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पत्रप्रेम से चैटप्रेम तक

Hindi Stories: प्रेम अब खत में नहीं, चैटबौक्स में होता है. पहले खत लिखने में आधा दिन गुजर जाता था और आधा साल गुजर जाता था ’आई लव यू’ कहने में. अब तो आई लव यू एक सप्ताह भी इंतजार नहीं कर सकता. वो भी कौपीपेस्ट कर भेजा जाता है और कई बार गलती से किसी और को भी चला जाता है.

नजरों से दिल तक का रास्ता अब डेटापैक से हो कर गुजरता है. इश्क अब दिल से नहीं, अंगूठे से जन्म लेता है. बातें आंखों से नहीं, इमोजी से होती हैं. जिस प्रेम के लिए कवि पपीहा चकोर व चांद का सहारा लेता था, आज वही प्रेम ‘टिंडर’ पर राइट स्वाइप (मैं इच्छुक हूं) कर के तय हो रहा है.

पहले प्यार में इत्तेफाक होता था, अब लोकेशन औन होती है. पहले रोमांस ‘मंदिर जाने के बहाने तुम से मिलने आई’ या छत से इशारे, पनवाड़ी के यहां नोट भेज कर होता था, अब ‘नीयरबाई मैचेस फाउंड’ से होता है. लड़की की लोकेशन गूगल मैप पर ट्रैक हो जाती है, मुलाकात का समय इंस्टा स्टोरी से पता चलता है. पहले खत में गुलाब सूख जाता था अब चैट में बैटरी सूख जाती है. पहले मिलते वक्त दिल धड़कता था, अब मोबाइल का नोटिफिकेशन धड़काता है.

बीते जमाने के प्रेम में इंतजार का मजा होता था कि तुम मु?ो इतना मत सताया करो. अब 10 मिनट  रिप्लाई न आए तो ब्लौक कर ‘भाड़ में जा’ कहते हैं. पहले तसवीर देखने के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता था, अब गुडमौर्निंग के साथ ही चार सैल्फी आ जाती हैं. पहले प्रेम आत्मीय व गोपनीय होता था, अब इंटरनैटीय व ओपनीय होता है. व्हाट्सऐप समूह में लाइव अपडेट देते हैं कि- भाई, वो आ गई है, हम कैफे में बैठे हैं. भाई, उस ने अभी कौफी की पहली चुस्की ली.

टिंडर, बंबल व हिंज अब ये डेटिंग ऐप्स नहीं, प्रेम के एटीएम बन चुके हैं जहां इश्क कैश की तरह औन डिमांड मिल सकता है लेकिन सारा कैश असली हो, जरूरी नहीं. पहले छोरा मोहब्बत के लिए सीटी बजाता था, अब मैच का नोटिफिकेशन बजाता है. प्रपोजल से पहले इंस्टा हैंडल पूछा जाता है. मोहब्बत में अब असली दोस्त एलगोरिदम है. पहले चिट्ठी फाड़ी जाती थी, अब चैट ब्लौक कर दिया जाता है. टिंडर की एक बायो ‘लुकिंग फौर गुड वाइब्स ओनली.’ मतलब काफी पिलाओ, मूवी दिखाओ और वाइबवाइब खेलो. कोई कमिटमैंट न मांगो. ‘बम्बल’ पर महिला पहल करती है लेकिन 24 घंटे में जवाब नहीं आया तो मैच वैसे ही हवाहवाई हो जाता जैसे मौसम की पहली बारिश छू कर निकल जाती है. आजकल आप को कोई मिस नहीं करता. बस, लास्ट सीन चैक करता है. पहले जुदाई पर दर्दभरे गाने सुनते थे, अब चैटजीपीटी से पूछते हैं कि एक्स को कैसे जल्दी से जल्दी मैमोरी से सदैव के लिए डिलीट करें.

‘हिंज’ बेचारा गंभीर प्रेमी टाइप ऐप है जो कहता है डिजाइनड टू बी डिलीटेड, लेकिन यूजर डिलीट नहीं करता क्योंकि एक्स की संख्या बढ़ जाती है. पहले रिश्ता टूटने पर दोस्त, दरजी, बूआ, भाभी या मौसी मिल कर दुख जतातीं, ढांढ़स बंधाती थीं, अब एक नोटिफिकेशन ‘एक्सवाईजेड अनमैच्ड यू’ का आ जाता है.

आज की पीढ़ी का रोमांस फास्ट फूड जैसा स्वाइप, चैट, मीट एंड घोस्ट यानी अचानक गायब हो जाना तक है. फिर नए प्रोफाइल पर नया शिकार ढूंढ़ना. रिश्ते का टिकाऊपन नैटवर्क स्पीड के समानुपाती है. सिग्नल नहीं, तो प्रेम भी औफलाइन. पहले प्रेम में खतों की खुशबू होती थी, अब स्मार्टफोन में परफ्यूम फिल्टर होता है. बाप यदि कभी पूछने की जुर्रत कर ले कि कहां मिले तुम दोनों तो बेटा बेबाकी से कहता है औनलाइन क्लास में.

 

अब प्रेम की शुरुआत चैटजीपीटी से होती है. भाई एक अच्छी ओपनिंग व क्लोजिंग लाइन के साथ उसे पटाने के लिए 10 बैस्ट लाइनें दे दे. उसी को कौपी-पेस्ट कर भेज देता है. और जवाब आता है, आर यू गूगल? बिकौज यू हैव एवरीथिंग आई हैव बीन सर्चिंग फौर. और लड़की टाइपिंग दिखाती है, फिर गायब हो जाती है. भाई गूगल बनोगे तो सर्च रिजल्ट बन कर रह जाओगे बौयफ्रैंड नहीं.

तो, आज का प्रेम ऐसा है कि वैलेंटाइन डे पर तो ऐक्टिव रहता है लेकिन करवाचौथ आतेआते पासवर्ड बदल देता है.  बायो में लिखा होता है, लव पेट्स, नैटफ्लिक्स एंड ट्रैवल. पर लव पेट्स का मतलब केवल आवारा कुत्तों को कभीकभार बिस्कुट खिला देने तक है. ट्रैवल तो किया ही नहीं और नैटफ्लिक्स तो दोस्त के पासवर्ड पर चल रहा है.

निकट भविष्य में अब शादी के कार्ड पर लिखा मिलेगा, ‘स्वाइप कर के मिले, वाइब कर के जुड़े और अब फौरएवर के लिए कनैक्ट हो रहे.’ कृपया, हमारी डेटिंग से शादी की जर्नी को आशीर्वाद दें. Hindi Stories

 

 

आज भी: महिलाएं सिर्फ भोगने के लिए

Gender Nnequality: किसी भी समाज का निर्माण एक दिन में नहीं होता. समाज में रहने वाले लोगों की सोच, उन के विचार, उन की मान्यताएं समाज की दशा व दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. समाज में रहने वाले लोगों के विचार, उन की सोच पीढ़ीदरपीढ़ी स्थानांतरित होती हुई उस समाज की मान्यताओं का रूप ले लेती हैं. इन मान्यताओं एवं संस्कृति का प्रभाव उस समाज में रहने वाले लोगों पर पड़ता है. धर्मों ने इस में सब से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

पुराणों और स्मृतिकारों की दृष्टि में महिला

हमारे पुराणों व संहिताओं में और स्मृतिकारों व टीकाकारों ने महिलाओं की गिनती जिस प्रकार से बुराइयों में की है, संभवतया उस से पुरुषों के अंदर महिलाओं के प्रति नफरत व घृणा का बीजारोपण अवश्य हुआ होगा. स्मृतिकारों और टीकाकारों ने महिलाओं की गिनती कुछ प्रमुख बुराइयों में की है, उसे सभी दुखों का स्रोत बताया गया है, उसे नियंत्रण में रखने के लिए मारनेपीटने के निर्देश दिए गए हैं.

मैत्रायणी संहिता में स्त्री कपासा व सुरा के साथसाथ 3 प्रमुख बुराइयों में गिनती की गई है. मनु ने तो स्त्रियों के प्रति बहुत ही कठोर बात कही है. उस ने कहा है,  ‘स्त्रियों की इच्छाएं अपवित्र होती हैं, वे बेईमान, ईर्ष्यालु और दुराचारिणी होती हैं.’

ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है, ‘पुत्री ही सभी दुखों का स्रोत है.’ कथासरित्सागर में लिखा हुआ है, ‘पुत्र सुख का प्रतीक है और पुत्री दुख का मूल.’

स्मृतिकार बृहस्पति का मत है कि यदि शत्रु जबरदस्ती किसी स्त्री से संभोग कर ले तो स्त्री का त्याग न किया जाए, स्त्री से प्रायश्चित्त करा कर पति उसे वापस ले सकता है. यानी, पीडि़ता से ही प्रायश्चित्त कराने की बात कही गई.

मत्स्य पुराण के अनुसार, ‘पत्नी को पति की देवता की भांति पूजा करनी चाहिए.’

वेदव्यास ने लिखा है, ‘यदि पति विदेश गया है तो पत्नी को अपने शरीर को सुखा कर कांटा कर लेना चाहिए, उसे किसी प्रकार का शृंगार नहीं करना चाहिए.’

स्मृतियों के टीकाकारों का मत था, ‘जब पति विदेश गया हो तो उस के अन्य संबंधियों को उस पर नियंत्रण रखना चाहिए, उसे सदा गृहकार्य में इतना व्यस्त रखना चाहिए कि वह अन्य पुरुषों के विषय में सोच भी न सके.’

मत्स्य पुराण ने तो निर्देश दिया है, ‘पत्नी को ठीक करने के लिए पति उसे रस्सी से, बांस से मार सकता है.’

हिंदू धर्मग्रंथों में स्त्रियों को हर तरीके से नियंत्रण में रखने की बात, उसे मारनेपीटने की बात ने किस प्रकार की मानसिकता वाले पुरुषों की जमात का निर्माण किया होगा, इस की सहज कल्पना की जा सकती है.

जाहिर सी बात है महिलाओं के प्रति घृणित सोच, मारनेपीटने जैसी पाश्विक विचारधारा ने पीढ़ीदरपीढ़ी स्थानांतरित होती हुई आज के आधुनिक समाज, सभ्य कहे जाने वाले समाज के पुरुषों की मानसिकता के निर्माण में अवश्य ही भूमिका निभाई होगी. इस के उदाहरण हमें दिल्ली जैसे शहर तक में आएदिन देखने को मिल रहे हैं.

पशु प्रवृत्ति के पुरुष

शहर कोई भी हो, जगह कोई भी हो महिलाओं के प्रति घृणित सोच रखने वाले हिंसक प्रवृत्ति के पुरुष हर तरफ मौजूद हैं. जिस प्रकार से स्त्री को पुरुषों के पतन और विनाश की ओर ले जाने वाली बता कर स्त्री की पराधीनता को अनिवार्य ठहराया गया, जिस पुरुष सत्तात्मक समाज का निर्माण किया गया वह आज भी जारी है. महिलाओं के प्रति बुरी सोच रखने वाले, उसे इंसान न सम?ा कर उपभोग की वस्तु सम?ाने के आदी पुरुषों की एक बड़ी संख्या आज के आधुनिक व सभ्य कहे जाने वाले समाज में भी मौजूद है.

द्य  ऐसे पुरुष महिलाओं को अपनी संपत्ति समझते हैं.

द्य  उन के लिए महिलाओं का काम सिर्फ बच्चे पैदा करना है, घर संभालना, खाना बनाना है.

द्य यदि महिलाएं बाहर निकलें तो इन पुरुषों की इजाजत से, पुरुषों की मरजी से निकलें.

द्य महिला का खानापीना, उठनाबैठना, हंसनाबोलना सभीकुछ पुरुषों की मरजी से हो.

द्य पुरुषों को हर हाल में महिलाओं को नियंत्रित रखना है क्योंकि उन के तथाकथित पुराणों में, स्मृतिकारों ने उन्हें यह निर्देश दिया हुआ है कि महिलाओं को किसी भी तरह से नियंत्रित रखना है. बाहर की दुनिया सिर्फ और सिर्फ पुरुषों के लिए है. ऐसे लोग महिलाओं को देवी तो बताते हैं पर उन के लिए देवी की परिभाषा घर की चारदीवारी में कैद महिलाएं होती हैं.

पौरुषत्व की तुष्टि

पुरुषों का हिंसात्मक व्यवहार महिलाओं के प्रति कभी भी जागृत हो सकता है. कब किस परिस्थिति में वह अपने अंदर छिपे बैठे अमानवीय, रूढि़वादी, निरंकुश चेतना से ग्रसित हो उठेगा, इस का भी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. शिक्षा, आधुनिकता, बराबरी की बातों के चोले के पीछे छिपे, सभ्यता एवं संस्कृति की खाल में लिपटे बैठे उस के अंदर का वास्तविक रूप, उस का अमानवीय चरित्र, कब किस वक्त निर्भय, स्वतंत्र और विवेकशील हो रही महिलाओं के खिलाफ जागृत हो कर स्त्री के जिस्म और व्यक्तित्व को रौंद डाले, इस का कुछ भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता.

इन पुरुषों की सोच उस याज्ञवल्क्य की तरह है जो उस हरेक गार्गी के सिर को पत्थर से कुचल देना चाहता है. जो पुरुष के समक्ष तर्कवितर्क करे, उसे वादविवाद में, बुद्धि में गार्गी से हारना पसंद नहीं.

बेडि़यों में जकड़ने की साजिश

पुरुषवादी सोच वाले पुरुषों की यह साजिश है कि बलात्कार का भय दिखा कर, आतंकित कर के वापस महिलाओं को रूढि़वादी बेडि़यों से जकड़ा रखा जाए. इन्हें मत्स्य पुराण के उस निर्देश का पालन करना है जिस में स्त्रियों को मारपीट कर नियंत्रित रखे जाने की बात कही गई है. उन महापुरुषों की हिदायतों का अनुसरण करना है जिन्होंने ‘स्त्रियों की उच्च शिक्षा वर्जित है’ के नारे लगाए हैं. स्त्रियों को सिर्फ सिलाईकढ़ाई, बच्चों के पालन एवं खाना बनाने की शिक्षा दी जाए और इन्हीं कामों में व्यस्त रखे जाने की वकालत की गई है.

आज कथावाचकों की भीड़ सी आ गई है. वे अपने प्रवचनों में समाज के काफी बड़े समूह, जिस में महिलाएं एवं बच्चों की ही तादाद अधिक होती है, को नियंत्रित करने की ही तो बात बताते हैं. महिलाओं को भोग्य वस्तु ही तो बताया जा रहा है, जैसे महिलाएं मौडर्न ड्रैस नहीं पहन सकती हैं, उन्हें छोटे कपड़े नहीं पहनने चाहिए, महिलाओं को मर्यादा में रहना चाहिए, लड़कियों को देररात तक नहीं घूमना चाहिए, उन्हें नौकरी नहीं करनी चाहिए, पतियों की सेवा करनी चाहिए, सुंदरता महिलाओं की दुश्मन है, उन्हें मेकअप यानी श्रृंगार नहीं करना चाहिए.

इन आयोजनों में अपने घरों की औरतों को पुरुष जानबूझ कर भेजते हैं और औरतें सोचती हैं कि यहां उन्हें खुली हवा में सांस लेने को मिल रही है. असल में ये पंडाल हिटलर के गैस चैंबर जैसे हैं जहां विश्व युद्ध के दौरान लोगों को यह कह कर भेजाजाता था कि वहां उन्हें खाना मिलेगा.

कथावाचकों की अपनी दुनिया

कथावाचकों के प्रवचनों में कहा जाता है कि बलात्कार की घटना के लिए महिलाएं ही खुद जिम्मेदार हैं, उन की स्वतंत्रता जिम्मेदार है, उन के छोटे कपड़े जिम्मेदार हैं, उन का घर से बाहर निकलना ही गलत है. वे कहते हैं कि लड़कियां नौकरी नहीं कर सकतीं, महिलाओं का काम पतियों की सेवा करना है, उन का काम खाना बनाना और बच्चे पालना है. प्रवचन सुनसुन कर महिलाएं अपने संरक्षण में पल रहे बच्चों की सोच में भी इन्हीं बातों को आरोपित करेंगी. ये महिलाएं अपने घर में पल रही बच्चियों को नियंत्रित करेंगी. उन्हें बाहर आनेजाने और मौडर्न ड्रैस पहनने से रोकेंगी. वे उन वेश्याओं की तरह हो जाती हैं जो ग्राहकों को देख कर खुदबखुद अपना शरीर सौंपने के लिए उन के पीछे दौड़ती हैं.

प्रवचनों को सुन कर युवकों, युवतियों व बच्चों के कौग्निटिव लैवल का क्या हश्र होता होगा, यह विचार का विषय है. इन बच्चों के विकास में किस तरह का अवरोध उत्पन्न होता होगा, यह सम?ाने की बात है. इस का एक दुष्परिणाम यह देखने को मिलेगा कि इन बच्चों में सामने वाले की तकलीफ और कष्ट को महसूस करने की क्षमता शून्य हो जाएगी.

राजनेता भी पीछे नहीं

इन कथावाचकों के अतिरिक्त जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों व राजनेताओं के बयान भी इसी मानसिकता से ग्रसित होते हैं. बलात्कार के मामलों में उन के दिए हुए बयान उन के पुरुषसत्तात्मक सोच की ही पोलपट्टी खोलते हैं. वैसे पुरुष भी धर्म के उतने ही गुलाम होते हैं जितनी औरतें पुरुषों की. तभी तो पुरुष धर्म के नाम पर आत्मदाह तक कर डालते हैं, धर्म को मारने और मरने वाले पुरुष चाहिए और बदले में वह पुरुष को गुलाम औरतें दे देता है.

सपा नेता अबू आजमी महिलाओं के छोटे कपड़े पहनने पर लगाम लगाने की बात करते हैं. तो कैलाश विजयवर्गीय, भाजपा नेता, फरमाते हैं- जब सीता ने लक्ष्मणरेखा पार की थी तभी उन का अपहरण हुआ. अपने इस बयान में कैलाश विजयवर्गीय भी महिलाओं को ही नियंत्रित करने की बात कर रहे हैं.

ऐसा समाज जहां अहल्या के बलात्कारी इंद्र की तो पूजा की जाए, किंतु बलात्कार पीडि़ता अहल्या को दंडित किया जाए.

ऐसा समाज जिस में किसी बिलकिस बानो के बलात्कारियों का फूलमाला से स्वागत किया जाए और बलात्कार पीडि़ता को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए.

