है जहां स मामूली लगने वाला तनाव गहन अवसाद का रूप लेने लगता है.’’

वह आगे कहते हैं, ‘‘डाक्टर्स पहले से जानते हैं कि अकेलेपन से तनाव, व्याकुलता और आत्मविश्वास में कमी आती है और मानसिक समस्याएं भी कड़ी हो जाती हैं, जैसे पागलपन, अंधेरे में बैठना, किसी से बोलचाल न करना आदि. अकेलेपन की समस्या पूरी दुनिया में तेजी से फैल रही है, विशेषतौर पर बुजुर्गों में अकेलेपन की समस्या तेजी से बढ़ रही है.’’ अकेलेपन से होनेवाले डिप्रैशन के बारे में डा. संजू गंभीर बताते हैं, ‘‘जीवन में कभीकभार मायूस रहना एक सामान्य बात है, लेकिन जब यह एहसास बहुत समय तक बना रहे और आप का साथ न छोड़े तो यह डिप्रैशन में बदल जाता है. इस के संकेत समाज से कटना, चुपचाप रहना, एकांत में बैठना और ऐसी स्थितियां जिन में कि कम भूख लगना और अत्यधिक नींद आना आदि नजर आते हैं.’’

अकेलेपन और डिप्रैशन के लक्षण

–       नींद न आना.

–       निराश, हताश महसूस करना.

–       अकेलेअकेले रहना.

–       मायूस रहना.

–       लक्ष्य तय न कर पाना.

–       किसी से बोलचाल न करना.

डिप्रैशन का सही कारण समझना उस के इलाज को आसान बना सकता है. जैसे कि यदि कोई अपनी नौकरी से परेशान होने की वजह से डिप्रैशन में जा रहा है तो उस के लिए किसी ऐंटीडिप्रैसैंट दवा लेने की जगह कोई अन्य अच्छी नौकरी या रोजगार कहीं ज्यादा फायदेमंद हो सकता है. यदि आप अकेलेपन की वजह से परेशान हैं तो दोस्तों के साथ वक्त बिताना ज्यादा लाभदायक हो सकता है. ऐसी स्थिति में परिस्थितियां बदलने लगती हैं और डिप्रैशन से छुटकारा पाया जा सकता है. महिलाओं और पुरुषों में डिप्रैशन के बारे में वे कहते हैं, ‘‘दुनियाभर में महिलाएं इस वक्त खुद को बेहद तनाव और दबाव में महसूस कर रही हैं. यह समस्या आजकल हर देश में पाई जा रही है. भारतीय महिलाओं ने खुद को ज्यादा तनाव में बताया है. एक सर्वे के अनुसार, हर साल 15 से 20 फीसदी महिलाओं को डिप्रैशन का शिकार होना पड़ रहा है. कुछ महिलाओं को अपनी सुंदरता को ले कर परेशानी होती है, तो किसी को शौपिंग की, किसी को घर व औफिस में संतुलन बनाने की,’’

इस के अलावा और भी कई वजहें होती हैं. इस दौरान व्यक्ति में निम्न लक्षण दिखाई देते हैं.

थकान : डिप्रैशन के कारण व्यक्ति गंभीर मानसिक और शारीरिक बदलावों से गुजरता है. वह हमेशा थकाथका सा महसूस करता है. उस की गतिविधियां भी बदलने लगती हैं और बोलचाल में भी बदलाव आता है. थकान महिलाओं से ज्यादा पुरुषों में पाई जाती है.

नींद पर असर : डिप्रैशन के होने से लोगों की नींद पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. वे या तो अधिक सोने लगते हैं या कम नींद लेने लगते हैं. कुछ लोगों को 12 घंटे सोने के बाद भी थकान महसूस होती है और कुछ तो रातभर सोते भी नहीं. वे रातभर जागते रहते हैं और अंधेरे में बैठे रहते हैं.

चिड़चिड़ापन : डिप्रैस्ड पुरुषों का स्वभाव बदलने लगता है और उन के स्वभाव में चिड़चिड़ापन आने लगता है. पुरुषों में चिड़चिड़ेपन की सब से बड़ी वजह उन के दिमाग में लगातार आने वाले नकारात्मक विचार होते हैं.

गुस्सा आना : कई लोगों को डिप्रैशन की वजह से उन को बहुत गुस्सा आने लगता है, जिस की वजह से वे बिना किसी कारण के गुस्सा करते रहते हैं. कई बार देखा गया है कि कुछ लोग, गलत होते हुए भी, गुस्से से अपनेआप को सही साबित करने लगते हैं. गुस्सा या बदले की भावना जैसे स्वभाव चिड़चिड़ेपन से अलग होता है. इस परिस्थिति में इंसान को अपने परिवार और दोस्तों की मदद की आवश्यकता होती है.

तनाव : तनाव भी पुरुषों में डिप्रैशन का एक लक्षण होता है. हालांकि तनाव हर बार डिप्रैशन का कारण बने, ऐसा होना जरूरी नहीं. कई बार तनाव किसी और वजह से भी हो सकता है, यह साबित भी हो चुका है कि तनाव मानसिक व शारीरिक रूप से बदलाव ला सकता है, सो इस की वजह से इंसान डिप्रैस्ड हो सकता है.

आर्थिक कमजोरी के कारण

कई स्थितियों में व्यक्ति अपने कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण भी लोगों से दूरी बना लेता है. आर्थिक रूप से सक्षम लोगों के समक्ष वह खुद को छोटा और कमजोर मानने लगता है. उस का आत्मविश्वास खोने लगता है. वह सामाजिक समारोहों में लोगों से मिलनेजुलने से कतराता है. वह उन के समक्ष खुद को अपमानित सा महसूस करने लगता है. उस की यह सोच उसे अकेला कर देती है.

ऐसे लोगों को अपनी काबिलीयत पर भरोसा करते हुए अपने अन्य गुणों को उभारना चाहिए और आत्मविश्वास के साथ लोगों के साथ मिलनाजुलना चाहिए. अपने ज्ञान और जानकारी से लोगों का दिल जीतना चाहिए और अकेलेपन को दूर करना चाहिए.

आर्थिक सक्षमता के कारण

ऊपरी तौर पर आर्थिक रूप से सक्षम लोग भले ही भीड़ से घिरे रहें पर वास्तव में वे अकेले होते हैं. सुविधासंपन्न, संसाधनों से लैस ऐसे व्यक्तियों के पास अधिकतर ऐसे लोग होते हैं जो सिर्फ उन की धनदौलत और उन के आसपास रह अपने लिए स्टेटस की चाहत रखते हैं. ऐसे में अमीर व्यक्ति निस्वार्थ दोस्त और अपनों के अभाव में खुद को अकेला महसूस करता है.

ऐसे लोगों को अपने पैसे का गरूर छोड़ कर ऐसे लोगों की तलाश करनी चाहिए जो उन की दिल से परवा करें, उन की बात ध्यान से सुनें. भौतिक सुविधाओं की जगह उन्हें प्रकृति के साथ अधिक से अधिक समय बिताना चाहिए. पेड़पौधों के साथ समय बिताना चाहिए. पुराने दोस्तों की तलाश करनी चाहिए जो वास्तव में उन के सच्चे दोस्त थे.

