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लाल रंगः गंभीर विषय पर बनी बचकानी फिल्म

इंसान के जीवित रहने के लिए खून की अहमियत सर्वोपरि है. लोग दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए खुशी खुशी अपना रक्त दान करते हैं. हर किसी को पता है कि भारत में खून की बिक्री गैरकानूनी है. लोग स्वेच्छा से रक्तदान करते हैं. मगर कुछ लोगों ने खून का गैरकानूनी व्यापार कर लाखों रूपए से अपनी तिजोरी भरने में लगे हैं. अफसोस की बात यह है कि जिन डाक्टरों को इंसान की जिंदगी बचाने का दायित्व होता है, वही डाक्टर खून के अनैतिक व गैरकानूनी व्यापार का हिस्सा बने हुए हैं. इस अति घृणित व्यापार जैसे संजीदा, गंभीर व संवदेनशील विषयवस्तु पर बनी अति बचकानी फिल्म है ‘‘लाल रंग’’.

फिल्म की कहानी दो दोस्तों करनाल के शंकर (रणदीप हुडा) और हरियाणा के राजेष धीमान (अक्षय ओबेराय) ओर खून के अनैतिक व्यापार के इर्दगिर्द घूमती है. शंकर अपने आप में माफिया, पर गरीबों का मसीहा है. लोग उससे डरते हैं. उसकी पहुंच बड़े-बड़े लोगों तक है. वह एक फोन करके किसी को पुलिस के चंगुल से छुड़ा देता है. वह गरीब रिक्शेवालों को सौ या दो सौ रूपए देकर उनका खून निकालता है और फिर उस खून को पांच हजार में बेचता रहता है. एक कठोर अपराधी के लिबास के नीचे शंकर का कोमल हृदय भी नजर आता है. वह पेशेवर रक्तदाता के जीवन को लेकर चिंतित भी नजर आता है.

शंकर करनाल में अपना एक गैर कानूनी ब्लड बैंक चलाता है. उसके तार दिल्ली तक फैले हुए हैं. शंकर का एक साथी सूरज  दिल्ली में इसी तरह से खून जमा कर शंकर को लाकर देता रहता है. शंकर और राजेष की मुलाकात करनाल के पैथोलॉजी कालेज में होता है, जहां दोनो पैथोलॉजी में डिप्लोमा के विद्यार्थी हैं. शंकर क्लास में जाता ही नही है. पर उसकी उपस्थिति लगती रहती है. कॉलेज की एडमिनिस्ट्रेटर नीलम के संग उसके यौन संबंध भी हैं. कॉलेज से जुड़े डाक्टर व लैब सहायक भी उसकी मुट्ठी में है. शंकर खून के इस अनैतिक व्यापार से राजेश को भी जोड़ लेता है. राजेश अपनी सहपाठी पूनम शर्मा (प्रिया बाजपेयी) से प्यार करता है.

एक दिन कॉलेज की तरफ से ‘रक्त दान शिविर’ का आयोजन होता है, जहां शंकर व राजेश कॉलेज के डाक्टर व लैब सहायक की मदद से ऐसा खेल खेलते है कि रक्त दान शिविर में जमा हुआ आधे से ज्यादा रक्त शंकर के पास आ जाता है. डेंगू फैलने पर शंकर इस रक्त  को मनमानी दाम में बेचकर बीस लाख से अधिक कमा लेता है. इस बीच एक रिक्शेवाले की मौत हो जाती है क्योंकि खून के सौदागरो ने सौ या दो सौ रूपए देकर उसका रक्त चूस लेता है. शहर का एसपी गजराज इसकी जांच शुरू करता है. सूरज को पुलिस पकड़ लेती है, पर शंकर के एक फोन से वह छूट जाता है. उसके बाद गजराज इस धंधे को खत्म करने के लिए कमर कस लेता है. इसी बीच पता चलता है कि शंकर की बचपन की प्रेमिका डॉ. राशि खन्ना अब किसी और से शादी करने जा रही है क्योंकि राशि व उसके परिवार वालों को खून के अवैध व्यापार से नफरत है. शंकर अपने खून के धंधे को बंद करने की बजाय प्रेमिका राषि को अलविदा कह देता है.

इधर पैसे को लेकर शंकर व राजेश में अनबन हो जाती है. राजेश अपना अकेले रक्त का अवैध धंधा शुरू कर देता है. वह बलविंदर को खून देने के लिए एक एचआईवी ग्रसित इंसान का खून लेकर बेच देता है. बलविंदर बाद में फांसी लगा लेता है. पुलिस जांच में राजेश का नाम सामने आता है. पर गजराज बड़ी मछली पकड़ना चाहता है. वह राजेश से कहता है कि असली बॉस का नाम बता दे, तो वह उसे छोड़ देगा. राजेश, शंकर का नाम बताना चाहता है, पर शंकर उसे धमका देता है. अब राजेश चुप हो जाता है. पर राजेश को पुलिस गिरफ्तार करे, उससे पहले ही शंकर आत्मसपर्मण कर देता है. शंकर को पांच साल की सजा हो जाती है. राजेश व पूनम शादी कर लेते हैं. पांच साल बाद जेल से बाहर आने पर शंकर एनजीओ बनाकर जरुरतमंदो को रक्त उपलब्ध करना शुरू करता है.

फिल्म के तमाम दृष्य अजीबोगरीब व अविश्सनीय लगते हैं. फिल्म में खून का अवैध व्यापार, किसी भी गरीब को चंद रूपए व बिस्कुट का पैकेट देकर उसका खून निकाल लेना, रोमांस, जेल जाना, सब कुछ बहुत आसान सा लगता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो आक्रामक शंकर के किरदार में रणदीप हुडा का अभिनय सराहनीय है. अक्षय ओबराय का अभिनय भी ठीक है. दो दोस्तो के रूप में  रणदीप हुडा और अक्षय ओबराय की केमिस्ट्री अच्छी है. प्रिया बाजपेयी को अभिनय के नाम पर कुछ करने के लिए है ही नहीं. ‘पी से पी एम तक’ जैसी असफल फिल्म करने के बाद मीनाक्षी दीक्षित ने इस फिल्म में अति छोटा और महत्वहीन किरदार निभाया है. वह इस तरह के किरदार व फिल्में करके बॉलीवुड में लेबी रेस का घोड़ा कभी नहीं बन सकती. 

