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अब स्मार्टफोन ऐप से आप मैनेज कर सकते हैं घर का बजट

कुछ खास स्मार्टफोन ऐप के जरिए सभी खर्चों को आसानी से मैनेज किया जा सकता है. ये एप्लीकेशन न सिर्फ बजट तैयार करने में मदद करते हैं, बल्कि तय सीमा से अधिक खर्च होने पर एसएमएस भेजकर चेतावनी भी देते हैं.

Mint : Personal Finance & Money

इस ऐप के जरिए आप एक साथ अपने सभी बैंक खातों को जोड़ सकते हैं. इसकी मदद से खर्चों का वर्गीकरण, बिल का भुगतान, बैलेंस जांचने और खरीदारी से पहले बैलेंस दोबारा देखने जैसे काम आसानी से किए जा सकते हैं. समय-समय पर की जाने वाली देनदारी को याद रखने के लिए ‘मिंट : पर्सनल फाइनेंस एंड मनी’ में रिमाइंडर भी लगाया जा सकता है.

जब भी आपका बैलेंस तय सीमा से कम होगा तो यह नोटिफिकेशन के जरिए आपको अलर्ट करेगा. बजट मैनेज करने वाला यह ऐप एंड्रौयड, विंडोज और आईओएस, तीनों प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है. बैंक खाते की जानकारी शामिल होने के बावजूद इसका इस्तेमाल सुरक्षित है. ऐप की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गूगल प्ले पर 68,000 लोगों ने इसे पूरी 5 रेटिंग दी है.

Goodbudget : Budget & Finance

इस  ऐप्लीकेशन का नाम पहले ‘ईजी एनवेलप’ ऐप हुआ करता था. जिस तरह खर्च नियंत्रित करने के लिए कई बार हम पैसों को अलग-अलग लिफाफों में रख लेते हैं, यह ऐप भी उसी तरह आधुनिक तरीके के वर्चुअल एनवेलप तैयार करता है. जैसे मनोरंजन पर कितना पैसा खर्च करना है, फोन पर कितना और राशन पर कितना.

ऐप में इस तरह के नियमित और अनियमित खर्चे को 20 खातों में रखा जा सकता है. ‘गुडबजट : बजट एंड फाइनेंस’ से बैंक खातों को जोड़ने की जरूरत भी नहीं है. इसके जरिए कमाई और खर्च की तुलना भी कर सकते हैं. साथ ही परिवार के दूसरे सदस्यों और मोबाइल में मौजूद कॉन्टेक्ट को वर्चुअल एनवेलप में शामिल करके उनका खर्च एक साथ नियंत्रित कर सकते है. यह ऐप गूगल प्ले और आईओएस पर उपलब्ध है.

Expense Manager

इसकी खासियत इसके स्मार्ट फीचर हैं. यह ऐप आपके सभी बैंक अकाउंट का सार बताएगा. अगर किसी बिल का समय पर भुगतान नहीं हुआ है तो यह उसकी भी जानकारी देगा. इतना ही नहीं, ‘एक्सपेंस मैनेजर’ पर पैसों के हर लेन-देने का स्क्रीन-शॉट भी सहेजा जा सकता है.

इस ऐप्लीकेशन का डाटा माइक्रोएसडी कार्ड में सेव होता है. इसे 4 अंकों के पासवर्ड से लॉक भी किया जा सकता है. ‘एक्सपेंस मैनेजर’ 30 भाषाओं  में उपलब्ध है. इसे गूगल प्ले स्टोर पर 4.3 रेटिंग मिली है.

अपनी बेटी को बनाना चाहते हैं करोड़पति, तो इस प्लान में करें निवेश

आपकी बेटी शादी के पहले ही करोड़पति बन सकती है. यानी जब तक आप की बेटी की शादी होगी. उसके लिए आप गाड़ी और बंगले का इंतजाम कर सकते हैं. इसके लिए आपको अपनी बेटी के नाम से सुकन्य समृद्धि अकाउंट खुनवाना होगा. आप सुकन्या समृद्धि अकाउंट अपने नजदीकी पोस्ट औफिस या बैंक में खुलवा सकते हैं. इस स्कीम में निवेश करने पर आपको टैक्स छूट भी मिलेगी.

कितना करना होगा निवेश

आप अपनी बेटी के नाम से सुकन्या समृद्धि अकाउंट में 14 साल तक निवेश कर सकते हैं. बेटी की उम्र 21 साल होने पर यह अकाउंट मैच्योर होता है. हालांकि इस अकाउंट में जमा रकम पर बेटी की शादी होने की ब्याज मिलता रहता है.

उदाहरण के लिए अगर आप अपनी 1 साल की बेटी के नाम से सुकन्या समृद्धि अकाउंट खुलवाते हैं और 14 साल तक हर माह 12,500 रुपए निवेश करते हैं तो मौजूदा ब्याज दर के हिसाब से आपकी बेटी जब 21 साल की होती है तो उसके अकाउंट में कुल 77,99,280 रुपए हो जाएंगे.

बेटी 25 साल की उम्र में हो जाएगी करोड़पति

अगर बेटी की शादी 25 साल की उम्र तक नही होती है तो इस रकम पर ब्याज मिलता रहेगा और 25 साल की उम्र में उसके अकाउंट में 1 करोड़ रुपए से अधिक हो जाएंगे. आप 14 साल में सुकन्या समृद्धि अकाउंट में कुल 21 लाख रुपए निवेश करेंगे और आपकी बेटी को 1 करोड़ रुपए से अधिक अमाउंट मिलेगा.

मौजूदा समय में मिल रहा है सालाना 8.5 फीसदी ब्याज

मौजूदा समय में सुकन्या समृद्धि स्कीम में सालाना 8.5  फीसदी ब्याज मिल रहा है. केंद्र सरकार हर तीन माह पर इस स्कीम पर मिलने वाले ब्याज की समीक्षा करती है. कोई भी व्यक्ति सुकन्या समृद्धि अकाउंट में एक साल में अधिकतम 1.5 लाख रुपए ही निवेश कर सकता है. 1 साल से 10 तक की उम्र की बेटी के नाम पर ही सुकन्या समृद्धि अकाउंट खोला जा सकता है.

जब इस अभिनेत्री के लिए राजेश खन्ना से झगड़ पड़ा था ये मशहूर खलनायक

अरे, रंजीत आ गया, उधर मत जाना. 70-80 के दशक में रंजीत को देख यही कहा जाता था. खासकर महिलाओं को हिदायत दी जाती थी कि जहां रंजीत आया है, वहां मत जाना. चूंकि रंजीत की छवि ही उस दौर में कुछ वैसी थी. लोग उन्हें गलत नजरों से देखते थे.

यहां हम बात कर रहे हैं रंजीत की. उस किरदार की, जो सिल्वर स्क्रीन पर किरदारों को रुलाते दिखता था. लेकिन क्या आप जानते हैं असल जिंदगी में वो राजेश खन्नी की साली सिंपल कपाडिया को दिल दे बैठे थे, यहां तक कि इसी वजह से उनका राजेश खन्ना से झगड़ा भी हुआ था. चलिए आज हम बताते हैं वो किस्सा.

