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मैं 26 वर्षीय युवती हूं. स्कूल में मैं ने सैक्स का भरपूर आनंद उठाया. शुरू में 4-5 बार गर्भ ठहरा तो गर्भपात करा लिया. कहीं मुझ में कोई कमी तो नहीं आ गई है.

सवाल
मैं 26 वर्षीय युवती हूं. शुरू से ही काफी खुले विचारों की रही हूं, इसलिए जो भी मुझे अच्छा लगता है करती हूं. उस का क्या परिणाम होगा बगैर इस की चिंता किए. यही कारण है कि मैं जब स्कूल में पढ़ती थी तभी मैं ने लड़कों से न केवल दोस्ती की वरन सैक्स का भी भरपूर आनंद उठाया. शुरू में 4-5 बार गर्भ ठहरा तो गर्भपात करा लिया. मगर उस के बाद बिना कोई सावधानी बरते मैं ने अपने एक बौयफ्रैंड के साथ बरसों तक शारीरिक संबंध बनाए. पर फिर गर्भ न ठहरा.

अब शादी की उम्र होने पर मैं ने शादी करने का मन बनाया है. मेरा मंगेतर भी मेरा बौयफ्रैंड रहा है. मैं शादी अपनी मरजी से कर रही हूं. पर समस्या यह है कि कई सालों तक मैं ने अनगिनत बार सहवास किया बिना कोई एहतियात बरते, बावजूद इस के मुझे कभी गर्भ नहीं ठहरा.

मैं जानना चाहती हूं कि शुरू में 4-5 बार दवाओं से गर्भपात कराने की वजह से कहीं मुझ में कोई शारीरिक खराबी तो नहीं आ गई है, जिस वजह से मैं कंसीव नहीं कर पा रही? बताएं क्या वजह है? क्या मैं भविष्य में कभी मां नहीं बन पाऊंगी? यदि ऐसा है तब तो मेरा शादी करना ही बेमानी होगा.

मैं ने अपने मंगेतर को भी इस बाबत कुछ नहीं बताया. आजकल तो वह जब भी सहवान की इच्छा व्यक्त करता है मैं खीज उठती हूं. मेरे बदले रवैए से वह भी हैरान है. बताएं क्या करूं?

जवाब
छोटी उम्र में ही लड़कों के साथ शारीरिक संबंध बनाने और वह भी 2-4 बार नहीं वरन वर्षों तक और गर्भवती हो जाने पर चोरीछिपे अनापशनाप दवाओं से गर्भपात का फैसला लेना जोखिम भरा हो सकता था, आप किसी यौन रोग की शिकार हो सकती थीं.

आप ने जो आचरण किया उस के जो भी दुष्परिणाम होंगे आप भविष्य में मां बन सकेंगी या नहीं ये सब सोचना इस समय जब विवाह को चंद महीने बचे हैं, बेमानी होगा. अब तो इन सब चिंताओं को दरकिनार कर आप शादी की तैयारी करें.

शादी के बाद यदि गर्भधारण करने में समस्या आती है, तो डाक्टरी जांच और उपचार यदि आवश्यक हुआ तो ले सकती हैं. वैसे भी मातृत्व प्राप्त करने की नित नई तकनीक विकसित हो रही हैं. इसलिए पहले आप अच्छी पत्नी बनने की तैयारी करें. मां बनेंगी या नहीं इस सोच को फिलहाल दरकिनार कर दें, क्योंकि ये सब सोचने का यह सही वक्त नहीं है.

और हां, यह नैतिक बोझ ले कर विवाह न करें कि आप ने जो किया वह गलत ही था. सामाजिक मान्यता चाहे उसे न हो पर यह अपवाद हानिकारक है. चरित्र से उस का लेनादेना नहीं है. विवाह बाद आप पति की साथी रहें, सुखी जीवन हो यह कोशिश करें.

मुझे काम के सिलसिले में ज्यादातर धूप में रहना पड़ता है, जिस से मुझे पिगमैंटेशन की समस्या का सामना करना पड़ रहा है. मैं इसे कैसे रोक सकती हूं.

सवाल
मैं कामकाजी महिला हूं और मुझे काम के सिलसिले में ज्यादातर धूप में रहना पड़ता है, जिस से मुझे पिगमैंटेशन की समस्या का सामना करना पड़ रहा है. कृपया बताएं मैं पिगमैंटेशन की रोकथाम कैसे कर सकती हूं?

जवाब
स्किन पिगमैंटेशन के कारणों में सन डेमेज, हारमोनल डिसऔर्डर से ले कर आनुवंशिक कारण तक को शामिल किया जा सकता है. ज्यादातर मामलों में सन ऐक्सपोजर त्वचा पिगमैंटेशन की वजह बनता है. इसलिए इस की रोकथाम के लिए रोजाना 15 या इस से अधिक एसपीएफ सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें. आप पीक टाइमिंग के दौरान सन ऐक्सपोजर से बचें. अपने चेहरे और हाथों पर 30 से 40 एसपीएफ वाली सनस्क्रीन लगा कर धूप में निकलें और इसे बाहर निकलने से आधा घंटा पहले लगाएं.

अगर आप की त्वचा रैडिएशन के प्रति ज्यादा सैंसिटिव है तो आप के लिए घर के अंदर भी सनस्क्रीन लगाना उतना ही जरूरी है, जितना कि बाहर जाने से पहले. घर में मौजूद आर्टिफिशियल लाइट भी त्वचा पर असर डालती है, क्योंकि इस में भी कुछ मात्रा में रैडिएशन होता है. आमतौर पर घर में रहने पर एसपीएफ 15 तक का सनस्क्रीन लगाना बेहतर रहता है.

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दमकती त्वचा चाहिए तो जानिए खुद की स्कि‍न टाइप

आपकी त्वचा/स्‍किन किस प्रकार की है अगर आपको इस बात का पता चल जाए तो आप उसकी बेहतर तरीके से देखभाल कर सकेंगी. कई बार ऐसा होता है कि हम स्‍टोर में जाते हैं और देखते हैं कि वहां पर कई प्रकार की क्रीम और लोशन रखे हैं, लेकिन हम उनको देखकर कंफ्यूज हो जाते हैं कि इनमें से कौन सा प्रोडक्‍ट खरीदें जो हमारी त्‍वचा को सूट करे. इसी उलझन को दूर करने के लिये आपकी खुद की त्‍वचा किस प्रकार की है, इसको जानना बहुत जरुरी है. आज हम आपको आपकी स्‍किन टाइप से परिचिति करवाएंगे.

ड्राय : अगर आपकी त्‍वचा बहुत तनी हुई या फैली हुई रहती है तो इसका मतलब आपकी त्‍वचा ड्राय है. इसको पहचानने के लिये, अपनी त्‍वचा पर पूरे दिन किसी भी मौस्‍चराइजर या लोशन का प्रयोग न करें. फिर अगर आपकी त्‍वचा कसी हुई और रुखी लगेगी तो समझ जाइये कि आपकी स्‍किन ड्राय है.

औयली : अगर मुंह धोने के आधे घंटे बाद आपकी त्‍वचा तेलीय हो जाती है, तो इसका मतलब आपकी त्‍वचा औयली है. इसके अलावा अगर आप कोई टिशू पेपर लेकर अपनी त्‍वचा पर प्रेस करेंगी तो उस टिशू पेपर में तेल लग जाएगा, जिससे आप समझ जाइयेगा कि आपकी त्‍वचा औयली है.

