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Hindi Kavita : बड़ी हो कर क्या बनेगी

Hindi Kavita : जब मैं छोटी थी
बहुत हंसती थी
खिलखिलाती थी
इठलाती थी
मां के आंचल से बंधी
मेरी वह छोटी सी दुनिया
आज की ग्लोबल दुनिया से
बिलकुल अलग थी

वहां केवल खुशियां थीं
उम्मीदें थीं
हंसीठिठोली के साथ
कुछ डांट और फटकार भी थी
ममता में सराबोर
मां के धीमे तमाचे
मुझे सही और गलत का एहसास करा देते थे
मेरी निर्बाध उद्दंडता पर लगाम लगा देते थे

जब मैं बड़ी हुई
मेरी सोचसमझ और सपने भी बड़े हुए
साथ ही,
मेरे लिए
मेरी मां की चिंताएं भी बड़ी हो गईं
मां का आंचल छूटा
और मेरे लिए
खींची गई अनगिनत रेखाएं
मेरे सामने खड़ी हो गईं
ये अनगिनत रेखाएं अदृश्य थीं
लेकिन,
थीं बहुत कठोर

जल्द ही,
इन रेखाओं के साथ
मैं ने एडजस्ट करना सीख लिया
वैसे ही जैसे
बचपन में
मां के आंचल के साथ
मैं एडजस्ट हो गई थी

इन अनगिनत रेखाओं के साथ
अनगिनत चिंताएं भी थीं
जो अब मेरी मां से ज्यादा
मुझे सता रही थीं
फिर जल्द ही
इन चिंताओं के साथ
मैं ने एडजस्ट करना सीख लिया

मैं चाहती थी
मैं भी डाक्टर बनूं
मुफ्त में सब का इलाज करूं
मैं भी ड्राइवर बनूं
देश की सैर करूं
मैं भी पायलट बनूं
दुनिया को ऊंचाइयों से देखूं
मैं भी कल्पना और सुनीता बनूं
अंतरिक्ष की सैर करूं
लेकिन, जल्द ही
मुझे पता चला कि मुझे क्या बनना है?

मेरी शादी तय कर दी गई
मैं डाक्टर नहीं दुलहन बन गई
पायलट की जगह
किसी की पत्नी बना दी गई
वक्त ने मुझे
बहुतकुछ बना दिया

किसी की भाभी बनी
किसी की बहू
किसी की देवरानी बनी
तो किसी की जेठानी
तरक्की हुई तो जल्द ही
मां भी बन गई

अब मेरी गोद में मेरी एक बेटी है
जो धीरेधीरे बड़ी हो रही है
अभी वह छोटी है
बहुत हंसती है
खिलखिलाती है
इठलाती भी है
मेरे आंचल से बंधी
मेरी बेटी की यह छोटी सी दुनिया
आज की ग्लोबल दुनिया से
बिलकुल अलग है
यहां केवल खुशियां हैं
उम्मीदें हैं
हंसीठिठोली के साथ
कुछ डांट और फटकार भी है
उस की पीठ पर पड़ने वाले
ममता में सराबोर
मेरे धीमे तमाचे
उसे सही और गलत का एहसास करा देते हैं
और उस की निर्बाध उद्दंडता पर लगाम लगा देते हैं

अब वह बड़ी हो रही है
उस की सोचसमझ, सपने भी बड़े हो रहे हैं
साथ ही,
उस के लिए
मेरी चिंताएं भी बड़ी हो रही हैं
सोचती हूं,
जब मेरा आंचल छूटेगा
और अनगिनत अदृश्य कठोर रेखाएं
उस के सामने खड़ी होंगी
तब वह
क्या बन पाएगी?

लेखक : शकील प्रेम

Online Hindi Story : दिल वालों का दर्द – मनोज का क्या था अंतिम फैसला

Online Hindi Story : उस दिन मनोज फटी आंखों से उसे एकटक देखता रह गया. उस के होंठ खुले के खुले रह गए. इस से पहले उस ने ऐसा हसीन चेहरा कभी नहीं देखा था. मनोज ने डाक्टर की डिगरी हासिल कर के न तो किसी अस्पताल में नौकरी करनी चाही और न ही प्राइवेट प्रैक्टिस की ओर ध्यान दिया, क्योंकि पढ़ाई और डाक्टरी के पेशे से उस का मन भर गया था.

किसी के कहने पर मनोज एक फैक्टरी में मुलाजिम हो गया. वहां के दूसरे लोग मिलनसार थे. औरतें और लड़कियां भी लगन से काम करती थीं. कइयों ने मनोज के साथ निकट संबंध बनाने चाहे, पर उन्हें निराशा ही मिली. वजह, मनोज शादी, प्यारमुहब्बत वगैरह से हमेशा भागता रहा और उस की उम्र बढ़ती गई. उसी फैक्टरी में एक कुंआरी अफसर मिस सैलिना विलियम भी थीं, जिन्होंने कह रखा था कि मनोज के लिए उन के घर के दरवाजे हमेशा खुले रहेंगे. शराब पीना उन की सब से बड़ी कमजोरी थी, जो मनोज को नापसंद था.

दूसरी मारिया थीं, जो मनोज को अकसर होटल ले जातीं. वहीं खानापीना होता, खूब बातें भी होतीं. वे शादीशुदा थीं या नहीं, उन का घर कहां था, न मनोज ने जानने की कोशिश की और न ही उन्होंने बताया. इसी तरह दिन गुजरतेगुजरते 15 साल का समय निकल गया. न मनोज ने शादी करने के लिए सोचा और न इश्कमुहब्बत करने के लिए आगे बढ़ा. यारदोस्तों ने उसे चेताया, ‘कब तक कुंआरा बैठा रहेगा. किसी को तो बुढ़ापे का सहारा बना ले, वरना दुनिया में आ कर ऐसी जिंदगी से क्या मिलेगा…’

दोस्तों की बातों का मनोज पर गहरा असर पड़ा. उस ने आननफानन एक दैनिक अखबार व विदेशी पत्रिका में अपनी शादी का इश्तिहार निकलवा दिया. यह भी लिखवा दिया कि फोन पर रात 10 बजे के बाद ही बात करें या अपना पूरा पता लिख कर ब्योरा भेजें. 4 दिन के बाद रात के 10 बजे से

2 बजे तक लगातार फोन आने शुरू हुए, तो फोन की घंटी ने मनोज का सोना मुश्किल कर दिया. पहला फोन इंगलैंड के बर्मिंघम शहर से एक औरत का आया, ‘मैं हिंदुस्तानी हो कर भी विदेशी बन गई हूं. मेरा हाथ पकड़ोगे, तो सारी दौलत तुम्हारी होगी. तुम्हें खाना खिला कर खुश रखूंगी. मैं होटल चलाती हूं.

‘मैं विदेश में ब्याही गई केवल नाम के लिए. चंद सालों में मेरा मर्द चल बसा और सारी दौलत छोड़ गया. सदमा पहुंचा, फिर शादी नहीं की. अब मन हुआ, तो तुम्हारा इश्तिहार पसंद आया.’ ‘‘मैं विचार करूंगा,’’ मनोज ने कहा.

दूसरा फोन मनोज की फैक्टरी की अफसर मिस सैलिना विलियम का था, ‘अजी, मैं तो कब से रट लगाए हुए हूं, तुम ने हां नहीं की और अब अखबार में शादी का इश्तिहार दे डाला. मेरी 42 की उम्र कोई ज्यादा तो नहीं. मेरे साथ इतनी बेरुखी मत दिखाओ. तुम अपनी मस्त नजरों से एक बार देख लोगे, तो मैं शराब पीना छोड़ दूंगी.’ ‘‘ऐसा करना तुम्हारे लिए नामुमकिन है.’’

‘मुझ से स्टांप पेपर पर लिखा लो.’ ‘‘सोचने के लिए कुछ समय तो दो,’’ मनोज ने कहा.

4 दिन बाद निलंजना का फोन आया, ‘मेरी उम्र 40 साल है. मेरी लंबाई 5 फुट, 7 इंच है. मैं ने कंप्यूटर का डिप्लोमा कोर्स किया है.’ ‘‘आप ने इतने साल तक शादी क्यों नहीं की?’’

‘मुझे पढ़ाई के आगे कुछ नहीं सूझा. जब फुरसत मिली, तो लड़के पसंद नहीं आए. अब आप से मन लग जाएगा…’ ‘‘ठीक है. मैं आप से बाद में बात करूंगा.’’

आगरा से यामिनी ने फोन किया, ‘मैं आटोरिकशा चलाती हूं. मैं हर तरह के आदमी से वाकिफ हो चुकी हूं, इसीलिए सोचा कि अब शादी कर लूं. आप का इश्तिहार पसंद आया.’ ‘‘कभी मिलने का मौका मिला, तो सोचूंगा.’’

‘मेरा पता नोट कर लीजिए.’ ‘‘ठीक है.’’

मुमताज का फोन रात 3 बजे आया. वह कुछकुछ कहती रही. मनोज नींद में था, सो टाल गया. बाद में उस की एक लंबी चिट्ठी मिली. उस ने गुस्से में लिखा था, ‘मेरी फरियाद नहीं सुनी गई. कब तक ऐसा करोगे? मैं तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ूंगी. मैं ख्वाबों में आ कर तुम्हें जगा दूंगी. इस तरह सजा दूंगी. ‘मैं पढ़ीलिखी हूं. यह तो तुम पर मेरा मन आ गया, इसलिए शादी को तैयार हो गई, वरना कितने लड़के मुझे पाने के लिए मेरे घर के चक्कर लगाते रहे. मैं ने किसी को लिफ्ट नहीं दी. मेरी फोटो चिट्ठी के साथ है. उम्र में तुम से थोड़ी कम हूं, दिल की हसरतें पूरी करने में एकदम ऐक्सपर्ट हूं.’

नूरजहां ने तो हद पार कर दी, जब सिसकती हुई रात के 1 बजे बहुत सारी बातें करने के बाद वह बोली, ‘अब तो यह हालत है कि कोई मेरे दरवाजे पर दस्तक देने नहीं आता. कभी लोगों की लाइन लगी रहती थी. अब तो कभी खटका हुआ, तो पता चलता है कि हवा का झोंका था. ‘जिंदगी का एक वह दौर था कि लोग हर सूरत में ब्याहने चले आते. जितनी मांग की जाए, उन के लिए कम थी और एक आज मायूसी का दिन है. खामोशी का ऐसा दौर चल पड़ा, जो सन्नाटा बन कर खाए जाता है. हर समय की कीमत होती है.’

‘‘क्या आप तवायफ हैं?’’ ‘अजी, यों कहिए मशहूर नर्तकी. मेरा मुजरा सुनने के लिए दूरदूर से लोग आते हैं और पैसे लुटा जाते हैं.’

‘‘तो आप कोठे वाली हैं?’’ ‘अब वह जमाना नहीं रहा. पुलिस वालों ने सब बंद करा दिया. तुम से मिलने कब आऊं मैं?’

‘‘थोड़ा सोचने का वक्त दो.’’ फूलमती तो घर पर ही मिलने चली आई. मैं फैक्टरी में था. वह लौट गई, फिर रात को फोन किया, ‘मैं पीसीओ बूथ से बोल रही हूं. मैं फूलमती हूं. बड़े खानदान वाले लोग नीची जाति वालों को फूटी आंखों देखना पसंद नहीं करते, जैसे हम लोग उन के द्वारा बेइज्जत होने के लिए पैदा हुए हैं.

‘सब के सामने हमें छू कर उन का धर्म खराब होता है, लेकिन जब रात को दिल की प्यास बुझाने के लिए वे हमारे जिस्म को छूते हैं, तब उन का धर्म, जाति खराब नहीं होती… एक दिन एक हताश सरदारनी का फोन आया, ‘मैं जालंधर से मोहिनी कौर बोल रही हूं. शादी के एक साल बाद मेरा तलाक हो गया. मुझे वह सरदार पसंद नहीं आया. मैं ने ही उसे तलाक दे दिया.

‘वह ऐयाश था. ट्रक चलाता था और लड़कियों का सौदा करता था. फिर मैं ने शादी नहीं की. उम्र ढलने लगी और 40 से ऊपर हो चली, तो दिल में तूफान उठने लगा. बेकरारी और बेसब्री बढ़ने लगी. तुम्हारे जैसा कुंआरा मर्द पा कर मैं निहाल हो जाऊंगी.’

‘‘तुम्हें पंजाब में ही रिश्ता ढूंढ़ना चाहिए.’’ ‘अजी, यही करना होता, तो तुम से इतने किलोमीटर दूर से क्यों बातें करती?’

‘‘थोड़ा सब्र करो, मैं खुद फोन करूंगा.’’ ‘अजी, मेरा फोन नंबर तो लो, तभी तो फोन करोगे.’

‘‘बता दो,’’ मनोज बोला. एक दिन फोन आया, ‘मैं पौप सिंगर विशाखा हूं. मेरा चेहरा ताजगी का एहसास कराता है. कभी किशोरों के दिल की धड़कन रही, अब पहले से ज्यादा खूबसूरत लगने लगी हूं, मैं ने इसलिए गायकी छोड़ दी और आरामतलब हो गई. इस की भी एक बड़ी वजह थी. मेरे गले की आवाज गायब हो गई. इलाज कराने पर भी फायदा न हुआ. तुम अगर साथी बना लोगे, तो मेरा गला ठीक हो जाएगा. मेरी उम्र 40 साल है.’

‘‘तुम्हारा मामला गंभीर है, फिर भी मैं सोचूंगा.’’ ‘कब उम्मीद करूं?’

‘‘बहुत जल्दी.’’ एक फोन वहीदा खान का आया. वह लाहौर से बोली, ‘मेरे पास काफी पैसा है, लेकिन मुझे यहां पर कोई पसंद नहीं आया. मैं चाहती हूं कि आप हमारा धर्म अपना लें और यहां आ जाएं, तो मेरा सारा कारोबार आप का हो जाएगा.

‘मैं रईस नवाब की एकलौती बेटी हूं. न मेरे अब्बा जिंदा बचे हैं और न अम्मी. मेरी उम्र 40 साल है.’ ‘‘आप के देश में आना मुमकिन नहीं होगा.’’

‘क्यों? जब आप को शादी में सबकुछ मिलने वाला हो, तो मना नहीं करना चाहिए.’ ‘‘क्योंकि मुझे अपना देश पसंद है.’’

इस के बाद मुंबई से अंजलि का फोन आया. वह बोली, ‘मैं इलैक्ट्रिकल इंजीनियर हूं और एमबीए भी कर रही हूं. मेरी उम्र 35 साल है. मैं ने अभी तक शादी नहीं की. पर अब शादी करने की दिली ख्वाहिश है. ‘इस उम्र में भी मुझे लौन टैनिस और गोल्फ खेलने का शौक है. आप अपने बारे में बताइए?’

‘‘मैं रमी का खिलाड़ी हूं और बैडमिंटन खेलने का शौक रखता हूं.’’ ‘मैं भी वही सीख लूंगी. एक दिन आप मिलिए. बहुत सी बातें होंगी. मुझे भरोसा है कि हम दोनों एकदूसरे को जरूर पसंद करेंगे. मुझे आप की उम्र पर शक है. आप 40 साल से ज्यादा के हो ही नहीं सकते.’

‘‘आप ने ऐसा अंदाजा कैसे लगा लिया?’’ ‘आप के बोलने के ढंग से.’

‘‘अगर मैं आप को सर्टिफिकेट दिखा दूं, तो यकीन करेंगी?’’ ‘नहीं.’

‘‘क्यों?’’ ‘वह भी बनवा लिया होगा. जो लोग 45 से ऊपर हो चुके हों, वे ऐसा इश्तिहार नहीं निकलवाते. या तो आप ने औरतों का दिल आजमाने के लिए इश्तिहार दिया है या फिर कोई खूबसूरत औरत आप के दिमाग में बसी होगी, जिसे अपनी ओर खींचने के लिए ऐसा किया.’

मनोज ठहाका मार कर हंस पड़ा. वह भी फोन पर जोर से हंस पड़ी और बोली, ‘लगता है, मैं ने आप की चोरी पकड़ ली है.’ मनोज ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘आप की उम्र कुछ भी हो, मुझे फर्क नहीं पड़ता. क्या आप मुझ से हैंगिंग गार्डन में आ कर मिलना चाहेंगे?’ ‘‘वहां आने के लिए मुझे एक महीने पहले ट्रेन या हवाईजहाज से रिजर्वेशन कराना पड़ेगा.’’

‘तारीख बता दीजिए, मैं यहीं से आप का टिकट करा कर पोस्ट कर दूंगी. मेरे जानने वाले रेलवे और एयरपोर्ट में हैं.’ ‘‘आप जिद करती हैं, तो अगले हफ्ते की किसी भी तारीख पर बुला लें. मुझे देखते ही आप को निराश होना पड़ेगा,’’ कह कर मनोज फिर हंस पड़ा.

‘मैं बाद में फोन करूंगी.’ ‘‘गुडबाय.’’

‘बाय.’ मनोज की फैक्टरी की मुलाजिम मारिया बहुत खूबसूरत थी, जो अकसर मनोज को अपने साथ होटल ले जाती थी. उसे खिलातीपिलाती और चहकते हुए हंसतीमसखरी करती. उस ने कभी अपने बारे में नहीं बताया कि वह कहां रहती है. शादीशुदा है या कुंआरी या फिर तलाकशुदा.

मनोज ने ज्यादा जानने में दिलचस्पी नहीं ली. उस की उम्र ज्यादा नहीं थी. मनोज के इश्तिहार पर उस की नजर नहीं पड़ी, लेकिन उसे किसी ने शादी करने की इच्छा बता दी. बहुत दिनों बाद मारिया मनोज को होटल में ले गई और बोली, ‘‘क्या तुम शादी करना चाहते हो?’’

‘‘क्यों? अभी तो सोचा नहीं.’’ ‘‘झूठ बोलते हो. तुम ने अखबार में इश्तिहार दिया है.’’

मनोज की चोरी पकड़ी जा चुकी थी. उस ने कहा, ‘‘मेरी उम्र बढ़ने लगी थी. एकाएक मन में आया कि शायद कोई पसंद कर ले. अखबार में यों ही इश्तिहार दे दिया. तमाम दिलवालियों से फोन पर बात हुई और चिट्ठियां भी आईं.’’ ‘‘तो किसे पसंद किया?’’

‘‘किसी को नहीं.’’ ‘‘क्यों?’’

‘‘तुम्हें बताने लगूंगा, तो समय कम पड़ जाएगा. इसे अभी राज रहने दो.’’ ‘‘नहीं बताओगे, तो मैं तुम्हारे साथ उठनाबैठना बंद कर दूंगी. तुम मुझे अपना जीवनसाथी बना लो, दोनों को शांति मिलेगी.’’

‘‘तुम ठीक कहती हो मारिया.’’ ‘‘मुझे भी उस लिस्ट में रख लो. मैं ने अभी तक किसी से रिश्ता नहीं जोड़ा. मैं अकेली रहती हूं.’’

‘‘मैं ने तो समझा था कि तुम शादीशुदा हो.’’ ‘‘नहीं. मेरा भी ध्यान रखना.’’

मारिया की उम्र 35 साल से कुछ ज्यादा थी. मनोज को डाक से अंजलि का लिफाफा मिला. उस के अंदर एक चिट्ठी, मिलने की जगह और लखनऊ से मुंबई तक हवाईजहाज का रिजर्वेशन टिकट था. ताज होटल के कमरा नंबर 210 में ठहरने व खानेपीने का इंतजाम भी उसी की ओर से किया गया था.

अंजलि ने अपना कोई फोटो भी नहीं भेजा, जिसे मुंबई पहुंच कर वह पहचान लेता. एयरपोर्ट से ताज होटल तक के लिए जो कार भेजी जाने वाली थी, उस का नंबर भी लिखा था. कहां खड़ी मिलेगी, वह भी जगह बताई गई थी. जब मनोज मुंबई पहुंचा, तो उसे उस जगह पहुंचा दिया गया. वह बेसब्री से अंजलि का इंतजार करने लगा, जिस ने इस तरह न्योता भेजा था.

मिलने पर अंजलि ने खुद अपना परिचय दिया. उसे देखने पर मनोज को ऐसा लगा, मानो कोई हुस्न की परी सामने खड़ी हो. वह कुछ देर तक उसे देखता रह गया. अंजलि मुसकराते हुए बोली, ‘‘मेरा अंदाजा सही निकला कि आप 30-40 से ऊपर नहीं हो सकते. आप का इश्तिहार महज एक ढकोसला था, जो औरतों को लुभाने का न्योता था.’’

