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मंजिल (भाग-7) : जब सुहास को हुआ पापा बनने का अहसास

पूर्व कथा 

पुरवा का पर्स चोर से वापस लाने में सुहास मदद करता है. इस तरह दोनों की जानपहचान होती है और मुलाकातें बढ़ कर प्यार में बदल जाती हैं. सुहास पुरवा को अपने घर ले जाता है. वह अपनी मां रजनीबाला और बहन श्वेता से उसे मिलवाता है. रजनीबाला को पुरवा अच्छी लगती है. उधर पुरवा सुहास को अपने पिता से मिलवाने अपने घर ले आती है तो उस के पिता सहाय साहब सुहास की काम के प्रति लगन देख कर खुश होते हैं.

सुहास की बहन श्वेता को देखने लड़के वाले आते हैं. इंजीनियर लड़के गौरव से श्वेता का विवाह तय हो जाता है. मिठाई  के डब्बे के साथ बहन की सगाई का निमंत्रण ले कर सुहास सहाय साहब के घर जाता है. घर पर बीमार सहाय साहब का हालचाल पूछने उन के मित्र आए होते हैं. सहाय साहब सुहास की तारीफ करते हुए सब को बताते हैं कि वह उस के लिए मोटरपार्ट्स की दुकान खुलवा रहे हैं. सुहास अपनी तारीफ सुन कर खुश होता है.

श्वेता की सगाई पर आए सहाय साहब के परिवार से मकरंद वर्मा परिवार के सभी सदस्य उत्साहपूर्वक मिलते हैं. दोनों परिवार वाले सुहास और पुरवा के रिश्ते से खुश थे.

समय तेजी से गुजरता रहा. सुहास व्यापार शुरू कर देता है, लेकिन कई बार काम के लिए बंध कर बैठना उस के लिए मुश्किल हो जाता क्योंकि किसी भी जगह जम कर रह पाना उस के स्वभाव में नहीं था.

अंतत: श्वेता के विवाह का दिन आ जाता है. उस दिन पुरवा का सजाधजा रूप देख कर सुहास दीवाना हो जाता है. पुरवा से शीघ्र विवाह करने के लिए सुहास दुकान पर मन लगा कर काम करने लगता है. यह सब देख सहाय साहब खुश थे. आखिरकार वह एक दिन वर्मा साहब के घर पुरवा का रिश्ता ले कर पहुंच जाते हैं. सभी की मौजूदगी में खुशी से पुरवासुहास का रिश्ता पक्का हो जाता है और शीघ्र ही धूमधाम से विवाह हो जाता है.

सुहागसेज पर दोनों हजारों सपने संजोते हैं और हनीमून पर ऊटी जाते हैं. वापस आने पर घर में सब उन का स्वागत करते हैं. इधर श्वेता से बात करने पर पुरवा को पता चलता है कि बड़े परिवार के कारण वह ससुराल में नाखुश है. उधर अपनी व्यवहारकुशलता से पुरवा ससुराल में जल्द ही सब से घुलमिल जाती है.

पुरवा महसूस कर रही थी कि सुहास का ध्यान समाजसेवा में अधिक रहता है. वह दूसरों की मदद के लिए दुकान पर भी ध्यान न देता.

एक दिन श्वेता ससुराल से लड़झगड़ कर मायके आती है. पुरवा के समझाने पर वह उलटा पुरवा को ही सुहास द्वारा कुछ न कमाने का ताना देती है. यह बात सच थी इसीलिए पुरवा सब चुपचाप सुन लेती है लेकिन अब उस के दिमाग में श्वेता के शब्द गूंज रहे थे.

पुरवा अब निरंतर सुहास को उस की जिम्मेदारी का अहसास कराने की कोशिश करती. शीघ्र ही वह दिन भी आता है जब पुरवा को पता चलता है कि वह मां बनने वाली है. सुहास पापा बनने के सुखद अहसास से झूम उठता है.

अब आगे…

उस रात पुरवा ने सुहास पर क्रोध करते हुए कहा, ‘‘तुम ने चारों तरफ इतना ढिंढोरा क्यों पीटा?’’

सुहास बहुत प्रसन्न था अत: उसे मनाते हुए बोला, ‘‘तुम्हें क्या बताऊं पुरू, मैं कितना खुश हूं. बैठेबैठे यही कल्पना  करता हूं कि एक नन्हा सा बच्चा जब ‘पापा’ कह कर बुलाएगा तब भला कैसा लगेगा.’’

पुरवा ने मुसकरा कर उसे देखा. बोली, ‘‘यह कल्पना तो मैं भी करती हूं सुहास. यह जो मेरे अंदर पनप रहा है, इस की रचनाकार मैं हूं, यह भावना ही विचित्र रोमांच से भर देती है.’’

‘‘नहीं पुरवा, रचनाकार तो कुदरत है. तुम और मैं तो बस माध्यम हैं पर यह पूरी तरह से हम दोनों का होगा. जैसे मैं अपने मातापिता से अपनी इच्छाएं पूरी करवाता हूं, वैसे ही…’’

‘‘हां सुहास,’’ पुरवा ने उसे बीच में ही टोक दिया, ‘‘लेकिन सोचो जरा, अब हमारी जिम्मेदारी कितनी बढ़ गई है.’’

सुहास अपने उत्साह में डूबा हुआ ही बोला, ‘‘तो क्या पुरवा, मैं बहुत मेहनत करूंगा, एक दिन फैक्टरी खड़ी करूंगा, फिर उसे भी आगे बढ़ाऊंगा. इस घर में कोई व्यापारी नहीं है, पर मैं बन कर दिखाऊंगा,’’ उसे इतना उल्लसित देख कर पुरवा भी गद्गद हो उठी.

धीरेधीरे पुरवा अपने तनमन में विचित्र सा बदलाव महसूस करने लगी. मन के अंदर ममता का स्रोत फूटने लगा था. कैसा होगा मेरा बच्चा? किस पर जाएगा. जब वह मां कहेगा तो कैसा लगेगा. अनेक बातें उसे गुदगुदाती रहतीं. और शरीर में विचित्र सी व्याकुलता, चलने में, उठने में उलझन सी, खानेपीने में अरुचि. पुरवा सोचती, यह कैसा आनंद है जो कष्ट भी साथ ही साथ लाया है. सुहास दुकान छोड़ कर बीच में ही भाग आता तो पुरवा क्रोध करती, ‘‘यह क्या, इतनी जल्दी आ गए.’’

सुहास उस के पेट पर प्यार से हाथ फेरता, ‘‘हां, मुझे इस की बहुत याद आ रही थी.’’

‘‘बहानेबाज.’’ पुरवा मुसकरा देती.

‘‘तुम्हें तो दुकान छोड़ कर भागते रहने का बहाना चाहिए.’’

‘‘नहीं सच्च. मुझे लगा कि तुम भी मुझे याद कर रही हो, आखिर तुम्हारा ध्यान रखना भी तो मेरा ही कर्तव्य है न,’’ सुहास ने सफाई दी.

पुरवा ने प्यार से उसे देखा और कहा, ‘‘सुहास, तुम्हारे प्यार पर मुझे सदा बहुत गर्व होता रहा है. पर कभीकभी मुझे लगने लगता है कि तुम प्यार और कर्तव्य निभातेनिभाते अपने उत्तरदायित्व को भूल जाते हो.’’