संवेदनशील : सेन्‍सिटिव स्‍किन लालिमां लिये हुए होती है. शरीर में हाई हिस्‍टामाइन होने की वजह से स्‍किन सेन्सिटिव हो जाती है और सिरोसिस, रोसेसिआ और एक्‍जिमा होने के बहुत सारे चांस होते हैं.

झुर्रियां : बढ़ती उम्र और पर्यावरणीय कारकों की वजह से त्‍वचा पर झुर्रियां पड़ने लगती हैं. सूरज की धूप और तनाव का लेवल बढ़ना भी एक कारण होता है. त्वचा पर हल्‍की रेखाएं दिखना पिगमेंटेशन और त्‍वचा का ग्रे हो जाना बताता है कि आप की त्‍वचा पर एजिंग का असर पडने लगा है.

एक्‍ने प्रोन : लार्ज पोर साइज और रिएक्‍टिव स्‍किन होने की वजह से एक्‍ने, पिंपल होने की बहुत संभावना हो जाती है. इस बात का पता कि एक्‍ने बैक्‍टीरियल, हार्मोनल या वंशानुगत है, केवल उसकी जांच से ही पता लगाया जा सकता है. वैसे तो त्‍वचा की साफ-सफाई से इसे कंट्रोल किया जा सकता है लेकिन अगर या बड़ी समस्‍या में से एक है तो डर्मटालजिस्ट के पास ही जाना सही रहेगा.

 

कुछ इस तरह काम करेगा 5G, जानिए भारत में कब होगा शुरू

फोन और कंप्यूटर में 3जी, 4जी चलाने वाले यूजर अब 5जी के इंतजार में हैं. जानते हैं 5जी आखिर क्या है और ये आपकी जिंदगी कैसे बदल देगा. मोटामोटी कहें तो 5जी के बाद आपके मोबाइल फोन में इंटरनेट 100 गुना तेजी से चलने लगेगा.

इतना ही नहीं रियल टाइम में डाटा ट्रांसफर भी संभव हो सकेगा. 5जी से मतलब है फिफ्थ जेनरेशन मोबाइल नेटवर्क, जो 2010 में आए 4जी के बाद आया है. इसे एलटीई भी कहा जाता है.

5जी दो बड़े फायदों के साथ आएगा. पहला डाउनलोड स्पीड और दूसरा डाटा ट्रांसफर. इसमें डाउनलोडिंग की स्पीड 10 गीगाबाइट प्रति सेकंड हो जाएगी, मतलब आप 5जीबी की पूरी की पूरी डीवीडी आधे सेकंड में डाउनलोड कर पाएंगे. इसके बाद अगर आप 4k वीडियो क्वालिटी (100+जीबी) में चाहते हैं तो उसे भी आप 10 सेकंड में प्राप्त कर सकते हैं.

4के एक हाई रिजॉल्यूशन डिजिटल फॉर्मेट है जिसका इस्तेमाल कमर्शियल डिजिटल सिनेमा में किया जाता है. इतना ही नहीं 5जी में वाईफाई की स्पीड भी आपको हैरान कर सकती है. वहीं डाटा ट्रांसफर जो फिलहाल लंबा वक्त ले लेता है वह भी एक सेंकड से कम में पूरा हो जाएगा. तेजी से डाटा ट्रांसफर होना नई तकनीकों मसलन ऑटोनॉमस ड्राइविंग, टेलिमेडिसिन के लिए संभावनाओं का बाजार और भी खोल सकता है.

शुरुआत में शायद इस्तेमालकर्ताओं को बहुत कुछ न मिले क्योंकि यूजरों के हाथ में अभी सही स्मार्टफोन नहीं पहुंचा हैं. 2018 में दक्षिण कोरिया में हुए शीतकालीन ओलंपिक को देखने पहुंचे लोगों ने 5जी का इस्तेमाल करने की कोशिश की थी. लोगों ने रियल टाइम में वीडियो लेने की कोशिश की, लेकिन 4जी फोन पर 5जी को इस्तेमाल करना और फिर बफरिंग में फंसे रहना एक बड़ी समस्या बना रहा.

एक समस्या यह भी है कि आज भी ऐसे कई देश हैं जहां 4जी, 3जी जैसी तकनीक भी नहीं पहुंची हैं. वहीं कुछ ऐसे देश भी हैं जहां आज 3जी तकनीकी क्षेत्र का एक मजबूत स्तंभ है. वहीं कुछ ऐसे विकासशाल क्षेत्र भी हैं जहां 2जी अब भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है.

टेलीकॉम कंपनियों के अलावा कई और कारोबारों में यह तकनीक मददगार साबित हो सकती है. ऑटो निर्माता और कार क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां भी इस हाईस्पीड इंटरनेट तकनीक पर हाथ आजमाने को तैयार हैं.

कार निर्माताओं की नजर से देखे तो अगर स्मार्ट ऑटोनॉमस गाड़ियां स्वयं ही ट्रैफिक जाम और रास्तों की भीड़भाड़ की जानकारी दें, तो कंपनियों को इससे बहुत फायदा होगा. निर्माता मशीन के साथ तालमेल बैठाकर इस तकनीक के जरिए बेहतर से बेहतर नतीजे प्राप्त करना चाहते हैं. लॉजिटिक सेक्टर के लिए भी यह किसी बड़ी मदद से कम नहीं होगा.

जर्मनी दुनिया भर में इंटरनेट स्पीड और मोबाइल इंटरनेट के मामले में काफी पीछे है. यह देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति बेहतर करने के लिए 5जी बतौर लॉन्चपैड इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन यह बिल्कुल आसान नहीं है.

साल 2018 की शुरुआत में, मोबाइल एलटीई तकनीक जर्मनी के 65 फीसदी इलाके में ही उपलब्ध थी. वहीं दक्षिण कोरिया में एलटीई कवरेज तकरीबन 97 फीसदी है. आज भी जर्मनी के ग्रामीण इलाके 3जी और 2जी पर ही भरोसा करते हैं. इसलिए उपभोक्ता एजेंसियां और उद्योग क्षेत्र पूरी तरह 5जी कवरेज की मांग करते हैं.

मार्च 2019 तक दक्षिण कोरिया 5जी का इस्तेमाल पूरे देश में शुरू कर देगा. तीन बड़े टेलीकॉम ऑपरेटर इस सेवा को लॉन्च करने के लिए दक्षिण कोरिया में दिन-रात काम कर रहे हैं.

उस वक्त तक शायद जर्मनी मोबाइल फोन ऑपरेटरों को ये फ्रीक्वन्सी बेचना शुरू कर देगा. द यूनाइटेड स्टेट्स फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन (एफसीसी) जल्द ही इस 5जी तकनीक को बेचना शुरू कर देगा. दक्षिण कोरिया के बाद चीन और जापान 5जी की रेस में सबसे आगे हैं.

