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पढ़ाई और जौब कैसे करें मैनेज

आज यूथ का मल्टीटास्क होना बेहद जरूरी है, क्योंकि उन्हें परिस्थितिवश कई बार अनेक कार्यों को एकसाथ हैंडिल करना पड़ता है, जैसे होस्टल में रह कर पढ़ाई के दौरान खुद ही खाना बनाना, बाहर के काम निबटाना या फिर कभीकभी पढ़ाई के साथसाथ जौब भी करनी पड़ती है ताकि खुद की पढ़ाई का खर्च तो निकाल लें साथ ही आर्थिक रूप से स्ट्रौंग भी बनें ताकि अपनी हर जरूरत के लिए पेरैंट्स पर निर्भर न रहना पड़े. कुछ युवा तो आसानी से इन सब चीजों को हैंडिल कर लेते हैं, लेकिन कुछ एकसाथ कई काम या फिर जौब व पढ़ाई को साथसाथ हैंडिल नहीं कर पाते, जिस से दोनों के ही परिणाम बिगड़ते हैं. यहां हम आप को पढ़ाई व जौब को एकसाथ मैनेज करने के टिप्स बता रहे हैं जो आप के लिए काफी मददगार साबित होंगे.

टाइम मैनेजमैंट के फंडे को समझें

लाइफ फंडों के बल पर ही चलती है. अगर एक बार फंडा क्लियर हो जाए तो समझो सारी परेशानियों का हल निकल जाता है. अगर आप भी एकसाथ दो चीजों को हैंडिल करना चाहते हैं तो टाइम मैनेज करना सीखें. जैसे हर इंसान के पास एक दिन में 24 घंटे होते हैं. अगर वह 8 घंटे की जौब भी करता है तब भी 8-9 घंटे सोने के निकालने के बावजूद 7-8 घंटे बचते हैं, जिन में से अगर 2-3 घंटे औनलाइन व मौजमस्ती करने के लिए भी निकाल दें तब भी आप के पास 4-5 घंटे बचेंगे, जिन में आप अच्छी तरह अपनी पढ़ाई को टाइम दे पाएंगे यानी टाइम मैनेज कर के चलने से आप हर चीज सही तरीके से हैंडिल कर पाएंगे.

समय की सही पहचान जरूरी

हर व्यक्ति का ध्यान और एकाग्रता का हाई और लो टाइम होता है. हाई टाइम में आप अपनी शक्ति को पढ़ाई में लगाएं और जब एकाग्रता नहीं बन पा रही है तो उस समय मनोरंजन करने लगें ताकि आप का माइंड रिलैक्स हो सके.

मल्टीटास्किंग की हो आदत

सिर्फ एक काम में उलझे रहना आज के यूथ को शोभा नहीं देता, उन्हें तो मल्टीटास्किंग बनना चाहिए. आज मल्टीटास्किंग होना समय की डिमांड है. आज औफिस में भी ऐसे कर्मचारियों को ही पसंद किया जाता है जो हर कार्य करना जानते हों न कि सिर्फ व सिर्फ एक कार्य को ही ले कर बैठे रहें. इस के लिए आप को खुद ही निश्चय करना होगा कि आप एकसाथ किनकिन कार्यों को संभाल सकते हैं. जैसे अगर आप जौब करते हैं तो उस के साथसाथ आप घर के कार्यों में भी हाथ बंटा सकते हैं व अपने छोटे भाईबहनों की भी पढ़ाई में मदद कर सकते हैं. इस से आप को एकसाथ कई चीजों को हैंडिल करना आ जाएगा, जिस से जब भी आप पर एकसाथ कई कार्यों की जिम्मेदारी आएगी तो आप उसे आसानी से निभाएंगे और घबराएंगे नहीं.

परफैक्शन की कला सीखें

कार्य में परफैक्शन लाने के लिए आप को शुरुआत में छोटेछोटे कार्यों को ही लेना चाहिए ताकि आप उन्हें परफैक्टली हैंडिल कर सकें. इस के लिए आप को शैड्यूल बना कर चलना होगा ताकि आप को पता रहे कि किस समय किस कार्य को करना है. इस से जहां आप समय के महत्त्व को जानेंगे वहीं इस से एकसाथ कई कार्यों को करने और उन में परफैक्शन लाने की कला भी आएगी जो आगे चल कर आप को बडे़ टास्क करने में भी मदद करेगी.

ऐनर्जी कैसे प्राप्त करें

जब आप को मल्टीटास्क बनना है यानी एकसाथ कई कार्यों या फिर जौब व पढ़ाई को हैंडिल करना है तो उस के लिए ऐनर्जी का होना जरूरी है. बिना ऐनर्जी के आप किसी भी कार्य में अपना मन नहीं लगा पाएंगे. इस के लिए आप हैल्दी डाइट लें. जैसे फलसब्जियां, लंच व डिनर में दालों व हरी पत्तेदार सब्जियों को महत्त्व दें. इस से आप को ऊर्जा मिलेगी और यही ऊर्जा आप को सभी कार्यों में ऐक्टिव रोल प्ले करने में मदद करेगी. सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आप अपनी सोच को पौजिटिव रखें, जिस से आप हर कार्य को पूरी लगन से कर पाएंगे.

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माता-पिता : बचपन के दोस्त या दुश्मन

मौजूदा पीढ़ी के बच्चों और 25-30 साल पहले के बच्चों की जिंदगी में जमीन और आसमान का फर्क है. आज जिन मध्य और उच्चमध्यवर्गीय मांबाप की उम्र 35 से 40 साल के बीच है, वे आज के बचपन को ले कर जरा सी कोई बात हुई नहीं कि इस दौर के बच्चों की सुखसुविधाओं पर अपने दौर को याद कर के ताने मारने लगते हैं. अगर सुखसुविधाओं के आंकड़ों और तथ्यों की नजर से देखें तो यह बहुत गलत भी नहीं लगता. आखिर आज 8 से 17 साल तक के उच्च और उच्चमध्यवर्गीय हिंदुस्तानी महानगरों के बच्चे सालाना 10 हजार रुपए से ले कर 50 हजार रुपए तक की पौकेट मनी पाते हैं. जबकि 90 के दशक में किए गए टाटा इंस्टिट्यूट औफ सोशल साइंसैस व पाथ फाइंडर एजेंसी के सर्वे के मुताबिक, 80 और 90 के दशकों में भारत के आम मध्यवर्गीय शहरी बच्चे भी साल में औसतन 500 रुपए से ले कर 3 हजार रुपए तक की पौकेटमनी पाते थे.

आखिर आज 8 से 18 साल तक के बच्चों की पढ़ाईलिखाई में देश के सालाना 4 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो रहे हैं. यह अफ्रीका के 9 देशों के कुल सालाना बजट से भी ज्यादा बड़ी रकम है. आज शहरी बच्चों के पास तमाम तरह के गैजेट, कई तरह के फैशनेबल कपड़े, अनगिनत प्रकार की खानेपीने की चीजें, दोस्तों से लगातार संपर्क में बने रहने के लिए दर्जनों किस्म के फोन और इंटरनैट की सुविधाएं हैं.

सवाल है क्या फिर भी आज के बच्चे 25-30 साल पहले के बच्चों के मुकाबले ज्यादा सुखी, ज्यादा खुश हैं? जवाब है नहीं. आखिर क्यों? क्योंकि आज के बच्चे बेफिक्र नहीं हैं. आज के बच्चों के सिर और कंधों पर उम्मीदों व आकांक्षाओं का भारीभरकम बोझ लदा है. आज के बच्चों के पास खेलने के लिए खिलौने तो बहुत हैं लेकिन साथ में खेलने वाला कोई नहीं है. तमाम रिपोर्ट्स कहती हैं कि पश्चिमी देशों की तरह भारत में भी बच्चे बहुत अकेले होते जा रहे हैं. इस की एक वजह तो मांबाप की व्यस्तता ही है. मगर उस से भी बड़ी वजह है संवेदनशील संपर्क तकनीक का हमारे जीवन में लगभग छा जाना. भूमंडलीकरण, संस्कृति और बदलता आवासीय परिदृश्य भी इस सब का एक कारण है.

दबाव पर दबाव

वास्तव में बचपन एक ऐसी उम्र होती है जब बगैर किसी तनाव के मस्ती से जिंदगी जीने का आनंद लिया जाता है. लेकिन अब यह बात या तो किताबों में सुरक्षित है या फिर पुराने लोगों की जबान में. हालांकि नन्हें होंठों पर फूलों सी खिलती हंसी, शरारतें, रूठना, मनाना, जिद पर अड़ जाना आदि बचपन को इन्हीं तमाम बातों से जोड़ कर देखा जाता है. लेकिन आज की तारीख में बच्चों से एक बेफिक्र बचपन छीन लिया गया है. आज उन के चेहरों पर या तो चिंता या तनाव या फिर सजग मुसकराहट चस्पां रहती है. बच्चों की निश्छलता, कोमलता और बेफिक्री को हम ने उन की लाइफस्टाइल में कुरबान कर दिया है. एक जमाने में अपनी छोटी सी उम्र में पापा और दादा के कंधों की सवारी करने वाले बच्चों के कंधों पर आज या तो भारीभरकम बस्ता टंगा है या फिर उन में इसी कमसिन उम्र के दौरान दुनियाभर की खूबियों से लैस हो लेने का दबाव सवार है.

