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Parenting Problem : मेरा बेटा जन्‍म से स्लो चाइल्ड है. अब 22 साल का है.

Parenting Problem : सवाल – मैं ने उस की प्रोग्रैस के लिए बहुत मेहनत की है. फिलहाल एक एनजीओ में वह स्किल ट्रेनिंग ले रहा है अपनी क्षमता के अनुसार. मैं उस के भविष्य को ले कर चिंतित रहती हूं. एक स्ट्रैस हमेशा दिमाग में बना रहता है. क्या करूं?

जवाब – आप की चिंता समझ जा सकती है क्योंकि किसी भी मातापिता के लिए अपने बच्चे का भविष्य सुनिश्चित करना बहुत महत्त्वपूर्ण होता है, खासकर अगर वह बच्चा सामान्य न हो. खैर, सब से पहले, आप को खुद को और अपने बच्चे को धैर्य रखने की जरूरत है. यदि आप का बच्चा सामान्य बच्चों जैसा नहीं है और सब काम धीरेधीरे सीखता है तो इस का मतलब यह नहीं कि वह भविष्य में सफल नहीं होगा. इस समय उसे पूरे परिवार के सपोर्ट की जरूरत है.

  • अपने बच्चे की प्रगति पर सकारात्मक दृष्टिकोण रखने की कोशिश करें. उस की हर छोटी सफलता को सराहें. यह बच्चे को आत्मविश्वास देगा और उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगा.
  • घर का वातावरण सहायक और आरामदायक होना चाहिए. नकारात्मकता से बचें और अपने बच्चे को इस बात का एहसास कराएं कि वह आप के लिए खास है और आप हमेशा उस के लिए खड़े हैं.
  • आप को यह समझने की आवश्यकता है कि प्रत्येक व्यक्ति का रास्ता अलग होता है. अगर आप के बच्चे का विकास थोड़ा धीमा है तो इस का मतलब यह नहीं कि वह कभी कुछ नहीं कर पाएगा. धीरेधीरे सही दिशा में काम कर के वह अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर सकता है.
  • बच्चे का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा होना बहुत जरूरी है. अच्छे आहार, नियमित व्यायाम और पर्याप्त नींद से उस की ऊर्जा व मानसिक स्थिति बेहतर रहेगी.
  • यदि आप महसूस करते हैं कि आप अकेले हैं तो आप ऐसे मातापिता के सपोर्ट ग्रुप्स में शामिल हो सकते हैं जो आप ही की समान समस्याओं का सामना कर रहे हों. यह आप के मनोबल को बढ़ा सकता है और आप दूसरों से समाधान व सुझाव पा सकते हैं.
  • अगर आप खुद तनाव में रहेंगे तो वह आप के बच्चे को भी प्रभावित कर सकता है. आप व्यायाम या खुद की देखभाल से तनाव को राहत दे सकते हैं.
  • याद रखें कि आप की चिंता स्वाभाविक है लेकिन जो सब से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है वह यह है कि आप अपने बच्चे के लिए एक स्थिर और सहायक वातावरण बनाए रखें.

Parental Burnout : बच्‍चों को चैंपियन और टौपर बनाने के चक्‍कर में परेशान मम्‍मीडैडी

Parental Burnout : परफैक्ट पेरैंटिंग का दबाव बढ़ता जा रहा है. बच्चों को औलराउंडर बनाने के चक्कर में मातापिता आज पेरैंटल बर्नआउट का शिकार हो रहे हैं.

हम बच्चों को अपने जीवन का मोहरा बना लेते हैं. लगता है कि हर कोई हमारे बच्चे की तारीफ करे. पेरैंट्स खुद दूसरों से कहते हैं कि मेरी तरफ देखो, क्या नायाब चीज है मेरा बच्चा, मेरा बच्चा आईपीएल में गया है, स्कूल की तरफ से बाहर गया है, वह स्विमिंग चैंपियन बन गया है. यानी आज पेरैंट्स चाहते हैं कि उन का बच्चा पढ़ाई के साथसाथ ड्राइंग, पेंटिंग, डांस, सिंगिंग, क्राफ्ट, स्पोर्ट्स आदि में भी सब से आगे रहे. इस सब के चलते मातापिता पेरैंटल बर्नआउट की गिरफ्त में आ जाते हैं.

नैचुरल ग्रोथ होने दो

यह आप को उलटवार करता है. बच्चे के बारे में आप सोसाइटी में इतनी बातें करते हैं कि एक दिन वह बच्चा आप के गले की फांस बन जाता है. दूसरे शब्दों में कहें तो वह गले की ऐसी हड्डी बन जाता है जो न निगलते बने न उगलते. दरअसल बच्चे की तारीफ इतनी ज्यादा कर दी जाती है सोसाइटी में कि उसे मैनेज करना एक चैलेंज बन जाता है.

बच्चा है कि आप की अब एक नहीं सुनता, आप पर दबाव बढ़ता ही जा रहा है. इसलिए बच्चे की नैचुरल ग्रोथ होने दो. उस को खादपानी दो लेकिन अपने को उस पर न्योछावर मत करो. बच्चों के लिए उतना करो जितना जेब इजाजत करे. बच्चों के लिए खुद को पूरी तरह न थकाएं. अगर आप भी अपने बच्चों की देखभाल और पालनपोषण के दौरान थकान व तनाव का अनुभव करते हैं, अपने बच्चों की जिम्मेदारियों व अपेक्षाओं के बीच संतुलन नहीं बना पाते हैं और आप को  पर्याप्त आराम व सपोर्ट नहीं मिल पाता है तो सम?िए की कमी खुद में ही है. आइए जानें इस सिचुएशन को कैसे हैंडल करें.

बच्चों को न कहना भी सीखे मां

अगर बच्चे ने बोला  है कि मेरा दोस्त यहां से कोचिंग ले रहा है, मैं भी लूंगा, लेकिन आप को लग रहा है कि वह बहुत महंगा है, आप अफोर्ड नहीं कर पाएंगे तो बच्चे को साफ मना कर दें. इस के अलावा अगर बच्चों का ग्रुप ट्रिप पर बाहर जा रहा है और बच्चा भी जाना चाहे पर आप उसे अकेले नहीं भेजना चाहते तो उसे प्यार से सम?ा कर मना कर दें. उस की हर बात मानना आप के लिए प्रैशर क्रिएट करता है. इसलिए उतना ही करें जिसे आप खुशीखुशी हां कह सकें वरना मना करने की भी आदत डालें.

हर किसी के आगे बच्चों की तारीफ न करें

बच्चों की तारीफों के पुल अगर आज आप रिश्तेदारों के सामने बांध रहे हैं तो ध्यान रखें, कल आप को उसे मैनेज करने के लिए लगातार बच्चों से कुछ अच्छा करने की उम्मीद रखनी होगी ताकि आप ने अपने सर्कल में बच्चों की जो इमेज बनाई है उसे कायम रख सकें. इस के लिए आप के साथसाथ बच्चों पर भी दबाव बनेगा. इसलिए ऐसा करना ही क्यों. आप के बच्चे जैसे हैं उन्हें वैसा ही रहने दें, बेकार के दिखावे के चक्कर में एक्स्ट्रा सिरदर्द लेना ही क्यों.

बच्चों की तरफदारी न करें

आज अगर आप ने जरूरत से ज्यादा बच्चे की तरफदारी की तो यह बच्चा इतना अहं वाला हो जाएगा कि बड़ा होने के बाद यह अपने मांबाप को कुछ नहीं सम?ोगा. उस को लगेगा, मेरी मां को तो कुछ आता ही नहीं है. उस को लगेगा सारा ज्ञान उस के पास है. वह बातबात में आप को आप के ही फ्रैंड्स सर्कल में नीचे दिखाएगा. फिर आप पछताएंगी कि बच्चे को ज्यादा ही सिर चढ़ा लिया है लेकिन तब आप के पास इस का कोई हल नहीं होगा. आप मन मसोस कर रह जाएंगी क्योंकि बच्चा आप की सुनेगा नहीं और बच्चे की वजह से अपनी होती हुई बेइज्जती आप सह पाएंगी नहीं. इसलिए हर गलत बात में बच्चे का साथ न दें. कुछ गलत है तो उसे इग्नोर करने के बजाय बच्चे को उस के बारे में बताएं.

बच्चे की नैचुरल ग्रोथ होने दें

अगर आप की सहेली का बच्चा स्विमिंग सीख रहा है तो यह जरूरी नहीं है कि आप का बच्चा भी वही सीखे. हो सकता है आप के बच्चे का मन न हो या उस के पास टाइम न हो, वह अपनी स्टडीज पर ज्यादा टाइम देना चाहता हो. क्या जरूरत है अपने बच्चे को सब के बच्चों के जैसा बनाने की. आप का बच्चा जिस में अच्छा है उसे वह करने दें. बच्चे की नैचुरल ग्रोथ होने दें.

बच्चों को स्पेस दें

वे वास्तव में हम से ज्यादा जानते हैं और यह आज भी सच है. चाहे हमें यह पसंद हो या न, वे ज्यादातर समय सही होते हैं. आप ने देखा होगा कि बच्चों को लगातार परेशान करना और उन के इर्दगिर्द मंडराते रहना हम में से किसी के लिए भी अच्छा नहीं है. इसलिए स्पेस देना हमेशा मददगार होता है और हम भी टैंशनफ्री रहते हैं.

बच्चे को सहीगलत में फर्क करना सिखाएं

बच्चों की जिद पूरी करने से मातापिता कई बार बच्चों को यह संदेश दे देते हैं कि वे जो भी कर रहे हैं वह गलत नहीं है. बच्चे भी धीरेधीरे इसी व्यवहार को सही मान बैठते हैं. लेकिन ऐसा न करें. बच्चों को बताएं कि गलत और सही क्या है और उस के अनुसार उन के साथ व्यवहार करें.

बच्चा आप का अपमान करे तो बरदाश्त न करें

कई बार बच्चे मांबाप से ?ागड़ा करने के दौरान बहुत जिद करते हैं और मांबाप का अपमान भी करने लगते हैं. वहीं, बच्चों का यह व्यवहार धीरेधीरे घर के बाहर यानी स्कूल में, पड़ोसियों और रिश्तेदारों के बीच भी दिखाई देने लगता है. इस बात को ले कर कई बार मातापिता इतनी टैंशन ले लेते हैं कि अपने में बीमारी लगा लेते हैं. अगर आप के साथ भी ऐसा हो रहा है तो बच्चे को सम?ाएं. न सम?ो तो उस से कुछ दिन बात न करें. वह खुद ही बेचैन हो जाएगा और तब उसे बताएं कि आप ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे थे.

बच्चों से परफैक्ट होने की उम्मीद न करें

सब से महत्त्वपूर्ण बात, अपने बच्चों से परफैक्ट होने की उम्मीद न करें और हमेशा याद रखें, कोई भी आप को उतना प्यार नहीं करेगा जितना वे करते हैं.

हमें पहले इंसान और फिर मातापिता के तौर पर सीखना होगा कि कोई भी परफैक्ट नहीं होता. इसलिए हम किसी और, खासकर अपने बच्चों से परफैक्शन की उम्मीद नहीं कर सकते. इन अवास्तविक अपेक्षाओं को दूर करने से मातापिता के तौर पर हम पर और हमारे बच्चों पर बो कम होगा.

पेरैंट्स के रूप में कई बार हमें ऐसा लगता है कि हम अपना 100 प्रतिशत नहीं दे रहे हैं. इस जगह हम न केवल तनाव महसूस करते हैं, बल्कि हमें असफलताओं का अनुभव भी होता है. ऐसे में खुद को दोष न दें, बल्कि अपने लिए थोड़ा समय निकालें और बच्चों के बचपन को खुद भी एंजौय करें व उन्हें भी एंजौए करने दें.           –

Accident : दुर्घटना हो जाए तो

Accident : दुर्घटना के बाद सही कदम उठाना आप के और दूसरों के लिए मददगार हो सकता है लेकिन आमतौर पर लोगों को इस की जानकारी कम होती है कि ऐसी परिस्थिति में वे क्या करें. जानिए यदि रास्ते में दुर्घटना हो जाए तो क्या करें.

आज की दौड़भाग वाली जिंदगी में हादसा कभी भी किसी के साथ भी हो जाता है. ऐसे समय कुछ सम झ नहीं आता कि क्या करें. हम अकेले होते हैं तो स्थिति बेहद खराब होती है. लेकिन हमारी हिम्मत ही हमें हर आपदा से बाहर निकाल सकती है. यदि हम घबरा गए तो शायद जिंदगी भी हम से प्यार नहीं करेगी.

निशा का एक्सिडैंट हुआ और उस का पैर टूट गया. पुलिस केस के कारण कोई भी सामने से मदद के लिए नहीं आता है. ऐसे में निशा घबरा गई उस के हाथपैर फूल गए और उस की घबराहट इतनी बढ़ गई कि वह पैनिक हो गई और उस की हालत बिगड़ती चली गई. लगभग 2 घंटे बाद उसे ट्रीटमैंट मिला, लेकिन खून ज्यादा बहने के कारण और उस के पैनिक होने से डाक्टर उसे बचा न सके.

प्रिया के घर में जोर से धमाका हुआ, कुकर फट गया था और आग लग गई. उस ने किसी तरह जा कर रसोई में देखा तो गैस को तुरंत बंद किया. सारे खिड़कीदरवाजे खोले और आग को बु झाने का प्रयत्न किया. जोर से चिल्ला कर आसपड़ोस के लोगों को भी बुला लिया, इस तरह एक बड़ा हादसा होतेहोते बच गया. अगर वह बिना सम झदारी के अपना आपा खो देती तो एक बहुत बड़ा हादसा उस के साथसाथ दूसरों को भी निगल लेता. यह हादसा भयानक दुर्घटना का रूप ले सकता था.

डिंपल सुबहसुबह वाक करने के बाद टूव्हीलर पर घर वापस आ रही थी तो पीछे से आती हुई कैब ने उसे जोर से टक्कर मार दी और एक्सिडैंट कर के उस का ड्राइवर भाग गया. एक्सिडैंट इतना भीषण था कि वह संभल न सकी. पिछला टूव्हीलर का पहिया जाम हो गया और और टूव्हीलर उस के पैरों के ऊपर जा कर गिरा. सीधे तरफ गाड़ी जाम हो कर ऐसी गिरी कि उस के सिर, कंधे और सीधे शरीर में बहुत मार लगी. काइनेटिक हौंडा पर रखा हुआ उस का पर्स, बैग, फोन सड़क पर इधरउधर बिखर गए?.
उस का टूव्हीलर उछल कर उस के पैरों पर गिरा और वह इतनी जोर से सड़क पर गिरी थी कि उस के कंधे की और पैर की हड्डी टूट गई. सिर पर मार के कारण सिर घूम रहा था, असहनीय दर्द के अतिरिक्त कुछ सम झ नहीं आया. उस से हिला भी नहीं जा रहा था दूसरी तरफ से आते हुए ट्रक को देख कर उस के हौसले पस्त होने लगे.
वह सहायता ढूंढ़ रही थी लेकिन कोई नजर नहीं आया. इक्कादुक्का लोग सड़क के किनारे वाक के लिए निकलते दिखे. आजकल लोग स्वयं किसी की मदद करने को आगे नहीं आते हैं. वे पुलिस के झं झटों से बचने का प्रयास करते हैं.

डिंपल ने खुद को हिलाने की कोशिश की, किंतु असमर्थ हुई. फिर उस ने अपने मन को मजबूत कर के मदद के लिए गुहार लगाई. जिस से एकदो लोग वहां आ गए. दूर से आते हुए ट्रक की गति भी कम हो गई. उन्होंने जल्दी से उस का टूव्हीलर उठा दिया और बोले, ‘‘मैडम, उठ जाओ.’’
डिंपल बोली, ‘‘मैं उठ नहीं सकती हूं, मेरी उठने में मदद करें.’’

उन दोनों का सहारा ले कर वह किसी तरह सड़क के किनारे बैठ गई. तब तक दर्द के अलावा कुछ सम झ नहीं आ रहा था. सुबह 7 बजे का वक्त था. सड़कों पर ज्यादा लोग नहीं थे. उसे सम झ नहीं आया कि वह क्या करे. मदद करने वाले लोग उसे किनारे पर छोड़ कर जा चुके थे.
उस ने देखा उस के पैर बुरी तरह छिल चुके हैं, हड्डी दिख रही है. पैरों से खून निकल रहा है. उस ने पैरों को दबा कर सहलाने की कोशिश की तो दर्द की तीखी लहर ने बहाल कर दिया. उस के घाव पर मक्खियां बैठने लगीं, कपड़े फट गए थे, हाथों, कोहनी, घुटने पैर के पंजे ज्यादा छिल गए. सीधा हाथ हिलाने में असमर्थ थी. उस ने कोशिश की लेकिन उठ नहीं सकी.

वह मदद के लिए घर पर फोन करना चाहती थी, लेकिन फोन उस के पास नहीं था. लोगों ने उस के बैग में सामान रख कर हौंडा पर रख दिया था. वह उठने में असमर्थ थी. तभी उस ने देखा एक बच्चा जो स्कूल बस का इंतजार कर रहा था वह उस के पास आया और बोला, ‘‘आंटी आप को चोट लगी है कुछ मदद करूं?’’
‘‘हां बेटा, सामने वह पर्स पड़ा है उसे मु झे पकड़ा दो.’’
उस ने अपने बैग से रुमाल निकाला और जहां पैरों में खून आ रहा था उस को बांध लिया.
तभी उस के पास एक कपल आया उन्होंने कहा कि आप को कहीं छोड़ दें?
डिंपल ने कहा, ‘‘मैं काफी देर से घर पर संपर्क करने की कोशिश कर रही हूं कोई फोन नहीं उठा रहा है. पीछे बिल्ंिडग में मेरा घर है आप वहां से किसी को बुला लाइए. मेरी हौंडा यहां है छोड़ कर नहीं जा सकती हूं, डैमेज है.’’
तब तक उस ने अपनेआप को शांत करने की कोशिश की. जहांजहां से खून निकल रहा था वहां अपनी चुन्नी को फाड़ कर बांध लिया. जब तक वह महिला परिवार वालों को बुलाने गई, वह लगातार अपने हस्बैंड से संपर्क करने की कोशिश करती रही. आखिरकार कोशिश सफल हुई. उस ने अपने हस्बैंड से कहा कि आप गाड़ी ले कर आएं मेरा एक्सिडैंट हो गया है और तुरंत अस्पताल जाना होगा.
इस तरह आधे घंटे के भीतर उसे अस्पताल जाने के लिए सहायता मिल गई. लेकिन इतना आसान नहीं था. एक्सिडैंट का केस था तो पुलिस कार्यवाही हुई. अस्पताल में पंचनामा किया गया. एक घंटे के भीतर उपचार शुरू हो गया.