VIDEO : ब्लाउज का हुक टूटने के बाद भी डांस करती रही कंटेस्टेंट, मलाइका ने किया सैल्यूट

टीवी रियलिटी शो ‘इंडिया नेक्स्ट टौप मौडल 4’ के एक एपिसोड में एक कंटेस्टेंट तमन्ना शर्मा को शो की जज मलाइका अरोड़ा ने सैल्यूट किया है. मलाइका के इस तरह सैल्यूट करने के पीछे वजह यह रही कि तमन्ना परफौर्म कर रही थीं, तभी डांस करते-करते उनके ब्लाउज का हुक पीछे से टूट गया और उनका ड्रेस उनके बौडी से स्लिप होने लगा. इस दौरान तमन्ना घबराई नहीं और परफौर्म करना जारी रखा. तमन्ना फिल्म ‘गब्बर’ के एक गाने ‘कुंडी मत खड़काओ राजा’ पर डांस कर रही थी.

तमन्ना ने बहुत ही मुश्किल तरीके से इस हादसे को स्टेज पर मैनेज किया. मलाइका को तमन्ना की ये चीज बेहद पसंद आई और उन्होंने अपने सोशल नेटवर्किंग साइट इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए उन्हें सैल्यूट किया.

मलाइका द्वारा शेयर किए गए इस वीडियो में वह दिल खोलकर तमन्ना की तारीफ करती हुई नजर आ रही हैं. मलाइका कहती हैं, ‘आपने बड़े ही अच्छे तरीके से खुद को मैनेज किया. सबका यही डर रहता है चाहे सनी का हो या मेरा भी है कि जब भी हम स्टेज पर जाते हैं तो कही वार्डरोब मालफंक्शन न हो. तुमने इसे बहुत ही अच्छे तरीके से मैनेज किया तमन्ना’.

बता दें, मलाइका के अलावा इस दौरान शो के जज मिलिंद सोमन और डब्बू रतनानी भी मौजूद थे. साथ ही सनी लियोनी इस एपिसोड में एक स्पेशल गेस्ट के रूप में प्रेजेंट थीं.

गौरतलब है कि अरबाज खान से अलग होने के बाद अब मलाइका की अर्जुन कपूर से नजदिकियां इन दिनों सुर्खियों में है. आए दिन अर्जुन कपूर और मलाइका को एक साथ देखा जा रहा है.

हाल ही में करण जौहर के चैट शो ‘कौफी विद करण’ में अर्जुन कपूर ने भी मलाइका अरोड़ा से रिश्‍ते पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा था कि वह अब ‘सिंगल’ नहीं हैं. यानी कोई है, जो उनकी जिंदगी में आ गया है.

‘चन्द्रशेखर हूं रावण नहीं’

भीम आर्मी को मायावती दलितों का विरोधी मानते अपने वोटबैंक को समझाती हैं कि वह इनसे दूर रहे. इसके जवाब में भीम आर्मी के संस्थापक चन्द्रशेखर मायावती को अपना नेता मानते है. चन्द्रशेखर का मानना है कि बहन जी किसी बात से हमसे नाराज हैं. लेकिन यह हमारे परिवार का मसला है. हम केवल कांशीराम के मूवमेंट को आगे बढ़ा रहे हैं. हमें ना तो राजनीति करनी है और ना ही चुनाव लड़ना है. हम चाहते हैं कि 2019 में भाजपा सत्ता में ना आये. मायावती का पक्ष लेते चन्द्रशेखर कहते हैं कि ‘कांग्रेस दलितों का हित चाहती है तो मायावती का साथ दे.’

भीम आर्मी के संस्थापक चन्द्रशेखर का पूरा नाम चन्द्रशेखर आजाद है. कुछ समय से उनके नाम के आगे चन्द्रशेखर रावण लिखा जाने लगा था. इस पर चन्द्रशेखर ने कहा कि मेरा असल नाम चन्द्रशेखर ही दर्ज है. बाकी जिसको जो अच्छा लगता है वह जोड़ लेता है, किसी ने आजाद जोड़ा तो कोई रावण भी जोड़ लेता है. चन्द्रशेखर पर जातीय राजनीति ठप्पा लगता है. चन्द्रशेखर कहते हैं कि मेरे साथ बड़ी संख्या में मुसलिम भी हैं.

चन्द्रशेखर पर एक युवती के यौन शोषण का भी आरोप है. वह सफाई देते हुए कहते हैं कि जो लोग मुझे खरीद नहीं सके, वह इस तरह के आरोप लगाकर तोड़ना चाहते हैं. इसमें हमारे ही समाज के कुछ लोग जुड़े हैं. चन्द्रशेखर का मीडिया में एक आकर्षण है. युवाओं में वह लोकप्रिय हो रहे हैं. यही वजह है कि बसपा नेता मायावती को उनसे परहेज होता है.

असल में चन्द्रशेखर को सपोर्ट करने वाले नेताओं में बड़ी संख्या ऐसे नेताओं की है जो बसपा से जुड़े रहे और अब बसपा से अलग हो गये हैं. मायावती की ही तरह चन्द्रशेखर भी कांशीराम की नीतियों पर चलने की बात करते हैं. मायावती यह नहीं चाहती कि कांशीराम के नाम पर कोई दूसरा राजनीति करे. मायावती को यह डर भी है कि अगर दलितों में कोई दूसरा नेता उभरा तो दलित मायावती का साथ छोड़कर उसके साथ चले जायेंगे.

चन्द्रशेखर ने अयोध्या मसले पर कहा कि ‘अयोध्या देश के प्रमुख बौद्व स्थलों में से एक है. इसका नाम साकेत था. इसे वापस साकेत होना चाहिये. इसके लिये हम संघर्ष करेंगे. राममंदिर विवाद कोर्ट में है, कोर्ट जो फैसला करे हमें मानना चाहिये.’

मध्य प्रदेश : दलित अत्याचार पर कांग्रेस और बीजेपी दोनों चुप

अनुसूचित जाति तथा जनजाति अत्याचार निवारण कानून (अत्याचार कानून) के प्रावधानों को कमजोर बनाने वाले सर्वोच्च अदालत के फैसले के खिलाफ 2 अप्रैल को हजारों की संख्या में दलितों ने देश भर में प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों पर पुलिस और हिंदुत्ववादी गुंडो की हिंसा में, कम से कम 9 लोगों की मौत हो गई. “दो अप्रैल के प्रदर्शन के बाद दलितों की हालत इतनी खराब हो गई है कि जब हम पुलिस के पास अपनी शिकायत लेकर जाते हैं तो वो लोग हमारी पृष्ठभूमि की जांच करने लगते हैं”, ग्वालियर के 30 वर्षीय निवासी महेश कुमार मंडेलिया ने मुझे बताया.

मंडेलिया गल्ला कोठार के रहने वाले जाटव हैं. चौहान प्याऊ के इर्दगिर्द बसे दलित मोहल्लों में से एक है गल्ला कोठार. इन मोहल्लों में रहने वाले लोगों का कहना है कि चौहान प्याऊ के राजपूत (तोमर और चौहान) ग्वालियर के सबसे प्रभावशाली परिवारों में से एक हैं जिन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है. यहां रहने वाले लोगों ने बताया कि 2 अप्रैल की रैली में चौहान प्याऊ के राजपूतों ने पिस्तौल और रायफलों से गोलिया बरसाईं और नजदीकी दलित मोहल्लों- गल्ला कोठार और भीम नगर- में गुस आए. हिंसा में दोनों मोहल्लों के दो दलित आदमी मारे गए और दर्जन भर से अधिक गोलीबारी में घायल हो गए.

