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बाबाओं का महाजाल

पिताजी को महंत श्रवणदास के कमरे में छोड़ कर रक्षित बाहर आया और बड़े बेमन से हौल में लगा टीवी देखने लगा. अचानक टीवी पर आ रहे समाचार ने उसे चौंकाया-

‘हाथरस में भोलेबाबा के प्रवचन के दौरान हुई भगदड़, 121 लोगों की मौत. भगदड़ में दबे अधिकांश लोग भयंकर गरमी और उमस में सांस न ले पाने व दबने से मर गए.’

ओह, ये बाबा लोग और न जाने कितने परिवारों को तोड़ेंगे और न जाने कितने लोगों की जान लेंगे. जाते ही क्यों हैं लोग इन के प्रवचन सुनने, आखिर हमारे जैसा ही कोई इंसान कैसे भगवान का दूत हो सकता है? अब वह दूसरों की क्या कहे, उस के अपने पिता ने ही मंदिर और भगवान को ले कर तूफान मचा रखा है. आखिर हार कर उसे पिताजी को उन के कहे अनुसार महंत के पास लाना ही पड़ा है.

वह बहुत अच्छी तरह जानता है कि ये सब ढोंगी हैं पर खुद को बताते ऐसे हैं जैसे मानो ये भगवान से साक्षात्कार कर के आए हों. पर आज सबकुछ जानते हुए भी वह अपने पिता के आगे मजबूर है और अपने ही पिता को अपने साथ अहमदाबाद में रहने के लिए राजी करने के लिए उसे मंदिर के महंत के आगे नतमस्तक ही होना पड़ रहा है. इन ढोंगियों के आगे झुकते हुए वह बेबस है, हताश है पर करे तो करे क्या. अपने पिता को यों मंदिर में इन के भरोसे भी तो नहीं छोड़ सकता.

“अरे, तुम यहां बैठे हो, पिताजी कहां हैं,” बड़ीबहन रितिका की आवाज सुन कर वह चौंक गया.

“बड़ी देर हो गई तुझे आने में. तुम तो सुबह ही पहुंचने वाली थीं यहां,” रक्षित ने कुछ उदास स्वर में कहा.

“दिल्ली से तो सही समय पर चली थी ट्रेन पर आगरा पहुंचतेपहुंचते लेट हो गई. हां, तो फिर क्या हुआ, कुछ निराकरण निकला कि नहीं,’’ रितिका ने रक्षित के पास बैठते हुए कहा.

“क्या निकलेगा, वे बस मंदिर में रहना चाहते हैं और कहीं नहीं, न तेरे पास, न मेरे पास. मंदिर के बड़े महंत जी से कहा है उन्हें समझाने के लिए, देखो क्या होता है,” रक्षित ने उदास स्वर में कहा.

“ओह, पूरी जिंदगी तो निकल गई हमारी यह सब देखतेदेखते, अब और कितना देखना पड़ेगा. सच, मैं आज 55 वर्ष की होने को आई लेकिन बचपन से यही सब देखती आई हूं अपने घर में,” कहते हुए रितिका मानो अपने बचपन में पहुंच गई.

उस समय वह 10 साल की थी जब प्रोफैसर पिता हर दिन एक बाबा के आश्रम में जाया करते थे. हमेशा कालेज के बाद पिता को लेट आते देख एक दिन मां झगड़ पड़ीं, ‘आजकल कहां चले जाते हो, रोज ही लेट आते हो और आते ही, बस, खाना खा कर सो जाते हो? न बच्चों की चिंता होती है तुम्हें और न घर की. पूरे दिन खटतेखटते मैं थक जाती हूं, तुम्हें समझ क्यों नहीं आता?’

‘अरेअरे भागवान, इतना गुस्सा क्यों कर रही हो, तुम्हें पता है, आज मैं बाबा रामेश्वर जी का प्रवचन सुनने गया था. बहुत पहुंचे हुए संत हैं. तुम भी चलना मेरे साथ, बहुत अच्छा लगेगा. बहुत अच्छा प्रवचन देते हैं. सच पूछो तो जिंदगी जीना सिखा रहे हैं वे लोगों को. इतने सारे लोग आए थे कि जगह कम पड़ गई.’

‘मुझे नहीं जाना ऐसे किसी भी बाबा के पास. मेरा तो घर ही मेरा मंदिर है और तुम्हें भी यही सलाह दूंगी कि तुम भी अपना ध्यान बीवीबच्चों में लगाओ, इन बाबा के पास नहीं.’ मां ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा.

‘तुम अपना उपदेश अपने पास रखो. मैं तो जाऊंगा. कब से तलाश थी मुझे एक गुरु की. अब लगता है मेरी वह खोज पूरी हो गई है. तुम्हें पता नहीं है कि हर इंसान का एक गुरु होना जरूरी है ताकि जीवन के किसी भी मोड़ पर आई समस्याओं के समाधान के लिए गुरु जी की शरण में जाया जा सके, और गुरु ही वह सीढ़ी होता है जो इंसान को इस संसार में जीवन जीने का तरीका व मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग बताता है,’ पापा ने उत्सुकतापूर्वक और अपने गुरुजी पर भरोसा जताते हुए कहा था.

“पापा हर दिन अपने कालेज के बाद न केवल बाबा के आश्रम में जाते थे बल्कि खासा पैसा भी देते थे. जिस पर घर में हमेशा झगड़े होते रहते थे. इसी सब के बीच एक दिन अचानक पापा का तथाकथित गुरु वह बाबा अपने सारे भक्तों का पैसा ले उड़ा. भक्त हैरत से रोते कल्पते रहे. आम भक्तों की ही तरह पापा काफी दिनों तक उदास रहे और फिर धीरेधीरे ठीक हो गए.

“और फिर उस के बाद अपने घर में आगमन हुआ बाबा बाल ब्रह्मचारी का जिन के बारे में उन के चेलेचपाटों ने प्रचारित किया कि वे बाल्यावस्था में हैं और बाल्यावस्था वह अवस्था होती है जब पूर्ण जीवन जी चुकने के बाद इंसान मोक्ष और जीवन के अंत की ओर प्रस्थान करने लगता है तो उस की बुद्धि और विवेक बिलकुल बच्चे जैसा हो जाता है और ये ब्रह्मचारी बाबा अपनी उसी अवस्था में हैं.

“बाबा हर दिन नईनई चीजों की मांग करते थे, बिलकुल बच्चों की तरह जिद किया करते थे. कभी बच्चों की तरह रोना शुरू कर देते तो कभी जोरजोर से हंसना, रक्षित ने अपनी याददाश्त पर जोर डालते हुए कहा.

“तुझे याद है, पापा ने खुद कभी मोंटी कार्लो का स्वेटर नहीं पहना था और बाबा जी के लिए मोंटी कार्लो का स्वेटर ले कर आए थे और बाबा जी ने बच्चों की तरह खुश होते हुए खुद वह ब्रैंडेड स्वेटर पहन कर पापा को अपना फटा व मैलाकुचेला स्वेटर दे दिया था जिसे पहन कर पापा जी खुद को देवदूत समझते थे और नहाधो कर उस फटे स्वेटर को पहन कर बाहर वाक किया करते थे,” रितिका ने उदास स्वर में कहा.

“वह दिन याद है जब चाचाचाची आए हुए थे और पापा अपने उन बालब्रह्मचारी गुरुजी को घर ले कर आ गए थे. वह ढोंगी बाबा अकसर पानी के गिलास को उठा कर फेंक देता था. सामान इधर उधर छुपा देता था और फिर पापा कहते थे कि वो अभी बालबुद्धि में होने के कारण इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं,” रक्षित ने कहा.

“अरे तुम्हें याद है कि अकसर इस बात के पीछे मम्मीपापा में जम कर लड़ाई हुआ करती थी. वे कहती थीं कि यदि बाबा बच्चा हैं तो कभी जमीन पर क्यों नहीं बैठते, क्यों अपने हाथ में पहना सोने का कड़ा किसी को नहीं देते,” रितिका बोली थी.

“सच में उस दिन तो अति ही हो गई थी जब पापा एक दिन के लिए घर आए चाचाचाची को घर छोड कर बाबा के पीछेपीछे चले गए थे और 2 दिनों बाद वापस लौटे थे और इस घटना के कुछ दिनों बाद ही वह बालब्रह्मचारी बाबा मंदिर के आश्रम के लिए इकट्ठा किया गया सारा चंदा ले कर रफूचक्कर हो गया था. बाद में पता चला कि वह ढोंगी बालब्रह्मचारी बाबा हरियाणा का रहने वाला 5 बच्चों का पिता था और उस के नाम अनेक एफ़आईआर दर्ज थीं और फिर जब हम ने पापा से कहा कि आप के गुरुजी नौदोग्यारह हो गए तो पापा के पास शब्द नहीं थे उस के बारे में बोलने को,” रक्षित ने व्यंग्यपूर्ण हंसते हुए कहा.

“भाई, मुझे समझ नहीं आता कि एक पढ़ालिखा इंसान, जो कालेज में बच्चों को इतिहास पढ़ाता है, दिमाग से कभी क्यों नहीं सोच पाया कि ये जितने भी बाबा होते हैं इन का सारा क्रियाकलाप उन की स्वार्थसिद्धि और आम जनता से पैसा वसूलने के लिए होता है. हां, वह बात दूसरी है कि ये सारे काम अप्रत्यक्ष रूप से होते हैं जो आम जनता को जरा भी दिखाई नहीं देते और जनता हमेशा यही गुणगान करती है कि, ‘फलां बाबा बहुत पहुंचा हुआ है. मेरी फलांनी समस्या को चुटकियों में हल कर दिया,’ रितिका ने गंभीरतापूर्वक कहा तो रक्षित फिर एक घटना को याद करते हुए बोला, “अरे रितू, तुम ने सही कहा. तुम्हें वह अपने पड़ोस में रहने वाली बिल्लो आंटी याद हैं जो बिलकुल सामान्य महिला थीं पर नवरात्र के दिनों में शाम होते ही चाची को शाम के 6 बजे से देवी आनी प्रारंभ हो जाती थी. दिन में साधारण सी साड़ी पहनने वाली आंटीजी शाम को सुर्ख लाल रंग की साड़ी पहन, खुले काले बालों को सामने अपने मुख पर फैला कर बारबार गरदन को आगेपीछे ठीक वैसे ही हिलाती थीं जैसे फिल्मों में देवी का रूप दिखाया जाता है. उन का एक बेरोजगार लड़का उन देवीरूपी आंटी जी का दूत बना रहता था जो देवी का असिस्टेंट बन कर आंटी के साइड में मोरपंखी का चंवर हिलाता रहता था.

“आंटी के वेदी पर बैठते ही कुछ ही देर में वहां कितने लोगों की भीड़ लग जाया करती थी जो अपनी जिंदगी की अनेक समस्याएं ले कर आते थे देवी जी से निराकरण करवाने. कोई अपने बीमार बेटे को लाता, कोई बेरोजगार अपनी नौकरी की तारीख़ पूछता तो कोई अपने विवाह की तारीख़. और वे तथाकथित देवी जी एक कटोरी में रखे ज्वार के कुछ दाने बेटे के हाथ में रख देती थी और बेटा फिर एक कलावा का धागा और कुछ हवन की भभूत समस्याग्रस्त भक्तों के हाथ में रख देता व समस्या के अनुसार समय बता कर कहता था, जब समस्या हल हो जाए तो देवीजी पर सामर्थ्यानुसार चढ़ावा चढ़ा देना.”

“पर रक्षित, बिल्लों आंटी ज्वार के दाने क्यों रखती थीं अपने बेटे के हाथ में?” रितिका ने कुछ उत्सुकता से पूछा.

“अरे, यह बिल्लो आंटी के पूरे परिवार का मिलाजुला प्रयास था. उन लोगों ने कोडवर्ड बना रखे थे जैसे बीमारी के लिए 2 दाने, नौकरी के लिए 4 और विवाह के लिए 5 दाने. बस, आंटी समस्या के अनुसार दाने अपने बेटे के हाथ पर रखती थीं और बेटा उस की व्याख्या करता था. आंटी का बेटा बीमारी वाले को 15 दिन, शादीविवाह वाले को 6 माह में समस्या हल हो जाने को कहता था क्योंकि आमतौर पर बीमारी 15 दिन में ठीक हो जाती है, शादीविवाह, नौकरी आदि के लिए चूंकि इंसान प्रयासरत रहता है तो 6 माह में सौल्व हो ही जाती है. तुम याद करो, वे अंकल कहते थे कि चार बेटों और एक बेटी यानी कुल 7 सदस्यीय परिवार के लिए साल के 2 नवरात्र बहुत बड़े सहारा होते हैं क्योंकि साल में 2 बार आने वाली इन 9 रात्रियों के दौरान उन के यहां नकद, कपड़े, फल और ढेरों मेवा चढ़ावे के रूप में इतने अधिक आ जाया करते थे कि सालभर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती थी.”

“मुझे तो कभी समझ ही नहीं आता कि हमारे जीवन की समस्यायों को कोई दूसरा कैसे सुलझा सकता है, किसी की बीमारी को डाक्टर ठीक करेगा या ये बाबा और देवियां. नौकरी तो इंसान की मेहनत से लगेगी या इन ढोंगियों के आशीर्वाद से. क्यों अपने ऊपर भरोसा न कर के लोग इन बाबाओं के चक्कर में पड़ते हैं और वे बाबा तो सम्रद्ध होते जाते हैं जबकि आम आदमी कंगाल हो जाता है,” रितिका ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा.

“क्या ये सब हमारे पापा के टाइम में ही होता था, दीदी? आज का यूथ इन सब से दूर है क्या?” रक्षित ने कुतूहल से कहा.

“अरे कहां का दूर है, आज का युवा तो और अधिक उलझा है. तुम खुद ही सोचो, अगर युवा दिमाग से काम लेता तो क्या यह हाथरस वाला हादसा होता, क्या हर दिन नए कथावाचक और धर्मगुरुओं का जन्म होता, सीहोर में पंडित प्रदीप मिश्रा की कथा में रुद्राक्ष वितरण के दौरान हुई भगदड़ और मारी गई जनता इस बात का प्रतीक है कि क्या युवा और क्या वृद्ध, सभी इन की गिरफ्त में हैं और ये लोग खुद ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं और जनता को मूर्ख बनाते हैं.

“आजकल अकसर मंदिरों और बाबाओं के प्रवचनों में इतनी अधिक भीड़ होती है कि पुलिस और प्रशासन की सारी तैयारियां धरी की धरी रह जाती हैं और हर दिन नएनए हादसे हो जाते हैं. तुम्हें क्या लगता है, यह केवल बड़ेबुजुर्गों की भीड़ होती है? बिलकुल नहीं. इन में युवा अधिक, बुजुर्ग कम होते हैं.

“अपनी इटावा वाली मौसी अपनी बेटी के मिर्गी के दौरों के इलाज के लिए एक बाबा के पास जाया करती थीं और वह बाबा मौसी को बाहर बिठा कर उन की बेटी के साथ संबंध बनाया करता था जो उन की बेटी ने खुद बाद में बताया. अब मिर्गी जैसी बीमारी का इलाज ये बाबा करेंगे या डाक्टर. पर बात यह है कि अभी तो हमारे पिताजी ने ही अपनी सारी तार्किक बुद्धि को एक डब्बे में बंद कर रखा है. कुछ समझ नहीं आता कि क्या करें?” रितिका ने उदास स्वर में कहा.

“अपने पिताजीमाताजी तो और भी महान हैं. इन लोगों ने तो सारी सीमाएं ही क्रौस कर दी हैं. हम दोनों की शादी के बाद रिटायमैंट का जितना भी पैसा मिला उस सब को तो इन्होंने मंदिर बनवाने में लगा दिया. मंदिर के पुजारी और महंत ने भी भांप लिया कि इन के पास पैंशन का अच्छाखासा पैसा है, मोटा आसामी है, सो न केवल पुजारी बल्कि पुजारी का पूरा परिवार इन दोनों की जम कर सेवा करता था और ये लोग जम कर उन के ऊपर खर्च करते थे.

“इन लोगों ने अपने प्रवचनों से उन का इतना अधिक ब्रेनवाश कर दिया कि हम दोनों में से किसी के भी पास रहना पसंद न कर के इन्होंने यहां मंदिर पर रहना पसंद किया. उन्हें हम दोनों से अधिक ये पुजारी और इन का परिवार अपना लगने लगा. अचानक एक दिन माताजी को अटैक आ गया, रह गए बेचारे पिताजी. जो जिंदगीभर मोक्ष और गुरु व ईश्वर की तलाश करते लेकिन हाथ आया पत्नी का वियोग और अब इन्हें मंदिर से बढ कर और कोई जगह अपने लिए उपयुक्त नहीं लगती. यानी, अब जितना भी पैसा बचा है उस पर भी नजर है इन सब की.”

“समस्या पिताजी की नहीं है, रक्षित, समस्या इन तथाकथित पंडे, पुजारी और बाबाओं ने उत्पन्न कर रखी हैं क्योंकि इन्होंने आम आदमी के दिमाग में अपने उलटेसीधे प्रवचनों से यह भर दिया है कि मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना है और इसी मोक्ष के चक्कर में पिताजी इन बाबाओं के चक्कर लगाते रहे और अब यहां मंदिर पर ही रहने की जिद लगा कर बैठ गए हैं. न चाहते हुए भी हमें इन बाबाओं की शरण में आना पड़ा है.”

