Satirical Story In Hindi : जब से नई सरकार बनी है, तब से पूरे देश को परेशान करने वाली मुन्नी खुद परेशान हो चली है बेचारी. जिस मुन्नी को कभी पूरा शहर आंखें फाड़फाड़ कर देखा करता था, आज वही मुन्नी अपनी बैंक की पासबुक में हर बार ऐंट्री करवाने के बाद आंखें फाड़फाड़ कर देखती रहती है कि सरकार द्वारा ऐलान किए गए पैसे आए कि नहीं. पर बेचारी को हर बार निराशा का ही सामना करना पड़ता है.
कल यही मुन्नी मिली. चंडीगढ़ के 17 सी चौक पर भुट्टे भूनती हुई. बिखरे हुए बाल, पिचके हुए गाल. हाय रे, मुन्नी की क्या दशा कर दी सरकार ने.
परदे पर थिरकने वाली मुन्नी भुट्टे बेचती हुई. हाय रे, बुरे दिन न… अच्छे दिनों की पीठ पर चढ़ कर तुम कहां से आ गए? जाने कहां गए वो दिन, जो सरकार ने बताए थे. उन दिनों के बहाने मैं ने भी इस दिल को न जाने क्याक्या सब्जबाग दिखाए थे.
उस वक्त कभी पूरे देश पर राज करने वाली मुन्नी की बदहाली देख कर बेहद दुख हुआ. काश, मुन्नी के ये बुरे दिन मेरे हो जाते. अपना क्या, मैं तो आकाश से गिरा खजूर पर अटका बंदा हूं.
जिस देश में लोगों को अपनी उंगलियों के नाखूनों पर नचाने वाली मुन्नी को भुट्टे भून कर पेट भरना पड़े, लानत है उस देश के भरे पेटों पर.
माना, देश बदल रहा है. देश में बदलाव की बयार के साथ मुन्नी भी ऐसे बदल जाएगी, ऐसा तो सपने में भी न सोचा था.
मैं ने अधभुना भुट्टा लेने के बहाने उस से बात करने के इरादे से पूछा, ‘‘मुन्नी, और क्या हाल हैं?’’
‘‘क्या बताएं बाबू, जब से नई सरकार आई है, मत पूछो क्या हाल है,’’ उस ने तसले में गरमाते कोयलों पर रखा भुट्टा बदलते हुए कहा, तो जले दिल से एक बार फिर आह निकली.
‘‘क्यों, क्या हो गया हाल को? गौर से देखो तो जरा, हर किसी के पैर में सरकार ने कितनी उम्दा क्वालिटी की नाल ठोंक दी है. अब तो हर गधा आधारकार्ड में गधा होने के बाद भी घोड़े की तरह दौड़ने को मजबूर है,’’ मैं ने उस से बुद्धिजीवी होते हुए कहा, तो वह तनिक तनी. उसे लगा कि देश में और सब से डरने की जरूरत होती है, पर बुद्धिजीवी से डरने की कोई जरूरत नहीं होती. बातें करने के लिए बुद्धिजीवी सब से महफूज प्राणी है, क्योंकि उस के पास व्यावहारिक कुछ नहीं होता.
‘‘क्या है न बाबू, सोचा था कि सरकार बदलेगी, तो जनता की तकदीर बदले या न बदले, पर मुन्नी की तकदीर जरूर बदलेगी. नई सरकार किसी और की तकदीर में चार चांद लगाए या न लगाए, पर मुन्नी की तकदीर में चार चांद जरूर लगाएगी,’’ अचानक उसे लगा कि वह तो बुद्धिजीवी के साथ बेकार की बहस में पड़ गई है, ऐसे में मोटा वाला 20 रुपए का भुट्टा जल गया तो…?
मुन्नी ने मोटा वाला भुट्टा दूसरी ओर से भूनने के लिए पलटा और फिर हाथ बचाते हुए बोली, ‘‘क्या बताएं बाबू, बैंक की पासबुक में हर रोज 15 लाख की ऐंट्री देखतेदेखते आंखों का सूरमा तक बह गया है. 15 लाख तो दूर, अपने ही 5 सौ रुपए पासबुक के रखरखाव के बैंक वालों ने काट लिए. उस के बाद नोटबंदी ने रहीसही कमर भी तोड़ दी बाबू.
‘‘मत पूछो बाबू, मुंह पर घूंघट डाले कितने दिन अपने ही पैसों के लिए एटीएम के सामने सिर झुकाए खड़े रहना पड़ा कि कमर की सारी लचक जाती रही. पर फिर भी कमर की लोकलाज के लिए कमर पकड़े ही खड़ी रही कि शायद काला धन निकल आए और हमारे खाते में समा जाए, पर कुछ नहीं हुआ.’’
अभी नोटबंदी से मुन्नी उबरी भी नहीं थी कि सरकार ने जीएसटी लगा दिया. अब भुट्टे पर जीएसटी कौन देगा, तो कौन लेगा? ग्राहक भुट्टा खाएगा या जीएसटी चुकाएगा?
यह तो शुक्र मनाओ कि मुन्नी बाहर से जवान है. सो खराब पेट वाले अभी भी जीएसटी की परवाह किए बिना मुन्नी के आगे चौबीसों घंटे दर्द से पीडि़त कमर मटकाते हुए कच्चा भुट्टा खाने चले आते हैं. अगर मुन्नी बुढ़ा गई होती, तो…
‘‘तो सावधान मुन्नी, अब आ रहा है मिशन दो हजार उन्नी. उस के स्वागत के लिए तैयार हो जा.’’
‘‘नहीं बाबू, नहीं… अब मुन्नी बसंती की तरह और नहीं नाच सकती. जनता नाचे तो नाचे, मुन्नी अब पूरी तरह से टूट चुकी है. मुन्नी से नहीं संभाली जा रही अब अपनी ही चुन्नी. ऐसे में जयरामजी की मिशन दो हजार उन्नी.
‘‘यह क्या बाबू जला दिया न मेरा 20 रुपए का भुट्टा. सरकार झूठी, सरकार का हर वादा झूठा.’’ Satirical Story In Hindi
Social Story in Hindi : रात का दूसरा पहर. दरवाजे पर आहट सुनाई पड़ी. कोई दरवाजा खोलने की कोशिश कर रहा था. आहट सुन कर नीतू की नींद उचट गई. वह सोचने लगी कि कहीं कोई जानवर तो नहीं, जो रात को अपने शिकार की तलाश में भटकता हुआ यहां तक आ पहुंचा हो?
तभी उसे दरवाजे के बाहर आदमी की छाया सी मालूम हुई. उस के हाथ दरवाजे पर चढ़ी सांकल को खोलने की कोशिश कर रहे थे. यह देख नीतू डर कर सहम गई. उस के पास लेटी उस की छोटी बहन लच्छो अभी भी गहरी नींद में सो रही थी. उस ने उसे जगाया नहीं और खुद ही हिम्मत बटोर कर दरवाजे तक जा पहुंची.
सांकल खोलने के साथ ही वह चीख पड़ी, ‘‘मलखान तुम… इतनी रात को तुम मेरे दरवाजे पर क्या कर रहे हो?’’ नीतू को समझते देर नहीं लगी कि इतनी रात को मलखान के आने की क्या वजह हो सकती है. वह कुछ और कहती, इस से पहले मलखान ने अपने हाथों से उस का मुंह दबोच लिया.
‘‘आवाज मत निकालना, वरना यहीं ढेर कर दूंगा,’’ कह कर मलखान पूरी ताकत लगा कर नीतू को बाहर तक घसीट लाया. आंगन के बाहर अनाज की एक छोटी सी कोठरी थी, जिस में भूसा भरा हुआ था. मलखान ने जबरदस्ती नीतू को भूसे के ढेर में पटक दिया. उस की चौड़ी छाती के बीच दुबलीपतली नीतू दब कर रह गई. मलखान उस पर सवार था.
‘‘पहले ही मान जाती, तो इतनी जबरदस्ती नहीं करनी पड़ती,’’ मलखान ने अपना कच्छा और लुंगी पहनते हुए कहा. लच्छो, जो नीतू से 2 साल छोटी थी, उस ने करवट ली, तो नीतू को अपनी जगह न पा कर उठ बैठी. दरवाजा भी खुला पड़ा था. उसे कुछ अनजाना डर सा लगा. मलखान पहले लच्छो के बदन से खेलने के चक्कर में था. 2 दिन पहले लच्छो ने उस के मुंह पर थूक दिया था, जब उस ने जामुन के पेड़ के नीचे उसे दबोचने की कोशिश की थी.
वह नीतू से ज्यादा ताकतवर और निडर थी. पर उस ने घुमा कर एक ऐसी लात मलखान की टांगों के बीच मारी कि वह ‘मर गया’ कह कर चीख पड़ा था. अचानक हुए इस हमले से मलखान बौखला गया था. वह सोच भी नहीं पाया था कि लच्छो इस तरह का हमला अचानक कर देगी. उस की मर्दानगी तब धरी की धरी रह गई थी. एक तरह से लच्छो ने उसे चुनौती दे डाली थी.