गुमराह करता धर्म

कुछ लोग अकेलेपन से नजात पाने के लिए धार्मिक प्रवचनों का सहारा लेने लगते हैं जबकि धर्म उन के अकेलेपन को कम करने के बजाय उन में निराशा का भाव उत्पन्न करता है. धार्मिक प्रवचनों में कहा जाता है कि आप जिम्मेदारियां छोड़ दें, मोहमाया छोड़ दें, व्यक्ति अकेला आया था अकेला जाएगा, वह क्या साथ लाया था जो साथ ले जाएगा. ऐसे उपदेश व्यक्ति को और अकेला और तनावग्रस्त करते हैं. धर्म व्यक्ति को दोस्तों, निकटसंबंधियों से दूर करता है. हिंदू धर्म में जीवन के 4 आश्रमों में एक आश्रम वानप्रस्थ भी है जिस में कहा जाता है कि इस दौरान उसे गृहस्थी का त्याग कर देना चाहिए. यानी जब मनुष्य को सब से ज्यादा अपनों की जरूरत होती है, जब वह जिम्मेदारियों से मुक्त होता है, अकेला होता है तब उसे अपने सगेसंबंधियों से दूर हो जाना चाहिए. इस तरह धर्म व्यक्ति के अकेलेपन को कम करने या दूर करने के बजाय बढ़ाता है.

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित मैक्स अस्पताल (साकेत) के मैंटल हैल्थ ऐंड बिहेवियेरल साइंसेज के डायरैक्टर डा. समीर मल्होत्रा का कहना है, ‘‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक संपर्क जहां व्यक्ति में अपनेपन की भावना को पोषित करता है वहीं सामाजिक रूप से अकेलापन उस के आत्मविश्वास को तोड़ता है और व्यक्ति खुद की उपेक्षा करने लगता है.’’

डा. समीर बताते हैं, ‘‘हमारा मन और शरीर न्यूरोकैमिकल्स, हार्मोंस और इम्यून सिस्टम के साथ जुड़ा हुआ है. जब हम अकेले होते हैं तो हमारा मन दुखी होता है और इस का परिणाम व्यक्ति की भूख व नींद पर पड़ता है. नतीजतन, व्यक्ति चिड़चिड़ा और तनावग्रस्त रहता है. उस की पाचनक्रिया पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. अकेलेपन के दौरान सेरोटोनिन का स्तर निम्न हो जाता है.

‘‘सेरोटोनिन वे न्यूरोट्रांसमीटर्स होते हैं जो दिमाग से शरीर में एक विशेष तरह की तरंगें छोड़ते हैं जिस से दिमाग का शरीर पर पूरा नियंत्रण होता है. अकेलेपन के दौरान जब व्यक्ति डिप्रैशन में चला जाता है तब सेरोटोनिन की कमी से उदासी की भावना पनपती है और व्यक्ति दिमागी तौर पर कमजोर हो जाता है. उस के मन में निराशा, अक्षमता का भाव पनपने लगता है. सो, उस के दिमाग में आत्महत्या के खयाल पनपने लगते हैं.’’

निष्कर्ष यह है कि अकेलेपन से उबरने में आशा, विश्वास, दृढ़ संकल्प और अपनों का सहयोग मददगार होते हैं.   

यों करें अकेलेपन को दूर

वह व्यक्ति जो अकेलेपन से जूझ रहा है और डिप्रैशन में चला जाता है, तब उपचार के तहत उस के व्यक्तित्व, परिवार और आसपास के वातावरण का पूरा प्रोफाइल बनाया जाता है. उस के अकेलेपन के कारकों को समझा जाता है और काउंसलिंग, दवाओं व साइकोथैरेपी द्वारा उस में जीवन के प्रति आशा जगाई जाती है. इस तरह उसे स्वस्थ, सार्थक सामाजिक माहौल देने का प्रयास किया जाता है.

–       जब कोई दूर चला जाए और उस की कमी से अकेलापन महसूस हो तो सोचें कि वह आप को दुखी नहीं, हमेशा खुश देखना चाहता था.

–       प्रेम में धोखा खाने पर उपजे अकेलेपन के दौरान खुद को दोस्तों व परिवार से अलग न करें. उन के आसपास रहें. अपने को दोषी न मानें. नियमित व्यायाम व हैल्दी लाइफस्टाइल से खुद को फिट रखें. मन में नकारात्मक विचार न आने दें. शराब व ड्रग्स के सेवन से दूर रहें.

–       अपने जैसे औरों को ढूंढ़ने की कोशिश करें जिन से आप अपने विचार बांट सकें. दोस्तों को फोन करें, बात करें, घर से बाहर मिलें.

–       बागबानी, चित्रकारी, मिट्टी के खिलौने, कारपेंटरी, आसपास के बच्चों को पढ़ाने जैसी सक्रिय हौबी अपनाएं.

–       नई भाषा सीखें, यह आप का आत्मविश्वास बढ़ाएगी.

–       डायरी लिखें, अपने विचारों को प्रकट करें.

–       किताबें पढ़ें, ब्लौग लिखें. किसी भी तरह अपने विचारों को प्रकट करें.

–       वौक पर जाएं, ऐसा करते समय दिमाग के अकेलेपन के विचार बाहर निकलते हैं.

–       छोटे बच्चों को खेलते हुए देखें. बुजुर्गों के साथ समय बिताएं, उन के अनुभव जानें.

–       मनोचिकित्सक द्वारा दी गई दवाओं को सही समय पर नियम से लें और उन के सुझावों पर अमल करें.

–       सामाजिक भागीदारी बढ़ाएं.

–       अपने लिए नियमित रूप से थोड़ा खाली समय निकालें.

–       लक्ष्य तय करें और उस के प्रति अनुशासन बरतें.

–       अपनी कमियों को स्वीकारना सीखें.

–       हमेशा मुसकराने की कोशिश करें, क्योंकि कोशिश आदत बन जाती है.

–       खाली समय में घर की साफसफाई करें.

–       कमरों की खिड़कियां बड़ी बनवाएं ताकि बाहर की दुनिया और हवा व धूप से आप का संपर्क बना रहे.

झूठ से सुकून

फ्लैट कल्चर हमें कभी रास नहीं आया. जिस दिन से उस फ्लैट में कदम रखा था, कोई न कोई अनचाही या यों कहिए कि मन के खिलाफ बात हो ही जाती थी. लाख तरीके अपनाने पर भी प्राइवेसी भंग हो जाती थी. दरवाजा भले ही अपनी सहूलियत के लिए भेड़ कर रखा हो, कोई न कोई कौलबैल बजा कर सीधे अंदर घुस आता था किचन और डायनिंगरूम तक, जैसे कि यह कोई घर न हो कर सराय हो. ‘बहनजी, सब्जी वाला आया है, सब्जियां ले लो’, ‘भाभीजी, कपड़े इस्तरी कराने हैं क्या’, ‘मैम, टंकी में पानी फुल कर लेना, वरना 10 बजे बिजली गुल होने के बाद आप को दिक्कत हो जाएगी’ वगैरावगैरा.

मेरी पत्नी को इन बातों से कोई ज्यादा असुविधा नहीं होती थी क्योंकि पड़ोसी खुद हमारी सुविधाओं के लिए चिंतित दिखाई देते थे. पर एक दिन भीमसेनजी ऐन सवेरे का चायनाश्ता करते वक्त, अंदर तक घुसते चले आए, ‘‘भाई साहब, ऊपर वाले उमाकांतजी ने रेलिंग पर गीले कपड़े फैला रखे हैं. बारबार कहने पर भी वे अपनी आदत से बाज नहीं आ रहे हैं. चलिए, हम मिल कर उन के आगे अपनी आपत्ति दर्ज कराते हैं.’’