समझदारी से काम लें

इसी तरह एक और किस्सा हुआ. महेश किसी काम से स्कूटर से शहर के बाहर गया था. वापसी में लौटते समय अंधेरे में एक सरिया लोहे का उस के पैर को भेद गया, गाड़ी फिसल कर गिर गई. पैरों से काफी खून आ रहा था क्योंकि हाईवे पर कोई मदद नहीं मिलती है. उस ने अपनी शर्ट उतारी और पैरों को कस कर बांध लिया और अपने घर वालों को फोन किया कि मैं जल्दी से घर पहुंचने वाला हूं डाक्टर को बुलाओ. किसी तरह तेजी से स्कूटर को तेज चला कर वह घर पहुंचा, आधे घंटे में काफी खून बह चुका था घर पहुंच कर वह बेहोश हो गया.

लेकिन उस ने फोन से घर वालों को सतर्क कर दिया था और डाक्टरी सहायता मिल गई, हालांकि रिकवरी में लंबा समय लगा, लेकिन यदि ऐसी सम झदारी नहीं दिखाई होती तो कुछ भी अनहोनी हो सकती थी.
दुर्घटना कहीं भी हो सकती है घर में हो सकती है, घर के बाहर हो सकती है, कोई भी दुर्घटना हो सकती है पर इस में घबराने की जगह संयम से उसे बाहर निकालने के उपाय सोचने चाहिए.

नीता के घर में सिलैंडर लीकेज हो गया. उस ने सम झदारी दिखाई और पूरे घर की खिड़कीदरवाजे खोल कर सब को घर से बाहर निकाल दिया और फायर ब्रिगेड को तुरंत सूचित किया. सम झदारी दिखाने से घटना टल गई.
दुर्घटना के वक्त यदि आप अकेले हैं. तो कुछ बातों का ध्यान रखें – प्राथमिक उपचार स्वयं करने का उपाय करें.

शांत रहें और घबराएं नहीं

घबराहट में क्योंकि हमारी मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है और परिस्थितियों को बिगाड़ भी सकती है. ऐसे समय गहरी सांस लें और अपने दिमाग को सक्रिय करने की कोशिश करें जिस से क्या करना है वह आप निर्णय ले सकें.

अपनी चोट का आकलन करें

अपनी चोट का आकलन करें कि कहां चोट लगी है, यदि कहीं ज्यादा खून बह रहा है तो आप के पास जो भी है चुन्नीसाड़ी उसे फाड़ कर घाव को कस के बांध दें ताकि खून रुक जाए. प्राथमिक चिकित्सा खुद ही करने का प्रयास करें आप के पास जो कुछ भी है. ऐसे समय शरमाने की जरूरत नहीं है.

मदद के लिए कौल करें

आजकल स्वयं कोई मदद नहीं करता है, यदि आप के आसपास कहीं लोग दिख रहे हैं तो मदद के लिए लोगों को पुकारें, क्योंकि वही लोग पहले आप की मदद कर सकते हैं. यदि आप का फोन काम कर रहा है तो अपने परिवार और दोस्तों को सूचित करें, जिस से वह आप तक पहुंच सकें.
मदद के लिए इमरजैंसी हैल्पलाइन नंबर जैसे 108 पर तुरंत कौल करें या फिर अपने दोस्तों को फोन करें जिस से यदि उन का कोई परिचित उस एरिया में हो तो आप को मदद मिल सके.
अगर फोन तक नहीं पहुंच पा रहे हैं तो जोरजोर से चिल्ला कर लोगों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करें जिस से मदद आप तक पहुंच सके.
यदि घातक दुर्घटना हुई है हड्डी टूट गई है तो ज्यादा जबरदस्ती न करें स्वयं को रिलैक्स करने की कोशिश करें, गहरी सांस लें. यदि आप अकेले हैं और परिवार बहुत दूर है तो हैल्पलाइन नंबर का उपयोग करें या आसपास जो भी दिख रहा है उस से कहें कि वह किसी भी गाड़ी में बैठा कर आप को अस्पताल पहुंचा दे.

मदद मांगने में संकोच न करें

यदि संभव हो तो प्राथमिक उपचार स्वयं करें, अगर आप के पास पानी है तो घाव को साफ कर लें ताकि मिट्टी और अन्य कीटाणु साफ हो जाएं.
हमारा जीवित रहना ज्यादा जरूरी है इसलिए मदद मांगने में संकोच न करें. मन को सकारात्मक रखें, आप की हिम्मत ही आप को मुसीबत से बाहर निकलने का रास्ता दिखाएगी. आजकल फोन की सुविधा बहुत अच्छी है, यदि आप अपने परिजनों से मदद के लिए बाहर हैं तो अपने लोकेशन की जानकारी दें जिस से वे आप को जल्दी ढूंढ़ कर मदद पहुंचा सकें.

सड़क पर कहीं बाहर एक्सिडैंट हुआ है तो आप अपने किसी व्हाट्सएप ग्रुप में अपनी लोकेशन डाल दें जिस से जो भी आसपास हो किसी तरह आप को मदद पहुंचा सके.
किसी भी परिस्थिति में मन को मजबूत करना बहुत जरूरी है जिस से आप का दिमाग सक्रिय होता है और आप सही निर्णय ले सकते हैं. जान है तो जहान है, पैनिक होने से न केवल आप का स्वास्थ्य बिगड़ जाएगा अपितु आप अपनी सोचनेसम झने की शक्ति भी खो देंगे. अपना ध्यान रखिए और किसी भी परिस्थिति में कमजोर न पड़ें. आप की हिम्मत आप को हर मुश्किल से बाहर निकलने का रास्ता बता देगी.

USA : महिलाओं के बाद अब ट्रांसजैंडर्स पर टेढ़ी हुई ट्रंप की नजर

USA :  अपने पहले कार्यकाल में भी ट्रंप ने कई विवादित फैसले लिए, जो ट्रांसजैंडर्स के अधिकारों के हक में नहीं था. अब अपनी दूसरी पारी में वे ट्रांसजैंडर्स को समाज की मुख्यधारा से अलगथलग करने को आतुर दिख रहे हैं.

सत्ता जब किसी दक्षिणपंथीकट्टरपंथी के हाथ में आती है तो उस का पहला शिकार औरत बनती है. धर्म का औजार हाथ में ले कर दक्षिणपंथी आदमीऔरत से जीवन के मूल अधिकार छीन लेने को आतुर हो उठता है. उसे धर्म की जंजीर में जकड़ कर घर की चारदीवारी में कैद होने के लिए बाध्य करता है. वह औरत को अपने हाथ की कठपुतली बना कर रखना चाहता है. ऐसी कठपुतली जिसे वह अपने इशारे पर नचा सके और उस का भोग कर सके.

दक्षिणपंथी विचारधारा को मानने वाले रूढ़िवादी ट्रंप

अमेरिका की बागडोर अब दक्षिणपंथी विचारधारा को मानने वाले रूढ़िवादी डोनाल्ड ट्रंप के हाथ में है. ट्रंप ऐसी संकुचित मानसिकता के व्यक्ति हैं जिन्होंने औरत को गुलाम और भोग की वस्तु से ज्यादा नहीं समझा. ट्रंप महिलाओं के कुछ अधिकारों के पक्ष में कभी नहीं रहे, जिनमें अबौर्शन मुख्य रूप से शामिल है. ट्रंप और उन के समर्थकों का मानना है कि अबौर्शन पेट में पल रहे बच्चे की हत्या करना है. हालांकि महिलाएं इसे इस रूप में नहीं देखती हैं.
अबौर्शन को महिलाएं एक मूल अधिकार के रूप में देखती हैं और मानती हैं कि यह उन के स्वास्थ्य से जुड़ा एक अधिकार है और अपने शरीर के बारे में फैसला लेने का हक सिर्फ उन्हें ही होना चाहिए. अपने पिछले कार्यकाल में ट्रंप की पार्टी के कई सीनेटर्स ने देशभर में अबौर्शन पर बैन लगाने की इच्छा जाहिर की थी और कुछ राज्यों में तो यह बैन है भी.

महिलाओं के खिलाफ हेट स्पीच बढ़

ट्रंप की जीत के बाद अमेरिका में दक्षिणपंथी ताकतें एक बार फिर सिर उठाने लगी हैं. जिन का बुरा प्रभाव औरतों, ब्लैक्स और ट्रांसजैंडर्स पर पड़ रहा है. सोशल मीडिया पर बीमार मानसिकता के लोग औरत के शरीर को अपनी प्रौपर्टी कह कर उन पर हक जताने की कोशिश में जुटे हुए हैं तो वहीं ट्रांसजैंडर्स के साथ गालीगलौच और मारपीट की घटनाएं अचानक बढ़ गई हैं.
जाहिर है सत्ता शीर्ष से जब ऐसे इशारे होंगे तो नीचे लोग उन को अपने व्यवहार में उतारेंगे. सोशल मीडिया पर निक फुएंटेस नाम का एक यूजर औरतों के लिए लिखता है- “यौर बौडी, माय चौइस. फौरएवर.” यानी कि “तुम्हारा शरीर, मेरी मर्जी, हमेशा.”

ट्रंप के सत्ता में आने के बाद अमेरिका में महिलाओं के खिलाफ हेट स्पीच बढ़ रही हैं. लोगों ने महिलाओं से यह तक कहना शुरू कर दिया है कि उन की जगह रसोई में है और उन्हें जरूरत से ज्यादा उड़ना नहीं चाहिए. ऐसे में ट्रंप और उन के समर्थकों के विरोध में जगहजगह महिलाओं द्वारा विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं.

दरअसल ट्रंप रूढ़िवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं. महिला आजादी और महिला अधिकारों के खिलाफ उन्होंने कई ऐसे फैसले पिछले कार्यकाल में दिए जिसने अमेरिकी महिलाओं को सड़क पर उतर कर आंदोलन करने के लिए मजबूर किया. महिलाओं के प्रजनन अधिकारों, विशेष रूप से गर्भपात का फैसला ट्रंप के शासनकाल में मुमकिन नहीं है.
अब ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने की खबर के बाद शारीरिक स्वायत्तता को ले कर अनेक अमेरिकी महिलाओं ने पुरुषों से दूरी बना ली है. डेटिंग, सैक्स, शादी और बच्चों के पालनपोषण से पीछे हट कर, ये महिलाएं एक संदेश भेज रही हैं कि वे उस प्रणाली में शामिल होने से इनकार करती हैं जिस के तहत उन के साथ दुर्व्यवहार होता है और उन्हें खतरे में डाला जाता है.

ट्रांसजैंडर्स पर लगाम

अपनी दूसरी पारी में ट्रंप ट्रांसजैंडर्स के हक भी छीनने को आतुर हो रहे हैं. वाइटहाउस आने के साथ ही ट्रंप जो नए काम करने वाले हैं, उन में ट्रांसजैंडर्स पर लगाम कसना शामिल है. ट्रंप ट्रांसजैंडर्स को समाज की मुख्यधारा से अलग करना चाहते हैं. उन के मुताबिक दुनिया में दो ही लिंग हैं जिन्हें स्वीकार किया जा सकता है – स्त्रीलिंग और पुलिंग. इन दो जैंडर के अलावा वे किसी को मुख्यधारा में नहीं देखना चाहते हैं.

अमेरिका में ट्रांसजैंडर्स को पढ़ने, नौकरी करने, शादी करने, बच्चा गोद लेने आदि का अधिकार था. 2015 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्रांसजैंडर्स की शादी पूरे देश में वैध हो गई थी. ट्रांसकपल के लिए बच्चों को गोद लेने की भी मंजूरी मिल गई थी.
गौरतलब है कि गोद देने वाली एजेंसियां इस के लिए होम स्टडी करती हैं कि बच्चों के लिए कैसा माहौल है, इस के बाद वे कानूनी प्रोसेस करती हैं. कई बार आवेदन रिजेक्ट भी हो जाता है लेकिन ये दर उतनी ही है, जितनी आम जोड़ों के अडौप्शन के दौरान होता है.

ट्रांसजैंडर लोगों से नफरत या भेदभाव

अब ट्रंप इन सब अधिकारों को उन से छीन लेने के मूड में हैं. अपने पहले कार्यकाल में भी ट्रंप ने कई विवादित फैसले लिए, जो ट्रांसजैंडर्स के अधिकारों के हक में नहीं था. मसलन, उन्होंने बहुत से ऐसे जजों की नियुक्ति की, जो एंटीLGBTQ+ माने जाते थे. उन का पुराना रिकौर्ड ट्रांसजैंडर लोगों से नफरत या भेदभाव का रहा.
ट्रंप ने दोसौ से ज्यादा ऐसे जजों को ताकत दी, जो अपने कंजर्वेटिव तौरतरीकों के लिए जाने जाते थे. उन में से कईयों ने धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला दे कर ट्रांस अधिकारों को कम करने की कोशिश भी की.

द कंवर्सेशन की एक रिपोर्ट में अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन के हवाले से कहा गया है कि ट्रंप के पिछले कार्यकाल में देशभर में 532 एंटीLGBTQ बिल बने.
– इन में से 208 बिल स्टूडेंट्स और शिक्षकों के अधिकारों को सीमित करते हैं.
– लगभग 70 बिल धार्मिक छूट से जुड़े हुए हैं और ट्रांसजैंडरों पर कई रोक लगाते हैं.
– 112 बिल हेल्थ से संबंधित हैं. जैसे ट्रांसजैंडरों का अपना पसंदीदा जैंडर पाने के लिए मेडिकल ट्रीटमेंट लेना.

आर्मी में ट्रांसजैंडर

बहुत से देशों से अलग अमेरिका में ट्रांसजैंडर सेना में भी जा सकते हैं. ओबामा सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी चरण में इसे मंजूरी दे दी थी, जिस के बाद आर्मी में ट्रांसजैंडर सैनिकों की मौजूदगी बढ़ने लगी. साल 2017 में डोनाल्ड ट्रंप ने आते ही इसपर रोक लगा दी. उन का कहना था कि इस से मेडिकल खर्च बहुत ज्यादा बढ़ रहा है क्योंकि हौर्मोनल बदलाव की प्रक्रिया से गुजर रहे सैनिकों की मेडिकल जरूरतें आम सैनिकों से ज्यादा रहती हैं.
इस के अलावा सेना में कथित तौर पर बैलेंस भी बिगड़ रहा था. साल 2021 में राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ट्रंप की पाबंदियों को पलटते हुए ट्रांसजैंडरों के लिए सैन्य सर्विस एक बार फिर शुरू कर दी. मगर अब ट्रंप के वाइटहाउस आने से पहले ही ट्रांसजैंडरों के खिलाफ हवा चल निकली है.
अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन के मुताबिक, रिपब्लिकन्स के कथित विवादित प्रोजैक्ट 2025 में ट्रांसजैंडरों के हक कमजोर करने पर कई नीतियां हैं. उन्हें डर है कि राष्ट्रपति एग्जीक्यूटिव और्डर जारी करते हुए सरकारी एजेंसियों को ऐसे निर्देश दे सकते हैं. जैसे सेना या स्कूलकालेजों में उन की जगह खत्म कर दी जाए. या इसपर बातचीत के फोरम पर अटैक हो.

16 लाख से ज्यादा लोग खुद को ट्रांसजैंडर

वैसे एग्जीक्यूटिव और्डर देते ही ऐसा नहीं है कि नीतियों में बदलाव हो जाता है. इस के बाद एक टाइम पीरियड होता है, जिसे पब्लिक कमेंट पीरियड कहते हैं. एक से दो महीने के इस वक्त में संस्थाएं या लोग इसे चुनौती भी दे सकते हैं. या फिर इस दौरान आमलोगों और संगठनों की राय ली जाती है ताकि नीतियों में अमेंडमेंड हो सकें.
अगर और्डर किसी खास समूह के अधिकारों को कमजोर करता दिखे तो उसे कोर्ट में भी चुनौती दी जा सकती है. तब वो पौलिसी लागू नहीं हो सकती, जब तक कि उसे कोर्ट से हरी झंडी न मिल जाए. इस में महीनों या सालों भी लग सकता है. इतने समय में सरकारें बदल जाती हैं.

कुल मिला कर फिलहाल ट्रांसजैंडरों में डर तो बना हुआ है लेकिन उन के खिलाफ नीतियां लाना उतना भी आसान नहीं. यूएस में तीस साल के भीतर के लोगों में पांच फीसदी से कुछ ज्यादा लोग खुद को ट्रांसजैंडर या फिर नौनबायनरी मानते हैं, यानी जो खुद को किसी जैंडर में नहीं पाते. ये डेटा प्यू रिसर्च सेंटर का है और दो साल पुराना है. इस बीच संख्या काफी बढ़ी, लेकिन इसपर किसी का कोई निश्चित डेटा नहीं है.
यूसीएलए लौ स्कूल में विलियम्स इंस्टीट्यूट ने भी इसपर एक रिसर्च की, जिस में पाया गया कि अमेरिका में 13 साल की उम्र के ज्यादा के 16 लाख से ज्यादा लोग खुद को ट्रांसजैंडर मानते हैं. इस के अलावा वे लोग भी हैं, जो जन्म के समय खुद को मिले जैंडर से खुश नहीं, लेकिन खुल कर जता नहीं पाते.

