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सर्दियों में आप पर खूब जमेगी यह क्लासिक हेयर स्टाइल

सर्दी आ गई है. इस समय आप स्टाइलिश स्वेटर और जैकेट पहनने के साथ अपने बालों पर खूब सारा एक्‍सपेरिमेंट कर सकती हैं. आज हम आपको कुछ ऐसे हेयरस्‍टाइल बताएंगे जिन्हें सर्दियों के मौसम में बेहद आराम और कम समय में बनाये जा सकते हैं.

जूड़ा

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यह हेयरस्‍टाइल काफी क्‍लासी लुक देती है. इस हेयर स्टाइल के साथ आप चंद मिनटों में बोल्‍ड लुक पा सकती हैं. इस जूडे को बनाने के लिये पतले हेयर बैंड का प्रयोग करें और मुंह पर कुछ लटों को खुला छोड़ दें.

खुले बाल

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अगर आपको सहेलियों के बीच सनसनी फैलानी है तो यह हेयरस्‍टाइल आपके लिये ही है. इस हेयरस्‍टाइल को किसी भी ड्रेस के साथ आजमाया जा सकता है. हां, आपको केवल इसको मैनेज करना आना चाहिये. इसको और निखारने के लिये हेयर बैंड लगाएं.

साइड पोनी

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यह हेयरस्‍टाइल काफी ट्रेंड में है और आसान भी. अगर आप अपनी बारिंग हेयरस्‍टाइल से बोर हो चुकी हैं तो साइड पोनीटेल बांध कर आपको एक नया लुक मिल सकता है. इसको बनाने में भी बिल्‍कुल समय नहीं लगता. इसको बिल्‍कुल ढीला बांधे, जिससे साइड में आपके बाल लंबे दिखेगे.

हाई पोनीटेल

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इस हेयरस्‍टाइल को ज्‍यादातर हर लड़की पसंद करती है. बिना कुछ सोंचे समझे घर से निकलते वक्‍त आप हाई या लो पोनीटेल बांध कर आराम से निकल सकती हैं. यह आराम से मैनेज भी हो जाती है और उधर उधर फैलती भी नहीं है. चाहें तो पोनीटेल बांध कर सामने से सेमी-बीहाईव हेयरस्‍टाइल रखें, यह इन दिनों काफी इन है.

वेव

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अपने बालों को वेवी लुक दीजिये. इसको अगर बांधना हो तो आप केवल एक पोनी बना लीजिये बस आपका काम हो जाएगा.

हर लड़की को देखने आते हैं ये 6 तरह के लड़के

शादी हर इंसान के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला होता हैं, क्योंकि इसके बाद उस इंसान की पूरी जिंदगी बदल जाती हैं. भारत में तो शादी अधिकतर अरेंज मैरिज ही होती हैं, जिसमें कई समय से चली आ रहे रिवाजों को माना जाता हैं और लड़का, लड़की को देखने के लिए जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब लड़का किसी लड़की को देखने जाता हैं तो उस समय वह किस तरह व्यवहार करता है.

आज हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ ऐसे ही लड़कों के टाइप के बारे में जो लड़की देखने जाते हैं.

हर चीज को तोलमोल करने वाले

जिन लड़कों को अपनी होने वाली पत्नी से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें होती हैं, वह मैरिज मीटिंग के दौरान उनसे कई सवाल पूछते हैं. ऐसे लड़के मैरिज मीटिंग के दौरान लड़की से जुड़ी हर चीज को बारीकी से देखते हैं. आपको भी कभी न कभी ऐसा लड़का देखने के लिए जरूर आया होगा या आ सकता है.

इंटरव्यू लेने वाले

अरेंज मैरिज मीटिंग में लड़का और लड़की दोनों को सवाल पूछने का हक बराबर होता है. मगर कुछ लड़के तो मानो लड़की देखने नहीं बल्कि इंटरव्यू लेने की नियत से आए होते हैं. ऐसे लड़के बेमतलब की बातों को भी डिटेल में पूछते हैं.

धोखेबाज

ऐसे लड़के शुरू में तो आप में बहुत ज्यादा दिलचस्पी दिखाएंगे और उन्हें लगेगा कि आप उनके लिए परफेक्ट हो. ऐसे में वह आपके सामने इम्प्रैशन जमाने के लिए झूठी शानों शौकत और कई तरह के झूठ बोलेंगे. अगर आपको भी ऐसा कोई लड़का देखने के लिए आए तो उनसे बचकर ही रहें.

डिमांडिंग लड़के

मैरिज मीटिंग के दौरान इस तरह के लड़के तो हर लड़की से टकराते होंगे. डिमांडिग लड़के शादी के बाद अपनी वाइफ को अपने हिसाब से रखना चाहते हैं. यह शुरू में तो आपकी हर बात मान लेते हैं लेकिन बाद में अपनी डिमांड करने लग जाते हैं. वहीं, कुछ लड़के ऐसे भी होते हैं जो पहली मीटिंग में लड़कियों को अपनी डिमांड बता देते हैं कि वह आपसे क्या चाहते हैं.

टाइम खराब करने वाले

कुछ लड़के ऐसे होते हैं जो दोस्तो, पेरेंट्स और रिश्तेदारों के कहने पर शादी के लिए हां कर देते हैं लेकिन असल में वह शादी नहीं करना चाहते. ऐसे लड़के न तो आपमें दिलचस्पी लेते हैं और न ही आपसे इस बारे में कुछ कहते हैं. इस तरह के लड़कों को टाइम खराब करने के बाद पीछे छुड़ाने में बिल्कुल समय नहीं लगता.

गोल्ड डिगर और लुटेरा दूल्हा

शादी की बात हो और कोई दहेज की डिमांड न करें, ऐसा तो हो ही नहीं सकता. अरेंज मैरिज मीटिंग के दौरान आप अपनी जिंदगी में ऐसे लड़के से कभी-न-कभी तो जरूर मिलेंगी. ऐसे लड़के सिर्फ पैसों के लिए ही शादी करना चाहते हैं.

हाइवे का हत्यारा : आखिर कैसे फंसा 34 हत्याएं करने वाला आदेश

आदेश ने अब तक 34 हत्याएं करने का जुर्म कबूला है. मुमकिन है कि उस की लिस्ट में और नाम बढ़ें. लेकिन अब किसी को उतनी हैरानी नहीं होगी, जितनी सितंबर के दूसरे हफ्ते में हुई थी. इस सनकी हत्यारे ने एक के बाद एक ट्रक ड्राइवरों और क्लीनरों की हत्याओं की बात कबूली थी और यह भी बताया था कि उस ने कब कहां किस की हत्या की थी.

आदेश जब भोपाल में पकड़ा गया था, तब पुलिस को जरा भी अंदाजा नहीं था कि उस के हत्थे कोई मामूली मुलजिम नहीं, बल्कि एक ऐसा सीरियल किलर चढ़ा है, जिस का कत्ल करने का अपना एक अलग स्टाइल और अंदाज है. जब 34 हत्याओं की बात उस ने स्वीकारी थी तो इस स्वीकारोक्ति की गूंज न केवल देश बल्कि विदेशों तक भी पहुंच गई थी.

हर किसी की दिलचस्पी आदेश खांबरा में है, खासतौर से मनोविज्ञानियों की, जिन के लिए यह कातिल शोध का विषय हो सकता है. मध्य प्रदेश पुलिस उस के द्वारा की गई हत्याओं में सिर खपा रही है कि कैसे इस दुर्दांत और बेरहम हत्यारे द्वारा की गई हत्याओं को सूचीबद्ध कर के ऐसी चार्जशीट तैयार करे कि उस के फांसी के फंदे से बचने की रत्तीभर भी गुंजाइश न रहे.

कौन है आदेश खांबरा

लगभग 50 वर्षीय आदेश खांबरा मामूली शक्तसूरत वाला अधेड़ आदमी है. उस के चेहरे से अगर अपने जुर्मों के अनुपात में क्रूरता नहीं टपकती तो मासूमियत भी नहीं दिखती. वह बेहद सपाट चेहरे वाला तटस्थ और लगभग भावशून्य व्यक्ति है. मामूली पढ़ेलिखे आदेश खांबरा की बातों में दर्शन जरूर झलकता है. पकड़े जाने के बाद वह शायद खुद की अहमियत समझने लगा है, इसीलिए वह और भी ज्यादा लापरवाह दिखने की कोशिश करता है.

भोपाल के नजदीक औद्योगिक इलाका है मंडीदीप जो एक छोटा सा कस्बा है. यहां की फैक्ट्रियों में काम करने आए देश भर के लोग रहते हैं. इन में से अधिकांश पेशे से मजदूर हैं, जो मंडीदीप में स्थाई रूप से बस गए हैं, खांबरा परिवार उन में से एक है.

आदेश खांबरा के पूर्वज भारत पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त भोपाल आ गए थे. उस के पिता गुलाब खांबरा सेना से नायक सूबेदार के पद से रिटायर हुए थे. अपना पेट पालने के लिए आदेश मंडीदीप में दरजी की छोटी सी दुकान चलाता था. उस की शादी हो चुकी है और उस के 5 बच्चे भी हैं जिन्हें वह बेहद प्यार करता है.

पुलिस इस से ज्यादा जानकारी आदेश के बारे में हासिल नहीं कर पाई है या फिर वह किन्हीं वजहों के चलते मीडिया को नहीं दे रही है. हां, पुलिस ने यह बात जरूर प्रमुखता से बताई कि आदेश के अपने पिता से बेहद कटु संबंध थे. खुद आदेश ने भी स्वीकारा कि वह इतना बेरहम हत्यारा इसलिए बना क्योंकि उसे परिवार में कभी किसी का प्यार नहीं मिला.

पिता ने तो उसे कभी चाहा ही नहीं और न ही किसी और ने उस की परवाह की. मां की मौत बचपन में ही हो चुकी थी. पिता सैन्य अनुशासन अपने घर में भी चलाते थे और जराजरा सी बात पर उसे मारते, डांटते थे. कभीकभी तो वह उसे घर से निकाल देते थे, इसलिए अपनी उम्र का बड़ा हिस्सा उस ने अभावों में रहते रिश्तेदारों के यहां गुजारा था.

किशोर उम्र बड़ी नाजुक होती है आदेश का मासूम मन इन हालात को बरदाश्त नहीं कर पाया. लिहाजा एक गुस्सा उस के अंदर जमा होता गया, जिस का अहसास उसे नहीं हुआ और वह एक बेरहम हत्यारा बन गया.

ऐसे बना हत्यारा

इन दिनों आदेश को ले कर देश भर में जगहजगह घूम रही पुलिस को यह भी नहीं मालूम कि आदेश ने जुर्म की दुनिया में पहला कदम कब रखा था. लेकिन उस ने जो कबूला उस के मुताबिक साल 2010 के बाद से वह लगातार एक नियमित अंतराल से हत्याएं कर रहा था और हिम्मत बढ़ती गई.

आदेश के निशाने पर ट्रक ड्राइवर और क्लीनर ही क्यों होते थे, इस सवाल का जवाब भी उस के बयानों से मिलता है कि ये लोग सौफ्ट टारगेट होते थे. हत्याओं की शुरुआत भी उस ने भोपाल और मंडीदीप के बीच 11 मील नाम के इलाके से की थी, जो होशंगाबाद रोड पर स्थित है. यहां से एक रास्ता प्रसिद्ध भोजपुर के शंकर मंदिर की तरफ जाता है. इस इलाके में रिहायशी मकान और अपार्टमेंट बन रहे हैं, लेकिन इस के बाद भी वह इलाका सुनसान रहता है. खासतौर से रात के वक्त तो आवाजाही न के बराबर रहती है.

पैसों की तंगी दूर करने के लिए आदेश ने मेहनत करने के बजाय जुर्म का रास्ता चुना. मंडीदीप में रहने वाले आपराधिक प्रवृत्ति के कई लोगों से उस के संबंध थे. संगत रंग लाई और एक दिन उस ने 11 मील इलाके में एक ट्रक लूट लिया. अपनी पहली वारदात की वह तारीख नहीं बता पाया, लेकिन उस की बातों से लगता है कि यह बात सन 2007 की रही होगी.

पहले जुर्म में उस ने ट्रक ड्राइवर की हत्या नहीं की थी, बल्कि उसे लूट कर छोड़ दिया था. इस लूट से उस के हाथ काफी माल लगा था. मोटा माल आसानी से हाथ लगने के बाद उसे टेलरिंग बेहद घाटे वाला और बेकार का काम लगा, क्योंकि जितना पैसा वह 3-4 साल मेहनत कर के कमा पाता था, उतना एक रात में उस ने ट्रक की लूट से कमा लिया था. हालांकि लोगों को दिखाने के लिए वह अपने टेलरिंग के पेशे से चिपका रहा.

पहली बार जुर्म करने वालों की हालत अजीब होती है, कुछ दिन वे पुलिस के डर और राज खुल जाने से सहमे रहते हैं लेकिन जब 10-15 दिन गुजर जाते हैं तो फिर बेफिक्र हो जाते हैं. इसी बीच किसी तरह वे चोरीछिपे घटनास्थल का चक्कर जरूर लगाते हैं, इस के कई मनोवैज्ञानिक कारण अपनी जगह हैं.

पहली लूट पर जब कुछ नहीं बिगड़ा तो आदेश के हौसले बढ़े और दूसरी वारदात को अंजाम देने के लिए उस ने गुना जिले के राघौगढ़ कस्बे को चुना जो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का चुनाव क्षेत्र होने के चलते मशहूर है.

यह भी साल 2007-2008 के दरम्यान की बात है. राघौगढ़ में ट्रक लूट कर उस ने सबूत मिटाने की गरज से ट्रक ड्राइवर की हत्या कर दी थी. इस के बाद उस ने लगभग हर वारदात में ऐसा ही किया, जिस से पकड़ा न जाए. लगातार हत्याएं करने के बाद वह अपनी अपराध शैली में बेहद ऐहतियात बरतने लगा था.

दूसरी वारदात में भी उसे खासी रकम मिली थी. इस के बाद तो ट्रक ड्राइवरों और क्लीनरों की हत्या को उस ने अपना फुलटाइम जौब बना लिया. लंबी दूरी तक जाने वाले ट्रक ड्राइवरों के पास तो खासी नगदी होती ही है, लेकिन उसे असल आमदनी होती थी ट्रक का माल लूटने से और फिर ट्रक को भी बेच देने से. यह आदेश खांबरा के लिए बाएं हाथ का खेल बनता जा रहा था.