लच्छो उठी और दालान में पड़े एक डंडे को उठा लिया. वह धीरेधीरे आगे बढ़ने लगी. उस का शक सही निकला कि दीदी किसी मुसीबत में फंस गई हैं. मलखान उस समय अंधेरे में भागने की कोशिश कर रहा था कि अचानक लच्छो ने घुमा कर डंडा उस के सिर पर जड़ दिया.
डंडा पड़ते ही वह भागने लगा और भागतेभागते बोला, ‘‘सुबह देख लूंगा.’’ ‘‘क्या हुआ दीदी, तुम ने मुझे उठाया क्यों नहीं? कम से कम तुम मुझे आवाज ही लगा देतीं,’’ लच्छो रोते हुए बोली.
‘‘2 रोज पहले ही मैं ने इस की हजामत बना डाली थी, जब इस ने मुझ से छेड़छाड़ की थी.’’ ‘‘क्या…?’’ यह सुन कर नीतू तो चौंक गई.
‘‘हां दीदी, कई दिनों से वह मेरे पीछे पड़ा हुआ था. उस दिन भी वह मुझ से छेड़छाड़ करने लगा. उस दिन तो मैं ने उसे छोड़ दिया था, वरना उसी दिन उसे सबक सिखा देती,’’ लच्छो ने नीतू को सहारा दे कर उठाया और कमरे में ले गई.
दोनों बहनें एकसाथ रह कर प्राइमरी स्कूल के बच्चों को पढ़ाया करती थीं. कुछ साल पहले उन के पिता की मौत दिल का दौरा पड़ने से हो गई थी. वह बैंक में मुलाजिम थे. पिता की मौत के बाद उन की मां श्यामरथी देवी को वह नौकरी मिल गई थी. चूंकि बैंक गांव से काफी दूर शहर में था, इसलिए दोनों बेटियों को गांव में अकेले ही रहना पड़ रहा था. मां कभीकभार छुट्टी के दिनों में गांव आ जाया करती थीं. मलखान की नाक कट गई थी. एक को तो वह अपनी हवस का शिकार बना ही चुका था, पर दूसरी से बदला लेने के लिए तड़प रहा था.
एक दिन शाम के 7 बज रहे थे. दोनों बहनें खाना बनाने की तैयारी में थीं. मलखान ने अपने कुछ दोस्तों को जमा किया और लच्छो के घर पर धावा बोल दिया.
‘‘बाहर निकल, अब देख मेरा रुतबा. गांव में तेरी कैसी बेइज्जती करता हूं,’’ मलखान अपने साथियों के साथ लच्छो के घर में घुसता हुआ बोला. घर के अंदर मौजूद दोनों बहनें कुछ समझ पातीं, इस से पहले ही मलखान के साथियों ने लच्छो को पकड़ लिया और घसीटते हुए बाहर तक ले आए.
गांव की इज्जत गांव वालों के सामने नंगी होने लगी. मलखान गांव वालों के बीच चिल्लाचिल्ला कर कह रहा था, ‘‘ये दोनों बहनें जिस्मफरोशी करती हैं. इन की वजह से ही गांव की इज्जत मिट्टी में मिल गई है. हम लच्छो का मुंह काला कर के, इस का सिर मुंड़ा कर इसे गांव में घुमाएंगे.’’ दोनों बहनों का बचपन गांव वालों के बीच बीता था. गांव वालों के बीच पलबढ़ कर वे बड़ी हुई थीं. उन्हीं लोगों ने उन का तमाशा बना दिया था.
योजना के मुताबिक, गांव का हज्जाम भी समय पर हाजिर हो गया. नीतू को अपनी छोटी बहन के बचाव का तरीका समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे इन जालिमों के चंगुल से उसे बचाया जाए? वह सोच रही थी कि किसी तरह लच्छो की इज्जत बचानी है, यह सोच कर नीतू घर से निकल पड़ी. नीतू भीड़ को चीरते हुए अपनी बहन के पास जा कर खड़ी हो गई.
भीड़ में से आवाज उठी, ‘‘इस का भी सिर मुंड़वा दो.’’ नीतू पहले तो गांव वालों के बीच खूब रोईगिड़गिड़ाई. उस ने अपनेआप को बेकुसूर साबित करने के दावे पेश किए, पर किसी ने उस की एक न सुनी. बड़ेबूढ़े भी चुप्पी साध गए.
नीतू अपने घर से एक तेज खंजर उठा लाई थी. बात बिगड़ती देख उस ने वह खंजर तेजी से अपने पेट में घुसेड़ लिया. देखते ही देखते खून का फव्वारा फूट पड़ा. वह चीख कर कहे जा रही थी, ‘‘हम दोनों बहनें बेकुसूर हैं. मलखान ने ही एक दिन मेरी इज्जत लूट ली थी.’’
इसी बीच पुलिस की जीप वहां से गुजरी और वहां हो रहे तमाशे को देख कर रुक गई. नीतू ने मरने से पहले सारी बातें इंस्पैक्टर को बता दीं. कुसूरवार लोग पकड़े गए. पर नामर्द गांव वालों ने गांव की इज्जत को अपने ही सामने लुटते देखा. यह कलियुग का चीरहरण था. Social Story in Hindi
Satirical Story In Hindi : आजकल पूरे देश में प्रदूषण की समस्या का होहल्ला मचा है और देश की राजधानी को तो प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए नएनए प्रयोग आजमाए जा रहे हैं. ‘औडइवन’ अर्थात ‘समविषम’ के नुस्खों में हम सब की जान फंसी रही. ऐसे लाजवाब एक्सपेरीमैंट से हमारे क्रियाशील मस्तिष्क में भी एक क्रांतिकारी विचार उपजा है जिसे बिना किसी शुल्क के, मुफ्त में आप सभी से शेयर कर रहे हैं. असल में इस लेख के माध्यम से हम प्रदूषण के समस्त ज्ञातअज्ञात रूपों से इतर, एक ‘सुपर स्पैशल प्रदूषण’ पर आप सभी का ध्यान आकर्षित करना चाह रहे हैं जिसे बेचारे हम सरीखे ‘सद्गृहस्थी’ 24×7 की तर्ज पर ‘नौनस्टौप’ भुगतते आए हैं. दुख की बात यह है कि इस प्रदूषण की समस्या पर लंबीचौड़ी फेंकने वाले विद्वानों की भी बोलती बंद है. इस में कोई आश्चर्य की बात भी नहीं.
पत्नीजी से डरना, उन की डांटफटकार सुनना हर पति महाशय का परम कर्तव्य है. इसे हम पावनधर्म इसलिए कह रहे हैं ताकि इस मजबूरी को साहित्यिक रूप में सम्मानपूर्वक प्रकट कर सकें. वरना विवशता तो यह है कि उन के आगे सब की बोलती बंद है. मंत्री हो या संत्री, अफसर हो या बेरोजगार, इस पैमाने के आगे सब एकसमान हैं.
अब हम ने सर्वजन हिताय में इस विषय पर बोलने की हिम्मत की है. श्रीमतीजी की प्रतिदिन की डांट से त्रस्त आ कर जनहित में हम ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का बीड़ा उठाया है. हमें पता है, हमें नारी संगठनों से प्रतिरोध, उलाहने सहने पड़ेंगे लेकिन पत्नी पीडि़त संघों से हमें अटूट समर्थन, सम्मान और पुरस्कारों की भी आशा है. अब इस अघोषित प्रदूषण के खिलाफ ‘विसिल ब्लोअर’ की भूमिका निभाने की हम ने कमर कस ली है. सभी पतियों की यही रामकहानी है, सो आप प्रबुद्धगण हमारी दुखती रग को पकड़ चुके होंगे.
आप खुद सोचिए, रेल, बस, कारमोटर, स्कूटर, बाइक के कर्कश हौर्न, लाउडस्पीकर पर बजते कानफोड़ू संगीत अथवा रैली, धरनाप्रदर्शन करते आदरणीय नेताओं के भाषण ही ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं. जब घरों में पत्नीजी का संवाद डांटफटकार की प्रक्रिया, सप्तम स्वर में संपन्न होने लगे तो क्या इसे ‘स्पैशल होमली प्रदूषण’ की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए? डांट के रूप अनेक हो सकते हैं, बच्चों पर और खासकर पति महाशय पर डांट का रूप अकसर विस्फोटक ही होता है. भारतीय गृहस्थी दुनिया का 8वां अजूबा है. यह रेल की पटरियों की तरह साथसाथ चलती जरूर है लेकिन मिलती कहीं नहीं. अटकती, लटकती, मटकती, इतराती, बलखाती हुई निर्बाध रूप से भारतीय गृहस्थी लगातार गतिशील रहती है. यही कारण है कि हमारे यहां पतिपत्नी साथसाथ रह कर अपने विवाह की स्वर्ण, रजत अथवा प्लैटिनम जुबली मनाते हैं.