ऐसा समाज जिस में देश के खिलाड़ी बेटियों के साथ दुर्व्यवहार करने वाला संसद की गरिमा बढ़ाए.

ऐसा समाज जिस में बलात्कारी बाबा के लिए जेल की सजा सजा नहीं, बस, एक मजाक बन कर रह जाए, जिसे बारबार पैरोल पर छोड़ दिया जाए.

ऐसा समाज जहां बलात्कारियों को नियंत्रित करने की जगह महिलाओं को नियंत्रित करने की बात की जाए. ये सारी बातें बलात्कारियों के मनोबल को बढ़ावा देती हैं.

एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर दिन 86 बलात्कार होते हैं. देश में लगातार महिला उत्पीड़न व रेप के बढ़ते मामले महिलाओं के प्रति बर्बर हो चुके समाज, उन के प्रति लोगों की घृणित सोच की पुष्टि करते हैं. यह कुल बलात्कारों का एक प्रतिशत भी नहीं होगा क्योंकि पीडि़ता की बदनामी ज्यादा होती है, बलात्कारी मर्द माना जाता है.

महिलाओं के प्रति बर्बर हो चुका समाज किस प्रकार की पाश्विक प्रवृत्ति की दलदल में धंसता चला जा रहा है, यह किस तरह के समाज की रचना हम ने की है, इस पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है. आश्चर्य है कि बराबरी का हक देने वाले संविधान की 78 वर्षगांठ मना लेने के बाद भी हम महिलाओं को नियंत्रित करने, महिलाओं को किस प्रकार के पोशाक पहनने चाहिए, उसे क्या खाना, क्या पीना चाहिए, यह तय करने वाले पुरुषवादी मानसिकता के समाज में सांस ले रहे हैं.

यह कैसा समाज है जहां महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने की प्रवृत्ति समाज के पुरुषों को अपने ताकतवर होने का महागौरव प्रदान करती है. यह उसी गौरवपूर्ण कृत्य से प्रेरित है जिस में किसी कुंती को भरी सभा में घसीट कर निर्वस्त्र किया जा सकता है. मणिपुर में जब महिलाओं के प्रति इस प्रकार की बर्बरता, इस तरह का दुर्व्यवहार हो रहा था तब समाज के, देश के ठेकेदारों ने ठीक उसी प्रकार चुप्पी साध ली थी जिस प्रकार महाभारत में धृतराष्ट्र और भीष्म पितामह ने मौन साधा हुआ था. आज तक मणिपुर के उन लोगों को पकड़ा नहीं गया है जिन्होंने औरत को नंगा कर के घुमाया था.

इस से ही समाज में यह संदेश जाता है कि तुम पुरुष हो, स्वतंत्र हो, तुम कुछ भी कर सकते हो. तुम्हारा हर अपराध क्षम्य है, नियंत्रण तो महिलाओं का करना है. पुरुषों को दी जाने वाली यही शिक्षा उन्हें निरंकुश बनाती है. चाहे देहरादून बस में बच्ची के साथ होने वाला गैंगरेप हो, बागेश्वर जिला में नाबालिग के साथ उस के ही ताऊ द्वारा किया जाने वाला रेप हो, उत्तराखंड में नर्स का रेप जिस का शव कंकाल में तबदील हो चुका था, बिहार में मुजफ्फरपुर

की नाबालिग का बलात्कार और बर्बरतापूर्वक हत्या, कोलकाता में डाक्टर का बलात्कार और बर्बरतापूर्वक उस की हत्या आदि सब के पीछे महिलाओं के प्रति घृणित सोच, उसे भोग्य वस्तु सम?ाने की गंदी सोच रखने वाले पुरुष, वर्चस्व की मानसिकता की ही कहानी है. हम ने एक ऐसे समाज का निर्माण कर दिया है, पुरुषों की एक ऐसी जमात खड़ी कर दी है जो महिलाओं को एक उपभोग की वस्तु से अधिक कुछ नहीं समझता, जिसे यह महसूस ही नहीं होता कि उस के बर्बरतापूर्ण कृत्य से महिलाओं को कष्ट पहुंच रहा है या उसे दर्द हो रहा है. Gender Nnequality

जेन कौशिक के बहाने फिर उजागर हुई – ट्रांसजैंडर्स की ट्रैजेडी

Human Rights Issue: किन्नर कितने ही शिक्षित और जागरूक हो जाएं, फिर भी उन के प्रति समाज के नजरिए के बदलने की उम्मीद न के बराबर ही दिखती है. इस की वजह मौजूदा वर्णव्यवस्था में किन्नरों की दोयम दर्जे की स्थिति तो है ही, खुद किन्नर भी अपनी तरफ से अपनी बेहूदी हरकतें छोड़ने की पहल नहीं करते. जेन कौशिक के खुद को ट्रांसजैंडर कहलाने और सुप्रीम कोर्ट में एक मुकदमा जीत जाने से मुख्यधारा में उन की जगह बन पाएगी, इस में शक है.

तय है दूसरे तमाम ट्रांसजैंडर्स की तरह जेन कौशिक को भी समझ आ गया होगा कि उस जैसियों के लिए बराबरी का ख्वाब कभी हकीकत में नहीं बदल सकता. अगर जेन की मंशा महज एक मुकदमे के जरिए मुख्यधारा में शामिल हो जाने की थी तो उस पर पानी फिर गया है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उस के साथ न्याय करने की अपनी जिम्मेदारी तो निभा दी है लेकिन उसे समाज में बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए उस के पास भी कोई कानून नहीं.

जेन को समझ यह भी आ गया होगा कि जिसे मेनस्ट्रीम यानी मुख्यधारा कहा जाता है उस पर मुट्ठीभर सवर्ण काबिज हैं. वरना तो दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक और सवर्ण औरतें तक भी सिरे से वर्णव्यवस्था की शिकार हैं. इस पौराणिक सिस्टम पर कानून का भी जोर नहीं चलता. अगर चलता होता तो देश में रोजरोज के झगड़े, विवाद और फसाद खड़े नहीं हो रहे होते.

इस की ताजी मिसाल यूजीसी की नई गाइडलाइंस हैं जिन के लागू होते ही ऊंची जाति वालों ने वह बवाल काटा कि एक बार तो यह लगने लगा था कि अब सोशल मीडिया पर चल रही सवर्णों और गैरसवर्णों के बीच की जूतमपैजार सड़क पर आने को है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के स्टे ने हालात संभाल लिए जिस पर यही कहा जा सकता है कि छुरी तरबूज पर गिरे या तरबूज छुरी पर, कटना आखिरकार तरबूज को ही पड़ता है. जेन कैसे तरबूजे के मानिंद कटी, इस से पहले उस के बारे में जानने की कोशिश में वही कहानी सामने आती है जो आमतौर पर अधिकतर किन्नरों की होती है.

राहुल बना जेन

31 वर्षीय जेन दिल्ली के बुराड़ी इलाके के पिछड़े समुदाय के एक खातेपीते घर में लड़के के रूप में पैदा हुई थी. पेरैंट्स ने उस का नाम राहुल रखा था. मांबाप के अलावा घर में 2 छोटी बहनें भी थीं. जेन जब 13-14 साल की थीं तब उसे जैंडर डिस्फोरिया का एहसास हुआ. जैंडर डिस्फोरिया यानी जैंडर आइडैंटिटी डिसआर्डर किसी भी लड़के या लड़की के लिए बेहद असहज और तनावपूर्ण स्थिति होती है. उस में वह अपनी लैंगिक पहचान को ले कर दुविधा में पड़ जाता है. यही जेन यानी राहुल के साथ हुआ.

दोटूक कहें तो इस स्थिति में खासतौर से टीनऐजर उम्र के मुताबिक शरीर में आ रहे बदलावों से छुटकारा पाने की हद तक परेशान हो उठता है. मसलन, दाढ़ी और स्तन से घृणा भी वह करने लगता है. दूसरी बड़ी दिक्कत उस का न चाहते हुए भी विपरीत लिंगी की तरह बरताव करने की इच्छा होती है जिसे रोक पाना उस के बस की बात नहीं होती. लड़के लड़कियों की तरह व्यवहार करने लगते हैं और लड़कियां लड़कों की तरह. यह वह स्टेज होती है जिस में चिंता, कशमकश, बेचैनी और डिप्रैशन घेरने लगता है. अकेले रहने की इच्छा यानी सामाजिक अलगाव भी इस का अहम लक्षण है.

जैंडर डिस्फोरिया की मुकम्मल वजह आज तक सामने नहीं आ पाई है लेकिन माना यह जाता है कि बायोलौजिकल और हार्मोनल व एक हद तक पर्यावरणीय कारकों की वजह से भी यह स्थिति हो सकती है. सहूलियत के लिए या किन्नरों को अपमानित न करने की मंशा से इसे प्राकृतिक विविधता शब्द से नवाज दिया गया है. राहुल जब 8वीं क्लास में आया तो उस के ये लक्षण सहपाठियों से छिपे न रह सके. हुआ वही जिस का ऐसे मामलों में डर होता है कि सहपाठी उस की खिल्ली व मजाक उड़ाने लगे लेकिन उस ने घरवालों से खुद में आ रहे इन बदलावों को छिपाए रखा. दूसरी दिक्कत तब शुरू हुई जब साल 2018 के लगभग पेरैंट्स उस पर शादी के लिए दबाव बनाने लगे. यह राहुल की समझदारी ही कही जाएगी कि उस ने सीधेसीधे मांबाप को बता दिया कि वह खुद एक महिला है, इसलिए महिला से शादी नहीं कर सकता.

समझदारी मांबाप और भाईबहनों ने भी दिखाई और राहुल को हर तरह का सहयोग दिया. ऐसी हालत में उसे भावनात्मक सहारे और सहानुभूति की ज्यादा जरूरत थी जोकि परिवार से मिला लेकिन जैंडर डिस्फोरिया का एक और बड़ा लक्षण यह होता है कि इस से ग्रस्त लोगों में खुद को दूसरे यानी विपरीत लिंग में देखने की इच्छा बेहद मजबूती से होने लगती है. अकसर यह इच्छा कितनी महंगी पड़ती है, इसे जेन के उदाहरण से भी समझा जा सकता है.

परिवार पर राज उजागर कर राहुल का खुद को हलका महसूस करना कुदरती बात थी पर यहीं से उस के लड़की बनने की ख्वाहिश और जोर मारने लगी तो उस ने अपनी यह इच्छा, जो मजबूरी ज्यादा थी, घरवालों को बताई. कौशिक परिवार के सब्र, समझा और हिम्मत की जो इस जटिल और कठिन स्थिति में भी राहुल के साथ खड़े रहे और उसे लड़की बनने की इजाजत दे दी. न केवल इजाजत दी बल्कि उस के जेन बनने तक के सफर में साथ भी दिया जिस का अहम पड़ाव ट्रांजिशन होता है.

2018 में ही राहुल औपरेशन के जरिए जेन बन गया. इस तरह के औपरेशन को मैडिकल की भाषा में जैंडर रीअसाइनमैंट सर्जरी कहा जाता है जो इन दिनों बेहद आम है. इतनी आम कि औपरेशन के जरिए लिंग परिवर्तन कराने वालों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है. दिल्ली के एम्स स्थित ट्रांसजैंडर क्लिनिक के मुखिया डाक्टर मनीष सिंघल के मुताबिक साल 2023 से जनवरी 2026 तक 139 जैंडर अफौर्मिंग सर्जरी और 56 माइनर औपरेशन हुए थे.

इस प्रक्रिया में जननांग और वेशभूषा बदल जाते हैं. इस दौरान 69 ट्रांसजैंडर मर्द से औरत बने और 71 औरत से मर्द बने. 33 ने जननांग बदलवाने के लिए सर्जरी करवाई. जानकारी के मुताबिक अधिकतर औपरेशन 20 से 30 साल की उम्र वाले कराते हैं. देशभर के हाल और आंकड़े इस से जुदा नहीं होंगे, इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.

बड़ी आसानी से राहुल कौशिक जेन कौशिक बन गया लेकिन इस के बाद उस की जिंदगी और भी ज्यादा दुश्वार होती गई. इस की एक वजह उस का अपने ही शरीर से खिलवाड़ करना सम?ा आता है. खिलवाड़ इन मानो में कि अगर राहुल राहुल ही रहता, जेन न बनता तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता. अभी तक जेन को सार्वजनिक जीवन और दुनियादारी का कोई खास तजरबा नहीं था. इस का सार यह निकलता है कि एक किन्नर किन्नर ही रहेगा, इस के सिवा कुछ और वह नहीं हो सकता.

अच्छी बात है कि जेन इस मिथक को तोड़ना चाह रही थी. शिक्षा और नौकरी के जरिए उस ने इस की कोशिश भी की. सर्जरी के बाद जेन ने अपना फोकस पढ़ाई व कैरियर पर ज्यादा रखा लेकिन इस से पहले वह साल 2016 में राजस्थान से बीए की डिग्री फर्स्ट डिविजन में ले चुकी थी. इस के अगले ही साल 2017 में उस ने हरियाणा से नर्सरी टीचर ट्रेनिंग में डिप्लोमा कोर्स किया. जेन अब तक अतीत के कड़वे अनुभवों से लगभग उबर चुकी थी, इसलिए पढ़ाई में उस ने मुड़ कर नहीं देखा. 2019 में उस ने गुजरात से एमए की डिग्री पौलिटिकल साइंस में हासिल की. साल 2020 में वह उत्तर प्रदेश की एक यूनिवर्सिटी में बीएड यानी बैचलर औफ एजुकेशन के लिए इनरोल हुई थी. उसी समय इंग्लिश से एमए भी उस ने कर लिया.

अब जेन अपनी डिग्रियों, जो उस ने लगन व मेहनत से हासिल की थीं, के चलते आत्मविश्वास से भरी हुई थी. चूंकि उस ने टीचिंग में जाने का मन बना लिया था इसलिए डिग्रियां भी उसी को टारगेट करते ली थीं. मेहनत और काबिलीयत रंग लाईं. साल 2022 में उसे उत्तर प्रदेश के एक प्राइवेट स्कूल लखीमपुर खीरी स्थित उमा देवी चिल्ड्रन स्कूल में सोशल साइंस व इंग्लिश टीचर की नौकरी 45 हजार रुपए महीने की सैलरी पर मिल गई. शायद जिंदगी में पहली बार इतनी खुश हुई होगी क्योंकि अब वह अपने पैरों पर खड़ी थी और दुनिया को दिखा सकती थी कि ट्रांसजैंडर्स भी आम लोगों के बराबर होते हैं.

लेकिन इस बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाते उसे एक हफ्ता ही गुजरा था कि छात्रों और स्टाफ को मालूम हो गया कि जेन ट्रांसजैंडर है. इस के पहले यह बात स्कूल के प्रिंसिपल को ही पता थी जिन्होंने कथित तौर पर इसे छिपा कर ही उसे नौकरी पर रखा था. देखते ही देखते स्कूल में जेन मजाक और उत्सुकता का पात्र बन गई. यहां तक तो बात ठीक थी लेकिन छात्र और स्टाफ के लोग उसी मानसिकता और पूर्वाग्रह से ग्रस्त थे जिस से पूरी दुनिया है कि ट्रांसजैंडर समाज से बाहर के और दोयम दर्जे के प्राणी हैं. चूंकि वे मूलतया किन्नर और हिजड़े हैं इसलिए इन्हें स्कूल में पढ़ाने का हक ही नहीं. इस के लिए जम कर उस का मजाक उड़ाया गया, ताने मारे गए और भद्दे कमैंट्स किए गए. जाहिर है जेन इस सब से परेशान हो उठी थी और हैरान भी थी कि एक हफ्ते पहले तक सभी लोग उसे इज्जत की नजर से देख रहे थे लेकिन एकाएक ही सभी की नजर और नजरिया इतना कैसे बदल गए कि वह उपहास और उत्पीड़न का पात्र बन गई.

जेन की वजह से सारा स्कूल असहज हो उठा तो प्रिंसिपल साहब को चिंता हुई कि ऐसे कैसे कैंपस में अनुशासन रहेगा और कैसे बच्चे पढ़ेंगे, सो, उन्होंने जेन पर इस्तीफा देने का दबाव डाला. ये वही प्रिंसिपल साहब थे जिन्होंने दया खा कर कह लें या उस की डिग्रियां व योग्यता देख कर नौकरी पर रखा था. अब वही जेन से इस्तीफा मांग रहे थे. चूंकि कोई और रास्ता नहीं था इसलिए उस ने इस्तीफा दे दिया.

लड़ाई सार्थक या निरर्थक

देश क्या पूरी दुनिया में 3 तरह के किन्नर होते हैं. पहले वे जो हुजूम बना कर भीख, नेग और खैरात मांग कर जिंदगी गुजर करते हैं और अपनी बदतमीजियों, बेजा वसूली व बेहूदी हरकतों की वजह से बदनाम हैं और दहशत का दूसरा नाम हैं. दूसरे वे जो देहातों में रहते अकेले दूसरों के रहमोकरम पर जीते हैं. एक तरह से वे निर्वासित और एकाकी जिंदगी जीने को मजबूर रहते हैं. इन किन्नरों की कुल संख्या लगभग 5 लाख का 65 फीसदी है.

तीसरे वे होते हैं जो जन्मजात किन्नर नहीं होते, खुद को ट्रांसजैंडर कहते और कहलाना पसंद करते हैं. पिछले कुछ सालों से वजूद में आए ये किन्नर पढ़ेलिखे होते हैं, जागरूक होते हैं और अपने कानूनी व संवैधानिक अधिकार जानते हैं. इसीलिए इन की आमदनी दूसरे किन्नरों से ज्यादा होती है. नैशनल लाइब्रेरी औफ मैडिसिन की एक रिपोर्ट के मुताबिक किन्नरों की औसत मासिक आमदनी लगभग 15 हजार रुपए है. कोई 30 फीसदी किन्नर 5,000 से 7,500 रुपए महीना कमाते हैं. 15 फीसदी 10 हजार से 20 हजार रुपए महीना तक कमा लेने वाले किन्नरों की संख्या 37 फीसदी है लेकिन लगभग 14.5 फीसदी किन्नर ऐसे हैं जो 20 से 50 हजार रुपए महीना तक कमा लेते हैं. जाहिर है जेन जैसे ट्रांसजैंडर तीसरी कैटेगरी में आते हैं जो शिक्षित हैं और जिन्होंने किन्नरों का परंपरागत पेशा नहीं अपनाया है.