Viral News : ‘कठमुल्ला’ शब्‍द के बाद कटघरे में जस्टिस शेखर यादव

Viral News : जस्टिस शेखर कुमार यादव ने जब ‘कठमुल्ला’ शब्द का प्रयोग किया तब उन को इस की गहराई का अंदाजा नहीं होगा कि यह महाभियोग का जरिया बन जाएगा.

रविवार 8 दिसंबर 2024 का विश्व हिंदू परिषद के विधि प्रकोष्ठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के लाइब्रेरी हौल में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था. इस कार्यक्रम में जस्टिस शेखर कुमार यादव के अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक और मौजूदा जज जस्टिस दिनेश पाठक भी शामिल हुए. कार्यक्रम में वक्फ बोर्ड अधिनियम, धर्मांतरण कारण एवं निवारण और समान नागरिक संहिता एक संवैधानिक अनिवार्यता जैसे विषयों पर अलगअलग लोगों ने अपनी बात रखी. इस दौरान जस्टिस शेखर यादव ने ‘समान नागरिक संहिता एक संवैधानिक अनिवार्यता’ विषय पर बोलते हुए कहा कि ‘देश एक है, संविधान एक है तो कानून एक क्यों नहीं है ?’

कठमुल्ले’ देश के लिए घातक

लगभग 34 मिनट की इस स्पीच के दौरान उन्होंने कहा “हिंदुस्तान में रहने वाले बहुसंख्यकों के अनुसार ही देश चलेगा. यही कानून है. आप यह भी नहीं कह सकते कि हाई कोर्ट के जज हो कर ऐसा बोल रहे हैं. कानून तो भैय्या बहुसंख्यक से ही चलता है.”
अपने इसी भाषण में जस्टिस शेखर यादव यह भी कह जाते हैं कि ‘कठमुल्ले’ देश के लिए घातक हैं. वह यह समझते हैं कि ‘कठमुल्ला’ शब्द गलत है. इस के बाद भी कहते हैं ‘जो कठमुल्ला हैं, शब्द गलत है लेकिन कहने में गुरेज नहीं है, क्योंकि वो देश के लिए घातक हैं. जनता को बहकाने वाले लोग हैं. देश आगे न बढ़े इस प्रकार के लोग हैं. उन से सावधान रहने की जरूरत है.’
‘कठमुल्ला’ का शाब्दिक अर्थ ‘कट्टरपंथी मौलवी’, ‘अपने मत या सिद्धांत के प्रति अत्यंत आग्रहशीन या दुराग्रही व्यक्ति होता है. इस का मतलब कट्टर मौलवी होता है जो काठ के मनकों की माला फेरता हो. अब यही ‘कठमुल्ला’ शब्द विवाद का विषय बन गया है.
जस्टिस शेखर कुमार यादव की दूसरी उस बात पर विवाद है जिस में यह कहा कि ‘कानून तो बहुसंख्यक से ही चलता है.’ इस देश में कठमुल्ला, बहुसंख्यक, अल्पसंख्यक जैसे शब्द राजनीतिक दलों को बहुत लुभाते हैं. देश का संविधान कहता है कि राजनीति में जाति और धर्म का प्रयोग ठीक नहीं होता है. राजनीतिक दल संविधान हाथ में ले कर जाति और धर्म की राजनीति पहले चुनाव से कर रहे हैं. इस देश की राजनीतिक व्यवस्था इस तरह की हो गई है कि बिना जाति और धर्म का वोट बैंक बनाए चुनाव जीता ही नहीं जा सकता.

‘कठमुल्ला’ और ‘बहुसंख्यक’

1990 के दौर में अपनी सरकार बचाने के लिए वीपी सिंह ने मंडल कमीशन लागू किया. क्योंकि भाजपा ने राममंदिर आंदोलन के सहारे धर्म की राजनीति शुरू की थी. उत्तर प्रदेश के उस समय के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने राममंदिर के लिए आंदोलन करने वाले कारसेवकों पर गोली चलवाई. सैकड़ों लोग मारे गए. इस के बाद मुलायम सिंह का नाम ‘मुल्ला मुलायम’ पड़ गया. मुलायम सिंह यादव को यह नाम पसंद था क्योंकि इस के सहारे पूरा मुसलिम वोट उन को मिलने लगा. कांग्रेस के हाथ से मुसलिम वोट उस समय जब निकला तो आज तक नहीं आया.
जाति और धर्म की राजनीति अपनेअपने प्रतीकों से सहारे हमेशा से होती रही है. इस के बाद भी हर नेता कहता है कि वह जाति, धर्म और वोटबैंक की राजनीति नहीं करता. वह सबका साथ सबका विकास की बात करता है. इस से बड़ा देश की जनता के साथ कोई धोखा नहीं हो सकता है. जस्टिस शेखर कुमार यादव ने ‘कठमुल्ला’ और ‘बहुसंख्यक’ दो ऐसे चटपटे शब्दों को प्रयोग कर दिया जो उन को नहीं कहना चाहिए था.
किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से ऐसे शब्दों की उम्मीद राजनीतिक बिरादरी के लोग नहीं करते हैं. वो तो बिना जाति और धर्म के वोट बैंक के अपनी राजनीति करते हैं. जस्टिस शेखर यादव के इस बयान को ले कर विवाद खड़ा हो गया था. मसला बढ़तेबढ़ते बात महाभियोग तक पहुंच गई थी. श्रीनगर से नैशनल काफ्रेंस के सांसद आगा सईद मेहदी की मुहिम में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस के सांसद भी एकजुट को  गए.

कैसे लाया जाता है महाभियोग ?

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने लिखा, ‘जब हम संविधान के 75 साल का जश्न मना रहे हैं तो इस तरह की बातें ठीक नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट इस को संज्ञान ले.’ जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ महाभियोग भी संविधान के ही दायरे में आ सकता है. संविधान के अनुच्छेद 124(4), (5), 217 और 218 में जजों के खिलाफ महाभियोग की पूरी प्रक्रिया का जिक्र है. सब से पहले जजों को हटाने के लिए नोटिस देना पड़ता है.
सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया की शुरुआत संसद के किसी भी सदन यानी लोकसभा या राज्यसभा में हो सकती है. इस के लिए सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस देना पड़ता है. अगर ये नोटिस लोकसभा में दिया जा रहा है, तो इस के लिए 100 या इस से अधिक सांसदों का समर्थन चाहिए. अगर यह प्रक्रिया राज्यसभा में शुरू हो रही है, तो इस के लिए 50 या इस से अधिक सांसदों का समर्थन चाहिए. नोटिस के बाद अगर लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के सभापति इसे स्वीकार करते हैं, तभी किसी जज को हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है.
अगर यह नोटिस स्वीकार होता है, तो सदन के चेयरमैन या स्पीकर 3 सदस्यीय जांच समिति का गठन करते हैं, ताकि जजों को हटाने के लिए जो आधार बताए जा रहे हैं, उन की जांच हो सके. इस समिति में सुप्रीम कोर्ट का एक जज, एक हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश, चेयरमैन या स्पीकर की सहमति से चुने गया एक न्यायविद सदस्य होता है. अगर यह नोटिस संसद के दोनों सदनों में स्वीकार किया जाता है, तो जांच समिति का गठन लोकसभा के स्पीकर और राज्य सभा के सभापति मिल कर करते हैं.
ऐसी स्थिति में जिस सदन में बाद में नोटिस दिया जाता है, उसे रद्द माना जाता है. जांच समिति अपनी पड़ताल के बाद औपचारिक रिपोर्ट बनाती है. इस रिपोर्ट को संबंधित सदन के स्पीकर को दिया जाता है. सदन के स्पीकर इस रिपोर्ट को सांसदों के सामने रखते हैं. अगर जांच रिपोर्ट में जज को दोषी पाया जाता है, तो जज को हटाने का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में मतदान के लिए रखा जाता है.
संविधान के अनुच्छेद 124 (4) के मुताबिक जज को हटाने की प्रक्रिया तभी आगे बढ़ती है, जब इस प्रस्ताव को दोनों सदनों के उपस्थित कुल सदस्यों में से बहुमत का समर्थन मिलता है. साथ ही प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों की संख्या सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों की दोतिहाई संख्या से कम नहीं होनी चाहिए. जज को हटाने की सारी प्रक्रिया अगर पूरी हो जाती है, तो यह प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास जाता है. इस के बाद राष्ट्रपति के आदेश पर ही जज हटाए जा सकते हैं.

महाभियोग का कितना असर

असल में यह पूरी प्रक्रिया जिस तरह की है उस के पूरा करने की ताकत आज के विपक्ष में नहीं है. इस के पहले भी अब तक किसी जज को महाभियोग के जरिए हटाया नहीं गया है. कई जजों को हटाने की प्रक्रिया शुरू तो हुई पर वह पूरी नहीं हो सकी.
वर्ष 1991 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वी रामास्वामी को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी. जांच समिति ने भी उन्हें दोषी पाया था. लेकिन महाभियोग प्रस्ताव को पर्याप्त सांसदों का समर्थन नहीं मिला. इस कारण यह प्रस्ताव गिर गया.
2011 में सिक्किम हाई कोर्ट के जज पीडी दिनाकरन को भी हटाए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी. मामला जांच समिति तक गया. लेकिन इस प्रक्रिया को उस समय रोकना पड़ा, जब जस्टिस दिनाकरन ने जांच समिति की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए इस्तीफा दे दिया. 2011 में कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई थी. जांच समिति ने भी उन्हें दोषी पाया. महाभियोग प्रस्ताव को राज्यसभा में काफी समर्थन मिला. लेकिन लोकसभा में मतदान से पहले ही जस्टिस सौमित्र सेन ने इस्तीफा दे दिया.
2015 में गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस पार्दीवाला को भी हटाने का प्रस्ताव आया था. मामला था आरक्षण के खिलाफ उन के फैसले में ‘जातिगत टिप्पणी’ का. जस्टिस पार्दीवाला ने अपने फैसले में से विवादित टिप्पणी को हटा दिया. जिस के बाद यह बात खत्म हो गई थी.
2015 में ही मध्य प्रदेश के हाई कोर्ट के जस्टिस एसके गंगेले को हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी. लेकिन राज्य सभा की जांच समिति ने उन्हें क्लीन चिट दे दी. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हाई कोर्ट के जस्टिस सीवी नागार्जुन रेड्डी के खिलाफ 2016 और 2017 में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई थी. इस प्रस्ताव को समर्थन नहीं मिला. जिस के कारण यह नहीं पारित हो सका.

क्यों लाया जा रहा महाभियोग ?

दरअसल, विपक्ष भी जानता है कि जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ महाभियोग पारित नहीं हो पाएगा. वह इस बहाने पूरी बहस को जनता के बीच चाहता है. जिस से आगे से कोई जज भी इस तरह की बात कहने का साहस न कर सके. राजनेताओं को यह काम करना चाहिए था कि समाज में जाति और धर्म की भावना ही न उठे. वोट की मजबूरी के कारण वह इस काम को नहीं कर पाए. हर चुनाव को जीतने के लिए जाति और धर्म का मुद्दा जरूरी हो जाता है. अब यह जाति और धर्म के मुददे की राजनीति हमारी अदालतों में ही नहीं हमारे घरों में भी घुस गई है.
घरों में जब कोई डिलीवरी मैन आता है तो हम यह जानने की कोशिश में रहते हैं कि यह किस जाति और धर्म का है. पिछले कुछ सालों में ऐसी तमाम घटनाएं हुईं जब खाने ले कर डिलीवरी करने गए लड़कों से जाति और धर्म को ले कर उन को प्रताड़ित किया गया. कई झगड़े हुए और मुददा पुलिस थाने तक गया. अभी उत्तर प्रदेश में कांवड यात्रा के दौरान दुकानों पर नाम लिखने के आदेश दिए गए जिस का मकसद केवल दुकानदार की जाति और धर्म की पहचान करने का था.

मुसलिम से परहेज

दलितों को यह शिकायत पिछड़ों और अगड़ों से होती है कि वह जाति के नाम पर छुआछूत का व्यवहार करते हैं. यही दलित, पिछड़ा और अगड़ा धर्म के नाम पर मुसलिम से परहेज करता है. 1980 के बाद से उत्तर भारत में राममंदिर आंदोलन के सहारे धर्म का प्रचार हुआ. जिस की वजह से आपसी दूरियां तेजी से बढ़ी.
2014 में भारतीय जनता पार्टी ने 80 बनाम 20 का नारा दे कर मुसलिमों को हाशिये पर ढकेल दिया. पहली बार भाजपा ने राजनीतिक दलों को समझा दिया कि देश में बिना मुसलिम के भी चुनाव जीते जा सकते हैं. इस के बाद जो हिंदूमुसलिम भावना भड़की उस में जस्टिस शेखर कुमार यादव जैसे पढ़ेलिखे लोग भी भटक गए. उन को भी कठमुल्ला ही परेशानी समझ आने लगी.
यह उदाहरण है कि राजनीति केवल वोट लेने देने का मसला भर नहीं है. इस से घर और समाज दोनों प्रभावित होते हैं. लोगों के मन की भावना बदल जाती है. चुनाव जीतने के लिए हिंदूमुसलिम करेंगे तो उस का प्रभाव समाज में दरार डालने का काम करेगा. जो घर परिवार समाज और देश के लिए ठीक नहीं होगा.

BPSC Exam : सिरदर्द और आंदोलन बनते जा रहे हैं एग्‍जाम

BPSC Exam : प्रतियोगी परीक्षाएं छात्रों के लिए सिरदर्द बनती जा रही हैं. फौर्म भरने से ले कर परीक्षा देने तक छात्र कई दिक्कतों से जूझते हैं.

संघ लोक सेवा आयोग यानि यूपीएससी ने एनडीए नैशनल डिफेंस एकेडमी और नेवल एकेडमी एग्जाम 2024 के लिए नोटिस दी. एग्जाम नोटिस नवंबर 3 /2025- एनडीए-1 में परीक्षा के बारे में 109 पेज का एक फौर्म बनाया. इस में परीक्षा कैसे दें, कितने नंबर के सवाल हैं जैसी तमाम चर्चा की गई थी. 109 पेज पढ़ कर उस को परीक्षा का फार्म भरना था. परीक्षा फौर्म भरने से ले कर सवालों के जवाब भरने तक एक लंबी प्रक्रिया होती है, जिस में एक भी गड़बड़ी होने का मतलब होता है पूरी परीक्षा का रद्द हो जाना.
अधिकतर परीक्षाओं में नाम, रोल नंबर और डिटेल को लिखना नहीं होता है, इस की जगह पर केवल गोले में काले रंग के बौलपेन से भरना होता है. ऐसे में एक भी गोला गलती से काला हो गया तो पूरा पेपर रिजैक्ट हो जाता है. इन परीक्षाओं के पेपर कंप्यूटर के जरिए जांचे जाते हैं. ऐसे में वह काले गोले के जरिए ही पेपर और बाकी डिटेल की जांच करता है. एक गोले के गलत होने से पूरा पेपर रद्द कर दिया जाता है. इसलिए परीक्षा का फार्म लंबाचौड़ा 109 पेज तक का हो जाता है.

सरल किया जाएं फौर्म भरना

नैशनल डिफेंस एकैडेमी और नेवल एकैडेमी एग्जाम 2024 के 109 पेज को देखें तो पता चलता है कि किसकिस तरह से परीक्षा फार्म भरना सिखाया जाता है. पहले प्वाइंट पर लिखा है कि कैंडिडेट यह जांच लें कि वह परीक्षा के लिए योग्यता रखता है या नहीं? जो योग्यता रखता है वही आगे फौर्म भरे. इस के बाद कैसे अप्लाई करें. रजिस्ट्रेशन प्रोफाइल में 7 दिनों तक कोई बदलाव किया जा सकता है. फार्म भरने में कोई गलती न हो इस के लिए इतनी बारीक जानकारियां दी जाती हैं. इसलिए पहली जरूरत है कि फौर्म भरना सरल किया जाए, जिस से गलती की संभावना कम हो सके.
फौर्म भरना कठिन होने से कोचिंग संस्थाएं और कंप्यूटर सेवा केंद्र जैसे बिचौलियों की चांदी हो जाती है. यह लोग फौर्म भरवाने का पैसा लेते हैं. बहुत सारे ऐसे बच्चे भी हैं जिन के पास अपने कंप्यूटर नहीं हैं. ऐसे में वे कंप्यूटर सेवा केंद्र का सहारा लेते हैं. ये लोग फौर्म भरने का 100 रुपए से ले कर 500 रुपए तक की फीस लेते हैं. अब सभी प्रतियोगी परीक्षाओं का फौर्म कंप्यूटर पर भरना पड़ता है. इस में गलती सुधारने का समय होता है. समय निकल जाने के बाद सुधार की गुजांइश खत्म हो जाती है.

परीक्षा केंद्र दूर और अव्यवस्थित

आज के दौर में हर परीक्षा में लाखोंलाख छात्र बैठते हैं. ऐसे में परीक्षा आयोजन के लिए बने केंद्र बड़ी दूरदूर होते हैं. परीक्षा का फौर्म भरते समय छात्र से पूछा जाता है कि वह अपने पसंद के शहर का नाम बताएं. उसे क्रमवार 3 से 5 शहरों के नाम बताने होते हैं. परीक्षा आयोजन करने वाले संस्थान कोशिश करते हैं कि छात्र की पसंद का शहर मिल जाए. आमतौर पर पंसद का शहर मिल जाता है. हर शहर में कई सेंटर ऐसे होते हैं जो काफी दूर होते हैं. ऐसे में सुबह 8 बजे परीक्षा सेंटर पर पहुंचना कठिन होता है.
तमाम छात्र रात में ही रेलवे स्टेशन या बस स्टेशन या फिर किसी पार्क में ही पहुंच कर रूक जाते हैं. इन में लड़केलड़कियां सभी होते हैं. कई परीक्षा केंद्र ऐसे स्थानों पर होते हैं जहां संकरी गलियां और सड़कें होती हैं. उन में 1 से 2 हजार छात्र पहुंच जाते हैं तो अव्यवस्था हो जाती है.