मनोज को उस की बातों पर हंसी आ गई. उस ने शायद उस के झूठ को पकड़ लिया था. ‘‘क्या आप ने सचमुच अभी तक शादी नहीं की?’’

‘‘मेरी झूठ बोलने की आदत नहीं है. मैं शादी करना ही नहीं चाहता था. मुझे मस्तमौला रहना पसंद है.’’ ‘‘अब कैसे रास्ते पर आ गए?’’

‘‘यह भी एक इत्तिफाक समझिए. लोगों ने मजबूर किया, तो सोचा कि देखूं किस तरह की औरतें मुझे पसंद करेंगी, इसलिए इश्तिहार दे दिया.’’ ‘‘क्या अभी भी शादी करने का कोई इरादा नहीं है?’’

‘‘ऐसा कुछ होता, तो यहां तक दौड़ लगाने की जरूरत नहीं थी. आप अपना परिचय देना चाहेंगी?’’ ‘‘मैं ने अपने मांबाप को कभी नहीं देखा. मैं अनाथालय में पलीबढ़ी हूं. एक शख्स ने खुश हो कर मुझे गोद ले लिया. मैं अनाथालय छोड़ कर उन के साथ रहने लगी. मुझे शादी करने के लिए मजबूर नहीं किया गया. वह मेरी पसंदनापसंद पर छोड़ दिया गया.

‘‘उस शख्स के कोई औलाद न थी. उस ने शादी नहीं की, लेकिन एक बेटी पालने का शौक था, इसलिए मुझे ले आया. मैं ने भी उसे एक बेटी की तरह पूरी मदद देते हुए खुश रखा. ‘‘मैं ने शादी का जिक्र किया, तो वह खुश भी हुआ और उदास भी. खुश इसलिए कि उसे कन्यादान करने का मौका मिलेगा, दुखी इसलिए कि सालों का साथ एक ही पल में छूट जाएगा.’’

‘‘तो क्या सोचा है आप ने?’’ ‘‘मैं इतना जानती हूं कि सात फेरे लेने के बाद पतिपत्नी का हर सुखदुख समझा जाता है. लंबी जिंदगी कैदी के पैर से बंधी हुई वह बेड़ी है, जिस का वजन बदन से ज्यादा होता है. बंधनों के बोझ से शरीर की मुक्ति ज्यादा बड़ा वरदान है. मैं आप को इतना प्यार दूंगी, जो कभी नहीं मिलेगा.’’

उन दोनों में काफी देर तक इधरउधर की बातें हुईं. उस ने इजाजत मांगी और चली गई. अगले दिन वह मनोज से फिर मिली. उस के चेहरे की ताजगी सुबह घास पर गिरी ओस की तरह लग रही थी. उस की नजरों में ऐसी शोखी थी,

जो उस के पढ़ेलिखे होने की सूचना दे रही थी. अंजलि को कोई काम था. उस ने जल्दी जाने की इजाजत मांगी. मनोज उसे जाते हुए देखता रहा, जब तक कि वह आंखों से ओझल नहीं हो गई.

शाम का धुंधलका गहराने लगा था. मनोज बोझिल पलकों और भारी कदमों से उठा और लौटने के लिए एयरपोर्ट की ओर चल दिया. जिंदगी में किसी न किसी से एक बार प्यार जरूर होता है, चाहे वह

लंबा चले या पलों में सिकुड़ जाए, लेकिन पहला प्यार एक ऐसा एहसास है, जिसे कभी भूला नहीं जा सकता. उस की यादें मन को तरोताजा जरूर बना देती हैं.

Hindi Kahani : प्यार की जीत – राह में रुढ़ियों के कांटे भला कौन दूर करता

Hindi Kahani : ‘‘मैं बिलाल से बेइंतहा मोहब्बत करती हूं. चाहे कुछ भी हो जाए मैं उसी से शादी करूंगी. आप मुझे कुछ भी कर के रोक नहीं सकते. मेरे जन्म से आज तक इन 21 सालों में आप ने सिर उठा कर भी मेरी ओर नहीं देखा क्योंकि मैं एक बेटी हूं. ऐसे में आप अब क्यों मेरी जिंदगी में दखल दे रहे हैं? यह मेरी जिंदगी है. अगर इस मामले में भी मैं आप की बात सुनूंगी तो मेरी पूरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. मैं इसे बरदाश्त नहीं कर सकती हूं. गलत क्या है और सही क्या है, यह मैं जानती हूं. इस के अलावा मैं अब नाबालिग नहीं हूं. अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार है मुझे.’’ अपने समक्ष खड़ी अपनी बेटी निशा की बातें सुन कर सोमनाथ आश्चर्यचकित रह गए. सोमनाथ को यकीन ही नहीं हो रहा था कि जो उन के सामने बोल रही है वह उन की बेटी निशा है. निशा ने इस घर में आए इन 2 सालों में अपने पिता के सामने कभी इतनी हिम्मत से बात नहीं की.

निशा को अपने पिता से इस तरह बात करते हुए देख कर उस की मां लक्ष्मी भी हैरान थी. उसे भी निशा के इस नए रूप को देख कर यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह उस की बेटी निशा ही है. अगर एक सलवारकमीज खरीदनी होती तो भी वह अपने पापा से पूछने के लिए घबराती. अपनी मां के पास आ कर ‘मां, आप ही पापा से पूछिए और खरीद दीजिए न प्लीज, प्लीज मां’ बोलने वाली निशा आज अपने पापा के सामने अचानक शेरनी कैसे बन गई? अपने पापा के सामने इस तरह खड़े हो कर बेधड़क बातें कर रही निशा को देख कर लक्ष्मी सन्न रह गई. उस से भी बड़ी हैरानी की बात यह है कि निशा का यह कहना कि वह एक मुसलमान युवक से प्यार करती है और उसी से शादी भी करना चाहती है. इस प्रस्ताव को सोमनाथ के सामने रखने के लिए भी हिम्मत चाहिए, क्योंकि सोमनाथ एक कट्टर हिंदू हैं. उन के सामने उन की बेटी कह रही है कि वह एक मुसलमान युवक से शादी करना चाहती है. लक्ष्मी ने मन में सोचा कि जो भी हो, निशा की हिम्मत की दाद देनी चाहिए.

एक कड़वा सच यह है कि लक्ष्मी कभी अपने पति के सामने ऐसी बातें नहीं कर सकती थी. शादी हुए इन 30 सालों में लक्ष्मी ने पति के सामने कभी अपनी राय जाहिर नहीं की. उन के परिवार की प्रथा है कि औरतों को आजादी न दी जाए. उन का मानना है कि स्त्री का दर्जा हमेशा पुरुष से कम होता है. मगर लक्ष्मी के मायके की बात अलग थी. लक्ष्मी के पिता ने उसे एक महारानी की तरह पालपोस कर बड़ा किया. उस के पिता की 3 बेटियां थीं और वे इस से बहुत खुश थे. वे अपनी लड़कियों को घर की महालक्ष्मी मानते थे और उन्हें भरपूर स्नेह व इज्जत देते. उन्हें अपनी तीनों बेटियों पर गरूर था खासकर अपनी बड़ी बेटी लक्ष्मी पर. लक्ष्मी की बातों को वे सिरआंखों पर रखते थे. लक्ष्मी की ख्वाहिश का मान करते हुए उन्होंने उसे अंगरेजी साहित्य में बीए करने की इजाजत दी.

लक्ष्मी के पिता ने अपनी बेटी की शादी के मामले में एक गलत फैसला ले लिया. सोमनाथ के परिवार के बारे में अच्छी तरह पूछताछ किए बगैर उस परिवार की शानोशौकत को देख कर अपनी बेटी की शादी सोमनाथ से करवाई. शादी के दूसरे दिन ही लक्ष्मी को ससुराल में एक झटका सा लगा. लक्ष्मी को अंगरेजी अखबार पढ़ते देख कर उस के ससुर ने उसे फटकारा, ‘इस तरह सुबह अंगरेजी अखबार पढ़ना एक बहू को शोभा देता है क्या? तुम्हारी मां ने तुम्हें यही सिखाया है क्या? मर्दों की तरह औरतों का अखबार पढ़ना अच्छे संस्कार नहीं हैं. दुनिया के बारे में जान कर तुम क्या करोगी? तुम्हारा काम है रसोई में खाना पकाना और बच्चे पैदा कर के उन का पालनपोषण करना, समझी तुम?’ ससुरजी की बातें सुन कर लक्ष्मी को ताज्जुब हुआ. ससुराल में आए कुछ ही दिनों में लक्ष्मी को पता चल गया कि औरतों को मर्दों का गुलाम बना कर रहना ही इस घर की परंपरा है. न चाहते हुए भी लक्ष्मी ने अपनेआप को बदलने की कोशिश की.

समय आया जब लक्ष्मी अपने पहले बच्चे की मां बनने वाली थी. जब डाक्टर ने यह खबर सुनाई तो लक्ष्मी बेहद खुश हुई. उस ने खुशी से अपने पति सोमनाथ को यह समाचार सुनाया तो उन्होंने कहा, ‘‘सुनो, अगर लड़का पैदा हुआ तो उसे ले कर इस घर में आना. लड़की पैदा हुई तो उसे अपने मायके में छोड़ कर आना, समझी. खानदान को आगे बढ़ाने के लिए मुझे लड़का ही चाहिए.’’ यह सुनते ही लक्ष्मी सन्न रह गई. वह सोच भी नहीं सकती थी कि कोई आदमी अपनी पहली संतान के बारे में ऐसा भी सोच सकता है.

बहरहाल, लक्ष्मी ने एक लड़के को जन्म दिया और उस के बाद लक्ष्मी की इज्जत उस घर में बढ़ गई. इस का कारण यह था कि लक्ष्मी की दोनों जेठानियां अपनी पहली संतान लड़की होने केकारण उन्हें अपने मायकों में ही छोड़ कर आईर् थीं. लक्ष्मी के ससुर ने उसे एक कीमती गहना तोहफे में दिया. उस के 2 वर्षों बाद जब लक्ष्मी का दूसरा लड़का पैदा हुआ तब से सोमनाथ अपना सीना चौड़ा करते हुए घूमते थे.

लक्ष्मी के कई बार मना करने के बावजूद उस के दोनों बेटों संदीप और सुदीप को उस के पति और ससुर ने लाड़प्यार दे कर बिगाड़ दिया. अगर लक्ष्मी बीच में बोले तो, ‘ये दोनों लड़के हैं, शेर हैं मेरे बच्चे. उन्हें पढ़ने की कोई जरूरत नहीं. कुछ भी कर के जिंदगी में सफल हो जाएंगे,’ कह कर लक्ष्मी के दोनों बेटों को पूरी तरह बिगाड़ दिया सोमनाथ ने. लक्ष्मी बेबस हो कर देखती रह गई. इतने में लक्ष्मी तीसरी बार गर्भवती हुई. सोमनाथ तो बड़े गरूर से कहता रहा, ‘यह भी बेटा ही होगा.’ सोमनाथ की इस बेवकूफी को देख कर लक्ष्मी को समझ में ही नहीं आया कि वह रोए या हंसे.

मगर इस बार लक्ष्मी के एक खूबसूरत बेटी पैदा हुई. लक्ष्मी ने अपनी नन्ही सी परी को अपने सीने से लगा लिया. जब सोमनाथ को यह खबर मिली कि लक्ष्मी ने एक लड़की को जन्म दिया है तो वे गुस्से से पागल हो गए. बच्ची को देखने के लिए भी नहीं आए और ऊपर से उन्होंने चिट्ठी लिखी कि घर वापस आते समय बेटी को मायके में छोड़ कर आना. अगर वहां भी बच्ची को पालना नहीं चाहें तो उसे किसी अनाथ आश्रम में दाखिल करवा देना. लक्ष्मी अपनी बच्ची को अपनी छोटी बहन के हवाले कर अपने पति के घर वापस आ गई. लक्ष्मी की बहन के 2 बेटे थे, इसलिए उस ने खुशीखुशी लक्ष्मी की बेटी की परवरिश करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली. लक्ष्मी की छोटी बहन ने उस प्यारी सी बच्ची का नाम निशा रखा.

लक्ष्मी के बेटे संदीप और सुदीप दोनों अव्वल नंबर के निकम्मे, बदतमीज और बदचलन बने. 10वीं कक्षा में दोनों फेल हो गए और लफंगों की तरह इधरउधर घूमने लगे. लाख कोशिशों के बावजूद लक्ष्मी अपने बेटों को अच्छे संस्कार नहीं दे पाई. संदीप और सुदीप दोनों गैरकानूनी काम कर के 2 बार जेल भी जा चुके थे. लक्ष्मी ने अपनी बहन की चिट्ठी से यह जान लिया कि निशा पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहती है और अच्छे संस्कारों से आगे बढ़ रही है. लक्ष्मी को इतनी कठिनाइयों के बीच इसी समाचार ने खुश रखा. मगर वह खुशी बहुत दिनों तक नहीं टिकी. लक्ष्मी की छोटी बहन, जिसे कोई बीमारी नहीं थी, अचानक दिल का दौरा पड़ा और 4 दिन अस्पताल में रहने के बाद चल बसी. उस के पति ने सोचा कि एक 21 साल की लड़की को बिन मां के पालना खुद से नहीं होगा, इसलिए निशा को लक्ष्मी के पास छोड़ने का फैसला लिया. उस वक्त निशा फैशन टैक्नोलौजी का कोर्स कर रही थी और वह अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी.

पहले तो सोमनाथ ने निशा को फैशन टैक्नोलौजी की पढ़ाई करने की इजाजत देने से सख्त मना कर दिया. लेकिन लक्ष्मी ने उन से गुजारिश की, ‘कोर्स को खत्म होने में अब सिर्फ एक ही साल बाकी है, उसे बीच में रोकना नहीं. उसे पूरा करने दीजिए, मैं आप के पैर पड़ती हूं.’ बहुत सोचने के बाद आखिरकार सोमनाथ ने निशा को कालेज भेजने के लिए मंजूरी दी. निशा को यह सब बड़ा अजीब सा लगा. एक तो पहली बार वह अभी अपनी 21 साल की उम्र में अपने जन्मदाता मांबाप से मिल रही थी, दूसरी बात जिस माहौल में वह बड़ी हुई थी वहां इस तरह औरतें अपने पति के सामने झोली फैला कर नहीं खड़ी होती थीं. दोनों को वहां पर बराबर का सम्मान दिया जाता था.

लक्ष्मी ने भी अपनी बेटी के प्रति अपना प्यार नहीं जताया. उस के मन में एक ही विचार था कि पढ़ाई खत्म होते ही निशा का ब्याह एक ऐसे घर में हो जहां औरतों को इज्जत दी जाए. बेटी की शादी में पिता की उपस्थिति जरूरी है, इसलिए लक्ष्मी अपने पति से अपनी बेटी के बारे में कोई भी बहस नहीं करना चाहती थी और सोमनाथ की हर बात मानती थी.

सोमनाथ की देखादेखी उन के दोनों बेटे भी औरतों की इज्जत नहीं करते थे. दोनों मिल कर अकसर निशा को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहते. बचपन से लाड़प्यार और इज्जत से पली निशा को इस माहौल में घुटन होने लगी. उसे इस बात का बहुत अफसोस था कि उस की मां ने भी अपना प्यार जाहिर नहीं किया. इसी बीच निशा के कालेज में वार्षिक महोत्सव हुआ और तभी पहली बार उस की मुलाकात बिलाल से हुई. उस उत्सव में भाग लेने के लिए कई कालेजों से बहुत सारे छात्र आए हुए थे. निशा एक अच्छी गायिका थी और उस की आवाज में मिठास थी. जिस के कारण उस के कालेज के छात्रों और अध्यापकों ने निशा को गाने के लिए प्रोत्साहित किया ताकि उन के कालेज को पुरस्कार मिले. निशा ने उस प्रतियोगिता के लिए खूब तैयारी भी की. उस के साथ उस की सहेली गिटार बजाने वाली थी.

मगर उत्सव के दिन जो लड़की गिटार बजाने वाली थी उस के पिता बीमार हो कर अस्पताल में भरती थे और वह उत्सव में न आ सकी. निशा अब उलझन में पड़ गई. गिटार के बिना निशा का गाना अधूरा होगा और इसी कारण उसे पुरस्कार मिलने की उम्मीद नहीं थी. निशा असमंजस में पड़ गई और रोने लगी. उस की सहेलियां ढाढ़स बंधाने लगीं और उसे चुप कराने की कोशिश कर रही थीं. उसी वक्त एक नौजवान वहां आया और उस ने कहा, ‘एक्सक्यूज मी, मैं आप की बातें सुन रहा था और मैं समझ गया हूं कि आप को एक गिटार बजाने वाला चाहिए. अगर आप को कोई एतराज न हो तो क्या मैं आप की मदद कर सकता हूं?’ इसे सुन कर निशा और उस की सहेलियां ताज्जुब से एकदूसरे को देखने लगीं. एक पल के लिए वे सोच में पड़ गईं कि क्या जवाब दें.

निशा और उस की सहेलियों को उस अनजान युवक का प्रस्ताव स्वीकार करने में झिझक हुई. वह किसी और कालेज का छात्र है, फिर वह क्यों अपने कालेज को छोड़ कर हमारे कालेज के लिए गिटार बजाने को तैयार है, ऐसा क्यों? उन के मन में यह डर था कि यह ईव टीजिंग का कोई चक्कर तो नहीं. उस युवक ने हंसते हुए कहा, ‘मैं एक अच्छा गिटारिस्ट हूं. इसलिए मैं ने सोचा कि मैं आप की मदद करूं, अगर आप बुरा न मानें तो. ज्यादा मत सोचिए, हमारे पास वक्त बहुत कम है.

उस की गंभीरता देख कर निशा और उस की सहेलियां उस लड़के की मदद लेने के लिए तैयार हो गईं. उस लड़के ने तुरंत अपने दोस्त से गिटार ले कर निशा के साथ मिल कर

2 बार रिहर्सल किया. निशा ने देखा कि वह उस के साथ बड़ी तमीज के साथ बातें कर रहा था और बहुत ही मृदुभाषी था. निशा स्पर्धा को ले कर बहुत परेशान थी और इस हड़बड़ी में उस ने उस लड़के का नाम तक नहीं पूछा. जब उन की बारी आई तो दोनों मंच पर आए. निशा अपनेआप को भूल कर अपने गाने में मंत्रमुग्ध हो गई और उसे पुरस्कार भी मिला. पुरस्कार लेते समय निशा उस लड़के को भी अपने साथ मंच पर ले गई.

विदाई के समय उस लड़के ने निशा को अपना नाम बताया, ‘मेरा नाम बिलाल है. मैं अंगरेजी साहित्य में एमए कर रहा हूं. आप मेरा मोबाइल नंबर सेव कर लीजिए. अगर आप को कोई परेशानी न हो तो हम फोन पर बात कर सकते हैं और दोस्ती को आगे कायम रख सकते हैं.’ निशा ने एक मीठी सी मुसकान के साथ बात कर रहे बिलाल की ओर देखा.

निशा ने पहली बार बिलाल को गौर से देखा. 6 फुट का कद, चौड़े कंधे, गेहुंआ रंग, बड़ीबड़ी आंखें और चौड़ा माथा तथा उस के चेहरे पर छलक रही एक मधुर मुसकान. निशा को लगा कि सच में बिलाल एक आकर्षक युवक है. इस के अलावा लड़कियों के प्रति उस का बरताव निशा को बेहद पसंद आया. उस घटना के बाद दोनों अकसर फोन पर बातें करते थे. बिलाल की आवाज में भी एक अनोखा जादू था. बड़े अदब से बात करने वाला उस का अंदाज निशा को उस की ओर खींचने लगा. कई बार फोन पर बात होने के बाद दोनों ने एक कौफी शौप में मिलने का फैसला लिया. बिलाल एक बड़ी गाड़ी में आया. फोन पर इतनी बातें करते वक्त कभी अपनी हैसियत के बारे में उस ने कुछ भी नहीं बताया. अब भी बड़ी नम्रता से कहा, ‘वापस जाते

समय आप को मोटरबाइक में छोड़ना अच्छा नहीं लगेगा, इसलिए गाड़ी ले कर आया.’ उस की आवाज में जरा भी घमंड नहीं था. बिलाल ने अपने परिवार के बारे में सबकुछ बताया. उस ने बताया कि लखनऊ की मशहूर कपड़े की दुकान जमाल ऐंड संस के मालिक हैं उस के पिता और उस की मां घर पर ही बुटीक चलाती हैं जहां वे डिजाइनर साडि़यां तैयार कर उन्हें बेचती हैं. उस के बडे़ भाई पिता के साथ कारोबार संभालते हैं और एक छोटी बहन कालेज में पढ़ती है. यह सुनती रही निशा बिलाल को अपने परिवार के बारे में क्या बताए, सोचने लगी. अपने पिता या अपने भाइयों की झूठी तारीफ करने के बजाय वह चुप रही.

दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई. एक दिन बिलाल ने कौफी शौप में कौफी पीते समय कहा, ‘निशा, मुझे बातें घुमाना नहीं आता. मैं आप से बेहद प्यार करता हूं और आप से शादी करना चाहता हूं. क्या आप को मेरा प्यार कुबूल है.’ यह बात सुन कर निशा को एक झटका सा लगा, क्योंकि वह बिलाल को दोस्त ही मानती रही और कभी भी उस ने उसे इस नजरिए से नहीं देखा था. इस के अलावा निशा ने सोचा कि दोनों के बीच मजहब की दीवार है और यह शादी कैसे हो सकती है?

‘मैं जानता हूं कि हमारा मजहब अलग है मगर वह हमारे बीच नहीं आ सकता. आप को जल्दबाजी में फैसला लेने की जरूरत नहीं है. आप मेरे बारे में और हमारे रिश्ते के बारे में आराम से ठंडे दिमाग से सोचिए. आप मुझ से शादी न करना चाहें तो भी मैं दोस्ती को बरकरार रखना चाहता हूं.’ निशा इस प्रस्ताव के लिए बिलकुल तैयार नहीं थी. वह गहरी सोच में पड़ गई. दिल की बात किसी के साथ बांटने के लिए निशा की कोई करीबी सहेली भी नहीं थी.

निशा रातदिन इस बारे में सोचने लगी. निशा ने सोचा कि अगर उस के पिता ने उस की शादी करवाई तो वे जरूर एक ऐसे लड़के व परिवार को ढूंढ़ निकालेंगे जो औरत को इंसान नहीं मानते. उस से भी नहीं पूछेंगे कि वह लड़का उसे पसंद है या नहीं. बहुत सोचने के बाद निशा को यह एहसास हुआ कि मन ही मन में वह बिलाल से प्यार करने लगी है. बस, अपने दिल की बात समझ नहीं पाई और बिलाल ने अपने दिल की बात कह कर उस के अंदर सोए हुए प्यार को जगा दिया. बिलाल एक नेक और अच्छा इंसान है. अच्छे खानदान का है. निशा को ऐसा लगा कि बिलाल से अच्छा पति ढूंढ़ने पर भी कहीं नहीं मिलेगा. काफी कशमकश के बाद निशा ने फैसला लिया कि जिस परिवार ने उसे प्यार और इज्जत नहीं दी उस परिवार के लिए वह अपने प्यार की बलि क्यों चढ़ाए.

निशा ने 15 दिनों के बाद बिलाल से अपने प्यार का इजहार किया. उसी दिन बिलाल उसे अपने घर ले गया.?

बिलाल की गाड़ी एक आलीशान बंगले के सामने आ कर रुक गई. गाड़ी से उतर कर झिझकती हुई निशा अंदर गई. ‘आजा मेरी बहूरानी’ एक प्यारभरी पुकार सुन कर निशा ने उस तरफ देखा तो वहां एक और मुसकराती हुई औरत खड़ी थी. ‘मेरी अम्मीजान जुबैदा बेगम,’ बिलाल ने कहा और वहां 2 और औरतें खड़ी थीं और उन में से एक औरत को ‘मेरी भाभीजान जीनत और सूट पहने एक लड़की को ‘मेरी छोटी व इकलौती बहन शबनम, कालेज में पढ़ रही है,’ कह कर बिलाल ने सब से परिचय करवाया. निशा ने अपने संस्कार के अनुसार बिलाल की मां के पैर छुए, मगर बिलाल की मां ने निशा को उठा कर अपने सीने से लगाया और कहा, ‘नहीं, मेरी बेटी, तुम्हारी जगह यहां नहीं बल्कि यहां मेरे दिल में है. आ कर यहां आराम से बैठो. डर क्यों रही हो, मैं भी एक मां हूं.’ यह सुनते ही निशा का मनोबल बढ़ गया. ऐसे में शबनम बोली, ‘अरे, मेरी नई भाभी, आप क्यों इतनी टैंशन में हैं. अपनी टैंशन कम करने के लिए यह ठंडा पानी पीजिए.’ निशा ने भी हंसते हुए उस से पानी का गिलास ले लिया.

इसी दौरान उस घर की बहू जीनत एक प्लेट में कुछ मिठाई और नमकीन ले कर आई, ‘लीजिए, मेरी नई देवरानीजी, इसे खाइए.’ इतने में बिलाल के बड़े भाई और पापा आ गए. बिलाल ने अपने पिताजी से निशा का परिचय करवाया. उस की आवाज में डर बिलकुल नहीं था. उस ने प्यार और इज्जत के साथ अपने पिताजी से बात की. ‘अब्बूजान, मैं ने आप से कहा था न कि मैं एक लड़की से प्यार करता हूं, यही वह लड़की है निशा.’ बिलाल की बातें सुनते ही पिताजी ने मुसकराते हुए निशा के पास आ कर कहा, ‘हमेशा खुश रहो बेटी.’

बिलाल को अपने पिता से बातें करते हुए देख कर निशा को ऐसा लगा कि बापबेटे नहीं, बल्कि 2 भाई आपस में बातें कर रहे हैं. फिर बिलाल ने अपने भाई को निशा से मिलवाया. अपने भाई से एक दोस्त की तरह पेश आया बिलाल. बिलाल के परिवार से मिलने के बाद निशा ने फैसला कर लिया कि चाहे जो भी हो बिलाल से शादी करने के अपने फैसले से वह पीछे नहीं हटेगी. अपने पिता से भी उस ने हिम्मत जुटा कर कहा, ‘मैं 21 साल की हूं. अपनी जिंदगी का अहम फैसला लेने की उम्र है मेरी. अगर आप अपने बेटों के साथ मेरे रास्ते में अड़चन डालेंगे तो मजबूरन मुझे कानून की मदद लेनी पड़ेगी. मैं आगे आने वाली किसी भी मुसीबत का सामना करने के लिए तैयार हूं और मैं अपने फैसले पर अटल हूं.’

निशा की दृढ़ता देख कर सोमनाथ ने भी अपना निर्णय सुनाया, ‘‘मुझे तुम्हारी कोई परवा नहीं. तुम जियो या मरो, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मगर एक बात कान खोल कर सुन लो, अगर तुम्हारी शादीशुदा जिंदगी में कोई समस्या आए तो मायका समझ कर इस घर में कदम रखने के बारे में सोचना मत. याद रहे, मेरे लिए तुम मर चुकी हो.’’ सोमनाथ ने एक बाप की तरह नहीं, बल्कि किसी दुश्मन की तरह निशा के साथ व्यवहार किया. बिलाल और निशा की शादी हुए लगभग 2 महीने बीत गए. शादी के दिन निशा ने बिलाल से कहा, ‘‘बिलाल, यह मेरी जिंदगी का बहुत बड़ा फैसला है. अगर कुछ गलती हो जाए तो सिर छिपाने के लिए मेरे पास मेरा मायका भी नहीं है.’’ बिलाल ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘हमारे घर में तुम्हें इतना प्यार मिलेगा कि तुम्हें अपने मायके की याद कभी नहीं आएगी. यह मेरा वादा है तुम से.’’

निशा ने सोचा था कि बिलाल के घर वाले उन दोनों की शादी इसलामिक तौरतरीकों से करेंगे. मगर शादी के 2 दिन पहले ही बिलाल के मां और पापा ने निशा से इस के बारे में बात की. उन्होंने कहा, ‘‘तुम ने मेरे बेटे से प्यार किया है और शादी भी करने वाली हो, इस वजह से तुम्हारे ऊपर हम अपना मजहब नहीं थोपना चाहते. दबाव में पड़ कर एक मजहब को कोई अपना नहीं सकता. इसलिए अब तुम दोनों की कानूनी तौर से कोर्टमैरिज करवा देंगे. तुम हमारे साथ रह कर हमारे मजहब और रीतिरिवाज को जान लो. जब तुम्हारा मन पूरी तरह से इसलाम को कुबूल करना चाहे तब तुम अपना मजहब बदलना.’’ यह सुनते ही निशा को राहत मिली और उस ने अपनी सास को गले लगा लिया.

उस घर का माहौल निशा को बहुत पसंद आया. निशा को ऐसा लगा कि उस घर के कोनेकोने में प्यार ही प्यार है. कोई भी किसी से बुरा सुलूक नहीं करता और ऊंची आवाज में भी नहीं बोलता था. खासकर, अपनी सास के प्यार से वह फूली न समाई. बिलाल की मां अपनी दोनों बहुओं को अपनी बेटी की तरह प्यार और सम्मान देती थीं.

बिलाल की मां को सिलाई व कढ़ाई में ज्यादा दिलचस्पी थी. वे उस बंगले के बाहर वाले एक बड़े कमरे में अपनी डिजाइनर साडि़यों का बुटीक चला रही थीं. निशा ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया था, इसलिए वह भी अपनी सास के साथ साडि़यां तैयार करने लगी और बुटीक में जा कर वहां भी काम संभालने लगी. एक दिन जब निशा अपनी सास के साथ बुटीक में बैठी थी, उस वक्त एक छोटा सा पत्थर आ कर गिरा. उस पत्थर से बुटीक का एक शीशा टूट गया. सासबहू हैरान हो गईं. इतने में और भी बहुत सारे पत्थर आ कर गिरे. दोनों ने बाहर आ कर देखा तो वहां निशा के दोनों भाई खड़े थे. उन्हें देखते ही निशा को यह आभास हुआ कि यह हरकत इन दोनों की ही है. इस हरकत से निशा को बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई. इस के बाद निशा के दोनों भाई सड़क पर खड़े हो कर बहन को गाली देने लगे.

‘‘यही है वह औरत जिस ने एक मुसलमान से शादी की. बेशरम कहीं की,’’ ऐसा कह कर निशा के भाई निशा का अपमान करने लगे. यह सुन कर निशा शर्म से पानीपानी हो गई. निशा अपना सिर पकड़ कर बैठ गई. निशा इस सोच में पड़ गई कि इस मामले को कैसे सुलझाए. निशा को पता था कि उस के भाई लखनऊ शहर के बहुत बड़े गुंडे हैं और 2-3 बार जेल की हवा भी खा चुके हैं. उन के पिताजी ने उन्हें जेल से छुड़वाया और जब निशा की मां ने कुछ पूछने की कोशिश की तो सोमनाथ ने बात काट कर, ‘‘तुम औरत हो. यह मामला मर्दों का है और मेरे बेटों ने मर्दों जैसा काम किया है, तुम बीच में मत बोलो,’’ लक्ष्मी को चुप करा दिया.

आज उन दोनों भाइयों ने निशा के ससुराल वालों के सामने आ कर अपनी गुंडागर्दी दिखाई. इतने में 4-5 छोटेछोटे पत्थर और आ कर गिरे और उन में से एक पत्थर निशा की सास के माथे पर लगा और उन्हें चोट लग गई.

घर आ कर निशा ने अपनी सास की चोट पर मरहम लगाया. इस दुर्घटना की खबर मिलते ही बिलाल के अब्बूजान घर लौट आए. उन सब के सामने निशा ने झिझकते हुए कहा, ‘‘अब्बूजान, मेरे भाइयों ने ही हमारे बुटीक पर पत्थर फेंके थे. आप मेरे बारे में मत सोचिए. उन्होंने जो किया, गलत किया और आप पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा दीजिए.’’ निशा की बातें सुन कर सब ने अब्बूजान की ओर देखा क्योंकि फैसला लेने वाले वे ही थे. ‘‘ठीक है जुबैदा, तुम अभी आराम करो. कल से बुटीक के लिए एक सिक्योरिटी गार्ड रखेंगे. तुम दोनों औरतें अकेले में ऐसी हालत को नहीं संभाल पाओगी. इसलिए एक गार्ड की जरूरत है.’’ उन की बातों से यह स्पष्ट था कि वे इस मामले को पुलिस तक ले जाना नहीं चाहते हैं. मगर निशा ने उन के पास जा कर सहम कर कहा, ‘‘अब्बूजान, मैं आप से निवेदन करती हूं कि आप मेरे भाइयों को माफ मत कीजिए. उन्होंने जो भी किया वह बिलकुल गलत है. अगर

आप इस बार उन्हें माफ करेंगे तो उन की जुर्रत और बढ़ जाएगी. इसलिए

आप उन के खिलाफ पुलिस में शिकायत करा दीजिए.’’ ‘‘मैं तुम्हारे जज्बे को समझ सकता हूं बहू, मगर हमें इस मामले में सावधानी बरतनी होगी. जिन्होंने यह हरकत की, वे तुम्हारे भाई हैं. आज नहीं तो कल, हम एक परिवार हो जाएंगे. अगर हम आज जल्दबाजी में पुलिस के पास गए तो हमारे रिश्ते में दरार आ जाएगी. हमें सब्र से काम लेना चाहिए. उन दोनों को एक न एक दिन अपनी गलती का एहसास होगा. हम उस दिन का इंतजार करेंगे.’’ उन के बड़प्पन के सामने अपने पिता की हरकतों को याद कर निशा की आंखें नम हो गईं.

इस दरमियान रमजान का महीना आया. रमजान के महीने के 10वें दिन दोपहर की नमाज के बाद अचानक निशा बेहोश हो गई और उसे देख कर सब के होश उड़ गए. तुरंत डाक्टर को बुलावाया गया. निशा की जांच करने के बाद डाक्टर ने मुसकराहट के साथ कहा, ‘‘आप लोगों के लिए खुशखबरी है, आप के घर में एक नया मेहमान आने वाला है.’’ यह सुन कर सभी पुलकित हो उठे.

बिलाल के परिवार ने निशा को पलकों पर बिठाया. अब्बूजान और भाईजान दोनों रोज निशा के लिए फल खरीद कर लाते थे. जुबैदा और जीनत दोनों खास पकवान बनातीं. सब का प्यार देख कर निशा की आंखें डबडबा गईं. अचानक एक दिन जुबैदा को थकान महसूस हुई और वे एक कुरसी पर बैठ गईं. उन के दाहिने हाथ में इतना दर्द होने लगा कि उसे उठा ही नहीं पाई और धीरेधीरे वह दर्द सीने तक पहुंच गया और जुबैदा बेहोश हो गईं. घर के लोग उन्हें ले कर अस्पताल पहुंचे. डाक्टर ने जांच कर के उन्हें तुरंत आईसीयू में दाखिल कर दिया.

डाक्टर ने कहा, ‘‘इन्हें हार्टअटैक आया है. इन की आर्टरी में ब्लौकेज है और तुरंत बाइपास सर्जरी करनी पड़ेगी. सारी फौर्मेलिटीज पूरी करने के बाद हम औपरेशन करेंगे. इस के लिए कुल मिला कर 5 लाख रुपए खर्च करना होगा आप को.’’ यह सुन कर परिवार के सभी लोग उदास हो गए. बिलाल के पिताजी हताश हो गए थे. शादी हुए इतने सालों में अपनी बीवी को ऐसी हालत में वे पहली बार देख रहे हैं और वे उसे बरदाश्त नहीं कर सके. बच्चों ने पहली बार अपने अब्बूजान की आंखों में आंसू छलकते हुए देखे.

बिलाल के अब्बूजान के पास इस वक्त इतने रुपए नहीं थे. उन्होंने अपने दोनों बेटों के लिए लखनऊ की मेन मार्केट में अलगअलग दुकान खोलने के लिए अपनी सारी बचत उस में लगा दी थी. उन की मजबूरी देख कर निशा ने कहा, ‘‘अब्बूजान, आप ने हमारी बुटीक की कमाई को कभी भी नहीं मांगा. अब हमारे पास 10 लाख रुपए हैं और आप बेफिक्र रहिए.’’ अम्मीजान का औपरेशन बिना किसी परेशानी के साथ हो गया. सभी अस्पताल में अम्मीजान के पास थे. उस समय निशा के मोबाइल की घंटी बजी. उस की मां का फोन था. शादी होने के बाद मां ने एक बार भी फोन नहीं किया था. अब क्यों फोन कर रही है? सोचते हुए निशा ने ‘हैलो’ कहा तो दूसरी तरफ उस की मां की हड़बड़ाई आवाज सुनाई दी, ‘‘निशा, तुम्हारी मदद चाहिए. तुम्हारे भाइयों को पुलिस पकड़ कर ले गई है और उन्हें जमानत पर छुड़वाने के लिए 5 लाख रुपए चाहिए.’’ यह सुनते ही निशा के क्रोध की सीमा नहीं रही.

औपचारिकता के लिए भी मां ने यह नहीं पूछा कि तुम कैसी हो, मगर अपना अधिकार जताते हुए अपने नालायक बेटों के लिए रुपए मांग रही है. वह गुस्से में बोली, ‘‘किस हक से आप मुझ से इतने रुपए मांग रही हैं? आप लोगों ने दर्द के सिवा क्या दिया है मुझे और मुझ से मदद मांगने में आप को लज्जा नहीं आई?’’ ऐसा कहते हुए निशा ने गुस्से में तमतमाते हुए फोन काट दिया. अब्बूजान यह सब सुन रहे थे.

5 दिनों के बाद जुबैदा घर वापस आ गईं. दोनों बहुओं ने अपनी सास की खूब देखभाल की. दूसरे दिन सुबह ही अब्बूजान कहीं बाहर जाने की तैयारी करने लगे. सब ने सोचा कि शायद वे अपनी दुकान जा रहे हैं. उन्होंने निशा से पूछा, ‘‘बेटी, तुम्हारे पास जो 5 लाख रुपए हैं, क्या तुम मुझे दे सकती हो? निशा ने बिना कोई सवाल पूछे चैक में दस्तखत कर के अब्बूजान को दे दिया. उस चैक को अपने पौकेट में रख कर उन्होंने कहा,’’ मैं अपने संबंधी के घर तक जा रहा हूं.’’ यह सुन कर सब हैरान हो गए क्योंकि बड़ी बहू जीनत का घर लखनऊ में नहीं, फिर किस संबंधी का जिक्र कर रहे हैं अब्बूजान. ‘‘मैं निशा के मायके के बारे में बात कर रहा हूं. वे हमारे संबंधी ही हैं. उन के घर के बेटे जेल में सड़ रहे हैं. उन्हें रिहा कराने के लिए ये रुपए ले जा रहा हूं.’’ निशा ने कुछ कहने की कोशिश कि तो अब्बूजान ने बीच में बात काट कर कहा, ‘‘बहू, तुम्हारा गुस्सा जायज है मगर यह वक्त नहीं है गुस्सा निकालने का. जब वे हम से मदद मांग रहे हैं, तो इनकार करना ठीक नहीं और इंसानियत भी नहीं है.’’ उन की बातें सुन कर सब सन्न हो गए.

अचानक अपने घर की चौखट पर निशा के ससुरजी को देख कर निशा के मांबाप दोनों आश्चर्यचकित हो गए. मगर वे मुसकराते हुए घर के अंदर गए और लक्ष्मी को 5 लाख रुपए का चैक दे कर कहा, ‘‘बहनजी, निशा एक बच्ची है. इसलिए जब आप ने उसे फोन किया तो गुस्से में आ कर न जाने उस ने क्या कह दिया. उस की तरफ से मैं आप से माफी मांगता हूं. इन रुपयों से अपने बेटों को रिहा कराने का काम शुरू कीजिए.’’ यह सुन कर लक्ष्मी और सोमनाथ दोनों की नजरें झुक गईं. ‘‘भाईजान, आप से मैं कुछ बात करना चाहता हूं. बच्चे पतिपत्नी की देन होते हैं. उन्हें अच्छी परवरिश देना हमारा फर्ज है. बच्चों में बेटाबेटी का फर्क करना प्यार का अपमान करने के समान है. जो भी हमें मिले उसे सच्चे मन से अपनाना ही हमारे लिए उचित है और एक बात सुनिए, बच्चों को सहीगलत सिखाना भी हमारा ही कर्तव्य है. अगर बच्चे गलत रास्ते पर चल पड़ें तो इस का मतलब है हमारी परवरिश में ही खोट है. यह मत सोचना कि मैं आप के बेटों की गलतियों के लिए आप को दोषी ठहरा रहा हूं. आगे से उन दोनों को सही रास्ते पर चलने की सीख दीजिए. अपने मन से द्वेष की भावना को हटा दीजिए और अपने बच्चों के मन में भी इस जहर के बीच को मत बोइए. इस दुनिया में हमेशा प्यार की ही जीत होगी, नफरत की नहीं.’’ उन की बातें सुन कर जिंदगी में पहली बार सोमनाथ का अभिमान टूट गया और फूटफूट कर रोने लगे. आगे बढ़ कर जमाल साहब ने सोमनाथ को गले लगाया और वहां हुई प्यार की जीत.