हिंसा के बाद राज्य पुलिस ने इलाके के दलित और राजपूत लागों की शिकायतों के आधार पर कई एफआईआर दर्ज की. चौहान प्याऊ में मैंने राजा चौहान और महेन्द्र चौहान से बात की. इन दो राजपूतों पर प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आरोप है. राजा को गिरफ्तार होने से पहले अंतरिम जमानत मिल गई थी और उसका दावा है कि उसने “अपनी औरतों को बचाने के लिए” गोली चलाई थी. दलित निवासियों की हत्या के आरोपी महेन्द्र को तीन महीनों के भीतर जमानत पर रिहा कर दिया गया था. उसका दावा है कि उसने “आत्मरक्षा” में गोली चलाई थी. लेकिन राजपूतों की ओर से कोई क्षति नहीं हुई और ना ही दलितों के पास से कोई हथियार जब्त किया गया.

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के तथ्यों के अनुसार मध्य प्रदेश में 2014 से हर साल 1700 से अधिक मामले अत्याचार कानून के तहत दर्ज किए गए थे. ब्यूरो के तथ्यांक के अनुसार 2014 से ही दलितों के खिलाफ अपराध के मामले बढ़े हैं और अन्य राज्यों के मुकाबले मध्य प्रदेश में सबसे अधिक दलित विरोधी अपराध दर्ज किए गए हैं. राज्य में चंबल-ग्वालियर संभाग में सबसे अधिक दलितों की बसावट है जो संभाग की जनसंख्या का 20 और 25 प्रतिशत है. इस संभाग में छह जिले हैं और राज्य की 230 विधानसभा में से 34 सीट यहां हैं. इसके बावजूद इस क्षेत्र में अत्याचार कानून का सबसे जबरदस्त विरोध हुआ और 2 अप्रैल के प्रदर्शन में इस क्षेत्र के 7 दलित मारे गए.

इस साल अक्टूबर में मैंने ग्वालियर और मुरैना का दौरा किया. दोनों चंबल-ग्वालियर संभाग के महत्वपूर्ण शहर है. यहां मैंने अलग अलग समुदायों के लोगों से बात की. मैंने दलित, राजपूत, ब्राह्मण और अन्य पिछडा वर्ग के लोगों से बात की. सभी समुदयों में 28 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए अत्याचार निवारण कानून पर राजनीतिक पार्टियों की खामोशी सबसे महत्वपूर्ण विषय हैं. अगड़ी जातियों का मानना था कि यह कानून एक ऐसा अस्त्र है जिसे उन लोगों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है. उन लोगों को आशा थी कि बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर इस कानून का साफ विरोध करेगी. इन लोगों ने इस मामले में केन्द्र सरकार की दोहरे चरित्र की आलोचना की. राजा चौहान ने कहा, “मान लो कि एक दलित गुजर रहा है और उसी वक्त मैंने थूक दिया. वह मेरे खिलाफ एसीसी/एसटी मामला दायर कर देगा और मैं तो गया छह महीने के लिए अंदर.”

दूसरी ओर यहां रहने वाले दलितों को दो अप्रैल के बाद पुलिस और अगड़ी जातियों के पड़ोसियों की हिंसा और दुश्मनी के मद्देनजर राजनीतिक दलों से आश्वासन चाहिए. इसके बावजूद ना तो इस कानून पर विवाद और ना ही दलित की सुरक्षा बीजेपी और कांग्रेस के लिए चुनावी मुद्दा है. चंबल-ग्वालियर संभाग के दलित संकेत देते है कि इस उदासीनता का असर चुनाव परिणाम में दिखाई देगा. “वोट देते वक्त जो एक बात हम याद रखेंगे वह यह कि 2 अप्रैल के बाद किस राजनीतिक दल या नेता ने हमें समर्थन दिया और कौन हमें हमारे हाल पर छोड़ कर चला गया”, भीम नगर के निवासी मंगल तमोटिया ने मुझे बताया. मंगल के भाई राकेश की हिंसा में मौत हो गई थी.

कांग्रेस और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और अमित शाह ने चंबल-ग्वालियर संभाग सहित प्रदेश भर में चुनावी रैलियों को संबोधन किया लेकिन किसी ने भी इन मामलों पर बात नहीं की. यहां तक कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी अपनी संपूर्ण जन आशीर्वाद यात्रा में दलितों के खिलाफ उत्पीड़न को नजरअंदाज किया. जुलाई के मध्य से चौहान ने प्रदेश भर में जन आशीर्वाद नाम से रोड शो और चुनाव रैलिया की थीं. 24 अक्टूबर को चौहान ने चौहान प्याऊ से रोड शो निकाला और जिस जगह दलितों की हत्या हुई थी वहां से बस तीन किलोमीटर की दूरी पर जनसभा को संबोधित किया जिसमें उन्होंने एक बार भी हत्या की बात नहीं की.

अगस्त में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शनों के बाद सरकार ने संसद में अत्याचार कानून पर संशोधन कर उन प्रावधानों को पुनः स्थापित कर दिया जिसे सर्वोच्च अदालत ने कमजोर कर दिया था. इसमें उस धारा को भी पुनः लागू कर दिया गया जिसके तहत इस कानून के तहत अत्याचार के आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी का प्रावधान है. उस वक्त बीजेपी और कांग्रेस सहित अधिकांश पार्टियों ने इस विधेयक का सर्मथन किया था. हालांकि दोनों पार्टियों के राज्य स्तरीय नेताओं ने मीडिया के जरिए यह संकेत दिया था कि तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी. सितंबर में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बयान दिया कि इस कानून के तहत किसी को भी फर्जी तरीके से पकड़ा नहीं जाएगा और मुख्यमंत्री चौहान ने कहा कि बिना पड़ताल कोई गिरफ्तारी नहीं होगी. निजी साक्षत्कारों में दोनों नेताओं ने सवर्ण मतदाताओं को खुश करने वाली उनकी अभिव्यक्तियां दी हैं लेकिन चुनावी रैलियों में दोनों ही इस मामले से बचे हैं.

दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के ग्वालियर स्थित कार्यालयों में जिस तरह का माहौल है वह संविधान से अधिक सामंती जातीय ऊंच-नीच को तवज्जो देता दिखता है. यहां तक कि संसद में जब अत्याचार कानून में संशोधन को पारित किया जा रहा था तो भी उनका व्यवहार इसी तरह का था. स्थानीय नेता और पार्टी कार्यकर्ता पुरातन जाति आधारित सामाजिक ढांचे- “सामाजिक व्यवस्था”-की बात करते हैं जो उनके विचार में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी है. उनका कहना है कि दलित दावेदारी के खिलाफ अगड़ी जातियों का हिंसक प्रतिशेध सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए न्योचित उपाय है जो पुरातन धर्मग्रंथों द्वारा स्वीकृत है.

20 अक्टूबर को ग्वालियर के कांग्रेस भवन में मैंने कांग्रेस पार्टी के जिला अध्यक्ष देवेन्द्र शर्मा से मुलाकात की. दिवार पर बड़ा सा पोस्टर टंगा था. जिसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया और राहुल गांधी के दोनों तर्फ राजीव गांधी और माधवराव सिंधिया हैं. 50 से ऊपर के छह सात लोग शर्मा को घेरे बैठे थे और 30 वर्ष के आसपास का नौजवान कार्यकर्ता शर्मा की हर बात में अपना कथन जोड़ रहा था.