22 दिसंबर को एआईबी यानी औल इंडिया बार काउंसिल की परीक्षा थी. लखनऊ के ब्राइट कावेंट कालेज और गर्ल्स कालेज में सेंटर था. यह दोनों कालेज ठाकुरगंज में संकरी सड़कों पर बने थे. ऐसे में कुछ छात्र अपने वाहनों से आए थे. सड़क जाम हो गई. छात्रों का सेंटर तक पहुंचना मुश्किल हो गया. कालेज के सामने वाली रोड मुश्किल से 12 फुट चौड़ी थी. जिस में छात्र और उन के पेरैंट्स का चलना मुश्किल हो गया था. ऐसे में अगर कोई हादसा हो जाता तो मुश्किल हो जाता.
परीक्षा आयोजित करने की अच्छीखासी फीस छात्रों से ली जाती है. इस के बाद भी उन की सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया जाता है. इस से छात्रों में नाराजगी होती है. कई बार यह नाराजगी बड़ी परेशानी बन जाती है. कुछ दिन पहले नीट परीक्षा में धांधली का मुद्दा लोकसभा और सुप्रीम कोर्ट तक गया. इस के बाद भी छात्र संतुष्ट नहीं हैं. उन को लगता है कि उन के साथ चीटिंग हुई है. अब कोई भी परीक्षा हो उस में हिस्सा लेने वाले छात्रों की संख्या लाखों होती है. इतनी बड़ी व्यवस्था करना सरल नहीं होता.

बिहार में BPSC छात्रों का आंदोलन

बिहार में 70वीं संयुक्त प्रारंभिक परीक्षा का आयोजन बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन बीपीएससी ने किया. इस के तहत 1957 पदों का भरा जाना था. इस के लिए 5 लाख से अधिक छात्रों ने अप्लाई किया. पहले आवेदन की लास्ट डेट 18 अक्टूबर थी. परीक्षा से पहले ही नौर्मलाइजेशन को ले कर फैली अफवाह, छात्रों के प्रदर्शन और आवेदन में सामने आई कुछ तकनीकी समस्याओं के कारण आखिरी डेट बढ़ा कर 4 नवंबर कर दी गई. 5 लाख आवेदनों में से 4 लाख 80 हजार छात्रों ने परीक्षा दे दी.
इस परीक्षा के तहत डिप्टी एसपी, डिप्टी कलेक्टर, सीनियर डिप्टी कलेक्टर और राजस्व अधिकारी जैसे कई पद भरे जाने थे. कैंडिडेट का सिलेक्शन प्रीलिम्स, मेंस और पर्सनाल्टी टेस्ट के आधार पर किया जाता है. परीक्षा के लिए नोटिफिकेशन जारी होने के बाद नौर्मलाइजेशन को ले कर सब से पहला विवाद सामने आया. इस को ले कर छात्र प्रदर्शन करने लगे. इस के बाद बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन को सफाई देनी पड़ी कि इस परीक्षा में नौर्मलाइजेशन लागू नहीं किया गया है. छात्रों ने पटना में बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन के औफिस के बाहर धरना देना शुरू किया.
इस में मशहूर कोचिंग टीचर खान सर भी इस में शामिल हुए. प्रशासन और पुलिस ने कोचिंग संस्थानों पर छात्रों को भड़काने का आरोप भी लगाया. 13 दिसंबर को एग्जाम हो जाने के बाद पेपर आउट होने का आरोप भी लगा. छात्रों ने परीक्षा में गड़बड़ी, प्रश्नपत्र में असमानता का आरोप लगाते हुए पूरी परीक्षा रद्द करने की मांग की.
पेपर लीक के आरोप पर हंगामा बढ़ने पर आयोग ने बापू परीक्षा केंद्र की परीक्षा रद्द करने और उसे 4 जनवरी 2025 को उसी सेंटर पर फिर से आयोजित कराने की घोषणा कर दी. इस के लिए नए एडमिट कार्ड भी जारी किए गए. छात्र दोबारा परीक्षा आयोजित कराने की मांग करने लगे. छात्रों की बिहार के मुख्य सचिव से भी वार्ता हुई. इस के बाद भी छात्र माने नहीं. आयोग के मुख्यसचिव की तरफ से साफ कहा गया कि परीक्षा दोबारा आयोजित नहीं होगी.

क्या होता है नौर्मलाइजेशन

अगर कोई परीक्षा एक ही शिफ्ट में होती है तो एक ही प्रश्नपत्र सभी छात्रों के लिए होता है इस को ही नौर्मलाइजेशन कहते हैं. मगर कोई परीक्षा एक से ज्यादा शिफ्ट में होती है तो विभिन्न शिफ्टों में परीक्षा देने वाले छात्रों को अलगअलग प्रश्नपत्र दिए जाते हैं. नौर्मलाइजेशन सिस्टम के द्वारा यह अनुमान लगाया जाता है कि कोई पेपर कितना सरल और कितना मुश्किल होता है. इस के अनुसार ही मार्क्स तय किए जाते हैं.
अगर एक शिफ्ट में छात्रों का औसतन स्कोर 100 में से 95 है और दूसरी शिफ्ट में 85 है और पाया जाता है कि दूसरी शिफ्ट का पेपर कुछ मुश्किल था तो नौर्मलाइजेशन स्कोर फार्मुले में दोनों ग्रुप के छात्रों को बराबर 90-90 स्कोर दिया जा सकता है. इस को ले कर छात्र विरोध कर रहे थे.
छात्रों का आंदोलन बढ़ने पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड्गे, प्रियंका गांधी, अरविंद केजरीवाल, तेजस्वी यादव तक सभी नेता छात्रों के साथ खड़े हो गए. प्रशांत किशोर जैसे नेता भी छात्रों के साथ खड़े हो गए. एनडीए के घटक दलों में से चिराग पासवान भी छात्रों के साथ खड़े हो गए. यहां तक कि भाजपा के नेता भी प्रशासन के विरोध में खड़े हो गए. बिहार में इसी साल के दिसंबर में विधानसभा चुनाव हैं.
छात्र आंदोलन का प्रभाव वहां भी पड़ सकता है. केंद्र की भाजपा सरकार हो या प्रदेशों की, न तो वह रोजगार दे पा रही हैं और न ही सही से परीक्षा आयोजित करा पा रही हैं. ऐसे में युवा परेशान हैं. वह भाजपा और मोदी सरकार के खिलाफ खड़े हैं. उत्तर प्रदेश में भी शिक्षकों की भर्ती में आरक्षण का सही तरह से पालन नहीं हुआ. इस का आरोप एनडीए के घटक दल ने ही लगाया. ऐसे में सरकार और युवा आमनेसामने हैं. नीट परीक्षा में धांधली के बाद नएनए सवाल दिख रहे हैं. परीक्षा के नाम पर यह खेल खतरनाक है. इस का परिणाम खराब होगा.

लेखक – शैलेंद्र सिंह 

Bangladesh : शेख हसीना के लिए क्यों बेचैन है ढाका

Bangladesh :  शेख हसीना पर आरोप हैं कि भ्रष्टाचार के अलावा उन्होंने छात्रों के विरोध प्रदर्शन को कुचलने के लिए ‘मानवता के विरुद्ध अपराध किए’. ढाका ने हसीना को वापस भेजने के लिए दिल्ली पर दबाव बना रखा है, लेकिन भारत की मोदी सरकार ढाका की ख्वाहिश पूरी करने के मूड में कतई नहीं है. इस के कई कारण हैं.

शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग

Bangladesh में शेख हसीना की सत्ता खत्म होने और भारत द्वारा शेख हसीना को शरण देने के बाद भारत और बंगलादेश के बीच संबंध काफी तल्ख हो चुके हैं. 5 अगस्त, 2024 को तख्तापलट के बाद बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना अपनी जान बचा कर भागीं तो भारत ने उन को पनाह दी. लेकिन अब भारत के सामने बड़ी डिप्लोमैटिक समस्या उठ खड़ी हुई है. बंगलादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार ने भारत से आधिकारिक तौर पर शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की है.
गौरतलब है कि Bangladesh हो या पाकिस्तान, लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के बावजूद इन देशों में जब भी किसी एक पार्टी की सरकार गिरी, उस के प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति को देश छोड़ कर भागना पड़ा. नवाज शरीफ, जनरल परवेज मुशर्रफ सत्ता से हटने के बाद अपनी जान बचा कर दूसरे देशों में भागे. यही बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ भी हुआ है. यदि वे सत्ता छोड़ने के बाद बंगलादेश में रुकतीं तो जीवित न बचतीं.

5 अरब डौलर के भ्रष्टाचार का आरोप

इस से उलट भारत में कभी किसी प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति को सत्ता से हटने के बाद देश छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ी. इंदिरा गांधी की सरकार गिरी. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिरी. मनमोहन सिंह की सरकार गिरी मगर देश छोड़ने की जरूरत किसी को नहीं पड़ी. राजीव गांधी के निधन के बाद जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की बागडोर संभाली तो विपक्षी पार्टियों ने उन का जीना हराम कर दिया.
भाजपा जब सरकार में आई तो उस ने सोनिया, प्रियंका, रौबर्ट वाड्रा और राहुल गांधी को भ्रष्टाचार के आरोपों में घेरने व जेल भिजवाने की सारी तरकीबें अपना लीं, फिर भी गांधी-वाड्रा परिवार ने कभी देश छोड़ने की बात नहीं सोची क्योंकि उन्हें यहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था व संविधान पर भरोसा था. यह भारत के लोकतंत्र की मजबूती और खूबी है.
दूसरी बात यह कि भारत में किसी भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने का आरोप नहीं लगा. जबकि इन मुसलिम देशों के प्रधानमंत्रियों पर घोर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं. शेख हसीना पर भी 5 अरब डौलर के भ्रष्टाचार का आरोप है और इसलिए यूनुस सरकार हसीना का प्रत्यर्पण चाहती है.

आधिकारिक प्रत्यर्पण आग्रह

शेख हसीना के आधिकारिक प्रत्यर्पण आग्रह से पहले बंगलादेश में उन के खिलाफ बाकायदा गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ है. उन पर आरोप है कि भ्रष्टाचार के अलावा उन्होंने छात्रों के विरोधप्रदर्शन को कुचलने के लिए ‘मानवता के विरुद्ध अपराध किए’.
ढाका ने हसीना को वापस भेजने के लिए दिल्ली पर दबाव बना रखा है. भारत और बंगलादेश के बीच 2013 से प्रत्यर्पण समझौता भी मौजूद है. लेकिन भारत की मोदी सरकार ढाका की ख्वाहिश पूरी करने के मूड में कतई नहीं है. इस के कई कारण हैं.
शेख हसीना के भारत के साथ संबंध हमेशा बहुत अच्छे रहे हैं. उन की वजह से ही भारत और Bangladesh के रिश्ते भी काफी मजबूत हुए और दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ा. दोनों देशों के बीच लंबे समय से जो सीमा विवाद और जल विवाद थे, उन का समाधान भी शेख हसीना के कार्यकाल में ही निकला. शेख हसीना भारत की भरोसेमंद दोस्त रही हैं. वे आगे भी भारत के बहुत काम आ सकती हैं.
इसलिए नई दिल्ली की यह जिम्मेदारी भी है कि वह उन की सुरक्षा करे क्योंकि हसीना को यूनुस सरकार के हाथों सौंपने का अर्थ होगा उन को फांसी के तख्ते पर पहुंचा देना. बंगलादेश इस वक्त शेख हसीना के खून का प्यासा हो रहा है.

ढाका के सुपुर्द करने का मतलब

ऐसे में भारत का कर्तव्य है कि वह अपनी पुरानी दोस्त की सुरक्षा करे. एक बड़ी शक्ति बनने की महत्त्वाकांक्षा रखने वाले देश के लिए यह उचित भी नहीं है कि वह अपने उस साथी से पीठ फेर ले जिस ने लंबे समय तक उस के हितों को साधा हो. भारत को शेख हसीना की हिफाजत के साथ पड़ोसी देश में बढ़ रही कट्टरपंथी ताकतों पर भी नकेल कसनी है.
शेख हसीना को ढाका के सुपुर्द करने का मतलब है वहां हिंसा की आग में घी डालना. क्योंकि हसीना को यदि फांसी पर चढ़ाया जाता है तो उन के समर्थकों में भारी रोष और विद्रोह पैदा होगा और कट्टरपंथी सरकार से दोदो हाथ करने के इरादे से सड़कों पर उतर पड़ेंगे. भारत के लिए आवश्यक है कि वह बंगलादेश में उदारवादी व्यवस्था को सुरक्षित रखने का प्रयास करे जिसे Bangladesh के कट्टरपंथी तहसनहस कर के बंगलादेश को संकट और बरबादी में झोंकना चाहते हैं.इस के लिए भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी आवाज पंहुचानी होगी. बंगलादेश में कट्टरपंथी ताकतों का बढ़ना भारत के लिए खतरे की घंटी है.

पाकिस्‍तान का इरादा

पाकिस्तान इस फिराक में है कि वह बंगलादेश की कट्टरपंथी ताकतों से हाथ मिला कर भारत को दोनों तरफ से घेर ले. चीन की नजर भी बंगलादेश पर है. इसलिए भारत की विदेश नीति, जो जर्जर अवस्था में पहुंच चुकी है, को दुरुस्त करना होगा और उदारवादी ताकतों से संपर्क साध कर बंगलादेश में लोकतंत्र की बहाली की दिशा में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देना होगा ताकि भारत की सीमाएं सुरक्षित रहें और यहां शांति बनी रहे.
इस के अलावा भारत का दायित्व है कि बंगलादेश के अल्पसंख्यकों, जिन में हिंदुओं की संख्या अधिक है, की जानमाल की हिफाजत सुनिश्चित करे. कट्टरपंथी ताकतें किसी भी देश में हों, उन के निशाने पर सब से पहले अल्पसंख्यक ही होते हैं. भारत में भी यही हाल है. यहां भी दक्षिणपंथी कट्टर ताकतें लंबे समय से मुसलमानों पर जुल्म ढा रही हैं. हमें अगर बंगलादेश के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की चिंता है तो अपने देश के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को हम कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं? यह मोदी सरकार और उन के मंत्रियों-अधिकारियों को सोचना चाहिए.

वर्तमान स्थिति अराजक

दोनों देशों में शांति व्यवस्था और वास्तविक लोकतंत्र स्थापित हो, इस सोच के तहत ही भारत के 400 से अधिक प्रमुख नागरिकों, जिन में पूर्व डिप्लोमैट्स भी शामिल हैं, ने नई दिल्ली में बंगलादेश के उच्चायुक्त के माध्यम से बंगलादेश के नागरिकों को खुलापत्र लिख कर वहां धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध बढ़ती हिंसा पर गहरी चिंता व्यक्त की है और इस बात पर बल दिया है कि बंगलादेश को स्थिर, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश बनाए रखने में ही दोनों देशों के साझा हित सुरक्षित रह सकते हैं
अंतरिम प्रशासन में अतिवादी तत्त्वों के प्रभाव के विरुद्ध भी पत्र में चेताया गया है कि इन की वजह से बंगलादेश के संस्थापक मूल्य बदल सकते हैं. Bangladesh के अधिकांश नागरिक भी इस पक्ष में हैं कि उन का देश उदार व धर्मनिरपेक्ष बना रहे, जिस में धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित सभी नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहें.
इस में शक नहीं कि बंगलादेश की वर्तमान स्थिति अराजक है. सरकार पर भीड़ का राज हावी है. भीड़ जो चाहती है वह करती है और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है. एक निश्चित पैटर्न के तहत लगभग सभी क्षेत्रों- न्यायपालिका, कार्यकारिणी, शिक्षा संस्थानों, मीडिया- से जबरन इस्तीफे दिलवाए जा रहे हैं, जिस से कानून लागू नहीं हो पा रहा है, जनव्यवस्था चरमरा गई है और हर तरफ अफरातफरी का वातावरण है. हालांकि सेना को पुलिस शक्तियां भी दी गई हैं, लेकिन स्थिति सामान्य नहीं हुई है. जाहिर है कि इस सब पर अंतर्राष्ट्रीय चिंताएं भी हैं.