नजरों से गिराना

इस सब का एक बड़ा कारण यह है कि हम बच्चों को बहुतकुछ बनाने के फेर में, परफैक्ट तो कुछ बना ही नहीं पा रहे, उन से उन का अनमोल बचपन अलग से छीन ले रहे हैं. छोटी सी उम्र में ही हम उन्हें प्रतिस्पर्धाओं के क्रूर दंगल में उतार देते हैं. प्रतिस्पर्धा में असफल रहने पर हम उन्हें अपनी नजरों से ही नहीं, उन्हें खुद उन की नजरों से भी नीचे गिरा देते हैं. प्रतिस्पर्धा की कशमकश में उन का बचपन, उन की मासूमियत खो जाती है. आधुनिकता दिखाने के लिए और कमरे से बाहर न जाने की सुविधा को देखते हुए मांबाप उन्हें गिल्लीडंडे, लट्टू व बैटबौल की जगह वीडियोगेम्स व मोबाइल थमा देते हैं जो उन के दिमाग को कुंद और खूंखार बना देते हैं. बच्चों का स्वभाव उग्र हो जाता है. दिनभर अकसर वीडियो गेम से चिपके रहने वाले बच्चों में सामान्य बच्चों की अपेक्षा चिड़चिड़ापन व गुस्सैल प्रवृत्ति कहीं अधिक पाई जाती है.

छुट्टियां भी हैक्टिक

हमारे दिलोदिमाग में कुछ ऐसी बात घर कर गई है कि हम आजकल अपनी हर गतिविधि को एक फायदे की गतिविधि में तबदील कर देना चाहते हैं. उसे भुनाना चाहते हैं. यहां तक की छुट्टियों को भी हम ज्यादा से ज्यादा एंजौय करना चाहते हैं. इसलिए कहीं घूमने जाते हैं तो बजाय ठीक से घूमने के, कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा जगहें कवर कर लेना चाहते हैं. इसलिए छुट्टियों को भी हैक्टिक कर डालते हैं. खासकर ये बात छात्रों पर सब से ज्यादा लागू होती है. आप समर वैकेशन के बाद किसी छात्र से पूछिए कैसी रही छुट्यिं? तो ज्यादातर छात्र हिचकिचाते हुए कहेंगे, फन रहा, पर हैक्टिक रहा. आप सोचेंगे छुट्टियों का फन तो समझ में आता है मगर ये हैक्टिक…पर ऐसा है. जी हां, समर वैकेशन सचमुच अब छात्रों के लिए फन से ज्यादा हैक्टिक हो चला है. शुरू में कुछ दिन फन लगता है, लेकिन स्कूल द्वारा दिया गया ढेर सारा हौलीडे होमवर्क व प्रोजैक्ट्स छात्रों को छुट्टियों में भी चैन से नहीं जीने देते. इसलिए उन्हें छुट्टियां फन व मजेदार लगने के बजाय हैक्टिक लगती हैं. आप तो समझ गए होंगे, छुट्टियों में भी हम ने आपाधापी को आने वाली पीढ़ी के गले से बांध दिया है.

साथी भी लगता प्रतिस्पर्धी

कैरियर की क्रूर प्रतिस्पर्धा के बीच बच्चों को आजकल एक और प्रतिस्पर्धा ने जकड़ लिया है, वह है रिऐलिटी शो. जी हां, ये शो बच्चों के कोमल मन को प्रतिस्पर्धा की भावना को तोड़ देने की हद तक भर देते हैं. बच्चे इसे कुछ समझ पाएं, इस से पहले ही ये शो उन से उन का बचपन छीन लेते हैं. अब उन्हें अपने बचपन का हर साथी अपना प्रतिस्पर्धी नजर आने लगता है, जिस का बुरा से बुरा करने को वे हरदम तैयार रहते हैं. लेकिन नौकरीपेशा मातापिता ये सब जान कर भी नहीं जानना चाहते. क्योंकि यह जानना उन के सामने धर्मसंकट की स्थिति खड़ी करता है. वास्तव में आज के मांबाप को बच्चों के लिए घर के अंदर ही कई किस्म की सुविधाएं जुटा देना, उन्हें व्यस्त रखना या फिर किसी के भरोसे छोड़ना फायदे का सौदा लगता है.

दरअसल, उन के पास अपने बच्चों के लिए खाली वक्त नहीं होता है. अपने मकसद के लिए पढ़ेलिखे आधुनिक मांबाप बच्चों के बचपन को छीन कर उन्हें स्कूल, ट्यूशन, डांस क्लासेज, वीडियोगेम्स आदि में व्यस्त रखते हैं. जिस से बच्चा घर के अंदर दुबक कर अपना बचपन ही भूल जाता है. जबकि संपूर्ण विकास के लिए बच्चों को बाहर की हवा, बागबगीचे, दोस्तों के साथ मौजमस्ती यह सब चाहिए होता है. पढ़ाईलिखाई अपनी जगह है. आज के दौर में उस की अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है परंतु बच्चों का बचपन भी दोबारा लौट कर नहीं आता है.

बस्ते के बोझ से स्वास्थ्य पर असर

क्या आप को पता है नर्सरी और केजी के बच्चों के लिए कानूनन बस्ते का प्रावधान नहीं है? अन्य जिन बच्चों के स्कूलबैग का प्रावधान है, वह बैग भी उस के वजन के 10 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए? अगर अधिक पाया जाता है तो उस स्कूल के विरुद्ध जुर्माना लगाया जा सकता है. स्कूल बैग ऐक्ट बाकायदा एक अधिनियम है. लेकिन फिर भी पूरे हिंदुस्तान में सभी स्कूल इस नियम को तोड़ते हैं. लेकिन बच्चे तो बेचारे हैं. उन के मांबाप कभी भी इस मामले में स्कूल के विरुद्ध शिकायत नहीं करते. सवाल उठता है क्यों? क्योंकि मांबाप को लगता है उन का बच्चा बैग ले कर और वह भी भारी बैग ले कर जाएगा तो शायद ज्यादा शिक्षा ले आएगा.

साल 2006 में चिल्ड्रेन स्कूल बैग ऐक्ट पारित किया गया था. इस ऐक्ट में प्रावधान है कि बच्चे के स्कूल बैग का वजन उस के वजन का 10वां हिस्सा होना चाहिए. लेकिन स्कूलों में खुलेआम इस ऐक्ट की अवहेलना होती है. इस का खमियाजा बच्चों को वर्तमान में ही नहीं, भविष्य में भी भुगतना पड़ सकता है. बस्ता अधिनियम के मुताबिक तो स्कूल में बच्चों के लिए लौकर की सुविधा होनी चाहिए. जिस से बच्चों को रोज बैग न ले कर जाना पड़े. शिक्षा के अधिकार के तहत भी इस ऐक्ट को लागू किया गया है. शिक्षा के अधिकार के तहत धारा 29 में यह निर्देश है कि बच्चे के ऊपर कम भार पड़े, इस के लिए बैग का वजन कम होना चाहिए.

बच्चों को बैग का बोझ न उठाना पड़े, इस के लिए स्कूल के गेट तक अभिभावक खुद ही बोझ उठाते हैं. लेकिन ये बच्चे जितनी ही देर बैग को अपने कंधों पर ढोते हैं, उतना भी नुकसानदायक है. इस से मसल्स पेन, बोन चटकने आदि का खतरा रहता है. शरीर में हड्डी का वजन सब से कम होता है. पूरे शरीर में कोई 3 किलो हड्डियां होती हैं. ऐसे में लो बौडी वेट वाले के ऊपर अतिरिक्त वजन डाला जाए तो इस का असर पूरे शरीर पर दिखता है. हर शरीर का अपना गुरुत्व केंद्र (सैंटर औफ ग्रैविटी) फिक्स होता है. अधिक वजन होने पर गै्रविटी पीछे की ओर शिफ्ट होने लगती है जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है क्योंकि इस से मांसपेशी और हड्डियों पर भार अधिक पड़ता है. बच्चे की पीठ और कमर में प्रौब्लम रहती है. मसल्स में दर्द के साथसाथ बोन के चटकने का खतरा भी रहता है. रीढ़ की हड्डी नीचे की ओर झुक जाती है. 10 से 12 साल के बाद गरदन और नस पर भी असर पड़ता है.

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साइबर कानून एवं अपराध

दिल्ली में एक छात्र द्वारा अपनी महिला मित्र की अश्लील तसवीरें उतार कर एमएमएस बनाने व आगे दूसरे छात्रों द्वारा उस की फिल्म बनाने एवं फिर उसे बाजी डौट कौम द्वारा बेचने का सनसनीखेज मामला एकमात्र मामला नहीं है. ऐसे सैकड़ों मामले पूरे विश्व में खतरनाक ढंग से बढ़ रहे हैं. सूचना क्रांति के विस्तार के साथ ही अपराधों में वृद्धि हुई है, ये साइबर अपराध कंप्यूटर सौफ्टवेयर्स के माध्यम से किए जाते हैं. विश्व में करोड़ों लोग जो इंटरनैट का प्रयोग करते हैं, साइबर अपराध की आशंका से ग्रस्त रहते हैं. साइबर अपराध साधारणत: किसी प्रकार की हिंसा नहीं फैलाते लेकिन लालच, सम्मान और किसी व्यक्ति के चरित्र के कमजोर पहलू के साथ खेल कर विभिन्न अपराधों को जन्म देते हैं. साइबर अपराधों में आपराधिक गतिविधियां जैसे चोरी, धोखा, गबन, अपमान करना आदि सम्मिलित हैं. साइबर अपराध वे गैरकानूनी कार्य हैं जिन में कंप्यूटर का इस्तेमाल होता है तथा इस में सूचना, तकनीकी एवं आपराधिक गतिविधियां सम्मिलित होती हैं. विभिन्न प्रकार के साइबर अपराधों को निम्न प्रकार से बांटा जा सकता है :

व्यक्तिगत अपराध

इस प्रकार के अपराध किसी व्यक्ति या उस की निजी संपत्ति आदि को ले कर हो सकते हैं. इन में इलैक्ट्रौनिक मेल, साइबर स्टौकिंग, अश्लील/आपत्तिजनक सामग्री के इंटरनैट द्वारा प्रसार से हैकिंग/क्रैकिंग या किसी अन्य अपराध में कंप्यूटर का प्रयोग करना, वाइरस फैलाना, इंटरनैट साइट्स पर अतिक्रमण तथा बिना स्वीकृति के किसी व्यक्ति के कंप्यूटर पर गलत या आपराधिक तरीके से कब्जा करना आदि सम्मिलित हैं.