आमतौर पर जहां लड़कियां खलनायक को देख डर जाती हैं और नाम से ही कांपने लगती हैं वहीं ये हीरोइन एक खलनायक के प्यार में बुरी तरह पागल हो गई थी. ये हीरोइन थीं एक्ट्रेस डिंपल कपाड़िया की बहन सिंपल कपाड़िया, जो हिंदी फिल्मों के खलनायक रंजीत की दीवानी हो गईं थीं.

सिंपल कपाड़िया ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत साल 1977 में बनी फिल्म अनुरोध से की थी. इस फिल्म में उन्होंने अपने जीजा राजेश खन्ना के साथ काम किया था. जी हां, उस वक्त डिंपल कपाड़िया और राजेश खन्ना की शादी हो चुकी थी. इस फिल्म में सिंपल जीजा राजेश खन्ना के साथ बोल्ड सीन करने की वजह से भी काफी सुर्खियों में रही थीं.

वही दूसरी ओर सिंपल बौलीवुड फिल्म इंडस्ट्री में खलनायक का पर्याय बन चुके रंजीत को दिल दे चुकी थीं. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो दोनों की इंटीमेट रिलेशनशिप से सिंपल के जीजा यानी राजेश खन्ना खुश नहीं थे.

इसी वजह से शोमु मुखर्जी की फिल्म ‘छैला बाबू’ के सेट पर दोनों के बीच कोल्ड वौर साफ देखने को मिला था. कहा जाता है कि सिंपल कपाड़िया के साथ रंजीत के रिलेशन को लेकर इतने नाराज थे कि उनकी लड़ाई भी हुई थी. इसी वजह से आखिर में दोनों एक-दूसरे से अलग हो गए थे.

शक के कफन में दफन हुआ प्यार : भाग 3

प्यार में दोनों हो गए दीवाने

पहली ही नजर में चंदना विवेक के दिल में घर कर गई थी. उस दिन के बाद से विवेक चंदना के करीब जाने के लिए बेताब रहने लगा. वैसे भी उस के लिए दीपचंद के घर आनेजाने की पूरी छूट थी. जब भी मौका मिलता, वह दीपचंद के घर चला जाता और घंटों चंदना के साथ बिताता.

चूंकि चंदना के पिता दीपचंद अध्यापक थे, इसलिए उन का दिन स्कूल में ही बीतता था. बच्चे स्कूल चले जाते थे. चंदना की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी इसलिए वह और उस की मां सुमन घर पर ही रहती थी. सुमन को विवेक के चंदना से मिलने पर कोई ऐतराज नहीं था. वह सोचती थी कि विवेक बहुत सीधासादा और नेकदिल युवक है. वह कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगा, जिस से दोनों परिवारों की बदनामी हो.

विवेक जब भी चंदना के पास बैठता था, उसे दीवानगी भरी नजरों से निहारता था. चंदना को विवेक का ऐसा देखना अच्छा लगता था. उस के मन के भीतर एक अजीब सी गुदगुदी होती थी. धीरेधीरे चंदना भी विवेक को प्यार भरी नजरों से देखने लगी थी.

आंखों के रास्ते दोनों ने एकदूसरे के दिलों में अपना मुकाम बना लिया था. यह भी कह सकते हैं कि दोनों एकदूसरे को अपना दिल दे बैठे थे. जब दिलों की बातें हुईं तो मौका देख कर दोनों ने अपने प्यार का इजहार भी कर लिया. एक हफ्ते बाद विवेक अपने परिवार के साथ घर लौट गया.

विवेक अपने घर तो लौट आया, लेकिन उस का दिल, उस का चैन, उस का करार सब कुछ चंदना के पास रह गया था. चंदना के बगैर विवेक का मन नहीं लग रहा था. वह उस से मिलने के लिए तड़प रहा था. विवेक यही सोच रहा था कि चंदना से कैसे मिले, कैसे बातें करे. उधर चंदना का भी यही हाल था. विवेक के लिए वह तड़प रही थी. चंदना के पास सेलफोन भी नहीं था जो फोन कर के विवेक से बात कर लेती.

मोहब्बत की आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी. दोनों विरह की अग्नि में जल रहे थे. विवेक से जब चंदना की जुदाई बरदाश्त नहीं हुई तो वह मांबाप से झूठ बोल कर नानानानी से मिलने के बहाने बघांव चला आया. बघांव आते हुए रास्ते में उस ने चंदना को उपहार में देने के लिए एक मोबाइल फोन खरीदा. उस ने सोचा कि चंदना के पास सेलफोन होगा तो बात करने में आसानी रहेगी.

ननिहाल जाने के बहाने मिलता था प्रेमिका से

विवेक बघांव पहुंचा तो उसे देख कर नाना रामधनी खुश हुए. उन्हें क्या पता था कि उन का नाती उन से नहीं, अपनी प्रेमिका चंदना से मिलने आया है. नानानानी से मिलना तो एक बहाना था. नानानानी से मिलने के बाद विवेक चंदना से मिलने उस के घर गया.

घर में चंदना और उस की मां ही थीं. विवेक को देखते ही चंदना का चेहरा खिल उठा. वह उसे हसरत भरी नजरों से देखती रही. विवेक से वह कहना तो बहुत कुछ चाहती थी, लेकिन मां के डर की वजह से कुछ नहीं बोल पाई.

मुंह से भले ही न सही पर इशारोंइशारों में दोनों के बीच काफी बातें हुईं. वैसे भी जब दो प्रेमी दिल की गहराई से एकदूसरे को प्यार करते हों तो उन्हें अपनी बात कहने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं होती.

नाश्ता वगैरह करने के बाद विवेक जब घर से निकलने लगा तो चंदना उसे विदा करने कमरे से बाहर आई. तभी उस ने झटके में मोबाइल फोन उस के हाथों में थमा दिया और बोला, ‘‘यह तुम्हारे लिए गिफ्ट है.’’ चंदना ने झट से फोन अपनी समीज के अंदर रख लिया ताकि कोई देख न सके. उस रात विवेक नाना के घर पर ही रुक गया. अगली सुबह वह अपने घर मऊनाथ भंजन लौट आया.

फोन मिल जाने से दोनों के बीच की दूरियां मिट गईं. भले ही वे एकदूसरे की सूरत देख नहीं पा रहे थे, लेकिन प्यार भरी मीठीमीठी बातें कर के अपने दिल को तसल्ली दे लेते थे. एक दिन चंदना की छोटी बहन वंदना ने उसे मोबाइल पर किसी से बात करते सुन लिया.

उस ने जब इस बारे में बहन से पूछा तो वह घबरा गई. उस ने वंदना को इस बारे में किसी से कुछ भी न बताने को कहा तो वह मान गई. वंदना ने वाकई किसी से कुछ नहीं बताया. हां, चंदना ने उसे यह नहीं बताया था कि वह किस से और क्यों बातें करती थी. धीरेधीरे दोनों का प्रेम जवां होता रहा.