पतिपत्नी और डांट का चोलीदामन का साथ है. जहांजहां पत्नीजी की उपस्थिति पाई जाती है वहांवहां डांटफटकार का पाया जाना निश्चित है. अब इस दार्शनिक वाक्य से आप उस प्रदूषण की सहज कल्पना कर सकते हैं जिस के लिए पत्नीजी की डांटफटकार जिम्मेदार है. सुबह हमारी नींद पत्नीजी की उस लास्ट घोषणा से खुलती है जो अल्टीमेटम का अंतिम रूप जैसी होती है. यह क्रिया इतनी बुलंद आवाज में संपन्न होती है कि बिना आलस से बिस्तर छूट जाता है. यह कार्य निबटते ही उलाहनों, कोसने और रुटीन रोनेधोने का कार्यक्रम चलने लगता है जो शीघ्र ही डांट में बदल कर ध्वनि प्रदूषण फैलाने लगता है. एक बानगी देखिए – ‘‘अजी सुनते हो, 8 बज गए, कब तक सोते रहोगे? फिर बाथरूम में जा कर बैठ जाओगे…बच्चों को भी स्कूल जाना होता है…ऐसी आरामतलबी है तो दोचार बाथरूम बनवाने की हैसियत कायम करते…’’
अब आप बताइए ऐसे ध्वनि प्रदूषण को हम किस श्रेणी में रखें? क्या हमारी यह डिमांड गलत अथवा अतार्किक है? पत्नीजी की चिल्लाहट, झल्लाहट समय और अवसर की मुहताज नहीं होती. जब मन किया, हमें सुधारने के लिए ऐसी डांटफटकार की डोज दिन में अनेक बार आवश्यक रूप से पिलाई जाती है. कई बार तो इस ‘होमली प्रदूषण’ से आसपास की बिल्ंिडगों के शीशे भी तड़क जाते हैं. इस उदाहरण से आप इस प्रदूषण की तीव्रता का सहज अनुमान लगा सकते हैं. पत्नीजी की डांट और शोरगुल से अकसर हमें गुस्सा और आक्रोश भी महसूस होता है लेकिन दिल को तब सुकून मिलता है जब पड़ोस से भी ऐसा ही ध्वनि प्रदूषण सुनने को मिलता है. मजे की एक बात और देखिए, जैसे ही हम शाम को घर आते हैं, श्रीमतीजी सीबीआई इंस्पैक्टर की भूमिका में हमारे समक्ष परिवार, कालोनी की रिपोर्ट प्रस्तुत करने लगती हैं. बच्चों की गतिविधियां, स्टडी, स्कूल, ट्यूशन, टीवी, कार्टून और इंटरनैट यूज से जुड़ी सब अपडेट सविस्तार प्रस्तुत करती हैं. अब यदि ऐसे महत्त्वपूर्ण लमहे पर हम ने जरा सी लापरवाही दिखा दी तो हमारा शिकार होना तय है – ‘‘मैं भी किस से बतिया रही हूं, इन्हें चिंता किस बात की है. मेरी बातें तो इन्हें बकवास लगती हैं. इन से बोलने का मतलब दीवारों से सिर फोड़ना है. अजी बहरे हो क्या, आप से ही पूछ रही हूं और आप अखबार में डूबे हो. सच्ची बात कह दो तो आप को सांप सूंघ जाता है. दीवारों से बात करूं या आप से, आप का कुछ नहीं हो सकता.’’
यदि घर पहुंचने में देर हो गई तो पुलिस अफसर अथवा सुप्रीम कोर्ट के सफल एडवोकेट की तरह हमें जिरह का सामना भी करना पड़ता है और यदि हम ने बुद्धिमानी से काम नहीं लिया तो डांट का ध्वनि प्रदूषण पूरी कालोनी को प्रदूषित करने लगता है. इस समय अकसर पूरा संवाद एकतरफा ही चलता है. हम होंठ चिपकाए भीगी बिल्ली की तरह इस संपूर्ण प्रक्रिया को जल्द से जल्द निबटा लेना चाहते हैं ताकि फटाफट डांटफटकार का क्रम शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके. इस स्थिति के लिए अकसर श्रीमतीजी खुद अपनेआप को ही कोसती हैं. वे दिनरात की मेहनत में सुधार कार्यक्रम चला कर भी हमें सुधार नहीं पाई हैं.
हमारी लाइफस्टाइल उन्हें जरा भी पसंद नहीं. हम ठहरे लापरवाह, गैर जिम्मेदार. उन की नजर में उन के प्रति हमारी तटस्थता किंतु हमारा रहस्यमय रोमांटिक नेचर उन्हें हमेशा शक के दायरे में फंसाए रखता है. इसलिए उन की नजर में चिल्लाना एकदम जायज है. वैसे, एक बात कहें, शर्त यह है कि आप हमारे राज को किसी से कहेंगे नहीं. रोजरोज की पत्नीजी की डांट से बचने के लिए हम ने अपने कानों में रूई ठूंसने का देशी जुगाड़ कर रखा है वरना अब तक तो हमारे कान के परदे फट गए होते. अब समय आ गया है कि इस घरेलू प्रदूषण से मुक्ति के लिए समस्या समाधान पर पूरे देश में विचारमंथन हो. हम इस लेख के माध्यम से सरकार को एक मुफ्त की सलाह भी देना चाहते हैं. यदि इस पर अमल हो जाए तो बहुत संभव है इस प्रदूषण की समस्या न्यून रह जाएगी. अगर पतिपत्नी संवाद को भी ‘औडइवन’ सिस्टम से सीमितप्रतिबंधित कर दिया जाए तो पति जमात का उद्धार हो सकता है. महीने की औड तारीख को पत्नीजी बोलेंगी और इवन डेट को पति महाशय. सच कहूं तो इस से ‘सम्मान नागरिक संहिता’ का भी आदर्श रूप से पालन हो सकेगा वरना पतिपत्नी संवाद अकसर एकतरफा ही चलता है जो गुस्से की सीमा पार कर अकसर बम विस्फोट की तरह प्रदूषण फैलाने लगता है. यह नियम यदि गृहस्थों पर लाद दिया जाए तो मूक पतियों को भी बोलने का कानूनी अधिकार मिल सकता है. कानों में रूई ठूंसने की तकनीक भी अब पुरानी पड़ चुकी है. समय की मांग को देखते हुए हमारे इस सुझाव पर तुरंत अमल होने की जरूरत है. इस से ‘पौल्यूशन फ्री होम’ का सपना भी साकार होगा.
एक तथ्य हम और स्पष्ट कर दें, पति की नजर से हम ने अपनी तहरीर रख दी है लेकिन सच में मेरा मन पत्नीजी का बहुत आभारी है. वे गुस्सा चाहे कितना भी करें लेकिन यह सच है कि हमारा जीवन उन्हीं पर निर्भर है. यदि एक दिन बीमार पड़ जाएं तो हमारे होश ठिकाने आ सकते हैं, फिर उन का चिल्लाना भी जायज है. आखिर वे भड़ास निकालें तो किस पर. दिनभर घरपरिवार के लिए खपती हैं तो उन की हम से अपेक्षा रखना स्वाभाविक है. सात फेरे लिए हैं, सात जन्मों का साथ है तो इतना अधिकार तो बनता है. हमारी इल्तजा बस इतनी सी है, सरकार इस प्रदूषण पर गौर फरमाए और पतियों को भी बोलने का अवसर प्रदान करे. Satirical Story In Hindi
Satirical Story In Hindi : कौर्पोरेट गुरु डबल श्री ने फरमाया है कि हिंसक नक्सली इलाकों के सरकारी स्कूल बंद कर वहां निजी स्कूल खोले जाएं क्योंकि इन इलाकों के सरकारी स्कूलों से आतंकी पैदा होते हैं. हवाई सफर करने वाले, एयरकंडीशंड कमरे में बैठ कर दुखी जनता को जीने की राह दिखाने वाले फाइवस्टार संत ने यह कह कर गरीबों की देशभक्ति पर वार किया है. यदि उन की बात पर विश्वास किया जाए तो इन इलाकों के सरकारी स्कूल हर साल आतंकी ही उगल रहे हैं और यदि डबल श्री की राय नहीं मानी गई तो देश का आधा हिस्सा आतंकियों के हाथों में जाने वाला है.
डबल श्री का स्तर रामदेव और आसाराम जैसे बाबाओं से भी ऊंचा है. जहां रामदेव और आसाराम के भक्त कमजोर वर्ग और कमजोर दिमाग के हैं वहीं डबल श्री के भक्त मोटी जेब वाले हैं. दिमाग के बारे में कहा नहीं जा सकता क्योंकि अकसर ये आईआईटी या आईआईएमशुदा होते हैं, जिन्हें जमीन से ऊपर माना जाता है. इन की सनक को देश के शिक्षा जगत का बंटाधार करने को कमर कस कर तैयारी में लगी सरकारें इज्जत देती हैं. आखिरकार इन के अध्यात्म गुरु नेही बिचौलिया बन कर कई बार उन की नाक कटने से बचाई है.
