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बिहार के बाहर कामयाब होगा महागठबंधन?

बिहार में नरेंद्र मोदी को मात देने के बाद अब नीतीश और लालू दूसरे राज्यों में भी मोदी के गुब्बारे की हवा निकालने के लिए कमर कस चुके हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को मिली जबरदस्त कामयाबी के बाद जदयू ने उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम और पंजाब में महागठबंधन बनाने की कवायद शुरू कर दी है. पिछले दिनों दिल्ली में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इस बात का फैसला लिया गया कि जिन राज्यों में आने वाले दिनों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां गैरभाजपा दलों का महागठबंधन बनाया जाएगा.

बिहार में महागठबंधन को मिली महाकामयाबी के बाद भाजपा को उस की अनदेखी करना आसान नहीं होगा. शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आजाद विवाद समेत कई भीतरी उठापटक झेल रही भाजपा के लिए महागठबंधन खासा सिरदर्द करने वाला होगा.

नीतीश कहते हैं कि उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम के क्षेत्री दलों को यह तय करना होगा कि वे अकेले चुनाव लड़ें या बिहार के महागठबंधन के मौडल की राह पर चल कर भाजपा को तगड़ी चुनौती दें.

243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में महागठबंधन का 178 सीटों पर कब्जा है. इस में जदयू की झोली में 71, राजद के खाते में 80 और कांगे्रस के हाथ में 27 सीटें हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में सब से बड़े विजेता लालू ही रहे. पिछले 10 साल से राज्य की राजनीति में हाशिए पर ढकेल दिए गए लालू अब नई सजधज के साथ एक बार फिर बिहार की सियासत में ताल ठोंक चुके हैं.

पिछले विधानसभा में 22 सीट पर सिमटने वाले राजद ने इस बार 80 सीटें जीत कर अपनी मजबूत जगह बना ली है. महागठबंधन ने राजग को महाझटका देते हुए उसे 58 सीट पर ही समेट डाला था, जिस से महागठबंधन का हौसला बुलंद है.

मुसलिम, यादव, कुर्मी, कुशवाहा, पिछड़े, अतिपिछड़े और महादलित महागठबंधन की ताकत बन चुके हैं जिन की आबादी 70 फीसदी के करीब है. महागठबंधन की जीत के पीछे सब से बड़ी वजह यह रही कि पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार से सबक लेते हुए नीतीश, लालू और कांगे्रस ने मिल कर महागठबंधन बनाने में जरा भी देरी नहीं की. महागठबंधन ने शुरू से ही नीतीश की अगुआई में चुनाव लड़ने का ऐलान किया और अंत तक उस पर कायम रहा. जब महागठबंधन बनाने की कवायद परवान चढ़ी, महागठबंधन के अगुआ रहे मुलायम सिंह का साथ नहीं मिलना तय है. वहीं, बसपा प्रमुख मायावती भी महागठबंधन को खास भाव नहीं दे रही हैं. इस से फिलहाल उत्तर प्रदेश में महागठबंधन बनने के आसार नहीं दिख रहे हैं.

उत्तर प्रदेश की सियासत के 2 मजबूत चेहरे मुलायम सिंह और मायावती महागठबंधन से दूर रहे हैं. नीतीश ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में मुलायम और अखिलेश यादव को भी न्योता भेजा था, पर उन्होंने अपने किसी नुमाइंदे को भेजने की भी जरूरत नहीं समझी. सपा प्रमुख मुलायम के इस रवैये से 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए महागठबंधन बनाने की उम्मीद को झटका लगा है.

साल 2012 में हुए उत्तर प्रदेश की 403 सीटों वाली विधानसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी को 224 सीटें मिलीं और मायावती की बसपा की झोली में 80 सीटें गई थीं. साल 2007 के चुनाव में बसपा को 206 और सपा को 97 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. सो उत्तर प्रदेश के दोनों क्षत्रप अपने बूते सरकार बनाने की ताकत रखते हैं, ऐसे में दोनों में से कोई नहीं चाहेगा कि सत्ता की मलाई काटने में किसी के साथ बंटवारा किया जाए.

कुछ ऐसा ही हाल पश्चिम बंगाल में भी है. साल 2011 में 294 सीटों वाली पश्चिम बंगाल की विधानसभा में ममता बनर्जी की तृणमूल कांगे्रस ने अकेले 186 सीटों पर कब्जा जमा लिया था. ममता ने पश्चिम बंगाल की सत्ता पर पिछले 32 सालों से जमे वामपंथियों को उखाड़ फेंका था. ताकतवर होने की वजह से ममता किसी दूसरे दल से गठबंधन करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही हैं. उन्हें पूरा यकीन है कि इस बार भी वे विधानसभा के चुनाव में अकेले जीत का परचम लहरा सकती हैं.

नीतीश की मोदी को पटखनी

उधर, नीतीश कुमार अपने शपथ ग्रहण समारोह में देशभर के मोदी विरोधी नेताओं और पार्टियों को इकट्ठा करने में भी काफी हद तक कामयाब रहे हैं. बिहार के बाद नैशनल लेवल पर नरेंद्र मोदी को पटखनी देने के लिए उन्होंने देश की राजनीति का नया चेहरा बनने के संकेत दिए हैं. चुनाव प्रचार में लालू प्रसाद यादव से कन्नी काटने वाले राहुल गांधी लालू से गले मिलते दिखे, वहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल चारा घोटाले के मामले में मुजरिम करार दिए गए लालू से गले मिलते नजर आए. जब इस बात पर केजरीवाल की छीछालेदर हुई तो उन्होंने कह डाला कि वे लालू से गले नहीं मिले, बल्कि लालू ने उन्हें जबरन गले लगाया था.

बहरहाल, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, कांगे्रस की शीला दीक्षित, तरुण गोगोई, सिद्धारमैया, शिवसेना के रामदास कदम, राकांपा के शरद पवार, तृणमूल की ममता बनर्जी, वामपंथी सीताराम येचुरी, जनता दल (एस) के एच डी देवेगौड़ा, इनेलो के अभय चौटाला, झारखंड विकास मोरचा के बाबूलाल मरांडी, झामुमो के हेमंत सोरेन, असम गण परिषद के प्रफुल्ल कुमार महंत, अकाली दल के सुखबीर सिंह बादल को नीतीश एक मंच पर खड़ा कर चुके हैं.

शपथ ग्रहण समारोह की बड़ी खासीयत यह रही कि 9 राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित 15 दलों के नेता मौजूद थे. इन 15 दलों के पास राज्यसभा की 244 सीटों में से 132 पर कब्जा है.

नीतीश और लालू का मकसद है कि बिहार में महागठबंधन को भारी कामयाबी मिलने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर भी महागठबंधन का प्रयोग किया जाए. कांगे्रस के एमएलसी रामचंद्र भारती कहते हैं कि बिहार में महागठबंधन को कामयाबी मिलने के बाद पश्चिम बंगाल, असम, तामिलनाडु, पंजाब और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में इस तरह के प्रयोग का रास्ता साफ हुआ है. बिहार में महागठबंधन ने नरेंद्र मोदी की चमक को काफी फीका कर दिया है. राज्यों के विधानसभा चुनावों तक ही महागठबंधन खुद को सीमित नहीं रखना चाहता है, बल्कि वह साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए भी कमर कसने लगा है.

जदयू को पूरा भरोसा है कि नीतीश के नाम पर दूसरे राज्यों के क्षेत्रीय दल महागठबंधन के झंडे तले आ जाएंगे. 2014 के आम चुनाव में जिस तरह से कांगे्रस के भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता ने भाजपा और नरेंद्र मोदी में भरोसा जताया था उसी तरह का भरोसा जनता अगले आम चुनावों में नीतीश के पक्ष में जता सकती है. अगर मोदी की इमेज समय दर समय टूटतीबिखरती रहती है तो 2019 के आम चुनाव में जनता मजबूत विकल्प खोजेगी और महागठबंधन उसी के लिए खुद को अभी से तैयार करने में जुट गया है. इस साल पश्चिम बंगाल, असम में और अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, अगर इन राज्यों में महागठबंधन बनता है और उसे कामयाबी मिलती है तो अगले आम चुनाव के लिए महागठबंधन की राह काफी आसान हो जाएगी.

लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान दूसरे राज्यों में महागठबंधन बनाने की कोशिशों की खिल्ली उड़ाते हुए कहते हैं कि काठ की हांडी बारबार नहीं चढ़ती है. ऐसे में महागठबंधन के नेताओं की हवा निकलनी तय है. पिछले लोकसभा चुनाव में कांगे्रस समेत सभी इलाकाई दलों का तंबू मोदी की आंधी से उखड़ चुका है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी परिवार तक सिमट कर 5 सीटों पर रह गई तो बिहार में जदयू 20 सीटों से गिर कर 2 सीट पर सिमट गया था. राजद को 4 सीटों से ही संतोष करना पड़ा और जनता दल (एस), सजपा, इनेलो की हालत तो पानी मांगने वाली भी नहीं रही.

गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव के पहले देश के 11 क्षेत्रीय दलों को मिला कर नया फ्रंट बनाने की नाकाम कोशिश की गई थी. उस में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव, जनता दल (एस) के नेता एच डी देवेगौड़ा, बीजू जनता दल के सुप्रीमो नवीन पटनायक, एआईएडीएमके की जयललिता और माकपा नेता प्रकाश कारत जैसे क्षेत्रीय मजबूत नेता शामिल थे. लेकिन यह कोशिश परवान नहीं चढ़ सकी थी, जिस का पूरा फायदा भाजपा को मिल गया.

बहरहाल, अब अगर राज्यों में महागठबंधन को कामयाबी मिलती है तो अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को तगड़ी चुनौती मिलनी तय है. इस तरह विधानसभा चुनाव के नतीजे देश की राजनीति को नई दिशा देंगे.

लालू उवाच

एक बार फिर से राजद का मुखिया चुनने के बाद लालू प्रसाद यादव पूरी ठसक के साथ कहते हैं कि अब केंद्र से भाजपा को उखाड़ फेंकना ही उन का मकसद है. साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव तक सभी राज्यों में गैर भाजपा दलों को एकजुट करने की मुहिम शुरू हो चुकी है. नरेंद्र मोदी की सरकार की कलई खुल चुकी है और उन से जनता का मोहभंग हो चुका है.

राजद की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में हुंकार भरते हुए उन्होंने कहा कि बिहार से फासीवादी ताकतों को खदेड़ दिया गया है और अब कश्मीर से कन्याकुमारी तक फासीवादी ताकतों को खत्म कर दिया जाएगा. राष्ट्रीय स्तर पर समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिल कर भाजपा के खिलाफ आंदोलन शुरू किया जाएगा. उन्होंने कहा कि देश की सभी बड़ी संस्थाओं का भगवाकरण किया जा रहा है और उन में आरएसएस के लोगों को भरा जा रहा है. गांधी के हत्यारे को महिमामंडित किया जा रहा है. ऐसी तमाम कोशिशों को कुचल दिया जाएगा.

इन्हें भी आजमाइए

– आजकल बाजार में कई ऐसे ब्यूटी उत्पाद हैं जिन का प्रयोग एक से अधिक काम के लिए किया जा सकता है. लिपस्टिक चीक टिंट की तरह प्रयोग कर सकते हैं और बीबी क्रीम कंसीलर का काम कर सकती है. इस से आप बहुत सारे प्रोडक्ट्स खरीदने से बचेंगे.

– खाना पकाते समय दालचीनी, अदरक, कालीमिर्च का उपयोग जरूर करें. ये मसाले सेहत के लिए फायदेमंद हैं. इस से आप की इन्सुलिन क्षमता बढ़ती है और साथ ही रक्त में शर्करा की मात्रा कम होती है.

– आप कितने ही व्यस्त क्यों न रहते हों, अपने जानकारों और दोस्तों से संपर्क न टूटने दें. लोगों से मेलमिलाप रखने से कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता रहता है.

– बालों के लिए शैंपू लगाने के बाद कंडीशनर की जरूरत पुरुषों को भी उतनी ही होती है जितनी महिलाओं को. इस से बालों की नमी और चमक लंबे समय तक बरकरार रहती है.

– अकसर पेट की गड़बड़ी से चेहरे पर दागधब्बे नजर आते हैं, सो दिन में कम से कम 3 बार नीबू पानी पिएं, कुछ ही हफ्तों में चेहरा चमकने लगेगा.

– औफिस या घर के पास पार्किंग होने के बजाय कोशिश करें कि थोड़ी दूर पर हो. इस से आप का पैदल चलने का अभ्यास बढ़ेगा और आप स्वस्थ रहेंगे.

बात ऐसे बनी

बच्चे मेले से एक पीपनी खरीद लाए थे जो फूंकने पर बेहद तीखी आवाज करती है. कुछ देर के लिए तो कान झन्ना जाता है. एक दिन लगातार मेरे मोबाइल पर किसी मनचले का बारबार फोन आ रहा था. तंग आ कर मैं ने मोबाइल स्विच औफ कर दिया पर पता नहीं कहां से उस ने लैंडलाइन फोन हासिल कर लिया था. एकाएक दिमाग में एक खुराफात सूझी. फोन बजा, जैसे ही हैलो कहने पर उस ने बकवास शुरू की, मैं ने जोर से माउथपीस पर रख कर पीपनी बजा दी. वह कुछ बोलता, मैं पीपनी बजा देती. शायद कान झन्नाने से तंग आ कर उस ने फोन करना बंद कर दिया.

शशि गोयल, आगरा (उ.प्र.)

*

वैन वाला ड्राइवर किसी के घर के आगे वैन खड़ी कर के चला गया. थोड़ी देर में जिन के घर के आगे वैन खड़ी थी वे लोग वापस आ गए. अब उन्हें अपनी गाड़ी पार्क करने में असुविधा हो रही थी. उन्होंने 10-15 मिनट तक वैन के ड्राइवर  का इंतजार किया कि शायद थोड़ी देर के लिए गया होगा, वापस आ जाएगा. लेकिन जब वह नहीं आया तो उन के सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने उस वैन के 2 पहियों की हवा निकाल दी. थोड़ी देर बाद जब ड्राइवर वापस आया और उस ने 2 पहियों की हवा निकली देखी तो यह कह कर जाने लगा कि अब तो वह सुबह ही गाड़ी हटा पाएगा. रात हो गई है. मैकेनिक नहीं मिलेगा. दुकानें बंद हो चुकी हैं. वे सज्जन सकपका गए कि अब वे अपनी गाड़ी कैसे पार्क करेंगे. वे तुरंत अपने घर से हवा भरने का पंप लाए और खुद ने उस वैन के पहियों में हवा भरी. फिर ड्राइवर से बोले कि अपनी गाड़ी ले जाए. ड्राइवर शान से गाड़ी में बैठा और चलता बना.

– सतपाल सिंह, विष्णु गार्डन (न.दि.)

*

मेरी एक सहपाठिन अकसर मेरे से 20-30 रुपए उधार ले लेती लेकिन कभी वापस नहीं करती थी. थोड़े पैसे होने के कारण मैं मांग नहीं पाती थी. एक दिन गृहविज्ञान की अध्यापिका ने हमें 2-2 लड़कियों के समूह में 1-1 चादर बना कर विद्यालय में जमा करने के लिए कहा. तभी मुझे एक उपाय सूझा. मैं और मेरी वही सहपाठिन जब चादर खरीदने के लिए बाजार जाने लगीं तो मैं ने उसे 50 रुपए थमाते हुए कहा, ‘‘ये 50 रुपए रखो और बाकी उन रुपयों में से काट लेना जो तुम ने मुझ से उधार लिए थे.’’ बस, बात बन गई, मजबूरन उसे मेरा यह प्रस्ताव स्वीकारना पड़ा.

– प्राक्षी त्यागी, मुजफ्फरनगर (उ.प्र.)