वे अपने प्यार को ले कर भविष्य के सुनहरे सपने संजोने लगे. रेत के ढेर पर ख्वाबों का आशियाना बनाने लगे. इसी बीच इन प्रेमियों के साथ एक नई घटना घट गई. पता नहीं दोनों के प्यार को किस की नजर लग गई थी.

अचानक बदल गया चंदना का व्यवहार

विवेक ने महसूस किया कि चंदना अब उसे पहले जैसा प्यार नहीं कर रही है. पता नहीं क्यों वह उस से कटने लगी थी. पहले वह विवेक के फोन की घंटी बजते ही काल रिसीव कर लेती थी, पर अब लगातार फोन की घंटियां बजती रहती थीं. न तो चंदना काल रिसीव करती थी और न ही मिस्ड काल करती थी.

चंदना के इस व्यवहार पर विवेक को गुस्सा आता था. हद तो तब हो गई जब विवेक चंदना को काल करता तो वह अकसर दूसरी काल पर व्यस्त मिलती थी.

विवेक का शक पुख्ता हो गया था कि चंदना का किसी और के साथ संबंध बन चुका है. इसीलिए वह उस से कटीकटी सी रहने लगी है. इस बात को ले कर चंदना और विवेक के बीच विवाद हो गया. विवेक ने उसे बहुत भलाबुरा कहा. उस के बाद चंदना ने विवेक से बात करनी बंद कर दी.

बाद में विवेक ने किसी तरह चंदना को मना लिया और उस से माफी मांग ली. उस ने वादा किया कि अब दोबारा उस से ऐसी गलती नहीं होगी. चंदना से माफी मांग कर विवेक ने एक पैंतरा चला था. उस ने सोच लिया था कि अगर चंदना उस की नहीं हुई तो किसी और की भी नहीं होगी.

इसीलिए उस ने चंदना से माफी मांग कर उसे विश्वास में लिया ताकि कभी बुलाने पर वह उस की बात सुन ले. प्यार में अंधी चंदना को इस बात का तनिक भी भान नहीं था कि विवेक उस के पीठ पीछे क्या षडयंत्र रच रहा है.

विवेक ईर्ष्या की आग में जल रहा था. वह दिनरात इसी सोच में डूबा रहता था कि चंदना उस की नहीं हुई तो किसी और की भी नहीं होगी. आखिर विवेक ने उस की हत्या की योजना बना डाली. योजना बनाने के बाद विवेक बाजार जा कर एक फलदार चाकू खरीद लाया और उसे अपने बैग में छिपा दिया.

16 मार्च की सुबह विवेक मां से नानी के घर जाने को कह कर घर से निकला और बस स्टैंड जा पहुंचा. वहां से वह गाजीपुर जाने वाली एक सरकारी बस में बैठ गया. गाजीपुर पहुंचने के बाद उस ने चंदना को फोन कर के बताया कि वह मिलने आ रहा है. गांव के बाहर लल्लन यादव के खेत के पास पहुंचो, कुछ जरूरी बातें करनी हैं.

विवेक का फोन आने के बाद चंदना मां से खेतों पर जाने की बात कह कर विवेक के बताए स्थान पर जाने के लिए चल दी. चंदना को क्या पता था कि जो उस से मिलने आ रहा है, वह उस का वफादार प्रेमी नहीं बल्कि मौत है.

साढ़े 9 बजे के करीब चंदना लल्लन यादव के खेत पर पहुंच गई. वहां खेत के चारों ओर कोई नहीं था. तब तक विवेक भी वहां पहुंच गया. प्रेमिका को देख कर विवेक हौले से मुसकराया तो चंदना ने भी उसी अंदाज में मुसकरा कर जवाब दिया. फिर चंदना ने उस से बुलाने की वजह पूछी तो विवेक गुस्से से लाल हो गया और उसे भद्दीभद्दी गालियां देते हुए बोला, ‘‘मैं ने तुम्हारे लिए खुद को बरबाद कर दिया. तुम पर पानी की तरह पैसे बहाए. तुम ने बदले में मुझे क्या दिया बेवफाई. मेरे प्यार को ठुकरा कर दूसरों की बाहों में रंगरलियां मना रही हो. ऐसा मैं हरगिज होने नहीं दूंगा. अगर तुम मेरी नहीं हुई तो तुम्हें किसी और की भी होने नहीं दूंगा.’’

विवेक ने किया चाकू से वार

चंदना कुछ समझ पाती, इस से पहले ही विवेक ने बैग से फलदार चाकू निकाला और उस की गरदन पर जोरदार वार कर दिया. चंदना हवा में लहराती हुई जमीन पर जा गिरी. उस के बाद विवेक तब तक उस के पेट और गरदन पर वार करता रहा, जब तक उस के प्राणपखेरू नहीं उड़ गए. चंदना की निर्मम हत्या करने के बाद विवेक उस की लाश घसीटते हुए गेहूं के खेत में ले गया और लाश को ठिकाने लगा कर आराम से घर लौट आया.

विवेक ने जिस चालाकी और सफाई से काम किया था, उसे देख कर उसे लगा था कि पुलिस उस तक कभी नहीं पहुंच सकती. लेकिन पुलिस ने उस की सोच पर पानी फेर दिया. जिस शक की आग में वह जल रहा था, उसी शक की आग ने उसे खाक में मिला दिया.

प्यार का ये मतलब नहीं होता कि किसी की निर्मम तरीके से हत्या कर दे. विवेक अगर समझदारी से काम लेता तो चंदना भी इस दुनिया में सांस ले रही होती. लेकिन एक शक की चिंगारी ने सब कुछ तहसनहस कर दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

शक के कफन में दफन हुआ प्यार : भाग 2

चंदना हत्याकांड की गुत्थी काफी उलझी हुई थी. जांच अधिकारी के लिए यह मामला काफी चुनौतीपूर्ण था. उधर चंदना की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई थी. रिपोर्ट में बताया गया कि उस के साथ दुष्कर्म नहीं हुआ था. उस की मौत का कारण अत्यधिक खून बहना बताया गया था.

थानाप्रभारी शमीम अली ने चंदना हत्याकांड का खुलासा करने के लिए कई मुखबिर लगा दिए थे. इसी बीच जांच के दौरान उन्हें पता चला कि चंदना अपने पास मोबाइल फोन रखती थी और सब से छिपछिपा कर किसी से अकसर बातें करती थी. यह बात वंदना के अलावा कोई नहीं जानता था.

वंदना काफी छोटी थी. थानाप्रभारी शमीम ने सोचा अगर उस से डराधमका कर पूछताछ की गई तो वह डर जाएगी और फिर शायद ही कुछ बता पाए. इसलिए उस से बड़े प्यार और मनोवैज्ञानिक तरीके से बात करनी जरूरी थी. क्या करना है, यह फैसला कर के वह दीपचंद के घर जा पहुंचे.

