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मुक्केबाजी की रिंग से गृहस्थी के घेरे में मनोज कुमार

भारत के नामचीन मुक्केबाज मनोज कुमार ने जब दिल्ली प्रैस को अपना पहला इंटरव्यू दिया था तब वे सरकार से ‘अर्जुन अवार्ड’ पाने के सिलसिले में अदालत का रुख कर चुके थे. बाद में वे इस लड़ाई में जीते भी थे और तब जजों ने इस बात पर अफसोस जताया था कि किसी खिलाड़ी को सरकारी सम्मान पाने के लिए इस तरह से अदालत की शरण लेनी पड़ी.

तब ओलंपियन मुक्केबाज मनोज कुमार ने कहा था कि अपने हक को पाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं. फिलहाल मनोज कुमार अपने खेल की वजह से सुर्खियों में नहीं हैं बल्कि अब वे मुक्केबाजी के घेरे से निकल कर शादी के बंधन में बंधने वाले हैं.

11 अक्टूबर, 2108 को वे हरियाणा के जिले कुरुक्षेत्र के एक गांव मथाना की नेहा के साथ परिणय सूत्र में बंधेंगे. नेहा के घर और मनोज के आवास पर इस शादी की तैयारियां जोरों से चल रही हैं.

मनोज कुमार के साथ वैवाहिक बंधन में बंधने वाली नेहा एक साधारण परिवार की लड़की हैं. उन्हें छोटे बच्चों को पढ़ाने में दिलचस्पी है और यही वजह है कि उन्होंने जेबीटी की पढ़ाई की है. इस के अलावा वे पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री भी हासिल कर चुकी हैं.

मनोज कुमार से जब उन की भावी जीवनसाथी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि शादी के लिए उन्हें सुशील, सादगी से भरी व गुणवान लड़की चाहिए थी, इसलिए उन के परिवार ने नेहा को चुना. नेहा की सब से बड़ी खासीयत यह है कि वे हमेशा गरीब बच्चों को शिक्षित करने के लिए तत्पर रहती हैं.

जब मनोज कुमार से टेलीफोन पर बात की गई तो उन्होंने बताया, “मेरे घर वालों ने नेहा को पसंद किया है. उन के और मेरे परिवार के संस्कार एक जैसे हैं. मुझे उम्मीद है कि उन का यह फैसला मेरी पूरी जिंदगी के लिए सही रहेगा.

“जब कोई इंसान बड़ा हो जाता है तो वह किसी बड़े परिवार में ही रिश्ता जोड़ना चाहता है. पर मेरे लिए बड़े परिवार से ज्यादा अहम है संस्कारी परिवार, क्योंकि मैं खुद एक संस्कारी परिवार से ताल्लुक रखता हूं. मैं तो नेहा से एक बार भी नहीं मिला हूं. फोन बात हुई थी बस थोड़ी देर के लिए.”

विवाह के 2 दिन बाद यानी 13 अक्टूबर, 2108 को रिसेप्शन पार्टी होगी. मनोज कुमार के आदर्श, कोच और बड़े भाई राजेश कुमार ने बताया कि इस वैवाहिक समारोह में मुख्य रूप से राज्यसभा सदस्य व पद्मश्री मुक्केबाज एमसी मैरी कौम,  विजेंदर सिंह, अमित पंघाल, सतीश यादव, पहलवानों में सुशील कुमार, योगेश्वर दत्त, बजरंग पूनिया, मौसम खत्री, विनेश फोगाट, एथलीट नीरज चोपड़ा,  द्रोणाचार्य अवार्डी मुक्केबाज कोच गुरबक्श सिंह संधू, फिल्म कलाकार बिंदु दारा सिंह, प्रवीण डबास, संग्राम सिंह, द ग्रेट खली, राजा चौधरी, आशुतोष राणा सहित कई अन्य जानीमानी हस्तियां नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद देने पहुंचेंगी.

अपने छोटे भाई के इस गठबंधन से खुश बड़े भाई राजेश कुमार ने बताया कि मनोज को खीर सब से ज्यादा पसंद है इसलिए शादी में उस की पसंदीदा खीर जरूर बनाई जाएगी.

मनोज कुमार की होने वाली जीवन संगिनी नेहा के पिता पृथ्वी सिंह शुगर मिल करनाल से रिटायर हो चुके हैं और अब खेतीबारी का काम भी करते हैं. उन का बेटा वीरेंद्र हरियाणा पुलिस में है.

हरियाणा के मुक्‍केबाजों में मनोज एक चमकते हुए सितारे हैं. साल 2010 में वे दिल्ली कामनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीते चुके हैं. साल 2018 के गोल्ड कॉस्ट के कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने ब्रांज मेडल जीता था. 2007 में मंगोलिया में हुई  मुक्केबाजी की एशियन चैंपियनशिप में ब्रांज मेडल अपने नाम किया था. 2013 जॉर्डन में हुई एशियन चैंपियनशिप में ब्रांज मेडल, साउथ एशियन गेम्स 2016 में गोल्ड मैडल जीता था.

किसान आंदोलन खत्म पर 2019 चुनाव की उलटी गिनती शुरू

पिछले दिनों दिल्ली बौर्डर पर किसानों के साथ जितनी ज्यादती केंद्र सरकार द्वारा की गई उसे पूरा भारत देख रहा था. पर चूंकि 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं, महंगाई चरम पर है, सरकार किसानों को नाराज करना नहीं चाहती.

न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी

किसानों की कुछ अहम मांगों को छोड़ कर मोदी सरकार मंत्रिमंडल ने 2018-19 विपणन वर्ष के लिए गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 105 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी कर इसे 1, 840 रुपए प्रति क्विंटल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को रबी फसलों के एमएसपी को मंजूरी दी गई. फसल वर्ष 2017-18 में गेहूं का समर्थन मूल्य 1,735 रुपए प्रति क्विंटल था.

समर्थन मूल्य कृषि सलाहकार निकाय सीएसीपी की सिफारिशों के अनुसार बढ़ा दिया गया है. यह फसलों के उत्पादन लागत से कम से कम 50% ऊंचा मूल्य दिलाने के सरकार की घोषणा के अनुरूप है.

कृषि मंत्री ने कहा

कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कैबिनेट बैठक के बाद कहा कि गेहूं की कीमत 1,840 रुपए प्रति क्विंटल, चना 4,620 रुपए, मसूर 4,475 रुपए तथा सरसों की कीमत 4,200 रुपए प्रति क्विंटल तय की गई है.  रबी फसलों के समर्थन मूल्य में वृद्धि से किसानों को 62, 635 करोड़ रुपए की अतिरिक्त आय होगी.

इस बार समर्थन मूल्य में पिछले साल की तुलना में 105 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है. चने का उत्पादन लागत मूल्य 2,637 रुपए प्रति क्विंटल है, वहीं इस के समर्थन मूल्य में 75% की वृद्धि की गई है. अगर तुलना करें तो पिछले साल के मुकाबले इस बार 220 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है.

आंदोलन खत्म पर पूरी तरह नहीं

बहरहाल, सरकार की घोषणा से किसानों ने आंदोलन खत्म कर दिया है पर एक अहम सवाल यह भी है कि मोदी सरकार ने यह सुधार किसान आंदोलन के बाद ही क्यों किया?

जिस देश की लगभग 75% की आबादी कृषि उत्पादन और व्यापार पर तरक्की कर रही है, उसी कृषि क्षेत्र और किसानों की अनदेखी सरकार क्यों कर रही है?

मालूम हो कि गन्ने के समर्थन मूल्य पर सरकारी उदासीनता से देश के कई किसानों की जमापूंजी तक नहीं निकल पाई थी. घाटा हुआ तो सेठ साहुकार से लिए उधार पैसे लौटाने में नाकाम रहे कई किसानों ने आत्महत्या तक कर ली थी.

सुखद है कि केंद्र सरकार ने किसानों की अधिकतर मांगें मान ली हैं पर अगर शुरूआती दौर में सरकार ने यह किया होता तो न सिर्फ फसल का उत्पादन और अधिक होता, बल्कि किसानों के चेहरों पर भी खुशी झलक रही होती.

भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने कहा है कि केंद्र सरकार किसान विरोधी है और किसानों के हितों के लिए संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार किसानों को मूलभूत सुविधाएं नहीं दे देती.

नेताओं के बोल

उधर बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी केंद्र सरकार पर आरोप लगाया और कहा कि मंहगाई रोकने में नाकाम रही मोदी सरकार किसानों को पिटवा रही है. दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली सबकी है और अगर किसान दिल्ली में घुसना चाह रहे थे तो उन्हें आने देना चाहिये था.

हैरतंगेज एक्शन दृश्य से भरपूर “मणिकर्ण‍िका : द क्वीन औफ झांसी” का टीजर रिलीज

कंगना रनौत की आने वाली फिल्म “मणिकर्ण‍िका : द क्वीन औफ झांसी” का टीजर र‍िलीज हो गया है. कृष द्वारा निर्देशित, जी स्टूडियो और कमल जैन द्वारा निर्मित “मणिकर्ण‍िका : द क्वीन औफ झांसी” 25 जनवरी, 2019 को दुनिया भर में रिलीज होगी.

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यह फिल्म एक साहसी और निडर महिला की जीवन यात्रा बताती है जो आजादी के लिए लड़ी थी. टीजर में कंगना रानौत का जबरदस्त एक्शन अवतार देखने को मिल रहा है. दो मिनट के टीजर की शुरुआत अमिताभ बच्चन की दमदार आवाज से होती है. वो कहते हैं, “भारत वर्ष, महान सभ्यता जहां मिट्टी भी सोना थी. द‍िलों के दरवाजे हर मेहमान के लिए खुले थे. एक द‍िन इन्हीं दरवाजों से घुस आए कुछ क्रूर शैतानी इरादे. तब इस मिट्टी के गर्भ से उठ खड़ी हुई मणिकर्ण‍िका.