जीवन की मुसकान

रश्मि अपने डाक्टर पति को ज्यों ही बांहों में कैद करती, कोई न कोई मरीज घंटी बजा देता और रश्मि के सपने अधूरे रह जाते. पति के कर्तव्य और अपने प्यार के बीच उलझी रश्मि समझ न पाती कि उस की समस्या का हल कैसे होगा? कौलबैल की आवाज सुनते ही रश्मि के दिल पर एक घूंसा सा लगा. उसे लगा, आग का कोई बड़ा सा गोला उस के ऊपर आ गया है और वह उस में झुलसती जा रही है.

पति की बांहों में सिमटी वह छुईमुई सी हुई पागल होना चाहती थी कि सहसा कौलबैल ने उसे झकझोर कर रख दिया. कौलबैल के बीच की दूरी ऐसी थी, जिस ने कर्तव्य में डूबे पति को एकदम बिस्तर से उठा दिया. रश्मि मन ही मन झुंझला उठी.

‘‘डाक्टर, डाक्टर, हमारे यहां मरीज की हालत बहुत खराब है,’’ बाहर से आवाज आई.

रश्मि बुदबुदाई, ‘ये मरीज भी एकदम दुष्ट हैं. न समय देखते हैं, न कुछ… अपनी ही परवा होती है सब को. दूसरों को देखते तक नहीं, मरमरा जाएं तो…’

‘‘शी…’’ उस के पति डाक्टर सुंदरम ने उस को झकझोरा, ‘‘धीरे बोलो. ऐसा बोलना क्या तुम्हें शोभा देता है?’’

रश्मि खामोश सी, पलभर पति को घूरती रही, ‘‘मत जाइए, हमारी खुशियों के वास्ते आज तो रहम कीजिए. मना कर दीजिए.’’

‘‘पागल तो नहीं हो गई हो, रश्मि? मरीज न जाने किस अवस्था में है. उसे मेरी जरूरत है. विलंब न जाने क्या गुल खिलाए? मुझे जाने दो.’’

‘‘नहीं, आज नहीं जाने दूंगी. रोजरोज ऐसे ही करते हो. कभी तो मेरी भी सुना करो.’’

‘‘कर्तव्य की पुकार के आगे हर आवाज धीमी पड़ जाती है, रश्मि. यह नश्वर शरीर दूसरों की सेवा के लिए ही तो बना है. जीवन में क्या धरा है, केवल आत्मसंतोष ही तो, जो मुझे मरीजों को देख, उन्हें संतुष्ट कर के मिल जाता है.’’

‘‘कर्तव्य, कर्तव्य, कर्तव्य,’’ रश्मि खीझी, ‘‘क्या तुम्हीं रह गए हो कर्तव्य पूरा करने वाले? मरीज दूसरे डाक्टर को भी तो बुला सकता है. तुम मना कर सकते हो.’’

‘‘ऐसे ही सब डाक्टर सोचने लगें तो मरीज को कौन देखेगा?’’ सुंदरम ने मुसकरा कर कहा, ‘‘हटो आगे से…हटो, रश्मि.’’

‘‘नहीं, नहीं,’’ रश्मि सिर को झटक कर एक ओर हट गई. उस की आंखों में आंसू थे.

डाक्टर सुंदरम शीघ्रता से बाहर निकल गए. रश्मि की आंखों तले अंधेरा सा छाया था. वह उठ कर खिड़की से बाहर देखने लगी. हां, अंधेरा है, दूरदूर तक अंधेरा है. सारा नगर सो रहा है और वह जागी है. आसपास पत्तों के खड़कने की भी आवाज नहीं है और उस की आंखों की पुतलियां न जाने किस दिशा में बारबार फिर रही हैं, आंखों में विवशता का पानी है. लाचार है. आंखों में पानी का गहरा नीला सागर है. होंठों पर न जाने कैसे झाग निकल कर बाहर टपक रहे हैं. किंतु यहां उस की इस दशा को देखने वाला कौन है? परखने वाला कौन है?

रश्मि ध्यान से कमरे की एकएक चीज अंधेरे में आंखें फाड़फाड़ कर देखने लगी. पलंग पर एक तरफ उस का 2 वर्ष का बेटा अविनाश सोया पड़ा है. कमरे में सुखसुविधा की सारी चीजें उपलब्ध हैं. रेडियो, फ्रिज, टेपरिकौर्डर और न जाने क्याक्या. किंतु इन सब के बीच वह सुख कहां है जिस की किसी भी पत्नी को चाह होती है, जरूरत होती है? वह सुख उस से क्यों छीना जाता है, लगभग हर रोज? उस की आंखों की पुतलियां एक बार फिर अविरल हो चलीं. उस की आंखें घूमती गईं. कुछ न भूलने वाली बातें, कुछ हमेशा याद रखने वाली बातें.

आज बड़ी मुश्किल से पति के पास कुछ अधिक देर बैठने का मौका मिला था. उस ने आज पूरे चाव से अपना शृंगार किया था, ताकि मरीजों से अलग बैठा सुंदरम उस में खो सके. खाने की मेज पर सुंदरम बोला था, ‘रश्मि, आज कितनी अच्छी लग रही हो, इच्छा होती है, तुम इसी तरह बैठी रहो और मैं भी इसी तरह बैठा तुम्हें देखता रहूं?’ और वह खुशी से झूम उठी. मस्ती के उन क्षणों को सोते वक्त वह और भी मधुर बनाना चाहती थी कि मरीज ने आ कर किसी लुटेरे की भांति उस के सुख को छिन्नभिन्न कर दिया और वह मुट्ठियां भींच बैठी थी. कर्तव्य के आगे सुंदरम के लिए कोई भी महत्त्व नहीं रखता. वह शीघ्रता से ओवरकोट पहन कर बाहर निकल गया था.

रश्मि को ध्यान आया, यह सब आज की बात नहीं है. उस के सुख पर ऐसा हमला शादी के तुरंत बाद ही होने लगा था. सुहागरात की उन मधुर घडि़यों में तो शायद मरीजों को उस पर तरस आ गया था. उस रात कोई कौलबैल नहीं घनघनाई थी. उस की सुखभरी जिंदगी का शादी के बाद वह शायद पहला व अंतिम दिन था, जब रात बिना किसी बाहरी हलचल के बीती थी. किंतु उस के अगले ही दिन उस के सपनों का सजाया कार्यक्रम छिन्नभिन्न हो गया था और जिंदगी अस्तव्यस्त. सुंदरम अपने मरीजों के प्रति इतना वफादार था कि उस के आगे खानापीना ही नहीं, बल्कि पत्नी भी महत्त्वहीन हो जाती थी. कौलबैल बजी नहीं कि वह मरीज को देखने निकल जाता. इस तरह रश्मि का जीवन एक अजीब प्रतीक्षा और अस्तव्यस्त ढंग से बीतने लगा था. जीने का न कोई ढंग था, न नियम. था तो केवल मरीजों को देखने का नियम, हर समय जब भी मालूम पड़े कि मरीज बीमार है. और घर में खाना कभी 12 बजे खाया जा रहा है, तो कभी 1 बजे, कभी 2, 3 या 4 बजे, कभी बिलकुल ही नहीं. रात का भी यही हाल था.

रश्मि प्रतीक्षा करती रहती कि कब सुंदरम आए, वह उस के साथ भोजन करे, बातें करे. लेकिन अस्पताल से देर से लौटने के बाद भी यह हाल था कि ऊपर से मरीज आ गए तो फिर बाहर. रात के 2 बजे कौलबैल बज उठे तो परवा नहीं, अफसोस नहीं. बस, कर्तव्य एक डाक्टर का एक मरीज के प्रति ही याद रहता. रश्मि को यह बिलकुल पसंद नहीं था. चौबीस घंटों में वह बहुत कम समय पति को अपने नजदीक पाती थी. वह चाहती थी, सुंदरम एक निश्चित कार्यक्रम बना ले, इतने से इतने बजे तक ही मरीजों को देखना है, उस के बाद नहीं. बाकी समय उसे वह अपने पास बिठाना चाहती थी.

