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रिफ्रैशिंग औरेंज जूस मौकटेल

सामग्री

– 30 एमएल औरेंज जूस

– 15 एमएल सोडा

– 5 एमएल लैमन जूस

– 15 ग्राम वैनिला आइसक्रीम

– 4-5 आइस क्यूब्स

– सजाने के लिए थोड़ी सी पुदीना पत्ती कटी.

विधि

– ब्लैंडर में औरेंज जूस, सोडा, लैमन जूस और आइसक्रीम डाल कर ब्लैंड करें.

– आइस क्यूब्स व पुदीना पत्ती से सजा कर सर्व करें.

ऐप्पल आइस टी

सामग्री

– 30 एमएल ऐप्पल जूस

– 20 एमएल ब्लैक टी

– 10 एमएल शुगर सीरप

– थोड़े से ऐप्पल कटे

– 10 एमएल लैमन जूस

– गार्निशिंग के लिए पुदीना पत्ती कटी

– 4-5 आइस क्यूब्स

– गार्निशिंग के लिए एक नीबू व ऐप्पल का टुकड़ा.

विधि

– ऐप्पल जूस, ब्लैक टी, शुगर सीरप व लैमन जूस को मिक्स कर उस में आइस क्यूब्स व ऐप्पल के टुकड़े डालें.

– फिर मिश्रण को एक लंबे गिलास में डालें.

– नीबू व ऐप्पल के टुकड़े और पुदीना पत्ती से सजा कर सर्व करें.

  • व्यंजन सहयोग: रुचिता कपूर जुनेजा

राख हुए सपने : मानसी के सपने कैसे निगल गया मुजम्मिल

15अक्तूबर, 2018 की दोपहर के करीब ढाई बजे मुंबई के मार्गों और बाजारों में अच्छीभली भीड़ थी. उसी वक्त मुंबई के अंधेरी इलाके के मिल्लत नगर से एक ओला कैब निकली, जिस में एक युवक बैठा था. 19-20 साल का वह युवक घबराया हुआ सा लग रहा था. उस ने कैब सांताक्रुज एयरपोर्ट के लिए बुक कराई थी, लेकिन वहां जाने के बजाय वह जोगेश्वरी, गोरेगांव और मलाड की सड़कों पर घूमता रहा. आखिर में उस ने मलाड के ‘माइंडस्पेस’ के सामने कैब रुकवाई.

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उस ने ड्राइवर को यह कह कर बिल चुकता कर दिया कि वह माइंडस्पेश में बैठ कर दोस्त का इंतजार करेगा और फिर दोनों आटोरिक्शा से एयरपोर्ट जाएंगे. उस युवक का सूटकेस डिक्की में रखा था. उस ने ड्राइवर को कह कर अपना सूटकेस निकलवाया, जो काफी भारी था. करीब 3 साल से कैब चला रहे ड्राइवर ने महसूस किया कि सूटकेस में उस युवक के वजन से भी ज्यादा वजन है.

किराए के पैसे ले कर ड्राइवर आगे बढ़ गया, लेकिन लगभग 500 मीटर जाते ही उस के दिमाग को झटका लगा. टैक्सी में आए युवक के उसे न तो हावभाव सामान्य लगे और न ही एयरपोर्ट के लिए कैब बुक कर के इधरउधर भटकना. साथ में भारी वजन का सूटकेस और माइंडस्पेस के सामने मैंग्रोव की झाडि़यों के पास उतरना. सब कुछ संदिग्ध लग रहा था. कुछ गड़बड़ लगी तो कैब ड्राइवर यू टर्न ले कर वापस आया. लेकिन तब तक वह युवक सूटकेस मैंग्रोव की झाडि़यों में फेंक कर जा चुका था.

कैब ड्राइवर ने 4-5 लोगों को बुला कर सारी बात बताई और पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर दिया. मलाड का वह इलाका थाना बांगुर नगर में आता था. कंट्रोल रूम से यह खबर उच्चाधिकारियों और थाना बांगुर नगर थाने को दे दी गई. गश्त पर निकली थाने की पुलिस जिप्सी को तत्काल वहां पहुंचने को कहा गया.

सूचना पा कर थाना बांगुर नगर के थाना इंचार्ज विजय वाने ने ड्यूटी अफसर से इस मामले को डायरी में दर्ज करने को कहा और इंसपेक्टर अरविंद चंदन शिवे, सबइंसपेक्टर विनीत कदम, दिलीप काले, सिपाही राजू जाधव और संतोष देसाई को साथ ले कर मौके पर पहुंच गए. उन्होंने टैक्सी ड्राइवर से मोटीमोटी बातें पूछने के बाद सूटकेस को मैंग्रोव की झाडि़यों से बाहर निकलवाया.

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सूटकेस में निकला सनसनी का सामान

पुलिस ने वहां मौजूद लोगों की उपस्थिति में सूटकेस को खुलवाया तो सभी हैरान रह गए. सूटकेस में एक युवती की लाश थी. करीब 20-21 साल की वह युवती देखने में काफी सुंदर थी और अच्छे परिवार की लग रही थी. कपड़े भी उस ने ब्रांडेड पहन रखे थे.

मृतका के सिर पर गहरा घाव था, जिस से साफ पता चल रहा था कि उस के सिर पर किसी भारी चीज से वार किया गया था. उस के गले पर भी गोलाई में डार्क कलर का निशान था, जिसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे गले में रस्सी डाल कर खींची गई हो.

थानाप्रभारी विजय वाने ने शव का निरीक्षण किया और लाश को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया. सूटकेस और रस्सी को पुलिस ने जाब्ते की काररवाई में शामिल कर लिया. काररवाई निपटा कर पुलिस थाने लौट आई.

कैब ड्राइवर को पुलिस अपने साथ ले आई थी. उस से डीसीपी संग्राम सिंह निशानदार के समक्ष पूछताछ की गई. पूछताछ के बाद डीसीपी संग्राम सिंह निशानदार ने इस मामले की जांच इंसपेक्टर अरविंद चंदन शिवे को सौंप दी.

इंसपेक्टर अरविंद चंदन शिवे ने सीनियर अधिकारियों के निर्देश पर केस की जांच के लिए एक पुलिस टीम गठित की, जिस में उन्होंने असिस्टेंट इंसपेक्टर विनीत कदम, दिलीप काले, सिपाही राजू जाधव और संतोष देसाई को शामिल किया गया.

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पुलिस टीम के सामने सब से बड़ी चुनौती यह थी कि मुंबई जैसे महानगर में हत्यारे को कहां और कैसे खोजे, जबकि अभी तक यह ही पता नहीं था कि मृतक युवती रहती कहां थी और उस का नाम क्या था? इस काम में कैब ड्राइवर मदद कर सकता था, इसलिए पुलिस ने उसे साथ रखा.

स्कौटलैंड के बाद दूसरे नंबर पर आने वाली मुंबई पुलिस ने इस मर्डर मिस्ट्री को ओला कंपनी के बुकिंग नंबर और मौकाएवारदात से मिले सीसीटीवी कैमरों की फुटेज के आधार पर 4 घंटों में सुलझा लिया. ओला को बुकिंग नंबर से हत्यारे का पता और फोन नंबर मिल गए थे, जिस से पुलिस को उस तक पहुंचने में कोई परेशानी नहीं हुई.

पुलिस टीम ने जिस समय अभियुक्त के घर पर छापा मारा, उस समय वह घर के अंदर अकेला था और अपने गुनाह के साक्ष्यों को मिटाने की कोशिश कर रहा था. पुलिस टीम ने उस घर को सील कर के उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया. घटनास्थल से सबूत जुटा कर पुलिस उसे अपने साथ थाने ले आई. पूछताछ में उस ने अपना नाम मुजम्मिल इब्राहिम सईद बताया और मृतका का नाम मानसी दीक्षित.

इस के पहले कि पुलिस पूछताछ के लिए अभियुक्त को रिमांड पर ले पाती, यह खबर मीडिया में लीक हो गई. इस के बाद तो इलैक्ट्रौनिक और सोशल मीडिया ने इस खबर को देश भर में फैला दिया.

घर वाले पहुंचे मुंबई

मानसी दीक्षित के घर वालों ने जब यह खबर टीवी पर देखी तो उन के होश उड़ गए. उस के घर में कोहराम मच गया. मानसी दीक्षित राजस्थान के कोटा शहर की स्टेशन रोड पर स्थित मंगलायन अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 602 की रहने वाली थी.

उस के पिता का नाम ऋषि दीक्षित था, जो कोटा के रेलवे वर्कशाप में सर्विस करते थे. उन के परिवार में पत्नी पद्मा के अलावा 2 बेटियां थीं. बड़ी बेटी का नाम दीक्षा था और छोटी का नाम मानसी.

जैसेतैसे खुद को संभाल कर मानसी के घर वाले मुंबई के लिए रवाना हो गए. ऋषि दीक्षित की दोनों बेटियां पढ़ाईलिखाई में होशियार और महत्त्वाकांक्षी थीं. ऋषि दीक्षित दोनों बेटियों को पढ़ालिखा कर अच्छा जीवन देना चाहते थे. उन की मृत्यु के बाद उन का यह सपना उन की पत्नी पद्मा दीक्षित ने पूरा किया. बड़ी बेटी दीक्षा को उन के ही विभाग के डीआरएम औफिस में नौकरी मिल गई थी. जबकि छोटी बेटी मानसी दीक्षित कई साल के संघर्ष के बाद उस मुकाम पर पहुंची, जो उस के सपनों में था.

