Download App

Story 2025 : रूपदिवाना

Story 2025 :  ‘‘मैं अपनी दुलिया की छादी लानी के टुड्डे से कलूंदी. लानी मेरी पक्की छहेली है,’’ रश्मि तुतलाई.

मां ने रश्मि को मनाने का असफल प्रयास किया, ‘‘पर, रानी का गुड्डा मोटा है. कद्दू कहीं का.’’

पापा ने विकल्प प्रस्तुत किया, “मम्मी का कहना मान ले. प्रिया के गुड्डे से कर ले. वह तो छरहरा है. रंग भी धूप सा उजला है.”

मां ने फिर से नाकभौंहें सिकोड़ी, “न बाबा न. हम अपनी बिटिया की गुड़िया की शादी प्रिया के चपटी नाक और बटन सी छोटी आंखों वाले गुड्डे से भी नहीं करेंगे. किसी राजकुमार से ही करेंगे प्यारी सी रश्मि की प्यारी सी डौली की शादी.”

पापा झल्ला उठे. ‘‘अगर उस से भी नहीं तो जिस में तेरी मम्मी के सींग समाएं उसी से कर. मैं नहीं पड़ता तेरी सहेलियों के गुड्डेगुड़ियों के चक्कर में. चाहें अपनी डल्लो को चरिकुमारी बना या कुएं में धकेल,’’ कह कर पापा अपनी फाइलों में डूब गए.

आज मां को रश्मि के लिए कोई लड़का पसंद नहीं आ रहा था. भैया और पापा रातदिन परेशान थे. जहां भी कोई रिश्त बताता, पापा और भैया जाते. रश्मि की फोटो और बायोडेटा दे कर आते. रश्मि थी ही ऐसी परीरूप कि उस की फोटो तुरंत पसंद कर ली जाती. पापा लड़के का फोटो और बायोडेटा मां को दिखाते, पर मां हर फोटो में कोर्ई न कोई नुक्स निकाल देती. बायोडेटा पढ़नेसुनने की नौबत ही नहीं आती. भैयापापा सिर पकड़ कर बैठ जाते. बड़े भैयाभाभी ने तो बीच में पड़ना ही छोड़ दिया था. हां, छोटे भैया निराश हो कर फिर उठते और बुझे मन से नए रिश्ते की तलाश में लग जाते. पापा एक बार तो फट ही पड़े, ‘‘इस आसमान की परी के लिए कोई ऊपर से ही उतरेगा अब. उसे जा कर हवाईजहाज में ढूंढ़ो.’’

हुआ भी यही. छोटे भैया सुशांत और मां दीपाली बूआ के यहां भात दे कर हवाईजहाज से मुंबई से लौट रहे थे. उन का सहयात्री किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था. ब्लेजर में उस का रंग और भी दमक रहा था. उस का अखबार सुशांत के पैरों के पास गिरा तो उस ने सौरी कह कर अखबार उठा लिया. बस फिर तो दोनों में लंबी बातचीत का पहाड़ी रास्ता खुलता गया. रश्मि का ध्यान आते ही अम्मां के मन में विचार आया, ‘‘काश, ये अविवाहित हो. इस की सुंदरता में तो मैं कहीं से भी नंबर नहीं काट सकूंगी. लाखों में अलग ही दिखेगा.’’

सहयात्री का रंग हलका गुलाबी था. गहरी काली आंखों पर घनी पलकों की चिकें पड़ी थी. ऊंची नाक शुक नासिका को सार्थक कर रही थी. गुलाबी पतले होंठ गुलाब की पंखुड़ियों का आभास दे रहे थे. खनकती हंसी के बीच धवल दांतों की पंक्तियां अनार के दानों की भांति जड़ी प्रतीत हो रही थीं. सहयात्री में लड़़कियों सा सौंदर्य समाया था. काले घुंघराले बाल उस की सुंदरता को द्विगुणित कर रहे थे. सुशांत ने मन ही मन उस के साथ रश्मि को खड़ा किया तो उस के मुंह से अनायास निकल पड़ा, ‘‘वाह, क्या जोड़ी है.’’

सहयात्री ने चौंक कर सुशांत की ओर देखा और पूछा, ‘‘किस की?’’

उतरते जहाज से बाहर झांकते हुए सुशांत ने उड़ती फाख्ता की जोड़ी की ओर संकेत किया, ‘‘इन की.’’

सहयात्री सरल सा मुसकरा दिया. अम्मां के संकेत पर सुशांत ने उस से विजिटिंग कार्ड का आदानप्रदान कर लिया. वह दवाओं की कंपनी में सेल्स एक्जीक्यूटिव था. नाम था सृजन शर्मा. बातचीत में अम्मां ने जान लिया कि वह अविवाहित है.

मां को आज एयरपोर्ट से घर की दूरी द्रोपदी के चीर सी अंतहीन लग रही थी. रास्तेभर वह बस यही सोचती रहीं कि अब घर आए और कब वह रश्मि को बताएं कि मेरी खोज को आज विराम लग गया. रश्मि ठुनकेगी, ‘‘मम्मा, आप तो बस हर बार यही कहती हो. पर मेरा जवाब आज तक इस दुनिया में पैदा ही नहीं हुआ. आप ही तो कहती हो कि हंस बस मोती चुगता है.’’ बस, तब मैं सब को धीरेधीरे सृजन के बारे में बताऊंगी कि आज से तीस साल पहले रश्मि का जवाब इस धरती पर उतर चुका है. सब आश्चर्य से पूछेंगे, ‘‘क्या वाकई?’’ इसी उहापोह में टैक्सी घर के आगे रुकी. तब मां की विचारधारा को झटका लगा.

रश्मि सुबह से ही पूजा की शादी में गई हुर्ई थी. पूजा रश्मि से पूरे 6 साल जूनियर थी. पूजा की बड़ी बहन अपाला का विवाह साधारण रूपरंग के चार्टेड एकाउंटेंट अजस्र से सात वर्ष पूर्व हो चुका था. अपाला और रश्मि दांतकाटी रोटी थी. अपाला के रिसेप्शन से लौट कर मां ने मुंह बनाया था, ‘‘अपाला के मम्मीपापा ने क्या देखा? और ये मिट्टी की माधो अपाला मान कैसे गई उस बजरबट्टू अजस्र को?” डिनर पर बुलाया, तो पापा ने मां को झिड़का, ‘‘उस दिन तुम अजस्र को बजरबट्टू बता रही थी. बिलकुल रामसीता की जोड़ी है दोनों की. अजस्र सांवला है तो क्या हुआ? सीए है.’’

मां का मुंह फिर बिचका, ‘‘उलटा नहीं तो सीधा तवा कहीं का. सुनोजी, तुम ने उस की टांगें नहीं देखी क्या. बिलकुल सींकसलाई. ताड़ का पेड़ कहीं का.’’

पापा ने फिर समझाया, ‘‘क्या सूरत ही सबकुछ है? पोस्ट और घर कुछ नहीं. अपाला की ससुराल पर लक्ष्मी बरसती है.’’

बस पापा की इन्हीं बातों पर मां का मूड उखड़ जाता था. पापा चलतेचलते कह गए. पर अपाला अजस्र की पोस्ट, योग्यता और घर की स्थिति देख कितनी खुश है.

रश्मि के लिए जितने भी वर देखे गए, अम्मां का इनकार रश्मि पर उम्र की परतें चढ़ाता गया. रिश्तेदारी में भी रश्मि से छोटी उम्र की लड़कियों की शादी एकएक कर के होती जा रही थी. पापा दुखी हो कर कहते, ‘‘न जाने रश्मि के हाथ कब पीले होंगे? छोटे की धरोहर की भी शादी हो गई. रश्मि से पूरे चार बरस छोटी है. सुंदरता के चक्कर में एक से एक आला रिश्ते पानी की तरह हाथ से फिसलते जा रहे हैं. रश्मि उनतीस की हो गई है. तुम्हें सुंदरता को योग्यता से कम आंकना चाहिए. रश्मि के लिए लड़के की उम्र कम से कम तीसइकतीस होनी चाहिए. अब इस उम्र तलक कौन भीष्म पितामह बना बैठा होगा. चलो, मैं अब योग्य वर ढूंढ़ भी दूं तो क्या तुम चंद्रमा को पाने का अपना सपना छोड़ दोगी? किस कंदरा से लाऊं कामदेव तुम्हारी रति रानी के लिए?’’

रश्मि पूजा की शादी से लौटी, तो मां उस की प्रतीक्षा में जाग रही थीं. रश्मि सदैव की तरह लाड़ से इठलाई, ‘‘मां अब आईं. आईं तो क्या लाईं. नहीं लाईं तो क्यों आईं? अपनी इकलौती, लाड़ली, डार्लिंग बेटी के लिए.’’

मां के मन की हंसी चेहरे पर उतर आई, ‘‘देख, मैं न कहती थी कि कोई आसमान से ही उतरेगा अपनी हूर की परी के लिए. मेरी भविष्यवाणी सोलहों आने सच हुई. वह पूरा गंधर्व कुमार है.’’

रश्मि ने शंका व्यक्त की, ‘‘वह तो हर बार आप ही फेल कर देती हो. पर लगता है कि आप ने अब की बार पीतल और कंचन में भेद कर लिया है. मैं तो समझी थी कि मुंबई से आप मेरे लिए लेटेस्ट फैशन की ड्रेस नहीं, लेटेस्ट डिजाइन का मैच ले कर लौटी हो मेरे लिए.’’

‘‘देख, कल तेरे पापा भाईदूज का टीका कराने सल्लो बूआ के यहां जा रहे हैं. तेरी बड़ी भाभी और औकाधरा की कल किट्टी है. और तेरे बड़े भैया भी कल डबल शिफ्ट में ड्यूटी है,” मां बोली.

अम्मां के कहने पर अगले दिन सुशांत ने औफिस से सृजन को फोन कर के घर आने का निमंत्रण दे दिया. सृजन ने शाम को आने का वायदा कर लिया.

शाम को सृजन कुछ पहले ही आ गया. दरवाजा रश्मि ने खोला. सौंदर्य का अथाह सागर देख कर रश्मि ठगी सी रह गई. सृजन भी रूप की राशि रश्मि को देख कर अंदर आना भूल गया.

रश्मि ने संभल कर सृजन को अंदर आने को कहा. सृजन सकपकाते हुए बोला, ‘‘मि. सुशांत ने मुझे बुलाया है. क्या मिस्टर सुशांत घर पर हैं?’’

रश्मि ने सृजन को ड्राइंगरूम में बैठा दिया.

अंदर आ कर रश्मि का हृदय तेजी से धडक़ने लगा. ‘‘अम्मा ने सच ही कहा था. सारी सहेलियां जल उठेंगी. सब्र का फल मीठा होता है.’’

सृजन और सुशांत के बीच हो रही बातचीत भी रश्मि की विचार श्रृंखला को छोड़ नहीं सका. सुशांत ने मां से चाय भेजने को कहा, तो उन्होंने फिर से रश्मि को सृजन के सम्मुख प्रस्तुत करने के उद्देश्य से नौकर से चाय न भेज कर रश्मि से चाय ले जाने को कहा.

चाय मेज पर रखते हुए एक बार फिर से रश्मि का मन लुब्ध भ्रमर की भांति उस रूप लावण्य का दृष्टिपान करने की लालसा से सृजन की ओर नीची दृष्टि से देखने लगा. सृजन भी उसे अपलक देख रहा था. सुशांत ने दोनों की नजरें चार होते हुए देखा तो रश्मि लगातार अंदर चली गई. सृजन तो बातचीत का बिंदु ही भूल गया.

सृजन ने चलते समय सुशांत को घर आने का निमंत्रण दिया, तो सुशांत को अनायास ही मुंहमांगी मुराद मिल गई. सुशांत बोला, ‘‘मिस्टर सृजन, मैं आप के घर अब से चौबीस घंटे बाद यानी कल शाम पांच बजे आऊंगा. पर आप से नहीं, आप के पिताजी से मिलने. मेरे साथ मेरी मदर भी आप की माताजी से मिलने आएंगी. आप को कोई एतराज तो नहीं?’’ सुन कर सृजन मुसकराया. अचानक उस के मुंह से प्रथम कवि सा निकला. ‘‘नहीं भैया, मुझे तो प्रसन्नता ही होगी.’’

सुशांत ने जब मां को सृजन के निमंत्रण के बारे में बताया, तो मां ने ‘शुभस्य शीघ्रम’ के अनुसार अगले ही दिन सृजन के घर जाने का मन बना लिया.

अगले दिन सुशांत मां को साथ ले कर सृजन के घर पहुंचा. रास्ते में सुशांत ने मां का मन टटोला, ‘‘मां, आप आईएएस, आईपीएस तक को ठुकरा चुकी हैं, क्योंकि मैं आप की जिद जानता हूं. आप रूपदिवानी हैं. हमें आप से समझौता कर लेना चाहिए,’’ कह कर सुशांत ने मुंह पर ताला लगा लिया.

सृजन ने उन्हें हाथोंहाथ लिया. घर के अन्य सदस्य भी बहुत सौहार्द से मिले.

रश्मि का विवाह सृजन के साथ धूमधाम से हो  गया. सब अम्मां की प्रसन्नता में प्रसन्न थे. स्वयं रश्मि की भी प्रसन्नता का कोई ओरछोर नहीं था. शादी का एक बरस, खुशियों का एकएक पल बन कर बीत गया. रश्मि मां बनने वाली थी.

धीरेधीरे सृजन कंपनी के काम में इतना उलझता चला गया कि उसे रश्मि की ओर ध्यान देने का अवसर कम ही मिल पाता. रश्मि उस का सानिध्य अधिक से अधिक चाहती, पर सृजन को उस के लिए समय निकालना असंभव होता जा रहा था. रात को सृजन के खाने की प्रतीक्षा में रश्मि खाने की मेज पर सिर रख कर सो जाती. सृजन आता और चुपचाप कपड़े बदल कर सो जाता. रश्मि की नींद खुलती, तो सृजन को सोया पाती. मेज पर खाना ज्यों का त्यों रखा देख रश्मि अपराधबोध से ग्रस्त हो स्वयं को उलाहना देती,

‘‘कितना थक जाते हैं सृजन. और मैं उन की प्रतीक्षा जाग कर नहीं कर सकी. कितना चाहते हैं मुझे. सोया देख कर जगाया तक नहीं और खाना भी नहीं खाया.’’

सुबह उठ कर सृजन बस जल्दीजल्दी की रट लगा देता. रश्मि को उसे नाश्ता तक कराना भारी हो जाता. एक दिन इसी जल्दीजल्दी के रट में रश्मि गिर ही गई होती, यदि बाथरूम का दरवाजा उस के हाथ में न आ गया होता. तब सास रुक्मिणी ने उसे टोका, ‘‘ऐसे दिन हैं तेरे रेशू. जरा संभल कर चला कर. सिरजू को नाश्ता मैं करा दिया करूंगी.’’

रश्मि सास की बात पर चुप रही, पर मन ही मन कहा, ‘‘सृजन को सामने बैठा कर खिलाने में मुझे जो सुख मिलता है, फिर कैसे मिलेगा. इसी बहाने पल दो पल उन के साथ बैठ लेती हूं, वरना सारे दिन भागते सृजन पानी की तरह हाथ से फिसलफिसल जाते हैं.’’

रश्मि सृजन से पूछती, ‘‘पास्ता, कट्लेट्स कैसे बने हैं?’’ सृजन रश्मि की पाककला की प्रशंसा ढंग से नहीं कर पाता. बहुत टेस्टफुल कह कर न जाने किन विचारों की भूलभुलैया में खो जाता. रश्मि उसे सृजन की व्यस्तता मान लेती.रक्षाबंधन पर भाइयों को राखी बांधने जाने से पूर्व रश्मि ने सृजन का मन टटोलने का प्रयत्न किया, ‘‘अम्मां के पास रहने के लिए इस बार अम्मांजी से लंबी छुट्टी सेंक्शन करा दीजिए.’’

सृजन को जैसे संबल मिल गया, ‘‘अम्मां का सेक्रेटरी मैं जो बैठा हूं, तुम्हारी छुट्टियां स्वीकृत करने के लिए बड़े वाले सूटकेस में कपड़े ले जाना.’’

सृजन का उत्तर सुन कर रश्मि का मुंह उतर गया. सृजन से दूर रहना उस के लिए मुश्किल था, पर सृजन ने अनजान बनते हुए सरलता से ‘हां’ कह दिया था.

 

औफिस जाते समय सृजन रश्मि को मां के घर छोड़ता गया. बड़े सूटकेस के साथ रश्मि को देख कर छोटी भाभी ने तंज कसा, ‘‘जीजाजी बड़ी खुशी हुई कि इस बार आप भी दीदी के साथ यहां रहेंगे, वरना दीदी के कपड़े तो ब्रीफकेस में ही आ जाते थे. आप दीदी से शादी वाले गठजोड़ अभी तक बांधे हुए हैं,” सुन कर सृजन हंसता हुआ नीचे उतर गया.

कभी रश्मि औफिस में सृजन को फोन कर के आने को कहती, तो सृजन औफिस से लौटते में बस 10-15 मिनट को आ जाता. भूल कर भी रश्मि से घर चलने को नहीं कहता.

एक बार रश्मि ने ही पूछा, ‘‘अम्मांजी भी क्या सोचेंगी? मैं जैसे यहां आ कर जामवंत के पैर सी जम ही गई.’’

सृजन ने रश्मि की दलील को हथेली पर जमी धूल सा उड़ा दिया, ‘‘तुम्हें डाक्टर ने रेस्ट बताया है. वहां गृहस्थी की चकल्लस में सांस लेने तक की फुरसत नहीं मिलती तुम्हें. यहां सब तुम्हारी सेवा में लगे रहते हैं. तुम्हें यहां छोड़ कर मैं बेफिक्र हूं.’’

सृजन के इस अपनेपन से रश्मि भीतर तक भीग गई.

एक दिन रश्मि की सहेली अपाला की छोटी बहन उर्वशी अपनी सहेली सोनल के साथ रश्मि से मिलने आई. दोनों ने खाना वहीं खाया. रश्मि के पड़ोस में उर्वशी की ननद रिक्ति रहती थी. उर्वशी उस से मिलने चली गई. रश्मि सोनल को अम्मां के कमरे में आराम से बातचीत करने के लिए ले गई. वहां सृजन की फोटो देख कर सोनल ठिठकी. कुछ देर बाद उस ने रश्मि से पूछा, ‘‘ये महाशय कौन हैं दीदी? मैं इन्हें पिछले 3 सालों से जानती हूं. नई तितलियों पर मंडराने वाले भ्रमर हैं जनाब.’’

सुन कर रश्मि जड़ हो गई. उस के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. रश्मि उस से सृृजन का असली परिचय छुपा गई. संभल कर बोली, ‘‘अम्मां के लाड़ले भांजे हैं. अम्मां इन पर बेटों से भी ज्यादा ममता लुटाती हैं. पर तुम ये सब क्यों पूछ रही हो? कहीं धोखा तो नहीं हुआ तुम्हें? अम्मा के तो श्रवण कुमार हैं ये.’’

सोनल बेपरवाही से उत्तरायी होंगे घर के भ्रवण कुमार. पर बाहर तो पूरे रोमियो बने रहते हैं. मुझे कोई धोखा नहीं हुआ है. मेरी फ्रैंड अनुजा इन के प्रेमजाल में बुरी तरह से फंसी हुई है. हर समय इन के नाम की माला जपती रहती है. कुछ महीने पहले अचानक अनुजा के कालेज पहुंच गए. बताया कि वापस पोस्टिंग यहीं करा ली है. अनुजा ने इन महोदय के कंधे से लग कर रोरो कर अपना बुरा हाल कर लिया. तब से रोज सुबहशाम उस से मिलते हैं. मैं ने अन्य तितलियों को भी इन की चपेट में आते देख कर अनुजा को सावधान किया. पर अनुजा पर इन का रंग गहरा चढ़ चुका है और वह मेरे देखने को मेरा दृष्टिभ्रम मानती है. यह महाशय हैं ही ऐसे मोहक विष्णुरूप कि इन के मकडज़ाल में कोई भी फंस जाता है. नाम भी तो मोहन कुमार है.’’

सोनल का एकएक शब्द रश्मि को बिच्छू के डंक सा काटता गया. उस ने होंठ काट लिए, ‘‘सोनल तू ने झूठ नहीं कहा. अम्मां भी तो इन की रूप की मोहिनी में ही तो फंस गई थीं. वे इन के बारे में और कुछ जानना ही नहीं चाहती थीं. पर अम्मां को तो इन की हर रट लग गई थी. पिताजी और बड़े भैया ने कितना समझाया था उन को. फिर अम्मां की जिद और मेरी बढ़ती उम्र के कारण पिताजी और बड़े भैया को घुटने टेकने पड़ गए थे. अब पीएं अम्मां धोधो कर इन का रूप. सृजन ने अपना नाम तक बदल लिया.’’