सुहास ऐसे में उसे गुदगुदा कर बात पलटने की कोशिश करता और कहता, ‘‘मुझे वह भी याद है पुरू. अपने आने वाले बच्चे के लिए मुझे बहुत परिश्रम करना है. एक सफल व्यवसायी बनना है. वह कहते हैं न कि हर सफल व्यक्ति के पीछे एक स्त्री होती है,’’ सुहास पुरवा को चिढ़ाते हुए कहता, ‘‘तो तुम हो न मुझे घड़ीघड़ी सही राह दिखाने वाली. मुझे मालूम है कि तुम मुझे कभी भटकने नहीं दोगी,’’ ऐसे में सदा पुरवा गर्व से भर उठती. सोचती, सुहास को पसंद कर के मैं ने कोई गलती नहीं की है.

श्वेता अपनी यात्रा से वापस आ गई थी. अपने सुखद अनुभव सब को सुना कर वह फूली नहीं समाती थी. पुरवा भी सुनती और खुश होती. सोचती, शुक्र है कि श्वेता की नादानी अब राह नहीं खोज पाएगी. पुरवा का स्वास्थ्य प्राय: खराब हो जाता था. मां उस का बहुत ध्यान रखती थीं. सुहास भी दुकान से सीधे घर आ जाता था. कभीकभी वह पुरवा को घुमाने ले जाता. दोनों बहुत सी पुरानी यादों को दोहराते और भविष्य के सपने बुनते. उन स्वप्नों में एक नन्हा शिशु भी किलकारियां भरता.

एक दिन अंधमहाविद्यालय से पुरवा के लिए एक पत्र आया. राष्ट्रपति के सम्मुख एक विशेष आयोजन में विद्यालय के बच्चों को कार्यक्रम प्रस्तुत करना था. पुरवा को कार्यक्रम तैयार करवाने में सहायतार्थ बुलाया गया था. उस ने मां से पूछा तो उन्होंने कहा, ‘‘जाने में तो कोई हर्ज नहीं है पर तुम्हारी तबीयत तो ठीक नहीं रहती है और रिहर्सल करवाने रोज जाना पड़ेगा.’’

‘‘जानती हूं मम्मी, पर वहां जा कर शायद मैं अपनी अस्वस्थता के बारे में कुछ देर भूली रहूं.’’

मां हंस दी थीं. बोलीं, ‘‘हां, यह तर्क भी ठीक है.’’ इस तरह पुरवा को एक बार पुन: कुछ घंटों के लिए अपना पुराना समय वापस मिल गया था. उसे बस या स्कूटर से जानेआने की आज्ञा नहीं थी, इसलिए कभी कार से कभी टैक्सी से ही उसे जाना पड़ रहा था. उस के चेहरे पर पुरानी चमक वापस आ रही थी. आंखों में उत्साह झलकने लगा था. सुहास भी उन दिनों बहुत देर से घर वापस आता था. पुरवा सोचती कि वह घर पर नहीं मिलती है शाम को शायद इसीलिए वह देर से वापस आता है पर एक दिन वह घर पहुंची तो उसे बड़ी विचित्र स्थिति का सामना करना पड़ा. वह टैक्सी वाले को पैसे चुका कर जैसे ही पोर्च तक पहुंची तो ड्राइंगरूम से ऊंचीऊंची बहसों का स्वर उसे चौंका गया. जिस घर में कभी भी ऊंचे स्वर में बात नहीं की जाती है, वहां थोड़ा सा ऊंचा स्वर भी चौंकाने के लिए काफी था. वह हतप्रभ आंखों से सब को देखती हुई अंदर पहुंची तो सब चुप हो गए.

‘‘क्या हुआ?’’ उस ने सुहास की तरफ देखते हुए पूछा. सुहास बिना कुछ बोले उठ कर अंदर चला गया. पुरवा ने मां व पापा की ओर दृष्टि घुमाई तो मां ने मुसकराने का प्रयास करते हुए कहा, ‘‘कोई विशेष बात नहीं है. हम लोग सुहास को व्यापार की ऊंचनीच समझा रहे थे.’’ मां ने थकी हुई पुरवा को बैठाते हुए स्नेह से उसे देखा, ‘‘और तुम्हारी रिहर्सल कैसी चल रही है?’’

पुरवा ने भी मुसकराहट बिखेर कर कहा, ‘‘ठीक चल रही है मम्मीजी. बस, कार्यक्रम समाप्त होते ही फुरसत हो जाएगी.’’

‘‘चलो अच्छा है. कुछ मन भी बहला रहता है तुम्हारा. उठ कर फ्रेश हो लो. सब खाने को बैठे हैं.’’

कमरे में पहुंची तो सुहास लेटा हुआ था. पुरवा सिरहाने बैठ गई और बोली, ‘‘क्या हुआ? तबीयत तो ठीक है?’’

‘‘हां, ठीक है सब. तुम नहाना चाहो तो नहा लो,’’ सुहास ने जैसे बात टालते हुए कहा. पुरवा को लगा, उस से कुछ छिपाया जा रहा है, पता नहीं क्यों? वह गर्भवती है इसलिए, अथवा कोई अन्य कारण है. मन में चिंता सी हो आई पर ऊपर से उस ने कुछ भी प्रदर्शित नहीं होने दिया. सुबह जब सुहास जाने लगा तब पुरवा ने मां को कहते सुना, ‘‘जो भी करना, सोचसमझ कर करना.’’

सारा दिन यह वाक्य उसे दंश देता रहा था. आखिर व्यापार संबंधी वह कौन सी समस्या है जो उसे नहीं बताई जा रही है. जब से सुहास ने अपनी दुकान खोली है, कभी उस ने यह नहीं देखा कि सुहास ने मम्मीपापा को व उसे कुछ ला कर दिया हो. उसे जेठानी की बात याद आ गई. हंसीहंसी में ही उन्होंने कहा था, ‘सुहास को तो मम्मीजीपापाजी के आंचल में दुबक कर रहने की आदत पड़ी हुई है.’

‘क्या मतलब?’ पुरवा ने आश्चर्य से पूछा था.

‘मतलब सीधा सा है. दुलार के मारे उसे जरा से कष्ट में देख नहीं सकते हैं पापाजी और मम्मीजी. जो मांगते हैं, तुरंत हाजिर कर देते हैं,’ इला भाभी ने कहा था.

‘पर ऐसा तो सभी मातापिता करते हैं,’ पुरवा ने तर्क किया था.

‘तुम्हारा कहना ठीक है, पर फिर भी हर मांबाप बच्चे को जीवन की कठिनाइयों से भागने को उचित नहीं समझते हैं बल्कि जो मातापिता बच्चों को हर मुश्किल का सामना करने के लिए प्रेरणा देते हैं, वही ठीक करते हैं.’

इला की बात पर पुरवा ने आश्चर्य से उसे देखा था. तब विस्तार से इला भाभी ने समझाया था कि सुहास ने पढ़ाई में भी बहुत लापरवाही बरती. दोनों बड़े भाई चाहते थे कि उन की तरह ही सुहास भी प्रतियोगिताओं में बैठ कर एक ठोस राह पकड़े. पर सुहास का पढ़ाई में या शायद परिश्रम में अधिक मन नहीं लगता था. मम्मीजी व पापाजी ने भी इसे उस का बचपना कह कर टाल दिया. मम्मीजी कहतीं, ‘बच्चों के साथ जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए, समय आने पर कोई न कोई राह उसे भी मिल ही जाएगी.’

उस समय पुरवा ने इन बातों को गंभीरता से नहीं लिया था, पर अब कुछ समय से उन बातों को प्राय: याद कर लेती है. जैसे उस की हर आवश्यकता मम्मीजी अपने पर्स से पूरी करती रहती हैं. कभीकभी तो सुहास को भी मम्मीजी से ही रुपए लेते पुरवा ने देखा है.