ये कूल्हे व छातियां मटका कर और हाथ से ताली बजा कर नहीं बल्कि मेहनत और शिक्षा के जरिए इज्जतदार तरीके से गुजरबसर करना चाहते हैं लेकिन समाज इन्हें भी स्वीकार नहीं कर रहा है तो यह समाज की खामी है. पर इस ज्यादती को जेन ने अपनी नियति मानते खामोशी से हजम नहीं कर लिया बल्कि अपने हक और न्याय के लिए उस ने हर वह दरवाजा खटखटाया जो उस के लिए खुल सकता था. स्कूल से निकाले जाने पर कार्रवाई करते उस ने सब से पहले राष्ट्रीय महिला आयोग में ज्यादती और भेदभाव की शिकायत दर्ज कराई.

शिकायत रंग लाई क्योंकि राष्ट्रीय महिला आयोग ने उत्तर प्रदेश सरकार को जांच कराने के निर्देश दिए. यह रंग जल्द ही फीका पड़ गया क्योंकि होने जाने के नाम पर आयोग और सरकार फाइलफाइल खेलते रहे. इस का फायदा उठाते स्कूल प्रबंधन ने काउंटर अटैक करते जेन पर एक करोड़ रुपए की मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया. लेकिन स्कूल प्रबंधन उस वक्त घबरा उठा जब सरकारी दफ्तरों से इस मामले में सफाई और जानकारी मांगते पत्र आने लगे और मीडिया भी इस दिलचस्प मामले में दिलचस्पी लेने लगा. हद तो उस वक्त हो गई जब एक दिन लखीमपुर खीरी के मोहम्मदी पुलिस स्टेशन से एसएचओ साहब पुलिस दलबल सहित दौरे पर आ धमके.

इस सब से न केवल स्कूल की साख पर बट्टा लग रहा था बल्कि छात्रों और स्टाफ में भी दहशत पैदा होने लगी थी. कुल जमा धंधा खतरे में पड़ने लगा था क्योंकि कुदरती तौर पर पेरैंट्स अपने बच्चों को ऐसे स्कूल में पढ़ाने से परहेज ही करते हैं जहां किन्नर टीचर हो और आएदिन पुलिस भी आ धमकती हो. इधर, दिल्ली में अपने घर वापस आ गई जेन शुरुआती कार्रवाई से उत्साह से भर उठी थी और पूछताछ में पुलिस को फिल्मी अंदाज में उस ने बताया था कि, मैं ट्रांसजैंडर्स के अधिकारों के लिए लड़ रही हूं ताकि आइंदा किसी ट्रांसजैंडर का इस तरह अपमान और उत्पीड़न न हो. मेरे साथ स्कूल में बुरा सुलूक किया गया और स्टाफ के सामने मु?ो बेइज्जत किया गया. जवाब में स्कूल प्रबंधन की तरफ से प्रिंसिपल साहब ने इन आरोपों का खंडन करते जेन को ही यह कहते लपेटे में ले लिया कि उस ने कभी अपनी ट्रांसजैंडर पहचान को उजागर नहीं किया.

यह कितना सच है कितना झूठ, कहा नहीं जा सकता लेकिन अपनी लैंगिक पहचान जेन उजागर कर देती तो क्या बच्चे और स्टाफ उसे सहज ढंग से ले पाते, इस की गारंटी कोई प्रिंसिपल तो क्या, सरकार और अदालत भी नहीं ले सकतीं क्योंकि फसाद की असल जड़ पहचान नहीं बल्कि समाज का नजरिया है जो सदियों व मध्यकाल से वैसा ही है जैसा कि आज है. सुर्खियां बनने लगीं और हल्ला मचने लगा तो स्कूल प्रबंधन ने एक कदम पीछे हटते मानहानि का मुकदमा वापस ले लिया. साथ ही, जैंडर सैंसिटाइजेशन कोर्स चलाने का वादा भी किया.

इस से बात आईगई सी हो गई और जेन ने 2023 में गुजरात के जामनगर के एक स्कूल जेपी मोदी स्कूल में नौकरी के लिए अप्लाई कर दिया. स्कूल का औफर लैटर मिलते ही उस ने अपने सारे जरूरी डौक्यूमैंट्स स्कूल प्रबंधन को भेज दिए. पिछले मामले से सबक लेते हुए इस बार उस ने अपनी पहचान उजागर करते पहचानपत्र भी भेज दिए ताकि भविष्य में लखीमपुर खीरी सरीखा बखेड़ा खड़ा न हो.

लेकिन इस स्कूल में तो जेन को पढ़ाने का भी मौका नहीं मिला. पहचान होते ही स्कूल ने उस से अपना औफर वापस ले लिया. कोई 8 महीने वह बेरोजगार रही. इस के बाद मई 2025 में हैदराबाद के एक प्राइवेट बोर्डिंग स्कूल में उसे नौकरी मिल गई. यहां इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तो उस की पहचान को ले कर कोई विवाद/फसाद नहीं हुआ और जेन सुकून से नौकरी कर रही है लेकिन इस के पहले के स्कूलों के भेदभाव और मनमानी के खिलाफ उस ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली थी और जीती भी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा

जब महिला आयोग ने कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति कर अपनी ड्यूटी बजा दी जिस से जेन को कुछ हासिल नहीं हुआ तो उस ने 2023 में ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी. संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर अपनी याचिका में उस ने दोनों स्कूलों पर आरोप लगाया था कि उस से उस की ट्रांसजैंडर पहचान के चलते भेदभाव किया गया व अपमानित भी किया गया. इन स्कूलों से बर्खास्तगी पर उस ने अपना वाद ट्रांसजैंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 और संविधान के अनुच्छेदों 14, 15, 17,19 और 21 के उल्लंघन के रूप में पेश किया.

अपनी याचिका में उस ने अपने तमाम शैक्षणिक दस्तावेज यानी डिग्रियां पेश कीं व अपनी सर्जरी का भी ब्योरा दिया. अपनी याचिका में जेन ने बट फौर टैस्ट यानी पहचान न होती तो ऐसा न होता का हवाला देते दलील दी कि स्कूलों की कार्रवाई गरिमा, जीवन और पेशे के अधिकार अनुच्छेद 21, 19 का उल्लंघन है जो आर्थिक मौत के बराबर है. याचिका में उस ने अनुच्छेद 14 समानता, 15 भेदभाव और 17 अस्पृश्यता निषेध का भी उल्लेख किया. उस ने न केवल स्कूलों बल्कि राज्य से भी मानसिक पीड़ा के एवज में मुआवजा मांगा. राज्यों से इसलिए कि उन्होंने ट्रांसजैंडर एक्ट 2019 के तहत कार्रवाई नहीं की थी.

सुप्रीम कोर्ट ने जेन की दलीलों से इत्तफाक रखते 17 अक्तूबर, 2025 को दिए अपने फैसले में गुजरात के जेपी मोदी स्कूल को आदेश दिया कि वह बतौर मुआवजा जेन को एक लाख रुपए दे लेकिन लखीमपुर खीरी के स्कूल उमा देवी चिल्ड्रंस अकादमी को भेदभाव के सुबूत नाकाफी मानते हुए मुआवजे से छूट दे दी लेकिन केंद्र सरकार सहित गुजरात और उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि वे जेन को 50-50 हजार रुपए मुआवजा दें क्योंकि वे ट्रांसजैंडर एक्ट के मुताबिक जेन के अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाए थे.

बदहाली का जिम्मेदार कौन

बिलाशक जेन कानूनी लड़ाई जीत गई है लेकिन सामाजिक लड़ाई जीत पाई, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं और न ही इस फैसले से दूसरे किन्नरों की बदहाली दूर होने वाली है. खुद किन्नर भी अपनी तरफ से कोई कोशिश इस तरफ नहीं करते क्योंकि मांग कर और नेग वसूली के नाम पर छीन कर खाना उन्होंने अपना हक समझ लिया है. यह पैसा कमाने का आसान रास्ता भी है. इसलिए किन्नर जेन की तरह पढ़लिख कर इज्जत वाला कोई रोजगार या नौकरी नहीं करते. सच यह भी है कि समाज लगातार इन का तिरस्कार और अपमान करता ही करता है तो हालात सुधरने के चांस न के बराबर ही दिखते हैं.

जो किन्नर पढ़लिख कर रोजगार की सोचते हैं, उन से भी नौकरी देने वाले डरेंगे कि इन किन्नरों का क्या भरोसा जो जेन की तरह जाने कब सीधे सुप्रीम कोर्ट चले जाएं और जुर्माना या मुआवजा हमें देना पड़े. इसलिए उन्हें नौकरी ही मत दो, इस से क्या फायदा. किन्नरों की बदहाली का जिम्मेदार कौन, इस सवाल का जवाब बेहद साफ है कि धर्म, जिस ने किन्नरों को कभी आदमी होने का दर्जा दिया ही नहीं, बल्कि इसे पूर्वजन्म के पापों की देन बता कर इन्हें मुख्यधारा से बाहर धकेल दिया. रामायण और महाभारत में किन्नरों का जिक्र मिलता है लेकिन उस से यह नहीं लगता कि उन्हें कोई सम्मानजनक दर्जा मिला हुआ था.

एक लोककथा के मुताबिक जब राम जंगल जा रहे थे तब उन्हें छोड़ने किन्नर भी गए थे. वन जाते वक्त राम ने कहा, सभी नरनारी वापस चले जाएं. 14 साल बाद जब वे लौटे तो नरनारी जा चुके थे लेकिन किन्नर नदी किनारे ही खड़े थे. राम ने इस से खुश हो कर उन्हें आशीर्वाद दिया. इस आशीर्वाद से किन्नरों को न तब कुछ मिला था न आज मिल रहा है. महाभारत की कहानी में वृहन्नला नाम के किन्नर का जिक्र आता है जो दरअसल अर्जुन था. अज्ञातवास के दौरान अर्जुन राजा विराट की बेटियों को डांस और म्यूजिक सिखाता था. एक प्रसंग में अर्जुन स्वीकारता है कि वह न पुरुष है न स्त्री है बल्कि नपुंसक है.

महाभारत की लड़ाई में शिखंडी नाम का किन्नर भी है जो पूर्वजन्म में अंबा था जिस ने भीष्म को मारने की प्रतिज्ञा की थी. यक्ष के वरदान से शिखंडी का जैंडर चेंज हुआ था. युद्ध में वह शिखंडनी के रूप में लड़ा था. थोक में प्रतिज्ञाएं लेने वाले भीष्म ने एक प्रतिज्ञा यह भी ली थी कि वह युद्ध में किसी स्त्री या नपुंसक पर हमला नहीं करेगा. भीष्म को मारने के लिए अर्जुन ने इसीलिए शिखंडी की आड़ ले कर उस पर तीर चलाए थे.

त्रेता और द्वापर में किन्नरों के सामाजिक बहिष्कार के स्पष्ट प्रसंग नहीं मिलते लेकिन उन के सम्मान या मुख्यधारा में होने के भी प्रमाण नहीं मिलते. बात बिगाड़ी सनातनियों के संविधान मनुस्मृति ने जो सीधेसीधे किन्नरों को पूर्वजन्म का दोषी शूद्रों की तरह बताती है. उस के चलते आज भी किन्नरों से नफरत आम है. इस ग्रंथ के अध्याय 9 के श्लोक 49 व 50 में मनु कहता है कि पुरुष, स्त्री और नपुंसक ये तीनों अपनेअपने कर्मों के अनुसार जन्म लेते हैं.

बस, तभी से किन्नर भी अपना अगला जन्म सुधारने के लिए पूजापाठ और दानदक्षिणा में लगे हैं लेकिन इस के लिए वे जेन कौशिक जैसियों को आदर्श नहीं मानते कि अगला तो किसी ने देखा नहीं, पहले पढ़लिख कर मेहनत कर, यह जन्म तो सुधार लें.

अंधविश्वास – कथा कर्मकांड में फंसे परिवार की में

Superstition Story: रिया के चेहरे पर आज एक अजीब सी चमक थी. आंखें हंस रही थीं और होंठ गुनगुना रहे थे. जैसे हर लड़की के मन में अपनी ससुराल के, पति के और घरपरिवार के सपने पलते हैं वैसे ही रिया ने भी कुछ ख्वाब पाल रखे थे.21वीं सदी की पढ़ीलिखी, तेजतर्रार लड़की रिया आसमान में उड़ रही थी. जैसी सोच रखी थी वैसी ही ससुराल पाई थी. सुखी, संपन्न और सब से महत्त्वपूर्ण घर के सारे लोग पढ़ेलिखे व प्रबुद्ध थे. रिया का मानना था कि पढ़ेलिखे लोगों से तालमेल बिठाना सहज हो जाता है, जिंदगी आसान बन जाती है. ससुरजी नामी वकील हैं, सासुजी एमकौम तक पढ़ी बहुत बड़ी समाज सेविका हैं, देवर एमसीए की पढ़ाई कर रहा है, ननद फैशन डिजाइनर है और पति आरव एमबीए तक पढ़ा हुआ एक बड़ी कंपनी में मैनेजर है.

सगाई और शादी के बीच ज्यादा समय नहीं था तो रिया ने ससुराल देखा नहीं था. बस, वीडियो पर आरव ने घर दिखा दिया था. बढि़या शानदार बंगला था. सगाई के बाद 2 महीने में ही शादी हो गई तो ससुराल वालों से ज्यादा जानपहचान का मौका नहीं मिला रिया को. पर रिया को लगा, मेरा स्वभाव सरल और हंसमुख है, सो, सब को चुटकी में अपना बना लूंगी, सम?ा लूंगी और घुलमिल जाऊंगी. ससुराल के सारे मैंबर्स पढ़ेलिखे, सम?ादार हैं तो दिक्कत नहीं होगी.

शादी भी निबट गई और रिया आरव का हाथ थामे एक नए जीवन की नींव रखने जा रही थी. पर यह क्या, रिया ने गाड़ी से उतर कर दहलीज पर कदम रखा कि आश्चर्य में पड़ गई और दिल को धक्का भी लगा. घर के गेट पर एक काला पुतला लटक रहा था, दूसरी ओर नीबूमिर्ची और बीच में लोहे की यू आकार की कोई चीज लगी हुई थी.

रिया को अजीब लगा कि पढ़ेलिखे, सम?ादार लोग भी ऐसी चीजों को मानते हैं यह जान कर. पर रिया चुप रही. अभी तो पहला कदम रखा था ससुराल में तो सवालजवाब करना उचित नहीं समझ उस ने. सारी रस्में खत्म कर के घर के भीतर पहुंची तो रिया को और ?ाटका लगा. घर में तरहतरह की अजीब चीजें देख कर. छोटा कछुआ, कहीं बाम्बू तो कहीं पिरामिड. और तो सब ठीक पर आते ही रिया की सासुजी ने आरव और रिया की नीबू, नमक और लालमिर्च से नजर उतार कर उस की ननद से बोला कि जा कर चार रस्ते पर फेंक आ. रिया को एक और शोक लगा. मन में पढ़ेलिखे लोगों की जो परिभाषा बिठा रखी थी वह ध्वस्त हो गई. पर अभी कुछ भी पूछने का समय नहीं था, सो चुपचाप रिया सब का अनुसरण करती रही.

सारी रस्में निबट गईं. आरव का हाथ थामे वह अपने बैडरूम में आई. पूरे रूम में बुरी नजर से बचाने वाले हर टोटके मौजूद थे. रिया को बेचैनी होने लगी मानो पढ़ेलिखे लोगों के बीच न हो कर कोई झाड़फूंक वाले बाबा के घर में आ गई हो. थकीहारी, सोचतेसोचते कब नींद आ गई उसे, पता नहीं चला.

सुबह उठी, नहाधो कर नीचे आई तो सासुमां ने कहा, ‘‘रिया तुम और आरव करुणानिधि स्वामी के आश्रम जा कर उन से आशीर्वाद ले कर आओ, बाबाजी की कृपा बनी रहेगी.’’ रिया का दिमाग हिल गया साक्षात द्वारिकाधीश को न पाय लागूं जो जीवनआधार हैं, ऐसे बाबाजी को क्यों नमूं. हे प्रकृति, छोटे से मोबाइल में हर चीज अपडेट करने वाले खुद की सोच को अपडेट करना कब सीखेंगे. पर शादी के पहले ही दिन आरव को नाराज करना नहीं चाहती थी रिया तो बेमन से गई आश्रम.

बाबाजी के चेहरे पर रिया को देख कर जो भाव बदले उसे देख कर रिया के दिमाग में आग लग गई. भगवाधारी बाबा के ठाट देख कर रिया को ताज्जुब हुआ. आलीशान कोठी में हर आधुनिक सुखसुविधा मौजूद थी. बाबा के आशीर्वाद लेने के लिए लोगों का तांता लगा था और वहां उपस्थित भीड़ में कोई भी अनपढ़गंवार नहीं लग रहा था. सभी अच्छे घर के समझदार व पढ़ेलिखे लोग थे.

रिया सोचने लगी, एक तरफ हम चंद्रयान भेज रहे हैं और एक तरफ अंधश्रद्धा को हवा दे रहे हैं. कब सुधरेगा समाज. बेमन से बाबा को प्रणाम किया तो बाबा ने आशीर्वाद देने के बहाने रिया के गालों को कुछ यों छुआ कि रिया के तनमन में आग लग गई. मैं गाड़ी में हूं बोल कर पैर पटकते वह निकल गई. क्या सोचा था ससुराल वालों के बारे में और क्या निकले. यह बाबा कौन सा भगवान है, महज हमारे जैसा इंसान ही तो है, इतना अंधविश्वास और अंधभक्ति. क्या मैं छोटी बच्ची हूं जो बैड टच को न समझ पाऊं. लंपट, कैसे सहला रहा था मेरे गाल. रिया को आरव पर इतना गुस्सा आया था लेकिन सही समय पर बात करूंगी, सोच कर चुप रही.

हर छोटीबड़ी बात के लिए बाबा, ज्योतिष और टोटके. रिया तिलमिला उठती थी पर रिश्ता बचाने की जद्दोजेहद में आहिस्ताआहिस्ता रिया ससुराल वालों के साथ एडजस्ट करने की पूरी कोशिश कर रही थी. फिर भी हर रोज कोई न कोई बात ऐसी हो जाती कि मन आहत हो जाता. 21वीं सदी की पढ़ीलिखी रिया खुद को बहुत मुश्किल से इस अंधविश्वासभरे वातावरण में ढाल रही थी.