उर्वशी के आते ही दोनों की बातचीत पर विराम लग गया. काफी देर हो चुकी थी, अत: उर्वशी और सोनल ने जाना चाहा. रश्मि ने और अधिक जानने की गरज से सोनल से कहा, “उर्वशी तो अब गृहस्थिन बन गई है. सोनल तू अभी इन झंझटों से दूर है. परसों सनडे में आना. मेरी बोरियत कुछ तो कम हो.’’

सोनल भी रश्मि से और अधिक बात करना चाहती थी. अत: वह इतवार की सुबह 10 बजे ही अनुजा को ले कर रश्मि के घर आ गई. रश्मि ने जानबूझ कर दोनों को अम्मां के कमरे में बैठाया. अनुजा की दृष्टि सृजन की फोटो से हटती ही नहीं थी. गहरी सांस ले कर सोनल बोली, ‘‘पता नहीं, क्यों अनुजा इन के पीछे पागल है? ये किसी एक के हो कर रह नहीं सकते.’’

रश्मि बोली, ‘‘अम्मां के भांजे का खयाल छोड़ दे अनुजा. यह अपनी पत्नी को बेहद चाहता है.’’

पत्नी के नाम पर दोनों चौंक कर खड़ी हो गईं, और ‘‘बाजार से जरूरी सामान खरीदना है,’’ का बहाना बना कर चली गईं.

शाम को रश्मि ने सास को फोन किया, ‘‘अम्मांजी, आप तो मुझे भूल ही गई हैं. कब बुला रही हैं?’’

सास रुक्मिणी जैसे आसमान से गिरीं, ‘‘मैं तो रोज ही सृजन से तुम्हें ले आने को कहती हूं, पर वह कहता है कि तुम जी भर के रहना चाहती हो. क्या जी भर गया तुम्हारा?’’

शाम को ससुर आ कर रश्मि को ले गए. सृजन रात को तकरीबन 10 बजे आया. रश्मि को देख कर वह चौंक गया.

दिनप्रतिदिन सृजन का रवैया रश्मि के प्रति उपेक्षापूर्ण होता जा रहा था. एक दिन रश्मि ने सास से कहा, ‘‘मां, ये घर में सब से छोटे हैं. आप में से कोई इन से क्यों नहीं पूछता कि इतनी रात गए तक कहां रहते हो?’’

रुक्मिणी गहरी सांस ले कर उतराई, ‘‘रश्मि से सृजन का सौभाग्य है कि उसे तुम जैसी सहनशील पत्नी मिली. वह एक खूंटे से बंधने वाला कभी न था. तुम्हारी हां सुन कर हमें तसल्ली हुई कि उस ने भी तुम्हारे लिए हां कर दी, पर वह अनुमान हमें भी न था कि वह अपने पुराने ढर्रे पर लौट आएगा. अब पानी सिर से ऊपर आता जा रहा है,’’ कह कर वह चिंतित सी होती चली गईं.

रश्मि का स्वास्थ्य दिनप्रतिदिन गिरता जा रहा था. मांपिताजी के पूछने पर रश्मि सृजन की उपेक्षा छुपा जाती. भैयाभाभी की चिंता रश्मि हंस कर टाल जाती. पर अंदर ही अंदर रश्मि को चिंता का घुन खाए जा रहा था.

एक दिन छोटी भाभी धरा घबराई सी रश्मि से मिलने आई. धरा हिम्मत बटोर कर बोली, ‘‘रश्मि कान से सुना झूठा हो सकता है, पर आंखों से देखा कैसा झुठला दूं? मेरा दिल सच में ही बैठा जा रहा है.’’

धरा रश्मि को भाभी कम सहेली अधिक लगती थी. धरा भी मन के प्रत्येक बोझ को रश्मि से कह कर हलका कर लेती थी. रश्मि भी शादी से पूर्व शकुंतला की ढीली अंगूठी सी शादी की फिसलती उम्र की वेदना धरा को बता देती थी. परंतु सृजन की निष्ठुरता को रश्मि फिर भी धरा के सामने मुंह पर नहीं ला पाई थी.

धरा की बात सुन कर रश्मि का हृदय अनजानी आशंका से धड़क उठा. उस ने छोटी भाभी की ओर प्रश्नवाची दृष्टि उठाई और कहा, ‘‘भाभी कहो, कुछ मत छुपाओ.’’

इधरउधर देख कर धरा बोली, ‘‘रश्मि कोई और कहता तो कभी न मानती. पर मेरी आंखों ने धोखा नहीं खाया है. कल मैं ने सृजन को एक लड़की के साथ पिक्चर हाल में देखा. वह लड़की सृजन से बिलकुल सट कर बैठी थी. बस मेरी पिक्चर उन दोनों की गतिविधियां बन गईं. वह  दोनों बारबार सटसट जाते थे. आपस में बातबात पर खिलखिलाते थे. पिक्चर तो एक बहाना था. वहां तो उन की अपनी ही पिक्चर चल रही थी.’’

रश्मि ने धरा को रोकते हुए अधीरता से कहा, ‘‘भाभी आगे कुछ मत कहो. सुदर्शन रूपकारी सृजन के रूप पर अम्मां ऐसी मोहित हो गईं कि वे उस के कलंक को नहीं देख सकीं और ना ही आप में से कोई जान पाया कि वह केवल कंचन की काया वाला मन से कांच का टुकड़ा निकला.

“सृजन जैसा रूपवान लड़का हाथ से न निकल जाए के डर से अम्मां ने पापाभैया को उस के बारे में कहीं कोई पूछताछ भी नहीं करने दी. सृजन के रूप का जादू अम्मां के सिर पर चढ़ कर बोल रहा था.’’

थोड़ी देर बाद धरा चली गई. रश्मि अनमनी सी पलंग पर पड़ गई. रश्मि की आंख खुली, तो संध्या का सुरमई रंग रात्रि की कालिमा में बदल रहा था. आज सूर्य पश्चिम से कैसे निकल आया. रश्मि को आश्चर्य हुआ. सृजन आज 7 बजे ही घर आ गया था. बड़ी भाभी वृंदा l ने सृजन को औफिस से तुरंत घर आने के लिए फोन किया था. वृंदा सहित घर के सब सदस्य बरामदे में बैठे थे. सृजन भी सीधा वहीं पर आया. अम्मां वृंदा को दिलासा दे रही थीं.

सृजन को देखते ही भतीजी पल्लवी सुबकते हुए बोली, ‘‘चाचू हमें अभी की अभी नानू के पास कानपुर ले चलिए. अजस्र मामा का फोन आया था कि नानू सब को बुला रहे हैं. हैलेट  अस्पताल की इमर्जेंसी में नानू एडमिट हैं. मैं ने अपना और मम्मा का सूटकेस लगा लिया है.’’

बड़े भैया कंपनी की मीटिंग में यूएसए गए हुए थे. रश्मि से सूटकेस लगाने को कह सृजन फ्रैश होने के लिए बाथरूम में घुस गया. ड्राइवर ने कार निकाल ली थी. स्टेशन पहुंचते ही सृजन ने देखा कि लेट होने की वजह से कानपुर की ट्रेन छूटने में 10 मिनट थे. तत्काल में सीट मिल गई. उन के ट्रेन में बैठते ही गाड़ी ने प्लेटफार्म छोड़ दिया. एकदो स्टेशन निकलने पर अपने औफिस को सूचित करने के लिए सृृजन ने अपना मोबाइल तलाशा, पर मोबाइल कहीं नहीं मिला. उस ने वृंदा से कहा, ‘‘भाभी जरा अपना मोबाइल दीजिए. मेरा मोबाइल या तो औफिस में छूट गया या घर पर हड़बड़ी में रह गया.’’

वृंदा के मोबाइल में सृजन के औफिस का नंबर था. उस ने औफिस में सूचना दे दी, ‘‘भाभी के साथ मैं कानपुर जा रहा हूं. चार दिन भी लग सकते हैं.’’

इधर रुक्मिणी ने देखा कि सृजन का मोबाइल उतारे हुए कपड़ों के नीचे पड़ा था. अगले दिन दोपहर में जब रश्मि आराम करने अपने कमरे में चली गई, तब रुक्मिणी ने सृजन का मोबाइल निकाला. उस में पांच लड़कियों के नंबर फीड थे. उन्होंने उन पांचों को मैसेज कर दिया, ‘‘आज शाम को 5 बजे मां ने घर पर मेरी बर्थडे की पार्टी रखी है. इसी पार्टी में मां मेरे जीवनसाथी के रूप में तुम्हारे नाम की घोषणा करेंगी. तुम मेरी पसंद हो. मैं ने मां को अपने और तुुम्हारे बारे में सबकुछ बता दिया है.’’

अभी 5 बजने में 2 घंटे शेष थे. रुक्मिणी ने रश्मि को बुलाया और ड्राइंगरूम में लगे सब फोटो दिखा कर वहां पर रश्मि और सृजन की शादी के फोटो लगवा दिए. उन की शादी की एलबम भी ड्राइंगरूम की बीच वाली मेज पर रख दी. रश्मि बारबार पूछ रही थी, ‘‘मां, आप ये सब क्यों कर रही हो?”

रुक्मिणी ने रश्मि से शादी वाली कैसेट भी लाने को कहा और बोलीं,’’ अपनी शादी की कैसेट टीवी पर लगा दे. भागदौड़ में मैं तुम्हारी शादी की सारी रस्में नहीं देख पाई थी. रतजगे के कारण मैं बरात में भी नहीं जा पाई थी. आज मैं और तुम घर में अकेले हैं. मेरी सहेलियों की बेटियां भी सृजन भैया की शादी की कैसेट देखने को व्यग्र हैं. वे लोग भी 5 बजे तक आ जाएंगी. समय अच्छा कट जाएगा.’’

5 बजते ही वे पांचों भी बुके ले कर आ गईं. उन की निगाहें सृजन को तलाश रही थीं. रुक्मिणी ने उन्हें पहले बरामदे में बैठाया. फिर रश्मि से कहा, ‘‘रेशू बिटिया, टीवी पर जरा वो वाली कैसेट लगवा देना.’’

रश्मि ने तुरंत अपनी शादी वाली कैसेट लगा दी और उन पांचों को ड्राइंगरूम में ले आई, ‘‘पार्टी जैसी तो कोई तैयारी लग नहीं रही है.’’ उन्होंने सोचा कि शायद दूसरे रूम में हो. फिर उन्होंने रश्मि से पूछा, ‘‘भाभीजी किस की शादी हमें दिखा रही हो?’’

रश्मि इठलाते हुए बोली, ‘‘अपनी और आप के भैया की शादी और किस की?’’

उन्होंने देखा कि रश्मि के साथ शादी की हर रस्म में सृजन उस के साथ में है. जैसेजैसे कैसेट आगे बढ़ रही थी, रश्मि और रुक्मिणी का उल्लास बढ़ता जा रहा था और उन पांचों के चेहरे फीके पड़ते जा रहे थे. अचानक रुक्मिणी बोली, ‘‘और कब तक न करती अपने सरजू की शादी? तीस का हो गया था, पर रश्मि को देखते ही उस पर लट्टू हो गया.’’ पांचों के मुंह से एकसाथ निकला, ‘‘तीस के…? बताते तो हैं अपने को… कह कर उन्होंने अपनी जीभ काट ली. बात संभालते हुए बोलीं, “लगते तो चौबीस के भी नहीं.’’

उन्होंने एलबम उठाई, तो हर फोटो में रश्मि और सृजन साथसाथ थे. ड्राइंगरूम की दीवारों पर निगाहें दौड़ाईं, तो ‘मुगलेआजम’ के शीशमहल के सेट की तरह सृजन के साथ रश्मि ही रश्मि नजर आ रही थी.

पांचों एकसाथ झटके से उठ खड़ी हुईं और बोलीं, ‘‘आंटीजी, हम चलते हैं. जरूरी काम है,” कह कर वे खटाखट सीढ़ियां उतरती चली गईं. रुक्मिणी पीछे से उन्हें आवाज देती रह गईं, “बर्थड़े का केक तो खाती जाओ. चाय तो पीती जाओ.’’

रश्मि खुशी से रुक्मिणी के गले लग गई. रुक्मिणी ने रश्मि से कहा, ‘‘अब ये मोबाइल सरजू को नजर नहीं आना चाहिए. आजकल के लड़कों को किसी के मोबाइल नंबर याद नहीं रहते.’’

Story 2025 : प्रेम की दो मिसाल

Story 2025 :आरुषि ने अपनी जुड़वां बहन सुरुचि से हमदर्दी जताते कहा कि तुम इतने सालों से इस नरक में अपनी जिंदगी कैसे गुजार रही हो? पापा ने तुम्हारी सहायता नहीं की, तो इस गंद के खिलाफ तुम्हें ही आवाज उठानी चाहिए थी. जब तुम ने अपने लिए कुछ नहीं किया तो किसी और से उम्मीद कैसे कर सकती हो? और हां…

जिंदगी में हर कहानी के समानांतर एक कहानी चलती है, जिस का लेखक उस कहानी से जुड़ा मुख्य किरदार स्वयं होता है. उसी के व्यवहार और क्रियाकलाप के अनुसार कहानी अपने रंग बदलती है. इन दोनों कहानियों के इर्दगिर्द ढेरों किरदार अपनीअपनी भूमिका जीवंत करने में जुटे रहते हैं. उन किरदारों का व्यवहार और नजरिया समानांतर चल रहे उन दोनों कथानकों के मुख्य किरदार के प्रति मौके और मतलब के अनुसार बदलते रहते हैं.

अपने इर्दगिर्द चल रहे उन किरदारों के बदलते रवैए को आरुषि और सुरुचि मौसी की जिंदगी ने बखूबी समझा. ये दोनों मम्मी की सहेलियां थीं, जुड़वा बहनें. जमींदार परिवार की आनबान मानी जाती हैं बेटियां, क्योंकि शान माने जाने का अधिकार तो बेटों के ही पास रहा.

मम्मी अकसर उन की चर्चा किया करती थी, ‘आरुषि के परिवार में बेटियों की शादी में पैसे, सोनेचांदी के अलावा ढेरों गाय, बैल, भैंस, घोड़े देने की परंपरा सालों से चलती आ रही थी. उन के घर में बेटियों पर दिल खोल कर खर्च किया जाता था सिवा उन की पढ़ाई के.’

आरुषि की शादी तय हो चुकी थी, मेहमान आ चुके थे. सारा घर मेहमानों से भरा था. शादी के 2 दिनों पहले काफी देर होने पर जब आरुषि ने कमरे का दरवाजा नहीं खोला तो उस की छोटी चाची ने जा कर दरवाजा खटखटाया. दरवाजा अंदर से बंद नहीं था, इसलिए खुल गया. भीतर जाने पर पता चला कि आरुषि कमरे में नहीं है.

यह खबर पूरे घर में बिजली की भांति कौंध गई. जांचपड़ताल करने पर पता चला कि आरुषि के पिता रघुवीर चाचा के एक दोस्त कनक बाबू का बेटा हेमांग भी गायब है. वे लोग बोकारो से इसी शादी में शामिल होने आए थे. इसी गांव के थे और रघुवीर चाचा से उन की पुरानी दोस्ती थी सालों पहले उन का परिवार बोकारो में बस गया था. लेकिन संबंध अभी भी उसी तरह कायम था. इन लोगों का एकदो साल में आनाजाना और मिलना हो जाता था. जब भी वे लोग गांव आते थे तो रघुवीर चाचा के घर पर ही रुकते थे क्योंकि उन का अपना पुश्तैनी घर सालों से बंद था. इतने भरेपूरे परिवार में कभी किसी को यह शक नहीं हुआ कि आरुषि का हेमांग से कोई संबंध है.

अगर दोनों बच्चों ने यह बात अपने परिवार वालों को बताई होती तो शायद वे अपनी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने के लिए तैयार भी हो जाते लेकिन उस वक्त कोई मातापिता बच्चों को इतना हक देते कहां थे कि वे अपनी पसंद और शादी की बात उन से कर सकें.

आरुषि के पिता दबंग किस्म के इंसान थे. उन की सोच में घर की औरतें पैरों में पहनी जाने वाली खुबसूरत मोजरी के समान हुआ करती हैं. उन तक आरुषि के गायब होने की खबर पहुंचते ही वे सीधे आंगन में आए और बिना कुछ बोले चाची को कमरे में ले गए. दरवाजा बंद हुआ और अंदर से तब तक चीखनेचिल्लाने की आवाजें आती रहीं जब तक वे पीटते हुए थक नहीं गए.

पति के सामने हमेशा चुप रहने वाली चाची भी आज रोते हुए चिल्ला रही थीं, “मार डालो मुझे, कम से कम आज मेरी एक बेटी तो इस कैद से आजाद हो गई. 2 दिनों बाद इस कैद से आजाद हो कर तुम्हारी ही तरह किसी और भेड़िए के हाथों की कठपुतली बन कर रह जाती.” थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला और चाचा दनदनाते हुए बाहर चले गए.

कुछ देर बाद आरुषि के छोटे चाचा ने आ कर घर के मालिक का फरमान सुनाया, “आरुषि की जगह अब सुरुचि की शादी की तैयारी शुरू करो.”

सुरुचि शादी के लिए तैयार थी या नहीं, किसी ने उस से पूछना जरूरी नहीं समझा. अकेले में चाची ने उसे जा कर समझाया, “बेटा, मेरी जिंदगी तो बीत गई. तुम्हारे सामने तुम्हारी पूरी जिंदगी पड़ी है. अभी बस तुम इस घर से चली जाओ. आगे जैसी तुम्हारी मरजी. अपने फैसले अगर खुद ले सको तो जरूर लेना. अपनी खुशियां हासिल करने का हक हर किसी को है. मेरी तरह घुटन में अपनी जिंदगी बरबाद मत करना. मेरा आशीर्वाद हर कदम पर तुम्हारे साथ रहेगा.”

धूमधाम से शादी संपन्न हो गई. सुरुचि उस घर की छोटी दुलहन और मधुर की पत्नी के रूप में ससुराल पहुंच गई.

विदाई के अगले ही दिन एक सुसाइड नोट लिख कर सुरुचि की मां ने फांसी लगा ली. ‘मैं अब तक अपने पति की ज्यादती बरदाश्त करती रही, बिना रीढ़ की हड्डी वाली अपनी जिंदगी व्यतीत करती रही पर अब और बरदाश्त नहीं होता. मेरी बेटियां अब इस घर से चली गई हैं. अब मैं अपनी वजूदहीन जिंदगी के बोझ को और बरदाश्त नहीं कर सकती. मैं अपनी मरजी से आत्महत्या कर रही हूं, इस के लिए किसी और को जिम्मेदार न माना जाए.’

बिना पुलिस को इस की खबर किए आननफानन चाची का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

उधर आरुषि कनक बाबू के बेटे हेमांग के साथ बोकारो नहीं जा कर कहीं और चली गई. हेमांग के परिवार वालों ने पता लगाने की कोशिश की, लेकिन कुछ पता नहीं चलने पर वे लोग भी शांत बैठ गए.

करीब 10 वर्षों बाद हेमांग और आरुषि अचानक से बोकारो आए, साथ में अपने 9 साल के जुड़वां बच्चों हृदयंश और हिमांगी को ले कर. परिवार वालों ने हेमांग और आरुषि को कुछ यों अपनाया, जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो.

पता चला कि वे दोनों घर छोड़ने के बाद सीधे बड़ौदा गए जहां कुछ दिन हेमांग अपने एक दोस्त के घर पर ठहरा. उसी की मदद से एक प्राइवेट फर्म में नौकरी की शुरुआत की और कुछ दिन बाद उन्होंने कोर्ट मैरिज कर ली. 2 साल बाद हेमांग ने अपने अनुभव के आधार पर कैमिकल लाइन में अपनी नई शुरुआत की.

मेहनत और लगन के योगदान से काम अच्छा चला और दोनों को समय ने मनचाही खुशियां दीं. पूरी तरह स्थापित होने के बाद अब उन दोनों ने घरवालों से मिलने का यह प्रोग्राम बनाया था.

कहते हैं सफलता और पैसा गुनाहों पर भी परदा डालने में सफल होता है, फिर ये दोनों तो बस अपनी खुशियां तलाशने निकले थे. और साथ ले कर आए थे रिश्तेदारों के लिए ढ़ेर सारी उम्मीदें. इन की अच्छीखासी संपत्ति के माध्यम से उन की चाहत पूरी हो सकती थी.

हेमांग के परिवार वाले आरुषि, हृदयंश और हिमांगी को ले कर रघुवीर चाचा के घर पहुंचे. कुछ देर की की चुप्पी के बाद चाचा बोले, “अब तो जो होना था हो चुका, अब पहले की तरह सामान्य हो कर तुम लोग अपना जीवन जियो.”

आंसूभरी आंखों से बस इतना ही बोल पाई आरुषि, “सबकुछ पहले की तरह सामान्य कैसे, क्या मां अब वापस आ पाएंगी?” यह कहतेकहते उस की आवाज भर्रा गई. हेमांग ने उसे थाम लिया और आरुषि फूटफूट कर रो पड़ी.