पति का मूड भी बात करने का होता कि मरीज आ धमकता और सारा मजा किरकिरा. सब बातें बंद, मरीज पहले. घूमने का प्रोग्राम भी मरीज के कारण रुक जाता. उसे लगता है, रात कभी 2 बजे से शुरू होती है, कभी 3 बजे से. यह भी कोई जिंदगी है. लेकिन सुंदरम कहता कि मरीज को देखने का कोई समय नहीं होता. मरीज की हालत तो अनायास ही बिगड़ती है और यह मालूम पड़ते ही डाक्टर को उस की जांच करनी चाहिए. मरीजों को देखने के लिए बनाए कार्यक्रम के अनुसार चलने पर वह कार्यक्रम किसी भी मरीज की जान ले सकता है. जब मरीज बीमार है तभी डाक्टर के लिए उसे देखने का समय होता है. देखने का कोई निश्चित समय नहीं तय किया जा सकता.

उसे सुंदरम का कहा याद आने लगा, ‘रश्मि, मैं तुम्हारी हर खुशी का खयाल रखूंगा. लेकिन मेरी प्यारी रश्मि, कर्तव्य के आगे मैं तुम्हें भी भूल जाऊंगा.’

उसे अपने स्वर भी सुनाई दिए, ‘सुंदरम, क्या दुनिया में तुम्हीं अकेले डाक्टर हो? हर समय तुम मरीज को नहीं देखने जाओगे तो दूसरा डाक्टर ही उसे देख लेगा.’

‘रश्मि, अगर ऐसे ही हर डाक्टर सोचने लगे तो फिर मरीज को कौन देखेगा?’

‘मैं कुछ नहीं जानती, सुंदरम. क्या तुम्हें मरीज मेरी जिंदगी से भी प्यारे हैं? क्या मरीजों में ही जान है, मुझ में नहीं? इस तरह तो तुम मुझे भी मरीज बना दोगे, सुंदरम. क्या तुम्हें मेरी बिलकुल परवा नहीं है?’

अजीब कशमकश में पड़ा सुंदरम उस की आंखों के आगे फिर तैर आया, ‘मुझे रुलाओ नहीं, रश्मि. क्या तुम समझती हो, मुझे तुम्हारी परवा नहीं रहती? सच पूछो तो रश्मि, मुझे हरदम तुम्हारा ही खयाल रहता है. कई बार इच्छा होती है कि सबकुछ छोड़ कर तुम्हारे पास ही आ कर बैठ जाऊं, चाहे दुनिया में कुछ भी क्यों न हो जाए.

‘लेकिन क्या करूं, रश्मि. जब भी किसी मरीज के बारे में सुनता या उसे देखता हूं तो मेरी आंखों के आगे मां का तड़पता शरीर तैर जाता है और मैं रह नहीं पाता. मुझे लगता है, 14 साल पहले की स्थिति उपस्थित होने जा रही है. उस समय किसी डाक्टर की गलती ने मेरी मां के प्राण लिए थे और आज मैं मरीज को न देखने जा कर उस के प्राण ले रहा हूं. और उस के घर वाले उसी तरह मरीज की असमय मृत्यु से पागल हुए जा रहे हैं, मुझ को कोस रहे हैं, जिस तरह मैं ने व मेरे घर वालों ने डाक्टर को समय पर न आने से मां की असमय मृत्यु हो जाने पर कोसा था.’

‘रश्मि, मैं जितना भी बन सकता है, तुम्हारे पास ही रहने की कोशिश करता हूं. 24 घंटों में काफी समय तब भी निकल आता है, तुम्हारे पास बैठने का, तुम्हारे साथ रहने का. मेरे अलग होने पर तुम अविनाश से ही खेल लिया करो या टेप ही चला लिया करो. तुम टेप सुन कर भी अपने नजदीक मेरे होने की कल्पना कर सकती हो.’

‘ऊंह, केवल इन्हीं बातों के सहारे जिंदगी नहीं बिताई जा सकती, सुंदरम. नहीं, बिलकुल नहीं.’

‘रश्मि, मुझे समझने की कोशिश करो. मेरे दिल की गहराई में डूब कर मुझे पहचानने की कोशिश करो. मुझे तुम्हारे सहारे की जरूरत है, रश्मि. मुझे तुम्हारे प्यार की जरूरत है, रश्मि. उस प्यार की, उस सहारे की जो कर्तव्य पथ पर बढ़ते मेरे कदमों को सही दिशा प्रदान करे. तुम क्या जानो, रश्मि, तुम जब प्रसन्न हो, जब तुम्हारा चेहरा मुसकराता है तो मेरे मन में कैसे अपूर्व उत्साह की रेखा खिंच जाती है.

‘और जब तुम उदास होती हो, तुम नहीं जानतीं, रश्मि, मेरा मन कैसीकैसी दशाओं में घूम उठता है. मरीज को देखते वक्त, कैसी मजबूती से, दिल को पत्थर बना कर तुम्हें भूलने की कोशिश करता हूं. और मरीज को देखने के तुरंत बाद तुम्हारी छवि फिर सामने आ जाती है और उस समय मैं तुरंत वापस दौड़ पड़ता हूं, तुम्हारे पास आने के लिए, तुम्हारे सामीप्य के लिए…

‘रश्मि, जीवन में मुझे दो ही चीजें तो प्रिय हैं-कर्तव्य और तुम. तुम्हारी हर खुशी मैं अपनी खुशी समझता हूं, रश्मि. और मेरी खुशी को यदि तुम अपनी खुशी समझने लगो तो…तो शायद कोई समस्या न रहे. रश्मि, मुझे समझो, मुझे पहचानो. मैं हमेशा तुम्हारा मुसकराता चेहरा देखना चाहता हूं. रश्मि, मेरे कदमों के साथ अपने कदम मिलाने की कोशिश तो करो. मुझे अपने कंधों का सहारा दो, रश्मि.’

और रश्मि के आगे घूम गया सुंदरम का तेजी से हावभाव बदलता चेहरा. चलचित्र की भांति उस के आगे कई चित्र खिंच गए. मां की असमय मृत्यु की करुणापूर्ण याद समेटे, आज का बलिष्ठ, प्यारा सुंदर, जो मां को याद आते ही बच्चा बन जाता है, पत्नी के आगे बिलख उठता है. रो उठता है. वह सुंदरम, जो कर्तव्य पथ पर अपने कदम जमाने के लिए पत्नी का सहारा चाहता है, उस की मुसकराहट देख कर मरीज को देखने जाना चाहता है और लौटने पर उस की वही मुसकराहट देख कर आनंदलोक में विचरण करना चाहता है लेकिन वह करे तो क्या करे? वह नहीं समझ पाती कि सुंदरम सही है या वह. इस बात की गहराई में वह नहीं डूब पाती. उस का मन इस समस्या का ऐसा कोई हल नहीं खोज पाता, जो दोनों को आत्मसंतोष प्रदान करे. सुंदरम की मां डाक्टर की असावधानी के कारण ही असमय मृत्यु की गोद से समा गई थीं और उसी समय सुंदरम का किया गया प्रण ही कि ‘मैं डाक्टर बन कर किसी को भी असमय मरने नहीं दूंगा,’ उसे डाक्टर बना सका था. इस बात को वह जानती थी.

किंतु वह नहीं चाहती कि इसी कारण सुंदरम उस की बिलकुल ही उपेक्षा कर बैठे. कुछ खास अवसरों पर तो उसे उस का खयाल रखना ही चाहिए. उस समय वह किसी अपने दोस्त डाक्टर को ही फोन कर के मरीज के पास क्यों न भेज दे?

रश्मि ने एक गहरी सांस ली. खयालों में घूमती उस की पलकें एकदम फिर पूरी खुल गईं और फिर उसे लगा, वही अंधेरा दूरदूर तक फैला हुआ है. वह समझ नहीं पा रही थी कि इस अंधेरे के बीच से कौन सी राह निकाले?