Hindi Story : भूल सुधार – मीता और विनय बच्चें से क्यों परेशान थें

Hindi Story : मीता यह सुन कर सन्न रह गई कि उस की सहेली ने पार्क स्ट्रीट के एक रेस्तरां में विजय को नशे में धुत्त, एक लङकी को बांहों में ले कर नाचते देखा था. किसी लङकी के साथ इस तरह नाचने में इतनी बुराई नहीं थी, मगर लङकी भले घर की नहीं लगती थी व दोनों ही नशे में बेहूदा हरकतें कर रहे थे. यहां तक कि रेस्तरां के मैनेजर को भी उन्हें वहां से हटाना पड़ा था. गालियां बकते व मैनेजर को धमकाते हुए विजय लङखड़ाता हुआ अपने साथियों को ले कर रेस्तरां से बाहर निकल गया था.

सहेली तो अपना कर्तव्य पूरा कर चली गई, पर मीता सोच में डूब गई,’कहां गलती रह गई… उन लोगों ने तो अपने बच्चों के लिए जीवन की सब सुविधाएं मुहैया की थीं. अच्छे पब्लिक स्कूलों में उन्हें पढ़ाया था. बच्चों का काम करने के लिए हर समय नौकर या कामवाली घर में रहती थी. अच्छे से अच्छा खाना व बढ़िया कपड़े उन के लिए लाए जाते. फिर ऐसा क्यों हुआ?’

कुछ उड़तीउड़ती बातें उस ने लीना के विषय में भी सुनी थीं, पर उसे अपने पति की अच्छे पद से जलने वाले लोगों की नीच सोच की उपज समझ कर उस ने अधिक ध्यान नहीं दिया था. उस ने लीना को हमेशा अपने सैमिनार, ट्यूटोरियल के कालेज अथवा यूनिवर्सिटी के चक्कर लगाते या फिर अपनी किताबों में ही डूबे देखा था. उस का उलटेसीधे चक्करों में पङने का तो सवाल ही नहीं उठता था.

वैसे भी दोनों बच्चे बढ़िया उच्चारण के साथ धाराप्रवाह इंग्लिश बोलते थे, कांटेछुरी से खाना खाते थे. उन के ये बढ़िया तौरतरीके दूसरे बच्चों के मांबाप के लिए जलन का कारण हो सकते थे. मीता व उस के पति विनय को अपनी आधुनिक व सुंदर बच्चों पर बहुत गर्व था.

विजय इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ता था. पढ़ाई में दोनों बच्चे तेज थे. पर अब यह क्या सुनने को मिल रहा था…

शाम को विनय औफिस से आते ही सोफे पर लेट गया. मीता ने माथे पर हाथ फेरा, कहीं बुखार तो नहीं. विनय ने लंबी सांस ले कर उस का हाथ धीरे से हटा दिया, ‘‘बुखारवुखार कुछ नहीं, यों ही सिरदर्द है.’’

‘‘बाम मल देती हूं, आप लेट जाइए.’’

‘‘बाम से कुछ नहीं होगा,’’ विनय सीधे हो कर बैठ गया. बोला, ‘‘जानती हो, आज गोल पार्क में क्या हो रहा था? कुछ आवारा से छोकरे एक गरीब रेहङीवाले को मुफ्त कबाब न खिलाने पर पीट रहे थे. उस की दुकान का सत्यानाश कर दिया उन्होंने और उस की सारी कमाई भी छीन ली.’’

‘‘किसी ने रोका नहीं.’’

‘‘अरे, आम लोग अपनी जान खतरे में क्यों डालें? जब तक पुलिस आई वे बम फेंक कर भाग गए. मैं भी गाड़ी घुमा कर दूसरे रास्ते से आया.’’

‘‘ये सब तो यहां आम बातें हैं. आप क्यों परेशान होते हैं?’’

‘‘यह साधारण बात नहीं है, मीता,’’ विनय ने उसे गहरी नजरों से देखा, ‘‘उन लङकों में लालकाले चैक की शर्ट व बिस्कुटी रंग की जींस पहने एक लङका भी था. यही कपड़े तुम पिछले सप्ताह विजय के लिए न्यू मार्केट से खरीद कर लाई थीं न?’’

मीता कांप उठी. तो उस की सहेली ने झूठ नहीं कहा था. विजय बुरे लङकों की संगति में पड़ गया है, यह साफ था. अचानक उसे अपने पर्स व अलमारी से गायब होते रुपयों का भी ध्यान आया, जिन के लिए वह कामवाली को धमका चुकी थी और उसे निकाल चुकी थी. वह व्यर्थ ही उन गरीबों पर आरोप लगा रही थी. जाहिर है, विजय अपने आवारा साथियों पर उड़ाने के लिए उस के पर्स पर हाथ साफ कर रहा था.

धीमे स्वर में उस ने विनय को दिन में अपनी सहेली से सुनी घटना के बारे में भी बताया. तभी फोन की घंटी बजी. मीता ने फोन उठाया,”हैलो, लीना है?’’

कुछ सोच कर मीता ने कहा, ‘‘हां, लीना ही बोल रही हूं.’’

‘‘ओह, मेरी जान, कल शाम विक्टोरिया के सामने मिलो.’’

‘‘लेकिन, मां…’’

मीता अधिक नहीं बोली. वह नहीं चाहती थी कि दूसरी ओर से बोलने वाला लङका उस की आवाज पहचान जाए. वह मामले की जड़ तक पहुंचना चाहती थी.

‘‘अरे, मां को गोली मारो, ऐक्सट्रा क्लास लगने का बहाना बना कर निकल जाना. पहले भी तो ऐसा कई बार कर चुकी हो.’’

‘‘अच्छा,’’ मीता धीरे से बोली.

‘‘ठीक 5 बजे, बाएं वाले दरवाजे पर,’’ कह कर उधर से फोन बंद कर दिया गया. विनय भी सारी बातें सुन रहा था.

दोनों मौन बैठे रहे. मीता ने पति से कहा, ‘‘कुछ कीजिए न, ऐसे चुप बैठे रहने से कैसे काम चलेगा.’’

‘‘अब क्या करने को रह गया है? दोनों बच्चे हाथ से निकल गए हैं. मैं तो अपने औफिस के काम से अकसर दौरे पर रहता हूं. लगता है, तुम घर का खयाल नहीं रखतीं. दिनरात लेडीज क्लब व किट्टी पार्टी के चक्करों में घर से गायब रहती हो.’’

‘‘हां, अब सारा दोष मेरा ही है. तुम भी तो शनिवार की रात ताश मंडली जमा कर रविवार सवेरे तक व्यस्त रहते हो और साथ मुझे भी घसीट ले जाते हो. जवान बेटे के सामने घर में खुलेआम शराब की बोतल खोल कर बैठ जाते हो. इन सब से तो घर में बड़ा सुधार होता है न.’’

एकदूसरे पर दोषारोपण के बाद दोनों ने ठंडे मन से विचार किया. दोनों को ध्यान आया कि उन्हें अपने बच्चों के मित्रों, कालेज के समय व लीना के विषय में किसी भी बात का पता नहीं था. शुरू में 1-2 बार लीना व विजय ने अपने मित्रों को खाने पर बुलाने को कहा भी था, पर समय न होने के कारण मीता टाल गई थी. फिर दोनों को रुपए दे कर कह दिया था कि रेस्तरां में ही खाना खिला देना.
दोबारा जब लीना ने चाय पार्टी के लिए अपनी सहेलियों को बुलाया तो मीता नौकर को आवश्यक निर्देश दे कर नारी स्वतंत्रता पर एक नेता का भाषण सुनने महिला क्लब की बैठक में चली गई थी.

अब ठोकर लगने पर दोनों की आंखें खुल गईं. मीता उठ कर लीना के कमरे में गई. पाठ्यक्रम की मोटीमोटी किताबों पर धूल जमी थी, मानो किसी ने उन्हें छुआ ही न हो. एक दराज में अश्लील साहित्य भरा था.

मीता ने विनय को सलाह दी कि अगली शाम वह उस लङके को जा कर देखे तो सही. शायद वह लीना के सुयोग्य वर ही हो. विनय मान गया, पर दोनों जानते थे कि यह उन का भ्रम मात्र है कि वह लङका योग्य पात्र होगा.

दूसरे दिन विनय विक्टोरिया मैमोरियल के बाएं फाटक पर चहलकदमी करते उस हिप्पीनुमा लङके को देख आया. एक ही दिन में उस की आयु के 10 साल बढ़ गए थे.

कहां वह लीना के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी या निजी फर्म का कोई मैनेजर खोज रहा था और कहां भुट्टा चबाता, मैलेकुचैले कपड़ों में गंधाता यह हिप्पी.

लीना को डांटनेधमकाने का अब कोई लाभ नहीं था. इस तरह तो वह घर से भाग सकती थी. विनय ने मीता को समझाया कि पानी सिर से काफी ऊंचा हो गया है, पर शायद ध्यान देने से अब भी बिगड़ी बात बन सकती है. बच्चों को सही राह पर लाने का प्रयास अभी भी किया जा सकता है.
मीता ने लीना के साथ खूब गपशप करने की कोशिश की. लीना अपने कमरे में मां की उपस्थिति से बोर ही होती, पर मीता ने उस का पीछा नहीं छोड़ा.

एक दिन बाजार खरीदारी में मदद करने के लिए भी उस ने लीना से कहा. लीना ने भी सोचा कि मां को बाजार में ही छोड़ कर फिल्म चली जाएगी. पर मीता ने उस से साङियां पसंद करने को कहा, ‘‘बेटी, मेरी पसंद तो पुरानी हो गई है, तुम्हीं जरा नए जमाने की साङियां चुन दो.’’

वहीं दुकान में आग्रह कर उस ने लीना को अच्छे चड़ीदार कुरते व कमीजसलवार के सैट भी खरीदवा दिए. पहले तो लीना ने नाकभौं चढ़ाई, पर फिर मां का मन रखने के लिए ट्रायल रूम में जा कर अपनी मैली जींस व हाल्टर टौप बदल कर आ गई. अपने व्यक्तित्व के इस नए निखार पर वह स्वयं हैरान रह गई.

मैले कपड़े उतार कर वह खुद भी आराम का अनुभव कर रही थी. अगले कुछ दिनों में मां की बढ़िया रेशमी साङियां भी पहन कर देखीं. नरम रेशमी कपड़े का स्पर्श खुरदरी जींस और डायनस के बाद बड़ा सुखद लगा. मांबाप के साथ वह एकआध पार्टी में भी गई. कालेज के फक्कड़ों के स्थान पर सभ्य लेकिन आधुनिक लोग अच्छे लगे.

उधर विनय ने विजय की ओर अधिक ध्यान देना प्रारंभ किया. वह उस से उस के कालेज और पढ़ाई के विषय में चर्चा करता. विजय को अच्छा तो न लगता, पर खुलेआम वह पिता का अनादर न करता.

अभी वह पूरी तरह नहीं बिगड़ा था और फिर अच्छे संस्कार तो कहीं दबेढके थे ही, जिन पर बुरी संगत की धूल भी जमी हुई थी. इसी धूल को विनय खुरचने का प्रयास कर रहा था.

एक दिन विनय उस के कमरे में स्टीरियो सुनने जा पहुुंचा. साथ में फ्रिज से बीयर की बोतल भी निकाल ली. एक गिलास में बीयर डाल उसे विजय की ओर बढ़ा दिया. विजय हड़बड़ा गया, ‘‘नहीं… नहीं, पापा, मैं तो यह नहीं पीता.’’

‘‘अच्छा,’’ विनय ने हैरानी का नाटक किया. ‘‘आजकल तो लङके 10वीं तक पहुंचतेपहुंचते ही बिगड़ जाते हैं और मांबाप के सामने बैठ कर खूब शराबसिगरेट पीते हैं. मुझे बड़ी खुशी हुई कि मेरा बेटा इन सब ऐबों से परे है. लो, आज से मैं भी इसे छोड़ देता हूं,’’ कह कर विनय ने बोतल कूड़ेदान में फेंक दी.

विजय ने भी चुपचाप सिगरेट की डब्बी, जो खिङकी के परदे के पास पड़ी थी, आहिस्ता से सरका कर बाहर गली में गिरा दी. विनय ने देख कर भी अनदेखा कर दिया. कुछ देर तक तो वह विजय का कानफोड़ू अंगरेजी संगीत सुनता रहा, फिर अपने कमरे में जा कर आनंद शंकर के रिकौर्ड किया पेन ड्राइव उठा लाया.

‘‘ये मैं ने खरीदे थे. रामलालाजी की बेटी इन की बड़ी प्रशंसा कर रही थी. जरा लगाओ तो.’’

अनिच्छा से विजय ने पेन ड्राइव लगाया. भारतीय व विदेशी संगीत का अनोखा संगम सुन कर वह मुग्ध हो गया. चीखचिल्लाहट भरे संगीत के अभ्यस्त कान सितार का मधुर स्वर सुन कर मस्त हो गई. इस संगीत के साथ हाथपैर फेंकफेंक कर मटकने के स्थान पर आंख बंद कर आराम से सुनने को मन चाहता था.

‘‘यह तो बहुत मस्त है, पापा. मैं तो समझा था, आप क्लासिकल म्यूजिक के रिकौर्ड लाए होंगे.’’

‘‘अरे, नहीं, वे तो मेरे पल्ले ही नहीं पड़ते, उन्हें समझने के लिए तो संगीत की पर्याप्त जानकारी होना आवश्यक है.’’

अनजाने ही विनय विजय को राजनीतिक चर्चा, फुटबाल, क्रिकेट और ताजा घटनाओं में घसीट लेता. इस तरह विजय का बाहर जाना काफी कम हो गया. खाने की मेज पर भी रात को विभिन्न विषयों पर मातापिता और बच्चों में खूब चर्चा होती व कई बार बहस भी हो जाती, पर सब इसे सामान्य रूप में लेते.

एक दिन पीढ़ियों के अंतर पर बहस होने लगी. बिना कोई व्यक्तिगत प्रहार किए विनय ने विजय व लीना को समझाया, ‘‘मांबाप जानबूझ कर कभी बच्चों की उपेक्षा नहीं करते. अब मुझे ही लो.

‘‘पिछले 2 सालों से मैं कंपनी का सब से बड़ा अधिकारी हूं. मेरी जिम्मेदारियां बहुत बढ़ गईं, सो मैं तुम लोगों को अधिक समय नहीं दे सका. और फिर मुझे दौरे भी बहुत करने पड़ते हैं.

‘‘यह सब तुम लोगों की सुखसुविधा के लिए ही तो करता हूं. तुम्हारी मां को भी मेरी पत्नी होने के नाते अनेक सामाजिक संस्थाओं में जाना पड़ता है. कभी शायद हम लोगों ने लापरवाही भी बरती हो, पर वह तो इसीलिए कि हमें तुम दोनों पर विश्वास है. हमें मालूम है कि अच्छी शिक्षा तुम्हें कभी भटकने नहीं देगी.’’

तनाव के कारण मीता की मुट्ठियां भिची हुई थीं. लीना और विजय ने झुके हुए सिर उठा कर कहा, ‘‘आप ठीक कहते हैं, पापा, हम कभी आप का सिर नीचा नहीं होने देंगे.’’

‘‘अरे, सिर क्या नीचा होगा. तुम दोनों का तो मैं प्रबंध करने वाला हूं,’’
वह लीना से बोला, ‘‘आनंदजी का बेटा तो तुम ने पिछली पार्टी में देखा ही था. उन्हीं के घर से तुम्हारे लिए रिश्ता आया है. वह एक कंपनी में डिवीजनल इंजीनियर है. तुम्हीं बताओ, उन्हें क्या उत्तर दूं?’’
शरम से लाल होती लीना ‘धत्’ कह कर अपने कमरे में भाग गई.

मध्यवर्गीय आनंद परिवार से रिश्ता विनय ने स्वयं मांगा था क्योंकि लङका बहुत अच्छा था और उस परिवार के लिए विनय की पदप्रतिष्ठा व रोबदाब का पलड़ा उन को मिलने वाले प्रस्तावों के मुकाबले काफी भारी था.

‘‘और, बरखुरदार, तुम्हारे लिए भी मैं ने एक प्रबंध किया है,’’ वह विजय की ओर मुखातिब हुआ, ‘‘तुम्हारी 2 महीने की छुट्टियां हैं. मेरा एक ठेकेदार मित्र है जो बहुमंजिली इमारतें बनवाता है. उसे किसी विश्वसनीय आदमी की जरूरत है. उस के पास 2 महीने काम कर लो. तुम्हारा प्रशिक्षण भी हो जाएगा और तुम्हें ओवरसियर का वेतन भी मिलेगा. मैं तो अब लीना की शादी के इंतजाम के लिए पैसे की व्यवस्था में लगा हूं.’’

‘‘ठीक है, पिताजी, इस तरह मैं भी लीना को अपनी कमाई के पैसों से अच्छा सा उपहार दे सकूंगा.’’

‘‘अरे भई, एक बार तुम इंजीनियर बन गए तो फिर तुम्हारी कमाई से ही घर चलेगा. मैं तो अवकाश ग्रहण कर आराम करूंगा.’’

तीनों हंसने लगे. मीता की भिची मुट्ठियां आहिस्ताआहिस्ता खुल गई थीं और विनय के ठहाके सारे घर में गूंज रहे थे.

Hindi Story : अपना घर – आखिर सीमा के मायके में क्या हुआ था?

Hindi Story : शादी के बाद बड़े उत्साह के साथ मायके जा रही थी सीमा. मन भागभाग कर बचपन की यादें, वहां बिताए एकएक पल याद कर रहा था. लेकिन वहां पहुंच कर वही मन डूब सा क्यों गया? मोबाइल की घंटी बजते ही सीमा ने तुरंत फोन उठा लिया. रिसीवर के दूसरी ओर मां थी, ‘‘मां, आप को ही याद कर रही थी. भैया रवाना हो गए? आप सब को देखे महीना हो गया.’’ सीमा थोड़ी सी रोंआसी हो कर बोली, ‘‘भैया कब तक आएंगे? मुझ से तो सब्र नहीं हो रहा. अब कब आ कर आप सब से मिलूं.’’ ‘‘आ रहा है बेटा, तेरे बिना घर ही सूना हो गया. तू तो हमारे घर की रौनक थी. तेरे बाबूजी, भैया, मैं, हम सब को तू बहुत ही याद आती है. तेरी नई भाभी भी तुझ से मिलने को अधीर है. दीदी कब आएंगी, बस यही पूछती रहती है. अच्छे से सामान पैक कर लेना. खानेपीने का सब रख लेना.

ट्रेन से नीचे मत उतरना. मौसम थोड़ा ठंडा है, कुछ हलका ओढ़ने को रख लेना.’’ ‘‘हां मां हां, अब मैं बच्ची नहीं रही. शादी हो चुकी है, मैं सब मैनेज कर लूंगी.’’ कह कर सीमा ने फोन रख दिया. ‘मां भी न,’ यह सोच कर सीमा मुसकरा दी. दूसरे दिन सवेरे जल्दी उठ कर सीमा ने फाइनल पैकिंग कर ली. सीमा की सास ने आज उसे रसोई से छुट्टी दे दी ताकि वह आराम से सब पैक कर ले. रोहन से दूर होने का दुख था पर महीनेभर बाद मायके जाने की खुशी अलग थी. तभी डोरबेल बजी, ‘‘भैया, आप आ गए,’’ भैया को देख कर सीमा की प्रसन्नता देखने लायक थी. सास ने दोपहर का खाना लगाया. पहली बार बहू के भाई की आवभगत में कोई कमी नहीं रखी. आते ही पूरा घर संभाल लिया. सीमा तो हमारे घर के कणकण में रचबस गई है, बेटा.