पुलिस के हत्थे लगा चंदना का मोबाइल फोन

उन्होंने वंदना के सिर पर बड़े प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘वंदना.’’ वंदना ने डरते हुए जवाब दिया.

‘‘किस क्लास में पढ़ती हो?’’

‘‘चौथी क्लास में.’’ उस ने उत्तर दिया.

‘‘क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारी दीदी अपने पास एक मोबाइल रखती थी? वह मोबाइल कहां है?’’

‘‘जी सर, मुझे पता है दीदी अपने पास एक मोबाइल फोन रखती थी. यह भी पता है कि वह उसे कहां छिपा कर रखती थी.’’ वंदना ने कांपते स्वर में उत्तर दिया.

‘‘तो बताओ वह मोबाइल कहां छिपा कर रखती थी?’’ थानाप्रभारी ने बडे़ प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा.

‘‘मैं अभी लाती हूं.’’ वंदना ने जवाब दिया. फिर वह भागती हुई कमरे में गई और बक्से से मोबाइल फोन निकाल कर ले आई. उस ने मोबाइल थानाप्रभारी के हाथों में दे दिया. यह देख कर दीपचंद और उस की पत्नी भौचक्के रह गए. उन्हें पता ही नहीं था कि उन की बेटी उन की नाक के नीचे क्या गुल खिला रही थी. घर वालों को पता ही नहीं था कि छोटी बेटी भी उस के साथ मिली हुई थी. मांबाप माथा पकड़ कर बैठ गए.

‘‘बेटा, क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारी बहन चंदना किस से बात करती थी?’’ जांच अधिकारी ने वंदना से अगला सवाल किया.

‘‘सर, मुझे उस का नाम तो नहीं पता लेकिन मैं इतना जानती हूं कि दीदी छिपछिप कर किसी से बात करती थी. मैं ने उसे कई बार बातें करते हुए देखा था.’’

‘‘ठीक है बेटा, तुम जा सकती हो. इस के आगे का पता मैं खुद लगा लूंगा.’’ उन्होंने कहा और चंदना का मोबाइल फोन ले कर चले गए.

थानाप्रभारी शमीम अली सिद्दीकी के पास हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए मोबाइल ही आखिरी सहारा था. उन्होंने चंदना के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि घटना वाले दिन यानी 16 मार्च की सुबह चंदना के फोन पर साढ़े 9 बजे के करीब आखिरी काल आई थी.

मोबाइल से पहुंची कातिल तक पुलिस

उस के बाद उस का मोबाइल स्विच्ड औफ हो गया था. जिस नंबर से चंदना को आखिरी काल आई थी, उस नंबर के बारे में पता लगाया गया तो पता चला कि वह नंबर मऊनाथ भंजन जिले के मुहम्मदाबाद गोहना थाना क्षेत्र के गांव उमनपुर निवासी विवेक कुमार चौहान का था. उस नंबर पर चंदना की काफी लंबीलंबी बातें होती थीं. पुलिस को यह समझते देर नहीं लगी कि मामला प्रेम प्रसंग का था. इसी प्रेम प्रसंग के चक्कर में उस की हत्या हुई थी.

जांच अधिकारी शमीम अली ने दीपचंद को थाने बुलवा कर विवेक कुमार चौहान के बारे में पूछताछ की तो दीपचंद विवेक का नाम सुन कर चौंक गया. उस ने बताया कि विवेक उस के पड़ोस में रहने वाले रामधनी का नाती है. वह अकसर अपने नानानानी से मिलने ननिहाल आता रहता था. वह जब भी यहां आता था, मेरे घर पर भी सब से मिल कर जरूर जाता था. वह बहुत सीधासादा लड़का है.

काल डिटेल्स के आधार पर विवेक शक के दायरे में आ चुका था. घटना वाले दिन से उस का भी फोन बंद था. लेकिन घटना वाले दिन उस के सेलफोन की लोकेशन घटनास्थल पर ही थी. इसी वजह से विवेक शक के दायरे में आ गया.

19 मार्च, 2018 को थानाप्रभारी शमीम अली गाजीपुर से पुलिस फोर्स ले कर मऊनाथ भंजन पहुंचे. मुहम्मदाबाद गोहना थाने की पुलिस की मदद से उन्होंने उमनपुर स्थित विवेक के घर पर दबिश दी. संयोग से विवेक घर पर ही था. पुलिस उसे हिरासत में ले कर गाजीपुर ले आई. फिर पुलिस ने उसे बहरियाबाद थाने ले जा कर उस से कड़ाई से पूछताछ की.

सख्ती से घबरा कर उस ने सब कुछ बता दिया. अपना जुर्म कबूलते हुए उस ने पुलिस को बताया कि चंदना उस की प्रेमिका थी और उसी ने चाकू से गोद कर उस की हत्या की थी. उस ने यह भी बताया कि उस ने हत्या में प्रयुक्त चाकू छिपा दिया था.

विवेक ने सिलसिलेवार पूरी कहानी बता दी. थानाप्रभारी ने विवेक की निशानदेही पर लल्लन के खेत से चाकू बरामद कर लिया. आरोपी विवेक से पूछताछ के बाद कहानी कुछ इस तरह पता चली.

चंदना विवेक से लड़ा बैठा था नैना

21 वर्षीय चंदना खूबसूरत तो थी ही, ऊपर से चंचल भी थी. चंदना के पड़ोस में रामधनी चौहान का घर था. रामधनी भले ही दीपचंद की जाति के नहीं थे, लेकिन रामधनी के घर से दीपचंद के परिवार जैसे प्रगाढ़ संबंध थे. रामधनी के घर जब भी कोई मेहमान आता था तो दीपचंद उसे बुला कर अपने घर ले आता और जम कर स्वागत करता. दीपचंद के मेहमाननवाजी से मेहमानों का दिल खुश रहता था.

रामधनी की बेटी का एक बेटा था जिस का नाम विवेक कुमार चौहान था. 21-22 वर्षीय विवेक कभीकभार नानानानी के घर बघांव आया करता था. वह मऊनाथ भंजन जिले के उमनपुर गांव में अपने मांबाप के साथ रहता था. उस के पिता का नाम था विजय बहादुर चौहान. वह सरकारी नौकरी में थे. उसी से 5 सदस्यों वाले परिवार का भरणपोषण होता था. विवेक ने स्नातक तक पढ़ाई कर के नौकरी करने का मन बना लिया था.

3 साल पहले यानी सन 2015 में बात तब की है जब विवेक इंटरमीडिएट में पढ़ रहा था. उन्हीं दिनों उस के ननिहाल बघांव में शादी थी. परिवार के साथ विवेक भी बघांव आया था. वहां उसे मामा के घर सप्ताह भर रहना था.