पटकथा स्तरहीन है. फिल्म में हरियाणवी भाषा का ज्यादा पुट है. कुछ संवाद अच्छे हैं. संगीत भी स्तरीय है. पर निर्देशक सय्यद अहमद अफजाल पूरी तरह से मात खा गए हैं. फिल्म में महिला पात्र जबरन ठूसे गए नजर आते हैं. इंटरवल के बाद तो पूरी फिल्म बिखरी हुई सी लगती है.

‘‘क्रिअन पिक्चर्स ’’ कै बैनर तले बनी फिल्म ‘‘लाल रंग’’ की निर्माता नितिका ठाकुर, निर्देषक सय्यद अहमद अफजल, संगीतकार विपिन पटवा व शिराज उप्पल, कलाकार-रणदीप हुडा, अक्षय ओबेराय, रजनीश दुग्गल, प्रिया बाजपेयी और मीनाक्षी दीक्षित हैं.

100 साल में पहली बार डालर पर होगा महिला का फोटो

अमेरिका के सौ साल के इतिहास में ऐसा पहली बार होगा जब किसी महिला का चेहरा 20 डालर के नोट पर छापा जाएगा. पूर्व राष्ट्रपति जैक्सन को पहले यह स्थान प्राप्त था. अब जैक्सन 20 डालर के नोट के बेकसाड पर दिखाई देंगे. टबमैन से पहले 19वीं शताब्दी में मार्था वाशिंगटन को 1 डालर के सिल्वर सर्टिफिकेट पर स्थान मिला था.

बुधवार को राजस्व अधिकारी जेकब जे लिउ ने महिलाओं और सिविल राइट लिडर्स के चित्रों को 10 डालर और 5 डालर के नोटों में शामिल करने की घोषणा की.अभी करेंसी का नया डिज़ाइन तैयार नहीं किया गया है. ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि अगले दशक तक इसका सर्कुलेशन शुरू हो जाएगा.

टबमैन का जन्म 1820 के आस पास एक गुलाम परिवार में हुआ था. उन्होंने बहुत से गुलामों को आजाद कराया और गुलामी का कड़ा विरोध किया. उन्होंने दासता विरोधी जॉन ब्राउन की भी सहायता की. कुछ इतिहासकारों का मानना है की उन्होंने सिविल वार में यूनियन आर्मी के साथ एक कूक, एक नर्स और एक  जासूस के तौर पर काम किया. यूद्ध में किसी मोर्चे का नेतृत्व करने वाली वह पहली महीला थीं.

उन्हें वीरता और आजादी का आइकन माना जाता है.

 

अब बिना किसी नंबर के चलाएं WhatsApp

आपने अभी तक व्हाट्सएप को कई तरह इस्तेमाल किया होगा. एक फ़ोन पर दो व्हाट्सएप, एक नंबर से दूसरे नंबर पर स्विच और भी काफी कुछ. लेकिन आज हम आपको बताएंगे कि आप बिना किसी नंबर के व्हाट्सएप कैसे यूज़ कर सकते हैं.

इसके लिए आपको फॉलो करने होंगे कुछ स्टेप्स. जिनकी मदद से आप बिना किसी नंबर का प्रयोग कर व्हाट्सएप यूज़ कर सकते हैं. तो आइए जानते हैं-

अनइंस्टॉल व्हाट्सएप

सबसे पहले यदि आपके फोन में पहले से व्हाट्सएप है तो उसे अनइंस्टॉल कर दीजिए.

व्हाट्सएप डाउनलोड करें

अब पुनः व्हाट्सएप को अपने एंड्रायड फोन पर डाउनलोड कर इंस्टॉल करें

फ्लाइट मोड

इसके बाद अपने फोन की सभी मैसेजिंग सर्विसेज को ब्लॉक कर दें. इसके लिए अपने फोन को फ्लाइट मोड पर रखें जो अपने आप सभी मैसेजिंग सर्विसेज को ब्लॉक कर देगा.

कोई भी नंबर डालें

अब वॉट्सऐप को ओपन कर कोई भी नंबर डालें. ऐसे में वॉट्सऐप नंबर तो एक्सेप्ट कर लेगा, लेकिन कोई वैरिफिकेशन मैसेज नहीं भेज पाएगा.

वैरिफिकेशन

वॉट्सऐप का वैरिफिकेशन अभी भी बचा होगा इसलिए यूजर्स इसका इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. अब वॉट्सऐप आपसे वैरिफिकेशन करने का दूसरा तरीका पूछेगा. इस समय ‘Verify through SMS' ऑप्शन पर क्लिक करें और अपना ईमेल ऐड्रेस डालें. जैसे ही आप सेंड (SEND) बटन पर क्लिक करें उसी समय कैंसिल (Cancel) बटन पर क्लिक करें. ये ऑथोराइजेशन प्रोसेस को बंद कर देगा.

'स्पूफ टेक्स्ट मैसेज'

अब एंड्रायड यूजर्स को 'स्पूफ टेक्स्ट मैसेज' (Spoof Text Message) एप इंस्टॉल करनी होगी.

डिटेल्स भरें

अब जब आप पहले दी हुई प्रक्रिया को पूरा कर लें तब इस ऐप में आकर कुछ डिटेल्स भरें. इसमें नीचे दी गई डिटेल्स का इस्तेमाल करें. To: +447900347295 From: + (कंट्री कोड)(मोबाइल नंबर) Message: आपका ईमेल ऐड्रेस

फेक नंबर पर भेजी जाएंगी डिटेल्स

अब ये डिटेल्स उस फेक नंबर पर भेजी जाएंगी, बस आपका काम हो गया.

क्या दीपिका की ये शर्त मान जाएंगे कबीर खान…!

बॉलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण ने बॉलीवुड दबंग सलमान खान की फिल्म में काम करने की शर्त रखी है.

चर्चा है कि दीपिका और सलमान निर्देशक कबीर खान की आगामी फिल्म 'ट्यूबलाइट' में साथ दिखाई देने वाले हैं. दीपिका ने कबीर सामने यह शर्त रखी है कि फिल्म में उनका किरदार हल्का नहीं होना चाहिए.

सलमान की फिल्म में लीड रोल सलमान का ही होता है. इस कारण से जब दीपिका को सलमान के साथ फिल्म ऑफर की गई तो दीपिका ने फिल्म निर्माता के सामने यह शर्त रख दी. 