रक्षित और रितिका को मंदिर के प्रांगण में बैठा देख कर मंदिर के पुजारी ने उन्हें बड़े महंतजी के कमरे में जा कर विश्राम करने के लिए कहा तो वे दोनों उस कमरे की तरफ चल दिए. एसी, डबल बेड, सोफे और महंगे कारपेट जैसी आधुनिक सुखसुविधाओं से संपन्न इस कमरे को देखते ही वे दोनों दंग रह गए. रितिका ने जैसे ही अपना सिर सोफे पर टिकाया, उसे वह दिन याद आ गया जब उस की बोर्ड की परीक्षाएं होने वाली थीं और मम्मीपापा पर आसाराम बापू के दीक्षा शिविर में जाने का भूत सवार था क्योंकि आसाराम बापू के भक्तों ने उस समय यह प्रचारित किया था कि इस समय दीक्षा लेने से बहुत बड़ा पुण्य प्राप्त होने वाला है और मोक्ष तो प्राप्त हो ही जाएगा. रिजर्वेशन न मिलने के बावजूद ये दोनों 2 ट्रेन बदल कर अहमदाबाद में दीक्षा लेने पहुंचे थे और फिर घर के मंदिर में आसाराम बापू की तसवीर लगा कर उसी की पूजा की जाती थी.

“दूसरों को मोक्षप्राप्ति का रास्ता बताने वाले वे आसाराम बापूजी आज जेल की हवा में मोक्ष प्राप्त कर रहे हैं,” व्यंग्यपूर्ण हंसी हंसते हुए रक्षित ने कहा.

“पर भैया, मुझे यह समझ नहीं आता कि बारबार धोखा खाने के बाद भी ये पापा जैसे लोग संभलते क्यों नहीं, क्यों इन के झांसे में आ जाते हैं?’’

“इस का कारण है न, दीदी, कि जब इंसान अपने जीवन की समस्याओं से परेशान हो जाता है तो उन का सामना करने की जगह इन बाबाओं के पास जाता है और ये बाबा, जो अपने को भगवान का दूत बताते हैं, इंसान को समस्यायों का सामना करना नहीं, उन से भागना सिखाते हैं ताकि समस्या बनी रही और भक्त इन के पास आता रहे और ये मालामाल होते रहें. पर सोचने की बात है जो इंसान अपने जीवन की समस्याओं न सुलझा पाने के कारण बाबा और पंडित बन जाता है वह हमारे जीवन की समस्याओं को क्या सुलझाएगा.

“तुम्हें याद होगा कि जब अपने पड़ोस में रहने वाली आंटी के पति लिवर की बीमारी के कारण अस्पताल में भरती थे तभी आंटी के गुरु ने उन्हें महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराने की सलाह देते हुए कहा था कि आप बस 21 हज़ार बार मंत्र का जाप करवा लो, गारंटी से अंकल ठीक हो कर घर आ जाएंगे. इस प्रति मंत्र के 100 रुपए के हिसाब से पंडितजी ने 21,000 हज़ार रुपए मंत्र के और 4,000 रुपए अन्य सामग्री के लिए हथियाए. उधर पंडितजी मंत्र का जाप करते रहे, इधर अंकलजी की मृत्यु हो गई.”

“सब अच्छी तरह याद है मुझे, कुछ भी नहीं भूला हूं. एक बात और याद आ रही है जब मम्मी लिवर सिरोसिस के कारण लंबे समय तक बीमार रही थीं और तब पापा के एक दोस्त अपने घर में एक बाबा को ले कर आए थे. बाबा क्या, 55 साल के अधेड़ थे वे. 15 वर्षों से फल और दूध का ही सेवन करने वाले वे बाबा अपने घर को देख कर पापा से बोले थे,

“शर्माजी, आप का घर बहुत बढ़िया है परंतु ड्राइंगरूम के कोने में एक बहुत ही खतरनाक आत्मा का वास है जिस ने मुझे आप के घर का अन्न-जल तक ग्रहण नहीं करने दिया है. यदि आप ने इस का इलाज नहीं करवाया तो अभी तो केवल पत्नी ही बीमार हुई है, आगे चल कर घर के मुखिया को भयंकर हानि भी हो सकती है. बस, इस के बाद उन बाबा जी अपने घर में 11 हज़ार रुपए ले कर पूजा की. मम्मी तो दवाई और डाक्टर से सही हुईं पर वह बाबा 11 हज़ार रुपए ले कर चला गया था. और तुम्हें पता है, वह यूपी के अयोध्या में रहने वाला एक बेरोजगार युवक था जिस की पत्नी बीमार रहती थी और 35 साल की अविवाहित बेटी घर में बैठी थी. अब सोचो, जो बाबा अपने ही घर का भला नहीं कर पा रहा, वह दूसरों का क्या भला करेगा.”

रक्षित और रितिका बातें कर ही रहे थे कि तभी मंदिर के पुजारी ने कमरे में आ कर कहा, “बड़े महंतजी आप को बुला रहे हैं.”

जैसे ही वे दोनों बड़े महंतजी के कमरे में पहुंचे, वे बोले, “शर्माजी अभी आप के साथ अहमदाबाद ही जाएंगे. हां, हर 2-3 माह में आप दोनों इन्हें यहां जरूर ले कर आएंगें, इस बात का वादा करिए आप लोग.”

“जीजी बिलकुल,” कहते हुए उन दोनों ने न चाहते हुए भी हाथ जोड़ दिए.

“अभी आप लोग आराम करें. शाम की आरती और भोजन ग्रहण कर के जाइएगा,” बड़े महंतजी ने अपनी मधुर वाणी से कहा.

बाहर आ कर रक्षित और रितिका दोनों ने लंबी सांस ली, चलो पापा ने अपनी जिद तो छोड़ दी.

“पर दीदी, इस सब से बचने का कोई उपाय है क्या. क्या लोग मेरी और तुम्हारी जैसी तार्किक सोच को अपना कर जीवन को सरल और सहज नहीं बना सकते?” रक्षित ने रितिका की तरफ़ मुखातिब होते हुए कहा.

“देखो रक्षित, जब तक इंसान ख़ुद के आत्मबल पर भरोसा न कर के इन बाबाओं, पंडितों के चक्कर में फंसता रहेगा तब तक जनता ख़ुद कंगाल और ये मालामाल होते रहेंगे. जिस दिन आम जनता इन के पास आना बंद कर देगी, इन का सारा धंधा चौपट हो जाएगा. एक और बात, जब तक हमारेतुम्हारे जैसे लोग तर्क से नहीं सोचेंगे तब तक इन के जाल में फंसते रहेंगे. और देश में हर दिन एक नए बाबा का जन्म होता रहेगा,” रितिका ने लंबी सांस भरते हुए कहा.

एक दुखद सूचना

देश के आम और खास को जो समोसों से प्यार करते हों या न, जो समोसे चटनी के साथ खाते हों या फिर बिन चटनी के, जो समोसे गरमागरम खाने के शौकीन हों या फिर जैसे मिल गए वैसे ही, जो समोसे चाय के साथ खाने के शौकीन हों या फिर चाय समोसे के साथ पीने के शौकीन हों, देश के वोटर हों या कि जिन के पास चारचार आधारकार्ड हों, वयस्क-अवयस्क जो भी हों, जो जरा सा भी देशभक्त हों, उन सब के लिए दुखद सूचना है कि जनता के आटे में से चुराए मंत्रीजी के समोसे गुम हो गए हैं. उन के समोसों को ढूंढने के लिए मौजिया विभाग आकाशपाताल एक किए हुए है. उस ने अपना खासों का दस्ता, जो चांद पर घूमने का इच्छुक था, अपने खोजी कुत्तों के साथ चांद पर भी भेज दिया है.

मौजिया विभाग सहित इलैक्ट्रौनिक मीडिया से ले कर प्रिंट मीडिया तक के सारे पत्रकार जनहित की खबरें छोड़ कर मंत्रीजी के समोसों की खोज में अपनेअपने स्तर लीडियाते जुटे हैं. पर एक समोसा हैं कि उन का अभी तक कुछ अतापता नहीं. मंत्रीजी के समोसों को पता नहीं कौन अजगर निगल गया? यह देश के लिए संकट की घड़ी है.

मंत्रीजी का कहना है कि उन्होंने इस बारे में अपने सीबीआई प्रमुख से व्यापक चर्चा की और उन्हें आदेश दिया कि वे दूसरी सारी खोजें बंद कर समोसों पर अपनी आंख केंद्रित करें. गए तो गए, पर आखिर उन के समोसे गए कहां? जनता का बजट जनता तक नहीं पहुंचा, पर वे चुप रहे.

जनता के रोजगार के अवसर जनता तक नहीं पहुंचे, वे चुप रहे. जनता का आटा जनता तक नहीं पहुंचा, वे चुप रहे. जनता के अधिकार जनता तक नहीं पहुंचे, वे चुप रहे. पर अब उन के समोसे भी उन तक नहीं पहुंचे? अब वे चुप रहने वाले नहीं. यदि उन के समोसों का पता नहीं चला तो उन सब को निलंबित किया जाए जिन्हें उन तक समोसे पहुंचाने का काम सौंपा गया था. अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे विभाग बंद करा देंगे. देश वैसे ही आर्थिक ‘खुशहाली’ से जूझ रहा है.

लानत है, हे उन के विभागों के मुस्तैद बड़ेबड़े पेटधारियो, क्या उन्होंने इसलिए तुम्हें बड़ेबड़े पदों पर योग्यों को छोड़ कर बैठाया है कि तुम उन के समोसों तक की रक्षा विपक्ष से न कर सको?

असल में हुआ यों कि मंत्रीजी को नवनिर्मित श्मशानघाट का लोकार्पण कर उसे जनता को समर्पित करना था. उन्होंने जनहित में मुसकराते हुए लोकार्पण किया भी. लोकार्पण के बाद श्मशान निर्माण विभाग द्वारा वहां पर चायसमोसों का कार्यक्रम रखा गया था. पर ऐन मौके पर मंत्रीजी को समोसे समर्पित होने से पहले ही गायब हो गए.

लोकार्पण की सफलता के लिए श्मशान निर्माण विभाग के हैड ने श्मशानघाट पर मंत्रीजी के शुभागमन पर श्मशान घाट का शुभारंभ करने की प्रसन्नता में पार्टी आयोजित करने के सिलसिले में अपने से निचले अधिकारी को उन के पेट के अनुरूप समोसे लाने का आदेश दिया. उन से निचले अधिकारी ने अपने बौस के आदेश की तामील करते हुए समोसे लाने के आदेश अपने से छोटे अधिकारी को सुपुर्द कर दिया. उन से छोटे अधिकारी ने समोसे लाने के आदेश अपने से निचले अधिकारी के गले में बांधा. जब सब से नीचे के अधिकारी को अपने नीचे कोई अधिकारी नहीं दिखा तो उसे बहुत गुस्सा आया. बहुत बदनसीब होता है वह अधिकारी जिस के नीचे कोई अधिकारी न हो. जब वही सब से नीचे का अधिकारी निकला तो मन को मारते हुए उस ने अपने से नीचे के कर्मचारी को समोसे लाने का आदेश दिया.

सब से नीचे का कर्मचारी उछलताउछलता समोसे लाने बाजार गया. वह नौकरी ही समोसों की करता है. उस ने मंत्रीजी के लिए उन की पंसद के समोसे लिए और उन में से 4 समोसे वहीं बैठ कर खा उन्हें भी बिल में लगवा दिया. वह समोसे लाया और औफिस में रख दिए. फिर समोसे कहां गए, किसी को कोई पता नहीं. श्मशानघाट का लोकार्पण करने के बाद ज्यों ही मंत्रीजी के समोसों की ढूंढ पड़ी तो समोसे गायब! मंत्रीजी को ज्यों ही अपने समोसों के गुम होने का पता चला, वे लालपीले हो गए.

उन्होंने तत्काल चहेते अफसरमंडल की आपात बैठक बुलाई. अफसरमंडल की बैठक में उन के चहेतों ने इस बात पर गुस्सा जाहिर किया कि लोकप्रिय मंत्रीजी के समोसे गुम हो जाना सच्ची ही गंभीर मुद्दा है. जिस देश में मंत्रीजी तक के समोसे गुम हो जाएं उस देश की कानून व्यवस्था पर उंगलियां नहीं, हाथ-लात उठने चाहिए.

अफसरमंडल ने तत्काल इसे देश की एक और दुखद घटना मानते हुए एक आवाज में कहा कि संबधित विभाग के हैड के खिलाफ कानूनी जांच की जाए. माना, मंत्रीजी समोसे बिन चटनी के ही खाते हैं, पर अब यह भी पता किया जाए कि समोसों के साथ वाली चटनी कहां है? कहीं उसे रिकौर्ड में लिए बिना चुपचाप चटोरे चाट तो नहीं गए? जब तक भोगप्रिय मंत्रीजी के समोसे नहीं मिल जाते तब तक संबंधित अधिकारी को निलंबित किया जाए ताकि जांच में आंच न आए और समोसों को समोसा किया जाए व चटनी को चटनी. जो चहेता अक्षम अधिकारी मंत्रीजी के समोसों की रक्षा नहीं कर सकता वह जनता के आटे की रक्षा क्या खाक करेगा? मंत्रीजी के समोसों की जांच सीबाआई, सीआईडी से न करवा कर रौ से करवाई जाए ताकि देश की जनता को लगे कि देश में कानून व्यवस्था अभी भी कायम है.

हर आम और खास को यह भी सूचित किया जाता है कि जो भी आम या खास मंत्रीजी के समोसे ढूंढ कर लाएगा या सरकार को यह सूचना देगा कि उन के समोसे किस के पेट में हैं उसे 26 जनवरी को डैमफूल पुरस्कार से दिल्ली में सम्मानित किया जाएगा.

मुझे अपनी पत्नी से जैलेसी होने लगी है. मुझे समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूं.

अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं बाराबंकी का रहने वाला हूं और हाल ही में मेरी शादी हुई है. मेरी पत्नी दिखने में बेहद सुंदर है और साथ ही काफी समझदार भी है. वे पढ़ी-लिखी होने के साथ साथ घर को भी अच्‍छी तरह संभालती है. मैं दिखने में ऐवरेज हूं और ज्यादा पढ़ा लिखा भी नहीं हूं. मेरा खुद का बिजनेस है और अपने इस काम से मैं इतना कमा लेता हूं कि अपने घर का खर्च आसानी से उठा लेता हूं. जब भी कोई रिश्तेदार या दोस्त घर आता है तो मुझे एक बात जरूर बोलता है कि मैं बहुत लकी हूं जो मुझे इतनी सुंदर पत्नी मिली है. वे सब मुझे ऐसे जताते हैं जैसे मैं तो कुछ हूं ही नहीं. मेरे मन में अपनी ही पत्नी को लेकर जलन पैदा होने लगी है लेकिन मैंने अपनी पत्नी को कभी मुझसे निराश नहीं देखा. वह मेरे साथ साथ मेरे पूरे परिवार का अच्छी तरह से खयाल रखती है. कई बार मुझे डर लगता है कि कहीं मेरी जैलेसी मेरे और मेरी पत्नी का रिलेशन खराब ना कर दे. मुझे क्या करना चाहिए ?

जवाब –

मैं आपकी फीलिंग्स अच्छी तरह से समझ सकता हूं लेकिन अपनी ही पत्नी के लिए अपने मन में इस तरह की जलन लाना बेहद गलत बात है. अगर वह आपसे ज्यादा सुंदर है और आपसे ज्यादा पढ़ी-लिखी है तो इसमें उसकी तो कोई गलती नहीं है. एसे में अपनी पत्नी से क्‍यों ईष्‍या कर रहे हैं. आपकी गलती यह है कि आप दूसरों की बातों में आकर अपने आप को नीचा देखने समझने लगे हैं. इसे इंफीरियरिटी कौम्‍पलेक्‍स कहते हैं. यह भाईबहनों या भाईभाई के बीच भी होता है. इस तरह की भावनाएं दोस्‍तों के बीच भी देखी जाती है लेकिन घर के रिश्‍ते में इस तरह के मनोभवों पर लगाम लगाना चाहिए. घर के अंदर ऐसी स्थिति किसी भी रिश्‍ते के भविष्‍य के लिए खतरनाक होता है. आज के समय में अपनों के साथ रिश्‍तों को संवारने पर जोर देना चाहिए न कि तोड़ने पर.

अगर कोई आपको बोलता है कि आपकी किस्मत अच्छी है कि आपको ऐसी पत्नी मिली है तो आपको ईष्‍या करने की बजाय खुश होना चाहिए. अपनी पत्नी की और भी ज्यादा तारीफ करनी चाहिए जिससे कि आपकी पत्नी भी आपसे खुश रहे. बाहर वाले चाहे लाख तारीफ करें लेकिन पति अगर के आगे वह सब फीके हैं.

जैसा कि आपने बताया कि आपकी पत्नी को आपसे कोई शिकायत नहीं है और वह आपके साथ साथ आपके परिवार का पूरा खयाल रखती है तो इस स्थिति में आपको भी पत्नी से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए. आपको खुश होना चाहिए कि आपको ऐसी पत्नी मिली है जो आपके ही नहीं आपके घर के हर सदस्‍यों की मदद के लिए तैयार रहती है. हर इंसान में एक अलग काबि‍लियत होती है. अपनी काबिलियत को नजरअंदाज नहीं करे. अपने मन में इस यकीन को पक्‍का करें कि आप भी पूरा दिन महनत करके अपने घर का खर्चा उठाते हैं. घर के सदस्‍यों की जरूरतों को पूरा करते हैं इसलिए बेहतर होगा यदि आप दूसरों की बातों में आकर अपना रिलेशन को खराब न करें और खुशी खुशी पत्नी के साथ अपना जीवन बिताएं.