ब्राह्मण जाति के शर्मा ने बताना शुरू किया, “मेरे पड़ोस में दो एससी/एसटी, दो ओबीसी और सवर्ण रहते हैं. “रामराज का अर्थ है सभी पड़ोसियों में राम का स्वरूप देखना… धर्म तो एक ही है ना, सनातन.” जब मैंने शर्मा से बार बार अत्याचार कानून पर उनकी पार्टी के स्टेंड के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, “हमने संशोधन बिल नहीं लाया इसलिए स्पष्ट करने को हमारे पास कुछ नहीं है.” सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने संसद में यह विधेयक पेश किया था. शर्मा का मानना है कि कानून को पुनः बहाल करने की कोई आवश्यकता नहीं थी और सरकार को विरोध को अपने आप ठंडा हो जाने देना चाहिए था.

कांग्रेस कार्यालय में मेरी मुलाकात एक और ब्राह्मण कार्यकर्ता धमेन्द्र शर्मा से हुई. धमेन्द्र का दावा है कि अत्याचार कानून में संशोधन होने से दो समुदायों को नुकसान हुआ है. उन्होंने कहा, ”देखिए हमारे एससी/एसटी भाईलोग दिहाड़ी करने वाले मजदूर लोग है और अब इस कानून के कारण ठेकेदारों ने उन्हें काम देना बंद कर दिया है क्योंकि वे मानते हैं कि इस कानून को उनके खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा. पारंपरिक तौर पर समाज में एक सामाजिक व्यवस्था थी. उसे इसी तरह बने रहना चाहिए.” देवेन्द्र ने उनके विचारों पर सहमति जताते हुए कहाः “क्या जरूरत थी एससी/एसटी मुद्दे को छेड़ने की. और क्या जरूरत थी उसको बाद में सही करने की. चाहे एससी/एसटी हो या सवर्ण हो, हम किसी के साथ अन्याय होने नहीं देंगे.” यह तर्क सभी समुदाय को बराबार का पीड़ित बताता है और अत्याचार कानून के दुरुपयोग के व्यापक भ्रम को मान्यता देता है जबकि एनसीआरबी का डेटा कहता है कि भारत में दोषसिद्धि की दर 2006 और 2016 के बीच दो प्रतिशत घट कर 26 प्रतिशत रह गई है.

कांग्रेस कार्यलय में मीटिंग करने से पहले मैंने गल्ला कोठार का भ्रमण किया. मैंने यहां रहने वाले 20 दलित लोगों से मुलाकात की जो दीपक जाटव की याद में एक वृक्ष के नीचे जमा हुए थे. दीपक की 2 अप्रैल के दिन हिंसा में मौत हो गई थी. इलाके में व्याप्त जातीय हिंसा के बारे में चर्चा करते हुए वहां मौजूद कईयों ने मुझे पार्षद चतुर्भुज धनोलिया पर हाल में हुए हमले के बारे में बताया. 50 वर्षीय रामअवतार सिंह ने उन परिस्थितियों के बारे में बताया जिसकी वजह से हमला हुआ था. सिंह ने बताया 10 सितंबर को एक राजपूत मोहल्ले से गुजर रहा था जब उसकी मोटरसाइकल का पहिया गड्डे में फंस गया. वह गड्डा पार्षद के घर के सामने था. वह आदमी पार्षद के पास गया और उस गड्डे को साफ करने और ढकने को कहने लगा. मंडेलिया ने बताया कि वह आदमी चाहता था कि पार्षद खुद गड्डे को साफ करे जिसके बाद दोनों के बीच बहस होने लगी. राजपूत आदमी चला गया और 20 मिनट के अंदर दूसरे लोगों के साथ वापस आया और धनोलिया के घर को घेर लिया.

धनोलिया ने मुझे बताया कि कम से कम 20 राजपूत आदमियों ने उनके घर को घेर लिया और परिवार पर पथराव किया. उन्होंने नाला साफ करने वाली बात नहीं कि और इसे “बस जातीय नफरत” करार दिया. धनोलिया ने बताया कि उनकी शिकायत के बाद पुलिस ने एक राजपूत को हिरास्त में लिया था लेकिन बाद में उसी दिन राजपूतों की भीड़ ने थाने में जाकर जबरदस्ती उसे छुड़ा लिया. “हालांकि मैंने परिवार पर हमला करने वाले कुछ राजपूतों का नाम लिया था लेकिन पुलिस ने अज्ञात लोगों पर एफआईआर दर्ज की.” धनोलिया ने आगे बताया, “पुलिस ने मेरे खिलाफ हमला करने और सार्वजनिक अशांति फैलाने का केस लगा दिया और मुझे जमानत लेनी पड़ी.”

अत्याचार कानून पर बीजेपी के नेताओं के विचार कांग्रेस के नेताओं के ही जैसे हैं. ग्वालीय विधानसभा सीट के लिए बीजेपी के तीन इंचार्ज में से एक रमेश चंद्र सेन ने मुझसे कहा कि दमित वर्ग को अत्याचारों के बारे में भूल कर प्रशासन पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि दलित और आदिवासी अब चुनाव लड़ सकते हैं और राजनीति में आ सकते हैं. “आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी सरकार सत्ता में आई तब आरएसएस प्रमुख देवरस ने (तीसरे सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस) उन लोगों को एक लाइन का संदेश दिया थाः पुरानी बातों को भूल कर शासन करो.” “तुम पर अत्याचार हुआ था, पाप हुआ. इन लोगों को पुलिस या जेल भेजने के काम में मत उलझो बल्कि खुद को बड़ा बनाने और अपनी लाइन को इनसे बड़ा बनाने की सोचो.”

सेन ने भी 2 अप्रैल की हिंसा के लिए दलितों को दोषी ठहराया. उन्होंने अनुसूचित जाति तथा जनजाति की ओर इशारा करते हुए कहा, “वह वर्ग साक्षर नहीं है.” सेन ने कहा कि इन समुदायों के पास “संसाधनों की कमी है और इसलिए इन लोगों ने गलत विश्वासों के चलते दंगे किए” कि फैसले से कानून कमजोर हो गया है.

ग्वालियर में बीजेपी के घर घर जाकर प्रचार कार्यक्रम को सेन देखते हैं. जब मैंने उन से सवाल किया कि दलितों के लिए उनके पास बताने को क्या है तो उनका कहना था कि वे लोग मुख्यमंत्री की लाई विकास योजनाओं का हवाला देंगे जिसमें बिजली के बिल में छूट वाली योजना भी शामिल है. उन्होंने कहा कि वोटों के लिए प्रचार में वह अत्याचार कानून को सामने नहीं लाएंगे. कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भी कहा कि वो लोग अत्याचार कानून और दलित सुरक्षा के विषय को स्थानीय प्रचार प्रयासों में शामिल नहीं करेंगे. देवेन्द्र ने कहा, “हमारी प्रथमिकता महिला सुरक्षा, किसानों के मुद्दे और युवा लोगों के लिए रोजगार हैं.” दोनों ही पार्टियों के घोषणापत्रों से अत्याचार कानून गायब है. बीजेपी ने ओबीसी समुदायों के लिए वादे किए हैं और कांग्रेस ने वकीलों और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने की बात की है.