घर वालों के साथ चंदना भी शादी में शामिल हुई. चंदना खूबसूरत तो थी ही, जब वह सफेद रंग के कपड़े पहन लेती थी तो और भी सुंदर लगती थी. उस दिन भी चंदना ने सफेद रंग की पोशाक पहनी थी. इस पोशाक में वह सब से अलग और बहुत खूबसूरत लग रही थी. अचानक उस पर विवेक की नजर पड़ गई तो वह उसे कुछ देर अपलक निहारता रह गया. थोड़ी देर बाद चंदना उस की नजरों के सामने से ओझल हो गई तो उस की आंखें उसे इधरउधर ढूंढने लगीं. लेकिन वह कहीं नहीं दिखी.

बूढ़े मां-बाप को रखना है तनाव से दूर तो उन्हें दिखाएं सिनेमा

कौन नहीं होता सिनेमा का शौकीन. फिल्में केवल मनोरंजन के लिए नहीं होती. बल्कि ये हमें बहुत कुछ सिखाती भी हैं. कई शोधों में ये बात सामने आई है कि जो लोग सिनेमा देखते हैं, ना देखने वालों की तुलना में उनका दिमाग ज्यादा सक्रिय रहता है, उनमें रचनात्मकता अच्छी होती है और मानसिक तौर पर वो ज्यादा स्वस्थ होते हैं. इस खबर में हम आपको सिनेमा से जुड़ा एक रोचक जानकारी देने वाले हैं.

हाल ही में हुए एक अध्ययन में या बात सामने आई कि सिनेमा, थिएटर जैसे माध्यमों से नियमित रूप से संपर्क में रहने वाले बुजुर्ग तनाव से दूर रहते हैं. तनाव एक गंभीर मुद्दा है, जिससे लाखों लोग प्रभावित होते हैं, विशेषकर बुजुर्ग.

शोध में 50 वर्ष से ज्यादा के करीब ढाई सौ लोगों को शामिल किया गया था. इस अध्ययन में ये बात सामने आई कि लोग जो प्रत्येक दो-तीन महीने में फिल्म, नाटक या प्रदर्शनी देखते हैं, उनमें तनाव विकसित होने का जोखिम 32 फीसदी कम होता है, वहीं जो महीने में एक बार जरूर इन सब चीजों का लुत्फ उठाते हैं, उनमें 48 फीसदी से कम जोखिम रहता है.

ब्रिटेन में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, इन सांस्कृतिक गतिविधियों की शक्ति सामाजिक संपर्क, रचनात्मकता, मानसिक उत्तेजना और सौम्य शारीरिक गतिविधि के संयोजन में बेहद लाभकारी है.

जानकारों के मुताबिक, ये सारे माध्यम कई तरह के मानसिक विकारों से लड़ने में हमारी मदद करते हैं. जब आप इन माध्यमों से जुड़ते हैं तो आपके दिमाग को काफी आराम मिलता है. वो रिलैक्स पोजिशन में होता है. खास कर के जो लोग उम्र के एक खास पड़ाव पर खड़े हैं उन्हें जरूरत है कि खुद को तनाव से दूर रखने के लिए इस तरह के माध्यमों का सहारा लें.

मशरूम बौल्स

सामग्री

– 100 ग्राम मशरूम कटी हुई

– थोड़ा सा प्याज बारीक कटा

– थोड़ा सा अदरक व लहसुन कटा

– 10 ग्राम अखरोट

– 2 ब्रैडपीस

– थोड़ी सी धनियापत्ती कटी

– थोड़ा सा फ्लैक्स सीड पाउडर

– थोड़ा सा लालमिर्च पाउडर

– तलने के लिए तेल

– कोटिंग करने के लिए ब्रैडक्रंब्स

– लपेटने के लिए थोड़ा सा बेसन

– नमक स्वादानुसार.

विधि

– ब्रैड को छोड़ कर बाकी सारी सामग्री को ब्लैंडर में ब्लैंड करें.

– फिर ब्रैड को पानी में भिगो कर निचोड़ उसे मिक्स्चर में डालें.

– सारी सामग्री को अच्छी तरह मिक्स कर गोलियां तैयार कर उन्हें ब्रैडक्रम्बस में लपेट कर सुनहरा होने तक तलें और फिर गरमगरम सर्व करें.

कैप्सिकम बोट्स

सामग्री

– 4 छोटी शिमला मिर्च

– 100 ग्राम पनीर

– थोड़े से आलू उबले हुए

– थोड़ा सा प्याज कटा हुआ

– थोड़ा सी लहसुन कटा

– 2 टमाटर कटे

– 15 ग्राम टोमैटो कैचअप

– चुटकीभर लालमिर्च पाउडर

– थोड़ा सी कालीमिर्च पाउडर

– थोड़ा सा अदरक

– 10 ग्राम पिज्जा चीज

– थोड़ा सा तेल

– नमक स्वादानुसार.

विधि

– शिमलामिर्च को 2 भागों में काट लें.

– फिर पनीर को मैश कर उस में थोड़ा प्याज, आलू, अदरक, नमक व कालीमिर्च डाल कर अच्छी तरह मिलाएं.

– इस मिक्स्चर को शिमलामिर्च में भर कर एक तरफ रख दें.

– अब एक पैन में तेल गरम कर उस में प्याज, टमाटर व लहसुन भूनें.

– साथ में नमक, लालमिर्च पाउडर व कालीमिर्च पाउडर भी डालें.

– जब मसाला अच्छी तरह भुन जाए तब इस में टोमैटो कैचअप व थोड़ा पानी डाल कर पकाएं.

– फिर बेकिंग डिश में तैयार बोट्स को रख कर उन के किनारों पर तैयार सौस डालें.

– ऊपर से चीज कद्दूकस करें और फिर तब तक पकाएं जब तक चीज पिघल न जाए.

– गरमगरम सर्व करें.

घाव और दवा : दुनियाभर में धर्म के दलदल से मुक्त होने की कवायद

भारत में सत्ता से जुड़े सभी पार्टियों के लोग भाजपा के कंपीटिशन में धर्म की स्थापना में जुटे दिख रहे हैं, जबकि यूनान से प्रकाश की एक चमचमाती लौ दिखाई दे रही है. एथेंस में एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है जो पुरोहितों और बिशपों की स्थिति सिविल सेवकों के रूप में समाप्त कर देगा और देश को चर्च और राज्य से अलग करने के लिए एक कदम आगे लाएगा.

समझौते के तहत यूनान सरकार ने चर्चों को दिया जाने वाला सरकारी खर्च बंद करने का निर्णय लिया है. पादरियों को मिला सिविल सेवक का दर्जा खत्म होगा. यूनान में चर्च और राज्य के अलग होने का यह पहला कदम है और रास्ता अभी लंबा है. इसे चर्च के नेताओं के साथसाथ सरकार और सांसदों द्वारा अनुमोदित किया जाना है.

यूनान के प्रधानमंत्री एलेक्सिस सिप्रस और आटोसेफर्नियस और्थोडौक्स चर्च के प्रमुख आर्कबिशप आईरोनिमोस के बीच इस संबंध में संयुक्त समझौता हुआ है.