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अगली बार कब: आखिर क्यों वह अपने पति और बच्चों से परेशान रहती थी?

उफ, कल फिर शनिवार है, तीनों घर पर होंगे. मेरे दोनों बच्चों सौरभ और सुरभि की भी छुट्टी रहेगी और अमित भी 2 दिन फ्री होते हैं. मैं तो गृहिणी हूं ही. अब 2 दिन बातबात पर चिकचिक होती रहेगी. कभी बच्चों का आपस में झगड़ा होगा, तो कभी अमित बच्चों को किसी न किसी बात पर टोकेंगे. आजकल मुझे हफ्ते के ये दिन सब से लंबे दिन लगने लगे हैं. पहले ऐसा नहीं था. मुझे सप्ताहांत का बेसब्री से इंतजार रहता था. हम चारों कभी कहीं घूमने जाते थे, तो कभी घर पर ही लूडो या और कोई खेल खेलते थे. मैं मन ही मन अपने परिवार को हंसतेखेलते देख कर फूली नहीं समाती थी.

धीरेधीरे बच्चे बड़े हो गए. अब सुरभि सी.ए. कर रही है, तो सौरभ 11वीं क्लास में है. अब साथ बैठ कर हंसनेखेलने के वे क्षण कहीं खो गए थे.

मैं ने फिर भी जबरदस्ती यह नियम बना दिया था कि सोने से पहले आधा घंटा हम चारों साथ जरूर बैठेंगे, चाहे कोई कितना भी थका हुआ क्यों न हो और यह नियम भी अच्छाखासा चल रहा था. मुझे इस आधे घंटे का बेसब्री से इंतजार रहता था. लेकिन अब इस आधे घंटे का जो अंत होता है, उसे देख कर तो लगता है कि यह नियम मुझे खुद ही तोड़ना पड़ेगा.

दरअसल, अब होता यह है कि हम चारों की बैठक खत्म होतेहोते किसी न किसी का, किसी न किसी बात पर झगड़ा हो जाता है. मैं कभी सौरभ को समझाती हूं, कभी सुरभि को, तो कभी अमित को.

सुरभि तो कई बार यह कह कर मुझे बहुत प्यार करती है कि मम्मी, आप ही हमारे घर की बाइंडिंग फोर्स हो. सुरभि और मैं अब मांबेटी कम, सहेलियां ज्यादा हैं.

जब सप्ताहांत आता है, तो अमित फ्री होते हैं. थोड़ी देर मेल चैक करते हैं, फिर कुछ देर टीवी देखते हैं और फिर कभी सौरभ तो कभी सुरभि को किसी न किसी बात पर टोकते रहते हैं. बच्चे भी अपना तर्क रखते हुए बराबर जवाब देने लगते हैं, जिस से झगड़ा बढ़ जाता और फिर अमित का पारा हाई होता चला जाता है.

मैं अब सब के बीच तालमेल बैठातेबैठाते थक जाती हूं. मैं बहुत कोशिश करती हूं कि छुट्टी के दिन शांति प्यार से बीतें, लेकिन ऐसा होता नहीं है. कोई न कोई बात हो ही जाती है. बच्चों को लगता है कि पापा उन की बात नहीं समझ रहे हैं और अमित को लगता है कि बच्चों को उन की बात चुपचाप सुन लेनी चाहिए. ऐसा नहीं है कि अमित बहुत रूखे, सख्त किस्म के इंसान हैं. वे बहुत शांत रहने और अपने परिवार को बहुत प्यार करने वाले इंसान हैं. लेकिन आजकल जब वे युवा बच्चों को किसी बात पर टोकते हैं, तो बच्चों के जवाब देने पर उन्हें गुस्सा आ जाता है. कभी बच्चे सही होते हैं, तो कभी अमित. जब मेरा मूड खराब होता है, तीनों एकदम सही हो जाते हैं.

वैसे मुझे जल्दी गुस्सा नहीं आता है, लेकिन जब आता है, तो मेरा अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रहता है. वैसे मेरा गुस्सा खत्म भी जल्दी हो जाता है. पहले मैं भी बच्चों पर चिल्लाने लगती थी, लेकिन अब बच्चे बड़े हो गए हैं, मुझे उन पर चिल्लाना अच्छा नहीं लगता.

अब मैं ने अपने गुस्से के पलों का यह हल निकाला है कि मैं घर से बाहर चली जाती हूं. घर से थोड़ी दूर स्थित पार्क में बैठ या टहल कर लौट आती हूं. इस से मेरे गुस्से में चिल्लाना, फिर सिरदर्द से परेशान रहना बंद हो गया है. लेकिन ये तीनों मेरे गुस्से में घर से निकलने के कारण घबरा जाते हैं और होता यह है कि इन तीनों में से कोई न कोई मेरे पीछे चलता रहता है और मुझे पीछे देखे बिना ही यह पता होता है कि इन तीनों में से एक मेरे पीछे ही है. जब मेरा गुस्सा ठंडा होने लगता है, मैं घर आने के लिए मुड़ जाती हूं और जो भी पीछे होता है, वह भी मेरे साथ घर लौट आता है.

एक संडे को छोटी सी बात पर अमित और बच्चों में बहस हो गई. मैं तीनों को शांत करने लगी, मगर मेरी किसी ने नहीं सुनी. मेरी तबीयत पहले ही खराब थी. सिर में बहुत दर्द हो रहा था. जून का महीना था, 2 बज रहे थे. मैं गुस्से में चप्पलें पहन कर बाहर निकल गई. चिलचिलाती गरमी थी. मैं पार्क की तरफ चलती गई. गरमी से तबीयत और ज्यादा खराब होती महसूस हुई. मेरी आंखों में आंसू आ गए. मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था कि इतनी बहस क्यों करते हैं ये लोग. मैं ने मुड़ कर देखा. सुरभि चुपचाप पसीना पोंछते मेरे पीछेपीछे आ रही थी. ऐसे समय में मुझे उस पर बहुत प्यार आता है, मैं उस के लिए रुक गई.

सुरभि ने मेरे पास पहुंच कर कहा, ‘‘आप की तबीयत ठीक नहीं है, मम्मी. क्यों आप अपनेआप को तकलीफ दे रही हैं?’’

मैं बस पार्क की तरफ चलती गई, वह भी मेरे साथसाथ चलने लगी. मैं पार्क में बेंच पर बैठ गई. मैं ने घड़ी पर नजर डाली. 4 बज रहे थे. बहुत गरमी थी.

सुरभि ने कहा, ‘‘मम्मी, कम से कम छाया में तो बैठो.’’

मैं उठ कर पेड़ के नीचे वाली बेंच पर बैठ गई. सुरभि ने मुझ से धीरेधीरे सामान्य बातें करनी शुरू कर दीं. वह मुझे हंसाने की कोशिश करने लगी. उस की कोशिश रंग लाई और मैं धीरेधीरे अपने सामान्य मूड में आ गई.

तब सुरभि बोली, ‘‘मम्मी, एक बात कहूं मानेंगी?’’

मैं ने ‘हां’ में सिर हिलाया तो वह बोली, ‘‘मम्मी, आप गुस्से में यहां आ कर बैठ जाती हैं… इतनी धूप में यहां बैठी हैं. इस से आप को ही तकलीफ हो रही है न? घर पर तो पापा और सौरभ एयरकंडीशंड कमरे में बैठे हैं… मैं आप को एक आइडिया दूं?’’

मैं उस की बात ध्यान से सुन रही थी, मैं ने बताया न कि अब हम मांबेटी कम, सहेलियां ज्यादा हैं. अत: मैं ने कहा, ‘‘बोलो.’’

‘‘मम्मी, अगली बार जब आप को गुस्सा आए तो बस मैं जैसा कहूं आप वैसा ही करना. ठीक है न?’’

मैं मुसकरा दी और फिर हम घर आ गईं. आ कर देखा दोनों बापबेटे अपनेअपने कमरे में आराम फरमा रहे थे.

सुरभि ने कहा, ‘‘देखा, इन लोगों के लिए आप गरमी में निकली थीं.’’ फिर उस ने चाय और सैंडविच बनाए. सभी साथ चायनाश्ता करने लगे. तभी अमित ने कहा, ‘‘मैं ने सुरभि को जाते देख कर अंदाजा लगा लिया था कि तुम जल्द ही आ जाओगी.’’

मैं ने कोई जवाब नहीं दिया. सौरभ ने मुझे हमेशा की तरह ‘सौरी’ कहा और थोड़ी देर में सब सामान्य हो गया.

10-15 दिन शांति रही. फिर एक शनिवार को सौरभ अपना फुटबाल मैच खेल कर आया और आते ही लेट गया. अमित उस से पढ़ाई की बातें करने लगे जिस पर सौरभ ने कह दिया, ‘‘पापा, अभी मूड नहीं है. मैच खेल कर थक गया हूं… थोड़ी देर सोने के बाद पढ़ाई कर लूंगा.’’

अमित को गुस्सा आ गया और वे शुरू हो गए. सुरभि टीवी देख रही थी, वह भी अमित की डांट का शिकार हो गई. मैं खाना बना रही थी. भागी आई. अमित को शांत किया, ‘‘रहने दो अमित, आज छुट्टी है, पूरा हफ्ता पढ़ाई ही में तो बिजी रहते हैं.’’

अमित शांत नहीं हुए. उधर मेरी सब्जी जल रही थी, मेरा एक पैर किचन में, तो दूसरा बच्चों के बैडरूम में. मामला हमेशा की तरह मेरे हाथ से निकलने लगा तो मुझे गुस्सा आने लगा. मैं ने कहा, ‘‘आज छुट्टी है और मैं यह सोच कर किचन में कुछ स्पैशल बनाने में बिजी हूं कि सब साथ खाएंगे और तुम लोग हो कि मेरा दिमाग खराब करने पर तुले हो.’’

अमित सौरभ को कह रहे थे, ‘‘मैं देखता हूं अब तुम कैसे कोई मैच खेलते हो.’’

सौरभ रोने लगा. मैं ने बात टाली, ‘‘चलो, खाना बन गया है, सब डाइनिंग टेबल पर आ जाओ.’’

सौरभ ने कहा, ‘‘अभी भूख नहीं है. समोसे खा कर आया हूं.’’

यह सुनते ही अमित और भड़क उठे. इस के बाद बात इतनी बढ़ गई कि मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा.

‘‘तुम लोगों की जो मरजी हो करो,’’ कह लंच छोड़ कर सुरभि पर एक नजर डाल कर मैं निकल गई. मैं मन ही मन थोड़ा चौंकी भी, क्योंकि मैं ने सुरभि को मुसकराते देखा. आज तक ऐसा नहीं हुआ था. मैं परेशान होऊं और मेरी बेटी मुसकराए. मैं थोड़ा आगे निकली तो सुरभि मेरे पास पहुंच कर बोली, ‘‘मम्मी, आप ने कहा था कि अगली बार मूड खराब होने पर आप मेरी बात मानेंगी?’’

‘‘हां, क्या बात है?’’

‘‘मम्मी, आप क्यों गरमी में इधरउधर भटकें? पापा और भैया दोनों सोचते हैं आप थोड़ी देर में मेरे साथ घर आ जाएंगी… आप आज मेरे साथ चलो,’’ कह कर उस ने अपने हाथ में लिया हुआ मेरा पर्स मुझे दिखाया.

मैं ने कहा, ‘‘मेरा पर्स क्यों लाई हो?’’

सुरभि हंसी, ‘‘चलो न मम्मी, आज गुस्सा ऐंजौय करते हैं,’’ और फिर एक आटो रोक कर उस में मेरा हाथ पकड़ती हुई बैठ गई.

मैं ने पूछा, ‘‘यह क्या है? हम कहां जा रहे हैं?’’ और मैं ने अपने कपड़ों पर नजर डाली, मैं कुरता और चूड़ीदार पहने हुए थी.

सुरभि बोली, ‘‘आप चिंता न करें, अच्छी लग रही हैं.’’

वंडरमौल पहुंच कर आटो से उतर कर हम  पिज्जा हट’ में घुस गए.

मैं हंसी तो सुरभि खुश हो गई, बोली, ‘‘यह हुई न बात. चलो, शांति से लंच करते हैं.’’

तभी सुरभि के सैल पर अमित का फोन आया. पूछा, ‘‘नेहा कहां है?’’

सुरभि ने कहा, ‘‘मम्मी मेरे साथ हैं… बहुत गुस्से में हैं… पापा, हम थोड़ी देर में आ जाएंगे.’’

फिर हम ने पिज्जा आर्डर किया. हम पिज्जा खा ही रहे थे कि फिर अमित का फोन आ गया. सुरभि से कहा कि नेहा से बात करवाओ.

मैं ने फोन लिया, तो अमित ने कहा, ‘‘उफ, नेहा सौरी, अब आ जाओ, बड़ी भूख लगी है.’’

मैं ने कहा, ‘‘अभी नहीं, थोड़ा और चिल्ला लो… खाना तैयार है किचन में, खा लेना दोनों, मैं थोड़ा दूर निकल आई हूं, आने में टाइम लगेगा.’’

कुछ ही देर में सौरभ का फोन आ गया, ‘‘सौरी मम्मी, जल्दी आ जाओ, भूख लगी है.’’

मैं ने उस से भी वही कहा, जो अमित से कहा था.

‘पिज्जा हट’ से हम निकले तो सुरभि ने कहा, ‘‘चलो मम्मी, पिक्चर भी देख लें.’’

मैं तैयार हो गई. मेरा भी घर जाने का मन नहीं कर रहा था. वैसे भी पिक्चर देखना मुझे पसंद है. हम ने टिकट लिए और आराम से फिल्म देखने बैठ गए. बीचबीच में सुरभि अमित और सौरभ को मैसज देती रही कि हमें आने में देर होगी… आज मम्मी का मूड बहुत खराब है. जब अमित बहुत परेशान हो गए तो उन्होंने कहा कि वे हमें लेने आ रहे हैं. पूछा हम कहां हैं. तब मैं ने ही अमित से कहा कि मैं जहां भी हूं शांति से हूं, थोड़ी देर में आ जाऊंगी.

फिल्म खत्म होते ही हम ने जल्दी से आटो लिया. रास्ता भर हंसते रहे हम… बहुत मजा आया था. घर पहुंचे तो बेचैन से अमित ने ही दरवाजा खोला. मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, ‘‘ओह नेहा, इतना गुस्सा, आज तो जैसे तुम घर आने को ही तैयार नहीं थी, मैं पार्क में भी देखने गया था.’’

सुरभि ने मुझे आंख मारी. मैं ने किसी तरह अपनी हंसी रोकी. सौरभ भी रोनी सूरत लिए मुझ से लिपट गया. बोला, ‘‘अच्छा मम्मी अब मैं कभी कोई उलटा जवाब नहीं दूंगा.’’

दोनों ने खाना नहीं खाया था, मुझे बुरा लगा.

अमित बोले, ‘‘चलो, अब कुछ खिला दो और खुद भी कुछ खा लो.’’

सुरभि ने मुझे देखा तो मैं ने उसे खाना लगाने का इशारा किया और फिर खुद भी उस के साथ किचन में सब के लिए खाना गरम करने लगी. हम दोनों ने तो नाम के कौर ही मुंह में डाले. मैं गंभीर बनी बैठी थी.

अमित ने कहा, ‘‘चलो, आज से कोई किसी पर नहीं चिल्लाएगा, तुम कहीं मत जाया करो.’’

सौरभ भी कहने लगा, ‘‘हां मम्मी, अब कोई गुस्सा नहीं करेगा, आप कहीं मत जाया करो… बहुत खराब लगता है.’’

और सुरभि वह तो आज के प्रोग्राम से इतनी उत्साहित थी कि उस का मुसकराता चेहरा और चमकती आंखें मानो मुझ से पूछ रही थीं कि अगली बार आप को गुस्सा कब आएगा?

शौर्टकट: नसरीन ने सफलता पाने के लिए कौन-सा रास्ता अपनाया?

उफ फिर एक नया ग्रुप. लगता है सारी दुनिया सिर्फ व्हाट्सऐप में ही सिमट गई है. कालेज जाने से पहले अपने मोबाइल में व्हाट्सऐप मैसेज चैक करते समय नसरीन ने खुद को एक नए व्हाट्सऐप ग्रुप सितारे जमीं पर से जुड़ा पाया.

यह व्हाट्सऐप का शौक भी धीरेधीरे लत बनता जा रहा है. न देखो तो कई महत्त्वपूर्ण सूचनाओं और जानकारी से वंचित रह जाते हैं और देखने बैठ जाओ तो वक्त कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता. किसीकिसी ग्रुप में तो एक ही दिन में सैकड़ों मैसेज आ जाते हैं. बेचारा मोबाइल हैंग हो जाता है. आधे से ज्यादा तो मुफ्त का ज्ञान बांटने वाले कौपीपेस्ट ही होते हैं और बचे हुए आधों में भी ज्यादातर तो गुडमौर्निंग, गुड ईवनिंग या गुड नाइट जैसे बेमतलब के होते. लेदे कर कोई एकाध मैसेज ही दिन भर में काम का होता है. बच्चे का नैपी जैसे हो गया है मोबाइल. चाहे कुछ हो या न हो बारबार चैक करने की आदत सी हो गई है. नसरीन सोचतेसोचते सरसरी निगाहों से सारे मैसेज देख रही थी. कुछ पढ़ती और फिर डिलीट कर देती. कालेज जाने से पहले रात भर के आए सभी मैसेज चैक करना उस की आदत में शुमार है.