यह पहली बार होगा जब यह जोडी बड़े पर्दे पर साथ में दिखाई देगी. दीपिका अब सिर्फ बॉलीवुड में ही नहीं बल्कि हॉलीवुड में भी चर्चित चेहरा बन गई है. बॉलीवुड में दीपिका ने सभी बड़े स्टार्स के साथ काम किया है.

 

15 हजार से अधिक वेतन वाले कर्मचारियों की बढ़ेगी पेंशन

कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) से निकासी को लेकर फरवरी की अधिसूचना रद्द होने के साथ ही कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस) में संशोधन की उम्मीदों को बल मिला है. इससे देशभर के करोड़ों कर्मचारियों को लाभ मिलेगा.

पेंशन का फॉर्मूला

ईपीएस का संचालन ईपीएफ के पैसे से ही होता है. ईपीएफ में कर्मचारी और नियोक्ता दोनों का योगदान होता है. ईपीएफ के लिए प्रत्येक नियोक्ता को कर्मचारी के वेतन से 12 फीसद राशि काटकर कर्मचारी के ईपीएफ खाते में जमा करानी पड़ती है. साथ ही इतनी ही राशि वह अपनी ओर से भी जमा करता है. नियोक्ता की ओर से जमा कराई जाने वाली इस राशि में से 3.67 फीसद राशि ईपीएफ में जाती है. जबकि शेष 8.33 फीसद पैसा ईपीएस के खाते में जाता है.

राहत तो मिली पर बड़ा कंफ्यूजन बरकरार

अभी 15 हजार रुपये तक वेतन पाने वाले कर्मचारियों के पेंशन खाते में 1.66 फीसद राशि का योगदान सरकार की ओर से भी किया जाता है.

इससे अधिक वेतन पाने वालों को सरकार कोई मदद नहीं देती. नतीजतन कम वेतन वालों को तो न्यूनतम एक हजार रुपये पेंशन मिलने लगी है, लेकिन इससे जरा भी अधिक वेतन पाने वाले लाखों कर्मचारी या तो ईपीएस पेंशन से वंचित हैं या निजी पेंशन स्कीमों पर निर्भर हैं. कर्मचारी संगठनों ने इसे लेकर सरकार को कुछ सुझाव दिए हैं.

भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) के महासचिव बृजेश उपाध्याय ने कहा कि 15 हजार रुपये से अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों की पेंशन बढ़ाने के लिए उनके ईपीएस खाते में नियोक्ता के 8.33 फीसद योगदान के साथ ईपीएफ के शेष 3.67 फीसद योगदान से भी 1.66 फीसद काटकर ईपीएस खाते में डाला जाना चाहिए. इससे सरकार के योगदान के बगैर ही इन कर्मचारियों की पेंशन बढ़ जाएगी. कर्मचारी भी शायद ही इसका विरोध करेंगे.

…और हर रोज बनना पड़ता है लोमड़ी

अपने और अपने परिवार का पेट पालने के लिए इंसान को न जाने क्याक्या काम करना पड़ता है. कोई नौकरी करता है, कोई व्यापार तो कोई ऐसा काम करता है, जिस से लोगों के चेहरे पर मुसकराहट आए. पाकिस्तान के कराची शहर में रहने वाले 35 वर्षीय मुराद अली का पेशा भी लोगों को हंसाने का है. दरअसल मुराद कराची जू में काम करते हैं. उन का काम है, रोज सुबह से शाम तक लगभग 12 घंटे के लिए लोमड़ी बन जाना. क्या हुआ जनाब? आप चौंक गए? जरा सोचिए जिस पेशे के बारे में सुन कर आप को हैरानी हो रही है उसी पेशे को बड़ी ही ईमानदारी के साथ मुराद निभा रहे हैं.

इस पेशे ने न केवल मुराद की पहचान बदल दी है बल्कि उन का नाम भी 12 घंटों के लिए मुराद अली से बदल कर मुमताज बेगम हो जाता है. मुमताज को दूसरे जानवरों की तरह ही पिंजरे में बंद कर दिया जाता है और उसे देखने के लिए 10 रुपए का टिकट लगता है. रोज हजारों लोग टिकट खरीद कर मुमताज को देखने आते हैं. सभी के मन में ढेरों सवाल होते हैं, ‘‘यह कैसे हुआ?’’, ‘‘क्या बचपन से ही मुमताज ऐसी है?’’, ‘‘मुमताज के घर वाले कौन हैं?’’ लोगों के इन सवालों का जवाब मुमताज को घुमाफिरा कर देना होता है, जो लोगों को हैरान कर दे. इतना ही नहीं, मुमताज के किरदार को हर रोज निभाने वाले मुराद अली को रोज भारीभरकम मेकअप करना होता है और खुद को देखने आने वाले हर दर्शक को अपने इस अजीबोगरीब शरीर की कहानी सुनानी पड़ती है. मुमताज कहानी सुनाते वक्त बताती है कि उस का जन्म 35 वर्ष पूर्व अफ्रीका में हुआ था और उसे खाने में फल, केक और जूस बहुत पसंद हैं. यह एक बनावटी कहानी होती है, जो मुमताज को दर्शकों को लुभाने के लिए सुनानी पड़ती है.

खैर, मुराद अली इस पेशे को करने वाले अकेले ऐसे इंसान नहीं हैं. कराची के जू में यह पिंजरा कई सालों से है और मुमताज के किरदार को अब तक कई आदमी निभा चुके हैं. खुद मुराद के पिता भी मुमताज बन चुके हैं, लेकिन 18 वर्ष पूर्व उन की मौत होने के बाद मुराद को घर वालों का पेट पालने के लिए इस पेशे से जुड़ना पड़ा. वैसे इस किरदार के लिए जू के निर्देशक मोहम्मद फईम खान को ऐसे पुरुष का चयन करना पड़ता है, जो अच्छी एक्टिंग कर सके, लोगों द्वारा पूछे जाने वाले सवालों का जवाब दे सके और उन के द्वारा खुद को बनाया गया मजाक सह सकें. साथ ही उस पुरुष में 12 घंटे एक ही आसन में बैठने का स्टैमिना भी होना चाहिए और उसे कई सारी भाषाओं का ज्ञान भी होना चाहिए ताकि वह दर्शकों से बात कर सके.