दोनों पार्टियों के राष्ट्रीय नेता भी अन्य मुद्दों पर केन्द्रित हो कर प्रचार कर रहे हैं. राहुल गांधी के मुख्य चुनावी मामलों में फ्रांस के साथ 36 राफेल विमानों का सौदा, महिला सुरक्षा, बेरोजगारी और किसानों की पस्त हालत है. अमित शाह ने घुसपैठियों के खतेर और चौहान के नेतृत्व में विकास कार्य को चुनावी मुद्दा बनाया है.

प्रदेश में ऑल इंडिया फॉरर्वड ब्लाक की किसान शाखा अखिल भारत अग्रगामी किसान सभा के उपाध्यक्ष जयंत वर्मा ने मुझे बताया कि दोनों राष्ट्रीय पार्टियां अत्याचार कानून वाले मामले को इसलिए संबोधित नहीं कर रहीं क्योंकि यह मामला केवल शहरी इलाकों में रहने वालों की चिंता का विषय है. वर्मा बताते हैं कि पार्टी नेताओं को लगाता है कि इससे उनके दलित वोट प्रतिशत को नुकसान नहीं होगा.” ग्वालियर-चंबल संभाग की डबरा सीट से चुनाव लड़ रहे बहुजन समाज पार्टी के नेता पीएस मंडेलिया वर्मा से असहमति जताते हैं. मंडेलिया के अनुसार बीजेपी और कांग्रेस के नेता इस मामले में इसलिए खामोश हैं क्योंकि “दोनों पार्टियों का नेतृत्व उच्च जाति के लोग कर रहे है. दोनों अपने वोटरों को नाराज नहीं करना चाहते. उनकी चुप्पी से उन लोगों को फायदा होगा.”

निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के हिसाब से 2013 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और बीजेपी को 36 और 44 प्रतिशत वोट मिला था. उस चुनाव में बसपा को 6.3 प्रतिशत वोट हासिल हुआ था जिसका अर्थ है कि वह चुनाव मुख्य रूप से इन दो राष्ट्रीय पार्टियों के बीच ही था. लेकिन चंबल क्षेत्र में बसपा की मजबूत पकड़ है जहां उसे 2003, 2008 और 2013 के चुनावों में क्रमशः 13.7, 20.4, और 15.6 प्रतिशत वोट मिला था. मंडेलिया ने बताया कि 28 नवंबर को होने वाले चुनावों में बसपा दलितों और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अत्याचार का मामला उठा रही है. मंडेलिया ने कहा, “हम 2 अप्रैल को भूलने नहीं देंगे”.

मध्य प्रदेश : संघ से नाराज साधुओं का बीजेपी के खिलाफ चुनाव प्रचार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चुनावी रणनीति में हिंदू धार्मिक नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. बीते सालों में धर्म और राजनीति के इस मिश्रण ने संघ को भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में भगवा लहर बनाने में मदद की है. लेकिन इस साल अस्वाभाविक रूप से बड़ी संख्या में धर्म गुरु 28 नवंबर को होने जा रहे विधानसभा चुनाव में बीजेपी का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं. चुनाव का पारा बढ़ने के साथ साधुओं ने यह प्रण लिया है कि वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार को उखाड़ फेकेंगे.

धर्म गुरुओं के इस विद्रोह का नेतृत्व कंप्यूटर बाबा के नाम से मशहूर हाई प्रोफाइल साधू नामदेव दास त्यागी कर रहे हैं. 23 नवंबर को जबलपुर में नर्मदा नदी के किनारे हिंदू धार्मिक नेताओं के भव्य आयोजन के बाद मुझसे बात करते हुए उन्होंने कहा, “हम लोगों का मात्र एक उद्देश्य हैः नर्मदा नदी और गाय की रक्षा लेकिन शिवराज सिंह चौहान हमारी बात सुनने को तैयार नहीं हैं.” कंप्यूटर बाबा ने आगे कहा, “शिवराज नर्मदा और गाय विरोधी हैं और आरएसएस के करीबी साधुओं को संरक्षण देकर साधू समुदाय को मूर्ख बनाना चाहते हैं.”

एक दिवसीय नर्मदा संसद में राज्यभर के 1000 साधुओं ने भाग लिया. सुबह संसद का आरंभ यज्ञ के साथ हुअ जिसमें चौहान सरकार के हराने की प्रार्थना की गई. संसद के अंत में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें जनता से संत विरोधी बीजेपी सरकार को हराकर “धर्म की रक्षा” करने का आह्वान किया गया.

जबलपुर में आयोजित यह संसद राज्य के विभिन्न हिस्सों में हिंदू धर्म गुरुओं द्वारा आयोजित श्रृंखलाबद्ध विरोध प्रदर्शनों का समापन कार्यक्रम था. पहला प्रदर्शन भोपाल में 2 अक्टूबर को हुआ था, उसके बाद 23 अक्टूबर को इंदौर में, 30 अक्टूबर को ग्वालियर में, 4 नवंबर को खंडवा में और 11 नवंबर को रीवा में प्रदर्शन हुआ.

कंप्यूटर बाबा ने इन प्रदर्शनों और संसद के आयोजन में मुख्य भूमिका निभाई. इस वर्ष अप्रैल में हिंदू धर्म गुरुओं में व्याप्त असंतोष को देखते हुए शिवराज सिंह ने कंप्यूटर बाबा और अन्य चार बाबाओं को राज्य सरकार में राज्य मंत्री बनाया था. बाबा लोग प्रदेश में पहली बार मंत्री नहीं बने थे. 2016 में आरएसएस प्रचारक से साधू बने अखिलेश्वरानंद गिरी को मध्य प्रदेश गो संवर्धन बोर्ड का प्रमुख बनाया गया था. अप्रैल में चार साधुओं को मंत्री बनाए जाने के बाद राज्य के प्रशासन में लगे साधुओं की संख्या छह हो गई. लेकिन छह महीनों के अंदर ही कंप्यूटर बाबा और शिवराज सिंह चौहान सरकार के बीच तकरार हो गई. आरोप लगा कि सरकार आरएसएस के करीबी साधुओं के पक्ष में पक्षपाती व्यवहार कर रही है.

“मैं जब सरकार में शामिल हुआ तो मुझे लगा था कि शिवराज सिंह संतो और साधुओं की चिंताओं को लेकर सच में गंभीर हैं. लेकिन एक महीने के भीतर ही मुझे समझ आ गया कि साधुओं का एक ऐसा वर्ग भी है जिसके के हक में पक्षपात किया जाता है. इस वर्ग को आरएसएस का समर्थन प्राप्त है और इस वर्ग का एक ही उद्देश्य है बीजेपी की राजनीति को चमकाना.” अखिलेश्वरानंद के संबंध के बारे में कंप्यूटर बाबा का कहना है, “वह आरएसएस के प्रचारक थे और साधू बनने के पश्चात भी धर्म की जगह आरएसएस के एजेंडे को आगे बढ़ाने को अपनी पहली चिंता मानते हैं.”