धीरेधीरे समय बीतते शादी को एक साल हो गया. एक डेढ़ महीने से रिया की तबीयत ठीक नहीं रहती, उलटियां आना, जी मिचलना, चक्कर आना वगैरह. मैडिकल चेकअप करवाने पर पता चला रिया मां बनने वाली है. आज घर में कितनी खुशी का माहौल था. रिया की प्रैग्नैंसी रिपोर्ट पौजिटिव आई थी. रिया की सास ने आरव को बताया कि बाबाजी कुछ मंत्र बोल कर भभूत देते हैं, उस भभूत को खाने से बेटा पैदा होता है. पहले तो आरव भी भड़का कि ये सब अंधविश्वास है, मैं नहीं मानता.

मां के रोजरोज के दबाव ने और कुछ बेटे की चाह की भीतरी लालसा ने उसे उकसाया. सो, आरव भी रिया पर दबाव डालने लगा, ‘‘रिया मेहरबानी कर के मान जाओ न, मां का दिल रख लो.’’

रिया गुस्से से कांप उठी, ‘‘आरव, बीज को बोये डेढ़ महीना हो गया. जो बोया है वही उगेगा. क्या खेतों में ज्वार बोने के बाद किसी भभूत के छिड़काव से गेहूं उगते हैं. पढ़ेलिखे हो कर बच्चों जैसी बातें मत करो, मैं नहीं जाऊंगी किसी बाबा के पास.’’

पर रिया की सास के दिमाग में बाबाजी का भूत और पोते की चाह ने रिया के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया था. सो, वह सुबह से शाम तक रिया को प्रताडि़त करने का एक बहाना नहीं छोड़ती थी और इस बात को ले कर घर में हो रहे झगड़े व तनाव के आगे रिया को झुकना पड़ा, बेमन से खाती रही भभूत. उस की सास सब के सामने इतराती रहती देखना, हमारे घर गुलाब जैसा बेटा ही आएगा. घर में भी सब के मन में यह बात बैठ गई कि बेटा ही होगा.

इतने में 9 महीने बीत गए और एक काली बरसाती रात में रिया को दर्द उठा और अस्पताल ले जाना पड़ा. बाहर सब बेटे की प्रतीक्षा में बैठे थे कि अभी खुशखबरी आएगी. रिया की सास ने नर्स से कहा?, ‘‘जल्दी से मेरे गुलाब जैसे पोते को ले आना मेरी गोद में.’’

बारिश का मौसम था. बिजली जोर से कड़की और नर्स ने आ कर एक और बिजली गिराई, ‘‘माताजी, गुलाब नहीं, जूही खिली है आप के आंगन में.’’ सब के दिल बैठ गए, यह क्या हो गया. आरव ने जैसेतैसे दिल बहलाया और बोला, ‘‘कोई बात नहीं. बेटी तो लक्ष्मी का रूप होती है.’’ लेकिन रिया की सास हारने को तैयार नहीं, बोली, ‘‘बहू ने श्रद्धा से भभूत खाई होती तो जरूर बेटा होता. खैर, अगली बार ढंग से खिलाऊंगी, पर देख आरव, बेटी बो?ा होती है, तू इस का कुछ इंतजाम कर दे और अगली बार मु?ो पोता ही चाहिए और उस के लिए तेरी दूसरी शादी भी करवानी पड़ी तो भी करवा दूंगी, हां.’’

अब आरव का धैर्य जवाब दे गया. उस ने उसी समय मां को सख्त शब्दों में डांट दिया, ‘‘मां, अब बस भी कीजिए. आप के अंधविश्वास ने मेरे मन में भी बेटेबेटी में फर्क का बीज बो दिया. मेरी बेटी मेरा अभिमान होगी. अब आप मु?ो बख्श दीजिए और आप भी ऐसे ढोंगी बाबाओं के चक्कर से नजात पाइए, अपनी सोच बदलिए. हम 21वीं सदी में जी रहे हैं.

‘‘रिया और अपनी बच्ची के साथ मैं अलग हो जाऊं, उस से पहले सुधर जाइए. आप जैसे स्वभाव वाली सास की वजह से ही कहावत पड़ी होगी कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है.’’ पर आज रिया खुश थी अपनी चांद सी बेटी को पा कर और आरव को एक अंधविश्वास से बाहर निकलता देख कर.

दूसरे दिन अखबार की हैडलाइन पढ़ कर रिया की सास चौंक उठी, ‘शहर में संन्यास आश्रम वाले गुरुजी करुणानिधि स्वामी नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार केस में गिरफ्तार.’ सासुमां दौड़ते हुए नम आंखों से पोती को गोद में उठा कर खिलाने लगी, मेरी गुडि़या मेरा अभिमान और रिया को गले लगा कर बोली, ‘‘धन्यवाद बेटी जो तुम ने हमें इतनी प्यारी पोती का उपहार दिया.’’

रिया को आज अपने सपनों का घर, परिवार मिल गया. आरव ने कहा सैल्फी तो बनती है और छोटे से स्क्रीन में संयुक्त परिवार एकसाथ हंसतेमुसकराते ?झिलमिलाने लगा.  Superstition Story

वे पसंद नहीं करते

Army Story: कैप्टन कर्नल नेहरा साहब मुझे डिपो के अफसर मेस में मिले. मैं पीटी ड्रैस में उस समय नाश्ता कर रहा था. वे भी नाश्ता करने आए थे. मैं उन के अधीन हवलदार रहते हुए एक यूनिट में काम कर चुका था. शायद उन्होंने मु?ो अब भी हवलदार समझ था, इसीलिए उन की टोन में रूखापन था. नाश्ता करते हुए मैं ने उन्हें कुछ भी जवाब देना श्रेष्ठ नहीं समझ . अफसर मेस का यही नियम था. नाश्ता, लंच या डिनर करते चुप रहा जाए. कोई बड़ा अफसर विजिट के लिए आए तो भी उठना नहीं है. अगर कुछ पूछा जाता है तो बैठेबैठे ही उत्तर देना है. यह नियम हरेक पर लागू है. अगर कोई उठने भी लगता है तो उसे मना कर दिया जाता है.

‘‘तुम यहां कैसे? तुम्हें अफसर मेस में नाश्ता करने की परमिशन किस ने दी?’’ उन की आवाज में गुस्सा था, माथे पर बल पड़े हुए थे.

मैं ने मेस के नियम के रहते फिर भी उन्हें जवाब नहीं दिया. केवल मुंह पर उंगली रख कर चुप रहने का इशारा किया. मेरे ऐसा करने पर वे और गुस्सा हो गए. उन्होंने मेस हवलदार को जोर से आवाज लगाई. वह ‘सर’ कह कर भागा हुआ आया. कर्नल साहब ने गुस्से की टोन में ही मेरी ओर इशारा करते हुए पूछा, ‘‘ये श्रीमान यहां कैसे नाश्ता कर रहे हैं? यहां अलाऊ नहीं है.’’

‘‘क्यों सर, ये कैप्टन साहनी साहब हैं, नई पोस्ंिटग पर आए हैं.’’

वे बहुत समय तक मुझे हैरानी से देखते रहे. मैं नाश्ता कर चुका था. नाश्ता करते रहने पर भी उन्होंने मेरी ओर प्रश्न उछाला था, ‘‘आप अफसर कब और

कैसे बने?’’

वे ‘तुम’ से ‘आप’ पर आ गए थे. वे एक अफसर से रूखे तरीके से नहीं बोल सकते थे. मैं उन के सामने बैठ गया. मेस बौय मेरे लिए चाय रख गया था. मैं ने चाय की चुस्कियां लेते हुए बड़े सहज भाव से कहा, ‘‘सर, मैं अफसर तब बना जब हमारे विभाग ने इंवेट्री कंट्रोल अफसर की वेकैंसी निकाली.’’

‘‘फिर भी आप को अफसर नहीं बनना चाहिए था.’’

‘‘क्यों सर, मैं अफसर फैमिली से संबंध रखता था. आप जानते थे कि मेरे बड़े भाई हमारे विभाग के कर्नल थे. अब वे ब्रिगेडियर बन कर कमांड हैडक्वार्टर में बैठे हैं. आप उन के अंडर में काम भी कर चुके हैं. उन्होंने आप को बताया भी था लेकिन फिर भी आप ने मुझे हर तरह से तंग किया. आप यह बरदाश्त नहीं कर सकते थे कि एक हवलदार आप की तरह स्कूटर पर आए. आप ने मुझ से पूछा भी था, ‘इतनी कम सैलरी में तुम अपना स्टैंडर्ड कैसे मेनटेन करते हो?’

उस समय वे औफिस में बैठे सिगरेट पी रहे थे. मैं ने कहा था, ‘सर, मुझे किसी तरह की आदत नहीं है. मैं सिगरेट, शराब नहीं पीता हूं. मीटअंडा भी नहीं खाता. मेरी फ्री रम भी मेरी स्टोरकीपर प्लाटून के जवान पी जाते हैं. बड़ी आसानी से मैं अपना स्टैंडर्ड मेनटेन कर पाता हूं. मेरा क्वार्टर इतने क्वार्टरों में फर्स्ट क्यों आया था? मेरी पत्नी भी बहुत अच्छे घर से आई थी. अपने साथ ढेरों दहेज लाई थी. उसे पता था कि घर को कैसे व्यवस्थित करना है. इंस्पैक्शन करने आए कमांडैंट साहब की पत्नी और अन्य अफसर उस के रखरखाव से आश्चर्यचकित थे. उन्होंने मेरे रैंक को नहीं देखा था. उन्होंने हमारे साथ बैठ कर चाय भी पी. कमांडैंट साहब ने अपने सैनिक सम्मेलन में भी यह बात कही थी कि अगर किसी को क्वार्टर का रखरखाव और सुंदरता देखनी है तो हवलदार साहनी का क्वार्टर देखें.’

‘‘आप को लगा था, मैं आप पर व्यंग्य कस रहा हूं. आप ने मुझे 7 दिन का पिट्ठू लगा कर काम करने की सजा दी थी. आप हमेशा पढे़लिखे जवानों को हेय समझ ते रहे हैं. सर, ऐसी मानसिकता आज भी मैं ने आप के चेहरे पर मुझे नाश्ता करते हुए दिखी थी.

‘‘सर, मैं आप से कहीं ज्यादा पढ़ालिखा था. किसी कारण मैं जवान में भरती हुआ था. यह तो वक्त खराब था मेरा कि मु?ो आप के अंडर में काम करना पड़ा. मैं ने आप के साथ काम करते हुए भी शौर्ट सर्विस कमीशन के लिए अप्लाई किया था लेकिन आप ने मुझे आगे नहीं जाने दिया था. बाधक थी आप की सोच, जवानों की योग्यता को नकारने की वृत्ति. यह भी कि आप औल इंडिया कंपीटिशन बीट कर के अफसर बने हैं.

‘‘ऐसी मानसिकता मैं ने आईएमए की ट्रेनिंग के दौरान भी देखी थी. खुद को जवान से बने अफसर से सुपीरियर समझना. ऐसी सोच सीधे आए अफसरों के मन में हमेशा रही है लेकिन ट्रेनिंग में सभी कैडेट ऐसे नहीं थे. वे इस बात को समझते थे कि किसी का भी यहां तक पहुंचना आसान नहीं है.’’

अभीअभी नाश्ते के लिए आ कर बैठे मेजर सतनाम सिंह साहब ने मेरी बात सुन ली थी. वे मेरे रूममेट भी थे. उन्होंने पूछा, ‘‘क्या हुआ कैप्टन साहनी?’’

‘‘कुछ नहीं, सर. कर्नल साहब मुझे यहां नाश्ता करते देख कर गुस्सा हो गए थे. मैं इन के अंडर में हवलदार रहते हुए कार्य कर चुका हूं. ये मुझे आज भी हवलदार समझ रहे थे.’’

मेजर सतनाम सिंह साहब ने कर्नल साहब को गहरी नजरों से देखा और कहा, ‘‘सर, आप को अपनी सोच बदलने की जरूरत है. क्या आप समझते हैं, कैप्टन साहनी को यहां तक पहुंचने में कम मुश्किलें आई होंगी? पहले कमांडिंग अफसर, फिर ब्रिगेड कमांडर, उस के बाद सब-एरिया कमांडर और अंत में कमांड हैडक्वार्रट में जनरल साहब ने इन का सख्त इंटरव्यू लिया होगा. तब इन्हें इन की योग्यता के कारण इंवेंट्री कंट्रोल अफसर के लिए रिक्मेंड किया होगा और अंत में एसएसबी बोर्ड जो सेलैक्शन के समय किसी की भी नहीं सुनता है चाहे वह सेना के किसी बड़े अफसर का भाई या बेटा ही क्यों न हो?

‘‘थोड़ीबहुत सिफारिश भी तभी चलती है जब इंटरव्यू देने वाले में दम हो. वे उस समय एक साधारण अफसर को नहीं, बल्कि एक सेनाप्रमुख का सेलैक्शन कर रहे होते हैं. कल को इन्हीं में से किसी को सेनाप्रमुख बनना होता है. आप भी शायद पहली बार एसएसबी क्लियर नहीं कर पाए होंगे.’’

कर्नल नेहरा कुछ नहीं बोले थे. वे उसी तरह गुस्से में नाश्ता कर के चले गए थे.

मैं ने मेजर सतनाम सिंह साहब से कहा, ‘‘सर, मैं अपने काम में बिलकुल परफैक्ट था. यह कर्नल साहब बहुत अच्छी तरह जानते थे. उस समय ये कैप्टन थे. इन्होंने मुझे हर तरह से चैक करवाया था. यहां तक कि सौलवेज डिपो को जाने वाले पुराने स्टोर को भी चैक करवाया. कुछ नहीं मिला था. यही नहीं, सर, मैं पोस्टिंग जा रहा था. ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन भी आ गया था. मैं यूनिट की नफरी से आउट था. फिर भी इन्होंने एक सूबेदार साहब को मेरा सामान चैक करने के लिए स्टेशन भेजा था कि कहीं मैं कुछ चोरी कर के तो नहीं ले जा रहा हूं.

‘‘मैं ने चैक करवाने से इनकार किया था. चैक करने आए सूबेदार साहब ने इन्हें बताया तो इन्होंने स्टेशन पर तैनात मिलिट्री पुलिस को अप्रोच करने के लिए कहा. मिलिट्री पुलिस के अधिकारी ने सूबेदार साहब से कहा कि आप यूनिट से चैक करने का लैटर ले कर आएं. तब हम चैक करेंगे.

‘‘सर, मजे की बात सुनें, सूबेदार साहब यूनिट में वापस गए और लैटर ले कर आए. मिलिट्री पुलिस के अधिकारी ने खुद मेरे सामान को चैक किया. पर्सनल के अतिरिक्त उन्हें वह सामान मिला जो मिलिट्री की ओर से मु?ो अथौराइज था. उन्होंने चैक कर के एक कौपी मुझे दी और एक कौपी सूबेदार साहब को दी. मैं ने अपने भाई ब्रिगेडियर साहब को बताया. उन्होंने कहा, ‘तुम अपनी नई यूनिट पहुंचो, फिर मैं बताता हूं कि क्या करना है.’

‘‘सर, मैं ने इन के विरुद्ध शिकायत करने की ठान ली थी. फिर ब्रिगेडियर साहब ने सम?ाया कि इस समय जबकि इंवेंट्री कंट्रोल अफसर की सारी कार्रवाई हो चुकी है, केवल एसएसबी रह गया है, किसी तरह की कार्रवाई मत करो. मैं भी जान गया था कि एक हवलदार या जूनियर अफसर की कोई नहीं सुनता है. अफसर, अफसर का फेवर करते हैं.’’

थोड़ी देर बाद मैं ने कहा, ‘‘सर, ये ड्राफ्ंिटग में बहुत कमजोर थे. जो क्लर्क सरकारी पत्रों की ड्राफ्ंिटग के लिए तैनात था, वह भी अच्छी ड्राफ्ंिटग नहीं कर पाता था. विशेषकर उन पत्रों की जो फौर्मेशन हैडक्वार्टर में जाने होते थे. मैं ड्राफ्ंिटग कर के देता था. ये पूछते थे, ‘यह ड्राफ्ंिटग किस ने की है, तुम्हारी तो हो नहीं सकती. वह मेरे बारे में बताता था कि मैं ने की है. ये कर्नल साहब मेरी एक गलती निकाल नहीं पाते थे. व्यावहारिक बात तो यह थी कि ये खुद ड्राफ्ंिटग करते. यह मेरे कमांडिंग अफसर भी जानते थे कि ये मुझ से ईर्ष्या रखते हैं.

‘‘सर, इतना सब होने पर भी इन्होंने मेरी गुप्त रिपोर्ट खराब कर दी. मेरे कमांडिंग अफसर साहब ने इन्हें बहुत झड़ा था कि एक ऐसा जवान जो तुम्हारी कुरसी पर बैठने के योग्य है, आप ने उस की रिपोर्ट खराब कर दी है. तब उन के प्रभाव में भी इन्होंने मेरी रिपोर्ट ठीक नहीं की. कमांडिंग साहब ने कहा था कि अगर तुम ठीक नहीं करोगे तो मैं इसे ठीक करूंगा. फाइनल रिपोर्ट मेरी मानी जाएगी. तब भी इन्होंने ठीक नहीं की. मेरे कमांडिंग अफसर साहब ने उसे ठीक कर के भेजा.’’

‘‘लेकिन सारे अफसर ऐसे नहीं हैं, कोई बिरला ही ऐसा होता है जो ऐसी श्रेणी में आता है जिन की कोई गिनती नहीं होती. एक से बढ़ कर एक अच्छे अफसर हैं. वे जवानों के वैलफेयर को सर्वोपरि समझते हैं और मानते हैं,’’ मेजर सतनाम सिंह ने कहा.

‘‘जानता हूं, सर. नहीं तो 13 लाख की विश्व प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ सेना को कमांड करना आसान नहीं होता. मैं तो आप से अपने व्यक्तिगत अनुभव शेयर कर रहा हूं. सभी अनुशासनप्रिय होते हैं. कोई जवान या जूनियर अफसर अनुशासन तोड़ने की हिम्मत नहीं करता है. वे जानते हैं, अगर ऐसा किया तो उन का रिकौर्ड खराब हो सकता है. उन के अगले प्रमोशन में फर्क पड़ सकता है. समय पर प्रमोशन न मिलने पर वे औरों से जूनियर हो जाएंगे. जवानों की ओर से गलती की गुंजाइश न के बराबर रहती है.’’