देखें तो क्या है इस नए ग्रुप में? ऐडमिन कौन है? कौनकौन जुड़ा है इस में? क्या कोई ऐसा भी है जिसे मैं जानती हूं? नसरीन ने नए ग्रुप के गु्रप इन्फो पर टैब किया. इस ग्रुप में फिलहाल 107 लोग जुड़े थे. स्क्रोल करतेकरते उस की उंगलियां एक नाम पर जा कर ठहर गईं. राजन? ग्रुप ऐडमिन को पहचानते ही नसरीन उछल पड़ी.

अरे, ये तो फेस औफ द ईयर कौंटैस्ट के आयोजक हैं. इस का मतलब मेरा प्रोफाइल फर्स्ट लैवल पर सलैक्ट हो गया है. नसरीन के अरमानों को छोटेछोटे पंख उग आए.

नसरीन जयपुर में रहने वाले मध्यवर्गीय मुसलिम परिवार की साधारण युवती है. मगर उस की महत्त्वाकांक्षा उसे असाधारण बनाती है. 5 फुट 5 इंच लंबी, आकर्षक नैननक्श और छरहरी काया की मालकिन नसरीन के सपने बहुत ऊंचे हैं और अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह किसी भी हद तक जाने का जनून रखती है. जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने वाली नसरीन को समाज के रूढिवादी रवैए ने बागी बना दिया. उस का सपना मौडल बनने का है. मगर सब से बड़ी बाधा उस का खुद का परिवार बना हुआ है. उस के भाई को उस का फैशनेबल कपड़े पहनना फूटी आंख नहीं सुहाता और मां भी जितनी जल्दी हो सके अपने भाई के बेटे से उस का निकाह कराना चाहतीं. मगर इस सब से बेखबर नसरीन अपनी ही दुनिया में खोई रहती है. उस की जिंदगी में फिलहाल शादी और बच्चों के लिए कोई जगह नहीं है. उस की हमउम्र सहेलियां उस से ईर्ष्या करती हैं. मगर मन ही मन उस की तरह जीना भी चाहती हैं.

महल्ले के बड़ेबुजुर्गों और मौलाना साहब तक उस के अब्बा हुजूर को हिदायत दे चुके हैं कि बेटी को हिजाब में रखें और कुरान की तालीम दें, क्योंकि उसे देख कर समाज की बाकी लड़कियां भी बिगड़ रही हैं. लेकिन अब्बा को जमाने से ज्यादा अपनी बेटी की खुशी प्यारी थी, इसलिए उन्होंने उसे सब की निगाहों से दूर फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने दिल्ली भेज दिया.

एक दिन कालेज के नोटिस बोर्ड पर राजन की कंपनी द्वारा आयोजित फेस औफ द ईयर कौंटैस्ट का विज्ञापन देखा, तो उसे आशा की एक किरण नजर आई. हालांकि दिल्ली में आए दिन इस तरह के आयोजन होते रहते हैं, मगर राजन की कंपनी द्वारा चुने गए मौडल देश भर में अलग पहचान रखते हैं. विज्ञप्ति के अनुसार विभिन्न चरणों से होते हुए प्रतियोगिता का फाइनल राउंड मुंबई में होना था तथा विजेता मौडल को क्व10 लाख नकद इनाम राशि के साथसाथ 1 साल का मौडलिंग कौंट्रैक्ट साइन करना था. यह जानते हुए भी कि फिल्मों की तरह इस क्षेत्र में भी गौड फादर का होना जरूरी है, नसरीन ने इस प्रतियोगिता के लिए अपनी ऐंट्री भेज दी. उस का सोचना था कि वह यह कौंटैस्ट जीत गई तो आगे का रास्ता खुल जाएगा.

राजन फैशन जगत में जाना माना नाम है. उस की रंगीनमिजाजी के किस्से अकसर सुनाई देते हैं. फिर भी उस के लिए मौडलिंग करना किसी भी नवोदित का सपना होता है. आज खुद इस ग्रुप में राजन के साथ जुड़ कर नसरीन को यों लगा मानो उस की लौटरी लग गई. आज आसमान मुट्ठी में कैद हुआ सा लग रहा था. उसे अचानक नीरस और उबाऊ व्हाट्सऐप अच्छा लगने लगा.

‘सब कुछ सिस्टेमैटिक तरीके से करना होगा.’ सोचते हुए मिशन की प्लानिंग के हिसाब से सब से पहले नसरीन ने व्हाट्सऐप प्रोफाइल की डीपी पर लगी अपनी पुरानी तसवीर हटा कर सैक्सी तसवीर लगाई. फिर राजन को पर्सनल चैट बौक्स में मैसेज भेज कर थैंक्स कहा. राजन ने जवाब में दोनों हाथ नमस्कार की मुद्रा में जुड़े हुए 2 स्माइली प्रतीक भेजे. यह नसरीन की राजन के साथ पहली चैट थी.

एक दिन नसरीन ने अपने कुछ फोटो राजन के इनबौक्स में भेजे तथा तुरंत ही सौरी का मैसेज भेजते हुए लिखा, ‘‘माफ कीजिएगा, गलती से सैंड हो गए.’’

‘‘इट्स ओके. बट यू आर लुकिंग वैरी सैक्सी,’’ राजन ने लिखा.

‘‘सर, मैं इस वक्त दुनिया की सब से खुशहाल लड़की हूं, क्योंकि मैं आप जैसे किंग मेकर से सीधे रूबरू हूं.’’

‘‘मैं तो एक अदना सा कला का सेवक हूं.’’

‘‘हीरा अपना मोल खुद नहीं आंक सकता.’’

‘‘आप नाहक मुझे चने के झाड़ पर चढ़ा रही हैं.’’

‘‘जो सच है वही कह रही हूं…’’

राजन ने 2 हाथ जुड़े हुए धन्यवाद की मुद्रा में भेजे.

‘‘ओके सर बाय. कल मिलते हैं,’’ और 2 स्माइली के साथ नसरीन ने चैट बंद कर दी.

2 दिन बाद प्रतियोगिता का पहला राउंड था. नसरीन ने राजन को लिखा, ‘‘सर, यह मेरा पहला चांस है, क्या हमारा साथ बना रहेगा?’’

‘‘यह तो वक्त तय करेगा या फिर खुद तुम,’’ कह कर राजन ने जैसे उसे एक हिंट दिया.

नसरीन उस का इशारा कुछकुछ समझ गई. फिर ‘मैं यह कौंटैस्ट हर कीमत पर जीतना चाहूंगी,’ लिख कर नसरीन ने उसे हरी झंडी दे दी.

पहले राउंड में देश भर से चुनी गईं 60 मौडलों में से दूसरे राउंड के लिए  20 युवतियों का चयन किया गया. नसरीन भी उन में से एक थी. राजन ने उसे बधाई देने के लिए अपने कैबिन में बुलाया. आज उस की राजन से प्रत्यक्ष मुलाकात हुई. राजन जितना फोटो में दिखाई देता था उस से कहीं ज्यादा आकर्षक और हैंडसम था. अपने कैबिन में उस ने नसरीन के गाल थपथपाते हुए कहा, ‘‘बेबी, हाऊ आर यू फीलिंग नाऊ?’’

‘‘यह राउंड क्वालिफाई करने के बाद या फिर आप से मिलने के बाद?’’ नसरीन ने शरारत से पूछा.

‘‘स्मार्ट गर्ल.’’

‘‘अब आगे क्या होगा?’’

‘‘कहा तो है कि यह तुम पर डिपैंड करता है,’’ राजन ने उस की खुली पीठ को हलके से छूते हुए कहा.

‘‘वह तो है, मगर अब कंपीटिशन और भी टफ होने वाला है,’’ नसरीन ने राजन की हरकत का कोई विरोध न करते हुए कहा.

‘‘बेबी, तुम एक काम करो, नैक्स्ट राउंड में अभी 10 दिन का टाइम है. तुम रोनित शेट्टी से पर्सनैलिटी ग्रूमिंग की क्लासेज ले लो. मैं उसे फोन कर देता हूं,’’ राजन ने उस के चेहरे पर आई लटों को हटाते हुए कहा.

‘‘सो नाइस औफ यू… थैंक्स,’’ कह नसरीन ने उस के हाथ से रोनित का कार्ड ले लिया.

10 दिन बाद प्रतियोगिता के सैकंड राउंड में नसरीन सहित 10 मौडलों का चयन किया गया. अब आखिरी राउंड में विजेता का चयन किया जाना था. प्रतियोगिता का फाइनल मुंबई में होना था. निर्णायक मंडल में राजन सहित एक प्रसिद्ध टीवी ऐक्ट्रैस और एक प्रसिद्ध पुरुष मौडल था.

नसरीन भी सभी प्रतिभागियों के साथ मुंबई पहुंच गई. प्रतिभागियों के रुकने की अलग व्यवस्था की गई थी और बाकी टीम की अलग. राजन ने नसरीन को मैसेज कर के अपने रूम में बुलाया.

‘‘तो बेबी, क्या सोचा तुम ने?’’

‘‘इस में सोचना क्या? यह तो एक डील है… तुम मुझे खुश कर दो, मैं तुम्हें कर दूंगी,’’ नसरीन ने बेबाकी से कहा.

‘‘तो ठीक है, रात को डील पर मुहर लगा देते हैं.’’

‘‘आज नहीं कल रिजल्ट के बाद.’’

‘‘मुझ पर भरोसा नहीं?’’

‘‘भरोसा तो है, मगर मेरे पास भी तो सैलिब्रेट करने का कोई बहाना होना चाहिए न?’’ नसरीन ने उसे अपने से अलग करते हुए कहा.

‘‘ऐज यू विश… औल द बैस्ट,’’ कहते हुए राजन ने उसे बिदा किया.

अगले दिन विभिन्न चरणों की औपचारिकता से गुजरते हुए अंतिम निर्णय के आधार पर नसरीन को फेस औफ द ईयर चुना गया. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच पिछले वर्ष की विजेता ने अपना क्राउन उसे पहनाया तो नसरीन की आंखें खुशी के मारे छलक उठीं. उस ने राजन की तरफ कृतज्ञता से देखा तो राजन ने एक आंख दबा कर उसे उस का वादा याद दिलाया. नसरीन मुसकरा दी.

आज की रात अपनी देह का मखमली कालीन बिछा कर नसरीन ने अपनी मंजिल को पाने के लिए शौर्टकट की पहली सीढ़ी पर पांव रखा. एक गरम कतरा उस की पलकों की कोर को नम करता हुए धीरे से तकिए में समा गया.

खिताब जीतने के बाद पहली बार नसरीन अपने शहर आई. पर रेलवे स्टेशन पर कट्टर समाज के लोगों ने उस के भाई की अगुआई में उसे काले झंडे दिखाए, मुर्दाबाद के नारे लगाए और उसे ट्रेन से उतरने नहीं दिया. भीड़ में सब से पीछे खड़े उस के अब्बा उसे डबडबाई आंखों से निहार रहे थे. नसरीन उन्हें देख कर सिर्फ हाथ ही हिला सकी और ट्रेन चल पड़ी. इस विरोध के बाद उस ने फिर कभी जयपुर का रुख नहीं किया.

देखते ही देखते विज्ञापन की दुनिया में नसरीन छा गई. लेकिन शौर्टकट सीढि़यां चढ़तेचढ़ते काफी ऊपर आ गई नसरीन के लिए मंजिल अभी भी दूर थी. उस की ख्वाहिश इंटरनैशनल लैवल तक जाने की थी और सिर्फ राजन के पंखों के सहारे इतनी ऊंची उड़ान भरना संभव नहीं था. उसे अब और भी सशक्त पंखों की तलाश थी, जो उस की उड़ान को 7वें आसमान तक ले जा सके.

एक दिन उसे पता चला कि फैशन जगत के बेताज बादशाह समीर खान को अपने इंटरनैशनल प्रोजैक्ट के लिए फ्रैश चेहरा चाहिए. उस ने समीर खान से अपौइंटमैंट लिया और उस के औफिस पहुंच गई. इधरउधर की बातों के बाद सीधे मुद्दे पर आते हुए समीर ने कहा, ‘‘देखो बेबी, यह एक बीच सूट है और बीच सूट कैसा होता है, आई होप तुम जानती होंगी.’’

‘‘यू डौंट वरी. जैसा आप चाहोगे हो जाएगा,’’ नसरीन ने उसे आश्वस्त किया.

‘‘ठीक है, नैक्स्ट वीक औडिशन है, लेकिन उस से पहले हम देखना चाहेंगे कि यह जिस्म बीच सूट लायक है भी या नहीं,’’ समीर ने कहा.

नसरीन उस का इशारा समझ रही थी. अत: उस ने कहा, ‘‘पहले औडिशन ले कर ट्रेलर देख लीजिए. कोई संभावना दिखे तो पूरी पिक्चर भी देख लेना.’’

‘‘वाह, ब्यूटी विद ब्रेन,’’ कहते हुए समीर ने उस के गाल थपथपाए.

नसरीन का चयन इस प्रोजैक्ट के लिए हो गया. 1 महीने बाद उसे समीर की टीम के साथ सूट के लिए विदेश जाना था. अब राजन से उस का संपर्क कुछ कम होने लगा था.

आज राजन ने उसे डिनर के लिए इनवाइट किया था. नसरीन जानती थी कि वह रात की गई सुबह ही वापस आएगी. कुछ भी हो, मगर राजन के लिए उस के दिल में एक सौफ्ट कौर्नर था.

‘‘समीर के साथ जा रही हो?’’

‘‘हूं.’’

‘‘मुझे भूल जाओगी?’’

‘‘यह मैं ने कब कहा?’’

‘‘तुम उसे जानती ही कितना हो… एक नंबर का लड़कीखोर है.’’

‘‘तुम्हें भी कहां जानती थी?’’

‘‘शायद तुम्हें उड़ने के लिए अब आकाश छोटा पड़ने लगा?’’

‘‘तुम्हें कहीं मुझ से प्यार तो नहीं होने लगा?’’ नसरीन ने माहौल को हलकाफुलका करने के लिए हंसते हुए कहा.

‘‘अगर मैं हां कहूं तो?’’ राजन ने उस की आंखों में झांका.

‘‘तुम ऐसा नहीं कहोगे.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि फैशन की इस दुनिया में प्यार नहीं होता. वैसे भी तुम्हारी कंपनी फेस औफ द ईयर कौंटैस्ट फिर से आयोजित करने वाली है. फिर एक नया चेहरा चुना जाएगा, जो तुम्हारी कंपनी और तुम्हारे बिस्तर की शोभा बढ़ाएगा. फिर से तुम साल भर के लिए बिजी हो जाओगे. मैं ने पिछले वर्ष की मौडल के चेहरे पर एक पीड़ा देखी थी जब वह मुझे क्राउन पहना रही थी. वह पीड़ा मैं अपनी आंखों में नहीं आने देना चाहती,’’ नसरीन ने बहुत ही साफगोई से कहा.

राजन उसे अवाक देख रहा था. उस ने अपनी जिंदगी में आज तक इतनी पारदर्शी सोच वाली लड़की नहीं देखी थी.

नसरीन ने आगे कहा, ‘‘मेरी मंजिल अभी बहुत दूर है राजन. तुम जैसे न जाने कितने छोटेछोटे पड़ाव आएंगे. मैं वहां कुछ देर सुस्ता तो सकती हूं, मगर रुक नहीं सकती.’’

रात को सैलिब्रेट करने का राजन का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. उस ने नसरीन से कहा, ‘‘चलो, तुम्हें गाड़ी तक छोड़ दूं.’’

‘‘ओके, बाय बेबी… 2 दिन बाद मेरी फ्लाइट है. देखते हैं अगला पड़ाव कहां होता है,’’ कहते हुए नसरीन ने आत्मविश्वास के साथ गाड़ी स्टार्ट कर दी.

राजन उसे आंखों से ओझल होने तक देखता रहा.

समझौता: शादी के दिन देवर के घर कैसे पहुंच गई शिखा?

जब मां का फोन आया, तब मैं बाथरूम से बाहर निकल रहा था. मेरे रिसीवर उठाने से पहले ही शिखा ने फोन पर वार्त्तालाप आरंभ कर दिया था. मां उस से कह रही थीं, ‘‘शिखा, मैं ने तुम्हें एक सलाह देने के लिए फोन किया है. मैं जो कुछ कहने जा रही हूं, वह सिर्फ मेरी सलाह है, सास होने के नाते आदेश नहीं. उम्मीद है तुम उस पर विचार करोगी और हो सका तो मानोगी भी…’’

‘‘बोलिए, मांजी?’’ ‘‘बेटी, तुम्हारे देवर पंकज की शादी है. वह कोई गैर नहीं, तुम्हारे पति का सगा भाई है. तुम दोनों के व्यापार अलग हैं, घर अलग हैं, कुछ भी तो साझा नहीं है. फिर भी तुम लोगों के बीच मधुर संबंध नहीं हैं बल्कि यह कहना अधिक सही होगा कि संबंध टूट चुके हैं. मैं तो समझती हूं कि अलगअलग रह कर संबंधों को निभाना ज्यादा आसान हो जाता है.

‘‘वैसे उस की गलती क्या है…बस यही कि उस ने तुम दोनों को इस नए शहर में बुलाया, अपने साथ रखा और नए सिरे से व्यापार शुरू करने को प्रोत्साहित किया. हो सकता है, उस के साथ रहने में तुम्हें कुछ परेशानी हुई हो, एकदूसरे से कुछ शिकायतें भी हों, किंतु इन बातों से क्या रिश्ते समाप्त हो जाते हैं? उस की सगाई में तो तुम नहीं आई थीं, किंतु शादी में जरूर आना. बहू का फर्ज परिवार को जोड़ना होना चाहिए.’’ ‘‘तो क्या मैं ने रिश्तों को तोड़ा है? पंकज ही सब जगह हमारी बुराई करते फिरते हैं. लोगों से यहां तक कहा है, ‘मेरा बस चले तो भाभी को गोली मार दूं. उस ने आते ही हम दोनों भाइयों के बीच दरार डाल दी.’ मांजी, दरार डालने वाली मैं कौन होती हूं? असल में पंकज के भाई ही उन से खुश नहीं हैं. मुझे तो अपने पति की पसंद के हिसाब से चलना पड़ेगा. वे कहेंगे तो आ जाऊंगी.’’

‘‘देखो, मैं यह तो नहीं कहती कि तुम ने रिश्ते को तोड़ा है, लेकिन जोड़ने का प्रयास भी नहीं किया. रही बात लोगों के कहने की, तो कुछ लोगों का काम ही यही होता है. वे इधरउधर की झूठी बातें कर के परिवार में, संबंधों में फूट डालते रहते हैं और झगड़ा करा कर मजा लूटते हैं. तुम्हारी गलती बस इतनी है कि तुम ने दूसरों की बातों पर विश्वास कर लिया. ‘‘देखो शिखा, मैं ने आज तक कभी तुम्हारे सामने चर्चा नहीं की है, किंतु आज कह रही हूं. तुम्हारी शादी के बाद कई लोगों ने हम से कहा, ‘आप कैसी लड़की को बहू बना कर ले आए. इस ने अपनी भाभी को चैन से नहीं जीने दिया, बहुत सताया. अपनी भाभी की हत्या के सिलसिले में इस का नाम भी पुलिस में दर्ज था. कुंआरी लड़की है, शादी में दिक्कतें आएंगी, यही सोच कर रिश्वत खिला कर उस का नाम, घर वालों ने उस केस से निकलवाया है.’

‘‘अगर शादी से पहले हमें यह समाचार मिलता तो शायद हम सचाई जानने के लिए प्रयास भी करते, लेकिन तब तक तुम बहू बन कर हमारे घर आ चुकी थीं. कहने वालों को हम ने फटकार कर भगा दिया था. यह सब बता कर मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाहती, बल्कि कहना यह चाहती हूं कि आंखें बंद कर के लोगों की बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए. खैर, मैं ने तुम्हें शादी में आने की सलाह देने के लिए फोन किया है, मानना न मानना तुम्हारी मरजी पर निर्भर करता है,’’ इतना कह कर मां ने फोन काट दिया था. मां ने कई बार मुझे भी समझाने की कोशिश की थी, किंतु मैं ने उन की पूरी बात कभी नहीं सुनी. बल्कि,? उन पर यही दोषारोपण करता रहा कि वह मुझ से ज्यादा पंकज को प्यार करती हैं, इसलिए उन्हें मेरा ही दोष नजर आता है, पंकज का नहीं. इस पर वे हमेशा यहां से रोती हुई ही लौटी थीं.

लेकिन सचाई तो यह थी कि मैं खुद भी पंकज के खिलाफ था. हमेशा दूसरों की बातों पर विश्वास करता रहा. इस तरह हम दोनों भाइयों के बीच खाई चौड़ी होती चली गई. लेकिन फोन पर की गई मां की बातें सुन कर कुछ हद तक उन से सहमत ही हुआ. मां यहां नहीं रहती थीं. शादी की वजह से ही पंकज के पास उस के घर आई हुई थीं. वे हम दोनों भाइयों के बीच अच्छे संबंध न होने की वजह से बहुत दुखी रहतीं इसीलिए यहां बहुत कम ही आतीं.

लोग सही कहते हैं, अधिकतर पति पारिवारिक रिश्तों को निभाने के मामले में पत्नी पर निर्भर हो जाते हैं. उस की नजरों से ही अपने रिश्तों का मूल्यांकन करने लगते हैं. शायद यही वजह है, पुरुष अपने मातापिता, भाईबहनों आदि से दूर होते जाते हैं और ससुराल वालों के नजदीक होते जाते हैं.

दूसरों शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि महिलाएं, पुरुषों की तुलना में अपने रक्त संबंधों के प्रति अधिक वफादार होती हैं. इसीलिए अपने मायके वालों से उन के संबंध मधुर बने रहते हैं. बल्कि कड़ी बन कर वे पतियों को भी अपने परिवार से जोड़ने का प्रयास करती रहती हैं. वैसे पुरुष का अपनी ससुराल से जुड़ना गलत नहीं है. गलत है तो यह कि पुरुष रिश्तों में संतुलन नहीं रख पाते, वे नए परिवार से तो जुड़ते हैं, किंतु धीरेधीरे अपने परिवार से दूर होते चले जाते हैं. भाईभाई में, भाईबहनों में कहासुनी कहां नहीं होती. लेकिन इस का मतलब यह तो नहीं होता कि संबंध समाप्त

कर लिए जाएं. मेरे साथ यही हुआ, जानेअनजाने मैं पंकज से ही नहीं, अपने परिवार के अन्य सदस्यों से भी दूर होता चला गया. सही माने में देखा जाए तो संपन्नता व कामयाबी के जिस शिखर पर बैठ कर मैं व मेरी पत्नी गर्व महसूस कर रहे थे, उस की जमीन मेरे लिए पंकज ने ही तैयार की थी. उस के पूर्ण सहयोग व प्रोत्साहन के बिना अपनी पत्नी के साथ मैं इस अजनबी शहर में आने व अल्प पूंजी से नए सिरे से व्यवसाय शुरू करने की बात सोच भी नहीं सकता था. उस का आभार मानने के बदले मैं ने उस रिश्ते को दफन कर दिया. मेरी उन्नति में मेरी ससुराल वालों का 1 प्रतिशत भी योगदान नहीं था, किंतु धीरेधीरे वही मेरे नजदीक होते गए. दोष शिखा का नहीं, मेरा था. मैं ही अपने निकटतम रिश्तों के प्रति ईमानदार नहीं रहा. जब मैं ने ही उन के प्रति उपेक्षा का भाव अपनाया तो मेरी पत्नी शिखा भला उन रिश्तों की कद्र क्यों करती?

समाज में साथ रहने वाले मित्र, पड़ोसी, परिचित सब हमारे हिसाब से नहीं चलते. हम में मतभेद भी होते हैं. एकदूसरे से नाखुश भी होते हैं, आगेपीछे एकदूसरे की आलोचना भी करते हैं, लेकिन फिर भी संबंधों का निर्वाह करते हैं. उन के दुखसुख में शामिल होते हैं. फिर अपनों के प्रति हम इतने कठोर क्यों हो जाते हैं? उन की जराजरा सी त्रुटियों को बढ़ाचढ़ा कर क्यों देखते हैं? कुछ बातों को नजरअंदाज क्यों नहीं कर पाते? तिल का ताड़ क्यों बना देते हैं? मैं सोचने लगा, पंकज मेरा सगा भाई है. यदि जानेअनजाने उस ने कुछ गलत किया या कहा भी है तो आपस में मिलबैठ कर मतभेद मिटाने का प्रयास भी तो कर सकते थे. गलतफहमियों को दूर करने के बदले हम रिश्तों को समाप्त करने के लिए कमर कस लें, यह तो समझदारी नहीं है. असलियत तो यह है कि कुछ शातिर लोगों ने दोस्ती का ढोंग रचाते हुए हमें एकदूसरे के विरुद्ध भड़काया, हमारे बीच की खाई को गहरा किया. हमारी नासमझी की वजह से वे अपनी कोशिश में कामयाब भी रहे, क्योंकि हम ने अपनों की तुलना में गैरों पर विश्वास किया.

मैं ने निर्णय कर लिया कि अपने फैसले मैं खुद लूंगा. पंकज की शादी में शिखा जाए या न जाए, किंतु मैं समय पर पहुंच कर भाई का फर्ज निभाऊंगा. उस की सगाई में भी शिखा की वजह से ही मैं तब पहुंचा, जब प्रोग्राम समाप्त हो चुका था. सगाई वाले दिन मैं जल्दी ही दुकान बंद कर के घर आ गया था, लेकिन शिखा ने कलह शुरू कर दिया था. वह पंकज के प्रति शिकायतों का पुराना पुलिंदा खोल कर बैठ गई थी. उस ने मेरा मूड इतना खराब कर दिया था कि जाने का उत्साह ही ठंडा पड़ गया. मैं बिस्तर पर पड़ापड़ा सो गया था. जब नींद खुली तो रात के 10 बज रहे थे. मन अंदर से कहीं कचोट रहा था कि तेरे सगे भाई की सगाई है और तू यहां घर में पड़ा है. फिर मैं बिना कुछ विचार किए, देर से ही सही, पंकज के घर चला गया था.

मानव का स्वभाव है कि अपनी गलती न मान कर दोष दूसरे के सिर पर मढ़ देता है, जैसे कि वह दोष मैं ने शिखा के सिर पर मढ़ दिया. ठीक है, शिखा ने मुझे रोकने का प्रयास अवश्य किया था किंतु मेरे पैरों में बेड़ी तो नहीं डाली थी. दोषी मैं ही था. वह तो दूसरे घर से आई थी. नए रिश्तों में एकदम से लगाव नहीं होता. मुझे ही कड़ी बन कर उस को अपने परिवार से जोड़ना चाहिए था, जैसे उस ने मुझे अपने परिवार से जोड़ लिया था.

शिखा की सिसकियों की आवाज से मेरा ध्यान भंग हुआ. वह बाहर वाले कमरे में थी. उसे मालूम नहीं था कि मैं नहा कर बाहर आ चुका हूं और फोन की पैरलेल लाइन पर मां व उस की पूरी बातें सुन चुका हूं. मैं सहजता से बाहर गया और उस से पूछा, ‘‘शिखा, रो क्यों रही हो?’’ ‘‘मुझे रुलाने का ठेका तो तुम्हारे घर वालों ने ले रखा है. अभी आप की मां का फोन आया था. आप को तो पता है न, मेरी भाभी ने आत्महत्या की थी. आप की मां ने आरोप लगाया है कि भाभी की हत्या की साजिश में मैं भी शामिल थी,’’ कह कर वह जोर से रोने लगी.

‘‘बस, यही आरोप लगाने के लिए उन्होंने फोन किया था?’’ ‘‘उन के हिसाब से मैं ने रिश्तों को तोड़ा है. फिर भी वे चाहती हैं कि मैं पंकज की शादी में जाऊं. मैं इस शादी में हरगिज नहीं जाऊंगी, यह मेरा अंतिम फैसला है. तुम्हें भी वहां नहीं जाना चाहिए.’’

‘‘सुनो, हम दोनों अपनाअपना फैसला करने के लिए स्वतंत्र हैं. मैं चाहते हुए भी तुम्हें पंकज के यहां चलने के लिए बाध्य नहीं करना चाहता. किंतु अपना निर्णय लेने के लिए मैं स्वतंत्र हूं. मुझे तुम्हारी सलाह नहीं चाहिए.’’ ‘‘तो तुम जाओगे? पंकज तुम्हारे व मेरे लिए जगहजगह इतना जहर उगलता फिरता है, फिर भी जाओगे?’’

‘‘उस ने कभी मुझ से या मेरे सामने ऐसा नहीं कहा. लोगों के कहने पर हमें पूरी तरह विश्वास नहीं करना चाहिए. लोगों के कहने की परवा मैं ने की होती तो तुम को कभी भी वह प्यार न दे पाता, जो मैं ने तुम्हें दिया है. अभी तुम मांजी द्वारा आरोप लगाए जाने की बात कर रही थीं. पर वह उन्होंने नहीं लगाया. लोगों ने उन्हें ऐसा बताया होगा. आज तक मैं ने भी इस बारे में तुम से कुछ पूछा या कहा नहीं. आज कह रहा हूं… तुम्हारे ही कुछ परिचितों व रिश्तेदारों ने मुझ से भी कहा कि शिखा बहुत तेजमिजाज लड़की है. अपनी भाभी को इस ने कभी चैन से नहीं जीने दिया. इस के जुल्मों से परेशान हो कर भाभी की मौत हुई थी. पता नहीं वह हत्या थी या आत्महत्या…लेकिन मैं ने उन लोगों की परवा नहीं की…’’ ‘‘पर तुम ने उन की बातों पर विश्वास कर लिया? क्या तुम भी मुझे अपराधी समझते हो?’’

‘‘मैं तुम्हें अपराधी नहीं समझता. न ही मैं ने उन लोगों की बातों पर विश्वास किया था. अगर विश्वास किया होता तो तुम से शादी न करता. तुम से बस एक सवाल करना चाहता हूं, लोग जब किसी के बारे में कुछ कहते हैं तो क्या हमें उस बात पर विश्वास कर लेना चाहिए.’’

‘‘मैं तो बस इतना जानती हूं कि वह सब झूठ है. हम से जलने वालों ने यह अफवाह फैलाई थी. इसी वजह से मेरी शादी में कई बार रुकावटें आईं.’’ ‘‘मैं ने भी उसे सच नहीं माना, बस तुम्हें यह एहसास कराना चाहता हूं कि जैसे ये सब बातें झूठी हैं, वैसे ही पंकज के खिलाफ हमें भड़काने वालों की बातें भी झूठी हो सकती हैं. उन्हें हम सत्य क्यों मान रहे हैं?’’

‘‘लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे बातें झूठी हैं. खैर, लोगों ने सच कहा हो या झूठ, मैं तो नहीं जाऊंगी. एक बार भी उन्होंने मुझ से शादी में आने को नहीं कहा.’’ ‘‘कैसे कहता, सगाई पर आने के लिए तुम से कितना आग्रह कर के गया था. यहां तक कि उस ने तुम से माफी भी मांगी थी. फिर भी तुम नहीं गईं. इतना घमंड अच्छा नहीं. उस की जगह मैं होता तो दोबारा बुलाने न आता.’’

‘‘सब नाटक था, लेकिन आज अचानक तुम्हें हो क्या गया है? आज तो पंकज की बड़ी तरफदारी की जा रही है?’’

तभी द्वार की घंटी बजी. पंकज आया था. उस ने शिखा से कहा, ‘‘भाभी, भैया से तो आप को साथ लाने को कह ही चुका हूं, आप से भी कह रहा हूं. आप आएंगी तो मुझे खुशी होगी. अब मैं चलता हूं, बहुत काम करने हैं.’’ पंकज प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किए बिना लौट गया.

मैं ने पूछा, ‘‘अब तो तुम्हारी यह शिकायत भी दूर हो गई कि तुम से उस ने आने को नहीं कहा? अब क्या इरादा है?’’

‘‘इरादा क्या होना है, हमारे पड़ोसियों से तो एक सप्ताह पहले ही आने को कह गया था. मुझे एक दिन पहले न्योता देने आया है. असली बात तो यह है कि मेरा मन उन से इतना खट्टा हो गया है कि मैं जाना नहीं चाहती. मैं नहीं जाऊंगी.’’ ‘‘तुम्हारी मरजी,’’ कह कर मैं दुकान चला गया.

थोड़ी देर बाद ही शिखा का फोन आया, ‘‘सुनो, एक खुशखबरी है. मेरे भाई हिमांशु की शादी तय हो गई है. 10 दिन बाद ही शादी है. उस के बाद कई महीने तक शादियां नहीं होंगी. इसीलिए जल्दी शादी करने का निर्णय लिया है.’’

‘‘बधाई हो, कब जा रही हो?’’ ‘‘पूछ तो ऐसे रहे हो जैसे मैं अकेली ही जाऊंगी. तुम नहीं जाओगे?’’

‘‘तुम ने सही सोचा, तुम्हारे भाई की शादी है, तुम जाओ, मैं नहीं जाऊंगा.’’ ‘‘यह क्या हो गया है तुम्हें, कैसी बातें कर रहे हो? मेरे मांबाप की जगहंसाई कराने का इरादा है क्या? सब पूछेंगे, दामाद क्यों नहीं आया तो

क्या जवाब देंगे? लोग कई तरह की बातें बनाएंगे…’’ ‘‘बातें तो लोगों ने तब भी बनाई होंगी, जब एक ही शहर में रहते हुए, सगी भाभी हो कर भी तुम देवर की सगाई में नहीं गईं…और अब शादी में भी नहीं जाओगी. जगहंसाई क्या

यहां नहीं होगी या फिर इज्जत का ठेका तुम्हारे खानदान ने ही ले रखा है, हमारे खानदान की तो कोई इज्जत ही नहीं है?’’

‘‘मत करो तुलना दोनों खानदानों की. मेरे घर वाले तुम्हें बहुत प्यार करते हैं. क्या तुम्हारे घर वाले मुझे वह इज्जत व प्यार दे पाए?’’ ‘‘हरेक को इज्जत व प्यार अपने व्यवहार से मिलता है.’’

‘‘तो क्या तुम्हारा अंतिम फैसला है कि तुम मेरे भाई की शादी में नहीं जाओगे?’’ ‘‘अंतिम ही समझो. यदि तुम मेरे भाई की शादी में नहीं जाओगी तो

मैं भला तुम्हारे भाई की शादी में क्यों जाऊंगा?’’

‘‘अच्छा, तो तुम मुझे ब्लैकमेल कर रहे हो?’’ कह कर शिखा ने फोन रख दिया.

दूसरे दिन पंकज की शादी में शिखा को आया देख कर मांजी का चेहरा खुशी से खिल उठा था. पंकज भी बहुत खुश था.

मांजी ने स्नेह से शिखा की पीठ पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘बेटी, तुम आ गई, मैं बहुत खुश हूं. मुझे तुम से यही उम्मीद थी.’’ ‘‘आती कैसे नहीं, मैं आप की बहुत इज्जत करती हूं. आप के आग्रह को कैसे टाल सकती थी?’’

मैं मन ही मन मुसकराया. शिखा किन परिस्थितियों के कारण यहां आई, यह तो बस मैं ही जानता था. उस के ये संवाद भले ही झूठे थे, पर अपने सफल अभिनय द्वारा उस ने मां को प्रसन्न कर दिया था. यह हमारे बीच हुए समझौते की एक सुखद सफलता थी.

Food Poisoning से बचें : रेस्‍तरां में खाने के बाद मरी महिला, मिडडे मील से 20 बच्‍चे बीमार

तेलंगाना राज्य के निर्मल कस्बे में एक रेस्तरां में खाना खाने के बाद विद्यालय की 19 वर्षीय महिला कर्मचारी की मृत्यु हो गई और साथ ही 4 कर्मी बीमार हो गए. यह घटना हमें खाद्य विषाक्तता के खतरे की ओर ध्यान दिलाती है. खाद्य विषाक्तता अर्थात फूड पायजनिंग एक गंभीर समस्या है जो लापरवाही के कारण आम है.

यह समस्या न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक रूप से भी हमारे समाज को प्रभावित करती है.

दरअसल,खाद्य विषाक्तता के कई कारण हो सकते हैं. इन में से कुछ प्रमुख कारण हैं-

दूषित और संक्रमित खाद्य पदार्थ, खराब भंडारण और परिवहन, अनुचित पकाने की विधि, भोज्य पदार्थों में मिलावट.

इन कारणों से खाद्य पदार्थों में हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस और अन्य जीवाणु प्रवेश कर जाते हैं. और ये जीवाणु हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं. दूषित खाद्य के लक्षण अनेक हो सकते हैं. इन में से कुछ प्रमुख लक्षण हैं:

उल्टी, दस्त, पेट दर्द, बुखार, सिरदर्द.

इन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. यदि आप को इन में से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए.

बावजूद- घटना दर घटना

ऐसी अनेक घटनाएं हमारे आसपास घटित होती जाती हैं इस में जागरूकता के साथसाथ आपसी समझदारी की भी आवश्यकता है. शायद ही ऐसा कोई दिन होता हो जब फूड प्वाइजनिंग की घटना घटित न होती हो. लिए कुछ घटनाओं के परिपेक्ष में हम इस की गंभीरता को समझने का प्रयास करें.

प्रथम घटना – हाल ही में मध्य प्रदेश में दूषित खाद्य खा कर 50 लोग बीमार हो गए. एक शादी समारोह था जहां खाना खाने के बाद 50 व्यक्ति अचानक बीमार हो गए. पता चला कि खाद्य विषाक्तता के कारण यह बीमारी हुई.

द्वितीय घटना – छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के कटोरी नगोई में खाद्य विषाक्तता से 20 स्कूली बच्चे बीमार हो गए. स्कूल में मिड-डे मील खाने के बाद 20 बच्चे बीमार हो गए. जांच में पता चला कि दूषित खाद्य के कारण बच्चे बीमार हो गए.

तृतीय घटना- उत्तर प्रदेश में खाद्य विषाक्तता से 10 लोगों की मौत हो गई. एक गांव में खाना खाने के बाद 10 लोगों की मौत हो गई. जांच में पता चला कि दुषित खाद्य के कारण मौत हुई.

इन घटनाओं से पता चलता है कि खाद्य विषाक्तता के मामलों में कितनी गंभीरता से लेने की आवश्यकता है. सरकार और समाज को मिल कर खाद्य विषाक्तता के खतरे को कम करने के लिए काम करना होगा.

स्वच्छता और स्वच्छता का ध्यान

खाद्य पदार्थों का सही भंडारण और परिवहन खाद्य पदार्थों में मिलावट को रोकने के लिए कानूनी कार्रवाई और सख्त करनी होगी.

सरकार और समाज को मिल कर दूषित खाद्य के खतरे को कम करने के लिए जागरुकता प्रसार का प्रयास करना चाहिए. हमें अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जागरूक और सावधान रहना चाहिए.

दूषित खाद्य के आर्थिक और सामाजिक प्रभाव भी बहुत गहरे हो सकते हैं. इन में से कुछ प्रमुख प्रभाव हैं.

स्वास्थ्य खर्च में वृद्धि,उत्पादकता में कमी,आर्थिक नुकसान, सामाजिक तनाव इन प्रभावों को कम करने के लिए हमें इस के खतरे को गंभीरता से लेना होगा.

खाद्य विषाक्तता एक गंभीर समस्या है जो हमारे देश में आम है. यह समस्या न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक रूप से भी हमारे समाज को प्रभावित करती है.

कानून दर कानून

भारत में दूषित खाद्य के मामलों में कई कानूनी प्रावधान हैं. इन में से कुछ प्रमुख कानून हैं:

बिलासपुर हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बीके शुक्ला के मुताबिक इस संदर्भ में पहले से ही नियम कायदे और कानून हैं जो कुछ इस प्रकार हैं-

1. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006
2. खाद्य सुरक्षा और मानक नियम, 2011
3. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986

अधिवक्ता बीके शुक्ला के मुताबिक इन कानूनों के तहत, खाद्य विषाक्तता के मामलों में दोषी पाए जाने पर:

– जुर्माना तक 10 लाख रुपये
– 6 महीने से 7 साल तक की जेल
– खाद्य लाइसेंस रद्द करना

इस के अलावा, सरकार ने खाद्य विषाक्तता के मामलों में जागरूकता फैलाने के लिए कई अभियान चलाती रहती हैं. इस के बावजूद घटनाएं घटित हो रही है इस का मतलब यह है कि जागरूकता की कमी और लापरवाही इस का प्रमुख कारण है.

थैंक्यू अंजलि: क्यों अपनी सास के लिए फिक्रमंद हो गई अंजलि

सुबह-सुबह मीता का फोन आया, “भैया जी, अम्मा को बुखार हो रहा है. कल से कुछ खापी नहीं रहीं हैं.”

“यह क्या कह रही हो मीता? ऐसा था तो कल ही क्यों नहीं बताया? राकेश ने हड़बड़ा कर कहा.

“असल में अम्मां जी ने ही मना किया था.”

“अम्मां ने मना किया और तुम मान गईं? जानती हो आजकल कैसी बीमारी फैली हुई है? कोरोना का कितना डर है? अच्छा रुको मैं आ रहा हूं.”

बदहवास से राकेश निकलने लगे तो मैं ने पीछे से टोका,” सुनो पहले मास्क पहनिए. पाकेट में सैनिटाइजर रखिए और देखिए प्यार में होश खोने की जरूरत नहीं. चेहरे से मास्क बिल्कुल भी मत हटाना. अगर अम्मां जी को कोरोना हुआ तो फिर इस का खतरा आप को भी हो सकता है न. अम्मां को छूने के बाद याद कर के सैनिटाइजर लगाना और हां अम्मां से थोड़ी दूर ही बैठना.”

राकेश ने थोड़ी नाराजगी से मेरी तरफ देखा तो मैं ने सफाई दी,” अपनी या मेरी नहीं तो कम से कम बच्चों की चिंता तो करो.”

“ओके. चलो मैं आता हूं.” कहते हुए राकेश चले गए.

मैं जानती हूं कि राकेश कहीं न कहीं अम्मा के मसले पर मुझ से नाराज रहते हैं. दरअसल मेरा अपनी सास के साथ हमेशा से 36 का आंकड़ा रहा है. वैसे तो अमूमन सभी घरों में सासबहू के बीच इसी तरह का रिश्ता होता है. मगर मेरे साथ कुछ ज्यादा ही था.

मैं जिस दिन से घर में बहू बन कर आई उसी दिन से अपनी सास के खिलाफ मोर्चा खोल लिया था. सास ने मुझे सर पर पल्लू रखने को कहा पर मैं ने उन की नहीं सुनी. सास ने मुझे नॉनवेज से दूर रहने को कहा मगर मैं ने यह बात भी स्वीकार नहीं की क्यों कि मैं अपने घर में अंडा मछली खाती रही हूं. सास पूजापाठ में लिप्त रहतीं और मुझे यह सब अंधविश्वास लगता. सास जरूरत से ज्यादा सफाई पसंद थीं जबकि मैं बेफिक्र सी रहने की आदी थी. मैं खुद को एक प्रगतिशील स्त्री मानती थी जबकि सासू मां एक रूढ़िवादी महिला थीं. इन सब के ऊपर हमारे बीच विवाद की एक वजह राकेश भी थे. हम दोनों ही राकेश से बहुत प्यार करते थे और इसी उलझन में रहते थे कि राकेश किसे अधिक प्यार करते हैं.

मैं मानती हूं कि अम्मां जी ने बचपन से राकेश को पालापोसा और प्यार दिया. इसलिए उन के प्यार पर पहला हक अम्मां का ही है. मगर कहीं न कहीं मेरा यह मानना भी है कि शादी के बाद पति को अपनी मां का पल्लू छोड़ देना चाहिए और उस स्त्री के प्रति अपना दायित्व निभाना चाहिए जो उस के लिए अपना घरपरिवार छोड़ कर आई है.

मुझे सास की हर बात में टोकाटाकी भी पसंद नहीं थी. हमारी शादी के 2 साल बाद मोनू हो गया और फिर गुड्डी. गुड्डी उस वक्त करीब 3 साल की थी जब मैं ने राकेश से अलग घर लेने की जिद की.

राकेश ने बहुत समझाया ,”देखो अंजलि, बड़े भैया बरेली में हैं और छोटे भैया मुंबई में. अम्मां बाबूजी के पास में ही हूं. ऐसे में हमारा इन दोनों को अकेला छोड़ कर जाना उचित नहीं.”

मगर मैं अड़ी रही,” अरे वाह दोनों बड़े भाइयों को अपने मांबाप की नहीं पड़ी. केवल तुम ही श्रवण कुमार बनते फिरते हो. तुम्हारी दोनों भाभियां ऐश कर रही हैं और बीवी घुटघुट कर मरने को विवश है. देखो तुम ने मेरी बात नहीं मानी न तो मैं हमेशा के लिए अपनी मां के घर चली जाऊंगी.  फिर संभालते रहना अपने बच्चों को.”

मेरी धमकी का असर हुआ. राकेश ने पुराने घर के पास ही एक नया घर खरीदा. अम्मां बाबूजी को पुराने घर में छोड़ कर हम यहां शिफ्ट हो गए.

भले ही राकेश ने मेरी बात मान ली मगर हम दोनों के बीच एक अदृश्य दीवार भी खड़ी हो गई थी. राकेश के दिल में मेरे लिए पहले जैसा प्यार नहीं रह गया था. वह केवल पति का दायित्व निभा रहा थे.

इस बात को 4 साल बीत चुके हैं. पिताजी भी दो साल पहले गुजर गये. अब अम्मां उस घर में नौकरानी मीता के साथ अकेली रहती हैं. मुझे इस बात का एहसास है कि अम्मां के लिए अकेले रहना काफी कठिन होता होगा. मगर न मैं ने कभी उन्हें लाने की बात की और न कभी अम्मां ने ही कोई शिकायत की.

राकेश अंदर ही अंदर अम्मां के प्रति खुद को अपराधी महसूस करते हैं पर इस संदर्भ में मुझ से कुछ कहते नहीं.

आज अम्मां की बीमारी के बारे में सुन कर जैसे राकेश ने मुझे भेजती नजरों से देखा था इस से जाहिर था कि वे इन सारी बातों के लिए मुझे ही कसूरवार मान रहे थे.

मैं बेसब्री से राकेश के लौटने का इंतजार कर रही थी. कहीं न कहीं अम्मां को ले कर मुझे भी चिंता होने लगी थी. आखिर वे बुजुर्ग हैं और बुजुर्गों के लिए कोरोना ज्यादा घातक सिद्ध हो रहा था.

मैं ने राकेश को फोन कर अम्मां के बारे में जानना चाहा तो राकेश ने संक्षेप में जवाब दिया,” अम्मां को तेज बुखार है. मैं ने एंबुलेंस वाले को फोन कर दिया है. बस वे आने ही वाले हैं. फिर मैं अम्मा को ले कर हॉस्पिटल निकल जाऊंगा. सारा इंतजाम कर के और कोरोना का टेस्ट करवा कर ही लौटूंगा. मीता ने बताया है कि अम्मां से मिलने शर्मा जी का लड़का आया था जो कुछ दिन पहले विदेश से लौटा था. ”

“ठीक है मगर जरा ध्यान से. प्लीज अपना भी ख्याल रखना.”

“हूं ठीक है.” कह कर राकेश ने फोन काट दिया. मेरे दिल में खलबली मची हुई थी, अम्मां को सच में कोरोना निकला तो? उन्हें कुछ हो गया तो ? राकेश तो मुझे कभी भी माफ नहीं करेंगे. इधर मुझे यह डर भी लग रहा था कि कहीं अम्मां के कारण कहीं राकेश भी बीमारी ले कर घर न आ जाएं.

शाम ढले राकेश वापस लौटे.

“क्या हुआ? अम्मां कैसी हैं और आप ने अपना ध्यान तो रखा? मास्क हटाया तो नहीं ? हाथों में सैनिटाइजर तो लगाते रहे न? अम्मां की रिपोर्ट कब तक आएगी?किस हॉस्पिटल में एडमिट किया है?”

मैं ने सवालों की झड़ी लगा दी तो वे मुंह बनाते हुए बाथरूम में नहाने चले गए.

मैं ने खुद को शांत किया और फिर एकएक कर के सवाल पूछे. राकेश ने बताया कि रिपोर्ट 36 घंटे में आ जाएगी और तब तक अम्मां एडमिट रहेगीं.

रात में सोते समय राकेश ने मुझ से सवाल किया,”दोतीन महीने पहले तुम ने अम्मां से उन का पुश्तैनी सोने का हार मांगा था?”

सवाल सुन कर मैं सकते में आ गई,” हां मैं ने तो बस सुरक्षा के लिहाज से कहा था. असल में मुझे लगा कि बाबूजी भी नहीं हैं और अम्मा अकेली रहती हैं. ऐसे में कहीं हार चोरी न हो जाए.”

“क्या बात है अंजलि, हार के जाने का डर है तुम्हें पर अम्मां के जाने का कोई डर नहीं? “कह कर राकेश उठ कर दूसरे कमरे में चले गए.

मैं अम्मां को मन ही मन बुराभला कहने लगी, कैसी हैं अम्मा भी? बीमारी में भी मेरे खिलाफ अपने बेटे के कान भरने से बाज नहीं आईं. मैं ने बुरा सा मुंह बनाया और लेट गई.

तब तक राकेश एक ज्वैलरी बॉक्स ले कर अंदर आए,” यह लो अंजलि, अम्मा ने यह हार तुम्हारे बर्थडे के लिए तैयार कराया था. अपने पुश्तैनी हार मेंअपने अब तक के बचाए हुए रुपए लगा कर यह भारी हार बनवाया है तुम्हारे लिए. यह हीरे की अंगूठी मेरे लिए, यह कंगन गुड्डी और यह घड़ी मोनू के लिए.”

कहते कहते राकेश फफकफफक कर रोने लगे थे. मेरी आंखों में भी आंसू छलक आए. तोहफे में हार दे कर अम्मां ने मुझे हरा दिया था.

तभी राकेश ने रुंधे हुए स्वर में फिर कहा,” जानती हो अम्मां ने यह सब देते हुए क्या कहा? वे बोलीं कि बेटा क्या पता मुझे कहीं कोरोना हो और मैं लौट कर न आ सकूं. ऐसे में अंजलि को जन्मदिन पर अपने हाथों से नहीं दे पाऊंगी इसलिए तू ही उसे दे देना. आखिर वह भी है तो मेरी बच्ची ही न.”

मैं निशब्द जमीन को एकटक निहार रही थी. शायद अम्मा के प्रति आज तक के अपने व्यवहार पर शर्मिंदा थी. राकेश सोने चले गए मगर मैं रात भर करवटें बदलती रही. मेरी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे. मैं सोचती रही अम्मां मेरा इतना ख्याल रखती हैं और मैं ही हमेशा उन के बारे में गलत सोचती रही हूं. यह बात मुझे अंदर से बेधे जा रही थी.

किसी तरह 36 घंटे बीते. राकेश ने फोन कर के बताया कि अम्मां को कोरोना नहीं है. सिंपल बुखार है जो अब लगभग ठीक हो चुका है.”

मेरी आंखों से खुशी के आंसू बह निकले. मैं ने राकेश से कहा, सुनो अम्मां जैसे ही हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हों तो उन्हें हमारे घर ले कर आना. उन्हें देखभाल की जरूरत है और फिर कोरोना फैल रहा है. वे खुद अपनी सुरक्षा का ख्याल नहीं कर पाएंगी. मैं उन का ख्याल रखना चाहती हूं हमेशा. … वैसे भी आखिर मैं हूं तो उन की बच्ची ही न. ” कहते कहते मैं रो पड़ी थी.

राकेश गदगद स्वर में इतना ही बोल पाए,” थैंक्यू अंजलि.”

Bollywood : दीवाली का फायदा नहीं उठा सकी बिग बजट की ‘Singham Again’, ‘Bhul Bhulaiyaa 3

इस बार दिवाली के अवसर पर एक नवंबर को रोहित शेट्टी निर्देशित फिल्म ‘सिंघम अगेन’ और अनीस बज़मी निर्देशित फिल्म ‘भूल भुलैया 3’ एक साथ रिलीज हुई. इन दोनों औसत दर्जे की फिल्मों ने एक ही दिन सिनेमाघरों में आ कर आपस में टकराते हुए अपना नुकसान ही किया है,जबकि 8 नवंबर और 15 नवंबर को एक भी बड़ी फिल्म प्रदर्शित नहीं हो रही है. अगर इन दोनों फिल्मों के निर्माता आपस में बात कर  अलगअलग सप्ताह में अपनी फिल्म ले कर आते,तो दोनों को फायदा होता. नवंबर माह के पहले सप्ताह ‘भूल भ्रुलैया 3’ और ‘सिंघम अगेन’ ने जो कमाई की है,उस की वजह इन फिल्मों का बेहतरीन होना कदापि नहीं है, बल्कि 2024 के पूरे साल में दर्शक सिनेमा देखने के लिए प्यासा था, तो छुट्टियों के वक्त वह इन फिल्मों को देखनेे चला गया.

दिवाली के अवसर पर 15 दिनों के लिए स्कूल,कालेज भी बंद चल रहे हैं. इस के अलावा दिवाली की शुक्रवार, शनीवार, रवीवार को छुट्टी रही, रवीवार के दिन ‘भाई दूज’ का त्योहार भी रहा. पर कमाई के आंकड़ों में बड़ा घाल मेल होने के आरोप भी लग रहे हैं.

भारतीय सिनेमा के इतिहास में और कम से कम मेेरे 42 साल के फिल्म पत्रकारिता के वक्त जिस तरह की गला काट प्रतिस्पर्धा ‘सिंघम अगेन’ और ‘भूलभुलैया 3’ के निर्माताओं के बीच नजर आई, वह इस से पहले कभी नहीं हुआ. इस की अपनी वजहें रही हैं.

पहले बात रोहित शेट्टी निर्देशित एक्शन प्रधान फिल्म ‘सिंघम अगेन’ की. ‘सिंघम अगेन’ का निर्माण रोहित शेट्टी,अजय देवगन और मुकेश अंबानी की कंपनी ‘जियो स्टूडियो’ ने किया है. अजय देवगन पिछले कई वर्षों से लगातार असफलता का दंश झेलते आ रहे हैं. बतौर अभिनेता तो छोड़िए, पिछले 4 वर्ष के अंतराल में अजय देवगन की बतौर निर्माता, जिन में मुख्य भूमिका अजय देवगन ने निभाई, ‘छलांग’, ‘द बिग बुल’, ‘भुज द प्राइड आफ इंडिया’, ‘रन वे 34’, ‘भोला’, ‘शैतान’, ‘औरों में कहां दम था’ जैसी 7 असफल फिल्में दे चुके हैं. तो वहीं बतौर निर्माता व निर्देशक रोहित शेट्टी पिछले एक वर्ष में ‘सर्कस’ और ‘इंडियन पोलिस फोर्स’ की बुरी तरह से असफलता का दंश झेलते आ रहे हैं. ऐसे में अजय देवगन और रोहित शेट्टी ने साम दाम दंड भेद की नीति अपना कर अपनी फिल्म ‘सिंघम अगेन’ को सफलतम फिल्म साबित करवाने के सारे प्रयास कर डाले, पर उन्हें सफलता हाथ लगी हो, ऐसा कहना मुश्किल है.

रोहित शेट्टी ने ‘सिंघम अगेन’ में अजय देवगन, करीना कपूर खान, रणवीर सिंह, दीपिका पादुकोण, अक्षय कुमार, टाइगर श्राफ जैसे स्टार कलाकारों की फौज खड़ी कर डाली, पर वह यह भूल गए कि यह सभी स्टार कलाकार पिछले 5 – 6 वर्ष से लगातार असफल फिल्में ही दे रहे हैं. अभी कुछ दिन पहले ही अक्षय कुमार और टाइगर श्राफ की जोड़ी की फिल्म ‘छोटे मियां बड़े मियां’ बाक्स आफिस पर बुरी तरह से मात खा चुकी है. रणवीर सिंह पिछले 4 साल से एक आध फिल्म छोड़ कर घर पर बैठ कर मक्खी मार रहे हैं. रणवीर सिंह के साथ कोई भी फिल्मकार फिल्म बनाने के लिए तैयार नहीं है. इतना ही नहीं अजय देगवन व रोहित शेट्टी ने ‘सिंघम अगेन’ में धर्म, हनुमान, ‘रामायण’ को बेचने के साथसाथ ‘अंध भक्तों’ को लुभाने के लिए फिल्म के अंदर ‘जय श्री राम’ के नारे लगवाने, हनुमान चालीसा का पाठ, शिव तांडव स्तोत्र का पाठ सहित सब कुछ कर डाला. पर कुछ भी काम नहीं आया. काश रोहित शेट्टी और उन के 9 लेखकों ने यह सब करने में पैसा व ताकत बरबाद करने की बजाय फिल्म की कहानी, पटकथा व संवाद पर मेहनत कर एक मनोरंजक फिल्म बनाई होती तो आज बाक्स आफिस पर फिल्म की दर्गति नही होती.

‘सिंघम अगेन’ में कहानी नहीं है. संवाद चेारी के हैं. यह फिल्म दिमागी टार्चर है. इसे 15 मिनट से ज्यादा झेलना दर्शक के लिए मुश्किल हो रहा है. वास्तव में ‘सिंघम अगेन’ रोहित शेट्टी की बजाय एक ऐसे फिल्मकार की फिल्म है, जो कि पूरी तरह से सत्ता के तले दबा और मजबूर नजर आता है. ‘सिंघम अगेन’ एक अति घटिया प्रपोगंडा और सरकार परस्त फिल्म है.

‘आदिपुरूष’ की ही तरह इस फिल्म में भी रावण को मुसलिम किरदार के रूप में पेश करते हुए ‘राम’ के हाथों मरवा कर यही बात कहने का प्रयास किया गया कि मुस्लिम हत्या करने योग्य हैं. क्या एक फिल्मकार को इस तरह के दृश्य गढ़ना शोभा देता है. इस के बावजूद जिस तरह के निर्माता की तरफ से पहले दिन से ही बाक्स आफिस के आंकड़े पेश किए जा रहे हैं, उसे देख कर इन आंकड़ों की सचाई पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. केआरके ने तो खुलेआम ट्वीट कर कई आरोप लगाए हैं.

इतना ही नहीं ‘सिंघम अगेन’ को ‘भूल भुलैया 3’ से ज्यादा सफल फिल्म साबित करवाने के लिए रोहित शेट्टी ने ‘सिंघम अगेन’ का डिस्ट्रीब्यूटर ‘पीवीआर आयनौक्स’ को ही बनाया और 60 प्रतिशत स्क्रीन्स पर केवल ‘सिंघम अगेन’ को ही रिलीज किया. ‘भूल भुलैया 3’ को महज 40 प्रतिषत स्क्रीन्स मिले.

इतना ही नहीं रामानंद सागर के पोते शिव सागर एक सीरियल ‘कागभुसुंडी रामायण’ ले कर आ रहे हैं, तो ‘सिंघम अगेन’ के ही बैकड्राप पर खड़े हो कर अजय देवगन ने ‘कागभूसुंडी रामायण’ सीरियल देखने की वकालत करते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया पर जारी कर ‘सिंघम अगेन’ की तरफ लोगों का ध्यान खींचने का प्रयास किया.

इस के बावजूद 375 करोड़ रूपए की लागत में बनी ‘सिंघम अगेन’ 7 दिनों के अंदर महज 173 करोड़ रूपए ही बाक्स आफिस पर एकत्र कर सकी, इस में से निर्माता की जेब में आएंगे लगभग 90 करोड़ रूपए. अब अंदाजा लगा लें कि साम दाम दंड भेद की नीति अपनाने के साथ ही धर्म को बेच कर भी ‘सिंघम अगेन’ कितनी सफल हुई?

173 रूपए बाक्स आफिस कलेक्शन का दावा निर्माता ने किया है, जबकि आरोप है कि यह आंकड़े गलत हैं. उन पर कौरपोरेट बुकिंग करवाने, फिल्म से जुड़े हर कलाकार व निर्माता द्वारा टिकटें खरीद कर मुफ्त में बांटने सहित कई आरोप लग रहे हैं. मजेदार बात यह है कि ‘सिंघम अगेन’ का डिस्ट्रीब्यूशन ‘वीवीअर आयनौक्स’ के पास है. निर्माता की तरफ से दावे किए जा रहे हैं कि फिल्म अच्छा कमा रही है. तो फिर एक नवम्बर के बाद ‘पीवीआर आयनौक्स’ के शेयर के दाम 5 से 7 प्रतिशत तक क्यों गिरे? यदि फिल्म कमा रही है,तो फिर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के शेयर के दामों में उछाल आना चाहिए. इस का जवाब तो फिल्म के निर्माता और पीवीआर आयनौक्स ही बेहतर दे सकता है.

अब बात टीसीरीज निर्मित और अनीस बज़मी निर्देशित हौरर कौमेडी फिल्म ‘भूल भुलैया 3’ की, जिस में कार्तिक आर्यन, माधुरी दीक्षित, विद्या बालन, तृप्ति डीमरी, राजपाल यादव, संजय मिश्रा जैसे कलाकार हैं. यह फिल्म भी मौलिक नहीं बल्कि 2007 में प्रदर्शित प्रियदर्शन निर्देशित व अक्षय कुमार और विद्या बालन के अभिनय से सजी फिल्म ‘भूल भुलैया’ का तीसरा भाग है. इस का दूसरा भाग 15 वर्ष बाद 2022 में ‘भूल भुलैया 2’ के नाम से आया था, जिस का निर्देशन अनीस बज़मी ने किया था.

इस फिल्म में कार्तिक आर्यन के साथ तब्बू थीं. फिल्म को अच्छी सफलता मिल गई थी. इसी सफलता को भुनाने के लिए निर्माता टीसीरीज और निर्देशक अनीस बज़मी ‘भूल भुलैया 3’ लेकर आ गए. ‘भूल भुलैया 3’ भी औसत दर्जे की ही फिल्म है, पर ‘सिंघम अगेन’ के मुकाबले 10 प्रतिशत अच्छी कही जा सकती है. लेकिन ‘भूलभुलैया 3’ में भी धर्म व अंधविश्वास को बढ़ावा देने के साथ ही जितने मसाले हो सकते थे, उन्हें जबरन ठूंसा गया है. कार्तिक आर्यन से ले कर विद्या बालन, माधुरी दीक्षित, राजपाल यादव व संजय मिश्रा के अभिनय में काफी कमियां नजर आती हैं.

2007 की फिल्म ‘भूल भुलैया’ के मुकाबले ‘भूल भुलैया 3’ 10 प्रतिशत भी नहीं है. मगर 150 करोड़ रूपए की लागत में बनी फिल्म ‘भूल भुलैया 3’ ने 7 दिन में 168 करोड़ 80 लाख रूपए बाक्स आफिस पर एकत्र किए हैं. इस में से निर्माता की जेब में लगभग 80 करोड़ रूपए जा सकते हैं. मगर यह आंकड़े वह हैं, जो कि निर्माता की तरफ से पेश किए जा रहे हैं, जिन्हें कोई सच मानने को तैयार नहीं है. इस फिल्म के निर्माताओं पर भी कौरपोरेट बुकिंग, फर्जी आंकड़े देने से ले कर टिकटें खरीद कर मुफ्त में बांटने के आरोप लग रहे हैं. सब से बड़ा आरेाप तो कार्तिक आर्यन और उस की पीआर टीम पर लग रहा है कि इन्होंने अपनी जेब से पैसे खर्च कर जम कर टिकटें खरीदी हैं.

‘सिंघम अगेन’ की ही तरह ‘भूल भुलैया 3’ के निर्माता ने भी अपनी चालें चलीं. टीसीरीज ने ‘सिंघम अगेन’ के खिलाफ ‘कम्पटीशन कमीशन औफ इंडिया’ में शिकायत दर्ज करवाने के अलावा ‘सिंघम अगेन’ के गाने को ‘यूट्यूब’ से हटवाने तक काफी कुछ किया. तो दूसरी तरफ अभिनेता कार्तिक आर्यन और उन की पीआर टीम एक अलग ही ढर्रे पर काम करती नजर आ रही है. कार्तिक आर्यन और उन की पीआरटीम इस झूठ को साबित करने पर आमादा है कि कार्तिक आर्यन एक मात्र ऐसे कलाकार हैं, जो कि नेपोकिड नहीं हैं.केवल अपनी अभिनय प्रतिभा के बल पर ‘भूलभलुलैया 3’ को सफलता दिलाई है. इस बात को साबित करने के लिए कार्तिक आर्यन व उन की पीआर टीम तो आम दर्शकों को नीचा दिखाने व उन्हें नुकसान पहुंचाने से भी बाज नहीं आ रहे हैं.

कार्तिक आर्यन अपनी पीआर टीम के साथ कई सिनेमाघरों में जा रहे हैं. वहां पहुंच कर वह जिस तरह की हरकतें कर रहे हैं, वह किसी भी कलाकार या किसी भी सभ्य इंसान के लिए सही नहीं कही जा सकती.

सोमवार, 4 नवंबर को मुंबई के बांदरा स्थित गेइटी ग्लैक्सी सिनेमाघर पर कार्तिक आर्यन अपनी कार में बैठ कर पहुंचे और जब उन्हें देखने के लिए हजारों लोग इकट्ठा हो गए, तब कार्तिक आर्यन अपनी कार से बाहर निकल कर अपनी कार के ऊपर खड़े हो कर डांस करते हुए अपनी फिल्म ‘भूल भलैया 3’ को सर्वश्रेष्ठ फिल्म बताने के लिए काफी कुछ नौटंकी की, उस के बाद वह सिनेमाघर के अंदर भी गए, जहां फिल्म ‘भूल भुलैया 3’ दिखाई जा रही थी. ऐसा करते समय उन की सुरक्षा में लगे उन के निजी बाउंसरों और उन की पीआर टीम के कुछ लोगों ने महिलाओं के साथ धक्कामुक्की भी की. छोटे बच्चों को चोट भी आई.

कार्तिक आर्यन ने अपनी कार के ऊपर खड़े हो कर जो कुछ किया, उस से उन्हें भी चोट लग सकती थी. मगर खुद को महान बताने के नशे में सवार कार्तिक आर्यन व उन की पीआर टीम को खुद समझ में नहीं आ रहा है कि वह किस गलत राह पर चल रहे  हैं. कार्तिक आर्यन के वहां से विदा लेेते ही कई महिलाएं शिकायत करने गेईटी ग्लैक्सी मल्टीप्लैक्स के मैनेजिंग डायरेक्टर मनेाज देसाई के पास शिकायत दर्ज कराने पहुंच गई. उस के बाद मनोज देसाई ने कुछ चैनलों से बातचीत करते हुए कहा कि कार्तिक आर्यन सहित हर कलाकार को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि आम दर्शकों को नुकसान न पहुंचे.

मनोज देसाई ने कार्तिक आर्यन के कार पर खड़े हो कर जो कुछ किया, उसे भी गलत बताया.

कार्तिक आर्यन की पीआर टीम की तरफ से उन्ही समोसा क्रिटिक्स से कार्तिक आर्यन के पक्ष में अजीबोगरीब किस्म के लेख छपवाए जा रहे हैं. जिन समोसा क्रिटिक्स को पैसे दे कर कुछ भी लिखवाते रहने की बात करण जोहर कबूल कर चुके हैं.

चश्मा: एस्थर ने किया पाखंडी गुरूजी को बेनकाब

आज एस्थर का ससुराल में पहला दिन था. उस ने सोचा जब परिवार के हर सदस्य ने उसे खुले दिल से अपनाया है तो क्यों ना वह भी उन के ही रंग में रंग जाए और उन जैसा ही बन कर सब का दिल जीत ले. यही सोच वह भोर होने से पहले अपनी सासूमां सुनंदा की भांति ही जाग गई.

रोज सुबह 8 बजने जागने वाली एस्थर आज अलार्म लगा कर 5:30 बजे ही जाग गई. घर के सभी लोगों की सुबह की शुरुआत चाय से होती है, इसलिए वह चाय बनाने के लिए रसोईघर की ओर चल पड़ी.

उस ने कभी सोचा ही नहीं था की पराग का परिवार इतनी सहजतापूर्वक उस की और पराग की शादी के लिए स्वीकृति प्रदान कर देगा और उसे पूरे दिल से अपना लेगा, क्योंकि अकसर पराग की बातों से उसे ऐसा प्रतीत होता था कि उस का परिवार एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार है पर कल के रिसैप्शन पार्टी में एस्थर का यह भ्रम टूट गया. उसे एक पल के लिए भी यह महसूस नहीं हुआ कि वह किसी दूसरे धर्म या समुदाय में ब्याही है.

जाति, धर्म कभी भी प्यार एवं स्नेह के बीच दीवार नहीं बन सकते, पराग के परिवार ने इस बात पर मुहर लगा दी थी.

यही सब सोचती हुई अभी वह रसोईघर में प्रवेश करने ही वाली थी कि सुमित्रा बुआ जोरजोर से चिल्लाने लगीं,”अरे…अरे… बहुरिया यह क्या अनर्थ करने जा रही हो…”

सुमित्रा बुआ अपना ससुराल छोड़ कर यहां मायके में डेरा डाले बैठी हैं. सुबहसुबह ही जाग जाती हैं और अकसर माला फेरने का ढोंग रचा हौल में धुनी रमाए बैठ जाती हैं. आज भी वह अपना आसन जमाए बैठी हुई थीं.