मानसी बचपन से ही मौडलिंग और फिल्मों की दीवानी थी. जब कभी वह किसी मैगजीन या विज्ञापनों में किसी मौडल की तसवीर देखती तो उस की आंखों में भी वैसे ही सपने तैरने लगते थे. उस की मां ब्यूटीशियन होने के नाते मानसी के मन और सपनों को आसानी से जान लेती थीं. उन्हें जब भी मौका मिलता, मानसी को अपने साथ पार्लर ले जातीं. बेटी को वह सुंदरता के सारे गुण सिखाया करती थीं.

शुरू हुई मानसी के सपनों की उड़ान

मां का सहयोग पा कर मानसी ने पूरी तरह अपना ध्यान मौडलिंग और फिल्मों की तरफ लगा दिया था. वह अपने स्कूल से ले कर कालेजों तक वहां होने वाले हर छोटेबड़े कल्चरल प्रोग्रामों में भाग लेती रही.

कालेज की पढ़ाई खत्म होने के बाद मानसी पूरी तरह से मौडलिंग और बौलीवुड में कूद गई. उस ने फेसबुक और इंस्टाग्राम पर अपनी काफी तसवीरें डाल रखी थीं. मानसी ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल में बैकग्राउंड इमेज लगाई थी, जिस में उस ने लिखा था— आई एम मी यानी मैं, मैं हूं. यह तुम कभी नहीं हो सकते.

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जाहिर है मानसी ने यह शब्द किसी को चैलेंज करने के लिए लिखा था. यह बात 4 साल पहले की थी, जब वह महज 16 साल की थी. सोशल मीडिया में मानसी की एक से बढ़ कर एक ग्लैमरस तसवीरें पड़ी थीं.

मिस कोटा की हैसियत से मानसी को मौडलिंग के छोटेमोटे काम भी मिलने लगे थे. लेकिन मानसी इस से खुश नहीं थी. उस का सपना मौडलिंग और बौलीवुड में ऊंचे स्थान तक जाने का था. उस का यह सपना मुंबई में ही पूरा हो सकता था.

बहरहाल, मार्च 2018 में मानसी का मुंबई में रहने का सपना भी पूरा हो गया. उसे मुंबई की एक प्राइवेट कंपनी ए.के. टावर्स फाइनैंस ने बुलाया था. मुंबई में मानसी ने अंधेरी के शास्त्रीनगर में किराए का एक कमरा ले लिया और वहीं रहने लगी. खाली समय में मानसी सोशल मीडिया में बिजी रहती थी.

मानसी दीक्षित एक खूबसूरत, कमसिन और बोल्ड युवती थी. शायद यही वजह थी कि मुंबई के ग्लैमरस वर्ल्ड ने उसे हाथोंहाथ लिया. मौडलिंग, टीवी सीरियल, क्राइम पेट्रोल और कई म्यूजिक एलबमों के साथसाथ उसे बौलीवुड की शार्ट फिल्मों में भी काम मिलना शुरू हो गया.

मानसी की खूबसूरती और बोल्डनैस उस की सफलता का राज थे. वह कई धारावाहिकों और एलबमों में नजर आई और यही वजह शायद उस की हत्या का कारण बनी.

उस की मौत के बाद पुलिस ने जब उस का सोशल मीडिया एकाउंट खंगाला तो कई चौंका देने वाली बातें सामने आईं. पता चला कि इसी साल वह यूएई और थाईलैंड की सैर कर चुकी थी. अपने फेसबुक पेज पर उस ने एक जगह लिखा था, ‘मैं जब लोगों की जिंदगी से जाती हूं तो अपना निशान छोड़ जाती हूं. अच्छा हो या बुरा, कम से कम मुझे हमेशा याद तो रखेंगे.’

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इस के साथ ही वह अपनी कमियां भी स्वीकार करती थी. उस ने अपने एक पुराने पोस्ट के लिए क्षमा मांगी थी और लिखा भी था, ‘मैं तुम्हारी तरह परफेक्ट नहीं हूं. मुझ में भी कमियां हैं. मुझे जिंदगी से अभी बहुत कुछ सीखना है लेकिन मैं अपने जीवन, अपने सफर का आनंद ले रही हूं. जीवन ने जो दिया, उसे स्वीकार कर रही हूं और भगवान की बहुत शुक्रगुजार हूं.’

इस से यह बात साफ थी कि मानसी एक खुले दिमाग की दिलखुश युवती थी. उसे दोस्ती करना और दोस्तों के साथ घूमनेफिरने, मस्ती करने में मजा आता था. साथ ही उसे अपने कैरियर से भी लगाव था. वह अपने परिवार से बहुत प्यार करती थी और उस की अहमियत भी अच्छी तरह समझती थी.

जहां एक तरफ मानसी अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी, वहीं दूसरी तरफ मुजम्मिल इब्राहिम सईद के रूप में एक नाग उसे निगलने के लिए तैयार बैठा था.

19 वर्षीय मुजम्मिल इब्राहिम सईद हैदराबाद का रहने वाला था. उस के पिता सिराजु हसन सईद काफी समय पहले मर्चेंट नेवी में इंजीनियर थे. वहां से रिटायर होने के बाद उन्होंने मुंबई के जोगेश्वरी इलाके में मिल्लतनगर स्थित अल अहद इमारत की दूसरी मंजिल पर एक फ्लैट खरीद लिया था. अपने परिवार के साथ वह इसी फ्लैट में रहते थे.

सिराजु हसन का संबंध हैदराबाद के एक रईस खानदान से था. इस खानदान की काफी बड़ी हवेली और जमीनें थीं. मुजम्मिल परिवार का एकलौता बेटा था, जिसे बड़े लाडप्यार से पाला गया था. सिराजु हसन उसे पढ़ालिखा कर अपनी तरह इंजीनियर बनाना चाहते थे. जबकि मुजम्मिल की पढ़ाईलिखाई में कोई रुचि नहीं थी.

परेशान हो कर सिराजु ने 5वीं कक्षा के बाद उसे आगे पढ़ने के लिए हैदराबाद में रह रहीं उस की नानी के पास भेज दिया. नानी की छत्रछाया में रह कर वह अपना ग्रैजुएशन पूरा कर पाता, इस के पहले ही उस के सिर से नानी का साया उठ गया.

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सोशल मीडिया के माध्यम से मिले मुजम्मिल और मानसी

मानसी दीक्षित की तरह ही मुजम्मिल इब्राहिम भी सोशल मीडिया और बौलीवुड का दीवाना था. फेसबुक के माध्यम से उस ने जब मौडल मानसी को देखा तो उस के दिल में हलचल मचने लगी. उस ने मानसी से नजदीकियां बढ़ाने और दोस्ती के लिए अपना एक बढि़या प्रोफाइल तैयार कर के फेसबुक और इंस्टाग्राम पर डाल दिया. साथ ही मानसी को फ्रेंड रिक्वेस्ट भी भेज दी. मानसी उस से प्रभावित हो गई और उस ने मुजम्मिल की दोस्ती स्वीकार कर ली.

सोशल मीडिया पर काफी समय तक दोनों की दोस्ती चलती रही. मुजम्मिल ने मानसी से खुद को मौडलिंग में कामयाब युवक बताया था. सोशल मीडिया पर जब दोनों की दोस्ती गहरा गई तो वह अपनी मां के साथ घूमने के बहाने मुंबई आ गया और अपने एक कौमन दोस्त के साथ मानसी से मिला.

इस के बाद जबतब दोनों मिलने लगे. कभी किसी रेस्तरां तो कभी किसी बिजनैस सेंटर पर इस बीच दोनों एकदूसरे से काफी घुलमिल गए थे.

घटना के दिन 11 बजे जब मां अपनी एक सहेली से मिलने घर से बाहर गई तो मुजम्मिल ने मानसी को एक मौडलिंग कंपनी के लिए फोटो शूट करने के बहाने अपने फ्लैट पर बुला लिया. जब मानसी उस के फ्लैट पर पहुंची तो मुजम्मिल ने इधरउधर की बातों के बाद उस के साथ सैक्स की इच्छा जताई और उस से अश्लील हरकतें करने लगा. मानसी ने इस सब का जम कर विरोध किया.

जब वह फ्लैट से बाहर निकलने के लिए दरवाजे की तरफ बढ़ी तो मुजम्मिल ने डर कर पास पड़ा स्टूल उठा कर मानसी के सिर पर दे मारा, जिस से उस के सिर से खून बहने लगा. वह बेहोश हो कर फर्श पर गिर पड़ी. एक पल के लिए तो मुजम्मिल के दिल में मानसी के प्रति हमदर्दी जागी.

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वह मानसी को होश में लाने के लिए उस के मुंह पर पानी के छींटे मारने लगा. लेकिन जब मानसी को होश आने लगा तो उस के मन में बुरेबुरे खयाल खलबली मचाने लगे. उस ने सोचा कि मानसी अगर पुलिस के पास चली गई तो वह कहीं का नहीं रहेगा. पुलिस, जेल और हथकड़ी की कल्पना करते हुए उस ने एक खतरनाक फैसला ले लिया. अपने आप को बचाने के लिए वह घर के अंदर रखी कपड़े सुखाने वाली रस्सी ले आया और उस से मानसी का गला घोंट दिया.

सहेली के घर गई उस की मां कभी भी लौट कर आ सकती थीं. इस के पहले कि मां घर आएं, मुजम्मिल ने घर में रखे ट्रैवल सूटकेस में रस्सी सहित मानसी की लाश डाल दी और ठिकाने लगाने के लिए सांताकु्रज एयरपोर्ट जाने के लिए ओला कंपनी की एक कैब बुक कर ली. कैब आ गई तो उस ने ड्राइवर की मदद से ट्रैवल सूटकेस को कैब की डिक्की में रखवा लिया. फिर वह ओला कैब में बैठ कर सांताक्रुज एयरपोर्ट जाने के बजाए किसी सुनसान जगह तलाशने लगा.