मैं थोड़ी देर बाद फिर बोला, ‘‘सर, अदर आर्म्स के अफसर हमारे अफसरों से कहीं ज्यादा अच्छे होते हैं. वे हम पर अधिक विश्वास करते हैं, हमारे काम की प्रशंसा करते हैं विशेषकर जब हम वर्कशौप्स में पोस्ट होते हैं. वे हमें मेहमान सम?ाते हैं. सभी को हमारे सैक्शन से काम पड़ता है. हर स्टोर को देने की हमारी जिम्मेदारी होती है.’’

मेजर सतनाम सिंह साहब नाश्ता कर चुके थे. मुझ से कहा, ‘‘छोड़ें, कैप्टन साहब, परवा मत करें. अब आप इन्हीं की तरह अफसर हैं. इन्हें आप की गुप्त रिपोर्ट नहीं लिखनी है. डिप्टी कमांडैंट साहब और कमांडैंट साहब आप को बहुत मानते हैं. इसीलिए उन्होंने आप को एक अत्यंत जिम्मेदार पोस्ट पर लगाया है. चलिए, अपने काम पर चलते हैं.’’

वे उठे तो मैं भी अपने रूम में आया. वरदी पहनी और अपने औफिस आ गया. औफिस के कार्य में व्यस्त रहा. अफसर मेस में कर्नल के साथ हुई बातचीत डिप्टी कमांडैंट साहब और कमांडैंट साहब के पास पहुंच गई थी. वे दोनों मेरे भाई ब्रिगेडियर साहब के साथ काम कर चुके थे. उन्होंने मुझे अलगअलग समय पर अपने औफिस में बुलाया और पूछा कि कर्नल नेहरा के साथ क्या बात हुई थी. वे मेरे मुख से सारी बात सुनना चाहते थे. मैं ने सब बताया. उन्होंने मुझे अपने काम पर ध्यान देने के लिए कहा. मैं अपने औफिस में चला आया था.

बाद में मुझे कमांडैंट साहब के पीए ने बताया था कि कमांडैंट साहब ने कर्नल नेहरा को बुला कर बहुतकुछ कहा था. शायद उन से यह भी कहा गया था कि वे भी आप की गुप्त रिपोर्ट खराब कर सकते हैं. आप फुल कर्नल नहीं बन पाएंगे. मेरी उन से कोई बात नहीं होती थी. न मेस में और न अन्य कहीं. उन के चेहरे के भावों से हमेशा मुझे यह लगा था कि वे मुझ से नाराज हैं. मेरा उन से कोई संबंध भी नहीं रहता था. डिपो में उन का विभाग अलग था और मेरा अलग.

मैं अपने औफिस में आ कर बैठ गया. जवान रहते जीवन में कैसीकैसी घटनाएं घटीं, सब याद आने लगा था. कई बार आंखोंदेखी बात भी गलत हो जाती है. मैं एक वर्कशौप में पोस्ट था. उस समय मेरे पास साइकिल थी. आदेश यह था कि हम साइकिल पर गेट से बाहर जा कर चढ़ सकते हैं. मैं पैदल ही गेट की तरफ बढ़ रहा था. गेट के पास एक तिरपाल का टुकड़ा पड़ा था. आगे से सूबेदार मेजर साहब आ रहे थे. उन्होंने मुझ से कहा, ‘बाबूजी, देखना यह टुकड़ा कैसे पड़ा हुआ है?’ मैं ने टुकड़ा उठा कर उन्हें दे दिया और लंच के लिए चला गया.

दूर खड़े नायक-क्लर्क पिल्ले को लगा, ‘ले भई, आज हवलदार साहनी चोरी करते पकड़ा गया. सूबेदार मेजर साहब ने उसे रंगेहाथों पकड़ लिया. उस ने पूरी यूनिट में फैला दिया कि हवलदार साहनी चोरी करते पकड़ा गया.’

मैं लंच से लौटा तो मुझे तुरंत मेरे जूनियर अफसर ने बुलाया, पूछा, ‘क्या हुआ था?’

मुझे कुछ पता ही नहीं था. मैं ने उन से पूछा, ‘क्या हुआ, सर. आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?’

‘तुम्हें चोरी करते हुए सूबेदार मेजर साहब ने पकड़ा था?’

‘नहीं सर, यह बात हुई थी.’ मैं ने उन्हें सारी बात बताई.

उन्होंने तुरंत सूबेदार मेजर साहब से पूछा. उन्होंने भी वही बताया जो मैं ने उन्हें बताया था.

मुझे बुरा लगा था. मेरे साथ पूरे स्टाफ को भी बुरा लगा था. सूबेदार मेजर साहब ने शाम को सैंट्रल रोलकौल रखी थी. ऐसी रोलकौल में अफसरों को छोड़ कर सभी जूनियर अफसर और जवान हिस्सा लेते हैं. चाहे कोई फैमिली के साथ रह रहा हो या बैरक में. सूबेदार मेजर साहब ने सारी बात विस्तार से बताई और नायक पिल्ले को सैंटर में खड़ा कर के खूब ?ाड़ा व बेइज्जत किया, कहा, ‘हवलदार साहनी चोर नहीं है, नायक पिल्ले जैसे खुद चोर होते हैं, उन्हें सभी चोर नजर आते हैं. हवलदार साहनी और उन का स्टाफ स्टोर-होल्डर हैं.

‘बाढ़ खेत को नहीं खाती है. अगर आप को सूई भी चाहिए तो आप उन के पास भागते हैं. वे अदर आर्म्स से हैं. हमारे मेहमान हैं. उन्हें इस तरह बदनाम करना छोड़ें. आगे से इस बात का खयाल रखें. नायक पिल्ले जैसी हरकत न करें. यह रोलकौल इसी के लिए बुलाई गई है.’

नायक पिल्ले ने सब के सामने मु?ा से माफी मांगी थी. मैं ने उस से केवल यह कहा था कि आप को बात फैलाने से पहले मु?ा से बात करनी चाहिए थी पर मुंह से निकली बात लौट कर नहीं आती. मैं बहुत दिनों तक आहत रहा था.

मैं नयानया स्कूटर ले कर आया था. मुझे बहुत अच्छा लग रहा था कि मैं अब साइकिल वाला नहीं रहा. मेरे बहुत से साथी और शायद कर्नल नेहरा भी जलभुन गए थे. कुछ दिन तो स्कूटर ठीक चला, बाद में ऐसा खड़ा हुआ कि स्टार्ट ही न हो. मुझे समझ ही नहीं आया कि नया स्कूटर जो शोरूम से निकाले कुछ ही दिन हुए हैं, इस तरह खराब कैसे हो सकता है. कैंटोनमैंट एरिया शहर से दूर होता है. मुझे 4 किलोमीटर स्कूटर धकेल कर शोरूम की वर्कशौप तक ले जाना पड़ा था. संडे था.

यूनिट में छुट्टी थी. रास्ते में कर्नल नेहरा साहब तथा दूसरे अफसर भी मिले थे. सब ने पूछा कि क्या हुआ. मैं ने कहा कि बस, सर, स्टार्ट नहीं हो रहा. शोरूम ले जा रहा हूं. उन में से कइयों ने स्टार्ट कर के भी देखा. उन से भी स्टार्ट नहीं हुआ. उन में ये कर्नल नेहरा भी थे, कहा, ‘ठीक है, शोरूम ले जाओ.’

मैं ने अनुभव किया था, उन के चेहरे पर कुटिल मुसकान थी. शायद खुश हो रहे होंगे कि चार किलोमीटर धकेलेगा तो पता चल जाएगा. शोरूम में मेकैनिक ने बताया कि किसी ने आप के साथ शरारत की है. पैट्रोल टंकी में गंदा सूतर डाल दिया है जिस कारण कारबोरेटर ब्लौक हो गया है. मेकैनिक को सभी साफ कर के लगाने में बड़ी मेहनत पड़ी थी. मुझे उसी रोज पैट्रोल टंकी में ताला लगवाना पड़ा था. फिर कोई शरारत नहीं हुई.

चाय आई, पी कर मैं फिर यादों में खो गया. ट्रेनिंग करते समय मिलिट्री साइंस के पीरियड में हमें विस्तार से सम?ाया गया था कि सेना में अलगअलग व्यवस्थाएं क्यों श्रेष्ठ हैं. सेना में ही नहीं, सिविल में भी ऐसी व्यवस्थाएं हैं. आप अपने अधीन काम करने वालों से ज्यादा घुलमिल नहीं सकते. अफसर बनने के बाद सभी भूल जाते हैं कि जवान और जूनियर अफसर हैं तो वे अफसर हैं. जवान नहीं होते तो वे अफसर भी न होते. वे कमांड किन पर करते.

जानता हूं, अनुशासन के लिए ऐसा करना जरूरी है लेकिन जवानों के वैलफेयर का काम भी तो हम अफसरों को सिखाया जाता है. समय का ध्यान रखो. अगर 10 बजे का टाइम है तो उस से 5 मिनट पहले पहुंचो. आमतौर पर ऐसा ही किया जाता है. मैं ने अपने सैनिक जीवन में एक ऐसा धाकड़ कमांडिंग अफसर देखा जो समय का जबरदस्त पाबंद था. वह परेड लेता था तो उस का जीप से उतरना और परेड का सावधान होना एकसाथ होता था. उस अफसर के समय ब्रिगेड कमांडर साहब का एडम-इंस्पैक्शन था. कमांडर साहब किसी कारण आधा घंटा लेट थे. उन्होंने संतरी से गेट बंद करवा दिया, संतरी से कहा, ‘कमांडर साहब आएं तो गेट नहीं खोलना है. पूछें तो कहना, ‘सर, आप आधा घंटा लेट हैं. इंस्पैक्शन के लिए कोई और दिन निश्चित करें.’

बिग्रेड कमांडर साहब वापस चले गए. उन्होंने एक हफ्ते बाद का समय रखा और समय से 5 मिनट पहले आए. वरना तो कई कमांडिंग अफसर इंस्पैक्शन करने वालों का घंटों इंतजार करते हैं. सेना ऐसे अफसरों के कारण सर्वश्रेष्ठ बनती है. और भी बहुतकुछ याद आने लगा. कई अफसर जवानों से बहुत प्यार करते हैं. उन्होंने देखा, सिविलियन वर्कर शौर्ट लीव ले कर हफ्ते में 2-3 बार घर चले जाते हैं. हमारे जवान पीछे से उन का काम करते रहते हैं. उन्होंने यह कर दिया कि सिविलियन हफ्ते में एक बार शौर्ट लीव जा सकेंगे. यह उन के लिए केवल प्रिविलेज था, अधिकार नहीं था. इसलिए कोई बोल नहीं सका था. यह भी किया कि हमारे जवान भी हफ्ते में एक बार शौर्ट लीव ले सकेंगे चाहे उन्हें सोना ही क्यों न हो.

फिर उन्हीं कमांडैंट साहब ने देखा कि ओपन एयर थिएटर में अफसरों और जूनियर अफसरों के लिए तो कुरसियां लगी होती हैं लेकिन जवानों व उन के बीवीबच्चों को क्वार्टर से दरियां ला कर पिक्चर देखनी पड़ती थी. उन्होंने सब के लिए कुरसियां खरीद कर लगवाईं. ऐसे अफसर भारतीय सेना में भरे पड़े हैं. बहुत कम अफसर कर्नल नेहरा जैसे होते हैं.

ऐसे अनेक शानदार अफसरों के साथ मैं एक लंबी सेवा कर के सेना से सेवानिवृत्त हुआ. खट्टेमीठे अनुभव हमेशा मेरी यादों में बने रहे. मैं ने अपने सैनिक जीवन में केवल यह किया कि मैं ने किसी की छुट्टी नहीं रोकी और कार्य के दौरान कई तरह की बातें होने पर भी मैं ने किसी की गुप्त रिपोर्ट खराब नहीं की. यह मेरे अधिकार क्षेत्र में था.

साहनी के साथ कुछ ऐसा ही हुआ था. Army Story

“पापा जीत गए…” एक सुसाइड नोट में पूरी पीढ़ी की पीड़ा

Heartbreaking Story: पिता की डांट, उन के हाथों बेइज्जत होने का डर और हर समय यह ताना कि वह जीवन में कुछ नहीं कर पाया और कुछ नहीं कर पाएगा, इन शब्द बाणों ने ऐसी घोर हताशा और निराशा उस के अंदर भर दी कि उस ने एक झटके में सब को अलविदा कह दिया.

वह अभी सिर्फ 24 साल का था. उस के सामने बहुत लंबा जीवन शेष था, मगर पिता की उलाहनाओं और अपेक्षाओं ने उसे मौत का रास्ता चुनने के लिए मजबूर कर दिया. 23 अप्रैल को कानपुर में घटी एक दर्दनाक घटना ने समाज के उस चेहरे को बेनकाब किया है, जिसे हम अक्सर बच्चों के भविष्य की चिंता, अनुशासन और संस्कार के नाम पर छिपा देते हैं. यह घटना एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि एक सामाजिक विफलता है. एक ऐसी विफलता, जिस में एक पिता का प्रेम नियंत्रण और अपमान में बदल गया और एक बेटे की उम्मीदों ने धीरेधीरे दम  तोड़ दिया.

जब पिता की अपेक्षाएं बेटे के भीतर डर पैदा करने लगे और उस का घर सुरक्षित स्थान की बजाय तनाव का केंद्र बन जाए, तो युवा मन आखिर कहां जाए? कानपुर में बर्रा-8 के वरुण विहार में रहने वाले प्रशिक्षु वकील प्रियांशु श्रीवास्तव ने कानपुर के न्यायालय भवन की पांचवीं मंजिल से छलांग लगा कर जान दे दी. उस की जेब से मिले दो पेज के सुसाइड नोट में जो सब से ज्यादा दुखी और मार्मिक बात लिखी थी वह यह कि – मेरे पिता मेरे शव को न छुएं.

प्रियांशु ने सुसाइड नोट में अपने पिता राजेंद्र कुमार पर आक्रोश व्यक्त किया है. पिता की तरफ से उस का दिल इसकदर टूट चुका था कि उस ने उन्हें अपना शव तक न छूने की बात लिख डाली. प्रियांशु ने अपने 2 पेज के सुसाइड नोट में जो कुछ भी लिखा है वह आज बच्चों पर पेरैंट्स द्वारा अनावश्यक रूप से बढ़ती जा रही अपेक्षाओं और दबाव से उत्पन्न हताशा और अवसाद की कहानी बयान करता है जिस का सामना आज बहुतेरे बच्चे कर रहे हैं.

प्रियांशु की आत्महत्या से उन तमाम मातापिता की आंखें खुल जानी चाहिए जो अपने बच्चों को हर समय डांटतेफटकारते रहते हैं, जो किसी के भी सामने उन को बेइज्जत कर देते हैं, जो दूसरे बच्चों से हर वक्त अपने बच्चे की तुलना करते रहते हैं और उस के व्यक्तित्व को निखारने ही नहीं देते और एक खिलती हुई कली को फूल बनने से पहले ही मसल डालते हैं.

प्रशिक्षु अधिवक्ता प्रियांशु श्रीवास्तव ने अपने सुसाइड नोट में लिखा – उन की आखिरी इच्छा है कि सुसाइड नोट जो भी देखे उसे आखिरी तक पढ़े. पिता राजेंद्र कुमार की डांट, उलाहने और निर्वस्त्र कर घर से निकालने की धमकी उसे जिंदगी भर सालती रही. पिता से रिश्ते में इस कदर दूरी आ गई थी कि उस ने लिखा – ऐसे पिता भगवान किसी को भी न मिले. पिता उस का शव भी न छू पाएं. उस ने लिखा – पापा जीत गए, उन्हें जीत मुबारक हो.

प्रियांशु ने 2025 में लौ किया था. विधि स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद वह अपने पिता राजेंद्र कुमार श्रीवास्तव के साथ कचहरी में बैठ कर वकालत का प्रशिक्षण लेता था. वहां राजेंद्र कुमार सब के सामने उसे डांटतेफटकारते रहते थे. बचपन से मिल रहे अपमान और डांट जैसे प्रियांशु के दिल पर चस्पा हो गई थीं. अपने अपमान का कोई क्षण वह भूला नहीं था. सुसाइड नोट में उस ने लिखा कि बचपन में 6 साल की उम्र में चुपके से फ्रिज में रखा मैंगो शेक पी लेने पर पिता ने उसे निर्वस्त्र कर घर से निकाल दिया था. वह शर्मिंदगी उस के जेहन में बैठ गई. आगे लिखा कि पढ़ाई के लिए दबाव, अधूरी तैयारी पर पीटना तो फिर भी ठीक था, लेकिन हर पल शक की नजर से देखना, हर मिनट का हिसाब लेना, कहीं न कहीं मानसिक टार्चर ही रहा.

उस ने लिखा – बचपन में चुराए गए एक रुपए के सिक्के वाली गलती को पिता सब के सामने कह कर उसे बेइज्जत करना नहीं भूलते थे. टार्चर इस सीमा तक हुआ कि मेरा प्यार नफरत में बदल गया. वह लिखता है – कक्षा 9 में विषय के चयन से ले कर कम अंक आने पर पिता द्वारा घर से निर्वस्त्र कर निकालने की धमकी के डर से उसे नापसंद विषय लेने पड़े. हाईस्कूल में अंक कम आने पर प्रियांशु डर के मारे घर छोड़ कर मथुरा पहुंच गया.

ऐसा नहीं था कि प्रियांशु अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी का अनुभव नहीं करता था. सुसाइड नोट में उस ने लिखा – पिता को घर खर्च में मदद कर सकूं, इसलिए मैं ने ट्यूशन भी पढ़ाया. कुछ औनलाइन वर्क कर के पिता को मोबाइल फोन और बहन को फोन के साथ स्कूटी भी खरीद कर दी. इस के बावजूद पिता कमजोर होने का आरोप लगाते थे. उस के पास किस का फोन आया, कहां जा रहे हो जैसी जरूरत से ज्यादा दखल उस के जीवन में थी. उस ने लिखा कि उसे न तो कोई गलत शौक है न संगत. पिता खुद का घर और औफिस न बना पाने का ताना उस को देते थे.

सुसाइड नोट के अनुसार सुसाइड वाले दिन भी प्रियांशु के पिता ने महल्ले में सब के के सामने उसे बेइज्जत किया था. ऐसे हालातों में उस की जीने की इच्छा खत्म हो गई. लिखा कि पापा जीत गए… उन्हें जीत मुबारक हो, क्योंकि इतनी बंदिशों और बेइज्जती के साथ वह जी नहीं सकता. साथ ही प्रियांशु ने यह भी लिखा कि उस के पिता पर कोई कार्रवाई न की जाए. उस ने जातेजाते अपनी मां और बहन को ढेर सारा प्यार देने की बात लिखी.