अंधेरे की चादर में लिपटी उस की आंखें दूरदूर तक अंधेरे को भेदने का प्रयास करती हुई खयालों में घूमती चली गईं. उसे कब नींद ने अपने आगोश में ले लिया, उसे खुद पता न चला. अगले दिन कौलबैल एक बार फिर घनघनाई. और इस बार न केवल बजी ही, बल्कि बजती ही चली गई. इस के साथ ही दरवाजे पर भी जोरों की थाप पड़ने लगी. और यह थाप ऐसी थी जो रश्मि को पांव से ले कर सिर तक झकझोर गई. उस के चेहरे की भावभंगिमा भयंकर हो गई और शरीर कांपने सा लगा. माथे की सलवटें जरूरत से ज्यादा गहरी हो गईं और दांत आपस में ही पिसने लगे. पति का मधुर सामीप्य उसे फिर दूर होता प्रतीत हुआ और भावावेश में उस की मुट्ठियां भिंचने लगीं. उस का एकएक अंग हरकत करने लगा और वह अपने को बहुत व्यथित तथा क्रोधित महसूस करने लगी.

वह चोट खाई नागिन की तरह उठी. आज तो वह कुछ कर के ही रहेगी. मरीज को सुना कर ही रहेगी और इस तरह सुनाएगी कि कम से कम यह मरीज तो फिर आने का नाम ही नहीं लेगा. अपना ही राज समझ रखा है. ‘उफ, कैसे दरवाजा पीट रहा है, जैसे अपने घर का हो? क्या इस तरह तंग करना उचित है? वह भी आधी रात को? खुद तो परेशान है ही, दूसरों को बेमतलब तंग करना कहां की शराफत है?’ वह बुदबुदाई और मरीज के व्यवहार पर अंदर ही अंदर तिलमिला गई.

‘‘मैं देखती हूं,’’ दरवाजे की ओर बढ़ते हुए सुंदरम को रोकते हुए रश्मि बोली.

‘‘ठीक है,’’ सुंदरम ने कहा, ‘‘देखो, तब तक मैं कपड़े पहन लेता हूं.’’

रश्मि दरवाजा खोलते हुए जोर से बोली, ‘‘कौन है?’’

‘‘मैं हूं, दीदी,’’ बाहर से उस के भाई सूरज की घबराई हुई सी आवाज आई.

और उसी समय रश्मि को लगा, जैसे उस से कोई भारी भूल हो गई है. आगंतुक को देखे बिना बेढंगेपन से बोलने के बाद और आगंतुक को देख लेने के पश्चात उस के चेहरे पर अजीब सा परिवर्तन आ गया. उस की माथे की सलवटें विलीन हो गईं और उस का रौद्र रूप परिवर्तित हो कर असमंजस की स्थिति में पहुंच गया. वह आगंतुक को निहारती ही रह गई. उस की क्रुद्ध आंखें सहज हो कर आगंतुक पर जा टिकीं. वह सूरज था, उस का भाई. उस का परिवार भी इस शहर में ही रहता था. उस की शादी इसी शहर में हो गई थी, जिस परिवार के लोगों से यदाकदा वह मिल सकती थी. सच तो यह था कि परिवार के यहां होने से ही उस की हिम्मत कुछकुछ बाकी थी, नहीं तो सुंदरम के दैनिक कार्यक्रम से तो वह पूरी तरह टूट ही चुकी होती.

परिवार के किसी भी सदस्य से मिल कर उसे बेहद शांति और प्रसन्नता महसूस होती थी. किंतु इस समय ऐसी कोई बात नहीं थी कि भाई को देख कर वह प्रसन्न होती. समय आधी रात का जो था.

जैसे किसी को आशंकाओं के बादल कड़क कर भयभीत कर दें, ऐसी स्थिति से घिरी रश्मि शीघ्रता से बोल उठी, ‘‘सूरज, तुम! इतनी रात गए?’’

‘‘दीदी, दीपू की हालत बहुत खराब है. जीजाजी कहां हैं? उन से कहिए, जल्दी चलें,’’ सूरज ने डरे हुए स्वर में कहा.

‘‘क्या हुआ दीपू को?’’ रश्मि ने अपने छोटे भाई के बारे में पूछा. एकाएक उस की घबराहट बढ़ गई.

‘‘यह तो जीजाजी ही देख कर बता सकेंगे. दीदी, उन्हें जल्दी चलने को कहिए,’’ सूरज बोला, ‘‘समय बताने का भी नहीं है.’’ एकाएक रश्मि लड़खड़ा गई. कड़ाके की सर्दी में भी उस के माथे पर पसीने की बूंदें चमक उठीं. पूरा शरीर जैसे मूर्च्छित अवस्था में पहुंच गया. उस के आगे अपने भाई दीपू का चेहरा घूमने लगा, प्याराप्यारा, भोलाभाला सा वह मासूम चेहरा.

एकाएक उस ने अपने को संयत किया और पूरी शक्ति से बोलने का प्रयास करती हुई वह कह उठी, ‘‘सुनिए, कहां हैं आप? जल्दी तैयार होइए. आप ने सुना, दीपू की हालत गंभीर है. चलिए न, जल्दी कीजिए.’’

‘‘हां, हमें तुरंत चलना चाहिए,’’ सुंदरम, जो पहले से तैयार था, बोला.

कुछ ही देर बाद तीव्र गति से दौड़ रहे, सुंदरम और सूरज के स्कूटरों ने तुरंत उन्हें उन के लक्ष्य तक पहुंचा दिया. स्कूटर रोक कर सुंदरम ने तुरंत अपना बैग संभाला और शीघ्रता से अंदर की तरफ दौड़ा. पीछे से रश्मि को जो लगभग पूरे रास्ते मूर्च्छित सी सुंदरम के पीछे बैठी रही थी, सूरज ने सहारा दिया और कमरे में ले आया. सुंदरम पूरी तन्मयता से दीपू को देखने में जुट गया. यद्यपि उस के माथे पर भी पसीने की बूंदें झलक आई थीं, लेकिन उसे इस की परवा न थी. उस के हाथ सधे हुए और आंखें जौहरी बन कर अपने मरीज को जांच रही थीं. उस का दिमाग केवल अपने मरीज के बारे मेें ही विचारशील था. उसे दीपू के अलावा आसपास की किसी चीज का बोध न था.

जब तक सुंदरम दीपू को देखता रहा, रश्मि, उस की मां, बहनभाई व पिताजी सभी आशंकित से खड़े रहे. सब के सब सांस रोके सुंदरम के चेहरे के उतारचढ़ाव को देख रहे थे, जो पूरी तन्मयता से जांच कर रहा था.

दीपू को इंजैक्शन लगा कर एकाएक सुंदरम के चेहरे के हावभाव में परिवर्तन हो आया. मंदमंद मुसकराते हुए उस ने कहा, ‘‘कोई खतरा नहीं.’’ सब की सांस में सांस आई. वे निश्चिंत हो कर सुंदरम को देखने लगे. सभी के मुंह से एकदम निकला, ‘‘शुक्र है, हम तो घबरा गए थे.’’

वातावरण को अत्यंत शीतलता प्रदान करते हुए सुंदरम ने आगे कहा, ‘‘दीपू को सर्दी लग गई है. उस की सांस सर्दी के कारण ही रुकने लगी थी. मैं ने इंजैक्शन दे दिया है. अब कोई खतरा नहीं है. किंतु…’’ रुक कर उस ने कहा, ‘‘अगर हम देर से पहुंचते तो खतरा बढ़ सकता था.’’

रश्मि दौड़ कर एकाएक सुंदरम से आवेश में लिपट गई, ‘‘सुंदरम, तुम कितने अच्छे हो. तुम ने मेरे भाई को बचा लिया, सुंदरम.’’ और सुंदरम ने मुसकरा कर उसे अपने से अलग किया जो सब के सामने ही उस से लिपट गई थी. होश में आने पर रश्मि भी कुछ झेंप गई. अगले दिन फिर रात को कौलबैल घनघनाई. रश्मि को न जाने क्यों इस बार न कोई क्रोध आया न कोई खीझ.

उस ने चुपचाप उठ कर किवाड़ खोला, ‘‘कहिए?’’

