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नेमप्लेट

लेखिका – आर्या झा

‘‘मम्मा, मैं ने अंकित को टिकट और विजिटिंग वीजा मेल कर दिया है, आप को लेने एयरपोर्ट आ जाऊंगी. बस, आप जल्दी से जल्दी मेरे पास आ जाओ.’’

‘‘पहले से कुछ बताया नहीं, कैसे जल्दी आ जाऊं. पहली बार तेरे घर आना है, कुछ तो तैयारियां करनी होंगी.’’

‘‘कैसी तैयारी, पापड़ बड़ी कोई खाता नहीं. इंडियन कपड़े मैं पहनती नहीं. बाकी सबकुछ अटलांटा में मिलता है, मां. बस, सुबह उठना और तैयार हो कर फ्लाइट में बैठ जाना.’’

आशना का यह कहना था कि निधि ने तैयारियां शुरू कर दीं. बच्चों का क्या है, कुछ भी बोलेंगे. वह मां है, वह तो बेटी के लिए उस की पसंद की सारी चीजें ले कर जाएगी. बेटे अंकित से उस की पसंद की मिठाइयां मंगाईं तो एक साल पहले की सारी तैयारियां याद हो आईं. कैसे घर को दुलहन सा सजाया था, घर के हर दरवाजे पर आम के पल्लव का तोरण लगाया था. बहू के आने और बेटी को विदा करने के सफर में हर बार पति की कमी कितनी खली थी पर खुद को संभालती हुई ऐसे तैयारी की कि उस की जिंदगी में जो खुशी का मौका आया है उसे ऐसे न जाने देगी, फिर अचानक सबकुछ बदल गया.

उस सुबह की याद आते ही उस का दिल कांप जाता है मगर आज उसी बेटी ने स्वयं उसे प्यार से बुलाया तो जरूर कोई न कोई अच्छी बात होगी. यही सब सोचती उस के बचपन में पहुंच गई.

‘प्रैक्टिस मेक्स मैन परफैक्ट, क्यों मम्मा. प्रैक्टिस मेक्स ह्यूमन परफैक्ट क्यों नहीं?’

मात्र 10 वर्ष की थी जब स्कूल से आते ही बैग फेंक कर वह जटिल प्रश्नों के बौछार कर रही थी और उस के पास कोई उत्तर न था सिवा समझने के. ‘इस में क्या है, मतलब से मतलब रखो न.’

‘मतलब यह है कि वुमन परफैक्ट नहीं होती. पूरा पक्षपात है पर जाने दो, तुम नहीं समझोगी.’

‘अरे बाबा, ये पुरानी बातें हैं. तुम्हारा जमाना अलग है, मेरी बन्नो. खुश रहा करो.’

‘व्हाट बन्नो, मैं कभी बन्ना-बन्नी नहीं बनूंगी, मम्मा. ये सब अपने बेटे को बना लो.’

अंकित जो उस से 5 साल बड़ा था, चुपचाप मां और बहन की बातें सुन रहा था और मां के अरमानों पर पानी फिरता देख कह उठा- ‘मैं बनूंगा बन्ना और बन्नी भी ला दूंगा, मम्मा.’

‘मेरा बच्चा,’ बोल कर निधि ने उसे सीने से लगा लिया. वाकई कभीकभी अंकित के लिए फिक्रमंद हो जाती थी. वैसे तो दोनों बच्चों को उस ने एक सा पालनपोषण दिया मगर बेटी अपने अधिकार के प्रति खूब सजग थी और बेटा उतना ही शांत था. यह शायद नए जमाने की नई लहर ही थी.

बच्चों के बचपन की बातें चलचित्र सी आंखों में घूम गईं. सच ही कहते हैं- होनहार बिरवान के होत चिकने पात. बेटे ने जो कहा, कर दिखाया. सचमुच उस के पसंद की बहू ले आया जो नौकरी के साथ घर की देखभाल भी करती है. उस के आने के बाद कभी लगा ही नहीं कि वह किसी पराए घर की परवरिश है. शायद बेटे का उस के प्रति लगाव ही ऐसा था कि बहू ने भी सास पर अपना खूब लाड़ लुटाया.

पिता के किडनी फेलियर से हुई असमय मृत्यु ने ही अंकित को जिम्मेदार बना दिया था. उस ने परिवार का बिजनैस बखूबी संभाला. इस के विपरीत आशना हमेशा उस से रूठीरूठी ही रही. घर से दूर ही रही. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए होस्टल गई, फिर उस का आनाजाना मेहमानों की तरह होता रहा. मां होने के नाते वह अपनी विद्रोही बेटी को खूब पहचानती थी. वह जितनी ही जहीन पढ़ाई में थी उतनी ही कड़वी जबान की भी स्वामिनी थी. मगर निधि के अंदर एक विश्वास था कि सारी कड़वाहट मिठास में बदल जाएगी जब उसे प्यार होगा. मगर प्यार के लिए भी तो उसे खुद को तैयार करना होगा.

2 वर्ष पहले सब से बड़ी खुशी भी उस ने ही दी कि उस की नौकरी एक इंटरनैशनल कंपनी में लग गई है. बेसिक तनख्वाह 60 लाख रुपए सालाना है. ऊपर से कुछ वैरिएबल अमाउंट और बोनस अलग. उस का अमेरिकन वीजा भी प्रोसैस हो गया है. इस बात पर पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई. आज भी महीने के 60 हजार रुपए में घर चलाने वाली गृहिणी की बेटी अगर साल के 60 लाख से ऊपर कमाने लगे तो वाकई अपनी पैदाइश पर गर्व होने लगता है.

उस की अप्रत्याशित सफलता से उस के प्रति निधि का रवैया ही बदल गया. उस के स्वतंत्र विचारधारा व नई सोच के प्रति आदर का भाव पैदा होने लगा. बेटी के दिमाग में कुछ तो बात होगी जो उसे इतने सम्मानित कंपनी में इतना अच्छा जौब मिला है और साथ ही, उस ने एक और खुशखबरी दी कि अपने ही सहपाठी अविनाश को जीवनसाथी बनाने का फैसला किया है. इस बात पर निधि को लगा जैसे उस की लौटरी निकल गई. उसे तो यकीन ही नहीं था कि कभी उस की बेटी शादी के लिए किसी को पसंद भी करेगी. वह तो कब से इस दिन की प्रतीक्षा कर रही थी. खूब धूमधाम से शादी कराने की ठानी.

गोवा में डैस्टिनेशन वैडिंग की तैयारी की. होटल बुक कर एडवांस दे दिया गया. रिश्तेदारों ने अपने हवाई टिकट बुक कर लिए. कपड़े बन गए.

शादी को बस एक हफ्ता रह गया था. आशना औफिस से छुट्टी ले कर घर आ गई. रातदिन दोनों लवबडर्स की तरह फोन पर बातें करने लगे. शुभकार्य था तो घर को भी लाइट और तोरण से सजा लिया. जब 90 प्रतिशत तैयारियां हो गईं और अगली सुबह हलदी व लेडीज संगीत के लिए गोवा की फ्लाइट पकड़नी थी तो आशना ने शादी से इनकार कर दिया.

निधि को कुछ समझ में नहीं आ रहा था. आखिर इस की वजह क्या हो सकती है. सबकुछ ठीक जा रहा था मगर अचानक कहीं उस से कोई भूल तो नहीं हुई है जो बेटी हत्थे से उखड़ गई है. न तो शादी के लिए तैयार है और न ही इस विषय में कुछ सुनना चाहती है. हिम्मत कर पूछ बैठी, ‘मेरे बच्चे, बताओ तो सही, आखिर ऐसी क्या बात हो गई जो ये…’

‘कुछ भी नहीं. तुम सोचो, कुछ हुआ ही नहीं.’

‘सुन बच्चे, अगर हमारी ओर से लेनदेन में कोई कमी रह गई तो बता, मैं उन लोगों से माफी मांग लूंगी?’

‘तुम सचमुच बिना रीढ़ की हो, मां. अभी तक लगता था पर बगैर बात माफी का क्या मतलब है. शादी वे लोग नहीं, मैं टाल रही’ हंसती हुई बोली तो कुछ तसल्ली हुई और फिर कहा, ‘एक और बार कारण पूछा तो घर छोड़ दूंगी मैं और लौट कर कभी नहीं आऊंगी.’

‘हां, पर मेहमान जो परसों से आने लगेंगे उन्हें क्या कह कर रोकूं?’

‘बोल दो, कोई मर गया.’

‘छीछी, ऐसी मनहूस बातें नहीं कहते.’

‘क्या फर्क पड़ता है, मम्मा. कोई पहले मरे या बाद में. पापा सारी जिंदगी अपने घरवालों के पीछे मरते रहे. तुम ने बगैर उफ किए सारे त्याग किए. पहले कैरियर का त्याग, फिर मायके का, दादी के लिए पोते की ख्वाहिश में अबौर्शन करा कर शरीर का त्याग, फिर पापा के बिजनैस ट्रिप के बहाने खुद को शराब में डुबोने से किडनी खराब होने पर उन की असमय मृत्यु पर अपने शृंगार का त्याग. माफ करना, तुम्हें देख कर मुझे यही प्रेरणा मिली है कि मैं अपना जीवन त्याग के बिना बिताऊं और यही मेरा अंतिम निर्णय है.’

निधि उस के इस रूप से परिचित तो थी ही, उसे तो यही आश्चर्य हो रहा था कि आखिर वह अविनाश से शादी के लिए मानी कैसे. जननी से ज्यादा अपनी जायी को और कौन समझता. इस विद्रोहिनी को अपने हाथों ही बड़ा किया था. यही सब सोचती कब सुबह हो गई, पता न लगा. मालूम होता था रात आंखों में कट गई. ‘फ्लाइट में सो लेगी’ यह सोच कर बचीखुची पैकिंग की और हार्ट्सफील्ड – जैक्सन अटलांटा इंटरनैशनल एयरपोर्ट पर उतरी तो बेटी के हाथ प्रैम पर थे.

एक बार को लगा कि शायद गलती से किसी बच्चे के प्रैम को पकड़ लिया है मगर उस ने बोला, ‘‘तेरे बेटे से फास्ट हूं मैं. शादी उस ने पहले की पर तुझे नानी मैं ने पहले बनाया. कैसा लगा मेरा सरप्राइज, मम्मा.’’

निधि निशब्द थी. कुछ सूझ न रहा था, तो आंखें बहने लगीं.

‘‘आई हेट टियर्स,’’ कह कर हंस पड़ी.

उफ, सचमुच अपने बाप पर गई है. उसे जो करना है वही करेगी. दूसरे क्या सोचते हैं, इस से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. ‘‘तुम ने शादी कब की, कुछ बताया नहीं?’’

‘‘नहीं की, बाकी बातें घर पर करेंगे, मौम.’’

उस ने कार में न केवल उस का सामान लोड किया बल्कि बच्चे को कार सीटर के बैल्ट में बिठा कर उस का हाथ पकड़ कर कार के अंदर बैठाया. एक नई मां का ऐसा ऐक्टिव रूप निधि के लिए दुनिया का आठवां अजूबा था.

घर पहुंच कर उस ने बगैर किसी मदद के खुद ही बच्चे को और उस के सामान को निकाला और निधि मूकदर्शक सी अपलक उसे निहारती रह गई. मन की बात मन में दबाए बेटी के घर में प्रवेश किया तो एकदम करीने से सुसज्जित घर में एक हाउसहैल्पर के अलावा और कोई न था.

आखिरकार हिम्मत कर पूछ बैठी, ‘‘इस का पिता कौन है, कहां है?’’

‘‘मां, इस का पिता वही शख्स है जिस से मैं ने प्यार किया था. मगर उसे अपने ऊपर अधिकार नहीं दिया वरना मुझ से कम तनख्वाह पाने वाला, मुझ से कम आईक्यू वाला अपने कैरियर में मुझ से आगे निकल अपने दोस्तों में शान से मेरे बच्चे का बाप कहलाने का गौरव पाता.’’

‘‘बेटू, सिर्फ इतनी सी बात के लिए तुम ने शादी नहीं की?’’

‘‘चिल्ल ममा, इतनी सी बात नहीं है. शरीर के कुछ हिस्सों के सिवा मुझ में उस में क्या अंतर है, बोलो? सिर्फ इतने के लिए मैं उसे छाती पर नहीं बिठा सकती थी.’’

‘‘फिर उस का ही बच्चा क्यों?’’ इस बार निधि ने तीर निशाने पर लगाया.

‘‘मैं ने उस से प्यार किया था.’’

एक इस बात से निधि को तसल्ली हुई कि बेटी चाहे जितने भी विरोधी नारे लगा ले मगर उस ने मन को मलिन नहीं किया था. उस का कहना किसी हद तक सही था. कई पीढि़यों से महिलाएं अकेली, अपने दम पर घरगृहस्थी खींचती हुई अपनी मेहनत पर दूसरे का यशगान करती नहीं थकती हैं. अपने खूनपसीने से सजाए आशियाने पर पति के नाम की नेमप्लेट खुशीखुशी बरदाश्त करती हैं तो स्वेच्छा से अपनी ही नेमप्लेट के साथ जीना कोई गलत तो नहीं. उस की बेटी के घर, बैंक बैलेंस और यहां तक कि बच्चे पर सिर्फ और सिर्फ उस की नेमप्लेट थी.

एक खंडित प्रेमकथा

‘‘शु चि, ‘सा’ निकल रहा है, ‘सा’ क्यों छूटता है तुम्हारा, ऊपर, थोड़ा और ऊपर लो. ‘सा’ को पकड़ो तो सारे सुर अपनेआप पास रहेंगे.’’

संगीत क्लास में मेहुल की 18 वर्षीया छात्रा शुचि से यह कहते ही पास के कमरे से एक तीखा व्यंग्य तीर की तरह आ कर इन की पूरे क्लास को धुआंधुआं कर गया : ‘सा’ जिस का निकला जा रहा उसे तो अपना होश नहीं, किसी और का ‘सा’ पकड़ने चले हैं.’’

थोड़ी देर के लिए एक विकृत मौन पसर गया. मेहुल ने स्थिति संभाली, ‘‘राजन और दिव्या, तुम लोग शुचि के सम से अंतरा लो.’’

किसी के दिल में आग लगी थी. जन्नत से लटकती रोशनियों के गुच्छों से जैसे चिनगारियां फूटी पड़ती थीं. सांभवी कमरा समेटना छोड़ मुंह ढांप बिस्तर पर पड़ गई.

मन ही मन ढेरों उलाहने दिए, हजार ताने मारे, जी न भरा तो अपना फोन उठा लिया और स्वप्निल को टैक्स्ट मैसेज किया- ‘एक नई कहानी लिखना चाहती हूं, प्लौट दे रही हूं, बताएं.’ यही सूत्र था प्रख्यात मैगजीन एडिटर स्वप्निल सागर से जुड़े रहने का. और कैसे जिया जाए, कैसे जिया भरमाया जाए, कैसे भुलाए वह अपनी परेशानियों को?

टैक्स्ट देखापढ़ा जा चुका था, जवाब आया, ‘भेजो.’

लिखना शुरू किया उस ने. निसंदेह आज के समय की कमाल की लेखिका है वह.

कल्पना, भाषा, विचार और कहानियों की बुनावट में असाधारण सृजन करने की कला. पल में प्लौट भेजा और ओके होते ही लिखना शुरू.

सांभवी : 5 फुट हाइट, सांवलीसलोनी, हीरे कट का चेहरा, शार्प और स्मार्ट. उम्र करीब 28 वर्ष.

मेहुल को सोचते हुए उस के अंदर आग सी भड़क उठी, ‘वही मेहुल, वही आत्मकेंद्रित संगीतकार और वही उस के सिमटेसकुचे चेहरे की अष्टवक्र मुद्राएं, तनी हुई भौंहों और होंठों के बंद कपाट में फंसे हुए कभी न दिखने वाले दांत. मन तो हो रहा था उठ कर जाए और विद्यार्थियों के सामने ही वह मेहुल की पीठ पर कस कर एक मुक्का जमा आए. वह उठ कर गई मगर उस कमरे के बगल से निकल कर रसोई में जा कर चाय के बरतन पटकने लगी, यानी चाय बनाने का यत्न करते हुए गुस्सा निकालने की सूचना देने लगी किसी को.

हद होती है सहने की. महीनों से उस ने अपनी इच्छा जता रखी है कि मेहुल कहीं भी हो मगर उस के साथ चले, उस के साथ कुछ रूमानी पल बिताए, एक शाम सिर्फ ऐसा हो जो सिर्फ उन दोनों के लिए हो, दैनिक चालीसा से हट कर हो.

जब इतने दिनों तक यथार्थ के देवता से इतना भी न हुआ तो कम से कम बाजार ही साथ चलें. इसी बहाने सही वह अपने लिए कुछ महक गुलाब के निचोड़ ही लेगी, अलमारी खुलेगी, ड्रैस निकलेंगे- कुछ वह सजेगी तो कुछ मेहुल संवेरगा, दोनों बहुत दिनों बाद एकदूसरे पर कुछ पल अपलक नजर रखेंगे और सांभवी अब तक नकचढ़ी इमोशन के गुब्बारों को समर्पण की सूइयों से छेद कर उस के गले से लिपट जाएगी थोड़ी शरमा कर और थोड़ी बेहया सी.

इज्जत ताक पर रख सांभवी सुबह से 4 बार मेहुल को याद दिला चुकी थी कि आज क्लास की छुट्टी कर देना, बाजार चलना है. दरअसल सांभवी के लिए यह बड़ी बात थी कि आगे बढ़ कर वह अपनी खुशी के लिए किसी से कुछ मांगे, चाहे क्यों ही न वह मेहुल हो.

मगर मेहुल, स्कूल से आ कर वही रैगुलर रूटीन में बच्चों को ले कर संगीत क्लास में बैठा है. एक दिन की चाय भी सांभवी को मेहुल के साथ नसीब नहीं होती. वह हड़बड़ी में चाय बना कर देती है और वह अपने चायनाश्ते की प्लेट ले कर क्लास में घुस बैठता है. हां, बच्चों के लिए अलग से बीचबीच में नाश्ता भिजवाने की मांग करते समय हक देखते ही बनता है उस का. चिढ़े न भला क्यों सांभवी.

चार वर्षों में कहीं घूमने तो क्या, जिंदगी की सब से हसीं याद भी उस के पास नहीं है. हां, हनीमून की हसीन याद जिस के बिना वैवाहिक जीवन जैसे पानी के बिना सूखा ताल. कैसे होता उस का हनीमून, उस वक्त तो बच्चों के संगीत की वार्षिक परीक्षाएं चल रही थीं.

उस ने अपनी चाय बनाई और वापस अपने कमरे में आ गई. चाय और कलम की जुगलबंदी रात 8 बजे तक चलती रही.

क्लास खत्म कर के मेहुल बैडरूम में आ कर उस के सामने खड़ा हो गया.

‘‘अब तो देर हो गई है, दुकानें तो बंद ही हो रही होंगी, क्या सामान लाना है बता दो, जल्द पास ही से कहीं से ले आऊंगा.’’

कलम छोड़ सांभवी ने मेहुल को देखा. उस की नीरस, निर्लिप्त आंखों को देख घायल सर्पिणी की तरह सांभवी तड़प उठी, क्रोध ने उसे कुछ देर मौन कर दिया-

कैसा इंसान है, एक तो इसे साथी के क्रोध से कुछ लेना है न देना, न ही साथी के प्रेमनिवेदन से कोई वास्ता, न उसे साथी से मानमनौवल आता है, न साथी में डूब कर दुनिया में जीने का सुख लेना, कब्र से निकला मुर्दा कहीं का.

इस मौन में दिल की लगी बुझ लेने के बाद उस ने मेहुल से कहा, ‘‘तुम्हें जल्दी होगी, मुझे कोई जल्दी नहीं. अब तुम खाना खा कर सो जाना, सामान लाना हुआ तो मैं ही कल ले आऊंगी.’’

‘‘ठीक है,’’ सपाट सा उत्तर दे कर मेहुल ड्राइंगरूम में न्यूजपेपर पढ़ने चला गया और सांभवी कहानी में डूबने की कोशिश के बावजूद सतह पर ही उतराती रह गई.

एक चेहरा रहरह उस की आंखों में घूम रहा था. वह चेहरा था स्वप्निल सागर का. वे तब सबएडिटर थे जब सांभवी ने इस मैगजीन में लिखना शुरू किया था.

उस वक्त वह 21 साल की थी और ग्रेजुएशन के बाद पत्रकारिता व एमए में दाखिला लिया था. मुलाकात भी बड़ी रोचक ही कही जाएगी उन दोनों की.

एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू के लिए वह जाना चाहती थी लेकिन मैटर पहले संपादक से अप्रूव हो जाए तो छपने की कुछ गारंटी रहे, ऐसा सोच उस ने संपादक को फोन किया. इस वक्त तक वह मैगजीन में अपनी रचनाएं डाक द्वारा भेजा करती थी, कभी रूबरू नहीं हुई थी. इस बार इंटरव्यू के लिए परमिशन मिले तो तैयार मैटर ले वह खुद जाए, इसी मंशा से सांभवी ने फोन पर मिलने का समय निर्धारित कर लिया.

कुछ दिनों में तैयार मैटर ले कर मैगजीन के औफिस पहुंची. कहानी और आलेख सैक्शन संभालने वाले संपादक स्वप्निल से मिलने की कोशिश करने लगी.

केबिन में पहुंची तो स्वप्निल नहीं थे. वह इंतजार करती रही. जब स्वप्निल आए तो बहुत हड़बड़ी में थे. सांभवी को देख एक पल ठिठक तो गए लेकिन तुरंत ही कहा, ‘आज तो मैं समय नहीं दे पाऊंगा, क्या आप लिखने के सिलसिले में आई हैं?’

‘जी, मैं सांभवी, आप से फोन पर बात हुई थी, मैं जिस इंटरव्यू…’

‘मतलब, अब तक हमारी मैगजीन की सब से छपने वाली राइटर. साहित्य दर्शन और विचारों पर आप की पकड़ देख मैं तो आप को 50 से ऊपर की कोई महिला समझता था. तो आप हैं वो सांभवी.’ अब तक जाने की हड़बड़ी में खड़ा सा शख्स अपनी कुरसी पर जा बैठा था. उस ने सांभवी का लिखा हुआ मैटर लिया और एक सरसरी निगाह डाल अपनी मेज की डैस्क में रख कर कहा, ‘पहले की तरह असरदार.’

इस बीच सांभवी ने उस की आंखों में देखा और देखती ही रह गई. गजब की रोमानी और बोलती आंखें, चेहरे पर नटखटपन और घनी सी छोटी मूंछ अल्हड़ से पौरुष की गवाही देती. सांभवी ने अनुमान लगाया 30 से ऊपर के होंगे.

स्वप्निल उठ खड़े हुए. भागती सी लेकिन बड़ी गहरी नजर डाल सांभवी से कहा, ‘सांभवी आज मैं जरा जल्दी में हूं, लेकिन जल्दी ही आप से लंबी बातचीत का दौर निकालूंगा.’

स्वप्निल निकल तो गए लेकिन सांभवी के लिए पीछे एक अदृश्य डोर छोड़ गए. पता नहीं कब क्यों वह उस अदृश्य डोर को पकड़े स्वप्निल के पीछे चलने लगी थी. खुशगवार लगी गरमी की उमसभरी शाम जैसे अचानक ठंडी हवा के झोंके आ गए हों.

इस बीच, वह कई बार स्वप्निल से मिली. स्वप्निल के व्यस्तताभरे समय से उसे जो भी पल मिले वे किसी फूल के मध्य भाग की खुशबू से कम नहीं थे.

दो महीने के अंदर उस ने न जाने कितनी ही रचनाएं लिख डाली थीं और न जाने कितनी बार वह स्वप्निल के दफ्तर जा चुकी थी.

इस बार जब वह गई तो दफ्तर में अलग तरह की गहमागहमी थी. सारे लोग काम के बीच काफी मस्तीभरे मूड में थे. पता चला आज स्वप्निल कोर्ट मैरिज कर रहे हैं. लड़की से प्रेम इसी दफ्तर में हुआ था. वह यहां आर्टिकल आदि लिखती थी और इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी साथ ही कर रही थी.

लोग खुश थे, बहुत खुश, इतने कि खुद के खर्चे पर मिठाई बांट रहे थे. लेकिन जाने क्यों सांभवी के अंदर क्याक्या चटक गया. ईर्ष्या, अभिमान, संताप आंसू बन कर आंखों के कोरों में जमा होने की जिद करने लगे और वह वहां से चुपचाप निकल आई. किस पर जताए अभिमान, संताप? कोई वजूद तो नहीं उस सूरत का, कोई निशान भी नहीं उस मूरत का दिल में.

इस बीच ऊंची डिग्री लेते 4 साल और गुजरे. सांभवी के घर में अब सभी फिक्रमंद थे सांभवी की शादी को ले कर. वह भी किस का बाट जोहे? स्वप्निल सागर अब पूरे मैगजीन के एडिटर बन चुके थे, अपने पारिवारिक जीवन और कैरियर में पूरी तरह व्यस्त. सांभवी कौन थी- सिवा एक लेखिका के.

मुलाकात करवाई गई मेहुल से उस की. पांच फुट नौ इंच की अच्छी हाइट में शांत, शिष्ट, भला सा नौजवान और आंखों में गहरी कोई बात. दोनों ने आंखें मिलाईं और जैसे गहरी एक संधि हो गई अनकहे संवाद में.

सांभवी को नया संसार मिला, रचनेगढ़ने को नया रिश्ता मिला, एक सखा मिला प्रेमपुष्प से सजाने को.

मेहुल की बात लेकिन कुछ अजीब रही.

मेहुल एक पब्लिक स्कूल में संगीत शिक्षक था, घरवापसी उस की 5 बजे होती.