‘‘हद हो गई,’’ भुनभुनाते हुए मैं उन के साथ उमाकांतजी से शिकायत करने चला गया.

पर भीमसेनजी की ओर से उमाकांतजी से शिकायत करने का नतीजा बुरा निकला और उन की लौबी वाले उन के चहेते मेरे खिलाफ हो गए. सुबह जब गेट खोला तो पड़ोसी भाभियों की गीली साडि़यां हमारे फ्लैट के ऊपर लटक रही थीं. उन्हें जानबूझ कर ठीक से न निचोड़े जाने के कारण उन से पानी धार से टपक रहा था. मैं ने पत्नी कुलदीपा को हिदायत दी कि इस मसले को तूल मत देना, मैं उन्हें प्यार से समझा दूंगा.

बहरहाल, इस तरह की आएदिन होने वाली बातों से हम आजिज आ गए और हम ने कौलबैल को बिजली से डिस्कनैक्ट करा दिया. भीतर से दरवाजे पर चटखनी चढ़ा कर अंदर बैडरूम में ही ज्यादातर रहने लगे. लेकिन हमारे इस नकारात्मक रवैए का असर पड़ोसियों पर अच्छा नहीं पड़ा. आखिर टाइमपास के लिए उन्हें हमारा साथ जो चाहिए था. सो, एक शाम जब मैं औफिस से लौट कर हाथमुंह धो रहा था तो दरवाजे के बाहर एक नहीं, कई लोगों के होने की आहट मिली. जब दस्तक हुई तो मैं ने रवाजा खोल दिया. सामने उमाकांतजी हाथ में कोई  फाइल लिए थे और उन के पीछे कोई 7-8 लोग खड़े थे.

‘‘नमस्कार, शशिकांतजी, हम इस अपार्टमैंट में बेहतर सुविधाएं देने के लिए एक वैलफेयर सोसायटी का गठन कर रहे हैं और आप से गुजारिश है कि आप इस में अहम भूमिका निभाएं,’’ उमाकांतजी ने कंधे उचकाउचका कर हमारे सहयोग की गुहार लगाई. भलमनसाहत में मैं भी बागबाग हो उठा, ‘‘अरे, क्यों नहीं, क्यों नहीं, मैं भी तो इसी अपार्टमैंट का एक अभिन्न हिस्सा हूं.’’

‘‘तो फिर, आज शाम आप 8 बजे बी ब्लौक में नीलेशजी के फ्लैट में तशरीफ लाएं,’’ उमाकांतजी मेरी जबान पर लगाम लगा कर चलते बने.

अपने लेटलतीफी स्वभाव के अनुसार मैं ने 8 बजे के बजाय पौने 9 बजे नीलेशजी के फ्लैट में कदम रखा. वहां पहुंचने पर मुझे लगा कि जैसे सबकुछ पहले से तयशुदा था. वहां अपार्टमैंट के रिहाइशदारों की भीड़ में पदाधिकारियों के चुनाव का दौर चल रहा था. मेरे हाजिर होते ही किसी लालजी ने जनरल सैक्रेटरी के पद के लिए मेरे नाम का प्रस्ताव कर दिया. भीड़ के शोरगुल में मेरी नानुकर किसी ने नहीं सुनी और अफरातफरी में बहुमत से मैं वैलफेयर सोसायटी का जनरल सैके्रटरी चुन लिया गया.

मीटिंग से निबटने के बाद जब कंधों पर जिम्मेदारी लादे, मैं मुंह लटकाए घर में दाखिल हुआ तो मेरी पत्नी ने मुझे बधाई दी, ‘‘अजी, जनरल सैके्रटरी बनाए जाने पर आप को लखलख बधाइयां.’’ पत्नी की बात सुन कर मैं आश्चर्य में डूब गया. मेरे आने से पहले यह खबर उन तक ही क्या, पूरे अपार्टमैंट में फैल चुकी थी. तभी तो जब मैं अपार्टमैंट के अंदर से गुजर रहा था तो लोगबाग मेरे बारे में ही खुसुरफुसुर कर रहे थे.

पत्नी कुलदीपा फिर बोल उठी, ‘‘अजी, संतरे सा मुंह क्यों फुला रखा है? कित्ती चंगी गल है कि आप जनरल सैके्रटरी चुने गए हो. अब आप की काबिलीयत इन अपार्टमैंट वालों से तो छिपी नहीं है. सरकारी अफसर होने का फायदा तो इन्हें भी मिलना ही चाहिए.’’

जब कुलदीपा ने ही मुझे ‘जनरल सैके्रटरी’ का तमगा पहना दिया तो इसे कैसे ठुकराया जा सकता था. मैं मन ही मन सोचने लगा, ‘कुलदीपा, अभी तुम्हें यह सब बहुत अच्छा लग रहा है. जब हमारा ड्राइंगरूम नगर निगम के औफिस जैसा एक सार्वजनिक स्थल बन जाएगा तब तुम्हें पता चलेगा आटेदाल का भाव. अरे, हम जैसे बिजी गवर्नमैंट सर्वैंट के लिए ऐसी वैलफेयर सोसायटी जौइन करना कोई आसान बात है क्या?’

खैर, मैं भी तैयार था, यह देखने के लिए कि आगेआगे होता है क्या…

अगले दिन सुबह, बच्चों को स्कूलवैन में बैठाने के बाद जब मैं वापस लौटा तो ड्राइंगरूम में उमाकांतजी, नीलेशजी और भीमसेनजी को देख कर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ. वैलफेयर सोसायटी के पदाधिकारियों के साथ अब तो उठनाबैठना लगा ही रहेगा. मैं ने सोचा, ‘लो, इन के साथ कुछ देर तक इन का हालचाल पूछने के बाद ही औफिस के लिए निकलना हो पाएगा, औफिस के लिए एकाध घंटे लेट ही सही.’

उमाकांतजी, जो कल सोसायटी के प्रैसिडैंट भी चुने गए थे, चाय की चुस्कियों में ही बोल उठे, ‘‘शशिकांतजी, इस अपार्टमैंट का बिल्डर निरंजन निहायत कमीना आदमी निकला. उस ने अपार्टमैंट के चारों ओर फेसिंग कराने का वादा पूरा नहीं किया और यहां से अपना औफिस समेट कर चलता बना.’’ जब मैं ने उस बात पर चिंता जाहिर की तो वे फिर बोल उठे, ‘‘शशिकांतजी, आज मैं भी सदर बाजार काम पर नहीं जा रहा हूं. नीलेशजी ने अपने औफिस से इस काम के लिए पहले ही छुट्टी ले रखी है. भीमसेनजी भी गद्दी में आज नहीं बैठने वाले हैं. यानी, हम सब आज कोर्ट में बिल्डर के खिलाफ एक मुकदमा डालने जा रहे हैं. आप चूंकि खुद एलएलबी हैं और मुझे जानकारी मिली है कि आप कानूनी दांवपेंचों के बड़े जानकार हैं, इसलिए आप का हमारे साथ कोर्ट में मौजूद रहना बेहद जरूरी है.’’