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फिल्म के आधिकारिक टीज़र को प्रशंसकों से शानदार प्रतिक्रिया मिली है. टीज़र को 24 घंटे में 12 मिलियन से अधिक व्यूज मिले हैं. फिल्म में सर्वश्रेष्ठ तकनीशियनों ने काम किया है. मशहूर संगीत तिगड़ी शंकर एहसान लौय ने गीतकार प्रसून जोशी के लिखे गीतों को संगीतबद्ध किया है. इतना ही नहीं, हौलीवुड के जाने माने एक्शन कोरियोग्राफर निक पौवेल ने फिल्म में एक्शन दिया है.

टीज़र के बारे में बात करते हुए ज़ी स्टूडियो के मुख्य कार्यकारी अधिकारी शरीक पटेल ने कहा, ” यह फिल्म रानी लक्ष्मी बाई को हमारी और से श्रद्धांजलि है, यह फिल्म भारत की महान योद्धा रानी की असाधारण यात्रा वर्णन करती है और उन्हें सलाम करती है, जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए अपनी जिंदगी का त्याग किया. दर्शकों द्वारा टीज़र को मिल रहे प्यार और प्रशंसा के लिए हम उनके आभारी हैं.”

कंगना ने अपने किरदार को रि‍यल दि‍खाने के लिए कड़ी मेहनत की है. टीजर से पहले कंगना के कई लुक जारी किए गए थे. फिल्म रिलीज से पहले कई विवादों में भी फंस चुकी है. कंगना पर फिल्म में दखलंदाजी का आरोप लगा साथ ही कुछ कारणों से सोनू सूद ने फिल्म को बीच में ही छोड़ दिया था.

देखें टीजर:

अब दलित बसपा को वोट क्यों देगा

एक अक्तूबर को इलाहाबाद हाइकोर्ट का एक अहम फैसला आया था जिसमें मुख्य न्यायाधीश डीबी भोंसले और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने वह याचिका खारिज कर दी थी जिसमें 1400 करोड़ के स्मारक घोटाले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की गई थी. याची शशिकांत पाण्डेय की याचिका कोर्ट ने यह कहते खारिज की थी कि यह व्यक्तिगत हित में दाखिल की गई है. गौरतलब है कि बसपा प्रमुख मायावती के कार्यकाल में हुये इस भीमकाय घोटाले में शशिकांत का भाई संतोष पाण्डेय भी शामिल है.

मायावती इस घोटाले में भले ही आरोपी न हों लेकिन वे भी जांच के दायरे में आ सकतीं थीं बशर्ते योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार कोर्ट को यह भरोसा न दिलाती कि इस घोटाले की जांच सीबीआई या किसी दूसरी एजेंसी से कराने की कोई जरूरत नहीं क्योंकि स्मारक घोटाले की विजिलेन्स जांच तेजी से चल रही है और जल्द ही इसे पूरा भी कर लिया जाएगा. गौरतलब यह भी है कि अपने मुख्यमंत्री रहते मायावती ने लखनऊ और नोएडा में कई स्मारक और पार्क बनवाए थे जिन पर सरकार ने कोई 41 अरब 48 करोड़ रुपये खर्च किए थे. तब मायावती सरकार पर घपले घोटाले का आरोप लगा था लेकिन सरकार बदलने के बाद इस मामले की जांच तत्कालीन लोकायुक्त एनके मल्होत्रा को सौंपी गई थी.

लोकायुक्त ने 20 मई 2013 को अपनी रिपोर्ट में कहा था कि हां, 14 अरब 10 करोड़ 83 लाख और 43 हजार रुपये का घोटाला हुआ है. इस रिपोर्ट में कुल 199 लोगों को आरोपी बनाया गया था और विस्तृत जांच की मांग सीबीआई या एसआईटी से कराने की सिफारिश की गई थी. अखिलेश यादव सरकार ने लोकायुक्त की सिफारिशों को दराज में रखते हुये जांच राज्य के विजिलेन्स विभाग को सौंप दी थी. विजिलेन्स ने 1 जनवरी 2014 को लखनऊ के गोमती नगर थाने में एफआईआर दर्ज की थी और मामला दर्ज होने के पोने पांच साल बाद भी न तो इसमें चार्जशीट दाखिल हुई और न ही विजिलेन्स जांच पूरी कर पाया.

घोटाले का एमपी कनेकशन

फिर भाजपा सत्ता में आई और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने तो पुराने मामले खंगाले जाने लगे, इसके पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा जिस ऐतिहासिक दुर्गति का शिकार हुई वह किसी सबूत की मोहताज नहीं. दुर्गति का यह सिलसिला विधानसभा चुनाव में भी दिखा तो जानकारों ने मान लिया कि बसपा गुजरे कल का नाम है जिसका परम्परागत दलित वोट उसके हाथ से छिटक चुका है और मायावती दलित समुदाय का भरोसा खो चुकीं हैं.

फूलपुर, गोरखपुर और कैराना लोकसभा उपचुनाव भाजपा हारी तो बसपा में फिर जान आती दिखी. सपा और कांग्रेस के साथ उसके महागठबंधन की जमकर चर्चा हुई और यह भी साबित हो गया कि भाजपा को बेदखल करना है तो पूरे विपक्ष को एकजुट होना पड़ेगा. कर्नाटक विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद मायावती में फिर जोश दिखा और वे विपक्षी एकता की अहम धुरी बन गईं. इस संभावित महागठबंधन से भाजपा का बौखलाना और चिंतित होना स्वभाविक बात थी क्योंकि मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में बसपा कांग्रेस गठबंधन की चर्चा कुछ ऐसे हो रही थी मानो आजकल में यह हो ही जाएगा.

राजनैतिक विश्लेषकों ने तो बाकायदा नतीजे से भी घोषित करना शुरू कर दिये थे कि अगर बसपा कांग्रेस गठबंधन हुआ तो उसे सत्ता में आने से कोई नहीं रोक सकता. वजह बसपा का मध्यप्रदेश के विंध्य और चंबल इलाकों की कोई 60 सीटों पर गहरा प्रभाव है और भाजपा विरोधी वोट कांग्रेस और बसपा में बटने से भाजपा को 40 सीटों पर फायदा होता है , बसपा 2013 के चुनाव में 4 सीटों पर जीती थी और 10 पर दूसरे नंबर पर रही थी इसके अलावा वह 30 सीटों पर खासे वोट ले गई थी. अब अगर गठबंधन हुआ तो भाजपा को 230 सीटों में से 100 पर भी जीत पाना दुश्वार हो जाएगा.

राजनीति के इन गणितीय सूत्रों और प्रमेयों से परे देश और समाज के हालात तेजी से बदले. सुप्रीम कोर्ट के एट्रोसिटी एक्ट पर आए फैसले से दलित गुस्सा हो उठे. अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बिना जांच के सवर्णों की गिरफ्तारी के प्रावधान को रद्द कर दिया था. इस फैसले के विरोध में दलितों ने 2 अप्रैल को बंद का ऐलान किया था जिसका सबसे ज्यादा असर भी मध्यप्रदेश में देखने में आया था. 2 अप्रैल की हिंसा में कोई दर्जन भर दलित और गैरदलित मारे गए थे.

इस दलित जागृति या चेतना से हर कोई हतप्रभ था. दलितों ने बगैर किसी लागलपेट के सुप्रीमकोर्ट के फैसले का जिम्मेदार केंद्र सरकार को मानते उसे न केवल मनुवादी करार दिया था बल्कि यह भी याद दिलाया था कि साल 2014 में भाजपा दलित वोटों की सीढ़ियों पर चढ़कर सत्ता की छत तक पहुंची थी. बात सच भी थी और दलित हिंसा के फिर भड़कने का अंदेशा था इसलिए केंद्र सरकार ने संसद में पुराने कानून को पारित कर दिया.

इस पूरे घटनाक्रम में मायावती कहीं नहीं थीं. इस स्वस्फूर्त आंदोलन या बंद में दलितों ने अपने हक की लड़ाई खुद लड़ी थी लेकिन मायावती दलितों की जीत का श्रेय खुद को देती रहीं जिस पर दलितों ने कोई तब्ज्जुह नहीं दी क्योंकि हकीकत वे जानते थे.

संसद में सरकार के घुटने टेकने के बाद भड़कने की बारी सवर्णों की थी जो भाजपा को अपनी पार्टी समझते रहे थे. जल्द ही सवर्ण भी सड़कों पर आ गए और एट्रोसिटी एक्ट के विरोध में बंद का आहवान करने लगे, उनका बंद भी सफल रहा लेकिन सरकार अब दलितों और सवर्णों के बीच फंस चुकी थी. इसी बिगड़ते सामाजिक माहौल में हर किसी ने याद दिलाया कि एट्रोसिटी एक्ट में गिरफ्तारी के प्रावधान में सबसे पहली ढील दलितों की मसीहा कही जाने बाली मायावती ने ही अपने मुख्यमंत्री रहते दी थी तो दलितों का उनसे बचाखुचा मोह भी भंग हो गया.

जब गठबंधन की बात चली तो मायावती फिर मुख्यधारा में आती दिखाईं दीं क्योंकि दलित समुदाय को एक मजबूत राजनैतिक सहारे और सरपरस्ती की जरूरत महसूस होने लगी थी जो उसे इस गठबंधन में दिख रहा था लेकिन जाने क्यों भाजपा बेफिक्र थी और उसके दिग्गज नेता नरेंद्र मोदी, अमित शाह और शिवराज सिंह चौहान हर कभी कहते भी रहे थे कि यह गठबंधन नहीं होगा. भाजपा से नाराज सवर्ण समाज जातिगत आरक्षण को भी खत्म करने की मांग बड़े पैमाने पर करने लगा था.