सुरुचि भी अपने हिस्से की जिंदगी को सहेजने की चाहत में उसे काटे जा रही थी. ससुराल आने के कुछ ही दिनों बाद उसे पता चला कि उस का पति मधुर अपनी विधवा भाभी के प्रेम में बुरी तरह जकड़ा हुआ है. इसे प्रेम कहना भी प्रेम का अपमान होगा क्योंकि अगर प्रेम होता तो मधुर ने उन के संग शादी की हिम्मत दिखाई होती. किसी लड़की की जिंदगी बरबाद करने बरात ले कर न जाता.

शुरूशुरू में सुरुचि अपने अंदर की उम्मीदों को सिंचित करती रही. उसे लगता था कि वह अपने व्यवहार से मधुर को सही रास्ते पर ले आएगी. जब तक सासससुर जिंदा थे, मधुर भाभी के कमरे में मौका देख कर जाता था. थोड़ा लिहाज बाकी था उस में. मातापिता को सब जानकारी थी, पर हर मांबाप की तरह वे भी किसी और की बेटी को अपने बिगड़ैल बेटे को सुधारने का मोह संवरण नहीं कर पाए थे.

उन्होंने एक लड़की की जिंदगी नरक में धकेलने के गुनाह की भरपाई की चाहत में अपनी आधी संपत्ति अपनी उस बहू के नाम पर कर दी जिस ने कभी पति का सुख पाया ही नहीं.

मायके वाले तो शादी कर के अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री मान बैठे थे. एक बार मायके जाने पर सुरुचि के उतरे चेहरे को देख कर उस की चाची ने उस के दांपत्य जीवन की खोजबीन की थी. जब सुरुचि ने उन्हें हकीकत बताई तो उन्होंने एक संस्कारी महिला की तरह नसीहत दे डाली कि लड़की की डोली ससुराल जाती है और अर्थी ही वहां से बाहर निकलती है. इस के बाद नियति मान कर सुरुचि अपनी जिंदगी काटती जा रही थी.

मातापिता के निधन के बाद मधुर ने अपनी बचीखुची लोकलाज भी बेच खाई. अब वह दिन में भी भाभी वंदना के कमरे में जाने लगा था. सुरुचि की हैसियत अब उस घर की बस एक नौकरानी के समान रह गई थी.

अपने मायके वालों से मिलने के बाद आरुषि अपनी जुड़वां छोटी बहन से मिलने उस की ससुराल आई. जिस वक्त वह वहां पहुंची, मधुर घर पर नहीं था.

सुरुचि के उतरे चेहरे को देख कर जब उस ने उस से पूछा तो सुरुचि ने उसे सारी आपबीती बयां कर दी.

“तुम इतने सालों से इस नरक में अपनी जिंदगी कैसे गुजार रही हो? पापा ने तुम्हारी सहायता नहीं की, फिर भी इस गंद के खिलाफ तुम्हें आवाज उठानी चाहिए थी. जब तुम ने अपने लिए कुछ नहीं किया तो किसी और से उम्मीद कैसे कर सकती हो? चलो मेरे साथ, जो होगा देखा जाएगा और हां, यहां जो जमीन तुम्हारे नाम की गई है, उसे किसी को सौंपने का ख़याल भी मत लाना. उस पर तुम्हारे सासससुर ने बस तुम्हारा हक सौंपा है.”

आरुषि की बातों से हेमांग के चेहरे पर सहमति के भाव परिलक्षित हो रहे थे.

मधुर बाहर से आ कर सीधे अपनी भाभी वंदना के कमरे में गया. वहां उसे पता चला कि सुरुचि की बहन आई हुई है.

आरुषि ने सुरुचि से उस के बैग संभालने को कह कर उस से अपने साथ चलने को कहा.

वे लोग निकलने ही वाले थे कि सामने से मधुर आता हुआ दिखा, बेशर्म की तरह दांत निपोरते हुए बोला, “जितना ज्यादा दिन हो सके, अपनी इस बहन के साथ ही रहना. कुछ दिन मैं भी अपनी जिंदगी सुकून से जी सकूंगा. और हां, साली साहिबा, मेरा समय अच्छा था कि आप शादी के पहले ही साढ़ू जी के साथ भाग गईं. थोड़ीबहुत जिंदगी जो मैं जी रहा हूं, उस का मजा भी किरकिरा हो जाता क्योंकि आप की खुबसूरती देख मैं खुद को 2 नावों में सवार होने से नहीं रोक पाता और मैं एकसाथ 2 नावों पर पैर रख कर गिरने का खतरा मोल नहीं लेना चाहता.”

हेमांग गुस्से में मुट्ठी भींच कर मधुर की तरफ बढ़ा. मगर आरुषि ने उस के हाथ पकड़ लिए और जातेजाते यह कह कर गई, “सुरुचि अब तुम्हें जल्दी ही पूरी तरह आजाद कर देगी, जा कर तलाक के कागजात भिजवाती हूं. बस, उस संपत्ति की उम्मीद मत करना जो तुम्हारे पेरैंट्स ने सुरुचि के नाम किया है.”

समय अपनी निर्बाध गति से बढ़ता रहा. सुरुचि और मधुर का तलाक हो गया. कुछ वर्षों बाद ही हेमांग का एक विधुर दोस्त धवल ने सुरुचि के सामने शादी का प्रस्ताव रखा. धवल एक सुलझा हुआ इंसान था. सुरुचि ने इस शादी के लिए हामी भर दी और अपनी बची जिंदगी के लिए खुशियों के कुछ कतरे सहेजने में जुट गई. 2 साल बाद बेटी आन्या ने उन की जिंदगी में आ कर उसे और भी खुबसूरत बना दिया.

समय बीतता रहा. बच्चे बड़े हो गए. हृदयंश और हिमांगी ने हेमांग के बिजनैस में अपना सहयोग देते हुए उसे और बढ़ाया. दोनों ने मातापिता का आशीर्वाद ले कर अपनी पसंद की जीवनसाथी चुना और कुछ समय बाद अपनाअपना घर ले कर एक ही शहर में रिश्ते की मिठास को सहेजे खुशहाल जिंदगी का आनंद लेने लगे.

वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता, करवट लेना उस का स्वभाव है. 2020 में पूरे विश्व में कोरोना का प्रकोप फैला. लौकडाउन लगा. तमाम बंदिशों के बीच पता नहीं कैसे हेमांग, आरुषि और उन के 2 नौकर कोविड पौजिटिव पाए गए.

कोरेंटाइन और फिर हौस्पिटल के तमाम इंतजामों के बावजूद हेमांग को बचाया नहीं जा सका. दोनों बच्चों और सुरुचि के परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. उस की जिंदगी को सहेजने वाला हेमांगरूपी एक खंभा धराशायी हो चुका था और दूसरा खंभा जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहा था. आरुषि की हालत के मद्देनजर डाक्टर ने उसे हेमांग के बारे में बताने को मना किया था. बारबार वह हेमांग की हालत के बारे में पूछती, “कैसे हैं हेमांग?”

“ठीक हैं, सुधार हो रहा है,” कह कर उस की बात को टाल दिया जाता. ऐसा कहते वक्त परिवार का वह सदस्य किस मानसिक जद्दोजहेद को झेल रहा होता, इस का सही से शाब्दिक बयान कर पाना किसी के वश का नहीं.

आरुषि कहती, “हम दोनों को एक ही कमरे में क्यों नहीं रखवा देते?”

जवाब मिलता, “डाक्टर ने कहा है कि 2 बीमार एक कमरे में नहीं रह सकते.”

अपनी जंग में आरुषि भी वैंटिलेटर पर आ गई. 5 दिन वह वैंटिलेटर पर रही. इन्फैक्शन लिवर तक पहुंच गया था. आखिरकार एक और जिंदगी हार गई, मौत जीत गई.

हेमांग को गुजरे 11 दिन हो चुके थे. अगले दिन उन की बारहवीं थी. देररात आरुषि की तबीयत ज्यादा बिगड़ने लगी और सुबह 4 बजे उस ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, बिना यह जाने कि अब उस का सुहाग भी इस दुनिया में नहीं है. आरुषि के चले जाने से हेमांग की बारहवीं भी उस दिन नहीं हो पाई. उन दोनों के बारहवीं की रस्म आरुषि के जाने के बारह दिनों बाद एकसाथ ही की गई.

कहते हैं, रिश्ता ऊपर से बन कर आता है पर इन दोनों ने अपना रिश्ता खुद बनाया, सामाजिक नियमों और परंपराओं के परे जा कर अपनी हिम्मत और कर्मों से निर्धारित किया. इस दुनिया को अलविदा कहते हुए अपने पीछे छोड़ गए अपने बच्चों के लिए गहरा दर्द और सामाजिक उसूलों व संस्कारों की दुहाई देने वाले लोगों के लिए ये वाक्य- ‘हेमांग और आरुषि एकदूसरे के लिए ही बने थे. हेमांग के बिना आरुषि जिंदा नहीं रह पाती. उस के जाने की खबर बरदाश्त नहीं कर पाती. इसलिए हेमांग अपने साथ आरुषि को भी ले गए.’

साथसाथ जिंदगी जीने के बाद इन दोनों ने अपनी मौत भी ऊपर वाले से एकसाथ ही मांग ली थी. जो लोग इन के घर छोड़ कर जाने से नाराज थे उन लोगों के लिए इन का प्रेम अब एक मिसाल बन चुका था, जो जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद भी एकदूसरे के ही बन कर रहेंगे. यह प्रेम लोगों के लिए एक शाब्दिक मिसाल बन चुका था, जो कुछ समय बाद उन की सोच में सामान्य हो जाएगा. लेकिन इन के अपने बच्चों और सुरुचि के परिवार पर इन के जाने का सचमुच फर्क पड़ा था और बहुत फर्क पड़ा था, जिस से उबरने में उन्हें काफी समय लगेगा. समानांतर चलती दोनों कहानियां अपनाअपना समय ले कर आई थीं.

26 January 2025 : निडरता

26 January 2025 : 965 की लड़ाई चल रही थी. यूनिट को मोरचाबंदी करने के लिए बहुत कम समय दिया गया था. पूरा डिव 5 सितंबर को सांबा से आगे बैजपुरा इलाके में फैल गया था.
मुझे याद है 7 सितंबर को रात में 11 बजे हमारे तोपखाने ने अपनी तापों के मुंह खोल दिए थे. पूरा पश्चिम लाल हो गया था. सभी जवान और अधिकारी बाहर आ गए थे. उसी समय आदेश आया कि एडवांस वर्कशौप डिटैचमेंट जाएगी. उस के लिए पहले से 2 गाड़ियां तैयार की गई थीं. एक में जनरल स्टोर, वैपन स्टोर और इलैक्ट्रौनिक स्टोर था जिस का इंचार्ज मैं था. दूसरी गाड़ी में गाड़ियों और टैंकों के स्पेयरपार्ट्स थे जिस का इंचार्ज एक बंगाली स्टोरकीपर अमल कुमार दत्ता था. मैं पंजाब का और दत्ता बंगाल का, दोनों ही निडर थे. मेरी गाड़ी का ड्राइवर एक मद्रासी लड़का सिपाही राजू था. दूसरी गाड़ी का ड्राइवर सिपाही सुरिंदर पंजाब से था. बंगाल और पंजाब का संगम था. सब निडर थे.

जब हम ने और गाड़ियों के साथ मूव किया तो रात को एक बज चुका था. बिना लाइट के चलना था. लड़ाई में लाइट जला कर नहीं चला जाता. लाइट जले, तो गोला वहीं आता है. यह अच्छा हुआ था कि चांदनी रात थी. हालांकि पाकिस्तान चौकी ज्यादा दूर नहीं थी लेकिन पाकिस्तान में घुसने में सुबह के 5 बज गए. डोगरा रैजिमैंट के जवान हमें गाइड कर रहे थे. उन्होंने कहा, ‘गाड़ियों को तुरंत डिस्पर्स करें. एयरअटैक होने वाला है. ऐसे समय वृक्षों के नीचे जहां भी जगह मिलती है, गाड़ियां पार्क की जाती हैं. वहीं लेट जाना होता है.

अभी गाड़ियां पार्क हो ही रही थीं कि जबरदस्त एयरअटैक हुआ. ऐसे अटैक फर्स्ट लाइट में किए जाते हैं जब सभी रिलैक्स होते हैं और जंगल-पानी जाने के चक्कर में रहते हैं. एयरअटैक खत्म हुआ तो सभी पाकिस्तान में आसपास के खेतों में चले गए. हमारे पास घिसी करने के अलावा कोई चारा नहीं था. मेरे स्टोर में लिक्विड सोप था. उसे हाथ पे मला और वाटर टैंक से बूंदबूंद आते पानी से हाथ साफ कर लिए. कई तो यह भी नहीं कर सके. हैंडटूहैंड लड़ने वाले जवान ऐसी स्थिति से कैसे निबटते होंगे, केवल अनुमान ही लगा सकते हैं. ये नैचुरल कौज किसी के रोके नहीं रुकती है. पर सब मैनेज करना पड़ता है.

पौ फट रही थी. उसी समय हुकम हुआ कि अपनाअपना नाश्ता और लंच ले लो. हमें तुरंत आगे मूव करना है. नाश्ता क्या था, नमकीन शकरपारे थे. उन्हें ही हमें नाश्ते और लंच के लिए इस्तेमाल करना था. आदेश ऐसा था जो भी खाकी यूनिफौर्म में दिखाई दे उसे तुरंत गोली मार दें. फ्रंट सीट पर मैं बैठा था. गाड़ी के ऊपर का ढकन खोल कर सीट पर खड़ा हो गया. कारबाइन मशीन को फायरिंग पोजिशन पर ले आया. चार्ज मैंगजीन कर लिया यानी एक गोली चैंबर में चली गई. सेवटी कैच को रैपिडफायर पर कर लिया ताकि फायर करने की जरूरत पड़े तो बैरल से एकएक या दोदो गोलियां निकलें.

हमारे अगले डैस्टिनेशन के बीच पाकिस्तान का केवल चारवां गांव था. हमें महाराजके गांव में मोरचाबंदी करनी थी. दोनों गांवों में काफी दूरी थी. हमें चारवां में कोई दुश्मन नहीं मिला. हां, रास्ते के दृश्य देख कर मन विचलित हुआ. सैकड़ों लाशें जगहजगह पड़ी थीं. लाशें फूल कर डरावनी हो गई थीं. आसमान में हजारों चीलकौए मंडरा रहे थे मानव मांस खाने का लुत्फ उठाने के लिए. उन के लिए हिंदुस्तानपाकिस्तान के शवों में कोई अंतर न था. वे नरभक्षी थे.

मुझे आश्चर्य हुआ कि यह जानते हुए भी कि हिंदुस्थान कई फ्रंट खोल सकता है, पाकिस्तान ने अपने गांव खाली क्यों नहीं करवाए. मरने वाले सभी सिविलयन थे. शवों को बुल्डोजर से इकट्ठा कर के दफनाया जा रहा था. सेना के इंजीनियर विभाग के जवान इस कार्य को अंजाम दे रहे थे. सेना में आए मुल्ले उन के लिए कलमा पढ़ रहे थे, सजदा कर रहे थे. यह भारतीय सेना का मानवीय पक्ष था कि वे दुश्मन के शवों को भी सम्मान देते हैं. हमारे शहीद जवानों को पीछे अस्पतालों में भिजवाया जा रहा था जिस से उन के घरवालों के आने तक सुरक्षित रखा जा सके.

महाराजके गांव तक पहुंचने के रास्ते में 2 बार एयरअटैक हुए. गाड़ियां जल्दी से दूरदूर डिस्पर्स कर के, जिस को जहां जगह मिली, लेट गए. सुरक्षा के लिए ऐसा करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं होता. गाडियों का नुकसान भरा जा सकता है लेकिन जवान शहीद हो जाएं तो उस नुकसान को भरना मुश्किल होता है. यह अच्छा हुआ कि दोनों एयरअटैक में हमारा कोई नुकसान नहीं हुआ.

महाराजके के सामने बड़े मैदान में यूनिट ने राउंडशेप में मोरचाबंदी कर ली. यानी, चारों तरफ मोरचे, बीच में दूरदूर गाड़ियों का डिस्पले. गाड़ियां भी इस तरह पार्क की जातीं कि एक का मुंह अगर पूर्व की तरफ है तो दूसरी का मुंह पश्चिम की तरफ होता. उस के बाद कैमाफ्लाइज नेट लगा कर इस तरह छिपाया जाता कि किसी को पता नहीं चलता कि यहां कोई गाड़ी पार्क है.

लड़ाई में हमारी वर्कशौप पर जबरदस्त लोड था. हालांकि, हमारी रिपेयर टीमें फास्टमूविंग लाइटें ले कर रैजिमैंटों के साथसाथ चलती थीं. टैंक या गाड़ियां रिपेयर कर के तुरंत लड़ाई में शमिल कर देते थे. टैंक या गाड़ियां पीछे वर्कशौप में वही आती थीं जो रिपेयर टीमें ठीक नहीं कर पातीं.

उस समय हमारे पास सेंचुरियन और शरमन टैंक थे. दोनों टैंक ब्रिटिश मेड थे. सारे पश्चिमी देश पाकिस्तान के साथ थे. शरमन टैंक ठीक चल रहे थे लेकिन सेंचुरियन टैंक में गन को घुमाने वाला पुर्जा ‘फंक्शन एंड कंट्रोल यूनिट’ खराब हो जाता था. गन फायर तो करती लेकिन चारों तरफ घूम नहीं पाती थी. ब्रिटेन ने इस पुर्जे के लिए हाथ खड़े कर दिए थे.

शरमन टैंक पाकिस्तान के पैर्टन टैंक का मुकाबला नहीं कर पाते थे. स्टोर में जितना फंक्शन एंड कंट्रोल था, वह खत्म सा हो गया था. हमारा चेक यह होता था कि पुराना ले कर नया देते.

टैलीकौम आइटम था. सभी अफसर और टैलीकौम मेकैनिक इसे ठीक करने में लगे हुए थे. इस छोटे से पुर्जे के कारण जिस तरफ गन का मुंह होता उसी तरफ वह फायर कर पाती थी. पाकिस्तान के पैर्टन टैंक उन्हें आसानी से शिकार बना लेते. काफी नुकसान हो रहा था.

फिर एक टैलिकौम मेकैनिक हवलदार लाल सिंह के मन में आइडिया आया कि यह एक फ्यूज है जिस के कारण यह पुर्जा काम नहीं कर पाता. अगर इसे किसी गुडकंडक्टर से जोड़ दिया जाए तो वह फ्यूज का काम करने लगेगा. वे मेरे पास स्टोर में आए और 2 तरह की पैकिंगवायर ले कर गए. मैं पैकिंगवायर की डिस्क्रिप्शन नहीं दे सकता. उन्होंने प्रयोग किया और वे सफल रहे. टैंक पर लगा कर उसे टैस्ट किया गया. गन चारों तरफ घूमने लगी. समस्या का समाधान हो गया था. रिपेयर टीम को बता दिया गया कि यह पैकिंगवायर का टुकड़ा फ्यूज का काम करेगा. फिर टैंक नहीं रुके.

रन-औॅफ-कछ की छोटी सी लड़ाई में कुछ पैर्टन टैंक पकड़े गए थे. उन पर प्रयोग किए गए कि कौन से गोले से इसे बरबाद किया जा सकता है. तीन तरह के गोले तैयार किए गए. एक गोला ऐसा था जो टैंक में सुराख कर के अंदर के क्रीयू को खत्म करता. टैंक को वैसे ही कैप्चर कर लिया जाता. एक गोला हवा में फट कर आसपास लेटे दुश्मनों को समाप्त करता. एक गोला ऐसा था जो टैंक में आग लगा देता. आदेश यह था कि ज्यादा से ज्याद टैंक कैप्चर किए जाएं. आज देश में जगहजगह वही टैंक खड़े हैं.

हमारा रियर कपूरथला में था. वहां से जल्दी मूवमैंट के कारण बहुत सा स्टोर रह गया था. लड़ाई में उन की सख्त जरूरत थी.

एक पार्टी बनाई गई जिसे कपूरथला से सारा स्टोर लाने के लिए कहा गया. उस पार्टी में मैं भी था. एक और हवलदार सरदूल सिंह थे जिन का घर जालंधर के पास किसी गांव में था. मेरा घर अमृतसर में था. हम दोनों से कहा गया 2 दिन अपने घर में रह कर कपूरथला रिपोर्ट करना. मकसद यह था कि जिन के घर पंजाब में हैं और रास्ते में आते हैं, वे अपने घरवालों से मिल लें. उन्हें कुछ तसल्ली हो जाएगी कि वे ठीक हैं.

कपूरथला के लिए गाड़ी लंच के बाद चली. चाहते थे, दिन में जितना सफर हो जाए, अच्छा है. लेकिन पठानकोट पहुंचते ही रात के 8 बज गए थे. वहां साथ लाया डिनर किया और आगे का सफर शुरू किया. गाड़ी से बटाला-बाबा-बकाला होते हुए जालंधर से कपूरथला चले जाना था. अंधेरे में ही सफर करना था. लड़ाई में गाड़ी की लाइटें नहीं जला सकते थे.