डबल श्री का सरकारी स्कूल बंद करवाने की सनक के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि वे जताना चाहते हों कि सरकारी स्कूलों से सरकार को मिलता क्या है? उलट, अपनी जेब से मास्टरों को वेतन देना पड़ता है. उधर, निजी स्कूल कमाई का सब से फायदेमंद धंधा है. पाठ्यक्रम के बाहर ढेर सारी गैरजरूरी किताबें रखवाने और हर सप्ताह तीसरी कक्षा के बच्चों से प्रोजैक्ट रिपोर्ट तैयार करवाने से किताब माफिया और स्टेशनरी माफिया की रोटीरोजी चल रही है. इस बहाने शिक्षाविदों और अफसरों की भी कमाई हो जाती है.
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सरकारी स्कूलों के अध्यापक महज मास्टर होते हैं, गुरु नहीं. सालभर वे या तो जानवर गिनते हैं या फिर गटरें और शौचालय. 10 साल में एक बार वे इंसान भी गिन लेते हैं. मतदाता सूची बनाने के काम में भी ये ही जोत दिए जाते हैं. बारबार होने वाले चुनावों में वे ड्यूटी भी दे आते हैं. बचाखुचा समय शिक्षा में जरा भी दिलचस्पी न लेने वालों को पढ़ाने में लगाते हैं. और पढ़ाना भी ऐसा कि सभी ढक्कन छात्रोंछात्राओं का उत्तीर्ण होना जरूरी है वरना इंक्रीमैंट को लाल झंडी.
अब तो अंगरेज आकाओं की देखादेखी सरकारें भी अध्यापकों को ठेके पर रखने लगी हैं. यानी, सूखा वेतन. भविष्य निधि या ग्रैच्युटी भूल जाओ. पक्की नौकरी की कोई गारंटी नहीं. बेइज्जती न हो, इसलिए इन्हें संविदा शिक्षक कहा जाता है. यानी, सम्मानित हम्माल. ऐसे में बेचारे मास्टर से ही देश का भविष्य संवारने की उम्मीद की जाती है, जो सरासर अनुचित है.
सरकारी स्कूलों के भवनों की हालत तो ऐसी है कि पुरातत्त्व विभाग वाले इन्हें आसानी से धरोहर की श्रेणी में रख लें. पुताई की बात तो जाने ही दीजिए, कई स्कूलों में दरवाजेखिड़कियां तक नहीं हैं. रात को शराबखोरी होती है. नशीली दवाओं और शरीर का व्यापार होता है. फर्श उखड़ा होता है. लड़कियों के लिए पेशाबघर नहीं होते. नेताओं के जन्मदिन और विवाह की पार्टियां होती हैं. बरातें ठहराई जाती हैं.
ऐसा नहीं कि हमारे शिक्षा शिकारी इस सब से अनजान हैं. अखबारों के पृष्ठ कई बार रंगे जा चुके हैं. लेकिन अध्यापकों को गधाहम्माली में जोते रखने वाले ये फाइवस्टार विद्वान इसे कोई मुद्दा नहीं मानते. डबल श्री ने शिक्षा के अधिकार को शायद शिक्षा की दुक?ान का अधिकार समझ लिया हो. उन जैसे लोगों को स्कूलों में पढ़ाने के लिए अच्छा वेतन मिलता है. क्यों न मिले? फीस जो जबरदस्त होती है.
घोषणा करते समय अध्यात्म गुरु भूल गए कि आतंकी इलाकों के मातापिता के पास क्या इतनी फीस देने की हैसियत है? क्या प्राणायाम से उन की गरीबी दूर हो जाएगी? क्या सुदर्शन क्रिया उन्हें अच्छा जीवन देगी? क्या ओउम उच्चारने से उन की सेहत ठीक हो जाएगी? डबल श्री का कहना है कि सदैव मुसकराते रहना चाहिए. फिर ये गिनती कर बताते हैं कि बचपन में हम इतनी बार मुसकराते हैं, जवानी में उस से कम और बुढ़ापे में उस से भी कम. लगता है उन्होंने मुसकराहट गिनने में पीएचडी की है.
यदि कोई इन का कहना मान कर किसी की मैयत में मुसकराता रहे तो उस के साथ क्या होगा, यह डबल श्री के अलावा सभी को मालूम है. अध्यात्म की दुकानें लगाने वालों से पूछा जाना चाहिए कि ये फाइवस्टार स्कूल खोलने के अलावा कितना सामाजिक काम करते हैं. उस में भी बच्चे भिश्तियों की तरह पीने का पानी अपने घर से ले जाते हैं. सिर्फ गरमी के दिनों में रेलवेस्टेशनों पर प्याऊ चालू कर देने से ही समाजसेवा नहीं होती. भजन में तालियां पीटने से किसी की हालत नहीं सुधरती. उस के लिए कर्म करना होता है. जो भारत में भाग्य के सामने ओछा माना जाता है.
देश को पुराने काल में बांधे रखने वालों को देख कर ही स्टीव जौब घबरा कर स्वदेश चला गया था. उस ने सूचना क्षेत्र में जो क्रांति की, क्या वह धार्मिक कर्मकांड के कीचड़ में रह कर हो पाती? उस का भाग जाना दुनिया के लिए फायदेमंद रहा. यहां रहता तो वह क्या कर पाता, सिवा भभूत रमा कर, बाबा बन कर उपदेश पिलाने के.
आज महंगी शिक्षा ही बेहतर शिक्षा का पैमाना मानी जाती है. यदि ऐसा है तो इन फाइवस्टार स्कूलों में पढ़ने वाले अब तक तो भारत की तसवीर बदल चुके होते. इन का हर विद्यार्थी आईटी के ख्वाब देखता है. हर साल कितने ही आईआईटियंस निकलते रहते हैं. डिगरी मिली नहीं, कि वीजा के लिए भटकते रहते हैं. पासपोर्ट पर ठप्पा लगवाने के लिए बेताब हो उठते हैं. इस से तो सरकारी स्कूलों से निकले विद्यार्थी ही अच्छे जो देश के लिए कुछ करने को तैयार रहते हैं. फौज में देखिए, पुलिस में देखिए, ज्यादातर जवान सरकारी स्कूल वाले ही मिलेंगे.
फाइवस्टार स्कूलों के विद्यार्थियों को देश से कोई मतलब नहीं होता. वास्तविकता का सामना करने की उन में हिम्मत नहीं होती. देश में शिक्षा के अड्डे दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं और सरकारी स्कूल बंद होते जा रहे हैं. सरकार भी तो यही चाहती है कि गरीबों के बच्चे पढ़ें नहीं. यदि वे पढ़लिख कर आगे आ गए तो उन के कभी पूरे न किए जाने वाले वादों का क्या होगा?
निजी स्कूलों में विशेष अतिथि बन कर भाषण पिलाने वाले हमारे नेतामंत्री कभी सरकारी स्कूलों के बारे में चिंता नहीं करते. हां, मास्टरजी का स्थानांतर करवाने या रुकवाने में जरूर दिलचस्पी लेते हैं. छोटे शहरों में दो सौ से भी ज्यादा बड़ी निजी शिक्षण संस्थाएं… माफ कीजिए इंस्टिट्यूट हैं. उन्हें सस्ती जमीन मिल जाती है. नैपोलियन के शब्दकोष में असंभव शब्द नहीं है तो इन के पाठ्यक्रम में अनुत्तीर्ण शब्द नहीं है. सब के सब पास होते हैं. क्यों न हों जब लक्ष्मी ने सरस्वती को खरीद लिया है तो फिर किस में हिम्मत है कि रोक ले?
अब राष्ट्रीय संत की बात करें. वैसे तो हर तिलकधारी खुद को राष्ट्रीय संत कहलवाने की इच्छा रखता है. ये लोग अमीरों को बताते हैं कि जिंदगी कैसे जिएं. ज्ञान देने की बाकायदा तगड़ी फीस लेते हैं, देने वाले की जेब जो भरी हुई है. हमारे यहां विद्यादान को महादान कहा जाता है. लेकिन अब यह महाव्यापार बन गया है. बाप की अथाह कमाई वाले अमीरजादों के पास फुरसत ही फुरसत है.
मनोरंजन और जनसंपर्क बढ़ाने के लिए सत्संग से बढ़ कर और क्या विकल्प हो सकता है. सभी संत कहे जाने वाले महाव्यापारी हैं.
इन का सारा कामकाज इंग्लिश में चलता है. यानी, देश से वे वैसे ही कटे हुए हैं. वे कभी गंदी बस्तियों में नहीं जाते. न ही उन के शिष्य जाते हैं. ध्यान का कैंप लगाते हैं लेकिन मलिन बस्तियों में सफाई कैंप नहीं लगाते. जगहजगह शिक्षा के अड्डे तो खोलते हैं लेकिन गरीब बच्चों की फीस का इंतजाम नहीं करते. जो कभी पैदल नहीं चलते, हमेशा एसी गाडि़यों या हवाई जहाज में उड़ते फिरते हैं, उन्हें जमीनी हकीकत कैसे मालूम हो सकती है?