किसी संस्था के विरुद्ध

इस प्रकार के अपराध सामान्यत: किसी सरकारी, निजी संस्था, कंपनी या किसी समूह के खिलाफ हो सकते हैं. ये अपराध भी हैकिंग, क्रैकिंग द्वारा अथवा गैरकानूनी ढंग से सूचनाओं को प्राप्त करने और उन का इस्तेमाल किसी संस्था या सरकार के विरुद्ध कर के किए जाते हैं. पाइरेटेड सौफ्टवेयर का वितरण एवं अन्य प्रकार के गैरकानूनी कंप्यूटर संबंधी कार्यों से संबंधित अपराध इस श्रेणी में आते हैं.

समाज के विरुद्ध

ये अपराध किसी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध ही सीमित न रह कर संपूर्ण समाज को प्रभावित करते हैं. इस प्रकार के अपराधों में पोर्नोग्राफी तथा अश्लील सामग्री या ट्रैफिकिंग जैसे अपराध शामिल होते हैं.

विभिन्न प्रकार के साइबर अपराध

हैकिंग

यह सब से ज्यादा प्रचलित साइबर अपराध है. सूचना प्रौद्योगिकी ऐक्ट 2000 में इस प्रकार के अपराधों को बताते हुए कहा गया है, ‘‘जो भी जानबूझ कर या बिना जाने किसी गलत कार्य द्वारा पब्लिक या व्यक्ति को हानि पहुंचाता है अथवा पहुंचाने का प्रयास करता है उसे हैकिंग कहते हैं. इस प्रकार के अपराधों में कंप्यूटर पर ही सूचनाओं को गैरकानूनी ढंग से अधिगृहीत कर नुकसान पहुंचाने का कार्य किया जाता है.’’

सुरक्षा से संबंधित अपराध

इंटरनैट तथा नैटवर्क की तेज रफ्तार से वृद्धि के साथ नैटवर्क सुरक्षा बहुत महत्त्वपूर्ण हो गई है. निजी गुप्त सूचनाओं को आमजन तक प्रचारितप्रसारित करना ही सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित अपराधों की श्रेणी में आता है. यह कार्य नैटवर्क पौकेट स्निफर द्वारा किया जा सकता है जो संपूर्ण सूचनाओं को छोटेछोटे टुकड़ों में बांट कर उन का पुन: वितरण और प्रचारप्रसार करते हैं. ये नैटवर्क पौकेट स्निफर एक सौफ्टवेयर तकनीक को विकसित करते हैं तथा उपभोगकर्ता को उपयोगी सूचनाएं ग्रहण करने हेतु खाता संख्या एवं पासवर्ड उपलब्ध करवाते हैं. सुरक्षा व्यवस्था को इस से गंभीर खतरा उत्पन्न होता है.

इंटरनैट पर धोखाधड़ी

यह भी विशेष प्रकार का अपराध है. इंटरनैट कंपनियां इंटरनैट पर अपने उत्पादों की मार्केटिंग करती हैं. खराब उत्पादों की मार्केटिंग के लिए वे अपने ग्राहकों को गलत सूचनाएं दे कर उन्हें फंसाती हैं. इस प्रकार की कई भ्रामक और धोखाधड़ी वाली स्कीम्स को औनलाइन इंटरनैट द्वारा समाचारपत्र आदि द्वारा प्रस्तुत कर गबन करने के अनेक उदाहरण मिलते हैं.

क्रैडिट कार्ड धोखाधड़ी

यद्यपि इंटरनैट द्वारा मुद्रा का स्थानांतरण और लेनदेन करना बहुत आसान हो गया है, वहीं इस तकनीक ने कई प्रकार के साइबर अपराधों को जन्म भी दिया है. इन में मुख्य है, क्रैडिट कार्ड धोखाधड़ी. इस प्रकार के अपराध में किसी कार्डधारक के डिजिटल हस्ताक्षर बना कर उस के कोड नंबर की चोरी की जाती है. भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी ऐक्ट 2000 की धारा 73 के अनुसार इस प्रकार के अपराधों के लिए 2 वर्ष तक का कारावास या 2 लाख रुपए जुर्माना अथवा दोनों दंड निर्धारित हैं.

पोर्नोग्राफी

इंटरनैट पर अश्लील फिल्मी दृश्यों को देखना अब बहुत आसान हो गया है. युवाओं में तो पोर्नोग्राफी का बहुत के्रज है. पोर्नोग्राफी मैटीरियल आसानी से और कम पैसे में प्राप्त भी हो सकता है. मोबाइल फोन की तकनीक में विकास के कारण इन्हें भी कानून की भाषा में कंप्यूटर के समकक्ष माना गया है तथा इस से भी किसी अश्लील सामग्री की रिकौर्डिंग, संग्रहण और उस का आदानप्रदान बहुत आसान हो गया है. आजकल किसी भी फिल्म को तुरंत रिकौर्ड कर एमएमएस अथवा अन्य तरीकों से कुछ ही समय में संपूर्ण विश्व में प्रसारित कर सकते हैं. इस प्रकार इन दृश्यों में छेड़छाड़ अथवा जोड़तोड़ कर अश्लील सामग्री भी तैयार की जा सकती है. इंटरनैट और अन्य तकनीक की इस प्रगति का एक और दुष्प्रभाव इस के द्वारा अश्लील दृश्यों व फिल्मों का बच्चों तक आसानी से पहुंचना है. ऐसा करने वाले भी साइबर अपराधी कहलाते हैं.

सूचना प्रौद्योगिकी ऐक्ट 2000 और पोर्नोग्राफी

साइबर अपराधों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर सूचना प्रौद्योगिकी ऐक्ट 2000 बनाया गया. इस ऐक्ट के तहत अश्लील दृश्यों का प्रचारप्रसार एक दंडनीय साइबर अपराध है. इस ऐक्ट के अनुसार‘जो भी व्यक्ति, संस्था या समूह किसी भी प्रकार की अश्लील सामग्री को प्रकाशित व प्रसारित करने का प्रयास करेगा, जिस से कि किसी व्यक्ति को पढ़ने, सुनने, देखने के लिए प्रेरित किया जा सके अथवा उस के मस्तिष्क में किसी प्रकार की विकृति उत्पन्न कर सके, को इस ऐक्ट के तहत साइबर अपराधी माना जाएगा. उसे 5 वर्ष की कैद या 1 लाख रुपए तक का जुर्माना अथवा दोनों की सजा का प्रावधान है. दोबारा ऐसा प्रयास करने पर उसे 10 वर्ष के कारावास या 10 लाख रुपए जुर्माना अथवा दोनों की सजा का प्रावधान भी किया गया है.’

क्रिप्टोग्राफी, प्राइवेसी और राष्ट्रीय सुरक्षा

इंटरनैट द्वारा लोगों को अपना दृष्टिकोण प्रकट करने और किसी के प्रति टिप्पणी करने का विश्वव्यापी मंच प्राप्त हो गया है. लेकिन इस का अर्थ यह नहीं है कि किसी को अमर्यादित किया जाए या उन की प्राइवेसी में दखलंदाजी की जाए. अगर कोई ऐसा करता है तो वह साइबर अपराधी कहलाएगा. क्रिप्टोग्राफी वास्तव में शब्दों का प्रयोग कर संदेश को इस प्रकार प्रसारित करना है कि मात्र प्रेषक एवं संदेश प्राप्तकर्ता ही उसे समझ सके. इस प्रकार न केवल व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता बनी रहती है बल्कि दूसरों को भी इन कोड शब्दों की जानकारी प्राप्त नहीं होती. आधुनिक युग में इस प्रकार के कार्यों में भी कोडवर्ड की चोरी करने एवं उन संदेशों को गैरकानूनी ढंग से अनाधिकृत व्यक्तियों व कंपनियों तक पहुंचने से व्यावसायिक संगठनों को ही नहीं बल्कि देश की सुरक्षा एजेंसियों के गुप्त कार्यों का पता दुश्मनों को चल जाता है जिस से राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है.

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सहवाग के कहने पर प्रीति ने खरीदा था क्रिस गेल को, अब जिताए दो मैच

समय का चक्र कैसे हालात दिखा देता है इसका ताजा उदाहरण क्रिस गेल हैं. अभी चार महीने पहले ही की बात है जब आईपीएल 2018 की नीलामी में वेस्टइंडीज के धाकड़ बल्लेबाज क्रिस गेल दो करोड़ की बेस प्राइस में बिकने आए थे जिनका अब तक आईपीएल में शानदार रिकौर्ड रहा था. लेकिन दो बार उन्हें इस नीलामी में कोई खरीदार नहीं मिला था, लेकिन आज उन्होंने दो मैच खेल कर 175 रन बना डाले और दोनों में ही वे प्लेयर औफ द मैच रहे. आज क्रिस गेल आईपीएल में फर्श से अर्श पर पहुंच गए है.