गाड़ी अमृतसर के रास्ते जाती तो मैं अमृतसर उतरता. मैं ने गुरदासपुर में उतरने का निर्णय किया. गुरदासपुर में मेरी मौसी रहती थी. रात वहां गुजारने की सोची. ड्राइवर ने जब मुझे गुरदासपुर उतारा तो रात के 10 बज चुके थे. चारों तरफ गुप अंधेरा था. बलैकआउट था. कोई बंदा दिखाई नहीं दे रहा था. मैं यूनिफौर्म में था और कारबाइन मशीन मेरे कंधे पर थी.

मैं पैदल ही मौसी के घर की ओर चल पड़ा. उसी समय पंजाब पुलिस का एक सिपाही मेरे पास आया. वह बरसते गोलों में भी अपनी ड्यूटी कर रहा था. साइकिल उस के पास थी. पंजाबी में पूछा, ‘‘बाऊजी, तुसीं कित्थे जाना ऐ?’’

मैं ने कहा, ‘‘कृष्णा महल्ले में मेरी मौसी रहती है. मैं ओथे जा रहया हां.’’

‘‘बाऊजी, मेरी साइकिल ते बैठो. मैं तुहानू छड देदां हां. चाहे तुसीं फौजी हो, लड़ाई दा टाइम ऐ. मैं कोई रिस्क नई लैना चाहदां.’’

मुझे बहुत अच्छा लगा. मैं ने कहा, ‘‘कोई गल नई, तुसीं छड दो.’’

पुलिस के सिपाही ने मुझे मौसी के घर छोड़ा. मैं ने उस का धन्यवाद किया. मैं ने मौसी का दरवाजा खटखटाया और कहा कि, ‘मैं बिंदी हूं.’ दरवाजा तुरंत खुल गया. सिपाही तब तक नहीं गया जब तक मैं घर के अंदर नहीं चला गया. सभी बैठक में रेडियो के पास बैठे खबरें सुन रहे थे. मैं ने मौसाजी को प्रणाम किया. कलानौर से मेरे मझले मामाजीमामीजी भी आए हुए थे. कलानौर डेरा बाबानानक के पास था और तोप के गोलों की रेंज में था. मैं ने उन्हें भी प्रणाम किया.

मेरा नाना परिवार और दादा परिवार जानते थे कि मैं लड़ाई में गया हूं. वे सब मेरे लिए चिंतित थे. मुझे यूनिफौर्म और हथियार के साथ देख कर थोड़ी देर के लिए चिंता मिट गई. मैं ने बताया कि हमारी यूनिट पाकिस्तान में चविंडा के पास महाराजके गांव में है. हम तोप के गोलों से तो दूर हैं लेकिन एयरअटैक से बच नहीं पाते हैं. फिर भी रातदिन काम करते हैं. गुप अंधेरे में भी. दो दिन अमृतसर रह कर कपूरथला से स्टोर ले कर लड़ाई में शमिल होना है. कपूरथला में हमारा रियर है.

‘‘चविंडा में तो बहुत जबरदस्त लड़ाई चल रही है. रेडियो पर यही बताया जा रहा,’’ मौसा जी ने कहा.

‘‘जी, मौसाजी. चविंडा हम से 3 किलोमीटर आगे है. हमारे वापस जाने तक उन्हें सियालकोट से पीछे धकेल दिया जाएगा. वैसे, अल्लड़ रेलवे स्टेशन पर हमारा कब्ज़ा हो गया है. इस से सियालकोट से डेरा बाबा नानक की रेल सप्लाई बंद हो गई है. सड़कों के रास्ते पहले ही बंद कर दिए गए थे.’’

मामीजी ने मेरे लिए आलू के परांठे बनाए और खा कर मैं सो गया. सुबह नाश्ता कर के मैं अमृतसर के लिए निकला. लड़ाई में भी बसें चल रही थीं. मझले मामाजी भी मेरे साथ हो लिए. मैं यूनिफौर्म में और हथियार के साथ था. प्राइवेट बस थी, फिर भी बस वाले ने मुझ से किराया नहीं लिया. बस में बैठी सवारियों के चेहरों पर कोई डर नहीं था. सभी मुझ से लड़ाई के बारे जानना चाहते थे. मैं ने कहा, ‘‘मैं ज्यादा नहीं बता सकता लेकिन उन की बैंड बज रही है.’’

वे जानना चाहते थे कि मैं इस समय कहां हूं. मैं ने कहा, ‘‘मैं सुरक्षा कारणों से अपनी लोकेशन नहीं बता सकता. हां, सियालकोट सैक्टर में हूं.’’

फिर किसी ने कोई सवाल नहीं किया. एक जगह बस रुकी. दो युवा लड़कियां बस में चढ़ी. उन के हाथ में लिफाफे और चाय का थरमस व कप थे. वे फौजियों को ढूंढ़ रही थीं. मुझे देखा तो तुरंत मुझे एक लिफाफा और गरमगरम चाय दी. मैं ने मामू के लिए भी मांगा. उन्होंने खुशी से दी. पंजाब में फौजियों के लिए जगहजगह खानेपीने की व्यवस्था थी. कोई जवान भूखा न जाए, ऐसी व्यवस्था जम्मूपठानकोट रोड पर भी थी. लगा पूरा देश लड़ाई लड़ रहा है. लिफाफे में गरमगरम पकौड़े थे.

उन दिनों फौजी गाड़ियों की बहुत मूवमैंट थी. कोई भी फौजी बिना खाएपिए नहीं जा पाता था. यह देशवासियों की बहुत बड़ी सेवा थी. उन्हें किसी ने ऐसा करने के लिए नहीं कहा था. अपने मन से वे सब सेवा कर रहे थे. देश के प्रति उन का यह जज्बा आश्चर्यजनक था. एक मोरचा युद्ध के मैदान में था जिसे हम सैनिक संभाले हुए थे, एक मोरचा हमारे देशवासी यहां संभाले हुए हैं. मैं उन की इस सेवा के समक्ष नतमस्तक हो गया.

अमृतसर बसस्टैंड पर उतरा तो मामू मेरे साथ नहीं आए. मैं ने उन से कहा भी लेकिन उन्होंने कहा, ‘‘मैं पहले मौडल टाउन बड़ी बहन के पास जाऊंगा.’’

फिर मैं कुछ नहीं बोल पाया. स्टैंड से बाहर निकला तो कई रिक्शेवाले पूछने लगे कि बाऊजी कहां जाना है. हम छोड़ देते हैं. फिर एक रिक्शेवाले ने कहा, ‘‘मैनू तुहाडे घर दा पता ऐ. तहसीलपुरा में है.’’

मैं ने उसे ध्यान से देखा. यह ज्ञान सिंह था. मेरे साथ चौथी तक पढ़ा था. मैं उस के रिक्शे पर बैठ गया, कहा, ‘‘यार, मेरे कोल टुटे पैसे नहीं ए.’’

‘‘कोई गल नई, बाऊजी. तुसीं देश दी सेवा कर रहे हो. असीं फौज च जाके सेवा नई कर सकदे. एह छोटी जेई सेवा कर के सानू लग्गेगा कि असीं वी लड़ाई लड़ रहे हां.’’

मैं कुछ नहीं बोल पाया. भावुक हो उठा. मैं ने बात बदल दी, ‘‘ज्ञान, तुसीं अग्गे नई पढ़े?’’

‘‘कित्थे बाऊजी, गरीबी ऐनी सी दालरोटी नई चल पांदी सी. मैं छोटा सी, मैंनू मजदूरी वी नई मिलदी सी. मां कई जगह झाडूपोंचा करती थी. मैं बड़ा हुआ तां मेरे पास रिक्शा चलान दे अलावा कोई चारा नई सी.’’

घर आया तो मैं ने घर से पैसे ले कर देने की कोशिश की लेकिन उस ने नहीं लिए. घर वाले मुझे देख कर खुश हुए. दो दिन रह कर मैं जीटी रोड पर आ गया. बहुत सी फौजी गाड़ियां जालंधर जा रही थीं. एक गाड़ी में जगह मिल गई. उस ने जब मुझे कपूरथला रोड पर छोड़ा तो अंधेरा घिर आया था. उस समय बस मिलने का कोई चांस नहीं था. मैं पैदल ही कपूरथला की ओर चल पड़ा.

मेरे पीछे आ रहे एक साइकिल वाले ने पूछा, ‘‘साहब जी, तुसीं कित्थे जाना ऐ ते पैदल ही क्यों जा रहे हो?’’

उन दिनों फौजियों की पंजाब में बहुत इज्जत थी. मैं ने कहा, ‘‘मैंनू कपूरथला जाना ऐ. पैदल चलूंगा तो सुबह तक पहुंच जाऊंगा.’’

‘‘साहब जी, कपूरथला ऐथों 20 किलोमीटर दूर ऐ. ऐस वेले कोई सवारी वी नई मिलनी ऐ. सवेरे 8 बजे बस आएगी, ओदे च चले जाना. रात मेरे घर रुको जी.’’

मैं जल्दी से निर्णय नहीं कर पाया. लड़ाई चल रही है, किसी अनजाने घर में रुकना ठीक रहेगा या नहीं?

‘‘तुसीं कुज न साचो जी. रात दा वेला ऐ. ऐस सड़क ते सारे पिंड पैरा दे रहे ने. कई तुहानू परेशान कर सकदे ने. चाहे तुसीं वर्दी च हो. कई घटनावां होइयां ने फौजियों से हथियार लूट कर ले गए हैं.’’

मैं ने कुछ देर सोचा, फिर उस के साथ हो लिया. उस के घर में मेरी जबरदस्त सेवा की गई. बढ़िया खाना मिला और शानदार बिस्तर दिया गया. रात मैं ने आराम से काटी. सुबह उस का धन्यवाद कर के बस के लिए मैं सड़क पर आ गया. उन अनजान लागों की सेवा को मैं जीवनभर भूल नहीं पाया.

थोड़ी देर बाद हवलदार सरदूल सिंह भी बस के लिए मेरे पास आ कर खड़े हो गए. मैं ने उन्हें जयहिंद कहा. उन्होंने मुझ से हाथ मिलाया. कपूरथला रियर में पहुंचे तो नाश्ता तैयार था. नाश्ता किया और वापस चल पड़े. स्टोर पहले ही गाड़ी में लोड कर दिया गया था. लंच नहीं बनाया गया था. जगहजगह लगाए गए लंगर से खाने का इरादा था.

शाम को हम पठानकोट पहुंचे. लंगर से लिया डिनर किया और आगे का सफर शुरू किया. यूनिट में हम रात को एक बजे पहुंचे. सभी मोरचों पर थे. गाड़ी पार्क कर के हम भी मोरचे पर खड़े हो गए. सोने का प्रश्न ही नहीं था. रात को एयरअटैक नहीं होते थे लेकिन घात लगा कर बैठे दुश्मन के अटैक करने का हमेशा खतरा था. उस के लिए पूरी यूनिट मोरचे पर रहती थी.

22 दिन की इस लड़ाई में न सो सके, न नहा सके और न ही ठीक से खाना मिला. पाकिस्तान के कई कुओं में जहर मिलाया गया था. वे नहाने के काबिल भी नहीं थे. स्किन डिजीज होने का खतरा था. वाटर टैंकों से हिंदुस्थान से पानी आता था. केवल 2 बोतल पानी मिलता. उस से आप कुछ भी कर लें. काम करते हुए खुद को बचाने की प्राथमिकता थी.

वर्कशौप में हमारे सैक्शन की जिम्मेदारी होती थी कि हम कलपुर्जों की कमी न होने दें. पहले कहा गया कि सिर्फ ब्रिगेड की गाडियों की रिपेयर करेंगे. फिर कहा गया, पूरे डिव की गाड़ियों को एंटेरटेन करेंगे. हमारी पूरी सप्लाई सिविल ट्रकों पर थी. उन पर एयरअटैक कम होते थे. उन्हें भी रिपेयर करने के आदेश आए. मैं और मेरे साथ एक अफसर रातदिन कलपुरजों को जम्मू, पठानकोट और जालंधर से कलपुरजे ला कर देते रहे. सभी सप्लायर दिल खोल कर सामान देते थे. विशेषकर पंजाब के सप्लायर. वे कहते थे, ‘‘तुसीं सामान लै जाओ जी. लैटरहेड ते लिख के दे दो. बिलिंग कर के पैसे आदें रहनगे. पर पाकिस्तान नू ओना दी नानी याद दिला दो.’’

सीजफायर के बाद वे खुद महाराजके आ कर सप्लाई करते रहे. उन के बिलों के 6 महीने बाद पेमेंट किया जाना शुरू किया गया. ट्रकों के पेमेंट एक साल बाद तक किए जाते रहे. लडाकू फौज के जवान बताते हैं कि जहां ट्रक में 10 टन माल आता था, वे 12 टन माल लाते थे. इतने बहादुर थे कि कहते थे, ‘‘साहब जी, तुसीं सिर्फ लड़ो. सानू दसों कि माल कित्थे अनलोड करना ऐ.’’ उन्होंने मोरचे तक सामान पहुंचाया बिना किसी डर के.

महाराजके गांव के तीन तरफ बड़ेबड़े गन्ने के खेत थे. बिलकुल पोने गन्ने. भूख लगती तो सभी गन्ने चूपते. नित्यकर्म के लिए हमारे स्टोर में कौटनवेस्ट आती थी. सभी उस का प्रयोग करते थे. कई बार ऐसा होता कि हम नाश्ता ले कर स्टोर में आ जाते. उसी समय एयरअटैक होता. एक बार मुझे नाश्ता गाड़ी की टेलबोल्ट पर रखने का समय नहीं मिला. मैं ने उसे जमीन पर रखा और मोरचे पर आ गया. मेरी आंखों के सामने कुत्ता नाश्ता खा गया, मैं कुछ नहीं कर सका. यह नहीं पता चला कि वह कुत्ता पाकिस्तान का था या हिंदुस्तान का. उन के लिए कोई बौर्डर का बंधन नहीं था.

मुझे बाऊजी कहा करते थे कि जो दाना समय में न हो, उसे मुंह से भी गिर जाना है. उन की यह बात कितनी सच थी.

सीजफायर के बाद एमईएस से कहा गया कि वे हर यूनिट में ट्यूबवैल लगाएं. कई कौमन ट्यूबवैल भी लगाए गए जहां से वाटरटैंक से मैस के लिए पानी आता था. पूरा खाना औयलकुकरों पर बनता था जो बहुत शोर करते थे. उन के लिए गहरे मोरचे खोदने पर भी शोर कम न होता था. हमें चाय के साथ कभी नमकीनपूरी मिलती और कभी शक्करपारे मिलते. 22 दिन तक यही सिलसिला रहा.

सीजफायर के बाद सारी व्यवस्थाएं हो गईं. तब सभी के चेहरों पर सुकून दिखाई देने लगा. लड़ाई फिर कभी भी शुरू हो सकती है, इसलिए रिपेयर का जबरदस्त लोड हो गया. हम रातदिन कलपुर्जों के लिए भागते रहे. हां, नहाने और खाने की व्यवस्था ठीक हो गई.

इस बीच, ताशकंद समझौते के बाद प्रधानमंत्री लालबहादुर शस्त्री जी के मरने की खबर आई. पूरा देश शोक में डूब गया. भारतीय सेना को उम्मीद थी कि पाकिस्तान के जीते हुए इलाके के बदले पीओके ले लिया जाएगा. लेकिन ऐसा न हो सका. सेना इस समझौते से निराश थी. 6 महीने वहां रहने के बाद आदेश आया, 31 मार्च, 1966 तक हमें सारा इलाका खाली करना है. भारतीय सेना अनुशासनप्रिय है. वह आदेशों का पालन करती है.

छोड़ते समय कैंप फेयर होता है. बड़ा खाना किया जाता है. शहीदों को नमन किया जाता है. उन के परिवारों के लिए शोकसभा आयोजित की जाती है. जो घायल हैं उन के जल्दी ठीक होने की उम्मीद व्यक्त की जाती है. ठीक होने पर भी वे दोबारा सर्विस में आने के काबिल नहीं रहते. किसी का बाजू नहीं होता, किसी की टांग नहीं होती है. हां, उन का अच्छी तरह इलाज कर के मैडिकल पैंशन के साथ अन्य सुविधाएं दे कर घर भेज दिया जाता है. जिला सैनिक बोर्डों के जरिए उन्हें सरकारी नौकरियों में एडजस्ट किया जाता है. शहीद परिवारों के साथ भी ऐसा ही किया जाता है. कोशिश होती है कि उन्हें यों ही सड़क पर न छोड़ा जाए.

पाकिस्तान छोड़ने के बाद हमें जम्मू के पास छनियां गांव में जगह मिली. वहां काफी देर रहे यह सोच कर कि पाकिस्तान फिर कोई गड़बड़ न करे. इतने बड़े डिव की यूनिटों को पंजाब में एडजस्ट करना मुश्किल था. हमारी यूनिट को पटियाला में राजिंदरा अस्पताल के पास अंगरेजों के समय की बनी बैरकों में जगह मिली. उस से थोड़ा आगे यूनिट को वर्किंग प्लेस मिला. पूरा स्टोर सैट करने में एक महीना लग गया. तब कहीं जा कर पहली लीवपार्टी गई. उस में मेरा नाम नहीं था. मैं ने घर में लिख दिया था कि मैं ठीक हूं, छुट्टी मिलने पर आऊंगा. मैं आता हूं या नहीं, घरवालों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था. उन्हें पैसा चाहिए होता था, वह मिल रहा था. बाऊजी को छोड़ कर पूरा परिवार मेरे प्रति अभावुक था. परिवार में यह स्थिति हमेशा रही.लड़ाई में देश की निडरता और देशवासियों के सहयोग को मैं कभी भूल नहीं पाया.

 

Hindi Storytelling : पांचवां मौसम प्‍यार का

Hindi Storytelling : किशोरावस्था में पनपा प्यार परवान चढ़े यह खुशनसीबी सब को हासिल नहीं होती. मौसम, मीनू, नीरा सब की जिंदगी प्यार की खुशबू से महकी लेकिन क्या कोई भी अपने पहले प्यार का साथ जीवन भर पा सकी?
‘‘आज नीरा बेटी ने पूरे डिवीजन में फर्स्ट आ कर अपने स्कूल का ही नहीं, गांव का नाम भी रोशन किया है,’’ मुखिया सत्यम चौधरी चौरसिया, मिडिल स्कूल के ग्राउंड में भाषण दे रहे थे.
स्टेज पर मुखियाजी के साथ स्कूल के सभी टीचर, गांव के कुछ खास लोग और कुछ स्टूडेंट भी थे. आज पहली बार चौरसिया मिडिल स्कूल से कोई लड़की फर्स्ट आई थी जिस कारण यहां के लड़केलड़कियों में खास उत्साह था.
मुखियाजी आगे बोले, ‘‘आजतक हमारे गांव की कोई भी लड़की हाईस्कूल तक नहीं पहुंची है. लेकिन इस बार सूरज सिंह की बेटी नीरा, इस रिकार्ड को तोड़ कर आगे पढ़ाई करेगी.’’
इस बार भी तालियों की जोरदार गड़गड़ाहट उभरी. लेकिन यह खुशी हमारे स्कूल के एक लड़के को नहीं भा रही थी. वह था निर्मोही. निर्मोही मेरा चचेरा भाई था. वह स्वभाव से जिद्दी और पढ़ने में औसत था. उसे नीरा का टौप करना चुभ गया था. हालांकि वह उस का दीवाना था.