जहां भी जाना हो तो दस दिन पहले ही शहर की दीवारें इन के शुभागमन के पोस्टरों से रंग दी जाती हैं. फिर ये महाराजा की तरह अपने लावलशकर के साथ पधारते हैं. हवाई अड्डे पर इन का शानदार स्वागत होता है. इन के प्रवचनों से फायदा होता किस को है?
शिक्षा के नएनए अड्डे खोलने के लिए ये शहर से दूर सस्ते में जमीन लेते हैं. कुछ साल चलाया, फिर ऊंचे दाम पर बेच देते हैं. झाडि़यां और पेड़ शिक्षा के नाम पर बलिदान कर दिए जाते हैं. गांवों में शौचालय नहीं हैं. पहले बेचारी महिलाएं झाडि़यों की आड़ में निबट लेती थीं लेकिन शिक्षा माफिया उन का लाज का यह परदा भी छीन लेते हैं.
कितने संतों ने अपने अड्डे बनाने की जगह महिला शौचालय बनाने की समझ दिखाई है? इन्हें जगहजगह आश्रम बनाने की क्या जरूरत है. यह साफ जाहिर है कि ये सस्ते में जमीन खरीदना चाहते हैं ताकि वे अपना धंधा आगे बढ़ा सकें. ये धर्म के व्यापारी अपनी पत्रिका भी निकालते हैं और विज्ञापन बटोरते हैं. पत्रिका की सामग्री एकदूसरे से ली हुई होती है. नया लाएंगे कहां से? लगे हाथों दवाएं भी बनाने लगते हैं. आयुर्वेद और हर्बल के नाम पर पता नहीं क्याक्या बनातेबेचते हैं.
ये अध्यात्म गुरु अपनी मार्केटिंग के लिए महंगी मार्केटिंग एजेंसी हायर करते हैं. जिस शिविर में इन के त्याग, ईमानदारी, अपरिग्रह के डोज दिए जाते हैं, वहां इन के चित्र, प्रवचनों की सीडी, मालाएं, अंगूठियां, झोले, बटुए, किताबें, दवाएं वगैरा भी बेची जाती हैं. इन पर न तो बिक्रीकर लगाया जाता है और न ही सेवाकर. कमाई का तो हिसाब ही नहीं. निर्मल बाबा ने तो अपने बटुए का नाम तक बरकत का बटुआ रख दिया था. बटुआ खरीदने वाले की बरकत हो या न हो, पर बाबा की जेब जरूर भर जाती है.
टीवी चैनलों पर खरीदे हुए भक्त प्रायोजित सवाल पूछते हैं और बाबा उन के जवाब देते हैं. सालभर में ऐसे कई हंगामे होते हैं और जनता अपनी गाढ़ी कमाई इन ठगों के हवाले कर देती है. झबरैले साईं बाबा की पोल उस की मौत के बाद खुल गई कि उसे तरहतरह के विदेशी परफ्यूम लगाने का शौक था, वह सोने के पलंग पर सोता था, उस के शयनकक्ष से करोड़ों का बेहिसाब धन मिला.
नित्यानंद के पुरुषनापुरुष होने के किस्से कई दिनों तक जबान पर चढ़े रहे. कई संत शराबकबाब और शबाब के आशिक हैं. धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक धाक जमाने के लिए संत बनने से अच्छा और सस्ता कोई दूसरा रास्ता नहीं है. सही है, जब तक मूर्ख हैं तब तक धूर्त हैं. Satirical Story In Hindi
Satirical Story In Hindi : बिहार के गया तीर्थ में पिंडदान करने से पितर स्वर्गलोक का टिकट पा जाते हैं तो आधार कार्ड द्वारा व्यक्ति को मृत्युलोक की सुखसुविधाओं का लाभ मिल जाता है. पंडित हमारी जन्मकुंडली बनाता है और सरकार आधारकुंडली को लिंक करा कर आम आदमी के कर्मों का लेखाजोखा रखने लगी है. हम जब भी दुनियादारी से परेशान होते हैं, तो हमें भगवान की याद आती है और मठमंदिरों में बैठे पंडेपुजारी हम से चढ़ोतरी ले कर भगवान से हमारी सिफारिश कर देते हैं. ठीक वैसे ही, जब हमें सरकारी लाभ लेना होता है तो आधार कार्ड को सेवा शुल्क दे कर लिंक कराना पड़ता है. यदि आप का आधार कार्ड लिंक नहीं है, तो इस का मतलब है आप की नीयत में खोट है. सरकार की नजरों में आप चोर हैं.
सरकार चाहती है कि देश के विकास में अंतिम पंक्ति के व्यक्ति का योगदान हो. तभी तो सब्जी वाला, दूध वाला, कपड़ों की धुलाई करने वाला, चाय वाला, रोजगार गारंटी योजना के तहत मजदूरी करने वाला आम आदमी सरकार की मंशा पूरी करने के लिए आधार कार्ड को लिंक कराने में लगा है. सरकार ने भी योजनाओं का पिटारा खोल रखा है. कन्यादान योजना में मुफ्त शादी कराओ, बच्चे पैदा करने के लिए जननी सुरक्षा योजना और बंद करने के लिए नसबंदी योजना तो है ही. शिक्षकों का वेतन बढ़ाने पर भले ही सरकार पर आर्थिक संकट आ जाता हो परंतु देश के नौनिहालों को आंगनवाड़ी और स्कूलों में मध्याह्न भोजन, पुस्तकें, स्कौलरशिप, साइकिल सबकुछ बांटा जा रहा है. बूढ़ों को वृद्धापैंशन मिलती है, एक रुपए किलो गेहूंचावल मिलता है. इस के बावजूद गरीबी दूर नहीं हो रही, तो करमजले गरीब का ही दोष है.
नोटबंदी की अप्रत्याशित घटना से आम आदमी यह तो समझने लगा है कि सरकार कभी भी, कुछ भी कर सकती है. बगैर आधार शादीविवाह पर बैन लगा दे, हो सकता है आधार कार्ड लिंक न कराने वालों को राष्ट्रद्रोह के इलजाम में जेल में ठूंस दे. आधार से किसी का भला हो न हो, आधार बनाने वाली कंपनी की पांचों उंगलियां जरूर घी में हैं. कहते हैं आदमी इतना बुरा भी नहीं होता जितना वोटर लिस्ट में दिखता है. वह इतना अच्छा भी नहीं होता जितना आधार कार्ड में दिखता है. आज के दौर में आदमी की पहचान उस के रंग, रूप, कद, काठी, पद, प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि नामपते वाले 12 अंकों के यूनिक नंबर वाले आधार कार्ड से हो रही है.
यदि आप देश के आम आदमी हैं तो सावधान हो जाइए क्योंकि आप का आधार कार्ड अभी कई जगह लिंक नहीं है. आधार कार्ड को बैंक खाते, रसोईगैस, मोबाइल नंबर, बीमा पौलिसी व पैन कार्ड से लिंक कराने की जिम्मेदारी आप के मजबूत कंधों पर है. आधार कार्ड लिंक हुए बिना आप को सरकारी सुविधाएं नहीं मिल सकतीं. शायद तुलसीदासजी इसलिए बहुत पहले कह गए थे कि ‘कलियुग केवल नाम आधार’ अर्थात कलियुग में केवल आधार कार्ड का ही नाम होगा. आधार कार्ड जादू की वह पुडि़या है जो जब तक हर जगह अलगअलग लिंक नहीं होगा, सरकार का मिशन पूरा नहीं होगा. मेहनतमजदूरी करने वाला लच्छू अभी भी इसी भ्रम में है कि आधार लिंक होने से देश का कालाधन वापस आ जाएगा, सीमा पर पाक की नापाक हरकतों पर विराम लगेगा और हमारा देश फिर से सोने की चिडि़या बन जाएगा. इसलिए आम आदमी सब कामधाम छोड़ कर अपने आधार कार्ड को लिंक कराने पर डटा हुआ है.
अपना तो मानना है कि सरकार लगेहाथ आधार कार्ड को ससुराल से भी लिंक कराने का फरमान जारी कर दे, क्योंकि ससुर टाइप के लोग सब्सिडी के नाम पर दामाद को सुखसुविधाएं दिला कर कहीं अपनी आमदनी को छिपा कर आयकर बचाने का उपक्रम तो नहीं कर रहे हैं. दामादों के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है क्योंकि बगैर आधार कार्ड के मिलने वाली ससुराली खैरात बंद हो गई तो उन के तो लेने के देने पड़ जाएंगे.
विपक्षी पार्टियों का काम तो विरोध करना है, तो करती रहें. उन्हें रोकता कौन है? सरकार तो आखिर सरकार है. उसे किस का डर? वह कब, कौन से नोट की शक्ल बदल दे, कहा नहीं जा सकता. लोग तो कहते हैं कि हमारे प्रधानमंत्रीजी को सूट का जो रंग पसंद आता है, वे नोटों को भी उसी रंग में देखना चाहते हैं. आधार लिंक कराने के बहाने सरकार ने देश के नागरिकों की कुंडली बना ली है, वह कभी भी, किसी की पोल खोल सकती है. कालेधन वाले सफेदपोशों को डर दिखा कर चुप रहना सिखा दिया है सरकार ने. तभी तो चारों ओर नमोनमो की धूम मची है. यह अलग बात है कि विजय माल्या जैसे लोग देश को लूट कर सरकार को ठेंगा दिखा रहे हैं. जो पार्टी कभी आधार कार्ड के विरोध में अपने झंडे गाड़ती थी, अब सरकार में आते ही उस के गुणगान करती नहीं थक रही.