इस के जाते ही बहुत अखरेगा. सीमा अपनी तारीफ में सास द्वारा कहे गए शब्दों के बोझ तले दबे जा रही थी. ‘‘जी,’’ मांजी, सास के पांव छू कर विदा ली. रोहन ने भैया, सीमा को रेलवे स्टेशन तक छोड़ दिया. सीमा और उस के भैया की शादी दो दिनों के अंतराल से हुई थी. पहले भाभी घर में आई, एक दिन बाद सीमा की बिदाई. ज्यादा दिन साथ रहे नहीं, दोनों अपनीअपनी शादी में व्यस्त थीं. आज सीमा शादी के एक महीने बाद मायके में रहने जा रही है. दूर भी तो इतना भेज दिया, बारबार जल्दी से मायके आ भी नहीं सकते. ट्रेन की दूरी तो बहुत खल रही थी. काफी उत्साहित थी, सब से मिलने के लिए. शादी के बाद रस्मोरिवाज, रिश्तेदारों के यहां आनेजाने में ही वक्त निकल गया. रोहन के साथ हनीमून की मीठी यादें याद करती रही, कभी मायके में बिताया हर पल. शादी के बाद लड़की 2 नावों की सवारी करती है, दोनों में संतुलन कर के चलती है. मायके वाले भी उतने ही प्रिय होते हैं जितने ससुराल वाले. मायके में जिंदगी का अल्हड़पन बीतता है. और ससुराल में जिम्मेदारी और कर्त्तव्यों को वहन करना होता है.

मायके में कोई रोकटोक नहीं, कोई बंदिश नहीं, सब से बड़ी बात वहां अपेक्षाएं नहीं थीं. ट्रेन में भैया, भाभी के गुणों की ही व्याख्या करते रहे हैं. सीमा का मन अधीर हो गया, भाभी से मिलने को. घर की इकलौती लाड़ली सीमा काफी चतुर व समझदार थी. मां की बीमारी के चलते सारे घर की जिम्मेदारी सीमा के कंधों पर थी. कौन सी चीज कहां रखनी है, कौन सा सामान किस तरह से घर में सैट करना है. अमुक चादर बैड पर जंचेगी या नहीं. अमुक टेबल कमरे के किस कौर्नर में रखें, गमले में आज कौन से फूल महकेंगे. सुबह के नाश्ते से ले कर रात के खाने में क्या बनेगा. सब काम सीमा के फैसले से होते थे.

सीमा मां, बाबूजी, भैया के साथ अपनी ही दुनिया में डूबी हुई थी. एकाएक उसे आभास हुआ घर में उस की शादी के चर्चा होने लगी. रोज कहीं न कहीं बाबूजी लड़का देख कर आते. उस दिन जब बूआ आई थीं, समझ रही थीं, ‘‘लड़की को सही वक्त पर उस के घर भेज दो, यह तो पराया घर है. एक दिन तो उसे यह घर छोड़ कर जाना है,’’ बूआ की बात कानों से सुनी, तभी से सीमा की सांस ऊपरनीचे हो गई. क्यों यह पराया घर है. जिस घर पलीबढ़ी, खेलीकूदी, हर खुशी पाई. किसी के पास जवाब नहीं था, पर सब को यही कहना था, जाना तो होगा. आखिर सब के समझाने पर सीमा मान गई. पर उस ने शर्त रखी कि वह मां को बीमार छोड़ कर नहीं जाएंगी. पहले भैया की भी शादी कीजिए. शर्त मान ली गई संयोग से सुयोग्य लड़की भी मिल गई. ज्योंज्यों मायका नजदीक आ रहा था, वैसे ही सीमा की बेचैनी भी बढ़ने लगी. आखिर उस का घर दिख गया. रोमरोम पुलकित हो गया. भैया ने जैसे ही सामान उतारा, सीमा ने घर के आंगन में पांव रखा कि चौंक गई.

बाहर आंगन में उस ने जो छोटा सा बगीचा तैयार किया था, सुबहशाम पानी डाला करती थी, जहां बैठ कर अकसर पढ़ाई किया करती थी, कितनी मेहनत से तरहतरह के पौधे लगाए थे, उस के बगीचे का नामोनिशान नहीं था. आंगन की महकती खुशबू को बेजान पत्थरों ने दबा दिया था. सारा आंगन पक्का करवा दिया गया था. भैया ने सीमा के चेहरे के भाव पढ़ लिए, दबी जबान में बोले, ‘‘यह तुम्हारी भाभी ने कहा, सारा घर मिट्टी से सन जाता है, वैसे भी तुम्हारे जाते ही सारे फूल मुर?ा गए थे.’’ उतरे चेहरे से सीमा अंदर ड्राइंगरूम में पहुंची. मांभाभी से मिली. भाभी चायनाश्ते में जुट गई. ड्राइंगरूम का नक्शा ही बदल गया था. सीमा की पेंटिंग्स दीवार से उतर कर घर के पिछवाड़े तक जा पहुंचीं, भाभी की बनाई पेंटिंग से रूम सज रहा था. दीवान पर पेंटिंग की चादर की जगह भाभी के हाथ की कशीदे की चादर फब रही थी. अब सोफा सैट की दिशा भी बदल गई.

गमलों में बनावटी फूल खिल रहे थे. परदों के रंग भी उलटपुलट हो गए. उसे लगा वह किसी नई जगह पर आ गई है. सीमा मनमसोस कर रह गई, कहने वाली थी कि मां यह क्या? तभी मां बोली, ‘‘तेरे घर पर सब ठीक है.’’ सीमा बोली, ‘‘हां, मां, मेरे घर पर सब ठीक है.’’ उधर मां भाभी की बनाई चीजों की तारीफ करते नहीं थक रही थी. तेरी भाभी ने आते ही अपना घर संभाल लिया. ‘सच है, यह भाभी का घर है, मेरा तो कभी था ही नहीं,’ हौले से सीमा बुदबुदा दी. यह घर पराया था नहीं, पर अब लगने लगा. मेरी इस घर में कोई अहमियत नहीं रही, सीमा मन ही मन रो दी. रात के खाने से निबटी थी. अब उसे मेहमानों का कमरा दिया गया. रातभर सोचसोच कर करवट बदलती रही. बचपन के स्कूल के, हर पल, हर क्षण याद आते रहे. वह अपने ही मन को समझती रही. मां, बाबूजी, भैया, भाभी के प्यारदुलार में कोई कमी नहीं है. फिर भी अब वह बात नहीं रही जो शादी से पहले थी. हिचकिचाहट नहीं थी.

कुछ भी काम करना हो, अब पूछना होता है. भाभी के हिसाब से घर की किचन की सैटिंग है, तो मुझे क्यों अखर रहा है. अपनेआप से सवाल करने लगी. मैं ने भी तो रोहन का घर संभाल लिया है. जैसे मुझे पता है, घर की कौन सी चीज कहां रखी है. यह सोचतेसोचते जाने कब आंख लग गई. सुबह नाश्ते की टेबल पर भैया ने मां के हाथ में रुपए दिए. मां ने आवाज लगाई, ‘‘बहू ये रुपए अलमारी में रख दे,’’ सीमा ने रुपयों से एकाएक नजरें चुरा लीं. शादी से पहले चाबी सीमा के ही हाथ में रहती थी. कुछ दिन मायके में रही. उस की उपस्थिति मात्र मेहमानस्वरूप ही रही. उसे महसूस हुआ, शादी के बाद लड़की ही नहीं, उस की तमाम चीजें शौक, पसंद भी पराए हो जाते हैं. मां, भैया, भाभी ने कुछ और दिन रुकने को कहा पर सीमा टस से मस नहीं हुई. उस के अपने पराए और पराए अपने हो गए थे. अगले दिन रोहन लेने आ गए. बिना किसी मोह, आंसू के सीमा अपने पति के साथ अपने घर चल दी.

लेखिका : अर्चना खंडेलवाल

Love Story : बेवफाई – क्या अतुल ने कल्पना से अपने दिल की बात कही?

Love Story : ‘हाय, पहचाना.’ व्हाट्सऐप पर एक नए नंबर से मैसेज आया देख मैं ने उत्सुकता से प्रोफाइल पिक देखी. एक खूबसूरत चेहरा हाथों से ढका सा और साथ ही स्टेटस भी शानदार…

जरूरी तो नहीं हर चाहत का मतलब इश्क हो… कभीकभी अनजान रिश्तों के लिए भी दिल बेचैन हो जाता है. मैं ने तुरंत पूछा, ‘‘हू आर यू? क्या मैं आप को जानता हूं?’’

‘‘जानते नहीं तो जान लीजिए, वैसे भी मैं आप की जिंदगी में हलचल मचाने आई हूं…’’

‘‘यानी आप कहना चाहती हैं कि आप मेरी जिंदगी में आ चुकी हैं? ऐसा कब हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अभी, इसी पल. जब आप ने मेरे बारे में पूछा…’’

मैं समझ गया था, युवती काफी स्मार्ट है और तेज भी. मैं ने चुप रहना ही बेहतर समझा, तभी फिर मैसेज आया देख कर मैं इग्नोर नहीं कर सका.

‘‘क्या बात है, हम से बातें करना आप को अच्छा नहीं लग रहा है क्या?’’

‘‘यह तो मैं ने नहीं कहा…’’ मैं ने तुरंत जवाब दिया.

‘‘तो फिर ठीक है, मैं समझूं कि आप को मुझ से बात करना अच्छा लग रहा है?’’

‘‘हूं… यही समझ लो. मगर मुझे भी तो पता चले कि आप हैं कौन?’’

‘‘इतनी भी क्या जल्दी है? आराम से बताऊंगी.’’

युवती ने स्माइली भेजी, तो मेरा दिल हौले से धड़कने लगा. मैं सोच में डूब गया कि यह युवती अजनबी है या उसे पहले से जानती है. कहीं कोई कालेज की पुरानी दोस्त तो नहीं, जो मजे लेने के लिए मुझे मैसेज भेज रही है. मुश्किल यह थी कि फोटो में चेहरा भी पूरा नजर नहीं आ रहा था. तभी मेरा मोबाइल बज उठा. कहीं वही तो नहीं, मैं ने लपक कर फोन उठाया. लेकिन बीवी का नंबर देख कर मेरा मुंह बन गया और तुरंत मैं ने फोन काट दिया. 10 सैकंड भी नहीं गुजरे थे कि फिर से फोन आ गया. झल्लाते हुए मैं ने फोन उठाया, ‘‘यार 10 मिनट बाद करना अभी मैं मीटिंग में हूं. ऐसी क्या आफत आ गई जो कौल पर कौल किए जा रही हो?’’

बीवी यानी साधना हमेशा की तरह चिढ़ गई, ‘‘यह क्या तरीका है बीवी से बात करने का? अगर पहली कौल ही उठा लेते तो दूसरी बार कौल करने की जरूरत ही नहीं पड़ती.’’ ‘‘पर आधे घंटे पहले भी तो फोन किया था न तुम ने, और मैं ने बात भी कर ली थी. अब फिर से डिस्टर्ब क्यों कर रही हो?’’

‘‘देख रही हूं, अब तुम्हें मेरा फोन उठाना भी भारी लगने लगा है. एक समय था जब मेरी एक कौल के इंतजार में तुम खानापीना भी भूल जाते थे…’’ ‘‘प्लीज साधना, समझा करो. मैं यहां काम करने आया हूं, तुम्हारा लैक्चर सुनने नहीं…’’

उधर से फोन कट चुका था. मैं सिर पकड़ कर बैठ गया. कभीकभी रिश्ते भी भार बन जाते हैं, जिन्हें ढोना मजबूरी का सबब बन जाता है और कुछ नए रिश्ते अजनबी हो कर भी अपनों से प्यारे लगने लगते हैं. जब अपनों की बातें मन को परेशान करने लगती हैं, उस वक्त मरहम की तरह किसी अजनबी का साथ जिंदगी में नया उत्साह और जीने की नई वजह बन जाता है. ऐसा नहीं है कि मैं अपनी बीवी से प्यार नहीं करता. मगर कई बार रिश्तों में ऐसे मोड़ आते हैं, जब जरूरत से ज्यादा दखलंदाजी बुरी लगने लगती है. प्यार अच्छा है, मगर पजेसिवनैस नहीं. हद से ज्यादा पजेसिवनैस बंधन लगने लगता है, तब रिश्ते भार बन जाते हैं और मन में खालीपन घर कर जाता है. मेरी जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही दौर आया था और इस खालीपन को भरने के लिहाज से उस अनजान युवती का दखल मुझे भाने लगा था. जिंदगी में एक नया अध्याय जुड़ने लगा था. नई ख्वाहिशों की आंच मन में अजीब सी बेचैनी पैदा कर रही थी. एक बार फिर से जिंदगी के प्रति मेरा रुझान बढ़ने लगा. दिलोदिमाग में बारबार उसी लड़की का खयाल उमड़ता कि कब उस का मैसेज आए और मेरी धड़कनों को बहकने का मौका मिले.

‘‘हाय, क्या सोच रहे हो?’’ अचानक फिर से आए उस युवती के मैसेज ने मेरे होंठों पर मुसकान बिखेर दी, ‘‘बस, तुम्हें ही याद कर रहा था.’’

‘‘हां, वह तो मैं जानती हूं. मैं हूं ही ऐसी बला जो एक बार जिंदगी में आ जाए तो फिर दिल से नहीं जाती.’’

मैं यह सुन कर हंस पड़ा था. कितनी सहज और मजेदार बातें करती है यह युवती. मैं ने फिर पूछा, ‘‘इस बला का कोई नाम तो होगा?’’

‘‘हां, मेरा नाम कल्पना है.’’

नाम बताने के साथ ही उस ने एक खूबसूरत सी शायरी भेजी. हसीं जज्बातों से लबरेज वह शायरी मैं ने कई दफा पढ़ी और फिर शायरी का जवाब शायरी से ही देने लगा.सालों पहले मैं शायरी लिखा करता था. कल्पना की वजह से आज फिर से मेरा यह पैशन जिंदा हो गया था. देर तक हम दोनों चैटिंग करते रहे. ऐसा लगा जैसे मेरा मन बिलकुल हलका हो गया हो. उस युवती की बातें मेरे मन को छूने लगी थीं. वह ब ड़े बिंदास अंदाज में बातें करती थी. समय के साथ मेरी जिंदगी में उस युवती का हस्तक्षेप बढ़ता ही चला गया. रोज मेरी सुबह की शुरुआत उस के एक प्यारे से मैसेज से होती. कभीकभी वह बहुत अजीब सेमैसेज भेजती. कभी कहती, ‘‘आप ने अपनी जिंदगी में मेरी जगह क्या सोची है, तो कभी कहती कि क्या हमारा चंद पलों का ही साथ रहेगा या फिर जन्मों का?’’

एक बात जो मैं आसानी से महसूस कर सकता था, वह यह कि मेरी बीवी साधना की खोजी निगाहें अब शायद मुझ पर ज्यादा गहरी रहने लगी थीं. मेरे अंदर चल रही भावनात्मक उथलपुथल और संवर रही अनकही दास्तान का जैसे उसे एहसास हो चला था. यहां तक कि यदाकदा वह मेरे मोबाइल भी चैक करने लगी थी. देर से आता तो सवाल करती. जाहिर है, मेरे अंदर गुस्सा उबल पड़ता. एक दिन मैं ने झल्ला कर कहा, ‘‘मैं ने तो कभी तुम्हारे 1-1 मिनट का हिसाब नहीं रखा कि कहां जाती हो, किस से मिलती हो?’’

‘‘तो पता रखो न अतुल… मैं यही तो चाहती हूं,’’ वह भड़क कर बोल पड़ी थी. ‘‘पर यह सिर्फ पजेसिवनैस है और कुछ नहीं.’’

‘‘प्यार में पजेसिवनैस ही जरूरी है अतुल, तभी तो पता चलता है कि कोई आप से कितना प्यार करता है और बंटता हुआ नहीं देख सकता.’’

‘‘यह तो सिर्फ बेवकूफी है. मैं इसे सही नहीं मानता साधना, देख लेना यदि तुम ने अपना यह रवैया नहीं बदला तो शायद एक दिन मुझ से हाथ धो बैठोगी.’’

मैं ने कह तो दिया, मगर बाद में स्वयं अफसोस हुआ. पूरे दिन साधना भी रोती रही और मैं लैपटौप ले कर परेशान चुपचाप बैठा रहा. उस दिन के बाद मैं ने कभी भी साधना से इस संदर्भ में कोई बात नहीं की. न ही साधना ने कुछ कहा. मगर उस की शक करने और मुझ पर नजर रखने की आदत बरकरार रही. उधर मेरी जिंदगी में नए प्यार की बगिया बखूबी खिलने लगी थी. कल्पना मैसेज व शायरी के साथसाथ अब रोमांटिक वीडियोज और चटपटे जोक्स भी शेयर करने लगी थी. कभीकभी मुझे कोफ्त होती कि मैं इन्हें देखते वक्त इतना घबराया हुआ सा क्यों रहता हूं? निश्चिंत हो कर इन का आनंद क्यों नहीं उठा पाता? जाहिर है, चोरीछिपे कुछ किया जाए तो मन में घबराहट तो होती ही है और वही मेरे साथ भी होता था. आखिर कहीं न कहीं मैं अपनी बीवी से धोखा ही तो कर रहा था. इस बात का अपराधबोध तो मुझे था ही. एक दिन कल्पना ने मुझे एक रोमांटिक सा वीडियो शेयर किया और तभी साधना भी बड़े गौर से मुझे देखती हुई गुजरी. मैं चुपके से अपना टैबलेट ले कर बाहर बालकनी में आ गया. वीडियो डाउनलोड कर इधरउधर देखने लगा कि कोई मुझे देख तो नहीं रहा. जब निश्चिंत हो गया कि साधना आसपास नहीं है, तो वीडियो का आनंद लेने लगा. उस वक्त मुझे अंदर से एक अजीब सा रोमांटिक एहसास हुआ. उस अजनबी युवती को बांहों में भरने की तमन्ना भी हुई मगर तुरंत स्वयं को संयमित करता हुआ अंदर आ गया.

साधना की अनुभवी निगाहें मुझ पर टिकी थीं. निगाहें चुराता हुआ मैं लैपटौप खोल कर बैठ गया. मुझे स्वयं पर आश्चर्य हो रहा था कि ऐसा कैसे हो गया? एक समय था जब साधना मेरी जिंदगी थी और आज किसी और के आकर्षण ने मुझे इस कदर अपनी गिरफ्त में ले लिया था. उधर समय के साथ कल्पना की हिमाकतें भी बढ़ने लगी थीं. मैं भी बहता जा रहा था. एक अजीब सा जनून था जिंदगी में. वैसे कभीकभी मुझे ऐसा लगता जैसे यह सब बिलकुल सही नहीं. इधर साधना को धोखा देने का अपराधबोध तो दूसरी तरफ अनजान लड़की का बढ़ता आकर्षण. मैं न चाहते हुए भी स्वयं को रोक नहीं पा रहा था और फिर एक दिन उस के एक मैसेज ने मुझे और भी ज्यादा बेचैन कर दिया.

कल्पना ने लिखा था, ‘‘क्या अब हमारे रिश्ते के लिए जरूरी नहीं है कि हम दोनों को एकदूसरे को मिल कर करीब से एकदूसरे का एहसास करना चाहिए.’’

‘‘जरूर, जब तुम कहो…’’ मैं ने उसे स्वीकृति तो दे दी मगर मन में एक कसक सी उठी. मन का एक कोना एक अनजान से अपराधबोध से घिर गया. क्या मैं यह ठीक कर रहा हूं?  मैं ने साधना की तरफ देखा.

साधना सामने उदास सी बैठी थी, जैसे उसे मेरे मन में चल रही उथलपुथल का एहसास हो गया था. अचानक वह पास आ कर बोली, ‘‘मां को देखे महीनों गुजर गए. जरा मेरा रिजर्वेशन करा देना. इस बार 1-2 महीने वहां रह कर आऊंगी.’’ उस की उदासी व दूर होने का एहसास मुझे अंदर तक द्रवित कर गया. ऐसा लगा जैसे साधना के साथ मैं बहुत गलत कर रहा हूं और मैं ही उस का दोषी हूं. मगर कल्पना से मिलने और उस के साथ वक्त बिताने का लोभ संवरण करना भी आसान न था. अजीब सी कशमकश में घिरा मैं सो गया. सुबह उठा तो मन शांत था मेरा. देर रात मैं कल्पना को एक मैसेज भेज कर सोया था. सुबह उस का जवाब पढ़ा तो होंठों पर मुसकान खेल गई. थोड़े गरम कपड़े पहन कर मैं मौर्निंग वाक पर निकल गया. लौट कर कमरे में आया तो देखा, साधना बिस्तर पर नहीं है. घर में कहीं भी नजर नहीं आई. थोड़ा परेशान सा मैं साधना को छत पर देखने गया तो पाया, एक कोने में चुपचाप खड़ी वह उगते सूरज की तरफ एकटक देख रही है.