कुछ समय इधरउधर भटकने के बाद उसे मलाड स्थित माइंडस्पेस के सामने वह जगह मिल गई. सूटकेस को वहां ठिकाने लगाने के बाद वह अपने घर लौट आया. घर आ कर उस ने फर्श पर फैले मानसी के खून की साफसफाई कर दी.

गिराफ्तारी के बाद पूछताछ में मुजम्मिल पुलिस को सहयोग नहीं कर रहा था. वह अपने आप को निर्दोष बता कर बारबार अपना बयान बदल रहा था. लेकिन जब पुलिस ने थोड़ी सख्ती दिखाई तो वह टूट गया और उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया.

विस्तृत पूछताछ के बाद जांच अधिकारी इंसपेक्टर अरविंद चंदन शिवे ने उस के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर के उसे न्यायिक हिरासत में आर्थर रोड जेल भेज दिया.   ?

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कायर (आखिरी भाग) : तारा और विशाल के बीच ऐसा क्या हुआ

पिछले अंक में आप ने पढ़ा था:

विशाल का बाप शराबी था. वह उस की मां को रोज पीटता था. विशाल को उस से नफरत हो गई थी. मांबाप के मरने के बाद विशाल रोजगार के लिए शहर आ गया और किराए पर रहने लगा. उस का मकान मालिक रघु अधेड़ उम्र का था, जो अपनी कमउम्र पत्नी तारा को जानवरों की तरह पीटता था. तारा की बेबसी देख कर विशाल उस का हमदर्द बन गया. धीरेधीरे तारा उस की ओर खिंचने लगी. कुछ दिनों बाद उन में संबंध बन गए.

अब पढ़िए आगे…

महल्ले के लोग रघु के बारे में अच्छी राय नहीं रखते थे. वे उसे मुंह लगाना भी पसंद नहीं करते थे.

तारा को रघु ने जोरजबरदस्ती और पैसे के दम पर हासिल किया था. तारा की मानें तो रघु से पैसे ले कर उस के गरीब मांबाप ने उसे रघु के हवाले कर दिया था. शादी की रस्में तो कहने को निभाई गई थीं.

तारा के साथ जिस्मानी रिश्ता बनाने के बाद जब कोई परदा नहीं रहा तो विशाल ने उस के जिस्म पर मारपीट के निशान देखे.

‘‘यह इनसान तो मेरी उम्मीद से भी ज्यादा वहशी है. कब तक तुम यह सब सहती रहोगी?’’ विशाल ने पूछा.

‘‘जब तक मेरा नसीब चाहेगा,’’ एक ठंडी सांस भरते हुए तारा ने कहा.

‘‘नसीब को बदला भी जा सकता है,’’ विशाल बोला.

‘‘अगर सचमुच ऐसा हो सकता है तो बिना देरी किए अभी मेरा हाथ थामो और यहां से कहीं दूर ले चलो,’’ उम्मीद भरी नजरों से विशाल को देखते हुए तारा ने कहा.

‘‘नहीं, अभी सही समय नहीं है. इस के लिए थोड़ा इंतजार करना होगा… जब तक मेरा कहीं और ठिकाना नहीं बन जाता,’’ विशाल बोला.

‘‘ठीक है, मैं तब तक इंतजार करूंगी. एक बात का ध्यान रखना कि मेरी बरदाश्त की हद हो सकती है, मगर रघु के वहशीपन और जुल्म की कोई हद नहीं है,’’ तारा की बात में एक किस्म की मायूसी थी.

‘‘मैं वह हद नहीं आने दूंगा. उस से पहले ही मैं तुम को इस नरक से निकाल दूंगा,’’ विशाल ने भरोसा दिया.

‘‘उम्मीद नहीं है कि मेरे साथ धोखा नहीं होगा,’’ तारा बोली. जाल में फड़फड़ाते पक्षी के समान वह जल्दी से इस जाल को काट कर उड़ने को बेचैन थी.

इस में जरा भी शक नहीं कि एक औरत के रूप में तारा ने विशाल को जितना दिया था उस से ज्यादा कोई भी औरत किसी मर्द को नहीं दे सकती थी.

लेकिन विशाल की सोच एकाएक मतलबी हो चली थी. एक आम मर्द की तरह वह भी सोचने लगा था कि तारा अब तक उस को जो दे चुकी थी स्थायी रिश्ते में उस से ज्यादा क्या दे सकती थी? इनसानी हमदर्दी वाली सोच पर वासना हावी होने लगी थी.

औरत को जिस्मानी तौर पर हासिल करने के बाद अकसर कई मर्दों को यह लगने लगता है कि औरत के पास अब उस को देने के लिए कुछ खास नहीं रहा.

इसी बीच न जाने कैसे अचानक रघु को इन दोनों के संबंधों को ले कर शक होने लगा. शक्की मर्द अकसर बेहद बेरहम हो जाता है, लेकिन रघु बेरहमी के मामले में पहले ही जानवर था. उस ने तारा पर जुल्मों की हद कर दी.

मगर यह क्या… तारा की रौंगटे खड़े कर देने वाली चीखों को सुन कर विशाल की रगों में बहते खून का खौलना एकाएक बंद हो गया था.

खून के ठंडेपन से विशाल खुद भी हैरान था. इस सब के पीछे कहीं न कहीं विशाल के अंदर की कायरता थी. वह सच का सामना करने से घबरा रहा था. हालात का यही तकाजा था कि वह तारा को ले कर जल्दी ही कोई फैसला करे.

एक दिन सुबहसवेरे काम पर जाने से पहले रघु ने विशाल को एक हफ्ते के अंदर जगह खाली करने का हुक्म दे दिया, ‘‘7 दिन के अंदर शराफत से जगह खाली कर देना, वरना सामान उठा कर बाहर फेंक दूंगा.’’

रघु की धमकी वाली जबान विशाल को अखरी, फिर भी कड़वा घूंट पी कर वह खामोश रहा. वैसे देखा जाए तो विशाल वहां से भागने की तैयारी कर रहा था, चुपके से चोरों की तरह.

7 दिन में जगह खाली करने वाली बात तारा को शायद मालूम नहीं थी. मगर रघु के इतना कह कर जाने के कुछ देर बाद ही तारा विशाल के कमरे में

आ गई. वह बहुत ही टूटी हुई नजर आ रही थी.

‘‘अब मुझ से और बरदाश्त नहीं होता. मैं पता नहीं क्या कर बैठूंगी? देखो, जालिम ने इस बार मुझ पर कैसा सितम ढाया है,’’ यह कहने के बाद तारा ने ब्लाउज को हटा कर अपने बदन पर जलती बीड़ी से दागने के निशान विशाल को दिखाए.

उन निशानों को देख एक बार तो विशाल भी कांप गया.

‘‘क्या इतना सब देखने के बाद भी तुम मुझ को अभी इंतजार करने के लिए ही कहोगे?’’ तारा ने पूछा.

विशाल से जवाब देते नहीं बना. तारा ने जैसे सीधे उस की मर्दानगी पर ही सवाल उठाया था.

‘‘नहीं, अब तुम को ज्यादा इंतजार नहीं करना होगा. मैं जल्दी ही तुम को इस नरक से निकाल कर कहीं दूर ले जाऊंगा,’’ सूखे होंठों पर जबान फेरते हुए विशाल ने कहा.

‘‘आज तुम्हारे शब्दों में पहले वाली आग नहीं रही है. फिर भी मेरे पास इस के सिवा कोई चारा नहीं कि मैं तुम्हारी बात पर यकीन करूं. वैसे भी मेरी हालत बेल जैसी है. सहारा गया तो खत्म,’’ तारा ने अजीब हंसी हंसते हुए कहा.

‘‘तुम को मुझ पर बने अपने भरोसे को कायम रखना चाहिए.’’

‘‘इसी की कोशिश कर रही हूं, मगर मेरी बरदाश्त की एक हद है और इस हद के टूटने से मैं कब क्या कर बैठूंगी, मैं खुद नहीं जानती,’’ इतना कहने के बाद तारा चली गई.

तारा के तेवर विशाल को हैरानी में डालने वाले थे. पहले कभी तारा ने ऐसे अंदाज में बात नहीं की थी.

विशाल को महसूस भी हुआ कि वह कायर था, औरत पर जुल्म होता देख उस की रगों में उबलने वाला खून बासी कढ़ी में आए उबाल से ज्यादा नहीं था. हकीकत का सामना करने की उस में हिम्मत नहीं थी. तारा के प्रति हमदर्दी के पीछे कहीं वासना की वह चाशनी थी जिस का स्वाद चखने के बाद विशाल की सोच में बहुत बदलाव आ गया था.

विशाल यह बात भी नजरअंदाज नहीं कर सकता था कि तारा दुनिया की नजरों में एक शादीशुदा औरत थी. उस के साथ विशाल के संबंध दुनिया की नजरों में गलत थे. उस पर रघु भी एक खतरनाक इनसान था. उस से दुश्मनी मोल लेने की विशाल में हिम्मत नहीं थी.

रघु विशाल को एक हफ्ते के अंदर कमरा खाली करने की चेतावनी दे चुका था. रघु और विशाल के बीच कोई लेनदेन नहीं रह गया था. जगह का किराया वह महीने के शुरू में ही रघु को दे चुका था.

सामान के नाम पर विशाल के पास भारीभरकम कुछ भी नहीं था. वह किसी भी समय जगह खाली करने के लिए आजाद था.

रात के वक्त चुपचाप ही अपनी जगह को छोड़ने से बेहतर रास्ता विशाल को नजर नहीं आ रहा था. दिन के उजाले में तारा कभी भी उस को आसानी से जाने नहीं देती.