एक राह पकड़ी तो उसे पेशा समझ लिया

सन 2010 से ले कर 2014 तक उस ने 5 ट्रक लूटे और 8 ड्राइवरों और क्लीनरों की हत्या की. लेकिन उस की हिम्मत उस समय और बढ़ गई थी, जब वह तीसरी वारदात को अंजाम देने के लिए महाराष्ट्र के अमरावती जिले में गया था. यहां वारदात के बाद वह पकड़ा गया था और उसे डेढ़ साल की सजा भी हुई थी. जेल से रिहा होने के बाद उस ने जुर्म की दुनिया से किनारा कर लेने का इरादा भी बनाया था, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. इस की 2 ही वजहें थीं. पहली यह कि जुर्म से कम समय में बहुत ज्यादा पैसा मिलता था और दूसरी बात संगत की थी.

एक बार जो अपराधी जेल हो आता है, उस के भीतर का डर मिट जाता है. वह पुलिसिया कामकाज के तौरतरीकों से भी वाकिफ हो जाता है. यही आदेश के साथ हुआ. सजा होने के कुछ दिन बाद तक उस ने भी जुर्म न करने की बात सोची, लेकिन जल्द ही जुर्म का कीड़ा उस के दिमाग में कुलबुलाने लगा. 2010 से 2014 के बीच वह एक दफा और पकड़ा गया था. इस बार जेल में रहते उस की दोस्ती तुकाराम बंजारा नाम के शख्स से हुई. दोनों ने जेल में तय कर लिया कि अब बाहर जा कर वे मिलजुल कर ट्रक लूटने और ड्राइवरों व क्लीनरों की हत्या का काम करेंगे.

इन दोनों ने जेल में रहते ही हाइवे क्राइम्स पर जैसे पीएचडी कर डाली थी. इस बात पर दोनों की राय एक थी कि मंडीदीप की फैक्ट्रियों में ट्रक ड्राइवर चोरी का माल बेच कर लाखों बनाते हैं तो हम तो उन्हें लूट कर और ज्यादा कमा सकते हैं.

महाराष्ट्र का रहने वाला तुकाराम भी कम खुराफाती और शातिर दिमाग का नहीं था. उसे आदेश जैसे किसी जोखिम उठाने वाले सहयोगी की जरूरत थी. जेल में रहते दोनों ने तरहतरह की योजनाएं बनाईं और बाहर आ कर उन पर अमल भी शुरू कर दिया.

योजनानुसार दोनों ने वारदातों को अंजाम देना शुरू कर दिया. अब ये ट्रक ड्राइवरों को हथियारों की नोंक पर नहीं लूटते थे, बल्कि उन्हें मीठीमीठी बातों में फंसाते थे. फंसने के बाद उन्हें शराब पिलाते या फिर किसी खानेपीने की चीज में नशे की गोलियां मिला कर दे देते थे.

ड्राइवर के बेसुध हो जाने के बाद ये उसे या तो कहीं पानी में डुबो कर मार देते थे या फिर उसे रेल की पटरियों पर सुला देते थे, जिस से मामला हादसे या खुदकुशी का लगे. इन तरीकों को अपनाने के पीछे इन का मकसद पुलिस जांच का दायरा सीमित रखना था, जिस में वे कामयाब भी रहे.

जुर्म की राह की तिकड़ी

इसी दौरान जयकरण प्रजापति नाम का शख्स भी इन के गिरोह में शामिल हो गया. जयकरण मध्य प्रदेश के ही टीकमगढ़ जिले के एक गांव का रहने वाला था, जिस का मुख्य काम ट्रक ड्राइवरों से दोस्ती बढ़ाना था. ट्रक ड्राइवरों को शीशे में उतारने के बाद वह कोड वर्ड में आदेश को बताता था कि अब आगे क्या करना है.

मसलन जब वह फोन पर यह कहता था कि कुछ मीठा लाओ तो इस का सीधा सा मतलब होता था कि शिकार जाल में फंस चुका है, इसलिए उसे ठिकाने लगाने के लिए तैयार रहो. जो ड्राइवर इन का दावतनामा कबूल कर लेते थे, उन्हें ये छक कर शराब पिलाते थे और फिर कहीं सुनसान जगह ले जा कर निर्वस्त्र कर उसे रेल की पटरियों पर फेंक देते थे या फिर किसी तालाब में.

इस तिकड़ी ने 3 साल में 20 से भी ज्यादा वारदातों को अंजाम दिया था. अधिकांश हत्याएं आदेश ने ही की थीं. ऐसा लगता है कि हत्या करते वक्त उस की सनक शवाब पर होती थी और वह अब यह जुर्म लूट के लिए कम बल्कि अपना शौक पूरा करने के लिए ज्यादा करता था. ट्रक ड्राइवरों की हत्या करने में माहिर हो चले आदेश खांबरा ने एकएक कर अपने जुर्म कबूले तो देश भर में सनाका खिंच गया.

अपने द्वारा की गई हत्याओं का राज्यवार हिसाब भी उस ने दिया कि उस ने मध्य प्रदेश में सब से ज्यादा 20 कत्ल किए. इन में से सब से ज्यादा कत्ल चंदेरी के नजदीक किए थे. चंदेरी साड़ी की देश भर में अलग पहचान है, जिसे हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘स्त्री’ में दिखाया भी गया है.

दरअसल, गुना, चंदेरी और राजगढ़, आगरामुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े हुए हैं. यहां हत्याएं करना और लूटपाट करना अपेक्षाकृत आसान काम है. महाराष्ट्र के अमरावती में आदेश ने 2 कत्ल किए तो छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में 3 और रायपुर में 2 कत्लों की बात उस ने कबूली है.

एक हत्या उस ने मशहूर देवस्थल शिरडी के संगमनेर जंगल में करने की बात स्वीकारी. उस ने महाराष्ट्र के ही वर्धा में 2 हत्याएं की थीं. ओडिशा के संबलपुर में भी आदेश ने 2 हत्याओं की बात कबूली.

कभी मंडीदीप से शुरू हुआ एक ट्रक की लूट का सिलसिला अंतरराज्यीय बन चुका था. जिस में खास बात यह थी कि आदेश की तरफ किसी का ध्यान नहीं था क्योंकि हाइवे पर हादसे और हत्याएं आम बातें हैं. सुनसान होने के चलते ऐसी जगहों पर पुलिस को गवाह और सबूत नहीं मिलते इसलिए वह भी जांच जल्द बंद कर मामला क्लोज कर देती है.

दूसरे आमतौर पर ड्राइवरों और क्लीनरों की परवाह ट्रक मालिक भी नहीं करते, क्योंकि उन की दिलचस्पी अपने माल और ट्रक में ज्यादा रहती है, जो न मिलें तो वे पुलिस में औपचारिक रिपोर्ट दर्ज करा कर अपने काम में ऐसे लग जाते हैं कि मानो कुछ हुआ ही न हो. ट्रक ड्राइवरों के परिजन भी ज्यादा भागदौड़ नहीं कर पाते. इस सिस्टम और मानसिकता का पूरा फायदा आदेश खांबरा, जयकरण प्रजापति और तुकाराम बंजारा उठा रहे थे.

ऐसे धरा गया बेरहम हत्यारा

आदेश खांबरा यूं ही पुलिस के फंदे में नहीं आ गया, बल्कि उसे अपना दायां हाथ कहे जाने वाले जयकरण की एक भूल काफी महंगी पड़ी. महत्त्वाकांक्षी जयकरण की इच्छा खुद का अपना अलग गिरोह बना कर काम करने की थी. जयकरण के जेहन में यह खयाल आया कि क्यों न एक दफा अपने दम पर ऐसी किसी वारदात को अंजाम दे कर देखा जाए कि कितनी कामयाबी हाथ लगती है. बस इसी को हकीकत में बदलने की कोशिश में वह तो पकड़ा गया, साथ में अपने बौस आदेश खांबरा और साथी तुकाराम को भी ले डूबा.

हुआ यूं था कि अगस्त के पहले ही हफ्ते में भोपाल के बिलखिरिया थाने में बंसल कंपनी के मालिक ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उन का एक ट्रक मंडीदीप से सरिए ले कर रवाना तो हुआ है लेकिन मंजिल तक नहीं पहुंचा है. बिलखिरिया थाने के टीआई लोकेंद्र सिंह के जरिए यह बात एसपी राहुल लोढ़ा और उन से होती हुई आईजी जयदीप प्रसाद तक पहुंची तो पुलिस महकमे ने इस पर गंभीरता से काररवाई शुरू कर दी.

दरअसल, भोपाल पुलिस के आला अफसर लगातार मिल रही ऐसी रिपोर्टों और शिकायतों से परेशान हो चले थे, जिन में ट्रक रवाना तो हुआ था लेकिन अपने गंतव्य तक नहीं पहुंचा था. हैरानी की बात यह थी कि ट्रक के साथसाथ उस के ड्राइवर और क्लीनरों का भी अतापता नहीं लग रहा था.

आईजी जयदीप प्रसाद ने एसपी राहुल लोढ़ा के नेतृत्व में एक जांच टीम गठित कर दी, जिस में एएसपी दिनेश कौशल और तेजतर्रार सीएसपी सुश्री बिट्टू शर्मा को शामिल किया गया. इस टीम ने बंसल कंपनी के लापता हुए ट्रक को लक्ष्य बना कर जांच शुरू की तो जल्द ही सुराग भी हाथ लग गया.

तब पुलिस को इस बात का कतई अंदाजा नहीं था कि उस के हत्थे कौन चढ़ने वाला है. जांच में भोपाल के ही आनंद नगर इलाके के एक जगह लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में जब यह दिखा कि एक ट्रक से सरिए उतार कर दूसरे ट्रक में रखे जा रहे हैं तो पुलिस टीम को लगा कि हो न हो यह ट्रक बंसल कंपनी का ही हो.

कोशिश की गई तो भोपाल के अयोध्या नगर इलाके में एक लावारिस ट्रक खड़ा मिला. साथ ही मिल गई ट्रक ड्राइवर लखन की लाश. इस के बाद तो पुलिस वालों की बांछें खिल उठीं.

उत्साहित पुलिस वालों ने सीसीटीवी फुटेज में चोरी के सरिए खरीदने वाले को तलाश लिया. उस की मदद से असली खरीदार महेश को अपनी गिरफ्त में ले लिया. मंडीदीप निवासी महेश से जब पुलिस ने पूछताछ की तो उस ने जयकरण का नाम लिया.

जयकरण को भी उठाने में पुलिस ने देर नहीं की. पूछताछ में वह जल्दी ही टूट गया और उस ने अपना गुनाह स्वीकार भी कर लिया कि ट्रक को उसी ने लूटा है. उस ने यह भी बताया कि हत्या करने के बाद ड्राइवर की लाश फेंक दी. जयकरण ने बताया कि यह ट्रक उस ने 11 मील इलाके में लूटा था और सरिया दूसरे को बेच दिए थे.

यहां जयकरण ने वह गलती की थी जो उस का उस्ताद आदेश खांबरा कभी नहीं करता था. वह गलती यह थी कि लूटे गए ट्रक को लावारिस छोड़ देना. जयकरण का इरादा पहले ट्रक बेचने का था, लेकिन उस ने बाद में अपना इरादा बदल दिया था.

जब जयकरण से पूछताछ चल रही थी, तभी इत्तफाक से मंडीदीप के ही एक ट्रांसपोर्टर मनोज शर्मा भी मिसरोद थाने पहुंच गए थे. मनोज ने पुलिस को बताया कि उन्होंने अपने ट्रक में चावल भर कर पुणे भेजे थे. ट्रक पुणे तक पहुंचा भी और वहां से चीनी ले कर वापस भोपाल के लिए रवाना भी हुआ लेकिन अभी तक यहां नहीं पहुंचा. मनोज के मुताबिक उस ट्रक में लगभग 10 लाख रुपए कीमत की चीनी थी.

जैसे ही मनोज ने ड्राइवर का नाम जयकरण बताया तो पुलिस वालों के चेहरे चमक उठे क्योंकि जयकरण पहले से ही उस की गिरफ्त में था. लेकिन नई समस्या यह थी कि बिलखिरिया थाने में बैठा जयकरण शक्कर का ट्रक कैसे उड़ा सकता था. इस बाबत जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि मनोज वाला ट्रक जिस का नंबर एमएच18बी ए 3560 है, वह तो उस ने आदेश खांबरा के हवाले कर दिया था.

जीपीएस से लगा ट्रक का सुराग

अब तसवीर साफ हो गई कि आदेश 10 लाख रुपए की शक्कर कहीं न कहीं तो जरूर बेचेगा, लेकिन इस का अंदाजा न तो पुलिस लगा पाई और न ही जयकरण कुछ बता पाया. इस वक्त ट्रक कहां होगा, यह भी पुलिस को नहीं मालूम था.

यह समस्या भी बैठेबिठाए हल हो गई, जब मनोज ने यह बताया कि उन्होंने ट्रक में एक गोपनीय जगह जीपीएस फिट कर रखा है. यह ट्रक जिस किसी टोल नाके से गुजरता था तो उस की लोकेशन उन के मोबाइल पर आ जाती थी. मनोज को अपने ट्रक की आखिरी लोकेशन झांसी की मिली थी.

उस के बाद से मैसेज आने बंद हो गए थे. इस के बाद भी उम्मीदें जिंदा थीं, इसलिए बिट्टू शर्मा हैडकांस्टेबल सचिन, आरक्षक अरुण और देवेश को ले कर रवाना हो गईं. मोबाइल फोन के जरिए अब ट्रक की लोकेशन मिलने लगी थी, लेकिन वह पलपल बदल भी रही थी.

बिट्टू शर्मा ने 10 दिन लगातार इस ट्रक का पीछा किया और आखिरकार ट्रक को उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर स्थित एक ढाबे पर देख भी लिया. इस ढाबे पर पुलिस वाले आधी रात को पहुंचे तो वहां का नजारा बेहद रंगीन था. ढाबे पर शराब सहित मौजमस्ती के तमाम इंतजाम थे जो आमतौर पर हाइवे पर होते हैं.