हमारी सरकार की पिछले 4 साल की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि भी यही है कि वह देश के सवा सौ करोड़ भाईबहनों के आधार कार्ड उन के बैंक खातों और रसोईगैस से लिंक करवाने पर तुली हुई है. अब बारी है गरीबों के पैन कार्ड बनवा कर आधार से लिंक कराने की. आयकर विभाग भले ही केवल आयकरदाताओं के पैन कार्ड से मतलब रखता हो, मगर सरकार को गरीबों की सब से ज्यादा चिंता है. सरकार का मानना है कि आखिर गरीब आदमी का भी अपना स्टेटस है. वह आधार सैंटरों के चक्कर काट कर 500 रुपए का गांधी छाप वाला हरा नोट खर्च कर के पैन कार्ड बनवाता है. फिर उसे अपने जनधन अकाउंट से लिंक करवाता है. उसे पता है चुनाव वाले अच्छे दिन फिर से आने वाले हैं. हो सकता है कि इसी खाते में सरकार नोटबंदी से वापस आए कालेधन में से कभी भी 15-15 लाख रुपए जमा करवा दे और गरीब आदमी गरीबी की रेखा को पार कर बल्लेबल्ले करने लगे.
इन 5 वर्षों में राममंदिर, अनुच्छेद 370, गंगा की सफाई, सीमापार की घुसपैठ जैसे मसलों को दरकिनार कर आधार कार्ड को लिंक कराने का अभियान चला कर सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह आम आदमी के विकास के बारे में गंभीरता से सोच रही है.
आम आदमी को भी अब यह भरोसा हो गया है कि उस ने अपना कीमती वोट इसीलिए दिया था कि उस की असल पहचान वाला बेशकीमती आधार कार्ड कश्मीर से कन्याकुमारी तक लिंक हो जाए. कुछ विघ्नसंतोषी यह कुतर्क देते फिर रहे हैं कि आधार कार्ड से उन की निजता के अधिकार का हनन होगा. अपना तो मानना है कि गीता के उपदेश को केवल सुनें ही नहीं, उसे जीवन में भी उतारें, क्योंकि गीता में कहा गया है कि हम क्या ले कर आए थे, क्या ले कर जाएंगे, जो हमारा नहीं है उस के लिए क्यों व्यर्थ शोक करें. आज भले ही हम साक्षर होने का दम भर लें मगर आधार कार्ड बनवाने में लगा अंगूठा अब हमारी पहचान बन चुका है. अब हम अंगूठा लगाने में कोई शर्मसंकोच नहीं, बल्कि अपनी शान में इजाफा समझ रहे हैं. बैंक एटीएम, राशन दुकान, मोबाइल नंबर आदिआदि में लगा हमारा अंगूठा इस बात का साक्षी है. आधार कार्ड को और कहांकहां लिंक कराया जा सकता है, सरकार इस पर लगातार मंथन कर रही है. सरकारी नौकरचाकरों के आधार कार्ड सेलरी से, व्यापारियों के बहीखातों से लिंक होने की खबर सोलह आने सही है.
नशामुक्ति अभियान चलाने वाले एक भाईसाहब का सुझाव है कि सरकार शराब की दुकानों पर भी आधार कार्ड लिंक कराना अनिवार्य कर दे. सरकार एक बार अंगूठा लगाने पर अद्धापौआ का हिसाब निर्धारित कर शराबखोरी को नियंत्रित कर सकती है. इस प्रक्रिया से शराब पीने वालों के आंकड़े भी अगली जनगणना में सार्वजनिक हो जाएंगे. सरकार आसानी से इस तिलिस्म का राज भी जान सकती है कि गरीबीरेखा से नीचे जीवनयापन करने व राशन दुकानों से मुफ्त राशन लेने वाले महीने में अपनी आमदनी से ज्यादा की शराब कैसे गटक जाते हैं. नोटबंदी में अपने नोट बदलने के लिए कईकई दिनों तक लाइन में लगा रहने वाला आम आदमी यह सोच कर खुश है कि देश में किसी भी नेता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे जनसेवा का धर्म छोड़ कर बैंक की लंबी लाइन में लग कर अपना समय खराब करते और न ही हमारे नेताओं के इतने खर्चे हैं कि उन्हें अपनी घरगृहस्थी चलाने के लिए बैंक के किसी एटीएम की लाइन में लग कर पैसा निकालना पड़े.
सरकार आम आदमी की नब्ज टटोल चुकी है. उसे पता है कि आम आदमी जब तक लाइन में खड़ा नहीं रहता उस का हाजमा खराब रहता है. इसीलिए सरकार समयसमय पर जनहित वाले ऐसे कामों को अंजाम देती रहती है. सरकारको मतदाताओं की बहुत फिक्र रहती है. यही कारण है कि अब तक उस ने वोटर लिस्ट को आधार कार्ड से लिंक करने की तरफ ध्यान नहीं दिया है. सरकार को पता है कि आधार कार्ड यदि वोटर लिस्ट से लिंक हो गया तो असलीनकली के नाम पर मतदाता के स्वाभिमान को चोट पहुंच सकती है और देश का प्रजातंत्र दुर्घटनाग्रस्त हो सकता है. प्रजातंत्र की सलामती के लिए यह कदम ठीक नहीं है.
धन्य है हमारा देश और धन्य है हमारी जनता जो बड़ेबड़े संकटों में भी मुसकराती है. चुनावी सभाओं और कुकरमुत्तों की तरह उग आए टैलीविजन चैनलों पर नेताओं के लच्छेदार भाषणों व जुमलों को सुन कर जनता ताली पीटती है. उसे भलीभांति पता है कि उस के हर मर्ज की दवा इन्हीं नेताओं के पास है. तभी तो नेताओं के भाषण और नारों को सुन कर आम आदमी की भूख गायब हो जाती है. आइए, हम भी सरकार के इस नेक काम में सहभागी बनें और अपनेअपने आधार कार्ड को जहांजहां लिंक नहीं है, लिंक कराएं क्योंकि आधार ही हमारी असली पहचान है. क्या पता आगे चल कर बिन आधार कार्ड हम कब, कौन सी सरकारी खैरात से वंचित रह जाएं.
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Editorial : जहां हम अंधेरे कमरे में दीये जला कर किसी देवता को पूजने के अधिकारों की बात करते हैं और जहां हमारी खोजें निकट की मसजिद के नीचे दबेछिपे मंदिर की नींवों और मूर्तियों तक सीमित हैं, वहीं 1980 तक हम से हर मायने में गरीब, लाचार, बेचारा, भूखा, कम्युनिज्म का मारा हमारा पड़ोसी चीन आज अंधेरी फैक्ट्रियां बना रहा है जहां रोबोट रातदिन, बिना मानव की उपस्थिति के, प्रति सैकंड एक मोबाइल बनाने में लगे हैं.
चीन की तकनीकी उन्नति अद्भुत है. मोबाइल चाहे अमेरिका ने ईजाद किया हो पर अब इस की तकनीक पर चीन का कब्जा है और दुनिया का शायद ही कोई ऐसा मोबाइल होगा जिस में चीनी पार्ट न लगे हों. भारत में भी लाखों मोबाइल बन रहे हैं पर उन का सामान विदेशों से आता है जिन्हें यहां सिर्फ असैंबल किया जाता है, पैक किया जाता है और किसी अमेरिकी या जापानी कंपनी की मोहर लगाई जाती है.
मोबाइल ही नहीं, दशक के अंत तक चीन अंधेरी फैक्ट्रियों में रोबोटों और आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस से पूरी कार को बनाने की तैयारी कर रहा है, वह तैयारी जो अमेरिका या यूरोप का कोई देश नहीं कर रहा.
चीन की घटती आबादी पर जो लोग जश्न मनाना चाहते हैं उन के लिए बुरी खबर यह है कि चीन मानवों की जगह मशीनों से काम करवा रहा है. उस की जनसंख्या घट कर चाहे 100 करोड़ या 70 करोड़ रह जाए, वह अपने विशाल गर्भगृहों से झूठे, काल्पनिक, गढ़े हुए वरदान नहीं देगा बल्कि आम आदमी की आज की जरूरतों को पूरा करने वाले सामान बनाएगा.
भारत में आज एक ही लक्ष्य रह गया है, पूरी सरकार केवल उसी पर काम करती नजर आती है कि कैसे धर्म को भुनाया जाए, कैसे भारतीयों को धर्मस्थलों पर ले जाया जाए, कैसे उन से उन की मेहनत का पैसा छीन कर मंदिर के दरवाजे सोने के बनाए जाएं, मंदिर का शिखर ऊंचा किया जाए, फलां जगह की मसजिद या चर्च को गिराया जाए, फलां धर्म के मानने वाले की दुकान मंदिर के निकट होने पर उसे बंद कराई जाए, किसकिस के वोट काटे जाएं और किसकिस पर आंतरिक सुरक्षा के मुकदमे थोपे जाएं.