गेल की इस छलांग की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. जब दो बार वे बिके बिना रह गए थे तब तीसरी बार पंजाब की मालिक प्रीति जिंटा ने उनपर दांव लगाया तो भी किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई. प्रीति ने उन्हें बेस प्राइस पर ही खरीदा. यानि उस समय कोई भी उन पर बोली लगाने को तैयार नहीं था. प्रीति ने गेल पर दांव सहवाग के कहने पर ही लगाया था.

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वहीं आईपीएल में गेल का रिकौर्ड खराब नहीं बल्कि बहुत ही शानदार रहा था. पिछले साल ही एक पारी में सबसे बड़ा स्कोर (167) बनाने वाले क्रिस गेल ने आईपीएल करियर में अब तक सबसे ज्यादा 250 से भी ज्यादा छक्के लगाए थे. पंजाब के मेंटर और डायरेक्टर वीरेंद्र सहवाग ने क्रिस गेल को अंतिम क्षणों में खरीदने की वजह का खुलासा किया था. तब सहवाग ने बताया था कि उनके शानदार स्ट्रोक प्ले और विपक्षी गेंदबाजों को ध्वस्त करने की शानदार ताकत पाकर हमारी टीम एक बढ़िया पैकेज में दिखाई पड़ रही है.

सहवाग के सार अनुमान सही निकले

सहवाग का गेल के बारे में अंदाज बिलकुल सही निकला. पहले दो मैचों में नहीं खिलाने के बाद जब पंजाब ने उन्हें तीसरे मैच में उतारा तो गेल ने साबित कर दिया कि वे आज भी आईपीएल के कितने बड़े खिलाड़ी हैं और उनका वे किसी कोने से नहीं चुके हैं. बावजूद इसके कि पंजाब के पास क्रिस गेल के अलावा एरोन फिंच मार्कस स्टोनिस और डेविड मिलर जैसे खतरनाक विदेशी खिलाड़ी थे और भारतीय खिलड़ियों में टीम के पास युवराज सिंह, मयंक अग्रवाल, केएल राहुल और करुण नायर थे, गेल ने मौका मिलते ही बता दिया कि उनके जैसा अभी तो कोई नहीं है.

दो बार प्लेयर औफ द मैच

गेल ने अपने पहले ही मैच में चेन्नई के खिलाफ 33 गेंदों में 63 रनों की शानदार पारी खेल कर पंजाब की जीत सुनिश्चित की. इसके बाद दूसरे मैच में पहले तीन मैचों में अजेय रही हैदराबाद की टीम के खिलाफ शानदार नाबाद शतक बनाया और पंजाब को दूसरी जीत दिला दी. दोनों मैचों में गेल प्लेयर ऑफ द मैच के खिताब से नवाजे गए.

नीलामी के बाद आईपीएल शुरु होने से पहले गेल के बारे में सहवाग ने संकेत दिए थे कि गेल हर मैच में नहीं खेलेंगे. उन्होंने कहा था, ”क्रिस गेल की ब्रेंड वैल्यू यह बताती है कि वह इस फौर्मेट में कितने प्रभावशाली है. हमने गेल हमारी टीम में ओपनिंग बैकअप आप्शन के तौर पर रहेंगे.”

संवेदनशील पारी रही

गेल का प्रदर्शन हैदराबाद के खिलाफ बहुत ही शानदार रहा. उनके तूफानी शतक की मदद से पंजाब ने हैदराबाद की टीम को 15 रन से हराया जो हैदराबाद की इस सीजन की पहली पराजय थी. ताबड़तोड़ क्रिकेट के बेताज बादशाह क्रिस गेल ने अपने आलोचकों को करारा जवाब देते हुए 63 गेंद में 104 रन बनाए जिसमें 11 छक्के और एक चौका शामिल था. उनकी इस पारी की मदद से पंजाब ने तीन विकेट पर 193 रन बनाए. जवाब में हैदराबाद की टीम 20 ओवर में चार विकेट पर 178 रन ही बना सकी.

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कैश क्रंच : अब पीओएस मशीन से नि:शुल्क निकाल सकेंगे 2 हजार रुपये

आधा दर्जन राज्यों में नकदी संकट को देखते हुए स्टेट बैंक ग्राहकों के लिए राहत भरी खबर लाया है. उसने छोटे शहरों में खुदरा बिक्री केन्द्रों पर पौइंट औफ सेल्स (पीओएस) मशीनों से रोजाना 2,000 रुपये तक मुफ्त निकालने की सुविधा देना शुरू कर दिया है. स्टेट बैंक ने यह सुविधा रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों पर देना शुरू किया है. रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों को निर्देश दिया था कि वे टियर-1 और टियर-2 श्रेणी के शहरों में ग्राहक खुदरा दुकानों पर उपलब्ध पीओएस से 1,000 रुपये और छोटे कस्बों में 2,000 रुपये तक निकालने की सुविधा शुरू करें. बैंक ने एक ट्वीट में बताया-देश में 4.78 लाख पीओएस मशीन से 2,000 रुपये तक का नकदी निकाली जा सकती है.

किसी भी बैंक के डेबिट कार्ड से निकलेगा कैश

बैंक के उपप्रबंध निदेशक (मुख्य परिचालन अधिकारी) नीरज व्यास ने ट्वीट में कर कहा कि ग्राहक अब टियर-3 से टियर-6 श्रेणी के शहरों में 2,000 रुपये तक निकाल सकेंगे. वहीं टियर-1 और टियर-2 श्रेणी के शहरों में 1,000 रुपये तक की निकासी पीओएस मशीन से कर सकते हैं. ग्राहक यह निकासी स्टेट बैंक या अन्य किसी बैंक के डेबिट कार्ड से हर दिन कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें कोई शुल्क नहीं देना होगा. स्टेट बैंक के पास कुल 6.08 लाख पीओएस मशीन हैं जिनमें से 4.78 लाख पर नकदी निकालने की भी सुविधा है.

पिछले कुछ दिनों में देश के कुछ राज्यों में एटीएम मशीनों में नकदी उपलब्ध नहीं होने की रिपोर्ट आई हैं. आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में एटीएम से नकदी नहीं मिलने के समाचार आने के बाद यह कदम उठाया गया है. इससे पहले दिन में स्टेट बैंक के चेयरमैन रजनीश कुमार ने कहा था कि एटीएम में नकदी की समस्या का शुक्रवार तक समाधान हो जाएगा. जिन राज्यों में कमी है वहां नकदी भेजी जा रही है. यह एक अस्थायी स्थिति है.

दूसरे बैंक ATM के इस्तेमाल पर लगेगा ज्यादा चार्ज

इस बीच, कन्फेडरेशन औफ एटीएम इंडस्ट्री (CATMI) ने मांग की है कि एटीएम से ट्रांजैक्शन करने पर चार्ज कम से कम 3 रुपए से 5 रुपए बढ़ना चाहिए. इससे एटीएम औपरेटर्स बढ़ती महंगाई में अपनी लागत निकाल सकेंगे. CATMI के निदेशक के. श्रीनिवास ने कहा कि हाल ही में आरबीआई ने काफी सख्त गाइडलाइंस जारी की हैं. इससे एटीएम सर्विस प्रोवाइडर्स की कुल लागत में बढ़ोतरी होगी. फिलहाल, सभी बैंक दूसरे बैंकों के कस्टमर से अपने बैंक के एटीएम का इस्तेमाल करने पर हर बार कैश निकालने पर 15 रुपए और दूसरे नौन कैश ट्रांजैक्शन पर 5 रुपए लेते हैं, जो 5 ट्रांजैक्शन के बाद हर बैंक ग्राहक को देना पड़ता है.

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मोदी राज में बोलना मना नहीं है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एकलौती बड़ी ताकत उनका वाकचातुर्य है, वे शब्दों को पिरोना जानते हैं और उनका कारोबार भी कर लेते हैं, उनके इसी हुनर को विपक्षी जुमलेबाजी कहते हैं. बोलना बिलाशक एक कला है जो किसी भी राजनेता को आना अनिवार्य है लेकिन ज्यादा और अनावश्यक बोलने बालों के प्रति आम राय अच्छी नहीं होती. नरेंद्र मोदी का कुछ भी बोलना इसलिए भी खास होता है कि वे शीर्ष संवैधानिक पद पर हैं, लेकिन उनकी खूबी यह है कि वे भाषा और विचारों में एक ऐसा तालमेल बैठालते हैं कि सुनने वालों के पास कोई तर्क नहीं रह जाता.

मोदी कितने और कहां से शिक्षित हैं, यह तो वही जाने पर उनके भाषणों में फिलासफी भी होती है और विकट का आत्मविश्वास भी होता है.  वे अपने आप को वैचारिक रूप से समृद्ध दिखाने की भरपूर कोशिश करते हैं और इसी वक्त में वे बेहद अपरिपक्व भी लगते हैं. यह और बात है कि उनके प्रशंसक यानि भक्त गण उनकी इन्हीं अदाओं पर बलैयां लिए जाते हैं. अभी तक के अधिकांश प्रधानमंत्री आमतौर पर जरूरत के मुताबिक ही बोलते रहे हैं, लेकिन मनमोहन सिंह जरूरत के मुताबिक भी नहीं बोलते थे और नरेंद्र मोदी जरूरत हो न हो बोलने से खुद को रोक नहीं पाते.

मनमोहन सिंह का कम बोलना अगर कमी या कमजोरी थी तो आनुपातिक और संख्यकीय लिहाज से नरेंद्र मोदी का बड़बोलापन कोई खूबी नहीं, बल्कि और बड़ी कमजोरी है, जिससे कभी कभी हीनता की बू भी आती है. यह क्या मानसिकता है और क्या असर लोगों पर डाल रही है इसे समझा जाना बेहद जरूरी है.