अंतरिम सरकार पर दबाव

इस का एक ही समाधान है कि बंगलादेश की जनता अपनी अंतरिम सरकार पर दबाव बनाए कि वह लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के संवैधानिक सिद्धांतों का सख्ती से पालन करे, हिंसा पर तुरंत विराम लगाए ताकि जनता की अपनी सरकार सत्ता संभाल सके. शेख हसीना के प्रत्यर्पण से कुछ हासिल नहीं होने जा रहा है, सिवा इस के कि उन के कुछ राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के अहंकार को संतोष मिलेगा.
Bangladesh को जरूरत है कि उस की अर्थव्यवस्था पटरी पर आए. यह देश में शांति, राजनीतिक स्थिरता और पड़ोसी मुल्कों, विशेष कर भारत, से अच्छे व सहयोगी संबंध स्थापित करने से ही मुमकिन है. लेकिन अभी तो ऐसा लग रहा है कि वहां की अंतरिम सरकार भारत के साथ टकराव की स्थिति बनाना चाहती है. हसीना के प्रत्यर्पण की मांग का यही अर्थ है. हालांकि, शेख हसीना अपने प्रत्यर्पण और अपने ऊपर लगे आरोपों के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय अदालत का दरवाजा खटखटा सकती हैं. आने वाले समय में वे ऐसा करेंगी भी.
Bangladesh का पूरा मामला यह भी साबित करता है कि भारत सरकार जो बांह मरोड़ने की बुलडोजरी नीति देश में अपनाती है वह सीमापार कहीं नहीं चलती, न Bangladesh में चली, न श्रीलंका में चली, न मालदीव में चली. नेपाल और भूटान तक आधेअधूरे भारत सहयोगी हैं. जो तानाशाही में यकीन रखते हैं, उन की सब सुनें, यह संभव नहीं.
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Pushpa 2 : अल्लु का फिल्म इंडस्ट्री के अर्जुन बनने की कहानी

Pushpa 2 की सक्सैस ने अल्लु अर्जुन को पैन इंडियन स्टार बना दिया है. अल्लु को मास ऐक्टर के रूप में पहचान मिली है जो शाहरूख, सलमान, प्रभास, रजनीकांत जितनी कहीं है.
17 नवंबर को जब पटना, बिहार के गांधी मैदान में अल्लु अर्जुन अभिनीत तेलुगु भाषा की फिल्म ‘Pushpa 2 : द रूल’ का हिंदी में डब संस्करण का ट्रेलर लौंच कार्यक्रम संपन्न हुआ था तो इस कार्यक्रम में अपेक्षा के विपरीत 2 लाख से अधिक आम लोग पहुंच गए थे. उत्साह को देखते मंच से अल्लु अर्जुन ने झुकते हुए कहा था, ‘‘पुष्पा हरगिज नहीं झुकेगा साला… लेकिन आज आप के प्यार के सामने वह झुक गया.  मंच से अपनी फिल्म का ही संवाद दोहराते हुए अल्लु अर्जुन ने कहा था, ‘‘पुष्पा को फायर समझा है, फायर नहीं वाइल्ड फायर है…’’

फायर नहीं वाइल्ड फायर

 5 दिसंबर को भारत सहित पूरे विश्व के साढ़े 13 हजार स्क्रीन्स में तेलुगु के अलावा हिंदी, बंगला, तमिल, मलयालम व कन्नड़ भाषा में डब हो कर व विदेशों में इंगलिश सबटाइटल के साथ रिलीज होते ही ‘Pushpa 2’ की ऐसी आंधी चली कि इस ने अबतक फिल्मों की कमाई के सारे रिकौर्ड तोड़ दिए.
मजेदार बात यह है कि इस से पूरा बौलीवुड संकट में दिखाई दे रहा है. बौलीवुड के किसी भी कलाकार ने अबतक ‘Pushpa 2: द रूल’ या अल्लु अर्जुन को ले कर कुछ कहने की बजाए अपने मुंह पर ताला लगा रखा है.
फिल्म ‘Pushpa 2 : द रूल’ की इस सफलता का श्रेय अल्लु अर्जुन को ही दिया जा रहा है. यूं बहुत कम लोगों को याद होगा कि अल्लु अर्जुन और फिल्म के निर्देशक सुकुमार का संबंध 20 साल पुराना है. अल्लु अर्जुन ने 2004 में सुकुमार के निर्देशन में अपने कैरियर की दूसरी फिल्म ‘आर्या’ की थी.
उस के बाद से अबतक अल्लु अर्जुन ने सुकुमार के निर्देशन में कई फिल्में की हैं. वह अबतक अपनी झोली में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के अलावा 6 फिल्मफेयर पुरस्कार और 3 नंदी पुरस्कार सहित कई पुरस्कारों को डाल चुके हैं. उन की गिनती भारतीय सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ नर्तकों/डांसरों में होती है. उन्हें ‘स्टाइलिश स्टार’ और ‘आइकन स्टार’ की पदवियां भी मिल चुकी हैं.
आज अल्लु अर्जुन की गिनती भारतीय सिनेमा में सब से अधिक कमाई करने वाले अभिनेताओं में होती है. 2014 में ही ‘फोर्ब्स इंडिया की सैलिब्रिटी 100 सूची में अल्लु अर्जुन का नाम जुड़ गया था.

फिल्मी माहौल में हुई परवरिश

फिल्म ‘Pushpa 2 : द रूल’ में अभिनय करने के लिए 300 करोड़ रूपए फीस लेने वाले 42 वर्षीय अभिनेता अल्लु अर्जुन का जन्म फिल्मी परिवार में ही हुआ था. तेलुगु सुपरस्टार चिरंजीवी, अल्लु के फूफा और तेलुगु अभिनेता तथा वर्तमान में आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण अल्लु के फुफेरे भाई हैं. हालांकि वंशवाद का ठप्पा सिर्फ बौलीवुड पर ही लगाया जाता है मगर साउथ में सभी कलाकार वंशवादी हैं.
अल्लु अर्जुन अपने मातापिता की 3 संतानों में दूसरे नंबर पर हैं. उन के बड़े भाई वेंकटेश उद्योगपति हैं. जब कि उन का छोटा भाई सिरीश भी अभिनेता है. अल्लु, अभिनेता राम चरण के चचेरे भाई हैं.
8 अप्रैल 1982 को चेन्नई में जन्मे अल्लु अर्जुन मशहूर तेलुगु फिल्म निर्माता अल्लु अरविंद के बेटे हैं, उन की मां निर्मला गृहिणी है. अल्लु के दादा प्रसिद्ध हास्य अभिनेता अल्लु रामलिंगैया थे, जिन्होंने 1000 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया.
वैसे उन के पूर्वज आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी जिले के पलाकोल्लू के निवासी हैं पर अल्लु का परिवार वहां से चेन्नई आ गया था और 1990 के दशक से उन का परिवार हैदराबाद में रह रहा है. अल्लु अर्जुन की प्रारंभिक शिक्षा चेन्नई के सेंट पैट्रिक स्कूल में हुई. उस के बाद उन्होंने एमएसआर कालेज, हैदराबाद से बैचलर औफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में डिग्री प्राप्त की.

चार साल की उम्र में किया अभिनय

यूं तो बौलीवुड के कई नेपोकिड की तरह अल्लु अर्जुन भी दक्षिण के नेपोकिड ही हैं, मगर जिस समय उन्होंने फिल्मों में एंट्री ली उस दौरान नेपोटिज्म नाम की बहस ही नहीं थी, बल्कि फिल्मों में स्टार्स के बच्चों की भरी डिमांड थी और फिल्में रिलीज से पहले ही चर्चा बटोर लेती थीं.
हालांकि फिल्मों में उन के अभिनय की शुरुआत उन्होंने महज 4 साल की उम्र में अपने पिता अल्लु अरविंद द्वारा स्वनिर्मित फिल्म ‘‘विजेता’ से बाल कलाकार के रूप में हो गई थी, जिस में अल्लु अर्जुन के फूफा चिरंजीवी हीरो थे. फिर 19 वर्ष की उम्र में उन के पिता अल्लु अरविंद ने ही स्वनिर्मित फिल्म ‘‘डैडी’’ में डांसर के रूप में अल्लु अर्जुन को अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का अवसर दिया, इस फिल्म में भी उन के फूफा चिरंजीवी ही हीरो थे. यानी उन की झोली में फिल्में बिना संघर्ष के आती रहीं.

21 साल की उम्र में बने हीरो

फिल्मों में बतौर हीरो 21 साल की उम्र में उन के कैरियर की शुरूआत 2003 में उन के पिता अल्लू अरविंद और सी. अश्विनी दत्त निर्मित फिल्म ‘‘गंगोत्री’ से हुई, जिस का निर्देशन के राघवेंद्र राव ने किया था. फिल्म ‘गंगोत्री’ के रिलीज होने के बाद उन के अभिनय की प्रशंसा हुई मगर उन के लुक की आलोचना करते हुए आइडलब्रेन के जीवी ने कहा था, ‘‘अर्जुन को ऐसी भूमिकाएं चुननी चाहिए जो उन की ताकत को बढ़ाए और उन की कमजोरियों को खत्म करे.’’

लेकिन फिल्म ‘गंगोत्री’ में अल्लु अर्जुन के अभिनय से प्रभावित हो कर निर्देशक सुकुमार ने दिल राजू निर्मित रोमांटिक एक्शन प्रधान तेलुगु फिल्म ‘आर्या’ में शीर्ष भूमिका निभाने का अवसर दिया. फिल्म आर्या में आर्या, एक मिलनसार और स्वतंत्र विचारों वाला लड़का है, जिसे गीता (अनु मेहता) से प्यार हो जाता है, जो एक अंतर्मुखी लड़की है, जो एक अन्य व्यक्ति अजय (शिव बालाजी) की ढाल पर है. हालांकि यह टौक्सिक रिलेशनशिप वाली फिल्म थी, जिस में आर्या का किरदार टौक्सिक टावर जैसी थी.

‘आर्या’ की सफलता

फिल्म ‘आर्या’ की सफलता ने अल्लु अर्जुन को स्टार बनाया, साथ में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, तेलुगु के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए पहला नामांकन अर्जित किया और नंदी स्पैशल जूरी पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (आलोचकों) के लिए सिनेमा पुरस्कार जीता. फिल्म आलोचनात्मक और व्यावसायिक रूप से सफल रही.
2004 में 4 करोड़ की लागत में बनी इस फिल्म ने 30 करोड़ रूपए से अधिक की कमाई कर दिया था. 2006 में इस फिल्म को मलयालम भाषा में डब कर केरला में रिलीज किया गया, जहां सफलता के झंडे गाड़ने के साथ ही अल्लु अर्जुन ने पूरे मलयाली समाज में अपनी पैठ बना ली.
इस के बाद अल्लु अर्जुन ने वी. वी. विनायक के निर्देशन में अपने पिता द्वारा सहनिर्मित तेलुगु फिल्म ‘‘बन्नी’’ में एक कालेज छात्र बन्नी का किरदार निभाया. इस फिल्म ने बौक्स औफिस पर सफलता दर्ज कराने के साथ ही आलोचकों को भी अल्लु अर्जुन की कार्यशैली, अभिनय व डांस की प्रशंसा करने पर मजबूर कर दिया. 2006 में वह ए. करुणाकरन की संगीतमय प्रेम कहानी ‘हैप्पी’ में नजर आए, जिस ने भारतीय बौक्स औफिस के साथ ही विदेशों में जम कर कमाई की.

शैलियों का प्रयोग

फिल्मी परिवार का सदस्य होने का फायदा अल्लू अर्जुन को शुरू में खूब मिला. इस के बाद अल्लु अर्जुन ने अपने अभिनय कैरियर को संवारने के लिए अपने पिता पर निर्भर छोड़ने में सफलता पाई. जिस चलते उन्होंने 2007 से अलगअलग शैलियों में प्रयोग करना शुरू कर दिया. 2007 में उन्होंने पुरी जगन्नाध की एक्शन फिल्म ‘देसमुदुरु’ में अभिनय किया. इस फिल्म में अल्लु अर्जुन एक निडर पत्रकार बाला गोविंदम की भूमिका में नजर आए, जो एक अंधेरे अतीत वाली महिला के प्यार में पड़ जाता है.
इस फिल्म के लिए संतोषम फिल्म पुरस्कार, सिनेमा पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता- तेलुगु के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए दूसरा नामांकन हासिल किया. 2007 में ही वह पहली बार अपने फूफा चिरंजीवी के साथ फिल्म ‘शंकर दादा जिंदाबाद’ के गीत ‘जगदेका वीरुदिकि’ में कैमियो किया.
2008 में लेखक व निर्देशक भास्कर की रोमांटिक एक्शन तेलुगु फिल्म ‘परुगु’ की, जिस में वह हैदराबाद के ऐसे खुशमिजाज इंसान कृष्णा की भूमिका में नजर आए, जो अपने दोस्त को उस की प्रेमिका के साथ भागने में मदद करता है, लेकिन उसे महिला के पिता के क्रोध और भावनात्मक संघर्ष का अनुभव करना पड़ता है.

पहला फिल्मफेयर पुरस्कार

इस फिल्म के लिए अल्लू अर्जुन ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता- तेलुगु के लिए अपना पहला फिल्मफेयर पुरस्कार और अपना दूसरा नंदी स्पैशल जूरी पुरस्कार अपने नाम किया. 2009 में निर्देशक सुकुमार ने अल्लू अर्जुन को एक्शन कौमेडी ‘आर्या’ के सीक्वअल ‘आर्या 2’ का हिस्सा बनाया. यह फिल्म प्रेमघृणा संबंधों और प्रेम त्रिकोण की जटिलताओं के इर्दगिर्द घूमती है.
इस फिल्म में उन के अभिनय के साथ ही डांस को काफी सराहा गया. इस फिल्म के लिए अल्लु अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ तेलुगु अभिनेता के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए चौथा नामांकन मिला.
फिर 2010 में उन की दो फिल्में रिलीज हुईं, जिन में से पहली गुणशेखर निर्देशित ‘वरूदु’ बौक्स औफिस पर बम साबित हुई, तो वहीं दूसरी हाइपरलिंक एंथोलौजी फिल्म ‘वेदम’ थी. कृश निर्देशित यह अल्लु के कैरियर की पहली ‘ए’ प्रमाणपत्र वाली पहली फिल्म थी, जिस की कहानी के केंद्र में मुंबई के ताजमहल पैलेस होटल में 26/11 के वक्त हुए मुंबई विस्फोट रहे.
इस फिल्म में अल्लु अर्जुन जुबली हिल्स (हैदराबाद) स्लम के रहने वाले एक केबल औपरेटर आनंद ‘केबल’ राजू की भूमिका में नजर आए. इस फिल्म में उन के साथ अनुष्का शेट्टी, मांचू मनोज और बौलीवुड कलाकार मनोज बाजपेयी भी थे. सब से बड़ी बात यह है कि इस फिल्म के एक गाने का अल्लु अर्जुन ने नृत्य निर्देशन भी किया था. इस फिल्म में उत्कृष्ट अभिनय के लिए उस ने सर्वश्रेष्ठ तेलुगु अभिनेता का अपना दूसरा फिल्मफेयर पुरस्कार हासिल किया.

मार्शल आर्ट सीखने वियतनाम जाना

2011 में उन के कैरियर में एक बदलाव आया. उन्हें वी. वी. विनायक निर्देशित फिल्म ‘बद्रीनाथ’ में अभिनय करने से पहले वियतनाम जा कर मार्शल आर्ट और तलवारबाजी का प्रशिक्षण हासिल करना पड़ा. इतना ही नहीं उन्हें अपनी दाढ़ी भी बढ़ानी पड़ी थी. वी. वी. विनायक की एक्शन फिल्म ‘बद्रीनाथ’ में उन्होंने बद्री की भूमिका निभाई थी, जो एक आधुनिक भारतीय समुराई है, जिसे उस के गुरु (प्रकाश राज) द्वारा बद्रीनाथ मंदिर की रक्षा करने का काम सौंपा गया है, जिस के प्रति वह बहुत वफादार है. इस में पहली बार अल्लु अर्जुन ने तमन्ना के साथ अभिनय किया था. यह फिल्म 187 सिनेमाघरों में 50 दिन तक दिखाई गई थी.

आलोचना का जवाब: अपने अंदर सुधार करना

आमतौर पर कलाकार अपनी आलोचना सुनना पसंद नहीं करता. मगर अल्लु अर्जुन की खासियत यह है कि वह आलोचना पर ध्यान दे कर अपने अंदर सुधार लाते हैं. जब कि बौलीवुड के कलाकारों को अपने अभिनय की आलोचना सुनना पसंद ही नहीं है. फिल्म ‘बद्रीनाथ’ के लिए उन की आलोचना हुई थी कि वह केवल एक्शन ही कर सकते हैं, इमोशनल सीन करना उन के बस की बात नहीं है.
इस के बाद अल्लु अर्जुन 2012 में रिलीज हुई निर्देशक त्रिविक्रम श्रीनिवास की एक्शन कौमेडी फिल्म: ‘जुलायी’ में नजर आए थे. इस फिल्म में उन्होंने एक स्ट्रीट- स्मार्ट, लेकिन बिगड़ैल युवा रवींद्र नारायण की भूमिका निभाई थी, जिस की जिंदगी एक बड़ी बैंक डकैती का गवाह बनने के बाद एक बड़ा मोड़ लेती है.
2013 में वह पुरी जगन्नाध निर्देशित एक्शन थ्रिलर ‘इद्दारममयिलाथो’ में अमला पौल और कैथरीन ट्रेसा के साथ एक अंधेरे अतीत वाले गिटारवादक संजू रेड्डी की भूमिका में नजर आए. फिर भी 2014 में अभिनेत्री काजल अग्रवाल के साथ वामसी पेडिपल्ली निर्देशित एक्शन थ्रिलर फिल्म ‘येवडु’ में कैमियो भूमिका में दिखाई दिए.

खुद बने निर्माता

बतौर अभिनेता पहचान बनाने के साथ कई पुरस्कार हासिल करने के बाद अल्लु अर्जुन ने मई 2013 में फिल्म के निर्माण के क्षेत्र में कदम रखते हुए लघु फिल्म ‘आई एम दैट चेंज’ का निर्माण व उस में अभिनय भी किया. सुकुमार निर्देशित यह फिल्म अगस्त 2014 में रिलीज हुई थी.
फिर वह सुरेंदर रेड्डी की फिल्म ‘रेस गुर्रम’ में अल्लू लक्ष्मण नामक एक लापरवाह इंसान के किरदार में नजर आए. यह फिल्म अल्लू की पहली 100 करोड़ रुपए कमाने वाली फिल्म बनी. तो वहीं सर्वश्रेष्ठ अभिनेता तेलुगु के लिए उन्हें तीसरी बार फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया.
फिर 9 अप्रैल 2015 को रिलीज हुई त्रिविक्रम श्रीनिवास की फिल्म ‘एस/ओ सत्यमूर्ति’ में नजर आए. इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए सातवां नामांकन मिला. 2015 में ही वह गुना शेखर की जीवनी एक्शन फिल्म ‘रुद्रमादेवी’ में गोना गन्ना रेड्डी की भूमिका में नजर आए. जो कि उन के कैरियर की पहली ऐतिहासिक व थ्रीडी फिल्म रही.
इस फिल्म के किरदार के साथ न्याय करने के लिए अल्लु अर्जन ने तेलंगाना में बोली जाने वाली तेलुगु भाषा सीखी. गोना गन्ना रेड्डी को मिली शोहरत के बाद फिल्म के निर्देशक गुना शेखर ने 2021 में ऐलान किया था कि वह ‘शाकुंतलम’ के बाद पूरी तरह से चरित्र पर आधारित एक फिल्म का निर्देशन करेंगे, जिस में अल्लु अर्जुन मुख्य भूमिका में होंगे.