“हम लोगों को जो अत्याधिक समर्थन प्राप्त हो रहा है उसकी मुख्य वजह यह है कि बड़ी संख्या में साधू अपने मामलों में आरएसएस की घुसपैठ के प्रयास से नाराज हैं. अधिकांश साधुओं ने आरएसएस के असली मकसद को समझ लिया है. उसका एक मात्र उद्देश्य बीजेपी के लिए हिंदू वोटों का धुर्वीकरण करना है.”

साधुओें को संगठित करने के वाले आरएसएस के उग्र संगठन विश्व हिंदू परिषद ने दशकों तक हिंदू धर्म नेताओं को नियंत्रित करना चाहा. वीएचपी का मुख्य उद्देश्य आरएसएस के राजनीतिक प्रोजेक्ट, बीजेपी, के लिए साधुओं को समर्थन देने के लिए प्रेरित करना है. आरएसएस के साथ काम करना साधुओं के लिए भी फलदायी होता है. प्रचार के एवज में उन्हें आरएसएस-वीएचपी से धन और अन्य प्रकार का संरक्षण प्राप्त होता है. लेकिन अधिकांश साधुओं ने चुनावों में हिंदू अनुष्ठानों और प्रतीकों में इसलिए भागीदारी की क्योंकि उनमें से कुछ को लगा था कि वे लोग सार्वजनिक रूप में धर्म का पालन कर रहे हैं.

मध्य प्रदेश में साधुओं के विरोध को देखते हुए आरएसएस संभल कर चलने को मजबूर है. विरोध कर रहे साधुओं की आलोचना करने और टकराव से बचते हुए उसने इन “नकली साधुओं” को आम हिंदुओं के सामने बेनकाब करने की योजना बनाई है.

जून 2018 से चौहान की कैबिनेट में मंत्री रहे गिरी आरएसएस की इस काउंटर रणनीति के अगुवाई कर रहे हैं. गिरी ने मुझे बताया कि आरएसएस ने “लोगों को शिक्षित करने के लिए प्रदेश के विभिन्न भागों में लगभग 1500 साधुओं को लगाया है. उनका उद्देश्य हिंदुओं के बीच भ्रम फैलाने वाले नकली साधुओं को जनता के बीच बेनकाब करना है. इन लोगों ने जो भ्रम फैलाया है उससे हिंदुओं को नुकसान होगा. यह उनको विभाजित कर कमजोर बना देगा.”

जब मैंने गिरी से पूछा कि कंप्यूटर बाबा और अन्य प्रदर्शनकारी साधुओं के आरोपों का जवाब चौहान ने क्यों नहीं दिया तो उनका कहना था, “शिवराज क्यों उनके बेबुनियाद आरोपों का जवाब दें. हमें पता है कि कांग्रेस उन्हें भड़का रही है और हम लोग नकली साधुओं को बेनकाब करने में सक्षम हैं.

गिरी का यह आरोप की प्रदर्शनकारी साधुओं को कांग्रेस मदद कर रही है सही हो सकता है क्योंकि इससे उसे फायदा होता है. साथ ही ये प्रदर्शन इस लिहाज से अनोखा है क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ है कि सधुओं ने सार्वजनिक रूप से वीएचपी और आरएसएस की गतिविधियों के खिलाफ अपना गुस्सा दिखाया है. मीडिया में प्रकाशित खबरों के मुताबिक कंप्यूटर बाबा ने इस बार के चुनावों में खुले तौर पर कांग्रेस को समर्थन दिया है.

साधुओं की बगावत इस बात का पहला ठोस सबूत है कि मध्य प्रदेश के साधुओं को यह एहसास हो गया है कि आरएसएस उनका इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्य के लिए कर रही है. यदि बीजेपी यह चुनाव जीत जाती है तो यह बगावत कमजोर पड़ जाएगी और यदि वह हारती है तो इससे साधुओं के बीच आरएसएस विरोध तीव्र हो जाएगा. और ऐसा सिर्फ मध्य प्रदेश में नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी होगा.

क्रिकेटर मिताली राज ने फोड़ा ‘लेटर बम’, इन पर लगाए गंभीर आरोप

साल 2011 में दिल्ली प्रेस की चहेती पत्रिका ‘गृहशोभा’ का ‘गोल्डन गर्ल’ का पहला संस्करण महिला जगत की 15 नामचीन खिलाड़ियों के नाम था. तब क्रिकेटर मिताली राज भी स्पेशल दिल्ली आई थीं और उन्होंने बतौर मौडल फोटोशूट कराते हुए एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू भी दिया था. तब से अब तक उन्होंने अपने उम्दा खेल से महिला क्रिकेट जगत में नई से नई ऊंचाइयां छुई हैं.

लेकिन आज क्रिकेट की यही ‘वंडर गर्ल’ खेल राजनीति की शिकार है. वो इस कदर निराश और हताश हैं कि अब क्रिकेट से संन्यास लेने पर विचार कर रही हैं.

मिताली राज ने मंगलवार, 27 नवंबर को सीओए सदस्य डायना एडुल्जी पर उनके साथ पक्षपात करने का आरोप लगाया और महिला टीम के मुख्य कोच रमेश पोवार के बारे में कहा कि इस पूर्व क्रिकेटर ने उन का अपमान किया.

हाल ही में हुए टी20 के महिला वर्ल्ड कैप में इंगलैंड के खिलाफ सेमीफाइनल मैच से पहले बिना किसी ठोस वजह के टीम से बाहर की गईं मिताली राज ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि डायना एडुल्जी ने उन के खिलाफ अपने पद का फायदा उठाया.

याद रहे कि 35 साल की मिताली राज को वेस्टइंडीज में खेले गए वर्ल्ड ट्वेंटी20 कप में लगातार अर्धशतक बनाने के बावजूद सेमीफाइनल में खेलने का मौका नहीं दिया गया था. भारत वह मैच 8 विकेट से हार गया था.

मिताली राज ने इस पूरे घालमेल पर बीसीसीआई के सीईओ राहुल जौहरी और क्रिकेट औपरेशंस जीएम सबा करीम को एक चिट्ठी लिख कर बताया, ‘अपने 20 साल के लंबे कैरियर में पहली बार मैं ने खुद को अपमानित और निराश महसूस किया. मुझे यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि देश के लिए मेरी सेवाओं की अहमियत सत्ता में मौजूद कुछ लोगों के लिए है भी या नहीं या फिर वे मेरा आत्मविश्वास तोड़ना चाहते हैं.

mitali raj complaint letter

‘मैं टी20 कप्तान हरमनप्रीत के खिलाफ कुछ नहीं कहना चाहती लेकिन मुझे बाहर रखने के कोच के फैसले पर उसके समर्थन से मुझे दुख हुआ.

‘मैं पहली बार देश के लिए वर्ल्ड कप जीतना चाहती थी और मुझे दुख है कि हम ने वह सुनहरा मौका गंवा दिया.

‘मैं ने हमेशा डायना एडुल्जी पर भरोसा जताया और उन की इज्जत की. मैं ने कभी यह नहीं सोचा कि वे मेरे खिलाफ अपने पद का दुरुपयोग करेंगी, खासकर तब जबकि वेस्टइंडीज में जो कुछ मेरे साथ हुआ, मैं उन्हें बता चुकी थी. मुझे सेमीफाइनल से बाहर रखने के फैसले को उन के समर्थन से मैं काफी दुखी हूं क्योंकि उन्हें तो असलियत पता थी.’