मैं दरवाजे पर खड़ी कुलदीपा के चेहरे को देखते हुए उधेड़बुन में अपनी दाढ़ी खुजलाने लगा कि तभी उस ने आंखों ही आंखों में इशारा किया, ‘अरे, महल्ले की बात है और आप को बड़ी इज्जत से साथ चलने को कह रहे हैं तो कोर्ट से लौटने के बाद कुछ देर से ही औफिस क्यों नहीं चले जाते?’

लिहाजा, कोर्ट में केस की स्टोरी तो मैं ने ही तैयार की जबकि नाममात्र के वकील ने अपने नाम के दस्तावेज और हमारे हलफनामे पर अपनी मुहर लगा कर फाइल पेश की और 3 दिनों बाद हमें फिर हाजिर होने का निर्देश दिया. इस तरह, जब वहां की औपचारिकताओं से निबटने में ही शाम के 4 बज गए तो मैं ने औफिस में फोन कर के उस दिन छुट्टी ले ली. जब मैं कोर्ट में वकील के साथ अपने बिल्डर निरंजन द्वारा किए गए गैरकानूनी मसलों पर बहस कर रहा था तो मेरे साथ आए सोसायटी के पदाधिकारियों को पूरा यकीन हो गया कि मैं सोसायटी की समस्याओं से निबटने के लिए एक सक्षम व्यक्ति हूं. कोर्ट में आ कर मुझे भी अच्छा लग रहा था. वैलफेयर सोसायटी के पदाधिकारियों के रूप में महल्ले में मैं नामचीन हो रहा था. जिधर से मैं गुजरता, लोगबाग मुझे महत्त्व देते हुए मेरा हालचाल जरूर पूछते.

घर लौट कर खाना खाने के बाद मैं ने बैडरूम में आ कर राहत की सांस ली. तभी कुलदीपा ने आ कर बताया कि उमाकांतजी का लड़का राहुल आया है. कह रहा है कि आज अंकल तो औफिस जा नहीं रहे, इसलिए वे हमारे फ्लैट में आ जाएं. पापा उन का इंतजार कर रहे हैं. अपार्टमैंट के कुछ मसलों से संबंधित जरूरी बातें करनी हैं.

मैं ने कुलदीपा की आंखों में बड़े शिकायतभरे अंदाज में देखा और कहा, ‘‘अभी क्या? यह तो खेल का आगाज है. औफिस से लौट कर रोज मुझे इसी तरह सोसायटी के काम के लिए घर से बाहर रहना होगा, वैलफेयर सोसायटी के लोगों के साथ. क्लाइमैक्स तक पहुंचतेपहुंचते नानी याद आ जाएगी.’’

पर उस ने भी मुसकरा कर और सिर नचा कर मूक अभिनय किया, ‘‘अब आज औफिस नहीं गए तो सोसायटी का ही कुछ काम कर लीजिए. आरामवाराम तो होता रहेगा. अब देखिए, मेरी मरजी के मुताबिक चलेंगे तो एक आदर्श नागरिक के रूप में जाने जाएंगे.’’

मैं टीशर्ट और बरमूडा पहने हुए ही बाहर निकल गया.

उमाकांतजी के ड्राइंगरूम का नजारा ही कुछ अलग था. वहां सबकुछ उलटापलटा पड़ा हुआ था. वे हुड़दंग करने के मूड में लग रहे थे. सोसायटी के कोई दर्जनभर लोग वहां जमे हुए थे. टेबल पर व्हिस्की की बोतलें थीं और कुछ लोग शतरंज के खेल में व्यस्त थे जबकि टीवी पर कोई वल्गर फिल्म चल रही थी. जब मैं ने झिझकते हुए उमाकांतजी के जनानखाने का जायजा लेना चाहा तो वे बोल उठे, ‘‘यार, बीवी को अभीअभी राहुल के साथ उस के मायके भेज दिया है जो यहीं राजनगर में है. अब हमारे ऊपर कोई निगरानी रखने वाला नहीं है. आज कई दिनों बाद तो मौजमस्ती का मूड बना है. सोचा कि तुम्हें भी साथ ले लूं. ऐसा मौका रोजरोज कहां आता है? खूब खाएंगेपीएंगे और एडल्ट फिल्में देखेंगे.’’

चूंकि मैं कभी ऐसे माहौल का आदी नहीं रहा, छात्र जीवन में भी पढ़नेलिखने के सिवा कभी कोई ऐसीवैसी नाजायज हरकत नहीं की, इसलिए मैं वहां काफी देर तक असहज सा रहा. बड़ी घुटन सी महसूस कर रहा था. तभी कुलदीपा ने कहला भेजा कि लखनऊ के ताऊजी सपरिवार पधारे हैं. सो, मुझे वहां से मुक्त होने का एक बहाना मिल गया. मैं ने उस माहौल से विदा होते समय राहत की सांस ली.

उस शाम जब मैं लखनऊ से पधारे मेहमानों को घंटाघर का मार्केट घुमाने ले जा रहा था तो अपार्टमैंट के ही कुछ बदमिजाज लौंडों के बीच खेलखेल में नोकझोंक के बाद मारपीट हो गई जिस में उमाकांतजी के लड़के राहुल का सिर फट गया. मामला थाने तक जाने वाला था कि मैं ने बीचबचाव कर के झगड़े को निबटाया और अपने मेहमानों को वापस घर में बैठा कर राहुल को मरहमपट्टी कराने अस्पताल चला गया. काफी देर बाद वापस लौटा तो मेहमानों को होटल में डिनर कराने ले गया क्योंकि अपार्टमैंट में पैदा हुए उस माहौल में कुलदीपा के लिए डिनर तैयार करना बिलकुल संभव नहीं था. बहरहाल, मैं यह सोचसोच कर शर्म में डूबा जा रहा था कि आखिर, ताऊताई क्या सोच रहे होंगे कि कैसे वाहियात अपार्टमैंट में हम ने फ्लैट लिया है और कैसे वाहियात लोगों के साथ हम रह रहे हैं. सुबह जब ताऊताईजी टहलने जा रहे थे तो अपार्टमैंट में गजब की गंदगी फैली हुई थी. बोतलें, कंडोम, सिगरेट के पैकेट आदि रास्ते में बिखरे हुए थे.

उस दिन मैं ने मेहमानों की खिदमत के लिए एक दिन की और छुट्टी ले ली. सुबह, नीलेशजी सोसायटी के किसी काम से आए थे, पर मुझे मेहमाननवाजी में व्यस्त देख कर चले गए. उस के बाद भी सोसायटी के कुछ लोग मेरे बारे में पूछने आए. परंतु कुलदीपा ने उन्हें कोई तवज्जुह नहीं दी. उस शाम मेहमानों को वापस लखनऊ जाना था. लिहाजा, शाम को उन्हें ट्रेन में बैठा कर वापस लौटा तो मैं बड़ी राहत महसूस कर रहा था क्योंकि उन के रहते अपार्टमैंट में कोई और ऐसी नागवार वारदात नहीं घटी जिस से कि उन्हें किसी और अजीबोगरीब अनुभव से गुजरना पड़ता. इसी बीच, मैं ड्राइंगरूम में थका होने के कारण सोफे पर लुढ़का हुआ था तभी कुलदीपा मेरे बगल में आ कर बैठ गई. उस ने मेरे बालों में अपनी उंगलियां उलझाते हुए कहा, ‘‘आप थोड़े में ही थक जाते हैं. देखिए, मैं भी तो कल से मिनटभर को आराम नहीं कर पाई हूं. अब समाज में रहते हैं तो हमें सामाजिक जिम्मेदारियां भी तो निभानी पड़ेंगी.’’