पर इस टीम का मकसद और निशाना आदेश खांबरा था, जिसे अंतत: सुबह तक पकड़ ही लिया गया और भोपाल ले आए. तुकाराम भी उस के साथ था. बिलखिरिया थाने में जैसे ही आदेश ने जयकरण को देखा तो उसे समझ आ गया कि खेल खत्म हो चुका है. इस के बाद भी उस ने पुलिस को बरगलाने की पूरी कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो पाया.

बेटे के मोह में उलझा

आदेश का मुंह खुलवाने के लिए पुलिस ने उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया और उस के बेटे का हवाला दिया कि जिन ड्राइवरों और क्लीनरों की हत्याएं उस ने की हैं, उन की आत्माएं बदला ले रही हैं. दरअसल, पिछले कुछ दिनों से आदेश के बेटे का 3 बार एक्सीडेंट हुआ था.

डर कह लें या मजबूरी कि आदेश ने एकएक कर सारे गुनाह स्वीकार लिए तो हड़कंप मच गया. आदेश से संबंधित जानकारियां टुकड़ों में ही सही, सामने आने लगीं. उस ने बताया कि वह अपने बेटे और परिवार को बहुत चाहता है.

हैरानी की बात तो यह थी कि उस के घर वालों को नहीं मालूम था कि वह इतना खतरनाक और दुर्दांत हत्यारा है. आदेश अकसर घर से गायब रहता था और कहां और क्यों रहता है, यह सच किसी को नहीं बताता था. हां, अपने गायब रहने के बाबत बहाने बनाने में वह माहिर हो गया था. बयानों में उस ने यह बात कही भी कि अपने गुनाहों की परछाईं उस ने घर वालों पर नहीं पड़ने दी थी.

लेकिन सच यह है कि आदेश के दोनों बेटे शुभम और सुगंध अपने पिता की वास्तविकता जानते थे. नगर पालिका में काम करने वाले शुभम को अपने पिता की गिरफ्तारी की जानकारी 9 सितंबर के अखबारों से मिली थी. शुभम को यह भी मालूम था कि आदेश पर मध्य प्रदेश के गुना के अलावा महाराष्ट्र के अमरावती और संगमनेर में भी मुकदमे चल रहे हैं.

आखिरी बार आदेश 15 अगस्त के दिन घर से निकला था, क्योंकि 16 अगस्त को नागपुर अदालत में उस की पेशी थी. उस का दूसरा बेटा सुगंध एक कार मैकेनिक की दुकान पर काम करता है.

गिरफ्तारी के बाद मंडीदीप में स्वाभाविक तौर पर आदेश की चर्चा रही. जिस ने भी सुना दांतों तले अंगुली दबा ली. इस कस्बे के लोग बताते हैं कि आदेश को टेलरिंग में इतनी महारत हासिल थी कि वह ग्राहक का नाप इंचीटेप से नहीं बल्कि ‘स्त्री’ फिल्म के हीरो राजकुमार राव की तरह अपनी आंखों से ले लेता था और उसी के आधार पर एकदम फिटिंग के कपड़े सिल कर देता था.

मंडीदीप से पहले आदेश रेहटी और शाहगंज के अलावा महाराष्ट के भंडारा में भी टेलरिंग की दुकानें खोल चुका था. यहां कुछ गुंडों से झगड़ा होने के चलते उस ने पुलिस वालों पर ही हमला कर दिया था.

कोई 6 साल पहले आदेश ने भंडारा में जेडेक्स टेलर्स के नाम से अपनी दुकान खोली थी, लेकिन वहां उस का मन नहीं लगा तो वापस मंडीदीप आ गया था. हैरत की बात यह भी है कि मंडीदीप थाने में उस के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं है.

मंडीदीप के पुराने लोग ही जानते हैं कि आदेश खांबरा के दादा नारायणदास खांबरा यहां के जानेमाने और प्रतिष्ठित नागरिक हुआ करते थे. वह एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और गांधीवादी नेता थे और पेशे से ठेकेदार थे. उन्हें बरखेड़ा से ले कर ओबैदुल्लागंज तक रेलवे लाइन बिछाने के लिए भी लोग जानते हैं और दाहोद बांध बनाने के लिए भी.

साल 1965 में नारायणदास का नाम तब पूरे मध्य प्रदेश में गूंजा था, जब उन्होंने भोजपुर विधानसभा से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था और महज 3 वोटों के मामूली अंतर से हार गए थे.

उस जमाने में इस इलाके में कांग्रेस के अलावा हिंदू महासभा का अच्छा प्रभाव था. गुजरे कल की इन बातों और प्रतिष्ठा से कोई संबंध न रखने वाले आदेश खांबरा अपने परिवार और पूर्वजों का नाम इस तरह यानी कई घरों के चिराग बुझा कर रोशन करेगा, इस का अंदाजा किसी को नहीं था.

गिरफ्तारी के बाद

पुलिस आदेश से काफी कुछ उगलवा चुकी है, जिस से यह तो साफ हुआ कि उस के प्रत्यक्ष सहयोगी जयकरण और तुकाराम ही थे, लेकिन जाने क्यों यह बात हर किसी को हजम नहीं हो रही थी क्योंकि मामला एकदो नहीं बल्कि 34 हत्याओं का था.

ट्रक और लूट का माल बेचने में आदेश का मददगार ग्वालियर निवासी साहबजी था. मिसरोद थाने में पुलिस वाले उसे तोड़ने में तो सफल रहे, साथ ही यह जानने की भी कोशिश करते रहे कि आदेश के संबंध किन और कैसे लोगों से थे.

आदेश ने अपने बयान में पुलिस को बताया कि ट्रक ड्राइवरों की जिंदगी कष्टों से भरी होती है, मैं इन्हें मुक्ति दे रहा था. उस ने स्वीकारा कि उस के संबंध दोनों प्रमुख राजनैतिक दलों भाजपा और कांग्रेस के नेताओं से थे. रायसेन जिले के एक भाजपा नेता का संपत्ति विवाद सुलझाने में उस ने कथित तौर पर सुपारी ले कर हत्या भी की थी. यह कहानी लिखे जाने तक इस बात की भी जांच चल रही थी.

सबूतों के नाम पर पुलिस को उस के पास से एक अहम डायरी मिली, जिस में ज्यादा नहीं सिर्फ 50 लोगों के नाम व मोबाइल नंबर दर्ज थे. इन में से अधिकतर ट्रक ड्राइवरों के हैं या फिर उन लोगों के, जो आदेश के लूटे ट्रकों और उन का माल ठिकाने लगाने में उस के सहयोगी थे.

खास अड्डे थे शिकार फांसने के

पुलिस आदेश को ले कर वहांवहां गई, जहांजहां उस ने हत्याएं करने की बात कबूली थी. कई जगह लाशें मिलीं तो कई जगह से पुलिस को खाली हाथ लौटना पड़ा, क्योंकि आदेश ठीकठीक जगह नहीं बता पाया कि उस ने लाश को कहां ठिकाने लगाया था.

अब से करीब 3 महीने पहले गायब हुए सीहोर के ड्राइवर राजेश पवार की लाश पुलिस ने उस की निशानदेही पर चंदेरी के निकट एक पुलिया से बरामद की, जिसे राजेश की पत्नी ने कपड़ों से पहचाना. इस रास्ते पर आदेश ने 2 ट्रक लूट कर 6 लोगों की हत्या की थी और सभी की लाशें पुलिया के नीचे पानी में फेंक दी थीं.

इन तीनों के 11 मील इलाके के कुछ ढाबे खास अड्डे थे, जहां से ये शिकार फांसते थे. आदेश की गिरफ्तारी के बाद देश भर के पुलिस थानों से भोपाल फोन आए कि कहीं उन के इलाकों में अज्ञात हत्याओं के आरोपी ये तीनों तो नहीं. यह बात भी पूछताछ में उजागर हुई कि महाराष्ट्र की तरफ की गई कुछ वारदातों को तुकाराम ने अपने दम पर अंजाम दिया था.

पुलिस हिरासत में आदेश की रंगीनमिजाज शख्सियत भी सामने आई. उस की एक प्रेमिका ग्वालियर में है तो दूसरी भिंड में. इन दोनों के नाम लिली हैं, जो अपने आशिक के पैसों पर लग्जरी जिंदगी जी रही थीं. लिली इन के असली नाम नहीं हैं, बल्कि ये नाम इन्हें आदेश ने अपनी सहूलियत के लिए दिए थे.

आदेश अपना खाली वक्त इन दोनों के साथ लेकिन अलगअलग गुजारता था. उस का कहना है कि उस की दोनों माशूकाओं को भी उस के गुनाहों की जानकारी नहीं थी. एक लिली के बारे में उस ने बताया कि वह कालेज गर्ल है जिस के बारे में चर्चा है कि वह उसे अपने धंधे में शामिल कर हाइवे क्वीन बनाने की मंशा पाले बैठा था.

पुलिस ने उस के ठिकाने पर दबिश दी लेकिन वह गायब हो चुकी थी. इसी तरह जयकरण की भी एक माशूका थी, जिस के बारे में उसे शक था कि उस के संबंध एक रिश्तेदार से हैं, जयकरण ने उस रिश्तेदार की ही हत्या कर डाली थी.

कहानी अभी बाकी है

अक्तूबर के पहले हफ्ते में मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव की गतिविधियां शुरू हुईं और आचार संहिता लगी तो आदेश की चर्चा भी कम हो गई. लेकिन अब तक पुलिस साहिबजी को गिरफ्तार कर भोपाल ले आई थी, जो गाजीपुर जेल में बंद था. इधर एक दूसरे पेशेवर अपराधी बिल्ला का कहना है कि वह दरअसल आदेश का गुरू है. बिल्ला का परिवार भी सालों पहले पाकिस्तान से आ कर झारखंड में बस गया था. सन 1989 में वह पंजाब से होता हुआ ग्वालियर आ गया और यहीं से आपराधिक वारदातों को अंजाम देने लगा.

बिल्ला भी ट्रक लूटता था. उस ने पहली वारदात साल 1992 में की थी. साल 2002 में वह राजगढ़ में गिरफ्तार हुआ था और सन 2007 में उस की मुलाकात आदेश से हुई थी. इस के बाद दोनों ने मिल कर हाइवे गैंग बना लिया था..

आदेश के जुर्मों की दास्तान बेहद उलझी हुई है, जिसे सुलझाने में पुलिस को पसीने आ रहे हैं. घटनाओं और पात्रों को सिलसिलेवार जमाना आसान काम नहीं रह गया है. इसी सिलसिले में 7 अक्तूबर को आदेश के मुंहबोले चाचा अशोक खांबरा का भी जिक्र हुआ, जिस की कहानी आदेश से कहीं ज्यादा दिलचस्प है. हिरासत में आदेश ने अपने मुंहबोले चाचा अशोक की बात कर के उसे अपना आदर्श बताया था.

अशोक खांबरा पर 70 हत्याएं कर ट्रक लूटने के आरोप हैं. उस की कहानी भी एकदम फिल्मी है. सन 2000 में वह बिलासपुर जेल में बंद था. पुलिस जब उसे पेशी के लिए ले जा रही थी, तब उस के गुर्गों ने फ्रूटी में नशीला पदार्थ मिला कर पुलिस वालों को पिला दी थी और अशोक फरार हो गया था.

इस के कुछ साल बाद अशोक के घर वालों ने अशोक की लाश नैनीताल के जंगलों में होने का दावा पेश कर उस का मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल कर लिया था. जब पुलिस रिकौर्ड में वह मर गया तो उस के खिलाफ चल रहे मामलों पर भी विराम लग गया. शक इस बात का है कि वह मरा नहीं बल्कि जिंदा है यानी नैनीताल के जंगलों में जो लाश मिली थी, वह अशोक की नहीं बल्कि किसी और की थी.

अब अशोक खांबरा की फाइलें भी खुल रही हैं और पुलिस उस का और आदेश का कनेक्शन भी ढूंढ रही है. अंदाजा है कि अशोक उत्तर प्रदेश में कहीं हो सकता है. इधर आदेश ने अशोक के बाबत चुप्पी साध रखी है. यानी मामला सुलझने के बजाय और उलझता जा रहा है.

अब नएनए किरदार आदेश से जुड़ रहे हैं, इस से पुलिस की मुश्किलें बढ़ रही हैं. इस के बाद भी वह जुटी हुई है कि बिखरी हुई कडि़यां जोड़ कर मामले को सुलझाए. अब यह सब चुनाव हो जाने के बाद ही संभव हो पाएगा, तब तक नएनए खुलासे होते रहेंगे कि आदेश के कहां, किस से, कैसे ताल्लुकात थे?

ससुराल की इन बातों को मायके में कभी ना बताएं

शादी के बाद लड़की अपना घर छोड़कर अपने ससुराल चली जाती है और उसे ही अपना घर बना लेती है. शादी के बाद लड़की एक घर की बहू बन जाती है और उस पर कई जिम्मेदारियां भी आ जाती हैं.

ऐसे में हर बहू को कई बातों को ध्यान में रखने की जरूरत होती हैं और अपने ससुराल के सीक्रेट को छुपाकर रखने की जरूरत होती है. जिनकी मदद से घर में खुशियां बनी रहती हैं.

तो आइये आज हम बताते हैं आपको ससुराल के उन सीक्रेट के बारे में जो हर बहू को अपने मायके में भी नहीं बताने चाहिए.

पति की आदतें

हर इंसान की आदतें अलग-अलग होती हैं. आपको अपने पति की कुछ आदतें पसंद न हो तो सहेलियों के सामने उनकी बुराई करने की बजाय प्यार से उसे सुधारने की कोशिश करें. लोग तो सिर्फ मजाक उड़ाएंगे लेकिन आपकी जीवनसाथी ही आपकी पहचान है. एक-दूसरे की कद्र करें,बुराई नहीं.

फैमिली प्लानिंग

शादी के बाद अकसर दूसरी औरतें यह जानने के लिए उत्सुक होती हैं कि आप बच्चा कब पैदा कर रही हैं. इस बात का ध्यान रखें की परिवार को आगे बढ़ाने की सलाह पति-पत्नी का खास सीक्रेट है. दूसरों की राय मानने की बजाए अपनी बात की आपस में ही रहने दें.