समझौते के अनुसार, चर्च की संपत्तियों, कब्जे और निवेशों का प्रबंधन करने के लिए यूनान राज्य और चर्च एक संयुक्त निधि तैयार करेंगे. इस में मौजूदा चर्च के 10 हजार पादरियों का वेतन शामिल होगा, जो अभी सिविल सेवक पेरोल का हिस्सा हैं. यानी इन का वेतन सरकारी खजाने से जा रहा है.

कई पादरी और नेता प्रधानमंत्री सिप्रस और आर्कबिशप के बीच हुए समझौते की आलोचना कर रहे हैं. यूनानी क्लेरिक्स संघ ने शिकायत की है कि पादरियों की सिविल सेवकों की स्थिति खत्म होने से उन के मौजूदा अधिकार भी समाप्त हो जाएंगे. उन का कहना है कि पुरोहितों को धोखा दिया गया है. इस समझौते के बारे में उन से कोई सलाहमशवरा नहीं किया गया.

दुनिया को लोकतंत्र का पाठ सिखाने वाले यूनान में रूढि़वादी चर्च वहां की सरकार के अनेक हिस्सों में शामिल है. वहां रूढि़वादी चर्च सार्वजनिक जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. स्कूलों में छात्र आज भी प्रार्थना के साथ अपने दिन की शुरुआत करते हैं और 12वीं तक की पढ़ाई में अनिवार्यरूप से धर्म की शिक्षा जारी है. यूनान की अदालतों में न्यायाधीश की सीट के ऊपर एक धार्मिक आइकन लटका रहता है.

चर्च शताब्दियों तक फलतेफूलते रहे हैं. ये रोमन कैथोलिक थे. इन में से ज्यादातर रोम के चर्च से अलग हो गए. सभी ईसाई इस बात से सहमत हैं कि ईसा ने केवल एक ही चर्च की स्थापना की थी पर कई कारणों से ईसाइयों में एकता नहीं रह पाई और उन के बहुत से चर्च व संगठन बन गए. वे एकदूसरे से पूरी तरह स्वतंत्र हैं.

यूरोपीय देशों में राज्य और चर्च के बीच सत्ता को ले कर लंबे समय से जद्दोजेहद चली है. 1517 में लूथर ने कैथोलिक चर्च की बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाई. उन्होंने कुछ परंपरागत ईसाई धर्मसिद्धांतों का विरोध किया. इस में लूथर को जरमन शासकों का संरक्षण भी मिला. बाद में कालविन ने लूथर के सिद्धांतों को विकसित करते हुए एक दूसरे प्रोटेस्टैंट संप्रदाय का प्रवर्तन किया जो स्विट्जरलैंड, स्कौटलैंड, हौलैंड तथा फ्रांस के कुछ भागों में फैला. आखिर में हेनरी अष्टम ने भी इंगलैंड को रोम के अधिकार से अलग कर लिया पर वहां एंग्लिकन चर्च प्रारंभ हो गया.

यूनान ने दुनिया को लोकतंत्र, सभ्यता और धर्मों को आदर देने का विचार दिया. आज की जनतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का प्रारंभ यूनान से होता है.

इतिहासकारों का मानना है कि करीब 4 हजार साल ईसापूर्व यूनान में मानव आबादी बस चुकी थी. यह भी मान्य तथ्य है कि ईसापूर्व 1000-499 में यूनान के नगर देशों की स्थापना हो चुकी थी जहां अनेक राजाओं का शासन चलता था. ईसापूर्व 683 में एथेंस में राजतंत्र समाप्त हो गया और अपने ढंग का जनतंत्र अस्तित्व में आया. बाद में यूनान पर रोम का आधिपत्य हो गया. सन 380 में सम्राट थियोडोसियस के शासन में ईसाई धर्म रोम का राजधर्म बन गया. सन 467 में जब रोमन साम्राज्य का पतन हुआ तब रोम के पतन का कारण ईसाई धर्मावलंबी होना बताया गया.

अब फिर मुसलिम देशों को छोड़ दें तो विश्व के बाकी देशों में धर्म का असर शिक्षा की वजह से कम हो रहा है.

दुनिया में धर्म का रुतबा घट रहा है. नास्तिकों की संख्या बढ़ रही है, क्योंकि वहां लोगों को धर्म, ईश्वर की सचाई समझ आ रही है. लेकिन भारत धर्म, अध्यात्म में अपनी मुक्ति का मार्ग तलाश रहा है. यहां की सरकार देश में वैज्ञानिक, तकनीक ज्ञान को आगे बढ़ाने के बजाय हिंदुत्व के खोखले काल्पनिक सहारे में भविष्य देख रही है. यह मार्ग आगे बढ़ने के बजाय पीछे मध्यकाल के अंधकार की ओर जाता है.

देश में मूर्तियां और मंदिर निर्माण पर पूरी शक्ति खर्च की जा रही है. स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों में वेद, पुराण, गीता, योग, आयुर्वेद अनिवार्य किए जा रहे हैं. इस ज्ञान पर सत्ता प्रतिष्ठान आत्ममुग्ध हो रहा है.

क्या हम हिंदू तालिबान बन रहे हैं? धर्म के सहारे राज करने का सपना देखने वाले अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सीरिया, सूडान के हालात सामने हैं. भारत की जनता को तरक्की, आजादी चाहिए या धर्म की थोपी गुलाम जिंदगी.

कायर (पहला भाग) : विशाल ने अपनी मां के साथ ऐसा क्या होता देखा था

बचपन की एकएक कर उभर रही तमाम घटनाओं ने विशाल के दिलोदिमाग पर बहुत ही गहरा असर छोड़ा था. यही वजह थी कि जब कभी भी वह किसी मर्द को औरत के ऊपर हाथ उठाते हुए देखता था तो उस की रगों में बहता जवान खून खौल जाता था.

बचपन में विशाल ने अपनी मां पर होने वाले बाप के जुल्मों को देखा था और यह उसी का नतीजा था.

विशाल का बाप शराबी था. वह शाम को शराब पी कर ही घर आता था. मां घर के राशनपानी के लिए पैसे मांगती थीं तो बाप गालियां बकने लगता था, पीटने लगता था.

मां को शराबी बाप की पिटाई से बचाने की कोशिश में विशाल कई बार बाप की टांगों से लिपट जाता था. इस पर शराबी बाप उसे दोनों हाथों से उठा कर चारपाई पर पटक देता था.

विशाल को एक ऐसे माहौल में रहने को मजबूर होना पड़ रहा था जहां मर्दों द्वारा औरतों से गालीगलौज और मारपीट करना एक मामूली बात थी.

विशाल के बाप को उस की शराब ही ले डूबी थी. मां भी बहुत ज्यादा दिन जिंदा नहीं रही थीं पर मरने से पहले उन्होंने विशाल को इतना काबिल बना दिया था कि वह दो वक्त की रोटी कमा सके.

पेट पालने के लिए विशाल को कोई ढंग का रोजगार चाहिए था. लिहाजा, गांव को छोड़ वह कामधंधे की तलाश में शहर आ गया था. गांव वाला मकान बेच कर विशाल को इतने पैसे मिल गए थे कि शहर में कामधंधे की तलाश करते हुए वह कुछ दिन अपना गुजारा कर सके.