कल शाम से जो हालात हैं घर में, उन्हें देख कर एक बार फिर उसे इला की बातें याद आ रही हैं, तो क्या वह यह सोचे कि सुहास परिश्रम करने से बचता रहता है, पर व्यापार का पहला सिद्धांत ही यह है कि व्यक्ति को परिश्रमी, साहसी व उद्यमी होना चाहिए. सब से अधिक दुख उसे इस बात का था कि उसे कुछ भी बताया नहीं जा रहा था. इतना अधिक अस्वस्थ भी नहीं है वह कि उसे कुछ भी  बताया ही न जा सके.

शाम को वह कार्यक्रम के अंतिम चरण की तैयारी करने गई थी. रविवार को कार्यक्रम प्रस्तुत होना था. सभी बच्चे पूरी लगन के साथ तैयारी में जुटे हुए थे.

बीच के समय में रोज चाय ले कर मदन आया करता था पर उस शाम यकायक कपड़ों में सजाधजा, चुस्तदुरुस्त सा जो युवक चाय ले कर आया, उसे देख कर पुरवा चौंक उठी. उस युवक ने चाय मेज पर रख दी और टटोल कर पुरवा के पैर छूने लगा तो पुरवा संकोच से बोली, ‘‘नहींनहीं, यह क्या?’’

‘‘दीदी, आप ने पहचाना नहीं क्या?’’ युवक वहीं फर्श पर बैठ गया. पुरवा ने सोचते हुए कहा, ‘‘तुम प्रभात हो न.’’

युवक मुसकराया. उस के चेहरे की हर शिकन पर उत्साह की चमक थी. बोला, ‘‘हां दीदी.’’

‘‘कैसे हो प्रभात?’’ पुरवा ने प्रसन्नता से पूछा.

‘‘आप की कृपा से बहुत अच्छा हूं दीदी,’’ उस के स्वर में प्रसन्नता और उत्साह साथसाथ तैर रहे थे. पुरवा को भी उसे देख कर बहुत ही अच्छा लग रहा था. एक दिन यही प्रभात बहुत ही रोंआसे स्वर में उस से बोला था, ‘दीदी, मैं शीघ्र से शीघ्र अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता हूं. मेरी मां बहुत बीमार रहती हैं. पिता शराब में अपना वेतन फूंक देते हैं. घर में 2 भाई और एक बहन भी हैं.’

उस दिन के प्रभात में और आज के प्रभात में कितना अंतर था. पुरवा ने पूछा, ‘‘तुम्हारा व्यापार कैसा चल रहा है प्रभात.’’

उस ने दोनों हाथ जोड़ लिए और गद्गद स्वर में बोला, ‘‘आप का ही आशीर्वाद है दीदी. अंकल ने जो राह दिखाई थी, उसी पर चल कर आज मेरी अपनी छोटी सी कंपनी है, जहां बड़े पैमाने पर देशविदेश के लिए रेडीमेड कपड़े तैयार होते हैं.’’

पुरवा ने सुना तो हतप्रभ रह गई. एक व्यक्ति जिसे कुदरत ने आंखों की रोशनी नहीं दी, फिर भी वह जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा हो जाना चाहता था. पुरवा ने अपने पापा के सामने उस की समस्या रखी और उन्होंने अपनी गारंटी पर प्रभात को बैंक से ऋण दिलवाया और रेडीमेड कपड़ों के बनाने और बेचने में सहायता की. प्रभात में साहस और लगन की कमी नहीं थी. अत: बहुत शीघ्र ये सारे कार्य उस ने कुशलतापूर्वकसंभाल लिए और सहाय साहब को अपनी सहायता से मुक्त कर दिया.

इस बीच पुरवा के जीवन में बहुत से परिवर्तन हुए. वह एम.ए. की परीक्षा में व्यस्त हो गई, फिर उस के जीवन में सुहास आ गया और वह उस की पत्नी बन गई. प्रभात से मिले उसे बहुत लंबा अरसा हो गया था. कई वर्षों से वह अंध- महाविद्यालय से जुड़ी हुई थी, इसलिए उसे वहां बहुत सम्मान प्राप्त था. प्रभात ने इतने थोड़े समय में इतनी अधिक सफलता प्राप्त कर ली थी, यह देख कर पुरवा हतप्रभ थी. मन ही मन में वह प्रभात की तुलना सुहास से कर रही थी. सुहास को भी तो पापा ने पूरी सहायता दी थी. स्वयं उस के मम्मीपापा भी बराबर उस का ध्यान रखते हैं पर अभी तक ऐसा कुछ भी तो दिखाई नहीं दिया कि लगे कि सुहास एक दिन सफल व्यापारी बन पाएगा. ऊपर से कुछ नई समस्या भी शायद उत्पन्न हो गई है जिस से उसे दूर रखा जा रहा है, तो क्या वह समझे कि सुहास एक गैरजिम्मेदार व्यक्ति है? या वह जीवन संघर्ष से दूर भागने का आदी है.

पुरवा के मन में उथलपुथल मची हुई थी. एक मन सुहास के प्यार में डूबा हुआ था, पर सोच को क्या करे, जो सच और झूठ के बीच कसमसा रहा था. प्यार करते समय कहां पता चलता है कि जीवन को क्या दिशा मिलने वाली है. कभीकभी सोचती है कि वह भी सुहास की तरह ही मान कर चले कि जीवन तो आनंद से व्यतीत हो रहा है. जो चाहती है मिल जाता है. घूमनाफिरना भी हो जाता है. बहुत से मित्र, बहुत सारे संबंधी हैं, जिन से निरंतर मिलनाजुलना चलता रहता है. प्यार करने वाला पति व प्यार देने वाले सासससुर भी हैं और क्या चाहिए.

पर उस का आत्मसम्मान सदा उस के आड़े आ जाता है. विवाह के उपरांत पति के उत्तरदायित्व पत्नी के प्रति बढ़ जाते हैं. लेकिन सुहास के पास किसी भी उत्तरदायित्व के निर्वाह के लिए समय नहीं है. उसे डाक्टर के पास अधिकतर मां ले जाती हैं. सुहास को तो अपने परिचितों की सेवाटहल से ही फुरसत नहीं है.

प्रभात की प्रसन्नता छिपाए नहीं छिप रही थी. पुरवा की तंद्रा भंग करते हुए उस ने कहा, ‘‘दीदी, आप कैसी हैं?’’

‘‘बहुत अच्छी हूं प्रभात. तुम से मिल कर बहुत खुशी हो रही है.’’

‘‘हमें भी बहुत याद आती थी दीदी, पर व्यापार जमाने में बहुत झंझट थे, आप से मिल ही नहीं पाए.’’

‘‘वह भी तो जरूरी था प्रभात. तुम ने इतना परिश्रम कर के अपने नाम को सार्थक कर दिखाया है,’’ पुरवा ने कहा.

‘‘जो कुछ भी है दीदी, आप की और अंकल की ही कृपा है. मुझे तो बस कर्म करना था. अभी तो बस नींव पड़ी है. छोटी सी फैक्टरी लगा ली है, शायद किसी दिन और भी कुछ कर सकूं,’’ प्रभात ने चाय का नया कप बना कर पुरवा को दिया था.

‘‘अच्छा दीदी, आप के पति कैसे हैं?’’

प्रभात ने पूछा तो पुरवा मुसकरा दी, ‘‘बहुत अच्छे हैं प्रभात. हम ने एकदूसरे को पसंद कर के विवाह किया है,’’ पुरवा की बात सुन कर प्रभात मुसकरा दिया.

‘‘आप की शादी की बात पता चली थी, पर जरा देर से. तब से ही मन था कि आप से और जीजाजी से मिलूं.’’

प्रभात सुहास के बारे में भी पूछता रहा. जब वह जाने लगा तो पुरवा ने कहा, ‘‘एक दिन हमारे घर जरूर आना, मैं सुहास से तुम्हें मिलवाना चाहती हूं.’’