आर्थिक स्थिति

अपनी सहेलियों या फिर रिश्तेदारों के सामने ससुराल की आर्थिक स्थिति का रोना न रोएं. इस बात को हमेशा याद रखें कि पीठ पीछे वह आपकी बुराई करेंगे. मदद के लिए कोई आगे नहीं आएगा. घर का बजट अपनी आय के हिसाब से ही बनाएं. पहले ही खर्च को कम करें और इंवेस्टमेंट की तरफ ध्यान दें.

आधी अधूरी प्रेम कहानी : राबिया और फाजिल की प्रेम कहानी

बात 6 अक्टूबर, 2018 की है. उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद के थाना पाकबड़ा का एक गांव है ऊमरी सब्जीपुर. इस गांव के लोग सुबह के समय अपने खेतों की तरफ जा रहे थे. तभी उन्हें ईदगाह के पीछे नजाकत चौधरी के खेत में एक युवक की लाश पड़ी दिखी. लोग जब लाश के नजदीक पहुंचे तो पता चला, उस का गला कटा हुआ है. उस युवक को कोई भी पहचान नहीं सका. वह नीले रंग की जींस और सफेद रंग की शर्ट पहने हुए था.

जब गांव के लोगों को इस लाश की खबर मिली तो वे देखने के लिए मौके पर पहुंचे गए. कुछ ही देर में वहां काफी भीड़ जमा हो गई. सूचना पा कर पाकबड़ा के थानाप्रभारी गजेंद्र त्यागी भी घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां मौजूद लोगों से उन्होंने लाश की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका.

मृतक ब्रांडेड कपड़े और जूते पहने हुए था और किसी अच्छे परिवार का लग रहा था. जामातलाशी में उस की जेब से 4 हजार रुपए मिले. इस से यह बात स्पष्ट हो गई कि उस की हत्या लूट के इरादे से नहीं की गई थी.

थानाप्रभारी ने इस की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दे दी थी, कुछ ही देर में एसएसपी जे. रविंद्र गौड़, एसपी (सिटी) अंकित मित्तल व सीओ (हाइवे) राजेश कुमार भी वहां पहुंच गए. सभी ने लाश का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतक के हाथपैरों पर चोट के निशान थे. फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया गया था. घटनास्थल की काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम गृह में रखवा दी.

मृतक की शिनाख्त कराने और केस का खुलासा करने के लिए एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ ने सीओ (हाइवे) राजेश कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया. टीम में पाकबड़ा थानाप्रभारी गजेंद्र त्यागी, एसएसआई प्रदीप कुमार, एसआई अतुल कुमार त्यागी, कांस्टेबल जावेद खां, सोनू ढाका, सुनील कुमार आदि को शामिल किया गया. टीम के मार्गदर्शन की जिम्मेदारी एसपी सिटी अंकित मित्तल को सौंपी गई.

शव की हुई पहचान

पुलिस ने ऊमरी सब्जीपुर के ग्रामप्रधान शाने आलम की तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. चूंकि शव की शिनाख्त नहीं हुई थी, इसलिए विभिन्न अखबारों में उस की फोटो सहित सूचना छपवाई गई. 7 अक्तूबर को थानाप्रभारी थाने में एसएसआई से इसी मसले पर चर्चा कर रहे थे, तभी कुछ लोग उन के पास पहुंचे.

उन में से एक ने बताया, ‘‘साहब, मेरा नाम नाजिम है. हम लोग बरेली जिले के कस्बा सिरौली के रहने वाले हैं. मेरा भाई फाजिल, जोकि चिकन का कारोबार करता है, 5 अक्तूबर शुक्रवार को मुर्गे खरीदने के लिए सिरौली से मुरादाबाद आया था. वह अभी तक घर नहीं लौटा. उस रात 10 बजे से उस का मोबाइल भी बंद है. अखबार पढ़ कर हम यहां आए हैं.’’

पुलिस ने एक दिन पहले जिस अज्ञात युवक की लाश बरामद की थी, थानाप्रभारी ने उस के फोटो नाजिम को दिखाए. फोटो देखते ही वह रोने लगा. बोला, ‘‘यही मेरा भाई है. मेरे भाई की यह हालत किस ने की?’’

लाश की शिनाख्त होने पर थानाप्रभारी ने राहत की सांस ली और नाजिम व उस के साथ आए लोगों को एक सिपाही के साथ पोस्टमार्टम गृह भेज दिया. वहां जब उन्हें ऊमरी सब्जी गांव के पास मिली अज्ञात युवक की लाश दिखाई गई तो नाजिम ने उस की पुष्टि अपने भाई फाजिल के रूप में की.

शव की शिनाख्त के बाद जब उस के भाई नाजिम से पूछताछ की गई तो उस ने आरोप लगाया कि मेरे भाई फाजिल की हत्या मुरादाबाद के कठघर थाना क्षेत्र की रहने वाली उस की प्रेमिका राबिया के घर वालों ने की है. राबिया के भाई दिलशाद हुसैन ने फाजिल को फोन कर के मिलने के लिए बुलाया था.

थानाप्रभारी ने यह जानकारी सीओ राजेश कुमार को बता दी. उन के निर्देश पर पुलिस टीम ने राबिया के मोहल्ला रहमत नगर (करूला) स्थित घर पर दबिश दी. पता चला कि मृतक फाजिल की प्रेमिका राबिया की भी दिल का दौरा पड़ने से मौत हो चुकी है. उस की लाश 7 अक्तूबर को ही करबला के कब्रिस्तान में दफना दी गई थी.

चूंकि नाजिम ने सीधे आरोप लगाया था, इसलिए नाजिम के घर वालों से पूछताछ करनी जरूरी थी. राबिया का भाई दिलशाद घर पर नहीं था. पता चला कि वह हैदराबाद गया हुआ है. इस पर पुलिस उस के पिता शमशाद हुसैन को पूछताछ के लिए थाने ले आई.

थाने में जब शमशाद हुसैन से एसपी (सिटी) के सामने सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि फाजिल की हत्या उस के बेटे दिलशाद ने अपने बहनोई के साथ मिल कर की थी. इस के बाद हालात ऐसे बने कि राबिया की भी हत्या करनी पड़ी.

खुल गया हत्या का रहस्य

पुलिस फाजिल की हत्या के ही मामले की जांच कर रही थी, लेकिन अब पता चला कि इन लोगों ने हत्या एक नहीं बल्कि 2 की थीं. हत्या के बाद इन लोगों ने राबिया की मौत हार्टअटैक से होने की बात प्रचारित कर दी थी.

पुलिस के लिए अब यह मामला और ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया था. दिलशाद की लोकेशन जानने के लिए पुलिस ने उस का फोन नंबर सर्विलांस पर लगा दिया. इस के अलावा दिलशाद के फोन नंबर की काल डिटेल्स भी निकलवाई गई.

दिलशाद की लोकेशन दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके की मिली. एसपी (सिटी) अंकित मित्तल ने 9 अक्तूबर को ही एक पुलिस टीम दिल्ली रवाना कर दी. ढूंढतेढूंढते पुलिस दिलशाद के पास पहुंच गई. दिल्ली में वह किराए का कमरा ले कर रह रहा था. उस के साथ उस का मौसेरा बहनोई उवैस भी था. दोनों को हिरासत में ले कर पुलिस थाना पाकबड़ा लौट आई.

मुरादाबाद शहर के रहमत नगर (करूला) निवासी शमशाद की बेटी राबिया इंटरमीडिएट के इम्तहान खत्म होने के बाद अपनी ननिहाल चली गई थी. उस की ननिहाल बरेली जिले के कस्बा सिरौली में थी. उस के नाना मुकद्दर व मामा मुख्तार गौहर उसे बहुत प्यार करते थे. ननिहाल में ही उस की मुलाकात सिरौली में ही रहने वाले फाजिल से हुई. फाजिल ने बताया कि उस की मीट शौप है.

राबिया तो खूबसूरत थी ही, फाजिल भी कम हैंडसम नहीं था. उस की आमदनी भी अच्छी थी, इसलिए वह खूब बनठन कर रहता था. उन दोनों में पहले दोस्ती हुई. फिर धीरेधीरे दोस्ती प्यार में बदल गई. दोनों चोरीछिपे मिलने लगे.

ऐसी मुलाकातों में प्रेमी जोड़े साथ जीनेमरने की कसमें खा लेते हैं. फाजिल और राबिया ने भी जीवन भर एकदूसरे का साथ निभाने का वादा किया. हालांकि वे चोरीछिपे मिलते थे. इस के बावजूद लोगों को उन के प्यार की भनक मिल ही गई. ननिहाल वालों को पता चला तो उन्होंने राबिया को उस के घर मुरादाबाद भेज दिया.

आखिर दोनों ने मिलने की राह बना ही ली

फाजिल मुरादाबाद के रहमत नगर मार्केट से अपनी दुकान के लिए मुर्गे खरीद कर लाता था. राबिया का घर भी रहमत नगर में ही था, इसलिए जब वह मुरादाबाद जाता तो उस की मुलाकात राबिया से हो जाती थी.

राबिया के ननिहाल वालों की फाजिल के घर वालों से अनबन थी. जब उन्हें पता चला कि फाजिल मुरादाबाद में भी राबिया का पीछा नहीं छोड़ रहा है तो उन की फाजिल के घर वालों से आए दिन लड़ाई होने लगी.

राबिया की वजह से जब घर वालों की बदनामी होने लगी तो उन्होंने उसे बहुत समझाया. लेकिन वह फाजिल से ही निकाह करने की जिद करती रही. लेकिन इस के लिए न तो घर वाले तैयार थे और न ननिहाल वाले. घर वालों ने राबिया के लिए लड़का ढूंढना शुरू कर दिया. खोजबीन कर के उन्होंने राबिया का रिश्ता मुरादाबाद शहर के ही नागफनी क्षेत्र के मोहल्ला डहरिया के रहने वाले अशफाक हुसैन के बेटे आरिफ हुसैन के साथ तय कर दिया.

इस रिश्ते का राबिया ने विरोध भी किया. लेकिन घर वालों ने उस की एक नहीं सुनी. अंतत: 1 नवंबर, 2013 को उस की शादी आरिफ के साथ कर दी गई.

शादी के बाद वह आरिफ के साथ चली तो गई लेकिन उस के मन से फाजिल की यादें दूर होने का नाम नहीं ले रही थीं. रहरह कर उसे फाजिल के साथ गुजारे हुए पल याद आते थे. ससुराल में जब कभी उसे मौका मिलता, वह फाजिल से फोन पर बात कर लेती थी.

राबिया ससुराल से जब मायके आती तो उस की फाजिल से मुलाकात हो जाती थी. यानी उस की शादी आरिफ से हो जरूर गई थी लेकिन उस का अपने प्रेमी से मिलनाजुलना जारी रहा.

इसी दौरान राबिया एक बेटी की मां बन गई थी, जिस का नाम महविश रखा गया था. अब वह 3 साल की है. बेटी पैदा होने के बाद आरिफ सऊदी अरब चला गया था. इस के बाद राबिया एक तरह से बेलगाम हो गई. वह बेटी को कभी ससुराल में तो कभी मायके में छोड़ कर फाजिल के साथ कईकई दिनों के लिए गायब हो जाती थी, जिस वजह से दोनों परिवारों की काफी बदनामी हो रही थी.

यह जानकारी किसी तरह सऊदी अरब में काम कर रहे उस के पति आरिफ को मिली तो उस ने फोन पर राबिया को कई बार समझाया. मायके वालों ने भी समझाया कि वह फाजिल को भूल कर अपनी गृहस्थी चलाए, लेकिन राबिया पर किसी का कोई असर नहीं हुआ.

विदेश में भी नहीं भूली प्रेमी फाजिल को

बाद में आरिफ राबिया को अपने साथ सऊदी अरब ले गया. वह वहां एक साल तक रही. वहां भी उसे रहरह कर प्रेमी की यादें आती रहीं. आखिरकार राबिया ने पति से कह दिया कि यहां उस का मन नहीं लग रहा, वह मुरादाबाद जाना चाहती है. मजबूरी में आरिफ उसे ले कर मुरादाबाद लौट आया.

मुरादाबाद आने के बाद राबिया ने फिर से अपने प्रेमी से मिलना शुरू कर दिया. वह खुले रूप से फाजिल के साथ घूमती. इसे ले कर मोहल्ले वाले राबिया से घर वालों पर ताने कसते. आरिफ उसे सऊदी अरब से हर महीने पैसे भेजता रहता था, जिन्हें वह खुले हाथों से खर्च करती थी.

घटना से 5 दिन पहले आरिफ सऊदी अरब  से वापस आया तो मोहल्ले वालों ने उस से भी राबिया की शिकायत की. आरिफ ने पत्नी को समझाया भी लेकिन राबिया नहीं मानी. दोनों के बीच फाजिल को ले कर कई बार झगड़ा भी हुआ. ऐसे में राबिया उस से तलाक देने को कहती. साथ ही यह भी कि वह फाजिल को हरगिज नहीं छोड़ सकती.

फाजिल राबिया पर शादी करने का दबाव बना रहा था. इतना ही नहीं, उस ने राबिया के परिवार वालों से फोन पर कह भी दिया था कि तुम लोग ऐसे नहीं माने तो मैं राबिया की छोटी बहन को उठवा लूंगा. फाजिल की इस धमकी पर राबिया के पिता शमशाद को बहुत गुस्सा आया. उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि वह फाजिल को सबक जरूर सिखाएंगे.

इस के बाद राबिया के परिवार वालों ने एक भयंकर योजना बनाई, जिस में राबिया के पति आरिफ को भी शामिल किया गया.

बन गई हत्या की योजना

योजना के मुताबिक राबिया के भाई दिलशाद ने राबिया से कहा, ‘‘राबिया, तुम फाजिल से बहुत प्यार करती हो. परिवार के लोगों ने फैसला किया है कि निकाह के संबंध में पहले फाजिल से बात कर ली जाए.’’

राबिया को भाई की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था, इसलिए उस ने अब्बू से पूछा, ‘‘अब्बू, क्या आप मेरा निकाह फाजिल से करा रहे हैं?’’

‘‘मैं ने तुम्हारा निकाह आरिफ से करा तो दिया है. अब दूसरा निकाह क्यों कराऊंगा? फाजिल से निकाह करने की बात तो तुम भूल ही जाओ.’’