मैं उस का इशारा समझ गया. वह चाहती थी कि मैं औफिस की ड्यूटी के साथसाथ सोसायटी के काम में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेता रहूं. मैं ने मन ही मन कहा, ‘कुलदीपा, देखना तुम खुद भी इन निठल्ले सोसायटी वालों से ऊब जाओगी.’ हम बातचीत में मशगूल थे कि तभी मेरी बिटिया तनु ने आ कर बताया कि उमाकांत अंकल बाहर खड़े हैं और वे आप से मिलना चाहते हैं. फिर मैं ड्राइंगरूम में आ गया और तनु से कह दिया कि अंकल को अंदर बुला लाओ.

उमाकांतजी सोफे पर बैठने से पहले ही बोल उठे, ‘‘अजी शशिकांतजी, एक बड़ी कामयाबी हमें मिली है.’’

‘‘अरे हां, बताइए,’’ मुझे लगा कि जैसे वे कोई बड़ी जंग जीत कर आए हैं.

‘‘बिल्डर निरंजन के घर का पता मिल गया है. वह यहीं पास के महल्ले में रहता है. आज शाम हम ने तय किया है कि अपने पदाधिकारियों के साथ अपार्टमैंट के सभी लोग उस से मिलने चलेंगे और उस पर प्रैशर बनाएंगे कि वह अपार्टमैंट के बकाया काम को तुरंत निबटाए, वरना हम उस के खिलाफ ऐसी कानूनी लड़ाई शुरू करेंगे कि उसे छटी का दूध याद आ जाएगा.’’

‘‘ठीक है, हम सभी उस के घर चलते हैं और उसे डराधमका कर आते हैं,’’ मैं ने कान खुजलाते हुए उन के मनोबल में इजाफा किया.

उस शाम हम निरंजन के घर गए तो बहसाबहसी का दौर इतना लंबा खिंचा कि रात के 11 बज गए. उस के गुंडों के साथ झड़प होने से हम बालबाल बच गए. उस का कहना था कि उस ने अपार्टमैंट में एक भी काम बकाया नहीं छोड़ा है जबकि हम ने कल कोर्ट में जो केस दायर किया था उस में कोई दर्जनभर ऐसे काम दर्शाए थे जिन्हें उस ने अपने वादे के अनुसार पूरा नहीं किया है. बहरहाल, बिल्डर निरंजन की नाराजगी की एक अहम वजह यह थी कि उसे पता चल गया था कि वैलफेयर सोसायटी ने उस के खिलाफ कोर्ट में एक केस डाला है. बस, इसी खुंदक में वह भविष्य में अपार्टमैंट में कोई भी काम कराने से साफ इनकार कर रहा था. उस ने तैश में भुनभुना कर कहा भी, ‘ऐसे कितने केस हम पर चल रहे हैं, एक और केस देख लेंगे. मेरा क्या बिगाड़ लोगे?’

रात के कोई 12 बजे घर लौट कर मैं ने खाना खाया. सोने की कोशिश की तो नींद का आंखों से रिश्ता कायम नहीं हो पाया. लिहाजा, पता नहीं कब आंख लगी और जब सुबह के 8 बजे तो मैं हड़बड़ा कर उठा. कुलदीपा भी घर के सारे कामकाज निबटाने के बाद नहाधो चुकी थी. किसी तरह अफरातफरी में तैयार हो कर मैं औफिस पहुंचा. मैं मुश्किल से अभी अपनी कुरसी पर बैठा ही था कि मैसेंजर ने आ कर बताया कि नीलेश नाम के कोई साहब आए थे और आप से मिलना चाह रहे थे. मैं सोच में पड़ गया. तभी मेरा मोबाइल बज उठा, ‘‘हैलो शशिकांतजी, मैं वैलफेयर सोसायटी से नीलेश बोल रहा हूं. मैं बाहर रिसैप्शन पर खड़ा हूं. आप से एक जरूरी काम था.’’

मेरा माथा ठनका, अच्छा, तो ये अपनी वैलफेयर सोसायटी के नीलेशजी हैं. मतलब यह कि अपनी सोसायटी अब मेरे औफिस तक आ पहुंची है. मैं ने रिसैप्शनिस्ट को फोन कर के बताया कि नीलेशजी को अंदर मेरे चैंबर में भेज दो. वे आए तो एकदम से अपने मतलब की बात पर आ गए, ‘‘शशिकांत, मैं बड़ी मुसीबत में हूं. मेरे बच्चे का सैंट्रल स्कूल में ऐडमिशन नहीं हो पा रहा है. हर मुमकिन कोशिश कर चुका हूं. अधिकारियों से खूब मगजमारी भी कर चुका हूं. अगर आप अपने डीओ लैटर पर सैंट्रल स्कूल के पिं्रसिपल से एक रिक्वैस्ट लिख दें तो मेरा बड़ा उपकार हो जाएगा.’’

वे हाथ जोड़ कर मुझ से बुरी तरह याचना करने लगे. मैं ने सोचा, अपनी वैलफेयर सोसायटी का मामला है, वह भी एक पदाधिकारी का. आखिर, मेरे अनुरोध पर उस के बच्चे का ऐडमिशन हो जाए तो इस में हर्ज ही क्या है. इस तरह वैलफेयर सोसायटी और औफिस की जिम्मेदारियां साथसाथ निबटाते हुए 2 दिन और गुजरे थे कि उमाकांतजी द्वारा एक सूचना मिली कि कल दोपहर बाद उन के यहां कोई खास आयोजन है जिस में मुझे सपरिवार शामिल होना है. कुलदीपा भी सामने आ खड़ी हुई, ‘‘अजी, सोसायटी का मामला है, कोई कोताही मत बरतना. कल कायदे से दोपहर बाद, औफिस से आधी छुट्टी ले कर यहां आ जाना, वरना बहुत बुराई हो जाएगी. लोग कहेंगे कि शशिकांत साहब ऐसे छोटेमोटे आयोजन में कहां आने वाले हैं, आखिर, वे एक बड़े अफसर जो ठहरे.’’

कुलदीपा के आग्रह को टालना मेरे वश की बात नहीं है. सो, उस दिन मैं औफिस से आधी छुट्टी ले कर उमाकांतजी के आयोजन में शामिल होने सपरिवार जा पहुंचा. लेकिन, मैं ने देखा कि वहां कोई बड़ा जश्न नहीं है, जैसे कि किसी का जन्मदिन या मैरिज एनिवर्सरी आदि. बस, नीलेशजी, लालजी और भीमसेनजी के परिवारजन ही वहां मौजूद थे. लिहाजा, उमाकांतजी ने खड़े हो कर स्वागत किया जबकि उन की पत्नी, कुलदीपा को ले कर दूसरे कमरे में चली गईं और मेरे दोनों बच्चे वहां दूसरे बच्चों के साथ खेलकूद में व्यस्त हो गए. मामूली औपचारिकताओं के बाद चायपान हुआ, फिर 4 बजे के आसपास खाना. मुझे बड़ी कोफ्त हुई. बस, इतने से आयोजन के लिए मुझे औफिस का अत्यंत महत्त्वपूर्ण काम छोड़ कर वहां से छुट्टी लेनी पड़ी. बहरहाल, जब हम लोग वापस अपने फ्लैट में आए तो कुलदीपा ने बताया कि आज मिसेज उमाकांतजी से मेरी खूब बातचीत हुई. उमाकांतजी घंटाघर के पास एक शराब का ठेका लेना चाहते हैं जिस के लिए उन्हें आप की मदद चाहिए.