‘‘हां दीदी, अवश्य आऊंगा,’’ प्रभात पैर छू कर चला गया पर पुरवा सोच में डूब गई. ऐसे कर्मठ लोग उसे बहुत अच्छे लगते हैं.

उस शाम के शोरगुल का कारण पुरवा को बहुत शीघ्र पता चल गया था. कारण जान कर वह हत्प्रभ रह गई थी. सुहास अब पुराना सब बेच कर कंप्यूटर का कार्य आरंभ करना चाहता था. उसे किन लोगों ने यह सलाह दी थी, यह बात पता नहीं चली थी.

पुरवा सोच में पड़ गई थी. जाने कैसेकैसे मित्र बनाए हैं इन दिनों सुहास ने. कभीकभी घर पर भी आ धमकते हैं. जितनी देर बैठते हैं वे सब चाय के साथ अपनी नेक सलाहें देते रहते हैं. कभीकभी मां भी उन की सलाहों से परेशान हो जाती हैं.

मां और पापा के चेहरे पर तनाव स्पष्ट दिखाई देता था. शायद उन्होंने भी कभी यह नहीं सोचा था कि उन का लाड़प्यार सुहास को इतना गैरजिम्मेदार बना देगा.

पुरवा के मन में भी लगातार हलचल मची हुई थी.

उस के गर्भ में सुहास का बच्चा था. सुहास को कम से कम अपने इस नए उत्तरदायित्व के प्रति सचेत होना चाहिए था. मां व पापाजी कब तक उस के सारे उत्तरदायित्व निभाते रहेंगे.

सुहास के बारे में सोचतेसोचते पुरवा को प्रभात का ध्यान आ गया. कुदरत ने उसे आंखें नहीं दी हैं, फिर भी वह जीवन के प्रति कितना गंभीर है. अपने मातापिता का दुख दूर करने के लिए उस ने राह बनाई और उस में सफलतापूर्वक आगे बढ़ भी रहा है. उस दिन भी पुरवा यही सोचती रही थी कि विकलांग हो कर भी प्रभात में आत्म- विश्वास कूटकूट कर भरा हुआ है. और तभी उसे यह भी सोचना पड़ा था कि क्या सुहास में आत्मविश्वास की कमी है. पहले तो कभी ऐसा नहीं लगा था फिर अब…अपनी नित नई सोच से घबरा कर कभीकभी वह अपना आत्म- विश्लेषण भी कर बैठती है.

कई बार अपनेआप से उस ने प्रश्न किया है, ‘पुरवा, साथ रह कर क्या तुम सुहास में बस त्रुटियां खोजने लगी हो? तुम्हारे प्यार के वे सारे दावे कहां खो गए हैं?’

कई बार चौंक कर वह यह भी सोचती है, कहीं ऐसा न हो कि भविष्य की चिंता में वर्तमान भी हाथ से छूट जाए. यही सब सोच कर पुरवा ने निर्णय लिया कि वह सुहास को प्यार से समझाने का प्रयास करेगी. वह उस दिन व्यग्रता से सुहास की प्रतीक्षा करने लगी.

-क्रमश:

जब कोई अपना हो हादसे का शिकार

जिंदगी में कभी भी किसी के साथ कोई बड़ा हादसा हो सकता है.  सैक्सुअल असाल्ट हो या शारीरिक और मानसिक चोट, एसिड अटैक हो या रेप या फिर ऐक्सिडैंट जैसे हादसों से इंसान बहुत संवेदनशील और जज्बाती हो जाता है.  वह अपने साथ हुए हादसे को समझने, उसे सहने और उस से उबरने की जद्दोजेहद में लगा रहता है.

ऐसे में आप का उसे यह विश्वास जताना बहुत जरूरी है कि आप उस के साथ हैं, उस की तकलीफ दिल से महसूस कर रहे हैं और उसे इस ट्रौमा से निकालने में हर मुमकिन साथ देंगे.

कुछ लोग पीड़ित व्यक्ति का हौसला बढ़ाने के बजाय उस के जख्मों को कुरेदने, अनर्गल बातें कह कर उसे और दुखी करने का काम करते हैं. ऐसा करने से बचें. आप उस का दर्द तो दूर नहीं कर सकते मगर उसे भावनात्मक स्पोर्ट दे कर इस दर्द को सहने के काबिल बना सकते हैं.

आप का कोई प्रिय किसी हादसे का शिकार हो जाए तो इन बातों का खयाल जरूर रखें :

ध्यान रखें कि ट्रौमा बारबार वापस आ सकता है : कई बार हादसे की वर्षगांठ या कोई ऐसा शख्स जो अटैक करने वाले अपराधी से मिलताजुलता हो, से मुलाकात होना, हादसे का समाचार मीडिया में प्रमुखता से आना या उस घटना से मिलतीजुलती घटनाओं का बारबार होना पीडि़ता के दिमाग में उस हादसे की यादें ताजा करता है. ऐसे में उसे सालों बाद भी आप के सपोर्ट की जरूरत पड़ सकती है.

उस की बात सुनें : पीडि़ता के दिमाग से इन बातों को दूर करने का अच्छा तरीका है कि उसे इस बारे में हर बात कहने का मौका दें. उस से बारबार सवाल न पूछें, लेकिन वह खुद जो भी कहना चाहती है उसे ध्यान से सुनें. उसे  अपना  क्रोध, हताशा या पछतावा जाहिर करने दें.

गले लगाने से पहले पूछें : यह मानव स्वभाव है कि आप अपने प्रियजन, जो किसी हादसे से गुजरा है, को गले लगाना या बांहों में भर कर रोना चाहते हैं. मगर कई दफा यह सही नहीं होता. खासकर हादसे के तुरंत बाद व्यक्ति फिजिकल टच नहीं चाहता. उसे डेली रूटीन में वापस आने और सामान्य होने के लिए समय चाहिए होता है.

विक्टिम को दोष न  दें :  कुछ लोगों की आदत होती है कि हादसे के बाद पीडि़ता को ही दोष देने लगते हैं कि तू ने ऐसा क्यों किया, इस तरह के कपड़े क्यों पहने, वहां गई क्यों, उस से फाइट क्यों नहीं की, ऐसा क्यों होने दिया वगैरहवगैरह.

रिलैक्स होने में मदद करें : जब कोई शख्स ट्रौमा के दौर से गुजरता है और तनाव भरे पल बिता रहा होता है  तो उसे फिर से रिलैक्स हो कर जीना सिखाना जरूरी है. रिलैक्स होने का जरिया अलगअलग होता है. कोई किताबें पढ़ कर, कोई संगीत सुन कर तो कोई म्यूजिक कंसर्ट्स में जा कर तो कोई बच्चों के साथ खेल कर सुकून पाता है. जरिया कोई भी हो, आप के प्रियजन को जो चीज पसंद हो वह करने को उसे प्रेरित करें.

सपोर्ट ग्रुप से मिलवाएं : जब हम अपने जैसे हादसे के शिकार व्यक्तियों से मिलते हैं तो एक अलग ही तरह का कनैक्शन महसूस करते हैं. समाज में बहुत से ट्रौमा स्पेसिफिक सपोर्ट ग्रुप्स हैं जिन का मैंबर बनने के लिए कोई चार्ज नहीं देना होता. जैसे चाइल्डहुड एब्यूस और सैक्सुअल एसौल्ट, एसिड अटैक आदि.  जितना ही आप का प्रियजन इस ग्रुप के सदस्यों के साथ जुड़ेगा उतनी ही जल्दी वह ट्रौमा के दर्द से रिकवर होता जाएगा.