मुराद अली अपने पेशे से बेहद खुश हैं. वह कहते हैं, ‘‘लोग मुझे देख कर हंसते हैं, तो मुझे लगता है मैं अच्छा काम कर रहा हूं. मेरा काम भी आसान नहीं है, लोगों को हंसाना एक कठिन काम है और इस काम को करने में लोगों के पसीने छूट जाते हैं.’’

वैसे मुमताज के किरदार को निभाने वाला यह अजीब पेशा दुनिया भर में अकेला ऐसा पेशा नहीं जिसे सुन कर कोई चौंक जाए. और भी ऐसे पेशे हैं जिन्हें अजूबों की फहरिस्त में शामिल किया जा सकता है. आइए कुछ हम आप को बताते हैं

1. बैड वारमर्स

यहां बैड वारमर्स का आशय उन लोगों से है जिन्हें गरम पानी की बोतल के समान लंदन के कुछ होटलों में गैस्ट के बैड को गरम और कोजी बनाने के लिए उन के बिस्तर पर लेटने को कहा जाता है. इस के लिए बैड वारमर सर्विस देने वाले आदमी या औरत को गरम नाइट सूट पहनाया जाता है और गैस्ट के आने से पहले उस के बैड को गरम करने का काम सौंपा जाता है.

2. किराए का बौयफ्रैंड

आप ने सुना होगा कि कार, बुक, कपड़े, घर या इलैक्ट्रौनिक आइटम्स को किराए पर लिया जा सकता है लेकिन जापान में एक कंपनी (रेंटल करेशी टोकियो) है, जो रैंट पर बौयफ्रैंड देने का काम करती है. यह वैबसाइट लड़कों को किराए का बौयफ्रैंड बनने की जौब औफर करती हैं. इस के लिए लड़कों को वैबसाइट पर अपना प्रोफाइल बनाना होता है. लड़के अपने क्लाइंट्स खुद बनाते हैं. हर किसी का अपना रेट होता है और क्लाइंट से मिली फीस का कुछ हिस्सा उन्हें वैबसाइट चलाने वाली कंपनी को देना होता है.

3. पक्षियों को भगाने वाला पुतला

भारत के कई होटलों और किलों में आज भी जीवित आदमियों को पक्षियों को डराने के लिए पुतला बनाया जाता है. इन के हाथ में एक झंडा पकड़ाया जाता है और जैसे ही कोई पक्षी स्वीमिंग पुल या फाउनटेन एरिया में बैठा दिखता है, तो इन्हें उसे भगाना होता है.

जमीन से उखड़ने का दर्द

राजकीय माध्यमिक विद्यालय में 8वीं जमात में पढ़ रही 14 साल की संजू कुमारी कहती है, ‘‘आखिरकार सरकार ने हमें अपनी जमीन से हटा ही दिया. सरकार ने रहने के लिए नई जमीन तो दी है, लेकिन वहां पढ़ने के लिए स्कूल ही नहीं है. बाबूजी पढ़ने के लिए किसी दूर के स्कूल में नहीं जाने देंगे.’’ उमेश बिंद का बेटा धर्मवीर कुमार चौथी जमात में पढ़ता है. वह बताता है, ‘‘मेरे जैसे कई बच्चों ने मुख्यमंत्री अंकल और डीएम अंकल को चिट्ठी लिख कर मांग की थी कि हम लोगों को नहीं हटाया जाए. हम लोग मन लगा कर पढ़ाई करेगे और बड़े आदमी बनेंगे, पर कोई सुनता ही नहीं है.’’ 60 साल की सरस्वतिया देवी सिसकते हुए कहती हैं, ‘‘मैं ने जमीन खोने का दर्द कई बार झेला है. मैं जब काफी छोटी थी, तभी मेरे पिता की जमीन एक दबंग ने धोखे से हड़प ली थी. मेरे परिवार को गांव छोड़ कर भागना पड़ा था. परिवार चलाने के लिए पिता को मजदूरी करनी पड़ी और मां को दाई का काम करना पड़ा था.

‘‘मैं ने भी छोटी उम्र से ही जूठे बरतन धोने का काम शुरू कर दिया था. अब एक बार फिर से जमीन से उजड़ने की पीड़ा झेलनी पड़ी है.’’ पटना के पश्चिमी इलाके में पिछले कई सालों से बसी दीघा बिंद टोली से उखड़ने और उजड़ने के बाद सभी 205 परिवारों को नया पता मिला है, कुर्जी बिंद टोली. कुर्जी के पास मैनपुरा में साढ़े 6 एकड़ की जमीन पर बिंद टोली के बाशिंदों ने अपना नया आशियाना बना लिया है. सरकार की ओर से बिजली, पानी, आनेजाने का रास्ता वगैरह बनाने का काम शुरू किया गया है. इस के अलावा स्कूल, सामुदायिक भवन वगैरह बनाने का भरोसा दिया गया है. मिट्टी खोदने का काम करने वाला रघुनाथ कहता है कि रेलवे पुल की योजना को पूरा करने के लिए सरकार ने बिंद टोली के लोगों को हटाने के लिए कई वादे तो कर दिए हैं, लेकिन कभी भी पूरे नहीं हो पाएंगे.

बिंद टोली के हटने के बाद खाली हुई जमीन को पटना के जिलाधीश एसके अग्रवाल ने रेलवे को हैंडओवर कर दिया. जमीन खाली होने से दीघा रेलवे पुल के चालू होने का रास्ता साफ हो गया है. पटना से पुल को जोड़ने के लिए गाइड बांध बनाने का काम कई सालों से अटका हुआ था. गौरतलब है कि दीघा एम्स ऐलिवेटेड सड़क के पास नहर किनारे बिंद टोली बसी हुई थी. 6 जनवरी, 2016 को जिला प्रशासन ने बिंद टोली के घरों पर बुलडोजर चला कर जमींदोज कर डाला. हर परिवार को घर बनाने के लिए 3-3 डिसमिल जमीन (एक डिसमिल जमीन की कीमत साढ़े 14 लाख रुपए है) के साथ एकएक तिरपाल और कंबल दिया गया है. साथ ही, टोली के बीच पीने के पानी के लिए 8 चापाकल लगा दिए गए हैं. स्कूल और सामुदायिक भवन बनाने के लिए अलग से 11 कट्टा जमीन दी गई है. घर से उजड़ने का दर्द झेलता 45 साल का रैन महतो कहता है, ‘‘सरकारी अफसर क्या जानें कि जमीन छोड़ने की पीड़ा क्या होती है? वे लोग तो अपने लिए दसियों मकान और जमीन बना लेते हैं, लेकिन गरीबों को उन की जमीन से उजाड़ने में उन्हें जरा भी तकलीफ नहीं होती है.