मैं ने उसे पीछे से बांहों में भर लिया. उस ने मेरी तरफ चेहरा किया तो मैं यह देख कर विचलित हो उठा कि उस की आंखों से आंसू निकल रहे थे. मैं ने प्रश्नवाचक नजरों से उस की तरफ देखा तो वह सीने से लग गई, ‘‘आई लव यू…’’

‘‘आई नो डियर, बट क्या हुआ तुम्हें?’’

अचानक रोतीरोती वह हंस पड़ी, ‘‘तुम्हें तो ठीक से बेवफाई करनी भी नहीं आती.’’

‘‘क्या?’’ मैं ने चौंक कर उस की ओर देखा.

‘‘अपनी महबूबा को भला ऐसे मैसेज किए जाते हैं? कल रात क्या मैसेज भेजा था तुम ने?’’

‘‘तुम ने लिखा था, डियर कल्पना, जिंदगी हमें बहुत से मौके देती है, नई खुशियां पाने के, जीवन में नए रंग भरने के… मगर वह खुशियां तभी तक जायज हैं, जब तक उन्हें किसी और के आंसुओं के रास्ते न गुजरना पड़े. किसी को दर्द दे कर पाई गई खुशी की कोई अहमियत नहीं. प्यार पाने का नहीं बस महसूस करने का नाम है. मैं ने तुम्हारे लिए प्यार महसूस किया. मगर उसे पाने की जिद नहीं कर सकता, क्योंकि मैं अपनी बीवी को धोखा नहीं दे सकता. तुम मेरे हृदय में खुशी बन कर रहोगी, मगर तुम्हें अपने अंतस की पीड़ा नहीं बनने दूंगा. तुम से मिलने का फैसला मैं ने प्यार के आवेग में लिया था मगर अब दिल की सुन कर तुम से सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि रिश्तों में सीमा समझना जरूरी है.

‘‘हम कभी नहीं मिलेंगे… आई थिंक, तुम मेरी मजबूरी समझोगी और खुद भी मेरी वजह से कभी दुखी नहीं रहोगी… कीप स्माइलिंग…’’

मैं ने चौंकते हुए पूछा, ‘‘पर यह सब तुम्हें कैसे पता…?’’

‘‘क्योंकि तुम्हारी कल्पना भी मैं हूं और साधना भी…’’ कह कर साधना मुसकराते हुए मेरे हृदय से लग गई और मैं ने भी पूरी मजबूती के साथ उसे बांहों में भर लिया.

आज मुझे अपना मन बहुत हलका महसूस हो रहा था. बेवफाई के इलजाम से आजाद जो हो गया था मैं.

Romantic Story : प्रेम से आजाद – सुमन अपने प्यार से क्या चाहती थी

Romantic Story : ‘‘मैं कौन हूं तुम्हारी?’’ सुमन ने प्रेम से पूछा.

‘‘यह क्या पूछ लिया. मैं तुम से प्यार करता हूं. तुम मुझ से प्यार करती हो,’’ प्रेम ने कहा.

‘‘और घर पर तुम्हारी पत्नी है, बच्चे हैं. फिर मैं क्या लगी रिश्ते में तुम्हारी?’’ सुमन ने थोड़े गुस्से में पूछा.

‘‘क्या प्यार काफी नहीं?’’

‘‘इस प्यार का नाम क्या है?’’

‘‘प्यार का कोई नाम नहीं होता.’’

‘‘होता है. समाज इसे रखैल नाम देता है और मुझे यह नाम स्वीकार नहीं,’’ सुमन ने तेज स्वर में कहा.

‘‘तुम मेरी दूसरी पत्नी भी तो समझ सकती हो खुद को.’’

‘‘पत्नी दूसरीपहली नहीं होती, पत्नी सिर्फ पत्नी होती है. यदि मुझ से प्यार करते हो तो मुझ से शादी करो. नहीं तो इतने दिनों तक जो तुम कर रहे थे मेरे साथ, वह मात्र एक छलावा था प्यार के नाम पर.’’

‘‘यह तुम क्या कह रही हो?’’

‘‘मैं सच कह रही हूं.’’

‘‘लेकिन यह भी एक सच है कि मैं शादीशुदा हूं.’’

‘‘और मैं क्या हूं?’’

प्रेम चुप रहा. उस से जवाब देते न बना. यह उस की गलती थी कि वह शादीशुदा हो कर भी दूसरी स्त्री के चक्कर में पड़ गया. वह घरपरिवार वाला व्यक्ति है. वह दूसरी शादी कैसे कर सकता है? उस के बच्चे क्या सोचेंगे? लोग क्या कहेंगे उसे? स्त्रीलोलुप, लम्पट? शुरूशुरू में तो सब अच्छा लगा, घूमनाफिरना, प्यारभरी बातें करना आदि. उस की पत्नी अपनी घरगृहस्थी व बच्चों में इतनी डूबी हुई थी कि उसे ध्यान भी न रहा कि उस का पति एक पुरुष भी है और पुरुष को घरगृहस्थी के कामों में उलझी हुई पत्नी के अलावा एक ऐसी स्त्री भी चाहिए जो उसे प्यार करे लेकिन दिनभर काम से थकीहारी पत्नी रात को बिस्तर पर पहुंच कर सो जाती. सुबह वही घरगृहस्थी शुरू. पत्नी अपना पत्नीधर्म बखूबी निभा रही थी लेकिन पति का प्रेमी मन प्रेम की तलाश में सुंदरी के आगोश के लिए भटक रहा था. वह हकीकत से दूर कल्पनालोक में विचरने को उत्सुक था. वह प्रेमिका के गजरे में फूल सजाना चाहता था. प्रेमभरी वार्त्ता से मन को बहलाना चाहता था. इसी चाहत में उसे सुमन मिल गई. दोनों एक ही औफिस में काम करते थे. प्रेम सीनियर था सुमन का. दोनों में प्रेम हो गया. जब बात प्रेम से आगे बढ़ कर शादी पर पहुंची तो प्रेम को सचाई बतानी पड़ी.

सुमन गुस्से से उखड़ गई. उस ने प्रेम को बेवफा, धोखेबाज, फरेबी कहा और शादी के लिए दबाव बनाने लगी. सुमन ने कहा, ‘‘तुम मेरा शोषण नहीं कर सकते. अपनी देह की भूख मिटाने के लिए प्यार का स्वांग रचा कर मुझे धोखा नहीं दे सकते. तुम्हें मुझ से शादी करनी ही होगी.’’ प्रेम ने कहा, ‘‘मैं प्यार से इनकार नहीं करता लेकिन शादी संभव नहीं है.’’

‘‘क्यों संभव नहीं है? तलाक दे दो अपनी पत्नी को.’’

‘‘मेरे बच्चे भी हैं,’’ प्रेम ने कातरता से कहा, ‘‘उन का क्या होगा, किस आधार पर तलाक दे दूं, अपनी गलती की सजा अपनी निरपराध पत्नी को कैसे दे दूं?’’

‘‘मेरा क्या होगा, यह नहीं सोचा?’’ सुमन ने गुस्से से कहा, ‘‘अपनी पत्नी और बच्चों की इतनी चिंता थी तो मेरे साथ प्यार का नाटक क्यों किया? अगर तुम ने मुझ से शादी नहीं की तो इस का अंजाम ठीक नहीं होगा. मैं जहर खा कर जान दे दूंगी. तुम्हारे खिलाफ शारीरिक शोषण की रिपोर्ट करूंगी.’’ सुमन की धमकी सुन कर प्रेम अंदर तक कांप गया. वह तनाव में रहने लगा. उस की पत्नी ने कई बार पूछा, ‘क्या बात है? औफिस में कोई परेशानी है?’ वह टालता रहा. कुछ नहीं है, कोई बात नहीं है, कह कर स्वयं को छिपाता रहा. लेकिन जब सुमन का दबाव बढ़ता गया तो मजबूरन उसे अपनी पत्नी को सब बताना पड़ा.

पत्नी पहले तो बहुत नाराज हुई, फिर उसे लगा कि पति पहले से ही परेशान है, ऐसे में उसे कुछ कहना उस की तकलीफ को बढ़ाना है. खुद परेशान हो कर पति को परेशान करने से अच्छा है कि समस्या का समाधान तलाशा जाए. उस ने पति से कहा, ‘‘तुम्हें तलाक चाहिए तो मैं दे दूंगी. अब गलती की है तो भुगतना तो पड़ेगा ही. आप को सोचना चाहिए कि आप शादीशुदा हैं, ऐसे में थानाकचहरी होने से बदनामी होगी, बच्चों पर गलत असर पड़ेगा. बहरहाल, तुम चिंता मत करो, उस से कहो कि तुम तलाक के लिए राजी हो.’’ प्रेम की आंखों में आंसू छलक पड़े. वह अपनी पत्नी से लिपट गया. सुमन को जब प्रेम ने बताया कि उस की पत्नी तलाक देने को राजी है तो वह खुशी से फूली नहीं समाई. लेकिन प्रेम का मुरझाया चेहरा देख कर वह बोली, ‘‘तुम खुश नहीं हो?’’

‘‘कोई गलती कर के खुश कैसे रह सकता है. मेरा तुम से शादी करना प्रायश्चित है और मेरे इस गुनाह की सजा मेरी पत्नी सहर्ष भोगने को तैयार है. मेरे लिए इस से बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है.’’

‘‘तुम अपनी पत्नी पर गर्व कर सकते हो लेकिन मेरे प्रेम का कोई मोल नहीं तुम्हारी नजर में?’’

‘‘मैं तुम से प्रेम करता हूं लेकिन शादी, मैं बदनामी से बचने के लिए कर रहा हूं. मैं नहीं चाहता कि मेरी बदनामी के कारण मेरे बच्चों के भविष्य पर खराब असर पड़े.’’

‘‘तुम्हें अब भी अपनी बीवी की पड़ी है. मैं तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं?’’ ‘‘यदि तुम मेरे लिए कुछ नहीं होतीं तो अपनी पत्नी से तलाक लेने के लिए क्यों कहता, क्यों तुम से शादी करने को राजी होता. यदि तुम मुझ से शादी करने में ही अपनी जीत समझती हो, प्यार को पाना समझती हो तो मैं राजी हूं.’’

‘‘तुम डर कर मुझ से शादी कर रहे हो?’’

‘‘तुम ने डराया तो डरना पड़ा.’’

‘‘तो तुम स्वेच्छा से दिल से शादी को राजी नहीं हो?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तुम्हारी शादी करने की वजह यह है कि मैं तुम्हें अपने शोषण का जिम्मेदार मान रही हूं?’’

‘‘हां.’’

‘‘यदि मैं ने अपनेआप को नुकसान पहुंचा लिया और तुम फंस गए तो तुम्हारी बदनामी तुम्हारे परिवार को सामाजिक रूप से नुकसान पहुंचाएगी?’’

‘‘हां.’’

‘‘इसीलिए तुम्हारी पत्नी ने तुम्हें आजाद कर दिया कि जाओ, जो मरजी करो, लेकिन मेरे बच्चों पर तुम्हारे कर्मों का असर न पड़े?’’

‘‘यही समझ लो.’’

‘‘मुझे तुम्हारी पत्नी की भीख के रूप में अपना प्रेम नहीं चाहिए.’’

‘‘तुम प्यार में छीनना, मिटाना, लूटना तो जानती हो न. मैं तैयार हूं. बोलो कब करनी है शादी?’’

‘‘यह शादी भी तुम अपने परिवार की सुरक्षा के लिए कर रहे हो?’’

‘‘मैं ने तुम्हारा शोषण नहीं किया. इसे मेरा बहकना कह लो. लेकिन धोखा मैं ने नहीं दिया. मैं ने विवाह की मर्यादारेखा लांघी है, इस की सजा मुझे मिलनी ही चाहिए और तुम्हें इंसाफ,’’ प्रेम ने कहा. बात रुक गई. सुमन रातभर सोचती रही. विचारती रही…एक तरफ प्रेम की पत्नी है जो अपने पति और परिवार के लिए अपने पति को तलाक देने पर राजी है. जितना दोषी प्रेम है, क्या वह नहीं है. किसी पुरुष के साथ बिस्तर तक जाने से पहले क्या उस ने उस के विषय में जानकारी ली? फिर विवाह से पूर्व शारीरिक संबंध बनाना, क्या उस का बहकना नहीं था? क्या अकेला प्रेम दोषी था? क्या प्यार छीन कर, डरा कर पाया जा सकता है? यदि प्रेम की जगह कोई और गलत व्यक्ति होता तो इस तरह के संबंधों का गलत फायदा नहीं उठा सकता था उस की बदनामी कर के, उलटेसीधे एमएमएस बना कर? फिर वह क्या करती? कहीं मुंह दिखाने लायक न रहती. मरने की धमकी, रिपोर्ट की धमकी सुन कर प्रेम की पत्नी ने स्त्रीधर्म का पालन भी किया ताकि किसी अन्य स्त्री की जान न जाए, जबकि उस ने मुझे देखा भी नहीं. अपने परिवार की, बच्चों की सुरक्षा के लिए वह अपने पति को तलाक देने को भी तैयार है.

यह महानता प्रेम के दिलोदिमाग में हमेशा रहेगी. क्या मेरे साथ रह कर प्रेम अपनी पत्नी और बच्चों को भूल सकेगा. नहीं, कभी नहीं. फिर इस तरह खंडित प्यार से शादी कर के उसे क्या मिलेगा. पत्नी होने का दंश झेलती रहेगी वह हमेशा. इस भाव से पीडि़त रहेगी कि उस का पति किसी ने उसे उपहार में दिया है. क्या इस शादी का कोई अर्थ रहेगा जिस में पुरुष मात्र अपनी गलती की सजा भोगने के लिए प्रायश्चित्त के लिए शादी कर रहा है. बिना प्रेम बिना त्याग की शादी, बोझ के अलावा कुछ नहीं. एक गलती वह कर चुकी है शादीशुदा व्यक्ति से प्रेम कर के. उस से शादी करना उस की दूसरी सब से बड़ी गलती होगी. प्रेम के साथ वह खुद भी जीवनभर पिसती और तड़पती रहेगी.

सुमन ने दूसरे दिन प्रेम को अपना निर्णय सुनाया, ‘‘मैं तुम्हें आजाद करती हूं अपने प्रेम से, अपनेआप से.’’ प्रेम ने उस की तरफ कृतज्ञता के भाव से देखा और अपने परिवार की तरफ लौट गया. सुबह का भूला शाम को घर आ गया. और सुमन उन रातों को, उन शामों को भूलने लगी जिन में घिर कर उस का पूरा जीवन तबाह हो सकता था, उस के साथ कई अनदेखे जीवन भी झुलस सकते थे.

Shyam Benegal : सिनेमा, सामाजिक व राजनीतिक हालात का चित्रण या एक और नेहरूवियन फिल्मकार

Shyam Benegal : एक बार हार्वर्ड बिजनैस स्कूल के एक इंटरव्यू में श्याम बेनेगल ने कहा था, ‘‘मैं ने हमेशा महसूस किया है कि भारतीय ग्रामीण इलाकों को भारतीय सिनेमा में कभी भी ठीक से प्रस्तुत नहीं किया गया. अगर आप वास्तव में भारतीय मानस को समझना चाहते हैं तो आप को ग्रामीण भारत को देखना होगा.’’

अब आप सोचिए कि श्याम बेनेगल जैसे उच्च शिक्षित फिल्मकार किस तरह के विचार रखते थे. श्याम बेनेगल के यह महज विचार नहीं थे, बल्कि वे इन्हीं विचारों के साथ भारतीय सिनेमा में इन सारी बातों को सदैव रखते थे. उन की डाक्यूमैंट्री हो या एड फिल्म या हो फीचर फिल्म, उन्होंने ग्रामीण व गरीब की बात को सर्वाधिक सशक्त अंदाज में पेश किया.

इन दिनों संविधान का मुद्दा काफी गरमाया हुआ है. जबकि, श्याम बेनेगल ने 2014 में ही ‘संविधान’ नामक 10 एपिसोड का एक सीरियल बनाया था. हर एपिसोड की अवधि 52 मिनट थी. यह सीरियल डाक्यूमैंट्री फौर्म में राज्यसभा टीवी पर 2 मार्च, 2014 से 4 मई, 2014 तक प्रसारित हुआ था. वहीं, श्याम बेनेगल ने 53 एपिसोड का सीरियल ‘भारत एक खोज’ 1988 में बनाया था.

श्याम बेनेगल ने ‘भारत एक खोज’ के माध्यम से भारतीय सिनेमा को नई दिशा दी. ‘भारत एक खोज’ में भी महाभारत की कहानी है, कृष्ण भी है. इस के बावजूद इस में धर्म नहीं बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, पहनावा आदि नजर आता है. उसी दौर में बलदेव राज चोपड़ा उर्फ बी आर चोपड़ा ने ‘महाभारत’ सीरियल को पूरी तरह से धार्मिक अंदाज में पेश किया था. बी आर चोपड़ा की ‘महाभारत’ के किरदार राजा रवि वर्मा के कलेंडर की भांति नजर आते हैं, जबकि श्याम बेनेगल के ‘महाभारत’ के किरदार वैसे नजर नहीं आते. यह है सोच का अंतर. यह है देश की बेहतरीन समझ रखने का नतीजा.

अपनी फिल्मों के माध्यम से उन्होंने एक ऐसा सिनेमा प्रस्तुत किया जो न केवल देश की वास्तविकताओं पर आधारित था बल्कि इस की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक जटिलताओं को भी गहराई से दर्शाता था. उन के कार्यों ने जाति, वर्ग, लिंग और शक्ति के मुद्दों को एक दुर्लभ संवेदनशीलता के साथ संबोधित किया, जिस से दर्शकों को उन के आसपास की दुनिया पर एक निसंकोच नजर डालने का मौका मिला.

श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्मों में महिलाओं को केंद्र में रखते हुए उन्हें सामाजिक मानदंडों को चुनौती देने की अनुमति दी. उन की फिल्मों ने महिलाओं के आंतरिक जीवन, संघर्ष और आकांक्षाओं का पता लगाया, जिन से वे भारतीय सिनेमा में नारीवादी कहानी कहने की अग्रणी बन गईं.

बेनेगल हमेशा महिलाओं को नायक के रूप में चित्रित करने के प्रति दृढ़ संकल्पित रहे. यह वह दौर था जब मुख्यधारा की हिंदी फिल्में अकसर महिलाओं को सहायक पत्नियों, बलिदान देने वाली माताओं या सजावटी प्रेमरुचियों की भूमिकाओं तक सीमित कर देती थीं.

भारतीय सिनेमा की सब से बड़ी कमजोर कड़ी यह है कि हमारे यहां फिल्मकार की बात को गहराई से समझने के बजाय उस की एकदो फिल्में देख कर उसे कई तरह के ‘वाद’ में विभाजित कर देते हैं. श्याम बेनेगल की फिल्म ‘अंकुर’, निशांत’, ‘मंथन’ व ‘भूमिका’ को देख कर उन पर साम्यवादी होने का आरोप मढ़ कर उन्हें एक अलग हाशिए पर डाल दूसरे फिल्मकार खुद मेनस्ट्रीम सिनेमा का अगुआ होने का राग आलापते रहे.

ऐसे लोगों पर कटाक्ष करते हुए मशहूर रंगकर्मी, निर्देशक व कौस्ट्यूम डिजाइनर, जिन्होंने श्याम बेनेगल के सीरियल ‘भारत एक खोज’ के अलावा ‘सरदार पटेल’ व ‘अतर्नाद’ जैसी फिल्मों में कौस्ट्यूम डिजाइनिंग की, कहते हैं, ‘‘क्या गरीबों की बात करना, मजदूरों की बात करना, शोषित व पीड़ितों के सामाजिक मुद्दे फिल्मों में उठाना साम्यवाद है?’’