भूलने को न कहें : पीडि़ता से बारबार सबकुछ भूलने को न कहें. वह इतनी सहजता से कुछ भी नहीं भूल सकती. उसे जताएं  कि आप उस का दर्द समझते हैं और केयर करते हैं.

वापस उसी स्थान पर न ले जाएं जहां क्राइम हुआ था : अकसर पीडि़ताएं  उस जगह पर दोबारा जाने से बचती हैं, जहां उन के साथ हादसा हुआ था. उस स्थान और परिस्थिति के आते ही वे खौफ महसूस करने लगती है. आप को उन के अंदर का यह खौफ दूर करना चाहिए. कुछ  मीठी और अच्छी यादें क्रिएट करें ताकि उन के दिमाग में मौजूद कड़वी यादें हलकी पड़ जाएं.

लड़की की आवाज निकाल कर फांसा प्यार के जाल में

फेसबुक पर दोस्ती कर के ठगे जाने की घटनाएं आए दिन मीडिया में आती रहती हैं, लेकिन हाल ही में एक ऐसी घटना सामने आई, जिस में एक युवक ने लड़की की आवाज निकाल कर दूसरे युवक से न सिर्फ दोस्ती की बल्कि 2 साल तक प्यार का नाटक करते हुए उस से सवा 4 लाख रुपए भी ठग लिए.

मामला पंजाब के जिला मोगा का है. मोगा जिले के गांव काऊके कलां के रहने वाले कर्मजीत सिंह ने फेसबुक पर एक लड़की के नाम से अपनी आईडी बना रखी थी.

पहली दिसंबर, 2016 को कर्मजीत सिंह ने गांव लोपों के रहने वाले कुलविंदर सिंह को फोन किया. उस ने कुलविंदर का फोन नंबर उस की फेसबुक आईडी से लिया था. खास बात यह थी कि कर्मजीत ने अपना नाम मनप्रीत कौर बताते हुए लड़की की आवाज में बात की थी.

पहली बार की बातचीत में ही कुलविंदर सिंह उस की आवाज और बातों से प्रभावित हो गया. धीरेधीरे उन की बातों का सिलसिला बढ़ता गया. कर्मजीत उर्फ मनप्रीत कौर ने अपनी लच्छेदार बातों से कुलविंदर पर अपना प्रभाव जमा लिया था.

इस के बाद दोनों वाट्सऐप से भी बातें करने लगे. हकीकत से परे कुलविंदर यही समझता था कि उस की दोस्ती मनप्रीत कौर नाम की एक लड़की से है. इसलिए वह उसे प्यार करने लगा था.

लड़की की आवाज में बात करने वाले कर्मजीत ने अब कुलविंदर सिंह को ठगना शुरू कर दिया. वह कभी उस से मोबाइल फोन खरीदने के नाम पर पैसे मांगता तो कभी घरेलू जरूरत के लिए.

22 साल का कुलविंदर सिंह उस की हर जरूरत पूरी करता था. कुलविंदर ने तो मनप्रीत कौर से शादी करने का भी फैसला कर लिया था. अलगअलग बहानों से कर्मजीत सिंह उस से 4 लाख 30 हजार रुपए ऐंठ चुका था.

एक दिन कुलविंदर सिंह ने अपने घर वालों से कह दिया कि वह काऊके कलां की रहने वाली मनप्रीत कौर से शादी करना चाहता है. कुलविंदर के घर वाले वैसे तो अपनी पसंद की लड़की से उस की शादी कराना चाहते थे, लेकिन उस की जिद पर वह मनप्रीत कौर से उस की शादी कराने को तैयार हो गए.

कुलविंदर के पिता अवतार के एक दोस्त काऊके कलां में रहते थे. उन्होंने अपने दोस्त से उस के गांव में रहने वाली मनप्रीत कौर नाम की लड़की और उस के घर वालों के बारे में पता करने को कहा.

अवतार सिंह के दोस्त ने अपने गांव में पता लगाया तो जानकारी मिली कि मनप्रीत कौर नाम की वहां कोई लड़की नहीं है. उन्हें यह जानकारी जरूर मिल गई कि गांव में कर्मजीत सिंह नाम का एक लड़का लड़की की आवाज में बात कर के फेसबुक पर लड़कों को फांसता है.

इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी पता लगा लिया कि कुलविंदर सिंह मनप्रीत कौर के जिस फोन नंबर और वाट्सऐप नंबर परबात करता था, वह फोन नंबर कर्मजीत का ही था.

यह खबर मिली तो कुलविंदर सिंह के पैरों तले से जमीन खिसक गई. क्योंकि वह तो लड़की समझ कर उस पर 4 लाख 30 हजार रुपए खर्च कर चुका था. चूंकि कर्मजीत पर वह मोटी रकम खर्च कर चुका था, इसलिए उस ने 14 फरवरी, 2018 को एसएसपी से मिल कर इस मामले की शिकायत की.

एसएसपी के आदेश पर थाना निहाल सिंह वाला के इंसपेक्टर सुरजीत सिंह ने कर्मजीत सिंह और उस के 2 भाइयों के खिलाफ रिपोर्ट कर जांच शुरू कर दी है.

मेहंदी है रचने वाली…

किसी भी दुल्हन के लिए उसके लहंगे, ज्वैलरी, मेकअप और हेयर स्टाइल के अलावा मेहंदी भी बेहद खास होती है. वो कहते हैं न कि अगर लड़की के हाथों पर मेहंदी का रंग गहरा हो तो उसका पति उसे बहुत प्यार करता है और अगर मेहंदी का रंग फीका रह जाए तो उसका मन उदास हो जाता है. अगर आप भी अपने हाथो में मेहंदी रचाने जा रही हैं तो हमारी इस खबर पर एक नजर जरूर डाल लें. आज हम आपको बता रहे हैं कि डार्क मेहंदी रचाने के लिए आपको क्या-क्या उपाय करने चाहिए और किन बातों का ख्याल रखना चाहिए.

मेहंदी लगाने से पहले और बाद में इन बातों का रखें ख्याल

मेहंदी लगवाने से पहले अपने हाथों को अच्छी तरह से धोकर साफ कर लें ताकि अगर आपके हाथों पर किसी तरह का लोशन या फिर औयल लगा हो तो वह निकल जाए. वैक्सिंग या स्क्रबिंग मेहंदी लगवाने से पहले ही करें क्योंकि मेहंदी लगाने के बाद स्क्रब या वैक्स करने से मेहंदी का रंग फीका पड़ सकता है. मेहंदी लगाने पर सीधा सूरज की रोशनी में बैठने से भी परहेज करें क्योंकि इससे मेहंदी जल्दी सूख जाएगी और सूरज की रोशनी मेहंदी का रंग फीका बना देगी. मेहंदी झड़ने के बाद हाथों को पानी से दूर ही रखें. हाथों को रंगड़ कर सूखी मेहंदी को उतारें या फिर इसके लिए बटर नाइफ की मदद लें.

मेहंदी का रंग डार्क करने के लिए अपनाएं ये घरेलू उपाय

चीनी और नींबू का घोल

मेहंदी का रंग डार्क चढ़ाने के लिए चीनी और नींबू का घोल तैयार कर लें. इसे मेहंदी सूखने पर हाथों पर लगाएं. यह पेस्ट चिपचिपा होने पर मेहंदी को उतरने नहीं देता.

सरसों का तेल

मेहंदी सूखने पर इसे हटाने से 30 मिनट पहले इस पर सरसों का तेल लगाएं. इसे लगाने से मेहंदी आसानी से निकल जाएगी और यह डार्क भी होगी.