निर्मोही के दिल में जलन थी कि कहीं नीरा हाईस्कूल की हीरोइन बन कर उसे भुला न दे. आज गांव में हर जगह सूरज बाबू की बेटी नीरा की ही चर्चा चल रही थी. उस ने किसी फिल्म की हीरोइन की तरह किशोरों के दिल पर कब्जा कर लिया था. आज हरेक मां अपनी बेटी को नीरा जैसी बनने के लिए उत्साहित कर रही थी. अगर कहा जाए कि नीरा सब लड़कियों की आदर्श बन चुकी थी, तो शायद गलत न होगा.
वक्त धीरेधीरे मौसम को अपने रंगों में रंगने लगा. चारों तरफ का वातावरण इतना गरम था कि लोग पसीने से तरबतर हो रहे थे. तभी छुट्टी की घंटी बजी. सभी लड़के दौड़तेभागते बाहर आने लगे. कुछ देर बाद लड़कियों की टोली निकली, उस के ठीक बीचोंबीच स्कूल की हीरोइन नीरा बल खा कर चल रही थी. वह ऐसी लग रही थी, जैसे तारों में चांद.
नीरा जैसे ही स्कूल से बाहर निकली, निराला चौधरी को देख कर खिल उठी. नीरा, निराला के पास पहुंची और बोली, ‘‘बिकू भैया, आप यहां?’’ बिकू निराला का उपनाम था. निराला बोला, ‘‘मैं मोटर- साइकिल से घर जा रहा था. सोचा, तुझे भी लेता चलूं.’’ फिर दोनों बाइक पर एकदूसरे से चिपट कर बैठ गए. बाइक दौड़ने लगी. सभी लड़केलड़कियां नीरा के इस स्टाइल पर कमेंट करते हुए अपनेअपने रास्ते हो लिए.
मैं और निर्मोही भाई वहीं खड़ेखड़े नीरा की इस बेहयाई को देखते रहे. नीरा आंखों से ओझल हो गई तो मैं निर्मोही भाई के कंधे पर हाथ रख कर बोला, ‘‘क्या देखते हो भैया, भाभी अपने भाई के साथ कूच कर गई.’’
इस पर निर्मोही भाई गुस्से में बोला, ‘‘बिकूवा उस का भैया नहीं, सैंया है.’’
मैं ने उन को पुचकारा, ‘‘रिलैक्स भैया, देर हो रही है. अब हम लोगों को भी चलना चाहिए.’’
फिर हम दोनों अपनीअपनी साइकिल पर सवार हो कर चल दिए. रास्ते में निर्मोही भाई ने बताया कि बिकूवा अपने ही गांव का रहने वाला है. शहर में उस का अपना घर है, जिस में वह स्टूडियो और टेलीफोन बूथ खोले हुए है. वह धनी बाप का बेटा है. उस के बाप के पास 1 टै्रक्टर और 2 मोटरसाइकिल हैं. बिकूवा अपने बाप का पैसा खूबसूरत लड़कियों को पटाने में पानी की तरह बहाता है.
वक्त के साथसाथ निराला और नीरा का प्यार भी रंग बदलने लगा. कुछ पता ही नहीं चला कि निराला और नीरा कब भाईबहन से दोस्त और दोस्त से प्रेमीप्रेमिका बन गए. इस के बाद दोनों एकदूसरे को पतिपत्नी के रूप में देखने का वादा करने लगे. धीरेधीरे इन दोनों के प्यार की चर्चा गरम होने लगी.

निर्मोही भाई भी इस बात को पूरी तरह फैला रहे थे. कब नीरा हाईस्कूल गई, कब उस पर निराला का जादू चला और कब उस की लवस्टोरी स्कूल से बाजार और बाजार से गांव के घरों तक पहुंची, कुछ पता ही नहीं चला.
अब गांव की लड़कियां, जिन के दिल में कभी उस के लिए स्नेह हुआ करता था, अब वही उसे देख कर ताना कसने लगीं कि मिसेज निराला चौधरी आ रही हैं. कोई कहता कि आज नीरा बिकूवा के स्टूडियो में फोटो खिंचवाने गई थी. कोई कहता, आज वह बिकूवा के साथ रेस्टोरेंट जा रही थी. आज वह बिकूवा के साथ यहां जा रही थी, आज वहां जा रही थी.
ऐसी ही अनापशनाप बातें उस के बारे में सुनने को मिलतीं. लेकिन बात इतनी बढ़ जाने के बाद भी उस के घरवालों को जैसे कुछ पता ही नहीं था या फिर उन लोगों को नीरा पर विश्वास था कि नीरा जो कुछ भी करेगी उस से उस के परिवार का नाम रोशन ही होगा.
एक दिन जब निर्मोही भाई से बरदाश्त नहीं हुआ तो जा कर नीरा के मातापिता को उस की लवस्टोरी सुनाने लगे, वे लोग उस पर बरस पड़े. वहां का माहौल मरनेमारने वाला हो गया. लेकिन निर्मोही भाई भी तो हीरो थे. उन में हार मानने वाली कोई बात ही नहीं थी. गांव में जातिवाद का बोलबाला होने से स्कूल का माहौल भी गरम होता जा रहा था. स्कूल के छात्र 2 गुटों में बंट चुके थे. एक गुट के मुखिया निर्मोही भाई थे तो दूसरे के ब्रजेश. लेकिन उस गुट का असली नेता निराला था. दोनों गुटों में रोजाना कुछ न कुछ झड़प होती ही रहती.
उन्हीं दिनों 2 और नई छात्राएं मीनू, मौसम और एक नए छात्र शशिभूषण ने भी क्लास में दाखिला लिया. जब मैडम ने हम लोगों से उन का परिचय करवाया तो उन दोनों कमसिन बालाओं को देख कर मेरी नीयत में भी खोट आने लगा. मुझे भी एक गर्लफ्रैंड की कमी खलने लगी. खलती भी क्यों नहीं. वे दोनों लाजवाब और बेमिसाल थीं. लेकिन मुझे क्या पता था कि जिस ने मेरे दिल में आग लगाई है उस का दिल मुझ से भी ज्यादा जल रहा है. मैं मौसम की बात कर रहा हूं. वह अकसर कोई न कोई बहाना बना कर मुझ से कुछ न कुछ पूछ ही लेती. कुछ कह भी देती. उधर मीनू तो निर्मोही भाई की दीवानी बन चुकी थी. पर मीनू का दीवाना शशिभूषण था.

अब एक नजर फिर देखिए, शशिभूषण दीवाना था मीनू का. मीनू दीवानी थी, निर्मोही की. निर्मोही नीरा के पीछे दौड़ता था. नीरा निराला के संग बेहाल थी, इन पांचों की प्रेमलीला देख कर मुझे क्या, आप को भी ताज्जुब होगा. मगर मेरे और मौसम के प्यार में ठहराव था. हम दोनों की एकदूसरे के प्रति अटूट प्रेम की भावना थी. तब ही तो चंद दिनों में ही मैं मौसम का प्यार पा कर इतना बदल गया कि मेरे घरवालों को भी ताज्जुब होने लगा. मैं और मौसम अकसर टाइम से आधा घंटा पहले स्कूल पहुंच जाते और फिर क्लास में बैठ कर ढेर सारी बातें किया करते.

उधर नीरा को मीनू और मौसम से बेहद जलन होने लगी क्योंकि ये दोनों लड़कियां नीरा को हर क्षेत्र में मात दे सकती थीं और दे भी रही थीं. वैसे तो पहले से ही स्कूल में नीरा की छवि धुंधली होने लगी थी लेकिन मीनू और मौसम के आने से नीरा की हालत और भी खराब हो गई.
पढ़ाई के क्षेत्र में जो नीरा कभी अपनी सब से अलग पहचान रखती थी, आज वही निराला के साथ पहचान बढ़ा कर अपनी पहचान पूरी तरह भुला चुकी थी. जिन टीचर्स व स्टूडेंट्स का दिल कभी नीरा के लिए प्रेम से लबालब हुआ करता था, आज वही उसे गिरी नजर से देखते.
उन्हीं दिनों मेरे पापा का तबादला हो गया. मैं अपने पूरे परिवार के साथ गांव से शहर में आ गया. उन दिनों हमारा स्कूल भी बंद था, जिस कारण मैं अपने सब से अजीज दोस्त मौसम को कुछ नहीं बता पाया. अब मेरी पढ़ाई यहीं होने लगी. पर मेरे दिलोदिमाग पर हमेशा मौसम की तसवीर छाई रहती.
शहर की चमकदमक भी मुझे मौसम के बिना फीकीफीकी लगती. शुरूशुरू में मेरा यह हाल था कि मुझे यहां चारों तरफ मौसम ही मौसम नजर आती थी. हर खूबसूरत लड़की में मुझे मौसम नजर आती थी. एक दिन तो मौसम की याद ने मुझे इतना बेकल कर दिया कि मैं ने अपने स्कूल की सीनियर छात्रा सुप्रिया का हाथ पकड़ कर उसे ‘मौसम’ के नाम से पुकारा. बदले में मेरे गाल पर एक जोरदार चांटा लगा, तब कहीं जा कर मुझे होश आया. इसी तरह चांटा खाता और आंसू बहाता मैं अपनी पढ़ाई करने लगा.

वक्त के साथसाथ मौसम की याद भी कम होने लगी. लेकिन जब कभी मैं अकेला होता तो सबकुछ भुला कर अतीत की खाई में गोते लगाने लगता. धीरेधीरे 2 साल गुजर गए. आज मैं बहुत खुश हूं. आज पापा ने मुझ से वादा किया है कि परीक्षा खत्म होने के बाद हम लोग 1 महीने के लिए घर चलेंगे. लेकिन परीक्षा में तो अभी पूरे 25 दिन बाकी हैं. फिर कम से कम 10 दिन परीक्षा चलेगी. तब घर जाएंगे. अभी भी बहुत इंतजार करना पड़ेगा. किसी तरह इंतजार खत्म हुआ और परीक्षा के बाद हम लोग घर के लिए रवाना हो गए.
गांव पहुंचने पर मैं सब से पहले दौड़ता हुआ घर पहुंचा. मैं ने सब को प्रणाम किया. फिर निर्मोही भाई को ढूंढ़ने लगा. घर, छत, बगीचा, पान की दुकान, हर जगह खोजा, मगर निर्मोही भाई नहीं मिले. अंत में मैं मायूस हो कर अपने पुराने अड्डे की तरफ चल पड़ा. मेरे घर के सामने एक नदी बहती है, जिस के ठीक बीचोंबीच एक छोटा सा टापू है, यही हम दोनों का पुराना अड्डा रहा है. हम दोनों रोजाना लगभग 2-3 घंटे यहां बैठ कर बातें किया करते थे. आज फिर इतने दिनों बाद मेरे कदम उसी तरफ बढ़ रहे थे.
मैं ने मन ही मन फैसला किया कि भाई से सब से पहले मौसम के बारे में पूछना है. फिर कोई बात होगी. मौसम का खयाल मन में आते ही एक अजीब सी गुदगुदी होने लगी. तभी दोनाली की आवाज से मैं ठिठक गया. कुछ ही दूरी पर भाई बैठेबैठे निशाना साध रहे थे. काली जींस, काली टीशर्ट, बड़ीबड़ी दाढ़ी, हाथ में दोनाली. भाई देखने में ऐसा लगते थे मानो कोई खूंखार आतंकवादी हों. भाई का यह रूप देख कर मैं सकपका गया. जो कभी बीड़ी का बंडल तक नहीं छूता था, आज वह गांजा पी रहा था. मुझे देख कर भाई की आंखों में एक चमक जगी. पर पलक झपकते ही उस की जगह वही पहले वाली उदासी छा गई.
कुछ पल हम दोनों भाई एकदूसरे को देखते रहे, फिर गले लग कर रो पड़े. जब हिचकियां थमीं तो पूछा, ‘‘भैया, यह क्या हाल बना रखा है?’’ जवाब में उन्होंने एक जोरदार कहकहा लगाया. मानो बहुत खुश हों. लेकिन उन की हंसी से दर्द का फव्वारा छूट रहा था. जुदाई की बू आ रही थी. जब हंसी थमी तो वह बोले, ‘‘भाई, तू ने अच्छा किया जो शहर चला गया. तेरे जाने के बाद तो यहां सबकुछ बदलने लगा. नीरा और बिकूवा की प्रेमलीला ने तो समाज का हर बंधन तोड़ दिया. लेकिन अफसोस, बेचारों की लीला ज्यादा दिन तक नहीं चली. आज से कोई 6 महीना पहले उन दोनों का एक्सीडेंट हो गया. नीरा का चेहरा एक्सीडेंट में इस तरह झुलस गया कि अब कोई भी उस की तरफ देखता तक नहीं.’’
थोड़ा रुक कर भाई फिर बोले, ‘‘बिकूवा का तो सिर्फ एक ही हाथ रह गया है. अब वह सारा दिन अपने बूथ में बैठा फोन नंबर दबाता रहता है. शशिभूषण और मीनू की अगले महीने सगाई होने वाली है…’’ ‘‘लेकिन मीनू तो आप को…’’ मेरे मुंह से अचानक निकला. ‘
‘हां, मीनू मुझे बहुत चाहती थी. लेकिन मैं ने उस के प्यार का हमेशा अपमान किया. अब मैं सोचता हूं कि काश, मैं ने नीरा के बदले मीनू से प्यार किया होता. तब शायद ये दिन देखने को न मिलते.’’
फिर हम दोनों के बीच थोड़ी देर के लिए गहरी चुप्पी छा गई. इस के बाद भाई को थोड़ा रिलैक्स मूड में देख कर मैं ने मौसम के बारे में पूछा. इस पर एक बार फिर उन की आंखें नम हो गईं. मेरा दिल अनजानी आशंका से कांप उठा.
मेरे दोबारा पूछने पर भाई बोले, ‘‘तुम तो जानते ही हो कि मौसम मारवाड़ी परिवार से थी. तुम्हारे जाने के कुछ ही दिनों बाद मौसम के पापा को बिजनेस में काफी घाटा हुआ. वह यहां की सारी प्रापर्टी बेच कर अपने गांव राजस्थान चले गए.’’

इतना सुनते ही मेरी आंखों के आगे दुनिया घूमने लगी. वर्षों से छिपाया हुआ प्यार, आंसुओं के रूप में बह निकला.

हम दोनों भाई छुट्टी के दिनों में साथसाथ रहे. पता नहीं कब 1 महीना गुजर गया और फिर हम लोग शहर आने के लिए तैयार हो गए. इस बार हमारे साथ निर्मोही भाई भी थे. शहर आ कर निर्मोही भाई जीतोड़ पढ़ाई करने लगे. वह मैट्रिक की परीक्षा में अपने स्कूल में फर्स्ट आए. आज 3 साल बाद पापा मुझे इंजीनियरिंग और भाई को मेडिकल की तैयारी के लिए कोटा भेज रहे थे.
मैं बहुत खुश था, क्योंकि आज मुझे कोटा यानी राजस्थान जाने का मौका मिल रहा था. मौसम का घर भी राजस्थान में है. इसीलिए इतने दिनों बाद मन में एक नई आशा जगी थी. मैं भाई के साथ राजस्थान आ गया. यहां मैं हरेक लड़की में अपनी मौसम को तलाशने लगा. लेकिन 1 साल गुजर जाने के बाद भी मुझे मेरी मौसम नहीं मिली.
अब हम दोनों भाइयों के सिर पर पढ़ाई का बोझ बढ़ने लगा था. लेकिन जहां भाई पढ़ाई को अपनी महबूबा बना चुके थे, वहीं मैं अपनी महबूबा की तलाश में अपने लक्ष्य से दूर जा रहा था. फिर परीक्षा भी हो गई. रिजल्ट आया तो भाई का सिलेक्शन मेडिकल के लिए हो गया, लेकिन मैं लटक गया. मुझे फिर से तैयारी करने के लिए 1 साल का मौका मिला है और इस बार मैं भी जीतोड़ मेहनत कर रहा हूं. लेकिन फिर भी कभी अकेले में बैठता हूं तो मौसम की याद तड़पाने लगती है. वर्ष के चारों मौसम आते हैं और चले जाते हैं. पर मेरी आंखों को तो इंतजार है,  5वें मौसम का. पता नहीं कब मेरा 5वां मौसम आएगा, जिस में मैं अपनी मौसम से मिलूंगा.

Superstition : सांसद भी अंधविश्वास के जाल में फंसे

Superstition : भारतीय जनता पार्टी के सांसद अंधविश्वास के जाल में फंसे हुए हैं. छत्तीसगढ़ के कांकेर में एक मेले में घटी अजीबोगरीब घटना सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे जनप्रतिनिधि वास्तव में हमारे हितों का ध्यान रख रहे हैं?

छत्तीसगढ़ संपूर्ण देश के अन्य राज्यों में अभी भी काफी पिछड़ा हुआ माना जाता है. जहां जादू टोना और नर बली की घटनाएं घटित हो जाती हैं. ऐसे में हाल ही में बस्तर के कांकेर में भारतीय जनता पार्टी के एक सांसद मेले में पहुंचे और देखतेदेखते लोगों की आस्था का केंद्र बन गए. सांसद महोदय नाचनेझूमने लगे और कहा गया कि उन्हें तो देवी आ गई है. इस घटनाक्रम से एक बार फिर दुनिया भर में संदेश चला गया कि छत्तीसगढ़ में आम से आमआदमी तो अंधविश्वास में फंसा हुआ है ही यहां के सांसद भी इस अंधविश्वास के जाल में फंसे हुए हैं.
एक तरफ विज्ञान और आधुनिक समय लोगों को चेतना संपन्न बनाने का काम कर रहा है, दूसरी तरफ अगर जनप्रतिनिधि इस तरह की हरकतें करते सार्वजनिक रूप से देखेंगे तो क्या देश और समाज क्या पतन की ओर नहीं जाएगा यह बड़ा सवाल है.

बस्तर अंचल में पिछड़ेपन की समस्या

दरअसल, केंद्र सरकार को यह संज्ञान में लेना चाहिए कि सांसद का नाग के मेले में घूमने और देवी की कृपा का दावा करने से लोगों में यह संदेश जा सकता है कि उन्हें भी इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और देवी की कृपा प्राप्त करने के लिए ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए. इस से लोगों में अंधविश्वास और गलत धारणाएं पैदा हो सकती हैं. इस से राजनीतिक नेताओं की विश्वसनीयता और ईमानदारी पर सवाल उठ सकते हैं. आम जनता जो अपने नेताओं के आचरण को देखते हैं और इस दिशा में भ्रम का शिकार हो जाते हैं.
इसलिए, यह जरूरी है कि लोगों को सही जानकारी और शिक्षा प्रदान की जाए ताकि वे ऐसे गलत संदेशों से बच सकें और सही दिशा में आगे बढ़ सकें. आज विज्ञान के समय में, ऐसी घटनाओं को स्वीकार करना गलत है. वस्तुत: विज्ञान के अनुसार, हमें किसी भी घटना को तर्कसंगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए.
सारी दुनिया जानती है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में पिछड़ेपन की समस्या है, और ऐसी घटनाओं को स्वीकार करने से यह समस्या और बढ़ सकती है. लोगों को शिक्षा और विज्ञान के बारे में जागरूक करने की आवश्यकता है, ताकि वे ऐसी घटनाओं को तर्कसंगत दृष्टिकोण से देख सकें और पिछड़ापन से मुक्ति पा सकें. इसलिए, यह जरूरी है कि हम ऐसी घटनाओं को तर्कसंगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें और लोगों को शिक्षा और विज्ञान के बारे में जागरूक करें.

आखिर हुआ क्या है

जनवरी 2025 के प्रथम सप्ताह में छत्तीसगढ़ के कांकेर में आयोजित रियासत कालीन मेले में यह अजीबोगरीब घटना घटी. बीजेपी सांसद भोजराज नाग पर देवी आ गई, जो मेले की शुरुआत के दौरान हुआ. यह घटना न केवल आश्चर्यजनक है, बल्कि यह हमें ऐसे जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी के बारे में भी सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे जनप्रतिनिधि वास्तव में हमारे हितों का ध्यान रख रहे हैं या नहीं? क्या वे समाज में गलत संदेश फैला रहे हैं या नहीं?
जनप्रतिनिधि होने के नाते, यह उन की जिम्मेदारी है कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के हितों का ध्यान रखें और उन के लिए काम करें. लेकिन जब वे अपने पद का ऐसा दुरुपयोग करते हैं और समाज में गलत संदेश फैलाते हैं, तो यह न केवल उन के निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के लिए, बल्कि समाज के लिए भी हानिकारक हो सकता है.
इन सवालों का जवाब ढूंढने के लिए, हमें अपने जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराना होगा. हमें उन से पूछना होगा कि वे अपने पद का उपयोग कैसे कर रहे हैं और वे क्या काम कर रहे हैं जो हमारे हितों‌ और चेतना के लिए आवश्यक है. सरकार और जनप्रतिनिधि का दायित्व है कि समाज में शिक्षा और जागरूकता को बढ़ावा दें. इन्हें लोगों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में जागरूक करना होगा.
आखिरकार, यह जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है कि उन्हें अपने पद का दुरुपयोग नहीं करने दें. समाज में शिक्षा और जागरूकता को बढ़ावे की दरकार है, ताकि आवाम अपने अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में जागरूक हो सके और अपने जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहरा सके.

Honey Trap : हुस्‍न के जाल में फंसा कर उड़ा ले जाती हैं लाखों रुपया

Honey Trap : Honey Trap  की शुरुआत कोल्ड वार के समय से मानी जाती है जब रूस और अमेरिका एकदूसरे के खिलाफ इस का इस्तेमाल करते थे लेकिन आज औनलाइन इस का इस्तेमाल किया जा रहा है जिस का ख़तरा आम हो गया है.

प्रेम जाल (हनी ट्रैप) में फंसा कर लोगों से वसूली करने वाले 3 आरोपियों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है. एक चिकित्सक से लगभग 9 लाख रुपए की ठगी की घटना प्रकाश में आई है.