मैं चौंक गया, तो क्या शराब के ठेके के लिए लाइसैंस दिलाने के लिए सारी जुगत मुझे ही करनी होगी? मैं ने कुलदीपा से कहा, ‘‘अब, यह काम मुझ से नहीं हो पाएगा. उमाकांत नाजायज काम करने वाला आदमी है और मेरी उस के साथ नहीं निभने वाली है.’’ पर कुलदीपा उमाकांतजी के ही पक्ष में मुझ से तर्ककुतर्क करने लगी, ‘‘अरे, अब उमाकांतजी यह बिजनैस करना चाहते हैं तो करने दीजिए. हमारा क्या जाता है?’’ ‘‘मतलब यह कि वह हमारे मारफत ठेका खोलेगा, ठेके पर अवैध धंधा करेगा और जब पकड़ा जाएगा तो कानून की गिरफ्त में मैं आऊंगा क्योंकि उस के ठेके की जिम्मेदारी मेरे ऊपर होगी,’’ मैं एकदम से बिफर उठा.

पर कुलदीपा कहां मानने वाली? वह मुंह फुला कर बड़बड़ाती हुई कोपभवन में चली गई. ‘शराब के धंधे में कुछ गड़बड़झाला होगा तो उमाकांतजी ही भुगतेंगे,’ वह बच्चों की तरह बड़बड़ा रही थी. मैं समझ गया कि अब मुझे उमाकांतजी का काम कराना ही पड़ेगा, नहीं तो, जिद्दी बीवी दानापानी तक के लिए हम सब को परेशान कर देगी.

अपार्टमैंट में आए हुए कोई 3 महीने गुजर गए थे. इस दौरान, मेरी ख्याति अपनी वैलफेयर सोसायटी के एक सफल कार्यकर्ता के रूप में चतुर्दिक फैल गई थी. मेरी मेहनत की बदौलत, बिल्डर निरंजन ने घुटने टेक दिए थे और नगरनिगम के अधिकारी

हमारे अपार्टमैंट में दूसरी कालोनियों की अपेक्षा बेहतर सुविधाएं देने लगे थे. मैं ने अपार्टमैंट के लोगों के कई प्राइवेट काम भी कराए जिस से मैं उन का सब से बड़ा खैरख्वाह बन गया. लोगबाग मेरा फेवर पाने के लिए तरहतरह के तिकड़म अपनाने लगे. कभी चाय पर बुला लेते तो कभी डिनर पर. शाम को औफिस से लौटने के बाद, मैं जैसे ही घर में दस्तक देता, अपार्टमैंट वालों का हुजूम बारीबारी से उमड़ पड़ता. अब तो कुलदीपा भी एकदम से ऊबने लगी थी क्योंकि उसे हर आगंतुक के लिए चायपान जो तैयार करना पड़ता था, उन की बेवक्त खातिरदारी जो करनी पड़ती थी. पर वह भी मजबूर थी, उन के खिलाफ कुछ भी नहीं बोलती क्योंकि उस ने ही तो मुझे महज कालोनी में महत्त्वपूर्ण व्यक्ति साबित करने के लिए उन की खिदमत में उन के सामने पेश किया था जिस से वे ढीठ बनते गए. ऐसे में जब मैं उमाकांत, नीलेश, लाल और भीमसेन आदि की नुक्ताचीनी करता तो वह खामोश रहती या अपराधबोध के कारण अंदर रसोई में चली जाती.

चुनांचे, मेरे साथ सब से बुरी बात यह हुई कि मैं औफिस के काम में कोताही बरतने के कारण एक ऐसे बिगड़े हुए अधिकारी के रूप में जाना जाने लगा जो औफिस में काम को गंभीरता से नहीं लेता है, अपने अधीनस्थों को दबा कर रखता है और अनियमितताएं करने में संकोच नहीं करता. इस का खमियाजा भी मुझे ही भुगतना पड़ा. वर्ष के अंत में, वार्षिक रिपोर्ट में मेरी जो उपलब्धियां दर्शाई गईं, वे अत्यंत निराशाजनक थीं, उस कारण मेरे उच्चाधिकारी मुझ से नाराज रहने लगे और कार्यप्रणाली में बारबार कमियां निकालने लगे, रुकावटें डालने लगे. तनाव इतना बढ़ता गया कि इस बाबत मैं ने कुलदीपा को भी बतलाने की बारबार कोशिश की. पर वह हर बार मुंह बिचका कर कोई जवाब नहीं देती.

एक दिन, एक अजीबोगरीब घटना ने हमें जैसे नींद से जगा दिया. हमारे किशोर बेटे सुमित्र की आलमारी से शराब की बोतल बरामद हुई जो आधी खाली थी. कुलदीपा तो आपे से बाहर हो गई. जब सुमित्र की पिटाई हुई तो उस ने स्वीकार किया कि यह बोतल खुद उमाकांत अंकल ने उसे बुला कर यह कहते हुए दी कि इस के सेवन से कद बढ़ता है और छाती चौड़ी होती है. मैं आवेश में उमाकांत के पास जाने वाला ही था कि कुलदीपा ने मेरा हाथ पकड़ लिया, ‘‘अब झगड़ाफसाद करने से कुछ भी हासिल नहीं होगा. मैं जानती हूं कि वह शरीफ आदमी नहीं है. आप कुछ कहेंगे तो वह लड़ने पर उतारू हो जाएगा. क्या आप को मालूम नहीं है कि वह अपार्टमैंट में सब को कैसे दबा कर रखता है? कुछ दिनों से वह आप की गैरहाजिरी में मेरे फ्लैट में किसी न किसी बहाने से आने की ताक में रहने लगा है. मुझे उस का इरादा नेक नहीं लगता है.’’

कुलदीपा के शब्द सुन कर मेरे पैर के नीचे से जमीन खिसकती सी लगी. मैं तो यह पहले ही भांप गया था कि उमाकांत गिरा हुआ इंसान है, पर इस बात का बिलकुल अंदाजा नहीं था कि उस की गंदी नजर मेरे ही घर पर है. लिहाजा, उस दिन शाम को जब मैं थकामांदा औफिस से घर लौटा तो मैं ने बेटे सुमित्र को बता दिया कि यदि सोसायटी का कोई आदमी किसी काम से आए तो कह देना कि पापा की तबीयत ठीक नहीं है और वे सो रहे हैं. अभी मैं ने मुश्किल से आंखें झपकाई ही थीं कि बाहर उठे अचानक शोर से मैं बेचैन हो उठा. कुछ लोगों के बीच लड़ाई के अंदाज में जोरजोर से बातचीत हो रही थी जिस में नीलेश की आवाज ज्यादा ऊंची थी. मैं हड़बड़ा कर बाहर निकला तो यह देख कर दंग रह गया कि नीलेश ने उमाकांत की गरदन जोर से दबोच रखी है. जब मैं उन के पास पहुंचा तो नीलेश, उमाकांत को अपनी पकड़ से मुक्त करते हुए बोल उठा, ‘‘देखिए शशिकांत साहब, उमाकांतजी मेरे साथ धोखाधड़ी कर रहे हैं. कोई 6 महीने पहले मैं ने इन्हें शराब का ठेका खोलने के लिए 4 लाख रुपए दिए थे, पर अब तो ये साफ कह रहे हैं कि मैं ने इन्हें एक धेला भी नहीं दिया है. दोस्ती के नाम पर मैं ने किसी कागज पर इन से कुछ भी नहीं लिखवाया. मैं ने कभी नहीं सोचा था कि मेरा इतने बड़े दगाबाज आदमी से पाला पड़ेगा.’’