उस रोज जब महल्लेवालों के सामने प्रियांशु को उस के पिता ने बेइज्जत किया, तभी उस ने 2 पेज का सुसाइड नोट लिख कर अपने व्हाट्सएप स्टेटस पर लगा दिया था. इस में उस ने कचहरी जा कर खुदकुशी करने की बात लिखी थी. इस के बाद से ही परिजन प्रियांशु को तलाश रहे थे. मगर वह कहीं नजर नहीं आया. दोपहर लगभग 3.30 बजे प्रियांशु ने न्यायालय भवन की पांचवीं मंजिल से छलांग लगा दी. ऊंचाई से गिरने के कारण प्रियांशु का सिर फट गया और मांस के लोथड़े बाहर आ गए. चारों ओर खून ही खून फैल गया. पांचवीं मंजिल से प्रियांशु जिस जगह गिरा वहां सामान्यत: किसी का आनाजाना नहीं होता है. आसपास कूड़े का ढेर है और वहां आवाजाही का रास्ता भी बंद है. आननफानन में कोर्ट की सुरक्षा में तैनात विशेष सुरक्षा बल के जवान प्रियांशु को अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

प्रियांशु के सुसाइड नोट में जो पीड़ा झलकती है, वह केवल एक बेटे की शिकायत नहीं है, वह एक पीढ़ी की आवाज है. जब वह लिखता है कि – पापा जीत गए, तो यह वाक्य किसी हार का नहीं, बल्कि एक टूटे हुए आत्मसम्मान को दर्शाता है. सब से चिंताजनक बात यह है कि ऐसे संकेत अक्सर पहले से मौजूद होते हैं, जैसे चुप्पी, दूरी, आत्मविश्वास की कमी और लगातार तनाव, लेकिन परिवार इन्हें जिद, कमजोरी, अनुशासनहीनता या असंवेदनशीलता समझ कर नजरअंदाज करता है.

मातापिता का अपने बच्चों से अपेक्षाएं रखना स्वाभाविक है. हर मातापिता चाहते हैं कि उन का बच्चा सफल हो, उन से बेहतर जीवन जिए, लेकिन जब यह अपेक्षाएं “तुलना”, “अपमान” और “नियंत्रण” का रूप ले लेती हैं, तो वे प्रेरणा नहीं, बल्कि विनाश का कारण बनती हैं.

प्रियांशु की आत्महत्या ने बहुत सारे सवालों को जन्म दिया है –

–  बारबार डांटना क्या बच्चों में सच में सुधार लाता है, या उन के आत्मविश्वास को खत्म करता है?

–  दूसरों से अपने बच्चे की तुलना करना क्या उसे प्रेरित करता है, या उस में हीन भावना पैदा करता है?

–  बच्चे का सार्वजनिक अपमान क्या उसे अनुशासन सिखाता है, या उस के आत्मसम्मान को कुचल देता है?

प्रियांशु की मौत उन सभी मातापिता के लिए एक चेतावनी है जो यह मानते हैं कि कठोरता ही सफलता का रास्ता है. बच्चों को दिशा देना जरूरी है, लेकिन उस से भी ज्यादा जरूरी है उन्हें समझना. अपने बच्चों से संवाद करें, केवल उन्हें निर्देश न दें. उन की गलतियों को सुधारें, लेकिन उन्हें अपमानित न करें. उन की तुलना दूसरों से नहीं, उन के अपने विकास से करें और उन्हें यह महसूस कराएं कि वे जैसे हैं, वैसे ही स्वीकार्य हैं.

एक बच्चा केवल आप की अपेक्षाओं पर खरा उतरने वाला मांस का पुतला नहीं है बल्कि वह भावनाओं, सपनों और संवेदनशीलता का अथाह समंदर है. जब उसे बारबार यह एहसास कराया जाए कि वह “कुछ नहीं कर सकता”, तो वह अपनी ही लहरों में डूब कर मर जाता है. प्रियांशु अब वापस नहीं आएगा, लेकिन उस की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं हम भी अनजाने में अपने बच्चों को उसी रास्ते की ओर तो नहीं धकेल रहे?

नगर में ढिंढोरा

Hindi Story: रंजीत ने एक फाइल खोली और पत्रों पर सरसरी नजर डाली तो उसे हर पत्र की लिखावट में अपने 9 वर्षीय बेटे डंपी की भोली सूरत नजर आ रही थी. आंसुओं को रोकने का प्रयत्न करते हुए वह कुरसी से उठ खड़ा हुआ और सोचने लगा कि जब तक डंपी मिल नहीं जाता वह दफ्तर का कोई काम ठीक से नहीं कर सकेगा.

पिछले 7 दिनों से उस के घर में चूल्हा नहीं जला. अड़ोसपड़ोस के लोग और सगेसंबंधी जो भी खाने का सामान लाते उसे ही थोड़ाबहुत खिलापिला जाते थे.

रंजीत घर जाने की छुट्टी लेने के लिए अपने अफसर के कमरे में अभी पहुंचा ही था कि फोन की घंटी बज उठी थी.

‘‘रंजीत, तुम्हारा फोन है,’’ बौस ने उस से कहा था.

रंजीत ने लपक कर फोन उठाया तो दूसरी तरफ  पुलिस अधीक्षक सुमंत राय बोल रहे थे.

‘‘रंजीत, कहां हो तुम? डंपी मिल गया है. तुरंत पुलिस स्टेशन चले आओ.’’

थाने पहुंचते ही रंजीत बेटे को देख कर बोला, ‘‘डंपी, मेरे बच्चे, कहां चले गए थे तुम? सुमंत, किस ने अगवा किया था मेरे बच्चे को?’’

रंजीत डंपी को गले लगाने के लिए आगे बढ़ा तो वह छिटक कर दूर जा खड़ा हुआ.

‘‘मैं कहीं नहीं गया था, पापा. मैं तो शुभम के घर में छिपा हुआ था. मुझे किसी ने अगवा नहीं किया था.’’

‘‘पर तुम पड़ोस के घर में क्यों छिपे थे?’’ रंजीत का स्वर आश्चर्य में डूबा था.

‘‘इसलिए कि मैं जीना चाहता हूं. आप और मम्मी तो उस रात ही मुझे चाकू से मार डालना चाहते थे. वह तो मैं ने अपने स्थान पर तकिया लगा कर अपनी जान बचाई थी.’’

डंपी रोते हुए बोला तो रंजीत ने एक पल को पत्नी की तरफ देखा फिर अपना सिर पकड़ कर बैठ गया.

‘‘ऐसा नहीं कहते, बेटा, भला कोई मम्मीपापा अपने बच्चे को मार सकते हैं?’’ शैलजा डंपी को अपनी बांहों में लेने के लिए आगे बढ़ी.

‘‘पता नहीं मम्मी, पर उस दिन तो आप दोनों ने चाकू से मुझे मारने की योजना बनाई थी,’’ डंपी अब सिसक कर रोने लगा.

‘‘बहुत हो गया यह तमाशा. अब एक शब्द भी आगे बोला तो इतनी पिटाई करूंगा कि बोलती बंद हो जाएगी,’’ रंजीत बच्चे द्वारा किए गए अपमान को सह नहीं पा रहा था.

‘‘मुझे पता है, इसीलिए तो मैं आप के साथ रहना नहीं चाहता हूं,’’ डंपी सिसक रहा था.

‘‘आखिर, उस दिन ऐसा क्या हुआ था कि बच्चा इतना डरा हुआ है?’’ दादी मां के इस सवाल पर रंजीत, शैलजा और डंपी के सामने उस रात की तमाम घटनाएं सजीव हो उठीं.

अचानक जोर की चीख सुन कर नन्हा डंपी जाग गया था. जब अंधेरे की वजह से उस की कुछ समझ में नहीं आया तो वह घबरा कर उठ बैठा था. धीरेधीरे अंधेरे में जब उस की आंखें देखने की अभ्यस्त हुईं तो देखा कि पलंग के एक कोने पर बैठी मम्मी सिसक रही थीं.

‘मैं तो इस दिनरात की किचकिच से इतना दुखी हो गया हूं कि मन होता है आत्महत्या कर लूं,’ रंजीत ने तौलिए से हाथमुंह पोंछते हुए कहा था.

‘चलो अच्छा है, कम से कम एक विषय में तो हम दोनों के विचार मिलते हैं. मैं भी दिन में 10 बार यही सोचती हूं. मैं ने तो बहुत पहले ही आत्महत्या कर ली होती. बस, डंपी का मुंह देख कर चुप रह जाती हूं कि मेरे बाद उस का क्या होगा,’ शैलजा भरे गले से बोली थी.

‘यह कौन सी बड़ी समस्या है. पहले डंपी का काम तमाम कर देते हैं फिर दोनों मिल कर आत्महत्या करेंगे. कम से कम इस नरक से तो छुटकारा मिलेगा,’ रंजीत तीखे स्वर में बोला था.

‘ठीक है. अच्छे काम में देर कैसी? मैं अभी चाकू लाती हूं,’ और क्रोध से कांपती शैलजा रसोईघर की ओर लपकी थी. रंजीत उस के पीछेपीछे चला गया था.

इधर दिसंबर की ठंड में भी डंपी पसीने से नहा गया था. कुछ ही दिन पहले टेलीविजन पर देखा भयंकर दृश्य उस की आंखों में एकाएक तैर गया जिस में एक दंपती ने अपने 3 बच्चों की हत्या करने के बाद आत्महत्या का प्रयास किया था.

डंपी को लगा कि उस ने यदि शीघ्र ही कुछ नहीं किया तो कल तक वह भी टेलीविजन के परदे पर दिखाया जाने वाला एक समाचार बन कर रह जाएगा. उधर रसोईघर से शैलजा और रंजीत के झगड़े के स्वर तीखे होते जा रहे थे.

डंपी फौरन उठा और अपने स्थान पर तकिया लगा कर उसे रजाई उढ़ा दी. सामने पड़ा एक पुराना कंबल ले कर वह पलंग के नीचे लेट गया. भय और ठंड के मिलेजुले प्रभाव से डंपी अपने घुटनों को ठोड़ी से सटाए वहीं पड़ा रहा.

आधी रात तक लड़नेझगड़ने के बाद रंजीत और शैलजा थकहार कर सो गए थे पर डंपी की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था. ये तो बड़े खतरनाक लोग हैं. मातापिता हैं तो क्या हुआ, उसे तो मार ही डालेंगे. इन लोगों के साथ रहना खतरे से खाली नहीं है.

कुछ ही देर में कमरे में खर्राटों के स्वर गूंजने लगे थे. डंपी को अपने ही माता- पिता से वितृष्णा होने लगी. वैसे तो बड़ा प्यार जताते हैं पर अब दोनों में से किसी को भी होश नहीं है कि मैं कहां पड़ा हूं.

सुबह उठ कर रंजीत जब ड्राइंगरूम में आया तो डंपी को तैयार बैठा देख कर चौंक गया, ‘बड़ी जल्दी तैयार हो गए तुम?’

‘जल्दी कहां, पापा, 7 बजे हैं.’

‘रोज तो कितना भी जगाओ, उठने का नाम नहीं लेते और आज अभी से सजधज कर तैयार हो गए,’ रंजीत अखबार पर नजर गड़ाए हुए बोला था.

‘शायद आप को याद नहीं है, पापा, मेरी परीक्षा चल रही है,’ डंपी ने याद दिलाया था.

‘ठीक है, जाओ पर खाने का क्या  इंतजाम करोगे? तुम्हारी मम्मी को तो सोने से ही फुरसत नहीं मिलती.’

‘कोई बात नहीं, पापा मैं ने नाश्ता कर लिया है. मैं चलता हूं नहीं तो बस छूट जाएगी,’ कहते हुए डंपी घर से बाहर निकल गया था.

‘डंपी…ओ डंपी?’ लगभग 2 घंटे बाद शैलजा की नींद खुली तो उस ने बदहवासी से बेटे को पुकारा था.

‘डंपी बाबा तो मेरे आने से पहले ही स्कूल चले गए,’ काम वाली ने शैलजा को बताया.

‘और साहब?’

‘वह भी अपने दफ्तर चले गए. मैं ने नाश्ते के लिए पूछा तो कहने लगे कि रहने दो. कैंटीन से मंगा कर खा लूंगा.’

‘उन्हें घर का खाना कब भाता है’ वह तो कैंटीन में खा लेंगे पर डंपी, वह बेचारा तो पूरे दिन भूखा ही रह जाएगा. कम्मो, तू जल्दी से कुछ बना कर टिफिन में रख दे. तब तक मैं तैयार हो लेती हूं.’

शैलजा टिफिन ले कर स्कूल पहुंची तो आया ने गेट पर ही रोक कर टिफिन ले लिया था.

‘मैं एक बार अपने बेटे डंपी से मिलना चाहती हूं,’ शैलजा ने अनुरोध भरे स्वर में कहा था.

‘उस के लिए तो आप को दोपहर की छुट्टी तक इंतजार करना पड़ेगा क्योंकि पढ़ाई के समय में अभिभावकों को अंदर जाने की इजाजत नहीं है,’ आया ने बताया था.

शैलजा आया को टिफिन पकड़ा कर लौट आई थी.

घर पहुंचते ही कम्मो ने बताया था कि डंपी बाबा के स्कूल से फोन आया था.

‘अभी वहीं से तो मैं आ रही हूं. घर पहुंचने से पहले ही फोन आ गया. ऐसा क्या काम आ पड़ा?’

उसी समय फोन की घंटी बज उठी. शैलजा ने लपक कर फोन उठाया तो उधर से आवाज आई थी, ‘आप डंपी की मम्मी बोल रही हैं न?’

‘जी हां, आप कौन?’

‘मैं स्कूल की प्रधानाचार्या बोल रही हूं. आप ही कुछ देर पहले डंपी के लिए टिफिन दे गई थीं. लेकिन आप का बेटा डंपी आज स्कूल आया ही नहीं है.’

‘क्या कह रही हैं आप? डंपी तो आज सुबह 7 बजे ही घर से स्कूल के लिए चला गया था. वहां न पहुंचने का तो प्रश्न ही नहीं उठता.’

‘देखिए, मेरा काम था आप को सूचित करना, सो कर दिया. आगे जैसा आप ठीक समझें,’ और फोन रख दिया गया था.

शैलजा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. डंपी गया तो कहां गया.

वह दोनों हाथों में सिर थामे जहां खड़ी थी वहीं खड़ी रह गई. उसे लगा कि टांगों में जान नहीं रही है, उस का गला भी सूख रहा था और आंखों के आगे अंधेरा छा रहा था.

शैलजा की यह दशा देख कर कम्मो दौड़ी आई और उसे सहारा दे कर सोफे पर बैठाया. एक गिलास पानी देने के बाद कम्मो ने शैलजा के सामने फोन रख दिया.

रात के झगड़े के बाद शैलजा की रंजीत से बोलचाल बंद थी पर उस की चिंता न करते हुए उस ने सिसकियों के बीच सबकुछ रंजीत को बता दिया था.

‘सुबह तो डंपी मेरे सामने ही बस्ता ले कर गया था. तो स्कूल की जगह वह और कहां जा सकता है. मैं स्कूल जा कर देखता हूं. वहीं कहीं बच्चों के साथ होगा,’ कहने को तो रंजीत कह गया था पर घबराहट के मारे उस का भी बुरा हाल था.

चौथी कक्षा में पढ़ने वाले 9 वर्षीय डंपी के गायब होने का समाचार जंगल में लगी आग की तरह फैल गया था. जितने मुंह उतनी बातें.

हर स्थान पर खोजखबर लेने के बाद रंजीत और शैलजा ने पुलिस में बेटे के गायब होने की रिपोर्ट लिखा दी थी. शुभम के मातापिता छुट्टियां मनाने दूसरे शहर गए हुए थे अत: घर वापस लौटते ही वे लपक कर डंपी के घर पहुंचे थे.

‘मुझे तो लगता है मैं ने डंपी को अपने घर के सामने खड़े देखा था,’ शुभम की मम्मी रीमा बोली थीं.

‘भ्रम हुआ होगा तुम्हें. इतने दिनों से ये लोग ढूंढ़ रहे हैं उसे. हमारे घर के सामने कहां से आ गया वह?’ शुभम के पापा रीतेश बोले थे.

रीमा को कुछ दिनों से शुभम की गतिविधियां विचित्र लगने लगी थीं. फ्रिज में रखे खाने के सामान तेजी से खत्म होने लगे. सदा चहकता रहने वाला शुभम खुद में ही डूबा रहने लगा था.

एक दिन रीमा ने शुभम को तब रंगे हाथ पकड़ लिया जब वह डंपी को खाने का सामान दे रहा था. शुभम के घर के पिछवाड़े कुछ खाली ड्रम रखे हुए थे, डंपी वहीं छिपा हुआ था.

पूरी जानकारी कर लेने के बाद पुलिस अधीक्षक सुमंत राय डंपी के मातापिता को सवालिया नजरों से देखने लगे.

काफी देर हिचकियां ले कर रोने  के बाद डंपी अपनी दादी की गोद में सो गया.

‘‘बहनजी, बच्चे के मन में डर बैठ गया है,’’ डंपी की नानी बोली थीं, ‘‘अब तो मुझे भी डर लग रहा है कि ये लोग क्रोध में बच्चे को चाकू घोंप कर मार डालते तो कोई क्या कर लेता?’’

‘‘ठीक कह रही हैं आप,’’ पुलिस अधीक्षक सुमंत राय बोले थे, ‘‘इस तरह की घटनाएं खुद पर नियंत्रण खो बैठने से ही होती हैं. इस बार तो मैं डंपी को रंजीत और शैलजा को सौंपे दे रहा हूं पर इन्हें लिखित भरोसा देना होगा कि बच्चे को ऐसी यंत्रणा से दोबारा न गुजरना पड़े.’’

‘‘भविष्य में ऐसा नहीं होगा. हम आप को वचन देते हैं,’’ रंजीत और शैलजा किसी से नजरें नहीं मिला पा रहे थे.

‘‘फिर भी मैं बच्चे की दादीदादा और नानीनाना से कहूंगा कि वे बारीबारी से यहां आ कर रहें जिस से कि बच्चे का मातापिता से खोया विश्वास लौट सके.’’