कैरियर की एक ‘ऐतिहासिक फिल्म’

2016 में, उन्होंने बोयापति श्रीनु द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सर्रेनोडु’ में अभिनय किया. इस फिल्म ने बौक्स औफिस पर 128 करोड़ रूपए कमाते हुए अच्छी सफलता पाई थी. जब कि आलोचकों ने इस फिल्म की कहानी व पटकथा की आलोचना की थी.
उस वक्त अल्लू अर्जुन ने इसे अपने कैरियर की एक ‘ऐतिहासिक फिल्म’ की संज्ञा दी थी, तो वहीं इस फिल्म में उन के अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता- तेलुगु के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड से नवाजा गया तथा सर्वश्रेष्ठ अभिनेता- तेलुगु के लिए फिल्मफेयर अवार्ड के लिए उन्हें आठवां नामांकन मिला.
2017 में वह निर्माता दिल राजू की फिल्म ‘‘डीजे दुव्वदा जगन्नाधम’ में नजर आए. हरीश शंकर निर्देशित इस फिल्म में अल्लु अर्जुन के साथ पूजा हेगड़े, राव रमेश और सुब्बाराजू भी हैं. इस फिल्म को बोरिंग बताते हुए काफी आलोचना हुई थी.
इस के बाद लेखक से निर्देशक बने वक्कनथम वामसी के निर्देशन में अल्लु अर्जन ने फिल्म ‘न पेरू सूर्या’ में नजर आए. जिस में उन्होंने भारतीय सेना के एक सिपाही सूर्या का अति चुनौतीपूर्ण किरदार निभाया. इस फिल्म की शूटिंग से पहले अल्लू अर्जुन ने पेशेवरों से ट्रिक्स और स्टंट सीक्वेंस सीखने में काफी समय बिताया. अब तक उन्हें लोगों ने स्टाइलिस्ट स्टार कहना शुरू कर दिया था.

15 साल बाद पिता की फिल्म

पूरे 15 साल बाद अल्लु अर्जुन ने अपने पिता अल्लु अरविंद व एस राधाकृष्ण निर्मित व त्रिविक्रम श्रीनिवास निर्देशित फिल्म ‘‘अला वैकुंठपूर्मुलु’’ में नजर आए. यह फिल्म जनवरी 2020 में रिलीज हुई थी. यह फिल्म उन के कैरियर की सब से ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म के साथ ही सब से ज्यादा कमाई करने वाली तेलुगु फिल्मों में से एक बन गई.

पैन इंडिया स्टार बनने की तरफ बढ़ाया कदम

अब तक स्टाइलिस्ट स्टार के साथ ही आइकन स्टार की पदवी हासिल कर चुके अल्लु अर्जुन ने खुद को पैन स्टार बनाने की दिशा में काम करना शुरू किया. इस के लिए उन्होंने अपने पसंदीदा व अति विश्व्सनीय निर्देशक सुकुमार को चुना. उन के निर्देशन में अल्लु अर्जुन ने ‘पुष्पा द राइज’ की, जो कि दिसंबर 2021 में रिलीज हुई.
आंध्र प्रदेश के शेषचलम पहाड़ियों में लाल चंदन की तस्करी पर आधारित इस फिल्म में अल्लु अर्जुन ने फहाद फासिल और रश्मिका मंदाना के साथ मजदूर से चंदन तस्कर बने पुष्पा राज की भूमिका निभाई. इस फिल्म को मिलीजुली समीक्षा मिली, लेकिन उन के अभिनय की प्रशंसा हुई. जब इसे हिंदी में डब कर के रिलीज किया गया तो पहले दिन इसे कम स्क्रीन्स और कम दर्शक मिले, लेकिन दूसरे दिन से इस ने हंगामा बरपा दिया और इस फिल्म ने सिर्फ हिंदी में 100 करोड़ रूपए कमा लिए और वह भी तब जब कोविड का दौर लगभग चल ही रहा था.
इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चौथा फिल्मफेयर पुरस्कार मिला. इसी के साथ पहली बार उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी नवाजा गया. राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के बाद अल्लु अर्जुन ने कहा था कि अब उन के कंधे पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ गई है.
इस फिल्म का संवाद ‘झुकेगा नहीं साला’ तो छोटे बच्चे से बड़ेबूढ़ों की जुबान पर छा गया था और पूरे 3 साल बाद जब ‘पुष्पा द राइज’ का सीक्वअल ‘पुष्पा 2: द रूल’ ले कर निर्देशक सुकुमार व अभिनेता अल्लु अर्जुन आए, तो इस फिल्म की आंधी में दक्षिण की फिल्म इंडस्ट्री के साथ ही बौलीवुड भी संकट में आ गया.

अल्लु अर्जुन की लोकप्रियता का आलम

अल्लु अर्जुन को जीक्यू में 2020 के सब से प्रभावशाली युवा भारतीयों की सूची में शामिल किया जा चुका है. 2020 में ‘याहू’ पर सर्वाधिक खोजे जाने वाले पुरुष सेलिब्रिटी हैं. 2022 के मध्य में गूगल पर सर्वाधिक खोजे जाने वालों में वह 19वे एशियाई बन गए.
केरल में 2006 से उन्हें ‘मल्लू अर्जुन’ कहा जाता है. 2021 में, केरल पुलिस ने एसओएस के बारे में जागरूकता बढ़ाने और अपने नए लौंच किए गए ऐप को बढ़ावा देने के लिए, अपने विज्ञापन में अल्लु अर्जुन की 2014 में रिलीज फिल्म ‘रेस गुर्रम’ से उन के कुछ दृश्यों का इस्तेमाल किया.

और भी बहुत कुछ

2024 में उन्हें 55वें ‘इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल औफ इंडिया’ में भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए आईएफएफआई विशेष मान्यता से सम्मानित किया गया. अल्लू अर्जुन हीरो मोटोकौर्प,  रेडबस, हौटस्टार, ओएलएक्स, कोलगेट, 7 अप, कोकाकोला, जोयालुक्कास सहित कई ब्रांडों और उत्पादों के सैलिब्रिटी एंडोर्स करते हैं. वह भारत की प्रमुख कबड्डी टूर्नामेंट ‘प्रो कबड्डी लीग’ के सैलिब्रिटी एंबेसडर भी रहे हैं.
वह अपने पिता अल्लु अरविंद द्वारा स्थापित शीर्ष मीडिया सेवा, अहा के एक सक्रिय प्रमोटर और एक सैलिब्रिटी ब्रांड एंबेसडर हैं. उन्होंने रैपिडो के लिए ड्रीम वौल्ट मीडियानिर्मित विज्ञापन अभियान वीडियो में गुरु की भूमिका निभाई.
विज्ञापन फिल्म का हिस्सा बनने पर, अल्लु अर्जुन ने कहा था, ‘‘मैं खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखना पसंद करता हूं जो जानता है कि सर्वोत्तम संभव समाधान के साथ किसी स्थिति से कैसे निपटना है. यही कारण है कि जब मुझ से गुरु की भूमिका के लिए संपर्क किया गया, तो मैं उत्साहित हो गया, जो मेरे जैसा दिखता है.’’
विज्ञापन फिल्म की रिलीज के बाद, तेलंगाना राज्य सड़क परिवहन निगम ने टीएसआरटीसी की गलत तस्वीर पेश करने के लिए अल्लु अर्जन के साथ ही रैपिडो कंपनी को कानूनी नोटिस भेजा था, तब इस विज्ञापन को एडिट किया गया था.

तंबाकू के खिलाफ चलाया अभियान

बौलीवुड कलाकार शाहरुख खान, अक्षय कुमार व अजय देवगन की तरह तंबाकू पदार्थों का विज्ञापन करने की बनिस्बत अल्लु अर्जुन एक चारकोल कलाकार भी हैं. 2021 में अल्लु अर्जन ने तंबाकू व धूम्रपान के खिलाफ अभियान शुरू करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘मैं लोगों का ध्यान धूम्रपान के दुष्प्रभावों की ओर आकर्षित करना चाहता हूं.
हम ने बहुत गलत धारणा बना ली है कि क्या अच्छा है और क्या बेकार है. मैं एक बदलाव लाना चाहता हूं. चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो.’’ इतना ही नहीं वह ‘श्री चैतन्य शैक्षणिक संस्थानों’ के ब्रांड एंबेसडर बने.

एक बेटे व एक बेटी के पिता

फिल्म ‘वेदम’ को मिली अपार सफलता व सर्वश्रेष्ठ अभिनेता दूसरा फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने के बाद 6 मार्च 2011 को, अल्लु अर्जुन ने हैदराबाद में स्नेहा रेड्डी से विवाह किया था और अब वह बेटे अयान तथा बेटी अरहा के पिता हैं.
अल्लु अर्जुन अपनी कला की विरासत को आगे बढ़ाते हुए उन की बेटी अल्लू अरहा ने फिल्म ‘शाकुंतलम’ में बाल कलाकार के तौर पर राजकुमार भरत की भूमिका निभाई. अल्लु अर्जुन व्यवसायी भी हैं. 2016 में उन्होंने एम किचन और बफेलो वाइल्ड विंग्स के सहयोग से ‘800 जुबली’ नामक एक नाइट क्लब शुरू किया था.

सामाजिक कार्य

दक्षिण के अभिनेताओं की ही तरह अल्लु अर्जुन भी सामाजिक कार्यो में अपना योगदान देते रहते हैं. 2019 में अल्लु अर्जुन ने अपने पैतृक शहर पलाकोल्लू, आंध्र प्रदेश में संक्रांति मनाई और 5 पंचराम क्षेत्रों में से एक, क्षीर रामलिंगेश्वर मंदिर के विकास और नवीकरण कार्यों के लिए 20 लाख रूपए दिए थे. इस रकम से मंदिर प्रबंधन ने रथशाला, वाहनशाला, गौशाला का निर्माण तथा मंदिर के रथ का जीर्णोद्धार किया.
फिल्म ‘पुष्पा 2 द रूल’ का 4 दिसंबर को हैदराबाद के संध्या थिएटर में प्रीमियर शो के दौरान मची भगदड़ में एक महिला की मृत्यु हो गई थी, उस महिला के परिवार को अल्लु अर्जुन ने 25 लाख रूपए देते हुए परिवार की हर संभव मदद करने की बात कही है.

राजनीति

अल्लु अर्जुन के फूफा चिरंजीवी व फुफेरे भाई पवन कल्याण राजनीति से जुड़े हुए हैं इसलिए अल्लु अर्जुन भी राजनीति से जुड़े नजर आते हैं. 2019 के लोकसभा चुनावों में उन्होने पलाकोल्लू में पवन कल्याण की जनसेना पार्टी के लिए भी प्रचार किया था. मगर 2024 में उन्होने ऐसा नहीं किया. कहा जाता है कि तभी से चिरंजीवी व पवन कल्याण के पिरवार से अल्लु अर्जुन के परिवार के संबंधों में खटास आ गई है.

‘Puspha 2: द रूल’ के बाद

‘पुष्पा 2: द रूल’ के बाद अल्लु अर्जुन इस फिल्म के अगले सीक्वअल ‘पुष्पा 3: द रैम्पेज’ में अभिनय कर रहे हैं पर इस फिल्म की शूटिंग कब होगी और यह फिल्म कब रिलीज होगी, इस की स्पष्ट जानकारी देने के लिए कोई तैयार नहीं है. मगर सूत्र बताते हैं कि इस फिल्म की आधी शूटिंग संपन्न हो चुकी है. और यह फिल्म 2025 के अंत तक रिलीज हो सकती है.

Hindi Cinema : पीएम मोदी को खुला पत्र लिखकर विवादों में आए थे फिल्ममेकर श्‍याम बेनेगल

Hindi Cinema : ‘अंकुर’ और ‘मंथन’ जैसी सुपरहिट फिल्में देने वाले मशहूर फिल्मसर्जक श्याम बेनेगल का गंभीर बीमारी के चलते 23 दिसंबर निधन हो गया. श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्मों में समाज के कई अनुछुए मुद्दों व सचाई को उजागर किया था.

ढह गया नेहरूवियन युग का अंतिम किला

23 दिसंबर की शाम साढ़े छह बजे मुंबई में 90 वर्ष की उम्र में मशहूर फिल्मसर्जक श्याम बेनेगल का निधन हो गया. इसी के साथ नेहरूवियन युग का अंतिम किला ढह गया. राजकपूर की ही तरह श्याम बेनेगल ने भी साम्यवादी विचारधारा के प्रति झुकाव रखते हुए भी समाजवाद को ही अपनी फिल्मों में परोसा. सब से बड़ा सच यह है कि श्याम बेनेगल गरीबों, वंचितों व सर्वहारा वर्ग के लोगों के फिल्मकार रहे हैं. उन्होंने हमेशा गरीबी, गैरबराबरी जैसे मुद्दों के साथ तमाम दूसरी सामाजिक समस्याओं पर फिल्में बनाईं.
उन्होंने सरकार की आलोचना करने से कभी भी परहेज नहीं किया. इस के बावजूद उन्हें सब से अधिक सरकारी डौक्यूमैंट्री आदि बनाने के अवसर मिले. उन्हें सरकार की कई कमेटियों में रखा जाता रहा. श्याम बेनेगल के कृतित्व की बात की जाए तो उन्होंने वह सिनेमा बनाया जिसे लोगों ने कला या समानांतर सिनेमा का नाम दिया, मगर जिस दौर में अमिताभ बच्चन की ऐक्शन फिल्में बौक्सऔफिस पर धन कमा रही थीं, उन्हीं दिनों श्याम बेनेगल की फिल्में भी बौक्सऔफिस पर धन कमा रही थीं.
यह श्याम बेनेगल के सिनेमा का ही जादू था कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक बार उन की तारीफ करते हुए कहा था कि उन की फिल्में इंसानियत को अपने मूल स्वरूप में तलाशती हैं. सत्यजीत रे के गुजर जाने के बाद श्याम ने उन की विरासत को संभाला.

नेहरूवियन बनाम साम्यवादी

एक तरफ कुछ लोग उन्हें नेहरूवियन फिल्मकार की संज्ञा देते रहे तो वहीं उन पर साम्यवादी होने के भी आरोप लगे. इस के बावजूद वे विचलित नहीं हुए. कहा जाता है कि श्याम बेनेगल को फिल्में बनाने के लिए पश्चिम बंगाल के तमाम उद्योगपति तब तक पैसा देते रहे जब तक पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन रहा और तभी तक ‘इप्टा’ भी जीवंत रूप में रहा. उस के बाद ‘इप्टा’ भी मरणासन्न हो चुका है.

उद्योगपतियों व संस्थाओं ने दिए पैसे

श्याम बेनेगल समय के बलवान थे कि उन्हें अपनी फिल्मों के निर्माण के लिए पश्चिम बंगाल के उद्योगपतियों का निजी समर्थन हासिल होने के साथ ही कुछ संस्थागत निगमों का साथ मिला. मसलन, फिल्म ‘मंथन’ के लिए गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन महासंघ और 1987 में ‘सुस्मान’ के लिए हथकरघा सहकारी समितियां का सहयोग मिला.
‘इप्टा’ से जुड़े कलाकार व फिल्मकार भी अब तो पूरी तरह से व्यावसायिक फिल्मों के ही रंग में रंगे हुए हैं. मगर श्याम बेनेगल के अपने अंतिम वक्त तक, ‘अंकुर’ से मुजीब: द मेकिंग औफ अ नैशन’ तक, के सिनेमा में विचारों के स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ.
लेकिन पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार के अंत के साथ ही श्याम बेनेगल के फिल्म निर्माण पर अंकुश सा लग गया. उन्होंने अंतिम फिल्म ‘मुजीबः द मेकिंग औफ अ नैशन’ बनाई, जिसे राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) और बंगलादेश फिल्म विकास निगम (बीएफडीसी) ने मिल कर बनाया था.
फिल्म ‘मुजीबः मेकिंग औफ अ नैशन’ बंगलादेश के निर्माता बंगलादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के पिता की जीवनी है. बंगाली के साथसाथ हिंदी भाषा में बनाई गई इस फिल्म में अभिनेता अरिफिन शुवो ने मुजीब का किरदार निभाया है.

स्टार कलाकारों की नहीं रही दरकार

श्याम बेनेगल उन फिल्मकारों में से रहे जिन्हें कभी भी स्टार कलाकारों या व्यावसायिक सिनेमा के सफलतम कलाकारों की जरूरत नहीं पड़ी. कलाकार उन के साथ काम करने के लिए उन के पीछे भागते रहे. वे कभी भी कलाकारों के पीछे नहीं भागे. श्याम बेनेगल ने कभी भी अपनी किसी भी फिल्म के लिए कलाकारों का चयन करते समय कलाकार का औडिशन या स्क्रीनटैस्ट नहीं लिया. उन की पारखी नजरें तो कलाकार से मिलते ही समझ जाती थीं कि इस के अंदर प्रतिभा है और फिर वे उस प्रतिभा को तराशकर स्टार बना देते थे. फिर चाहे वह नसीरुद्दीन शाह हों या शबाना आजमी या कोई अन्य.