उमाकांतजी ने भी बारबार कहा कि नीलेश दोस्ती का वास्ता दे कर मुझ से झूठमूठ के रुपए ऐंठना चाहता है. मुझे तो दोनों बेहद बेईमान लग रहे थे. पर उस घटना में मैं आखिर तक खामोश रहा. दोनों थाने गए तो भी मैं उन के साथ नहीं गया. दोनों अलगअलग मुझ से पैरवी करने के लिए गिड़गिड़ाए, पर मैं टस से मस नहीं हुआ. आखिर मैं किस का साथ देता? इसी बीच, कुलदीपा ने आ कर इशारे से बुला लिया.

नीलेश और उमाकांत के साथ क्या हुआ, यह जानने की जहमत मैं ने नहीं उठाई. लेकिन उस रात मैं बिलकुल सो नहीं सका. अपार्टमैंट का माहौल बेहद खराब था. बच्चे भी बिगड़ रहे थे. 12 साल की बेटी तनु भी मुझ से कई बार शिकायत कर चुकी थी कि अपार्टमैंट के बच्चे उसे कमीजसलवार में देख कर ‘बहनजी, आंटीजी’ कह कर छेड़ते हैं क्योंकि मैं ने ही उसे सख्त हिदायत दे रखी थी कि उसे सलीके के कपड़े पहनने चाहिए. कुछ दिनों बाद मुझे पता चला कि नीलेश और उमाकांत के बीच किसी न किसी तरह सुलह हो चुकी है और दोनों फिर से साथसाथ रहने लगे हैं. इस दरम्यान, मैं वैलफेयर सोसायटी से बारबार कन्नी काट कर कभी किसी मेहमान के यहां चला जाता तो कभी औफिस से काफी देर बाद लौटता. सोसायटी वालों को मुझ से मुलाकात करने का मौका ही न मिलता.

रविवार का दिन था. कुलदीपा मुझे देख, कुछकुछ अचंभित थी क्योंकि कई दिनों के बाद मैं शाम को घर जल्दी आया था. उस ने आते ही कहा, ‘‘आज दिन में सोसायटी की जनरल बौडी की मीटिंग थी जिस में आप की गैरहाजिरी में आप की सहमति के बिना आप को सोसायटी का प्रैसिडैंट चुना गया है. उमाकांतजी का बेटा राहुल कई बार आप को बुलाने आ चुका है.’’ मैं मुसकरा उठा, ‘‘अब जल्दीजल्दी सारे सामानअसबाब की पैकिंग कर लो, मैं ने यह फ्लैट बेच कर कविनगर में एक नया विला खरीद लिया है. अब मुझे यहां एक पल के लिए भी रहना बरदाश्त नहीं हो रहा है. अभी चंद मिनट में कुछ मजदूर बाहर खड़े ट्रक में हमारा सामान लादने के लिए आ रहे हैं.’’ जब तक कि मजदूर घर में घुस नहीं आए, तनु और सुमित्र सोच रहे थे कि मैं कोई पहेली बुझा रहा हूं. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि हम इस गंदे अपार्टमैंट को छोड़ किसी विला में जा रहे हैं और आखिर पापा ने इतना कुछ इतने चुपके से किया.

दरअसल, मैं ने उन्हें कुछ कहनेसुनने का मौका ही नहीं दिया क्योंकि तब तक मजदूर आ कर घर का सामान उठाउठा कर ट्रक में रखने लगे थे और कुलदीपा भी उन्हें सामानों को हिफाजत से रखने की हिदायतें देने लगी थी. आधे घंटे में घर खाली हो गया. तब तक अपार्टमैंट के पड़ोसी मूकदर्शक बने ये सब कुछ देख रहे थे. कुछ लोग फुसफुसा रहे थे कि शशिकांतजी साहब ने तो यह फ्लैट पिछले साल ही खरीदा था, फिर क्या वे इस फ्लैट को किराए पर उठाने जा रहे हैं. तभी नीलेश और उमाकांत आते दिखे. उमाकांतजी मुझे कुछ पल चुपचाप देखते रहे, फिर मैं ने उन की चुप्पी तोड़ी, ‘‘उमाकांतजी, कल इस फ्लैट में एक दूसरे साहब आ रहे हैं. पर वे न तो कोई सरकारी अफसर हैं, न ही कोई कानूनदां. हां, वे बिल्डर निरंजन के साढ़ू भाई हैं. अगर हो सके तो आप लोग उन्हें ही सोसायटी का प्रैसिडैंट चुन लेना.’’

उमाकांतजी हकला उठे, ‘‘पर, शशिकांत साहब, आप हमें छोड़ कर जा कहां रहे हैं? अपना पताठिकाना तो देते जाइए. अभी तो आप के जरिए मुझे ढेरों काम करवाने हैं. आप से अब मिलना कहां होगा? मैं आप से संपर्क में कैसे बना रहूंगा.’’

मैं ने कहा, ‘‘उमाकांतजी, मेरा तबादला तो विदेश में हो गया है. अगर आप वहां आ सकें तो मैं अभी आप को अपना पताठिकाना नोट कराए देता हूं.’’ मैं अपनी जिंदगी का वह पहला झूठ बोल कर इसी शहर के महल्ले में सुकून से रह रहा हूं. कभीकभार उमाकांतजी, भीमसेनजी या नीलेशजी रास्ते में टकरा जाते हैं तो मैं उन से बड़ी सफाई से कतरा कर तेजी से कहीं और निकल जाता हूं और अगर मजबूरन उन से बात करनी भी पड़ जाती है तो मैं एक दूसरा झूठ दाग देता हूं कि अरे भई, किसी जरूरी सरकारी काम से इंडिया आया था. कल सुबह की ही फ्लाइट से वापस जा रहा हूं.

बच्चों के मुख से

मैं अमेरिका में अपनी बेटी के यहां गई थी. हम सब लोग एकसाथ लंच कर रहे थे. हमारी 7 साल की नातिन भी खा रही थी. वह बहुत हाजिरजवाब है. खाने में बिरयानी बनी थी जिस में कुछ साबुत मसाले भी डाले थे. खाते समय उसे दांतों तले कुछ कठोर चीज महसूस हुई. उस ने उस वस्तु को मुंह से बाहर निकाल कर हाथ में रख अपनी मां से पूछा कि यह लकड़ी खाने में कैसे आई. दरअसल, वह एक लौंग थी. हम ने कहा कि बेटे, यह लकड़ी नहीं, बल्कि एक मसाला ‘लौंग’ है.