विक्स या आयोडेक्स

मेहंदी को हमेशा शाम को लगाएं ताकि यह रात भर लगी रहें. फिर इसे हटाने के बाद विक्स या आयोडेक्स लगाएं. इसे लगाने के बाद हाथों को गर्मी देने से लिए दस्ताने पहनें. इससे हाथों को पर्याप्त गर्मी मिलेंगी और मेहंदी का रंग डार्क होने लगेगा.

#मी टू का कसता फंदा

शहरी औरतों ने कुछ हद तक बगावत का झंडा खड़ा कर दिया है. जिन मर्दों ने कभी उन से छेड़खानी की थी उन का नाम ले कर उन्हें कठघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया गया है. मुकदमे तो नहीं चल रहे पर इन औरतों ने हैसियत वाले मर्दों का नाजायज फायदा उठाने के लिए की गई भद्दी हरकतों का परदाफाश कर दिया है. भारत में आमतौर पर औरतें यह नहीं मान रहीं कि उन के साथ जबरन सैक्स किया गया था लेकिन अमेरिका और यूरोप में औरतों ने माना कि एक बार नहीं कईकई बार उन के साथ जबरन सैक्स किया गया ताकि उन्हें नौकरी या आगे बढ़ने के मौके मिलते रहें.

अपनी हैसियत का फायदा औरतों से उठाना जितना गांवों व कसबों में होता है, उतना कहीं नहीं. गुंडई तो एक अलग बात?है जिस में लड़की या औरत को दबोच कर उस से जबरदस्ती की जाती है और लहूलुहान कर के छोड़ा जाता है. इस पर कभी मुकदमे हो जाते हैं पर आमतौर पर लाज के कारण मुंह छिपाना पड़ता है. बात हैसियत वालों की है जो जोरजबरदस्ती नहीं करते, लालच देते हैं या नुकसान पहुंचाने की धमकी देते हैं और लड़कियों को बदन सौंपने पर मजबूर करते हैं.

जिस से प्यार करते हो उसे कौन कब अपना बदन शादी के पहले या बाद में दे यह उस लड़की की मरजी है पर जहां यह सिर्फ नौकरी, ओहदा, काम बचाए रखने के लिए किया जाए वह हरगिज गलत है.

शहरी औरतों के साथ जो प्त मी टू हो रहा है वह तो लंबी रस्सी का सिरा भर है. गांवकसबों की औरतों के साथ तो यह घरों, स्कूलों, अस्पतालों, कैंपों, आश्रमों, खेतों, गाडि़यों में जम कर होता है जिन में शिकार औरत होने के बावजूद अपने शिकारी के साथ घूमती रहती है क्योंकि उसे जो चाहिए वह केवल बदन दे कर टांगें खोल कर मिल सकता है.

गांवों में अगर बात खुल जाए तो फैलते देर नहीं लगती इसलिए लड़कियां जीतेजी मुंह नहीं खोलतीं. मर्दों की पीढ़ी दर पीढ़ी औरतों को मांगने की आदत बन चुकी है. शहरी मी टू का उफान गांवों और कसबों की जरूरत है क्योंकि इस की शिकार औरतें जिंदगीभर घुटन में रहती हैं. उन्हें हर पल डर रहता है कि कहीं राज खुल न जाए. कभीकभार मर्द को शक हो भी जाता है तो वह मारपीट पर उतर आता है और खुद दूसरी के पास जाने की धमकी दे कर सताता है.

मी टू, यानी मैं भी शिकार रही हूं, गांवगांव, कसबेकसबे में उजागर होना चाहिए. हैसियत का फायदा कोई आदमी न उठा पाए. बदन प्यार में मिले, यह दूसरी बात है चाहे किसी की बीवी का हो या किसी और का पर फोकट में नहीं, बस दोनों की इच्छा हो. न जबरदस्ती हो, न ऐसी नौबत हो कि औरत को लगे कि बदन देने से ही उस का काम बनेगा.

सिंगल सैक्स का बोल्ड अंदाज और युवतियों के बदलते विचार

आकाश में उड़ने की जद्दोजेहद नारी मन में सृष्टि की रचना से जारी है. पुरुषों से मुकाबला कल भी था और आज भी जारी है. युवतियां अब पहले से ज्यादा सशक्त, स्वावलंबी और निडर हो गई हैं और उन सभी कामों को अंजाम दे रही हैं जिन्हें कभी पुरुष ही किया करते थे. घर की चारदीवारी से बाहर आ कर वे कंपनियों में नौकरी कर रही हैं और देर रात घर लौटने से भी नहीं घबरातीं. ऐसे में युवतियां देह स्वतंत्रता, परपुरुष संबंध और सैक्सुअल फ्रीडम भी चाहती हैं. पहले स्त्री के अस्तित्व को संस्कार, शील, गुण और चारित्रिक उच्चता के चश्मे से ही देखापरखा जाता था. ताकीद यही की जाती थी कि कौमार्य को बचाए रखना ही नारीत्व की सब से बड़ी गरिमा है.

परिवर्तन के इस दौर में न सिर्फ युवतियों के विचार बदले हैं बल्कि उस से कई कदम आगे वे दैहिक स्वतंत्रता की बोल्ड परिभाषा को नए कलेवर में गढ़ती और बुनती नजर आ रही हैं.

सैक्सुअल बोल्डनैस का बोलबाला

आज युवतियों ने सैक्स को अपने बोल्ड व बिंदास अंदाज से बदल दिया है. युवतियां न केवल सोशल फोरम में व सार्वजनिक जगहों पर सैक्स जैसे बोल्ड इश्यू को सरेआम उठा रही हैं बल्कि उस के पक्ष में अपना मजबूत तर्क भी पेश कर रही हैं. वे कैरियर ओरिऐंटिड होने के साथसाथ सैक्स ओरिऐंटिड भी हैं. सैक्स के टैबू होने के मिथक को वे काफी पीछे छोड़ चुकी हैं. वे सैक्स को बुराई नहीं समझतीं बल्कि उस का भरपूर लुत्फ उठाना चाहती हैं.

सिंगल सैक्स की पैरोकार आज की युवतियां

कुछ समय पहले तक युवतियों के अकेले रहने या सफर करने पर सवाल उठाए जाते थे, पर जवान होती युवापीढ़ी ने वर्षों से चली आ रही नैतिक व सैक्स से जुड़े सामाजिक मूल्यों की अपनी तरह से व्याख्या की है. सहशिक्षा व बौद्धिक विकास ने इसे बदलने में काफी सहायता की है. शिक्षित स्वतंत्र कम्युनिटी के इस बोल्ड अंदाज ने आम मध्यवर्गीय सोच में भी अपनी पैठ बना ली है. निम्न वर्गों में तो पहले से ही स्वतंत्रता थी. बगावती सुरों ने आजादी पाने की राह आसान कर दी है. युवतियों की आर्थिक स्वतंत्रता ने भी इस में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है.  सिंगल रहने वाली अधिकतर युवतियां इस सैक्सुअल फ्रीडम का बेबाकी से फायदा उठाती नजर आती हैं. वे सैक्स को ऐंजौय करने में हिचकिचाती नहीं हैं. यह भी शरीर की एक आवश्यकता है.

सेफ सैक्स, सेफ लाइफ का फंडा

आधी आबादी का एक बड़ा वर्ग सेफ सैक्स को तरजीह देता है. सैक्स अब इंटरकोर्स का माध्यम मात्र नहीं बल्कि सुरक्षित व आनंददाई बन गया है. युवतियां अलर्ट हैं, जागरूक हैं और अपनी सेहत को ले कर सजग भी हैं. सैक्सुअल इंटरकोर्स के दौरान वे दुनियाभर के उपाय जैसे पिल्स, कंडोम आदि का बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर रही हैं. सिंगल रहने वाली युवतियां अब सैक्स का भी मजा ले रही हैं और फिटनैस भी बरकरार रख रही हैं.