घटनाओं से सीखें

आरोपियों ने अपने अपराध को अंजाम देने के लिए एक चतुर योजना बनाई थी. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर चिकित्सक को अपना निशाना बनाया और उन्हें अपने जाल में फंसाया. आरोपियों ने चिकित्सक को यह विश्वास दिलाया कि वे दिल्ली पुलिस में कार्यरत हैं और उन्हें अपनी सेवाओं के लिए पैसे देने होंगे. चिकित्सक ने आरोपियों की बातों पर विश्वास किया और उन्हें लगभग 9 लाख रुपए दे दिए.
और जब, लेकिन जब चिकित्सक को यह एहसास हुआ कि वे ठगी के शिकार हो गए हैं, तो उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. पुलिस ने आरोपियों की तलाश शुरू की और आखिरकार उन्हें गिरफ्तार कर लिया.
आरोपियों की पहचान तिलक नगर निवासी नीरज त्यागी उर्फ धीरज उर्फ धीरू (42), कराला निवासी आशीष माथुर (31) और खारखौदा, हरियाणा निवासी दीपक उर्फ साजन (30) के रूप में हुई है.
पुलिस ने आरोपियों के पास से हेड कांस्टेबल की पूरी वर्दी और दिल्ली पुलिस के 3 पहचान पत्र, एक कार और 3 मोबाइल बरामद किए हैं. आरोपी नीरज और दीपक के खिलाफ पहले से ही बिंदापुर थाने में प्रेम जाल में फंसा कर वसूली करने का मामला दर्ज है.
हनी ट्रैप की शुरुआत का सटीक समय नहीं बताया जा सकता है, क्योंकि यह एक प्रकार की धोखाधड़ी है जो विभिन्न रूपों में और विभिन्न समयों में हुई है. हालांकि, यह कहा जा सकता है कि हनी ट्रैप की शुरुआत प्राचीन काल में हुई थी, जब लोगों को आकर्षित करने और उन से लाभ उठाने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग किया जाता था.
दरअसल, आधुनिक समय में, हनी ट्रैप की शुरुआत 1960 के दशक में हुई थी, जब अमेरिकी और सोवियत जासूसों ने अपने लक्ष्यों को आकर्षित करने और उन से जानकारी प्राप्त करने के लिए इस तरीके का उपयोग करना शुरू किया था.
इंटरनेट और सोशल मीडिया के आगमन के साथ, हनी ट्रैप की शुरुआत और भी आसान हो गई है, और अब यह एक आम प्रकार की धोखाधड़ी बन गई है जो विभिन्न देशों में होती है.

कुछ बहुचर्चित घटनाएं –

– 1960 के दशक: अमेरिकी और सोवियत जासूसों ने हनी ट्रैप का उपयोग करना शुरू किया.
– 1980 के दशक: हनी ट्रैप का उपयोग व्यावसायिक जासूसी में किया जाने लगा.
– 1990 के दशक: इंटरनेट के आगमन के साथ, हनी ट्रैप औनलाइन हो गई.
– 2000 के दशक: सोशल मीडिया के आगमन के साथ, हनी ट्रैप और भी आसान हो गई.
हाल में घटित हनी ट्रैप की कुछ घटनाएं इस प्रकार हैं:
इंदौर हनी ट्रैप मामला: मध्य प्रदेश के इंदौर में एक हनी ट्रैप मामला सामने आया है, जिस में एक महिला ने कई पुरुषों को अपने जाल में फंसा कर उन से पैसे ऐंठे हैं. इस मामले में पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया था. इसी तरह दिल्ली में एक हनी ट्रैप मामला सामने आया है, जिस में एक महिला ने एक पुरुष को अपने जाल में फंसा कर उसे पैसे देने के लिए मजबूर किया है. इस मामले में पुलिस ने आरोपी महिला को गिरफ्तार किया.
मुंबई में एक हनी ट्रैप मामला सामने आया, जिस में एक महिला ने कई पुरुषों को अपने जाल में फंसा कर उन से पैसे ऐंठे हैं. इस मामले में पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया है.

हनी ट्रैप प्रेम जाल के प्रकार

औनलाइन हनी ट्रैप: औनलाइन हनी ट्रैप में आरोपी व्यक्ति सोशल मीडिया या औनलाइन डेटिंग प्लेटफौर्म का उपयोग कर के पीड़ित व्यक्ति को अपने जाल में फंसाता है.
औफलाइन हनी ट्रैप: औफ़लाइन हनी ट्रैप में आरोपी व्यक्ति पीड़ित व्यक्ति से व्यक्तिगत रूप से मिलता है और उन्हें अपने जाल में फंसाता है.
कौर्पोरेट हनी ट्रैप: कौर्पोरेट हनी ट्रैप में आरोपी व्यक्ति कंपनी के अधिकारी या कर्मचारी को अपने जाल में फंसाता है और उन से व्यावसायिक जानकारी प्राप्त करता है.

हनी ट्रैप के लक्षण

यदि आप किसी अनजान व्यक्ति से अचानक मिलते हैं और वे आप के साथ बहुत जल्दी घनिष्ठ संबंध बनाने की कोशिश करते हैं, तो यह हनी ट्रैप का एक लक्षण हो सकता है. यदि कोई व्यक्ति आप के प्रति अत्यधिक प्यार और आकर्षण दिखाता है, तो यह हनी ट्रैप का एक लक्षण हो सकता है. यदि कोई व्यक्ति आप की व्यक्तिगत जानकारी मांगता है, जैसे कि आप का पता, फोन नंबर, या बैंक खाता विवरण, तो यह हनी ट्रैप का एक लक्षण हो सकता है.

हनी ट्रैप से बचने के लिए कानूनी उपाय

पुलिस में शिकायत दर्ज कराएं : यदि आप हनी ट्रैप के शिकार हुए हैं, तो तुरंत पुलिस में शिकायत दर्ज करें.
कानूनी सलाह लें: हनी ट्रैप से संबंधित कानूनी सलाह लेने के लिए एक वकील से संपर्क करें.
साइबर सेल में शिकायत दर्ज करें: यदि आप औनलाइन हनी ट्रैप के शिकार हुए हैं, तो साइबर सेल में शिकायत दर्ज करें. हनी ट्रैप में लड़कियां और युवक दोनों ही शामिल हो सकते हैं. हालांकि, अधिकांश मामलों में लड़कियां ही हनी ट्रैप के लिए उपयोग की जाती हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि हर बार ऐसा ही हो.
कुछ मामलों में, युवक भी हनी ट्रैप में शामिल हो सकते हैं. वे अपने आकर्षण और चार्म का उपयोग कर के पीड़ित व्यक्ति को अपने जाल में फंसा सकते हैं.
हनी ट्रैप में शामिल होने वाले व्यक्ति की लिंग या उम्र कोई महत्व नहीं रखती है. यह एक ऐसी धोखाधड़ी है जिस में कोई भी व्यक्ति शामिल हो सकता है और किसी भी व्यक्ति को अपना शिकार बना सकता है.
कुछ घटनाएं हैं जिन में युवक हनी ट्रैप में शामिल थे. दिल्ली में एक युवक ने एक महिला को अपने जाल में फंसाया और उसे पैसे देने के लिए मजबूर किया. मुंबई में एक युवक ने एक महिला को अपने जाल में फंसाया और उसे पैसे देने के लिए मजबूर किया. यह स्पष्ट है कि हनी ट्रैप में कोई भी व्यक्ति शामिल हो सकता है और किसी भी व्यक्ति को अपना शिकार बना सकता है. इसलिए बहुत ही कम शब्दों में कहा जाए- सावधानियां बचाव है.

Couple Goal : लाइफपार्टनर को बैस्‍ट फ्रैंड बनाने के 7 टिप्‍स

Couple Goal : जीवनसाथी की मृत्यु के बाद बिछड़ना हो या तलाक के बाद बिछड़ना हो, दोनों ही सिचुएशन में जीना मुश्किल हो जाता है इसलिए समय रहते ही जीवनसाथी की कद्र करें. ताकि साथी के साथ एक खुशहाल जीवन जी सकें.

एक साथी जो कभी आप के जीवन का सब से महत्वपूर्ण हिस्सा था, दूर चला जाता है, तो आप की दुनिया में रूखापन आ जाता है, समय रुक सा जाता है. हर जगह निराशा, अकेलापन और उदासी छा जाती है. इस कठिन समय में, खुद को संभालना और आगे बढ़ना एक बड़ी चुनौती हो सकती है. 60 के अंदर अकेले रह जाओ, तो वह गम कभी भूलता नहीं है.
चाहे तलाक हो, विधवा हो या फिर विधुर हो. बच्चे मां के पास रह जाते हैं, तो बाप के लिए और दिक्कत. न तो कोई दूसरी लड़की मिलती है न ही कोई और साथी. आज की तारीख में जो पतिपत्नी हैं आप के पास उन्हें संभाल कर रखो. ये बड़ी नायाब चीज है. जिन के पास है वो ऐसा समझे जैसे कि उन के पास कोहिनूर का हीरा है.

क्योंकि पता तो तब चलता है जब तलाक हो जाता है, साथी बिछड़ जाता है, अकेले रह जाते हैं. बहुत कम लोग हैं जो बाद में जिंदगी अच्छी तरह बिता सकते हैं. लड़कियां फिर भी ज्यादा अच्छी तरह मैनेज कर लेती हैं क्योंकि उन के पास बच्चे होते हैं. उन के मांबाप सपोर्ट करते हैं. युवावस्था है तो फ्लर्टिंग करने वाला कोई न कोई मिल ही जाता है. लेकिन अकेले आदमी को कुछ नहीं मिलता वो मारामारा फिरता है.

जितनी उम्र बढ़ेगी समस्या उतनी ही बढ़ती जाएगी. किसी भी उम्र में आदमी के लिए खुद को और घर को संभालना मुश्किल होता है. इसलिए देर न करें और जो जैसा जीवनसाथी मिला है उस के साथ निभाना सीखें. उसे छोड़ने की बजाए खुद आप बदलें कुछ उसे बदलें. अगर संभव न हो तो जो जैसा है उसे वैसे ही स्वीकार कर आगे बढ़ें.

जिन का साथी बिछड़ गया है उन से जाने ये दर्द

जीवनसाथी शब्द से ही स्पष्ट है जीवन भर का साथी, जिस से सिर्फ मृत्यु ही अलग कर सकती है, तो उस से अलग होने में दर्द तो महसूस होगा ही न. एक असहनीय पीड़ा होती है जीवनसाथी से हमारा शारीरिक मानसिक हर तरह का रिश्ता होता है जो साथ रहतेरहते इतना गहरा होता जाता कि वो हमारी सोच, हमारी कोशिकाओं, हमारे दिलोंदिमाग में घर बना लेती हैं, जिस के बिना जीना असंभव लगता है. हमारे जीवन में जो खुशी होती है वो जीवनसाथी के सुखदुख से ही जुड़ी होती है.
उदाहरण के तौर पर अगर आप के पति को औफिस से आने में एक दिन देर हो जाए तो आप के दिमाग में गलत खयाल आने लगते हैं अरे कहां हैं ये अभी तक आए क्यों नहीं? ये सब एक सामान्य स्थिति है लेकिन हमें ये भी सहन नहीं होता है.

फिर ऐसे में जिन का साथी कोरोना में या किसी और वजह से चला गया है उन से जाने यह दर्द. उन की जिंदगी कैसे पूरी तरह रुक गई है. वे आगे मूव औन करना भी चाहें तो कोई साथी नहीं मिलता. अकेले महिलाओं के लिए घर और बाहर संभालना मुश्किल हो जाता है. महिलाओं के लिए अचानक अपने पैरों पर खड़े होना बड़ी समस्या है. वो पहले से वर्किंग हैं तब तो ठीक है लेकिन अगर वर्किंग नहीं है तो नए सिरे से सब शुरू करना आसान नहीं होता. सिंगल पेरैंट की राह में भी कई परेशानियां आती हैं.

वहीँ एक बार को महिलाएं घर बाहर संभालना जल्दी सीख जाती हैं लेकिन पुरुषों के लिए घर संभालना असंभव सा हो जाता है. बच्चों को कैसे बड़ा करें, ये भी मुश्किल. महिलाओं को तो फिर भी जीवनसाथी मिल जाता है क्योंकि वे खुद को मैंटेन रखती हैं लेकिन पुरुष को जल्दी से कोई साथी मिलता नहीं है. वह अकेले रहरह कर थक जाता है. लड़कियों को उन के मांबाप, भाईबहन फिर भी सपोर्ट कर देते हैं लेकिन लड़कों को कोई भाईबहन ज्यादा दिन सपोर्ट नहीं करता, क्योंकि वे छोटीछोटी अपनी जरूरतों के लिए भी दूसरों पर डिपेंड हो जाते हैं.
वहीं लड़कियां खुद को और बच्चों के साथसाथ जिस के घर रह रही होती हैं उस का घर भी संभाल लेती हैं. इसलिए भाईबहनों और मांबाप के लिए उन्हें रखना ज्यादा आसान होता है. हालांकि परेशानी महिला या पुरुष दोनों को ही है लेकिन फिर भी कह सकते हैं पुरुष के लिए खुद को संभालना ज्यादा कठिन हो जाता है.

तलाक के बाद पसरता अकेलापन

मैं एक 46 वर्षीय महिला हूं जिस की जिंदगी में काम के अलावा कुछ नहीं बचा है. पति से करीब 1 साल पहले तलाक हो चुका है. मेरा 19 साल का बेटा अपने जीवन में बहुत व्यस्त है. पूरा दिन औफिस में कट तो जाता है लेकिन लाइफ में बहुत अकेलापन महसूस करने लगी हूं. मैं एक रिलेशन में थी भी लेकिन फिर मुझे लगा कि यह सिर्फ टैम्परैरी है और न तो समाज और न ही मेरा बेटा शायद मुझे अपनाएगा और मेरी इसी सोच ने मुझे वह रिश्ता खत्म करने पर मजबूर कर दिया.

अब लाइफ में फिर वही खालीपन और अकेलापन वापस आ गया है. काम से घर लौटती हूं तो कोई बात करने वाला कोई नहीं है. मैं बहुत उदास और निराश महसूस कर रही हूं. इस अकेलेपन से कैसे बाहर आया जाए, कैसे अपनी जिंदगी में खुशियां लाऊं. अगर अपनी पिछली जिंदगी को याद करती हूं तो बहुत पछताती हूं. मेरे पति से मेरी बनती नहीं थी. लेकिन सारी गलती उन की नहीं थी. काश थोड़ा सा एडजस्ट करने की कोशिश मैं ने भी की होती तो आज ये हालत न होते.
वाकई तलाक लेना आसान है लेकिन उस के बाद जीना मुश्किल है. यह बात तभी समझ में आती है जब हम साथी से दूर हो कर अकेलापन भोगते हैं. इसलिए समय रहते इस बात को समझें कि आप के साथी में कुछ बुराइयां भी हैं तो उस के साथ डील करना सीख लें क्योंकि उसे छोड़ने के बाद भी परिस्थितयां कुछ बहुत ज्यादा अच्छी नहीं होंगी.

पुरुषों को महिलाओं की ज्यादा कद्र करनी चाहिए

अकसर देखा जाता है कि पुरुष महिलाओं को टेकन फौर ग्रांटेड लेते हैं. उन्हें उन का हर काम समय पर किया हुआ मिल जाता है, तो उन्हें उस काम की भी वैल्यू नहीं होती है. पुरुषों को लगता है कि मैं कमाने वाला हूं, तो मेरी वैल्यू ज्यादा है. वे महिलाओं को ज्यादा तवज्जो नहीं देते. लेकिन अगर महिलाएं वर्किंग हैं तो भी उन्हें लगता है घर का ज्यादातर काम महिलाएं ही करें. अपने मांबाप के साथ एडजस्ट करने में भी वे अपने साथी को ऐसे घर के जंगल में छोड़ देते हैं, जहां वे उन के मां के साथ एडजस्ट करने में अपनी पूरी जवानी लगा देती हैं. लेकिन उन्हें जब अहसास होता है, तो अधेड़ उम्र में भी वे पति को छोड़ कर जाने से संकोच नहीं करतीं. फिर समझ आती है उस महिला की वैल्यू जिस की बातों पर कभी कान ही न धरे थे.

इसलिए बीवी की इज्जत समय रहते ही करें. उसे अगर आप की मां या किसी और रिश्ते से कोई परेशानी है, तो उसे समझें और दूर करें. अलग घर में रहें. उस ने शादी आप के साथ की है आप की मां को पूरी जिंदगी खुश करने का ठेका उस का नहीं है. इस बात को भी समझें कि अगर पत्नी छोड़ गई तो वो जैसेतैसे अपना गुजारा कर लेगी लेकिन आप को आप के घरवाले भी नहीं पूछेंगे. तब उसी पत्नी की बातें याद करकर के रोया करेंगे. इसलिए अभी भी समय है संभल जाएं और अपनी पत्नी की कद्र करें.

जीवनसाथी को दोस्त बनाएं

दोस्त से लड़ाई हो जाए, तो तलाक नहीं होता. न ही वह आप को जज करता है. आप की अच्छाईबुराई समेत आप को स्वीकार करता है. पतिपत्नी के बीच ऐसा रिश्ता प्रायः नहीं होता. पत्नी के लिए पति देवता है जिस में कोई कमजोरी या कमी वह देखना ही नहीं चाहती. पति के लिए पत्नी जिम्मेदारी होती है, ऐसी स्त्री जिस की वह इज्जत करता है पर हर बात उस से खुल के साझा नहीं कर सकता क्योंकि वे दो अलगअलग व्यक्तित्व हैं.

लेकिन अगर आप भी अपने लाइफ पार्टनर को दोस्त बना लें और खुद उन के दोस्त बन जाएं तो लाइफ पूरी तरह चेंज हो जाती है. दोस्त बनाएंगे तो बराबरी का हक दे पाएंगे. रिश्ता कोई भी हो उस में बराबरी और सम्मान का होना बहुत जरुरी है. ऐसे में अगर जीवनसाथी दोस्त होगा तो पतिपत्नी वाली तकरार को सुलझाना आसान होगा. वहां बातचीत का रास्ता खुला होगा. एकदूसरे से जो परेशानियां हैं उन पर बात की जा सकेगी, उन्हें हल करने का प्रयास किया जा सकेगा.

एक के बिछड़ते ही दूसरा बूढ़ा लगने लगता है

एक साथी के जाते ही दूसरा बूढ़ा होने लगता है फिर उम्र चाहे कोई भी हो उस की सोच साथी के साथ ही रुक जाती है. उस के सपने, उम्मीदें, उमंग, खुशी सब कुछ जीवनसाथी के साथ ही चला जाता है. महिलाओं को तो लगता है अब किस के लिए सजना, अब कौन है जो तारीफ करेगा. उन के चेहरे का नूर चला जाता है. उस पर बस साथी से बिछड़ने के गम की परछाइयां ही नजर आती हैं. तनाव इतना हो जाता है कि कई हैल्थ इशू हो जाते हैं. बीपी, शुगर जैसी कई बीमारियां अपनी चपेट में ले लेती हैं और उसपर घरबाहर संभालना और बच्चों की जिम्मेदारी समय से पहले बूढ़ा कर देती हैं. पूरा दिन भागदौड़ करने के बाद रात को बिस्तर पर मिलता अकेलापन न जीने देता है न मरने.

उम्र के हर पड़ाव पर जीवनसाथी चाहिए

कर्नाटक के मैसूर में रहने वाले एक 73 साल के बुजुर्ग ने शादी के लिए विज्ञापन दिया है. यह सरकारी टीचर की नौकरी से रिटायर हो चुके हैं और घर में अकेले रहते हैं. अकेलेपन से उन्हें अब डर लगता है. उन्हें अब एक जीवनसाथी की तलाश है.
ऐसे विज्ञापन अब आम हो चुके हैं कई संस्थाएं भी हैं, जो बुजुर्ग लोगों के विवाह करने का काम भी कर रही हैं. क्योंकि अब विवाह उम्र का मोहताज नहीं है. पहले जहां संयुक्त परिवार होते थे वहां किसी का साथी बिछड़ भी जाता था, तो भी घर में कई लोग होते थे उस अकेले की देखभाल करने के लिए उसे संभालने के लिए. लेकिन अब एकल परिवार के दौर में साथी के जाने के बाद अकेले ही सब संभालना मुश्किल हो जाता है. नातेरिश्तेदार भी कुछ दिन तक ही साथ निभाते हैं. इसलिए पूरी जिंदगी आगे कैसे कटे, यह सोच कर ही घबराहट होती है.

ईगो, अकड़ सब छोड़ साथी के साथ एडजस्टमेंट करना सीखें

रचना कहती हैं, “मेरे पति से थोड़ी कहासुनी होने के बाद वो मुझे मायके लेने आए थे, लेकिन तब कुछ झूठे रिश्तेदारों और कुछ मायके के लोगों की बातों में आ कर मैं साथ नहीं गई. उल्टा उन को दहेज के झूठे केस में धोखे से फंसा दिया. पर अब 6 साल हो चुके हैं और मैं घर पर बैठी हूं, केस झूठे थे, तो मेरे पति बरी हो गए. उन की दोबारा शादी हो गई. आज सोचती हूं मेरे पति लेने आए तब ही उन के साथ चली जाती तो आज मेरे भी एकदो बच्चे होते और मैं भी अपनी सहेलियों की तरह खुश होती अपने पति के संग.”
इसलिए इस बात को समझें, साथ कोई नहीं देगा सलाह सब देंगे. आखिर में आप की ही जिंदगी तबाह हो जाएगी. अगर कहासुनी हो जाती है तो रिश्तों को खत्म करने से अच्छा है दोचार दिन रूठ जाएं.
वास्तव में जीवन में ऐसे बहुत से पड़ाव आते हैं जहां हमें अहम निर्णय लेने पड़ते हैं. यदि हम अपना हित ध्यान में न रख कर रिश्तेदारों और दोस्तों के बहकावे में कुछ गलत निर्णय ले लेते हैं तो जीवन भर हमें उस का खामियाजा भुगतना पड़ता है. इसलिए ईगो, अकड़ सब छोड़ साथी को उस की कमियों के साथ दिल से स्वीकार करें और उसी में निभाना सीखें. तब तो जिंदगी चलती रहेगी लेकिन अगर साथ छूटा तो जिंदगी और भी बदतर हो जाएगी. तब दूसरा साथी खोजेंगी तो पहले तो मिलेगा ही नहीं और अगर कई साल धक्के खाने के बाद मिल भी गया तो, जितना पहले साथी के साथ एडजस्ट करने में कतरा रहे थे उस से 50 गुना ज्यादा ही एडजस्ट करना पड़ेगा. और अगर साथी न मिला तो पूरी जिंदगी अकेले काटना भी एक अभिशाप बन जाएगा.