सर्वहारा, ग्रामीण, गरीबी व उत्पीड़न की बात करने वाला सिनेमा

श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्मों में हमेशा गरीब, गैरबराबरी, सर्वहारा, वंचितों के उत्पीड़न की बात की. जी हां, पहली फिल्म ‘अंकुर (द सीडलिंग) में श्याम बेनेगल के गृह राज्य तेलंगाना में आर्थिक और यौन शोषण का यथार्थवादी चित्रण था, जिस ने उन्हें रातोंरात जबरदस्त शोहरत दिलाई.
इस फिल्म ने अभिनेत्री शबाना आजमी और अभिनेता अनंत नाग को पेश किया और बेनेगल ने 1975 में दूसरी सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता. शबाना ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता. जबकि 1980 के दशक की शुरुआत में न्यू इंडिया सिनेमा को जो सफलता मिली, उस का श्रेय काफी हद तक श्याम बेनेगल की चौकड़ी को दिया जा सकता है- ‘अंकुर’ (1973), ‘निशांत’ (1975), ‘मंथन’ (1976) और ‘भूमिका’ (1977).
बेनेगल ने कई नए अभिनेताओं का प्रयोग किया, मुख्य रूप से एफटीआईआई और एनएसडी से, जैसे नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी, कुलभूषण खरबंदा और अमरीश पुरी. बेनेगल की अगली फिल्म ‘निशांत’ (नाइट्स एंड) (1975) में एक शिक्षक की पत्नी का 4 जमींदारों द्वारा अपहरण और सामूहिक बलात्कार किया जाता है; अधिकारी परेशान पति की मदद की गुहार को अनसुना कर देते हैं.
‘मंथन’ (द मंथन) (1976) ग्रामीण सशक्तीकरण पर एक फिल्म है और यह गुजरात के उभरते डेयरी उद्योग की पृष्ठभूमि पर आधारित है. पहली बार गुजरात में 5 लाख से अधिक ग्रामीण किसानों ने दोदो रुपए का योगदान इस फिल्म के निर्माण के लिए किया था. इस तरह वे इस फिल्म के निर्माता बने थे.
जब यह फिल्म रिलीज हुई तो ट्रकों में भरकर किसान इसे देखने आए, जिस से यह बौक्सऔफिस पर सफल रही. ग्रामीण उत्पीड़न पर इस त्रयी के बाद बेनेगल ने एक बायोपिक भूमिका (द रोल) (1977) बनाई, जो मोटेतौर पर 1940 के दशक की प्रसिद्ध मराठी मंच और फिल्म अभिनेत्री हंसा वाडकर (स्मिता पाटिल द्वारा अभिनीत) के जीवन पर आधारित थी, जिन्होंने चमकदार और अपरंपरागत जीवन मुख्य पात्र पहचान और आत्मसंतुष्टि के लिए व्यक्तिगत खोज पर निकलता है, साथ ही पुरुषों द्वारा शोषण से भी वह जूझता है.

सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार

1970 के दशक की शुरुआत में श्याम ने यूनिसेफ द्वारा प्रायोजित सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टैलीविजन एक्सपैरिमैंट के लिए 21 फिल्म मौड्यूल बनाए. इस से उन्हें सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टैलीविजन एक्सपैरिमैंट के बच्चों और कई लोक कलाकारों के साथ बातचीत करने का मौका मिला.
इस अनुभव के आधार पर श्याम बाबू ने 1975 में क्लासिक लोककथा ‘चरणदास चोर’ (चरणदास द थीफ) की अपनी फीचर लंबाई प्रस्तुति में इन में से कई बच्चों का उपयोग किया. उन्होंने इसे चिल्ड्रन्स फिल्म सोसाइटी, भारत के लिए बनाया था. इस फिल्म में श्याम बेनेगल ने एक प्रतिभाशाली सक्षम महिला यानी कि राज कुमारी (स्मिता पाटिल) की पीड़ा और दुर्दशा के प्रति संवेदनशील हो कर उस की सुरक्षा की आवश्यकता पर भी बल दिया.
श्याम बेनेगल की प्रतिभा के आगे झुक कर व्यावसायिक सिनेमा के मशहूर स्टार कलाकार शशि कपूर ने 1978 में फिल्म ‘जनून’ और 1981 में ‘कलियुग’ के निर्देशन की जिम्मेदारी श्याम बेनेगल को सौंपी. फिल्म ‘जनून’ 1857 की आजादी की क्रांति के अशांत काल के बीच स्थापित एक अंतरजातीय प्रेम कहानी थी जब कि ‘कलियुग’ महाभारत पर आधारित थी. जिस में व्यवसाय को ले कर 2 परिवारों के बीच हुए मतभेद को दर्शाया गया है. इस फिल्म में राज बब्बर, शशि कपूर, सुप्रिया पाठक, अनंत नाग, रेखा, कुलभूषण खरबंदा, सुषमा सेठ जैसे दिग्गज कलाकार मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे. इन दोनों फिल्मों ने फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार जीता था.
1983 में राजनीति और वेश्यावृत्ति पर व्यंग्यपूर्ण कौमेडी फिल्म ‘मंडी’ में श्याम बेनेगल ने दिखाया कि किस तरह राजनेता बस्ती को भ्रष्ट होने से बचाने के लिए कोठे को शहर से दूर वीरान जगह पर भेज देते हैं. तो वहीं एक उद्योगपति का बेटा उस सुंदर वेश्या लड़की से शादी करना चाहता है जो कि उस के पिता व एक वेश्या की ही संतान है.

जुबैदा के साथ मुख्यधारा की बौलीवुड में प्रवेश

इस फिल्म में शबाना आजमी और स्मिता पाटिल का शानदार अभिनय है. 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘त्रिकाल’ में श्याम बेनेगल ने 1960 के दशक की शुरुआत में गोवा में पुर्तगालियों के आखिरी दिनों पर आधारित कहानी में मानवीय रिश्तों की खोज की. 1990 के दशक में श्याम बेनेगल ने भारतीय मुसलिम महिलाओं पर एक त्रयी बनाई, जिस की शुरुआत ‘मम्मो’ (1994), ‘सरदारी बेगम’ (1996) और ‘जुबैदा’ (2001) से हुई.
जुबैदा के साथ उन्होंने मुख्यधारा की बौलीवुड में प्रवेश किया, क्योंकि इस में शीर्ष बौलीवुड स्टार करिश्मा कपूर थीं और ए आर रहमान का संगीत था. पर इस के लिए करिश्मा कपूर को जोड़ने का काम फिल्म समीक्षक खालिद मोहम्मद ने किया था.
1992 में उन्होंने धर्मवीर भारती के साहित्यिक उपन्यास पर आधारित ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ बनाई, जिस ने 1993 में हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता. 1996 में उन्होंने फातिमा मीर की पुस्तक ‘द मेकिंग औफ द महात्मा’ पर आधारित एक और फिल्म, ‘द अप्रेंटिसशिप औफ अ महात्मा’ बनाई.
2005 में इंग्लिश भाषा में फिल्म ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोसः द फौरगौटन हीरो’ बनाई. लेकिन एक बार फिर वे अपने पुराने दौर में लौटे, जब 1999 में फिल्म ‘समर’ के माध्यम से सिनेमा जगत में फैली जाति व्यवस्था के साथ ही भारतीय जाति व्यवस्था की आलोचना की, जिस ने सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता.

श्याम बेनेगल एक परिचय

14 दिसंबर, 1934 को हैदराबाद मे कोंकणीभाषी चित्रपुर सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्में श्याम बेनेगल के पिता श्रीधर बी बेनेगल मूलतया कर्नाटक निवासी फोटोग्राफर थे. बचपन से ही कुछ अलग करने की धुन के चलते महज 12 साल की उम्र में श्याम ने अपने पिता द्वारा उपहार में दिए गए कैमरे का उपयोग कर पहली फिल्म बनाई थी.
उन्होंने हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में मास्टर डिग्री हासिल की, जहां उन्होंने हैदराबाद फिल्म सोसाइटी की स्थापना की, जो सिनेमा में उन के शानदार सफर की शुरुआत थी.

पुरस्कार

कला के क्षेत्र में उन के अद्भुत योगदान को इसी बात से समझा जा सकता है कि उन्हें कुल 18 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले. इस के अलावा श्याम को 1976 में पद्मश्री और 1991 में पद्मभूषण सम्मान से नवाजा गया. 2007 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से भी नवाजा गया.
श्याम बेनेगल की फिल्मों को 7 बार बेस्ट हिंदी फीचर फिल्म के लिए नैशनल अवार्ड मिला है, जिन में ‘अंकुर’ (1974), ‘निशांत’ (1975), ‘मंथन’ (1976), ‘भूमिका’ (1977), ‘मम्मो’ (1994), ‘सरदारी बेगम’ (1996), ‘जुबैदा’ (2001) शामिल हैं.

पीएम को खुला पत्र लिख कर आए थे विवादों में

श्याम बेनेगल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए एक खुलेपत्र की वजह से विवादों में आ गए थे और उन के खिलाफ राजद्रोह की एफआईआर भी दर्ज की गई थी. उस वक्त बेनेगल ने यह कहा था कि यह खुलापत्र है, एक अपील है प्रधानमंत्री से न कि कोई धमकी. हम सिर्फ यह मांग कर रहे थे कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा रुके और जय श्रीराम नारे को भड़काऊ नारे में न बदलने दिया जाए.
श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्मों में समाज के कई अनुछुए मुद्दों व सचाई को उजागर किया था, समाज में व्याप्त जातिवाद, अंधविश्वास और स्त्रीपुरुष के संबंधों को उन्होंने बखूबी अपनी फिल्मों में दिखाया, जिन्हें दूसरे फिल्मकार उठाने से डरते हैं.

Emotional Story : मां की डायरी

Emotional Story : ‘‘अंकल, मम्मी की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई क्या?’’ मां के कमरे से डाक्टर को निकलते देख सुरभी ने पूछा.

‘‘पापा से जल्दी ही लौट आने को कहो. मालतीजी को इस समय तुम सभी का साथ चाहिए,’’ डा. आशुतोष ने सुरभी की बातों को अनसुना करते हुए कहा.

डा. आशुतोष के जाने के बाद सुरभी थकीहारी सी लौन में पड़ी कुरसी पर बैठ गई.

2 साल पहले ही पता चला था कि मां को कैंसर है. डाक्टर ने एक तरह से उन के जीने की अवधि तय कर दी थी. पापा ने भी उन की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. मां को ले कर 3-4 बार अमेरिका भी हो आए थे और अब वहीं के डाक्टर के निर्देशानुसार मुंबई के जानेमाने कैंसर विशेषज्ञ डा. आशुतोष की देखरेख में उन का इलाज चल रहा था. अब तो मां ने कालेज जाना भी बंद कर दिया था.

‘‘दीदी, चाय,’’ कम्मो की आवाज से सुरभी अपने खयालों से वापस लौटी.

‘‘मम्मी के कमरे में चाय ले चलो. मैं वहीं आ रही हूं,’’ उस ने जवाब दिया और फिर आंखें मूंद लीं.

सुरभी इस समय एक अजीब सी परेशानी में फंस कर गहरे दुख में घिरी हुई थी. वह अपने पति शिवम को जरमनी के लिए विदा कर अपने सासससुर की आज्ञा ले कर मां के पास कुछ दिनों के लिए रहने आई थी.

2 दिन पहले स्टोर रूम की सफाई करवाते समय मां की एक पुरानी डायरी सुरभी के हाथ लगी थी, जिस के पन्नों ने उसे मां के दर्द से परिचित कराया.

‘‘ऊपर आ जाओ, दीदी,’’ कम्मो की आवाज ने उसे ज्यादा सोचने का मौका नहीं दिया.

सुरभी ने मां के साथ चाय पी और हर बार की तरह उन के साथ ढेरों बातें कीं. इस बार सुरभी के अंदर की उथलपुथल को मालती नहीं जान पाई थीं.

सुरभी चाय पीतेपीते मां के चेहरे को ध्यान से देख रही थी. उस निश्छल हंसी के पीछे वह दुख, जिसे सुरभी ने हमेशा ही मां की बीमारी का हिस्सा समझा था, उस का राज तो उसे 2 दिन पहले ही पता चला था.

थोड़ी देर बाद नर्स ने आ कर मां को इंजेक्शन लगाया और आराम करने को कहा तो सुरभी भी नीचे अपने कमरे में आ गई.

रहरह कर सुरभी का मन उसे कोस रहा था. कितना गर्व था उसे अपने व मातापिता के रिश्तों पर, जहां कुछ भी गोपनीय न था. सुरभी के बचपन से ले कर आज तक उस की सभी परेशानियों का हल उस की मां ने ही किया था. चाहे वह परीक्षाओं में पेपर की तैयारी करने की हो या किसी लड़के की दोस्ती की, सभी विषयों पर मालती ने एक अच्छे मित्र की तरह उस का मार्गदर्शन किया और जीवन को अपनी तरह से जीने की पूरी आजादी दी. उस की मित्रमंडली को उन मांबेटी के इस मैत्रिक रिश्ते से ईर्ष्या होती थी.

अपनी बीमारी का पता चलते ही मालती को सुरभी की शादी की जल्दी पड़ गई. परंतु उन्हें इस बात के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. परेश के व्यापारिक मित्र व जानेमाने उद्योगपति ईश्वरनाथ के बेटे शिवम का रिश्ता जब सुरभी के लिए आया तो मालती ने चट मंगनी पट ब्याह कर दिया. सुरभी ने शादी के बाद अपना जर्नलिज्म का कोर्स पूरा किया.

‘‘दीदी, मांजी खाने पर आप का इंतजार कर रही हैं,’’ कम्मो ने कमरे के अंदर झांकते हुए कहा.

खाना खाते समय भी सुरभी का मन मां से बारबार खुल कर बातें करने को कर रहा था, मगर वह चुप ही रही. मां को दवा दे कर सुरभी अपने कमरे में चली आई.

‘कितनी गलत थी मैं. कितना नाज था मुझे अपनी और मां की दोस्ती पर मगर दोस्ती तो हमेशा मां ने ही निभाई, मैं ने आज तक उन के लिए क्या किया? लेकिन इस में शायद थोड़ाबहुत कुसूर हमारी संस्कृति का भी है, जिस ने नवीनता की चादर ओढ़ते हुए समाज को इतनी आजादी तो दे दी थी कि मां चाहे तो अपने बच्चों की राजदार बन सकती है. मगर संतान हमेशा संतान ही रहेगी. उन्हें मातापिता के अतीत में झांकने का कोई हक नहीं है,’ आज सुरभी अपनेआप से ही सबकुछ कहसुन रही थी.

हमारी संस्कृति क्या किसी विवाहिता को यह इजाजत देती है कि वह अपनी पुरानी गोपनीय बातें या प्रेमप्रसंग की चर्चा अपने पति या बच्चों से करे. यदि ऐसा हुआ तो तुरंत ही उसे चरित्रहीन करार दे दिया जाएगा. हां, यह बात अलग है कि वह अपने पति के अतीत को जान कर भी चुप रह सकती है और बच्चों के बिगड़ते चालचलन को भी सब से छिपा कर रख सकती है. सुरभी का हृदय आज तर्क पर तर्क दे रहा था और उस का दिमाग खामोशी से सुन रहा था.

सुरभी सोचसोच कर जब बहुत परेशान हो गई तो उस ने कमरे की लाइट बंद कर दी.

मां की वह डायरी पढ़ कर सुरभी तड़प कर रह गई थी. यह सोच कर कि जिन्होंने अपनी सारी उम्र इस घर को, उस के जीवन को सजानेसंवारने में लगा दी, जो हमेशा एक अच्छी पत्नी, मां और उस से भी ऊपर एक मित्र बन कर उस के साथ रहीं, उस स्त्री के मन का एक कोना आज भी गहरे दुख और अपमान की आग में झुलस रहा था.

उस डायरी से ही सुरभी को पता चला कि उस की मां यानी मालती की एम.एससी. करते ही सगाई हो गई थी. मालती के पिता ने एक उद्योगपति घराने में बेटी का रिश्ता पक्का किया था. लड़के का नाम अमित साहनी था. ऊंची कद- काठी, गोरा रंग, रोबदार व्यक्तित्व का मालिक था अमित. मालती पहली ही नजर में अमित को दिल दे बैठी थीं. शादी अगले साल होनी थी. इसलिए मालती ने पीएच.डी. करने की सोची तो अमित ने भी हामी भर दी.

अमित का परिवार दिल्ली में था. फिर भी वह हर सप्ताह मालती से मिलने आगरा चला आता. मगर ठहरता गेस्ट हाउस में ही था. उन की इन मुलाकातों में परिवार की रजामंदी भी शामिल थी, इसलिए उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. पर मालती ने इस प्यार को एक सीमा रेखा में बांधे रखा, जिसे अमित ने भी कभी तोड़ने की कोशिश नहीं की.

मालती की परवरिश उन के पिता, बूआ व दादाजी ने की थी. उन की मां तो 2 साल की उम्र में ही उन्हें छोड़ कर मुंबई चली गई थीं. उस के बाद किसी ने मां की खोजखबर नहीं ली. मालती को भी मां के बारे में कुछ भी पूछने की इजाजत नहीं थी. बूआजी के प्यार ने उन्हें कभी मां की याद नहीं आने दी.

बड़ी होने पर मालती ने स्वयं से जीवनभर एक अच्छी और आदर्श पत्नी व मां बन कर रहने का वादा किया था, जिसे उन्होंने बखूबी पूरा किया था.

उन की शादी से पहले की दीवाली आई. मालती के ससुराल वालों की ओर से ढेरों उपहार खुद अमित ले कर आया था. अमित ने अपनी तरफ से मालती को रत्नजडि़त सोने की अंगूठी दी थी. कितना इतरा रही थीं मालती अपनेआप पर. बदले में पिताजी ने भी अमित को अपने स्नेह और शगुन से सिर से पांव तक तौल दिया.

दोपहर के खाने के बाद बूआजी के साथ घर के सामने वाले बगीचे में अमित और मालती बैठे गपशप कर रहे थे. इतने में उन के चौकीदार ने एक बड़ा सा पैकेट और रसीद ला कर बूआजी को थमा दी.

रसीद पर नजर पड़ते ही बूआ खीजती हुई बोलीं, ‘2 महीने पहले कुछ पुराने अलबम दिए थे, अब जा कर स्टूडियो वालों को इन्हें चमका कर भेजने की याद आई है,’ और पैसे लेने वे घर के अंदर चली गईं.