मनमोहन सिंह ने आदत के मुताबिक शांत लहजे में कहा कि नरेंद्र मोदी को खुलकर बोलना चाहिए. संदर्भ प्रसंग कठुवा गेंग रेप और उन्नाव गेंग रेप थे, जिन पर मोदी खामोश रहे थे और जो बोले वह सिर्फ एक राजनैतिक रस्म अदायगी भर थी. मनमोहन सिंह ने ताना मारा कि जो सलाह वह मुझे देते थे उसका अनुसरण उन्हें करना चाहिए. इस पर भगवा खेमा तिलमिला उठा.

केंद्रीय मंत्री रविशंकर सिंह ने तो निष्ठा निभाते बात का रुख ही पलटने की असफल कोशिश यह कहते कर डाली कि मोदी राज में देश की ताकत बढ़ी है, इसलिए हमेशा चुप रहने वाले मनमोहन सिंह सवाल नहीं करें.

भाजपा मीडिया सहित हर किसी का मुंह बंद करना चाहती है खासतौर से कोई नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ बोलता है तो वह अक्षम्य अपराध हो जाता है और यही मोदी राज की असल बढ़ती और बढ़ी ताकत है जिसमें सच देखने, कहने और बोलने की मुमानियत है. कठुवा और उन्नाव में जो हुआ वह देश भर में अब रोज हो रहा है. इसे देख कर आहत होने वाला गुनहगार और देशद्रोही है, क्योंकि वह नरेंद्र मोदी से सवाल करता है कि भाजपा नेताओं और आम राक्षसी प्रवृत्ति के मुजरिमों में फर्क क्या रह गया है. क्या सत्तारूढ़ दल के नेताओं को बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने पर भी कोई घोषित या अघोषित डिस्काउंट मिला हुआ है.

मनमोहन सिंह वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, पूर्व प्रधानमंत्री और रिजर्व बैंक के मुखिया रहे हैं, अगर उन्होंने प्रधानमंत्री को बोलने के मामले पर नसीहत दे डाली तो यह उनका सियासी हक था, जिसका अभिप्राय यह था कि नरेंद्र मोदी लच्छेदार भाषण छोड़ जमीनी बात करें और कठुवा और उन्नाव कांडों पर अपना रुख स्पष्ट करें.

ऐसा नरेंद्र मोदी ने शर्मिंदगी जाहिर करते किया भी और यह न कहते उपकार ही किया कि बलात्कारों से तो वैदिक साहित्य भी भरा पड़ा है, धर्मग्रंथों की मिसाल लें तो ऋषि मुनि वगैरह तो बात बात पर गरीब और छोटी जाति की कन्याओं का शील भंग करना अपना हक समझते थे. यही कुछ भाजपा नेताओं ने कर दिया तो उन्होंने गौरवशाली सनातनी परम्परा का ही निर्वाह किया है.

चूंकि दौर कथित लोकतन्त्र का है इसलिए बात घुमाफिराकर कही गई कि बात वाकई  खेद और शर्म की है जिसे दूर करने भक्तगन हरकत में आ गए हैं कि वो मंदिर जहां उस पीड़िता (जिस का नाम और पहचान उजागर करने की सजा जुर्माने की शक्ल में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मीडिया संस्थानों को दी) का रेप होना बताया जा रहा है, वहां तकनीकी तौर पर पर बलात्कार होना मुमकिन ही नहीं है. पुराने जमाने के जासूसी उपन्यासों के नायक भी इन दलीलों पर सर पीट लेते कि यह हो क्या हो रहा है. हम तो उपन्यासों में ही दफन होकर रह गए और यहां सस्पेंस की हद देखिये कि सरासर हुये बलात्कार की थ्योरी ही उल्टी जा रही है.

कुछ दिनों बाद मुमकिन है यह साबित ही कर दिया जाए कि उन्नाव और कठुवा के गेंग रेप हिंदुवादियों को बदनाम करने की साजिश थी, तो बात कतई हैरानी की नहीं होगी और फिर मनमोहन सिंह जैसे मौनी नेताओं के पास बोलने कुछ रह भी नहीं जाएगा. जैसे अहिल्या की इज्जत लूटकर इंद्र साफ बच निकला था वैसे ही ये देवतुल्य नेता मूंछों पर ताव देते नजर आएंगे कि मोदी राज में कानून व्यवस्था भी मजबूत थी.

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गोरे गोरे गालों पे

चेहरे पर अच्छी भौगौलिक हैसियत रखने के बाद भी गाल हमेशा ही उपेक्षा और अनदेखी के शिकार रहे हैं. कवियों और शायरों ने स्त्री सौन्दर्य का वर्णन चित्रण करते वक्त नाक, आंखों, होठों और जुल्फों को ही प्राथमिकता दी है, ये तमाम अंग गालों के नजदीकी ही हैं. गालों की तुलना सेव, अनार और टमाटर जैसे फलों से कर उन्हें बगीचा बनाकर छोड़ दिया गया है. इस ज्यादती के बाद भी गाल, गाल हैं जो अपना अलग आकर्षण रखते हैं. अगर वे लाल हों तो यह आकर्षण और बढ़ जाता है.

फूले लाल गालों को छूने और सहलाने का अपना एक अलग आनंद है, जिसमे वासना का भाव और अभाव दोनों होते हैं, मसलन गाल किसी बच्चे के हों तो उन्हें सहलाने में वासना नहीं बल्कि वात्सल्य होता है उलट इसके यही गाल किसी युवती के हों तो वासना या वात्सल्य का निर्धारण छूने वाले पुरुष की उम्र देख कर किया जाता है. हालांकि किसी अपरिचित यौवना के गाल छूना वह भी बिना उसकी अनुमति या सहमति के सभ्यता की बात या निशानी नहीं समझी जाती.

तमिलनाडु के राज्यपाल बुजुर्गवार बनवारी लाल पुरोहित को जाने क्या सूझी कि उन्होंने यूं ही एक प्रैस कान्फ्रेंस के दौरान एक महिला पत्रकार के गाल सहला दिये. हल्ला मचने यह एक मुक्कमल वजह थी और यह पत्रकार वार्ता की मर्यादा (अगर कोई होती हो तो) और उसका उल्लंघन भी था. मौजूदा दूसरे पत्रकारों ने राज्यपाल की इस हरकत पर एतराज जताया और विपक्ष ने भी निंदा की. बनवारी लाल की मंशा क्या थी यह शायद ही कभी स्पष्ट हो पाये.

विदर्भ क्षेत्र की नागपुर सीट से सांसद और विधायक रहे बनवारी लाल खुद भी पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं उन्हे गोपालकृष्ण गोखले द्वारा शुरू किए गए अखवार ‘द हितवाद’ को जिंदा रखने का श्रेय दिया जाता है. बनवारी लाल कभी किसी राजनैतिक दल या विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध नहीं रहे, बल्कि पदों के लालच में कांग्रेस और भाजपा के बीच झूला सा झूलते रहे. आखिरकार भाजपा ने गवरनरी से नवाजकर उन्हें इनाम दे दिया. कई विवादों से भी उनका नाम जुड़ा, मौजूदा गाल विवाद उसकी अगली कड़ी है.

एक पुरानी कहावत है कि बंदर कितना भी बूढ़ा हो जाये, कुंलाटे मारना नहीं छोड़ पाता यही हालत बनवारी लाल की है. गाल छू तो लिया पर महिला पत्रकार के एतराज पर वे इतना घबरा भी गए कि राज भवन पहुंचते ही जूते मोजे उतारने से पहले मेल के जरिये सफाई देकर उसे मेनेज करते नजर आए.

सौ प्रतिशत भावुकता आत्मीयता और सज्जनता दिखाते उन्होंने पीड़ित महिला पत्रकार से माफी मांगते अपने मेल में लिखा कि, जब तुमने मुझसे सवाल पूछा था तब हम प्रेस कान्फ्रेंस खत्म कर रहे थे. चूंकि मुझे तुम्हारे द्वारा पूछा सवाल अच्छा लगा इसलिए मैंने तुम्हारा एक पत्रकार होने के नाते उत्साह बढ़ाने के उद्देश्य से तुम्हारा गाल सहलाया था. तुम मेरी पोती के समान हो, अगर तुम उस घटना से आहत हुई हो तो मैं माफी मांगता हूं.

हाल फिलहाल तो इस माफीनामे के साथ ही बात आई गई हो रही है, पर सवाल बनवारी लाल की घटना के वक्त की मंशा का है कि वह क्या थी और जो भी थी वह साबित कैसे होगी. देश भर की युवतियां लड़कों से ज्यादा कुत्सित मानसिकता वाले बूढ़ों की बेजा हरकतों से परेशान रहती हैं, जो अपनी पकी उम्र को हथियार और फिर ढाल बनाकर उनके नाजुक अंगों को सहलाया करते हैं. भोपाल के एक गर्ल्स कालेज मे पढ़ रही एक 20 साल की युवती की मानें तो सिटी बस में जब कोई बूढ़ा बगल में बैठ जाता है तो कई दफा अंजान बनते वह नाजुक अंगों को छूने और सहलाने से बाज नहीं आता. दादा नाना की उम्र के इन लंपटों की हरकतें देख उन्हें थप्पड़ मारने और लताड़ने का मन करता है पर फिर लगता है फसाद खड़ा करने से कोई फायदा नहीं. इस युवती के मुताबिक अगर इन बूढ़ों को झिड़क दो तो वे फिर लाइन पर आते बेटी बेटी करने लगते हैं.

अच्छा तो यह हुआ कि ज्यादा प्रोत्साहन बनवारी लाल ने नहीं दिया. रहा सवाल पत्रकार के पोती समान होने का तो यह बात उन्हें बवाल मचने के बाद क्यों सूझी और क्या अब मानसिक यंत्रणा भुगत रही पीड़ित पत्रकार को वे कानूनन यह हक देने की दिलेरी या हिम्मत दिखा पाएंगे.

महिला पत्रकार का एतराज जायज था कि बिना पूछे उसके गाल सहलाये जाना अपमान और ज्यादती वाली बात थी,  जो हो ही  गए हैं तो उसकी भरपाई माफी मांग कर करना थूक कर चाटने जैसी बात नहीं तो और क्या है. औरतें कहीं सुरक्षित नहीं हैं पर जब शालीन और मर्यादित पदों पर बैठे लोग ही सार्वजनिक रूप से गलत तरीके से प्रोत्साहन देने के नाम पर बेजा हरकतें वो भी महिला पत्रकारों से करने लगें तो बात देश भर का माहौल देखते चिंता की तो है.

अब महिला पत्रकारों को चाहिए कि वे प्रेस कांफ्रेंसों में हेलमेट या बुर्का पहनकर जाएं जिससे उनके गाल सलामत रहें और अच्छे सवाल तो भूलकर भी न पूछें.

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नानू की जानू : समय व पैसे की बर्बादी के साथ सिर दर्द है ये फिल्म

2014 में प्रदर्शित तमिल फिल्म ‘‘पिसासु’’ के हिंदी रीमेक वाली फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ इस कदर घटिया है कि इसे देखना पैसा व समय बर्बाद करने के साथ ही सिरदर्द है. इस फिल्म से दूर रहने में ही हर तरह की भलाई है. फिल्म में एक दृश्य है, जहां नानू की मां (हिमानी शिवपुरी) एक फिल्म देख रही हैं. जब नानू पूछता है कि फिल्म कैसी है, तो नानू की मां कहती है-‘‘बहुत बकवास’’. तो लेखक ने अपनी फिल्म की सच्चाई खुद ही इस दृश्य में व्यक्त कर दी है.

फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ की कहानी एक भूत की प्रेम कहानी है. आनंद उर्फ नानू (अभय देओल) दिल्ली शहर का गुंडा है. वह लोगों से उनका मकान किराए पर लेता है और फिर उसे हड़प लेता है. इसमें उसका दोस्त डब्बू (मनु रिषि) मदद करता है. एक दिन जब नानू अपनी कार से घर की तरफ वापस लौट रहा होता है, तभी उसकी मां का फोन आ जाता है, मां से मोबाइल फोन पर बात करते हुए वह गाड़ी को किनारे लगाने की कोशिश करता है, तो उसकी कार से स्कूटी की टक्कर हो जाती है और स्कूटी पर सवार लड़की सिद्धि उर्फ जानू (पत्रलेखा) की मौत हो जाती है. पर नानू को इस बात का अहसास ही नहीं है. मगर सिद्धि यानी कि जानू का भूत उसके पल्ले पड़ जाता है.

भूतनी जानू अब नानू के घर में ही रहने लगती है. और नानू के साथ कई बड़ी अजीब सी चीजें होने लगती है. नानू इनसे निजात पाने का असफल प्रयास करता है. नानू अपने दोस्त डब्बू के साथ पता लगाना शुरू करता है कि किस लड़की की मौत हुई है, जो कि भूतनी बनकर उसके साथ रह रही है. तो पता चलता है कि उस रात सड़क पर सिद्धि की मौत हुई थी. नानू, सिद्धि के पिता से मिलते हैं. सिद्धि के पिता ने सिद्धि का अंतिम संस्कार नहीं किया है. बल्कि उसके मृत शरीर को अपनी फैक्टरी में बर्फ के बीच सुरक्षित रखा है. क्योंकि वह मानते हैं कि वह जिंदा है.

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अब नानू व उसका दोस्त यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि सिद्धि की हत्या किसने की. कहानी कई मूर्खतापूर्ण हास्य दृश्यों के साथ आगे बढ़ती है और फिर पता चलता है कि सिद्धि की स्कूटी की टक्कर नानू की ही कार से हुई थी. इस बीच सिद्धि के पिता नानू को बता चुके हैं कि वह तो उनकी बेटी का प्रेमी है. क्योंकि सिद्धि हमेशा कहा करती थी कि वह जिससे प्रेम करेगी, उसके घर रहने खुद ही चली जाएगी. अब नानू सिद्धि के पिता के साथ फैक्टरी पहुंचता है. तो अचानक बर्फ के टुकड़े हो जाते हैं और सिद्धि उर्फ जानू उठकर खड़ी हो जाती है. वह कहती है कि उसका समय नहीं आया था. यमराज के बंदे उसे गलती से उठा ले गए थे. इसलिए उन्होंने उसे वापस भेज दिया है और अब वह अपने प्रेमी नानू के घर में ही रहेगी. फिर अचानक एक घटना घटती है तो पता चलता है कि वह तो भूतनी ही है.

फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ को देखते चंद मिनटों में ही दर्शक को अहसास होने लगता है कि हम बुरी तरह से ठगे गए हैं. बेसिर पैर की कहानी, ऊटपटांग पटकथा वाली यह फिल्म बेवजह के हंसी के दृश्यों से भरी गयी है. फिल्म में न हौरर है, न कौमेडी है और न ही कोई अन्य भावनाएं. फिल्म में कहीं कोई लौजिक नहीं है. मनोरंजन भी नहीं है.

दर्शक अपना सिर पीटते हुए कहता है-‘‘कहां फंसायो नाथ..’’ फिल्म के निर्देशक फराज हैदर ने तो शायद कसम खा रखी थी कि वह बद से बदतर फिल्म बनाकर दिखाएंगे. फिल्म के निर्देशक फराज हैदर तो बेहतरीन प्रतिभाओं का उपयोग ही नहीं कर पाए. फिल्म का गीत संगीत भी आकर्षित नहीं करता.

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जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अभय देओल बुरी तरह से निराश करते हैं. ‘सोचा ना था’, ‘देव डी’, ‘ओए लक्की लक्की ओए’, ‘शंघाई ’, ‘हैप्पी भाग जाएगी’ जैसी फिल्मों के अभिनेता अभय देओल पूरी तरह से चुक गए हैं. दो साल बाद वह अति घटिया व बेसिर पैर की कहानी, अति घटिया पटकथा वाली फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ में अति घटिया अभिनय करते हुए नजर आए हैं. कई दृश्यों में वह अपने चचेरे भाई सनी देओल की नकल करते हुए नजर आते हैं.

पूरी फिल्म में पत्रलेखा महज पांच से छह मिनट के लिए नजर आती हैं. इंटरवल से पहले दो मिनट और इंटरवल के बाद चार मिनट के लिए. पत्रलेखा के सामने एक अति  घटिया फिल्म में छोटा सा किरदार निभाने की क्या मजबूरी थी, यह तो वही जानें. पर वह इस छोटे से किरदार में भी अपनी कोई छाप नहीं छोड़ती. ‘सिटी लाइट’ में अपने अभिनय से बौलीवुड में छा जाने वाली पत्रलेखा फिल्मों चयन में गलतियां कर अपने करियर पर खुद ही कुल्हाड़ी मार रही हैं.

दो घंटे की अवधि वाली एक्शन हौरर व कौमेडी फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ के निर्माता साजिद कुरेशी, निर्देशक फराज हैदर, लेखक मनु रिषि चड्ढा,कैमरामैन  एस आर सतीष कुमार, संगीतकार मीत ब्रदर्स, साजिद वाजिद, जीत गांगुली तथा कलाकार हैं-अभय देओल, पत्रलेखा, राजेष शर्मा,मनु रिषि, ब्रजेंद्र काला, मनोज पाहवा, हिमानी शिवपुरी व अन्य.

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वादियों का प्यार : भाग 3

मैं यह सब सुन कर जड़ सी हो गई. यद्यपि मैं साकेत को जेल भिजवाना नहीं चाहती थी पर पापा मुकदमा करने पर उतारू थे.

मेरी समझ को तो जैसे लकवा मार गया था और पापा ने कुछ दिनों बाद ही साकेत पर इस जुर्म के लिए मुकदमा ठोंक दिया. मैं भी पापा के हर इशारे पर काम करती रही और साकेत को दूसरा विवाह करने के अपराध में 3 वर्षों की सजा हो गई.मेरे सासससुर ने साकेत को बचाने के लिए बहुत हाथपैर मारे, पर सब बेकार.

इस फैसले के बाद मैं गुमसुम सी रहने लगी. कोर्ट में आए हुए साकेत की उखड़ीउखड़ी शक्ल याद आती तो मन भर आता, न जाने किन निगाहों से एकदो बार उस ने मुझे देखा कि घर आने पर मैं बेचैन सी रही. न ठीक से खाना खाया गया और न नींद आई.

साकेत के साथ बिताया, हुआ हर पल मुझे याद आता. क्या सोचा था और क्या हो गया. इन सब उलझनों से मुक्ति पाने के लिए मैं ने स्थानीय माध्यमिक विद्यालय में अध्यापिका की नौकरी कर ली.

दिन गुजरते गए और अब स्कूल की तरफ से ही शिमला आ कर मुझे पिछली यादें पागल बनाए दे रही थीं.

बाहर लड़कियों के खिलखिलाने के स्वर गूंज रहे थे. मैं अचानक वर्तमान में लौट आई. निर्मला जब मेरे करीब आई तो वह हंसहंस कर ऊंचीनीची पहाडि़यों से हो कर आने की और लड़कियों की बातें सुनाती रही और मैं निस्पंद सी ही पड़ी रही.