श्याम बेनेगल को समानांतर सिनेमा या कला सिनेमा का अग्रणी माना गया और बौलीवुड में मेनस्ट्रीम सिनेमा से जुड़े फिल्मकार कला या समानांतर सिनेमा के फिल्मकारों व उन की फिल्मों में अभिनय करने वाले कलाकारों के साथ अछूत जैसा व्यवहार करते रहें. जबकि ऐसे ही मेनस्ट्रीम के फिल्मकारों ने अपनी असफलता को सफलता में बदलने के लिए श्याम बेनेगल द्वारा अपनी फिल्मों के माध्यम से स्टार व लोकप्रिय कलाकार बनाए गए शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी आदि के आगे नतमस्तक होने पर क्यों मजबूर हुए?

श्याम बेनेगल ने अपनी सोचसमझ व विचारों के अनुरूप ही ‘जुबैदा’, कलियुग’ और ‘जुनून’ जैसी फिल्में बनाई, जिन्हें लोग कमर्शियल या यों कहें कि मेनस्ट्रीम सिनेमा मानते हैं, पर उन की नजर में आज भी श्याम बेनेगल कला या सामानांतर सिनेमा के फिल्मकार ही हैं? ऐसा क्यों, इस तरह की सोच के असल में कौन हैं जिम्मेदार? इस पर सभी को सोचविचार करने की जरूरत है.

क्या यह सच नहीं है कि श्याम बेनेगल ने जिन कहानियों को अपने सिनेमा में परोसा उन्हीं कहानियों ने देश की सिनेमाई पहचान को एक नया आकार दिया. श्याम बेनेगल की प्रतिभा को पहचान उन की पहली ही फिल्म ‘अंकुर’ से देखने को मिली जब उन की इस फिल्म के प्रदर्शित होते ही 40 से ज्यादा अवार्ड और 3 राष्ट्रीय पुरस्कारों से इस को नवाजा गया.

कुछ लोग मानते हैं कि श्याम बेनेगल सदैव धारा के विपरीत बहने का प्रयास करते हुए अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल हुए. पर यह बात हमारी समझ से परे है. माना कि 70 के दशक में तथाकथित हिंदी मेनस्ट्रीम सिनेमा खुद को चकनाचूर होते नहीं देख पा रहा था और वह गुस्से से हथियार हाथ में ले चलने लगा था. मगर इस तरह के मेनस्ट्रीम सिनेमा में गीतसंगीत, पेड़ के इर्दगिर्द नृत्य व रोमांटिक कहानियों का चस्का भी परोसा जा रहा था.

इस तरह की फिल्मों में हीरो व हीरोईन चिकनेचुपड़े थे. कुलमिला कर यह सिनेमा ग्रामीण पृष्ठभूमि से परे महानगरी पृष्ठभूमि के करीब था. माना कि एंग्रीयंगमैन के नाम से मशहूर अमिताभ बच्चन सिनेमाप्रेमियों के दिलोदिमाग पर छा चुके थे. पर इस के पीछे प्रचारतंत्र का भी बहुत बड़ा योगदान था.

भारतीय इतिहास में 70 का दशक राजनीतिक अशांति, आर्थिक संघर्ष और तेजी से सामाजिक परिवर्तनों से चिह्नित एक अशांत युग था, तब श्याम बेनेगल ने एक राष्ट्र की अपनी पहचान के साथ आने वाली आकांक्षाओं और चिंताओं को आवाज दी. उन्होंने मेनस्ट्रीम सिनेमा के फिल्मकारों की तरह पलायनवाद का रास्ता नहीं इख्तियार किया.

उसी दौर में डाक्यूमैंट्री व एड फिल्म बनाने में व्यस्त श्याम बेनेगल को एहसास हुआ कि जिस दर्द को वे बचपन से महसूस करते आए हैं वह बेचारगी, ग्रामीणों का शोषण आदि की तो बात न की जा कर सिर्फ सपने बेचे जा रहे हैं. यह सिनेमा हमारे देश की तसवीर पेश करने के बजाय दर्शक और हर आम इंसान को पलायनवादी बना रहा है. तब उन्होंने एक अतिसाधारण कहानी ‘अंकुर’ लिख कर उस कहानी के किरदारों में अनजान चेहरों शबाना आजमी व अनंत नाग को पिरो कर हैदराबाद में जा कर फिल्माया.

श्याम बेनेगल की यह कहानी 1950 के हैदराबाद में घटित एक सत्य घटनाक्रम से प्रेरित होने के साथ ही सामंतवाद की मुखालफत करती है. इस फिल्म के अंत में एक दृश्य है, जिस में एक छोटा बच्चा, सूर्या के घर की कांच की खिड़की पर पत्थर फेंक कर भाग जाता है. इस दृश्य को लोग भुला नहीं पाते.

सत्य घटना पर आधारित फिल्म ‘अंकुर’ मानवी व्यवहार का विश्लेषण करती अति जटिल फिल्म है. कहानी के केंद्र में दो किरदार लक्ष्मी और सूर्या हैं जिन का सामाजिक स्तर विरोधाभासी है. फिल्म में श्याम बेनेगल ने जातिगत मतभेदों, जातिगत पूर्वाग्रहों के साथ ही सामंतवादी सोच व यौन उत्पीड़न के मुद्दे को पूरी गंभीरता से उठाया है.

दलित जाति से संबंध रखने वाली लक्ष्मी (शबाना आजमी) अपने बहरे व गूंगे, शराबी व अतिगरीब कुम्हार पति किश्तय्या (साधु मेहर) के साथ एक गांव में रहती है. लक्ष्मी की अपनी जिंदगी में एकमात्र इच्छा एक बच्चे की मां बनना है. उधर गांव के जमींदार के शहर में पढ़ाई कर वापस लौटे बेटे सूर्या (अनंत नाग) की अपनी समस्याएं हैं.

सूर्या के पिता (खादर अली बेग) की कौशल्या नामक मालकिन है, जिस से उस का नाजायज बेटा प्रताप है. सूर्या के पिता का दावा है कि उन्होंने कौशल्या को ‘गांव की सब से अच्छी जमीन’ प्यार के तोहफे के रूप में दी है. तो वहीं सूर्या को मजबूरन अपना विवाह नाबालिग सारू (प्रिया तेंदुलकर) से इस शर्त पर करना पड़ता है कि जब तक सारू यौवन में नहीं पहुंच जाती वह सारू के साथ यौनसंबंध स्थापित नहीं कर सकता.

सूर्या अनिच्छा से गांव में अपनी जमीन पर बने पुराने घर में अकेले रहने चला जाता है. लक्ष्मी और किश्तय्या उस के नौकर होते हैं. सूर्या पहली मुलाकात में ही लक्ष्मी की ओर आकर्षित होने लगता है और उसे अपना खाना पकाने व चाय परोसने का काम देता है. इस से गांव के पुजारी नाराज होते हैं.

अब तक पारंपरिक रूप से जमींदार को भोजन पहुंचाने का काम पुजारी ही करते रहे हैं. उधर, सूर्या किश्तय्या को अपनी बैलगाड़ी चलाने के लिए रखता है और किश्तय्या की अनुपस्थिति में वह लक्ष्मी संग शारीरिक संबंध स्थापित करता है. गांव में अफवाहें गरम हो जाती हैं कि बेटा सूर्या भी अपने पिता के ही नक्शेकदम पर चल रहा है.

शराबी किश्तय्या ताड़ी चुराते हुए पकड़ कर सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता है. तब वह शर्मिंदगी के चलते गांव छोड़ देता है. अब सूर्या व लक्ष्मी के बीच कोई नहीं रहता. दोनों एकसाथ सोते हैं. कुछ समय बाद सारू अपने पति के साथ रहने के लिए आ जाती है. सारू दलित लक्ष्मी को पसंद नहीं करती और उसे नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा देती है.

सूर्या चुप रहता है क्योंकि गर्भधारण कर चुकी लक्ष्मी सूर्या के कहने पर भी गर्भपात करवाने से इनकार कर देती है. इसी बीच, किश्तय्या शराब की लत को छुड़ा कर वापस आता है, पर सूर्या अपने साथियों की मदद से उस पर कोड़े बरसाता है. लक्ष्मी अपने पति का बचाव करने के लिए दौड़ पड़ती है. वह गुस्से में सूर्या को कोसती है, फिर धीरेधीरे किश्तय्या के साथ घर लौटती है.

अंतिम दृश्य में जब सभी चले जाते हैं, तब एक छोटा बच्चा सूर्या की कांच की खिड़की पर पत्थर फेंकता है और भाग जाता है. यह दृश्य अपनेआप में बहुतकुछ कह जाता है.

निशांतः तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘बैन’ होने से बचाया था

फिल्म ‘अंकुर’ के बाद फिर हैदराबाद की ही एक सत्य घटनाक्रम यानी कि तेलंगाना के 1940 से 1950 के विद्रोह के खिलाफ सामंतवाद की आलोचना करने वाली फिल्म ‘निशांत’ बनाई थी, जिस में उन्होंने सामंतवाद के समय के दौरान ग्रामीण तबके की महिलाओं के यौन शोषण की बात की. जब श्याम बेनेगल ने अपनी इस फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के पास पारित करने के लिए भेजा, तब तक देश में इमरजैंसी लग चुकी थी. उस वक्त सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल थे.

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी कि सैंसर बोर्ड ने ‘निशांत’ को बिना कट के प्रमाणपत्र देने का फैसला कर लिया था. लेकिन इस की भनक सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल तक पहुंच गई. माननीय मंत्री महोदय अपना सारा काम छोड़ कर हवाईजहाज पकड़ कर सीधे मुंबई पहुंच गए और सैंसर बोर्ड फिल्म को पारित किए जाने का प्रमाणपत्र श्याम बेनेगल को सौंपता, उस से पहले ही विद्याचरण शुक्ल ने फिल्म ‘निशांत’ देखी और इसे बैन करने का आदेश दे दिया.

देश में वह राजनीतिक उथलपुथल का दौर था. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इसी के चलते काफी व्यस्त थीं. पर उन्हें जब पता चला कि ‘निशांत’ को बैन कर दिया गया है तो उन्होंने दिल्ली में एक निजी शो में फिल्म को देखा और फिर फिल्म को बैन किए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा था, ‘‘इस से सरकार असंवेदनशील और तुच्छ प्रतीत होती है.’’ उस के बाद ‘निशांत’ पर बैन हट गया था. और श्याम बेनेगल का आत्मविश्वास बढ़ गया था.

मजेदार बात यह है कि बाद में इस फिल्म ने 1977 में हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता. इसे 1976 के कान्स फिल्म महोत्सव में पाल्मे डी’ओर के लिए प्रतिस्पर्धा करने के लिए चुना गया था. 1976 के लंदन फिल्म फैस्टिवल व 1977 के मेलबर्न इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल और 1977 के शिकागो इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में आमंत्रित किया गया था, जहां इसे गोल्डन प्लाक से सम्मानित किया गया था.

फिल्म ‘निशांत’ में जागीरदार व उन के बेटों के अत्याचार का चित्रण है. जागीरदार के बेटों ने प्रथा बना ली है कि वे गांव की किसी भी महिला को अपने साथ सोने के लिए मजबूर कर सकते हैं. गांव के नए टीचर की पत्नी सुशीला को भी वे उठा कर ले जाते हैं और जागीरदार के घर के अंदर उस के साथ हर दिन बलात्कार होता रहता है. शिक्षक पति पुलिस व प्रशासन हर जगह मदद मांगने जाता है, मदद नहीं मिलती, पर वह प्रयास कर सभी पीड़ितों को इकट्ठा करता है. संगठित ग्रामीण अपने उत्पीड़कों का वध करते हैं. ये उन्मादी ग्रामीण निर्दोष रुक्मिणी के साथसाथ सुशीला को भी मार डालते हैं, जिसे खुद उस का पति नहीं बचा पाता.

फिल्म ‘अंकुर’ और ‘निशांत’ की चर्चा करते हुए ब्रिटिश फिल्म और टैलीविजन अकादमी के साथ एक साक्षात्कार में बेनेगल ने कहा था, ‘‘ भारतीय महिला को हमेशा एक पीड़ित के रूप में चित्रित किया गया है. मैं इसे बदलना चाहता था.’’ यह कटु सत्य है. श्याम बेनेगल की फिल्में महिलाओं का अधिक प्रामाणिक प्रतिनिधित्व प्रस्तुत करने में सफल रहीं.

‘मंथन’ में जातिवाद का मुद्दा

इस के बाद श्याम बेनेगल ने 1976 में अमूल नामक दूध सहकारी आंदोलन के वर्गीस कूरियन की सलाह पर नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी, गिरीश कर्नाड और स्मिता पाटिल जैसे कलाकारों को ले कर फिल्म ‘मंथन’ का निर्माण किया, जिस के लिए वर्गीस कूरियन ने 5 लाख डेयरी किसानों से दोदो रुपए एकत्र कर दिए थे.

इस के बावजूद श्याम बेनेगल ने अपनी इस फिल्म में जाति व्यवस्था का अहम मुद्दा उठाया था. 48 साल बाद 2024 में ‘मंथन’ का फिर से कांस फिल्म फैस्टिवल में प्रदर्शन किया गया. इस फिल्म के लिए संयुक्त राष्ट्र ने श्याम बेनेगल और वर्गीज कुरियन को खासतौर पर सम्मानित करने के लिए बुलाया था.

इसे 1977 में हिंदी की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था. इस के साथ ही इस फिल्म के शीर्षक गीत ‘मेरो गाम कथा परे…’ के लिए सिंगर प्रीति सागर को भी फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था.

सामंती पितृसत्तात्मक सोच व जातिवाद का विरोध करती फेमिनिस्ट फिल्म ‘भूमिका’

70 के दशक में भारतीय सिनेमा में पुरुषों और पुरुषप्रधान फिल्मों का वर्चस्व था. यह वह दौर था जब अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, शशि कपूर, धर्मेंद्र, शत्रुघ्न सिन्हा, डैनी जैसे कलाकारों के अभिनय का जलवा था और फिल्मों में महिला पात्र महज शोपीस या ग्लैमरगर्ल मात्र हुआ करती थीं.

ऐसे वक्त में श्याम बेनेगल ने महिलाओं की स्थिति व फेमिनिस्ट सोच वाली फिल्म ‘भूमिका’ बनाई. 11 नवंबर, 1977 को रिलीज हुई यह फिल्म मराठीभाषी अभिनेत्री हंसा वाडकर के जीवन पर लिखी बुक ‘सांगत्ये आइका’ से प्रेरित थी. इस में मराठी अभिनेत्री द्वारा अपनी स्वतंत्रता की खोज के साथ उस की सामाजिक अपेक्षाओं और व्यक्तिगत उथलपुथल का चित्रण किया गया है.

इस फिल्म में स्मिता पाटिल, अमोल पालेकर, अनंत नाग, नसीरुद्दीन शाह और अमरीश पुरी मुख्य किरदार में हैं. फिल्म की कहानी के केंद्र में इतना भर है कि एक नारी के जीवन में किस तरह से पुरुष आते हैं और जिस के चलते उस की जिंदगी में किस तरह के बदलाव आते हैं. किसी कलाकार के अस्तव्यस्त जीवन को ले कर इतनी बेहतरीन बायोपिक फिल्म अब तक कोई अन्य फिल्मकार नहीं बना पाया. यहां तक कि राज कुमार हिरानी ‘संजू’ और दक्षिण में नाग अश्विन ‘महानटी’ में भी फेल हो गए.

‘भूमिका’ फिल्म ने 2 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता. इसे कार्थेज फिल्म फैस्टिवल 1978, शिकागो फिल्म फैस्टिवल में आमंत्रित किया गया था, जहां इसे गोल्डन प्लाक 1978 से सम्मानित किया गया था. 1986 में इसे फैस्टिवल औफ इमेजेज, अल्जीरिया में आमंत्रित किया गया था.

श्याम बेनेगल ने इस फिल्म में जातिवाद और ‘नारी महज भोग्या’ के सिद्धांत का विरोध किया है. तो इस फिल्म में भी सामंती पितृसत्तात्मक सोच का विरोध साफ नजर आता है. फिल्म में पत्नी द्वारा सौतन से कहा गया यह संवाद बहुतकुछ कह जाता है, ‘‘बिस्तर बदल जाते हैं, रसोई बदल जाती है, पुरुषों के मुखौटे बदल जाते हैं लेकिन पुरुष नहीं बदलते हैं.’’

‘भूमिका’ का निर्माण करते हुए श्याम बेनेगल ने बायोपिक फिल्म की शैली यानी कि पारंपरिक उत्थानपतनउदय का पालन नहीं किया. फिल्म में उन के जीवन के प्रमुख घटनाक्रमों का समावेश जरूर है. श्याम बेनेगल ने नारी को उस के हाल पर नहीं छोड़ा है बल्कि फिल्म के अंत में नायिका ऊषा की आंखें जल रही हैं और उस के होंठ एक कड़ी रेखा में खिंचे हुए हैं. वह पूरे दृढ़संकल्प के साथ खुद से वादा करती है, ‘अब मैं वही करूंगी जो मुझे अच्छा लगेगा.’

कोंडराः पितृसत्तात्मक समाज के नैतिक पाखंडों की बात

1978 में आई फिल्म ‘कोंडरा’ पितृसत्तात्मक समाज के सामाजिक और नैतिक पाखंडों की पड़ताल करती है. यहां बेनेगल ने महिलाओं को सौंपी गई प्रतिबंधात्मक भूमिकाओं और पुरुषप्रधान समाजों द्वारा नियंत्रण बनाए रखने के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में हेरफेर करने के तरीकों की आलोचना करने के लिए मिथक और लोककथाओं का उपयोग किया है.

‘कलियुग’ में पूंजीवाद और इंसानी कमजोरी पर प्रहार

1974 से 1980 तक श्याम बेनेगल ने जितनी भी फिल्में बनाईं, सभी फिल्में छोटे बजट की रहीं और इन सभी पर कला या समानांतर सिनेमा का ठप्पा लगता रहा. लेकिन 1981 में श्याम बेनेगल ने ‘कलियुग’ का निर्देशन किया, जिस का निर्माण मेनस्ट्रीम व कमर्शियल सिनेमा के अभिनेता व राज कपूर के भाई शशि कपूर ने किया था. इस फिल्म में राज बब्बर, शशि कपूर, सुप्रिया पाठक, अनंत नाग, रेखा, कुलभूषण खरबंदा, सुषमा सेठ जैसे दिग्गज कलाकारों ने अभिनय किया था.

श्याम बेनेगल ने भले ही शशि कपूर के लिए यह फिल्म बनाई थी मगर इस फिल्म में भी श्याम बेनेगल ने पूंजीवाद और मानवीय कमजोरी पर तीखा प्रहार करते हुए कलियुगी परिवार के बीच कारोबार को ले कर होने वाले विवाद और दुश्मनी की कहानी पेश की. ‘कलियुग’ को फिल्मफेयर का बेस्ट फिल्म अवार्ड मिला. इस के साथ ही ‘कलियुग’ उन 3 भारतीय फिल्मों में से एक थी जिन्हें अकादमी पुरस्कारों में नामित किया गया था.

1982 में प्रदर्शित फिल्म ‘आरोहण’ में किसानों की दुर्दशा का चित्रण किया.

मंडी: सफदेपोश चेहरे हुए बेनकाब

श्याम बेनेगल सिर्फ सभ्य समाज या आम इंसानों तक ही सीमित नहीं रहे. उन्होंने वेश्यायों की जिंदगी पर भी फिल्म बनाई, मगर आम फिल्मों से हट कर. हिंदी सिनेमा में तवायफों के जीवन को हमेशा ही बहुत ग्लैमराइज तरीके से दिखाया जाता रहा है. पर जब श्याम बेनेगल ने 1983 में वेश्यालय पर ‘मंडी’ बनाई तो उन्होंने तवायफों के जीवन के सच के साथ समाज के कई सफेदपोश चेहरों को भी बेनकाब किया.

इस फिल्म में बेनेगल समाज द्वारा अकसर कलंकित और खारिज की जाने वाली महिलाओं का मानवीयकरण कर के दर्शकों को अपने स्वयं के पूर्वाग्रहों और सामाजिक पाखंडों पर सवाल उठाने के लिए मजबूर करते हैं. शबाना आजमी, कुलभूषण खरबंदा, सईद जाफरी, नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी के अभिनय से सजी इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा गया था.