मिताली राज यहीं पर नहीं रुकीं. उन्होंने कहा कि ऐसी कई घटनाएं हुईं जब इस पूर्व क्रिकेटर रमेश पोवार ने उन्हें अपमानित महसूस कराया.

मिताली राज ने अपनी चिट्ठी में लिखा, ‘अगर मैं कहीं आसपास बैठी होती तो वे बगल से निकल जाते थे. दूसरी खिलाड़ियों को नेट पर बल्लेबाजी करते समय देखते थे लेकिन जब मैं बल्लेबाजी कर रही होती थी तो नहीं रुकते थे. मैं उन से बात करने जाती तो फोन देखने लगते या फिर चले जाते.

‘यह काफी अपमानजनक था और सभी को दिख रहा था कि मुझे अपमानित किया जा रहा है. इस के बावजूद मै ने अपना आपा नहीं खोया.

‘जब हम वेस्टइंडीज पहुंचे, तब ही से सबकुछ शुरू हुआ. पहले कुछ इशारे मिले थे कि कोच पोवार का मेरे साथ व्यवहार ठीक नहीं है, लेकिन मैं ने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.’

मिताली राज का यह दर्द जायज है और बीसीसीआई को इस मामले की तह तक जाना चाहिए, क्योंकि मिताली राज के खेल आंकड़े बताते हैं कि वे क्रिकेट को कितना कुछ दे चुकी हैं.

3 दिसंबर, 1982 को राजस्थान के जोधपुर में जन्मी मिताली राज ने अब तक भारत की तरफ से 10 टेस्ट मैच खेले हैं और 51.00 की औसत से 633 रन बनाए हैं. इन का एक पारी में 214 का सर्वाधिक स्कोर रहा है.

इतना ही नहीं, 197 इंटरनेशनल वनडे मैच खेलने वाली इस खिलाड़ी ने 51.17 की औसत से 6550 रन बनाए हैं जिसमें 7 शतक और 51 अर्धशतक शामिल हैं. ट्वेंटी20 मैचों की बात करें तो मिताली राज ने ऐसे कुल 85 इंटरनेशनल मैच खेले हैं जिन में उन्होंने 37.42 की औसत से 2283 रन बनाएं हैं.

अब देखते हैं कि मिताली राज का यह फोड़ा गया ‘चिट्ठी बम’ कितनी दूर तक धमाका करता है.

अब घर पर ही करें बौडी पौलिशिंग

बौडी पौलिशिंग से बौडी पर एक अलग सी चमक आ जाती है. अगर आपने पार्लर जाकर पहले कभी बौडी पौलिशिंग कराई होगी तो आपको इससे मिलने वाले लाभ का अंदाजा होगा. लेकिन अब आपको बार-बार बौडी पौलिशिंग करवाने के लिये पार्लर के चक्‍कर काटने की और ज्यादा पैसे खर्च करने की कोई जरुरत नहीं है. क्‍योंकि आज हम आपको बताएंगे कि किस तरह से घर पर ही यह काम किया जा सकता है. जानने के लिये पढ़ें हमारा यह लेख-

सामग्री : प्‍यूमिक स्‍टोन आलिव आयल, घर का बना बौडी स्‍क्रब, पौलिशिंग बौडी क्‍लोथ

विधि : सबसे पहले अपनी बौडी को गरम पानी से धो लें. इसके बाद उस पर स्‍क्रब लगाएं और गोलाई में उसे रगड़ना शुरु कर दें. अपनी आंखो के आस-पास का एरिया बचाए रखें और अगर त्‍वचा पर पिंपल है तो ज्‍यादा कस के ना रगड़े. बौडी पौलिशिंग करने के लिये अपने बाथरूम में गरम पानी का भाप पैदा करने के लिये गरम पानी वाला नल चला दें. इसके बाद अपने पूरे शरीर पर आलिव आयल लगाएं और तकरीबन 10 मिनट तक के लिये अच्‍छे से मसाज करें. यह शरीर में अच्‍छे से नमी पैदा करेगी तथा पौलिशिंग आसान बनाएगी.

अब हल्‍के से शुगर स्‍क्रब लगाइये और पौलिशिंग क्‍लोथ की मदद से गोलाई में हाथ घुमाइये. अब प्‍यूमिक स्‍टोन का इस्‍तेमाल कर के कड़ी जगह, जैसे घुटना, कुहनियां और ऐड़ी आदि पर से मैल साफ कीजिये. अब अपनी बौडी को तौलिये से साफ कीजिये और उस पर क्रीम या बौडी लोशन लगाइये. जब आप यह कर लें तब बाहर निकलते वक्‍त हमेशा अपनी त्‍वचा पर सनस्‍क्रीन लगाएं. शरीर को चमकदार बनाने के लिये बौडी पौलिशिंग को हफ्ते में दो बार करना चाहिये. इससे आपकी बौडी पर एक अलग सा निखार व चमक आएगी.

सोने से पहले बालों की देखभाल है जरूरी

रात को सोने से पहले अपने बालों की खास देखभाल करके आप उन्हें टूटने से बचा सकती हैं. इसके अलावा बालों की देखभाल से उनमे एक नई सी जान आएगी और वह घने भी हो जाएंगे. आइये देखते हैं किस तरह से रात को हम अपने बालों की सही से देखभाल कर सकते हैं.

बालों को कंघी करें

रात को सोने से पहले अपने बालों में रोज 5-10 मिनटों के लिये कंघी फिराएं. पीछे से शुरू कर के आगे की ओर ले जा कर बाल झाडें. इससे दिन भर की धूल मिट्टी और गंदगी बालों से बाहर निकल जाएगी.

बालों को बांधे

रात को सोने से पहले बालों को जरुर बांधे. अगर बाल लंबे हैं तो आप उनकी प्लेट्स भी बना सकती हैं. इससे ना तो बाल टूटते हैं और ना ही वह उलझते हैं. बल्कि ऐसा करने से बालों की ग्रोथ अच्छी होती है.

कपड़े से बाल को ढंक कर सोइये

अगर आपके लंबे बाल हैं तो उनके आखिरी छोर को सोने से पहले कपड़े से बांधना मत भूलियेगा. अपने बालों को इस तरह से बांधिये की सोते समय उससे कपड़ा बाहर ना निकले. इससे दोमुंहे बालों की समस्या भी दूर होती है और अगर आपको यह समस्या पहले से ही है तो वह और ज्यादा नहीं फैल पाती.

तेल लगाएं

हफ्ते में तीन बार बालों में तेल लगाने से बालों का झड़ना रुक जाता है. ऐसा करने से बालों को जरुरी पोषक तत्व मिलते हैं, जो बालों की बढ़त के लिये जरुरी हैं. बालों के लिये नारियल या फिर बादाम का तेल बढियां होता है. रोज रात को सिर में तेल लगाइये और सुबह उठ कर शैंपू से धो लीजिये.

सीरम का प्रयोग

अगर आप बालों में तेल लगाने की इच्छुक नहीं हैं, तो बालों पर सीरम लगा सकती हैं. सीरम को बालों की जड़ों में लगाना चाहिये जिससे बाल उलझे नहीं. यह तेल का विकल्प माना जाता है. लेकिन इसको सही मात्रा में ही प्रयोग करना चाहिये क्योंकि ज्यादा प्रयोग से बालों को नुकसान पहुंचता है.

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