दूसरे दिन से एनसीसी का काम जोरों से शुरू हो गया. लड़कियां सुबह होते ही चहलपहल शुरू कर देतीं और रात तक चुप न बैठतीं.

एक दिन लड़कियों की जिद पर उन्हें बस में मशोबरा, फागू, कुफरी और नालडेरा वगैरह घुमाने ले जाया गया. हर जगह मैं साकेत की ही याद करती रही, उस के साथ जिया हरपल मुझे पागल बनाए दे रहा था.

हमारे कैंप के दिन पूरे हो गए थे. आखिरी दिन हम लोग लड़कियों को ले कर माल रोड और रिज की सैर को गए.

मैं पुरानी यादों में खोई हुई हर चीज को घूर रही थी कि सामने भीड़ में एक जानापहचाना सा चेहरा दिखा. बिखरे बाल, सूजी आंखें, बढ़ी हुई दाढ़ी पर इस सब के बावजूद वह चेहरा मैं कभी भूल सकती थी भला? मैं जड़ सी हो गई. हां, वह साकेत ही थे. खोए, टूटे और उदास से.

मुझे देख कर देखते ही रहे, फिर बोले, ‘‘क्या मैं ख्वाब देख रहा हूं? तुम और यहां? मैं तो यहां तुम्हारे साथ बिताए हुए क्षणों की याद ताजा करने के लिए आया था पर तुम? खैर, छोड़ो. क्या मेरी बात सुनने के लिए दो घड़ी रुकोगी?’’

मेरी आंखें बरस पड़ने को हो रही थीं. निर्मला से सब लड़कियों का ध्यान रखने को कह कर मैं भीड़ से हट कर किनारे पर आ गई. मुझे लगा साकेत आज बहुतकुछ कहना चाह रहे हैं.

सड़क पार कर साकेत सीढि़यां उतर कर नीचे प्लाजा होटल में जा बैठे, मैं भी चुपचाप उन के पीछे चलती रही.

साकेत बैठते ही बोले, ‘‘सुनीता, तुम मुझ से बगैर कुछ कहेसुने चली गईं. वैसे मुझे तुम को पहले ही सबकुछ बता देना चाहिए था. उस गलती की मैं बहुत बड़ी सजा भुगत चुका हूं. अब यदि मेरे साथ न भी रहना चाहो तो मेरी एक बात जरूर सुन लो कि मेरी शादी मधु से हुई जरूर थी पर पहले दिन ही मधु ने मेरे पैर पकड़ कर कहा था, ‘आप मेरा जीवन बचा सकते हैं. मैं किसी और से प्यार करती हूं और उस के बच्चे की मां बनने वाली हूं. यह बात मैं अपने पिताजी को समझासमझा कर हार गई पर वे नहीं माने. उन्होंने इस शादी तक मुझे एक कमरे में बंद रखा और जबरदस्ती आप के साथ ब्याह दिया.

‘‘‘मैं आप की कुसूरवार हूं. मेरी वजह से आप का जीवन नष्ट हो गया है पर मैं आप के पैर पड़ती हूं कि मेरे कारण अपनी जिंदगी खराब मत कीजिए. आप तलाक के लिए कागजात ले आइए, मैं साइन कर दूंगी और खुद कोर्ट में जा कर सारी बात साफ कर दूंगी. आप और मैं जल्दी ही मुक्त हो जाएंगे.’

‘‘यह कह कर मधु मेरे पैरों में गिर पड़ी. मेरी जिंदगी के साथ भी खिलवाड़ हुआ था पर उस को जबरदस्ती अपने गले मढ़ कर मैं और बड़ी गलती नहीं करना चाहता था, इसलिए मैं ने जल्दी ही तलाक के लिए अरजी दे दी. मुझे तलाक मिल भी जाता, पर तभी तुम जीवन में आ गईं.’’

‘‘मैं स्वयं चाह कर भी अपनी तरफ से तुम्हें मैसेज नहीं लिख रहा था पर जब तुम्हारा मैसेज आया तो मैं समझ गया कि आग दोनों तरफ लगी है और मैं अनचाहे ही तुम्हें भावभरे मैसेज भेजता गया.

‘‘फिर तुम्हारे पापा ने जब सगाई करनी चाही तो मैं अपनी बात कहने के लिए इसलिए मुंह नहीं खोल पाया कि कहीं इस बात से बनीबनाई बात बिगड़ न जाए और मैं तुम्हें खो न बैठूं.

‘‘बस, वहीं मुझ से गलती हुई. तुम्हें पा जाने की प्रबल अभिलाषा ने मुझ से यह जुर्म करवाया. शिमला की रंगीनियां कहीं फीकी न पड़ जाएं, इसलिए यहां भी मैं ने तुम्हें कुछ नहीं बताया. उस के बाद मुझे लगा कि यह बात छिपाई जा सकती है और तलाक मिलने पर तुम्हें बता दूंगा पर वह नौबत ही नहीं आई. तुम अचानक कहीं चली गईं और मिलने से भी मना कर गईं.

‘‘जेल की जिंदगी में मैं ने जोजो कष्ट सहे, वे यह सोच कर दोगुने हो जाते थे कि अब तुम्हारा विश्वास कभी प्राप्त न कर सकूंगा और इस विचार के आते ही मैं पागल सा हो जाता था.

‘‘पिछले महीने ही मैं सजा काट कर आया हूं पर घर में मन ही नहीं लगा. तुम्हारे साथ बिताए हर पल दोबारा याद करने के लालच में ही मैं यहां आ गया.’’

और साकेत उमड़ आए आंसुओं को अपनी बांह से पोंछने लगे, फिर झुक कर बोले, ‘‘हाजिर हूं, जो सजा दो, भुगतने को तैयार हूं. पर एक बार, बस, इतना कह दो कि तुम ने मुझे माफ कर दिया.’’

मैं बौराई हुई सी साकेत की बातें सुन रही थी. अब तक सिर्फ श्रोता ही बनी रही. भर आए गले को पानी के गिलास से साफ कर के बोली, ‘‘क्या समझते हो, मैं इस बीच बहुत सुखी रही हूं? मुझे भी तुम्हारी हर याद ने बहुत रुलाया है. बस, दुख था तो यही कि तुम ने मुझ से इतनी बड़ी बात छिपाई.

‘‘यदि एक बार, सिर्फ एक बार मुझे अपने बारे में खुल कर बता देते तो यहां तक नौबत ही न आती. पतिपत्नी में जब विश्वास नाम की चीज मर जाती है तब उस की जगह नफरत ले लेती है. इसी वजह से मैं ने तुम्हें मिलने को भी मना कर दिया था पर तुम्हारे बिना रह भी नहीं पाती थी.

‘‘जब तुम्हें सजा हुई तब मेरे दिल पर क्या बीती, तुम्हें क्या बताऊं. 3-4 दिनों तक न खाना खाया और न सोई, पर खैर उठो…जो हुआ, सो हुआ, विश्वास के गिर जाने से जो खाई बन गई थी वह आज इन वादियों में फिर पट गई है. इन वादियों के प्यार को हलका न होने दो.’’

और हम दोनों एकएक कप कौफी पी कर हाथ में हाथ डाले होटल से बाहर आ गए माल रोड की चहलपहल में खो जाने के लिए, एकदूसरे की जिंदगी में समा जाने के लिए.

बियौंड द क्लाउड्स : इंसानी स्वभाव, संवेदनाओं व भावनाओं का सजीव चित्रण

फिल्म की कहानी के केंद्र में तारा (मालविका मोहनन) और उसका छोटा भाई आमिर (ईशान खट्टर) है. फिल्म की कहानी शुरू होती है आमिर के अपने दोस्त अनिल के साथ ड्रग्स के पैकेट इधर से उधर पहुंचाने से. 2-3 बार ड्रग्स के पैकेट पहुंचाने के बाद आमिर एक बडे़ वेश्या गृह के मालिक और ड्रग्स के असली कारोबारी अशोक के पास पैसे लेने जाता है. अशोक 2-3 दिन में पैसे देने का वादा करता है. आमिर कह देता है कि पैसे नहीं मिलेंगें, तो काम नहीं होगा. इस बात से अशोक गुस्सा हो जाता है और वह अपने आदमी सनी के माध्यम से पुलिस के पास आमिर व उसके दोस्तों के ड्रग्स व्यापार की खबर पहुंचवा देता है.

पुलिस आमिर के अड्डे पर छापा मारती है. आमिर के कुछ साथी पकड़े जाते हैं. आमिर और अनिल भागने में सफल होते हैं. आमिर भाग कर धोबीघाट पहुंच कर कपड़ों में प्रेस कर रही अपनी बहन तारा के पास ड्रग्स का पैकेट छिपा देता है. पुलिस अभी भी उसके पीछे है. वह भाग रहा है. धोबी घाट पर एक इंसान अक्सी (गौतम घोष) उसे कपड़ों के ढेर में छिपा देता है. पुलिस खाली हाथ लौट जाती है.

दूसरे दिन तारा, आमिर को लेकर अपने घर जाती है. वह बताती है कि उसने यह घर एक इंसान से कर्ज लेकर खरीदा है. दोनों भाई बहन के बीच बहस होती है और तब दोनों की कहानी उजागर होती है. जब आमिर 13 साल का था, तब एक कार एक्सीडेंट में उसके माता पिता की मौत हो गयी थी. आमिर अपनी बहन के साथ रहता था. आमिर की नाराजगी है कि जब तारा का पति उसकी पिटाई करता था, तब बहन होते हुए भी उसको बचाती नहीं थी. इस पर तारा तर्क देती है कि उसका शराबी पति उसकी पिटाई करके चमड़ी उधेड़ देता था, ऐसे में वह उसे कैसे बचाती. बहरहाल, भाई बहन के आंसू बहते हैं. सारे गिले शिकवे मिट जाते हैं.