भाजपा नेताओं की भविष्यवाणी सही निकली. छत्तीसगढ़ में मायावती ने कांग्रेस से निकाले गए पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जनता कांग्रेस से गठबंठन किया तो मध्यप्रदेश और राजस्थान में बसपा कांग्रेस के गठबंधन पर विराम लग गया और यह स्पष्ट हो गया कि दोनों पार्टियां अपनी रोटियां अलग अलग सेकेंगी जिसका फायदा पहले के चुनावों की तरह भाजपा को मिलेगा.

लेकिन यह किसी को समझ नहीं आ रहा था कि गठबंधन की राह पर निकल पड़ीं मायावती हिचक क्यों रही हैं. इस सवाल का एक जबाब इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के वक्त मिला कि क्यों योगी सरकार ने स्मारक घोटाले के सीबीआई जांच की मांग अदालत में नहीं उठाई थी. सौदेबाजी में माहिर मायावती ने कोई डील अगर भाजपा से की है तो तय है वह दलितों के हितों को ताक में रखकर की है जिसे जागरुक होता दलित समाज भी समझ रहा है और खुद मायावती को भी समझ आ रहा है कि मध्यप्रदेश में बसपा का प्रदर्शन चुनाव दर चुनाव गिर रहा है.

दिग्गज कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने मायावती की इसी दुखती रग पर हाथ यह कहते रखा कि वे सीबीआई जांच से डर रहीं हैं तो मायावती शेरनी की तरह बिफर पड़ीं और कांग्रेस पर ही आरोप लगाने लगीं कि वह बसपा को खत्म करना चाह रही है और भाजपा का साथ दे रही है. बसपा अपने उसूलों और गैरत से कोई समझौता न  करते अकेले की दम पर लड़ेगी.

मायावती के इन तेवरों से भाजपा और सवर्ण खुश हैं कि कांग्रेस की सत्ता वापसी का ट्रम्प कार्ड जाया हो गया लेकिन दलित समुदाय फिर गफलत में है कि अब क्या किया जाए, अगर भाजपा फिर से सत्ता में आई तो सवर्ण उसकी मिट्टी कूट देंगे.

कभी मायावती और बसपा के संस्थापक कांशीराम के बेहद नजदीकी रहे बहुजन संघर्ष दल के मुखिया फूल सिंह बरैया कहते हैं असल गलतफहमी और गुरूर तो मायावती को है कि दलित वोटर अब भी उनके साथ है. मध्यप्रदेश में बसपा के पास अब जमीनी नेता तो दूर की बात है प्रतिबद्ध कार्यकर्ता भी नहीं बचे हैं. फूल सिंह यह भी कहते हैं कि मायावती तो कब की मनुवादियों के हाथ की कठपुतली बन चुकी हैं इसीलिए उत्तरप्रदेश में उनका सूपड़ा साफ हो चुका है, अब तो वे नाम की खा रही हैं और दलित हितों से खिलवाड़ कर रही हैं.

बकौल फूलसिंह दलित समुदाय बैचेन है, ऐसे में हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर बसपा का वोट घटकर 2 फीसदी रह जाये. छतीसगढ़ में अजीत जोगी अपने दम पर कुछ सीटें ले भी जाते, लेकिन मायावती का दामन थामकर उन्होंने खुद अपनी संभावनाओं को खत्म कर लिया है. आज जिन दिग्विजय सिंह पर मायावती बरस रही हैं उन्हीं दिग्विजय के साथ उन्होंने साल 2003 में सौदा किया था जिसने बसपा और कांग्रेस दोनों को मिटा दिया था. कोई वजह नहीं कि दलित समुदाय मायावती पर दोबारा भरोसा करेगा. वह जान और समझ रहा है कि अब बसपा अपने सिद्धांतों को झटक चुकी है जिससे मध्यप्रदेश राजस्थान और छतीसगढ़ में दलित खुद को असुरक्षित समझ रहा है.

इधर कांग्रेस तेल देखो और तेल की धार देखो की तर्ज पर सब्र और समझ से काम लेते अभी भी गठबंधन की उम्मीद जता रही है तो उसका मकसद दलित वोटर को यह मेसेज देना है कि वह तो भाजपा को हराने कमर कसकर तैयार है, लेकिन मायावती ही गठबंधन नहीं कर रहीं तो दलित समुदाय खुद ही तय कर ले कि उसका भला कौन कर सकता है. वह बसपा जो पूरी दम लगाने के बाद भी 2013 में चार से ज्यादा सीटें नहीं जीत पाई थी या फिर कांग्रेस जो तीनों राज्यों में सबसे बड़ी पार्टी है. सवर्णों ने सपाक्स नाम की पार्टी बना ली है जो भाजपा का वोट बेंक था अब अगर दलित वोट भी बंटा तो उत्तरप्रदेश में बैठी मायावती का तो कुछ नहीं बिगड़ना, घाटे में रहेगा तो दलित जिसकी हिफाजत बसपा नहीं कर सकती मायावती तो खुद की हिफाजत में लगी हैं और 2019 में भगवा खेमे से उपप्रधान मंत्री बन जाने का सपना पाल बैठी हैं.

छत्तीसगढ़ की संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पटल पर स्थापित करना चाहता हूं : आनंद कुमार

अम्बिकार /भारतीय सिनेमा के क्षेत्र में एक सशक्त निर्माता और अभिनेता के रूप में उभर रहे आनन्द कुमार अब किसी परिचय के मोहताज नही हैं . पिछले 22 वर्षों से नुक्कड़ नाटक के माध्यम से करोंड़ो लोगों को अपना संदेश दे चुके आनन्द इन दिनों अपनी नई फिल्म ”आइ एम नाट ब्लाईडं” ओनली माई आईज कान्ट सी को लेकर देश विदेश में चर्चा में है.

एक अंधे व्यक्ति के आई.ए.एस. बनने की सफलता की कहानी पर आधारित यह फिल्म दिव्यांगजनों को हौसला प्रदान करेगा. यह फिल्म माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेद्र मोदी जी के सपनों को साकार करने वाली फिल्म है.

मदारी आर्ट्स द्वारा बनाई गई फिल्म लंगड़ा राजकुमार को राष्ट्रीय, अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार मिल चुका है. इसी तरह डाक्यूमेन्ट्री फिल्म ”स्वयं बीइगं माई सेल्फ” साक्षर भारत एक नई रौशनी, लघु फिल्म, हेल्प टु अदर, डोंट से अगेन, डोंट से लंगड़ा, पागल, हैण्डपम्प को राष्ट्रीय स्तर पर एन.एफ.डी.सी. द्वारा पुरूस्कृत किया गया है.

पिछले 20 वर्षों से ज्यादा समय से नुक्कड नाटक और फिल्मों से जुडे़ ”नुक्कड के महानायक” के नाम से मशहूर आनन्द कुमार सशक्त सिनेमा की नई पहचान के रूप में उभर रहे हैं. फिल्म लंगड़ा राजकुमार में गरीब मजदूर और आइ एम नाट ब्लाइंड में ब्लांइड व्यक्ति की भूमिका से आनन्द के सशक्त अभिनेता होने का गुण देखा जा सकता है. इनके अभिनय में मेहनत और संघर्ष साफ झलकता है.

इस संबंध में आनन्द ने बताया की आज सार्थक और इंस्पायरिंग सिनेमा का दौर है, फिल्म समाज का आईना होता है. मैं संदेशपरक फिल्में करना चाहता हूं, फिल्मों के माध्यम से सरगुजा छत्तीसगढ की कला संस्कृति को अर्न्तराष्ट्रीय पटल पर स्थापित करना चाहता हूं .

प्रेम में जान लेता धर्म

धर्म, जाति का प्यार मुहब्बत को देखने का अपना नजरिया है जो बेहद संकीर्ण है. अलग अलग धर्म, जाति के युवा लड़के लड़कियों का प्यार धर्म, जाति को सुहाता नहीं है. जो लड़का लड़की उम्र, शिक्षा, व्यवसाय में भले ही बराबरी वाले हों और एकदूसरे से प्यार करने लगते हैं तो यह रिश्ता धर्म के दायरे से बाहर होता है. धर्म इस रिश्ते को मान्यता नहीं देता.

राजधानी दिल्ली के जहांगीर पुरी इलाके में 31 साल के अंकित की हत्या में एक बार फिर प्रेम में धर्म की नफरत का खूनी रूप सामने आया है. शुरुआती जांच से सामने आया है कि अंकित एक प्राइवेट टीचर था. वह अपने भाई के ट्यूशन सेंटर में पढने वाली मुस्लिम लड़की से प्यार करता था. दोनों दिसंबर में शादी करना चाहते थे. अंकित के परिवार वाले तो इस रिश्ते से खुश थे पर लड़की का भाई इस से नाराज था. उसे दोनों की शादी मंजूर नहीं थी.

आरोप है कि लड़की के भाई ने अंकित की हत्या करवा दी. उस की ट्यूशन सेंटर के बाहर नकाबपोश ने उसे गोली मार दी.

राजधानी दिल्ली में ही नहीं, देश के अन्य हिस्सों में भी धर्म, जाति के नाम पर प्रेम में हत्याओं की घटनाएं आम बात हैं. पिछले दिनों दिल्ली के ही ख्याला इलाके में अंकित सक्सेना नाम के युवक की लड़की के घरवालों ने चाकू मार कर हत्या कर दी थी. अंकित सक्सेना भी एक मुस्लिम युवती सलीमा से प्यार करता था और दोनों शादी करना चाहते थे.