असल में उन का सुबह से ले कर रात तक केवल इस बात पर पूरा ध्यान रहता है कि घर में कौनकौन सदस्य क्याक्या कर रहा है? भगवान की अराधना तो सब एक आडंबर मात्र ही थी.

बुआ का चिल्लाना सुन सुनंदा दौड़ती हुई बाथरूम से वहां आ ग‌ई. एस्थर भी सुमित्रा बुआ को इस तरह चिल्लाता देख पूरी तरह से स्तब्ध रह गई और डर कर रसोईघर के दरवाजे पर ही ठिठक गई.

सुनंदा कुछ पूछती इस से पहले ही सुमित्रा बुआ गुर्राती हुईं एस्थर से बोलीं,”इस घर पर पांव धर कर तुम पहले ही हमारे भैया की जातबिरादरी में नाक कटा चुकी हो. कुल तो भ्रष्ट कर ही दिया है और अब बिन नहाए भीतर जा कर हमारा धर्म भी भ्रष्ट करने का इरादा है क्या? कुछ नियम, धर्म है कि नहीं? वैसे भी तुम्हें मोमबत्ती जलाने के अलावा कुछ मालूम ही क्या होगा पर भौजी तुम… तुम को तो इतना वर्ष हो गया है इस घर में आए फिर भी अब तक तुम हमारे घर का नियम जान नहीं पाईं क्या?

“अपनी बहुरिया को तनिक ज्ञान दो, उस को इस घर के तौरतरीके सिखाओ, बताओ उस को इस घर में क्या होता है क्या नहीं. तुम पुत्रमोह में इतनी अंधी हो गई हो कि सब भूल ग‌ईं?”

यह सुन एस्थर सहम सी गई. वह कुछ समझ ही नहीं पाई कि आखिर उस से क्या चूक हो गई कि जो बुआ कल रात तक सभी के समक्ष उस की बलाईयां लेते हुए नहीं थक रही थीं, आज अचानक सुबह होते ही ऐसा क्या हो गया कि तीखे और कड़वे वचन उगल रही है.

सुनंदा लड़खड़ाती जबान में बोलीं,”दीदी, उस का घर में आज पहला दिन है धीरेधीरे सब सीख जाएगी. आप चिंता ना करें, मैं स्वयं उसे सब बता दूंगी. इस बार माफ कर दीजिए.”

“हां…. सिखाना तो अब पड़ेगा ही. केवल विजातीय बहू नहीं लाया है तुम्हारा लाडला बेटा, बल्कि गैर धर्म की लड़की ही घर उठा लाया है.”

यह सुन सुनंदा वहां से चुपचाप जाती हुई एस्थर को भी अपने संग चलने का इशारा कर गई. एस्थर भी सुनंदा के पीछे हो ली.

एक कोने में जा कर सुनंदा अपना हाथ एस्थर के सिर पर रखती हुई बोलीं,”दीदी के बातों का बुरा नहीं मानना. उन की जबान ही थोड़ी कड़वी है लेकिन वह दिल की बहुत अच्छी हैं. तुम एक काम करो पहले नहा लो, तब तक मैं पूजा कर लेती हूं फिर दोनों मिल कर चायनाश्ता बनाते हैं,” इतना कह सुनंदा चली गई.

*एस्थर* को सुबहसुबह नहाने की आदत नहीं है पर वह क्या करे ससुराल वालों का दिल जीतना बहुत जरूरी है क्योंकि पराग पहले ही कह चुका है कि उस की वजह से परिवार के लोगों को किसी प्रकार की कोई शिकायत का मौका नहीं मिलना चाहिए वरना वह उस की कोई मदद नहीं कर पाएगा.

घर के सदस्यों के प्रति नकारात्मक विचारों की बेल एस्थर के मन को जकड़ने लगे जिन्हें वह झटक नहाने चली गई और जब वह तैयार हो कर पहुंची तो उस ने देखा सासूमां ने सभी के लिए चायनाश्ता बना लिया है और सभी बैठक में नाश्ते के साथ चाय की चुसकियां ले रहे हैं.

सुनंदा बेचारी भागभाग कर सभी के प्लेट्स पर कभी कचौड़ियां परोस रही थीं तो कभी चटनी. कोई मीठी चटनी की फरमाइश कर रहा था तो कोई हरी धनिया की चटनी, पर उन की मदद कोई नहीं कर रहा. यहां तक कि उन की अपनी बेटी शिल्पी भी उन का हाथ बंटाने के बजाय उलटा उन से दोपहर पर बनने वाले खाने की सूची में अपनी फरमाइश जोड़ रही थी.

यह सब देख एस्थर अंदर ही अंदर क्रोध से भर गई पर स्वयं पर संयम रखती हुई शांत खड़ी रही. वह काफी देर तक वहां खड़ी रही लेकिन किसी ने भी उस से कुछ नहीं कहा.

सभी इस प्रकार व्यवहार कर रहे थे जैसे वह वहां पर उपस्थित ही नहीं है. यहां तक कि पराग ने भी उसे अनदेखा कर दिया.

सब का रवैया देख एस्थर की आंखें नम हो गईं पर किसी को भी इस बात का आभास तक नहीं हुआ, तभी सुनंदा बोलीं,”एस्थर तुम भी चाय पी लो.”

सुनंदा का इतना कहना था कि पराग की दादी, सुमित्रा बुआ की मां, सुनंदा की सासूमां और इस घर की मुखिया गायत्री देवी भड़कती हुई सुनंदा से बोलीं,”बहू, अब तुम इस घर की केवल बहू ही नहीं रहीं सास भी बन गई हो, तो इस बात का ध्यान रखना तुम्हारी जिम्मेदारी है कि गलती से भी कोई चूक ना हो. यह तुम्हारा मायके नहीं है जहां कुछ भी चल जाएगा.”

“जी मां जी,” सुनंदा ने सिर झुकाए हुए ही जवाब दिया.

तभी फिर दोबारा गायत्री देवी अपने रोबदार आवाज में बोलीं,”आज मैं ने अपने गुरु महाराज को घर पर बुलाया है. उस की सारी व्यवस्था तुम कर लेना. पूजा की सारी सामग्री गुरू महाराज स्वयं ही ले आएंगे. उन्होंने कहा है कि आज वे घर के साथसाथ इस छोरी का नामकरण और शुद्धिकरण भी करेंगे.”

इतना सुनते ही माला फेरतीं सुमित्रा बुआ अपनी ईश्वर अराधना पर अल्पविराम लगाते हुए बोलीं,”अम्मां, नामकरण… भला क्यों?”

“अरे भई, इस छोरी का नाम जो इतना विचित्र है पुकार लो तो ऐसा लगे है जैसे जबान ही पूरी अशुद्ध हो गई हो और फिर गुरु महाराज ने भी कहा है कि नाम बदलने से ही पराग का वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहेगा अन्यथा नहीं और उन्होंने यह भी कहा है कि हमारे कुल और पूर्वज पर जो इस छोरी की वजह से कलंक लगा है वह धुल जाएगा और हमारे पूर्वजों को वहां परलोक में किसी प्रकार की कोई यातना नहीं सहनी पड़ेगी. शिल्पी की शादी हेतु भी ग्रहशांति करने का कह रहे थे गुरूजी.

“मोहन, तुम जल्दी बैंक जा कर ₹1 लाख निकाल लाना. पूजा में जरूरत पड़ेगी.”

₹1 लाख सुनते ही पराग के पिता और गायत्री देवी के पुत्र मोहनजी के कान खड़े हो गए और उन्होंने आश्चर्य से कहा, “अम्मां ₹1 लाख वह भी पूजा के लिए… बहुत ज्यादा नहीं है क्या?”

“बहुत ज्यादा कहां है भैया…यह तो बहुत ही कम है. इस प्रकार की पूजा में ₹1-2 लाख खर्च हो जाते हैं. वह तो गुरू महाराज की हम सब पर कृपा एवं उन का आशीष है और फिर अम्मां उन की परमभक्त हैं इसलिए इतने कम में सब काम हो रहा है वरना आप और भाभी ने तो जो अपने पुत्रमोह में इस गैर धर्म की छोरी को बहू बना कर घर ले आए हैं उस के लिए तो आजीवन आप को और इस घर के पूर्वजों को सदा के लिए कष्ट भोगना पड़ता.”

यह सुन पराग बोला,”पापा, आप चिंता ना करें, मैं अपने अकाउंट से रुपए निकाल लूंगा.”

एस्थर आश्चर्य से पराग की ओर देखने लगी. उस ने आज से पहले कभी पराग का यह अंधविश्वासी अवतरण नहीं देखा था. उस ने कभी सोचा नहीं था कि इतना पढ़ालिखा और आधुनिकता का आवरण ओढ़ने वाला यह पूरा परिवार असल में पूर्ण रूप से अंधविश्वास के गिरफ्त में जकड़ा हुआ होगा.

*वह* विचार करने लगी कि इतना रूढ़िवादी और अंधविश्वासी परिवार ने उसे स्वीकार किया तो किया कैसे?

असल में वह इस सत्य से अनभिज्ञ थी कि इस ब्राह्मण परिवार का उसे अपनाना एक पाखंड था. वह तो बस यह नहीं चाहते थे कि उन का इकलौता कमाऊ बेटा शादी कर के अलग हो जाए क्योंकि अभी उन की छोटी बेटी की भी शादी होनी बाकी थी जिस में दहेज लगना था और एस्थर स्वयं भी एक कमाऊ मुरगी थी जिस का वह भरपूर इस्तेमाल कर सकते थे. इसलिए उन्होंने एस्थर को अलग धर्म का होते हुए भी अपनाने का स्वांग रचा.

इन सब बातों के बीच सहसा एस्थर को ऐसा एहसास हुआ जैसे गुरू महाराज और ग्रह शांति की बातें सुन सासूमां सुनंदा के चेहरे का रंग उड़ गया है और शिल्पी भी थोड़ी घबराई एवं असहज लगने लगी है.

अब तक जो लड़की हंसखेल रही थी, मुसकरा रही थी अचानक वह वहां से उठ कर चली गई और उसे इस प्रकार जाता देख सुनंदा भी उस के पीछे हो गईं.

दोनों को इस तरह परेशान देख एस्थर भी वहां से चली गई. जब वह शिल्पी के कमरे के करीब पहुंची तो उस ने सुना शिल्पी कह रही है,”अम्मां, मैं पूजा में ग्रहशांति हेतु नहीं बैठूंगी चाहे मेरी शादी हो या ना हो.”

सुनंदा उसे समझाने का प्रयत्न करते हुए कह रही थीं,”देखो शिल्पी, अम्मांजी ने गुरू महाराज को तुम्हारे ग्रहशांति हेतु पहले ही कह दिया है इसलिए इस बार तो तुम्हें बैठना ही होगा और फिर इस में तुम्हारा ही भला है. इस पूजा से तुम्हें अच्छा घरपरिवार मिलेगा.”

माजरा क्या है यह जानने के लिए एस्थर कमरे के अंदर जा अपनी सासूमां सुनंदा से बोली,”क्या बात है मम्मीजी, शिल्पी ग्रहशांति के नाम से इतना रो क्यों रही है?”

सुनंदा ने कोई जवाब नहीं दिया बस वह लगातार शिल्पी को पूजा पर बैठने के लिए मना रही थी.

तभी शिल्पी चिढ़ती और जोर से चिल्लाती हुई बोली,”अम्मां, आप समझती क्यों नहीं. पूजा के बाद हर बार मैं बेहोश हो जाती हूं. मेरा पूरा शरीर दर्द से भर जाता है. मुझे बहुत डर लगता है मम्मी. प्लीज, मैं पूजा में नही बैठूंगी.”

शिल्पी का डर उस के शब्दों से अधिक उस की आंखों में नजर आ रहा था.

*शिल्पी* को अपनी मां के समक्ष गिड़गिड़ाता देख एस्थर ने बड़े सहज भाव से कहा,”मम्मीजी, क्या शिल्पी का पूजा में बैठना जरूरी है?”

“बस… अभी तुम्हें इस घर में आए चंद घंटे ही हुए हैं. बेहतर होगा ज्यादा सवालजवाब करना छोड़ो और मेरे साथ चल के गुरू महाराज की सेवा और उन के खानपान की व्यवस्था में मेरा हाथ बंटाओ. और हां, पराग से कहना ₹1 लाख अधिक निकाल ले क्योंकि गुरू महाराज को पूजा के उपरांत दक्षिणा भी देना होगा ताकि शिल्पी के लिए अच्छे रिश्ते आएं.”

सासूमां की बातें सुन एस्थर यह जान चुकी थी कि वक्त रहते उसे सही कदम उठाना होगा अन्यथा उस का घर बरबाद हो जाएगा. साथ ही वह अपनी पहचान खो देगी और उस का अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा.

इस घरपरिवार के लोगों पर अंधविश्वास का ऐसा चश्मा लगा हुआ था जिसे उतार पाना इतना आसान नहीं था. यदि वह प्रयास भी करेगी तो सफल होना मुश्किल था, इसलिए वह यह जानते हुए कि शुद्धिकरण, नामकरण और शादी के लिए ग्रहशांति की पूजा सब बकवास एवं बेकार की बातें हैं, पूजा में हिस्सा लेने एवं अपनी सासूमां का हाथ बंटाने को वह स्वेच्छा से तैयार हो गई.

*गुरू* महाराज निर्धारित समय पर अपने 5 शिष्यों के साथ घर पहुंचे. सभी उन का चरणस्पर्श करने लगे. एस्थर दूर ही खड़ी सब देख रही थी.

तभी दादी एस्थर की ओर इशारा करती हुई बोलीं,”अरे बहूरानी, तुम्हें अलग से कहना पड़ेगा… जाओ और गुरू महाराज का आशीष लो.”

एस्थर ने जैसे ही गुरू चरणों में अपना शीश नवाया, आशीष देते हुए गुरू महाराज ने उसे जिस प्रकार से स्पर्श किया एवं उन के शिष्यों की जो दृष्टि उस पर पड़ी वह सिहर उठी. उसी क्षण गायत्री देवी ने गुरू महाराज को पूजा प्रारंभ करने का आग्रह किया तो उन्होंने एक अजीब सी मादक मुसकान लिए एस्थर की ओर इशारा करते हुए बोले,”हम पहले इस लड़की का शुद्धिकरण करेंगे फिर पूजा संपन्न होगा.”

फिर वे उस कमरे की ओर बढ़ ग‌ए जहां पहले से ही सारे कर्मकांड की व्यवस्था की गई थी. सासूमां के इशारे पर एस्थर भी गुरू महाराज के साथ उस कमरे में चली गई और घर के बाकी सदस्य वहीं हाल में ही गुरूजी के साथ आए शिष्यों के संग पूजा की बाकी तैयारियों में जुट गए.

करीब 2 घंटे बाद गुरू महाराज और एस्थर कमरे से बाहर निकले फिर गुरूजी तुरंत ही अपने शिष्यों के साथ पूजा की वेदी पर पूजा कराने लगे.

पूजा कराते हुए बारबार उन्हें एस्थर के साथ कमरे में बिताए क्षण स्मरण होने लगे कि कैसे एस्थर ने बड़ी चालाकी से अपने मोबाइल फोन का कैमरा कमरे में छिपा दिया था जिस में उन की सारी हरकतें कैद हो गई थीं. किस प्रकार उन्होंने एस्थर को भभूत का पुड़िया खाने को दिया जिस में बेहोशी की दवा थी. कैसे वे अपने साथ लाए पूजा समाग्री में नशीली मादक दवाएं ले कर आए थे और उस का सेवन कर वे एस्थर को बेहोश समझ उस के साथ दुराचार करने का प्रयत्न करने लगे.

यह सब विचार करते हुए गुरू महाराज आननफानन में पूजा निबटा जल्दी से जल्दी यहां से निकाल जाना चाहते थे क्योंकि एस्थर की दी हुई धमकी उन के कानों में गूंज रही थी,”चुपचाप शांतिपूर्ण ढंग से पूजा निबटा कर यहां से निकलो, वरना पुलिस बुला कर तुम्हारा यह वीडियो दिखा, तुम्हें पाखंड, ढोंग, मासूम लड़कियों की इज्जत से खेलने, उन्हें अपना शिकार बना और दूसरों को धर्म और ग्रहों का डर दिखा कर लूटने के नाम पर अंदर करवा दूंगी.”

पूजा संपन्न करा जब गुरू महाराज जाने लगे तो गायत्रीजी बड़ी विनम्रता पूर्वक बोलीं,”गुरूजी, आप ने इस छोरी का नामकरण और मेरी पोती का ग्रह शांति तो कराया नहीं?”

गुरू महाराज एस्थर की ओर घूरते हुए बोले,”नामकरण की कोई आवश्यकता नहीं है. शादी बहुत ही शुभ लग्न में हुई है. यह कन्या ईश्वर का वरदान है. आप के घर पर इस के पैर पड़ते ही घर की सभी विघ्न बाधाएं दूर हो गईं. सभी ग्रह अपनेआप ठीक स्थानों पर चले गए हैं इसलिए ग्रहशांति की भी अब कोई आवश्यकता नहीं.”

इतना कह गुरू महाराज चले गए और घर के सभी सदस्यों का एस्थर की ओर देखने का नजरिया ही बदल गया. सभी बड़े प्यार से उसे देखने लगे और एस्थर यह सोच कर मुसकराने लगी कि चश्मा तो अब भी सब के आंखों पर चढ़ा हुआ है लेकिन इस चश्मे की वजह से अब ना तो शिल्पी की शादी रुकेगी और ना ही उस का दैहिक शोषण होगा, जो अब तक होता आया है.

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