‘‘उजाड़ने से तो अच्छा था कि केरोसिन डाल कर पूरी बस्ती को जला देते. सभी मरखप जाते. सारा बखेड़ा ही खत्म हो जाता.’’ इतना कहते ही रैन महतो की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगती है. उस के पास खड़ा उस का 15 साल का बेटा नन्हे उसे चुप कराने की कोशिश करता है, फिर वह खुद भी रोने लगता है. रेखा देवी का दुख यह है कि जहां बिंद टोली को जमीन दी गई है, वहां चारों ओर गंदगी है. पूरे पटना का कचरा वहीं फेंका जाता है. जमीन के चारों ओर गंदा पानी जमा रहता है. ऐसे में लोगों का बीमार पड़ना तय है. बिंद जाति के लोग मछली पकड़ने, खेती करने के अलावा मजदूरी का काम करते हैं. बिंद टोली के ज्यादातर लोग दिहाड़ी मजदूरी कर के अपना और अपने परिवार का पेट पालते रहे हैं. साल 2007 से ही बिंद टोली को दोबारा बसाने की लड़ाई लड़ने वाला जद्दू महतो कहता है कि गरीबों को अपना हक पाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है. पुलिस की गोलियां, गालियां और लाठियां खानी पड़ती हैं.

हर सरकार गरीबों को हक और इंसाफ दिलाने की बात तो जोरशोर से करती है, लेकिन आज तक गरीबों को न तो उन का वाजिब हक मिला है और न ही इंसाफ मिल सका है. तरक्की के नाम पर सब से पहले गरीबों की झोंपडि़यों को ही उजाड़ा जाता है. क्या कभी सुना है कि किसी अमीर के खेत और मकान को तरक्की की योजनाओं के लिए उजाड़ा गया है?

नामांतरण हो पटवारी की जिम्मेदारी

मध्य प्रदेश में साल 2014-15 के दौरान लोकायुक्त ने तकरीबन 8 सौ सरकारी मुलाजिमों को भ्रष्टाचार के इलजाम में रंगे हाथ घूस लेते पकड़ा था. इस में हैरत की बात यह थी कि पटवारियों की तादाद सब से ज्यादा तकरीबन 6 सौ थी और इस से भी ज्यादा हैरानी की बात यह थी कि इन 6 सौ में से 80 फीसदी यानी 480 पटवारी नामांतरण यानी रजिस्टर में एक नाम की जगह पर दूसरा नाम चढ़ान के एवज में घूस लेते धरे गए थे. यह आम राय नहीं, बल्कि कड़वी सचाई है कि बगैर घूस लिए पटवारी नामांतरण नहीं करता यानी पनपती घूसखोरी की सब से अहम वजह नामांतरण है, जो वक्त रहते किसान न कराए, तो हजार कानूनी परेशानियां भी उस के सामने मुंहबाए खड़ी रहती हैं.

इस राज्य में कलक्टरों ने तो अपने दरबार यानी जनसुनवाई जैसे सरकारी जलसे अभी शुरू किए हैं, लेकिन किसान तो अंगरेजों के जमाने से पटवारी की दहलीज पर बैनामा और बहीखाता ले कर बैठते रहे हैं कि कब पटवारी साहब का मूड या नजरें इनायत हों और वे जमीन के कागज में नाम बदलने की जरा सी जहमत उठाएं. घूस तो वे लेंगे ही, क्योंकि यह उन का हक है. दाखिलखारिज यानी नामांतरण नाम की जिस कागजी कार्यवाही पर अरबों रुपए की घूस चलती है, वह बेहद मामूली है कि किसान की मौत के बाद वारिस या वारिसों के नाम कागजों पर चढ़ाना है या फिर जिस किसी ने भी जमीन खरीदी है, उसे वह अपने नाम करवाना. इन दोनों से भी अहम है बंटवारा, जो जज्बाती तौर पर तो तकलीफदेह होता ही है, लेकिन कागजी तौर पर उस से भी ज्यादा नुकसानदेह साबित होता है.

नामांतरण क्यों

जमीन कैसी भी हो और कितनी भी हो, उस की मिलकीयत को ले कर जमीन मालिक या खरीदार उस वक्त तक बेफिक्र नहीं होता, जब तक कि सरकारी कागजों में वह दर्ज न हो जाए. बदलाव के इस दौर का हर तरफ दिखने वाला नजारा यह है कि किसान खासतौर से छोटी जोत वाले किसान अपनी जमीन बेच कर शहरों में बस रहे हैं. बिल्डरों ने चारों दिशाओं में पैर पसार लिए हैं. हर कहीं इमारतें और रिहायशी इलाके बढ़ रहे हैं, जिन से जमीनों के दाम उम्मीद से कहीं ज्यादा बढ़े हैं. नतीजतन, जमीन की रजिस्ट्री की तादाद तेजी से बढ़ रही है, जिसे देख कर ऐसा लगता है मानो आने वाले समय में जमीन का अकाल पड़ने वाला है.

एक जमीन बिक कर तकरीबन आधा दर्जन हाथों से हो कर गुजर रही है और हर दफा उस का नामांतरण हो रहा है. खरीदार कोई जोखिम नहीं उठाता. उस की जेब में पैसा है. वह जानता भी है और समझता भी है कि नामांतरण अहम है, इसलिए वह पटवारी को इस बाबत मुंहमांगी रकम दे रहा है, जिस से आगे चल कर इसे बढ़े दामों पर बेचने में दिक्कत न आए. किसानों की परेशानी यह है कि वे नामांतरण चाहे वारिस होने की बिना पर कराएं या वसीयत की बिना पर, बगैर उन के नाम हुए जमीन पर न तो कर्ज मिलता है, न ही खादबीज मिलते हैं और न ही तमाम सरकारी सहूलियतें मिलती हैं. लिहाजा, उन्हें नामांतरण कराने की जल्दी रहती है. भूमाफिया को बड़ीबड़ी गाडि़यों में आते देख उन्हें यह डर भी सताने लगा है कि कहीं ऐसा न हो कि कोई और उन की जमीन की फर्जी रजिस्ट्री करा कर नामांतरण भी अपने हक में करा ले.