आखिर रघु द्वारा दी गई समय सीमा के खत्म होने से पहले ही एक रात को विशाल ने खामोशी से अपना सामान बांधा और चोरों की तरह वहां से निकल जाने का फैसला किया.

पर आधी रात के समय इस से पहले कि विशाल चोरों की तरह अपना सामान उठा कर वहां से निकल पाता एकाएक तारा दरवाजे पर आ कर खड़ी हो गई.

तारा को देख विशाल सकते में आ गया. उस की चोर जैसी हालत हो गई. इस से पहले कि वह कुछ कह पाता, तारा ने एक नजर बंधे हुए सामान पर डाली और फिर उस की तरफ देखने लगी

तारा की खामोश आंखों में कई सवालों के रूप में एक आग सी धधक रही थी. उस आग ने विशाल को डरा दिया.

एकाएक तारा अजीब ढंग से हंसी और बोली, ‘‘मैं तुम्हारे भरोसे किस हद से गुजर गई और तुम एक मर्द हो कर भी इस तरह रात के अंधेरे में चोरों की तरह भाग रहे हो. मैं हैरान भी हूं और सदमे में भी हूं. आखिर मैं ने तुम्हारे जैसे कायर मर्द पर भरोसा कैसे कर लिया?

‘‘मगर, अब पछताने का कोई मतलब नहीं. मैं इतनी आगे बढ़ आई हूं कि वापसी के सभी रास्ते बंद हो चुके हैं.

‘‘तुम जैसे भी हो, मेरी किस्मत अब तुम्हारे साथ ही बंध गई है. मेरा हाथ पकड़ो और सुबह होने से पहले यहां से कहीं दूर निकल चलो. इस बात को तुम दिमाग से निकाल दो कि मैं तुम्हें अकेला यहां से जाने दूंगी.’’

तारा के लहजे में खुली धमकी थी जिस ने विशाल को चौंका दिया.

‘‘तुम्हें गलतफहमी हो गई है. मैं इस समय कहीं नहीं जा रहा हूं, तुम को भी इस तरह इस वक्त मेरे कमरे में नहीं आना चाहिए था. रघु को इस बात का पता चल गया तो हम दोनों के लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी.’’

‘‘एक औरत से प्यार भी करते हो और इस तरह डरते भी हो. तुम मुझ को एक खूबसूरत जिंदगी का सपना दिखा कर कायर हो गए और मैं तुम्हारे भरोसे क्या से क्या बन गई? झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं.

‘‘मैं जानती हूं कि तुम चुपचाप यहां से भागने की तैयारी में थे. लेकिन अब मुझे साथ लिए बगैर तुम ऐसा नहीं कर सकोगे. मैं ने तुम से पहले ही कहा था कि औरत एक बेल की तरह होती है. लिपट जाए तो आसानी से छोड़ती नहीं.

‘‘रही बात रघु की, उस से डरने वाली कोई बात नहीं. वह यहां नहीं आएगा और न ही हमें जाने से रोकेगा. मुरदे कभी जागते नहीं,’’ तारा ने ठंडी आवाज में कहा.

‘‘क्या मतलब…?’’ विशाल के शरीर को जैसे बिजली का तार छू गया.

‘‘मतलब यह कि मैं ने उस जानवर को मौत के घाट उतार दिया है. जो खुद को मेरा पति कहता था और मुझ को इस का जरा भी अफसोस नहीं,’’ तारा की आवाज पहले की तरह ही बर्फ की सिल जैसी ठंडी थी.

विशाल के सिर पर जैसे कोई बम फूटा, वह हैरान सा तारा को देख रहा था.

सामने खड़ी तारा को देख कर विशाल को कायर होने का एहसास हो रहा था.

अब तो डरना जरूरी है

देश के शहरों में बढ़ता प्रदूषण घरों के लिए बड़ी आफत बन रहा है. बाहर व घर के कामों के बोझ से पहले से ही दबी औरतों को प्रदूषण के कारण पैदा होने वाली बीमारियों व गंद दोनों से जूझना पड़ रहा है.

दिल्ली जैसे शहर में अब कपड़े सुखाना तक मुश्किल हो गया है, क्योंकि चमकती धूप दुर्लभ हो गई है और साल के कुछ दिनों तक ही रह गई है.

इस का मतलब है कि गीले कपड़े सीले रह जाते हैं और बीमारियां व बदबू पैदा करते हैं. घरों के फर्श मैले हो रहे हैं, परदों के रंग फीके पड़ रहे हैं, घरों के बाग मुरझा रहे हैं और फूल हो ही नहीं रहे.

प्रदूषण के कारण अस्पतालों और डाक्टरों के चक्कर लग रहे हैं. जीवन में से हंसी लुप्त हो रही है क्योंकि हर समय उदासी भरी उमस छाई रहती है, जो मानसिक बीमारियों को भी जन्म दे रही है.

छोटे घरों में अब और कठिनाइयां होने लगी हैं क्योंकि बाहर निकल कर साफ हवा में सांस लेना असंभव हो गया है और घर के अंदर धूप न होने की वजह से हर समय एक बदबू सी छाई रहती है.

सरकारें हमेशा की तरह आखिरी समय पर जागती हैं, जब दुश्मन दरवाजे पर आ खड़ा हो. दुनिया के बहुत शहरों ने प्रदूषण का मुकाबला किया है और इस के उदाहरण भी मौजूद हैं.

यह दुनिया में पहली बार नहीं हो रहा है पर हमारी सरकारें तो केवल आज की और अब की चिंता करती हैं. बाबूओं और नेताओं को तो अपना पैसा बनाने और जनता को चूसने की लगी रहती है. उन्हें प्रदूषण जैसी फालतू चीज से कोई मतलब नहीं है.

दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों को प्रदूषण से आजादी दिलाना कोई असंभव काम नहीं है. जरूरत सिर्फ थोड़ी समझदारी की है.

जनता पहले लगे नियंत्रणों पर चाहे चूंचूं करे पर उसे जल्दी ही लाभ समझ आ जाता है. मुंबई के मुकाबले दिल्ली में हौर्न कम बजते हैं तो इसलिए कि यहां के लोगों को समझ आ गई है कि ट्रैफिक है तो हौर्न से तो कम नहीं होगा. छोटे शहरों में हर वाहन पींपीं करता रहता है क्योंकि इस में ईंधन न के बराबर लगता है.

प्रदूषण से बचाने के लिए जो तरीके अपनाए जाएंगे उन का तुरंत फायदा तो उसी को मिलेगा जो अपना रहा है. लोगों ने चूल्हों की जगह गैस इस्तेमाल की और धुंआ कम हो गया. क्या कानून बनाना पड़ा? नहीं, सुविधा जो थी.

अब सरकार का तो इतना काम है कि प्रदूषण से बचने के लिए शहरी इलाकों में से अपने दफ्तर हटा कर वहां बाग बना दे. उस के दफ्तर तो 50-60 मील दूर जा सकते हैं. पर वह तो पेड़ों से भरे इलाकों में सरकारी कर्मचारियों के लिए दड़बेनुमा मकान बनाना चाहती है जहां न कोई पेड़ बचा रहे न नया लग पाए.

सरकार कारखानों को बंद करा रही है पर न छूट दे रही है न सहायता. यदि पैसे नहीं दे सकते तो 5-7 साल के लिए टैक्स ही हटा दे, लोग खुद फैक्ट्री खाली कर देंगे और वहां घर बना देंगे. सरकार सोचती है कि जनता को प्रदूषण की चिंता ही नहीं है.

सड़कों पर वाहन कम करने के लिए सरकार ऊंची बिल्डिंगें बनने दे. उन पर आनाकानी न करे. पर छूट एक हाथ से दे कर दूसरे से न ले. अगर ऊपर घर व नीचे दफ्तर, दुकानें होंगी तो लोग बिना वाहन के रह सकेंगे.

लोग खुद अपने घरों और बच्चों की सेहत के लिए ऐसी जगह रहना चाहेंगे जहां कम प्रदूषण हो. पर जब तक सरकारी सांप, अजगर, सांड खुले फिरते रहेंगे तो भूल जाइए कि कुछ होगा.

वापस जीतें हमसफर का विश्वास

किसी भी रिश्ते की डोर विश्वास के धागों पर टिकी होती हैं. अगर किसी भी रिश्ते में जाने-अंजाने भरोसा टूट जाएं तो उस भरोसे को दुबारा वापस पाना बहुत कठिन है. रिश्ते को आगे बढ़ाने के लिए उसमें भरोसे की सबसे ज्यादा जरूरत है.

अगर आपने अपने साथी का भरोसा तोड़ा है तो उसे वापस पाने के लिए बहुत सी बातों को ध्यान रखने की जरूरत होती है. ऐसे में आप अपने साथी से बात करें और उन्हें विश्वास दिलाएं तो यह भरोसा दोबारा जीता जा सकता है. पर इसके लिए आप दोनों को बराबर कोशिश करने की जरूरत है.

खुद को माफ करें– अपने पार्टनर से मांफी मांगने से पहले आपको खुद को माफ करने की जरूरत है क्योंकि जब तक आप अपनी गलती को मांफ नहीं करेंगे तब तक कोई भी उसे माफ नहीं कर पाएगा. किसी भी रिश्ते में विश्वास लाने से पहले आपको खुद पर विश्वास करने की ज्यादा जरूरत होती है. अपनी गलती को माने और कोशिश करें कि आगे भविष्य में इस गलती को ना दोहराएं और अपने साथी को भी दुख ना दें.

अपनी भावनाओं को व्यक्त करें – सबसे पहले आपको अपने साथी के सामने इस बात को मान लेनी चाहिए कि आपने उसके विश्वास तोड़कर गलती की है ताकि उसे इस बात का एहसास हो कि आपको अपनी गलती का पछतावा है. फिर इसके बाद अपनी भावनाओं को जाहिर करें. ये सारी बातें आपके पार्टनर को प्रभावित कर सकती है और आप वापस उनका विश्वास हासिल कर सकते हैं.