‘‘डाक्टर साहब घर पर हैं? मेरे भाई की हालत बहुत खराब है. जरा उन्हें बुला दीजिए,’’ वैसा ही धीमा और भयभीत स्वर, जैसा सूरज का था. रश्मि को एकाएक लगा, जैसे आज फिर उस का भाई बीमार है जिस के लिए सुंदरम का जाना जरूरी है. तो क्या वह आज भी सुंदरम को रोकेगी?

उसे लगा कि जिस तरह कल मेरा पूरा परिवार भयभीत था, तरहतरह की मनौतियां मन ही मन मना रहा था, सुंदरम के जल्दी पहुंच जाने की इच्छा में बेसब्री से समय बिता रहा था, उसी तरह आज भी एक पूरे परिवार की हालत है. अगर सुंदरम नहीं गया तो एक पूरे परिवार की खुशियां मिट जाएंगी. नहीं, वह अपने सुख के लिए किसी पूरे परिवार को दुख के गर्त में नहीं धकेल सकती, कदापि नहीं. उस के आगे सुंदरम की वह मुसकान खिंच गई जो कल दीपू को बचाने के बाद उस के चेहरे पर आई थी. कितनी गहरी थी वह मुसकान, कैसा संतोष, गौरव भरा था उस मुसकान में. उसे लगा कि जीवन की मुसकान तो किसी को बचा लेने मेें ही है. सच्चा जीवन वही है जो किसी को जीवन दे सके, किसी की रक्षा कर सके. वह इस मुसकान को सुंदरम से छीनने का कभी कोई प्रयास नहीं करेगी. वह अपनी जिंदगी इस तरह बनाएगी जिस से सुंदरम को रोके नहीं और अनगिनत चेहरे नवीन जीवन पा कर झिलमिला उठें. वह अपने पति की राह अब कभी नहीें रोकेगी.

रश्मि बोली, ‘‘सुनिए, जल्दी जाइए, किसी मरीज की हालत चिंताजनक है. जल्दी जाइए न, देरी न जाने क्या कर जाए?’’

‘‘अरे भई, जा रहा हूं. अपना बैग तो लेने दो,’’ सुंदरम ने बाहर निकलते हुए कहा, ‘‘कैसी अजीब हो तुम भी.’’

उस के जाने के बाद रश्मि ने टेप रिकौर्डर चालू कर दिया. आवाजें गूंजने लगीं. ‘रश्मि, आज की रात कितनी मधुर है, कितनी इच्छा होती है, यह रात लंबी, बहुत लंबी हो जाए. कभी खत्म ही न हो.’ ‘रश्मि, मैं तुम्हें बेहद चाहता हूं. सच, रश्मि, तुम से अलग हो कर भी ऐसा लगता है जैसे तुम मेरे करीब हो और तुम्हारे पास होने का एहसास मुझे जल्दी काम करने की प्रेरणा देता रहता है.’ रश्मि को लगा, सुंदरम उस के पास ही बैठा बोलता जा रहा है और वह मंत्रमुग्ध सी सुनती जा रही है. उस ने एकाएक जोर से अविनाश को सीने से लगा कर चिपटा लिया.

ऐसा भी होता है

मैं आवश्यक कार्य से मुंबई गया था. उन दिनों सैलफोन नहीं थे. दिन के 10 बजे एक पब्लिक बूथ पर अपने घर धनबाद फोन करने के लिए पंक्ति में खड़ा था. जब मेरी बारी आई तो मुझे बताया गया कि पिताजी को अचानक दिल का दौरा पड़ा है, वे अस्पताल में भरती हैं. मैं ने घबरा कर ऊंची आवाज में पूछा कि कहां भरती हैं धनबाद में या फिर कहीं और. मुझे पता चला कि प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें कोलकाता के अस्पताल में भरती कराया गया था. मैं ने कहा कि मेरा टिकट तो रात की कोलकाता मेल ट्रेन का है जो 30 घंटे बाद धनबाद पहुंचती और फिर 5 घंटे बाद कोलकाता. मेरे पास हवाई जहाज से जाने के लिए पैसे भी नहीं थे. पंक्ति में खड़े एक व्यक्ति मेरी बात सुन कर मेरे पास आए और बोले, ‘‘आप अपना ट्रेन का टिकट मुझे दे दें और मेरे जहाज के टिकट पर आप कोलकाता चले जाएं. मैं भी धनबाद का ही रहने वाला हूं. शाम की फ्लाइट है और 2 घंटे में आप कोलकाता पहुंच जाएंगे.’’

मैं ने उन से कहा कि अभी मेरे पास पैसे नहीं हैं तो उन्होंने एअर टिकट मेरी जेब में डाल दिया और कहा, ‘‘वक्त बरबाद न करो. ट्रेन टिकट जल्दी मुझे दो. एक ही शहर के हैं, वहीं पैसे दे देना.’’ मैं ने अपना टिकट तो उन्हें दे दिया पर जल्दी में उन सज्जन का नाम या फोन नंबर पूछना भूल गया. उन दिनों ट्रेन या हवाई जहाज में कोई पहचानपत्र नहीं मांगा जाता था. हालांकि यह कार्य अनुचित ही था, पर उन की कृपा से सही समय पर मैं कोलकाता पहुंच गया.

– श्रीप्रकाश, बोकारो (झारखंड)

*

हमारा गैराज घर से सटा है. अकसर कई लोग अपनी चारपहिया गाड़ी ला कर गैराज के फाटक के ठीक सामने खड़ी कर देते हैं. परेशान हो कर हम ने सभ्यता के साथ बड़ेबड़े अक्षरों में लिख कर टंगवा दिया कि कृपया गैराज के सामने गाड़ी खड़ी न करें. लेकिन हमारे यहां कुछ ज्यादा नासमझ और अमानवीय लोग हैं जिन्हें किसी की परेशानी से कोई वास्ता नहीं होता, जब तब वे गाड़ी ला कर गैराज के सामने खड़ी कर चले जाते हैं. घंटों तक अपनी कार निकालना या भीतर करना अत्यंत कठिन हो जाता है. यदि हम लोग सामान्य चीजों व नियमों को पूरी नैतिकता के साथ पालन करने लगें तो समाज काफी आगे प्रगति कर सकता है.

– मायारानी श्रीवास्तव, मिरजापुर (उ.प्र.)

फिल्म रिव्यू: सनम तेरी कसम

यह फिल्म लव स्टोरी पर बनी है, पर इस में लव कम, रोमांस कम, रोनाधोना ज्यादा है. निर्देशक ने दर्दभरी कहानी को पेश किया है. फिल्म का अंत भी दुखांत है. अंत में नायिका मर जाती है. इतनी दर्दभरी प्रेम कहानी को अढ़ाई घंटे तक झेल पाना मुश्किल सा हो जाता है.

वैसे फिल्म विजुअली कुछ अच्छी लगती है. पाकिस्तान की उभरती नायिका मावरा होकेन ने अपने दर्दभरे अभिनय से कमजोर कहानी को संभालने की काफी कोशिश की है. लेकिन जब कहानी ही पुरानी हो तो कोई क्या कर सकता है. पुराने जमाने की नायिकाओं की तरह इस फिल्म की नायिका को सीधीसादी दिखाया गया है जो सलवारकमीज पहनती है, कमीज भी पूरी बांह की, चोटी करती है, आंखों पर मोटा चश्मा लगाती है. माथे पर पूजा का टीका लगाती है, ठीक वैसे जैसे दक्षिण भारतीय लगाते हैं. वह बहनजी टाइप की लगती है. रोनेधोने वाली फिल्में पसंद करने वालों को भले ही यह फिल्म पसंद आए परंतु आज की युवा पीढ़ी को यह बिलकुल भी नहीं भाएगी. इस फिल्म का निर्देशन 2 निर्देशकों-राधिका राव और विनय सप्रू ने किया है.