सुस्मानः नारी और आर्थिक चुनौतियां

बेनेगल ने अपनी फिल्मों में नारी के समक्ष आने वाले आर्थिक संकट और सामाजिक चुनौतियों पर भी खुल कर बात की. मसलन, 1987 में प्रदर्शित हथकरघा उद्योग के इर्दगिर्द घूमने वाली कहानी पर आधारित फिल्म ‘सुस्मान’. इस में हथकरघा उद्योग और कारीगरों के संघर्ष की मार्मिक दास्तान है. जबकि फिल्म मुख्यरूप से बुनकरों के आर्थिक शोषण पर केंद्रित है. यह प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच अपने परिवारों और समुदायों को बनाए रखने में महिलाओं की भूमिका पर भी रोशनी डालती है.

इन महिलाओं, जिन्हें अकसर स्वीकार नहीं किया जाता है, को अपने घरों की रीढ़ की हड्डी के रूप में चित्रित किया जाता है, जो श्रम और सामाजिक अपेक्षाओं के दोहरे बोझ से निबटती हैं. यों तो 10 साल पहले फिल्म ‘मंथन’ की श्वेतक्रांति में वे महिलाओं की भूमिका का चित्रण कर चुके थे. यह फिल्म दमनकारी व्यवस्थाओं को चुनौती देने और अपने अधिकारों का दावा करने में उन की सामूहिक शक्ति और लचीलेपन को प्रदर्शित करती है. ‘मंथन’ में नारी सशक्तीकरण के माध्यम से ही सहकारी आंदोलन को गति मिलती है.

सूरज का सातवां घोड़ाः साहित्यिक कहानी, मगर बहुत बड़ा राजनीतिक संदेश

श्याम बेनेगल ने साहित्य से भी परहेज नहीं किया. उन्होंने एनएफडीसी की मदद से धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘द सन्स सेवेंथ हौर्स’ पर आधारित फिल्म ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ बनाई. इस फिल्म में उन्होंने पारंपरिक सिनेमाई संरचनाओं को चुनौती दी. अभिनेता रजित कपूर, रघुवीर यादव, राजेश्वरी सचदेव, अमरीश पुरी, पल्लवी जोशी, नीना गुप्ता जैसे कलाकारों के अभिनय से सजी इस फिल्म ने 1993 में हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता था.

आत्मचिंतनशील शैली की इस फिल्म में कहानीकार मानेक मुल्ला (रजित कपूर) अपने दोस्तों को 3 महिलाओं की 3 कहानियां सुनाता है. जिन्हें वे अपने जीवन में अलगअलग समय पर जानते थे. राजेश्वरी सचदेव (मध्यवर्ग के लिए एक रूपक), पल्लवी जोशी (बौद्धिक और समृद्ध) और नीना गुप्ता (गरीब).

तीनों कहानियां एक ही कहानी के तीन अलगअलग पहलू हैं. इस कहानी में बताया गया है कि सूर्य के रथ को खींचने वाले सात घोड़ों की एक निर्धारित भूमिका तय होती है, लेकिन जो सब से कमजोर माना जाता है, वही भविष्य का प्रतिनिधित्व करता है. यह वही घोड़ा है जो लोगों को जीने की उम्मीद देता है.

श्याम बेनेगल ने ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ के माध्यम से इस बात पर रोशनी डालने का प्रयास किया कि किसी समूह या समाज में सब से निचला, सब से धीमा या सब से कमजोर ही समूह की गति या प्रगति निर्धारित करता है.

सरदारी बेगम: पितृसत्तात्मक समाज में पहचान तलाशती शास्त्रीय गायिका

ठुमरी गायिका के जीवन को चित्रित करती फिल्म ‘सरदारी बेगम’ एक शास्त्रीय गायिका की कहानी है जो कि सामाजिक बंधनों और व्यक्तिगत आकांक्षाओं से जूझती है. वह पितृसत्तात्मक समाज में अपनी अलग पहचान के लिए संघर्ष करती है. फिल्म में पारिवारिक रिश्तों, पीढ़ीगत और यौन राजनीति के साथसाथ सामाजिक रीतिरिवाजों पर भी चोट किया गया है. इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है. फिल्म में किरण खेर, अमरीश पुरी, रजित कपूर और राजेश्वरी सचदेव मुख्य भूमिका में हैं.

‘जुबैदा’: आजादखयालों वाली औरत का दर्द

2001 में श्याम बेनेगल ने फिल्म ‘जुबैदा’ में आजादखयालों वाली औरत की दुखद कहानी को परदे पर उतारा. जिस में प्यार, त्याग और महत्त्वाकांक्षा की एक मार्मिक खोज की गई. करिश्मा कपूर, मनोज वाजपेयी, सुरेखा सीकरी, रजत कपूर, लिलेट दुबे, अमरीश पुरी, फरीदा जलाल और शक्ति कपूर के अभिनय से सजी इस फिल्म को भी राष्ट्रीय पुरस्कार तथा करिश्मा कपूर को फिल्मफेयर अवार्ड मिला था.

इस तरह यदि श्याम बेनेगल की फिल्मों पर नजर दौड़ाई जाए तो एक ही बात उभ कर आती है कि श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्मों के माध्यम से हाशिए पर पड़े व निम्न लोगों को आवाज देने का प्रयास किया. वंचितों और वंचितों के जीवन पर केंद्रित कहानियों के माध्यम से वे आजीवन मुख्यधारा की कहानियों को चुनौती देते हुए विजयी बन कर उभरते रहे.

क्राउडफंडिंग का पहला सफल प्रयोग

इन दिनों ‘क्राउडफंडिंग’ शब्द काफी प्रचलित है. लेकिन सब से पहले श्याम बेनेगल ने ‘क्राउडफंडिंग’ से फिल्म ‘मंथन’ बनाई थी. वैसे उन्होंने ऐसा सीधे तौर पर नहीं किया था. यह फिल्म एनडीटीवी की थी, जिस के लिए दुग्ध व्यापार से जुड़े 5 लाख किसानों ने दोदो रुपए दिए थे. 1976 में दो रुपए की क्या कीमत थी, इस का एहसास किया जा सकता है.

मेनस्ट्रीम के फिल्मसर्जकों की तरह श्याम बेनेगल ने भारत को रोमांटिक बनाने के बजाय पूरे देश को उस के अल्पसंख्यकों और वंचित समुदायों के चश्मे से देखा. उन का सारा ध्यान ग्रामीण भारत, ग्रामीण इलाकों में मौजूद जातिवाद, आम इंसान के शोषण पर था और इसी को उन्होंने अपनी फिल्म में मुद्दा बनाया. उन्होंने वर्ग असमानताओं का एक स्पष्ट चित्रण पेश किया.

तभी एक बार फिल्म समीक्षक चिदानंद दासगुप्ता ने लिखा था, “’सत्यजीत रे के विपरीत, बेनेगल के काम ने जानबूझ कर किसी का पक्ष लिया और पात्रों को उत्पीड़कों और उत्पीड़ितों में विभाजित कर दिया. उन का यथार्थवाद अडिग था और सरलीकृत समाधान पेश करने से इनकार करता था.’’

नेहरूवाद से प्रेरित

बेनेगल की शुरुआती फिल्मों में तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों का चित्रण रहा, जिस के चलते उन पर नेहरूवादी होने के आरोप भी लगे. 1976 में फिल्म ‘मंथन’ ने सहकारी डेयरी आंदोलन का जश्न मनाया. तो वहीं पूरे 20 साल बाद 1996 में आई फिल्म ‘द मेकिंग औफ द महात्मा’ ने दक्षिण अफ्रीका में गांधी के प्रारंभिक वर्षों और उन के अहिंसा के दर्शन के विकास का पता लगाती है. श्याम बेनेगल ने महात्मा गांधी को देवता मानने के बजाय एक ऐसे इंसान के रूप में पेश किया जो उन की परिस्थितियों, व्यक्तिगत संघर्षों और उत्पीड़ितों के साथ बातचीत से आकार लेता है. गांधी की नैतिक दुविधाओं और विकसित होती रणनीतियों पर फिल्म का जोर नेतृत्व में अनुकूलनशीलता और आत्मप्रतिबिंब के महत्त्व पर एक सूक्ष्म टिप्पणी के रूप में भी काम करता है. फिर उन्होंने राजीव गांधी के कार्यकाल में जवाहरलाल नेहरू की किताब ‘द डिस्कवरी औफ इंडिया’ पर आधारित 53 एपिसोड का सीरियल ‘भारत एक खोज’ ले कर आए, जिस में गहराई और निष्पक्षता के साथ भारत के इतिहास का पता लगाया गया.

बेनेगल ने स्रोतसामग्री के प्रति ईमानदारी बरतते हुए भी हुए अंधराष्ट्रवाद को दूर रखा. श्याम बेनेगल ने इस सीरियल को बनाते समय ऐतिहासिक निष्ठा और सामाजिक व राजनीतिक टिप्पणी के बीच संतुलन बरकरार रखा. बौद्ध धर्म के उदय, भक्ति और सूफी आंदोलनों व औपनिवेशिक मुठभेड़ जैसे प्रसंगों की खोज के माध्यम से सीरियल ऐतिहासिक घटनाओं और सांप्रदायिकता, जातिगत भेदभाव और लैंगिक असमानता जैसे समकालीन मुद्दों के बीच समानताएं बनाता है.

अभी भी लैंगिक पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता के मुद्दों से जूझ रहे बौलीवुड में श्याम बेनेगल का सिनेमा सवाल उठाने, चुनौती देने और बदलाव को प्रेरित करने की शक्ति का प्रमाण है. महिलाओं के बारे में अपने सूक्ष्म, सहानुभूतिपूर्ण और निसंदेह ईमानदार चित्रण के माध्यम से बेनेगल ने भारतीय सिनेमा की संभावनाओं को फिर से परिभाषित किया.

उन की फिल्में नारीवादी आख्यानों के लिए एक कसौटी के रूप में काम करती रहती हैं, जिस से यह साबित होता है कि सिनेमा समाज का प्रतिबिंब और इस के परिवर्तन के लिए एक शक्ति दोनों हो सकता है.

उन की फिल्मों की सब से बड़ी खासीयत यह है कि उन की फिल्म की कहानी चाहे ग्रामीण महाराष्ट्र, दक्षिण भारत या गुजरात के बैकड्राप पर हो, पर वह कहानी के अनुसार स्थानीय रीतिरिवाजों, बोलियों और सांस्कृतिक बारीकियों पर सावधानीपूर्वक ध्यान देती है.

यह क्षेत्रीय विशिष्टता उन के आख्यानों में गहराई और यथार्थवाद जोड़ती है. उदाहरण के लिए, ‘मंथन’ में पात्र गुजराती और हिंदी का मिश्रण बोलते हैं, जो क्षेत्र की भाषाई विविधता को दर्शाता है. इसी तरह, ‘कोंडुरा’ में दक्षिण भारत की सांस्कृतिक प्रथाओं और लोककथाओं को कथा में मूल रूप से बुना गया है, जो स्थानीय जीवन की एक समृद्ध टेपेस्ट्री का निर्माण करती हैं.

श्याम बेनेगल ने सत्ता की चाटुकारिता कभी नहीं की. 2015 में उन्होंने कन्नड़ लेखक एम एम कलबुर्गी की हत्या और दादरी मौबलिंचिंग जैसी घटनाओं की निंदा की और असहिष्णुता के खिलाफ एकजुट प्रतिक्रिया का आह्वान किया. 2021 में उन्होंने सिनेमेटोग्राफ अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों की आलोचना की. फिल्म सैंसरशिप में संभावित सरकारी अतिक्रमण की चेतावनी दी. 2024 के अंतिम समय में सरकार ने सैंसर बोर्ड के संदर्भ में उन की ज्यादातर सिफारिशें मान ली हैं.

Rights : जमाना बदल गया

Rights : जिस तरह ससुराल से प्रताड़ित महिला को कानूनों से हक मिले हुए हैं वैसे ही पुरुष को भी मिले हैं, यानी पति भी पत्नी की प्रताड़ना की शिकायत करा सकते हैं मगर दिक्कत उस कानून में है जहां तलाक को बहुत जटिल और थका देने वाला बना दिया गया है, जो अनचाही घटनाओं को जन्म देता है.

अभी हाल ही में बेंगलुरु में एक एआई इंजीनियर द्वारा सुसाइड करने का मामला सामने आया है. 34 साल के अतुल सुभाष ने 9 दिसंबर को 1 घंटे 20 मिनट का वीडियो और 24 पेज का लेटर जारी कर कहा कि उन के पास आत्महत्या करने के सिवा कोई उपाय नहीं बचा है. सुभाष ने पत्नी निकिता सिंघानिया, सास, साले और चचेरे ससुर को मौत का जिम्मेदार बताया.

देश में पत्नियों से प्रताड़ित पतियों की संख्या बढ़ती जा रही है. 2021 के एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक देश में 81,063 विवाहित पुरुषों ने आत्महत्या कर ली वहीं 28,680 विवाहित महिलाओं ने आत्महत्या की. यह भी बताया गया कि साल 2021 में करीब 33.2 फीसदी पुरुषों ने पारिवारिक समस्याओं के कारण और 4.8 फीसदी फीसदी ने विवाह से जुड़े विवाद और घरेलू हिंसा के कारण आत्महत्या कर ली थी.

ज्यादा दूर नहीं, करीब एक या दो पीढ़ी पहले तक, खबर इस के विपरीत थी. दहेज नामक दैत्य ने लड़कियों की जान अपने क्रूर पंजों में दबोच रखा था. दहेज के लिए प्रताड़ित की जाने वाली कहानियां आम थीं. आएदिन स्टोव फटने से बहुओं के मरने की खबर छाई रहती थी. लड़कियां ज्यादातर कम उम्र में ही ब्याह दी जाती थीं, फिर उस का भविष्य पूरी तरह पति नामक परमेश्वर और ससुराल वालों के हाथों में. ससुराल अच्छी मिल गई तो ठीक वरना आजीवन प्रताड़ना. लड़की वाले बेचारे आजन्म बेटी को ले आशंकित रहते और लड़के वाले मूंछों पर ताव. आज भी 60-70 वर्षीय लोग भूले नहीं होंगे उस दौर को.

यों तो कांग्रेस के जमाने में बना दहेज निषेध अधिनियम 1961 देश में लागू था पर यह कारगर नहीं था और ज्यादातर केस सुबूत के अभाव में खारिज हो जाते थे. सताई हुई बेटी या मृत बेटी के मांबाप छाती पीट रह जाते थे. एक अंतहीन दौर था उत्पीड़न का, पानी सिर से ऊपर हो जाने के पश्चात भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए को साल 1983 में इंदिरा गांधी के समय लागू किया गया था. यह धारा विवाहित महिलाओं को उन के पति या उन के रिश्तेदारों से होने वाली क्रूरता और उत्पीड़न से बचाने के लिए बनाई गई थी. यह एक कड़ा कानून था जो भारतीय वधुओं के लिए संजीविनी साबित हुई.

कोख में मारने से बच गई लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान भी दिया जाने लगा और शादी की औसत उम्र भी बढ़ी. 1950 के बाद से ही मुफ्त शिक्षा मिलने से देहात और अंदरूनी क्षेत्रों को छोड़ दें तो शहरों-महानगरों में रहने वाली अधिकांश लड़कियां अब पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपने अधिकारों से बखूबी परिचित भी हैं.

जब सोच बदली तो व्यवहार भी. अब मांग की जा रही है कि उस कानून में थोड़ी ढील की आवश्यकता है. उस कानून को अब हथियार की तरह उपयोग किया जाने लगा है, जिस से वर पक्ष अब खुद को डरा, सहमा और कभीकभी सताया हुआ महसूस करता है. जैसे पहले लड़कियां लोकलाज और संस्कार की वजह से चुपचाप जुल्म सहती रहती थीं, वैसे ही आजकल कई पति भी सहनशील बने रहते हैं.

घरेलू हिंसा के शिकार शादीशुदा पुरुषों द्वारा आत्महत्या किए जाने के मामले से निबटने के लिए सरकार को गाइडलाइंस जारी करने का निर्देश देने की गुहार सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई है. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में इस के लिए राष्ट्रीय पुरुष आयोग बनाने की गुहार लगाई गई है. इस याचिका में एनसीआरबी के आंकड़ों का जिक्र किया गया है.

पति भी कर सकता है शिकायत

शादीशुदा पुरुषों के भी शादीशुदा महिलाओं की ही तरह कई अधिकार होते हैं. यानी जैसे पत्नी अपने पति के खिलाफ शिकायत कर सकती है, ठीक उसी तरह पति भी अपनी पत्नी के सताए जाने की शिकायत कर सकता है. अगर इस तरह के सभी दावे सही निकले तो उसे कोर्ट से न्याय भी दिया जा सकता है.

अच्छा हो कि दंपती आपस में प्यार से सामंजस्य बना कर जीवन का सुख लें. दो पहियों की गृहस्थी की गाड़ी बराबरी के चक्रों के सहारे संतुलन से खींचें न कि खींचखांच कर. जिंदगी छोटी है, न जाने कब शाम हो जाए, सो तब तक जिंदगी में उजालों का रंग भर लिया जाए.

होना तो यह चाहिए कि बजाय पुलिस मामला बनाने के, विवाह संबंध आसानी से तोड़ने का कानून हो. हिंदू विवाह कानून में तलाक का प्रावधान है पर उस में यदि एक पक्ष अड़ जाए तो एक दशक तक का समय तलाक लेने में लग जाता है. इसीलिए पतिपत्नी झगड़ते रहते हैं. कानून के मुताबिक अब पत्नियों का पलड़ा भारी लग रहा है. वैसे कट्टरपंथी औरतों को मिले अधिकारों को छीनना चाहते हैं और न जाने कब भाजपा सरकार किसी बहाने कानून में संशोधन कर औरतों को फिर पति की गुलाम संस्कारों के नाम पर बना दे.

Orissa High Court : शादी का झांसा दे कर सैक्स, रेप है या नहीं

Orissa High Court : ओडिशा हाईकोर्ट ने 24 फरवरी को एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है जिस में एक महिला ने 2021 में एक पुरुष पर 9 साल लंबे चले रिश्ते के बाद शादी के झूठे वादे के आरोप में बलात्कार का केस दर्ज कराया था. महिला का कहना था की उस ने शादी के वादे पर उक्त पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाए.

हाईकोर्ट की सिंगल बैंच के जज संजीव कुमार पाणिग्रही ने कहा कि शादी का झूठा वादा करना नैतिक रूप से गलत हो सकता है, लेकिन यह अपराध नहीं है. जस्टिस संजीव कुमार पाणिग्रही ने कहा कि दोनों पक्ष 2012 में वयस्क और सहमति से रिश्ते में थे. रिश्ते का शादी में न बदलना व्यक्तिगत निराशा का कारण हो सकता है, लेकिन यह अपराध नहीं है.

इस मामले पर पीठ ने दिलचस्प बातें कहीं कि “यौन स्वायत्तता की अवधारणा, एक महिला का अपने शरीर, कामुकता और रिश्तों के बारे में स्वतंत्र फैसले लेने का अधिकार, नारीवादी दर्शन के भीतर निरंतर विवाद का विषय रहा है. पितृसत्तात्मक समाज में विवाह को महज एक औपचारिक कार्य बना दिया गया है, जिस से यह धारणा मजबूत हुई है कि महिला की कामुकता को पुरुष की प्रतिबद्धता से बांधा जाना चाहिए. शादी मंजिल नहीं है, न ही अंतरंगता का पूर्व निर्धारित परिणाम है. दोनों को मिलाना मानवीय रिश्तों को पुरातन अपेक्षाओं में कैद करना है.”

कोर्ट ने आगे कहा, “नारीवादी दर्शन ने अपेक्षाओं के अत्याचार के खिलाफ लंबे समय से लड़ाई लड़ी है. यह गलत धारणा है कि एक महिला की भावनाएं केवल तभी वैध हैं जब वह विवाह से बंधी हो.” कोर्ट ने इस दौरान एक किताब का भी जिक्र किया. कोर्ट ने कहा, “सिमोन डी ब्यूवोइर ने अपनी किताब द सैकंड सैक्स में इस अपेक्षा में निहित अधीनता का जिक्र किया है. यह अनुमान कि एक महिला केवल विवाह की प्रस्तावना के रूप में अंतरंगता में संलग्न होती है, कि एक कार्य के लिए उस की सहमति दूसरे के लिए एक मौन प्रतिज्ञा है, पितृसत्तात्मक विचार का अवशेष है, न्याय का सिद्धांत नहीं.”

इस मामले में कोर्ट का दो टूक मानना है:

“कानून हर टूटे वादे की सुरक्षा नहीं करता.”
“प्यार का असफल होना अपराध नहीं है और निराशा को धोखाधड़ी में नहीं बदला जा सकता.”

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