सुमंत राय बोले तो सब ने सहमति में सिर हिलाया. उधर गहरी नींद में करवट बदलते हुए डंपी फिर सिसकने लगा था. Hindi Story

मिट्टी का तेल

Hindi Kahani: बूआ और फूफा गुड़गांव से अपने बेटे और नई बहू के साथ मिलने आए थे. दिन भर का कार्यक्रम था. खाना खा कर उन्हें वापस जाना भी था. उमाशंकर ने भी अपने बेटे अतुल की शादी कुछ माह पहले ही की थी. शादी के बाद बूआ और फूफा पहली बार आए थे. स्वागत का विशेष प्रबंध था.

उमाशंकर की पत्नी राजरानी ने झिड़क कर कहा, ‘‘कुछ तो सोच कर बोला करो. बहुएं घर में हैं और सुन भी रही हैं.’’

उमाशंकर ने झिड़की की परवा न कर हंसते हुए कहा, ‘‘अरे यार, उन्हें ही तो सुना रहा हूं. समय पर चेतावनी मिल जाए तो आगे कोई गड़बड़ नहीं होगी और तुम भी आराम से उन पर राज कर सकोगी.’’

‘‘मुझे ऐसा कोई शौक नहीं,’’ राजरानी ने समझदारी से कहा, ‘‘मेरी बहू सुशील, सुशिक्षित और अच्छे संस्कार वाली है. कोई शक?’’

गुड़गांव से आए फूफाजी उठ कर कुछ देर पहले हलके होने के लिए बाथरूम गए थे. जब लौटे तो हंस रहे थे.

कौशल्या ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘किस बात पर हंस रहे हो? बाथरूम में जो पोस्टर चिपका हुआ है उसे पढ़ कर आए हो?’’

‘‘अजीबोगरीब पोस्टर बाथरूम और अपने कमरे में चिपकाना आजकल के नौजवान लड़केलड़कियों का शौक है, पर मुझे हंसी उस पर नहीं आ रही है,’’ फूफाजी ने उत्तर दिया.

‘‘तो फिर?’’ कौशल्या ने पूछा.

फूफाजी ने उमाशंकर से पूछा, ‘‘क्यों भई, बाथरूम में मिट्टी का तेल क्यों रखा हुआ है?’’

उमाशंकर ने जोरदार हंसी के साथ जो उत्तर दिया उस से न चाहते हुए भी दोनों नई बहुएं सहम गईं.

रात के अंधेरे में चिंकी ने बेचैनी से पूछा, ‘‘पिताजी क्या सच कह रहे थे?’’

‘‘क्या कह रहे थे?’’ अतुल ने चिंकी का हाथ पकड़ कर खींचते हुए पूछा.

‘‘वही मिट्टी के तेल वाली बात,’’ चिंकी ने हाथ छुड़ाते हुए कहा.

‘‘ओ हो, तुम भी कितनी मूर्ख हो,’’ अतुल ने चिढ़ कर कहा, ‘‘पिताजी मजाक कर रहे थे और उन्हें मजाक करने की आदत है. तुम औरतों की कमजोरी यही है कि मजाक नहीं समझतीं. अब उस दिन बिना बात तुम्हारी मम्मी भी भड़क गई थीं.’’

‘‘मेरी मां तुम्हारी भी तो कुछ लगती हैं. बेचारी कितनी सीधीसादी हैं. उन का मजाक उड़ाना कोई अच्छी बात थी?’’ चिंकी ने क्रोध से कहा, ‘‘मेरी मां के बारे में कभी कुछ मत कहना.’’

‘‘अच्छा बाबा माफ करो,’’ अतुल ने प्यार से चिंकी को फिर पास खींचा, ‘‘अब तो चुप हो जाओ.’’

‘‘मैं चुप कैसे रह सकती हूं,’’ चिंकी ने शंका से पूछा, ‘‘बताओ न, क्या पिताजी सच कह रहे थे?’’

अब अतुल चिढ़ गया. खीज कर बोला, ‘‘हां, सच कह रहे थे. तो फिर? और यह भी सुनो. इस घर में पहले भी 3-4 बहुएं जलाई जा चुकी हैं और शायद अब तुम्हारी बारी है.’’

चिंकी छिटक कर दूर हो गई. उस रात समझौते की कोई गुंजाइश नहीं थी.

अगले दिन सबकुछ सामान्य था क्योंकि सब अपने- अपने काम रोज की तरह कर रहे थे. कोई तनाव नहीं. सबकुछ एक बदबू के झोंके की तरह उड़ गया था. फिर भी चिंकी जितनी बार बाथरूम जाती, मिट्टी के तेल की बोतल को नई दृष्टि से देखती थी और तरहतरह के दुष्ट विचार मन में आ जातेथे.

एकांत पा कर मां के नाम पत्र लिखा. सारी बातें विस्तार से लिखीं कि शादी में कहीं दहेज में तो कोई कमी नहीं रह गई? लेनेदेने में तो कहीं कोई चूक नहीं हो गई? अतुल को तो किसी तरह मना लेगी, पर ससुर के लिए आने वाली होली पर सूट का कपड़ा और सास के लिए कांजीवरम वाली साड़ी जो जानबूझ कर नहीं दी गई थी, अब अवश्य दे देना. हो सके तो अतुल के लिए सोने की चेन और सास के लिए कंगन भी बनवा देना. पता नहीं कब क्या हो जाए? वैसे माहौल देखते हुए ऐसी कोई आशंका नहीं है. ऊपर से सब का व्यवहार अच्छा है और प्यार से रखते हैं.

पत्र पढ़ कर मां घबरा गईं.

‘‘मेरा मन तो बड़ा घबरा रहा है,’’ मां ने कहा, ‘‘आप जाइए और चिंकी को कुछ दिनों के लिए ले आइए.’’

‘‘अब ऐसे कैसे ले आएं?’’ पिताजी ने चिंता से कहा, ‘‘चिंकी ने किसी की शिकायत भी तो नहीं की है. ले आने का कोई कारण तो होना चाहिए. हम दोनों का रक्तचाप ठीक है और मधुमेह की भी शिकायत नहीं है.’’

‘‘यह कोई हंसने की बात है,’’ मां ने आंसू रोकते हुए कहा, ‘‘कुछ तो बात हुई होगी जिस से चिंकी इतना परेशान हो गई. जो कुछ उस ने मांगा है वह होली पर दे आना. मेरी बेटी को कुछ हो न जाए.’’

‘‘कुछ नहीं होगा. तुम बेकार में दुखी हो रही हो,’’ पिताजी ने कहा, ‘‘उमाशंकरजी को हंसीमजाक करने की आदत है. दहेज के लिए उन्होंने आज तक कोई शिकायत नहीं की.’’

‘‘आदमी का मन कब फिर जाए कोई कह सकता है क्या? आप समझा कर अतुल को एक चिट्ठी लिख दीजिए,’’ मां ने कहा.

‘‘मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा,’’ पिताजी ने दृढ़ता से कहा, ‘‘हां, तुम चिंकी को जरूर लिख दो. कोई चिंता की बात नहीं है. सब ठीक हो जाएगा.’’

मां ने नाराजगी से पति को देखा और चिंकी को सांत्वना का पत्र लिखने बैठ गईं.

होली आई तो अतुल और चिंकी को घर आने की दावत दी. दामाद का खूब सत्कार हुआ. कुछ अधिक ही.

चिंकी ने मां को अलग ले जा कर पूछा, ‘‘आप ने सूट का कपड़ा और साड़ी खरीदी?’’

‘‘नहीं, तेरे पिताजी नहीं मानते. कहते हैं कि फालतू देने से लालच बढ़ जाता है. फिर कोई मांग भी तो नहीं की. हां, अतुल के लिए सोने की चेन बनवा दी है,’’ मां ने प्यार से कहा.

‘‘मां, बस तुम भी…चिंकी ने निराशा से कहा,’’ भुगतना तो मुझे ही पड़ेगा. आप को क्या. बेटी ब्याह दी, किस्सा खत्म. क्या अखबार नहीं पढ़तीं? टीवी नहीं देखतीं? हर रोज बहुओं के साथ हादसे हो रहे हैं.’’

‘‘बेटी, तेरे सासससुर ऐसे नहीं हैं,’’ मां ने समझाने की कोशिश की.

‘‘ठीक है मां…’’ चिंकी ने गिरते आंसुओं को थाम लिया.

जब बेटी और दामाद को बिदा किया तो ढेरों मिठाई और पकवान साथ में दिया. हजारहजार रुपए से टीका भी कर दिया.

अतुल ने विरोध किया, ‘‘मम्मीजी, इतना सब देने की क्या जरूरत है?’’

‘‘बेटा, करना तो बहुत कुछ चाहते थे पर अभी तो इतना ही है,’’ सास ने कहा, ‘‘तुम सब खुश रहो यही मन की इच्छा है.’’

‘‘मम्मीजी, आप का आशीर्वाद है तो सब ठीक ही होगा,’’ अतुल ने जल्दी से कहा, ‘‘अब चलें, देर हो रही है.’’

‘‘उमाशंकरजी और अपनी मम्मी को हमारा आदर सहित प्रणाम कहना,’’ पिताजी ने कहा.

ससुराल आने पर चिंकी बाथरूम गई तो मिट्टी के तेल की बोतल को अपनी जगह पाया. पता नहीं क्या होगा? सासससुर को शिकायत का कोई अवसर नहीं देगी. वैसे धीरेधीरे अतुल को रास्ते पर लाना होगा. जल्दी से जल्दी दूसरा घर या तबादले का प्रबंध करना पड़ेगा. मन के किसी एक कोने में आशंका का दिया जल रहा था.

छुट्टी का दिन था. रात हो चली थी. अतुल किसी काम से बाहर गया हुआ था. अचानक घर की रोशनी चली गई. घोर अंधेरा छा गया. अकसर आधे घंटे में बिजली आ जाती थी, पर आज बहुत देर हो गई.

अंधेरे में क्या करे कुछ सूझ नहीं रहा था.

उमाशंकर ने टटोलते हुए कहा, ‘‘राजरानी, एक टार्च थी न, कहां है? कुछ याद है.’’

‘‘आप की मेज की दराज में है,’’ राजरानी ने कहा, ‘‘पर उस का क्या करोगे? बैटरी तो है नहीं. बैटरी लीक कर गई थी तो फेंक दी थी.’’

उधर रसोई में टटोलते हुए और कुछ बर्तन इधरउधर गिराते हुए राजरानी बड़बड़ा रही थी, ‘‘मरी माचिस भी कहां रख दी, मिल ही नहीं रही है. और यह अतुल भी पता नहीं अंधेरे में कहां भटक रहा होगा.’’

अगर अचानक अंधेरा हो जाए तो बहुत देर तक कुछ नहीं सूझता. राजरानी, उमाशंकर और चिंकी तीनों ही कुछ न कुछ ढूंढ़ रहे थे, पर कभी दीवार से तो कभी फरनीचर से और कभी दरवाजे से टकरा जाते थे.

कमरे में टटोलते हुए चिंकी के हाथ में कुछ आया. स्पर्श से ध्यान आया कि कुछ दिन पहले उस ने एक लैंप देखा था. शायद वही है. पता नहीं कब से पड़ा था. अब बिना तेल के तो जल नहीं सकता.

उसे ध्यान आया, मिट्टी के तेल की बोतल बाथरूम में रखी है. कुछ तो करना होगा. दीवार के सहारे धीरेधीरे कमरे से बाहर निकली. पहला कमरा सास का था. फिर टीवी रूम था. आगे वाला बाथरूम था. दरवाजा खुला था. कुंडी नहीं लगी थी. एक कदम आगे कमोड था. बोतल तक हाथ पहुंचने के लिए कमोड पर पैर रख कर खड़े होना था. चिंकी यह सब कर रही थी, पर न जाने क्यों उस का दिल जोरों से धड़क रहा था.

जैसे ही बोतल हाथ लगी उसे मजबूती से पकड़ लिया. आहिस्ता से नीचे उतरी. फिर से दीवार के सहारे अपने कमरे में पहुंची. अब लैंप का ढक्कन खोल कर उस में तेल डालना था. अंधों की तरह एक हाथ में लैंप पकड़ा और दूसरे हाथ में बोतल. कुछ अंदर गया तो कुछ बाहर गिरा.

लो कितनी मूर्ख हूं मैं? चिंकी बड़बड़ाते हुए बोली. अब माचिस कहां है? माचिस इतनी देर से उस की सास को नहीं मिली तो उसे क्या मिलेगी? सारी मेहनत बेकार गई. अतुल तो सिगरेट भी नहीं पीता.

तभी चिंकी को ध्यान आया कि पिछले माह वह अतुल के साथ एक होटल में गई थी. होटल की ओर से उस के नाम वाली माचिस हर ग्राहक को उपहार में दी गई थी. अतुल ने वह माचिस अपनी कोट की जेब में डाल ली थी. माचिस को अभी भी जेब में होना चाहिए.

जल्दी से तेल की बोतल नीचे रखी और कपड़ों की अलमारी तक पहुंची. सारे कपड़े टटोलते हुए वह कोट पकड़ में आया. गहरी सांस ली और जेब में हाथ डाला. माचिस मिल गई. वह बहुत खुश हुई. जैसे ही जलाने लगी बोतल पर पैर लगा और सारा तेल गिर कर फैल गया.

उमाशंकर ने पूछा, ‘‘राजरानी, मिट्टी के तेल की बदबू कहां से आ रही है? क्या तुम ने तेल की बोतल तो नहीं गिरा दी?’’

‘‘अरे, मैं तो कब से यहां रसोई में खड़ी हूं,’’ राजरानी ने कहा, ‘‘मरी माचिस ढूंढ़ रही हूं.’’

‘‘अब छोड़ो भी माचिसवाचिस,’’ उमाशंकर ने कहा, ‘‘यहां आ जाओ और बैठ कर बिजली आने का इंतजार करो.’’

चिंकी ने माचिस जलाई और गिरी बोतल को हाथ में उठा लिया.

उमाशंकर ने लाइट की चमक देखी तो चिंकी के कमरे की ओर आए और वहां जो नजारा देखा तो सकपका गए. झट से दौड़ कर गए और चिंकी के हाथ से जलती माचिस की तीली छीन ली और अपने हाथ से मसल कर उसे बुझा दी.

‘‘लड़की तू कितनी पागल है?’’ उमाशंकर ने डांट कर कहा, ‘‘तू भी जलती और सारे घर में आग लग जाती.’’

तभी बिजली आ गई और सब की आंखें चौंधिया गईं. चिंकी ने जो दृश्य देखा समझ गई कि वह कितनी बड़ी भूल करने जा रही थी. घबरा कर कांपने लगी.

उमाशंकर ने हंस कर उसे झूठी सांत्वना दी, ‘‘मरने की बड़ी जल्दी है क्या?’’

और चिंकी को जो शर्म आई वह कभी नहीं भूली. शायद भूलेगी भी नहीं. Hindi Kahani

क्रिएटर के क्राइम में पार्टनर होते हैं फौलोअर

Social Media Crime: रील बनाने के चक्कर में बहुत से इन्फ्लुएंसर्स अपनी हड्डीपसली तो तुड़वा ही रहे हैं, दूसरों की जान भी खतरे में डाल रहे हैं. दिल्ली पुलिस ने एक रील क्रिएटर को पकड़ा जिस के वीडियो में वह रौंग साइड पर बाइक चला रहा था और सामने से आती कारों और ट्रकों से बच कर निकल रहा था. यह तो नैचुरल है कि ड्राइवर के पीछे वीडियो शूट करने वाले कम से कम 2 बाइक्स पर 4 जने होंगे जो सभी रौंग साइड पर ही चल रहे होंगे बिना वार्निंग के, बिना पुलिस परमिशन के.

रौंग साइड और सिविक इरिस्पौंसिबिलिटी सोशल मीडिया का हालमार्क बन गया. जितना ज्यादा चौंका सको, जितना ज्यादा डेयरिंग बन सको, जितने ज्यादा रिस्क ले सको, रील उतनी ही पौपुलर होगी. यह कुछ अच्छा करने के लिए नहीं दूसरों को डिस्टर्ब नहीं किया जा रहा बल्कि यह अपने स्वार्थ के लिए किया जा रहा है.

बंद कमरे में आप जो चाहो शूट करो, जो चाहो रिस्क लो, खुद के पैट्रोल से नहा कर लाइटर जलाओ, यह सब आप की मरजी. लेकिन इस से किसी का घर न जल जाए, यह तो देखना होगा न. आज के रील क्रिएटर लिमिट क्रौस कर रहे हैं. उन से ज्यादा उन के व्यूअर्स और फौलोअर्स जिम्मेदार हैं जो एक तरह से उन्हें गाल पर पप्पी दे रहे हैं कि वाह, क्या कमाल किया है.

आज की जेनजी इन तमाशों में बिजी हो गई है. पुराने रूल्स को चैलेंज करना हर नई जनरेशन का राइट भी है और रिस्पौंसिबिलिटी भी. लेकिन दूसरों को खतरों में डालने का राइट किसी को नहीं. इन दूसरों में शूटिंग करने में साथ लगे जहां एसोसिएट शामिल हैं वहीं घरवाले भी शामिल हैं और घर का सामान व अपना उन का खुद का फ्यूचर भी शामिल है.

रौंग साइड ड्राइविंग में पूरी सड़क डैंजर जोन बन जाती है. पुलिस तो बाद में आती है. सामने आने वाले और साइड में चलने वाले सभी घबरा जाते हैं कि क्या हो रहा है, कौन रौंग साइड पर क्यों चल रहा है. आज की रोड्स इतनी अनसेफ हैं कि सड़कों पर ध्यान बंटने से सीरियस ऐक्सिडैंट हो सकता है.

सब रील क्रिएटर नहीं जानते कि एक बार डिजिटल प्लेटफौर्म पर कुछ गया नहीं कि वह बरसों तक जिंदा रहेगा. और अब डिजिटल टैक्निक और फेसप्लेस रिकौग्नीशन टैक्निक सैकंडों में वर्षों पुराने डिलीट किए फोटो व वीडियो ढूंढ़ कर निकाल सकते हैं. क्रिएटर का पूरा फ्यूचर इन से बिगड़ सकता है.