फिल्म की कहानी एक दक्षिण भारतीय परिवार की है, जो एक सोसायटी के फ्लैट में रहता है. उस परिवार का मुखिया है जयराम (मनीष शर्मा) जो हद से ज्यादा रूढि़वादी है. परिवार में उस की पत्नी व 2 बेटियां सरस्वती उर्फ सरु (मावरा होकेन) और कावेरी हैं. उसी सोसायटी के एक फ्लैट में एक नौजवान इंदर (हर्षवर्धन राणे) भी रहता है, जो दिनभर अपने बंद फ्लैट में कसरत करता है और बियर पीता रहता है.

इंदर को ‘प्यार’ शब्द से नफरत है. वह अमीर परिवार से है और अपने पिता से नफरत करता है. वह जेल की सजा काट कर आया है. दूसरी ओर सरस्वती की कहीं शादी इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि वह बहनजी टाइप की है. सरस्वती एक लाइब्रेरी में नौकरी करती है. उस के पिता सरस्वती की शादी किसी आईआईटी या आईआईएम पास युवक से कराना चाहते हैं. एक दिन सरस्वती अपना मेकओवर रूबी नाम की फैशनेबल लड़की, जो इंदर के साथ रिलेशन में रहती है, से कराने के लिए इंदर के फ्लैट पर जाती है ताकि वह उस से अपौइंटमैंट दिला दे. वहां रूबी सरस्वती को देख कर आगबबूला हो जाती है और इंदर को घायल कर चली जाती है. सरस्वती घायल इंदर को अस्पताल ले जाती है. इस बात पर पूरी सोसायटी में जयराम परिवार की थूथू होती है. जयराम अपनी बेटी को घर से निकाल देता है.

अब इंदर सरस्वती को रहने को मकान ले कर देता है और उस के लिए आईआईएम पास युवक की तलाश करता है. लेकिन जब एक आईआईएम पास युवक भी सरस्वती को ठुकरा देता है तो वह टूट जाती है. तभी इंदर को पता चलता है कि सरस्वती को बे्रन ट्यूमर है. अस्पताल में मरने से पहले वह उस से शादी करता है. उस के मरने पर वह उस की यादों में खोया रहने लगता है.

फिल्म की यह कहानी भले ही पुरानी व जानीपहचानी हो परंतु निर्देशक ने फिल्म को सुंदर लुक दिया है. निर्देशन कुछ हद तक अच्छा है. निर्देशकों ने जहां नायिका को मासूम, शांत, धीरगंभीर दिखाया है, वहीं नायक को गुस्सैल दिखाया है. हर वक्त गुस्सा उस की नाक पर रहता है.

फिल्म एकदम साफसुथरी है. ज्यादा उतारचढ़ाव नहीं है. पूरी फिल्म मावरा होकेन ने संभाल रखी है. वह सुंदर है परंतु उस की भरभराती आवाज कुछ ठीक नहीं लगती. हर्षवर्धन राणे कुछ खास नहीं कर सका है. मुस्तकीम (विजय राज) और इंस्पैक्टर (मुरली शर्मा) के किरदार कमजोर लिखे गए हैं. फिल्म का गीतसंगीत थोड़ाबहुत अच्छा है. टाइटल सौंग अच्छा बन पड़ा है. छायांकन अच्छा है.          

 

 

 

 

फिल्म रिव्यू: घायल वंस अगेन

सनी देओल अब एक इमेज में बंध चुका है. उस का ढाई किलो का मुक्का मशहूर हो चुका है. भले ही दर्शकों का एक खास वर्ग उस के ऐक्शन दृश्यों व मुक्कों पर चीयर करे परंतु उस से किसी नई चीज की उम्मीद करना बेकार है.

सनी देओल की यह फिल्म 1990 में आई ‘घायल’ की सीक्वल है. फिल्म देख कर लगा कि अगर सनी देओल ‘घायल’ को घायल ही रहने देता तो अच्छा था, उस का सीक्वल न बनाता. ‘घायल’ में अमरीश पुरी की खलनायकी को दर्शक आज भी नहीं भूले होंगे.

इस फिल्म की कहानी पिछली फिल्म ‘घायल’ से आगे बढ़ती है, जहां से फिल्म खत्म हुई थी. बलवंत राय (अमरीश पुरी) की हत्या में सजा भुगत चुका अजय मेहरा (सनी देओल) अब समाज सुधार का काम करता है. उस का एक संगठन है ‘सत्यकाम’. एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी डिसूजा (ओम पुरी) और एक डाक्टर रिया (सोहा अली खान) अब उस के संगठन से जुड़े हैं. ये तीनों मिल कर सरकारी तंत्र में फैले भ्रष्टाचार को दूर करने में लगे हैं और लोगों को न्याय दिलाते हैं.

शहर के एक बड़े बिजनैसमैन राज बंसल (नरेंद्र झा) का बिगड़ैल बेटा कबीर (अभिलाष कुमार) अजय के दोस्त एसीपी डिसूजा को गोली मार देता है, क्योंकि उस ने राज के खिलाफ आरटीआई लगाई थी. 4 किशोर इस घटना का वीडियो बना लेते हैं. चारों वह वीडियो अजय को देना चाहते हैं. यह बात राज को पता चल जाती है. उस वीडियो को हासिल करने के लिए वह पूरे शहर की नाकाबंदी कर देता है. पूरे सरकारी तंत्र को ताकीद कर देता है कि वह वीडियो अपलोड न होने पाए.

वीडियो अजय तक पहुंच जाता है. अब अजय और राज में युद्ध छिड़ जाता है. राज अजय की बेटी को अपने पास बंधक बना कर रखता है. अंतत: अजय अकेला ही राज का चौपर हथिया कर उस के महलनुमा मकान पर धावा बोलता है और उस के बहुत से आदमियों को मार डालता है. पुलिस राज, मंत्री और उस के गुरगों को अरैस्ट कर लेती है. अजय अपनी बेटी को ले कर घर आता है.

फिल्म का निर्देशन का भार सनी देओल ने खुद उठाया है. उस ने 80-90 के दशक से चले आ रहे फार्मूलों को इस फिल्म में भरपूर प्रयोग किया है. मध्यांतर से पहले यह फिल्म उम्मीद जगाती है कि सनी देओल सरकारी तंत्र में फैल भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए कुछ नया करेगा परंतु कुछ ही देर में अजय के किरदार ने तेजी से ऐक्शन करने शुरू कर दिए तो लगा भैया, यह भी परंपरागत ऐक्शन पैक्ड ड्रामा है.

फिल्म में जिस उद्योगपति राज बंसल की बात कही गई है वह अंबानी सरीखा लगता है जो अपने दम पर अजय को देखते ही गोली मारने का आदेश तक निकलवाता है. देश के सुरक्षा सचिव तक को हड़काता है. उस के आदमियों की पूरी फौज है जो पलभर में हर बात की जानकारी जुटा लेते हैं. राज को घर बैठे ही पता चल जाता है कि शहर में कहां, कब, कौन आ जा रहा है और पलक झपकते ही उस के आदमी वहां पहुंच जाते हैं. क्लाइमैक्स में मुंबई में समुद्र किनारे बने जिस मकान को राज का बताया गया है, वह अंबानी का ही है.

अभिनय की दृष्टि से सनी देओल इस फिल्म में पहले भाग की अपेक्षा कमजोर ही साबित हुआ है. फिल्म में सोहा अली क्या कर रही है, उस का तो काम ही नहीं था. राज की भूमिका में नरेंद्र झा का काम अच्छा है. निर्देशक ने फिल्म में बहुतकुछ अविश्वसनीय भर दिया है. फिल्म का गीतसंगीत साधारण है. छायांकन अच्छा है. ऐक्शन दृश्य भी अच्छे हैं.

 

 

फिल्म रिव्यू: साला खड़ूस

फिल्म ‘साला खड़ूस’ को राजकुमार हिरानी और आर माधवन ने बतौर निर्माता मिल कर बनाया है. इस फिल्म के निर्देशन और पटकथा की जिम्मेदारी नई निर्देशिका सुधा कोंगड़ा ने निभाई है.