कुछ चायनाश्ता, जो अब सांभवी बनाने लगी थी, के बाद शाम 6 बजे से 8 बजे तक संगीत क्लास में बच्चों के साथ बैठता. रविवार छुट्टी के माहौल का भी ऐसा नक्शा था कि सांभवी के सब्र की इंतहा हो जाती. इस दिन वह किसी न किसी संगीत की महफिल का हिस्सा होता या कहीं स्टेज प्रोग्राम कर रहा होता.

सांभवी एक बंधेबंधाए मशीन के पुर्जे में आ फंसी थी और इस पूरे कारखाने को उखाड़ फेंकने की कोई सूरत उसे नजर नहीं आती थी.

संगीत में नितनए धुन रचे जाते, नए सुरों का संगम होता. लेकिन सांभवी के लिए इस में अकेलेपन का बेसुरा आलाप ही था, किसी अलग हवा, अलग रोशनी, अलग मेघ ले कर वह इस मेहुल नाम के बिन दरवाजे के किले में कैसे प्रवेश करे?

रात का अंधेरा कुछ पल को प्यार की रश्मियों के लिए भले अवसर रचता लेकिन ज्यादातर वह भी या तो मेहुल के सांसारिक कर्मों के लेखेजोखे में या सांभवी के शरीर की ऊष्मा नापने में ही बीत जाता. रागअनुराग, खेलीअठखेली, मानमनुहार, प्रेम के इन शृंगारों से अछूते ही रह जा रहे थे सांभवी के यौवन के सपने.

34 साल के मेहुल का पतझर सा निर्मोही रूप सांभवी के कुम्हलाते जाने का सबब बन गया था. 4 साल से ऊपर हो गए थे मेहुल से शादी को लेकिन अब तक ऐसी कोई सूरत नहीं बन पाई कि सांभवी स्वप्निल को अपनी काल्पनिक दुनिया से पूरी तरह मिटा पाए.

मेहुल को अपनी दुनिया में डूबा देख वह भी खुद को लगातार लेखन में व्यस्त रखती और स्वप्निल उस के जेहन से ले कर कागज के पन्नों तक लगातार फैल रहा था.

वह नहीं जानती थी कि स्वप्निल अपनी बीवी से कितना प्यार करता था, शायद बहुत, तभी तो जमाने की परवा न करते हुए उस ने विजातीय विवाह किया. वह यह भी नहीं जानती कि स्वप्निल अपने बेटे से कितना प्यार करता है, पर हां, आज की तिथि में वह ये बातें जानना भी नहीं चाहती. वह अपनी यात्रा में खुश है.

अच्छा लगता है सांभवी को स्वप्निल के बारे में सोचना. अगर मेहुल इन 4 सालों में उस की परवा को मोल देता तो शायद यह न होता. उस के रार ठानने, तकरार करने को बचकानी हरकत कह कर नजरअंदाज नहीं करता, उस के प्रेमविलास को अनावश्यक मान कर उस की अनदेखी न करता तब शायद सांभवी स्वप्निल की दुनिया को वास्तव तक न ले आती.

अब मेहुल के आगे झोली नहीं फैलाएगी सांभवी. मेहुल अगर उस के बिना दुरुस्त है तो वह भी सामाजिक दायित्व निभा कर खुद के सपनों को सींचेगी.

कहानी के नए प्लौट पर विचारते हुए शाम को सांभवी मार्केट से घर आई तो मेहुल का क्लास चल रहा था. उस की नजर उठी उधर और वह परेशान व हैरान रह गई.

सारे बच्चे दूर से मेहुल को घेरे हुए थे, मेहुल अपनी कौपी में उन्हें कुछ दिखा रहा था लेकिन शुचि… उस की हिम्मत देख सांभवी अवाक रह गई. मेहुल भी कुछ नहीं कहता, क्या इस में खुद उस की शह नहीं? अगर ऐसा नहीं होता तो 18 साल की इस लड़की की सब के सामने इतनी हिम्मत कैसे होती?

सांभवी कोफ्त से भर उठी. कहीं इसलिए तो मेहुल उस की तरफ से उदासीन नहीं, कहीं यही तो कारण नहीं कि वह क्लास की छुट्टी कर कभी उस के साथ घूमने नहीं जाता?

शुचि मेहुल के शरीर पर पूरी तरह लदी हुई उस से ताल समझ रही थी. यहां बाकी सारे बच्चे भी हैं जो वही ताल समझ रहे हैं, फिर शुचि को मेहुल के शरीर पर ढुलकने की क्या जरूरत पड़ी?

उसे याद आया, बिस्तर पर मेहुल कैसे उसे पल में रौंद कर पीछे घूम जाता है. प्रेम से ज्यादा देह में विचरण करने वाला कहीं शुचि के नरम, नाजुक, कोमल, किशोर शरीर पर… छिछि.

फिर से स्वप्निल सागर में डूबने की तैयारी कर ली उस ने. वह स्वप्निल को संदेश लिखने लगी थी.

अब उसे स्वप्निल से बातें करने के लिए यह कहने की जरूरत नहीं पड़ती कि कहानी का प्लौट दे रही हूं. अब सागर के किनारों की बंदिशें उस ने भेद ली हैं.

‘‘आहत हूं बहुत.’’ व्हाट्सऐप में टैक्स्ट किया. दो पल में सीन हो कर प्रत्युत्तर आया, ‘‘क्यों, क्या हुआ? तुम्हारी 2 कहानियां आ रही हैं अगले महीने.’’

‘‘बस, कहानी ही बन गई है जिंदगी मेरी.’’ उधर एक प्रश्नसूचक चुप्पी लेकिन सहानुभूति का स्पर्श पा रही थी सांभवी, लिखा, ‘18 साल की एक लड़की से बहुत क्लोज हो रहा है मेहुल.’’ लहजा शिकायती होने के साथ सागर को करीब पाने की छटपटाहट कम न थी.

‘‘सांभवी, तब तो मेरी पत्नी को भी तुम से गुस्सा होना चाहिए, काम के सिलसिले में पुरुषों के लिए यह नई बात नहीं.’’

सांभवी की ओर से सन्नाटा, विद्रूप और पश्चात्ताप के निशब्द पदचाप स्वप्निल को सुनते देर नहीं लगी, तुरंत उस ने बात संभाली, कहा, ‘‘अपने यौवन, सौंदर्य और टैलेंट की कद्र करो, जैसे मैं करता हूं तुम्हारी. तुम मेरी लकी चार्म हो. बी हैप्पी. मैं हूं न तुम्हारे साथ.’’

टूटते हुए को फिर भी दिलासा हुई, गरम रेत पर स्वप्निल मेघ सा बरस गया था. मेहुल के रवैए की वजह से स्वप्निल के निकट जाने की उत्कंठा पर अब उसे कोई शिकवा नहीं.

रविवार को मेहुल का स्टेज प्रोग्राम था. मेहुल ने खुद आगे बढ़ सांभवी को अपने प्रोग्राम में साथ चलने को कहा था. यह दिन उस के लिए खास था. वह भी तो रहना चाहती है उस के संग, चाहती तो है कि मेहुल के संगीत में उस की खुशबू रहे और उस के साहित्य में मेहुल की.

सांभवी की चपल काया में इंडोवैस्टर्न ड्रैस खूब फब रही थी. सब की नजर उस की ओर अनायास ही उठ रही थी. प्रोग्राम खत्म होने के बाद सांभवी ग्रीनरूम में मेहुल के पास पहुंची.

अब यह तो उम्मीद न थी. उसे बेहद बुरा लगा, जैसे कि अभी एक बच्चे की तरह सांभवी जोरजोर से रो पड़े.

यहां भी शुचि पहले से मौजूद. मेहुल के आगेपीछे वह यहां क्या कर रही है?

घृणा और कोफ्त से भर गई सांभवी. मेहुल ने देखा सांभवी को, एक सहज दृष्टि, न प्रशंसा के भाव न संकोच का. कैसा छिपा रुस्तम है यह मेहुल. सांभवी के मन में लगातार मंथन चल रहा था .

‘‘आओ चलेंगे, बाहर आयोजकों ने गाड़ी तैयार रखी है, आओ शुचि,’’ सांभवी की ओर बढ़ते हुए मेहुल ने शुचि को साथ चलने का इशारा करते हुए कहा.

यह क्या, मतलब शुचि हमारे साथ? क्रोध ने सांभवी को मन ही मन जड़ कर दिया था. सबकुछ भूल कर एक बार फिर कोशिश करने का मन जो हुआ था उस का, उस पर क्यों मिट्टी डाल रहा है, मेहुल. रोना आ रहा है सांभवी को, काश, यहां एक बिस्तर मिल जाता और वह उलटेमुंह धम्म से गिर कर जोर से रो पड़ती.

काफी मशक्कत के बाद इतना बोल पाई सांभवी, ‘‘ये हमारे साथ?’’

‘‘हां, तो इसे अकेली कैसे छोड़ूं? यह तो मेरा ही प्रोग्राम सुनने आई है, अकेली इतनी दूर से?’’

‘‘तो आई कैसे थी?’’ प्रश्न पूछ लेना भी उसे कचोट रहा था लेकिन खुद को रोक भी तो नहीं पाई वह. आखिर मेहुल इतना भी निर्लज्ज कैसे हो सकता है.

‘‘वह आई थी अकेले औटो से, तब दिन था मगर अब इतनी रात गए उसे अकेले कैसे छोड़ दूं? मेहुल जैसे आंखें तरेर रहा हो कि आगे और कोई सवाल नहीं.

सांभवी ने खूब समझा था. अपने पति की दिल की बात क्या सांभवी न समझे.

ठीक है मेहुल, तुम्हें पतिपत्नी के रिश्ते की गरिमा और अनुभूतियां समझ नहीं आतीं तो मैं भी हूं चपला प्रेम कामिनी, मुझे रोक न सकोगे. जब मैं स्वयं सलीके से जीना चाहती हूं तो तुम भटक जाना चाहते हो. फिर यही सही, मेहुल. सांभवी विस्फोट के मुहाने पर खुद को दबाए खड़ी थी.

गाड़ी में 2 लोग और थे जिन के उतरने के बाद पिछली सीट पर बीच में मेहुल के साथ अगलबगल शुचि और सांभवी हो गए थे. अब शुरू थी शुचि की प्रश्नलीला- सरसर करते दुनियाभर के सवाल. ‘‘आप ने इस में कोमल गांधार के साथ तीव्र ‘म’ लगाया, तार सप्तक पर जा कर पंचम को बीच में क्यों छोड़ दिया, हमें इस तरह तो नहीं बताया था?’’ सांभवी समझ रही थी सब. जायज सवालों के जरिए नाजायज अधिकार जता रही थी शुचि.

सांभवी को तीव्र वेदना ने आ घेरा और वह माइग्रेन की शिकार हो गई.

शुचि का घर गली के अंदर था, बाहर ही जीप रुकी और मेहुल शुचि को घर तक छोड़ने गया.

बेहयाई की हद नहीं कोई. अब अकेले अंधेरे में इतना सारा रास्ता उस बेशर्म लड़की के साथ. पता नहीं अकेले में क्याक्या गुल खिला दें दोनों.
याद आता है शादी का वह शुरुआती दौर. अपना बनाने के लिए सांभवी ने मेहुल को ले कर क्याक्या यत्न किए थे. कोई उत्सव या अवसर हो तो विशेष उपहार विशेष तरीके से देती, चुहल, हंसी, गुदगुदी, ठिठोली, खेलखेल में प्रेमनिवेदन, आंखों में मस्ती की भाषा आदि क्या कुछ न करती वह ताकि मेहुल के साथ अपनापन बढ़े, जीवंत अनुभूतियां दिनोंदिन फलेफूलें.

मेहुल शांत रहता, जैसे जमी हुई बर्फीली नदी. कितने ही कंकड़ फेंको, कोई हलचल नहीं. ऐसे शांत रहता जैसे सांभवी के मानसिक विकास पर उसे कोई शक हो, जैसे कि पतिपत्नी के बीच इन बातों का कोई महत्त्व ही नहीं. ये बातें बचकाना हरकत थीं मेहुल के लिए.

अब तो मेहुल के प्रति वाकई उस के मन में घृणा की कठोर काई जम गई है.

मेहुल शुचि को घर तक छोड़ वापस सांभवी के पास बैठ गया और ड्राइवर को रास्ते का निर्देश दे सांभवी की ओर देखा. वह आंखें बंद किए हुए माइग्रेन से जूझने की भरसक कोशिश में थी.

मेहुल ने पूछा, ‘‘कैसा लगा प्रोग्राम?’’

‘‘कौन सा प्रोग्राम? शुचि वाला या स्टेज वाला?’’

‘‘क्या कह रही हो, समझ कर कहो?’’ मेहुल का स्वर गंभीर हो गया था.

‘‘क्या इस लड़की का तुम्हारे बदन में लोटपोट होना जरूरी है? क्या बाकी बच्चे नहीं सीख रहे हैं तुम से? तुम मना नहीं कर सकते हो? पर मना करने के लिए तुम्हें भी तो उस की यह हरकत गलत लगनी चाहिए.’’

सांभवी को उम्मीद थी कि मेहुल उसे डांट कर चुप करा देगा जैसा कि अकसर लोग अपनी गलतियां छिपाने के लिए करते हैं.

मेहुल एक कठोर मौन साध गया. घर जा कर भी चुप और फिर सुबह स्कूल जाने तक, बस, चुप ही.

सुबह मेहुल के स्कूल चले जाने के बाद सांभवी ने स्वप्निल को फोन लगा दिया.

शायद, अब बांध टूट ही जाना था. परवा नहीं कि साथ में क्याक्या बह जाएंगे.

‘‘स्वप्निल,’’ एक कांपती, तरसती, दर्दभरी आवाज स्वप्निल पहली बार सुन रहे थे जिस में ‘जी’ के बिना एक अनकही निकटता पैदा हो गई थी.

‘‘अरे, क्या हुआ?’’ उधर से चिंतित स्वर.

‘‘अभी कहूं?’’

‘‘हां, कहो, मैं औफिस के लिए निकलने वाला था, रानू निकल गई है, बोलो?’’

सांभवी स्वप्निल की पत्नी रानू की अनुपस्थिति की सूचना से कुछ आश्वस्त हुई और बोली, ‘‘स्वप्निल.’’

‘‘कहो सांभवी.’’

‘‘मैं आप को देखना चाहती हूं, स्वप्निल. बहुत साल हो गए. मैं और कुछ नहीं सुनना चाहती.’’

‘‘मेहुल ने सताया,’’ स्वप्निल ठिठोली करते हुए सांभवी को शायद सचाई का आईना दिखाना चाहते हों, लेकिन सांभवी अपने मन के बिखरे कांच को इस वक्त अलगअलग नाम देने में समर्थ नहीं थी. उस ने शिद्दत से कहा, ‘‘स्वप्निल, मैं आप से मिलने को कह रही हूं. मेहुल की बात मत करो.’’

‘‘अच्छा, ठीक है. तुम्हारे शहर आऊंगा अगले महीने, एक साहित्यिक पत्रिका का उद्घाटन समारोह है. होटल ड्रीम टावर में ठहरूंगा, वहीं मिलेंगे हम. मैं वक्त पर सारा डिटेल दे दूंगा तुम्हें.’’

‘‘नहीं जानती यह महीना कैसे बीतेगा लेकिन इंतजार करूंगी, स्वप्निल.’’

स्वप्निल ने फोन रख दिया था और सांभवी दर्दभरे ग्लेशियर से फिसलतीबहती जाने कहां गिरती जा रही थी. उस से रहा नहीं गया, दोबारा फोन किया, कहा, ‘‘मैं क्यों टूटी जा रही हूं, स्वप्निल? क्या आप सुनना नहीं चाहेंगे? मैं आप से अपना दिल साझा करना चाहती हूं.’’

स्वप्निल सांभवी को टटोल चुके थे, कहा, ‘‘डियरैस्ट, तुम एक राइटर हो, जो झेल रही हो उसे तुम एक बार खुद क्रिएट करो. वह राइटर खुशनसीब होता है जो संघर्ष झेल कर, आग से गुजर कर कुछ नया रचता है. अब जो लिखोगी वह बेहतरीन होगा. प्लीज, इसी वक्त तुम प्लौट तैयार करो. तुम अपनी इसी मानसिक दशा को पकड़ो. जरूरत पड़े तो मुझे अपनी चाहतों में ढालो, तुम स्वतंत्र हो. मगर अभीअभी क्रिएट करो.

सारे दर्द, सारी सुप्त वासनाओं में रंग भरो. पूरी आजादी के साथ. अभी कई सारी बेहतरीन कहानियां चाहिए मुझे. और मैं जब आऊंगा तो तुम्हारे अंदर और कई कहानियां पैदा कर जाऊंगा.

‘‘बी अ स्मार्ट प्लेयर, अ डांसिंग प्लेयर. समझ गई न मेरी बात, डियरैस्ट.’’

सम्मोहित सी सांभवी ने कलम पकड़ ली. कहानियों के रूप में मन के उथलपुथलभाव जिंदा होने लगे. एक के बाद एक, लगातार कई दिन, कई कहानियां- ‘जिंदा आग’, ‘बर्फ का अंटार्टिक’, ‘ज्वलंत प्रश्न’, ‘जागृत कामनाएं’.

यहीयही चाहिए था स्वप्निल को लेकिन सांभवी को?

कहानी दे कर सांभवी ने संदेश भेजा स्वप्निल को- ‘‘मैं आप को खुश कर पाई न, स्वप्निल?’’

‘‘हां, बेहद.’’

‘‘हया की दीवारों ने मुझे मरोड़ रखा है, स्वप्निल. मेरा दम घुट रहा है. मैं तब से क्याक्या कहना चाहती थी आप से जब हमारी पहली मुलाकात थी.’’

‘‘क्या बात, कभी बताया नहीं. खामखां कितना ही वक्त बरबाद हुआ. चलो फिर भी जिंदगी नहीं गुजार दी कहने से पहले. शुरू होगी अब एक नई कहानियों की शृंखला. गुजर कर दरिया ए फना से. क्यों, है न?

‘‘मोहब्बत में तो मौत का दरिया भी बाढ़ ए बहारां हो जाता है. कहानियां क्या जबरदस्त होंगी सांभवी. मैं तुम से मिलने को उत्सुक हूं, सच.’’

‘‘सिर्फ कहानियों के लिए?’’

‘‘किस ने कहा?’’

‘‘तुम से ही तो मेरी कहानियां हैं. तुम तो मेरे लिए सब से महत्त्वपूर्ण हो. क्या मैं जिसतिस से यह बात कह सकता हूं?’’ स्वप्निल डुबो ले जा रहा था सांभवी को.

तीन रातों से मेहुल पास बर्फ सा पड़ा रहता है. वह तड़पती है बगल में आग सी. तीन रातों से लगातार वह स्वप्न देखती है. आज भी देख रही है. बंद पलकों से दर्द उछल कर बाहर आ रहा है. वह चिंहुकती है. मेहुल उसे धीरे से छूता है. उस के ललाट पर अपना हाथ रखता है. वह अचानक चीख उठती है, ‘‘स्वप्निल, नहींनहीं, आह, बचो, उड़, चला दिया उस ने ट्रक तुम्हारे ऊपर. मार डाला मेहुल ने तुम्हें. आह, मैं तुम्हें बचा नहीं पाई. एक बार तुम से मिल नहीं पाई. प्यासी बंदिनी मैं. न प्रेम दिया उस ने, न करने ही दिया.’’

मेहुल उठ कर बैठ गया था. पास आ कर उस के सिर को सहलाते हुए उस ने धीरेधीरे बुलाया, ‘‘सांभवी, उठो. तुम ठीक हो. घबराओ नहीं, सब ठीक है. किसी को कुछ नहीं हुआ.’’

उस ने आंखें खोलीं जो खुली ही रह गईं, सामने साक्षात मेहुल. सुबह की लाली फूटने को थी. मेहुल को देख अफसोस और क्रोध से वह टूटी जा रही थी. वह पीछे घूम मुंह फेर कर लेट गई. उसे बुखार था. पीछे मेहुल लेट गया.

एक मौन पश्चात्ताप का सागर दोनों के बीच बह रहा था. दोनों डूबे पड़े थे उस में. लेकिन निकलने की कोशिश किसी में नहीं थी.

सुबह के 8 बज रहे थे. कोई हलचल नहीं दिखी सांभवी में तो मेहुल चाय बना लाया. हौले से पुकारा उसे जैसे खुद की खुशी के लिए अपने दर्द को भुला कर सांभवी को माफ कर देना चाहता है वह.

सूरज की तेज रोशनी जैसे अब सब स्पष्ट कर देने पर आमादा थी.

‘‘क्या तुम स्वप्निल के पास जाना चाहती हो?’’

‘‘क्या तुम मुझे जाने के लिए कहना चाहते हो?’’

‘‘सांभवी…’’

‘‘ताकि शुचि…’’

‘‘सांभवी?’’ इस बार मेहुल का स्वर काफी तीक्ष्ण था.

‘‘क्या हुआ?’’ सांभवी के चेहरे पर व्यथा और विद्रूप के मिश्रित भाव उभर आए थे, ‘‘बहुत प्यारा नाम है न, उस के बारे में कोई बात अच्छी कैसे लगेगी?’’

‘‘तुम से इतनी नीचता की आशा मैं ने कभी नहीं की थी. तुम ने अगर पहले ही पूछा होता, मैं बता देता अब तक लेकिन लगातार तुम ने बिना समझे व्यंग्य और आघात का सहारा लिया. जानने की कोशिश किए बिना ही सब समझ चुकी थी तुम.

‘‘शुचि के पिता की सालभर पहले कैंसर से मौत हुई. वे मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे. हम से 3 साल बड़े थे. गांव से शहर हम एकसाथ स्कूल आते थे. फिर मैं शहर आ गया और वे गांव में ही खेतीकिसानी करते रहे. शुचि की मां की अचानक मृत्यु के बाद शुचि को उन्होंने इस शहर में अपने छोटे भाई के परिवार में भेज दिया और मुझे शुचि के एडमिशन से ले कर पढ़ाई व संगीत सिखाने का दायित्व दिया. सालभर पहले एक बार मैं गांव गया था, तुम्हें याद होगा, उस वक्त शुचि मेरे साथ ही गई थी क्योंकि मेरा दोस्त और उस के पापा मौत के कगार पर खड़े हम दोनों को साथ बुला रहे थे. मेरे जाते ही शुचि को मेरे हाथ में सौंप कर कहा, ‘अब से ये तेरी बेटी, भले तेरा अपना घरपरिवार रहे, तू पिता भी बने, यह अपने चाचा के पास रहे. लेकिन अब से यह तेरी बेटी हुई.’’

मैं ने दोस्त की ओर देख कर कहा, ‘‘शुचि मेरी बेटी और मेरी ही बेटी है.’’ दोस्त ने आंखें मूंद लीं.’’

सांभवी को अपने व्यवहार पर अफसोस तो खूब हुआ लेकिन जरा अहं आड़े आ गया, कहा, ‘‘जब ऐसी बात थी तो इतनी चुप्पी की क्या जरूरत थी? पहले ही कह देते.’’

‘‘चलो, अब कह देता हूं. तुम स्वप्निल के पास जाना चाहती हो तो आजाद हो.’’

पिघलती सी सांभवी फिर से अचानक जम गई. मेहुल क्या वाकई उसे नहीं चाहता, चाहता तो सुधरती हुई बात को बिगाड़ता क्यों भला? वह उठ कर चली गई.

सांभवी ने मेहुल को चुभोने के लिए स्वप्निल को मेहुल के सामने ही फोन किया, ‘‘स्वप्निल, क्या मैं ही आ जाऊं तुम्हारे पास हमेशा के लिए?’’

‘‘डियरैस्ट, कुछ अच्छा पाने के लिए सब्र की जरूरत होती है. तुम क्यों नहीं तब तक अपने लेखन पर ध्यान लगाती?’’

सांभवी को दिमाग में दर्द के गरम सीसे पिघलते से लगे. कई तरह की भावनाओं के जोड़घटाव, गुणाभाग में उलझ कर वह पस्त हो गई और बिस्तर पर निढाल पड़ गई.

दो दिनों तक मेहुल और सांभवी पतझर से बिखरे रहे.

तीसरे दिन मेहुल आ कर सोफे पर सांभवी के पास बैठ गया. वह दीवारों को ताकती शून्य सी बैठी थी.

‘‘तो क्या सोचा, कब जा रही हो स्वप्निल के पास?’’

‘‘क्या बात क्या है? जाना जरूरी है क्या?’’

‘‘क्यों नहीं, मेरे पास रह कर तो तुम प्यासी बंदिनी हो.’’

‘‘हां, हूं. उस से ज्यादा क्या हूं? तुम ने जाना है कभी खुद को?’’

‘‘मैं बुरा हूं तो तुम किसी के पास भी चली जाओगी?’’

‘‘तुम कैसे जानते हो वह कैसा है? सोनोग्राफी करवाई उस के आंत की?’’

‘‘हां करवाई.’’

‘‘क्यों, तुम उस के पास जाना चाहती हो इसलिए.’’

‘‘क्यों, तुम्हें क्या?’’

‘‘क्यों नहीं, उसे बिना परखे कैसे जाने दूं तुम्हें?’’

‘‘क्यों, बताओ?’’

‘‘क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम ऐसे हाथ में पड़ो जहां तुम्हारी कद्र नहीं. वह अपने परिवार और बच्चे के आगे तुम्हारा मोल कौड़ी का भी नहीं रखता. उस के लिए तुम कहानियों की एक मशीन हो, बस. क्या तुम कुछ भी नहीं समझती? उस के लिए उस की बीवी सब है, तुम नशे की हालत में हो.’’

‘‘जहन्नुम में जाने दो मुझे, मैं ने खुद को तुम पर थोप कर देख लिया बहुत.’’

‘‘नहीं,’’ मेहुल लिपट गया उस से. सांभवी का चेहरा उस के हाथों में था. मेहुल के होंठ सांभवी की आंखों के उन भारी पलकों पर आ कर रुक गए थे जहां जाने किन सदियों से अभिमान के घने मेघ जमे थे.

सांभवी ने मेहुल के कंधे पर सिर रख दिया.