इस बेचैनी में सब से ज्यादा फायदे में पटवारी रहता है, जो नामांतरण की पहली सीढ़ी भी है और छत भी. जिस किसी को नामांतरण कराना होता है, वह रजिस्ट्री समेत दूसरे जरूरी कागजात ले कर पटवारी के पास पहुंचता है. पटवारी कागजों का मुआयना कर के तय करता है कि वे ठीक हैं या नहीं. अगर उसे कागजात ठीक लगते हैं, तो वह नाम दर्ज कर फाइल तहसीलदार के पास पहुंचा देता है. तहसीलदार इस पर दस्तखत कर देता है, तो नामांतरण नाम का काम पूरा हो जाता है. इस के लिए दक्षिणा जमीन की कीमत या जरूरत के मुताबिक एडवांस में चढ़ा दी गई होती है. यह 10 हजार से ले कर 10 लाख रुपए या उस से ज्यादा भी हो सकती है. इस बाबत पटवारी को कोई जल्दी नहीं होती, क्योंकि तुरुप का पत्ता उस के हाथ में रहता है. लिहाजा, वह इतमीनान से काम करता है.

सब्र नहीं होता

13 जनवरी, 2016 को मध्य प्रदेश राज्य के निमाड़ इलाके के बड़वानी जिले के एक पटवारी एसबी डोंगरे को इंदौर के लोकायुक्त ने एक हजार रुपए की घूस लेते रंगे हाथ दबोचा था. भीकम कड़वाल नाम के इस किसान को जमीन का नामांतरण कराना था. जब वह थकहार कर परेशान हो गया, तो उस ने लोकायुक्त में शिकायत कर डाली. वह पटवारी फरवरी, 2016 में रिटायर होने वाला था. आमतौर पर तमाम सरकारी मुलाजिम रिटायरमैंट के सालभर पहले से घूस लेना बंद कर देते हैं. वजह शराफत नहीं, बल्कि यह मजबूरी रहती है कि अगर पकड़े गए तो कानूनी कार्यवाही होगी ही, लेकिन साथसाथ पैंशन और जीपीएफ की भी रकम रुक जाएगी. पटवारी एसबी डोंगरे से इतना सब्र भी न हुआ. लिहाजा, वह नप गया. इसी दिन राज्य के बालाघाट जिले के खैरलांजी तहसील के दफ्तर में एक और पटवारी भूपेंद्र देशमुख को भी लोकायुक्त ने 15 हजार रुपए की घूस लेते पकड़ा था.

भूपेंद्र ने एक किसान रमेश बिसेन से बंटवारानामा तैयार करने और नामांतरण कर नई बही बनाने के एवज में यह घूस ली थी. ठीक इसी दिन राजगढ़ जिले में पटवारी सुलतान सिंह पवार लोकायुक्त द्वारा ही 45 सौ रुपए की घूस लेते धरा गया था. इस बार इलजाम नामांतरण न हो कर मनरेगा के तहत कुआं खोदने व खसरे की नकल की दरकार का था.  एक किसान अनार सिंह से यह सौदा तकरीबन 18 हजार रुपए में तय हुआ था, जिस की पहली किस्त दी जा रही थी. रतलाम जिले का एक पटवारी गणतंत्र दिवस पर घूस लेते पकड़ा गया था, तो कहा जा सकता है कि घूसखोर पटवारी कतई नहीं सुधरने वाले और सरकार का जोर इन पर नहीं चलना. लिहाजा बेहतर यह होगा कि नामांतरण का ही तरीका बदल दिया जाए.

क्या है रास्ता

अपने ही पटवारियों की घूसखोरी के आगे घुटने टेक चुकी सरकार को समझ नहीं आ रहा कि वह कैसे इस लत पर लगाम कसे. 26 जनवरी, 2016 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रतलाम में ही ऐलान किया था कि जिन जमीनों के नामांतरण में कोई विवाद नहीं है, उन का नामांतरण अब ग्राम पंचायतें करेंगी. मुमकिन है कि इस फैसले पर जल्द अमल भी हो जाए, पर ऐसा हुआ तो तय है कि किसान कुएं से बच कर खाई में जा गिरेंगे. वजह, ग्राम पंचायत में मुंह फाड़ने वालों की तादाद ज्यादा रहेगी और इस बात की कोई गारंटी नहीं कि वहां थाल में सजा कर नामांतरण होगा. होना तो यह चाहिए था कि विवाद वाले नामांतरण ग्राम पंचायतों को सौंप दिए जाते. जिस विवाद का निबटारा तहसील में भी न सुलझे, तो ऊपरी अदालतों  में चला जाता है. इस में भी पटवारी का रोल और यह गवाही अहम होती है कि हां, इस जमीन के इतने ही वारिस हैं, जितने मालिक ने बताए हैं. पटवारी के अलावा नामांतरण का काम करने का हक किसी और को न होने का वह बेजा फायदा उठाता है. आंकड़ों से हट कर देखें, तो तकरीबन हर पटवारी करोड़पति है. सभी के पास बड़ीबड़ी गाडि़यां हैं, उन के बच्चे महंगे अंगरेजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं. ज्यादातर पटवारियों ने नजदीकी रिश्तेदारों के नाम पर जमीनें खरीद रखी हैं. मकान बना रखे हैं. इतना सब डकारने के बाद भी वे घूस खा रहे हैं, जिस का एक बड़ा हिस्सा नामांतरण की कार्यवाही से आता है. ऐसे में रास्ता क्या है, जिस से कि किसानों को नामांतरण के लिए परेशान न होना पड़े और कम घूस में काम हो जाए? इस सवाल का जवाब देना बेहद मुश्किल है. भोपाल के ही कुछ पटवारियों की मानें, तो नामांतरण बंद नहीं हो सकता, पर यह जरूर हो सकता है कि उत्तर प्रदेश की ताजा पहल की तर्ज पर इसे रजिस्ट्री के साथ ही कर दिया जाए. यह आइडिया फौरी तौर पर बुरा नहीं है कि नामांतरण और रजिस्ट्री में फर्क नहीं किया जाए यानी रजिस्ट्री को ही नामांतरण माना जाए. यह आइडिया कितना कारगर हुआ, यह उत्तर प्रदेश से ही पता चला है कि वहां घूसखोरी रुकी नहीं है, बल्कि उस का तरीका बदल गया है. अब नामांतरण का नहीं, बल्कि रजिस्ट्रार दफ्तर के ही नजदीक एक अलग कमरा बना कर घूस लेने का इंतजाम कर दिया गया है. सरकारी मुलाजिमों के ओहदे भले ही अलगअलग हों, लेकिन दिमाग सब का एक सा खुराफाती होता है. भोपाल के नजदीक सीहोर के एक पटवारी का कहना है कि यह न समझें कि नामांतरण या दूसरे कामों की घूस की पूरी रकम हम ही डकार जाते हैं. हां, पर सच यह है कि हमें एक बड़ा हिस्सा उम्मीद से ज्यादा मिलता है. इस पटवारी के मुताबिक, हर एक सर्किल का रेट बंधा हुआ है. ऊपर से पटवारी को घूस लेने के लिए मजबूर किया जाता है. ये लोग अपना कौलर तो साफ रखते हैं, लेकिन बदनाम पटवारी होते हैं. कारगर तो यह होगा कि नामांतरण न होने की बाबत पटवारी को ही जिम्मेदार ठहराया जाए और उस से ही पैनाल्टी वसूली जाए. साथ ही, पटवारी को मजबूत किया जाए कि वह कैसे भी हो, एक हफ्ते में नामांतरण करे, नहीं तो फिर सजा भुगतने को तैयार रहे तो ही बात बन सकती है, नहीं तो किसानों को तरहतरह से परेशान होना ही है.