अपनी जिंदगी से जुड़ें हर बात को शेयर करें – अगर आप अपने पार्टनर का भरोसा दोबारा जितना चाहते हैं तो उसके लिए आपको अपने जिंदगी से जुड़े हर बात के बारे में अपने साथी को बताना चाहिए ताकि उसे आपके ऊपर किसी प्रकार का संदेह ना रहें. अपने बीच कोई प्राइवेसी ना रखें. इससे आपका साथी शायद इस बात को समझ पाएगा की आप आगे भविष्य में उसके साथ कुछ गलत नहीं करेंगे और ना ही धोखा देंगे.

मांफी मांगें- आपको अपने रिश्ते में विश्वास वापस लाने के लिए अपने पार्टनर से मांफी मांगने की जरूरत होती है. अपने साथी को इस बात का विश्वास दिलाएं कि जो भी गलती आपसे हुई. वैसे आगे भविष्य में नहीं होगी.

भूलकर भी न कहें शर्मीले व्यक्ति से ये 4 बातें

शर्मीले इंसान को समझना थोड़ा मुश्किल होता है. ऐसे इंसान से बात करने से पहले ज्यादा सोचने की जरूरत होती है क्योंकि ऐसे में समझ नहीं आता है कि उनसे क्या बात की जाए. शांत और शर्मीले इंसान के मन की बात को पता लगाना बहुत मुश्किल होता है. इसलिए उनसे बात करते वक्त बहुत सी बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है.

आइए जानते हैं कौन सी ऐसी बातें होती हैं जिनका ध्यान रखना जरूरी है.

आंखों में देखकर बात करो – शर्मीले लोग आंखों में देखकर बात नहीं करते हैं. अगर आपको ऐसा लग रहा है कि आप जिस इंसान से बात करने कि कोशिश कर रहें हैं वह आपकी आंखों में देखकर बात नहीं कर पा रहा है, तो आपको उन्हें इस बात को अकेले में उसे समझाना चाहिए. ऐसे में  किसी इंसान को बुरा महसूस कराने के बजाय आपको इनसे बात करनी चाहिए, शायद आपको वह अपने इस झिझक की वजह बता पाएं.

आप बहुत शांत हैं – किसी भी शर्मीले इंसान को ये बात नहीं बोलनी चाहिए कि वह बहुत शांत है. ऐसे लोगों के पास बोलने को बहुत कुछ होता है, लेकिन वे सही समय का इंतजार करते हैं. एक शर्मिला व्यक्ति उस किताब की तरह होता है जो कई पन्ने खुलने के बाद दिलचस्प होता जाता है.

तेज क्यों नहीं बोलते –  शर्मीले इंसान को अगर आप यह बात बोलते हैं कि वह जोर से क्यों नहीं बोलते तो वह खुद के प्रति अधिक सचेत हो जाते हैं. इसलिए जब तक आप इस बात को लेकर निश्चित नहीं हो जाते कि सामने वाला क्या बोल रहा है,  तब तक आपको उन्हें कोई ऐसी बात या सुझाव नहीं देनी चाहिए जो उनके व्यवहार के अनुकूल हो.

आप मिलनसार नहीं हैं – शर्मीले लोग भी सामाजिक होना चाहते हैं और लोगों से बात करना चाहते हैं, लेकिन इसकी शुरूआत कैसे करें उन्हें पता नहीं चल पाता है. अगर आपको लगता है कि आप किसी ऐसे इंसान को जानते हैं जो ऐसी किसी परेशानी से जूझ रहा हो, तो आपको उनसे अकेले में बात करने की जरूरत है. आपको उन्हें इस बात का एहसास नहीं दिलाना चाहिए कि वह मिलनसार नहीं हैं या उन्हें लोगों से बात करने में दिलचस्पी नहीं है.

अपने बाल विवाह के खिलाफ लड़ी लंबी जंग

देश में भले ही शिक्षा के स्तर में कितना ही सुधार क्यों न हुआ हो, लेकिन कुप्रथाएं आज भी शिक्षा पर भारी पड़ रही हैं. लोग सामाजिक कुप्रथाओं को छोड़ने का नाम नहीं ले रहे. हरियाणा की रहने वाली शशि नाम की एक लड़की को ऐसी ही एक कुप्रथा से निकलने के लिए कई सालों तक लड़ाई लड़नी पड़ी. इस के लिए समाज ने उस के परिवार के साथ जो सुलूक किया, वह भी निंदनीय था.

बात हरियाणा के जिला करनाल की है. यहीं की रहने वाली शशि के चाचा की किसी वजह से शादी नहीं हो पा रही थी. उत्तर प्रदेश के एक गांव से चाचा की शादी की बात चली, लेकिन होने वाली चाची के घर वालों ने शशि के पिता के सामने एक शर्त रख दी.

शर्त यह थी कि होने वाली चाची के भाई से शशि की शादी की जाए. आंचलिक बोलचाल की भाषा में इस समझौते को आंटा-सांटा कहते हैं. उस समय शशि केवल 8 साल की थी. शशि के पिता यह शर्त मानने को तैयार हो गए और सन 2008 में उस का बाल विवाह कर दिया. उस का गौना बाद में होना तय हुआ.

शशि अब से 10 साल पहले उस समझौते के मायने नहीं जानती थी. लेकिन जैसेजैसे वह बड़ी होती गई तो समझ गई कि उस का विवाह हो चुका है. स्कूल में पढ़ाई के दौरान शशि ने बाल विवाह के बारे में पढ़ा. चूंकि खुद शशि का बाल विवाह हो चुका था, इसलिए वह इस कुरीति से नफरत करने लगी.

शशि ने तय कर लिया कि जब उस का गौना होगा तो वह अपनी ससुराल नहीं जाएगी. उस ने ऐसा ही किया. ससुराल पक्ष के लोग जब उसे बुलाने आए तो उस ने साफ कह दिया कि वह बाल विवाह को नहीं मानती और न ही उन के साथ जाएगी. पिता ने भी बेटी का साथ दिया.

बात माहेल्ले में फैली तो मोहल्ले वालों ने शशि के पिता पर शशि को ससुराल भेजने का दबाव बनाया लेकिन पिता ने किसी की बात नहीं मानी. उन्होंने कह दिया कि बेटी को वह जबरदस्ती नहीं भेजेंगे. मामला तूल पकड़ गया तो पंचायत हुई. शशि और उस के पिता ने पंचायत की बात भी नहीं मानी.

उन पर कई तरह के दबाव भी डाले गए. डरायाधमकाया गया. चाची को उस के मायके वाले यह कह कर ले गए कि जब तक शशि को नहीं भेजोगे, तब तक वह भी अपने मायके में रहेगी.

इस के बाद पंचायत ने शशि के पिता को परिवार सहित समाज से बेदखल कर दिया और लोगों ने उन की जमीन तक हड़प ली. इस के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. शशि लगभग 17 साल की हो चुकी थी. वह बचपन में हुई शादी से कानूनी छुटकारा पाना चाहती थी.

मार्च, 2017 में शशि ने पिता के साथ जा कर महिला संरक्षण एवं बाल विवाह निषेध अधिकारी रजनी गुप्ता को शिकायत दी. रजनी गुप्ता ने शशि के ससुराल वालों को बुला कर समझाया, लेकिन वह नहीं माने.

इस के बाद शशि ने अपने पिता के सहयोग से मई, 2017 में शादी तुड़वाने के लिए कोर्ट में केस दायर कर दिया. करीब 14 महीने की लड़ाई के बाद 16 जुलाई, 2018 को कोर्ट ने बाल विवाह मानते हुए शशि की शादी रद्द कर दी, जिस के बाद शशि ने बड़ी राहत महसूस की.

शशि अब बालिग हो चुकी थी. इस के बाद पिता ने उस के लिए उपयुक्त लड़का देखना शुरू किया. बेटी की मरजी से उन्होंने लवपाल नाम के युवक से उस का विवाह कर दिया. उस की शादी में मोहल्ले वालों के साथ उस के कुनबे वाले भी शामिल नहीं हुए. शादी में केवल पिता, दादी और एक चाची ही शरीक हुई.

शशि अब अपनी ससुराल में खुश है. उस के द्वारा कुप्रथा के खिलाफ लड़ी जंग को अब भले ही हर कोई सराह रहा है. लेकिन उस का पिता क्या करे, जिस की सारी जमीन लोगों ने हथिया ली थी.

मंजिल (भाग-8): कैसा चलने लगा पुरवा का जीवन

रात बहुत हो चुकी थी पर सुहास का कहीं पता नहीं था. दुकान पर फोन करने से पता चला कि आज 7 बजे ही सुहास कहीं चला गया था.

मांपापा भी बहुत चिंतित थे, कम से कम फोन ही किया होता. मां ने पुरवा को बच्चे का वास्ता दे कर जबरन खाना खिला दिया था.

पापा बारबार कह रहे थे, ‘‘बहुत ही लापरवाह होता जा रहा है.’’

पुरवा के मन में भी उथलपुथल थी. प्रतीक्षा करतेकरते ही उस की आंख लग गईं. रात 11 बजे के बाद सुहास आया तो मां व पापा ने प्रश्नों की बौछार कर दी. पुरवा कमरे में थी पर ऊंची आवाज से उस की नींद टूट गई. मन ही मन में विचित्र सी शंका उसे भयभीत करने लगी. वह कौन से कारण अब जन्म ले रहे हैं जिन की वजह से यहां के शांत वातावरण में अकसर भूचाल सा आने लगा है.