‘लो अमित, तब तक हमारे घर की कुछ पुरानी यादों में तुम भी शामिल हो जाओ,’ कह कर मालती ने एक अलबम अमित की ओर बढ़ा दिया और एक खुद देखने लगीं.

संयोग से मालती के बचपन की फोटो वाला अलबम अमित के हाथ लगा था, जिस में हर एक तसवीर को देख कर वह मालती को चिढ़ाचिढ़ा कर मजे ले रहा था. अचानक एक तसवीर पर जा कर उस की नजर ठहर गई.

‘यह कौन है, मालती, जिस की गोद में तुम बैठी हो?’ अमित जैसे कुछ याद करने की कोशिश कर रहा था.

‘यह मेरी मां हैं. तुम्हें तो पता ही है कि ये हमारे साथ नहीं रहतीं. पर तुम ऐसे क्यों पूछ रहे हो? क्या तुम इन्हें जानते हो?’ मालती ने उत्सुकता से पूछा.

‘नहीं, बस ऐसे ही पूछ लिया,’ अमित ने कहा.

‘ये हम सब को छोड़ कर वर्षों पहले ही मुंबई चली गई थीं,’ यह स्वर बूआजी का था.

बात वहीं खत्म हो गई थी. शाम को अमित सब से विदा ले कर दिल्ली चला गया.

इतना पढ़ने के बाद सुरभी ने देखा कि डायरी के कई पन्ने खाली थे. जैसे उदास हों.

फिर अचानक एक दिन अमित साहनी के पिता का माफी भरा फोन आया कि यह शादी नहीं हो सकती. सभी को जैसे सांप सूंघ गया. किसी की समझ में कुछ नहीं आया. अमित 2 सप्ताह के लिए बिजनेस का बहाना कर जापान चला गया. इधरउधर की खूब बातें हुईं पर बात वहीं की वहीं रही. एक तरफ अमित के घर वाले जहां शर्मिंदा थे वहीं दूसरी तरफ मालती के घर वाले क्रोधित व अपमानित. लाख चाह कर भी मालती अमित से संपर्क न बना पाईं और न ही इस धोखे का कारण जान पाईं.

जगहंसाई ने पिता को तोड़ डाला. 5 महीने तक बिस्तर पर पड़े रहे, फिर चल बसे. मालती के लिए यह दूसरा बड़ा आघात था. उन की पढ़ाई बीच में छूट गई.

बूआजी ने फिर से मालती को अपने आंचल में समेट लिया. समय बीतता रहा. इस सदमे से उबरने में उसे 2 साल लग गए तो उन्होंने अपनी पीएच.डी. पूरी की. बूआजी ने उन्हें अपना वास्ता दे कर अमित साहनी जैसे ही मुंबई के जानेमाने उद्योगपति के बेटे परेश से उस का विवाह कर दिया.

अब मालती अपना अतीत अपने दिल के एक कोने में दबा कर वर्तमान में जीने लगीं. उन्होंने कालेज में पढ़ाना भी शुरू कर दिया. परेश ने उन्हें सबकुछ दिया. प्यार, सम्मान, धन और सुरभी.

सभी सुखों के साथ जीते हुए भी जबतब मालती अपनी उस पुरानी टीस को बूंदबूंद कर डायरी के पन्नों पर लिखती थीं. उन पन्नों में जहां अमित के लिए उस की नफरत साफ झलकती थी, वहीं परेश के लिए अपार स्नेह भी दिखता था. उन्हीं पन्नों में सुरभी ने अपना बचपन पढ़ा.

रात के 3 बजे अचानक सुरभी की आंखें खुल गईं. लेटेलेटे वे मां के बारे में सोच रही थीं. वे उन के उस दुख को बांटना चाहती थीं, पर हिचक रही थीं.

अचानक उस की नजर उस बड़ी सी पोस्टरनुमा तसवीर पर पड़ी जिस में वह अपने मम्मीपापा के साथ खड़ी थी. वह पलंग से उठ कर तसवीर के करीब आ गई. काफी देर तक मां का चेहरा यों ही निहारती रही. फिर थोड़ी देर बाद इत्मीनान से वह पलंग पर आ बैठी. उस ने एक फैसला कर लिया था.

सुबह 6 बजे ही उस ने पापा को फोन लगाया. सुन कर सुरभी आश्वस्त हो गई कि पापा के लौटने में सप्ताह भर बाकी है. वह पापा की गैरमौजूदगी में ही अपनी योजना को अंजाम देना चाहती थी.

उस दिन वह दिल्ली में रह रहे दूसरे पत्रकार मित्रों से फोन पर बातें करती रही. दोपहर तक उसे यह सूचना मिल गई कि अमित साहनी इस समय दिल्ली में अपने पुश्तैनी मकान में हैं.

शाम को मां को बताया कि दिल्ली में उस की एक पुरानी सहेली एक डाक्युमेंटरी फिल्म तैयार कर रही है और इस फिल्म निर्माण का अनुभव वह भी लेना चाहती है. मां ने हमेशा की तरह हामी भर दी. सुरभी नर्स और कम्मो को कुछ हिदायतें दे कर दिल्ली चली गई.

अब समस्या थी अमित साहनी जैसी बड़ी हस्ती से मुलाकात की. दोस्तों की मदद से उन तक पहुचंने का समय उस के पास नहीं था, इसलिए उस ने योजना के अनुसार अपने ससुर ईश्वरनाथ से अपनी ही एक दोस्त का नाम ले कर अमित साहनी से मुलाकात का समय फिक्स कराया. ईश्वरनाथ के लिए यह कोई बड़ी बात न थी.

अगले दिन सुबह 10 बजे का वक्त सुरभी को दिया गया. आज ऐसे वक्त में पत्रकारिता का कोर्स उस के काम आ रहा था.

खैर, मां की नफरत से मिलने के लिए उस ने खुद को पूरी तरह से तैयार कर लिया.

अगले दिन पूरी जांचपड़ताल के बाद सुरभी ठीक 10 बजे अमित साहनी के सामने थी. वे इस उम्र में भी बहुत तंदुरुस्त और आकर्षक थे. पोतापोती व पत्नी भी उन के साथ थे.

परिवार सहित उन की कुछ तसवीरें लेने के बाद सुरभी ने उन से कुछ औपचारिक प्रश्न पूछे पर असल मुद्दे पर न आ सकी, क्योंकि उन की पत्नी भी कुछ दूरी पर बैठी थीं. सुरभी इस के लिए भी तैयार हो कर आई थी. उस ने अपनी आटोग्राफ बुक अमित साहनी की ओर बढ़ा दी.

अमित साहनी ने जैसे ही चश्मा लगा कर पेन पकड़ा, उन की नजर मालती की पुरानी तसवीर पर पड़ी. उस के नीचे लिखा था, ‘‘मैं मालतीजी की बेटी हूं और मेरा आप से मिलना बहुत जरूरी है.’’

पढ़ते ही अमित का हाथ रुक गया. उन्होंने प्यार भरी एक भरपूर नजर सुरभी पर डाली और बुक में कुछ लिख कर बुक सुरभी की ओर बढ़ा दी. फिर चश्मा उतार कर पत्नी से आंख बचा कर अपनी नम आंखों को पोंछा.

सुरभी ने पढ़ा, लिखा था : ‘जीती रहो, अपना नंबर दे जाओ.’

पढ़ते ही सुरभी ने पर्स में से अपना कार्ड उन्हें थमा दिया और चली गई.

फोन से उस का पता मालूम कर तड़के साढ़े 5 बजे ही अमित साहनी सिर पर मफलर डाले सुरभी के सामने थे.

‘‘सुबह की सैर का यही 1 घंटा है जब मैं नितांत अकेला रहता हूं,’’ उन्होंने अंदर आते हुए कहा.

सुरभी उन्हें इस तरह देख आश्चर्य में तो जरूर थी, पर जल्दी ही खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘सर, समय बहुत कम है. इसलिए सीधी बात करना चाहती हूं.’’

‘‘मुझे भी तुम से यही कहना है,’’ अमित भी उसी लहजे में बोले.

तब तक वेटर चाय रख गया.

‘‘मेरी मम्मी आप की ही जबान से कुछ जानना चाहती हैं,’’ गंभीरता से सुरभी ने कहा.

सुन कर अमित साहनी की नजरें झुक गईं.

‘‘आप मेरे साथ कब चल रहे हैं मां से मिलने?’’ बिना कुछ सोचे सुरभी ने अगला प्रश्न किया.

‘‘अगर मैं तुम्हारे साथ चलने से मना कर दूं तो?’’ अमित साहनी ने सख्ती से पूछा.

‘‘मैं इस से ज्यादा आप से उम्मीद भी नहीं करती, मगर इनसानियत के नाते ही सही, अगर आप उन का जरा सा भी सम्मान करते हैं तो उन से जरूर मिलिएगा. वे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं,’’ कहतेकहते नफरत और दुख से सुरभी की आंखें भर आईं.

‘‘क्या हुआ मालती को?’’ चाय का कप मेज पर रख कर चौंकते हुए अमित ने पूछा.

‘‘उन्हें कैंसर है और पता नहीं अब कितने दिन की हैं…’’ सुरभी भरे गले से बोल गई.

‘‘ओह, सौरी बेटा, तुम जाओ, मैं जल्दी ही मुंबई आऊंगा,’’ अमित साहनी धीरे से बोले और सुरभी से उस के घर का पता ले कर चले गए.

दोपहर को सुरभी मां के पास पहुंच गई.

‘‘कैसी रही तेरी फिल्म?’’ मां ने पूछा.

‘‘अभी पूरी नहीं हुई मम्मी, पर वहां अच्छा लगा,’’ कह कर सुरभी मां के गले लग गई.

‘‘दीदी, कल रात मांजी खुद उठ कर अपने स्टोर रूम में गई थीं. लग रहा था जैसे कुछ ढूंढ़ रही हों. काफी परेशान लग रही थीं,’’ कम्मो ने सीढि़यां उतरते हुए कहा.

थोड़ी देर बाद मां से आंख बचा कर उस ने उन की डायरी स्टोर रूम में ही रख दी.

उसी रात सुरभी को अमित साहनी का फोन आया कि वह कल साढ़े 11 बजे की फ्लाइट से मुंबई आ रहे हैं. सुरभी को मां की डायरी का हर वह पन्ना याद आ रहा था जिस में लिखा था कि काश, मृत्यु से पहले एक बार अमित उस के सवालों के जवाब दे जाता. कल का दिन मां की जिंदगी का अहम दिन बनने जा रहा था. यही सोचते हुए सुरभी की आंख लग गई.

अगले दिन उस ने नर्स से दवा आदि के बारे में समझ कर उसे भी रात को आने को बोल दिया.

करीब 1 बजे अमित साहनी उन के घर पहुंचे. सुरभी ने हाथ जोड़ कर उन का अभिवादन किया तो उन्होंने ढेरोें आशीर्वाद दे डाले.

‘‘आप यहीं बैठिए, मैं मां को बता कर आती हूं. एक विनती है, हमारी मुलाकात का मां को पता न चले. शायद बेटी के आगे वे कमजोर पड़ जाएं,’’ सुरभी ने कहा और ऊपर चली गई.

‘‘मम्मी, आप से कोई मिलने आया है,’’ उस ने अनजान बनते हुए कहा.

‘‘कौन है?’’ मां ने सूप का बाउल कम्मो को पकड़ाते हुए पूछा.

‘‘कोई मिस्टर अमित साहनी नाम के सज्जन हैं. कह रहे हैं, दिल्ली से आए हैं,’’ सुरभी वैसे ही अनजान बनी रही.

‘‘क…क…कौन आया है?’’ मां के शब्दों में एक शक्ति सी आ गई थी.

‘‘ऐसा करती हूं आप यहीं रहिए. उन्हें ही ऊपर बुला लेते हैं,’’ मां के चेहरे पर आए भाव सुरभी से देखे नहीं जा रहे थे. वह जल्दी से कह कर बाहर आ गई.

मालती कुछ भी सोचने की हालत में नहीं थीं. यह वह मुलाकात थी जिस के बारे में उन्होंने हर दिन सोचा था.

थोड़ी देर में सुरभी के पीछेपीछे अमित साहनी कमरे में दाखिल हुए, मालती के पसंदीदा पीले गुलाबों के बुके के साथ. मालती का पूरा अस्तित्व कांप रहा था. फिर भी उन्होंने अमित का अभिवादन किया.

सुरभी इस समय की मां की मानसिक अवस्था को अच्छी तरह समझ रही थी. वह आज मां को खुल कर बात करने का मौका देना चाहती थी, इसलिए डा. आशुतोष के पास उन की कुछ रिपोर्ट्स लेने के बहाने वह घर से बाहर चली गई.

‘‘कितने बेशर्म हो तुम जो इस तरह से मेरे सामने आ गए?’’ न चाहते हुए भी मालती क्रोध से चीख उठीं.

‘‘कैसी हो, मालती?’’ उस की बातों पर ध्यान न देते हुए अमित ने पूछा और पास के सोफे पर बैठ गए.

‘‘अभी तक जिंदा हूं,’’ मालती का क्रोध उफान पर था. उन का मन तो कर रहा था कि जा कर अमित का मुंह नोच लें.

इस के विपरीत अमित शांत बैठे थे. शायद वे भी चाहते थे कि मालती के अंदर का भरा क्रोध आज पूरी तरह से निकल जाए.

‘‘होटल ताज में ईश्वरनाथजी से मुलाकात हुई थी. उन्हीं से तुम्हारे बारे में पता चला. तभी से मन बारबार तुम से मिलने को कर रहा था,’’ अमित ने सुरभी के सिखाए शब्द दोहरा दिए. परंतु यह स्वयं उस के दिल की बात भी थी.

‘‘मेरे साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया, अमित?’’ अपलक अमित को देख रही मालती ने उन की बातों को अनसुना कर अपनी बात रखी.

इतने में कम्मो चाय और नाश्ता रख गई.

‘‘तुम्हें याद है वह दोपहरी जब मैं ने एक तसवीर के विषय में तुम से पूछा था और तुम ने उन्हें अपनी मां बताया था?’’ अमित ने मालती को पुरानी बातें याद दिलाईं.

मालती यों ही खामोश बैठी रहीं तो अमित ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘उस तसवीर को मैं तुम सब से छिपा कर एक शक दूर करने के लिए अपने साथ दिल्ली ले गया था. मेरा शक सही निकला था. यह वृंदा यानी तुम्हारी मां वही औरत थी जो दिल्ली में अपने पार्टनर के साथ एक मशहूर ब्यूटीपार्लर और मसाज सेंटर चलाती थी. इस से पहले वह यहीं मुंबई में मौडलिंग करती थी. उस का नया नाम वैंडी था.’’

इस के बाद अमित ने अपनी चाय बनाई और मालती की भी.

उस ने आगे बोलना शुरू किया, ‘‘उस मसाज सेंटर की आड़ में ड्रग्स की बिक्री, वेश्यावृत्ति जैसे धंधे होते थे और समाज के उच्च तबके के लोग वहां के ग्राहक थे.’’

‘‘ओह, तो यह बात थी. पर इस में मेरी क्या गलती थी?’’ रोते हुए मालती ने पूछा.

‘‘जब मैं ने एम.बी.ए. में नयानया दाखिला लिया था तब मेरे दोस्तों में से कुछ लड़के भी वहां के ग्राहक थे. एक बार हम दोस्तों ने दक्षिण भारत घूमने का 7 दिन का कार्यक्रम बनाया और हम सभी इस बात से बहुत रोमांचित थे कि उस मसाज सेंटर से हम लोगों ने जो 2 टौप की काल गर्ल्स बुक कराई थीं उन में से एक वैंडी भी थी जिसे हाई प्रोफाइल ग्राहकों के बीच ‘पुरानी शराब’ कह कर बुलाया जाता था. उस की उम्र उस के व्यापार के आड़े नहीं आई थी,’’ अमित ने अपनी बात जारी रखी. उसे अब मालती के सवाल भी सुनाई नहीं दे रहे थे.

चाय का कप मेज पर रखते हुए अमित ने फिर कहना शुरू किया, ‘‘मेरी परवरिश ने मेरे कदम जरूर बहका दिए थे मालती, पर मैं इतना भी नीचे नहीं गिरा था कि जिस स्त्री के साथ 7 दिन बिताए थे, उसी की मासूम और अनजान बेटी को पत्नी बना कर उस के साथ जिंदगी बिताता? मेरा विश्वास करो मालती, यह घटना तुम्हारे मिलने से पहले की है. मैं तुम से बहुत प्यार करता था. मुझे अपने परिवार की बदनामी का भी डर था, इसलिए तुम से बिना कुछ कहेसुने दूर हो गया,’’ कह कर अमित ने अपना सिर सोफे पर टिका दिया.

आज बरसों का बोझ उन के मन से हट गया था. मालती भी अब लेट गई थीं. वे अभी भी खामोश थीं.

थोड़ी देर बाद अमित चले गए. उन के जाने के बाद मालती बहुत देर तक रोती रहीं.

रात के खाने पर जब सुरभी ने अमित के बारे में पूछा तो उन्होंने उसे पुराना पारिवारिक मित्र बताया. लगभग 3 महीने बाद मालती चल बसीं. परंतु इतने समय उन के अंदर की खुशी को सभी ने महसूस किया था. उन के मृत चेहरे पर भी सुरभी ने गहरी संतुष्टि भरी मुसकान देखी थी.

मां की तेरहवीं वाले दिन अचानक सुरभी को उस डायरी की याद आई. उस में लिखा था : मुझे क्षमा कर देना अमित, तुम ने अपने साथसाथ मेरे परिवार की इज्जत भी रख ली थी. मैं पूर्ण रूप से तृप्त हूं. मेरी सारी प्यास बुझ गई.

पढ़ते ही सुरभी ने डायरी सीने से लगा ली. उस में उसे मां की गरमाहट महसूस हुई थी. आज उसे स्वयं पर गर्व था क्योंकि उस ने सही माने में मां के प्रति अपनी दोस्ती का फर्ज जो अदा किया था.

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