 

Hindi Ki Kahani : सासुमां को बदलना होगा

Hindi Ki Kahani : मोहिनी को लगने लगा था, उस के घर की छत पर टंगा यह आसमान का टुकड़ा केवल उसी की धरोहर है. बचपन से ले कर आज तक वह उस के साथ अपना सुखदुख बांटती आई है. गुडि़यों से खेलना बंद कर जब वह कालेज की किताबों तक पहुंची तो यह आसमान का टुकड़ा उस के साथसाथ चलता रहा. फिर जब चाचाचाची ने उस का हाथ किसी अजनबी के हाथ में थमा कर उसे विदा कर दिया, तब भी यह आसमान का नन्हा टुकड़ा चोरीचोरी उस के साथ चला आया. तब मोहिनी को लगा कि वह ससुराल अकेली नहीं आई, कोई है उस के साथ. उस भरेपूरे परिवार में पति के प्यार की संपूर्ण अधिकारिणी होने पर भी उस के हृदय का कोई कोना इन सारे सामाजिक बंधनों से परे नितांत खाली था और उसे वह अपनी कल्पना के रंगों से इच्छानुसार सजाती रहती थी.

मोहिनी के मातापिता बचपन में ही चल बसे थे. मां की तो उसे याद भी न थी. हां, पिता की कोई धुंधली सी आकृति उस के अवचेतन मन पर कभीकभी उभरती थी. किसी जमाने के पुराने रईसों का उन का परिवार था, जिस में बड़े चाचा के बच्चों के साथ पलती, बढ़ती मोहिनी को यों तो कोई अभाव न था किंतु जब कभी कोई रिश्तेदार उसे ‘बेचारी’ कह कर प्यार करने का उपक्रम करता तो वह छिटक कर दूर जा खड़ी होती और सोचती, ‘वह ‘बेचारी’ क्यों है? बिंदु व मीनू को तो कोई बेचारी नहीं कहता.’ एक दिन उस ने बड़े चाचा के सम्मुख आखिर अपना प्रश्न रख दिया, ‘पिताजी, मैं बेचारी क्यों हूं?’ इस अचानक किए गए भोले प्रश्न पर श्यामलाल अपनी छोटी सी मासूम भतीजी का मुंह ताकते रह गए. उन्होंने उसे पास खींच कर अपने से चिपटा लिया. अपने छोटे भाई की याद में उन की आंखें भर आई थीं, जिस से वे बेहद प्यार करते थे. उस की एकमात्र बेटी को उस की अमानत मान कर भरसक लाड़प्यार से पाल रहे थे.

यों तो चाची भी स्नेहमयी महिला थीं, किंतु जब वे अपनी दोनों बेटियों को अगलबगल लिटा कर अपने साथ सुलातीं तो दूर खड़ी मोहिनी उदास आंखों से उन का मुंह देखती, उस पर आतेजाते रिश्तेदार मोहिनी के मुंह पर ही कह जाते, ‘अभी तो इस का बोझा भी उतारना होगा, बिन मांबाप की बेटी ब्याहना आसान है क्या?’ और टुकुरटुकुर ताकती वह उन रिश्तेदारों के पास भी न फटकती. अपनी किताबें समेट कर मोहिनी छत पर जा बैठती. नन्हीमुन्नी प्यारीप्यारी कविताएं लिखती, चित्र बनाती, जिन में बादलों के पीछे छिपे उस के बाबूजी और मां उसे प्यार से देख रहे होते. इस तरह अपनी कल्पनाओं के जाल में उलझी, सिमटी मोहिनी बड़ी होती रही. वह अधिक सुंदर तो न थी किंतु उस के भोलेपन का आकर्षण अनायास ही लोगों को अपनी ओर खींच लेता था. बड़ीबड़ी आंखों में मानो सागर लहराता था. फिर एक दिन श्यामलाल के पुराने मित्र लाला हरदयाल ने अपने छोटे भाई के लिए मोहिनी को मांग ही लिया. यों तो शहर में लाला हरदयाल की गिनती भी पुराने रईसों में होती थी, किंतु अब वह सब शानोशौकत समाप्त हो चुकी थी.

उन का काफी बड़ा परिवार था. 5 छोटे भाई थे, जिन में से 2 अभी पढ़ ही रहे थे. मां थीं, अपनी पत्नी और 3 बच्चे थे. पिता का निधन हुए काफी समय हो चुका था और नरेंद्र के साथ मिल कर वे इस सारे परिवार के खर्चे का इंतजाम करते थे. नरेंद्र सभी भाइयों में सब से सीधा और आज्ञाकारी था. लाला हरदयाल उस के लिए किसी ऐसी लड़की को घर में लाना चाहते थे जो उन के परिवार के इस संगठन को बिखरने न दे. हरदयाल की पत्नी और मां में बनती न थी. काफी समय से वे किसी ऐसी सुलझी हुई, पढ़ीलिखी लड़की की तलाश में थे जो उन के घर के इस दमघोंटू वातावरण को बदल सके. श्यामलाल के यहां आतेजाते वे मोहिनी को अपने छोटे भाई नरेंद्र के लिए पसंद कर बैठे. श्यामलाल ने नरेंद्र को बचपन से देखा था, बेहद सीधा लड़का था, या यों कहिए कि कुछ हद तक दब्बू भी था. किंतु उस की नौकरी अच्छी थी. मोहिनी को उस घर में कोई कष्ट न होगा, यह श्यामलाल जानते थे. सो, पत्नी से पूछ उन्होंने विवाह के लिए हां कर दी. मोहिनी से पूछने की या उसे नरेंद्र से मिलवाने की आवश्यकता नहीं समझी गई, क्योंकि उस परिवार में ऐसी परंपरा ही न थी. बिंदु और मीनू के विवाह में भी उन की सहमति नहीं ली गई थी. मोहिनी और नरेंद्र का विवाह अत्यंत सीधेसादे ढंग से संपन्न हो गया. घर के दरवाजे पर बरात पहुंचते ही शोर मच गया, ‘‘बहू आ गई…बहू आ गई.’’

‘‘मांजी कहां हैं, भाभी?’’ पहली बार मोहिनी ने नरेंद्र के मुंह से कोई बात सुनी.

‘‘वे अंदर कमरे में हैं, अभी आएंगी. तुम दोनों थोड़ा सुस्ता लो. मैं चाय भेजती हूं,’’ और जेठानी चली गईं. थोड़ी ही देर में चाय की ट्रे उठाए 3-4 लड़कियों ने अंदर आ कर मोहिनी को घेर लिया. शीघ्र ही 2-3 लड़कियां और भी आ गईं. किसी के हाथ में नमकीन की प्लेट थी तो किसी के हाथ में मिठाई की. नई बहू को सब से पहले देखने का चाव सभी को था. नरेंद्र इस शैतानमंडली को देख कर घबरा गया. वह चाय का प्याला हाथ में थामे बाहर खिसक लिया.

‘‘भाभी, हमारे भैया कैसे लगे?’’ एक लड़की ने पूछा.

‘‘भाभी, तुम्हें गाना आता है?’’ दूसरी बोली.

‘‘अरे भाभी, हम सब तो नरेंद्र भैया से छोटी हैं, हम से क्यों शरमाती हो?’’ और भी इसी तरह के न जाने कितने सवाल वे करती जा रही थीं.

मोहिनी इन सवालों की बौछार से घबरा उठी. फिर सोचने लगी, ‘नरेंद्र की मांजी कहां हैं? क्या वे उस से मिलेंगी नहीं?’

चाय का प्याला थाम कर उस ने धीरे से सिर उठा कर उन सभी लड़कियों की ओर देखा, जिन के भोले चेहरों पर अपनत्व झलक रहा था किंतु आंखें शरारत से बाज नहीं आ रही थीं. मोहिनी कुछ सहज हुई और आखिर पूछ ही बैठी, ‘‘मांजी कहां हैं?’’

‘‘कौन, चाची? अरे, वे तो अभी तुम्हारे पास नहीं आएंगी. शगुन के सारे काम तो बड़ी भाभी ही करेंगी.’’ मोहिनी कुछ ठीक से समझ न पाई, इसलिए चुप ही रही. चुपचाप चाय पीती वह सोच रही थी, क्या वह अंदर जा कर मांजी से नहीं मिल सकती.

तभी जेठानी अंदर आ गईं, ‘‘चलो मोहिनी, मांजी के पांव छू लो.’’ मोहिनी उठ खड़ी हुई. सास के पास पहुंच कर उस ने बड़ी श्रद्धा से झुक कर उन के पांव छुए और इस इंतजार में झुकी रही कि अभी वे उसे खींच कर अपने हृदय से लगा लेंगी, किंतु ऐसा कुछ भी न हुआ.

‘‘सदा सुखी रहो,’’ कहते हुए उन्होंने उस के सिर पर हाथ रख दिया और वहां से चली गईं.

ममता की प्यासी मोहिनी को ऐसा लगा जैसे उस के सामने से प्यार का ठंडा अमृत कलश ही हटा लिया गया हो.

फूलों से सजे कमरे में रात्रि के समय नरेंद्र व मोहिनी अकेले थे. यों तो नरेंद्र स्वभाव से ही शर्मीला था, किंतु उस रात वह भी सूरमा बन बैठा. हिचकिचाती, अपनेआप में सिमटी मोहिनी को उस ने जबरन अपनी बांहों में समेट लिया.

जीवनभर के विश्वासों की नींव शायद इसी परस्पर निकटता की आधारशिला पर टिकी होती है. इसीलिए सुबह होतेहोते दोनों आपस में इस तरह घुलमिल कर बातें कर रहे थे मानो वर्षों से एकदूसरे को जानते हों. मोहिनी नरेंद्र के मन को भा गई थी. दसरे दिन सुबह सभी मेहमान जाने को हो रहे थे. रसोई में नाश्ते की व्यवस्था हो रही थी. शायद उसे भी काम में हाथ बंटाना चाहिए, यही सोच कर मोहिनी भी रसोई के दरवाजे पर जा खड़ी हुई. जेठानी प्यालों में चाय छान रही थीं और मां पूरियां उतार रही थीं.

मोहिनी ने धीरे से चकला अपनी ओर खिसका कर सास के हाथ से बेलन ले लिया और ‘मैं बेलती हूं, मांजी’ कह कर पूरियां बेलने लगी. उस की बेली 4-6 पूरियां उतारने के बाद ही सास धीरे से बोल उठीं, ‘‘नरेंद्र की बहू, पूरियां मोटी हो रही हैं…रहने दो, मैं ही कर लूंगी.’’ मोहिनी सहम कर बाहर आ गई. रात को मोहिनी ने नरेंद्र के कंधे पर सिर टिका कर 2 दिन से अपने हृदय में मथ रहे प्रश्न को पूछ ही लिया, ‘‘मांजी मुझे पसंद नहीं करतीं क्या?’’

नरेंद्र इस बेतुके, किंतु बिना किसी बनावट के किए गए सीधे प्रश्न से चौंक उठा, ‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘मांजी मुझ से प्यार से बोलती नहीं, न ही मुझे अपने से चिपटा कर प्यार किया. भाभी ने तो प्यार किया लेकिन मांजी ने नहीं.’’

मोहिनी के दोनों हाथ थाम कर वह बोला, ‘‘मां को समझने में तुम्हें अभी कुछ समय लगेगा. वैधव्य के सूनेपन ने ही उन्हें रूखा बना दिया है, उस पर भाभी के साथ कुछ न कुछ खटपट चलती ही रहती है. इसी कारण मांजी अंतर्मुखी हो गई हैं. किसी से अधिक बोलती नहीं. कुछ दिन तुम्हारे साथ रह कर शायद वे बदल जाएं.’’

‘‘मैं पूरा यत्न करूंगी,’’ और अपनेआप में हलका महसूस करते हुए मोहिनी नरेंद्र से सट कर सो गई. दूसरे दिन सुबह नरेंद्र के बड़े भाई एवं भाभी भी बच्चों सहित लौट गए. नरेंद्र से छोटे दोनों भाई अपनीअपनी नौकरियों पर वापस चले गए थे और 2 सब से छोटे भाई, जो नरेंद्र के पास रह कर पढ़ाई करते थे, अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गए.

नरेंद्र ने एक सप्ताह की छुट्टी ले ली थी. मोहिनी सोच रही थी कि शायद वे दोनों कहीं बाहर जाएंगे. किंतु नरेंद्र ने उस से बिना कुछ छिपाए अपने मन की बात उस के सामने रख दी, ‘‘मांजी और छोटे भाइयों को अकेला छोड़ कर हमारा घूमने जाना उचित नहीं.’’

मोहिनी खुशीखुशी पति की बात मान गई थी. उसे तो वैसे भी अपने दोनों छोटे देवर बहुत प्यारे लगते थे. मायके में बहनें तो थीं, लेकिन छोटे भाई नहीं. हृदय के किसी कोने में छिपा यह अभाव भी मानो पूरा होने को था. किंतु वे दोनों तो उस से इस कदर शरमाते थे कि दूरदूर से केवल देखते भर रहते थे. कभी मोहिनी से आंखें मिल जातीं तो शरमा कर मुंह छिपा लेते. तब मोहिनी हंस कर रह जाती और सोचती, ‘कभी तो उस से खुलेंगे.’ एक दिन मोहिनी को अवसर मिल ही गया. दोपहर का समय था. नरेंद्र किसी काम से बाहर गए हुए थे और मां पड़ोस में किसी से मिलने गई हुई थीं. अचानक दोनों देवर रमेश और सुरेश किताबें उठाए स्कूल से वापस आ गए.

‘‘मां, जल्दी से खाना दो, स्कूल में छुट्टी हो गई है. अब हम मैच खेलने जा रहे हैं.’’ किताबें पटक कर दोनों रसोई में आ धमके, किंतु वहां मां को न पा दोनों पलटे तो दरवाजे पर भाभी खड़ी थीं, हंसती, मुसकराती.

‘‘मैं खाना दे दूं?’’ मोहिनी ने हंस कर पूछा तो दोनों सकुचा कर बोले, ‘‘नहीं, मां ही दे देंगी, वे कहां गई हैं?’’

‘‘पड़ोस में किसी से मिलने गई हैं. उन्हें तो मालूम नहीं था कि आप दोनों आने वाले हैं. चलिए, मैं गरमगरम परांठे सेंक देती हूं.’’

मोहिनी ने रसोई में रखी छोटी सी मेज पर प्लेटें लगा दीं. सुबहसुबह जल्दी से सब यहीं इसी मेज पर खापी कर भागते थे. मोहिनी ने फ्रिज से सब्जी निकाल कर गरम की. कटा हुआ प्याज, हरीमिर्च, अचार सबकुछ मेज पर रखा. फ्रिज में दही दिखाई दिया तो उस का रायता भी बना दिया. ये सारी तैयारी देख रमेश व सुरेश कूद कर मेज के पास आ धमके. जल्दीजल्दी गरम परांठे उतार कर देती भाभी से खाना खातेखाते उन की अच्छीखासी दोस्ती भी हो गई. स्कूल के दोस्तों का हाल, मैच में किस की टीम अच्छी है, कौन सा टीचर अच्छा है, कौन नहीं आदि सब खबरें मोहिनी को मिल गईं. उस ने उन्हें अपने मायके के किस्से सुनाए. बिंदु और मीनू के साथ होने वाले छोटेमोटे झगड़े और फिर छत पर बैठ कर उस का कविताएं लिखना, सबकुछ सुरेश, रमेश को पता लग गया. ‘‘अरे वाह भाभी, तुम कविता लिखती हो? तब तो तुम हमें हिंदी भी पढ़ा सकती हो?’’ सुरेश उत्साहित हो कर बोला.

‘‘हांहां, क्यों नहीं. अपनी किताबें मुझे दिखाना. हिंदी तो मेरा प्रिय विषय है. कालेज में तो…’’ और मोहिनी बोलतेबोलते सहसा रुक गई क्योंकि चेहरे पर अजीब सा भाव लिए मांजी दरवाजे के पास खड़ी थीं. मोहिनी से कुछ न कह वे अपने दोनों बेटों से बोलीं, ‘‘तुम दोनों मेरे आने तक रुक नहीं सकते थे.’’

रमेश और सुरेश को तो मानो सांप ही सूंघ गया. मां के चेहरे का यह कठोर भाव उन के लिए नया था. भाभी से खाना मांग कर उन्होंने क्या गलती कर दी है, समझ न सके. हाथ का कौर हाथ में ही पकड़े खामोश रह गए. पल दो पल तो मोहिनी भी चुप ही रही, फिर हौले से बोली, ‘‘ये दोनों तो आप ही को ढूंढ़ रहे थे. आप थीं नहीं तो मैं ने सोचा, मैं ही खिला दूं.’’

‘‘क्यों? क्या घर में फल, डबलरोटी… कुछ भी नहीं था जो परांठे सेंकने पड़े?’’ मां ने तल्खी से पूछा.

‘‘ऐसा नहीं है मांजी. मैं ने सोचा बच्चे हैं, जोर की भूख लगी होगी, इसलिए बना दिए.’’

‘‘तुम्हारे बच्चे तो नहीं हैं न? मैं खुद ही निबट लेती आ कर,’’ अत्यंत निर्ममतापूर्वक कही गई सास की यह बात मोहिनी को मानो अंदर तक चीर गई, ‘क्या रमेश, सुरेश उस के कुछ नहीं लगते? नरेंद्र के छोटे भाइयों को प्यार करने का क्या उसे कोई हक नहीं? उन पर केवल मां का ही एकाधिकार है क्या? फिर कल जब ये दोनों भी बड़े हो जाएंगे तो मांजी क्या करेंगी? विवाह तो इन के भी होंगे ही, फिर…?’

रमेश व सुरेश न जाने कब के अपने कमरों में जा दुबके थे और मांजी अपनी तीखी दृष्टि के पैने चुभते बाणों से मोहिनी का हृदय छलनी कर अपने कमरे में जा बैठी थीं. एक अजीब सा तनाव पूरे घर में छा गया था. मोहिनी की आंखें छलछला आईं. उसे याद आया अपना मायका, जहां वह किसी पक्षी की भांति स्वतंत्र थी, जहां उस का अपना आसमान था, जिस के साथ अपने छोटेमोटे सुखदुख बांट कर हलकी हो जाती थी. मोहिनी को लगा, अब भी उस के साथसाथ चल कर आया आसमान का वह नन्हा टुकड़ा उस का साथी है, जो उसे हाथ हिलाहिला कर ऊपर बुला रहा है. वह नरेंद्र की अलमारी में कुछ ढूंढ़ने लगी. एक सादी कौपी और पैन उसे मिल ही गया. जल्दीजल्दी धूलभरी सीढि़यां चढ़ती हुई वह छत पर जा पहुंची. कैसी शांति थी वहां, मानो किसी घुटनभरी कैद से मुक्ति मिली हो. मन किसी पक्षी की भांति बहती हवा के साथ उड़ने लगा. धूप छत से अभीअभी गई थी. पूरा माहौल गुनगुना सा था. वहीं जीने की दीवार से पीठ टिका कर मोहिनी बैठ गई और कौपी खोल कर कोई प्यारी सी कविता लिखने की कोशिश करने लगी.

विचारों में उलझी मोहिनी के सामने सास का एक नया ही रूप उभर कर आया था. उसे लगा, व्यर्थ ही वह मांजी से अपने लिए प्यार की आशा लगाए बैठी थी. इन के प्यार का दायरा तो इतना सीमित, संकुचित है कि उस में उस के लिए जगह बन ही नहीं सकती और जैसेजैसे उन के बेटों के विवाह  होते जाएंगे, यह दायरा और भी सीमित होता जाएगा, इतना सीमित कि उस में अकेली मांजी ही बचेंगी. मोहिनी के मुंह में न जाने कैसी कड़वाहट सी घुल गई. उस का हृदय वितृष्णा से भर उठा. जीवन का एक नया ही पक्ष उस ने देखा था. शायद नरेंद्र भी 23 वर्षों में अपनी मां को इतना न जान पाए होंगे जितना इन कुछ पलों में मोहिनी जान गई. साथ ही, वह यह भी जान गई कि प्यार यदि बांटा न जाए तो कितना स्वार्थी हो सकता है. मोहिनी ने मन ही मन एक निश्चय किया कि वह प्यार को इन संकुचित सीमाओं में कैद नहीं करेगी. मांजी को बदलना ही होगा. प्यार के इस सुंदर कोमल रूप से उन्हें परिचित कराना ही होगा.