पूरी तरह निढाल हो कर वह जैसे पहली बार सुकून की सांस लेने लगी और शोख हवाओं को अभी ही मस्ती सूझ पड़ी. इन के गुदगुदाते स्पर्श ने उन्हें इस कदर बेकाबू कर दिया कि वे दोनों हरसिंगार के फूलों की तरह एकदूसरे पर बिछबिछ गए. अब मेहुल समझ रहा था कि पतिपत्नी बन जाने के बाद भी शोखियों की कारगुजारियां कितनी मदमस्त और जिंदादिल होती हैं और रिश्तों की मजबूत बुनावट के लिए कितना जरूरी भी.

बुझते दीये की लौ

अपने वीरान से फ्लैट से निकल कर मैं समय काटने के लिए सामने पार्क में चला गया. जिंदगी जीने और काटने में बड़ा अंतर होता है. पार्क के 2 चक्कर लगाने के बाद मैं दूर एकांत में रखी बैंच पर बैठ गया. यह मेरा लगभग रोज का कार्यक्रम है. मैं अंधेरा होने तक यहीं पड़ा रहता हूं.

बाग के पास कुछ नया बन रहा था. वहां की पहली सीढ़ी अभी ताजा थी इसलिए उस को लांघ कर सीधे दूसरी सीढ़ी पर पहुंचने में लोगों को परेशानी हो रही थी. मैं लोगों की असुविधा को देखते हुए हाथ बढ़ा कर उन्हें ऊपर खींचता रहा. बडे़बूढ़ों का पांव कांपता देख मैं पूरी ताकत से उन्हें ऊपर खींच रहा था पर आहिस्ता से.

‘हाथ दीजिए,’ कह कर मैं लगातार उस औरत को आगे आने को कहता और वह हर बार हिचकिचा कर सीढि़यों की बगल में खड़ी हो जाती. हलके भूरे रंग के सूट के ऊपर सफेद चुन्नी से उस ने अपना सिर ढांप रखा था. मैं ने फिर से आग्रह किया, ‘‘हाथ दीजिए, अब तो अंधेरा भी शुरू होने वाला है.’’

उस ने धीरे से मुझे अपना हाथ पकड़ाया. मैं ने जैसे ही उस के हाथ को स्पर्श किया उस के कोमल स्पर्श ने मुझे भीतर तक हिला दिया. इसी प्रक्रिया में उसे सहारा देते समय उस की चुन्नी सिर से ढलक कर कंधे पर आ गई. उस ने मुझे देखते ही कहा, ‘‘तब तुम कहां थे जब मैं ने इन हाथों का सहारा मांगा था?’’

‘‘तुम नूपुर हो न,’’ मैं ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘शुक्र है, तुम्हारे होंठों पर मेरा नाम तो है,’’ कहतेकहते उस की आंखों में पानी आ गया और वह सीढि़यों से हट कर एक कोने में चली गई. मैं भी उस के पीछेपीछे वहां आ गया. वह बोली, ‘‘मैं ने परसों तुम को पार्क में देखा तो इन आंखों को सहज विश्वास ही नहीं हुआ कि तुम ही हो. कैसे हो?’’

‘‘ठीक ही हूं,’’ मैं ने बुझे मन से कहा और उस का पता जानने के लिए अधीर हो कर पूछा, ‘‘यहां कहां रहती हो?’’

‘‘सैक्टर 18 में. मेरे बडे़ भाई वहीं रहते हैं. जब मन बहुत उदास हो जाता है तो यहां आ जाती हूं.’’

मैं उस के चेहरे को देखता रहा. उस के बाल समय से पहले सफेदी पर थे पर उस की सफेद चुन्नी और सूनी मांग देख कर मैं सहम सा गया. कुछ भी पूछने की हिम्मत नहीं जुटा सका. दोनों के बीच में सन्नाटा पसर गया था. भाव व्यक्त करने के लिए शब्दों का अभाव लगने लगा. वर्षों की चुप्पी के बाद भी शब्दों को तलाशने में बहुत समय लग गया. खामोशी को तोड़ते हुए मैं ने कहा, ‘‘चलो, दूर पार्क में चल कर बैठते हैं.’’

एक आज्ञाकारी बच्ची की तरह वह मेरे साथ चल दी थी. उस के बारे में सबकुछ जानने के लिए मैं बेहद उतावला हो रहा था पर बातें शुरू करने का सिरा पकड़ में नहीं आ रहा था.

मरकरी लाइट के पोल के पास नीचे हरी घास में हम दोनों एकदूसरे की मूक सहमति से बैठ गए, ठीक वैसे ही जैसे बचपन में बैठा करते थे. उस के शरीर से छू कर आने वाली ठंडी हवा मुझे भीतर तक सुखद एहसास दे रही थी.

‘‘और कौनकौन है यहां तुम्हारे साथ?’’ मैं ने डूबते हुए दिल से पूछा.

‘‘कोई नहीं. बस मैं, भैयाभाभी और उन की एक 8 साल की बेटी. और तुम्हारे साथ कौन है?’’

‘‘बस, मैं ही हूं,’’ मेरा स्वर उदास हो गया.

बातोंबातों में उस ने बताया कि शादी के 10 साल बाद ही उस के पति एक सड़क दुर्घटना में चल बसे थे. एक बेटी है जो वनस्थली में पढ़ती है और वहीं होस्टल में रहती है. संयुक्त परिवार होने के नाते सबकुछ वैसा चला जो नहीं चलना चाहिए था. उस घर में रहना और ताने सहना उस की मजबूरी बन चुकी थी. पति के गुजर जाने के बाद कुछ दिन तो सहानुभूति में कट गए, उस के बाद सब ने अपनेअपने कर्तव्यों से इतिश्री मान ली.

पिछले साल बेटी के होस्टल जाने के बाद थोड़ी राहत सी महसूस की पर मन बहुत ही उदास और अकेला हो गया. जिंदगी की लड़ाइयां कितनी भयंकर होती हैं, मन बहुत उदास होता है तो कुछ दिनों के लिए यहां चली आती हूं. यह सब बताने के बाद वह बिलखती रही और मैं पाषाण बना चुपचाप उस का रुदन सुनता रहा. मेरे मन में इस इच्छा ने बारबार जन्म लिया कि किसी न किसी बहाने उसे स्पर्श करूं, उस को सीने से लगाऊं, उस के लंबे केशों को सहला कर उसे चुप करा दूं पर शुरू से ही संकोची स्वभाव का होने के कारण कुछ भी न कर पाया.

मेरी आंखें भर आईं. मैं मुंह दूसरी तरफ कर के सुबकने लगा. एक लंबी ठंडी सांस ले कर मैं ने कहा, ‘‘पता नहीं यह संयोग है कि तुम्हें एक बार फिर से देखने की हसरत पूरी हो गई.’’

बातों का क्रम बदलते हुए उस ने अपनी आंखों को पोंछा और बोली, ‘‘तुम ने अपने बारे में तो कुछ बताया ही नहीं.’’

‘‘मेरे पास तुम्हारे जैसा बताने लायक तो कुछ नहीं है,’’ मैं ने कहा तो गहरे उद्वेग के साथ कही गई मेरी बातों में छिपी वेदना को उस ने महसूस किया और मेरा हाथ जोर से दबा कर सबकुछ कह कर मन हलका करने का संकेत दिया.

‘‘अपने से कहीं ऊंचे स्तर के परिवार में मेरा विवाह हो गया. पत्नी के स्वच्छंद व स्वतंत्र होने की जिद ने मुझे डंस लिया. अत्यधिक धनसंपदा ने भी इस को मुझ से दूर ही रखा. बातबात पर झगड़ कर मायके जाना और मायके वालों का मेरी पत्नी पर वरदहस्त, कुल मिला कर हमारी बीच की दूरियां बढ़ाता ही रहा. वह चाहती थी कि मैं घरजमाई बन कर हर ऐशोआराम की वस्तु का उपभोग करूं मगर मेरे जमीर को यह मंजूर नहीं था. 1-2 बार मेरे मातापिता उसे मनानेसमझाने भी गए पर उन्हें तुच्छ व असभ्य कह कर उस ने बेइज्जत किया. फिर मैं वहां नहीं गया.

‘‘मेरे जुड़वां बेटाबेटी हैं, उसी के पास रहते हैं. जब कभी मेरा मन बच्चों से मिलने को चाहता है, मैं उन्हें कहीं बाहर बुला कर मिल लेता हूं. उन के मन में मेरे प्रति न प्यार है न नफरत. जब से मेरे ससुरजी का देहांत हुआ है, उस ने दोनों बच्चों को होस्टल में भेज दिया है. पत्नी के मन में आज भी मेरे प्रति नफरत कूटकूट कर भरी है. सारा जीवन यों ही बीत गया.

‘‘जीवन कैसा भी बीते, पर उसे छोड़ने का मन ही नहीं करता. धीरेधीरे यह दर्द मेरे जीवन का हिस्सा बन गया है, फिर तो अकेले ही जिंदगी जीने की जंग शुरू हो गई जो आज तक चल रही है. मैं पिछले 3 सालों से इसी शहर में हूं और पास ही के एक बैंक में मैनेजर हूं. बस, यही है मेरी कहानी.’’

हम दोनों ही अतीत की यादों में खो गए. जिंदगी की किताब के पन्ने पलटते रहे और एकएक पड़ाव जांचते रहे. यही भटकाव कभीकभी आदमी के भविष्य की दिशा तय कर देता है. रात काफी घिर चुकी थी. बड़े बेमन से हम ने एकदूसरे से विदा ली.

नूपुर से मिलने के बाद मेरा दिल बहुत बेचैन हो गया था. खाना खाने का मन नहीं था इसलिए महरी को दरवाजे से ही वापस भेज दिया. मैं चाय का गिलास लिए ड्राइंगरूम में बैठ गया. सहसा स्मृति कलश से फिर एक स्मृति उभर कर मुझे कई बरस पीछे ले गई. मेरे विचारों के तार कब अतीत से जुड़ गए, पता ही न चला.

उस छोटे से शहर में कालोनी के कोने वाले मकान में वे लोग नएनए आए थे. मां प्रतिदिन सवेरे टहलने जातीं तो नूपुर की मां का भी वही नित्यकर्म था. हम अपनीअपनी मां के साथ पार्क में आते और जब तक मां टहलतीं, हम पार्क में एक तरफ बैठ कर बातें करते रहते. हमउम्र होने के कारण हमारी आपस में बहुत बनने लगी. खेलतेखेलते कब जवान हो कर एकदूसरे के करीब आ गए, पता ही न चला.

दिन बीतते गए. हमारी खुशियों का कोई अंत नहीं था. मगर एक दिन सूर्योदय होने से पहले ही सूर्यास्त हो गया. उस के पिताजी को दिल का दौरा पड़ा और वे सदा के लिए संसार से कूच कर गए. इस तरह एक दिन उस परिवार पर कहर टूट पड़ा.

उस रोज की शाम हर रोज की तरह नहीं हुई. जब तक मैं कालेज से आया, उन का सामान ट्रक में लादा जा चुका था. पता चला वे लोग पूना अपने घर जा रहे हैं. मैं नूपुर से मिल भी नहीं सका. उस से मिलने की हसरत मन में सिमट कर रह गई. न तोप चली न तलवार, न सूई चली न नश्तर पर हृदय पर ऐसा गहरा आघात लगा कि मैं ठीक से संभल न पाया.

वह साल बेहद उदासी में बीता. मैं पार्क में बैठ कर पुरानी यादों को दोहराता रहता. मेरे पास उस का अब कोई संपर्क सूत्र भी नहीं था.

एम कौम करने के बाद मेरी बैंक में नियुक्ति हो गई तो मुझे देहरादून जाना पड़ा. बातों का सिलसिला इस के बाद जा कर थम गया. लेकिन उस की यादें मेरे मन में बनी रहीं.

एक बार दीवाली पर घर आया तो मां ने यों ही दिल के तार छेड़ दिए, ‘तुझे याद है, हमारे पड़ोस में वर्माजी रहते थे, वही जिन की बेटी नूपुर के साथ तू अकसर खेला करता था.’

‘हां,’ मेरा दिल धक से कर गया, ‘कहां है वह?’

‘पिछले दिनों उस की मां का फोन आया था. अपनी बेटी के रिश्ते की बात करने लगीं.’

‘तो क्या कहा आप ने?’ मैं ने उत्सुकता से सांसें थाम कर पूछा.

‘मैं भला क्या कहती. जब भी तुझ से रिश्ते की बात करती, तू टाल जाता था. मुझे लगा तेरे मन में कोई है और जब समय आएगा तू खुद ही बता देगा.’

‘नहीं मां, मेरे मन में ऐसा कुछ भी नहीं था, न है,’ मैं ने सारा संकोच त्याग कर मां से मनुहार की, ‘चाहो तो एक बार फिर से बात कर के देख लो.’

और जब तक मां ने बात की, बहुत देर हो चुकी थी. मां ने रोंआसी सी हो कर बताया कि नूपुर की शादी तेरे साथ करने को उन का बड़ा मन था और नूपुर की भी रजामंदी थी पर समय से मैं कुछ जवाब न दे सकी तो वे उदास हो गईं. अब तो नूपुर की सगाई भी हो चुकी है.

मेरा दिल भारी हो गया और अगले दिन ही मैं वापस देहरादून चला गया. उस जैसा फिर मन को कोई प्यारा न लगा. मैं ने उस का अस्तित्व ही भुला देना चाहा पर भूलने के लिए भी मुझे हमेशा याद रखना पड़ा कि मुझे उसे भूलना है जो सहज न हो सका.

आज इतने सालों के बाद सारी बातों की पुनरावृत्ति ने मुझे झकझोकर कर रख दिया. मैं ने धीरे से आंखें मूंद लीं पर फिर भी आंसू का एक कतरा न जाने कहां से निकल कर मेरे गाल पर आ गया.

अगले दिन सुबह घूमने के लिए मैं बाहर जाने लगा तो दरवाजे पर नूपुर को देख कर रुक गया. हैरानगी से पूछा, ‘‘नूपुर, तुम?’’

‘‘घूमने जा रहे हो, चाय नहीं पिलाओगे, देखूं तो तुम अकेले कैसे रह लेते हो.’’

उस के शब्दों के इस आक्रमण से मैं सकपका सा गया परंतु उस के साथ रहने का कोई मौका भी गंवाना नहीं चाहता था. सो बोला, ‘‘चलो, आज सैर रहने देता हूं.’’

‘‘नहीं, तुम जाओ, तब तक मैं चाय तैयार करती हूं,’’ अपने होंठों पर चिरपरिचित मुसकान के साथ नूपुर बोली, ‘‘नित्यकर्म नहीं छूटना चाहिए, चाहे शरीर छूट जाए,’’ उस ने यह उसी अंदाज में कहा जैसे पार्क का चौकीदार टहलने वालों से कहा करता था. हम दोनों बीती बातों को याद कर हंस पड़े.

वह मेरे साथ ही घर के अंदर आ गई. दिन पखेरू की तरह उड़ने लगे. जिंदगी ने खुद ही खुशनुमा वारदात की शुरुआत कर दी. हमारा मिलनाजुलना लगातार जारी रहा और निरंतर एकदूसरे को सहारा देते रहे. उस ने भी अपनी छुट्टियां बढ़वा लीं.

उस दिन दोपहर से ही मेरा मन बहुत बेचैन और क्षुब्ध था. शाम होतेहोते उस ने वह बात बता दी जो मैं पहले से ही जानता था. मेरे पास आते ही साड़ी के पल्लू को उंगलियों पर इस तरह लपेट रही थी जैसे कोई महत्त्वपूर्ण बात कहने की भूमिका सोच रही हो.

‘‘मेरे स्कूल की छुट्टियां समाप्त होने जा रही हैं, कल वापस चली जाऊंगी.’’ यह सुन कर मुझे काठ मार गया. मैं तड़प उठा. बेहद धीमी आवाज में डूबते हुए दिल से पूछा, ‘‘फिर कब लौटोगी, क्या फैसला किया है?’’

‘‘कुछ फैसले हिसाब लगा कर नहीं किए जाते, जिंदगी खुद ही कर देती है.’’

‘‘फिर भी?’’ मैं उस के मुंह से सुनना चाहता था.

‘‘मैं नहीं जानती,’’ वह रोंआसी सी हो गई, फिर खुद को नियंत्रित कर लड़खड़ाते शब्दों में पूछा, ‘‘तुम?’’

‘‘मेरा क्या है, जब तक मन चाहा, रह लूंगा. फिर ढलते सूरज का क्या पता कब अस्त हो जाए.’’

‘‘ऐसा क्यों कहते हो,’’ कहते हुए नूपुर ने मेरे कंधे पर सिर टिका दिया. मेरी सिसकियां रुलाई में फूट पड़ीं. प्रेम का एहसास इतना गहरा होता है, मैं ने कभी सोचा भी न था. हम एकदूसरे के बाहुपाश में बंध गए.

आखिर वह मनहूस घड़ी आ ही गई. मैं उसे स्टेशन तक छोड़ने गया. गाड़ी के जाने तक मैं भागदौड़ कर उस के लिए पानी और फलों का इंतजाम करता रहा. बड़े भारी मन से मैं ने उसे विदा किया. मुझे लगा, लगातार मेरे शरीर का एक हिस्सा कटता जा रहा है पर मुझे तो अपने हिस्से की पीड़ा भोगनी थी, उसे अपने हिस्से की.

नूपुर क्या गई, मेरा सारा सुखचैन ही चला गया. मुझे सबकुछ वीराना सा लगने लगा. बरसों तक जो बात सीने में छिपी थी वह फिर से पपड़ी पड़े घाव को कुरेद गई. वह न मिलती तो अच्छा था. मैं जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता था ताकि रास्ते में मुझे कोई रोता हुआ न देख ले.

नूपुर की यादों ने फिर मुझे तोड़ कर रख दिया. उस के बिना कुछ भी करने को मन न करता. जब मन ज्यादा बेचैन होने लगता तो उसे लंबेलंबे पत्र लिखता और फाड़ कर फेंक देता.

इस उम्र में जब मैं जिंदगी को समेटने में व्यस्त था, नूपुर के प्रति इतनी चाहत बनी रहेगी, यह पहले पता होता तो उस से कभी न मिलता. घंटे दिनों में बदल गए, दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में. हमारे बीच निरंतर संपर्क बना रहा. फोन की हर घंटी पर मैं दिल की धड़कन में तेजी महसूस करता.

मेरा वीआरएस (रिटायरमैंट) स्वीकृत हो गया. मैं ने शहर से दूर पहाड़ी पर बनी कालोनी में एक फ्लैट ले लिया और जब नूपुर को इस बारे में बताया तो वह बहुत खुश हुई. उस ने पूछा, ‘‘कब तक कब्जा मिलेगा?’’

‘‘वह सब तो मिल चुका है. बस, गृहप्रवेश बाकी है.’’

‘‘अच्छा, कब कर रहे हो गृहप्रवेश?’’

‘‘जब तुम आ जाओ. मेरा इस दुनिया में और है ही कौन? 14 मार्च ठीक रहेगी.’’

‘‘सम?ा गई, तुम्हारे जन्मदिन वाले दिन. इस से अच्छा और कोई दिन हो भी नहीं सकता. मैं कोशिश करूंगी पर मेरा इंतजार मत करना.’’

14 मार्च के दिन सुबह से ही मैं ने घर धुलवा कर गेंदे की 2 मालाएं दरवाजे पर लटका दी थीं और मौली में आम के पत्ते बांध कर ऊपर तोरण बांध दिया. मुझे मां के कहे शब्द अचानक याद आ गए. वे कहा करती थीं, ‘बाहर दरवाजे पर आम के पत्ते मौली में गूंथ कर जरूर बांधना क्योंकि आम हमेशा हराभरा रहता है.’

आम के पत्ते बांधने के बाद मेरी गृहस्थी कितनी हरीभरी रही, इस को देखने के लिए आज मां मेरे बीच नहीं थीं. उन के बारे में सोच कर मेरी आंखें भर आईं.

मैं मिठाई की दुकान से एक डब्बा काजू की कतली और नमकीन ले आया. दोनों ही नूपुर को बहुत पसंद थे. मुझे आशा ही नहीं, विश्वास भी था कि नूपुर यहां पहुंचने का हरसंभव प्रयत्न करेगी.

मुझे नूपुर का ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा. वह सीधी मेरे फ्लैट पर आ गई. उस के साथ उस की बेटी भी थी. एकदम वैसी ही जैसे नूपुर को मैं ने बचपन में देखा था. मुझे देख कर उस का चेहरा खिल उठा तो मन में आया कि उसे सीने से लगा लूं. आज मेरे बच्चे भी इतने ही बड़े होंगे. रुंधे गले से मैं इतना ही कह पाया, ‘‘काश, आज मेरे बच्चे भी होते.’’

‘‘यह भी तो तुम्हारी ही बच्ची है, फिर भी अपने बच्चों को देखना चाहते हो तो सामने देखो,’’ उस ने मेरे कंधों का सहारा ले कर सामने टैक्सी की तरफ इशारा किया, ‘‘मैं इन्हें होस्टल से ले कर आई हूं. मैं जानती थी कि पत्नी के मरने के बाद तुम इन की कमी महसूस करोगे.’’

‘‘क्या वह नहीं रही?’’ मैं चौंक गया.

‘‘उन्हें गुजरे तो 6 माह हो गए हैं. उन्होंने जानबूझ कर तुम को नहीं बताया,’’ फिर मुझे एक तरफ ले जा कर बोली, ‘‘इन बच्चों के मन में तुम्हारे प्रति यह कह कर जहर भर दिया गया है कि तुम उन की अंत्येष्टि में भी नहीं आए. बड़ी मुश्किलों और आश्वासनों के साथ इन को यहां लाई हूं.’’

मुझे अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था. मैं झट से नूपुर को साथ ले कर टैक्सी के पास गया और कस कर बच्चों से लिपट गया.
थोड़ी देर साथ रहने के बाद नूपुर वापस जाने लगी तो मेरा मन टूटने लगा. किस अधिकार से उसे रोकूं. फिर भी भरे कंठ से बोला, ‘‘रुक जाओ, नूपुर. मुझे इस तरह अकेला छोड़ कर मत जाओ.’’

वह खामोश असहजता को छिपाने का असफल प्रयत्न करती रही. उस की चुप्पी मुझे निराश कर गई. एक दीर्घ ठंडी सांस ले कर मैं ने पूछा, ‘‘नूपुर, क्या मेरा कोई अधिकार है तुम पर?’’

‘‘ऐसा शरीर में कोई कोना नहीं जहां तुम्हारा अधिकार न हो,’’ वह मेरी आंखों में झांकते हुए बोली थी. उस के शब्द मेरे दिल की गहराइयों में उतर गए. जैसे इस छोटे से वाक्य में जीवन का सारा निचोड़ समाया हो. फिर डबडबाई आंखों से बोली, ‘‘तुम क्या चाहते हो?’’

‘‘मैं तुम्हें चाहता हूं, नूपुर. क्या अब हम सब साथसाथ नहीं रह सकते?’’

‘‘तुम ने ऐसी वस्तु मांगी है जो पहले से ही तुम्हारी थी,’’ वह सिसकने लगी. शायद वह भी मुझ से सहारा चाहती थी.

मैं ने एक बार बच्चों की तरफ देखा. मेरे मन के भावों को पढ़ते हुए नूपुर बोली, ‘‘अब ये बच्चे इतने नादान नहीं हैं. मैं ने उन्हें अपने और तुम्हारे बारे में सबकुछ साफसाफ बता दिया है. कल पूरी रात बच्चे मेरे साथ थे. ये सबकुछ समझते हैं.’’

मैं ने दूर से बच्चों की तरफ देखा. तीनों बच्चे आंखों से इस रिश्ते को स्वीकार कर रहे थे.

समय कब, कौन सी करवट बदले कोई नहीं जानता. इस नए बंधन की ?ार?ारी हमारे मन के भीतर तक फैल गई.

अपनी फौजन को पत्र

घर से कोसों दूर, बीहड़ जंगलों में, बर्फीले इलाके में देश की सुरक्षा में तैनात फौजियों की जिंदगी क्या होती है यह तो वही जानते हैं, या फिर उन के घरवाले. फौजी की यह एक चिट्ठी सब बयां कर रही है.

प्यारी सिमरन, मैं लद्दाख में अपनी यूनिट में पहुंच गया हूं. चारों तरफ पहाड़ ही पहाड़ हैं. सिंगल पत्थर के पहाड़. हरियाली का कहीं नामोंनिशान नहीं है. पहाड़ों की चोटियों पर बर्फ जमी हुई है. सर्दी बहुत है. ठंडी हवाएं चलती हैं. औक्सीजन की कमी है. थोड़ा सा पैदल चलने पर भी सांस फूलने लगती है.

यहां दूरदूर तक फौजियों के अलावा कोई दिखाई नहीं देता. गांव दूरदूर हैं. कभी कोई मिल जाता है तो सभी खुश हो जाते हैं. जूले, लद्दाखी भाषा में नमस्कार को जूल कहते हैं, कह कर उन का स्वागत करते हैं. हां, हमारे यहां लेबर स्थानीय लोग हैं. वे ईमानदार और बहुत मेहनती हैं. कुछ अपने गांव से आते हैं और कुछ के रहने के लिए टैंट लगा रखे हैं. राशन सब को सेना देती है.

चांदनी रात है, चारों तरफ सन्नाटा है. मैं रात की ड्यूटी पर हूं. हवा बहुत तेज चल रही है. खुद को बचाने पर भी इस भयंकर सर्दी से बच नहीं पा रहा हूं. दुश्मन पर नजर है पर तुम्हारी याद दुश्मन पर भारी है. काश, तुम छम कर के मेरे पास आ जातीं तो मैं तुम्हें अपनी बांहों में भींच लेता. कुछ गरमाहट ही आ जाती. शरीर में सर्दी के कारण जो कंपकंपी आ रही है वह कुछ कम हो जाती पर यह संभव नहीं है.

मैं यहां तुम्हारी याद में तड़प रहा हूं. तुम वहां तड़पती होगी. देश की सुरक्षा भी तो जरूरी है. हम जागते हैं तो देशवासी सोते हैं. अच्छा, मेरी शन्नो, मेरी ड्यूटी खत्म हो रही है. मैं सोने जा रहा हूं. तुम तो नहीं हो लेकिन स्लीपिंग बैग को तुम समझ कर लिपट जाऊंगा. सर्दी तो नहीं जाएगी लेकिन कुछ गरमाहट का एहसास होगा. बाहर ड्यूटी पर जो कंपकंपी छूट रही थी, वह कम हो जाएगी लेकिन जब तक पैर गरम नहीं होंगे, नींद नहीं आएगी.

पैरों को रगड़ कर गरम करने की कोशिश कर रहा हूं. दोदो गरम जुराबें पहनने पर भी पैरों के गरम होने में टाइम लग रहा है. पूरे शरीर पर गरम कपड़े हैं लेकिन सर्दी नहीं जा रही. हमारे टैंटों में लगी बुखारी रात 10 बजे बंद कर दी जाती है. पैर रगड़ कर गरम करने के अलावा और कोई चारा नहीं है.

बहुत देर बाद सोया तो तुम्हारे सपने आते रहे. सपने में खूब प्यार करते रहे. पता ही नहीं चला कब रात बीत गई. तब जगा जब बैड टी आई. नित्य कर्म से मुक्त हो कर मैं स्टोर में चला आया था.

माइनस 20 डिग्री तापमान में नहाना किसी सजा से कम नहीं है लेकिन हफ्ते में 3 बार नहाना जरूरी होता है वरना शरीर में कई तरह की बीमारियां पनपने लगती हैं. हाथपैर की उंगलियां सूज कर गलने लगती हैं. उन्हें रोज गरम पानी में नमक डाल कर रखना पड़ता है. सुखा कर, अच्छी तरह फुटपाउडर लगा कर, जुराबें पहन कर सोना पड़ता है. होंठ फट जाते हैं. उन पर लिपसोल लगा कर स्टोर में जाना पड़ता है. नहाने के लिए गरम पानी उपलब्ध रहता है.

तुम चिंता मत करो, मैं यह सब कर लेता हूं. मैं ही नहीं, यूनिट के सब जवान अपनेआप को ठीक रखते हैं.

आज भी स्टोर में थोड़ी देर बैठा था. सर्दी इतनी थी कि लगा कुछ देर और बैठा तो जम जाऊंगा. स्टोर में रोज के काम निबटाने पड़ते हैं. आदेश ऐसे हैं कि अगर किसी का इयू आए तो वह स्टोर में जा कर इयू करेगा. फिर आ कर मेन औफिस में बैठेगा जहां बुखारी जलती रहती है. स्टोर में बुखारी नहीं जलाई जा सकती. आग लगने का खतरा रहता है.

स्टोर में या औफिस में बैठे भी मैं तुम्हें याद करता रहता हूं. सभी अपनीअपनी बीवियों को याद करते हैं. बच्चे भी उन्हें इतने याद नहीं आते. जिन की बीवियां नहीं होतीं वे किसी को भी याद कर लेते हैं. इन यादों में काफी गरमाहट रहती है. काफी देर सन्नाटा छाया रहता है.
हमारा एक स्टोरकीपर नईनई शादी कर के आया था. हमारा हवलदार उसे छेड़ने लगता है, ‘सुना भई सतनामे, तेरी खंड दी बोरी कैसी है? कोरी मिली या पुरानी फटी हुई थी?’

नई शादी की हुई को खंड की बोरी कहते हैं. हम सब के चेहरों पर मुसकराहट फैल जाती है. देखें सतनाम क्या जवाब देता है. वह बेचारा बहुत देर तक शर्म के मारे कुछ बोल नहीं पाया. जब बोला तो सब खिलखिला कर हंस पड़े थे. ‘कोरी थी जी, पुरानी क्यों मिलेगी?’

उसी हवलदार ने फिर छेड़ा, ‘अच्छा, कोरी होने पर भी कहांकहां से सिली हुई थी?’

सतनाम इस का जवाब नहीं दे पाया. उसे और छेड़ने लगे तो हमारे कमांडिंग अफसर साहब आ गए. उन के चेहरे पर भी मुसकराहट थी, कहा, ‘मुंडे नू ज्यादा न छेड़ो, नहीं तो मु?ो इसे छुट्टी पर भेजना पड़ेगा. क्यों सतनामे, छुट्टी जाएगा?’

‘हां जी, सर,’ उस ने ऐसे बोला जैसे ‘हां जी, नहीं बोला, तो छुट्टी नहीं मिलेगी.’

‘ठीक है, हैडक्लर्क साहब, इसे 20 दिनों की छुट्टी पर आज ही भेजो. नई खंड दी बोरी पुरानी कर के आएगा,’ कह कर वे हंसते हुए अपने कमरे में चले गए थे.

सभी खिलखिला कर हंस पड़े थे. हवलदार मेजर बोले, ‘लै भई सतनामे, मजाकमजाक में तेरी छुट्टी दा कम बन गया. हुन बोरी नू कोरी नहीं रखना.’

सतनाम बेचारा ‘जी’ भी नहीं कह पाया. छुट्टी पर जाने की तैयारी के लिए वह वहां से भाग गया था.

मेरी सोहनी, फौज में हमारे मनोरंजन के यही साधन हैं. एकदूसरे को छेड़ लेते हैं. नहीं तो दूरदूर तक कोई छेड़ने वाला नहीं मिलता. अभी परसों की बात है, एक जवान हरियाणा से छुट्टी काट कर आया था. सभी औफिस में बैठ कर आग ताप रहे थे. एक क्लर्क ने हरियाणवी में पूछा, ‘सुना भई, छोरे जींद के, के हाल सै तेरी बहू का?’

वह जवान गुस्सा हो गया, कहा, ‘मैं इतना लंबा सफर कर के, थक कर वापस आया हूं. तुम मेरे बारे में पूछने के बजाय मेरी बहू के बारे पूछ रहे हो?’

‘गुस्सा न कर छोरे जींद के. तुम तो उसे सहीसलामत दिखाई दे रहे हो, इसलिए उस ने तुम्हारी बहू के बारे पूछा था,’ हवलदार मेजर ने अपना तर्क देते हुए जवान को समझाने की कोशिश की. मजे की बात यह होती है कि हरियाणा में वह कहीं का भी रहने वाला हो उसे छोरा जींद का ही बुलाया जाता है. चाहे वह लाख कहे कि वह जींद का नहीं, फरीदाबाद का है या रिवाड़ी का. मेन मकसद होता था छेड़ना और खुश रहना. यही हमें अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए ऊर्जा देता है. हम अपनी ड्यूटी ठीक से कर पाते हैं.

अभी देखो न सिपाही हरनाम सिंह को. वह 18 साल का हुआ था. शादी करने जा रहा था. उसे कुछ नहीं पता था कि सुहागरात में क्या करना होता है. उस ने अपने टैंट में जा कर अपने उस्ताद से पूछा. उस्ताद ने कहा, ‘यह तो कान में बताने वाली बात है.’

कान में उस्ताद ने क्या कहा, उस समय तो पता नहीं चला, बाद में हमें फिर बताया तो हमारा हंसहंस कर बुरा हाल था. मैं ने उस्ताद से कहा, ‘यह आप ने क्या कह दिया. बेचारी सारा दिन अपने बालों को धोती रहेगी तो भी साफ नहीं होंगे.’

‘कुछ नहीं होगा. वह शहर की लड़की से शादी करने जा रहा है, वह सब बता देगी.’

‘वह तो ठीक है पर फिर बेइज्जती फौज की होगी कि इतना बड़ा जवान हो गया है लेकिन फिर भी फौज ने कुछ नहीं सिखाया है.’

‘मैं ने उसे सिखा दिया है. परिणाम अच्छा ही होगा,’ उस्ताद अपनी बात पर अड़े रहे और हम सब हंसते रहे.

जब वह छुट्टी से वापस आया तो उस का चेहरा देखने लायक था, ‘क्या, उस्ताद, आप ने गलत बता दिया. वह तो मेरी मोरनी नू पता सी कि वहां नहीं यहां सुहागरात मनाई जाती है.’

उस की बात सुन सारी यूनिट बहुत दिनों तक हंसती रही. हमारे कमांडिंग अफसर को पता चला और वे उसे देखते ही हंस पड़ते जबकि वह शर्म से भाग जाता. उस की छुट्टी बाकी थी. उसे तुरंत छुट्टी पर भेज दिया गया. वापस आया तो बहुत खुश था.

किसी के घर में खुशी हो जाए, पूरी यूनिट खुश हो जाती है.

अगर किसी के घर से दुख का समाचार आए या किसी के घर में मौत हो जाए तो सारी यूनिट को दुख होता है, अफसोस होता है. उसे तुरंत छुट्टी पर भेजा जाता है. हम फौजी कई बार घर से इतनी दूर होते हैं कि दुख में समय पर घर नहीं पहुंच पाते. रास्ते की कठिनाइयां. बर्फ से रास्तों का बंद होना. ट्रांजिट कैंप में रुके रहना. मौसम खराब होने पर फ्लाइट का कईकई दिन न मिलना. मुख्य कारण होते हैं. जैसे मैं बेबे के चोला छोड़ने पर टाइम पर नहीं पहुंच पाया था. सभी गुस्सा थे. ऐसी मजबूरियां हर फौजी के साथ होती हैं.

हमारे पत्रों पर किसी शहर का नाम नहीं होता है. 56 एपीओ या 99 एपीओ लिखा मिलता है. सारे पत्र पहले इन एपीओज के हैडक्वार्टर्ज में जाते हैं. उन्हें पता होता है कि कौन सी यूनिट कहां पर है. उस के अनुसार, वे आगे आर्मी पोस्टऔफिस को भेजते हैं. कहीं डाक ट्रेन से जाती है. कहीं प्लेन से. कहीं ड्रौप होती है, कहीं तो ऐसे बीहड़ रास्ते हैं कि डाक हाथी ले कर जाते हैं. जवान तक पत्र पहुंचने में कईकई दिन लग जाते हैं. तार भी पहुंचने में समय लगता है. इसी तरह मेरे पत्र पहुंचने में भी देरी होती है. अगर ऐसा हो तो चिंता न किया करो. हमारा पहला काम घर में पत्र लिखना ही होता है.

मेरी प्यारी सिमरन, तू अपना खयाल रखना. सोहनी बन के रहना. तू पिछली बार कह रही थी कि तैनू वदिया मेकअप बौक्स चाहिए. कैंटीन में मैक्सफैक्टर कंपनी के मेकअप बौक्स आए थे. मैं ने तेरे लिए एक खरीद लिया है. उस में लाली है, लिपस्टिक है, कई रंगों की नेलपौलिश हैं, बेस पाउडर है. थोड़ा भी मेकअप करने पर तू बहुत सोहनी लगेगी. प्यार करन दा मजा आएगा. होर भी जो कहेगी, बाजार से ले दूंगा.

वैसे, तैनू फैमिली अलौटमैंट दा मनीऔर्डर मिल रहा होगा. पैसे बच जाएं तो तेरे झुमके ले लेंगे. अगर कोई जवान बौर्डर पर पोस्ट हो तो अपने वेतन का 80 प्रतिशत अपनी पत्नी को फैमिली अलौटमैंट से भेज सकता है. उस का रिकौर्ड औफिस हर महीने मनीऔर्डर द्वारा भेजता रहता है. मनीऔर्डर का सारा खर्चा सरकार उठाती है. जवान को फिक्र नहीं रहती कि घर में पैसा नहीं पहुंच रहा है.

पिछली बार तुम ने पूछा था कि यहां खाना कैसा मिलता है? यहां खूब बढि़या खाना मिलता है. ब्रेकफास्ट में 4 पूरियों के साथ 2 अंडों की भुर्जी मिलती है. साथ में तेज गरम चाय होती है. यहां फ्रैश दूध तो मिलता नहीं है, पाउडर के दूध की चाय बनाई जाती है. इस से पहले मलटी विटामिन की एक गोली और विटामिन सी की 2 गोलियां खानी पड़ती हैं. नहीं खाएं तो भूख नहीं लगती. 8 बजे तक ब्रेकफास्ट कर के सब अपने काम पर चले जाते हैं. एक बजे लंच होता है. उस में दाल, चावल, सब्जी रोटियां, रायता मिलता है. यह नहीं कि एक बार मिल गया तो दोबारा नहीं मिलेगा. पेटभर खाना मिलता है.

डिनर में भी यही सब मिलता है. हफ्ते में 3 दिन मीट मिलता है. जो मीट नहीं खाते उन्हें 2 अंडों के हिसाब से अंडाकरी मिलती है और जो बिलकुल पंडित हैं, उन के लिए पाउडर के दूध की खीर बनती है. वैसे, पंडित बहुत कम होते हैं. मीट नहीं तो अंडा खा ही लेते हैं.

3 महीने जब रास्ते खुलते हैं तब सप्लाई डिपो इन का स्टौक कर लेता है. सब्जियां, मीट और फल टिन्ड में आते हैं. मौसम ठीक हो तो हमारी सरकारी और प्राइवेट डाक एयरड्रौप की जाती है. इन सब का प्रबंध करने के लिए अलगअलग यूनिटें हैं. सब अपनाअपना कार्य सुचारु रूप से करती हैं. किसी चीज की मुश्किल नहीं होती और न ही कमी होती है. तीन साल का स्टौक मेनटेन किया जाता है. कोई ज्यादा बीमार हो जाए तो हैलिकौप्टर से तुरंत उसे बड़े अस्पताल में शिफ्ट किया जाता है. इस के लिए हर ब्रिगेड में मैडिकल यूनिट होती है.

बस सिमरन, दिन तो किसी न किसी तरह गुजर जाता है लेकिन रात गुजारनी मुश्किल होती है. उस समय तुम्हारी कमी बहुत खटकती है. यह बौर्डर एरिया है. यहां फैमिली क्वार्टर नहीं होते हैं. किसी की फैमिली यहां नहीं आ सकती है. बौर्डर पर छिटपुट घटनाएं होती रहती हैं. लड़ाकू फौज के जवान उन से लड़ते रहते हैं. बिना फैमिली के 3 साल यहां रहना बहुत कठिन होता है. लेकिन देश की सुरक्षा के लिए सभी खुशीखुशी रहते हैं. पता होता है, 3 साल बाद फैमिली स्टेशन मिलेगा तो सभी की बीवियां उन के साथ होंगी.

इस बीच, तुम जानती हो कि हर साल 60 दिन की वार्षिक छुट्टी मिलती है और 30 दिन की कैजुअल लीव मिलती है. जिसे कोई भी जवान साल में 2 बार ले सकता है. मैं अभी छुट्टी काट कर आया हूं. कोशिश करूंगा, मैं तब छुट्टी आऊं जब तुम्हारी डीलीवरी का टाइम हो. पर सिमरन, कई बार यादें भी मुक जाती हैं. फिर रातें सूनी हो जाती हैं.

रातभर सो नहीं पाता हूं. चांदनी की रोशनी में सारीसारी रात तेरी याद सताती है. उधर तुम तड़पती होगी. तेरा आंसुओं से भरा चेहरा मेरे सामने आ जाता है. यह कैसी तड़पन है, कैसी विरह है जो हम दोनों को तड़पाती है? किसी लड़की को फौजन नहीं बनना चाहिए. तुम्हारा तो मुझ से भी बुरा हाल होगा. दूरदूर तक कोई अपना दिखाई नहीं देता होगा. मैं हौसला भी कैसे दूं. मैं खुद डोलता रहता हूं. फौजियों की तरह फौजनें भी शहीद होती रहती हैं. बच्चों को भी अभाव रहता है. सभी मुश्किलों का सामना खुद करना पड़ता हैं. फौजी तो लड़ कर शहीद होते हैं. फौजनें तो रोज शहीद होती रहती हैं. तकलीफों में भी काम करना पड़ता है. हमें तो बनाबनाया खाना मिल जाता हैं. तुम्हें सबकुछ खुद करना पड़ता है. तकलीफ होने पर भी. मैं दूर बैठा कुछ नहीं कर पाता हूं.

इस समय जबकि तुम गर्भवती हो, मुझे तुम्हारे पास होना चाहिए था. मेरी मजबूरी देखो कि मैं यहां लद्दाख में बैठा हूं. शरीर में हो रही तकलीफों को जो केवल तुम मुझ से शेयर करना चाहती हो, नहीं कर पाती हो. बौर्डर एरिया के कारण मोबाइल नैटवर्क नहीं है. हमारे मैसेज के इंटरसैप्ट होने का खतरा बना रहता है. हमारी लोकेशन का पता चल जाता है. हमारे पास चिट्ठियां लिखने के अलावा रास्ता नहीं है. वे भी सुरक्षा कारणों से सैंसर हो कर जाती हैं. मजबूरी यह कि प्यार की बातें लिखी नहीं जा सकती हैं. कोई पढ़ ले, तो? किसी ने कोई कोड वर्ड सैट किया हो तो उस से पूछा जाता है कि इस का क्या मतलब है. सतनामे ने अपनी चिट्ठी में कोड वर्ड लिखना ही छोड़ दिया. प्यार की बातें कोई लिख ही नहीं पाता. यह सब सुरक्षा कारणों से होता है. कोई कुछ नहीं कर पाता है.

जानता हूं, वहां मिलिट्री अस्पताल की सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं लेकिन फिर भी मेरा वहां होना तुम्हारे मौरैल को ऊंचा करता है. तुम हंसतेहंसते सारी तकलीफें सह लेतीं. बौर्डर पर हर रोज हम दुश्मनों से लड़ते हैं. हमारे साथ और जवान भी होते हैं. तुम तो हम से भी बड़ी लड़ाई लड़ रही हो, अकेले. तुम हम से भी बहादुर हो. सभी फौजनें बहादुर हैं. लड़ाई हिम्मत और बहादुरी से लड़ी जाती है.

यह अच्छा किया कि तुम ने अपने भाई को बुला लिया. रोजरोज की चीजों के लिए तुम्हें बाजार नहीं जाना पड़ेगा. तुम अपने भाई से मंगवा सकती हो. तकलीफ होने पर वह तुम्हें अस्पताल भी ले कर जा सकता है. मेरी फिक्र कम हो गई. बस, समयसमय पर अस्पताल चेकअप के लिए जाती रहना. मिलने वाली दवाइयां खाती रहना. अभी तो टाइम है. समय रहते मैं तुम्हारे पास पहुंच जाऊंगा. रात को तकलीफ हो तो वहां 24 घंटे डाक्टर और ऐंबुलैंस रहती हैं तुरंत रिपोर्ट करना. वे संभाल लेंगे. यह तब करना है अगर मैं टाइम पर पहुंच नहीं पाता हूं तो.

अपने भाई से कहना, सारे काम स्कूटर पर किया करे. सामान लाने में सहूलियत रहेगी. तुम स्कूटर पर बैठो तो ध्यान से बैठना. वह स्कूटर ध्यान से चलाए.

अच्छा सिमरन, पत्र बहुत लंबा हो गया है. अपना खयाल रखना. अपने भाई को प्यार देना.

तुम्हारा फौजी

Bricks, UN, G20, ASEAN, SARC, NATO क्‍यों बने, भारत किस कैंप में और क्‍यों ?

बीते साल 9 और 10 सितंबर, 2023 को 18वें G20 शिखर सम्मेलन का आयोजन भारत में हुआ. यह पहली बार था जब भारत ने G20 देशों के शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की.  हर साल एक नए देश को अपनी बारी आने पर मेजबानी करने का मौका मिलता है. विश्व को एक परिवार बताने वाली मेजबान सरकार देश के अंदर बांटो और राज करो की नीति पर चलती है, यह बात भी दुनिया की निगाहों से छुपी हुई नहीं थी. लिहाजा मोदी सरकार द्वारा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का राग अलापना हास्यास्पद ही था.

अबकी साल 22 अक्टूबर 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 16वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने रूस के कजान शहर गए. गोदी मीडिया में इसकी खूब चर्चा हुई. प्रधानमंत्री मोदी के रूस में हुए भव्य आदरसत्कार का भी खूब गुणगान हुआ. रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ उनकी फोटो भी खूब वायरल हुई. इस साल ब्रिक्स समिट में मूल सदस्यों के साथ ईरान, मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल हुए हैं.

दरअसल दुनिया में अनेक देशों ने मिल कर अपने अपने कुछ खेमे बना रखे हैं एक जैसी राय रखने वाले देशों के यह खेमे एक दूसरे के साथ निवेश, व्यापार, रक्षा,हथियार सप्लाई आदि में सहयोग करने की बात कहते हैं. इन संगठनों के बारे में कहा जाता है कि अनेक देशों की इस एकजुटता से बहुत सारे छोटे देशों को ताकत मिलती है. बड़े और ताकतवर देशों की गलत हरकतों के खिलाफ यह एकजुटता बड़ा काम भी कर जाती है. पर सत्य इसके विपरीत ही खड़ा दिखता है. इन बड़े बड़े देशों की एकजुटता के बावजूद सीरिया की हालत बदतर हो गयी. अफगानिस्तान रूढ़िवादी कट्टर तालिबान के कब्जे में आ गया. रूस और यूक्रेन युद्ध एक लम्बे समय से जारी है. दोनों देशों में तबाही मची हुई है. लाखों की संख्या में दोनों ही देशों में आम नागरिक बेघर, बदहवास घूम रहा है. भव्य इमारतें जमींदोज हो रही हैं, लाखों लोग मारे जा चुके हैं. दोनों देशों की आर्थिक स्थिति डांवाडोल है. यही हालत इजरायल और फिलिस्तीन की है. अब ईरान पर भी बमबारी हो रही है. सब मरे कटे जा रहे हैं. ड्रोन बमों के धमाकों से धरती थर्रा रही है. मगर बड़े बड़े देशों की खेमेबाजी जारी है. संगठनों के बड़े बड़े आयोजन हो रहे हैं, भाषणबाजियां हो रही हैं, सर्वसम्मति बन रही है, मेजें थपथपा कर एक दूसरे को शाबाशी दी जा रही है.

आखिर ये ब्रिक्स, यूएन, जी 20, आसियान, सार्क, नाटो जैसे संगठन क्या हैं? यह संगठन क्यों बनाये गए? किन देशों ने बनाये और अनेक देशों में इनके सम्मेलन क्यों आयोजित होते हैं? क्या इस प्रकार के आयोजन इन देशों की जनता के जीवन स्तर को ऊपर उठाते हैं? उनकी प्रतिव्यक्ति आय बढ़ाते हैं? उन्हें गरीबी और भुखमरी से निकालते हैं? बेरोजगारी को कम करते हैं? इन तमाम सवालों के जवाब भारत के परिपेक्ष्य में तो ‘न’ ही हैं. बीते दस सालों में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आये-दिन किसी ना किस सम्मेलन-आयोजन के न्योते पर रहते हैं, लेकिन उनकी इन यात्राओं से देश की जनता को रत्ती भर भी फायदा नहीं है.

सरकार भले कहती रहे कि हम दुनिया की सबसे बड़ी इकॉनमी बनने जा रहे हैं, विश्वगुरु बनने जा रहे हैं. मगर सच्चाई यह है कि टॉप-10 जीडीपी वाले देश में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय भारत की है. 90% भारतीय हर महीने 20 हजार रुपये से भी कम कमाते हैं. 80 करोड़ लोगों को सरकार खुद हर महीने 5 किलो मुफ्त अनाज बांट रही है. यानी सरकार भी यह मानती है कि देश की 80 करोड़ आबादी इतनी गरीब है कि वह अपने लिए दो वक्त का भोजन नहीं जुटा सकती.

टोटल जीडीपी कैलकुलेट करने के मौजूदा तरीकों से भले ही हम तीसरी और चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था के टैग का जश्न मना लें, लेकिन सही मायने में यह ग्रोथ का पैमाना नहीं हो सकता है. भारत की प्रति व्यक्ति आय मात्र 2.14 लाख रुपये है. दुनिया में छोटा सा कतर सबसे अमीर देश है, जिसकी प्रति व्यक्ति आय 1,24,930 डॉलर यानी 96 लाख रुपए से ज्यादा है. जर्मनी और कनाडा की प्रति व्यक्ति आय भारत से 20 गुना ज्यादा है. यूके की 18 गुना ज्यादा है, फ्रांस की प्रति व्यक्ति आय भारत से 17 गुना ज्यादा है. जापान और इटली की औसतन प्रति व्यक्ति आय 14 गुना अधिक है. भारत जिस चीन को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानता है, उसकी भी प्रति व्यक्ति आय भारत से 5 गुना ज्यादा और ब्राजील की 4 गुना ज्यादा है. चीन और ब्राजील ब्रिक्स के प्रथम सदस्यों में भारत और रूस के साथ के हैं.

अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय भारत से 31 गुना ज्यादा है. अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय के चौथाई तक पहुंचने में ही भारत को कम से कम 75 साल लगेंगे. वहीं चीन इस स्थिति में दस साल में ही पहुंच जाएगा. अगर 2047 तक भारत विकसित देशों के श्रेणी में आना चाहता है तो उसके लिए प्रति व्यक्ति आय को बढ़ाकर 13000 डॉलर के ऊपर ले जाना होगा.

ऑक्सफैम इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक आज भारत की 10 फीसदी आबादी का राष्ट्र की 77 फीसदी संपत्ति पर कब्जा है. राज्यों के बीच भी प्रति व्यक्ति आय में बहुत अधिक फर्क है. गोवा के लोग ज्यादा कमा रहे हैं और यूपी-बिहार के बहुत कम. इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में आर्थिक असमानता की खाई कितनी बड़ी हो चुकी है.

भारत में भुखमरी की स्थिति बहुत गंभीर है. वर्ष 2024 के वैश्विक भूख सूचकांक में 27.3 अंक के साथ भारत 127 देशों में 105वें स्थान पर है, जो भूख की ‘गंभीर’ श्रेणी कहलाती है. भुखमरी के मामले में भारत, अपने पड़ोसी देशों – पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भी गिरा हुआ है. विश्व स्तर पर बड़े बड़े संगठनों का सदस्य होने के बावजूद भारत की जनता में खुशहाली के लक्षण ढूंढने से भी नहीं मिलते हैं. अलबत्ता फौरन टूर पर जाते हुए प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर ख़ुशी टपकती जरूर दिखाई देती है.

हाँ, इतने वर्षों में हमने एक उपलब्धि जरूर हासिल की है. वह यह कि हम दुनियाभर में कम पगार पर मजदूर भेजने वाले देश के तौर पर पहचाने जाने लगे हैं. भारत के हिंदू मुस्लिम नागरिकों की बहुत बड़ी संख्या मुस्लिम देशों में मजदूरी करती है. भारत युद्धग्रस्त देशों में अपने मजदूर और कारीगर बड़ी संख्या में भेज रहा है. मोदी कार्यकाल में दुनिया को यह संदेश जरूर गया है कि अगर सस्ता मजदूर चाहिए तो भारत उपलब्ध करवा देगा. शर्मनाक !

हालत यह है कि हमारे देश की आतंरिक हालत ऐसी जर्जर है कि उच्च आमदनी वाले दस फ़ीसदी अमीर भी अब इस देश में रहना नहीं चाहते हैं. बड़ी संख्या में अमीर तबका देश छोड़ कर विदेशों में बस रहा है. वे अपने बच्चों को विदेशी स्कूलों-यूनिवर्सिटियों में पढ़ाते हैं क्योंकि तमाम संगठनों का सदस्य होने के बाद भी भारत में शिक्षा व्यवस्था और रोजगार देने की क्षमता बदहाल है.

ऐसे में सवाल उठता है कि विश्व स्तर पर दर्जनों संगठनों का सदस्य बन कर हम क्यों अपना पैसा उनकी मेजबानी या मेहमाननवाजी पर उड़ा रहे हैं? हमारे प्रतिनिधि करोड़ों-अरबों रुपये विदेश यात्राओं पर क्यों फूंक रहे हैं जब आमजनता को उससे कुछ नहीं मिल रहा है?

उल्लेखनीय है कि आज दुनिया भर में 300 से ज्यादा अंतर-सरकारी संगठन (IGO) हैं. संयुक्त राष्ट्र (यूएन) सबसे बड़ा और सबसे जाना पहचाना अंतर-सरकारी संगठन हैं. अंतर-सरकारी संगठन (IGO) शब्द का अर्थ संधि द्वारा निर्मित एक इकाई से है, जिसमें दो या दो से अधिक राष्ट्र शामिल होते हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि वे सामान्य हित के मुद्दों पर सद्भावनापूर्वक काम करते हैं. आइये एक नज़र इस प्रकार के संगठनों के कामों और उनकी संख्या पर डालते हैं –

संयुक्त राष्ट्र (यूएन)

संयुक्त राष्ट्र (यूएन) एक अंतर-सरकारी संगठन है जिसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करना, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना और राष्ट्रों के कार्यों में सामंजस्य स्थापित करने का केंद्र बनना है. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भविष्य के विश्व युद्धों को रोकने के उद्देश्य से की गई थी

संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में विश्व बैंक समूह, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व खाद्य कार्यक्रम, यूनेस्को और यूनिसेफ सहित कई विशेष एजेंसियां, फंड और कार्यक्रम भी शामिल हैं. संयुक्त राष्ट्र, इसके अधिकारियों और इसकी एजेंसियों ने कई नोबेल शांति पुरस्कार जीते हैं.

अपनी स्थापना के समय, संयुक्त राष्ट्र के 51 सदस्य देश थे परन्तु 2024 तक आते आते इसमें 193 देश हो गए हैं, जबकि 2 गैर-सदस्य ऑब्जर्वर देश – वेटिकन और फिलिस्तीन हैं.

उस समय का गुलाम भारत, संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्यों में से एक है. भारत, संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों और सिद्धांतों का समर्थन करता है. संयुक्त राष्ट्र में भारत के वर्तमान स्थायी प्रतिनिधि टी. एस. तिरुमूर्ति हैं. वे न्यूयार्क स्थित संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त हैं.

ब्रिक्स

ब्रिक्स पांच उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक अंतरराष्ट्रीय समूह है. इसके घटक राष्ट्र ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं. इन्हीं देशों के अंग्रेज़ी में नाम के प्रथमाक्षरों B, R, I, C व S से मिलकर इस समूह का यह नामकरण हुआ है. इसकी स्थापना 2009 में हुई. इस साल यानी 2024 में ब्रिक्स समिट में ईरान, मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे चार नए देश इसमें शामिल हुए हैं.

मूलतः 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल किए जाने से पहले इसे “ब्रिक” के नाम से जाना जाता था. रूस को छोड़कर ब्रिक्स के सभी सदस्य विकासशील या नव औद्योगीकृत देश हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है. ये राष्ट्र क्षेत्रीय और वैश्विक मामलों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं. एक अनुमान के अनुसार ये राष्ट्र संयुक्त विदेशी मुद्रा भंडार में 4 खरब अमेरिकी डॉलर का योगदान करते हैं. इन राष्ट्रों का संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद 15 खरब अमेरिकी डॉलर का है. ब्रिक्स देशों का वैश्विक जीडीपी में 23% का योगदान है तथा यह संगठन विश्व व्यापार के लगभग 18% हिस्से में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसे R-5 के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इन पांचों देशों की मुद्रा का नाम ‘R’ से शुरू होता है.

ब्रिक्स (BRICS) संगठन पूरी दुनिया की जनसंख्या का 41% हिस्सेदारी रखता है. अर्थात आप यह भी कह सकते हैं कि पूरी दुनिया में जितनी भी जनसंख्या है उसका 41% सिर्फ ब्रिक्स देशों में है. विश्व व्यापार में ब्रिक्स देशों की साझेदारी 16% के करीब है. इस प्रकार वर्तमान समय में ब्रिक्स का विश्व में काफी महत्व है.

आज के समय में ब्रिक्स की इतनी ज्यादा चर्चा इसलिए भी है क्योंकि इससे जितने भी देश जुड़े हुए हैं कहा जा रहा है कि उनके क्षेत्रीय कार्यों में ब्रिक्स अपना महत्वपूर्ण योगदान निभा रहा है. ब्रिक्स का प्रथम शिखर सम्मेलन 16 जून 2009 में येकातेरिनबर्ग, रूस में हुआ था. सम्मेलन का मुख्य मुद्दा वैश्विक आर्थिक स्थिति में सुधार और वित्तीय संस्थानों में सुधार का था. इसके बाद प्रत्येक वर्ष इन 5 देशों के सर्वोच्च नेताओं के द्वारा इस सम्मेलन को आयोजित किया जाता है. भारत ने भी 9 सितंबर 2021 को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी डिजिटल मोड में की थी.

ब्रिक्स संगठन के मुख्य तीन स्तंभ हैं – राजनीति और सुरक्षा, आर्थिक और वित्तीय संस्कृति और लोगों का आदान-प्रदान. अब तक ब्रिक्स देशों ने कई प्रतिस्पर्धी पहलों को लागू किया है, जैसे कि न्यू डेवलपमेंट बैंक, ब्रिक्स कंटिंजेंट रिजर्व अरेंजमेंट, ब्रिक्स पे, ब्रिक्स संयुक्त सांख्यिकीय प्रकाशन और ब्रिक्स बैसक रिजर्व मुद्रा आदि. ब्रिक्स के उद्देश्य हैं – सदस्य देशों में बच्चों की शिक्षा में सुधार करना, विकसित और विकासशील देशों के बीच में सामंजस्य बनाए रखना, आपसी देशों के अंदर राजनीतिक व्यवहार बना के रखना, दूसरे देशों के साथ आर्थिक मदद और सुरक्षा का व्यवहार बना कर रखना, देशों के अंदर विवादों का निपटारा करना एवं एक दूसरे देश की संस्कृति की रक्षा करना.

भारत को इससे कोई लाभ मिल रहा है कहना मुश्किल है क्योंकि इसमें दबदबा तो चीन और रूस का ही है. हम तो केवल 142 करोड़ की आबादी वाले देश होने के कारण यहां हैं. इस बार भी कोई ऐसा फैसला नहीं हुआ जिससे देश की जनता को कोई लाभ होता हो. ब्रिक्स देश भारतीयों को वीजा फ्री प्रवेश तक नहीं देते. एक दूसरे से सामान खरीदने पर कोई कस्टम ड्यूटी की छूट नहीं है. पांचों मूल देशों में वैचारिक स्वतन्त्रता न के बराबर है, भारत समेत. रूस भारत से मजदूरों को बुला रहा है पर उन्हें फिर यूक्रेन युद्ध में मोर्चे पर भेज रहा है. चीन भारत में अपना सामान बेच तो रहा है पर हमसे खरीद नहीं रहा. इतने सालों में भारत चीन सीमा विवाद भी पूरी तरह हल नहीं हुआ तो आखिर यह बैठकें किस काम की?

जी-20

साल 1999 में जब एशिया में आर्थिक संकट आया था, तब तमाम देशों के वित्त मंत्रियों और सेंट्रल बैंक के गवर्नरों ने मिलकर एक फोरम बनाने की सोची, जहाँ पर ग्लोबल इकनॉमिक और फाइनेंशियल मुद्दों पर चर्चा की जा सके. जी 20 की स्थापना सितम्बर 1999 में कई विश्व आर्थिक संकटों के जवाब में की गई थी. ग्रुप ऑफ़ ट्वेंटी (G20) में 19 देश और दो क्षेत्रीय निकाय शामिल हैं. वर्ष 2008 से यह वर्ष में कम से कम एक बार आयोजित होती है, जिसमें प्रत्येक सदस्य के सरकार या राज्य के प्रमुख, वित्त मंत्री या विदेश मंत्री और अन्य उच्च रैंकिंग वाले अधिकारी शामिल होते हैं. इनके अलावा अन्य देशों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और गैर-सरकारी संगठनों को भी शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है. जी 20 की पहली बैठक साल 2008 में अमेरिका के वाशिंगटन में हुई. अब तक इसकी कुल 17 बैठकें हो चुकी हैं. 2023 में इसकी 18वीं बैठक की मेजबानी भारत ने की थी.

वैसे तो इस ग्रुप का फोकस अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना रहा है, लेकिन वक़्त के साथ इसका दायरा बढ़ता रहा. इसमें टिकाऊ विकास, स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और भ्रष्टाचार विरोधी जैसे मुद्दे भी जुड़ते चले गए.

यह आर्थिक रूप से ताकतवर देशों का एक ग्रुप है. इसलिए यहां लिए गए फ़ैसलों से इंटरनेशनल ट्रेड काफ़ी हद तक प्रभावित हो सकता है. इसकी हर बैठक के अंत में जी 20 देशों के साझा बयान पर आम सहमति भी बनाई जाती है. इससे भारत को सीधा कोई लाभ नहीं मिला है, यह भी सिर्फ राष्ट्राध्यक्षों के मिलने का क्लब बन गया है.

नाटो

नाटो का मतलब है उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन. इसकी शुरुआत 12 देशों के बीच एक गठबंधन के रूप में हुई थी, जिसका उद्देश्य सामूहिक रूप से दुनिया भर में सुरक्षा प्रदान करना और शांति बनाए रखना था. उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन की स्थापना 1949 में संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और कई पश्चिमी यूरोपीय देशों द्वारा सोवियत संघ के विरुद्ध सामूहिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए नाटो की स्थापना की गई थी. नाटो पहला शांति कालीन सैन्य गठबंधन था जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका ने पश्चिमी गोलार्ध के बाहर प्रवेश किया था.

रूस नहीं चाहता कि यूक्रेन नाटो का सदस्य बने. क्यों? आखिर रूस को क्या एतराज है? दरअसल रूस और यूक्रेन में लम्बे समय से जंग छिड़ी हुई है. अगर यूक्रेन नाटो का सदस्य बनता है तो पश्चिमी ताकतें रूस के खिलाफ जंग लड़ने में यूक्रेन की मदद करेंगी. इसलिए रूस लगातार इस कोशिश में है कि यूक्रेन नाटो का सदस्य ना बनने पाए. नाटो के 32 वर्तमान सदस्य देश हैं और एक पर हमला सब पर संधि के अनुसार माना जाता है. नाटो के तीन सदस्य परमाणु हथियार वाले देश हैं : फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका. रूस को सबसे ज्यादा ख़तरा अमेरिका से है.

नाटो का गठन 4 अप्रैल 1949 को यूरोप और उत्तरी अमेरिका के 12 देशों द्वारा किया गया था. तब से, विस्तार के 10 दौर (1952, 1955, 1982, 1999, 2004, 2009, 2017, 2020, 2023 और 2024) के माध्यम से 20 और देश नाटो में शामिल हो चुके हैं. आज नाटो यूरोप और उत्तरी अमेरिका के 32 देशों का एक राजनीतिक और सैन्य गठबंधन है. नाटो यानी उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन का मुख्य उद्देश्य, राजनीतिक और सैन्य तरीकों से मित्र देशों की सुरक्षा और आजादी की रक्षा करना है. व्लादिमीर पुतिन का रूस इस संगठन से बहुत डरता है वरना वह कब का यूक्रेन सहित कई देशों पर कब्जा कर चुका होता.

आसियान

आसियान की स्थापना 8 अगस्त, 1967 को थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में हुई थी. आसियान के सदस्य देशों में ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, वियतनाम शामिल हैं, जो शुरू में साम्यवाद के प्रसार के खिलाफ एकजुट हुए थे. पिछले कुछ वर्षों में, आसियान ने आर्थिक, सुरक्षा और सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों का समाधान करते हुए क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ाने का प्रयास किया है.

आसियान का पहला उद्देश्य सदस्य देशों की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता को कायम रखने का है. इसके साथ ही इसकी कोशिश होती है कि झगड़ों का शांतिपूर्ण निपटारा हो. इस संगठन का सेक्रेटरी जनरल, आसियान द्वारा पारित किए प्रस्तावों को लागू करवाने और कार्य में सहयोग प्रदान करने का काम करता है. आसियान और भारत सिर्फ सामरिक सहयोगी ही नहीं है बल्कि उन्होनें आपसी व्यापार को भी बढ़ाया है. भारत पूर्ण सदस्य बन जाता तो कस्टम ड्यूटी में बहुत छूट मिलती जो अब सीमित ही है. यह एक प्रभावी संगठन है.

सार्क

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) एक क्षेत्रीय अंतर-सरकारी संगठन है. इसकी स्थापना 1985 में हुई थी और इसका मुख्यालय काठमांडू, नेपाल में है. दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) दक्षिण एशिया के आठ देशों से मिलकर बना एक अंतर-सरकारी संगठन है, जिसका लक्ष्य आर्थिक विकास और क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ावा देना है.

सार्क के आठ सदस्य देश हैं – अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका. भारत ने विभिन्न सार्क पहलों में सक्रिय रूप से भाग लिया है जिसका उद्देश्य अंतर-क्षेत्रीय व्यापार, संपर्क और लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करना रहा है. पूर्व में ब्रिटिश कोलोनी रहे ये देश आपस में झगड़ने के अलावा कुछ नहीं करते और सार्क निरर्थक सा हो गया है. भारत पाकिस्तान की दोस्ती तो अब कल्पना से परे है.

एशियाई-अफ्रीकी कानूनी परामर्शदात्री संगठन (AALCO)

एएएलसीओ की स्थापना 15 नवंबर 1956 में प्रसिद्ध “बांडुंग” सम्मेलन के परिणामस्वरूप हुई थी, जिसके बाद गुटनिरपेक्ष आंदोलन का विकास हुआ. यह एशिया और अफ्रीका का प्रतिनिधित्व करने वाला एकमात्र अंतर-सरकारी संगठन है और 1980 में इसे संयुक्त राष्ट्र में स्थायी पर्यवेक्षक का दर्जा मिला था. इसके संस्थापक सदस्य भारत, इंडोनेशिया, इराक, जापान, म्यांमार, श्रीलंका, मिस्र और सीरियाई अरब गणराज्य हैं. एएएलसीसी का मुख्यालय नई दिल्ली में है.

राष्ट्रों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण मंच है: इसके उद्देश्यों में अंतरराष्ट्रीय कानून के क्षेत्र में सहयोग और समान चिंता के कानूनी मामलों में एशियाई-अफ्रीकी सहयोग के लिए एक मंच के रूप में कार्य करना शामिल है. संगठन कानूनी निहितार्थों के साथ समान चिंता के मामलों पर सूचना और विचारों के आदान-प्रदान को भी प्रोत्साहित करता है और उन्हें संयुक्त राष्ट्र, अन्य संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के समक्ष प्रस्तुत करता है. क्या इस संगठन के सामने कभी भारत की न्याय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता, जल्दी न्याय प्रदान करने की जरूरत, न्यायविदों की संख्या बढ़ाए जाने के सम्बन्ध में विचार-विमर्श हुआ? क्या इस संगठन का सक्रिय सदस्य होने और नई दिल्ली में इसके आयोजनों के बावजूद हमारी न्याय व्यवस्था में कोई सुधार हुआ या आम नागरिक को न्याय मिलने में आसानी हुई? कभी नहीं. फिर ऐसे संगठनों का औचित्य क्या है?

साठ वर्ष से अधिक समय पहले जब एएएलसीओ की स्थापना की गई थी, तब कौन सोच सकता था कि भविष्य में इसकी भूमिका एक ऐसे मंच के रूप में होगी, जहां वन्यजीवों की अंतर-महाद्वीपीय तस्करी पर भी बात होगी. इस संगठन की बैठकों और कार्यक्रमों में अफ्रीका और एशिया के बीच संबंधों को और मजबूत करने एवं वन्यजीव अपराध से निपटने की दिशा में विचार विमर्श होता है. बावजूद इसके भारत के जंगलों में वन्य जीवों की हत्या, जिसमें हाथी, गेंडे, बाघ और शेर निरंतर ख़त्म होते गए, शिकारियों द्वारा इसकदर मारे गए कि अब तो यह विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं,

एडीबी – एशियाई विकास बैंक

एडीबी की परिकल्पना 1960 के दशक के प्रारंभ में एक ऐसे वित्तीय संस्थान के रूप में की गई थी, जिसका चरित्र एशियाई होगा और जो विश्व के सबसे गरीब क्षेत्रों में आर्थिक विकास और सहयोग को बढ़ावा देगा. एशियाई विकास बैंक (एडीबी) एक बहुपक्षीय विकास वित्तपोषण संस्था है जो एशिया और प्रशांत क्षेत्र में गरीबी को कम करने के लिए समर्पित है.

एशियाई विकास बैंक ( एडीबी ) 19 दिसंबर 1966 को स्थापित किया गया, जिसका मुख्यालय 6 एडीबी एवेन्यू, मंडलुयोंग, मेट्रो मनीला 1550, फिलीपींस में है. ताकेशी वतनबे एडीबी के पहले अध्यक्ष थे. 1960 के दशक के दौरान एडीबी ने अपनी अधिकांश सहायता सदस्य देशों के खाद्य उत्पादन और ग्रामीण विकास पर केंद्रित की.

एशियाई विकास बैंक (एडीबी) विकासशील सदस्य देशों में ऐसी परियोजनाओं का समर्थन करता है जो आर्थिक और विकास संबंधी प्रभाव पैदा करती हैं, तथा इन्हें सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के संचालन, परामर्श सेवाओं और ज्ञान समर्थन के माध्यम से क्रियान्वित किया जाता है.

एडीबी का उद्देश्य विभिन्न विकास गतिविधियों के लिए ऋण और तकनीकी सहायता प्रदान करके लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है. इसके प्रतिनिधि कार्यालय पूरे विश्व में हैं. बैंक में लगभग 2,400 कर्मचारी हैं, जो इसके 67 प्रतिनिधि देशों में से 55 देशों से हैं और आधे से भी अधिक कर्मचारी फिलीपींस के रहने वाले हैं.
एडीबी विश्व के पूंजी बाजारों में बांड जारी करके अपना वित्तपोषण प्राप्त करता है. यह सदस्य देशों के योगदान, ऋण परिचालन से अर्जित आय और ऋणों के पुनर्भुगतान पर भी निर्भर करता है. एडीबी अपनी ‘रणनीति 2030’ के तहत एशिया और प्रशांत क्षेत्र की बदलती जरूरतों को प्रभावी ढंग से पूरा करने की ओर अग्रसर है. रणनीति 2030 के तहत, एडीबी समृद्ध, समावेशी, लचीले और टिकाऊ एशिया और प्रशांत क्षेत्र को हासिल करने के लिए अपने दृष्टिकोण का विस्तार कर रहा है, साथ ही अत्यधिक गरीबी को खत्म करने के अपने प्रयासों को जारी रखे है. हाल ही में एडीबी ने उत्तराखंड, भारत में जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए 200 मिलियन डॉलर के ऋण को मंजूरी दी है. इसके अलावा भी कई परियोजनाओं, बिजली आपूर्ति और तटीय सुरक्षा के लिए मोदी सरकार ने एडीबी से ऋण लिया है.

एएफडीबी – अफ्रीकी विकास बैंक (गैर-क्षेत्रीय सदस्य)

अफ़्रीकी विकास बैंक समूह (एएफडीबी), जिसे फ्रेंच में बीएडी के रूप में भी जाना जाता है, एक बहुपक्षीय विकास वित्त संस्थान है, जिसका मुख्यालय सितंबर 2014 से अबिदजान, आइवरी कोस्ट में स्थापित है. एएफडीबी अफ्रीकी सरकारों और क्षेत्रीय सदस्य देशों (आरएमसी) में निवेश करने वाली निजी कंपनियों के लिए एक वित्तीय प्रदाता है. अफ़्रीकी विकास बैंक की स्थापना 1964 में अफ़्रीकी एकता संगठन द्वारा की गई थी. अफ़्रीकी विकास बैंक में तीन संस्थाएं शामिल हैं – अफ़्रीकी विकास बैंक, अफ़्रीकी विकास कोष और नाइजीरिया ट्रस्ट फंड.

शुरू में केवल अफ्रीकी देश ही बैंक में शामिल हो पाए थे, लेकिन 1982 में इसने गैर-अफ्रीकी देशों को भी प्रवेश की अनुमति दे दी. एएफडीबी के अनुसार, गैर-क्षेत्रीय सदस्यों को शामिल करने से कम ब्याज वाले ऋण, अतिरिक्त बैंकिंग विशेषज्ञता और क्षेत्र के बाहर के बाजारों तक पहुँच के माध्यम से आर्थिक और सामाजिक विकास में योगदान करने में मदद मिली.

अफ्रीकी विकास बैंक का मिशन, क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास में योगदान देने वाली परियोजनाओं और कार्यक्रमों में सार्वजनिक और निजी पूंजी के निवेश को बढ़ावा देकर, गरीबी से लड़ना और महाद्वीप पर जीवन की स्थिति में सुधार लाना है.

31 दिसंबर 2023 तक, अफ्रीकी विकास बैंक की अधिकृत पूंजी 81 सदस्य देशों द्वारा खरीदी गई है, जिसमें 54 स्वतंत्र अफ्रीकी देश और 27 गैर-अफ्रीकी देश शामिल हैं. बैंक की प्रारंभिक अधिकृत पूंजी 250 मिलियन यूनिट्स ऑफ अकाउंट (यूए) थी.

भारत और अफ्रीकी विकास बैंक समूह के बीच साझेदारी 40 वर्षों से अधिक समय से है. भारत 1982 में अफ्रीकी विकास निधि का सदस्य बना और 1983 में अफ्रीकी विकास बैंक का सदस्य बना. भारत के पास बैंक के 14,813 शेयर हैं, जो कुल शेयरों का केवल 0.224% है. मई 2017 में, बैंक ने जयपुर, भारत में अपनी 52वीं वार्षिक बैठक आयोजित की गई.

इन चर्चित संगठनों के अलावा भी दर्जनों ऐसे संगठन हैं जो विश्व भर में गरीबी, शिक्षा, कुपोषण, बेरोजगारी, वित्त, व्यापार, रक्षा, सुरक्षा, हथियार, शान्ति जैसे मुद्दों पर काम कर रहे हैं. (देखें बॉक्स) विश्व में कुल 195 देश हैं, जो किसी ना किसी खेमे से जुड़े हैं. अनेक देश अनेक खेमों से जुड़े हैं. बावजूद इसके ना दुनिया से भूख, गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी दूर हो रही है, ना लड़ाईयां थम रही हैं. दशकों से धरती बम धमाकों से थर्रा रही है. निर्दोष लोगों के खून से मिट्टी लाल हो रही है.

अन्य देशों के मुकाबले भारत की स्थिति ज्यादा खराब है. 2023 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के बच्चों में कमजोरी की दर 18.7 प्रतिशत है जो दुनिया में सबसे ज्यादा है. यह अति कुपोषण को दर्शाती है. वहीं, भारत में अल्पपोषण की दर 16.6 प्रतिशत और पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 3.1 प्रतिशत है. इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 15 से 24 वर्ष उम्र की महिलाओं में एनीमिया यानी खून की कमी 58.1 प्रतिशत है.

भारत में महिलाओं के साथ होने वाले अपराध का ग्राफ भी बहुत तेजी से बढ़ रहा है. भारत में एक दिन में औसतन 87 रेप की घटनाएं होती हैं. राजधानी दिल्ली में एक दिन में 5.6 रेप के मामले सामने आते हैं. (स्रोत दिल्ली पुलिस)

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पिछले सालों के मुकाबले रेप के मामलों में 13.23 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. राजस्थान (6342), मध्यप्रदेश (2947), उत्तर प्रदेश (2845) के बाद दिल्ली (1252) में रेप की घटनाएं सबसे ज्यादा हैं. सामाजिक कलंक, प्रतिशोध के डर और कानूनी व्यवस्था में विश्वास की कमी के कारण बहुतेरे अपराध रिपोर्ट नहीं किए जाते. इसके अलावा, घरेलू हिंसा, उत्पीड़न और तस्करी महिला सुरक्षा पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है.

शान्ति के लिए भले दुनियाभर के राष्ट्र प्रतिबद्ध हों, भले उन्होंने शान्ति के लिए बड़े बड़े संगठन बना रखे हों, भले इन संगठनों के बड़ी बड़ी बैठकें, सेमिनार और आयोजन विभिन्न देशों में लगातार हो रहे हो, मगर धरती अशांत है और मानव जीवन हर देश में असुरक्षित है. इस अशांति के मूल में है धर्म. प्राचीन काल से जितनी भी लड़ाईयां या जंग होती आईं या आज जितने भी देशों के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है उसके मूल में धर्म ही है. हर धर्म खुद को दूसरे से श्रेष्ठ मान कर दूसरे को ख़त्म करने पर उतारू है. यानी एक धर्म के लोग दूसरे धर्म को मानने वाले लोगों को मार देना चाहते हैं. ऐसी है धर्म की शिक्षा.

धर्म ने सिर्फ हिंसा को पैदा किया. धर्म ने सबसे बड़ा नुकसान औरतों का किया है. धर्म ने औरत को आदमी के अंगूठे के नीचे दबा कर रखा और उसके विकास को प्रतिबंधित किया. धर्म ने सारे कर्मकांडों का बोझ औरत के सिर पर रख कर उसे ढोने के लिए मजबूर किया. धर्म ने औरत को बच्चा जनने वाली मशीन और सेवा करने वाली नौकरानी से अधिक हैसियत नहीं दी. उसे आर्थिक, मानसिक, शारीरिक रूप से पुरुष पर निर्भर बनाये रखा. धर्म के कारण ही भारत सहित तमाम देशों की अधिकांश औरतें नारकीय जीवन जीने के लिए बाध्य हैं.

धर्म ने मनुष्य और मनुष्य के बीच खाई पैदा की. धर्म ने ऊंच नीच जैसे भेद पैदा किये. धर्म ने कर्बला की जंग में इंसानी लहू से जमीन तर की और धर्म ने ही महाभारत करवाई. आज धर्म रूस-यूक्रेन और इजरायल-फिलिस्तीन के बीच इंसानों को काट रहा है. धर्म के खिलाफ आज तक विश्व के किसी देश ने कोई संगठन खड़ा करने की हिम्मत नहीं की क्योंकि धर्म की आड़ में ही सारे कुकर्मों को अंजाम दिया जा सकता है. इन संगठनों में मौजूद तमाम देश समय समय पर इसी धर्म का सहारा लेकर विनाश का तांडव करते हैं. धर्म का नाम लेकर दूसरे की जमीन पर कब्जा किया जाता है. धर्म का नाम लेकर अपना वर्चस्व बढ़ाया जाता है. धर्म का नाम लेकर दुनिया का बाप बना जा सकता है. इसलिए तमाम समस्याओं की जड़ इस धर्म पर कुठाराघात करने के लिए कोई तैयार नहीं है.

खेमेबाजी, और बस खेमेबाजी

एजी – ऑस्ट्रेलिया समूह
– 1985 में स्थापित
– कुल 48 सदस्य देश
– भारत जनवरी 2018 में इस समूह में शामिल हुआ
– इसकी पहली बैठक सितंबर 1989 में ब्रुसेल्स, बेल्जियम में हुई थी

बिम्सटेक
– जून 1997 को स्थापित
– भारत 6 अन्य देशों के साथ इसका संस्थापक सदस्य है
– मुख्यालय ढाका, बांग्लादेश में है

बीआईएस – अंतर्राष्ट्रीय निपटान बैंक
– मई 1930 को स्थापित
– भारतीय रिज़र्व बैंक 60 अन्य देशों के कुल केंद्रीय बैंकों में से एक सदस्य है
– मुख्यालय बासेल, स्विट्जरलैंड में

CoN – राष्ट्रमंडल राष्ट्र
– 11 दिसंबर 1931 को स्थापित
– भारत 53 अन्य देशों के साथ इसका सदस्य है
– मुख्यालय लंदन, यूके में है

सर्न – यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन
– 1954 में स्थापित
– मुख्यालय जिनेवा में
– भारत सर्न का सहयोगी सदस्य है

सीपी – कोलम्बो योजना
– 1950 में स्थापित
– मुख्यालय कोलंबो, श्रीलंका में है
– भारत कम्युनिस्ट पार्टी का संस्थापक सदस्य है.

ईएएस – पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन
– 1950 में स्थापित
– मुख्यालय कोलंबो, श्रीलंका में है
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

एफएओ – संयुक्त राष्ट्र का खाद्य और कृषि संगठन
– 16 अक्टूबर 1945 को स्थापित
– मुख्यालय रोम, इटली में है
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

जी-15 – 15 का समूह
– सितंबर 1989 में स्थापित
– मुख्यालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

जी-77 – 77 का समूह
– 15 जून 1964 को स्थापित
– मुख्यालय न्यूयॉर्क में
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

आईएईए – अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी
– 1957 में स्थापित
– मुख्यालय वियना, ऑस्ट्रिया में है
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

आईबीआरडी – अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक (विश्व बैंक)
– 1944 में स्थापित
– मुख्यालय वाशिंगटन डीसी, अमेरिका में है
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

आईसीएओ – अंतर्राष्ट्रीय नागरिक विमानन संगठन
– 1944 में स्थापित
– मुख्यालय मॉन्ट्रियल, कनाडा में है
– भारत एक निर्वाचित सदस्य है.

आईसीसी – अंतर्राष्ट्रीय चैंबर ऑफ कॉमर्स
– 1919 में स्थापित
– मुख्यालय पेरिस, फ्रांस में
– भारत इसका सदस्य है.

आईडीए – अंतर्राष्ट्रीय विकास संघ
– 26 सितम्बर 1950 को स्थापित
– मुख्यालय वाशिंगटन डीसी, अमेरिका में है
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

आईईए – अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी
– नवंबर 1974 में स्थापित
– मुख्यालय पेरिस, फ्रांस में
– भारत इसका सहयोगी सदस्य है.

आईएफएडी – कृषि विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय कोष
– दिसंबर 1977 में स्थापित
– मुख्यालय रोम, इटली में है
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

आईएफसी – अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम
– जुलाई 1956 में स्थापित
– मुख्यालय वाशिंगटन डीसी, अमेरिका में है
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

आईएलओ – अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन
– 1919 में स्थापित
– मुख्यालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

आईएमएफ – अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष
– दिसंबर 1945 में स्थापित
– मुख्यालय वाशिंगटन डीसी, अमेरिका में है
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है

आईएमओ – अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन
– मार्च 1948 में स्थापित
– मुख्यालय लंदन, यूके में है
– भारत एक निर्वाचित सदस्य है

आईएमएसओ – अंतर्राष्ट्रीय मोबाइल सैटेलाइट संगठन
– 1999 में स्थापित
– मुख्यालय लंदन, यूके में है
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है

इंटरपोल – अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक पुलिस संगठन
– 1923 में स्थापित
– मुख्यालय ल्योन, फ्रांस में है
– भारत 1949 से इसका सदस्य है

आईओसी – अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति
– जून 1894 में स्थापित
– मुख्यालय लॉज़ेन, स्विट्जरलैंड में स्थित है
– भारत इसका सदस्य है।

आईपीईईसी – ऊर्जा दक्षता सहयोग के लिए अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी
– 2009 में स्थापित
– मुख्यालय पेरिस, फ्रांस में
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

आईएसओ – अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन
– फरवरी 1947 में स्थापित
– मुख्यालय जिनेवा, स्विटजरलैंड में
– भारत इसका सदस्य है।

ITSO – अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार उपग्रह संगठन
– 1964 में स्थापित
– मुख्यालय वाशिंगटन डीसी में
– भारत इसका सदस्य है.

आईटीयू – अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ
– 17 मई 1864 को स्थापित
– मुख्यालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में
– भारत इसका सक्रिय सदस्य है।

आईटीयूसी – अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संघ परिसंघ
– नवंबर 2006 में स्थापित
– मुख्यालय ब्रुसेल्स, बेल्जियम में
– भारत इसका सदस्य है.

एमटीसीआर मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था
– अप्रैल 1987 में स्थापित
– जापान में मुख्यालय
– भारत जून 2016 से इसका सक्रिय सदस्य है

एनएएम – गुटनिरपेक्ष आंदोलन
– 1961 में स्थापित
– मुख्यालय जकार्ता, इंडोनेशिया में है
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

ओपीसीडब्ल्यू – रासायनिक हथियार निषेध संगठन
– अप्रैल 1997 में स्थापित
– मुख्यालय हेग, नीदरलैंड में है
– भारत इसका सक्रिय सदस्य है.

पीसीए – स्थायी मध्यस्थता न्यायालय
– 1899 में स्थापित
– मुख्यालय हेग, नीदरलैंड में है
– भारत एक पार्टी है

पीआईएफ – प्रशांत द्वीप फोरम (भागीदार)
– 1971 में स्थापित
– मुख्यालय सुवा, फिजी में
– भारत एक साझेदार है

एसएसीईपी – दक्षिण एशिया सहकारी पर्यावरण कार्यक्रम
– 1982 में स्थापित
– मुख्यालय कोलंबो, श्रीलंका में है
– भारत इसका सक्रिय सदस्य है.

एससीओ – शंघाई सहयोग संगठन (सदस्य)
– अप्रैल 1996 में स्थापित
– मुख्यालय बीजिंग, चीन में है
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

यूएनएड्स – एचआईवी/एड्स पर संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम
– जुलाई 1994 में स्थापित
– मुख्यालय न्यूयॉर्क, अमेरिका में है
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

यूनेस्को – संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन
– नवंबर 1946 में स्थापित
– मुख्यालय लंदन, ब्रिटेन में
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

डब्ल्यूएचओ विश्व स्वास्थ्य संगठन
– अप्रैल 1948 में स्थापित
– मुख्यालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में
– भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

मेरी बेटी मोबाइल फोन पर लड़कों से बातें करती रहती है. अजीब सा डर लगता है.

अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मेरी बेटी एक मेरठ के एक बड़े प्राइवेट स्कूल की 11वीं क्लास की स्‍टूडेंट है. उसका स्‍कूल कोएड है, जहां लड़के और लड़कियां दोनों पढ़ते हैं. उसका स्कूल हमारे घर से थोड़ी दूर है. मैं और मेरी पत्‍नी दोनों वर्किंग हैं इसी वजह से मुझे उसे मोबाइल फोन लेकर देना पड़ा ताक‍ि उसे कभी कोई परेशानी हो तो वह हमें तुरंत कौल कर सके. पिछले कुछ दिनों से मैं नोटिस कर रहा हूं कि वह अकसर अपने फोन से चिपकी रहती है. मैंने महसूस किया कि वह लड़कों से बातें करती है. मैंने उसे कई बार समझाया कि हमने उसे फोन इमरजेंसी सिचुएशन में इस्‍तेमाल करने के लिए दिया है. कई बार समझा चुका हूं कि मोबाइल पर बातें करके टाइमपास नहीं करे पर वह नहीं सुनती है. स्‍कूल में उसकी दोस्ती लड़कियों से ज्यादा लड़कों से है. जब भी उससे किसी लड़के के बारे में पूछो तो वह यही कहती है कि यह लड़का मेरा बेस्ट फ्रेंड है. मुझे डर लगता है कि मेरी बेटी किसी गलत रास्ते पर तो नहीं चल पड़ी है. लड़कियों की फोटोज, वीडियो लीक, अश्‍लील चैट को लेकर कई तरह की खबरें पढ़ता हूं इसलिए अपनी बेटी को लेकर डरने लगा हूं.

जवाब –

आपका डर अपनी जगह बिल्कुल सही है लेकिन आपको अपनी सोच बदलनी होगी. लड़कों से दोस्ती करना और बातें करना कोई गलत बात नहीं है. आजकल की जैनरेशन को अच्छे से पता होता है कि उन्हें किससे बातें करनी चाहिए और किससे नहीं. आपको अपनी बेटी पर विश्वास करना चाहिए. उससे बातें करें. धीरेधीरे यह जानने की कोशिश करें कि फोन पर उसकी क्‍या बातें होती हैं. वह जिन लड़कों से बातें करती हैं उनका बैकग्राउंड क्‍या है. अगर मन में कोई संदेह हो, तो उसकी क्‍लास टीचर या पीटीएम में टीचर से इन लड़कों के बारे में बात करके मन को तसल्‍ली कर लें. अगर संभव हो तो बेटी को ही कहें कि वह पीटीएम के दिन उन लड़कों से आपको मिलाएं, जिससे फोन पर बातें होती है.

आपकी बेटी एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ती है तो उसके विचार भी मौडर्न होंगे, आज मोबाइल के जरिए बच्‍चे दुनिया भर की चीजों से रूबरू हो रहे हैं जिनमें से कुछ कंटेंट उनकी उम्र के लिए सही नहीं है. आप अपनी बेटी के दोस्त बनें. उसे अखबार पढ़ने को दें. उसके साथ समाचार सुनें. न्‍यूज में ऐसी कई खबरें होती है, जो इस उम्र के युवाओं से जुड़ी होती है. उनके साथ सोशल मीडिया के माध्‍यम से हो रही घटनाओं से जुड़ी होती है. वह खुद ही समाचारों को पढ़ कर अपने दायरे तय कर लेगी.

एक पिता का चिंतित होना जायज़ है तो ऐसे में आप अपनी बेटी को समझाइए कि यह उम्र उसके पढ़नेलिखने की है तो उसे इस समय अपनी फ्रैंडशिप पर ज्यादा ध्यान ना देकर अपनी पढ़ाई को वक्त दे. जिंदगी में फ्रैंड्स का होना भी जरूरी है तो आप उसके दोस्त बनने के साथ साथ उसके दोस्तों से मिलिए भी. अपनी बेटी के लड़के और लड़की दोनों दोस्तों को अपने घर बुलाइए, उनके बातचीत कीजिए जिससे आपको भी पता चलेगा कि आपकी बेटी के फ्रैंड्स कैसे हैं. आपकी बेटी को महसूस होगा कि उसकी दोस्‍ती को लेकर आपको कोई आपत्ति नहीं है. वह समझेगी कि उसके पिता बस उसे सुरक्षित देखना चाहते हैं.

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हमारे घर के ग्राउंड फ्लोर पर एक लड़का रहता है वह मेरे 8 साल के बेटे को जोर से चिपका लेता है, ‘किस’ करता है. उसे कैसे रोकूं ?

अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं दिल्ली की मयूर विहार रहने वाली हूं और मेरा एक 8 साल का बेटा है. मेरे घर में मैं, मेरे पति और मेरा बेटा ही रहता है. मेरे पति सारा दिन औफिस के काम से बाहर रहते हैं और मैं एक हाउसवाइफ हूं. हाल ही में मेरे पति ने हमारे घर का ग्राउंड फ्लोर एक परिवार को रेंट पर दिया है जो कि बंगाल से हैं. उनका बेटा करीब 16 साल का है. वह अकसर मेरे बेटे के साथ खेलने के लिए हमारे घर आता रहता है. मेरा बेटा भी उसे पसंद करने लगा है, उसे भैया भैया कह कर बुलाता है. शुरुआत में तो मुझे सब नौर्मल लगा लेकिन धीरे धीरे जब मैंने उस लड़के को नोटिस किया तो मैंने देखा कि वह लड़का मेरे बेटे से बहुत चिपकता है. इतना ही नहीं कभी कभी वह उसे जोर से गले लगाता है और उसे किस करने लगता है. मुझे अजीब लगता है कि कैसे एक 16 साल का लड़का मेरे 8 साल के बेटे के साथ इतना चिपक सकता है. जब से मैंने ये नोटिस किया है मैं अपने बेटे को उसके पास बिल्कुल भी अकेला नहीं छोड़ती हूं. मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं उस लड़के को कैसे और क्या कह कर रोकूं. आप ही कुछ सलाह दीजिए.

जवाब –

मैं आपकी परेशानी अच्छी तरह समझ सकता हूं. कोई भी मां यह बिल्कुल नहीं चाहेगी कि उसके 8 साल के बेटे के साथ कोई इतना चिपके या कुछ गलत करे. इस केस में आपको सावधानी बरतने की जरूरत है. जैसा कि आपने उस लड़के के बारे में बताया उसे देख यह कहा जा सकता है कि वह पीडोफाइल हो सकता है. पीडोफाइल शब्‍द उन लोगों के लिए इस्‍तेमाल किया जाता है, जो बच्‍चों के साथ यौन शोषण करने में रुचि रखते हैं. इनके बारे में कहा जाता है कि जिनके साथ बचपन में यौन शोषण हुआ हो वे बड़े होने के बाद बच्चों के साथ भी उसी तरह से पेश आते हैं. इन्‍हें चाइल्‍ड सेक्‍शुअल अब्‍यूज में लिप्‍त पाया गया है. हो सकता है यह लड़का भी पी‍डोफाइल हो इसलिए अपने बेटे को उसके पास भेज कर रिस्‍क लेने की जरूरत नहीं है.

अपने बच्चे को किसी भी तरह से उस लड़के से दूर रखें लेकिन याद रहे कि आपको अचानक से अपने बच्चे को उससे दूर नहीं करना चाहिए बल्कि जब भी आपका बेटा उससे मिलने की जिद करे या वह लड़का आपके बेटे से मिलने आए, तो आपके पास सौलिड बहाना होना चाहिए. अगर वह लड़का सच में पीडोफाइल होगा, तो शुरुआत में उसे आपके व्‍यवहार से दुख होगा इसलिए जरूरी है कि इसकी तैयारी पहले से कर ले. इनके खेलने के टाइम पर बेटे को कोई ट्यूशन लगा दें या खुद पढ़ाना शुरू करें. बच्‍चों को उसके हमउम्र लोगों के पास खेलने भेजें. बच्‍चे का एडमीशन किसी हौबी क्‍लास या स्‍पोर्ट्स के क्‍लास में कर दें.

पीडोफाइल होने के और भी कई कारण हो सकते हैं जैसे कि बचपन में सिर पर चोट लग जाना या फिर जेनेटिक गड़बड़ी के कारण कुछ लोग ऐसे बन जाते हैं. ऐसे लोग हमारे आसपास ही होते हैं बस हमें इन्हें पहचानना पड़ता है. कई अध्‍ययनों से पता चला है कि बच्चों का यौन शोषण करने वालों में बड़ी संख्‍या में अपने ही करीबी रिश्तेदार या फिर पड़ोसी होते हैं. ऐसे लोगों पर हम शक नहीं कर पाते हैं इसलिए बच्‍चे इनका आसान शिकार बन जाते हैं. पुरूषों के साथ साथ महिलाएं भी पीडोफाइल हो सकती हैं तो अपने बच्चों को किसी के साथ भी अकेला छोड़ने से पहले उस इंसान की सोच को अच्छे से जान लें.

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तेरी सास तो बहुत मौडर्न है: मिसेज चंद्रा की चर्चा क्यों हो रही थी

शादी के समय ही रिश्तेदारों व जानपहचान वालों ने कहना शुरू कर दिया कि तेरी सास तो बड़ी मौडर्न है, पर नियति ही जानती है कि उस की सास उस के लिए कितनी केयरिंग है. सास के कहने पर जब नियति मायके आई तो क्या वह उन के प्रति अपनी मां की सोच बदल पाई? आज सुबहसुबह जैसे ही नियति का फोन श्रीकांतजी के मोबाइल पर आया, उन की पत्नी लीला ने उन्हें फोन स्पीकर पर डालने का इशारा किया और उन्होंने स्पीकर औन कर दिया. नियति हंसती हुई बोली, ‘‘हैलो पापा, आप ने स्पीकर औन कर लिया हो और मम्मी आ गई हों तो मैं अपनी बात शुरू करूं.’’ पिछले 2 महीनों से यही चल रहा है.

नियति का फोन जब भी आता है, श्रीकांतजी स्पीकर औन कर देते हैं क्योंकि नियति और उस की मां लीला की बातचीत तब से बंद है, जब से नियति ने अपना निर्णय सुनाया है कि वह शादी अपने कलीग और स्कूलफ्रैंड विकल्प से करना चाहती है. यह बात जानते ही दोनों मांबेटी के बीच अबोलेपन ने अपना स्थान ले लिया. लेकिन जब भी नियति का फोन आता है, लीला अपने सारे काम छोड़ कर फोन के करीब आ जाती है, यह जानने के लिए कि नियति क्या कह रही है. नियति की बातों को सुन कर लीला के चेहरे के हावभाव बनतेबिगड़ते रहते हैं,

क्योंकि लीला किसी हाल में नहीं चाहती कि उन की बेटी किसी विजातीय लड़के से ब्याह करे. वैसे, लीला कई दफा विकल्प की मां मिसेज चंद्रा से नियति के स्कूल फंक्शन और पेरैंट्सटीचर मीटिंग में मिल चुकी है. मिसेज चंद्रा मौडर्न और स्वतंत्र विचारधारा की महिला हैं. लीला को लगता है कि मिसेज चंद्रा जरूरत से ज्यादा ही मौडर्न हैं. मिस्टर चंद्रा इंडियन नेवी में वरिष्ठ अधिकारी के पद पर थे. उन का घर ग्वालियर के पौश एरिया में है और काफी आलीशान भी है. नौकरचाकर सब हैं. किसी चीज की कोई कमी नहीं है. उन के घर का वातावरण, रहनसहन थोड़ा भिन्न है, जो लीला को शुरू से ही अटपटा लगता आया है.

क्योंकि लीला जहां रहती है, वहां की औरतें न तो मिसेज चंद्रा की भांति बिना आस्तीन का ब्लाउज पहनती हैं और न ही बिना सिर पर पल्लू लिए घर से बाहर निकली हैं. ऊपर से इन का पूरा परिवार शुद्ध शाकाहारी और उन के घर पर बिना अंडा, मांस, मछली के काम ही नहीं चलता. श्रीकांतजी एक सुलझे हुए और सरल व्यक्तित्व के धनी हैं. उन्हें इस रिश्ते से कोई एतराज नहीं, क्योंकि उन के लिए तो नियति की खुशी ही सब से बड़ी है. उन का मानना है कि जातिपांति, धर्म कुछ नहीं होता, मनुष्य की बस एक ही जाति है और एक ही धर्म होता है और वह है मानवता का धर्म. श्रीकांतजी को मिसेज चंद्रा के मौडर्न होने से भी कोई तकलीफ नहीं है. श्रीकांतजी ने भी हंसते हुए कहा, ‘‘हां बोलो, तुम्हारी मम्मी आ गई हैं.’’

‘‘पापा, कल मैं और विकल्प ग्वालियर आ रहे हैं, फिर शाम को विकल्प के मौमडैड आप और मम्मी से हमारी शादी की बात करने आएंगे.’’ श्रीकांतजी नियति को आश्वस्त करते हुए बोले, ‘‘तुम चिंता मत करो, सब ठीक होगा.’’ यह सुनने के बाद नियति ने कहा, ‘‘थैंक्यू पापा, मुझे आप से एक बात और शेयर करनी है. मैं ने और विकल्प ने कंपनी चेंज कर ली है. हमारी नई कंपनी का सबडिविजनल औफिस ग्वालियर में भी है तो शादी के बाद हम दोनों ग्वालियर आ जाएंगे.’’ ‘‘यह तो और भी अच्छी बात है. हमारी बेटी शादी के बाद भी इसी शहर में रहेगी, हमें और क्या चाहिए. यह खबर सुनते ही तुम्हारी भाभी बहुत खुश हो जाएगी.’’ भाभी का नाम सुनते ही नियति चहकती हुई बोली, ‘‘पापा, भाभी कहां हैं, बात तो कराइए.’’

‘‘इस वक्त तो वह किचन में व्यस्त है.’’ नियति थोड़ा नाराज होती हुई बोली, ‘‘पापा, मैं ने मम्मी से कितनी बार कहा है कि एक फुलटाइम मेड रख लो, सुबह से ले कर रात तक भाभी बेचारी घर के कामों में ही उलझी रहती हैं. यहां तक कि उन के पास अपने खुद के लिए भी समय नहीं होता और मम्मी हैं कि कुछ समझती ही नहीं. उन्हें लगता है कि घर का सारा काम बहू का ही है. ऊपर से भाभी को सारे काम साड़ी पहन कर करने पड़ते हैं. उन्हें काम करने में कितनी असुविधा होती है. ‘‘पापा, आप मम्मी को समझाइए, वक्त तेजी से बदल रहा है. अब मम्मी को भी थोड़ा बदलना होगा.

अच्छा पापा, अब मैं फोन रखती हूं.’’ ऐसा कह कर नियति ने फोन रख दिया. नियति के फोन रखते ही लीला के चेहरे का रंग गुस्से से लाल हो गया और वह बड़बड़ाती हुई कहने लगी, ‘‘लो, अब यह छोरी सिखाएगी मुझे बहू से क्या काम करवाना है और क्या नही. खुद को तो धेलेभर की अक्ल नहीं. एक ऐसी औरत की बहू बनने को उतावली हुए जा रही है, जिसे हमारी संस्कृति का जरा सा भी ज्ञान नहीं. न तो वह अपने सिर पर पल्लू लेती है और न ही उसे छोटेबड़े का लिहाज है. शादी हो जाने दो, फिर पता चलेगा मौडर्न सास कैसी होती है.’’ लीला को अपनी स्वयं की बेटी के लिए इस प्रकार मुंह से आग उगलता देख श्रीकांतजी बोले, ‘‘अब बस भी करो लीला. मिसेज चंद्रा मौडर्न हैं, इस का मतलब यह नहीं कि वे बुरी हैं या फिर बुरी सास ही साबित होंगी. कम से कम अपनी बेटी के लिए तो अच्छा सोचो और अच्छा बोलो.

विकल्प अपने पेरैंट्स के साथ हम से मिलने आ रहा है. कल नए रिश्तों की नींव पड़ने वाली है. मैं नहीं चाहता कि किसी भी रिश्ते की शुरुआत खटास से हो.’’ श्रीकांतजी के ऐसा कहते ही लीला कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किए बगैर वहां से चली गई. दूसरे दिन नियति आ गई. शाम की पूरी तैयारियां जोरों पर थीं. वह वक्त भी आ गया जब विकल्प अपने पेरैंट्स के साथ नियति के घर पहुंचा. मिसेज चंद्रा की खूबसूरती आज भी बरकरार थी. उसे देखते ही लीला मन ही मन कुड़कुड़ाने लगी. जवान बेटे की मां और यह साजोसिंगार, अपनी उम्र तक का लिहाज नहीं. आग लगे ऐसे मौडर्ननैस को.

मिसेज चंद्रा इन सब से बेखबर, घर के सभी सदस्यों के साथ बड़ी आत्मीयता से मिल रही थीं. बातों ही बातों में मिसेज चंद्रा ने कहा, ‘‘मैं बड़ी खुश हूं, जो मुझे नियति जैसी खूबसूरत और समझदार बहू मिल रही है. मैं ढूंढ़ने भी निकलती तो नियति जैसी बहू मुझे न मिलती.’’ मिसेज चंद्रा के ऐसा कहने पर लीला व्यंग्यात्मक लहजे में बोली, ‘‘खूबसूरत, समझदार के साथसाथ कमाऊ बहू भी मिल रही है मिसेज चंद्रा, यह कहना भूल गईं आप.’’ लीला का ऐसा कहना श्रीकांतजी, नियति और उस के भैयाभाभी को बड़ा अटपटा और बुरा लगा, लेकिन मिसेज चंद्रा बड़े सहज भाव से लीला की बातों को हंसी में उड़ा गईं. उस के कुछ सप्ताह बाद नियति और विकल्प की शादी बड़ी धूमधाम से हो गई. शादी में आए सभी मेहमानों द्वारा शादी में किए गए शानदार इंतजाम को ले कर खूब तारीफ हुई,

साथ ही साथ, नियति व विकल्प की भी काफी प्रशंसा हुई. इन सब के अलावा सभी की जबान पर एक और बात की चर्चा जोरों पर थी और वह थी मिसेज चंद्रा की लेटेस्ट ज्वैलरी, स्टाइलिश साड़ी और हेयरस्टाइल. लीला के सभी सगेसंबंधी और सहेलियां उस से यह कहने से नहीं चूकीं कि लीला बहन, तुम ने तो दामाद के संग समधन भी बड़ी जोरदार पाई है. नियति की सास तो बड़ी मौडर्न है. इस उम्र में इतना स्टाइल… कमाल है, तुम्हारी समधन तो काफी स्टाइलिश है. सभी के मुंह से बस एक ही बात सुन कर कि ‘नियति की सास तो बड़ी मौडर्न है,’ लीला के कान पक गए और जब नियति शादी के बाद पहली बार घर आई तो लीला नियति की खैरखबर लेने के बजाय उस से कहने लगी, ‘‘कैसी है तेरी मौडर्न सास? सजनेसंवरने के अलावा भी कुछ करती है या बस सारा दिन केवल आईने के सामने ही बैठी रहती है?’’ अपनी मां का इस तरह बातबेबात नियति को उस की सास के मौडर्न होने का ताना देना उसे अच्छा नहीं लगता था,

इसलिए धीरेधीरे अब नियति अपने मायके आने से कतराने लगी. बस, फोन पर ही अपने पापा और भाभी से बात कर लेती. औफिस का भी यही हाल था. नियति के हर फैं्रड और कलीग को बस यही जानना होता है कि उस की सास का उस के साथ व्यवहार कैसा है? उसे परेशान तो नहीं करती है? नियति अपनी सास के होते हुए इतना फ्री कैसे रहती है? क्योंकि सभी को लगता है कि नियति की सास बड़ी तेजतर्रार, स्टाइलिश और मौडर्न है. नियति को यह बात समझ ही नहीं आ रही थी कि लोग सभी को एक ही तराजू पर क्यों तौलते हैं. ऐसा जरूरी तो नहीं कि जो महिला स्टाइलिश हो, मौडर्न हो, वह तेजतर्रार और बुरी सास ही होगी और जो देखने में सिंपल हो, सीधीसादी लगती हो, वह अच्छी सास ही होगी. एक शनिवार नियति अपने मायके में फोन कर अपनी मम्मी से बोली, ‘‘मम्मी, इस वीकैंड पर हम पिकनिक पर जा रहे हैं. मौम कह रही थीं कि आप सब भी हमारे साथ चलते तो एक अच्छी फैमिली पिकनिक हो जाएगी. आप भैयाभाभी से भी चलने को कह देना.’’ नियति का इतना कहना था कि लीला भड़क उठी और कहने लगी,

‘‘हमें कहीं नहीं जाना तेरी मौडर्न सास के साथ और न ही हमारी बहू जाएगी तुम लोगों के साथ. तुम सासबहू दोनों घूमो जींसपैंट पहन कर पूरे शहर में. तुम्हें न सही, पर हमें तो है लोकलाज का खयाल. ‘‘वैसे भी तुम्हारी भाभी अपने मायके इंदौर गई है और तुम्हारा पत्नीभक्त भाई उस के साथ ही गया है. दोनों यहां होते भी तो हम में से कोई न जाता तुम्हारे मौडर्न परिवार के साथ कहीं, क्योंकि उस दिन मेरे गुरुजी का जन्मदिन है, इसलिए हमारी समिति की ओर से इस अवसर पर भव्य सत्संग आयोजित किया जाएगा. उस दिन गुरुजी सभी को दर्शन और आशीर्वाद देंगे, जो जीवन की सद्गति के लिए बहुत जरूरी है. यह सब तेरी मौडर्न सास क्या समझेगी.’’ लीला का इतना कहना था कि नियति ने गुस्से में फोन काट दिया. निर्धारित दिन पर नियति अपने पूरे परिवार के साथ इधर पिकनिक के लिए निकल पड़ी, उधर लीला और श्रीकांतजी गुरुजी से आशीष लेने सत्संग के लिए निकल पड़े. आज पूरा दिन परिवार के संग इतना अच्छा समय बिता कर नियति काफी खुश थी. उसे बस इस बात का अफसोस था कि आज की इस खुशी का हिस्सा उस के अपने मम्मीपापा नहीं बन पाए थे. पिकनिक से लौटते वक्त नियति इन्हीं सब बातों में गुम थी कि अचानक उस का मोबाइल बजा. फोन किसी अनजान नंबर से था.

फोन रिसीव करते ही नियति की आंखों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी. यह देख नियति की सास ने उस से कारण जानना चाहा तो नियति रोती हुई बोली, ‘‘मम्मी का फोन था. सत्संग से लौटते हुए मम्मीपापा का ऐक्सिडैंट हो गया है. पापा गंभीररूप से घायल हो गए हैं. मम्मी को ज्यादा चोटें नहीं आई हैं. मोबाइल भी टूट गया है, इसलिए उन्होंने किसी दूसरे के मोबाइल से फोन किया था. भैयाभाभी शहर से बाहर हैं और वहां सिटी अस्पताल में पुलिस प्रक्रिया में देर होने की वजह से पापा का इलाज शुरू नहीं हो पा रहा है. मम्मी बहुत घबराई हुई हैं और परेशान हैं.’’ इतना सुनते ही मिसेज चंद्रा बोलीं, ‘‘तुम्हें रोने या परेशान होने की जरूरत नहीं बेटा, शहर के डीएसपी से मेरा बहुत अच्छा परिचय है. मैं अभी उन्हें फोन कर देती हूं और अस्पताल में भी फोन कर देती हूं. वहां भी मेरी पहचान के काफी सीनियर डाक्टर हैं, वे सब संभाल लेंगे. तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं और कुछ घंटों में तो हम भी शहर पहुंच ही जाएंगे.’’ ऐसा कहती हुई मिसेज चंद्रा ने अपने कई मित्रों और पहचान की नामीगिरामी हस्तियों को फोन कर नियति के मम्मीपापा को हर संभव मदद करने को कह दिया.

जब नियति अपने पूरे परिवार के साथ अस्पताल पहुंची तो उस के मम्मीपापा का इलाज शुरू हो गया था. पुलिस और अस्पताल के डाक्टर व स्टाफ अपना पूरा सहयोग दे रहे थे. यह देख एक बार फिर नियति की आंखें नम हो गईं और उस के चेहरे पर अपनी सास के प्रति आदर और कृतज्ञता के भाव उभर आए. नियति की मम्मी 3 दिनों तक अस्पताल में एडमिट रहीं और उस के पापा 15 दिनों तक. मिसेज चंद्रा पूरी आत्मीयता से हर रोज अस्पताल में उन से मिलने जातीं. उन की वजह से नियति के मम्मीपापा को अस्पताल में कोई परेशानी नहीं हुई. वहां उन का विशेष ध्यान रखा गया और अस्पताल के डाक्टरों व स्टाफ से भरपूर सहयोग मिला. उस के बावजूद मिसेज चंद्रा के प्रति लीला के विचार और बरताव में कोई फर्क न आया. लीला अब भी अपने स्वस्थ होने और सही समय पर इलाज मिलने का श्रेय अपने गुरुजी की कृपा और आशीर्वाद को ही दे रही थी. मिसेज चंद्रा को लीला अपने गुरुजी के द्वारा भेजा गया केवल एक माध्यम समझ रही थी, जबकि गुरुजी का इस बात से कोई वास्ता ही न था.

लीला की इस प्रकार अंधभक्ति देख और बारबार अपनी ही मां से अपनी सास के लिए अपमानभरे शब्द सुनसुन कर नियति ने यह तय कर लिया कि वह अब न तो अपने मायके जाएगी और न ही अपनी मम्मी को फोन करेगी. काफी दिनों तक जब नियति अपने मायके नहीं गई तो एक दिन नियति की सास ने उस से कहा, ‘‘नियति बेटा, तुम बहुत दिनों से अपने मायके नहीं गई हो, इस संडे समय निकाल कर उन से मिल आओ. उन्हें तुम्हारी चिंता होती होगी.’’ नियति अपनी सास की बात टालना नहीं चाहती थी और न ही उन्हें सच बता कर उन का दिल दुखाना चाहती थी, इसलिए वह बोली, ‘‘जी, इस संडे चली जाऊंगी.’’ संडे को जब नियति अपने मायके पहुंची तो पापा उसे बरामदे में आरामकुरसी पर बैठे किताब पढ़ते मिल गए. काफी देर पापा के पास बैठने के बाद जब नियति अंदर गई तो उस ने देखा कि उस की मम्मी अपनी सहेलियों के साथ बैठी हंसीठिठोली कर रही हैं और उस की भाभी भागभाग कर सब के लिए चायनाश्ता और पानी की व्यवस्था कर रही है. यह देख नियति अपनी भाभी का हाथ बंटाने किचन की ओर बढ़ी ही थी कि वहां बैठी उस की मम्मी की सहेलियों में से एक ने कहा,

‘‘अरे नियति, तुम कब आईं? इधर आ, हमारे पास बैठ. मैं ने तो सुना है कि तेरी सास बड़ी मौडर्न हैं, तुम अपनी सास के साथ ससुराल में कैसे निभा रही हो?’’ नियति चुप रही, फिर क्या था एक के बाद एक सभी ने नियति की सास का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया. कोई उन की लिपस्टिक पर फिकरे कसने लगा, तो कोई हेयरस्टाइल पर, किसी को उन का इस उम्र में जींस पहनना गलत लग रहा था, तो किसी को उन के लहराते हुए आंचल से आपत्ति थी. सभी की अनर्गल बातें सुन कर नियति से रहा नहीं गया और वह सब पर बरस पड़ी, ‘‘हां, मेरी सास बड़ी मौडर्न हैं. वे केवल मौडर्न ड्रैस ही नहीं पहनतीं, उन की सोच भी मौडर्न है. वे अपनी बहू को चारदीवारी में घूंघट के पीछे घुटनभरी जिंदगी नहीं, खुली हवा में आजादी की सांस लेने देती हैं. ‘‘यहां आप में से कितनी सास अपनी बहू को उन की मरजी से जीने देती हैं, अपनी बहू का बेटी की तरह मां बन कर ध्यान रखती हैं? लेकिन, मेरी मौडर्न सास मेरा खयाल अपनी बेटी की तरह रखती हैं और मुझे उन के मौडर्न होने पर गर्व है क्योंकि वे मुझे केवल बेटी बुलाती ही नहीं, अपनी बेटी समझती भी हैं. और सब से बड़ी बात यह कि, बुरे वक्त में साथ खड़ी रहती हैं. ऊपर वाले की इच्छा कह कर अपना पल्ला नहीं झाड़ लेती हैं.’’ नियति की बातें सुन कर सब की आंखें शर्म से झुक गईं और नियति के पापा बरामदे में बैठे मंदमंद मुसकरा रहे थे.

बदला: आखिर अंजली का मन क्यों मचलने लगता था

मनीष सुबह टहलने के लिए निकला था. उस के गांव के पिछवाड़े से रास्ता दूसरे गांव की ओर जाता था. उस रास्ते से अगले गांव की काफी दूरी थी. वह रास्ता गांव के विपरीत दिशा में था, इसलिए उधर सुनसान रहता था. मनीष को भीड़भाड़ से दूर वहां टहलना अच्छा लगता था. वह इस रास्ते पर दौड़ लगाता और कसरत करता था. मनीष जैसे ही अपने घर से निकल कर गांव के आखिरी मोड़ पर पहुंचा, तो उस ने देखा कि सामने एक लड़की एक लड़के से गले लगी हुई. मनीष रुक गया था. दोनों को देख कर उस के जिस्म में सनसनाहट पैदा होने लगी थी. वह जैसे ही नजदीक पहुंचने वाला था, वह लड़की जल्दी से निकल कर पीछे की गली में गुम हो गई. ‘‘अरे, यह तो अंजलि थी,’’ वह मन ही मन बुदबुदाया.

वही अंजलि, जिसे देख कर उस के मन में कभी तमन्ना मचलने लगती थी. उस के उभारों को देख कर मनीष का मन मचलने लगता था. आज उसे इस तरह देख कर वह अपनेआप को ठगा सा महसूस करने लगा था. आज मनीष पूरे रास्ते इसी घटना के बारे में सोचता रहा. आज उस का टहलने में मन नहीं लग रहा था. वह कुछ दूर चल कर लौटने लगा था. वह जैसे ही घर पहुंचा कि गांव में शोर हुआ कि किसी की हत्या हुई है. लोग उधर ही जा रहे थे. मनीष भी उसी रास्ते चल दिया था. वह हैरान हुआ, क्योंकि भीड़ तो वहीं जमा थी, जहां से अंजलि निकल कर भागी थी. एक पल को तो उसे लगा कि भीड़ को सब बता दे, पर वह चुप रहा. सामने अंजलि अपने दरवाजे पर खड़ी मिल गई.

शायद वह भी बाहर हो रही घटनाओं के संबंध में नजरें जमाई थी. मनीष ने उसे धमकाते हुए कहा, ‘‘मैं ने सबकुछ देख लिया है. मैं चाहूं तो तुम सलाखों के पीछे चली जाओगी.’’ अंजलि ने हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘अपना मुंह बंद रखना. मैं तुम्हारी अहसानमंद रहूंगी.’’ ‘‘ठीक है. आज शाम 7 बजे झाड़ी के पीछे वाली जगह पर मिलना. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.’’ ‘‘अच्छा, लेकिन अभी जाओ और घटना पर नजर रखना.’’ मनीष वहां से चल दिया. घटनास्थल पर भीड़ इकट्ठा हो गई थी. कुछ देर बाद पुलिस भी आ गई थी. पुलिस ने हत्या के बारे में थोड़ीबहुत जानकारी ले कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था. मनीष अपने घर लौट आया था. मनीष अंदर से बहुत खुश था कि आज उस की मनोकामना पूरी होगी. फिर हत्या कैसे और क्यों की गई है, इस का राज भी वह जान पाएगा. उस के मन में बेचैनी बढ़ती जा रही थी. आज काम में बिलकुल भी मन नहीं लग रहा था, इसलिए समय बिताने के लिए वह अपने कमरे में चला गया था. मनीष तय समय पर घर से निकल गया था.

जाड़े का मौसम होने के चलते अंधेरा पहले ही हो गया था. मनीष तय जगह पर पहुंच चुका था, तभी उस की ओर एक परछाईं आती हुई नजर आई. मनीष थोड़ा सा डर गया था. परछाईं जैसेजैसे उस की ओर बढ़ रही थी, उस के मन से डर भी खत्म हो रहा था, क्योंकि वह कोई और नहीं बल्कि अंजलि थी. अंजलि के आते ही मनीष ने उस के दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया था. कुछ पल के बाद उसे अपने आगोश में भरते हुए उस ने पूछा, ‘‘अंजलि, तुम ने जितेंद्र की हत्या क्यों की?’’ ‘‘उस की हत्या मैं ने नहीं की है, उस ने मेरे साथ सिर्फ शारीरिक संबंध बनाए थे, जो तुम देख चुके हो.’’ ‘‘हां, लेकिन हत्या किस ने की?’’ ‘‘शायद मेरे जाने के बाद किसी ने हत्या कर दी हो. यही तो मुझे भी समझ में नहीं आ रहा है… और इसीलिए मैं डर रही थी और तुम्हारी बात मानने के लिए राजी हो गई,’’ अंजलि अपनी सफाई देते हुए बोली थी. ‘‘क्या उस की किसी से दुश्मनी रही होगी?’’ मनीष ने सवाल किया.

‘‘मुझे नहीं पता… अब तुम पता करो.’’ ‘‘ठीक है, मैं पता करता हूं.’’ ‘‘मुझे तो डर लग रहा है, कहीं मैं इस हत्या में फंस न जाऊं.’’ ‘‘मेरी रानी, डरने की कोई बात नहीं है, मैं तुम्हारे साथ हूं. मैं तुम्हारी मदद करूंगा. बस, तुम मेरी जरूरतें पूरी करती रहो,’’ मनीष के हाथ उस की पीठ से फिसल कर उस के कोमल अंगों को छूने लगे थे. थोड़ी सी नानुकुर के बाद जब मनीष का जोश ठंडा हुआ, तो उस ने अंजलि को अपनी पकड़ से आजाद कर दिया. मनीष अगले सप्ताह रविवार को मिलने के लिए अंजलि से वादा किया था. अंजलि राजी हो गई थी. इधर अंजलि के मन का बोझ थोड़ा शांत हुआ कि वह मनीष को समझाने में कामयाब रही. मनीष को मुझ पर शक नहीं हुआ है. वह हत्यारे के बारे में पता करने में मदद करेगा. अब अंजलि और मनीष के मिलने का सिलसिला जारी हो चुका था. मनीष एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाता था.

अभी उस की शादी नहीं हुई थी. अंजलि महसूस कर रही थी कि मनीष दिल का बुरा नहीं है. उस की सिर्फ एक ही कमजोरी है. वह हुस्न का दीवाना है. कई बार अंजलि महसूस कर चुकी है कि आतेजाते मनीष उसे देखने की कोशिश करता था, लेकिन वह जानबूझकर शरीफ होने का नाटक करता था. इसीलिए औरों की तरह वह मेरा पीछा नहीं कर पाया था. जितेंद्र की हत्या की जांच कई बार की गई, लेकिन यह पता नहीं चल पाया कि उस की हत्या किस ने की. पुलिस द्वारा जहरीली शराब पीने से मौत की पुष्टि कर तकरीबन उस की फाइल बंद कर दी गई थी. अब अंजलि भी समझ चुकी थी कि पुलिस की ओर से कोई डर नहीं है. जितेंद्र की हत्या के बारे में गांव के लोगों की ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी. इस के पीछे वजह यह थी कि वह लोगों की नजरों में अच्छा इनसान नहीं था. वह शराब तो पीता ही था, औरतों व लड़कियों को भी छेड़ता रहता था.

बहुत से लोग उस के मरने पर खुश भी थे. अंजलि तकरीबन एक साल से मनीष से मिल रही थी. कई बार मनीष उसे उपहार भी देता था. अब तो अंजलि का भी मनीष के बगैर मन नहीं लगता था. एक दिन मनीष अंजलि को अपने गोद में ले कर उस के बालों से खेल रहा था. उस ने अपनी इच्छा जाहिर की, ‘‘क्यों न हम दोनों शादी कर लें? कब तक यों ही हम छिपछिप कर मिलते रहेंगे?’’ इस पर अंजलि बोली, ‘‘मुझे कोई एतराज नहीं है, पर मुझे अपनी मां से पूछना होगा.’’ ‘‘तुम अपनी मां को जल्दी से राजी करो.’’ ‘‘मां तो राजी हो जाएंगी, लेकिन यह बात मैं राज नहीं रखना चाहती हूं.’’ ‘‘कौन सी बात?’’ ‘‘यही कि जितेंद्र की हत्या किस ने की थी.’’ ‘‘किस ने की थी?’’ ‘‘मैं ने…’’ ‘‘कैसे और क्यों?’’ ‘‘3 साल पहले की बात है. मेरी एक बहन रिया भी थी.

घर में मां और मेरी बहन समेत हम सभी काफी खुश थे. पिताजी के नहीं होने के चलते मेरी छोटी बहन रिया मौल में काम कर के अच्छा पैसा कमा लेती थी. उसी के पैसों से हमारा घर चल रहा था. ‘‘जब भी मेरी बहन घर से निकलती थी, जितेंद्र अपनी मोटरसाइकिल से उस का पीछा करता था. मना करने के बाद भी वह नहीं मानता था. ‘‘मेरी बहन रिया उस से प्यार करने लगी थी. जितेंद्र ने मेरी बहन से कई बार शारीरिक संबंध बनाए. बहन को विश्वास था कि जितेंद्र उस से शादी जरूर करेगा. ‘‘लेकिन, जितेंद्र धोखेबाज निकला. मेरी बहन रिया को जितेंद्र के बारे में पता चला कि वह कई लड़कियों की जिंदगी बरबाद कर चुका है. मेरी बहन पेट से हो गई थी.

5 महीने तक मेरी बहन शादी के लिए इंतजार करती रही. जितेंद्र केवल झांसा देता रहा. ‘‘आखिरकार जितेंद्र ने शादी करने से इनकार कर दिया था. उस का मेरी बहन से झगड़ा भी हुआ था. ‘‘मेरी बहन परेशान रहने लगी थी. उस ने मुझे सबकुछ बता दिया था. मैं बहन को ले कर अस्पताल गई थी. वहां मैं ने उस का बच्चा गिरवाया, पर वह कोमा में चली गई थी. उस का बच्चा तो मरा ही, मेरी बहन भी दुनिया छोड़ कर चली गई. उसी दिन मैं ने कसम खाई थी कि जितेंद्र का अंत मैं ही करूंगी. ‘‘इस बार मैं ने गोरा को फंसाया था. मैं भी उस से प्यार का खेल खेलती रही. उस ने कई बार मुझे हवस का शिकार बनाना चाहा, लेकिन मैं उस से अपनेआप को बचाती रही. ‘‘उस दिन जितेंद्र ने मुझे अपने गुसलखाने में बुलाया था. मैं सोच कर गई थी कि आज रात काम तमाम कर के आना है. मैं ने उस की शराब में जहर मिला दिया. ‘

‘मैं उस की मौत को नजदीक से महसूस करना चाहती थी, इसलिए उस की हत्या करने के बाद मैं भी उस के साथ रातभर रही. वह तड़पतड़प कर मेरे सामने ही मरा था. ‘‘सुबह मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. जानबूझ कर उस के शरीर से मैं लिपटी हुई थी, ताकि कोई देखे तो गोरा को जिंदा समझे. पकड़े जाने पर पुलिस को गुमराह किया जा सके. हत्या के बारे में शक किसी और पर हो. यही हुआ भी. तुम ने मुझे बेकुसूर समझा. ‘‘मैं शादी करने से पहले सबकुछ तुम्हें बता देना चाहती हूं, ताकि भविष्य में पता चलने पर तुम मुझे गलत न समझ सको. मैं ने अपनी बहन रिया की मौत का बदला ले लिया, इसलिए मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं है.’’

मनीष यह सुन कर हक्काबक्का था. उस के मन में थोड़ा डर भी हुआ, लेकिन जल्द ही अपनेआप को संभालते हुए बोला, ‘‘तुम ने ठीक ही किया. तुम ने उस को उचित सजा दी है. तुम्हारे ऊपर किसी तरह का इलजाम लगता भी तो मैं अपने ऊपर ले लेता, क्योंकि मैं अब तुम से प्यार करने लगा हूं.’’ अंजलि ने मनीष को अपनी बांहों में ले कर चूम लिया था. वह अपनेआप पर गर्व कर रही थी कि उस ने गलत इनसान को नहीं चुना है. फिर वह सुखद भविष्य के सपने देखने लगी थी. उन दोनों ने जल्दी ही शादी कर ली. अंजलि अब मनीष को अपना राजदार समझती थी.

प्रायश्चित्त

“राजकुमारी, वापस आ गई वर्क फ्रौम होम से? सुना तो था कि घर पर रह कर काम करते हैं पर मैडम के तो ठाठ ही अलग हैं, हिमाचल को चुना है इस काम के लिए.” बूआ आपे से बाहर हो गई थी मिट्ठी को अपनी आंखों के सामने देख कर.

“अपनाअपना समय है, बूआ. कोई अपनी पूरी ज़िंदगी उसी घर में बिता देता है जहां पैदा हुआ हो और किसी को काम करने के लिए अलगअलग औफिस मिल जाते हैं, वह भी मनपसंद जगह पर,” मिट्ठी ने इतराते हुए बूआ के ताने का ताना मान कर ही जवाब दिया.

बूआ पहले से ही गुस्से में थी, अब तो बिफर पड़ी, “सिर पर कुछ ज्यादा चढ़ा दिया है, तुझे. पर मुझे हलके में लेने की गलती मत करना. तेरी सारी पोलपट्टी खोल दूंगी भाई के सामने. नौकरी ख्वाब बन कर रह जाएगी. मुंह पे खुद ही पट्टी लग जाएगी.”

“आप से ऐसी ही उम्मीद है, बूआ. लेकिन कोई भी कदम उठाने से पहले सोच लेना कि मैं मां की तरह नहीं हूं, जो तुम्हारे टौर्चर से तंग आ कर अपनी जान से चली गई.”

बूआ मिट्ठी को मारने के लिए दौड़ी ही थी कि कुक्कू बीच में आ गया. उन्हें दोनों हाथों से पकड़ कर अंदर ले गया. तब तक गुरु भी आ गया था. वह मिट्ठी को उस के कमरे तक छोड़ कर आया. मिट्ठी आंख बंद कर के अपनी कुरसी पर बैठ गई. जो उस ने जाना था उस से भक्ति बूआ के लिए उस की नफ़रत और भी बढ़ गई थी. बचपन से ही उसे बूआ से नफ़रत थी. वजह, उन का दोगला व्यवहार. कुक्कू और गुरु को हमेशा प्राथमिकता देती. घर का कोई भी काम हो, मिट्ठी से करवाती और हर बात में उसे ही पीछे रखती. घर में खाना उन दोनों की पसंद का ही बनता था. मिट्ठी का कुछ मन भी होता तो उस में हज़ार कमियां बता कर बात को टाल दिया जाता. मिट्ठी को समझ नहीं आता था कि वह अपनी ससुराल में न रह कर उन के घर में क्यों रह रही है. सब के सामने उन का बस एक ही गाना था-

‘मां तो छोड़ कर चली गई अपने दोनों बच्चों को. वह तो मेरी ही हिम्मत है जो अपना घरबार छोड़ कर यहां पड़ी हुई हूं इन की परवरिश के लिए.’

‘अब तो हम बड़े हो गए हैं, अब तो अपना घर संभालो जा कर.’ मन ही मन मिट्ठी बुदबुदाती. घर में सबकुछ बूआ की मरजी से ही होता आ रहा था. मिट्ठी और उस का छोटा भाई कुक्कू उन की हर बात मानते आ रहे थे. बूआ का बेटा गुरु भी कुक्कू का हमउम्र था, इसलिए दोनों साथ ही रहते थे. लेकिन मिट्ठी को अब घर में रहना और बूआ के कायदेकानून से चलना बिलकुल पसंद नहीं आ रहा था. यही कारण था कि उस ने कालेज पूरा होते ही नौकरी ढूंढ ली थी. पैकेज ज्यादा नहीं था. नौकरी दूसरे शहर में थी. छह महीने होतेहोते कंपनी में उस की अच्छी साख बन गई थी. घर आने का उस का मन ही नहीं होता था. इस बार पापा से ज़िद कर के उस ने हिमाचल वाले फ्लैट में रहने का मन बनाया. वर्क फ्रौम होम ले लिया. कुक्कू को जैसे ही भनक लगी, तुरंत उस के पास आया.

“देखो दीदी, मैं जानता हूं, तू हिमाचल क्यों जा रही है. मां के बारे में जानने का मेरा भी उतना ही मन है जितना तुम्हारा. बस, मैं कभी दिखाता नहीं हूं. मेरी भी अब छुट्टियां हैं. मैं भी वहीं पर कोई इंटर्नशिप कर लूंगा.”

मिट्ठी को कुक्कू की बात सही लगी और उसे साथ ले जाने को तैयार हो गई. गुरु को उस के पापा ने अपने पास बुला लिया था, इसलिए दोनों भाईबहन अपनाअपना सामान ले कर रवाना हो गए. बूआ अपने बेटे गुरु को उन के साथ भेजना चाहती थी लेकिन पति को मना नहीं पाई. भौंहें तान कर मिट्ठी और कुक्कू को विदा किया.

“गगन, तूने भेज तो दिया हिमाचल पर कोई बीती बात बच्चों के सामने आ गई तो क्या होगा ? उसी फ्लैट में रुकने की क्या पड़ी थी, किसी होटल में भी तो रुक सकते थे. तुम तो सब कुछ भूल गए हो.” बूआ ने लगभग डांटते हुए अपने भाई गगन को अपनी बात समझाने की कोशिश की.

“दीदी, 20 साल बीत चुके हैं उस घटना को. हम ने कोई जुर्म नहीं किया है जो छिपे रहेंगे और बच्चों को उस फ्लैट से दूर रखेंगे. वे दोनों उसी फ्लैट में पैदा हुए थे. अपनी जन्मभूमि इंसान को अपनी ओर खींच कर बुला ही लेती है. आप डरिए मत. सब ठीक होगा.” गगन ने अपनी बड़ी बहन को समझाने की कोशिश की.

“मिट्ठी अब कब तक ऐसे ही बैठी रहेगी? चल उठ, नहा कर आ जा. नाश्ता ठंडा हो गया है. हम दोनों कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं? मुझे भी सुनना है तुम लोग कैसे बिता कर आए हो मेरे बिना पूरा एक महीना.” गुरु मिट्ठी को बाथरूम भेज कर ही कमरे से बाहर गया.

“पापा मेरी कंपनी का एक औफिस शिमला में भी है. मैं ने सोचा है वहीं पर ट्रांसफर ले लेती हूं. अपना फ्लैट तो है ही वहां पर,” शाम को पापा घर आए तो मिट्ठी ने प्रस्ताव रखा.

“देखो बेटा, कुछ दिन वहां जा कर रहना दूसरी बात है और वहीं ठहर जाना बिलकुल अलग. तुम जहां हो, अभी वहीं पर रह कर काम करो,” पापा की स्पष्ट न थी.

“पापा, आप ने भी तो सालों वहां पर नौकरी की है. अपना फ्लैट बंद पड़ा है, मैं रहूंगी तो उस का अच्छे से रखरखाव भी हो जाएगा. फिर मेरा मन है वहां जा कर रहने का. प्लीज, एक बार मेरी तरह सोच कर देखो न,” मिट्ठी ने डरतेडरते अपनी बात दोहराई.

“तुझे सीधी तरह से कोई बात क्यों नहीं समझ आती है, लड़की? गगन वैसे ही उन बातों को याद करके परेशान हो जाता है, तुम हो कि खुद के अलावा किसी के बारे में सोचती ही नहीं हो. जा कर अपना काम करो,” बूआ ने अपने लहजे में मिट्ठी को डांटा. पापा के सामने मिट्ठी चुप रह जाती थी लेकिन आज उसे गुस्सा आ गया.

“आप से कौन बात कर रहा है, बूआ? पापा को ही जवाब देने दो. हिमाचल के नाम से इतना डर क्यों जाती हो? कहीं आप के कहने से ही तो पापा वापस नहीं आए वहां से, आप को इसी घर में जो रहना था?” गुस्से में मिट्ठी बोलती चली गई.

गुरु और कुक्कू आ कर उसे अपने साथ ले गए. घर में क्लेश पसर गया. उस रात किसी ने भी खाना नहीं खाया. गगन का गुस्सा शांत हुआ तो बेटी पर प्यार उमड़ पड़ा और उस के कमरे में आ गए. मिट्ठी लैपटौप पर कुछ काम कर रही थी. उसे देख कर गगन जाने के लिए वापस मुड़े, तभी बेटी ने आवाज़ लगाई.

“आइए पापा, मेरा काम तो पूरा हो गया है. बस, कुछ फोटो देख रही थी हिमाचल की.” गगन मिट्ठी के पास दूसरी कुरसी पर बैठ कर फोटो देखने लगे.

“यह फोटो तुम्हे कहां से मिली?” गगन, मिट्ठी, कुक्कू और नीतू की फोटो थी. मिट्ठी ने आश्चर्य से पापा को देखा, बोली, “फ्लैट के स्टोररूम में कुछ सामान पड़ा हुआ था. यह फोटो उस समान में ही थी.” मिट्ठी ने बताया तो गगन ने आगे पूछा, “बाकी सामान कहां है?”

“इस में है, पापा. आपकी और मम्मी की बहुत सारी यादें. मैं अपने साथ उठा लाई. मिट्ठी ने एक थैला गगन के हाथ में थमा कर दरवाज़ा बंद कर दिया. उसे डर था कि पापा को उन के कमरे में नहीं पाएंगी, तो भक्ति बूआ यहीं धमक पड़ेंगी. पापा जितनी देर घर में रहते हैं, उन की नज़र उन्हीं पर रहती है बूआ की, विशेष रूप से जब मिट्ठी आसपास हो तब. पापा उदास हो गए थे उन फोटो को देख कर, मम्मी के छोटेमोटे सामान को देख कर.

“कितना समझाता था कि छोटीछोटी बातों को दिल से लगाना ठीक नहीं लेकिन उसे तो बात की तह तक जाना होता था. क्यों कही, किस ने कही, क्या जवाब देना चाहिए था, बस, इसी में घुलती रहती थी.”

मिट्ठी को अच्छा लगा. बड़े दिनों बाद पापा ने मम्मी के बारे में खुल कर कुछ बोला था. पर अचानक पापा खड़े हो गए. “बेटा, तुम अपना काम करो, मैं चलता हूं. तुम्हारी बूआ ने दूध बना कर रख दिया होगा. उस के भी सोने का टाइम हो गया है. दिनभर काम में लगी रहती है.” दरवाजा बंद कर के पापा मिट्ठी के कमरे से बाहर निकल गए.

बूआ के लिए पापा की चिंता नई बात न थी. उन के एहसान में दबे हुए थे, पापा. उन के बच्चों की परवरिश कर के बूआ ने उन पर बड़ा एहसान चढ़ा दिया था. मिट्ठी ने सामान वापस समेट कर रख दिया. किसी और को पता चल जाता तो बात का बतंगड़ बन जाता. मां के बारे में घर में कोई भी बात नहीं करता था. कुक्कू के ऊपर बूआ अपना अतिरिक्त प्यार लुटाती थी, इसलिए उसे मां की कमी बस तभी महसूस होती जब मिट्ठी को रोते हुए देखता. मिट्ठी जब भी घर में होती उसे मां की कमी हर पल महसूस होती. बचपन के दिन याद आ जाते. मां कैसे हर जगह उसे साथ रखती थीं.

‘लड़के की इतनी परवा नहीं है जितनी लड़की की है. दिनभर इसी के चोंचलों में लगी रहती है. पढ़लिख कर दिमाग खराब हो जाता है छोरियों का. आखिर वंश तो लड़के से ही चलेगा. लड़की को तो एक दिन अपने घर चली जाना है.’ बूआ के ऐसे ताने से मां आहत होती लेकिन हंस कर जवाब देती.

‘दीदी, आप और मैं भी तो लड़कियां ही हैं. और फिर आप के घर का तो रिवाज़ है. आप अपनी ससुराल नहीं गईं तो मिट्ठी को भी यहीं रख लेंगे.’ मां के जवाब से बूआ आपे से बाहर हो जाती.

‘मेरी क्या रीस करनी है? मेरी तो मां बचपन में ही मर गई थी. गगन को अपने हाथों से पाला है मैं ने. कोई बूआ, चाची या ताई भी नहीं थी जो संभाल लेती. गगन ही नहीं जाने देता है. रहो अपने घर और ससुर की भी रोटी सेंको. मैं तो कल ही चली जाऊंगी अपने घर.’

मां फिर हंस पड़ती. ‘नाराज़ क्यों होती हो, दीदी? आप के भाई ही मुझे साथ ले कर गए हैं. मेरा तो मन भी नहीं लगता वहां. यहां छोड़ेंगे तो ससुरजी को रोटी नहीं, सब्जी भी खिलाऊंगी. रिटायर हो गए हैं, खुद ही सब काम करते हैं फिर भी. मुझे अच्छा नहीं लगता है.’

बूआ बात को पकड़ कर अपने पक्ष में कर लेती. ‘तो इसीलिए तो अपना घरबार छोड़ कर पड़ी हूं यहां. तुम अपना घर संभाल लेती तो गगन क्यों मुझे रोके रखता?’ कुछ भी कर के मां के सिर पर हर बात पटक दिया करती थी, बूआ.

कई सालों बाद इस बार नाना मिट्ठी के सामने ही आए. मां के जाने के बाद हर साल नाना दोनों नातियों से मिलने बेटी की ससुराल आते थे. न कोई उन से बात करता था और न ही कोई उन के पास बैठता था. अकेले आते थे और दोनों बच्चों को उन के हिस्से का चैक दे कर चले जाते थे.

नाना ने अपनी वसीयत में अपने बेटे और बेटी को बराबर का हिस्सा दिया था. सालभर की कमाई का आधा हिस्सा बेटी के दोनों बच्चों को दे जाते थे उस के जाने के बाद.

‘कितना फजीता किया था हमारे परिवार का इस आदमी ने. अब लाड़ बिखेरने आता है, बच्चों पर. इस की बेटी गई तो पुलिस ले कर गया था फ्लैट पर. अखबार में भी खबर दी कि मार दिया मेरी बेटी को,’ नाना चले गए तो बूआ का बड़बड़ाना शुरू हो गया.

“वे हमारे नाना हैं, बूआ. उन के बारे में ऐसा सोचना ठीक नहीं,” कुक्कू ने बोला तो बूआ ऐसे शुरू हुई जैसे इंतज़ार ही कर रही थी.

“तेरे दादा और पापा को जेल की हवा खानी पड़ती. वह तो तेरी मां की मैडिकल जांच में नहीं निकला कि उस को मारा है किसी ने.” मिट्ठी चाहती थी कि बूआ और भी कुछ बोल दे. “आप तो तब फ्लैट पर ही थी बूआ. पूजा भी आप ने ही रखवाई थी और पंडित को भी आप ही ले कर गई थी. आप को तो सच पता था, फिर आप ने क्यों छिपाया यह सब.” बूआ आज़ पहली बार डर अपने चेहरे पर छिपा नहीं पाई.

“तुझे किस ने बताया यह सब?” मिट्ठी इसी सवाल का जवाब देना चाहती थी.

“आप के पंडित ने, उन सब लोगों ने जो पूजा में आए थे, पड़ोस वाले.” बूआ सीधे मिट्ठी के सामने आ कर खड़ी हो गई.

“इसीलिए मैं नहीं चाहती थी कि तू जाए वहां पर. यही सब कर के आई है वर्क फ्रौम होम के बहाने.” बूआ के हर शब्द से गुस्सा टपक रहा था.

“मम्मी, पापा आए हैं. थोड़ा ध्यान उन पर दो. अकेले बैठे हैं बैठक में.” गुरु बूआ को वहां से ले गया और मिट्ठी भी पीजी वापस जाने के लिए अपना सामान पैक करने चली गई. गुरु 2 साल से खाली घूम रहा था. छोटीमोटी नौकरी उसे समझ नहीं आती थी और बड़ी के लायक न तो उस में काबिलीयत थी और न ही उस ने कोशिश की. जैसेतैसे इंजीनियरिंग पास की थी.

“मां, मुझे उसी कंपनी में नौकरी मिल गई है जिस में मामा काम करते थे.” गुरु ने घोषणा की तो बूआ रसोई से लड्डू का डब्बा उठा कर ले आई. कुक्कू ने लड्डू खा कर डब्बा उन के हाथ से ले लिया.

“बूआ, तुम खा लो, फिर बैठक में ले जा रहा हूं और वहां से बच कर नहीं आएंगे.” बूआ रोकती रह गई पर कुक्कू डब्बा उठा कर भाग गया. मिट्ठी बिना कुछ कहे ही घर से निकल गई. बूआ ने रोकने की कोशिश नहीं की. पीजी में जाते ही बिस्तर पर लेट गई. हमेशा की तरह मां याद आ रही थी.

‘एक हफ्ता तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी मां?’ मां पहली बार कुक्कू को ले कर नाना के घर गई तो मिट्ठी को पापा ने अपने पास ही रोक लिया था. रोतेरोते मुंह से निकल गया था मिट्ठी के. बाथरूम में चली गई मुंह धोने के लिए जिस से पीजी की बाकी लड़कियों को शक न हो. हर बार घर से आ कर एकदो दिन इसी तरह परेशान रहती थी मिट्ठी.

चार दिनों बाद ही पापा का फोन आया, देख कर मिट्ठी सोच में पड़ गई. पहली बार में तो फोन उठाना ही भूल गई. दूसरी बार जब आया तो उठाया, ‘बेटा, तुम्हारी भक्ति बूआ एक पूजा करवाना चाहती हैं. शिमला वाला फ्लैट तुम्हारी मां के जाने के बाद से बंद ही है. अब गुरु वहीं रहेगा, इसलिए पूजा कर के उसे पवित्र करवाना चाहती हैं. अगले रविवार को तुम भी थोड़ा समय निकाल लेना.”

“पापा, आप को पता है, मां जब से गई हैं, विश्वास उठ गया है मेरा पूजापाठ से.” मिट्ठी ने स्पष्ट किया.

“जानता हूं, बेटा. पर हो सकता है यह पूजा तुम्हारे टूटे विश्वास को जोड़ने में कामयाब हो जाए. ऐसा करते हैं, इस पूजा को तुम ही करवाओ. पंडितजी से तो मिल ही चुकी हो.” मिट्ठी समझ गई, वह मना नहीं कर पाएगी पापा को. तभी एक विचार उस के दिमाग में कौंधा.

“ठीक है पापा, कोशिश करती हूं. फ्राइडे तक आप को बताती हूं. भक्ति बूआ को बोलना अब उन के टैंशन के दिन गए. पंडितजी से मैं खुद ही बात कर लूंगी.”

पापा की खुशी फ़ोन पर ही फूट पड़ी. “अब उस का एहसान चुकाने का समय आ गया है. खुद को भुला कर उस ने हमारे घर को संभाला है. तुम ने यह ज़िम्मेदारी ले कर मेरे दिल का बोझ हलका कर दिया है.” पापा फ़ोन रखने ही वाले थे कि मिट्ठी ने कहा, “पापा, मैं चाहती हूं कि इस पूजा में नाना को भी बुलाऊं. मां के जाने के बाद नानी भी चली गईं. वे भी अकेले ही हैं. दादाजी भी गांव में चले गए हैं उस के बाद. प्लीज, उन दोनों को भी बुलाने दीजिए.”

कुछ देर तक पापा ने कुछ नहीं कहा लेकिन फ़ोन नहीं काटा. फिर यह कहते हुए फ़ोन रखा, “तुम कहती हो तो मना कैसे कर सकता हूं. बुला लो. भक्ति को मैं समझा लूंगा.”

मिट्ठी ने कमरे से बाहर आ कर आसमान की ओर देखा. उसे महसूस हुआ जैसे मां वहीं से मुसकरा कर कह रही है. “आखिर तुम ने रास्ता निकाल ही लिया सच से परदा उठाने का.” मिट्ठी केवल निर्देश दे रही थी और कुक्कू उस का पालन कर रहा था. पापा ने इस बार चौका लगाया था. “भक्ति दीदी, तुम इतने सालों से सब संभालती आ रही हो, अब मुझे भी कुछ करने का अवसर दो. इस बार पूजा की पूरी ज़िम्मेदारी मैं संभाल लूंगा. आजकल वैसे भी सब काम मोबाइल से हो जाते हैं. लंचटाइम में औफिस में बैठ कर सब प्रबंध कर दूंगा.”

भक्ति सकपका कर बोली, “गगन, क्या तू भी यही मानता है कि मेरी पूजा के कारण ही नीतू की जान गई?”

गगन ने दीदी का हाथ पकड़ लिया. “ऐसा कुछ नहीं है, दीदी. तुम ने मिट्ठी और कुक्कू के लिए कितनाकुछ किया है. मैं भी चाहता हूं कि गुरु को नौकरी मिलने और वहां सैट होने में मदद कर पाऊं. बस, इसीलिए आप को तनाव नहीं देना चाहता हूं.”

भक्ति का दिल भाई की बात मानने से इनकार कर रहा था लेकिन उसे मना भी नहीं कर सकती थी. “ठीक है, गगन. मुझे तो इस बात की खुशी है कि तू पूजा के लिए तैयार हो गया है. कितने साल हो गए, घर में कोई शुभ काम नहीं हुआ.”

“अब होगा दीदी और आप को परेशान भी नहीं होना पड़ेगा. बच्चे अब बड़े हो गए हैं. उन को भी ज़िम्मेदारी लेना सीखना चाहिए न. बस, इस बार उन की ही सहायता लूंगा.”

निश्चित तारीख पर सब लोग शिमला के उस फ्लैट में इकट्ठे हो गए. दादाजी और नाना को कुक्कू ने मना लिया. सब काम तैयार हो गया तो मिट्ठी भी आ गई. पूजा शुरू हुई. पंडितजी ने हवन और आरती करने के बाद जैसे ही जाने को कहा, भक्ति बूआ ने आदतन उन्हें रोक लिया.

“पंडितजी, गुरु की कुंडली देख कर बताइए कि क्या सावधानियां रखनी हैं और कुछ ऊंचनीच हो जाए तो क्या उपाय होगा?”

पंडितजी ने काफ़ी देर तक कुंडली को देख कर कुछ गणना की, फिर बोले, “गुरु मामा की छोड़ी हुई नौकरी पकड़ रहा है. उन्हीं के घर में रहेगा तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बहूरानी की आत्मा इन से संपर्क करे.” भक्ति बूआ ने तुरंत गुरु की कुंडली पंडितजी के हाथ से ले ली. लेकिन उन्होंने अपनी बात जारी रखी. “आज़ की पूजा में ही अगर कुछ मंत्र और पढ़ लिए जाएं और सच्चे दिल से बहूरानी को याद कर के उन से माफ़ी मांगी जाए तो बला टल सकती है.”

सब भक्ति बूआ की ओर देख रहे थे.

“तो जो सही है वो करो, मैं कौन सा मना कर रही हूं. इन बातों का कुछ मतलब थोड़े ही है.” बूआ उठ कर जाना चाहती थी लेकिन फूफाजी ने बिठा दिया.

“पंडितजी, जो बाकी है उस को भी पूरा कीजिए. बेटे को मुश्किल से रोज़गार मिला है, उस में कोई अड़चन न आए, उस का उपाय आप शुरू कीजिए.”

पंडितजी ने मंत्र पढ़ने शुरू किए. सबसे पहले नानाजी बोले. “नीतू बेटा, अगर तू सुन रही है तो मुझे माफ़ करना. मैं समय से तुम्हारी चिट्ठी नहीं पढ़ सका. तुम बच्चों को ले कर मेरे पास आना चाहती थीं लेकिन तुम्हारा खत मुझे तुम्हारे जाने के बाद मिला.”

अब पापा भी चुप नहीं रहे. पहली बार उन्होंने बच्चों के सामने अपनी पत्नी को ले कर कुछ कहा. “मैं भी खतावार हूं, नीतू. तुम्हारे मना करने पर भी मैं ने अपने बिजनैस के जनून के कारण नौकरी छोड़ी और तुम्हें तुम्हारे घर भी नहीं जाने दिया. मुझे डर था कि ससुराल में मेरी साख कम हो जाएगी.”

अब पंडितजी ने बोल कर सब को चौंका दिया. “हो सके तो माफ़ कर देना, बहूरानी. मैं नहीं जानता था कि तुम पूरे महीने व्रत कर रही थी. मैं ने ही भक्तिजी के कहने पर यह घोषणा की थी कि तुम्हारे कुंडली दोष के कारण ही गगन की नौकरी गई है और व्यवसाय भी शुरू नहीं हो पा रहा है. मुझे पता होता तो तुम्हें लगातार 3 दिन निर्जल, निराहार व्रत का उपाय न बताता.” सब की नजर भक्ति की ओर थी.

फूफाजी ने उन्हें कुछ बोलने के लिए हाथ से इशारा किया. भक्ति बूआ रोते हुए बोली, “नीतू, हो सके तो मुझे भी माफ़ करना. पंडितजी से बात कर के मैं ने ही वह पूजा रखी थी. मेरे कहने पर ही उन्होंने कुंडली देखी थी. दूध पीते बच्चे की मां ऐसी कठिन विधि नहीं अपना पाएगी यह जानते हुए भी मैं ने तुम पर दबाव बनाया.” बूआ बोल ही रही थी कि मिट्ठी बीच में बोल पड़ी.

“मां को 3 दिनों से उलटीदस्त हो रहे थे, फिर भी वे पूजा के काम में लगी रहीं और अपनी दवाई भी नहीं ले पाईं व्रत करने के कारण. अगर दवा लेतीं तो उन को हार्टअटैक न आता.”

आज़ पहली बार भक्ति बूआ ने मिट्ठी को घूर कर नहीं देखा.

नाना उठ कर खड़े हो गए. “बस, यही जानने के लिए मैं बेचैन था. अगर सही बात पता चल जाती तो मैं पुलिस के पास कभी न जाता. मेरी बेटी अचानक चली गई, अपनी नातियों से रिश्ता क्यों तोड़ता.”

कुक्कू ने नाना को पकड़ कर बिठा दिया और खुद भी उन के पास ही बैठ गया. फूफाजी ने भक्ति बूआ को वहां से उठा दिया और सामान ले कर चलने लगे. आज़ गगन ने उन्हें नहीं रोका.

बूआ खुद ही गगन के पास आई. “हो सके तो माफ़ कर देना, मेरे भाई. इसी एक गलती को सुधारने के लिए अपने घर नहीं गई.”

“पर मुझे तो सच बता देतीं, दीदी. जीनामरना अपने हाथ में नहीं है लेकिन मेरे विश्वास का कुछ तो मान रखतीं आप.”

भक्ति बूआ साड़ी के पल्लू में मुंह छिपा कर रो रही थी. फूफाजी ने आ कर पापा को सांत्वना दी.

“इस गलती की सज़ा अब मिलेगी इस को. अब यह तब तक तुम्हारे घर नहीं आएगी जब तक तुम बुलाओगे नहीं.” दादाजी उठने की कोशिश कर रहे थे लेकिन मिट्ठी ने उन्हें रोक दिया.

“भक्ति को विदा कर देता हूं, बेटा. शादी के 26 साल बाद ससुराल जा रही है. अब तो तू सब संभाल लेगी. उस को जाने दो.”

कुक्कू पंडितजी की ओर देख कर मुसकरा दिया. उन के प्रायश्चित्त पाठ ने वह कर दिखाया था जो सालों से कोई नहीं कर पाया था.

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