निर्देशिका सुधा कोंगड़ा ने कहानी तो खास नहीं चुनी है लेकिन किरदारों पर इस कदर मेहनत की है कि दर्शकों को उन का अभिनय बांधे रखता है. सुधा कोंगड़ा प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक मणिरत्नम की सहायिका रह चुकी है. इस फिल्म में उसने बौक्सिंग जैसे विषय को चुना है.

स्पोर्ट्स में फैली राजनीति और अधिकारियों द्वारा महिला खिलाडि़यों के शोषण को कई फिल्मों में दिखाया जा चुका है. इस फिल्म में भी निर्देशिका ने बौक्सिंग के खेल फैडरेशन के दिग्गजों के बीच चलती गुटबाजी और प्रतिभाशाली खिलाडि़यों को प्रताडि़त करने के साथसाथ महिला खिलाडि़यों से होने वाले यौन शोषण को दिखाया है. फिल्म बौक्सिंग खेल के तकनीकी पहलुओं को न दिखा कर एकदम फिल्मी सी हो गई है. ‘चक दे इंडिया’ और ‘मैरी कौम’ जैसी फिल्मों जैसा असर यह फिल्म नहीं छोड़ पाती.

फिल्म की कहानी दमदार नहीं है. एक मछली बेचने वाली युवती मादी (रितिका सिंह) के बौक्सर बन कर अपने देश के लिए पदक जीतने की कहानी है. फिल्म की कहानी भले ही साधारण हो परंतु उस बौक्सर युवती के रिंग में चलते घूंसे, दर्शकों को दमसाधे बैठे रहने को मजबूर कर देते हैं.

कहानी आदी तोमर (आर माधवन) की है, जो बौक्सर और कोच है. बौक्सिंग फैडरेशन के चीफ देव खतरी (जाकिर हुसैन) की वजह से उसे प्रताडि़त होना पड़ता है. उसे एक ऐसे खिलाड़ी की तलाश है जिसे ट्रेनिंग दे कर वह देश के लिए पदक ला सके. उस का तबादला हिसार से चैन्नई हो जाता है. वह खिलाड़ी की तलाश में लग जाता है. यहां उस की मुलाकात गुस्सैल मछली बेचने वाली एक लड़की मादी (रितिका सिंह) से होती है. मादी की बहन लक्ष्मी (मुमताज सरकार) बौक्सर है. वह बौक्सिंग में पदक जीत कर पुलिस में भरती होना चाहती है. मादी को देख कर आदी को लगता है, उस की तलाश पूरी हो गई है. वह रोजाना 500 रुपए दे कर मादी को ट्रेनिंग देता है. ट्रेनिंग लेते लेते मादी को आदी से प्यार हो जाता है, मगर आदी उसे डांट देता है.

उधर मादी की बहन लक्ष्मी नहीं चाहती कि मादी उस से आगे निकले. वह मादी के हाथ में चोट पहुंचाती है, जिस की वजह से मादी हार जाती है. आदी उसे छोड़ देता है. फैडरेशन का मुखिया मादी को अपनी हवस का शिकार बनाना चाहता है तो मादी उस की धुनाई कर फिर से आदी के पास लौटती है और रिंग में उतर कर अंतर्राष्ट्रीय मैच जीत कर भारत का नाम ऊंचा करती है, साथ ही, आदी के प्रति अपने प्रेम को जाहिर करती है.

इस फिल्म की मेकिंग में दक्षिण भारतीय टच दिखता है. फिल्म के संवाद सब से बड़ी कमजोरी हैं. फिल्म में मादी के संघर्ष को लंबा तो दिखाया गया है मगर उस के चैंपियन बनने को 2 मुकाबलों में ही समेट दिया गया है. आर माधवन की एंग्री यंगमैन की छवि दिखाई गई है. उस ने अपनी तरफ से भी अच्छी कोशिश की है. असल जिंदगी में बौक्सर रही रितिका सिंह ने बेहतरीन एक्टिंग की है. जाकिर हुसैन का काम भी अच्छा है. यह निर्देशन की कमजोरी है कि दर्शकों को क्लाइमैक्स का शुरू में ही पता चल जाता है. गीतसंगीत पक्ष साधारण है. छायांकन अच्छा है.

 

 

 

हौसले

खुले आसमान में करे परवाज

हौसले हर पंछी में नहीं होते

सिर्फ बहार ही तो नहीं बाग में

ठूंठ भी यहां कम नहीं होते

सीप में बने मोती

हर बूंद के ऐसे मौके नहीं होते

आंख में आंसू होंठों पर मुसकान

ऐसे दीवाने भी कम नहीं होते

जहां जाएं रोने के लिए

ऐसे कोने हर घर में नहीं होते

मरने के तो बहुत हैं

मगर जीने के बहाने कम नहीं होते

बयां कर शिकायत

हर गिरते को संभालने वाले नहीं होते.

                         – रेखा चंद्रा

यह भी खूब रही

सहेली की शादी थी. फेरों की व्यवस्था छत पर की गई थी. शादी वाले दिन सुबह से ही आसमान में बादल घिर आए. सब इस चिंता में डूब गए कि पानी बरसा तो क्या होगा, पर ऊपरी मंजिल पर घर होने के कारण कुछ हो नहीं सकता था. जैसी कि आशंका थी, रात में फेरों के दौरान ही पानी अपने लावलश्कर के साथ आ पहुंचा. आंधीपानी के कारण मंडप उखड़ने लगा तो सब घबरा गए. तब कुछ युवक आगे आए, उन्होंने मंडप के खंभों को पकड़ा और वरवधू ने दौड़दौड़ कर फेरे लिए. शादी के वीडियो में जब यह दृश्य आता है तो हम सब हंसतेहंसते लोटपोट हो जाते हैं.

– शशि श्रीवास्तव, खड़गपुर (प.बं.)

*

मैं अपने बेटे के पास कोलकाता गया हुआ था. मेरे पोते आयुष की 10वीं की वार्षिक परीक्षाएं सिर पर थीं. उसे भौतिक विज्ञान पढ़ाने की जिम्मेदारी मेरी थी. अपनी विभिन्न विशेषताओं के कारण स्कूल में आयुष लोकप्रिय छात्र बन गया था. उस के मित्रों की संख्या कुछ ज्यादा ही थी. मित्रों में लड़के तथा लड़कियां, दोनों थे. आयुष बोर्ड की परीक्षा के लिए कड़ी मेहनत कर रहा था. किंतु उस के दोस्तों का फोन उस की पढ़ाई में विघ्न डाल रहा था. सो, उस ने हम सब से कहा कि जब उस के किसी दोस्त का फोन आए तो कोई बहाना बना कर टाल दे. यह सिलसिला चल ही रहा था कि तभी उस की लेडी क्लासटीचर ने आयुष को कुछ जानकारी देने के लिए फोन किया. घर में काम करने वाली बाई ने फोन पकड़ा. वह आयुष के आने वाले फोन, खासकर लड़कियों के फोन से चिढ़ी रहती थी. उस ने बड़े ही रूखे ढंग से जवाब दिया कि यहां कोई आयुष नहीं रहता है और दोबारा फोन न करें. अगले दिन उस टीचर ने आयुष की मां को सारा मामला बताया. तब हम लोगों का हंसतेहंसते बुरा हाल हो गया.

– विनोद प्रसाद, रांची (झारखंड)

*

मेरे भैया आंखों में दर्द की शिकायत होने पर नेत्रविशेषज्ञ को दिखा कर आए. डाक्टर ने उन्हें चश्मा बना कर दे दिया था. शाम को खाने के वक्त भाभीजी अंदर से खाना ले कर आईं तो भैया ने उन्हें देखते ही चश्मा लगा लिया. यह देख कर भाभीजी बोलीं, ‘‘क्या बात है, मेरे पास आते ही चश्मा लगा लिया.’’ भैया ने जवाब दिया, ‘‘डाक्टर ने कहा था कि सिरदर्द महसूस होते ही चश्मा लगा लेना.’’ उन की इस बात पर भाभीजी तो खूब झेंपीं, मगर बाकी सब ने खूब ठहाके लगाए.

– मुकेश जैन ‘पारस’, बंगाली मार्केट (न.दि.)

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