इस के बाद राबिया ने अपने भाई दिलशाद से बात की तो उस ने राबिया को विश्वास में ले कर कहा, ‘‘अब्बू अगर राजी नहीं हैं तो क्या, तेरा भाई तो है. मैं कराऊंगा तेरा निकाह. रही बात अब्बू की तो पाकबड़ा में मेरा एक जानकार तांत्रिक है. अब्बू को वश में करना उस के बाएं हाथ का काम है.’’

दिलशाद ने बहन से कहा, ‘‘अच्छा, फाजिल से मेरी बात करा. मैं भी तो जान लूं कि वह तैयार है या नहीं.’’

राबिया ने उसी समय फाजिल को फोन मिलाया और अपने भाई से उस की बात करा दी. दिलशाद ने फाजिल से कहा, ‘‘फाजिल, बात दरअसल यह है कि हम ने किसी तरह आरिफ को राबिया से तलाक लेने के लिए राजी कर लिया है. यह बताओ कि तुम उस से निकाह के लिए तैयार हो?’’

‘‘हां, मैं तैयार हूं.’’ फाजिल खुश हो कर बोला.

‘‘ठीक है, लेकिन निकाह में अब बस एक रुकावट है, वह यह कि हमारे अब्बा नहीं मान रहे हैं. पर तुम चिंता मत करो उन का इलाज भी मैं ने ढूंढ लिया है. तुम मुरादाबाद आ जाओ, यहीं पर बैठ कर बात होगी. रही बात अब्बा की तो मेरा एक जानकार तांत्रिक है. वह ताबीज देता है. उस के ताबीज से वह भी वश में आ जाएंगे.’’

फाजिल बोला, ‘‘फोन राबिया को दे दो.’’

फाजिल ने राबिया से पूछा, ‘‘तुम्हारा भाई दिलशाद जो कह रहा है, क्या वह ठीक है?’’

‘‘हां ठीक है. ऐसी कोई बात नहीं है तुम मुरादाबाद आ जाओ.’’ राबिया ने उसे विश्वास दिलाया.

यह बात 4 अक्तूबर, 2018 की है. फाजिल ने दिलशाद से कहा, ‘‘मैं आज तो आ नहीं पाऊंगा. हां, मैं कल जरूर तुम्हारे पास आ जाऊंगा.’’

फाजिल के आने के पहले सभी लोग योजना को सफल बनाने के लिए आपस में विचारविमर्श करने लगे. इस खौफनाक साजिश की राबिया को जानकारी नहीं थी. वह तो यही समझ रही थी कि उस का भाई सच में फाजिल से उस का निकाह कराने की कोशिश में है.

फाजिल फंस गया जाल में

5 अक्तूबर को फाजिल बरेली से अपनी काले रंग की पैशन मोटरसाइकिल नंबर यूपी25बी वाई3154 से मुरादाबाद पहुंचा. राबिया ने फोन कर के उसे रहमत नगर की गली नंबर-4 स्थित हाजी मार्केट में मिलने को कहा, क्योंकि वहीं पर दिलशाद उस का इंतजार कर रहा था.

फाजिल रात 8 बजे राबिया के बताए पते पर पहुंच गया. वहां पर उसे दिलशाद व उस का साथी मिले. दिलशाद ने फाजिल से बड़ी आत्मीयता और शालीनता से बात की. उस ने अपनी लच्छेदार बातों से फाजिल को फांस लिया था.

फाजिल ने उन लोगों पर विश्वास कर लिया था. उस ने दिलशाद से उस के साथ आए व्यक्ति का परिचय पूछा तो उस ने बताया, ‘‘यह हमारे मौसेरे जीजा उवैस हैं, यह कुंदरकी में रहते हैं. पाकबड़ा में जिस तांत्रिक के बारे में मैं बात कर रहा था, वह इन का ही जानकार है.

बहुत पहुंचा हुआ तांत्रिक हैं. हमारे घरपरिवार के सभी लोग तुम्हारे और राबिया के साथ हैं. बस अब्बा ही राजी नहीं हैं. तांत्रिक से ताबीज बनवाने के लिए अभी उस के पास पाकबड़ा चलते हैं. ताबीज बन जाएगा तो अब्बा भी वश में हो जाएंगे.’’

रात का समय था. फाजिल उन के साथ जाना नहीं चाहता था, इसलिए उस ने राबिया को फोन मिला कर पूछा कि वह दिलशाद और उवैस के साथ पाकबड़ा जाए या नहीं. राबिया ने भी कह दिया कि ताबीज बनवाने के लिए वह दिलशाद के साथ तांत्रिक के पास चला जाए. ताबीज बनने के बाद सब ठीक हो जाएगा.

फाजिल बाइक से दिलशाद व उवैस के साथ पाकबड़ा के लिए चल दिया. दिलशाद और उवैस मोटरसाइकिल नंबर यूपी25ए यू4223 पर थे.  जब ये लोग ऊमरी सब्जीपुर गांव के पास पहुंचे, तो किसी बहाने से दिलशाद और उवैस ने अपनी मोटरसाइकिल रोक ली. उन्हें रुकते देख फाजिल भी रुक गया.

दिलशाद व उवैस बात करने के बहाने फाजिल को चाकू की नोंक पर एक खेत में ले गए. पहले तो दोनों ने उस के साथ मारपीट की फिर उसे दबोच कर उस का गला रेत दिया. कुछ ही देर में फाजिल की मौत हो गई. इस के बाद दोनों फाजिल की मोटरसाइकिल ले कर घर की तरफ चल दिए.

रास्ते में दिलशाद ने अपने अब्बा शमशाद को बता दिया कि काम हो गया. हम दोनों घर आ रहे हैं. यह बात राबिया ने सुन ली. उस समय तो वह कुछ नहीं बोली लेकिन जब दिलशाद और उस का बहनोई फाजिल की बाइक ले कर घर आए तो राबिया ने फाजिल के बारे में पूछा. दोनों कोई जवाब नहीं दे सके तो वह चिल्लाने लगी. राबिया चिल्लाचिल्ला कर कह रही थी कि तुम लोगों ने फाजिल को मार दिया है, तुम्हारे कपड़ों पर लगा खून सब बता रहा है. मैं पुलिस से तुम सब की शिकायत कर के जेल भिजवा दूंगी.

दिलशाद और उवैस ने खून सने कपडे़ उतार कर दूसरे कपड़े पहन लिए. जब वे कहीं भाग जाने को हुए तो राबिया शोर मचाने लगी. यह देख दिलशाद ने राबिया के मुंह पर कपड़ा रख कर उस का गला घोंट दिया. राबिया के प्राण निकल गए. यह बात 5-6 अक्तूबर की रात डेढ़ बजे की है.

इस के बाद दिलशाद व उवैस दोनों मुरादाबाद के रोजडवेज बसअड्डे पर पहुंचे. उन्होंने फाजिल की मोटरसाइकिल बसस्टैंड के आगे खड़ी कर दी और दिल्ली जाने वाली बस में बैठ गए. दोनों हैदराबाद भाग जाना चाहते थे पर दिल्ली पहुंच कर उन्होंने अपने एक जानकार की मार्फत जामा मस्जिद के पास किराए का कमरा ले लिया और फोन से सारी गतिविधियों का पता करते रहे.

अगले दिन राबिया के अब्बा शमशाद ने मोहल्ले में यह बात फैला दी कि हार्टअटैक से राबिया की मौत हो गई है. उसी दिन आननफानन में उस की लाश भी करबला के कब्रिस्तान में दफना दी.

आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने जिलाधिकारी से राबिया की लाश कब्र से निकलवा कर उस का पोस्टमार्टम कराने का अनुरोध किया. जिलाधिकारी राकेश कुमार के आदेश पर 11 अक्तूबर, 2018 को 10 बजे मजिस्ट्रैट की मौजूदगी में सुबह राबिया के शव को कब्र से निकाल कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

राबिया की हत्या की हकीकत आई सामने

डाक्टरों के पैनल ने राबिया के शव का पोस्टमार्टम किया तो पता चला, उस की मौत हार्टअटैक से नहीं, बल्कि गला घोंटने से हुई थी. पोस्टमार्टम के बाद शव को पुन: दफना दिया गया. शमशाद उस के बेटे दिलशाद और उवैस से पूछताछ के बाद पुलिस ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर दोहरे मर्डर का राज खोला और तीनों आरोपियों को न्यायालय में पेश कर के जिला जेल भेज दिया.

पुलिस इस केस गंभीरता से जांच कर रही थी. जांच में वह किसी भी तरह की खामी नहीं छोड़ना चाहती थी. पुलिस ने दिलशाद के घर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच की तो एक फुटेज में 6-7 अक्तूबर को मृतका राबिया का पति आरिफ भी दिखाई दिया.

आरिफ मुरादाबाद शहर के ही नागफनी थानाक्षेत्र के मोहल्ला डहरिया में रहता था. पुलिस ने आरिफ को भी पूछताछ के लिए बुलवा लिया.

प्रारंभिक पूछताछ में वह अपनी ससुराल में आने की बात नकारता रहा. चूंकि पुलिस के पास आरिफ के ससुराल में आने के पुख्ता सबूत थे, इसलिए उस से सख्ती से पूछताछ की गई. आखिर उस ने स्वीकार कर लिया कि इस मामले की साजिश में वह भी शामिल था. 14 अक्तूबर को आरिफ को भी जेल भेज दिया गया.

शेरों की रहस्यमय मौत : अगर इसे न रोका गया तो…

गुजरात का गिर अभयारण्य दुनियाभर में एशियाई शेरों की शरणस्थली के रूप में जाना जाता है. लेकिन हालफिलहाल यह अभयारण्य इसलिए चर्चाओं में है, क्योंकि यहां के शेरों पर खतरा मंडरा रहा है. इस साल सितंबर के दूसरे सप्ताह से अक्तूबर के पहले सप्ताह तक यहां के 23 शेरों की मौत हो चुकी है. इस से पहले भी गुजरात में 2016 और 2017 में 182 शेरों की मौत हो गई थी. गुजरात सरकार ने शेरों की इन मौतों की बात इसी साल मार्च में विधानसभा में की थी.

काफी अंतराल के बाद गिर अभयारण्य में इस साल सितंबर महीने की 12 तारीख को सब से पहले एक वयस्क शेर का शव मिला. वन अधिकारियों ने इस शेर के शव का पोस्टमार्टम करवा कर उस का अंतिम संस्कार कर दिया. इस शेर की मौत की जांचपड़ताल शुरू होने से पहले ही 13 सितंबर को एक मादा शेर का शव और मिल गया. इस के बाद एक दिन छोड़ कर 15 सितंबर को 3 शावक मृत मिले तो वन अधिकारियों के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं.

अधिकारियों ने जांचपड़ताल शुरू की, लेकिन फिर 17 सितंबर को एक मादा शेर का शव मिल गया. इस के अगले दिन 18 सितंबर को 2 शावकों और एक वयस्क शेर व एक मादा शेर की मौत की सूचना आ गई. अभी इन शेरों की मौत की पड़ताल शुरू भी नहीं हुई थी कि 19 सितंबर को एक अन्य शेर की मौत हो गई.

इस तरह 12 से 19 सितंबर तक 11 शेरों की मौत हो चुकी थी. लेकिन इन मौतों की चर्चा तक नहीं हुई. इस का कारण यह था कि वन अधिकारियों ने बदनामी के डर से शेरों की मौत के मामलों को दबा दिया था.

गिर में शेरों की बड़ी तादाद में हो रही मौत का मामला 20 सितंबर को मीडिया में आया. उस समय गिर (पूर्व) के उप वनसंरक्षक पी. पुरुषोत्तम ने कहा कि गिर अभयारण्य के पूर्वी हिस्से में अमरेली जिले के दलखाणिया वन रेंज में अलगअलग स्थानों पर 6 शेरों के शव मिले थे. जबकि संक्रमण और बीमारी की वजह से 4 शेरों की मौत जसाधार पशु चिकित्सा केंद्र में इलाज के दौरान हुई.

एशियाई शेरों की मौतों का मामला सामने आने के बाद गुजरात ही नहीं, पूरे देश में सनसनी फैल गई. राज्य सरकार ने 21 सितंबर को इन शेरों की मौत की जांच के आदेश दे दिए. गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने कहा कि शेरों की मौत के मामले में अगर किसी की लापरवाही सामने आती है, तो सरकार कड़ी काररवाई करेगी.

उन्होंने कहा कि शेर गुजरात के गौरव हैं. सरकार पूरे मामले को गंभीरता से ले रही है. जांच में यह भी देखा जाएगा कि शेरों की ये मौतें स्वाभाविक हैं या अस्वाभाविक. भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए भी कदम उठाए जाएंगे.

दूसरी ओर राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक और फारेस्ट फोर्स के मुखिया जी.के. सिन्हा ने कहा कि 8 दिन के भीतर 11 एशियाई शेरों की मौत हुई है. इन में से 6 शावकों तथा 2 शेरों की मौत का मुख्य कारण शेरों की आपसी वर्चस्व की लड़ाई हो सकती है. जब सिन्हा ने यह बात कही तब तक वन अधिकारियों को 3 शेरों की मौत के मामले की पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं मिली थी.

इन में 9 शेर गिर वन अभयारण्य के पूर्व (विस्तार) के दलखाणिया रेंज में और 2 शेर निकटवर्ती जसाधार रेंज में मरे हुए मिले थे. इन सभी शेरों की मौत 12 से 19 सितंबर के बीच यानी 8 दिन में हुई थी. इन में 5 वयस्क शेर और 6 एक साल से कम उम्र के शावक थे, 11 में से 8 नर और 3 मादा.

दावा सही नहीं था

पीसीसीएफ जी.के. सिन्हा ने दावा किया कि जिन इलाकों में शेरों के शव मिले, उन इलाकों में बाहरी शेरों के आने का सिलसिला चल रहा था. सिन्हा के अनुसार अधिकांश शेरों की मौत अपने क्षेत्र और समूह पर आधिपत्य रखने वाले शेरों के बीच वर्चस्व की लड़ाई में हुई.

इस इलाके के पुराने सभी वयस्क शेरों पर नजर रखने के लिए कालर आईडी लगाई गई थी, लेकिन मृत पाए गए 5 वयस्कों में से 3 शेरों के गले में कालर आईडी नहीं थी. मृत पाए गए शेरों के पेट में भोजन के कण भी नहीं मिले.