फरवरी माह में अंकित अपनी कार से घर जा रहा था. रास्ते में उसे लड़की के परिवार जनों ने रोक लिया और मारनेपीटने लगे. इस बीच लड़के की मां को यह बात पता चली तो वह बीचबचाव करने आईं. वहां मौजूद लड़की की मां, बाप, भाई, मामा ने उन की भी पिटाई की. जब अंकित ने मां को  बचाने की कोशिश की तो उस की चाकू घोंप कर हत्या कर दी गई.

यह सिलसिला थमेगा नहीं. हमारे देश में कौन किस से प्यार करेगा, किस से शादी करेगा, यह अधिकार लड़के लड़की को नहीं, उन के परिवारों को नहीं, यह धर्म तय करता है. यह धर्मों में बंटे हमारे समाज की सचाई है इसलिए धर्म और जाति से प्रेमी हमेशा डरे रहते हैं.

न जाने कितने ऐसे युवा हैं जो प्रेम की राह पर आगे बढ़ने से पहले हजार बार साथी का धर्म, जाति जानने की कोशिश करते हैं. प्रेम में परिवार बाद में खलनायक बनता है, धर्म, जाति का सवाल सब से पहले बीच में खड़ा होता है.

प्रेम के बीच में धर्म, जाति की सोच खतरनाक समाज का निर्माण करती है. ऐसे समाज में प्रेम, शांति कम, नफरत की हवाएं अधिक चलती हैं. प्रेमियों को प्रेम कम, नफरत का सामना ज्यादा करना पड़ता है. हर धर्म प्रेम सिखाता है, यह बात बारबार कही जाती है पर हकीकत में यह बात सही नहीं है.

खेल और खिलाड़ी दोनों को चमकाएंगे : केजरीवाल

भारतीय राजनीति भी बड़ी अजीब है. दिल्ली बौर्डर पर जहां एक तरफ किसानों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस, बौछारें छोड़ कर उन्हें दिल्ली में घुसने से रोका जा रहा था, तो वहीं दूसरी तरफ 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर दिल्ली के बुराड़ी में शाम लगभग 5 बजे एक कार्यक्रम आयोजित कर दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल एशियन गेम्स में निशानेबाजी में रजत पदक जीते दीपक कुमार डेढ़ा को सम्मानित कर रहे थे.

केजरीवाल ने दीपक को 75 लाख रुपए की राशि बतौर इनाम में दी और खेल को बढ़ावा देने के लिए दिल्ली सरकार और खुद की पीठ थपथपाई और खेल खिलाड़ी दोनों को प्रोत्साहित करते रहने का भरोसा दिलाया.

दिव्या का आरोप

मालूम हो कि पिछले दिनों एशियन गेम्स 2018 में ब्रौंज मैडल जीत कर दिल्ली आई दिव्या ककरण ने सीधे सीधे दिल्ली के सीएम केजरीवाल पर हमला बोलते हुए कहा था कि जब कोई खिलाड़ी पदक जीतता है तो फिर सभी राजनीतिक पार्टियां श्रेय लेने और सम्मानित करने के लिए आगे आ जाती हैं और यही खिलाड़ी जब संघर्ष कर रहे होते हैं, तो उनकी सुध कोई नहीं लेता.

दिव्या ने कहा था कि दिल्ली सरकार अगर पहले ही खिलाड़ियों को सुविधाएं दे रही होती तो आज मैं ब्रौंज नहीं गोल्ड मैडल देश के लिए जीत कर आती.

वैसे भारतीय राजनीतिक दलों की आंखें तब खुलती हैं, जब होहल्ला मचता है और मीडिया सवाल पूछने लगती है. फिर सरकार आनन फानन में उसकी लीपापोती करती है.

दीपक डेढा को केजरीवाल ने देर से ही सही पर सम्मानित किया पर बात सिर्फ इतने से ही नहीं बनेगी. दिल्ली सरकार को खेलों को बढ़ावा देने के लिए जमीनी रूप से काम करने होंगे, खिलाड़ियों को तमाम सुविधाएं देनी होंगी.

मेहनत रंग लाई

बुराड़ी में जिस दीपक कुमार डेढ़ा को केजरीवाल सरकार ने 75 लाख रुपए का चेक दिया उस ने आम भारतीय खिलाड़ियों की तरह संघर्ष किया, फांके खाए, जगह जगह खुद को साबित किया. पर सुखद यह है कि आखिर केजरीवाल को इस खिलाड़ी की याद आई और विपक्षी पार्टी भले ही इसे राजनीति में बने रहने की स्टंटबाजी कहे पर इससे अन्य  खिलाड़ियों का हौसला तो बढ़ेगा ही.

कार्यक्रम के दौरान आम आदमी पार्टी के कई नेता और विधायक भी इस दौरान मौजूद थे.

जिस समय दिल्ली के सीएम केजरीवाल दीपक कुमार डेढ़ा को सम्मानित कर रहे थे, उस समय वहां हजारों लोग जुटे थे, जिनमें से कइयों ने दीपक को सुबह शाम दौड़ लगाते हुए, आते जाते हुए देखा था, अब दीपक की प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे, वहीं केजरीवाल की तारीफ में भी कसीदे पढ़ रहे थे. पर फिलहाल बाजी और दिल दोनों केजरीवाल ने ही जीते.

एक सवाल किसानों का

उधर दिल्ली के बौर्डर पर किसान केंद्र सरकार को कोस रहे थे कि नोटबंदी, जीएसटी, पैट्रोल डीजल की बढ़ी कीमत, महंगाई के बाद सरकार ने लाठी बरसा कर हमें नायाब तोहफा दिया.

पर क्या केंद्र सरकार की आंखें खुलेंगी जो पिछले 4 साल से हवन, यज्ञ, कुंभ मेले के आयोजन में मसरूफ रह कर आम जनता की मूल समस्याओं को नजरअंदाज कर रही है?

किसानों से बर्बरता पर घिरी भाजपा

केंद्र और उत्तर प्रदेश की सरकार को पता था कि ‘किसान क्रांति या़त्रा’ में शामिल किसान अपनी मांगों को पूरा करवाने के लिये कमर कस चुके हैं. इस यात्रा में मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के किसानों के साथ हरियाणा और पंजाब के किसान शामिल हैं. किसी भी सरकार ने इस यात्रा को गंभीरता से नहीं लिया. केन्द्र सरकार ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह और दूसरे लोगों की मीटिंग बुलाई तब तक देर हो चुकी थी.

केन्द्र सरकार को लग रहा था कि किसान आंदोलनकारी राजनाथ सिंह की बात मान लेंगे. राजनाथ सिंह ने किसान नेताओं को अपने वक्ष में करने की योजना बनाई पर किसान राजनाथ सिंह और केन्द्र सरकार पर भरोसा करने का तैयार नहीं हुये. ऐसे में केन्द्र सरकार के प्रस्ताव को दरकिनार कर दिया गया.

भाजपा में राजनाथ सिंह को किसानों में प्रभाव रखने वाला नेता माना जाता है. राजनाथ सिंह किसान नेताओं के भले ही करीबी रहे हों पर किसानों के नेता वह कभी नहीं रहे. केन्द्र सरकार की परेशानी यह है कि उसके पास ऐसा कोई प्रभावी नेता नहीं जिसकी बातों का वजन किसानों के बीच रह गया हो. केन्द्र सरकार ने लोकसभा चुनाव के बाद से जितने भी वादे किये वह पूरे नहीं हुये.

किसान महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान हैं. फसल बीमा का बहुत सारा प्रचार होने के बाद भी उसका किसानों पर प्रभाव नहीं पड़ रहा. किसानों की फसल खराब हो रही है. कोई सुनने वाला नहीं है. किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में कोई काम नहीं हो रहा है. ऐसे में अब किसानों में केन्द्र सरकार का भरोसा खत्म हो चुका है. भाजपा नेताओं और किसानों के बीच अब विपक्षी नेता भी आ खड़े हुये हैं जिससे भाजपा को लोकसभा चुनाव में नुकसान हो सकता है.

ढ़ रही किसानों की परेशानियां

5 साल पहले किसानों को मुद्दा बना कर भारतीय जनता पार्टी ने केन्द्र में सरकार बनाने में सफलता हासिल की. केन्द्र में सरकार बनाने के बाद भाजपा ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का दावा किया. बात तो किसानों की आय दोगुनी करने की थी पर केन्द्र और प्रदेश सरकार के फैसलों से किसान बेहद परेशान हो गया. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की किसानों की कर्ज माफी से भी किसानों के हालात नहीं सुधरे.

मूल रूप से किसानों की परेशानियां है उनमें भाजपा सरकार के समय व्यवाहारिक बढोत्तरी ही हुई. इनमें फसलों पर छुट्टा पशुओं का कहर, डीजल-पेट्रोल की बढ़ती कीमते, गौवंश पशुओं की खरीद फरोख्त पर झगड़े, खेती के उपकरणों, कीटनाशकों, खाद और अन्य कृषि उपकरणों पर जीएसटी, नोटबंदी से बढ़ी बेराजगारी, भरपूर फसलों की सही बिक्री व्यवस्था का न होना प्रमुख है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गन्ना किसानों को सीख देते कहा कि वह अब गन्ना की जगह दूसरी फसलों की खेती करें. जिससे उनको लाभ अधिक मिल सके. गन्ना किसानों का बड़ा प्रभाव है. उनकी प्रदेश भर में संख्या भी अधिक है. किसानों का गुस्सा केन्द्र सरकार के खिलाफ भड़कने लगा. केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं देश भर के किसानों में अपनी अनदेखी को लेकर गुस्सा है.

भारतीय किसान यूनियन की अगुवाई में उत्तर प्रदेश के साथ उत्तराखंड, हरियाणा पंजाब, के किसानों ने हरिद्वार से ‘किसान क्रांति यात्रा’ निकाली. किसान दिल्ली पहुंच कर किसान घाट पर धरना देना चाहते थे. केन्द्र सरकार ने किसानों को गाजियाबाद में ही रोक लिया और किसानों पर लाठी गोली चला दी. इसमें 100 से अधिक किसान और 7 पुलिस के लोग घायल हो गये. अब तक केन्द्र सरकार ने किसान आंदोलन को हल्के में लिया था.

सरकार की खराब होती साख

जब गोली-लाठी चलने के बाद दबाव में आई केन्द्र सरकार ने किसानों से बातचीत का रास्ता निकाला तब तक देर हो चुकी थी. केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने किसानों के साथ बातचीत शुरू की. राजनाथ सिंह ने कहा कि किसानों की 11 में से 7 मांगे मान ली गई हैं. इसके बाद भी किसानों ने सरकार की बात नहीं मानी. किसानों पर गोली और लाठी की घटना ने देश में इसको मुद्दा बना लिया. विपक्षी पार्टियां भी किसानों के पक्ष में मैदान में आ खड़ी हुई. असल में किसानों में गुस्सा बहुत समय से बना हुआ है. किसानों के छोटे बड़े आंदोलन हर प्रदेश में चल रहे हैं. पिछले साल मध्य प्रदेश के मंदसौर में पुलिस ने किसानों पर फायरिंग की. जिसमें 6 किसानों की मौत हुई. मार्च 2018 में महाराष्ट्र में 30 हजार किसानों ने नासिक से 5 दिन लंबा सफर तय कर महाराष्ट्र की विधानसभा का घेराव किया.

तमिलनाडु के किसान दिल्ली के जतर मंतर पहुंचे और कई दिनों तक धरना प्रदर्शन किया. बहुत सारे कारणों के चलते खेती अब घाटे का सौदा हो गया है. ऐसे में किसान परेशान हैं. महंगाई और बेराजगारी का प्रभाव किसानों पर सबसे अधिक पड़ रहा है.

भाजपा की परेशानी यह है कि वह हर विरोध को देश के विरोध से जोड़कर देखती है. ऐसे में गंभीर होती परेशानी का असर उस पर नहीं पड़ता जिससे मदंसौर और दिल्ली जैसी घटनायें किसानों के खिलाफ हो जाती हैं. भाजपा हिन्दू मुसलिम वोट बैंक के चक्कर में यह भूल जाती है कि असल समस्या आर्थिक होती है. गांव स्तर पर कई तरह की परेशानियां खड़ी हैं. जिनके लिये व्यवहारिक सोच नहीं तैयार हो रही. जिससे किसानों में गुस्सा है. आम आदमी भी अब किसानों के साथ खड़ा है.

चुनावी साल में बढ़ेगा दबाव

किसानों की परेशानियां बढ़ रही हैं. अब किसानों के साथ आम जनता और विपक्षी दल भी जुट खड़े हो गये हैं. यह चुनावी साल है. किसानों को भी लग रहा है कि अब आंदोलन से लाभ हो सकता है. भाजपा को इस बात का आभास है. यही वजह है कि वह किसानों पर हुये लाठी और गोलीकांड को लेकर बैकफुट पर आ गई है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि ‘किसान हमारी प्राथमिकता है. केन्द्र सरकार और प्रदेश सरकार दोनों ही किसानों के हित में खड़ी है.’ मुख्यमंत्री योगी ने विपक्ष पर भी सवाल उठाते कहा कि ‘किसानों का शोषण करने वाले लोग आज किसानों के हक की बात करके घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं.’ यही नहीं योगी आदित्यनाथ ने अपने बड़बोलेपन में यहां तक कह दिया कि केजरीवाल, अखिलेश और चौधरी अजीत सिंह ऐसे नेता हैं जिनको आलू और गन्ने का अंतर नहीं पता है.

किसान आनोन्दलन को लेकर विपक्षी नेता भी अब किसानों के साथ खड़े हैं. बसपा नेता मायावती ने कहा कि ‘भाजपा की सरकार ने किसानों पर लाठी गोली चलवाकर अपनी तानाशाही का पूरा सबूत दिया है. किसानों और जनता से अच्छे दिनों का वादा करने वाली सरकार लाठियां बरसवा रही है. भाजपा की नीतियां गरीब और किसान विरोधी हैं. किसान वर्ग गहरे संकट में है.’ सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि ‘किसानों को गन्ने का पैकेज देने की बात कही गई पर पैसा नहीं दिया जा रहा. किसानों का गन्ना मूल्य अभी भी बाकी है. 5 सालों में तमाम किसानों ने आत्महत्या की है. ज्यादा प्रदेशों में भाजपा की ही सरकार है. ऐसे में समझ आता है कि किसान के लिये भाजपा के दिल में रहम नहीं है.’

प्रशांत किशोर की संस्था ‘आईपेक’ ने भाजपा के साथ काम करने के लिए कराया झूठा पोल

16 सितंबर को चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल होने की खबरें मीडिया में छाई रहीं. लेकिन अब पता चला ​है कि राजनीतिक परामर्श देने वाली उनकी कंपनी, इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटि (आईपेक) के अंदर कामकाज के तरीके को लेकर विवाद चल रहा है. हैदराबाद स्थित आईपेक के मुख्यालय में एक सर्वे कर कंपनी में काम करने वालों से पूछा गया कि आगामी लोक सभा चुनावों में वे किस पार्टी के साथ काम करना चाहते हैं. उस सर्वे में भाग लेने वाले आईपेक के एक पुराने और एक मौजूदा कर्मचारी का कहना है कि अधिकतर कर्मचारियों की राय कांग्रेस पार्टी के साथ काम करने की थी लेकिन इसके बावजूद आईपेक ने भाजपा का चयन किया.

हालांकि, आईपेक ने अभी तक आधिकारिक रूप से इसकी घोषणा नहीं की है लेकिन इन दोनों का कहना है कि भाजपा के पक्ष में सर्वे के परिणामों को तोड़ा-मरोड़ा गया है. मौजूदा कर्मचारी का कहना है, ‘‘जिस तरह से इन लोगों ने सर्वे किया उससे शक पैदा होता है. हम सभी को पहले से ही मालूम था कि हम लोग बीजेपी के लिए काम करेंगे. फिर भी पोल का नाटक किया गया.’’ इन लोगों की शिकायत यह नहीं है कि ये लोग भाजपा के साथ काम करने वाले हैं. बल्कि कंपनी के ढोंग से इनमें नाराजगी है. ‘‘वे लोग कह सकते थे, ‘सब सुनो, हम लोग भाजपा के साथ काम करने जा रहे हैं. तुम लोग प्रोफेशनल तरीके से काम करो. तुम लोगों को इसलिए तो भर्ती किया गया है.’’

सर्वे से पहले ही कंपनी के भीतर बड़ी अजीबो-गरीब बातें हो रही थीं. 9 सितंबर को हैदराबाद के इंडियन स्कूल औफ बिजनस के छात्रों के साथ अपनी बातचीत में प्रशांत किशोर ने कहा था कि ‘‘अब वह किसी भी पार्टी के साथ उस तरह से काम नहीं करेंगे जैसे 2014 से करते आए हैं.’’ दूसरे दिन हैदराबाद के गोलकोंडा हॉस्टल में आईपेक ने अपने कर्मचारियों को हाथ उठा कर यह बताने के लिए कहा कि वे लोग लोकसभा चुनाव में किस पार्टी के लिए काम करना चाहते हैं. उस वक्त वहां मौजूद पूर्व कर्मचारी का कहना है कि ज्यादातर लोगों ने कांग्रेस के साथ काम करने की इच्छा जताई.

इस अनौपचारिक पोल के बाद आईपेक के ह्यूमन रिसोर्स हेड अविनाश तिवारी ने प्रबंधन समिति की ओर से कर्मचारियों को मेल भेजा कि 20 सितंबर को औपचारिक पोल किया जाएगा. ईमेल मे तिवारी ने लिखा था, ‘‘2019 के आम चुनावों में हम लोग- भाजपा या कांग्रेस- किस पार्टी के साथ काम करेंगे इसका फैसला पोल के जरिए होगा.’’ पोल प्रक्रिया दो चरण में पूरी की जानी थी. 12 से 19 सितंबर के बीच परामर्श होना था और उसके बाद 20 सितंबर को वोटिंग की जानी थी. ईमेल में कर्मचारियों को यह साफ समझाया गया था कि इस पोल का मकसद यह जानना है कि “चुनावों में आईपेक किस पार्टी के साथ काम करे. कर्मचारी निजी तौर पर किसके साथ काम करना चाहते हैं यह जानना इस पोल का मकसद नहीं है.”

इन दोनों कर्मचारियों का कहना है कि 20 तारीख के पोल में स्टाफ को चयन के लिए तीन विकल्प दिए गए थे- भाजपा, कांग्रेस या इनमें से कोई भी नहीं. वोटिंग के लिए तीन पोलिंग बूथ बनाए गए और सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक वोटिंग हुई. प्रत्येक बूथ में कुल 276 वोटर थे. पूर्व कर्मचारी ने बताया कि आईपेक के सभी विभागों- मीडिया, डेटा, फील्ड टीम, सोशल मीडिया एनिलिटिक्स और राजनीतिक पड़ताल- में 400 से 450 कर्मचारी हैं. मौजूदा कर्मचारी ने मुझे बताया कि आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनाव कैंपेन में लगी टीम के अलावा सभी ने 20 सितंबर के सर्वे में भाग लिया.

वोटों की गिनती शाम को की गई. गिनती कर रहे मैनेजमैंट स्टाफ के साथ तिवारी भी वहां मौजूद थे. परिणाम की घोषणा रात के 8 बजे की गई. ‘‘वहां बमुश्किल 10-15 लोग ही मौजूद थे. ‘‘हालांकि, परिणाम की घोषणा करने वाले और इनर टीम के उपस्थित सदस्य ताली बजा रहे थे लेकिन दूसरे लोग चुपचाप खड़े हो कर यह सब देख रहे थे.’’ इस पूर्व कर्मचारी से 20 सितंबर के पोल के बारे में बात करने के बाद मैंने इस बारे में जब मौजूदा कर्मचारी से सवाल किया तो उसने भी इसकी पुष्टि की.

मौजूदा कर्मचारी का कहना है, ‘‘मुझे सच में समझ नहीं आ रहा कि ऐसा करते समय वे लोग क्या सोच रहे थे. प्रोफेशनल संस्थाओं में कर्मचारी क्या सोचते हैं इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता.’’ इस कर्मचारी का मानना है कि विचारधारा के हिसाब से सोचें तो ऑफिस में ज्यादातर लोग कांग्रेस के साथ काम करना चहते हैं. पोल के रिजल्ट से यह साफ पता चलता है कि आईपेक भाजपा के लिए काम करती आई है. वोटिंग के परिणाम को गोलमोल कर दिया गया.’’

पूर्व कर्मचारी मानते हैं कि बीजेपी के साथ काम करने को सही ठहराने के लिए सर्वे कराया गया था. वह बताते हैं कि रिजल्ट के बाद से आईपेक कर्मचारियों पर दवाब बनाने लगा है जिससे कि लोग काम छोड़ कर चले जाएं क्योंकि इनर टीम यह कतई नहीं चाहती कि संस्था में लिबरल लोगों का कब्जा हो जाए….उन लोगों को लिबरल-मुक्त कैंपेन टीम चाहिए.’’

प्रशांत किशोर के जदयू में शामिल हाने के बावजूद बीजेपी के साथ काम करने के कंपनी के फैसले से कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट पैदा नहीं होता क्योंकि कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के डेटा से पता चलता है कि प्रशांत किशोर का आईपेक के साथ औपचारिक रूप से कोई संबंध नहीं है. कागजों में आईपेक कन्सल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड के तीन निदेशक हैं- प्रतीक जैन, ऋषिराज सिंह और विनेश कुमार चंदेल. आईपेक की वेबसाइट में भी टीम सदस्यों के नामों में प्रशांत का नाम नहीं है. दोनों कर्मचारी उपरोक्त बात की पुष्टि करते हैं. पूर्व कर्मचारी ने बताया, “कम से कम कागजों में तो प्रशांत का कंपनी से कोई लेना देना नहीं है.’’ वह बताते हैं कि प्रशांत एक मेंटर की भूमिका अदा करते हैं. ‘‘हालांकि, कंपनी में किशोर की प्रमुख भूमिका है क्योंकि ज्यादातर काम उनके ही नाम पर कंपनी को मिलता है.’’

तो भी भविष्य में यह दूरी मिट सकती है. जिस दिन कंपनी ने सर्वे कराया था उस दिन लीडरशिप टीम की ओर से कर्मचारियों को एक ईमेल मिला था कि जिसमें प्रशांत किशोर के राजनीतिक कामों में भाग लेने के अवसर की बात थी. ईमेल में लिखा था, ‘‘आईपेक के पास अपने बीच से 4-5 कर्मचारियों को भेजना का मौका है जो संभवतः किशोर के साथ काम करेंगे.’’ ईमेल में यह साफ नहीं था कि इन कर्मचारियों को किस रूप में प्रशांत के साथ काम करना होगा. ये लोग आईपेक के स्टाफ रहेंगे या जदयू के कार्यकर्ता. ईमेल में यह कहा गया है कि यह काम रोटेशनल आधार पर किया जाएगा. तीन-तीन महीने में लोगों को भेजा-बुलाया जाएगा.

मैंने अविनाश तिवारी को ईमेल कर इस बारे में जानना चाहा मगर उनका जवाब नहीं आया. आईपेक के पोल में बीजेपी को कितने वोट मिले थे अभी स्पष्ट नहीं है लेकिन मैंने जिन दो कर्मचारियों से बात की उनका कहना है कि रिजल्ट के साथ छेड़छाड़ हुई है. मौजूदा कर्मचारी कहते हैं, ‘‘मैं ऐसा कहना तो नहीं चाहता लेकिन मुझे लगता है कि चुनाव में धांधली की शुरुआत पहले खुद के घर में ही होती है.’’

मुझे सिर्फ रियलिस्टिक सिनेमा ही बनाना है : रीमा दास

‘‘औस्कर’’ के लिए भारतीय प्रतिनिधि फिल्म के रूप में भेजी जाने वाली रीमा दास की फिल्म ‘विलेज रौक स्टार्स’ न सिर्फ पहली असमी भाषा की फिल्म है,बल्कि पहली पूर्वोत्तर भारत के किसी फिल्मकार की फिल्म है,जो कि पूर्णतः पूर्वोत्तर भारत में ही फिल्मायी गयी है. रीमा दास इस फिल्म की निर्माता होने के साथ साथ निर्देशक, लेखक, कैमरामैन व एडिटर भी है. फिल्म में अभिनय करने वाले बच्चे व बड़े सभी असम के चायगांव के हैं, जिन्होंने पहली बार अभिनय किया है. रीमा दास की इस फिल्म को इसी वर्ष ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म’, ‘सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार’ और सर्वश्रेष्ठ लोकेशन साउंड’’ सहित तीन राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा जा चुका है. (ज्ञातव्य है कि 1988 में जहान बरूआ की फिल्म के बाद ‘स्वर्ण कमल’ पाने वाली यह दूसरी असमी फिल्म है.) इससे पहले यह फिल्म 80 अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सवों में धूम मचाने के साथ ही 44 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी बटोर चुकी थी. इतना ही नहीं यह फिल्म भारतीय सिनेमा घरों में 28 सितंबर 2018 को पहुंची है.

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37 वर्षीय फिल्मकार रीमा दास के हौसले को सलाम किया जाना चाहिए, जिन्होंने असम में गौहाटी से 50 किलोमीटर दूर स्थित चायगांव से निकलकर 2003 में मुंबई पहुंची.

15 वर्ष के संघर्ष के बाद अपने बुलंद हौसले, अपनी मेहनत व लगन के बल पर उन्होने अंतरराष्ट्रीय सिनेमा जगत को अपनी प्रतिभा का अहसास कराते हुए अपनी दूसरी फिल्म ‘विलेज रौक स्टार्स’ के लिए लगभग पचास पुरस्कार हासिल कर लिए. इतना ही नहीं ‘‘भारतीय फिल्म फेडरेशन’’ को भी अहसास कराया कि 91वें औस्कर में ‘‘विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म’’ खंड में भारतीय प्रतिनिधि फिल्म के तौर पर उनकी फिल्म ‘‘विलेज रौक स्टार्स’’ को ही भेजा जाना चाहिए. जबकि इस प्रतिस्पर्धा में बौलीवुड की कई बड़े बजट की चर्चित फिल्में भी थीं.

‘‘फिल्म फेडरेशन आफ इंडिया’’ द्वारा असमी फिल्म ‘‘विलेज रौक स्टार्स’’ को औस्कर में भेजने के लिए चुने जाने के निर्णय के तीसरे दिन व ‘‘बुसान अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह’’ में जाने से एक दिन पहले मुंबई में रीमा दास से लंबी एक्सक्लूसिव बातचीत हुई, जो कि इस प्रकार रही…

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लगता है आपको बचपन से ही कला का माहौल मिला, जिसके चलते आपने फिल्मों से जुड़ने का निर्णय लिया?

हकीकत में मेरी नियति मुझे यहां ले आयी. अन्यथा 2003 में मुंबई आने तक मैने ऐसा कुछ नहीं सोचा था. मैं असम से हूं. हमारे असम में कला का बहुत अच्छा माहौल है. फिर चाहे वह संगीत हो या अभिनय हो या नृत्य हो या कला का कोई भी फार्म हो. असम के लोग भले ही कला यानी कि संगीत या अभिनय को प्रोफेशन न बनाएं, पर वह कुछ हद तक कला से जुड़े रहते हैं. लोग अपने प्रोफेशन के अलावा हर माह कम से कम एक बार किसी न किसी कला को भी अपना वक्त देते ही हैं. असम का हर इंसान सेलीब्रेशन में यकीन करता है. तो हमें बचपन से यही सीख मिलती है. कला तो हमारी रगों में है.

मेरे परिवार में मेरे पिता शिक्षक हैं. मेरी मां किताब की दुकान चलाने के साथ साथ प्रिटिंग प्रेस भी संभालती हैं. मेरे परिवार ने हमें कला के क्षेत्र में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया, तो साथ में पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए भी जोर दिया.

मैंने छह वर्ष की उम्र से ही अभिनय करना शुरू कर दिया था. हमारे यहां सिर्फ स्कूलों में ही नहीं हर गांव में नाटकों का मंचन हुआ करता है. हमारे गांव में एक नाटक हो रहा था ‘‘सोमाय’ यानी कि ‘समय’, जिसमें एक छोटे लड़के की जरूरत थी. कोई लड़का मिला नहीं, तो मुझे ही लड़के के किरदार के लिए खड़ा कर दिया गया था. तो पहली बार अभिनय में मेरी शुरूआत एक लड़के का किरदार निभाकर हुई थी. उसके बाद तो नाटकों में अभिनय का सिलसिला चलता रहा. पढ़ाई भी चलती रही. पर असम के दूसरे लोगों की ही तरह मैंने भी अभिनय को प्रोफेशन की तरह नहीं लिया था. हमारे यहां मोबाइल थिएटर ज्यादा हैं. हमारे यहां लोग नाटकों में अभिनय करते हैं या संगीत के कार्यक्रम में गीत गाते रहते हैं. तो गांव के अलावा स्कूल में व कौलेज में भी मैं नाटकों में अभिनय करती रही. मैंने सोशियोलौजी विषय में एमए किया. यहां तक कि जब 2003 में मैं मुंबई आयी, उस समय भी मैं अभिनेत्री बनने के लिए नहीं आयी थी. बल्कि इस मकसद से आयी थी कि मुझे भविष्य के लिए नयी राह बनानी है. तो मैं मुंबई में माहौल देखने व कुछ नया सीखने के मकसद से आयी थी. सोचा था कि उसके बाद वापस अपने गांव असम चली जाउंगी. लेकिन मुंबई नगरी ने मुझे यहीं का बनाकर रख दिया.

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2003 में मुंबई पहुंचने के बाद ऐसा क्या हुआ कि आपने फिल्में बनाना शुरू कर दिया?

मुंबई पहुंचने के बाद भी मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मुंबई में कहां जाना है या क्या करना है? काफी दिक्कतें आ रही थी. इसी बीच एक दो दोस्त बन गए जिनके साथ मैने पृथ्वी थिएटर में जाकर नाटक देखना शुरू कर दिया. नाटक देखते देखते मैं खुद नाटकों में अभिनय करने लगी. मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर आधारित ‘गोदान’ सहित कई नाटकों में अभिनय किया. फिर फिल्में देखना शुरू किया. फिल्में देखते हुए मुझे लगा कि मुझे भी फिल्मों में अभिनय करना चाहिए. लेकिन उस वक्त मुझे हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाएं अच्छी तरह से नहीं आती थीं. इस समस्या के चलते मैं थोड़ा डिप्रेशन में भी आ गयी थी कि आखिर मैं क्या करूंगी? तब मैने हिंदी व अंग्रेजी भाषा सीखते हुए विश्व सिनेमा देखना शुरू किया. फिर तो फिल्म देखने का ऐसा नशा सवार हुआ कि मैं नई नई डीवीडी की तलाश करती रहती थी. फिल्में देखते देखते मेरे अंदर बेचैनी बढ़ी और मुझे लगा कि मुझे भी कुछ बनाना चाहिए. तब 2009 में वापस आसाम जाकर मैंने लघु फिल्म ‘‘प्रथा’’ बनायी, जिसे कई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में काफी सराहा गया. इससे मुझे लगा कि अब मुझे यही काम करना चाहिए. फिर मैं वापस आसाम गयी. वहां सात-आठ लघु फिल्में बनायीं. पर फिर मुंबई वापस आ गयी. मैं अब मुंबई में रहती हूं, लेकिन फिल्में बनाने के लिए मैं अपने गांव ही जाती हूं. मेरे लिए वहां फिल्म बनाना आसान है. कम खर्च में मैं फिल्म बना लेती हूं. 10-12 लघु फिल्म बनाने के बाद 2011 में मैंने अपनी पहली फीचर फिल्म ‘‘अंर्तदृष्टि’’ की पटकथा लिखनी शुरू की. नवंबर 2013 में मैंने अपनी पहली फीचर फिल्म की शुटिंग शुरू की. इस फिल्म को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में मेरी उम्मीद से कम सम्मान मिला. तब मैंने अपनी दूसरी फिल्म ‘‘विलेज रौक स्टार’’ पर काफी मेहनत की. पूरे चार वर्ष की मेरी मेहनत का परिणाम है मेरी फिल्म ‘विलेज रौक स्टार’ जिसे 80 इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सराहा गया. तीन राष्ट्रीय पुरस्कार के अलावा 44 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले.

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पर आपने पहले अभिनय करने के बारे में सोचा था?

जब मैंने फिल्म ‘पथेर पांचाली’ देखी, तो पहली बार मेरे दिल ने कहा कि मुझे अभिनेत्री नहीं फिल्म निर्देशक बनना चाहिए. उसके बाद इरानी फिल्मकार माजिद मजीदी की फिल्म ‘चिल्ड्रेन आफ हैवेन’ देखकर मैंने तय कर लिया कि मैं फिल्म निर्देशक बनूंगी. इन फिल्मों से मैंने सीखा कि हम बहुत साधारण व छोटी बातों पर भी गहराई से असर करने वाली व दिल को छू लेने वाली वाली फिल्म बना सकते हैं. इसके लिए हमें ऐसी कहानी की भी जरुरत नहीं है जिसके लिए हमें बड़े बजट की जरुरत पड़े.

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इन फिल्मों में बच्चे नायक हैं, इसलिए आपकी फिल्म….?

मेरी बात पूरी होने से पहले ही रीमा दास ने कहा – मेरी पहली लघु फिल्म ‘प्रथा’ से लेकर अब तक मेरी हर फिल्म के मुख्य प्रोटोगौनिस्ट बच्चे ही रहे हैं. बच्चों के साथ काम करते हुए मैं खुद को बहुत सहज पाती हूं. बच्चे सवाल करने की बजाय हमारे विजन के अनुसार ही काम करते हैं.

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फिल्मकार के तौर पर आपको किस सिनेमा ने इंसपायर किया?

मुझे रियलिस्टिक सिनेमा ने इंस्पायर किया. लेकिन ऐसा नहीं है कि मुझे ‘बैटमैन’ या ‘स्पाइडरमैन’ जैसी फिल्में पसंद नहीं हैं. मुझे वह भी पसंद हैं. मेरी राय में दर्शक यह जानता है कि वह नकली दुनिया यानी कि सिनेमा देख रहा है, पर निर्देशक की जादूगरी के चलते वह सिनेमा को ही सच मान लेता है.

मसलन, स्पाइडर मैन इस दुनिया में है या नहीं, किसी को नहीं पता. पर सिनेमा का दर्शक निर्देशक द्वारा बताए गए स्पाइडरमैन को ही स्पाइडरमैन मान लेता है. वही निर्देशक सफल होता है, जो अपनी जादूगरी से लोगों को सिनेमा में वास्तविकता का यकीन दिला सके. मुझे तो हर हाल में सिर्फ रियलिस्टिक सिनेमा ही बनाना है. मैं अलग तरह के प्रयोग करते हुए सिनेमा बनाती रहूंगी.

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आपकी फिल्म ‘‘विलेज रौक स्टार्स’’ को ‘‘विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म खंड में औस्कर के लिए भेजे जाने के लिए चुनी जाने की खबर मिलने पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या रही?

उस वक्त मैं अपने परिवार के साथ असम के गांव के अपने घर पर ही थी, इसलिए खुशी से झूम उठी. यदि सड़क पर या कहीं दूसरी जगह होती तो शायद इतना खुलकर मैं न अपनी खुशी का इजहार न कर पाती. मेरी इस खुशी का हिस्सा मेरा पूरा परिवार बना.

आपको फिल्म के लिए कहानियां कहां से मिलती हैं?

आम लोगों से. मैं आम लोगों से बहुत मिलती हूं, उनसे बहुत बातें करती हूं. मैं लोगों के मुंह से उनकी जिंदगी की कहानियां सुनती हूं और वह सब मेरे दिमाग में संचित होता रहता है. फिर किसी इंसान की कहानी से प्रेरित होकर मैं अपनी लघु फिल्म या फीचर फिल्म की पटकथा लिखती हूं. लोगों के इमोशंस, उनके हावभाव को आब्जर्व करना मुझे पसंद है. मैं लोगों की सायकोलौजी को भी जानने की कोशिश करती हूं.

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फिल्म ‘‘विलेज रौक स्टार्स’’ की कहानी का प्रेरणा स्रोत क्या रहा?

जब मैं अपनी पहली फिल्म ‘‘मैन विद बाइनाकुलर्स’’(अंर्तदृष्टि) की शूटिंग असम में कर रही थी, तब एक दिन बिहू समारोह में नकली वाद्ययंत्र यानी कि कार्डबोर्ड के बने गिटार के साथ कुछ बच्चों को गाते देखा, तो मुझे ‘विलेज रौक स्टार्स’ की कहानी का बीज मिल गया. गरीबी में पल रहे बच्चों को पता था कि उन्हें अपनी जिंदगी का जश्न कैसे मनाना है. मुंबई में हम बहुत ही ज्यादा मैटेरियलिस्टिक व बनावटी जिंदगी जीते हैं. हम सुबह उठते ही क्या काम करना हैं, कहां दौड़भाग करनी है, इसी में व्यस्त हो जाते हैं और पूरा दिन भागते भागते बीत जाता हैं. पर मुझे अपने गांव में अहसास हुआ कि वास्तव में जिंदगी क्या है? खुशियां क्या हैं? गांव के उन बच्चों ने उस दिन मुझे अहसास कराया कि जिंदगी का जश्न क्या होता है? जीवन में छोटी छोटी खुशियां ही हमें आनंद प्रदान करती हैं. मैंने पाया कि मुंबई जैसे शहरों में बच्चों के खेलने की कोई जगह नही है, पर हमारे गांव में बच्चे प्रकृति के बीच खेलते हैं. पेड़ों पर चढ़ते व झूलते हैं. नदी तलाब में नहाते हैं. मैंने पाया कि हमारे गांव के बच्चे गरीब हैं, पर वह प्रकृति के साथ घुल मिलकर सर्वाधिक खुशियां पा रहे हैं.

आपने फिल्म की नायिका धुनू को गिटार वादक के रूप में ही क्यों पेश किया?

सबसे पहली बात तो गिटार मेरा पंसदीदा वाद्ययंत्र है. दूसरी बात गिटार मौडर्न इंस्ट्रूमेंट होने के बावजूद लोगों की भावनाओं के साथ बहुत जल्द जुड़ता है. गिटार से आजादी का अहसास होता है. मैंने अपनी इस फिल्म के माध्यम से लड़कियों की आजादी की बात की है. क्योंकि हमारे असम में अभी भी लड़कियों पर बहुत ज्यादा बंदिशें हैं. हमने फिल्म में नारी सशक्तिकरण और लैंगिक समानता की बात की है.

असम में लड़कियों पर किस तरह की बंदिशें हैं?

मुंबई की तरह हमारे यहां लड़कियों को आजादी नहीं है. जब लड़कियां सयानी हो जाती हैं, तब समस्या ज्यादा हो जाती है. अंधेरा होने के बाद लड़कियों को घर से बाहर निकलने नहीं दिया जाता. वहां हम लोगों के लिए दिक्कतें बहुत हैं. कुछ प्राकृतिक दिक्कतें भी हैं. पर हम लोग जी रहे हैं. अब तो आसाम में भी फिल्में बनने लगी हैं.

फिल्म ‘‘विलेज रौक स्टार्स’’ के निर्माण के लिए धन कहां से जुटाया?

इस फिल्म के निर्माण में मेरे पारिवारिक सदस्यों व रिश्तेदारों का ही योगदान है. हमने पूरी फिल्म अपने घर व अपने गांव असम के चयगांव, जो कि गौहाटी से 50 किलोमीटर दूर है, में फिल्मायी है. तो लोकेशन का पैसा नही लगा. घर में अपनी मां के साथ रहती थी. मेरे पास अपना कैमरा ‘कैनन 5 डी’ है, जिससे मैंने फिल्म की शूटिंग की. खाना मां बनाकर देती थी. फिल्म में मुख्य किरदार मेरी भतीजी भनिता दास व कजिन बसंती दास ने निभाया है. बाकी कलाकार भी गांव के बच्चे ही हैं. तो कलाकारों को पैसा नहीं देना पड़ा. मेरी चचेरी बहन मल्लिका मेरी सहायक थी. वही लोकेशन साउंड का ध्यान रख रही थी, जिसे पुरस्कार भी मिला. बाकी कोई क्रू मेंबर नहीं था. सारा काम मैं खुद ही कर रही थी. हमने चार वर्ष में यह फिल्म पूरी की. इसलिए फिल्म की शूटिंग पूरी होने तक कोई ज्यादा खर्च नहीं आया. पोस्ट प्रोड्क्शन में खर्च आया. मुझे हौन्ग्कौंग से ग्रांट मिली, जिसके चलते बैंकाक में फिल्म का कलर ग्रेड करवाया. साउंड के लिए अपनी जेब से पैसे डाले.

धन के अभाव के चलते आपने धुनु के किरदार के लिए अपनी भतीजी भनिता दास को चुना?

हमने पूरी फिल्म अपने पैसे से बनायी है. मेरी भनिता दास ने अब तक अभिनय नही किया था, वही नहीं फिल्म में जितने कलाकार हैं, सभी ने पहली बार काम किया है, पर उसने इतना बेहतरीन काम किया कि उसे इस फिल्म के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का राष्ट्रीय पुरस्कार’ मिला. अब वह आगे अभिनय करेगी या नहीं, यह तो मुझे नहीं पता. फिलहाल वह 9वीं कक्षा में पढ़ रही है. मुझे लगता है कि वैसे भी हमारी फिल्म इंडस्ट्री में बच्चों के लिए करियर कुछ खास नही है. मैं चाहती हूं कि वह अभी पढ़ाई करे. उसकी अपनी जिंदगी है, उसकी यात्रा है. नियति ने उसके बारे में क्या लिखा है? किसी को नहीं पता. पर मैं चाहती हूं कि वह पढ़ाई पर ध्यान दे. यदि मैंने पढ़ाई न की होती, तो मैं यहां तक नही पहुंच पाती. यदि मैं आज आपसे हिंदी में बात कर रही हूं या पूरी दुनिया घूमते हुए अंग्रेजी में बात करती हूं, तो यह सब मेरी अपनी पढ़ाई की वजह से ही संभव हुआ.

औस्कर में आपकी फिल्म भेजी गयी है.अब आपकी क्या योजना है?

मेरा संघर्ष बहुत बड़ा है. क्योंकि मैं एक इंडीपेंडेंट छोटी फिल्मकार हूं. औस्कर में हमारा मुकाबला बडे़ बड़े स्टूडियो की फिल्मों से है. पर मेरे अंदर डर नही है. हमें उम्मीद है कि हम औस्कर भी ले आएंगे. मैं खुद को खुशनसीब समझती हूं कि पिछले 3 वर्ष से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमाम दोस्त बनाए हैं, जिन पर मैं भरोसा कर सकती हूं. मेरे लिए यह बहुत खर्चीला है. कम से कम 4 से 5 करोड़ रूपए खर्च होनेवाले हैं और मेरे पास पैसे नही हैं. आसाम सरकार ने पचास लाख रूपए देने की बात कही है. इसके अलावा जब से फिल्म को औस्कर में भेजने की घोषणा हुई है, तब से तमाम लोग आर्थिक मदद करने का प्रस्ताव भेज रहे हैं. मैं अभी दो तीन दिन इंतजार करने वाली हूं कि शायद सरकार की तरफ रकम बढ़ा दी जाए. उसके बाद जिन लोगों ने पैसे देने का प्रस्ताव दिया है, उनसे पैसे लूंगी. अब लोग तो ‘विलेज रौक स्टार’ को अपनी फिल्म मान रहे हैं.

पहले फिल्में रील में बना करती थीं. अब डिजिटल में बन रही हैं. इससे क्या फर्क आया?

जब रील में फिल्में बनती थीं यानी कि सेल्यूलाइड सिनेमा ज्यादा वास्तविक और प्योर होता था. पर उनकी लागत बहुत आती थी. डिजिटल सिनेमा में प्योरिटी का अभाव है, पर लागत कम आती है. सेल्यूलाइड सिनेमा का लुक बहुत अलग होता है. पर मुझे लगता है कि आप रील या डिजिटल में सिनेमा बनाएं, पर कहानी सही ढंग से कही जानी चाहिए. फिर अब जब लोग फिल्में मोबाइल पर देखते हैं, तो उन्हें गुणवत्ता से कोई फर्क नहीं पड़ता.

मिजोरम में एक भी सिनेमाघर नहीं है. वहां बौलीवुड फिल्में प्रदर्शित नहीं होतीं. असम में क्या स्थिति है?

असम में 80 स्क्रीन्स हैं. इसके अलावा असम में चलते फिरते सिनेमाघर काफी हैं. हर दूसरे सप्ताह कोई न कोई बड़ी बौलीवुड फिल्म वहां पर प्रदर्शित होती है.असम में असमी भाषा में कई फिल्मेंं बन चुकी हैं.असम में 1935 से फिल्में बनती आ रही हैं. 1935 में सबसे पहले ज्योति प्रसाद अग्रवाल ने पहली असमी फिल्म ‘‘जोयमौटी’’ का निर्माण किया था. फिर प्र्रामथेस बरूआ ने ‘देवदास’ बनायी. मगर आसामी सिनेमा को राष्ट्रीय पहचान पाने में 53 वर्ष लगे. 1988 मे जहानू बरूआ निर्देशित फिल्म ‘‘हलोधिया चोरैये बौधन खाए’’ (द कातास्तोफे) को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजते हुए ‘‘स्वर्ण कमल’’ प्रदान किया गया था. उसके 30 वर्ष बाद ‘‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार व स्वर्ण कमल’ जीतने वाली दूसरी असमी फिल्म बनी है ‘विलेज रौक स्टार्स’’. आदिल हुसेन जैसे कई चर्चित कलाकार हैं. पर फिल्म वितरण की समस्या वहां भी है.

आपको लिखने का भी शौक है?

इस मामले में बहुत आलसी हो गयी हूं. पहले मैंने कविताएं बहुत लिखी हैं. दो तीन कहानियां भी लिखी हैं. पर अब तो बहुत आलसी हो गयी हूं. फिलहाल फिल्म देखने और बनाने में मजा आता है. पर भविष्य को लेकर कुछ नहीं कह सकती.

भविष्य की योजना क्या है?

फिलहाल दो मोर्चों पर काम कर रही हूं. मैंने असम में ही अपनी तीसरी फिल्म ‘‘बुलबुल कैन सिंग’’ भी बनायी है जो कि एक टीनएज प्रेम कहानी है. इसका विश्व प्रीमियर 6 सितंबर को ‘टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ में हो चुका है. टोरंटों से वापस आते ही ‘‘विलेज रौक स्टार्स’’ के औस्कर में भेजने की खुशखबरी मिल गयी. अब कम से कम फरवरी 2019 तक इस फिल्म के प्रचार आदि पर वक्त देना पड़ेगा. इसी बीच ‘‘बुलबुल कैन सिंग’’ 4 अक्टूबर से 13 अक्टूबर के बीच ‘‘बुसान अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव’’ के अलावा मुंबई में 25 अक्टूबर से आयोजित होने वाले ‘‘मामी’’ फेस्टिवल में ‘‘बुलबुल कैन सिंग’’ दिखायी जाएगी, तो उसके लिए भी वक्त देना है.

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