सिंगल सैक्स के फायदे

वर्जनाएं अब टूट रही हैं. पढ़ाई, नौकरी या कामकाज के सिलसिले में युवतियां अपनी जद की सीमाएं लांघ रही हैं. ऐसे में बेरोकटोक वाली एकाकी जिंदगी उन्हें ज्यादा रास आ रही है. माना कि आम भारतीय परिवारों में विवाहपूर्व सैक्स को अभी भी वर्जित समझा जाता है और इसे चोरीछिपे ही अंजाम दिया जाता है, लेकिन यही रोकटोक युवाओं को सैक्स के और अधिक करीब खींच कर ला रही है. वैसे तो सिंगल सैक्स अपनेआप में एक फ्रीडम का एहसास कराता है, पर इस के कुछ फायदे भी हैं जैसे :

–       इस से बोल्डनैस का एहसास होता है.

–       यह कथित वर्जनाओं को तोड़ने का चरम एहसास कराता है.

माना कि सिंगल सैक्स आप को रियल सैक्सुअल फन दे सकता है, पर अपनी सैक्सुअल प्राइवेसी को ले कर सतर्क भी रहें. सैक्सुअल फ्रीडम की भी लिमिट तय करें तभी आप इस के आनंद के चरम पर पहुंच सकती हैं और इस के बिंदास अंदाज में रंग सकती हैं. सैक्सुअल इंडिपैंडैंसी जहां आप को बेबाक व बोल्ड बनाती है वहीं मोरल पुलिसिंग का शिकार भी इसलिए फन के साथ केयर का भी खयाल रखें.

सिंगल सैक्स के नुकसान

भले ही सिंगल रहने वाली युवतियां सैक्स को ले कर मुखरित हों पर इस के अपने कुछ नुकसान भी हैं:

–       मल्टी पार्टनर्स से संक्रमण के खतरे बढ़ जाते हैं.

–       चीटिंग का खतरा हमेशा बना रहता है.

–       लंबे समय तक ऐसी फ्रीडम आप को फिजिकल प्रौब्लम्स भी दे सकती है.

बैडरूम रोमांस बढ़ाने के ये टिप्स आपके बहुत काम आएंगे

पति पत्नी के इश्क को ज्यादा से ज्यादा रोमांस से भरपूर रखने में बैडरूम का बड़ा योगदान होता है. घर में उन का ज्यादा समय बैडरूम में ही बीतता है. वे आराम, सुकून, रोमांस, इश्क के लिए बैडरूम को ही चुनते हैं. बैडरूम की ऊर्जा का प्रभाव उन के संबंधों एवं मानसिकता पर भी पड़ता है. मनोचिकित्सक, दिनेश के मुताबिक यदि पतिपत्नी अपना जीवन प्यारमुहब्बत से भरना चाहते हैं, तो शुरुआत

अपने बैडरूम से ही करें. बैडरूम को परफैक्ट रखें. इस से आप की सैक्स लाइफ हमेशा रोमांस से भरी रहेगी.

बैडरूम सजावट के टिप्स

लाइट: इश्क का इजहार करने में लाइट की अहम भूमिका होती है. अत: बैडरूम में हलकी गुलाबी, आसमानी रंग की लाइट का प्रयोग करें. कमरे में लाइट डाइरैक्ट नहीं इनडाइरैक्ट पड़नी चाहिए. लैंपशेड या कौर्नर लाइट हो तो और भी अच्छा. इस से बैडरूम रोमांस का मजा कई गुना बढ़ जाएगा.

फल रखें: अंगूर, स्ट्राबैरी, केला, चैरी या चीकू की खुशबू बहुत रोमांचित करती है. इस से प्यार करने का मजा दोगुना हो जाता है.

बैडरूम को रोमांटिक बनाएं: पतिपत्नी के अंतरंग संबंधों में मुहब्बत बनी रहे, इस के लिए वे कभी हिलस्टेशन जाते हैं, कभी समुद्र किनारे तो कभीकभी किसी बड़े होटल में. हर जगह की अपनी खूबसूरती होती है. मगर इसी खूबसूरती को, भिन्नता को अपने बैडरूम में शामिल करें, तो पतिपत्नी अपनी रोमांटिक लाइफ को एक डैस्टिनेशन पौइंट दे सकते हैं. कमरे में आर्टिफिशियल फाउंटेन, फूल, चित्र आदि लगाने के साथसाथ अलमारी, सोफे, टेबल आदि की जगह भी बदलते रहें ताकि बैडरूम आकर्षक लगे.

बैडरूम को रखें सुसज्जित: बैडरूम अच्छी तरह डैकोरेटेड हो. उस का इंटीरियर आप को बारबार रूम में जाने को उकसाए. परदे ऐसे कि आसमान नजर आए. हलके परदे इस्तेमाल करें. बैडरूम साफसुथरा हो. उस में तरहतरह के इनडोर पौधे लगाएं, बेल लगाएं. उस में हलकी रोशनी भी आनी चाहिए ताकि आप का मूड और ज्यादा रोमांटिक बने.

तसवीरें: बैडरूम में रोमांटिक तसवीरें लगाएं. लविंगबर्ड, हंस की तसवीर, रैडरोज आदि लगाएं ताकि इन्हें देख कर रोमांस करने का मन करे.

बिस्तर: मूड बनाने में बिस्तर का अहम रोल होता है. अत: गद्दे चुभनशील न हों. बैड से आवाज न आती हो. तकिए आरामदायक हों, बैडशीट का रंग इश्क को उकसाने वाला हो.

खुशबू: खुशबू हमारे अंदर कई तरह के भाव पैदा करती है. रोमांस के लिए कई तरह के परफ्यूम का प्रयोग किया जा सकता है. लैवेंडर, मोंगरा, ब्रूट, वन मैन शो जैसे परफ्यूम संबंध बनाने का मूड बनाते हैं. बैडरूम में खूबसूरत गुलदस्ते रखें. अरोमा कैंडल जलाएं. यह न केवल बैडरूम में हलकी रोशनी देती है, बल्कि इस के जलने से भीनीभीनी खुशबू भी आती है, जो रोमांस, चुहुलबाजी के लिए प्रेरित करती है.

डिस्टर्बैंस न हो: अलार्मघड़ी, मोबाइल, सिंगिंग खिलौने आदि बैडरूम से दूर ही रखें ताकि इन की आवाज प्यार में खलल न डाले.

दीवारों के रंग: दीवारों के रंग भी अपनी मूक भाषा में बहुत कुछ बोल जाते हैं. हलका गुलाबी, औरेंज, आसमानी, तोतईरंग, पेस्टल शेड्स आदि मन में प्यार का भाव जगाते हैं.

बहरे हो सकते हैं माइग्रेन के मरीज, ये है खतरा

आज कल माइग्रेन की समस्या लोगों में तेजी से बढ़ रही है. इसके लिए लोगों की जीवनशैली को बड़ा कारण माना जाता है. ये खबर माइग्रेन के मरीजों के लिए बेहद जरूरी है. एक रिपोर्ट की माने तो इसके मरीजों में उंचा सुनने की समस्या पाई गई है. माइग्रेन के मरीजों में सुनने की क्षमता तुलनात्मक तौर पर कम हो रही है. उनके बहरे होने की संभावना ज्यादा होती है.

हाल ही में हुए अध्ययन में ये बात सामने आई कि जो लोग माइग्रेन पीड़ित हैं उनमें कान बजने की शिकायत देखी गई है. जानकारों का मानना है कि ज्यादा वक्त तक ऐसा होने से उनके कान के अंदरूनी हिस्सों में विकार की संभावना बढ़ जाती है.