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दूसरे दिन सुबह तारा धोबीघाट के लिए रवाना होती है. तो पता चलता है कि तारा के दो तीन पुरुषों से अवैध संबंध हैं. यह बात अक्सी को पसंद नहीं. अक्सी, तारा से कहता है कि वह सिर्फ उसकी है. और वह तारा के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश करता है. तारा खुद को बचाने के लिए पत्थर से अक्सी का सिर फोड़ देती है. पुलिस आती है, अक्सी को अस्पताल पहुंचाती है. पुलिस तारा को अपने साथ ले जाती है, पुलिस तारा को अदालत में पेश करती है. अदालत तारा को जेल भेज देती है.

जेल में जेलर (जवाद असकरी), तारा को बताता है कि जब तक अक्सी का बयान नहीं आ जाता, उसे यहीं जेल में रहना पड़ेगा. तारा यह बात आमिर को बताती है. आमिर गुस्से में अस्पताल जाता है. पता चलता है कि अक्सी का औपरेशन सफल रहा. कुछ दिनों में ठीक हो जाएगा. आमिर खुद को अक्सी का दोस्त बताकर अक्सी से मिलता है. और उसे धमकाता है कि यदि उसने पुलिस को बयान नहीं दिया कि उसने तारा के साथ बलात्कार किया, इसलिए तारा ने उसके सिर पर पत्थर मारा, तो वह उसकी दोनों आंखें निकालकर उसका जीना मुश्किल कर देगा. उसके बाद आमिर हर दिन अक्सी के पास जाने लगता है. यहां तक कि अक्सी के लिए दवाईयां अपने पैसे से खरीद कर देता है.

इधर जेल में हर दूसरे तीसरे दिन आमिर अपनी बहन तारा से मिलने जाता है. तारा का एक ही रोना है कि उसे जेल में नहीं रहना है. मगर वह नहीं चाहती कि आमिर ड्रग्स सहित किसी गलत धंधे से जुड़े. जेल में ही तारा की दोस्ती 3 साल के बच्चे छोटू से हो जाती है, जिसकी मां गंभीर रूप से बीमार है. एक दिन छोटू की मां की मौत हो जाती है. अब तारा को लगता है कि उसकी भी मौत जेल में ही होगी. धीरे धीरे तारा छोटू में अपनी खुशियां तलाशने लगती है.

इसी बीच दक्षिण भारत से अक्सी की मां (शारदा जुम्पा), पत्नी(हीबा शाह) व चार साल की बेटी आ जाती है, जिन्हें हिंदी नहीं आती. अक्सी की पत्नी को टूटी फूटी अंग्रेजी आती है. हालात ऐसे बनते हैं कि आमिर, अक्सी के परिवार को अपने घर में रहने की इजाजत दे देता है. फिर अक्सी की पत्नी की तस्वीर मोबाइल से खींच कर अशोक को दिखाकर पैसे ऐंठता है. वह अशोक के  हाथों  अक्सी की पत्नी को बेचकर जमानत पर बहन तारा को छुड़ाना चाहता है. पर ऐन वक्त पर उसका जमीर उसे इसकी इजाजत नहीं देता. इससे अशोक उस पर चिढ़ जाता है और गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी देता है.

कई घटनाक्रम बड़ी तेजी से बदलते हैं. एक दिन तारा के आंसू देखकर गुस्से व परेशानी के साथ आमिर घर पहुंचता है. वहां अक्सी की बेटी का नाच उसका गुस्सा ऐसा बढ़ाता है कि वह गुस्से में अक्सी का सच और अक्सी की वजह से बहन तारा के जेल में होने की बात बता देता है. यह सुनकर अक्सी का परिवार आमिर के घर से रात में ही चला जाता है. सुबह आमिर उठता है तो घर की हालत देखकर उसे अहसास होता है कि उसने गुस्से में काफी कुछ गलत कर डाला. वह अस्पताल की तरफ भागता है.

इधर सुबह अक्सी की मां अदालत परिसर में अक्सी की तरफ से बयान टाइप करवाती है कि कैसे तारा निर्दोष है. मगर जब वह अस्पताल पहुंचती है, तो पता चलता है कि अक्सी की मौत हो गयी है. कुछ देर में आमिर भी पहुंच जाता है. अब तारा छोटू के साथ जेल में खुशियां तलाश रही हैं. तो वहीं आमिर, अक्सी के परिवार को अपने घर ले आता है.

लेखक निर्देशक माजिद मजीदी ने बड़ी खूबसूरती से सपनों के शहर मुंबई में भाई बहन की एक प्यारी कहानी सुनायी है, जिसमें विश्वास और परिस्थितियों के चलते जीवन के उतार चढ़ाव हैं. माजिद मजीदी ने इंसानी स्वभाव, इंसानी संवेदनाओं और भावनाओं को बहुत बारीकी से व बेहतरीन तरीके से सेल्यूलाइड के परदे पर उकेरा है. फिल्म में एक सीन है, जहां आमिर का दोस्त अनिल पिता की बीमारी और पैसे के लालचमें अशोक के हाथों बिक जाता है. वह आमिर को लेकर एक ऐसी सुनसान जगह पर पहुंचता हैं, जहां पानी और मिट्टी का कीचड़ है.

वहां अशोक के दो गुंडे अनिल को पैसा देते हैं. अनिल मुंह घुमाकर पैसे गिनना शुरू करता है. इधर अशोक के गुंडे कीचड़ में आमिर की पिटाई करने लगते हैं और वह उसे मार देना चाहते हैं. कुछ देर बाद अनिल का जमीर जागता है. वह उन दोनों गुंडों से कहता है कि अब आमिर को मत मारो. गुंडे कहां सुनने वाले. तब अनिल खुद उन गुंड़ों से लड़ने उसी कीचड़ में पहुंचता है. अनिल मारा जाता है और गुंडे आमिर को मरा हुआ समझ छोड़ देते हैं. यानी कि माजिद मजीदी ने इस दृश्य के माध्यम से मानव स्वभाव का बेहतरीन चित्रण किया है. उन्होंने यह कहने की कोशिश की है कि इंसान सिर्फ अच्छा या बुरा नहीं होता है. परिस्थितिवश वह गलत कदम उठा लेता है.

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इतना ही नहीं माजिद मजीदी ने झोपड़पट्टी व गंदगी वाले इलाके में भी आर्थिक व सामाजिक रूप से रचे बसे दो अलग अलग वर्ग का भी चित्रण किया. माजिद मजीदी की जितनी तारीफ की जाए, उतना कम है.

सिर्फ फारसी भाषा के जानकार फिल्मकार माजिद मजीदी ने हिंदी में ‘बियौंड द क्लाउड्स’ जैसी फिल्म बनाकर भारतीय फिल्मकारों को चुनौती के साथ बहुत बड़ा सबक दिया है कि अपनी भारतीय सभ्यता संस्कृति व जीवन मूल्यों से दूर न भागे. मगर होली से चंद घंटे पहले तूफानी बारिश और छोटू की मां की मौत पर तारा का उलझन भरा अभिनय कुछ खटकता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो सही मायने में बौलीवुड को ईशान खट्टर और मालविका मोहनन के माध्यम से दो बेहतरीन कलाकार मिले हैं. ईशान ने साबित कर दिया है कि बिना संवाद के किसी भी दृश्य को वह अपने अभिनय व चेहरे के भाव से जीवंत बना सकते हैं. बहन को जेल से ना छुड़ा पाने की बेबसी हो, गलत घंधे में फंसे होने का गम हो, दुःख हो, इन सारे भावों को ईशन खट्टर ने आंसुओं और अपने चेहरे के भाव से जिस तरह से परदे पर उकेरा है, वह उन्हें कमाल का कलाकार बनाती है. पूरी फिल्म में एक भी दृश्य ऐसा नहीं है, जहां इस बात का अहसास हो कि ईशान खट्टर की यह पहली फिल्म है.

‘तारा’ के किरदार में मालविका मोहनन ने भी जानदार अभिनय किया है. तारा के किरदार के लिए कंगना रानौट व दीपिका पादुकोण सहित कई दिग्गज कलाकारों ने औडीशन दिये थे. पर माजिद मजीदी ने अंततः मालविका मोहनन को चुना था. मालविका मोहनन ने अपने जानदार व सशक्त अभिनय से साबित कर दिया कि माजिद मजीदी की पारखी नजर ने गलत चयन नहीं किया था.

तनिष्ठा चटर्जी, गौतम घोष व छोटे बच्चे ने भी बेहतरीन अभिनय किया है. फिल्म का संगीत पक्ष सबसे अधिक कमजोर है. फिल्म की कमजोर कड़ी संगीतकार ए आर रहमान हैं. फिल्म के कैमरामैन अनिल मेहता ने बहुत बेहतरीन काम किया है. जिसकी वजह से लोगों को मुंबई एक नए रंग में नजर आती है.

लगभग दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘बियौंड द क्लाउड्स’ का निर्माण ‘जी स्टूडियो’ के साथ मिलकर किशोर अरोड़ा व शरीन केड़िया ने ‘नमः पिक्चर्स’ के बैनर तले किया है. फिल्म के लेखक निर्देशक माजिद मजीदी, संगीतकार  ए आर रहमान, कैमरामैन अनिल मेहता तथा कलाकार हैं – ईशान खट्टर, मालविका मोहनन, गौतम घोष, शारदा जुम्पा, हिबा शाह व अन्य.

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