सुहास जब कमरे में आया तो पुरवा के कुछ पूछने से पहले ही बोला, ‘‘अब तुम भी मत शुरू हो जाना. मैं कोई डिस्को करने नहीं गया था, न दोस्तों के साथ जुआ खेलने और शराब पीने गया था.’’

‘‘मुझे मालूम है,’’ पुरवा ने सीधा उस की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘खाना लगाऊं?’’

सुहास ने पलंग पर बैठते हुए जूते और मोजे इधरउधर उछाल दिए और थके हुए स्वर में बोला, ‘‘तुम ने खाया या नहीं?’’

‘‘मां बिना खाए रहने कहां देती हैं, उन का पोता भूखा नहीं रहना चाहिए,’’ पुरवा ने उस की उदासी दूर करने के विचार से मुसकरा दिया, पर सुहास उलझन में था. बोला, ‘‘कुछ थोड़ा सा यहीं ला दो, बाहर जाने का मतलब है फिर से भाषण सुनना.’’

पुरवा ने चकित दृष्टि से उसे देखा. ऐसी भाषा मां व पापा के लिए कब से सीख ली सुहास ने. धीरे से बोली, ‘‘एक फोन कर देते तो कोई चिंता नहीं होती किसी को.’’

‘‘फोन करने का समय कहां था. अरे इतना समय तो मिला नहीं कि बेला भाभी को फोन कर के भाई साहब का हाल पूछ लूं. बेचारी ने फोन पर बताया था कि भाई साहब को डाक्टर अलसर बता रहे हैं. शायद अस्पताल में भर्ती करना पड़े.’’

पुरवा ने केवल सुना, पर बोली कुछ नहीं. बेला के यहां भी कुछ न कुछ घटता ही रहता है और हर बार सुहास की अपनी कोई समस्या तो है ही नहीं, पर सुहास का बेला के साथ अस्पतालों के चक्कर में बीतता है.

कैसा विरोधाभास है सुहास के स्वभाव का यह. अपने भविष्य की चिंता है न वर्तमान की पर दूसरों के लिए आधी रात तक भूखाप्यासा दौड़ता रह सकता है. कई बार सोचती है पुरवा, कहीं इस मनोविज्ञान के पीछे प्रशंसा पाने की तड़प तो नहीं है?

खाना खाते समय सुहास ने बताया, ‘‘हमारी दुकान के सामने ही राकेशजी की बहुत बड़ी दुकान है. आज वह शाम 7 बजे ही दुकान से निकले कहीं शादी में जाने को, पर दुकान से बाहर पैर रखते ही बेहोश हो कर गिर पड़े. सब दौड़े, पर वे बेहोशी में थे और उन्हें पसीने छूट रहे थे. अब तुम्हीं बताओ, उन्हें ले कर अस्पताल जाना, उन के घर वालों को बुलाना, डाक्टर से जांचपड़ताल कराना, कैसे बीच में आ जाता. उन्हें तो दिल का दौरा पड़ा था.’’

पुरवा ने सुहास के बालों में हाथ फेरा. उस की यही भावना कहीं पुरवा को गर्व से भी भर देती है पर हर बात की अति प्राय: दुखदायी लगने लगती है. पुरवा को भी कभीकभी इसी भावना से जूझना पड़ता है, धीरे से बोली, ‘‘तुम अपनी जगह सही हो सुहास, पर वे मांबाप हैं, जिन्हें बचपन से ही आदत है तुम्हारे लिए परेशान हो जाने की. तुम्हें उन का दिल भी नहीं दुखाना चाहिए था.’’

‘‘शायद तुम ठीक कह रही हो, पर मैं थक भी तो जाता हूं.’’

पुरवा ने सुहास के बालों में उंगलियां उलझाते हुए कहा, ‘‘यही तो बात है सुहास, तुम्हें अब अपने बारे में भी सोचना चाहिए. अपना स्वास्थ्य, अपना काम और आने वाली जिम्मेदारी के बारे में.’’

‘‘सोचूंगा, इस समय तो मैं बस, अपने बारे में यही सोच पा रहा हूं कि कैसे झटपट सो जाऊं.’’

पुरवा ने मुसकरा कर बत्ती बुझा दी और बोली, ‘‘ठीक है, अब सुबह बात करेंगे.’’

सुबह चाय पर सुहास ने मां व पापा से क्षमा मांग ली और पूरी घटना भी विस्तार से सुना दी. मां ने भी तब पुरवा की तरह यही कहा, ‘‘तुम्हें अपने और काम के बारे में भी गंभीरता से सोचना चाहिए. आखिर बीवी व बच्चे की जिम्मेदारी कोई हंसीखेल तो नहीं है.’’

चाय का दौर चल ही रहा था तभी नौकर ने आ कर बताया कि कोई प्रभात बाबू आए हैं. पुरवा उत्साह से बोली, ‘‘उन्हें ड्राइंगरूम में बैठाओ, अभी हम लोग भी आ रहे हैं,’’ फिर सब की तरफ देख कर बोली, ‘‘वह मेरा शिष्य है. पापा ने उसे सहायता कर के रेडीमेड कपड़ों का व्यापार शुरू करवाया था. आंखें नहीं हैं पर लगन बहुत है उस में.’’

यह सुन कर मां व पापा के चेहरे पर उत्साह सा छा गया लेकिन सुहास चुपचाप सैंडविच और दलिया खाता रहा. जब पुरवा ने सब से प्रभात का परिचय करवाया, तो मांपापा बहुत ही प्रसन्न हुए. सुहास ने उस के हाथों में अपनी हथेली रख दी तो प्रभात ने तुरंत उस के पैर छू लिए फिर बारीबारी मां व पापा के भी छुए. उस की विनम्रता सभी के दिलों को छू रही थी. सुहास ने कहा, ‘‘पुरवा आप की बहुत प्रशंसा करती रही है. बस, मिलने का अवसर ही नहीं मिला.’’

‘‘मुझे ही मिलने आने में देर हो गई, जीजाजी,’’ प्रभात ने कहा.

सुहास को इस संबोधन की आदत नहीं थी, इसलिए बहुत ही अच्छा लगा. पुरवा का भाई अभी तक भारत नहीं लौटा था और साला होते हुए भी सुहास इस प्रिय संबंध के बारे में नहीं जानता था.

बातोंबातों में ही प्रभात ने कहा, ‘‘जीजाजी, आप का व्यापार कैसा चल रहा है?’’ सुहास इस प्रश्न पर अचकचा गया, फिर भी मन को संयत कर के कहा, ‘‘ठीक चल रहा है, लेकिन मेरी पसंद का नहीं है,’’ सुहास ने कहने के साथ ही चोर दृष्टि से सब को देख लिया.

‘‘ऐसा होता है, जीजाजी, पर मन को उखड़ने मत दीजिएगा. कोशिश कर के पुराने के साथ ही अपनी पसंद का भी जमाइए,’’ प्रभात ने सादगी से कहा.

‘‘एक काम संभल जाए यही बहुत है, एकसाथ 2 काम करना तो बहुत मुश्किल है,’’ सुहास ने कह तो दिया पर तुरंत ही उसे लगा कि उस ने कुछ गलत कह दिया है. विशेष कर उस व्यक्ति के सामने जो आंखें न होते हुए भी अच्छा- भला व्यापार चला रहा है.

‘‘जीजाजी, कोई भी कार्य बिना परिश्रम के पूरा नहीं होता है,’’  प्रभात ने तुरंत ही कहा. और यह व्यापार की दुनिया तो बहुत ही परिश्रम मांगती है, नहीं तो कुछ दिन में पता चलता है कि हम तो बहुत पिछड़ गए हैं…फिर बाजार से गायब होने में कुछ देर नहीं लगती है.’’

मां व पापा पूरी तन्मयता से प्रभात को सुन रहे थे. उन की आंखों में अनोखी सी चमक थी, पर सुहास के चेहरे पर हताशा के भाव थे. प्रभात के जाने के उपरांत पापा ने अचानक कहा, ‘‘वह मूषक कथा पढ़ी है तुम ने?’’ पापा सुहास को संबोधित कर रहे थे.

‘‘पढ़ी होगी, याद नहीं,’’ सुहास ने उखड़े हुए स्वर में कहा.

‘‘उस कहानी का नायक एक मरे हुए चूहे से व्यापार करने का वादा कर के महाजन से उसे उधार ले जाता है. एक दिन वह सचमुच अपने आत्मबल से बहुत बड़ा व्यापारी बन जाता है.’’

‘‘बन गया होगा, मुझे क्यों सुना रहे हैं,’’ सुहास के चेहरे पर कई भाव तीव्रता से आजा रहे थे. बीचबीच में वह पुरवा को भी क्रोध से देख लेता था.

पापा ने गरदन हिला कर दुख के भाव व्यक्त किए और फिर धीरे से कहा, ‘‘प्रभात को देख कर यह कहानी याद आ गई. आंखों के बिना ही इतना उत्साही युवक,’’ कुछ रुक कर फिर बोले, ‘‘उस ने ठीक ही कहा, सुहास. बाजार में बने रहने के लिए बहुत परिश्रम की जरूरत होती है.’’

सुहास अचानक उठ कर कमरे में चला गया तो मां ने भी दुख से कहा, ‘‘कोई बात इसे समझ में ही नहीं आती है. जाने क्या करने वाला है.’’

पता नहीं थकान थी या दुर्बलता, पुरवा की तबीयत खराब हो गई थी. पापा ने सुहास से कहा था, ‘‘अपनी जिम्मे- दारियां खुद उठाना सीखो. पुरवा को बराबर डाक्टर के पास ले जाना है और उस के खानेपीने और आराम का ध्यान भी तुम्हें ही रखना है.’’