शोधकर्ताओं ने देखा कि कान के कुछ अंदरूनी अंगों में खराबी के कारण माइग्रेन की शिकायत हो सकती है. माइग्रेन के मरीजों में अक्सर कान बजने की शिकायत देखी गई है. इससे कान के भीतरी हिस्से में झनझनाहट या कान बजने की शिकायत होती है. इस बीमारी को ‘सेंसोरीन्यूरल हियरिंग इंपेयरमेंट’ भी कहते हैं. इस बीमारी से आप पूरी तरह से बहरे हो सकते हैं.

बता दें कि इल स्टडी में 1,056 मरीज शामिल थे, जिन्हें माइग्रेन की शिकायत थी. इसके अलावा टीम में 4,224 लोग ऐसे भी थे जिन्हें माइग्रेन की शिकायत नहीं थी. नतीजों में सामने आया है कि माइग्रेन के मरीजों में कान की विकृति माइग्रेन रहित लोगों की तुलना में 12.2 फीसदी ज्यादा है.

उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिये कांग्रेस बनी दुश्मन नंबर 1

वैसे तो 2014 में आमचुनाव में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में केवल 2 सीटें ही मिली थीं. इसके बाद भी 2019 के आमचुनाव में केन्द्र में सरकार चला रही भाजपा के लिये कांग्रेस ही दुश्मन नम्बर एक है. राजस्थान, छत्तीसगढ और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव की हार ने भाजपा को अंदर तक हिला कर रख दिया है.

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण को देखें तो यहां पर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला होता है. पहले भाजपा के खिलाफ एक महागठबंधन की योजना बनी थी. बिहार की तर्ज पर बन रहे महागठबंधन में सपा, बसपा और कांग्रेस के साथ कुछ छोटे दलों के शामिल होने की बात चली थी.

सपा-बसपा ने बडे उपेक्षित भाव से कांग्रेस को गठबंधन में महत्व दिया. जिसकी वजह से कांग्रेस ने राजस्थान, छत्तीसगढ और मध्य प्रदेश में सपा-बसपा से कोई तालमेल नहीं किया. चुनाव के पहले यह लग रहा था कि कांग्रेस को इस गठबंधन न करने का नुकसान होगा. वह भाजपा को हराने में सफल नहीं होगी.

लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माने जाने वाले इन चुनावों में जनता ने सबसे अधिक भरोसा कांग्रेस पर दिखाया. उसी वजह से कांग्रेस ने भाजपा से तीनों राज्य छीन लिये. बसपा ने छत्तीसगढ में अजीत जोगी के साथ मिलकर पूरे समीकरण को बदलने के लिये पूरा दमखम लगा दिया इसके बाद भी वहां की जनता ने कांग्रेस के अलावा दूसरे दलों पर भरोसा नहीं किया.

तीन राज्यों में जीत ने कांग्रेस को यह भरोसा दिला दिया कि मोदी को हराया भी जा सकता है. इन तीन राज्यों में लोकसभा की 65 सीटें हैं. उसके मुकाबले अकेले उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं.

आमचुनाव में उत्तर प्रदेश इन 80 सीटों की वजह से ही सबसे खास हो जाता है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने सहयोगी दलों के साथ मिलाकर 73 सीटें मिली थीं. कांग्रेस 2 और सपा के पास 5 सीटें थीं. बसपा का खाता भी नहीं खुला था. उत्तर प्रदेश में इस क्लीन स्वीप के साथ भाजपा ने केन्द्र में और बाद में विधानसभा चुनाव में बहुमत की सरकार बनाई. उत्तर प्रदेश की जनता ने जो भरोसा भाजपा पर किया वह उस पर खरी नहीं उतरी. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के बाद लोकसभा की 3 और विधानसभा की 1 सीट पर हुये उपचुनाव में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा.

केन्द्र और प्रदेश दोनों ही जगह पर सरकार चलाने के बाद भी भाजपा उत्तर प्रदेश की जनता को राहत पहुंचाने में असफल रही है. ऐसे में उसके लिये लोकसभा चुनाव में पहले जैसा प्रदर्शन दोहराने की चुनौती है. सपा में परिवार का विवाद होने से पार्टी को नुकसान हुआ. बसपा में मायावती अपने वोटबैंक को एकजुट नहीं कर पाईं. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद दलित-सवर्ण विवाद में मायावती की भूमिका से दलित खुश नहीं हैं. मायावती से अधिक दलितों का साथ भीम आर्मी के नेता चन्द्रशेखर ने दिया. ऐसे में मायावती का वोटर बिखर चुका है.

भाजपा की केन्द्र सरकार ने दलित एक्ट को लेकर जिस तरह का काम किया उससे सवर्ण नाराज हुये जिसका पल तीन राज्यों के चुनाव में देखने को मिला.

सवर्ण ही नहीं दलित और पिछड़ा वर्ग भी अब कांग्रेस की तरफ झुक रहा है. कांग्रेस नेता सुरेन्द्र सिंह राजपूत कहते हैं ‘करीब 32 साल के लंबे अरसे से उत्तर प्रदेश में गैर कांग्रेस सरकारों का राज रहा है. इस दौरान उत्तर प्रदेश के विकास के लिये क्या हुआ? यह जनता देख रही है. विकास का महज नारा देकर जाति और धर्म के नाम पर जनता को लड़ाया गया. राजनीतिक भ्रष्टाचार और लूट के सहारे सरकारें चलाई गईं. जनता ने यह सब देख लिया है. झूठे वादे और दावे जनता परख चुकी है.

अब वह कांग्रेस को परखना चाहती है. सपा-बसपा और भाजपा को वोट देकर निराश हो चुकी जनता अब आपसी भाईचारा बनाने के लिये कांग्रेस की नीतियों और कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को मौका देना चाहती है. केन्द्र का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है. लोकसभा चुनाव में प्रदेश की जनता कांग्रेस के पक्ष में है. भाजपा की केन्द्र और प्रदेश की सरकार जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है.’

शाहरुख आखिर अबराम के ही साथ ज्यादा छुट्टियां क्यों बिताते हैं?

शाहरुख खान के दो बेटे आर्यन, अबराम व एक बेटी सुहाना खान हैं. अबराम सबसे छोटे हैं. अक्सर खबरें आती रहती हैं कि शाहरुख खान अपने बेटे अबराम के साथ छुट्टी मनाने गए हैं.

इस संबंध में शाहरुख खान कहते हैं – ‘‘इसकी एकमात्र वजह यह है कि अबराम मेरे व मेरे दोस्तों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताना पसंद करते हैं. जबकि आर्यन व सुहाना ज्यादा सामाजिक नहीं हैं. एक बार गौरी ने अबराम को एक घंटे के लिए मेरे पास महबूब स्टूडियो छोड़ा था.अब तो उसे यहां आना अच्छा लगता है.

फिल्में देखता है. फुटबौल खेलता है. बिल्लियों और मुर्गियों के साथ खेलता है. उसके साथ मेरा रहना जरूरी नही होता. वह रात में 9 बजे सो जाता है. सुबह जल्दी उठता है. जब हम लंदन में होते हैं, तो वह हाईड पार्क में जाना पसंद करता है. यदि मैं उसके साथ हूं, तो ठीक, अन्यथा अकेले जाना पसंद करता है. उसे घूमना बहुत पसंद है. फिल्म ‘हैरी मेट सेजल’ की शूटिंग के दौरान गौरी ने उसे हमारे पास चार दिन के लिए छोड़ा था, पर वह पूरे 32 दिन रहा. वह मेरे साथ नीदरलैंड, पुर्तगाल और हंगरी भी गया.’’

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