Inspiring Story : एक लुटेरा था

Inspiring Story : गोंडू लुटेरा उस कसबे के लोगों के लिए खौफ का दूसरा नाम बना हुआ था. भद्दे चेहरे, भारी डीलडौल वाला गोंडू बहुत ही बेरहम था. वह लोफरों के एक दल का सरदार था. अपने दल के साथ वह कालोनियों पर धावा बोलता था. कहीं चोरी करता, कहीं मारपीट करता और जोकुछ लूटते बनता लूट कर चला जाता.

कसबे के सभी लोग गोंडू का नाम सुन कर कांप उठते थे. उसे तरस और दया नाम की चीज का पता नहीं था. वह और उस का दल सारे इलाके पर राज करता था.

पुलिस वाले भी गोंडू लुटेरा से मिले हुए थे. पार्टी का गमछा डाले वह कहीं भी घुस जाता और अपनी मनमानी कर के ही लौटता.

गोंडू का मुकाबला करने की ताकत कसबे वालों में नहीं थी. जैसे ही उन्हें पता चलता कि गोंडू आ रहा है, वे अपनी दुकान व बाजार छोड़ कर अपनी जान बचाने के लिए इधरउधर छिप जाते.

यह इतने लंबे अरसे से हो रहा था कि गोंडू और उस के दल को सूनी गलियां देखने की आदत पड़ गई थी.

बहुत दिनों से उन्होंने कोई दुकान नहीं देखी थी जिस में लाइट जल रही हो. उन्हें सूनी और मातम मनाती गलियों और दुकानों के अलावा और कुछ भी देखने को नहीं मिलता था.

एक अंधेरी रात में गोंडू और उस के साथी लुटेरे जब एक के बाद एक दुकानों को लूटे जा रहे थे तो उन्हें बाजार खाली ही मिला था.

‘‘तुम सब रुको…’’ अचानक गोंडू ने अपने साथियों से कहा, ‘‘क्या तुम्हें वह रोशनी दिखाई दे रही है जो वहां एक दुकान में जल रही है?

ये भी पढ़ें- नया जमाना

‘‘जब गोंडू लूटपाट पर निकला हो तो यह रोशनी कैसी? जब मैं किसी महल्ले में घुसता हूं तो हमेशा अंधेरा ही मिलता है.

‘‘उस रोशनी से पता चलता है कि कोई ऐसा भी है जो मुझ से जरा भी नहीं डरता. बहुत दिनों के बाद मैं ने ऐसा देखा है कि मेरे आने पर कोई आदमी न भागा हो.’’

‘‘हम सब जा कर उस आदमी को पकड़ लाएं?’’ लुटेरों के दल में से एक ने कहा.

‘‘नहीं…’’ गोंडू ने मजबूती से कहा, ‘‘तुम सब यहीं ठहरो. मैं अकेला ही उस हिम्मती और पागल आदमी से अपनी ताकत आजमाने जाऊंगा.

‘‘उस ने अपनी दुकान में लाइट जला कर मेरी बेइज्जती की है. वह आदमी जरूर कोई जांबाज सैनिक होगा. आज बहुत लंबे समय बाद मुझे किसी से लड़ने का मौका मिला है.’’

जब गोंडू दुकान के पास पहुंचा तो यह देख कर हैरान रह गया कि एक बूढ़ी औरत के पास दुकान पर केवल 12 साल का एक लड़का बैठा था.

औरत लड़के से कह रही थी, ‘‘सभी लोग बाजार छोड़ कर चले गए हैं. गोंडू के यहां आने से पहले तुम भी भाग जाओ.’’

लड़के ने कहा, ‘‘मां, तुम ने मुझे जन्म  दिया, पालापोसा, मेरी देखभाल की और मेरे लिए इतनी तकलीफें उठाईं. मैं तुम्हें इस हाल में छोड़ कर कैसे जा सकता हूं? तुम्हें यहां छोड़ कर जाना बहुत गलत होगा.

‘‘देखो मां, मैं लड़ाकू तो नहीं??? हूं, एक कमजोर लड़का हूं, पर तुम्हारी हिफाजत के लिए मैं उन से लड़ कर मरमिटूंगा.’’

एक मामूली से लड़के की हिम्मत को देख कर गोंडू हैरान हो उठा. उस समय उसे बहुत खुशी होती थी जब लोग उस से जान की भीख मांगते थे, लेकिन इस लड़के को उस का जरा भी डर नहीं.

‘इस में इतनी हिम्मत और ताकत कहां से आई? जरूर यह मां के प्रति प्यार होगा,’ गोंडू को अपनी मां का खयाल आया जो उसे जन्म देने के बाद मर गई थी. अपनी मां के चेहरे की हलकी सी याद उस के मन में थी.

उसे अभी तक याद है कि वह किस तरह खुद भूखी रह कर उसे खिलाती थी. एक बार जब वह बीमार था तब वह कई रात उसे अपनी बांहों में लिए खड़ी रही थी. वह मर गई और गोंडू को अकेला छोड़ गई. वह लुटेरा बन गया और अंधेरे में भटकने लगा.

गोंडू को ऐसा महसूस हुआ कि मां की याद ने उस के दिल में एक रोशनी जला दी है. उस की जालिम आंखों में आंसू भर आए. उसे लगा कि वह फिर बच्चा बन गया है. उस का दिल पुकार उठा, ‘मां… मां…’

उस औरत ने लड़के से फिर कहा, ‘‘भाग जाओ मेरे बच्चे… किसी भी पल गोंडू इस जलती लाइट को देख कर दुकान लूटने आ सकता है.’ तभी गोंडू दुकान में घुसा. मां और बेटा दोनों डर गए.

गोंडू ने कहा, ‘‘डरो नहीं, किसी में इस लाइट को बुझाने की ताकत नहीं है. मां के प्यार ने इसे रोशनी दी है और यह सूरज की तरह चमकेगा. दुकान छोड़ कर मत जाओ.

‘‘बदमाश गोंडू मर गया है. तुम लोग यहां शांति से रहो. लुटेरों का कोई दल कभी इस जगह पर हमला नहीं करेगा.’’

‘‘लेकिन… लेकिन, आप कौन हैं?’’ लड़के ने पूछा.

वहां अब खामोशी थी. गोंडू बाहर निकल चुका था.

उस रात के बाद किसी ने गोंडू और उस के लुटेरे साथियों के बारे में कुछ नहीं सुना.

कहीं से उड़ती सी खबर आई कि गोंडू ने कोलकाता जा कर एक फैक्टरी में काम ले लिया था. उस के साथी भी अब उसी के साथ मेहनत का काम करने लगे थे.

Bossy Woman बनने के लिए फौलो करें ये 12 टिप्‍स

Bossy Woman : जब एक महिला मजबूत हो, स्ट्रौंग हो और अपने अधिकारों के प्रति सजग होती है तो उसे बौसी और कंट्रोलिंग वुमन का टैग दिया जाता है. इन लोगों में खुद कुछ करने का दम नहीं होता इसलिए महिलाओं को दबा कर उस पर अपना जोर चला कर अपने मर्दानगी का दम भरते हैं.

“एक क्वीन की तरह सोचो, जो कभी गिरने से नहीं डरती. हमारी असफलता ही महानता की ओर एक और कदम है.” यह कहना है दुनिया की सब से शक्तिशाली महिलाओं में से एक विश्व प्रसिद्ध ओपरा विन्फ्रे का, जो सभी महिलाओं के लिए एक प्रेरणा हैं.

आज हम महिलाओं को मजबूत और सशक्त बनाने की बात करते हैं. महिला सशक्तिकरण पर लेख, सेमिनार और अवेयरनेस प्रोग्राम करते हैं. लेकिन जब एक महिला पहले से ही मजबूत हो, स्ट्रौंग हो, अपने अधिकारों के प्रति सजग हो, वह दूसरों की बात मानने की बजाए अपनी बात मनवाने पर जोर दे, तो हम उसे ‘बौसी’, ‘जिद्दी’, ‘कंट्रोलिंग’ आदि नामों से बुलाते हैं. इस के ठीक विपरीत जब एक पुरुष ऐसा करता है, तो हम उसे ‘लीडर क्वालिटी’ वाला लड़का कहते हैं. क्या पुरुषों और महिलाओं में ये भेदभाव सही है? अगर पुरुष स्ट्रौंग और लीडर क्वालिटी वाले हो सकते हैं, तो फिर महिलाएं ऐसे क्यों नहीं हो सकती?

क्यों कहा जाता है महिलाओं को कंट्रोलिंग नेचर वाला

2014 में, फेसबुक सी ओ ओ शेरिल सैंडबर्ग ने ‘बैन बौसी’ “BAN BOSSY” अभियान शुरू किया और उन्हें विश्व प्रसिद्ध वुमन लीडर्स और दिग्गजों का समर्थन भी मिला. अभियान का तर्क यह था कि कम उम्र से ही लड़कियों को शांत और विनम्र रहने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. अगर वे इन लैंगिक मानदंडों को तोड़ने का साहस करती हैं, तो अकसर उन की आलोचना की जाती है. उन्हें नापसंद किया जाता है और ऐसे नामों से पुकारा जाता है, जो उन्हें बड़े हो कर नेता बनने से हतोत्साहित करते हैं यानी रोकते हैं. उसे ऐसा इसलिए नहीं करने दिया जाता क्योंकि वह महिला और पुरुष के इन लैंगिक मानदंडों को तोड़ने का साहस करती हैं, तो अकसर उन की आलोचना की जाती है.

लेकिन क्या एक महिला अपने लिए आवाज नहीं उठा सकती? महिलाओं के गुणों को अवगुण बना कर समाज के सामने पेश किया जाना क्या सही है?

यानि कि महिलाओं के इन गुणों को उन के अवगुण बना कर समाज के सामने पेश किया जाता है, क्योंकि अगर किसी लड़के से उस की पसंद पूछी जाए तो उसे केयरिंग, घर संभालने वाली, जौब वाली और नरम व्यवहार वाली लड़कियां ही पसंद आती हैं. स्ट्रौंग महिला का गर्लफ्रैंड बनाने तक ठीक है लेकिन उस के साथ जीवन बिताने की बात आए तो लड़के के दोस्त भी मजाक बनाने लगते हैं. ‘अरे तू तो पूरा जीवन दब के ही रहेगा, वो तो तुझे कुछ बोलने ही नहीं देगी.’ ऐसा और भी बहुत कुछ कहा जाता है. शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि हर पुरुष खुद को महिला से स्ट्रौंग समझता है और स्ट्रौंग रहना भी चाहता है. लेकिन इतिहास गवाह है कि महिलाएं पुरुषों से ज्यादा स्ट्रौंग और अकलमंद होती हैं.

महिलाएं पुरुषों से ज्यादा इंटेलिजेंट

इतिहास तो इस बात से भरा पड़ा है कि जब भी किसी राजा ने राज्य किया है तो ताकत भले ही उस की हो पर सलाह हमेशा वो अपनी पत्नी की ही मानता था. कुछ रानियों को छोड़ कर, अधिकतर जो राय स्त्रियों द्वारा दी जाती थी वो ही उस राजा की जीत या प्रभाव का कारण बनती थी. जैसे महाराणा प्रताप के पिता उदय सिंह के प्राण एक स्त्री (धाय मां) ने बचाए, अहिल्या तो अपनी बुद्धि के लिए प्रारंभ से ही मशहूर थीं और बाद में राज्य की बागडोर भी उन्हीं ने संभाली.
रजिया सुल्तान, मुमताज महल नूरजहां जिन के लिए कहा जाता था कि असली बादशाह तो वही थीं. जबकि मुसलमानों में तो औरत की कोई औकात ही नहीं मानी जाती. इसी प्रकार हिंदू रानियों की भी बड़ी लिस्ट है जिस में पद्मावती भी शामिल है यानि इन सभी के अलावा हर मुश्किल मोड़ पर सही सलाह दे कर राजा को मुकाम पर पहुंचाने वाली कोई न कोई स्त्री ही रही है. जब राम रावण से युद्ध के लिए जाते हैं पहले शक्ति की उपासना करते हैं.

महिला को बौसी और कंट्रोलिंग कहना कमजोर लोगों की निशानी

जो ऐसा कहते हैं वे कमजोर और निखत हैं और दूसरों पर निर्भर हैं पर मानना नहीं चाहते. इन लोगों में खुद कुछ करने का दम नहीं होता इसलिए स्त्री को दबा कर उस पर अपना जोर चला कर अपने पौरुषत्व का दम भरते हैं. उन्हें दबी, गिड़गिड़ती, बेचारी और लाचार औरतें ही पसंद आती हैं जो पुरुषों के पैरों में पड़े हुए अपना जीवन काटती हैं और ताउम्र उन पर निर्भर रहती हैं.

किन महिलाओं को कहा जाता है बौसी

खुद के फैसलों पर भरोसा करने वाली महिला को बौसी कहा जाता है क्योंकि उन्हें कोई फैसला करने के लिए किसी की राय की जरूरत नहीं होती. राय लेती भी हैं तो आखिरी फैसला उन का होता है.

1. अपने हक के लिए लड़ती है

ये महिलाएं अपने हक के लिए आवाज उठाना जानती हैं. ये किसी से दबती भी नहीं हैं. सभी अधिकार पता होते हैं और उन का इस्तेमाल करना भी ये बखूबी जानती हैं.

2. अपनी इच्छाओं से समझौता नहीं करतीं

ये महिलाएं पहले अपने लिए जीती हैं अपने बारे में सोचती हैं. खुद को खुश रखना जानती हैं. इसलिए अपने सपनों को दबाती नहीं हैं बल्कि उन्हें पूरा करने के लिए जी तोड़ मेहनत करने से घबराती नहीं हैं.

3. खुशियां बांटने में विश्वास रखती हैं

ये अपनी खुशी को तो प्राथमिकता देती ही हैं साथ ही दूसरे लोगों को भी अपनी खुशियों में शामिल करने में विशवास करती हैं. दूसरों की भावनाओं की कदर करना भी जानती हैं. स्ट्रौंग महिलाएं कभी भी, किसी भी तरह के ‘पंचेज’ रोक कर नहीं रखतीं. यानी होल्ड बैक नहीं करतीं, और जाहिर है, अगर उस का ब्रेकअप हो गया है तो वो अपने साथी को उस की गलतियों के लिए आसानी से माफ कर देती हैं. वो जिंदगी भर एक टूटे हुए रिश्ते और बुरी यादों का भार उठाने में विश्वास नहीं करती हैं. वह आगे बढ़ने में विह्श्वास करती हैं.

4. बौसी महिला के फायदे बहुत

यह आजकल की नारी है और इन्हें अपनी सुरक्षा के लिए किसी का मुंह देखने की जरूरत नहीं है. यह सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग भी लेती हैं और सुरक्षा ऐप भी इन के पास होती है ताकि मुसीबत में समझदारी से काम ले कर वहां से निकला जा सके. ये पूरी तरह चौकन्नी होती हैं और अपने लेवल पर काफी चीजें हल कर लेती हैं. कोई लड़का तंग कर रहा हो तो महिला सिपाही की मदद ले कर उस सिचुएशन से भी खुद ही बाहर निकलने का रास्ता खोजती है. और ये डर कर घर पर बैठने वालों में से नहीं है बल्कि मदद के लिए आवाज उठाना भी जानती हैं.

5. कौन्फिडेंस लेवल हाई होता है

इन महिलाओं में कौंफिडेंस भी होता है. किसी काम के लिए ये दूसरों पर डिपैंड नहीं रहतीं बल्कि अपने सब काम खुद ही कर लेती हैं. जो समझ न आए वह काम भी जल्द ही सीख लेती हैं. इन्हें पति के नक्शेकदम पर चलने की जरूरत नहीं होती है. ये अपनी राहें खुद चुनती हैं और खुद ही उस पर चलती हैं.

6. गो गेटर होती हैं ऐसी महिलाएं

गो गेटर यानि कि अपने सपनों को पूरा करने के लिए हर हद से गुजर जाना. उस के लिए जीजान लगा देना. अपने लक्ष्य पर नजर रखना और आगे बढ़ते ही जाना इन महिलाओं के व्यक्तित्व का अहम हिस्सा होता है.

7. पौजिटिव होती है सोच

यह हमेशा आधा भरा गिलास देखती हैं नाकि आधा खाली गिलास. इन की यही पौजिटिव सोच इन्हें ओरों से अलग बनाती है. इन के चीजों को देखने का नजरिया ही थोड़ा अलग होता है. यही वजह है ये असफलता मिलने पर परेशान नहीं होती बल्कि दोगुनी हिम्मत से फिर उठ खड़ी होती हैं.

8. सेल्फ केयर करना भी जानती हैं

ये महिलाएं न सिर्फ दूसरों का ख्याल रखती हैं बल्कि खुद की देखभाल करना भी जानती हैं. ये अपने लिए भी समय निकाल लेती हैं. जब ये अपना ख्याल रखती हैं तभी पूरे मन से दूसरों का ख्याल रख पाती हैं.

9. खुद को प्रेफरेंस देती हैं

ये जो हैं जैसे भी हैं उसे में खुश रहती हैं. इन की शकल अच्छी हो न हो, हाइट कम हो या रंग साफ न हो इन्हें इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. ये खुद के प्रति पूरी तरह ईमानदार होती हैं और खुद से प्यार करना इन्हें आता है. ये अपने में कोई कमी नहीं मानती. बल्कि अपनी कमजोरियों को ही अपनी ताकत बना लेती हैं.

10. सभी के लिए प्रेरणा बनती हैं

ये महिलाएं अपने जीवन में कुछ ऐसा कर गुजरती हैं कि ये दूसरे लोगों के लिए भी मिसाल बन जाती हैं. लोग इन के जीवन को देख कर बहुत कुछ सीखते हैं और ये खुद भी लोगों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं उन की मदद करती हैं.

11. विपरीत परिस्थितियों से घबराती नहीं हैं

हम अपने जीवन में आने वाली समस्याओं को किस तरह लेते हैं ये हमारी मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है और ये महिलाएं हर मुश्किल का डट कर सामना करती हैं. चुनौतियों के आगे सर नहीं झुकाती बल्कि हिम्मत के साथ उन का सामना करना जानती हैं.

12. वह पति से ज्यादा काम कर लेती हैं

ये महिलाएं घर और बाहर अच्छी तरह मैनेज कर लेती हैं. पति से कई गुना ज्यादा काम करती हैं और फिर भी फ्रेश ही महसूस करती हैं. क्योंकि ये जो भी करती हैं पूरे मन से करती हैं इसलिए जब मन खुश होता है कोई भी काम करने में बोझ नहीं लगता बल्कि खुशी मिलती है.

आप भी बनें स्ट्रौंग महिला

– अपने गुण और अवगुणों को जाने और उन में तालमेल बैठा कर जीना सीखें. अवगुणों को अपनी ताकत में बदल दें.
– हर बात के लिए सिर झुकाना भी सही नहीं होता जहां लगे अपनी गलती नहीं है वहां खुद को सही साबित करें.
– जिस काम को करने का मन न हो उसे दूसरों को करने के लिए न कहें.
– अपनी सीमाएं खुद तय करें कि किस चीज के लिए आप को किस हद तक जाना है यह खुद ही सोचें और तय करें.
– अपनी सेहत का पूरा ध्यान रखें. एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन हो सकता है. इसलिए अपने खानेपीने, रेगुलर हैल्थ चेकअप का ध्यान रखें.
– किसी के प्रेशर में न आएं. जो खुद को ठीक लगे वह करें. जो चीज सही न लगे उस के लिए मुंह पर मना करें.
– बुरा बनने से न डरें. खुद घुटघुट कर जीने से अच्छा है एक बार बुरे बन जाएं और चैन से अपनी लाइफ जिएं.

लिनोर एटियोनेटे ने भी एक किताब लिखी है, ‘रेजिंग मैंटली एंड इमोशनली स्ट्रौंग वुमन’. यह किताब महिलाओं पर केंद्रित है जिस में उन्हें स्ट्रौंग कैसे बनाया जाए इस बारे में बताया गया है. यानी कि महिलाओं को स्ट्रौंग होना ही चाहिए और इस के लिए कोशिश करते रहना चाहिए.
वैसे आज समाज भी बदलने लगा है जहां एक तरफ ऐसे पुरुष हैं जो स्ट्रौंग महिलाओं को पसंद नहीं करते वहीं बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो अपने पार्टनर के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलना चाहते हैं. जीवन की हर चुनौती का सामना करने के लिए उन्हें एक स्ट्रौंग महिला चाहिए जो उस की अनुपस्थिति में घर ही नहीं बाहर भी संभाल लें. अब ये आप को खुद तय करना है कि आप को एक मुखर, स्ट्रौंग, बनना है या डिपेंडैंट.

 

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें