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पहले बढ़ाये पेट्रोल के दाम फिर घटा कर लूट रहे वाहवाही

पेट्रोल डीजल की बढ़ी हुई कीमतों ने महंगाई में आग में घी डालने वाला काम किया. जनता के बीच गुस्सा था. सभी को 2014 के पहले भाजपा नेताओं के कहे बयान याद आ रहे थे. ऐसे में भाजपा की केंद्र और प्रदेश की सरकार को मुंह छिपाना पड़ रहा था. तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव करीब आता देख डीजल पेट्रोल की कीमतों को घटाया गया है. कांग्रेस नेता सुरेंद्र सिंह राजपूत कहते हैं “25 रुपये बढ़ा कर 2 रुपये 50 पैसे घटाने का दिखावा जनता समझ रही है”.

विरोधी कुछ भी कहें भाजपा नेता अपनी और प्रधानमंत्री की तारिफ करने का यह अवसर गंवाना नही चाहते. वो इसे जनता पर बड़ी राहत के रूप में दिखा रहे हैं. सपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि अबतक सरकार कहती थी कि डीज़ल पेट्रोल के दाम कम करना उनकी सीमा में नहीं. अब चुनाव देख दाम 25 रुपये बढ़ा के 2 रुपये 50 पैसे कम कर दिए गए. जनता से बोला गया यह भी एक झूठ है.

योगी ने की तारीफ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में पेट्रोल और डीजल के मूल्य में 2.50 -2.50 रुपये प्रति लीटर की कटौती की घोषणा की है. उन्होंने कहा कि भारत सरकार द्वारा भी पेट्रोल और डीजल के दामों में 2.50-2.50 रुपये प्रति लीटर की कटौती की गयी है. इस प्रकार प्रदेश में जनता को पेट्रोल और डीजल के मूल्य में 5.00-5.00 रुपये प्रति लीटर की कुल राहत प्राप्त होगी.

मुख्यमंत्री द्वारा यह घोषणा लखनऊ के इन्दिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित एक प्रेस कौन्फ्रेंस के दौरान की गयी. इस अवसर पर केन्द्र सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल के दामों में की गयी कटौती के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि भारत सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल के दामों में की गयी कमी से प्रेरित होकर राज्य सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल के मूल्य में कटौती का निर्णय लिया गया है. इससे प्रदेश सरकार के राजस्व में लगभग 4,000 करोड़ रुपये की कमी आएगी.

मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश जनसंख्या के मामले में देश का सबसे बड़ा राज्य है. यहां पेट्रोलियम उत्पादों की खपत भी अधिक है. उत्तर प्रदेश में पेट्रोल और डीजल का मूल्य भी देश के ज्यादातर राज्यों की अपेक्षा कम है तथा कई वर्षाें से कोई अतिरिक्त कर भी नहीं लगाया गया है, किन्तु पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि से आमजन को हो रही परेशानी से राहत दिलाने के लिए राज्य सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल के दामों में कमी का कदम उठाया गया है.

मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान में पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्य में वृद्धि के कारण हुई है. पिछले कई दिनों से पेट्रोल और डीजल के मूल्यों में हो रही बढ़ोत्तरी को नियंत्रित करने की मांग हो रही थी. उन्होंने कहा कि पेट्रोल और डीजल के दामों में कटौती के फैसले से प्रदेश के किसानों, नौजवानों सहित आमजन को बहुत राहत मिलेगी.

बिना नकेल का सांड़ हुआ रुपया

साल 2019 में आम लोकसभा चुनाव हैं. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए मुसीबतें चारों ओर से सूनामी की तरह आ गयीं हैं. जहां एक ओर देश में अराजकता का माहौल है, जातिवाद और धर्मांधता अपनी हद पर हैं. वहीं दूसरी ओर दुनिया में तेल की बढ़ती कीमतों से भारतीय रुपया न थमने वाली ढलान पर बिना नकेल के सांड़ की बेतहाशा दौड़ता जा रहा है.

पिछले कुछ समय से अमेरिकी डौलर के मुकाबले भारतीय रुपया गिर कर 73.77 के अपने निचले स्तर पर जा पहुंचा है. यह मौजूदा सरकार और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकेत हैं. नतीजतन, भारतीय रिजर्व बैंक अब सुधार के विकल्पों पर विचार कर रहा है. इसी के मद्देनजर आरबीआई ने तेल कंपनियों को अपने वर्किंग कैपिटल की जरूरतों को पूरा करने के लिए फौरेन करंसी लोन लेने की अनुमति दे दी है. यह फैसला उस समय लिया गया है जब ऐसा अंदाजा लगाया जा रहा था कि वह सीधे तेल कंपनियों को डौलर बेचेगा, पर ऐसा करने से उसका खजाना कमजोर पड़ जाता. ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक ने तेल कंपनियों को ही उधार लेने की अनुमति दे दी ताकि उस के पास फौरेन रिजर्व बचा रहे.

शेयर हुए धड़ाम

कच्चा तेल महंगा होने और रुपए में आई गिरावट के चलते शेयर बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ा. 4 अक्टूबर को कारोबार के दौरान सेंसेक्स 900 अंक लुढ़क गया. निफ्टी में भी 300 अंक की गिरावट आई. इस से निवेशकों को 3.21 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. सेंसेक्स में शामिल 30 में से 28 कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई.

इस अफरा तफरी का कांग्रेस ने फायदा उठाया और भाजपा सरकार पर निशाना साधा. उस का कहना है कि मोदी राज में रुपए में ऐतिहासिक गिरावट का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है. सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग इस समस्या पर बोलने से बच रहे हैं.

इस से सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें आ गई हैं. समस्या से बचने के लिए सरकार प्रवासी भारतीयों के लिए कोई आकर्षक जमा योजना ला सकती है ताकि भारी मात्रा में डौलर जुटा कर रुपए पर दबाव कम किया जा सके. पर यह जब होगा तब होगा. फिलहाल तो रुपया डौलर के मुकाबले बहुत कमजोर है जो देश की तरक्की की राह में बहुत बड़ा रोड़ा लग रहा है.

विवेक तिवारी हत्याकांड : रोज हो रहे हैं नए खुलासे

यूपी पुलिस की गोली से मारे गए विवेक तिवारी हत्याकांड में एक के बाद एक पहलू सामने आ रहे हैं. मालूम हो कि यूपी पुलिस के सिपाहियों ने आरोपी सिपाही के समर्थन में अभियान छेड़ा हुआ है, जिसका दिवंगत विवेक तिवारी की पत्नी कल्पना तिवारी ने विरोध किया है.

दिल पर हाथ रखकर सोचें

कल्पना का कहना है कि आरोपियों के लिए अभियान चलाने से पहले सिपाहियों को एक बार दिल पर हाथ रखकर सोचना चाहिए कि पीड़ित कौन है और किसके साथ अन्याय हुआ?

कल्पना ने एक चैनल से बातचीत में बताया कि इस जघन्य हत्या से उनका परिवार, वे और उनके बच्चे पूरी तरह बेसहारा हो गए हैं. कल्पना ने कहा कि एक आरोपी के लिए कैंपेन चलाया जा रहा है और कोई कुछ नहीं कर रहा. आखिर क्यों नहीं ऐसे लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए जो एक आरोपी के लिए चंदा दे रहे हैं?

इस पर विवेक के ससुर रमेश चंद्र शुक्ला ने भी सवाल उठाया है और यह अपील की है कि हत्यारोपी का साथ न दें.

जमा हो चुके हैं लाखों रूपए

इस हत्याकांड के बाद आरोपी सिपाही के समर्थन में सोशल मीडिया पर अभियान चलाया जा रहा है और साथ में अकाउंट की डिटेल भी दी जा रही है. इस अकाउंट में 5 लाख से भी अधिक की राशी जमा हो चुकी है.

सना ने नहीं बदला बयान

घटना की चश्मदीद गवाह रही सना को लेकर कल्पना ने कहा कि सना ने लगातार वही बोला है जो उसने पहले दिन कहा था. सना चाहती है कि विवेक के साथ न्याय हो और आरोपी पुलिस को कड़ी से कड़ी सजा मिले ताकि भविष्य में कोई बेगुनाह इस तरह न मारा जाए.

पुलिसकर्मी चलाएंगे अभियान

उधर, आरोपी सिपाही की बर्खास्तगी को लेकर उत्तर प्रदेश के पुलिसवालों ने अभियान छेड़ दिया है.
पुलिसकर्मी 5 अक्टूबर के दिन काली पट्टी लगाकर बर्खास्तगी का विरोध करेंगे और सरकार से यह मांग रखेंगे कि ड्यूटी के समय मारे गए पुलिसकर्मियों को भी 40-40 लाख और किसी आश्रित को सरकारी नौकरी दी जाए.

विवेक को सिर में मारी गई थी गोली

मालूम हो कि यूपी की राजधानी लखनऊ में एप्पल कंपनी में कार्यरत विवेक तिवारी फोन लौंच के एक कार्यक्रम के बाद देर रात घर जा रहे थे. उनके साथ उनकी जूनियर सना नामक युवती भी थी, जिन्हें विवेक घर छोड़ने जा रहे थे. लखनऊ के पौश एरिया गोमतीनगर विस्तार के पास ड्यूटी पर तैनात 2 सिपाहियों ने उन्हें कार रोकने के लिए कहा पर विवेक ने कार नहीं रोकी. इस पर उनमें से एक सिपाही ने गोली चला दी, जिससे घटनास्थल के पास ही विवेक की मौत हो गई.

इस हत्याकांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था और खुद गृहमंत्री राजनाथ सिंह व यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा था.

कोयले पर अदालत के फैसले और अपने ही कानून से बेपरवाह सरकार

2014 में चुनाव अभियान के वक्त नरेन्द्र मोदी ने कोयला उद्योग में सुधार को अपने विकास एजेंडे के केन्द्र में रखने का वादा किया था. उस साल सितंबर में सर्वोच्च अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कोयला खंड में प्रायः समस्त आबद्ध खनन को रद्द कर दिया था. इस फैसले ने एक बड़े घोटाले- कोलगट- पर रोक लगा दी थी. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार के पतन में इस घोटाले का कम योगदान नहीं था.

सर्वोच्च अदालत ने भारत सरकार और सार्वजनिक कंपनियों को निजी कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रम बनाने से रोक दिया था जिसके जरिए आवंटित कोयला खंड में निशुल्क उत्खनन कर निजी कंपनियां मुनाफा कमा रही थीं. अदालत ने अपने फैसले में कहा थाः ‘‘सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह देश की प्राकृतिक संपदा को कुछ लोगों की निजी संपत्ति नहीं मानेगी जो मनमर्जी से इसे लुटा दें.’’ अपने फैसले में अदालत ने कुल 214 संयुक्त उपक्रम और कोयला खंड आवंटनों को रद्द कर दिया था.

2014 के सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले ने कोयला उद्योग के लिए नए कानूनों और सुधारों के लिए जमीन तैयार की. अगले साल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने इन बदलावों को लक्षित कर दो कानून पारित किएः कोयला खान (विशेष प्रावधान) विधेयक 2015 और खान और खनिज विकास विनियमन अधिनियम. कोयला मंत्रालय ने अपनी प्रेस रिलीज में इसके बारे में कहा, ‘‘यह वर्ष इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा.’’ कोयला खनन कानून में यह व्यवस्था की गई है कि पहले जिन खंडों का आवंटन रद्द किया गया है वे खंड निजी या सार्वजनिक कंपनियों को निलामी के जरिए आवंटित होंगे या सीधे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को सौंप दिए जाएंगे.’’

कानून को पारित हुए तीन साल हो चुका है. लेकिन क्या यह लागू हो रहा? यह एक बड़ा सवाल है. सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकरी से पता चलता है कि कोयला मंत्रालय के पास निजी कंपनियों और सार्वजनिक कंपनियों के बीच हुए करारों से जुड़े दस्तावेजों की कॉपी नहीं हैं. सरकारी जांच के आभाव में आज भी वह सब हो रहा है जिसे अवैध कह कर सर्वोच्च अदालत ने रोक दिया था. 2014 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और उसके बाद बनाए गए कानूनों के अप्रभावी क्रियान्वयन से आज भी निजी कंपनियों को वैसा ही फायदा हो रहा है जैसा पहले होता था.

कोयला खान कानून के पारित होने के बाद से अब तक कुल कोयला खंड का 27 प्रतिशत नीलामी के जरिए आवंटित किया गया है और 84 प्रतिशत के आस पास को सीधे सार्वजनिक कंपनियों को सौंप दिया गया. नीलामी के जरिए आवंटित खंडों के बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणा की थी, ‘‘मात्र 33 खंडों के आवंटन से दो लाख करोड़ रुपये की आय यह साबित करती है कि नीतिगत प्रशासन से भ्रष्ट व्यवस्था को खत्म किया जा सकता है.’’ किंतु कोयला और स्टील के लिए संसद की स्थाई समिति की इस साल अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान सरकार के कार्यकाल में इस वर्ष अप्रैल माह तक कोयला आवटंन से प्राप्त राजस्व 5399 करोड़ रुपये है. समाचार पत्र बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के हवाले से इस साल जून तक कोयला आवंटन से प्राप्त कुल राजस्व 5684 करोड़ रुपये है जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दावे का मात्र 3 प्रतिशत है.

जिन सार्वजनिक कंपनियों को कोयला खंड आवंटित किया गया उनमें से अधिकांश ने निजी कंपनियों को माइन डिवेलपर कम आपरेटर (एमडीओ) नियुक्त किया है जिन पर खदान के रखरखाव, विकास और संचालन की जिम्मेदारी है. जबकि सार्वजनिक कंपनियों और एमडीओ के बीच होने वाले करार केन्द्र सरकार और कोयला मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं हो सकते तो भी निजी कंपनियां इन समझौतों की शर्तों का खुलासा करने से इनकार करती हैं. इस तरह की अपारदर्शिता 2014 के सर्वोच्च अदालत के फैसले और उसके बाद पारित कानूनों के खिलाफ है.

यहां दो तरह की समस्या देखी जा सकती है. सीधे तौर पर आवंटित किए खंडों का 75 प्रतिशत सरकारी स्वामित्व वाली ऐसी कंपनियों (पीएसयू) को दिया गया है जिनके पास उत्खनन का सीमित या शून्य अनुभव है. इन पीएसयू ने एमडीओ के साथ ऐसे करार किए हैं जो अनुचित तरीके से एमडीओ को लाभ पहुंचाते हैं. हाल में 21 कोयला खंडों के लिए हुए 16 एमडीओ करारों का पता लगा है. जो पीएसयू इन समझौतों में शामिल हैं वे हैं: राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड, छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड, पंजाब स्टेट पॉवर कॉरपोरेशन लिमिटेड, और पश्चिम बंगाल पॉवर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन. ये कंपनियां राज्य सरकार द्वारा संचालित हैं और इनमें से अधिकांश कंपनियों के पास कोयला उत्खनन का कोई अनुभव नहीं है.

खनन कानून में ‘‘खनन ठेकेदार’’ जैसा शब्द नहीं है और इसमें एमडीओ का उल्लेख भी नहीं किया गया है. देश के कोयला उद्योग के लिए बने किसी भी कानून में एमडीओ के बारे में कुछ नहीं लिखा है. कानून बस इस बात की इजाजत देता है कि कंपनी सिर्फ खदान के विकास के लिए बाहरी पार्टी से समझौता कर सकती है यदि वह पार्टी ठेकेदार है, एमडीओ नहीं. ठेकेदार और एमडीओ में अंतर बहुत स्पष्ट है.

खनन ठेकेदार का काम कोयला खंड में उत्खनन करना और पीएसयू के प्रोजक्ट तक कोयले को पहुंचाना है. ऐसे ठेकेदार को खनन और ढुलाई की फीस अदा की जाती है. पीएसयू पर मालिकाना अधिकार रखने वाली राज्य सरकारों द्वारा जारी टेंडर के अनुसार एमडीओ पर उत्खनन परियोजनाओं में आरंभिक निवेश, योजना निर्माण, खदानों का विकास और संचालन और कोयल की आपूर्ति ‘‘प्रतिस्पर्धात्म मूल्य’’ में करने की जिम्मेदारी है. इससे होता यह है कि पीएसयू को बाजार भाव में कोयला खरीदना पड़ रहा है क्योंकि इन्हें उत्खनन सेवा के अतिरिक्त कोयले का पूर्ण भुगतान एमडीओ को करना पड़ता है. यानी, पीएसयू को आवंटित कोयला खंड से कोयला निकालने पर खुद पीएसयू को कीमत चुकानी पड़ रही है. उर्जा उत्पादक कंपनियों को कोयला खंड आवंटन की व्यवस्था इसलिए की गई थी कि उन्हें बिचैलियों से छुटकारा मिल सके और इससे होने वाले लाभ को ये कंपनियां उपभोक्ताओं को हस्तांतरित कर सके.

सर्वोच्च अदालत के 2014 के निर्णय वाले मामले के एक याचिकाकर्ता सुदीप श्रीवास्तव ने मुझे बताया, ‘‘नए कानून में एमडीओ की कोई व्यवस्था नहीं है’’. जो कानून 2014 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन हेतु लाया गया हो वही कानून और उससे संबंधित नियम फैसले के विपरीत एमडीओ की अनुमति कैसे दे सकते हैं? यदि एमडीओ के पास सार्वजनिक कंपनी की ओर से भूमि अधिग्रहण करने और पर्यावरण संबंधित अनुमति लेने की शक्ति है तो उसे कैसे ठेकेदार माना जा सकता है?’’

प्रियांशु गुप्ता बताते हैं, ‘‘असल में सार्वजनिक कंपनिया छद्म कंपनियों की भांति काम कर रही हैं और एमडीओ की व्यवस्था से निजीकरण के लिए पीछे का दरवाजा खोल दिया गया है.’’ प्रियांशु एक शोधकर्ता और छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के सदस्य हैं. यह आंदोलन दो दर्जन जन संगठनों, ट्रेड यूनियनों और नागरिक समूहों का गठबंधन है. इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली में जुलाई में प्रकाशित लेख में गुप्ता और अनुज गोयल (गोयल भी छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के सदस्य)- ने लिखा है, ‘‘कोयला उत्खनन में एमडीओ के रास्ते रिस्क रिर्टन (जोखिम से सुरक्षा) का प्रावधान निजी कंपनियों को आकर्षित करता है.’’ आगे लेख में बताया गया है कि ‘‘सरकारी कंपनियों द्वारा कोयले का उत्खनन कार्य व्यावसायिक रूप से अधिक फायदेमंद है क्योंकि इन्हें उच्च मूल्य चुकाना नहीं पड़ता. बल्कि प्रत्येक एक सौ टन उत्खनन में 100 रुपये रॉयल्टी देनी होती है. विकास जोखिम और अग्रिम खर्च सरकारी कंपनियों को उठाना होता है.’’

उदाहरण के लिए 2015 की मई में छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड ने जो टेंडर गारे पेलमा सेक्टर-3 खदान में उत्खनन के लिए टेंडर जारी किया था उसमें उल्लेख है, ‘‘उत्खनन परियोजनाओं में अधिकांश निवेश एमडीओ करेगा और वह सीएसजीपीसीएल को प्रतिस्पर्धात्मक मूल्य में कोयला आपूर्ति सहित योजना विकास, कोयला खदान के संचालन और सभी आवश्यक गतिविधियों को पूरा करेगा.’’ श्रीवास्तव कहते हैं कि यह व्यवस्था प्रभावकारी रूप से बिना नीलामी के कोयला खंड को निजी कंपनी के हवाले कर देती है. इसके बाद निजी कंपनी कोयले को सार्वजनिक कंपनी को वापस बेच देती है. ‘‘कोयले की ‘बिक्री’ की जगह ये लोग ‘आपूर्ति’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं जो वास्तव में बिक्री ही है’’.

श्रीवास्तव बताते हैं कि कच्चे कोयले की प्रोसेसिंग प्रक्रिया में निकलने वाला निचले दर्जे का कोयला, जिसे औद्योगिक भाषा में मिडलिंग्स या रिजेक्ट कहा जाता है, भी एमडीओ को सौंप दिया जाता है. श्रीवास्तव के अनुसार ‘‘यह कोयला भी बाजार में बिक जाता है. खनन किए गए कोयले का 22 से 35 प्रतिशत हिस्सा रिजेक्ट होता है.’’ सरकारी और निजी कंपनियों के बीच होने वाले करारों की जांच करने में कोयला मंत्रालय की असफलता के चलते इस नए पीएसयू-एमडीओ मॉडल को- जो निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाता है- फलने-फूलने का अवसर दिया है.

कोयला खान कानून में साफ तौर पर कहा गया है कि जिन कंपनियों को कोयला खंड आवंटित किया गया है उन्हें ठेकेदारों से काम करवाने के संबंध में केन्द्र या राज्य सरकारों को जानकारी देनी होगी. कानून कहता हैः ‘‘ऐसे मामलों में जहां कोयला उत्खनन से संबंधित कार्य में, कोयला खदान का विकास ठेकेदार के जरिए कराया जाएगा, वहां ऐसा प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी प्रक्रिया के जरिए किया जाएगा और जब आवंटन हासिल करने वाली कंपनी ठेकेदारों को इस्तेमाल करेगी तब वह संबंधित राज्य सरकार, केन्द्र सरकार और नामनिर्दिष्ट प्राधिकारी को जानकारी कराएगी. साथ ही, करार के होने के बाद जल्द से जल्द इसकी शर्तों के बारे में भी सूचित करेगी.’’

केन्द्र सरकार ने जो आवंटन समझौते का प्रारूप तैयार किया है उसमें भी साफ तौर पर कहा गया है कि पीएसयू और अनुबंधित ठेकेदार के बीच हुए करार की हस्ताक्षर की गई कॉपी नामनिर्दिष्ट प्राधिकारी- कोयला मंत्रालय के सचिव- के पास करार के लागू होने के 15 दिनों के भीतर जमा की जाएगी. कोयला खान  विधेयक जब से पारित हुआ है तब से लेकर हाल तक 89 खंडो को पुनः आवंटित किया गया है और 59 कोयला खदानों को सीधे सीधे पीएयू के हवाले कर दिया गया है.

कोयला मंत्रालय यह स्वीकार करता है कि- उसने इस बारे में कोई कारण नहीं दिया है- उसके पास पीएसयू और एमडीओ के बीच हुए किसी भी करार की कॉपी नहीं है. अनुज गोयल के आरटीआई निवेदन के जवाब में 24 अगस्त 2018 को कोयला मंत्रालय ने बताया है कि उसके पास किसी भी एमडीओ समझौते की कॉपी नहीं है और मंत्रालय ने 17 अगस्त को सभी राज्य सरकारों को पत्र लिख कर एमडीओ के साथ संबंधित करार की कॉपी भेजने को कहा है.

बार बार जानकारी मांगने पर पीएसयू ने एमडीओ के बारे में जानकारी देने से इनकार कर दिया. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने कोयला मंत्रालय, 13 राज्य सरकारों, केन्द्र, पश्चिम बंगाल एवं झारखंड सरकार द्वारा संयुक्त रूप से संचालित दामोदर घाटी कॉर्पोरेशन, और उत्तर प्रदेश और केन्द्र द्वारा संचालित टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड को 34 आरटीआई आवेदन किए हैं. इन आवेदनों के जवाब मैंने देखे हैं. खनन गतिविधियों पर प्राधिकार रखने वाले राज्य सरकार के विभागों ने जवाब में लिखा है कि उनके पास एमडीओ करार की कोई भी कॉपी नहीं है. जबकि संबंधित पीएसयू ने एमडीओ के बारे में कोई भी जानकारी देने से इनकार कर दिया है.

उदाहरण के लिए 2018 की मई में खाग्रा जयदेव और टूबेड खदानों के एमडीओ के बारे में मांगी गई सूचना के बारे में दामोदर घाटी कॉर्पोरेशन ने बताया थाः माइन डिवेलपर कम ऑपरेटर के साथ जो समझौत हुआ है गोपनीय और भारी भरकम दस्तावेज है इसलिए इसकी कॉपी साझा नहीं की जा सकती.’’ इसी प्रकार तेलंगाना राज्य विद्युत उत्पादन कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने मई 2018 में एएमआर से करार के बारे में आरटीआई का जवाब देते हुए लिखा है, ‘‘इस बारे में जानकारी आरटीआई कानून के बाहर है क्योंकि इसमें जो जानकारियां है वह व्यावसायिक भरोसे और व्यापार गुप्तता से संबंधित हैं जो कंपनी के बौद्धिक हितों को नुकसान पहुंचा सकती हैं.’’ कंपनी ने यह भी दावा किया कि ‘‘इस समझौते को विशेषज्ञों ने बहुत समय लगा कर तैयार किया है और विशेषज्ञों से राय लेने के लिए भारी फीस चुकाई गई है.’’

मार्च 2018 में द कैरेवन में प्रकाशित खोजी रिपोर्ट कोलगेट 2.0 में इस बात का खुलासा किया गया था कि राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवियूएनएल) और अडानी समूह की कंपनी अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड का संयुक्त उपक्रम सर्वोच्च अदालत के 2014 के फैसले से पहले वाली शर्तों पर ही काम कर रहा है. जून 2018 की आरटीआई आवेदन के जवाब में आरआरवियूएनएल ने भी यही कहा कि ‘‘अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड के साथ उसके एमडीओ करार की जानकारी तकनीकी और व्यावसायिक रूप से गुप्त जानकारी है’’ जिसके कारण आरआरवियूएलएल यह जानकारी साझा नहीं कर सकती क्योंकि इससे एमडीओ, जो कि एक थर्ड पार्टी है, उसके व्यावसायिक हितों को गंभीर नुकसान पहुंचेगा.’’ जून 2018 में परसा ईस्ट और केटे बासन और परसा और केटे एक्सटेंशन खंड के साथ उसके खनन करार को आरआरयूवियूएनएल ने साझा तो किया लेकिन उस करार की कॉपी में सभी तकनीकी और व्यवसायिक शर्तों को मिटा कर.

10 अगस्त को कोयला मंत्री पीयूष गोयल ने राज्य सभा में कहा था कि एमडीओ करारों के लिए मॉडल अनुबंध करार में सूचना के अधिकार कानून 2005 के प्रावधानों और खुलासे की आवश्यकताएं लागू होती हैं. एमडीओ समझौते से संबंधित सूचना देने से इनकार कर, पीएसयू कोयला मंत्री के संसद में दिए बयान का उल्लंघन कर रही हैं.

दाती दुष्कर्म मामला : हाईकोर्ट ने पुलिस जांच पर सवाल उठाया, मामला सीबीआई को सौंपा

जिस व्यक्ति ने संत का चोला पहन लिया, वह मनुष्यों के बनाए तमाम कानूनों से ऊपर समझ लिया जाता है. इस तरह की सोच धर्मांध लोगों में ही नहीं, सरकारी मुलाजिमों में गहरे तक बैठी हुई है. दिल्ली पुलिस ने बहुचर्चित दाती दुष्कर्म मामले में हाईकोर्ट को सौंपी अपनी रिपोर्ट में खुद ही फैसला दे दिया कि पीड़ित लड़की के बयानों में विरोधाभास है और आरोपी दाती महाराज के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं है. आरोप पत्र में पुलिस ने पीड़िता को ही कठघरे में खड़ा कर दिया था.

अदालत ने पुलिस की जांच पर सवाल उठाते हुए मामला अपराध शाखा से ले कर सीबीआई को देने का आदेश दे कर इंसाफ का रास्ता ही साफ करने की कोशिश की है.

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन एवं न्यायाधीश वीके राव की पीठ ने पीड़ित युवती की शिकायत स्वीकार करते हुए जांच सीबीआई को देने का आदेश दिया है. पीठ ने जांच में खामियां बरतने पर कि इस मामले की पूरी जांच प्रभावित नजर आ रही है.

पीठ ने आदेश में कहा है कि यह विडंबना ही है कि अगर इस मामले के आरोप पत्र को देखा जाए तो जांच एजेंसी ने पीड़िता के बयान लेने के बाद आरोपी को गिरफ्तार करने की बजाय उसे ही कठघरे में खड़ा कर दिया है. पीड़िता ने दाती महाराज और उन के तीन भाईयों पर गंभीर आरोप लगाए थे. इस के बावजूद आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया.

दिल्ली पुलिस की ओर से आरोप पत्र में कहा गया कि इस मामले में शिकायतकर्ता के बयानों में विरोधाभास बताया गया है पर हाईकोर्ट ने कहा कि आरोप पत्र इस तरह तैयार किया गया है कि पीड़िता के बयान विरोधाभासी हैं जबकि पुलिस का काम उन बयानों के आधार पर सच तक पहुंचना था न कि आरोपियों को पीड़िता के आरोपों को झुठलाना. लेकिन ऐसा किया गया जो कि इस तरह के गंभीर अपराध के मामले में न्यायसंगत नहीं है.

आरोप पत्र में यह भी कहा गया है कि मुख्य पीड़िता के अलावा इस मामले में 54 अन्य लड़कियों को गवाह बनाया गया है. ज्यादातर ने आरोपों को गलत बताया है. इस पर हाईकोर्ट ने कहा है कि जिस तरह से यौन शोषण के मामले की जांच पुलिस ने की है वह चौंकाने वाली है. एक साथ 4 दर्जन से ज्यादा महिलाओं को एक बस में  ले जाया जाता है और वहां उन से पूछताछ होती है. प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि यह जैसे इन्हें सैरसपाटे के उद्देश्य से लाया गया हो. इस तरह की जांच पर कैसे भरोसा किया जा सकता है. यह आश्यर्चजनक है कि  4 दर्जन से ज्यादा महिलाओं से एक साथ पूछताछ पुलिस से किस प्रकार संभव की.

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस का यह रवैया आरोपियों के प्रति उन के प्रभाव को दर्शाता है. अदालत ने यह भी कहा कि अगर कोई विरोधाभास है भी तो अदालत जमानत के वक्त आरोपी को राहत दे सकती है लेकिन इस के लिए गिरफ्तारी जरूरी है.

राजस्थान की एक युवती ने दाती महाराज पर यौन शोषण का आरोप लगाया था. पुलिस कई महीनों से जांच में जुटी थी. युवती ने दिल्ली के फतेहपुर बेरी और राजस्थान के पाली स्थित आश्रम में बलात्कार किए जाने का आरोप लगाया था.

दरअसल बाबाओं के ऊपर पहले तो कोई आरोप लगाने की हिम्मत नहीं कर सकता. अगर कोई साहस करता भी है तो पुलिस मामला दर्ज करने से कतराती है. मामला दर्ज हो भी गया तो जांच में कई तरह के दबाव का सामना करना पड़ता है. दाती के मामले में भी संभव है  पुलिस को दबाव झेलना पड़ा हो क्योंकि धार्मिक प्रवचन देते वक्त कई टेलीविजन चैनलों के संपर्क में आने से बाबाओं की पहुंच नेताओं, अफसरों और मीडिया के प्रभावशाली लोगों से हो जाती है. इस दौरान कई बाबा बेशुमार दौलत के मालिक बन जाते हैं इसलिए पैसा और प्रभाव किसी भी तरह की जांच पर असर डालने के लिए काफी है.

इस देश में ऐसे अनगिनत मामले आते हैं जहां पुलिस पीड़ित व्यक्ति के न्याय की राह में रोड़ा डालने से नहीं चूकती. उच्च अदालतों का ही यह साहस है कि वह पीड़ित को आखिरी तक न्याय दिलाने की कोशिश करती है.

डेब्यू मैच में शतक बनाने वाले सबसे कम उम्र के भारतीय बने पृथ्वी शौ

कल तक वेस्टइंडीज के खिलाफ भारतीय क्रिकेट टीम पर विवाद हो रहा था कि सीनियर खिलाड़ियों की अनदेखी कर क्यों नए खिलाड़ियों को चुना गया? क्या वेस्टइंडीज की टीम इतनी कमजोर है कि ऐसा फैसला लिया जाए? क्योंकि अगर मेहमान टीम अगर कहीं मेजबानों पर भारी पड़ गई तो क्रिकेट की दुनिया में भारत की किरकिरी हो जाएगी.

लेकिन राजकोट में खेले गए अपने पहले टेस्ट मैच में शतक जड़ कर 18 साल के पृथ्वी शौ ने साबित कर दिया कि उन्हें टीम में चुन कर चयनकर्ताओं ने कोई गलती नहीं की है.

पृथ्वी शौ डेब्यू टेस्ट में शतक लगाने वाले सब से युवा भारतीय क्रिकेटर बन गए हैं. पर यह कोई तुक्का नहीं था क्योंकि इस ‘नन्हें जादूगर’ ने पहले भी अपनी कलाइयों की जादूगरी दिखा रखी है.

पृथ्वी शौ बचपन में ही यह साबित कर चुके थे कि वे भविष्य में क्रिकेट की दुनिया में लंबी रेस का घोड़ा बनेंगे. महज 4 साल की उम्र में अपनी मां को खो देने वाले पृथ्वी शौ को उन के पिता पंकज शौ ने अकेले ही पाला. क्रिकेट में उनके हुनर को पहचान कर पंकज शौ ने अपनी जिंदगी का सब से बड़ा दांव खेला और अपने बेटे को बेहतरीन खिलाड़ी बनाने के लिए अपना सब कुछ झोंक दिया. पृथ्वी को बल्लेबाज बनाने के लिए उन्होंने खुद उन का गेंदबाज बनने में भी कोई झिझक महसूस नहीं की.

पिता की मेहनत का ही नतीजा था कि स्कूल क्रिकेट से ले कर अब तक पृथ्वी शौ ने शानदार प्रदर्शन किया है. उन्होंने रणजी ट्रौफी और दिलीप ट्रौफी में कई रिकौर्ड अपने नाम किए. दिलीप ट्रौफी में शतक लगाने वाले वे सब से युवा बल्लेबाज थे. इस से पहले यह रिकौर्ड सचिन तेंदुलकर के नाम था. पृथ्वी ने आईपीएल में भी धमाकेदार शुरुआत की थी.

राजकोट में अपने पहले टेस्ट मैच में 134 रन बना कर पृथ्वी शौ ने साबित कर दिया है कि वे सिर्फ क्रिकेट खेलने के लिए ही बने हैं और आने वाले समय में अपने उम्दा खेल से क्रिकेट को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे.

बस 3 स्टेप्स और आप के फोन नंबर या बैंक अकाउंट से डीलिंक हो जाएगा आधार

सुप्रीम कोर्ट के आधार पर आए हालिया फैसले की देश भर में काफी सराहना हो रही है. वहीं कई लोगों का कहना है कि कोर्ट के इस फैसले से लोगों को आंशिक रूप से फायदा मिलेगा. उनका मानना है कि इस फैसले में अभी भी बहुत से पेंच हैं. जिसके कारण उपभोक्ता चाहते हुए भी आधार के झोल से बच नहीं सकता. हालांकि कोर्ट के फैसले से बाद अब लोगों को आगे बढ़कर अपनी आवाज उठानी होगी. सभी सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं को, जो आधार के बिना सेवाएं देने से इंकार करती हैं, उनके खिलाफ लड़ाई लड़नी होगी. किसी भी सेवा के बदले आधार की जानकारी साझा करना अब जरूरी नहीं है. आधार आपके किसी भी आम पहचान पत्र की तरह ही है.

इसी क्रम में हम लाए हैं एक बेहद महत्वपूर्ण जानकारी. अगर आप अपने आधार की जानकारी अपने बैंक या अपनी मोबाइल फोन की सेवा प्रदान करने वाली कंपनी के साथ साझा नहीं करना चाहते तो ये खबर आपके लिए है. हम आपको बताने वाले हैं कि आप अपने मोबाइल फोन या बैंक से अपने आधार को कैसे डीलिंक कर सकते हैं.

अपने फोन और बैंक से आधार को डीलिंक करने के लिए इन स्टेप्स को फौलो करें

  • सबसे पहले आप उस कंपनी के कस्टमर केयर नंबर पर कौल करें. कस्टमर केयर एक्जेकेटिव आपसे आपका ईमेल मांगेगा, जिसपर वो आपको उस सेवा से आधार को डीलिंक करने का ईमेल भेजेगा. उसमें आपके आधार की सौफ्ट कौपी मांगी जाएगी. आपको अपने आधार कार्ड की फोटो संस्था को भेजनी होगी. इसके कुछ ही देर में आपको उस संस्था से मेल प्राप्त होगा, जिसमें इस बात का कंफर्मेशन होगा कि आपके आधार को उस सेवा से अगले 72 घंटों में डीलिंक कर दिया जाएगा.
  • इसके अलावा आप उस संस्था के अधिकारिक वेबसाइट पर जा के लौगइन करिए. आपका अकाउंट खुलते ही एक टैब में आधार डीलिंक करने का औप्शन दिखेगा.
  • अगर आपको कंपनी/संस्था की वेबसाइट पर आधार डीलिंक करने का औपशन नहीं मिलता है तो आप एक ऐप्लिकेशन फौर्म भर के संस्था/कंपनी को भेज सकते हैं. ऐप्लिकेशन में आपको आधार की पूरी जानकारी, अपनी जानकीरी, नाम, पता, जैसी मूलभूत जानकारियां देनी होगी.

रिलायंस के खिलाफ इरिक्सन ने दायर की याचिका, पढ़ें पूरा मामला

स्वीडन की टेलीकौम उपकरण बनाने वाली कंपनी इरिक्सन ने रिलायंस टेलीकौम की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. बीते बुधवार इरिक्सन ने अनिल अंबानी की कंपनी आरकौम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. याचिका में ये मांग की गई है कि अनिल अंबानी और दो अन्य निवेशकों के बिना इजाजत विदेश जाने पर रोक लगे. कोर्ट इस मामले पर सुनवाई गुरुवार को करेगी.

दरअसल, आरकौम पर इरिक्सन के 1100 करोड़ रुपयों का बकाया हैं. इससे पहले स्वीडिश कंपनी ने ये मामला नेशनल कंपनी ट्रिब्यूनल (NCLT) के सामने उठाया था. NCLT ने आरकौम को 30 सितंबर से पहले इरिक्सन को 550 करोड़ की रकम चुकाने के आदेश दिए थे, पर रिलायंस पैसे वापस ना कर सकी. इरिक्सन का आरोप है कि रिलायंस कोर्ट का आदेश नहीं मानती. वो चाहते हैं कि रिलायंस के खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला चलाया जाए.

इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया में रिलायंस कम्युनिकेशन ने कहा कि दुरसंचार न्यायधिकरण से उन्हें राहत दी गई है. रिलायंस ने बकाया वापस करने के लिए 60 दिनों का वक्त मांगते हुए कहा कि वो अपने स्पेक्ट्रम की नीलामी करेंगे, जिससे अदा हुई रकम से वो इरिक्सन की बकाया राशि वापस करेंगे.

इससे पहले रिलायंस ने कहा था कि कंपनी को दिवालिया घोषित करने की सूरत में वो बकाया राशि वापस नहीं कर पाएंगे. जिस पर इरिक्सन ने कोर्ट से ये अपील की थी कि जब तक उनका बकाया ना मिले तब तक आरकौम को दिवालिया घोषित करने की प्रकिया शुरू ना हो.

आपको बता दें कि इरिक्सन ने रिलायंस टेलीकौम के साथ मिल कर 2012 में भारत में अपना काम शुरू किया. दोनों कंपनियों के बीच सात सालों का करार था. इस दौरान आरकौम पर 1100 करोड़ का बकाया हो गया.

क्या भीमा कोरेगांव मामले में अलग फैसला आने वाला था?

भीमा कोरेगांव मामले में पांच सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और वकीलों की गिरफ्तारियों के खिलाफ दायर याचिका पर सर्वोच्च अदालत ने 28 सितंबर के दिन फैसला सुनाया. महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में इस साल जनवरी में हुई हिंसा की घटना से कथित तौर पर संबंधित होने के आरोपों में इन लोगों को गिरफ्तार किया गया है. याचिका में इन लोगों को रिहा करने और मामले की जांच अदालत की निगरानी वाली विशेष जांच टीम (एसआईटी) से कराए जाने की मांग की गई थी. तीन जजों की पीठ ने बहुमत से अपने फैसले में याचिका को रद्द कर दिया. न्यायाधीश एएम खानविलकर ने अपने और मुख्य न्यायाधीश की ओर से फैसला लिखा था जबकि जस्टिस चंद्रचूड़ ने विपरीत फैसला सुनाया.

गौरतलब है कि 27 सितंबर की शाम तक सर्वोच्च अदालत की वेबसाइट में यह बताया गया था कि इस मामले में जस्टिस चंद्रचूड़ ही फैसला पढ़ेंगे.

हर दिन सर्वोच्च अदालत अगले दिन की होने वाली सुनवाइयों की जानकारी- मुकदमा सूची – को अपनी वेबसाइट में अपलोड करती है. इस सूची में मामले की सुनवाई करने वाले जजों के नाम, सुनवाई के लिए तय समय और फैसला पढ़ने वाले जजों की जानकारी होती है.

27 सितंबर को जारी सूची के अनुसार भीमा कोरेगांव मामले से संबंधित याचिका पर एकमात्र जस्टिस चंद्रचूड़ का फैसला आना था. वे ही इस फैसले को पढ़ने वाले थे. सुनवाई की सुबह सर्वोच्च अदालत की रजिस्ट्री ने वेबसाइट पर नोटिस अपलोड कर स्पष्टीकरण दिया कि ‘‘माननीय न्यायाधीश चंद्रचूड़ द्वारा पढ़े जाने वाले फैसले को न्यायाधीश खानविलकर और मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा द्वारा पढ़ा गया फैसला माना जाए.’’

चलन के हिसाब से भीमा कोरेगांव मामले की मुकदमा सूची में जस्टिस चंद्रचूड़ के साथ जस्टिस खानविलकर का नाम भी होना चाहिए था. उदाहरण के लिए, 28 सितंबर के ही दिन मुख्य न्यायाधीश की बेंच में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से संबंधित मामले की सुनवाई होने वाली थी. इस मामले की सूची में लिखा था, ‘‘फैसला सुनाएंगे : माननीय मुख्य न्यायाधीश, माननीय न्यायाधीश रोहिंटन फली नरीमन, माननीय न्यायाधीश डा डी.वाय. चंद्रचूड़, माननीय न्यायाधीश इंदू मल्होत्रा’’. (खानविलकर पांचवें न्यायाधीश थे.)

Was Chandrachud Dissent In The Bhima Koregaon Case

भीमा कोरेगांव में खानविलकर द्वारा फैसला सुनाए जाने वाले रजिस्ट्री नोटिस में इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि पहले के नोटिस में क्यों गलती हुई थी. सर्वोच्च अदालत के लिस्टिंग रजिस्ट्रार ने इस संबंध में हम से से बात करने से इनकार कर दिया.

याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने बताया कि नोटिस में खानविलकर का नाम गलती से नहीं छूटा होगा. भूषण कहते हैं, ‘‘यह सरकार के लिए सबसे अहम केस है’’ और हो सकता है कि सरकार को जब यह पता चला होगा कि चंद्रचूड़ फैसला लिख रहे हैं तो ‘‘वह घबरा गई हो.’’

मामले में दूसरे याचिकाकर्ता के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने यह कह कर फैसले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि वे खुद इस केस में वकील हैं. अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी यह कहते हुए बोलने से मना कर दिया कि ‘‘सैद्धांतिक रूप से जिस मामले में वह अदालत में पेश होते हैं उस पर कोई टिप्पणी नहीं करते.’’

चंद्रचूड़ के असहमति वाले फैसले के एक महत्वपूर्ण पक्ष की ओर इशारा करते हुए प्रशांत भूषण यह दावा करते हैं कि चंद्रचूड का फैसला पहले सर्वसम्मत फैसला था. वह बताते हैं कि चंद्रचूड़ ने अपने असहमति वाले फैसले में लिखा है कि ‘‘वह यह फैसला सुनाते हैं कि विशेष जांच टीम के गठन के बारे में तीन दिन बाद सुनवाई की जाए.’’ यह अजीब बात है कि असहमति वाला फैसला देने वाला जज केस की सुनवाई के लिए तारीख दे, जबकि बहुमत के फैसले ने इस याचिका को रद्द कर दिया है. भूषण का मानना है, ‘‘यदि यह सिर्फ असहमति होती तो चंद्रचूड़ कभी ऐसा नहीं लिखते.’’

चंद्रचूड़ के फैसले में और भी ऐसी बातें हैं जो आमतौर पर अहसमति का फैसला सुनाने वाले जजों के फैसलों में दिखाई नहीं देतीं. उनके फैसले के अंतिम पैराग्राफ में ऊपर लिखा है ‘‘विशेष जांच टीम अपनी आवधिक स्टेटस रिपोर्ट अदालत के सामने रखेगी. आरंभ में वह मासिक रूप में ऐसा करेगी.’’ वहीं बहुमती फैसले में अदालत की निगरानी वाली एसआईटी की मांग को खारिज कर दिया गया है और पुणे पुलिस को अपनी जांच को जारी रखने की अनुमति दी गई है. अपनी उपरोक्त टिप्पणी के नीचे चंद्रचूड़ ने एक फुटनोट लिख कर स्वीकार किया है कि यह उनका असहमति वाला फैसला है. इसके बावजूद चंद्रचूड़ ने अंतिम पैरा में दिए अपने निर्देश के संबंध में कोई स्पष्टिकरण नहीं दिया है जिसमें वह लिखते हैं: ‘‘क्योंकि यह मेरा अल्पमत वाला विचार है इसलिए मैंने यहां ये नहीं बताया है कि एसआईटी के सदस्य कौन लोग होंगे. यदि इसका मौका आता है तो इस मामले में अदालत से निर्देश लेने की छूट दी जाती है.’’

चंद्रचूड़ अपने फैसले के अल्पमत होने का उल्लेख आगे भी करते हैं. प्रशांत भूषण का मानना है कि चंद्रचूड के फैसले को पढ़ने से लगता है कि यह पहले तीनों जजों का फैसला था. वह कहते हैं कि ऐसा लगता है कि खानविलकर का फैसला जल्दबाजी में रातोरात लिखा गया था.’’

बहुमती फैसले में कहा गया है कि ‘‘जांच एजेन्सी को बदलने की मांग आरोपी नहीं कर सकता और वह यह भी नहीं बता सकता की जांच कैसे की जानी चाहिए. चाहे वह कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग ही क्यों न कर रहा हो.’’ लेकिन चंद्रचूड़ अपनी बात पर जोर देने के लिए खानविलकर द्वारा उल्लेखित चार केसों को चुनौती देते हैं. वह इन मामलों के उल्लेख पर अत्यंत महत्वपूर्ण चिंता व्यक्त करते हैं.

चंद्रचूड़ ने लिखा है कि उल्लेखित दो मामलों में-जिसमें से एक में स्वयं खनविलकर ने फैसला सुनाया था- सर्वोच्च अदालत ने निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच का हवाला देकर सीबीआई को मामला सौप दिया था. इस मामले को हस्तांतरित करने के विरोध में उल्लिखित दो अन्य मामलों के बारे में चंद्रचूड़ ने महत्वपूर्ण बातें कही हैं जो प्रस्तुत मामले को अन्य मामलों से अलग करता है. चार मामलों में एक में अज्ञात याचिकाकर्ता ने हस्तांरण की मांग की थी इसलिए मांग को रद्द कर दिया गया जबकि दूसरे मामले में याचिकाकर्ता के ‘‘हाथ गंदे थे’.’ वह लिखते हैं, ‘‘भीमा कोरेगांव मामले में न याचिकाकर्ता अज्ञात हैं और न ही याचिका किसी के निजी हित और राजनीतिक फायदे के लिए दायर की गई है.’’

बहुमत के फैसले का खास संदर्भ दिए बिना ही चंद्रचूड़ का असहमति का फैसला इस मामले में आए फैसले की अन्य कमजोरियों को दिखाता है. चार मामलों का उल्लेख करने के बाद खानविलकर लिखते हैं कि याचिका में ऐसी कोई खास बात नहीं है या उन तथ्यों का आभाव है जिनसे यह साबित होता हो कि जांच अधिकारी ने दुर्भावनाग्रस्त होकर अपनी शक्ति का प्रयोग किया है.’’ वहीं चंद्रचूड़ अपने फैसले में इस तरह की कई बातों का हवाला देते हैं. उदाहरण के लिए याचिकाकर्ता ने बताया है कि पुलिस ने 13 अप्रमाणित खतों को मीडिया के सामने जारी किया. पुलिस का दावा है कि इन खतों से आरोपियों का संबंध माओवादियों से होने की बात साबित होती है. याचिका में लिखा है, ‘‘इन खतों में किसी के हस्ताक्षर नहीं हैं और न पहचान के लिए लेटरहेड है और न ही भेजने और प्राप्त करने वालों का ईमेल या पता.’’

उन्होंने याचिकार्ताओं की उस दलील का भी उल्लेख किया जिसमें कहा गया है कि इन 13 पत्रों में से सात पत्रों को या तो किसी ‘कॉमरेड प्रकाश’ ने लिखा है या उन्हें ये खत लिखा गए हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर साईंबाबा को दोषी ठहराने वाले फैसले में यह बात कही गई है कि वे प्रकाश नाम का इस्तेमाल करते थे. चूंकि साईंबाबा मार्च 2017 से ही नागपुर के केन्द्रीय कारावास में बंद हैं इसलिए याचिकाकर्ताओं की दलील है कि उस तारीख के बाद उनके नाम पर लिखे या भेजे गए खत पूर्वदृष्टया (एक्स फेशीई) काल्पनिक हैं.

अपने फैसले में चंद्रचूड़ ने सिंघवी के निवेदन को भी नोट किया है जिसमें गिरफ्तारियों के लिए चश्मदीदों को पुणे से लाया गया था. सिंघवी ने ऐसा करने को ‘‘गिरफ्तारी, तलाशी और जब्ती के कानून का घोर उल्लंघन बताया था’’. इस दलील को मंजूर करते हुए चंद्रचूड़ ने लिखा है: “ये दोनों चश्मदीद पुणे महानगर पालिका के कर्मचारी हैं. अदालत के सामने इस बात का विरोध नहीं किया गया है कि ये लोग उस पुलिस टीम के साथ थे जिसने ये गिरफ्तारियां की हैं.’’ अपने फैसले के अंत में चंद्रचूड़ ने लिखा है:

यह मानते हुए भी कि जांच को नहीं रोका जाना चाहिए, मेरे विचार में यह मामला एसआईटी के गठन के लिए उपयुक्त मामला है. हमारे सामने ऐसी परिस्थितियों को रखा गया है जिससे महाराष्ट्र पुलिस ने निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के दावे पर शक पैदा होता है. स्वतंत्र जांच की आवश्यकता को स्पष्ट करने के लिए अदालत के सामने पर्याप्त सामग्री पेश की गई है.

एक अन्य बात जिससे यह संकेत मिलता है कि खानविलकर का फैसला जल्दी में लिखा गया था वह यह है अपने फैसले में खानविलकर ने पुणे पुलिस के जांच के तरीके पर याचिकाकर्ताओं की दलील पर विस्तृत रूप से विचार करने में आनाकानी की. जबकि यह जानने के लिए कि जांच निष्पक्ष और पूर्वाग्रह रहित थी इन दलीलों पर विचार करना जरूरी था. ‘‘यह अदालत ऐसा मंच नहीं है जहां साम्रगी की असलियत की जांच की जाए या ये जांचा जाए कि ये सामग्री पर्याप्त है या नहीं, या यह कि ये मनगढ़ंत है या सही है. हम इस विषय को खींचना नहीं चाहते क्योंकि इससे नामित आरोपियों और उन आरोपियों के  खिलाफ भी अदालत में उपस्थित नहीं हैं पूर्वाग्रह पैदा हो सकता है.

अपने फैसले में खानविलकर इस बात को फिर दोहराते हैं कि इस बात को सही ठहराने के लिए कि दोनों पक्षों द्वारा उठाए गए तथ्यजनित विषयों पर बात करने से आरोपियों के खिलाफ ‘‘गंभीर पूर्वाग्रह पैदा’’ हो सकता है. आगे फिर इस घोषणा से पहले की आरोपी चार सप्ताह तक और नजरबंद रहेंगे वे वही बात दोहराते हैं. ‘‘हम यह बताना चाहते हैं कि महाराष्ट्र राज्य द्वारा पेश संबंधित दस्तावेजों के रजिस्टर हमने देखे हैं और केस डायरी भी देखी है. लेकिन इन तथ्यों को खींचने से हमने परहेज किया है ताकि मामले में वादी और प्रतिवादियों के विरुद्ध किसी भी प्रकार का पूर्वाग्रह पैदा न हो.’’

कीमत वसूलना चाहती हैं मायावती

बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती को लगता है कि ‘दलित एक्ट’ और ‘प्रमोशन में आरक्षण’ जैसे मुद्दों ने दलितो को एकजुट कर दिया है. ऐसे में अगर वह कांग्रेस के साथ समझौता करके चुनाव लड़ेंगी तो उनको नुकसान होगा. बसपा प्रमुख मायावती ने न केवल कांग्रेस से दोस्ती तोड़ी बल्कि ठाकुर जाति दिग्विजय सिंह को उसका जिम्मेदार ठहरा दिया. जिससे दलित बिरादरी में सवर्ण विरोध को हवा दी जा सके. सवर्ण विरोध के नाम पर मायावती ठाकुर विरोध ही करती रही हैं. अब मायावती ब्राहमण-दलित सोशल इंजीनियरिंग की बात नहीं करती हैं. एक बार फिर से वह इन चुनावों में ‘दलित-मुसलिम गठजोड़’ को ही साथ लेना चाह रही हैं.

मायावती यह बात भूल रही हैं कि ‘दलित-मुसलिम गठजोड़’ 2014 और 2017 के चुनावों में बैक फायर कर चुका है. ऐसे में भाजपा विरोधी दलों को एकजुट होकर ही सफलता मिल सकती है. विपक्ष में भी अपना प्रभाव बढ़ाने के लिये मायावती ने कांग्रेस से नाता तोड लिया है. जिससे चुनाव के बाद किसी भी समझौते से आजाद रहा जाये. यह बात आमजन मानस में भी है कि मायावती किसी दबाव में कांग्रेस से समझौता तोड़ रही हैं. ऐसे में ‘दलित-मुसलिम गठजोड़’ मायावती की मंशा के अनुरूप सफल होगा यह साफ नहीं हो रहा है. मायावती को अपनी ताकत पर गुमान हो रहा है. राजनीति के जानकार मानते हैं कि वह अपना गलत आकलन कर रही हैं. अब दलितों में तमाम बिरादरी अलग अलग खेमे में है. जिससे दलित अब वोट बैंक नहीं रह गया है.

ताकत पर गुमान

2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती अपनी पूरी कीमत वसूल करना चाहती हैं. गठजोड़ की राजनीति में यह कोई बुरी बात भी नहीं है. मायावती को पता है कि अगर उन्होंने चुनाव पूर्व गठबंधन किया तो चुनाव बाद परिणामों के बाद गठबंधन तोड़ना सरल नहीं होगा. ऐसे में ‘एकला चलो’ की मुहिम के तहत वह अलग चुनाव लड़ें और चुनाव बाद के परिणाम के हिसाब से अपनी कीमत तय करें तो मुनाफे की संभावना अधिक है. इस कारण ही मायावती ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व समझौता करने से मना कर दिया है. इन राज्यों में चुनाव के बाद अगर मायावती सरकार बनाने की भूमिका में फिट हो सकी तो अपनी मुंहमांगी कीमत वसूल करेगी.

मायावती को यह साफ पता है कि कांग्रेस और बसपा का वोट बैंक एक ही है. ऐसे में कांग्रेस के मजबूत होने से बसपा के कमजोर होने का पूरा अंदेशा है. अब मायावती कांग्रेस और भाजपा से नाराज वोटबैंक को अपने पक्ष में लाना चाहती है. कांग्रेस नेता सुरेन्द्र राजपूत कहते हैं ‘दलित वोट बैंक मायावती की सच्चाई से परिचित है. वह अपने हित देखने लगा है. बसपा की पकड़ अब 2014 के पहले वाली नहीं रह गई है. लोकसभा और विधानसभा चुनाव के परिणाम से पता चल चुका है कि दलित अब वोटबैंक भर नहीं रह गया है.’

मायावती के इस कदम से उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा और कांग्रेस के महागठबंधन पर भी सवालिया निशान लग चुका है. मायावती ने उत्तर प्रदेश के बारे में कोई जवाब नहीं दिया. इसकी वजह भी यही है कि वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को हाशिये पर रखना चाहती हैं. तीन राज्यों के चुनाव का असर लोकसभा चुनाव में पड़ेगा. अगर बसपा को यहां सफलता मिल गई तो कांग्रेस और भाजपा दोनों से ही मनचाहा समझौता कर सकेंगी. मायावती के इस कदम से समाजवादी पार्टी को भी गहरा झटका लगा है. सपा नेता अखिलेश यादव बसपा पर टिप्पणी करने के बजाये कांग्रेस को ही इसके लिये जिम्मेदार ठहराकर मायावती का पक्ष ले रहे हैं.

अखिलेश यादव ने कहा कि ‘कांग्रेस को बड़ा दिल दिखाना चाहिये. गठबंधन की जिम्मेदारी कांग्रेस की है. उसे सभी भाजपा विरोधी दलों को एक साथ लेकर चलना चाहिये. कांग्रेस को समान विचारधारा के दलों को लेकर चुनाव लड़ना चाहिये.’ मायावती और कांग्रेस के संबंधों को लेकर कांग्रेस ने मायावती और सोनिया-राहुल के बीच तालमेल की बात को रखते हुये उम्मीद की है कि कोई रास्ता निकल आयेगा. भाजपा को इस तरह के झगड़े में अपना लाभ दिख रहा है. ऐसे में भाजपा ने कांग्रेस को दोषी मानते कहा है ‘कांग्रेस कभी गठबंधन नहीं कर सकती. वह केवल एक परिवार का ही शासन चाहती है.’

दिग्विजय तो बहाना

बसपा नेता मायावती ने कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के जिस बयान को आधार बनाकर कांग्रेस से गठबंधन न करने की बात कही वह कोई समझ में आने वाला आधार नहीं है. दिग्विजय सिंह ने कहा था कि बसपा केन्द्र सरकार और उसकी सीबीआई-ईडी से डरी हुई है. इस वजह से गठबंधन नहीं करना चाहती. इस तरह के आरोप पहले भी कई नेता लगा चुके है. पहले मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव सहित कई नेता इस बात को दोहराते रहे है. सीबीआई सरकार के हाथ का ‘तोता’ होती है. यह टिप्पणी भी बहुत मशहूर रही है. उत्तर प्रदेश में भाजपा बसपा-सपा के गठबंधन को लेकर चिंता में थी. उसने भीम सेना को अपने पक्ष में करने की योजना भी बनाई थी.

एक आरोप यह भी है कि सपा के मुलायम परिवार में शिवपाल यादव को भड़काकर नई पार्टी बनावाने के पीछे भी एक राजनीतिक साजिश है. इसके पीछे अमर सिंह के हाथ को देखा जा रहा है. अमर सिंह और भाजपा की ताजा दोस्ती से इसको जोड़ा जा रहा है. ऐसे में दिग्विजय के बयान पर मायावती का इतना बड़ा फैसला वैसा ही है जैसे मायावती को बस एक बहाने की तलाश थी. असल में मायावती किसी गठबंधन में बंधना नहीं चाहती. जिससे चुनाव बाद मनचाहा समझौता कर सके.

दलित से दूरी का लाभ

‘प्रमोशन में आरक्षण’ और ‘दलित एक्ट’ के मसले पर दलित और अगड़े एक बार फिर से आमने सामने हैं. ऐसे में मायावती का कांग्रेस से समर्थन करना एक अलग संदेश दे सकता है. मायावती एक बार फिर से चुनाव में ‘दलित-मुसलिम’ गठजोड़ तैयार करना चाहती है. मायावती को लग रहा है कि हिन्दुत्व के विरोध के नाम पर मुसलिम और सवर्ण विरोध के नाम पर दलित बसपा में ही अपनी संभावना देख रहा है. ऐसे में कांग्रेस के साथ उनका समझौता उनको कमजोर कर सकता है. ऐसे में वह कांग्रेस के विरोध में खड़ी दिखाना चाहती हैं. चुनाव के बाद जैसे भी परिणाम होंगे वह समझौता करने को आजाद होगी. मायावती को लगता है कि कांग्रेस के मुकाबले सपा से करीबी रखना ज्यादा लाभकारी होगा. इससे दलितों में किसी तरह के डर की भावना नहीं रहेगी. दलित एक्ट और प्रमोशन में आरक्षण पर पिछडों ने ज्यादा हल्ला नहीं मचाया है.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत बेहद खराब है इसके मुकाबले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस मजबूत हालत में है. उसे वहां बसपा की बहुत जरूरत नहीं है. इस वजह से उसे बसपा के दबाव की बहुत परवाह नहीं है. कांग्रेस भी समझ रही है कि बसपा अगर भाजपा के करीब जाते दिखेगी तो उसको बहुत नुकसान होगा. लोकसभा के स्तर पर मुसलिम वोट बैंक कभी भी कांग्रेस के मुकाबले बसपा को तवज्जों ज्यादा नहीं देगा. ऐसे में वह बसपा को लेकर बहुत आतुर नहीं है. कांग्रेस को पता है कि चुनाव के बाद अगर बसपा और भाजपा में कोई गठबंधन होता है तो बसपा का जनाधार पूरी तरह से खत्म हो जायेगा. दलित और मुसलिम वोटबैंक के धुव्रीकरण का जो प्रयास बसपा कर रही है वह एक बार फिर से नुकसान पहुंचा सकता है.

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