कर्ज से कंगाल होते मेहनतकश

मध्य प्रदेश में इंदौर के द्वारकापुरी इलाके में रहने वाले 32 साला पवन ने 6 फरवरी, 2016 को फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली. उस की 26 साला बीवी ज्योति ने भी ऐसा ही किया. पर उन दोनों ने दिल दहला देने वाला एक गुनाह यह भी किया कि खुदकुशी करने से पहले अपनी ढाई साल की मासूम बेटी नम्रता की भी गला घोंट कर हत्या कर डाली. पवन और ज्योति ने अभी अपनी घरगृहस्थी की शुरुआत ही की थी और मासूम नम्रता तो मम्मीपापा के अलावा कुछ जानतीसमझती ही नहीं थी.

किराए के मकान में रहने वाले पेशे से ड्राइवर पवन की खुदकुशी में कोई पेंच या सस्पैंस नहीं है, क्योंकि मरने से पहले उस ने एक चिट्ठी में लिखा था कि उस पर तकरीबन 65 हजार रुपए का कर्ज था और सूदखोर वसूली के लिए उसे आएदिन तंग करते थे. इस मामले में साफ दिख रहा है कि पवन ने ब्याज पर पैसे तो आसानी से ले लिए थे, पर लौटाने में पसीने आ रहे थे. वजह, आमदनी कम और खर्चे ज्यादा थे. पवन और ज्योति ने जब देखा कि वे तगड़े सूद पर लिए पैसों को नहीं लौटा पाएंगे, तो घबरा कर उन्होंने यह खतरनाक कदम उठा लिया. पहले ज्योति ने फांसी लगाई. उस के मरने पर पवन ने उस की लाश को पलंग पर लिटाया, फिर खुद दूसरे कमरे में जा कर फंदे पर झूल गया. लेकिन इस से पहले उस ने अपनी बेटी नम्रता का भी गला घोंटा होगा. चूंकि कर्ज सहूलियत से मिल रहा है, इसलिए ले लिया जाए, फिर ज्यादा कमा कर चुका देंगे जैसी खयाली बातें सोच कर जो लोग कर्ज लेते हैं, वे असल तो दूर की बात है उस का सूद भी नहीं चुका पाते, क्योंकि उन्हें अंदाजा नहीं रहता है कि जिस आमदनी में वे घर नहीं चला पा रहे, अगर उस में से ही ब्याज भी देना पड़े, तो वे खर्च कैसे चलाएंगे?

इतना जरूरी नहीं कर्ज

देश में पवन जैसे लोगों की भरमार है, जो अपने रहनसहन का लैवल पैसे वालों जैसा दिखाने के लिए कर्ज ले लेते हैं. भोपाल के शिवाजी नगर इलाके में एक मिल्क पार्लर चलाने वाले नौजवान सुरेंद्र सिंह (बदला नाम) ने कारोबार बढ़ाने के लिए एक सूदखोर से यह सोचते हुए 50 हजार रुपए लिए थे कि इस पैसे से वह दुकान में माल भरेगा और जो मुनाफा होगा, उस में से कर्ज चुकाता जाएगा. इस के बाद एक लोडिंग आटोरिकशा ले लेगा, जिस से ढुलाई का पैसा बचेगा और किराए पर चलाने से आमदनी भी बढ़ेगी. तयशुदा शर्तों के मुताबिक सुरेंद्र सिंह को मूल रकम के अलावा ढाई हजार रुपए ब्याज के हर महीने चुकाने थे. उस का अंदाजा यह था कि अगर 50 हजार रुपए के माल पर वह 10 फीसदी भी मुनाफा कमाएगा, तो 5 हजार रुपए महीने की आमदनी होगी. ढाई हजार फिर भी बच रहे थे, जिन्हें इकट्ठा कर के वह साल 2 साल में असल भी चुका देगा.

कारोबार के मामले में कम जानकारी रखने वाले सुरेंद्र सिंह को पहले ही महीने तब झटका लगा, जब महीने में 20 हजार रुपए का सामान भी नहीं बिका यानी ब्याज के 5 सौ रुपए उसे दूध की कमाई से मिला कर भरने पड़े. यह सिलसिला थमा नहीं तो सुरेंद्र परेशान हो गया, क्योंकि महीने की पहली तारीख को लेनदार मिल्क पार्लर पर आ खड़ा होता था और ब्याज का पैसा ले जाता था. बढ़ता घाटा देख कर सुरेंद्र सिंह को तनाव होने लगा और इसी परेशानी में वह बीमार पड़ गया. दुकान नौकर के भरोसे छोड़ी, तो बीमारी से ठीक होने के बाद पता चला कि 8-10 हजार का माल तो गायब है ही, दूध के पैसों की भी पूरी वसूली नहीं हुई है. नौकर से पूछा गया, तो वह लड़झगड़ कर काम छोड़ कर चला गया. इधर सूदखोर को कोई रहम नहीं आया. इलाज में हुआ 15 हजार रुपए का खर्च और ब्याज की 2 महीने की 5 हजार रुपए की रकम ने उसे फुटपाथ पर ला खड़ा कर दिया.

सुरेंद्र सिंह ने यहांवहां हाथपैर मारे, पर जब किसी ने मदद नहीं की, तो सूदखोर से बचने के लिए उस ने अपना मिल्क पार्लर घाटे पर बेच दिया और अब नए काम या कारोबार की तलाश में है, पर कर्ज लेने से उस ने तोबा कर ली.

महंगे पड़ते हैं ऐब

ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो कमाते तो जरूरत के मुताबिक ही हैं, लेकिन किसी लत या ऐब की गिरफ्त में आ कर कर्ज ले बैठते हैं. जुआ, सट्टा, शराब या कोई दूसरा नशा और धंधेवालियों के पास जाने वालों को कर्ज ज्यादा और जल्दीजल्दी लेना पड़ता है. ऐसे लोग शुरू में तो खर्च पर ध्यान नहीं देते हैं, लेकिन फिर धीरेधीरे जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ने लगते हैं, जिस का खात्मा किसी हादसे की शक्ल में ही जा कर होता है. पेशे से मेकैनिक सलीम काइनैटिक गाडि़यों का अच्छा जानकार था. भोपाल के एमपी नगर जोन-1 में उस की दुकान थी, जो खूब चलती थी. सलीम की कमाई तकरीबन 2 हजार रुपए रोजाना थी और कोई ऐब भी उस में नहीं था. जिंदगी मजे से चल रही थी, पर 2 साल पहले सलीम को जुए की ऐसी लत लगी, तो उसे कर्ज में डुबा कर बरबाद कर गई. अकसर जीतने वाला सलीम एक बाजी में बराबरी के पत्तों पर शो कर के तीन पत्ती के खेल में एक दांव में सवा लाख रुपए गंवा बैठा. चूंकि उधार लिया पैसा दूसरे दिन ही चुकाना था, इसलिए सलीम ने मशीनें बेच दीं. अगर वह पैसे न चुकाता, तो जालिम फाइनैंसर उस का धंधा करना मुहाल कर देते. जल्द ही दुकान बंद हो गई और घर चलाने के लिए जिन लोगों से उधार लिया था, वे भी तकाजा करने लगे, तो सलीम इंदौर भाग गया.

उधर भोपाल में उस की बीवी ससुराल वालों के ताने सुनती. वह जैसेतैसे दोनों बच्चों की परवरिश कर रही थी. साथ ही, उसे इस बात का डर भी था कि कहीं सलम उसे छोड़ कर इंदौर में ही किसी और लड़की से शादी न कर ले. भोपाल के ही बिट्ठन मार्केट इलाके में सब्जी बेचने वाली 48 साला संतोषी रैकवार की कमाई भी तकरीबन 8 सौ रुपए रोजाना की थी, जो इज्जतदार तरीके से गुजारा करने के लिए काफी थी, लेकिन संतोषी ने भागवत कथा कराने की ठानी, तो 50 हजार रुपए की कर्जदार हो गई और अब दुकान बेच कर फुटपाथ पर सब्जी बेच रही है. कहां तो उस ने सोचा था कि भगवान खुश हो कर उसे और बड़ी और पक्की दुकान दिला देगा, पर भगवान ने बजाय खुश होने के उसे उसी फुटपाथ पर ला खड़ा कर दिया, जहां से उस ने शौहर की मौत के बाद अपने नए सफर की शुरुआत की थी.

खर्च कम करें

गरीब तबके का रोजाना कमानेखाने वाला हर दूसरा शख्स छोटेबड़े कर्ज में क्यों डूबा है? इस की वजह साफ है कि दिखावे की जिंदगी जीने के लिए ये लोग पैसा ब्याज पर लेते हैं, पर वापस नहीं लौटा पाते. कोई महंगा फर्नीचर लेने के लिए कर्ज ले लेता है, तो कोई सोचता है कि 60 हजार रुपए की मोटरसाइकिल खरीद ली जाए, इस से बस का पैसा बचेगा, पर ब्याज का गुणाभाग कोई नहीं लगा पाता. नतीजा घाटा, तनाव, घरेलू कलह, सूदखोरों का कहर. वक्त रहते पैसों का इंतजाम न हो, तो छोटी बच्ची की हत्या कर बीवी के साथ फांसी पर झूलने का फैसला लेना पड़ता है, इसलिए बेहतर जिंदगी जीने का आसान तरीका है कि कर्ज लें ही न. जुआ, शराब और कर्मकांड तो कर्ज में डुबाते ही हैं, पर बेवजह के कामों के लिए लिया गया कर्ज भी भारी पड़ता है. कारोबार बढ़ाने के लिए कर्ज लेना हर्ज की बात नहीं है, लेकिन यह देख लेना चाहिए कि वाकई चुकाने लायक कमाई होगी या बात मुंगेरीलाल की तरह हसीन सपने देखने जैसी होगी.

VIDEO: आपको डरा सकता है राधिका आप्टे का ’फोबिया’

राधिका आप्टे की अपकमिंग थ्रिलर फिल्म 'फोबिया' का डरावना टीजर मेकर्स ने जारी कर दिया है. इस फिल्म में राधिका एक ऐसी लड़की के किरदार में नजर आएंगी, जो एक फोबिया की शिकार है.

इससे एक अजीब से डर का अहसास हो रहा है. वहीं 27 सेकेंड के इस टीजर में राधिका आप्टे अपनी एक्टिंग से भी खूब प्रभावित कर रही हैं. फिल्म में उन्हें एक आर्टिस्ट के तौर पर दिखाया जाएगा जिसके साथ एक रात अजीब हादसा होता है. उसे अगोराफोबिया नाम का फोबिया जो जाता है, जिसमें इंसान को सार्वजनिक जगहों पर जाने से या लोगों के बीच जाने से डर लगता है. इस हादसे की रात के बाद उसकी पूरी जिंदगी बदल जाती है.

इस फिल्म को डायरेक्ट पवन कृपलानी ने किया है. फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक काफी प्रभावित करने वाला है. यह फिल्म 25 अप्रैल को रिलीज होने जा रही है.

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