फौलोअर्स को भी नहीं भूलना चाहिए कि वे जिसे फौलो कर रहे हैं उस का रिकौर्ड भी जमा हो रहा है. नैटफिलक्स पर बनी सीरीज ‘एडोल्सैंस’ में पुलिस कुछ घंटों में 13 साल के मर्डर एक्यूज्ड के मोबाइल इन अकाउंट्स के बल पर बेल नहीं देने का और्डर पा लेती है जिन्हें एक्यूज्ड फौलो कर रहा था. क्रिएटर के क्राइम में वे भी पार्टनर हैं. रौंग साइड औफ रोड हो या रौंग साइड औफ नौर्म हो, गलत ही है. Social Media Crime

 

जिंदा लाश

Suspense Story: पंखे से झुलती भाभी की शिथिल देह, ऐंठा हुआ शरीर और वे आंखें… उफ, आरती की आंखों के सामने वो मंजर एक बार फिर घूम गया. जाड़े की इस सर्द रात में भी उस के चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक गईं. कितना प्यार करते थे भैया भाभी से. भाभी भी तो कम प्यार नहीं करती थी लेकिन भाभी का गुस्सा कभीकभी उन के प्यार पर हावी हो जाता. आरती को अपनी गृहस्थी से फुरसत ही नहीं मिलती, कहने को एक ही शहर में थी पर बड़ी मुश्किल से एक रात ही रुक पाती थी.

मां के मुंह से अकसर सुना था, ‘सबकुछ तो ठीक है पर प्रभा का गुस्सा राम बचाए, आगेपीछे कुछ भी नहीं सोचती. अब तो बालबच्चे भी हो गए हैं. ऐसी भी क्या जिद, मुंह से कुछ निकला नहीं, बस, पूरा कर दो. अरे, ऐसे थोड़े ही होता है. कितना समझाया था बड़े घर की इकलौती लड़की है, हमारे घर में कैसे खपेगी लेकिन तेरे भाई पर तो प्यार का भूत सवार था.’

किस ने सोचा था, भाभी की यही जिद न जाने कितनों की जिंदगी बरबाद कर देगी. सुबह से घर में कुहराम मचा हुआ था. आरती भाई से मिलने आई थी. घर में अब शोर मचना बंद हो चुका था. रात का घना अंधेरा पसरा हुआ था. घर में अजीब सा सन्नाटा था, ऐसा सन्नाटा जिसे वर्षों से कोई तोड़ न पाया. न जाने कितने मौसम आए और गए पर भाभी के जाने के बाद इस घर की खुशियों का मौसम कभी लौट कर नहीं आया. भाभी के कमरे का दरवाजा उड़का हुआ था. दरवाजे की दरारों से ?ांकती रोशनी भी उतनी ही बेचैन लग रही थी जितनी उस दरवाजे के पीछे रहने वाले वे मासूम चेहरे.

आरती पानी पीने के लिए रसोईघर की तरफ बढ़ी. न जाने कमरे की वे रोशनी उसे बारबार खींच रही थी. जब से वो मायके आई थी तब से उस ने देररात तक उस कमरे में उस रोशनी को महसूस किया था. जानती थी वह रोशनी से नहाए उस कमरे में रहने वालों के दिल का कोनाकोना कहीं न कहीं गले तक अंधेरे में डूबा हुआ था. भाभी के जाने के बाद घर में कबाड़ रखने वाले कमरे में भैया अपना सारा सामान समेट कर सिमट गए थे.

आरती ने कई बार कहा था, ‘मां, भैया अपने कमरे में क्यों नहीं सोते?’

मां की बात सुन आरती अंदर तक हिल गई थी. भैया अकसर रात में भाभी का नाम ले कर चिल्लाने लगते थे. उन्हें लगता कि रात के अंधेरे में कोई चुपके से उन की छाती पर सवार हो गया हो और पूछ रहा हो, ‘खुश हो न, अब?’

भाभी ने भाई से जिद की थी जब वे जिंदा थीं और मजे से जिंदगी चल रही  थी. ‘राजीव, भाई की शादी है, इकलौती बहन हूं मैं. बहुतकुछ सोचना पड़ता है. ये सब मैं अपने लिए थोड़ी कर रही हूं. तुम तो जानते हो, पापा हमारे रिश्ते से कभी खुश नहीं थे. तुम्हारी इज्जत के लिए कर रही हूं. शादी में एक सैट खरीद कर दे देते हैं. पापा को लगना चाहिए कि बेटी ने भले अपने मन से शादी की पर उस की पसंद गलत नहीं थी.’

‘प्रभा, समझने की कोशिश करो, नईनई नौकरी है. बौस पैसे नहीं देगा. वैसे भी, नईनई गृहस्थी है, कितनाकुछ जोड़ना है.’

भैया ने एक भरपूर नजर अपने घर पर डाली. घर एक छोटे शहर के पुराने से महल्ले में था. उखड़ा प्लास्टर. उड़ता रंग. उन की आवाज में याचना थी. प्यार कल्पना के खुले आकाश में विचरता है पर गृहस्थी यथार्थ के कठोर धरातल पर. हनीमून का समय बीत चुका था. अब जिंदगी से दोदो हाथ करना था. एक खेल ही तो है जिंदगी, जिस में एक तरफ आप अकेले होते हैं, दूसरी तरफ जिंदगी. हर बार यही लगता कि अगले मोड़ पर चैन होगा, सुकून होगा लेकिन यह सोचतेसोचते उम्र बीत जाती है. बस, थोड़ी दूर और. इंसान जिंदगी का हाथ पकड़ेपकड़े कितना आगे निकल आता है. एक ऐसे सफर पर जो कभी खत्म नहीं होता. वैसे भी, जिंदगी अकेले कहां होती है, मैदान उस का, पांसे उस के, समय उस का, चालें भी उस की और हम सिर्फ हाथपैर मारते हैं या सच पूछो तो हाथपैर मारने का ढोंग भर ही करते हैं. अब तो उन के 2 बच्चे भी हो चुके थे. भैया एकएक पैसा संभल कर खर्च करते थे.

‘तंग आ गई हूं तुम से. हर बार एक ही बात. कुछ भी हो जाए, मुझे शादी के लिए सैट चाहिए तो चाहिए. राजीव, कौन सा मैं अपने लिए मांग रही हूं?’

कहतेकहते भाभी का गला रुंध गया था. लड़कियों के लिए कितना मुश्किल होता है. पीहर में ससुराल की और ससुराल में पीहर की इज्जत रखतेरखते पूरा जीवन बीत जाता है.

‘समझने की कोशिश करो, प्रभा. बहुत सारे मौके आएंगे. अभी मेरा हाथ तंग है. गौरी का एडमिशन कराया है. उस की ड्रैस, कौपीकिताब, फीस कितना कुछ करना है. तुम से क्या छिपा है.’ भैया ने लगभग गिड़गड़ाते हुए भाभी से कहा था. मां चुपचाप सुन रही थी.

मियांबीवी के बीच कौन बोले, रोज की ही बात थी. चिड़ाचिडि़या की तरह लड़ेंगे, फिर एक हो जाएंगे. काश, मां का यह भ्रम बना रह जाता. काश, मां ने भाभी को मना लिया होता. काश, भैया ने भाभी की बात मान ली होती. काश, काश, काश. उफ, दिमाग सोचतेसोचते भन्नाने लगा. घंटों तक बहस होती रही. पता नहीं उस दिन भाभी ने क्यों जिद पाल ली थी. शायद मायके के सामने अपने फैसले को सही दिखाना उन की जिद नहीं, मजबूरी थी. भैया से शादी के बाद भाभी के मायके वालों ने रिश्ता लगभग तोड़ लिया था. वह तो भाभी ही थी जो मायके का मोह नहीं छोड़ पाई.

याद है आज भी 8 साल पहले का वह दिन जब भैया ने भाभी से चुपचाप कोर्ट मैरिज कर ली थी. मैं दौड़ीदौड़ी चली आई थी. मेरे ही सामने भाभी के भाई और पिता ने भैया को कितना भलाबुरा कहा था. भैया चुपचाप सिर ?ाकाए उन की बातें सुनते रहे लेकिन भाभी चट्टान की तरह भैया के आगे खड़ी रही.

भाभी के मातापिता बेहद दकियानूसी थे जो कुंडली मिलान के बिना शादी करने को तैयार न थे. वे अपने साथ पंडित को ले कर भी आए थे जो अनर्गल बक रहा था. भाभी शायद उन अंधविश्वासों से हमेशा के लिए नहीं निकल पाईं और उन की जिद ने अंधविश्वासों की जगह ले ली. मां ने बताया था कि वही भाभी बच्चों की तरह जिद करती रही. भैया सम?ातेसम?ाते थक चुके थे लेकिन भाभी उस दिन कुछ भी सुनने को तैयार न थी. भैया ने गुस्से में कहा था, ‘मैं अब और नहीं कर सकता. जो तुम्हारी इच्छा पूरी करे, चली जाओ उस के पास. कब से एक ही बात की जिद कर के बैठी हो.’

भैया को क्या पता था कि यही एक वाक्य उन के जीवनभर का दर्द बन जाएगा.

‘ठीक कहते हो तुम, यही सुनने के लिए तो तुम से शादी की थी. चली जाऊंगी तुम्हारी जिंदगी से, भूल जाना मु?ो.’

यही तो कहा था भाभी ने आखिरी बार. क्या पता था भैया को कि भाभी का

कहा यह अंतिम वाक्य उन के जीवन का काला सच बन जाएगा. वह चली गई थी इतनी दूर जहां से वापस कोई लौट कर

नहीं आता.

‘आरती, जल्दी से आ, तेरी भाभी.’

‘भाभी, क्या?’

खट्ट फोन कट चुका था. आरती हैलोहैलो करती रह गई. घर के बाहर लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था. भैया भाभी के शव के पास बेतहाशा रो रहे थे.

‘पैसे के लालच में बड़े घर की लड़की फांस ली, बेचारी मायके वालों से पैसे नहीं ला पाई तो मार कर लटका दिया.’ और न जाने क्याक्या. भाभी मर कर लाश बन चुकी थी और भैया जीवित रहते लाश बन गए थे. भाभी की ऐंठी हुई गरदन पंखे के कुंडे से लटक रही थी, आंखें पलकों की मर्यादा को तोड़ बाहर निकल आई थीं. जीभ मुंह से बाहर लटक रही थी.

भाभी के घर वाले वैसे भी भैया को पसंद नहीं करते थे, अपनी इकलौती बेटी की मृत्यु ने उन्हें पागल सा कर दिया. उन्होंने भैया का जीना हराम कर दिया. थाने और कचहरी के चक्कर काटतेकाटते भैया अचानक से बूढ़े लगने लगे थे. मां भैया के बच्चों को पालतेपालते न जाने कब दादी से मां बन गई. बेटे की जिंदगी को यों बरबाद होता देख मां का दिल फटने लगता. एक दिन गुस्से में उन्होंने भाभी के सारे कपड़े और उन की तसवीरें जला दीं. मासूम गौरी और नन्हे चीकू के सामने भाभी की कोई बात नहीं की जाती. भैया घंटों आसमान में न जाने क्या देखते रहते.

अब जी तो सभी रहे थे पर एक जिंदा लाश की तरह. पर मां तो आखिर मां ही थी. भैया के उदास चेहरे को देख उन का प्रलाप शुरू हो जाता और मरी हुई भाभी हर बार बीच में आ ही जाती. इंसान स्वभाव से संकोची होता है. नफरत तो वह आसानी से दिखा लेता है पर प्रेम अभिव्यक्त करने में अकसर संकोच कर जाता है. कहते हैं अकाल मृत्यु से मरे व्यक्ति का साया भटकता रहता है, भाभी मर कर भी नहीं मरी थी. लोगों के तानों, रिश्तेदारों की नफरत के रूप में वह आज तक जिंदा थी. मरने वाला तो मर कर चला गया पर बाकी लोग जिंदा लाश बन कर रह गए थे.

हरदम खिलखिलाने वाले भैया की हंसी कहीं खो सी गई थी. पुरुष भी कितने लाचार होते हैं, उन्हें भी तो ऐसा कंधा चाहिए होता है जिस पर सिर रख वे रो सकें, कह सकें कि वे भी पीड़ा से गुजरते हैं. किसी के तो सामने वे पुरुष होने के दंभ को छोड़ कर जारजार रो सकें. लेकिन अफसोस, भैया ने अपनेआप को एक कमरे तक समेट लिया था.

आरती का मन नहीं माना और वो उस रोशनी का पीछा करते हुए कमरे तक पहुंच गई. मासूम चीकू गहरी नींद में सो रहा था. आरती ने चीकू के उघड़े शरीर को रजाई से ढक दिया. पता नहीं यह आरती का भ्रम था या फिर कुछ और, चीकू के चेहरे पर मुसकराहट आ गई. शायद वह कोई सपना देख रहा था. न जाने क्यों उस की मुसकराहट को देख आरती को ऐसा लगा, उस का यह सपना कभी न टूटे. सपने में ही सही, उस मासूम के चेहरे पर मुसकान तो खिली वरना उस के चेहरे पर तो सिर्फ एक डर, संकोच और बिन मां का बच्चा होने का भाव ही देखा था. गौरी आड़ीतिरछी रेखाओं को खींचने में मग्न थी. आरती के पैरों की आहट से शायद उस की तंद्रा टूट गई.

‘‘बूआ, आप? क्या हुआ?’’

‘‘कुछ भी तो नहीं. तुम अभी तक सोई नहीं. इतनी देर तक जागना अच्छी बात नहीं. कल स्कूल भी जाना है न.’’

‘‘जी.’’

गौरी बचपन में बहुत ही चंचल थी. मां अकसर कहती थी, ‘आरती, तेरी ही छवि है, दिनभर इधरउधर डोलती रहती है.’ पर भाभी के जाने के बाद उस का वह बचपना न जाने कहां खो गया था. आखिर कितनी बड़ी ही थी वह, अपनी मां, एक धुंधली सी याद भर ही थी उस के जेहन में. बिस्तर पर कई कागज बिखरे हुए थे. उन कागजों पर पैंसिल से खींची आड़ीतिरछी रेखाओं को देख आरती का मन एक अजीब सी कशमकश में डूब गया. सभी तसवीरों में औरतों के ही चित्र थे. किसी में बाल कटे, किसी में लंबी चोटी तो किसी में जूड़ा.

‘‘अरे वाह, तुम्हारी ड्राइंग तो बहुत अच्छी है.’’ आरती की बात सुन गौरी के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ आई. वह दौड़ कर अलमारी से और भी चित्र ले आई. हर चित्र लगभग एकजैसे थे. किसी में औरत ने साड़ी तो किसी में सलवारसूट तो किसी में स्कर्ट पहन रखी थी. आरती सम?ाने की कोशिश कर रही थी पर न जाने क्यों उन सवालों के जवाब आरती के पास नहीं थे.

‘‘गौरी, ये किस के चित्र हैं. तुम्हारे हर चित्र में सिर्फ औरत है, ऐसा क्यों?’’

गौरी चुपचाप बैठी रही. उस की गहरी सांसों से उस का शरीर हिल रहा था. आरती चुपचाप उस के जवाब का इंतजार करती रही. इंतजार, कुछ इंतजार काफी भारी होते हैं. कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था. कहीं दूर ?ांगुर की आवाज उस सन्नाटे को तोड़ रही थी.

‘‘बूआ, मैं ने अपनी मां को नहीं देखा. एक धुंधली सी यादभर है. पापा और दादी के पास भी उन की कोई तसवीर नहीं है. शायद मेरी मां कुछकुछ ऐसी ही लगती होगी.’’

उस की बात को सुन आरती जमीन में धंस गई. गौरी बहुत देर तक आरती के चेहरे पर कुछ टटोलती रही. शायद वह उस के चेहरे पर अपने सवालों के जवाब ढूंढ़ रही थी. लेकिन अफसोस उसे वहां कुछ भी न मिला.

‘‘एक बात कहूं, बूआ?’’

‘‘हां, बोल न.’’

‘‘मेरी मां कैसी लगती थी?’’ आरती गौरी के मासूम चेहरे को देखती रह गई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो गौरी की बात का क्या जवाब दे.

गौरी ने एक गहरी सांस ली, ‘‘बूआ, इस घर में मां के बारे में कोई बात नहीं करता और न ही करना चाहता है. जब भी सुना तो बुरा ही सुना. खैर, एक बात बताइए, मेरी मां ने अपने जीवन के जितने भी साल इस घर में बिताए, आप लोगों के साथ जिए, उन में से एक भी अच्छी, एक भी मीठी याद आप के दिलों में है? मैं नहीं जानती उस दिन क्या हुआ, मां ने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया और न ही जानना चाहती हूं कि कौन सही था कौन गलत लेकिन एक बार हमारे बारे में तो सोचिए, कोई इंसान कितना भी बुरा क्यों न हो मगर कुछ तो अच्छा होगा ही.’’ आरती चुप थी, गौरी की बात का उस के पास कोई जवाब न था.

‘‘बूआ, इंसान एक कुत्ता भी पालता है तो उस के मरने के बाद भी उस की पसंदनापसंद को जीवनभर याद करता है. ऐसा तो नहीं कि उस कुत्ते ने अपने मालिक पर कभी भूंका न हो. फिर मेरी मां का अपराध इतना बड़ा कैसे हो गया कि कोई उन्हें भूले से भी याद नहीं करना चाहता?’’ आरती के पास गौरी के किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं था. वो चुपचाप कमरे से बाहर निकल आई. गौरी के भीतर एक नदी बह रही थी, विचारों की नदी, भ्रम की नदी, कुंठाओं की नदी. उसे अपने उस सागर की तलाश थी जहां समाहित हो कर उसे अपने सारे सवालों के जवाब मिल सकें. आसमान में सूरज निकलने को बेचैन था. आरती सोच रही थी कि कुछ ही पल में सूरज सारे संसार को रोशनी से भर देगा पर क्या वह चीकू और गौरी के जीवन के अंधकार को भी दूर कर सकेगा?

काश, आरती ने अपनी नौकरी न छोड़ी होती और खुद को पता रहता कि पैसा कमाना और फिर संभाल कर रखना कितना कठिन है. भाई आज दोहरी दुविधा में हैं. कोर्टकचहरी का चक्कर है, रिश्तेदारों ने कन्नी काट ली है. बच्चों को अकसर स्कूल में चिढ़ाया जाता है कि उन की मां को तो पिता ने दहेज के लिए मार डाला था. भैयाभाभी का वह प्यार जिस की वजह से भैया ने हजार मुश्किलें झेली थीं आज भाभी के जाने के बाद कहीं किसी मोबाइल के प्रेम संदेशों में खो गया. पुराना जमाना होता तो आरती भांजेभांजी के प्रेमपत्र तो दिखा सकती थी कि दोनों में कितना प्रेम था. बच्चे कभी न पिता को माफ कर सकेंगे न हम सब को. हम जीवनभर बच्चों की निगाहों में भी गुनाहगार बने रहेंगे और कथित रिश्तेदारों की भी. Suspense Story

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