हालांकि पापा के कहने के बाद भी अधिकतर मां को ही पुरवा का पूरा ध्यान रखना पड़ता था. कभीकभी ही सुहास उसे ले कर डाक्टर के पास जा पाता था. पुरवा का रक्तचाप भी अधिक हो जाता था और यह गर्भवती महिला के लिए ठीक नहीं था. एक दिन सुहास के बहुत देर से घर आने पर पुरवा ने कहा, ‘‘सुहास, घर के मरीज का कोई महत्त्व नहीं होता है न. अभी बेला भाभी या और कोई बीमार होता तो तुम उन के लिए भागते हुए नहीं थकते.’’

सुहास ने चौंक कर उसे देखा. बोला, ‘‘यह क्या ऊटपटांग बोल रही हो. तुम से अधिक और किसी की चिंता क्यों होगी मुझे,’’ पुरवा ने कुछ कहा नहीं तो फिर कुछ खीजे से स्वर में बोला, ‘‘और ये बेला भाभी कहां से बीच में आ गईं. अगर मैं भी कहूं कि वह तुम्हारा प्रभात यहां क्या करने आया था. सब की नजरों में मुझे गिराने के लिए ही उसे बुलाया था न?’’

पुरवा कुछ पल चकित सी उसे देखती रही और कुछ व्यथित हो बोली, ‘‘सुहास, उसे मैं ने बुलाया नहीं था, वह तो तुम से मिलने आया था. विवाह पर नहीं आ सका था इसीलिए मिलना चाहता था.’’

‘‘लोग मिलने आते हैं पर शिक्षा देने लगते हैं,’’ सुहास अपने मन की ग्रंथि धीरेधीरे खोल रहा था.

पुरवा को लगा कि धीरेधीरे उस का एक नए सुहास से परिचय हो रहा है. या शायद उस ने स्वयं ही सुहास को पहले समझने की चेष्टा नहीं की. इस ईर्ष्यालु और गैरजिम्मेदार सुहास से तो उस का नयानया परिचय हो रहा है. पुरवा को चुप रहना ही ठीक लगा. सुहास लगातार अपने मन की भड़ास निकाल रहा था. पुरवा के मन में तूफान उठ रहा था और सिर में भयंकर पीड़ा होने लगी थी. जाने क्या हुआ कि पुरवा एकदम ही बेसुध हो गई. सुहास ने घबरा कर मां को बुलाया और शीघ्र ही डाक्टर को बुला लिया गया. पुरवा का ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया था, अत: तुरंत ही उसे अस्पताल ले जाना पड़ा.

सुहास मन ही मन एक अपराधभाव से घिर गया. सोचता रहा, कहीं मेरी बकबक से ही पुरवा का यह हाल तो नहीं हो गया है?

कुछ घंटों के बाद पुरवा के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा. सुहास ने एकांत देखते ही पुरवा के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘सौरी, पुरु, मैं सचमुच बहुत ही गैर- जिम्मेदार प्राणी हूं.’’

पुरवा में बोलने का साहस नहीं था. पलकें खोल कर सुहास को कुछ पल निहारा और अपनी हथेली बढ़ा कर धीरे से उस के अधरों पर रख दी. जाने कब सुहास ने अपने परिचितों को अस्पताल में होने की सूचना दे दी, एकएक कर के सभी आने लगे.

शाम को बेला भी आ गई, पर वह अकेली थी. आते ही बोली, ‘‘यह क्या पुरवा, तुम्हें जब डाक्टर ने पूरा आराम बताया है तो जरा भी लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए.’’

पुरवा चुपचाप देखती रही. मन में सोचा, ‘क्यों, अस्पतालों में तुम सब के लिए भागने को सुहास खाली नहीं है इसलिए मुझे अपना ध्यान खुद ही रखना चाहिए.’ अभी उस की सोच पूरी भी नहीं हुई थी कि एक धमाका और हुआ, बेला बोली, ‘‘कुछ दिन से सागर भी बहुत बीमार रहने लगे हैं. उस दिन सुहास उन्हें ले कर अस्पताल जाते हुए यही कह रहे थे कि पुरवा को भी जल्दीजल्दी अस्पताल ले जाना पड़ता है.’’

पुरवा के मन में विचित्र सी हलचल थी, फिर भी हंस कर कहा, ‘‘क्या हुआ है भाई साहब को?’’

‘‘क्या बताऊं,’’ बेला ने गहरी सांस भर कर कहा, ‘‘पक्का तो पता नहीं, टेस्ट चल रहे हैं, पर पथरी का शक है डाक्टर को.’’

‘‘आप को इस तरह उन्हें अकेला छोड़ कर यहां नहीं आना चाहिए था, भाभीजी,’’ जाने कैसे पुरवा कह गई.

‘‘अब यह कैसे हो सकता है पुरवा, आखिर तुम भी तो अपनी हो.’’

बेला ने साधिकार प्यार जताया, पर न जाने क्यों पुरवा को उस प्यार में तनिक भी ऊष्मा की अनुभूति नहीं हुई. कुछ समय से न जाने क्यों उसे ऐसे तमाम रिश्तों में स्वार्थ और दिखावा ही अधिक दिखाई देने लगा है. बिस्तर पर पड़ेपड़े वह ऐसी अनेक बातों में ही उलझी रहती है. कभी सुहास का अत्यधिक गैर- जिम्मेदाराना व्यवहार उस के मन को कचोटने लगता है. तब वह प्रभात को याद करने लगती है. एक व्यक्ति आंखों से देख नहीं सकता, पर अपने उत्तरदायित्वों को ले कर कितना सतर्क रहता है. कुछ कर दिखाने का उस का प्रबल दृष्टिकोण किसी के लिए भी प्रेरणा बन सकता है.

उसे याद आता है कि जब वह पहली बार सुहास से मिली थी तब उसे वह भी एक उत्साही युवक प्रतीत हुआ था, जो नौकरी खोज रहा था और हर किसी के काम आने को आतुर रहता था. तब उसे लगा था कि सुहास बहुत संवेदनशील व्यक्ति है. किसी का दुख वह देख नहीं पाता, पर अब उसे बारबार लगता है कि उस की सोच गलत थी. सुहास जीवन की सचाइयों से कतराना चाहता है, इसीलिए समाज सेवा का भार ढो कर व्यस्तता की आड़ लेता है.

पुरवा का ध्यान अचानक भंग हो गया. बेला उस से पूछ रही थी, ‘‘क्या देवरजी कंप्यूटर का काम शुरू करने जा रहे हैं?’’

पुरवा ने चौंकते हुए कहा, ‘‘जी, पता नहीं.’’

‘‘अरे, तुम्हें ही पता नहीं, यह कैसे हो सकता है.’’

‘‘जो लोग उन्हें रोज नया काम करने की नेक सलाह देते हैं उन्हें ही पता होगा,’’ पुरवा का स्वर अचानक उखड़ गया.

बेला ने उस के स्वर की तिक्तता महसूस की और बोली, ‘‘क्या बात है पुरवा, कहीं यह शिकायत तुम्हें हम लोगों से तो नहीं है?’’

पुरवा ने बिना कुछ बोले करवट बदल ली. बेला कुछ और बोलती इस से पहले ही मां आ गईं.

सुहास भी उन के साथ था. बेला उस के साथ ही जाने को तत्पर हो उठी, ‘‘अब मैं चलूंगी, सुहास.’’

‘‘चलिए, भाभी, मैं आप को छोड़ देता हूं,’’ सुहास कार की चाबी नचाता चल दिया. पुरवा ने तिरछी आंखों से सब देखा और मन ही मन कुढ़ सी उठी. लगा कि अचानक ही तबीयत फिर बिगड़ रही है.

ऐसे कई अवसरों पर पुरवा स्वयं को संभालने का भरसक प्रयास करती रही है पर अस्वस्थ मन, टूटा हुआ शरीर, पुरवा को अचानक बहुत कमजोरी लगने लगी. जैसे मन डूब रहा हो, डूबता ही जा रहा हो.

इन दिनों हर छोटीबड़ी बात उसे अंदर ही अंदर मथने लगती थी. एक तरफ उत्तेजना से देह धड़कने लगती, साथ ही रक्तचाप भी बढ़ जाता.

मां ने देखा तो तुरंत डाक्टर को बुला लाईं. डाक्टर ने रक्तचाप देखा और तुरंत इंजेक्शन दिया. फिर मां को आवश्यक निर्देश दे कर चला गया. इंजेक्शन के प्रभाव से पुरवा की आंखों में नींद का खुमार छाने लगा था. मां घर फोन करने चली गई थीं. तभी सुहास आ गया. पीछे क्या हुआ यह जाने बिना ही वह क्रोध से बोला, ‘‘पुरवा, तुम्हें क्या होता जा रहा है. बेला भाभी से बात करने की तमीज भी भूल गई हो.’’

पुरवा ने मुंदती हुई आंखों को भरसक खोलने का प्रयास किया.

सुहास के शब्द तीर की तरह उस के दिल में चुभ रहे थे. सुहास कह रहा था, ‘‘मैं ने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी पत्नी एक मामूली औरत की तरह इतनी ओछी बातें कर सकती है.’’

सुहास अभी और भी कुछ कहता, तभी मां कमरे में आ गईं और बोलीं, ‘‘क्या शोर मचा रखा है, सुहास. दिखता नहीं उस की तबीयत कितनी खराब हो गई है.’’

पुरवा तब तक नींद की गोद में समा गई थी.

कई दिनों से आकाश पर बादल छाए थे, पर उस दिन अचानक ही बरसात की संभावना बढ़ गई. एक दिन पहले ही पुरवा घर वापस आई थी. उस रात से ही पुरवा चुप सी हो गई थी. न किसी से बात कर रही थी न कोई शिकायत, अंदर ही अंदर जैसे कोई मंथन चल रहा था.