इन बातों के आधार पर वन अधिकारियों ने दावा किया कि वर्चस्व की लड़ाई में शावक तो आमतौर पर मारे जाते हैं, जबकि हारने वाले वयस्क शेर सुनसान इलाकों में भाग जाते हैं, जहां शिकार न मिलने पर वे भूख से ही दम तोड़ देते हैं.

राज्य सरकार की ओर से जांच के आदेश दिए जाने पर गुजरात के प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव और मुख्य वन्यजीव वार्डन अक्षय कुमार सक्सेना उसी दिन पड़ताल के लिए गिर पहुंच गए.

सिलसिला चलता रहा तो लिया गया ऐक्शन

शेरों की मौत का मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात का होने के कारण केंद्र सरकार ने भी इसे गंभीरता से लिया. केंद्रीय वन एवं पर्यावरण विभाग की टीम ने 22 सितंबर को गिर अभयारण्य पहुंच कर उन जगहों का मौकामुआयना किया, जहां शेरों के शव मिले थे. केंद्र सरकार के दल ने राज्य सरकार के अधिकारियों से भी इस मामले में विस्तार से बातचीत की.

यह दुर्भाग्य ही रहा कि केंद्र सरकार की टीम के दौरे के एक दिन बाद ही राज्य सरकार के आदेश पर जांच में जुटी उच्चाधिकारियों की टीम को उस समय झटका लगा, जब 23 और 24 सितंबर को 24 घंटे के दौरान 2 और शेरों की मौत हो गई. इन में अमरेली जिले में आने वाले गिर वन के पूर्वी हिस्से की दलखाणिया रेंज में वन कर्मचारियों ने करीब 3-4 साल की एक शेरनी को बीमार हालत में देखा.

बीमार शेरनी को इलाज मुहैया कराया जाता, इस से पहले ही उस की मौत हो गई. वनकर्मियों ने इसी इलाके में मिले करीब 5-6 महीने के शेर के शावक को बीमार हालत में जसाधार पशु चिकित्सा केंद्र में भरती कराया था, जहां उस ने 24 सितंबर को दम तोड़ दिया.

मृत शेरनी के शरीर पर वन विभाग की एक चिप लगी मिली, जिस से पता चला कि शेरनी पिछले साल सितंबर में बीमार हुई थी, तब उस का इलाज कराया गया था. शेरनी के शव के पोस्टमार्टम के बाद इंफेक्शन या अन्य कारणों से हुई मौत की जांच के लिए नमूने ले कर भेज दिए गए थे.

गिर अभयारण्य में शेरों की लगातार मौतों की घटनाओं से मची अफरातफरी के बीच वन विभाग के आला अफसरों ने विचारविमर्श के बाद 64 टीमें गठित कर के शेरों की मौत के कारणों का पता लगाने का प्रयास शुरू कर दिया. शेरों की मौत को ले कर 8 हजार हेक्टेयर से ज्यादा वन क्षेत्र में सघन जांच अभियान शुरू किया गया.

जांच अभियान के दौरान दलखाणिया रेंज के सरसिया वीडी इलाके में ज्यादा बीमार हालत में पाई गई एक शेरनी को 25 सितंबर को रेस्क्यू सेंटर में इलाज के लिए ले जाया गया, लेकिन उपचार के दौरान उस की मौत हो गई. इस शेरनी की उम्र 8 से 9 साल के बीच रही होगी.

मृत शेरनी के रक्त, टिश्यू व अन्य आवश्यक नमूने जांच के लिए भेज दिए गए. इस शेरनी के शरीर पर एक माइक्रो चिप लगी मिली. इस से पता चला कि 4 सितंबर, 2016 को यह शेरनी इसी इलाके में बीमार हालत में मिली थी. इस के बाद रेस्क्यू सेंटर में उपचार करने के बाद उसे जंगल में छोड़ दिया गया था.

अभियान के दौरान एक अन्य शेरनी कमजोर हालत में दिखी. उसे रेस्क्यू कर के उपचार केंद्र पर ले जा कर भरती कराया गया.

वन विभाग की टीमों ने सघन जांच अभियान के दौरान 27 सितंबर तक गिर अभयारण्य और गिर पार्क तथा गिर के बाहरी इलाके सहित 1740 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 460 शेर देखे. इन में से 7 शेरों को सामान्य चोटें लगी थीं. दलखाणिया रेंज के सरसिया वीडी इलाके से घायल मिले 3 शेर, 3 शेरनी और एक शावक सहित कुल 7 शेरों को पकड़ कर निगरानी में रखा गया.

इस बीच 29 सितंबर को गुजरात के वन मंत्री गणपत वसावा ने अमरेली में कहा कि 23 सितंबर से शुरू हुए शेरों की तलाशी और जांच अभियान के तहत अब तक गिर वन तथा आसपास के 3000 वर्ग किलोमीटर इलाके में पड़ताल की जा चुकी है. इस दौरान 500 से ज्यादा शेर देखे गए हैं. इन में 7 शेरों का इलाज किया जा रहा है बाकी शेर स्वस्थ हैं.

दूसरी ओर इसी दिन लायन नेचर फाउंडेशन के अध्यक्ष भीखूभाई बाटावाला ने मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर 14 मृत शेरों की एफएसएल रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की. उन्होंने कहा कि 10 दिनों तक शेरों के शव सड़ते रहे और वन विभाग के कर्मचारी सोते रहे. उन्होंने इस मामले में लापरवाह वनकर्मियों के खिलाफ कड़ी काररवाई की मांग की.

वनमंत्री के हस्तक्षेप से सक्रिय हुआ वन विभाग

वन मंत्री के बयान के 3 दिन बाद यह बात सामने आई कि 12 से 30 सितंबर तक यानी 19 दिनों के दौरान कुल 21 शेरों की मौत हो चुकी थी. वन विभाग ने आधिकारिक रूप से कहा कि 12 से 19 सितंबर तक 11 शेरों की मौत अमरेली जिले की दलखाणिया रेंज के सरसिया इलाके में हुई. इस के बाद 20 से 30 सितंबर तक 10 अन्य शेरों की मौत इलाज के दौरान हुई.

मृत शेरों के विभिन्न नमूने नैशनल इंस्टीट्यूट औफ वायरोलौजी, पुणे भेजे गए. वहां की जांच रिपोर्ट में 4 शेरों में कैनाइन डिस्टेंपर यानी सीडी विषाणु और 6 शेरों में प्रोटोजोआ संबंधी संक्रमण की पुष्टि हुई.

इस के बाद ऐहतियात के तौर पर 31 शेरों को दलखाणिया के सरसिया इलाके से हटा कर जामवाला के पशु चिकित्सा केंद्र में रखा गया ताकि उन्हें अलगअलग आइसोलेशन में रख कर निगरानी की जा सके. इस के लिए बरेली के वेटनरी शोध संस्थान और इटावा के बाघ सफारी व दिल्ली जू के विशेषज्ञों की सेवाएं भी ली गईं.

कैनाइन डिस्टेंपर खतरनाक वायरस है. इस बीमारी से ग्रसित जानवरों का बचना मुश्किल होता है. यह बीमारी मुख्यरूप से कुत्तों में पाई जाती है. कुत्तों के जरिए यह वायरस दूसरे जानवरों में फैल जाता है. पूर्वी अफ्रीका के सेरेंगेटी जंगल के शेरों में 30 फीसदी की मौत का कारण कैनाइन डिस्टेंपर वायरस ही रहा था. सन 1991 में तंजानिया के जंगलों में करीब एक हजार अफ्रीकी शेरों की मौत के लिए भी यही वायरस जिम्मेदार था.

मृत शेरों के आंकड़े लगातार बढ़ने और नए कारण सामने आने से अधिकारियों और सरकार पर सवाल उठने लगे थे. अधिकारियों ने पहले कहा था कि अधिकांश शेरों की मौत बाहरी शेरों के घुसने से हुई वर्चस्व की लड़ाई में हुई. इस पर सवाल उठे कि इतने बड़े जंगल के केवल एक ही हिस्से में रोजाना शेरों की ऐसी कितनी भिडंत हो रही है, जिस में लगातार शेरों की जान जा रही है. दूसरी ओर राज्य सरकार पहले शेरों की मौत को प्राकृतिक कारणों से हुई मौत बताते हुए विषाणु के संक्रमण से इनकार करती रही.

सुप्रीम कोर्ट का दखल

बाद में पुणे से जांच रिपोर्ट मिलने पर सरकार ने शेरों को बचाने के लिए अमेरिका से टीके मंगवाने की कवायद शुरू की. सरकारी कवायद के बीच गिर में 2 और शेरों की मौत हो गई. इस तरह 20 दिन में 23 शेरों की मौत की पुष्टि होने पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया.

सुप्रीम कोर्ट ने 3 अक्तूबर को शेरों की मौत पर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार और गुजरात सरकार को नोटिस जारी कर के कहा कि यह मामला बहुत गंभीर है. सरकार को शेरों की मौत की वजह का पता लगाना चाहिए. जस्टिस मदन बी. लोकुर, एस. अब्दुल नजीर और दीपक गुप्ता की बेंच ने शेरों की मौत के मामले में स्वत: संज्ञान ले कर केंद्र सरकार से पूछा कि कहीं शेरों की मौत किसी वायरस इंफेक्शन से तो नहीं हुई.

सर्वोच्च अदालत में केंद्र सरकार की ओर से मौजूद अतिरिक्त सौलिसिटर जनरल ए.एन.एस. नादकर्णी ने कहा कि गुजरात के शेरों का मामला शीर्ष कोर्ट में पहले से लंबित है. हम शेरों की मौत के कारणों का पता लगाएंगे.

सुप्रीम कोर्ट में मामला उठने पर उसी दिन गुजरात सरकार ने गिर के शेरों को बचाने के लिए 6 घोषणाएं कीं. इन में गिर वन क्षेत्र के शेरों की हर 3 महीने में विशेष निगरानी और जांच करने, वन क्षेत्र में नए शेत्रुंजी डिवीजन समेत नए पशु चिकित्सा केंद्र शुरू करने, देश के शीर्ष पशु चिकित्सा संस्थानों व विदेश के विशेषज्ञों से सलाह लेने, ऐहतियात के तौर पर अन्य क्षेत्रों के शेरों के भी रक्त व लार के नमूने ले कर जांच कराने, अमेरिका से 300 विशेष टीके मंगवाने और आसपास के पशुओं के टीकाकरण करने की घोषणा शामिल थी.

इसी के साथ गुजरात के वन मंत्री ने कहा कि गिर के बाकी शेरों को बचाने के हरसंभव उपाय किए जा रहे हैं. निगरानी में रखे कुछ शेरों की हालत गंभीर है. गुजरात के वन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव राजीव गुप्ता ने कहा कि रौयल वेटनरी सोसायटी औफ लंदन से भी इस मामले में मदद ली जा रही है.

जूनागढ़ के मुख्य वन संरक्षक डी.टी. वसावा ने कहा कि मरने वाले सभी 23 शेर 22 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले गिर वन के केवल 25 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में दलखाणिया रेंज के एक हिस्से सरसिया वीडी के थे. वहां से हटा कर उन्हें जामवाला पशु चिकित्सा केंद्र में रखा गया. इन में 31 शेर ठीक हैं, जबकि जसाधार केंद्र में रखे 5 शेरों का इलाज चल रहा है.

गिर वन क्षेत्र के 23 शेरों की मौत से आहत बजरंग ग्रुप ने 3 अक्तूबर को एक सार्वजनिक नोटिस पर आगामी मंगलवार को धारी बंद का ऐलान किया. बंद के दौरान शेरों की आत्मा की शांति के लिए उपवास रखने की भी घोषणा की गई. धारी तहसील में आने वाली दलखणिया रेंज में ही गिर के सब से ज्यादा शेर हैं. यहां देश भर से वन्यजीव प्रेमी शेर देखने पहुंचते हैं.

फ्लोरिडा से मंगाए गए विशेष टीके

गिर के शेरों को वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए अमेरिका के फ्लोरिडा से मंगवाए गए 300 विशेष टीके 5 अक्तूबर को गुजरात के जूनागढ़ पहुंच गए. ये टीके लगाने की शुरुआत 6 अक्तूबर से की गई. पहले दिन ये टीके जामवाणा और जसाधार एनिमल सेंटर में रेस्क्यू कर के रखे गए 36 शेरों को लगाए गए. वायरस फैलने के डर से दलखाणिया से रेस्क्यू कर 31 शेरों को जामवाणा और 5 शेरों को जसाधार सेंटर पर रखा गया था.

गुजरात के सौराष्ट्र इलाके में 3 जिलों गिर सोमनाथ, अमरेली और जूनागढ़ में करीब 1400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले गिर वन में 2015 में हुई पिछली पंचवर्षीय गणना के अनुसार शेरों की कुल संख्या 523 थी. इन में 109 नर, 201 मादा, 73 किशोर और 140 शावक थे. इस से पहले 2010 में हुई गणना में 411 शेर पाए गए थे. इस से पहले 2005 में 359 शेरों की गिनती की गई थी. शेर की औसत आयु 12 से 15 साल होती है.

हर साल गिर में करीब 210 शावक जन्म लेते हैं. इन में से आमतौर पर 60 से 70 शावक ही बच पाते हैं. बाकी करीब 140 शावक 2 साल से कम उम्र में ही प्राकृतिक और अप्राकृतिक कारणों से मौत के आगोश में समा जाते हैं.

एशियाई शेर एक टेरिटोरियल प्राणी है. एक नर शेर के इलाके में एक से 3 मादा रहती हैं. एक बार में शेरनी एक से 4 शावकों को जन्म देती है. एशियाई शेरनी की गर्भावस्था 110 दिन की होती है. सामान्य परिस्थितियों में शेरनी 20 से 24 महीने के अंतराल पर फिर से गर्भधारण करती है.

गुजरात सरकार ने इसी साल 5 मार्च को राज्य विधानसभा में बताया था कि 31 दिसंबर, 2017 की स्थिति के अनुसार गत 2 सालों में 182 एशियाई शेरों की मौत हुई.

शेरों की मौत के ये आंकड़े सामने आने पर मार्च में ही गुजरात हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया. हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा था कि शेरों की अप्राकृतिक मौत का मामला काफी गंभीर और संवेदनशील है. सरकार को इसे हलके में नहीं लेना चाहिए. यह मामला अभी विचाराधीन है.

पिछले 5 साल में गुजरात में 414 शेरों की मौत हुई. इन में 260 शेर और 154 शावक शामिल थे. इन में 70 शेरों की मौत अप्राकृतिक तरीके से हुई. सब से ज्यादा 100 शेरों की मौत 2016-17 में हुई. वहीं, गिर अभयारण्य में गत 5 सालों में 207 शेरों की मौत हुई.

बहरहाल, गिर अभयारण्य में 23 शेरों की रहस्यमयी मौत ने वन विभाग पर सवालिया निशान लगा दिए हैं. वहीं वन्यजीव प्रेमियों की भी चिंता बढ़ा गई है. इस से यह आशंका हो गई है कि अमेरिका से मंगाए टीके के बावजूद अगर शेरों में वायरस संक्रमण पर काबू नहीं पाया जा सका तो शेरों का सफाया हो जाएगा और गिर उजड़ जाएगा.

इन सब सवालों के बीच एक कड़वा सच यह भी है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने गुजरात सरकार को एशियाई शेरों के दीर्घकालीन संरक्षण योजना के तहत 3 साल में कोई रकम आवंटित नहीं की. भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने अपने कार्यकाल के पहले साल में ही केवल 12 करोड़ रुपए इस काम के लिए आवंटित किए थे, उस के बाद कुछ नहीं.

यह बात जानना भी जरूरी है कि गिर के शेरों को गुजरात से मध्य प्रदेश के कूनो पालपुर में स्थानांतरित करने की मांग काफी समय से उठ रही है. इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2013 में एक आदेश भी पारित किया था.

लेकिन नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल से ही गुजरात सरकार इन शेरों को राज्य से बाहर नहीं भेजने पर अड़ी है. बावजूद इस के कि गिर के शेरों की तादाद लगातार घटती जा रही है. सन 2015 की अंतिम गिनती में गिर में गिने गए 523 में से 3 साल बाद अब करीब 275 शेर ही बचे हैं.

शेरों की मौत का यह सिलसिला कहां खत्म होेगा कहा नहीं जा सकता. क्योंकि 15 अक्तूबर, 2018 को गिर अभयारण्य के जूनागढ़ जिले के कालावाड़ गांव के एक खेत में 3 साल के एक नर शेर मारा गया, जबकि इस से एक दिन पहले ही 14 अक्तूबर को देवता गांव में 30 फुट गहरे कुएं में गिरे शेर को बचा लिया गया था.

गर्लफ्रैंड

अंबर को एक लड़की भायी,

जब वह दी उसे दिखाई

सोचा इस पर अपना इंप्रैशन जमाएं,

इसे अपनी गर्लफ्रैंड बनाएं.

जब उसे प्रपोज करने गया,

हिम्मत ने दिया जवाब, दिल घबराया.

उस के निकट तो आया,

पर उस से कुछ कह न पाया.

जब उस को अपनी बात नहीं बताएंगे,

तब कैसे उसे अपना बनाएंगे.

तब अंबर ने लिखा एक लैटर,

जिस में है दिल का मैटर.

लैटर में लिखा, ‘तुम मुझे अच्छी लगी,’

क्या तुम मेरी फ्रैंड बनोगी.

मेरा नाम है अंबर,

9813133333 है मोबाइल नंबर.

हमारी फ्रैंडशिप आगे बढ़ सकेगी जब

अपना मोबाइल नंबर एसएमएस करेंगी,

वह ऐसी जगह पर आई जहां था कोई नहीं,

उस ने उसे लैटर दिया, एकांत में लैटर देना है सही.

लड़की ने मोबाइल नंबर एसएमएस किया,

उस में अपना नाम भी लिख दिया.

कई रोज तक उन की हुई बात,

फिर होने को आई मुलाकात.

वे अकसर मिलने लगे,

डेटिंग पर जाने लगे.

रैस्टोरैंट गए व गए सिनेमाहौल,

आनंदमय हो गया उन के जीवन का हाल.

रोमांस व इश्क में जिए,

जिस्म के संबंध भी बनाए.

ऐसे वादे किए कि एकदूसरे का साथ देंगे,

हमेशा मित्रता में ही जिएंगे.

अब उन्हें ऐसा लगा रह न सकेंगे एकदूजे के बिन,

मैरिज की अब एक हो गया उन का जीवन.

-त्रिपुरारी मौर्य

सब जनता को ही लूटने में लगे हैं

आधुनिक इंटरनैट बेस्ड टैक्नोलौजी का गुणगान करने वालों को तब एक बड़ा झटका लगा जब कई शहरों में उबर व ओला की टैक्सियों की हड़ताल हो गई. दोनों कंपनियां इंटरनैट पर आधारित आप के फोन में डाउनलोड किए ऐप्स के सहारे एक पैरेलल पब्लिक ट्रांसपोर्ट मुहैया करा रही हैं और भारत ही नहीं कई और देशों में भी बेहद पौपुलर हैं. उन्होंने टैक्सी बिजनैस का स्वरूप ही बदल दिया, पर अब यही सेवा ग्राहकों के लिए जानलेवा बन रही है.

इस सेवा को देने वाली कंपनियों ने शुरू में ग्राहकों को भी खूब सस्ती सेवा दी और ड्राइवरों को भी भरपूर पैसा दिया. ड्राइवर 80 हजार रुपए मासिक तक कमाने लगे थे पर जैसेजैसे कंपनियों का नुकसान बढ़ने लगा, पैट्रोलडीजल के दाम बढ़े, ग्राहकों की निर्भरता बढ़ी, हरेक की जेब पर डाका डलने लगा. रात और भीड़ के समय ओला और उबर का सौफ्टवेयर अपनेआप फेयर बढ़ाने लगा. ड्राइवरों का कमीशन कम होने लगा. ज्यादा गाडि़यों की वजह से कंपीटिशन बढ़ने लगा.

नतीजा यह हुआ कि यह सेवा सरकारी सेवाओं की तरह होने लगी है. ड्राइवरों ने हड़ताल कर दी क्योंकि वे ज्यादा मुनाफा चाहते हैं, पर कंपनियां जो पहले ही बहुत मोटे नुकसान में चल रही हैं और छूट नहीं देना चाहतीं.

ग्राहकों को और ज्यादा निचोड़ना मुश्किल होने लगा है. लोग एअरकंडीशंड गाडि़यों के स्थान पर ठूसठूस कर भरी गई बसों और छोटी अनियमित टैक्सियों में चलने लगे चाहे रास्तेभर पसीने से तरबतर होना पड़े. जो फैशनेबल थे गाज उन पर भी गिरी क्योंकि वे यदि अतिरिक्त पैसे देने को राजी हों तो भी टैक्सी ऐप से बुलाने पर आती ही नहीं.

यह इंटरनैट निर्भरता का नतीजा है. लोग बहुत सी चीजें गारंटिड लेने लगे हैं. अब तक इंटरनैट का फार्मूला रहा है कि पहले सस्ती सेवा दो और लोग जब आदी हो जाएं तो दाम बढ़ा दो. अब वे मनमाने दाम लेने लगे हैं. टीवी पर टाटा स्काई भी ऐसा ही कर रहा है. क्रैडिट कार्ड कंपनियां भी यही कर रही हैं. एअरलाइनों ने टै्रवल एजेंटों को लगभग बंद करा दिया पर इंटरनैट सेवा के लिए मोटे पैसे वसूलने लगीं.

इन कंपनियों को दोष न दें क्योंकि यह कराधरा सरकार का है जो हर जने को तारों से जोड़ कर बांध रही है और हरेक को कंप्यूटर का गुलाम बना रही है जबकि इंटरनैट की मालिक कौन सी कंपनी है, आसानी से पता नहीं चलता. कंप्यूटर चोरों जिन्हें हैकर कहते हैं अब घर बैठे करोड़ों रुपए कमाने लगे हैं.

ओला और उबर ड्राइवर व उन की कंपनियां इन्हीं चोरों में शामिल हैं. भारत सरकार भी उन की साझीदार है. सब बेचारी जनता को लूटने में लगे हैं. पहले पंडेपादरीमुल्ला जो नियंत्रण रखते थे अब इंटरनैट रखने लगा है.

‘वैजिटेबल सूप’ बनाने का ये है सबसे बेहतरीन तरीका

सामग्री स्टौक की

– 50 ग्राम प्याज बारीक कटा

– 50 ग्राम गाजर बारीक कटी

– 50 ग्राम हरा प्याज बारीक कटा

– 50 ग्राम कालीमिर्च

– 1 तेजपत्ता

– 500 एमएल वैजिटेबल स्टौक.

सामग्री सूप की

– 20 ग्राम गाजर

– 20 ग्राम हरी बींस

– 20 ग्राम ग्रीन जुकीनी

– 20 ग्राम यलो जुकीनी

– 20 ग्राम मशरूम

– थोड़ी सा कालीमिर्च पाउडर

– नमक स्वादानुसार.

विधि

– वैजिटेबल स्टौक के साथ प्याज, गाजर, हरा प्याज, कालीमिर्च व तेजपत्ता डाल 20 मिनट तक उबालें.

– फिर बची सब्जियों को बारीक काट कर एक तरफ रख दें.

– अब स्टौक को छलनी से छान कर दोबारा आंच पर रख कर आधा होने दें.

– फिर इस में बची सब्जियां व नमक मिला कर कुछ मिनट और पकाएं.

– कालीमिर्च का पाउडर डाल कर गरमगरम सर्व करें.                         –

किसान का सवाल अर्थतंत्र ही नहीं हमारी नैतिकता पर भी बड़ा प्रश्नचिन्ह है

29 और 30 नवंबर को देशभर के किसान दिल्ली में जमा हो कर संसद तक मार्च करेंगे और कृषि संकट के सवाल पर तीन सप्ताह का विशेष संयुक्त संसदीय सत्र बुलाने की मांग करेंगे. किसान मुक्ति मार्च नाम के जुलूस का आयोजन अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति कर रही है. जून 2018 में गठित यह समिति 130 किसान संगठनों का फोरम है. इस दो दिवसीय आयोजन में एक लाख से अधिक किसानों के अलावा मिडिल क्लास की भागीदारी की आशा है.

दशकों से भारतीय किसान कर्ज, सूखा और अत्महत्या की मार झेल रहा है. 2004 में सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया था. 2004 और 2006 के बीच आयोग ने छह रिपोर्ट जमा की लेकिन किसी को भी लागू नहीं किया गया.

हाल के वर्षों में किसाने ने एक होकर विरोध जताना आरंभ किया है. इस साल मार्च के महीने में किसानों ने नासिक से मुंबई तक की 182 किलोमीटर की पैदल यात्रा की. इसी को आगे ले जाते हुए किसान मुक्ति मार्च का लक्ष्य भारतीय किसानों की चिंताओं से नीति निर्माताओं को अवगत कराना है.

किसान मार्च के पहले दी कारवां की रिपोर्टिंग ​फेलो आतिरा कोणिकर ने पीपुल्स आर्काइव फॉर रूरल इंडिया के संस्थापक संपादक पी. साईनाथ से बात की और किसानों के इस नए तेवर और उसे प्राप्त हो रहे मिडिल क्लास के समर्थन के बारे में जानना चाहा.

आतिरा कोणिकर: क्या आप को लगता है कि महाराष्ट्र में हुए बड़े किसान मार्च (जुलूस) ने किसानों को संसद मार्च को प्रेरणा दी?

साईनाथ: महाराष्ट्र के किसान लांग मार्च ने बहुत लोगों को प्ररित किया. मुंबई के जुलूस के कुछ दिनों बाद अप्रैल में मैं पंजाब गया. मुक्तसर, बठिंडा, संगरूर जैसे छोटे गांवों में किसान मुझ से पूछते थे, “हमे नासिक-मुंबई यात्रा के बारे में बताएं.” सभी ने इसके बारे में सुन रखा था, इससे प्रेरित थे.

और जो बात कि नासिक-मुंबई यात्रा के बारे में सबसे अधिक प्ररित करने वाली थी वह यह कि 36 साल मुंबई से बाहर रहने के बाद पहली बार मैंने देखा कि मिडिल क्लास बड़ी संख्या में, हजारों की तादाद में, मार्च में शामिल हुआ.

जे. जे. अस्पताल के डॉक्टर 182 किलोमीटर की यात्रा करने वाले किसानों के पैरों में मरहम-पट्टी करने आए. क्रॉफर्ड बाजार के व्यापारियों ने चुपचाप 1000 जूते वहां ला कर रख दिया क्योंकि उन लोगों ने मार्च में शामिल औरतों की फोटों देखी थीं जो खून से सने पैर लेकर लंबी दूरी की पैदल यात्रा कर रही थीं.

वकील लोग आकर किसानों से पूछते थे कि क्या वो उनके पक्ष में कोई जनहित याचिका डाल सकते हैं. वो लोग कानूनी शर्क नहीं थे. नौजवान वकील थे जो किसानों के लिए कुछ करना चाहते थे. मुझे लगता है कि यह टर्निंग पोइंट था, जब मिडिल क्लास सह नागरिकों के साथ जुड़ रहा था और पहली बार किसानों और मजदूरों के साथ संबंध कायम कर रहा था.

दिल्ली के मार्च का आयोजन अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति कर रही है. यह किसान समूहों और संगठनों का मंच है. जो मैंने मुंबई में देखा उसने मेरे दिल को छू लिया, खासकर युवा विद्यार्थियों, मिडिल क्लास चिंतित था और वो लोग अपने हमवतनों के प्रति गंभीर चिंता रखते थे. मैंने एक लेख लिखा था जिसमें मैंने कहा कि हम लोगों को कुछ ऐसा ही दिल्ली में करना चाहिए जो देश का शक्तिकेन्द्र है. बहुत से किसान संगठनों ने इस बारे में सहमति जताई.

जब व्यापारी क्लास की बात होती है तो एक हफ्ते के अंदर जीएसटी पास करने के लिए संसद का संयुक्त सत्र बुला सकते हैं. 14 साल में स्वामीनाथन रिपोर्ट रखी हुई है और आपके पास एक घंटा नहीं है उस पर बात करने के लिए.

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आतिरा: किसान समुदाय के प्रति राजनीतिक दलों की इस उदासीनता का क्या कारण है?

साईनाथ: मुझे लगता है कि सभी राजनीतिक दलों को कोसना गलत होगा. नासिक मुंबई यात्रा ऑल इंडिया किसान सभा ने कराई थी जो खुद को राजनीतिक संगठन मानता है. राजनीतिक वर्ग का बड़ा हिस्सा किसानों से बेपरवाह है. वह शत्रुतापूर्ण रुख अख्तियार किए हुए है. चुनावों से पहले कैसे कैसे झूठे वादे किए जाते हैं.

न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करने का वादा करने से बीजेपी को वोट मिला था. 2014 में उन लोगों ने इसका वादा किया था. 2015 में जब सत्ता में आए एक साल भी नहीं हुआ था उन लोगों ने अदालत में शपथपत्र जमा किए और आरटीआई का जवाब दिया कि इसे लागू नहीं किया जा सकता. उपज में समर्थन मूल्य सी2 प्लस 50 प्रतिशत नहीं किया जा सकता, यह मुमकिन नहीं है. (आयोग ने सिफारिश की थी कि उपज की विस्तृत लागत से 50 प्रतिशत अधिक किसान को दिया जाए जिसे सी2 कहा जाता है.) आरटीआई के जबाब में उन लोगों ने लिखा कि इससे बाजार बिगड़ जाएगा. यह बात कि इससे करोड़ों लोगों की हालत खराब हो रही है उनके लिए कोई मामला नहीं था.

2016 में कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने घोषणा की कि उन लोगों ने ऐसा कोई वचन नहीं दिया था. 2017 में कहने लगे कि वे लोग स्वीमीनाथन रिपोर्ट से बहुत आगे चले गए हैं और मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मॉडल का उदाहरण देने लगे. दो बड़े अर्थशास्त्रियों को लाकर मध्य प्रदेश के मॉडल को सही ठहराने लगे.

2018 में वित्त मंत्री जेटली ने अपने बजट भाषण में कहा, “हां हमने वादा किया था और इसे लागू भी किया है.” 2018 में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी कहते हैं, “हमने सभी तरह के वादे किए. हमको उम्मीद नहीं था कि हम चुनाव जीतेंगे.”

2014, 15, 16, 17 और 18 में बीजेपी सरकार ने अलग अलग स्टैंड लिया. वे कहते हैं कि इसे लागू कर दिया गया है जो कि सरासर गलत बात है क्योंकि एमएसपी उपज मूल्य की गणना अलग अलग तरीकों से की जा सकती है. वे लोग इस प्रकार से इसकी गणना कर रहे हैं जो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के आधार पर की जाने वाली वास्तविक गणना से 40 प्रतिशत कम है.

हम लोग बैठे रहे, देखते रहे और राष्‍ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार 1995 और 2016 के बीच 310000 किसानों ने आत्महत्या कर ली. यह आंकड़ा बहुत कम कर दिखाया गया है तो भी भयावह है. हालात इतने खराब हैं कि पिछले दो साल से मोदी सरकार ने एनसीआरबी के आंकड़ों को प्रकाशित ही नहीं किया. वो लोग संसद में प्रोविजनल (अस्थायी) डेटा जैसे छिटपुट आंकड़े पेश करते हैं. प्रोविजनल और अंतिम डेटा में बेहद अंतर हो सकता है, है कि नहीं? उन लोगों ने एनसीआरबी का किसान आत्महत्या संबंधी डेटा दो साल से जारी नहीं किया ताकि सरकार का राजस्व विभाग हर प्रकार का फर्जी डेटा दिखा सके. कैसे इस अवधि में हम खामोश बैठे रहे, ये सिर्फ अर्थतंत्र का बड़ा सवाल नहीं है बल्कि नैतिक मूल्यों का भी सवाल है.

आप उदासीनता की बात पूछ रहीं हैं. हम सब की उदासीनता की बात भी कीजिए. मोदी सरकार की नहीं पूर्व सरकारों की उदासीनता की भी बात कीजिए. मीडिया जिसे महान सुधार कह कर पेश करता है उसने वास्तव में यह किया है कि कृषक समुदाय से कृषि को छीन कर कॉर्पोरेट घराने के हवाले कर दिया है. कृषकों का मूल्य पर नियत्रण नहीं है, वे ना तो उपज का मूल्य तय कर सकता है और नहीं ही बाजार मूल्य का क्योंकि वह निर्धारित मूल्य नियामक के अंतर्गत काम करता है.

इस उदासीनता का कारण वह विचार है जो मानता है कि कृषि में जरूरत से ज्यादा लोग लगे हुए हैं और उन्हें यहां से बाहर कर देना चाहिए, जो सोचता है कि हमे अमेरिका की तरह होना चाहिए जहां मात्र दो प्रतिशत लोग खेती किसानी में लगे हैं. और कॉर्पोरेट किसानी हमारी सभी जरूरतें पूरी कर देगी. जब आप 40-50 प्रतिशत आबादी को कृषि से बाहर कर देना चाहते हैं तो उनको लेकर कहां जाएंगे?

क्या पिछले 20 सालों में आप ने एक भी रोजगार का निमार्ण किया? यहां बेरोजगारी का संकट गंभीर है. चाहे वह कितना ही दयनीय हो लेकिन जीविका से लोगों को वंचित कर रहे है और उन्हें रोजगार की तलाश में गांवों, शहरों और नगरों में भेज रहे हैं जबकि वहां रोजगार हैं ही नहीं.

आतिरा: दो दिन के इस मार्च की क्या योजनाएं हैं?

साईनाथ: 29 नवंबर की सुबह किसान जन पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण- चार दिशाओं- से शहर में दाखिल होंगे. वे लोग रामलीला मैदान तक की 12 से 24 किलोमीटर तक की पैदल यात्रा करेंगे. 29 की शाम बहुत से नाटक समूह किसानों के लिए और उनके बारे में सांस्कृतिक प्रस्तुति देंगे. 30 की सुबह वे लोग संसद की ओर कूच करेंगे. मुझे लगता है कि मार्च को संसद मार्ग या अन्य जगह रोका जाएगा. एआईकेएससीसी ने दोपहर में राजनीतिक दलों के नेताओं को अपना समर्थन देने के लिए निमंत्रण दिया है. आप ने वह पिटीशन देखी www.dillichalo.in जिसमें विशेष सत्र की मांग की गई है? हम सभी सांसदों और मंत्रियों को इस पर हस्ताक्षर करने को कहेंगे. सभी कहते हैं कि वे किसानों के शुभचिंतक हैं. तो चलिए उनको भी पिटीशन पर हस्ताक्षर करने देते हैं.

2018 की अगस्त में दिल्ली की एक बैठक में एक बहुत ही खुले किस्म का मंच बना जिसका नाम है नेशन फॉर फार्मर्स. दिलचस्प बात है कि शहर दर शहर, नगर दर नगर इसकी शाखाएं बन गईं. ये सभी किसान समूह नहीं हैं. तमिलनाडू, कर्नाटक और आंध्रा में टेकी फॉर फार्मर्स है. तीन-चार अलग अलग राज्यों में डॉक्टर फॉर फार्मर्स है. जो लोग दिल्ली आ पाएंगे वो लोग नेशन फॉर फार्मर्स के बैनर तले मार्च करेंगे. जब शिक्षक, छात्र, वकील, विज्ञानिक सभी किसान और मजदूरों के साथ खड़े होते हैं तो यह नेशन फॉर फार्मर्स कहलाता है, है कि नहीं? हम लोग मार्च के आयोजक नहीं है बल्कि उसके समर्थक समूह हैं.

महाराष्ट्र के डोम्बिवली के ऑटोरिक्शा चालकों ने अपने यूनियन के माध्यम से घोषणा की है कि वे लोग किसानों के ऑटोरिक्शा वाले हैं. 25 नवंबर को अपने ऑटो में बैठने वाले प्रत्येक ग्राहक को विशेष सत्र की मांग वाली पिटीशन पर साइन करने को कहेंगे. आल इंडिया बैंक एम्प्लायज एसोसिएशन ने अपनी सभी ग्रमीण शाखाओं में पिटीशन भेजी है, न सिर्फ यूनियन सदस्यों को हस्ताक्षर करने के लिए बल्कि शाखा में आने वाले सभी किसानों को हस्ताक्षर कराने के लिए. इनमें से बहुत को मैं जानता हूं और बहुतों को नहीं भी जानता हूं. इसका मतलब है कि कुछ बहुत गलत हो रहा है और हम लोगों को किसानों के साथ खड़ा होना होगा.

आतिरा: यदि विशेष सत्र होता है तो किन मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए?

साईनाथ: मैंने जून में लिखा था कि हम लोगों को 3 सप्ताह के विशेष सत्र की आवश्यकता है ताकि कृषि संकट और संबंधित विषयों पर चर्चा कर सकें. इन वर्षों में स्वामीनाथन रिपोर्ट पर कभी चर्चा नहीं हुई. तो उस पर तीन-चार दिन चर्चा कीजिए. सबसे पहले हमें एआईकेएससी द्वारा तैयार दो बिलों के मसौदे को पारित करना है. एक एमएसपी पर और दूसरा कर्ज (कर्ज में मुक्ति) पर है. ये बिल पहले ही तैयार कर लिए गए हैं और 21 राजनीतिक पार्टियों ने संसद में इसे समर्थन देने का वादा किया है.

तीन दिन भीषण जल संकट पर चर्चा कीजिए जो सूखे की स्थिति से कहीं बड़ा है. तीन दिन आप इस बात पर चर्चा कीजिए कि अगले 20 सालों के लिए आप को कैसी कृषि व्यवस्था चाहिए. कॉर्पोरेट या सामुदायिक, रसायनिक या एग्रो-इकोलॉलिकल? और तीन दिन वायनाड (केरल), महबूबनगर (तेलंगाना), विदर्भ (महाराष्ट्र) से लेकर छत्तीसगढ़ के कृषि संकट के पीड़ित किसानों को संसद के केन्द्रीय सभागार में खड़े होकर आपबीती सुनाने दीजिए. मुझे लगता है कि ये एक मात्र वो समय है जब देश सच में जानना चाहता है. और इस बार देश सच में कुछ जानेगा.

आतिरा: इन दो बिलों पर चर्चा के अलावा आप को लगता है कि वैधानिक स्तर पर कोई काम होगा?

साईनाथ: जल पर बिल आना ही चाहिए. आपको कहना होगा कि पानी का निजीकरण नहीं किया जा सकता जैसा हम लोग कर रहे हैं. और पानी पर जाति, वर्ग और लैंगिक विभेद को संबोधित कीजिए. और आपके पास कर्ज मामले पर रूपरेखा होनी चाहिए. उदाहरण के लिए कृषि पर सार्वजनिक निवेश को बढ़ाना होगा. यह दो दशकों से कम हो रहा है.

सबसे जरूरी बात है कि जब आप विशेष सत्र बुलाएंगे तो ये भी बताएंगे कि आप किसानों की चिंता करते हैं. और आप पूरे राष्ट्र का ध्यान उस संकट की ओर करेंगे जिसने ग्रमीण क्षेत्रों को बर्बाद कर दिया है. हमें नहीं लगता कि दो विधेयक या कोई एक नारा या दिल्ली की एक बैठक को सफलता है या कोई उपलब्धि कहा जाना चाहिए. दिल्ली का मार्च एक ऐतिहासिक शुरूआत है ना कि समापन है. क्योंकि जिस प्रकार से ये समूह उभरे हैं इसका मतलब होगा कि किसान और मजदूर मिडिल क्लास की चर्चा का हिस्सा होंगे. ‘किसानों के लिए नागरिक’ की स्थानीय शाखाएं होनी चाहिए.

आतिरा: आप ने बताया था कि 2011 में महिला किसान पर एक प्रायवेट बिल संसद में लाया गया था.

साईनाथ: वह बिल था महिला किसान अधिकार और हकदारी विधेयक जिसे स्वयं प्रोफेसर स्वामीनाथन ने प्राइवेट मेंबर बिल के रूप में संसद में रखा था. इसे किसी ने नहीं छुआ. यह खत्म हो गया. हम लोग औरतों को किसान नहीं मानते. वह किसान की बीवी है, है ना?

महिला किसानों को जायदाद में अधिकार नहीं दिया जाता. उन्हें जमीन के स्वामित्व का अधिकार नहीं दिया जाता. देश की मात्र 8 प्रतिशत महिला के नाम पर जमीन है. यदि आप महिला किसानों की संपत्ति के अधिकार और हकदारी को नहीं मानते तो आप कृषि संकट का समाधान नहीं कर सकते. आप इस हिस्से की अनदेखी कर संकट के समाधान की आशा नहीं कर सकते.

इसी प्रकार दलित और आदिवासी किसानों के अधिकार को भी सुनिश्चित करना होगा. जमीन देने के बावजूद भी दलित किसानों को पट्टा नहीं दिया जाता और आदिवासी किसान को पता ही नहीं कि ये पट्टा क्या बला है. ये लोग यहां 1000 साल से रह रहे है जब राज्य का अस्तित्व भी नहीं था. तो उनके सभी अधिकारों को कानूनी बनाना होगा, औपचारिक करना होगा और अपरिवर्तनीय बनाना होगा.

आतिरा: क्या पहले के मुकाबले विरोध का स्वरूप उग्र हुआ है?

साईनाथ: जी हां. दो सालों से किसान बहुत कड़ा विरोध दर्ज करा रहे हैं. मेरे लिए तो यह बहुत ही अच्छी बात है क्योंकि यह आशा का संकेत है. यह जबरदस्त किस्म की निराशा से बाहर आने का संकेत है. वह लोग निराशा से निकल कर सक्रिय विरोध और अधिकारों की मांग की दिशा में आगे आएं हैं. तो 29 और 30 नवंबर के मार्च को अलग रख कर मत देखिए.

इस साल दिल्ली में तीन बड़े मार्च हुए हैं. लेकिन इस बार मिडिल क्लास भी आएगा. सवाल है कि क्या चल रहा है, हो क्या रहा है. मैं मिडिल क्लास से पूछता हूं कि आखिरी बार कब उन लोगों ने किसान या मजदूर से बात की थी? आप ने कब उनके विचार जानने चाहे थे? उनकी कही बातें आपको हैरान कर देगी.

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