इस पर मेरी नातिन हंस कर इंग्लिश में बोली, ‘‘कितनी फनी है नानी, देखने में कितनी शौर्ट है और आप इसे लौंग कैसे कहती हैं.’’ इस पर हम सब हंस पड़े थे. नातिन का जन्म अमेरिका में ही हुआ है, इसलिए उसे हिंदी न के बराबर आती है.

शकुंतला सिन्हा, बोकारो (झारखंड)

*

मैं अपने भाई के घर गई थी. उन का 8 साल का बेटा रोतेरोते मेरे पास आया, पूछने पर बोला, ‘‘स्कूल में एक लड़की ने मेरा पैंसिल बौक्स तोड़ दिया और धक्का भी दिया.’’ मैं ने उस से कहा, ‘‘तू भी धक्का दे देता, उसे कुछ कहा क्यों नहीं.’’ बड़ी मासूमियत से उस ने जवाब दिया, ‘‘बूआ, पापा कहते हैं ‘लड़कियों पर हाथ नहीं उठाना चाहिए, उन की इज्जत करनी चाहिए.’’’ मैं ने गद्गद हो कर उसे गले से लगा लिया. अगर हम सभी बचपन से ही अपने बेटों को लड़कियों की इज्जत करना सिखाएं तो लड़कियों के साथ होने वाली अभद्रता को कम कर सकते हैं.

वंदना कथूरिया, फरीदाबाद (हरियाणा)

*

मेरा 7 वर्षीय पोता अमेरिका से आया तो मैं उसे मंदिर ले गई. मंदिर के बाहर पत्थर की शेर की मूर्तियों को देख वह डर गया, कहने लगा, ‘‘मैं अंदर नहीं जाऊंगा, ये शेर हमें खा लेंगे.’’ मैं ने प्यार से कहा, ‘‘भला पत्थर के बने शेर कभी खा सकते हैं?’’ वह विश्वस्त हो कर अंदर आ गया. पूजा के दौरान वह गौर से सबकुछ देखता रहा. मैं ने कहा, ‘‘भगवान से मांगो कि वे तुम्हें बड़ा आदमी बनाएं.’’ वह हंस कर बोला, ‘‘बड़ा आदमी तो मैं अपनी मेहनत से बनूंगा, ये पत्थर के भगवान मुझे कैसे बड़ा बना देंगे.’’

पहली बार मुझे लगा कि हम से ज्यादा समझदार तो ये बच्चे हैं. उस की यह बात मेरे दिल को छू गई और सिखा गई कि कर्म सब से बड़ी चीज है.

शशि ठुकराल, रोहिणी (दि.)

फिर महागठबंधन

उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू हो गई है. बिहार की तर्ज पर वहां भी महागठबंधन बनाने की कोशिशें हो रही हैं. नतीजा रोचक हो सकता है कि मात्र 20-22 प्रतिशत मत पाने वाली पार्टी बहुमत से सीटें पा जाए.

प्रस्तावित महागठबंधन में अजित सिंह की राष्ट्रीय लोकदल और कांगे्रस व कई छोटी पार्टियां तो शामिल हो चुकी हैं. कठिनाई समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी की है. दोनों अकेले कितना मतप्रतिशत पा पाती हैं, इस के बारे में अभी नहीं कहा जा सकता. दोनों को 20-22 प्रतिशत मत जुटाने तो मुश्किल भी नहीं होंगे. उन्हें जीत भी मिल सकती है अगर बाकी वोट महागठबंधन और भारतीय जनता पार्टी में बंट जाएं.

पहले उम्मीद थी कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी में मेलमिलाप हो जाएगा लेकिन हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्महत्या ने भाजपा और दलित के बीच खाई चौड़ी कर दी है. मायावती का भगवे झंडे के नीचे शरण लेना, अपनी आत्महत्या करने जैसा होगा. समाजवादी पार्टी के तेवर चुनाव के मौके पर ढीले होंगे, अब इस की उम्मीद है. सत्तारूढ़ पार्टियां अकसर चुनावों से पहले झुकने वाले समझौते नहीं करतीं पर  मुजफ्फरनगर में 2 सीटें हारने के बाद शायद उस को अपना अक्खड़पन कम करना होगा और कांग्रेस या महागठबंधन से समझौता करना होगा.

यह पक्का है कि चुनाव में मुद्दा सिर्फ सत्ता में आने का होगा. किसी भी पार्टी का राज्य के बारे में कोई खास कार्यक्रम नहीं है. उत्तर प्रदेश पहले की तरह बिखराव और बेकारी का गढ़ बना रहेगा. सत्ता में आ कर कुछ लोग लाभ उठाएंगे. प्रदेश में कोई चमचमाता सूरज निकलने लगेगा, इस की उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि चारों पक्षों में किसी का कोई एजेंडा है ही नहीं. जबकि उत्तर प्रदेश का विकास ही देश की गरीबी मिटाने की चाबी है. जो चुनावी उठापटक हो रही है वह नेताओं के अपने भविष्य के लिए है, जनता के लिए नहीं. इसलिए जो भीड़ नेताओं के सामने दिखेगी, वह किराए के लोगों की होगी जिन्हें भक्त लोग हांक कर लाएंगे. कोई भी जीते, इस राज्य का अगली सरकार के दौरान भी कुछ होने वाला नहीं, यह पक्का है.

नीरजा पर बैन

अभिनेत्री सोनम कपूर की फिल्म ‘नीरजा’ को पाकिस्तान में रिलीज होने से रोक दिया गया है. यह बैन पाकिस्तान ने इस आधार पर लगाया है कि इस फिल्म में उन के मुल्क की नकारात्मक इमेज दिखाई गई है. भारतीय फिल्मों को वहां इस से पहले भी कई बार बैन का सामना करना पड़ा है. दिलचस्प बात यह है कि यह फिल्म सैंसर बोर्ड (पाकिस्तान) के सामने पहुंचने से पहले ही बैन कर दी गई. बता दें कि यह फिल्म कराची एअरपोर्ट से 1986 में एक विमान के हाइजैक होने की सत्य घटना पर आधारित है. इस विमान की चालक दल की सदस्या नीरजा विमान यात्रियों को बचाने के लिए अदम्य साहस का परिचय देते हुए शहीद हो गई थी. हालांकि किसी फिल्म को बैन करने से कोई फायदा नहीं क्योंकि इस के पाइरेटेड वर्जन हर सैंसर बोर्ड को लांघ जाते हैं.

काबिल यामी और रितिक

फिल्म ‘सनम रे’ की रिलीज के बाद ही यामी गौतम ने एक जोरदार घोषणा करते हुए रितिक के साथ फिल्म ‘काबिल’ में अभिनय करने का खुलासा किया. पहली बार किसी सुपरस्टार के साथ काम कर रही यामी बहुत ही उत्साहित हैं. वे ट्विटर पर लिखती हैं, ‘‘इस सफर पर जाने के लिए मैं और इंतजार नहीं कर सकती. आप के साथ काम करने के लिए मैं काफी उत्सुक हूं.’’

संजय गुप्ता द्वारा निर्देशित होने वाली इस फिल्म का निर्माण राकेश रोशन कर रहे हैं. हालांकि संजय गुप्ता फिल्म में सहनिर्माता की भी भूमिका में है. गौरतलब है कि अब तक यामी फिल्म ऐक्शन जैक्शन, बदलापुर में छोटे किरदारों में ही नजर आई हैं. ऐसे में रितिक के अपोजिट काम पा कर उन का उत्साहित होना बनता भी है.

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