मम्मीपापा देखने आए हुए थे, उन के सामने भी चुपचाप ही पड़ी हुई थी. मां ने कहा, ‘‘जाने क्या हुआ है पुरवा को. किसी से बात ही नहीं करती है.’’

‘‘कोई तकलीफ है क्या, बताती क्यों नहीं है बेटी,’’ पापा ने झुक कर कई बार पूछा. मम्मी उस के सिर पर हाथ फेरने लगीं तो अचानक पुरवा के अश्रु बह चले.

‘‘यह क्या, पुरु? घबराते नहीं हैं. जल्दी ठीक हो जाओगी.’’

‘‘मुझे घर ले चलो, ममा,’’ अचानक पुरवा ने रोते हुए कहा.

‘‘ले चलेंगे बेटे, तुम ठीक तो हो जाओ. अभी तो बहुत कमजोर हो तुम,’’ मम्मी ने प्यार से कहा.

‘‘नहीं, मुझे आज ही चलना है.’’

मां पास ही खड़ी सब सुन रही थीं. बोलीं, ‘‘अगर कुछ दिन वहां रह कर यह जल्दी स्वस्थ हो सकती है तो आप जरूर ले जाइए.’’

सबकुछ आननफानन में हो गया. पुरवा का सामान पैक हुआ. वह मम्मीपापा के साथ उन के घर चली गई. सुहास को जैसे कुछ सोचनेसमझने का अवसर ही नहीं मिला. उसे उदास देख कर मां ने कहा, ‘‘अब उदास क्यों बैठा है. कुछ दिनों को वहां जाने का भी तो उसे अधिकार है.’’

‘‘मैं कहां कुछ कह रहा हूं.’’

‘‘फिर इतना मुंह लटकाने की क्या बात है?’’ मां कमरा ठीक करने लगी थीं. कोई चुभन उन के मन में भी थी, इसी से काम करते हुए कुछकुछ बोलती जा रही थीं.

‘‘सब के पीछे भागता रहता है, पर पत्नी बीमार पड़ी है तो प्यार से बात भी नहीं कर सकता है. बेला को ले कर बातबात पर उसे डांटता रहता है इन दिनों.’’

‘‘मैं क्या करूं, कभीकभी मेरा दिमाग फिर जाता है,’’ सुहास ने सफाई दी.

‘‘जिंदगी को मजाक समझ रखा है. हर बात में बचपना, हर समय जल्द- बाजी,’’ मां की किसी बात का उत्तर उस के पास नहीं था, पर वह उन की बातों पर सोचने के लिए विवश अवश्य हो रहा था.

पुरवा की कमी उसे बहुत खल रही थी. फोन पर जब भी वह पुरवा से बात करता, वह ‘हां, हूं’ में ही उत्तर देती. सुहास का मन करता कि अभी जाए और पुरवा को जबरन वापस ले आए, पर उस का अस्वस्थ शरीर याद आते ही सुहास हताश हो कर बैठ जाता. काम में मन पहले भी नहीं लगता था, अब उदासी का बहाना ले कर वह घर बैठ गया. जब मां व पापा ने अधिक टोका तो घर से बाहर तो निकलने लगा पर दुकान पर कम, कभी बेला, कभी किसी और मित्र के घर जा कर समय व्यतीत करने लगा.

पुरवा धीरेधीरे स्वस्थ हो रही थी. सुहास ने एक दिन पूछा, ‘‘कब आऊं लेने?’’ तो पुरवा ने चुप्पी साध ली. बहुत बार पूछने पर बोली, ‘‘अभी मैं आराम कर रही हूं.’’

मम्मी पास ही बैठी थीं. बोलीं, ‘‘उसे यहां बुला लो. कुछ दिन वह भी रह जाएगा.’’

‘‘कोई जरूरत नहीं है,’’ पुरवा का क्रोध अभी तक उतरा नहीं था. मम्मी कुछ पल उसे देखती रहीं फिर धीरे से कहा, ‘‘यह ठीक नहीं है, पुरु. उस ने कोई भूल की भी है तब भी इतना क्रोध दिखाना गलत है.’’

मम्मी अपनी बात कह कर चली गईं पर पुरवा खिन्न मन से खिड़की के पास जा कर खड़ी हो गई. थोड़ी दूर पर गुलमोहर का पेड़ था और दूर तक बोगनबेलिया की लंबी झाड़…लालसफेद और बैंगनी फूल एकसाथ मुसकरा रहे थे. उसे लगा कि प्रकृति कितनी सरलता से एकदूसरे के साथ सामंजस्य बैठा लेती है. यह गुलमोहर का पेड़ साक्षी है उस के प्यार का. जब भी सुहास पुरवा के साथ इस गुलमोहर के नीचे आता था, भविष्य के अनेक सपने संजोए जाते थे. कहां गए वह सारे सपने. वह कौन सी धुंध उन दोनों के मध्य फैल गई है कि सारे सपने कहीं खो गए हैं. उसे तो अभी कुछ भी नहीं भूला है, पर सुहास सबकुछ भूल गया है.

पुरवा खिड़की से हट कर पुन: बिस्तर पर लेट गई. सोचने लगी, ‘उस से कहां भूल हो गई, उस ने सुहास को गलत समझा या सुहास ही बदल गया है,’ एक गहरी सांस खींच कर उस ने आंखें मूंद लीं.  -क्रमश:

तो क्या इस खिलाड़ी की वजह से ब्रैडमेन पूरा नहीं कर सके 100 का औसत

सर डौन ब्रैडमैन की विदाई के इतने साल बाद भी दुनिया में कोई भी ऐसा बल्लेबाज़ नहीं हुआ जो अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में 100 के औसत के करीब भी पहुंचा हो. डौन ब्रैडमेन ने औस्ट्रेलिया के लिए टेस्ट क्रिकेट में 99.94 के औसत से रन बनाए. अगर वो करियर में चार रन और बना लेते तो वो आज दुनिया के इकलौते ऐसे बल्लेबाज होते जिनका अंतराष्ट्रीय स्तर पर बल्लेबाजी औसत 100 का होता.

लेकिन उनका ऐसा नहीं कर पाने का मलाल आज भी उनके साथी नील हार्वे को है. वो आज भी इस महान बल्लेबाज के इस विशाल उपलब्धि को हासिल नहीं कर पाने के पीछे खुद को जिम्मेदार मानते हैं.

दरअसल टेस्ट क्रिकेट की अपनी आखिरी पारी में ब्रैडमेन शून्य के स्कोर पर आउट हो गए और उन्हें आउट करने वाले गेंदबाज थे इंग्लैंड के लेग स्पिनर एरिक होलीज. अपनी आखिरी में उन्हें 100 का औसत हासिल करने के लिए चार रन चाहिए थे लेकिन वो शून्य पर बोल्ड हुए और ये सब यहीं ठहर गया.

दरअसल औस्ट्रेलिया के ब्रैडमेन के साथी खिलाड़ी नील हार्वे ब्रैडमेन के साथ उनके आखिरी मैच से एक मैच पहले क्रीज पर थे. इस मुकाबले की पहली पारी में हार्वे ने शानदार 112 रन बनाए. दूसरी पारी में ब्रैडमेन क्रीज पर थे और एक बल्लेबाज के आउट होने पर हार्वे क्रीज पर आए. अब औस्ट्रेलिया को जीत के लिए चार रनों की दरकार थी.

यहीं पर हार्वे ने एक चौका लगाया और मैच जिता दिया. ब्रैडमेन दूसरे छोर पर खड़े रह गए. उस समय ब्रैडमैन 173 रन बनाकर खेल रहे थे और अगर उस मैच में वो चार रन बनाते तो उनका औसत 100 का होता लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

इस मैच के बाद ब्रैडमेन ने आखिरी मैच खेला और वो उसमें शून्य पर आउट हुए जिससे की उनका 100 का औसत एक सपना ही रह गया.

हाल ही में सिडनी मार्निंग हेराल्ड से बातचीत में हार्वे ने कहा, ‘लीड्स में बनाए गए उन चार रनों से मैं आज भी अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता हूं. यह पूरी तरह से मेरी गलती थी, जो ब्रैडमैन टेस्ट क्रिकेट में 100 का औसत हासिल नहीं कर पाए. अगर वे चार रन मेरे बजाय उन्होंने बनाए होते, तो वह यह उपलब्धि हासिल कर लेते.’

हार्वे ने इस दिन के बारे में बताया और कहा,‘मैं क्रीज पर आया. लंकाशायर के गेंदबाज केन क्रैन्सटन ने मेरे लेग स्टंप पर गेंद की और मैंने उसे मिडविकेट पर चार रन के लिए खेल दिया. दर्शक इसे देखकर खुशी से झूमे और मैदान की ओर दौड़ पड़े.

हार्वे ने कहा, ‘इसके बाद मुझे अब भी याद है कि ब्रैड जोर से चिल्लाए, ‘चलो बेटे. यहां से निकलो.’ हार्वे ने अब भी बातचीत में कहा कि वो दोष लेने के लिए तैयार हैं लेकिन वो नहीं जानते थे कि वह अपने अंतिम टेस्ट मैच में शून्य पर आउट हो जाएंगे.

हार्वे ने बताया कि ‘उस समय आंकड़ों का इतना जिक्र नहीं होता था और ना ही टेलीविजन था. किसी पत्रकार को भी इसका एहसास नहीं रहा होगा. जब वो आउट हो गए तब सबको इस बारे में पता चला. इसके बाद इंग्लैंड 52 रनों पर सिमट गया और उन्हें फिर बल्लेबाजी का मौका भी नहीं मिला.’

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