शहर में विशाल को रहने के लिए जहां किराए की जगह मिली वह एक झुग्गी बस्ती थी. वहां लड़ाईझगड़ा होना आम बात थी. इलाके में रहने वाले ज्यादातर लोग मेहनतमजदूरी कर के

पेट पालते थे. सारा दिन मजदूरी कर के पैसे कमाना और रात को शराब पी कर गालीगलौज और लड़ाईझगड़ा करना वहां के तकरीबन सभी मर्दों की आदत थी.

विशाल को रहने के लिए किराए की जो जगह मिली थी, उस का मालिक रघुनाथ नाम का शख्स था. लोग उसे रघु कह कर पुकारते थे. रघु की उम्र 45 साल थी. वह किराए का आटोरिकशा चलाता था और पक्का शराबी था.

रघु ने अपने मकान का आगे वाला हिस्सा विशाल को किराए पर दिया था. वह कमरा अकेली जान के लिए काफी था. रघु मकान के पिछले वाले हिस्से में रहता था.

मकान के अगले और पिछले वाले हिस्से के बीच में एक आंगन था. आंगन में एक तरफ गुसलखाना और शौचालय बना हुआ था. वहां से कुछ ही दूरी पर पानी का सरकारी नल लगा हुआ था. सुबहशाम उस में एक घंटे के लिए पानी आता था.

रघु की बेहद खूबसूरत और जवान बीवी थी जो उम्र में उस से आधे से भी कम की लगती थी.

रघु की बीवी ने विशाल की जिंदगी में जबरदस्त हलचल पैदा कर दी थी.

रघु की जवान बीवी से विशाल का सीधा आमनासामना किराए की जगह पर आने के 2 दिन बाद उस वक्त हुआ था जब वह सुबह आंगन में लगे हुए नल में से पानी की बालटी भर रहा था. ठीक उसी समय खाली बालटी हाथ में लिए अपने कमरे से बाहर निकल रघु की बीवी भी नल की तरफ आ गई.

वह अभीअभी नींद से जगी लगती थी. उस के बेहिसाब हुस्न और जवानी की दमक किसी बिजली की तरह विशाल के दिल पर गिरी. वह कुछ पल के लिए बुत बन कर रह गया. एकदम से गोरा रंग, तीखे नाकनक्श, खूब भराभरा सा बदन विशाल की रगों में बहता लहू उबलने लगा.

किसी तरह अपनी हालत को काबू में करते हुए विशाल ने अपनी बालटी को नल के नीचे से हटा दिया ताकि वह पहले पानी भर सके.

विशाल के बालटी हटाने पर उसने अपनी खाली बालटी नल के नीचे रख दी और उस के भरने का इंतजार करने लगी. इस बात का फायदा उठाते हुए विशाल उस के रूप और जोबन का रसपान करता रहा.

बालटी जब लबालब भर गई तो वह झुक कर उस को उठाने लगी. वह दुपट्टा नहीं लिए थी इसलिए जब वह पानी से भरी बालटी उठाने के लिए झुकी तो कसे हुए सूट में से उस के उभारों की झलक विशाल पर जैसे सैकड़ों बिजलियां गिरा गईं.

विशाल को उस के चेहरे के भावों से लगा कि बालटी को उठा कर अपने कमरे तक ले जाने में उसे काफी दिक्कत महसूस हो रही थी. उस ने कहा, ‘‘लाइए, मैं छोड़ आता हूं.’’

उस ने इनकार नहीं किया. एक नजर विशाल को देखते हुए उस ने पानी से भरी हुई बालटी विशाल के बढ़े हाथ में थमा दी.

बालटी थामते वक्त विशाल का हाथ उस के हाथ से छू गया. विशाल की रगों में एक सनसनाहट सी फैल गई.

पानी से भरी बालटी उस के कमरे तक पहुंचा कर जब विशाल वापस जाने को हुआ तो वह एकाएक बोली, ‘‘तुम ही शायद नए किराएदार हो. मैं अभी तक तुम्हारा नाम भी नहीं जानती.’’

‘‘विशाल नाम है मेरा.’’

‘‘अच्छा नाम है. शादीशुदा हो?’’

‘‘शादी तो अभी बाद की बात है, फिलहाल तो मैं नौकरी ढूंढ़ रहा हूं,’’ विशाल ने कहा.

‘‘शराब पीते हो?’’ उस ने अटपटा सा सवाल पूछा.

‘‘नहीं, मुझे शराब से नफरत है,’’ विशाल ने जवाब दिया. पहली बार की मुलाकात में ही उस के इतने सवालों से विशाल हैरान था.

‘‘अच्छी बात है. कम से कम शादी के बाद तुम्हारी बीवी को पीटना तो नहीं पड़ेगा,’’ तारा ने ठहाका मार कर हंसते हुए कहा.

विशाल से बातचीत को खत्म करने से पहले रघु की बीवी एक बहाने से उसे अपना नाम बताना नहीं भूली, ‘‘हम दोनों की उम्र में इतना फासला नहीं है कि तुम मुझे आप कह कर बुलाओ. मेरा नाम तारा है. तुम मुझ को मेरा नाम ले कर भी बुला सकते हो,’’ इतना कहने के बाद वह पानी की बालटी उठा कर कमरे के अंदर चली गई.

इस के बाद तैयार हो कर विशाल काम की तलाश में घर से निकला तो उस के खयालों में तारा छाई हुई थी. तारा एक शादीशुदा औरत थी. उस के लिए जैसी भावनाएं विशाल के मन में जन्म ले रही थीं वे एक तरह से गलत थीं. मगर अपनी इन गलत भावनाओं पर विशाल का कोई कंट्रोल नहीं था.

नौकरी तो नहीं मिली, पर बाहर ढाबे पर खाना खा कर घर आने में विशाल को देरी हो गई.

घर का दरवाजा खुला हुआ था. अंदर दाखिल होने के बाद अपने कमरे का ताला खोलने से पहले विशाल ने एक सरसरी नजर आंगन के दूसरी तरफ डाली. वहां कमरे की लाइट जल रही थी और बरतनों की हलकी खनक भी सुनाई दे रही थी.

मकान के बाहर रघु का आटोरिकशा नहीं खड़ा था. इस का मतलब था कि वह अभी घर नहीं आया था.

विशाल में एक अजीब सी बेचैनी भर गई. उसे डर लगने लगा कि खयालों के भटकाव में उस से कहीं कुछ गलत न हो जाए.

लिहाजा विशाल अपने कमरे में आया और अंदर से कुंडी लगा ली.

इस के बाद विशाल चारपाई पर लेट तो गया, मगर नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. न चाहते हुए भी उसका खयाल बारबार तारा की तरफ ही जा रहा था.

नींद विशाल की आंखों से आंखमिचौली खेलती रही. उस रात वह हुआ जिस में एक बार फिर से विशाल में सालों पहले वाले हालात में ला कर खड़ा कर दिया.

उस रात रघु ज्यादा शराब पी कर घर आया था. ज्यादा कमाई होने पर शायद वह ज्यादा शराब पी लेता था.

विशाल ने आटोरिकशा के आने की आवाज सुनी. कुछ देर बाद मकान का दरवाजा भी जोरदार आवाज के साथ बंद हुआ.

विशाल को डर था कि रघु के ज्यादा पी कर आने के नतीजे में कुछ न कुछ अनहोनी होगी.

विशाल का डर गलत नहीं निकला. रात की खामोशी को चीरते हुए पहले ऊंची आवाज में रघु और तारा के बीच तीखी कहासुनी की आवाजें सुनाई दीं. इस के बाद एकाएक ही कहासुनी भारी गालीगलौज और मारपीट में बदल गई. तारा के दर्द से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. साफ था कि रघु उसे पीट रहा था.

विशाल बेचैन हो बिस्तर से उठ बैठा. उस का खून खौल रहा था. बाजुओं की नसें फड़क रही थीं पर वह अपनी बेबसी पर छटपटाता रहा.

सवाल यह था कि वह कैसे और किस हैसियत से पतिपत्नी के मामले में दखल दे सकता था. समाज इस की इजाजत नहीं देता था.

रात के अनुभव से सुबह विशाल का मन खिन्न था. आंखें भी न सोने की वजह से भारी थीं इसलिए नौकरी की तलाश में घर से बाहर निकलने का इरादा उस ने छोड़ दिया.

रात को कसाई की तरह अपनी बीवी को पीटने वाला रघु अपने ठीक समय पर आटोरिकशा ले कर कामधंधे के लिए निकल गया.

विशाल दरवाजा खोल कर अपने कमरे से बाहर आ गया. उस की नजरें आंगन के दूसरी तरफ गईं. वहां कोई दिखाई नहीं दिया.

विशाल कुछ पल कशमकश वाली हालत में रहा और फिर उस के कदम अपनेआप आंगन के दूसरी तरफ जाने के लिए उठ गए.

विशाल को देख कर तारा चौंक गई. बीती रात हुई मारपीट के निशान उस के चेहरे पर साफ देखे जा सकते थे. उस की बाईं आंख के नीचे और ऊपरी होंठ पर सूजन नजर आ रही थी. बाकी जिस्म पर भी मारपीट के निशान जरूर रहे होंगे जो विशाल देख नहीं सकता था.

विशाल खुद को रोक नहीं सका और गुस्से का इजहार करते हुए बोला, ‘‘तुम्हारा मर्द इनसान है या जानवर.

कोई अपनी औरत को इस तरह से पीटता है भला?’’

‘‘तो कैसे पीटता है?’’ तारा ने सवाल किया.

तारा के सवाल का जवाब विशाल को नहीं सूझा और वह बगलें झांकने लगा.

यह देख तारा अजीब तरीके से हंस दी और बोली, ‘‘तुम अभी इस बस्ती में नएनए आए हो इसलिए अजीब लगता होगा. मगर इस बस्ती में सभी मर्द अपनी औरतों को ऐसे ही पीटते हैं. तुम को यहां रहना है तो यह सब देखने की आदत डालनी होगी.’’

‘‘शायद तुम ने भी अपने मर्द के हाथों इस तरह से पिटने की आदत डाल ली है?’’ विशाल ने चुभती हुई आवाज में कहा.

‘‘इस के सिवा मैं कर भी क्या सकती हूं?’’

‘‘ऐसे जानवर को छोड़ क्यों नहीं देतीं?’’

‘‘छोड़ कर मैं कहां ठिकाना करूं? मांबाप ने बेचा था तो इस जानवर के पल्ले पड़ गई. अब इसे छोड़ कर क्या मैं किसी कोठे पर जा कर बैठ जाऊं?’’ तारा का लहजा बड़ा तल्ख था.

‘‘इस तरह की बातें पागलपन हैं. जिंदगी जीने के और भी रास्ते हैं,’’ विशाल ने कहा.

‘‘हमदर्दी जताते के लिए शुक्रिया. बिना किसी मर्द के समाज में एक अकेली और बेसहारा औरत की जिंदगी खुले मैदान में पड़े मांस के टुकड़े से ज्यादा नहीं होती, जिस को हर कोई नोचना चाहेगा.’’

‘‘तुम किसी दूसरे मर्द का हाथ भी तो थाम सकती हो?’’

‘‘जबरदस्ती…? जब तक कोई मेरा हाथ मांगने के लिए अपना हाथ आगे नहीं करेगा तब तक मैं उस का हाथ कैसे मांग सकती हूं? असली जिंदगी और बातों में बड़ा फर्क होता है,’’ तारा बोली.

‘‘एक बार इस नरक की जिंदगी से छुटकारा पाने का इरादा कर लोगी तो कोई न कोई हाथ थामने वाला भी मिल ही जाएगा,’’ विशाल ने कहा.

‘‘तुम थामोगे मेरा हाथ…?’’ तारा

ने पूछा.

‘‘हां, मैं ऐसा कर सकता हूं,’’

जोश में विशाल की जबान से यह बात निकल गई.

‘‘एक बार फिर सोच लो. याद रखो, औरत एक बेल की तरह है. सहारा देने वाले से एक बार लिपट जाए तो आसानी से छोड़ती नहीं,’’ तारा ने जोर दे कर कहा.

‘‘बेल लिपटने की हिम्मत तो दिखाए. सहारा भी कभी उस को छोड़ना नहीं चाहेगा,’’ तारा के गदराए जिस्म पर नजर गड़ाते हुए विशाल ने कहा.

तारा को जैसे यही बात कहने का इंतजार था. वह किसी बेल की तरह विशाल से लिपट गई.

सबकुछ इतना अचानक और तेजी से हुआ कि विशाल हक्काबक्का रह गया.

शादीशुदा होने के बावजूद मर्द के मामले में तारा प्यासी लगती थी. वासना के उफनते ज्वार में जो भूमिका एक मर्द होने के नाते विशाल की बनती उस को एक तरीके से तारा निभा रही थी और उसे बेतहाशा चूम रही थी.

कुछ पलों में ही तारा ने जैसे अपने जिस्म की सारी गरमी और प्यार विशाल की रगों में उतारने की कोशिश की.

जब ज्वार उतरा तो उस की आंखों में कोई पछतावा नहीं था बल्कि उस की जगह जीने की एक नई उमंग थी, कुछ सपने थे.

विशाल के लिए तारा का जिस्म पाना एक तिलिस्म जैसा था. तारा ने उस तिलिस्म को एक झटके में ही खोल दिया था. सबकुछ इतना जल्दी हो गया था कि विशाल हैरान था.

तारा के साथ गहराते रिश्तों के बीच विशाल को बहुत सी बातें जानने को मिलीं. कुछ महल्ले के लोगों से तो कुछ तारा की जबानी.

(क्रमश:)

क्या विशाल ने तारा का साथ जिंदगीभर निभाया? क्या तारा रघु से छुटकारा पा सकी? पढि़ए अगले अंक में…

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