चीन हमारा पड़ोसी ही नहीं, उस के साथ हमारी लंबी विवादास्पद सीमा है. उस की नदियां हमारे यहां आती हैं. उस के तिब्बत के लोग हमारे यहां शरण लिए हुए हैं. वह हमारे इलाकों को अपना कहता है. वहीं, हम इस में फंसे हैं कि रोबोटों को कैसे बनाया जाए और बनाया जाए भी या नहीं.
चीन रोबोट को यूरोप या अमेरिका से आयात नहीं कर रहा. वह अपने युद्ध का सामान भी खुद बना रहा है और रोजमर्रा के उपयोग की चीजें भी. चीन तमाम घरेलू आइटमों को अपने अंधेरे गर्भगृहों वाली फैक्ट्रियों में बना रहा है. हमें तो इस में ही संतोष होता है कि हम ने पंडित को रिश्वत दे कर अंधेरे गर्भगृह में छिपे देवीदेवता के दर्शन ‘अच्छे’ से कर लिए, बस. Editorial
Unemployment : देश में बेरोजगारी है, इस के लिए जितना दोष सिस्टम का है उस से ज्यादा खुद युवाओं का. रोजगार थाली में सज कर नहीं आता, उस के लिए खुद को कोशिशें करनी होती हैं.
बेरोजगारी से तंग आ कर अक्षत ने आत्महत्या करने की कोशिश की. यह बात जब अक्षत के दोस्त समीर को पता चली तो वह शौक रह गया. एक समय वे दोनों साथ में ही सरकारी जौब की तैयारी कर रहे थे. वक़्त रहते समीर ने अपना रास्ता बदल लिया, पापा के बिजनैस में लग गया. अक्षत सरकारी जौब पाने के पीछे पागल था, सरकारी नौकरी मतलब, परमानैंट नौकरी, अच्छी तनख्वाह और दूसरी तमाम सुविधाएं. वह जीतोड़ मेहनत भी कर रहा था मगर हर बार कुछ नंबरों से रह जाता था.
33 साल के हो चुके अक्षत को लगने लगा कि अब उस के पास कोई विकल्प नहीं बचा सिवा आत्महत्या करने के.
बढ़ती बेरोजगारी से न सिर्फ देशभर के युवा परेशान हैं, बल्कि विदेशों में पढ़ेलिखे युवा भी इस की चपेट में हैं. बेरोजगारी से जुड़ा एक काफी पेचीदा मामला है. दरअसल औक्सफोर्ड जैसी विश्वविख्यात यूनिवर्सिटी से पढ़े एक 41 साल के शख्स ने बेरोजगारी से तंग आ कर अपने मातापिता पर ही केस ठोंक दिया. 41 साल का यह बेरोजगार शख्स ज़िंदगीभर के लिए हर्जाने की मांग कर बैठा.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आतिश (बदला हुआ नाम) ने औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की. साथ ही, वकालत की ट्रेनिंग में भी ली. इस के बावजूद वह बेरोजगार था. इस शख्स का कहना था कि अगर उस के मांबाप उस की मदद नहीं करेंगे तो उस के मानवाधिकार का उल्लंघन होगा. लड़के के पिता 71 साल के हैं और उस की मां 69 साल की. इतने उम्रदराज होने के बावजूद वे अपने बेटे को हर महीने 1,000 पाउंड भेजते हैं.
इतना ही नहीं, वे अपने बेटे के दूसरे खर्च भी वहन कर रहे हैं. यानी, वह अपने सभी खर्चों के लिए अपने मातापिता पर ही निर्भर है. लेकिन अब वे अपने बेटे की मांगों से तंग आ चुके हैं और छुटकारा चाहते हैं. कैसे, यह उन्हें समझ नहीं आ रहा.
उच्च साक्षरता के बावजूद युवा बेरोजगार हैं, तो यह वाकई चिंतनीय है. बहुत तो नालायकी और आलसपने के शिकार हैं. वे कुछ करना ही नहीं चाहते सिवा सिस्टम को दोष देने के. उन्हें हर चीज थाली में परोसी हुई चाहिए. यहां तक कि जिस तरह की स्किल की जरूरत है वैसी स्किल युवा सीखने में नाकामयाब हैं, हां, डिग्रियां भरी हुई हैं.
हालांकि यह भी सच है कि भारत में स्किल नौकरियों की भी कमी है. हाल ही में इंस्टिट्यूट फौर ह्यूमन डैवलपमैंट और इंटरनैशनल लेबर और्गनाइज़ेशन ने इंडिया एंप्लौयमैंट रिपोर्ट 2024 जारी की. यह रिपोर्ट भी भारत में रोजगार की स्थिति को बहुत गंभीर रूप में पेश करती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि जो बेरोजगार फोर्स है, उस में लगभग 83 फीसदी युवा हैं.
यह कहना गलत नहीं होगा कि आज की युवा पीढ़ी बेरोजगारी से जूझ रही है. कई युवा नौकरियों के लिए अवसर तलाश रहे हैं. 15-20 हजार रुपए की नौकरी के लिए हजारों बेरोजगार युवा आवेदन करते हैं और जब इस में भी उन्हें सफलता नहीं मिल पाती, तो वे हताश और निराश हो जाते हैं.
सरकारी जौब नहीं लग पा रही है, तो इस का यह मतलब नहीं है कि आप कोई गलत कदम उठा लें या फिर अपने पेरैंट्स पर बोझ बन जाएं और उन से अपने खर्चे उठवाएं व उन्हें परेशान करें, तब, जब उन की उम्र हो चुकी है और वे खुद अपनी पैंशन पर निर्भर हैं. इस के अलावा यह भी नहीं कि हर बात का दोष सिस्टम पर डालें. सिस्टम अगर लचर है तो भी खुद को सक्षम बनाना भी तो जरूरी है.
टैक्नोलौजी के इस युग में युवा पीढ़ी को अब अपनी सोच बदलनी होगी. उसे अब नौकरी ढूंढ़ने के बजाय नौकरी देने वाला बनने पर ध्यान देना चाहिए.
हम युवाओं को अपने रोजगार और आजीविका के लिए अपने मातापिता का मुंह देखने के बजाय अपने रास्ते खुद तलाशने होंगे. इस में दो राय नहीं कि हम युवाओं के पास भरपूर क्षमता और कौशल है और इसे साबित करने के लिए पर्याप्त अवसर भी हैं. हमें केवल अपने लक्ष्य को परिभाषित करने की आवश्यकता है. टैक्नोलौजी इस कार्य में बहुत सहायक सिद्ध हो सकती है. इस की मदद से न केवल युवा पीढ़ी रोजगार पा सकती है बल्कि कईयों को रोजगार दे भी सकती है.
हमारे पास आगे बढ़ाने के कई अवसर हैं. लेकिन मुद्दा यह है कि सही दिशा में कदम किस प्रकार उठाया जाए, जिस से कि परिवार, समाज और देश को फायदा पहुंचे. इस के लिए युवाओं के साथसाथ सरकार को भी आगे आना होगा. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि आज आवश्यक और मूलभूत सुविधाओं के अभाव के कारण कई युवा, टैलेंटेड होते हुए भी, पीछे रह जाते हैं.
24 साल के एक युवक का कहना है कि वह अच्छा क्रिकेट खेलता है. लेकिन उस के पास क्रिकेट को बेहतर बनाने के लिए प्रभावी सुविधाएं नहीं हैं. यदि उसे सुविधाएं मुहैया कराई जाएं तो वह क्रिकेट में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है.
भारत में युवाओं (15-29 साल की उम्र) में बेरोजगारी की दर सामान्य आबादी की तुलना में काफी ज्यादा है. साल 2022 में शहरी युवाओं के लिए बेरोजगारी की दर 17.2 फीसदी थी, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 10.6 फीसदी थी. आईएलओ का कहना है कि भारत में युवा बेरोजगारी दर, वैश्विक स्तर से ज्यादा है.
देश में बढ़ती बेरोजगारी के और भी कारण हैं, जैसे बढ़ती आबादी, शिक्षा की कमी या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव, कौशल विकास की कमी, नौकरियों के अवसरों की कमी, धीमी आर्थिक वृद्धि, कुछ क्षेत्रों में निवेश की कमी, अवसरों का अनुपयुक्त उपयोग, भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी आदि.
सरकार की ज़िम्मेदारी केवल टैक्स कलैक्शन तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि देश का पूर्ण विकास हो, युवाओं को रोजगार मिले, यह भी सरकार की ही ज़िम्मेदारी है. Unemployment
Satirical Story In Hindi : मैं कुरसी हूं. हर जमाने में मेरा जलवा रहा है. मुझे हसीनाओं से भी ज्यादा भाव मिले हैं. इतिहास की ज्यादातर लड़ाइयां मेरे लिए ही लड़ी गईं. मैं सब की प्रिय हूं, सभी मेरे लिए जान पर खेलने को तैयार रहते हैं. लोगों ने मुझे हासिल करने के लिए अपने अजीजों तक को मार डाला. पिता को कारागार में डाल दिया. दोस्तों से मुंह मोड़ लिया. मुझ से नाता तोड़ना बेहद मुश्किल है, भले ही अपनी बीवी से नाता टूट जाए. राजा, मंत्री, नौकरशाह, बाबू सभी के लिए मैं माननीय हूं. मुझे पाने के लिए राजनीति की बिसात बिछाई जाती है, तमाम हथकंडे अपनाए जाते हैं. राजतंत्र में बाहुबल व कूटनीति के जरीए मैं हासिल होती थी, मगर प्रजातंत्र में वोट ही मुझे पाने का जरीया है.
मैं नेताओं की पैदल यात्राओं, आंदोलनों, भूख हड़तालों का इनाम हूं. जिस ने मेरी अनदेखी की, उस की जिंदगी में अंधेरा छा गया. जिस ने भी मुझे लात मारी, वह दुनिया वालों की लात का शिकार बन गया. मेरे लिए लोकतंत्र का जनाजा उठाया जाता है, संविधान को ठेंगा दिखाया जाता है और कानून को नजरबंद कर दिया जाता है. मेरे लिए दो धु्रव एक हो जाते हैं, दुश्मनों में सुलह हो जाती है, शेर और मेमना जंगलराज बनाने के लिए मिलाजुला जतन करते हैं. मैं कुरसी हूं यानी सत्ता, हक, सहूलियत, ऐश्वर्य, ख्याति. मेरे सामने बड़ेबड़ों की बोलती बंद हो जाती है. ताकतवर भी लाचार हो जाते हैं. जानकार बेजान हो जाते हैं. मेरे लिए रातोंरात ईमान बदल जाते हैं. बैनर बदल जाते हैं. मैं ही हकीकत हूं और सब बकवास.
मैं ही घोषणापत्रों का सार और विपक्ष की टीस हूं. मुझे हासिल करते ही कंगाल मालामाल और मूर्ख अक्लमंद हो जाते हैं. मेरे छूने से अंधे देखने लगते हैं. गरीबी का नामोनिशान मिट जाता है. दौलत से घर भर जाते हैं. जुल्म मेरा औजार है, झूठ मेरा कवच, बेईमानी मेरी बुनियाद है, तिकड़मबाजी मेरा ईमान है, घडि़याली आंसू मेरे गहने हैं और भ्रष्टाचार मेरी औलाद है. मैं कुरसी हूं. राजा विक्रमादित्य को मुझ पर बैठने से पहले बेताल के मुश्किल और उलझाऊ सवालों के जवाब देने पड़े थे. मेरी ही खातिर औरंगजेब ने अपनों को भी मार डाला था. लोकतंत्र में मैदान और लड़ाई का तरीका बदल गया है. अब मुझे पाने के लिए जनता के सामने न निभाने वाले वादे करने पड़ते हैं, भूख हड़ताल और पैदल यात्राओं के भीड़खींचू नाटक करने पड़ते हैं, गुंडों की फौज रखनी पड़ती है और किराए पर ‘जिंदाबाद’ बोलने वाले लोग रखने पड़ते हैं.
मैं कुरसी हूं. जो मुझे पा लेता है, उसे कुछ पाने की ख्वाहिश नहीं रहती है. वह उम्रभर मेरा हो कर रह जाता है. मेरे पास आंख और कान नहीं हैं, इसीलिए मैं दुखियों की चीखें सुन नहीं पाती, भूखेनंगों की हालत देख नहीं पाती. मेरे पास कपटी दिमाग और मजबूत पैर हैं. मैं इन दोनों अंगों का भरपूर इस्तेमाल करती हूं. अपने दिमाग से ही मैं राजनीति की बिसात बिछाती हूं, विरोधियों के कुचक्र को नाकाम करती हूं और मजबूत पैरों से आगे वाली कुरसी पर बैठे विरोधियों को ठोकरें मारती हूं. अपने ऊपर बैठने वाले को मैं रस से भर देती हूं. साहित्य के ठेकेदारों ने नौ रसों में जगह न दे कर मेरे साथ नाइंसाफी की है. शृंगार को रसराज कहा गया है, जबकि मेरे बगैर वह भी बेकार है, इसलिए साहित्य के ठेकेदारों को ‘कुरसी रस’ नामक एक नए रस का खुलासा कर देना चाहिए. Satirical Story In Hindi
Female Leadership : पुरूषवादी समाज में महिलाओं की योग्यता और क्षमता को कमतर कर के आंका जाता है. राजनीतिक परिवार हो या साधारण घरपरिवार जब भी महिलाओं को अवसर मिलता है वह अपनी काबिलियत को साबित करती हैं.
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का विमान दुर्घटना में निधन हो गया था (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानि एनसीपी प्रमुख और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन के बाद उन की पत्नी और राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र की नई डिप्टी सीएम बन गई हैं. सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र में डिप्टी सीएम के पद पर काबिज होने वाली पहली महिला हैं. अजित पवार का 28 जनवरी को विमान हादसे में निधन हो गया था. उन के निधन के बाद महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री का पद खाली हो गया था. महाराष्ट्र में शरद पवार की ताकत बढ़ती उस के पहले ही सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम उस रास्ते को बंद करने का काम किया गया. भाजपा नहीं चाहती थी कि पवार परिवार में आपसी एकजुटता हो जिस का नुकसान महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा को उठाना पड़े.
महाराष्ट्र की नई डिप्टी सीएम सुनेत्रा पवार और भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)
सुनेत्रा पवार धाराशिव जिले की रहने वाली हैं. वह एनसीपी के वरिष्ठ नेता पद्मसिंह पाटिल की बहन हैं. पद्मसिंह पाटिल और शरद पवार की दोस्ती की वजह से 1980 में सुनेत्रा और अजित पवार का विवाह हुआ. शादी के बाद सुनेत्रा बारामती आ गईं. उस समय अजित पवार दूध का कारोबार करते थे. सुनेत्रा ने अजित पवार के दूध के कारोबार में मदद की. इस के बाद अजित पवार ने अपना राजनीतिक करियर शुरू किया. 1993 में जब शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने, तब अजित पवार और सुनेत्रा पवार मुख्यमंत्री आवास यानी वर्षा बंगले में उन के साथ रहने लगे. वहीं सुनेत्रा ने कंप्यूटर चलाना सीखा था.
सुनेत्रा पवार के सामाजिक कार्य की शुरुआत काटेवाड़ी से हुई. यहां उन्होंने स्वच्छता अभियान चलाया था. उस समय काटेवाड़ी में 80 प्रतिशत लोगों के पास शौचालय तक नहीं थे. निर्मलग्राम और फिर ग्राम स्वच्छता अभियान के माध्यम से सुनेत्रा पवार ने लोगों को जागरूक किया. यहां आए बदलाव के बाद सुनेत्रा पवार ने राज्य के 86 गांवों में निर्मलग्राम अभियान का नेतृत्व किया. बारामती में महिलाओं को रोजगार देने के लिए एक टैक्सटाइल पार्क भी शुरू किया. जिस में लगभग 15 हजार महिलाएं काम करती हैं. सुनेत्रा पवार साल 2006 से ही इस टैक्सटाइल पार्क की अध्यक्ष हैं.
इस के साथ ही सुनेत्रा पवार विद्या प्रतिष्ठान नाम के एक शैक्षणिक संस्थान की ट्रस्टी भी हैं. जहां हजारों छात्रछात्राएं पढ़ रहे हैं. सुनेत्रा पवार ने एनवायरनमैंटल फोरम औफ इंडिया नामक एक संगठन की स्थापना की. यह जल संरक्षण और वृक्षारोपण पर काम करती हैं. उन का संगठन पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने का काम भी करता है. अजित पवार नियमित रूप से बारामती आते थे. वहीं सुनेत्रा पवार मुख्य रूप से क्षेत्र में जनसंपर्क का काम संभालती हैं. इसी वजह से बारामती क्षेत्र में उन्हें ‘भाभी’ कहा जाता है. 2024 में सुनेत्रा पवार ने अपनी ननद सुप्रिया सुले के खिलाफ बारामती से लोकसभा चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और बाद में वह राज्यसभा सांसद बनीं.
मौका मिलने पर हर दौर में आगे रही है महिलाएं :
सुनेत्रा पवार के लिए राजनीति नई नहीं है. अब महाराष्ट्र में डिप्टी सीएम बन कर वह नई मिसाल बन सकती है. पहला रिकार्ड उन के नाम इस बात का बन चुका है कि वह महाराष्ट्र की पहली महिला सीएम है. देश और विदेश में ऐसी महिलाओं की संख्या कम नहीं है जिन्होंने मौका मिलने पर खुद को पुरूषों से बेहतर साबित किया है. सदियों पहले के भी ऐसे उदाहरण मौजूद हैं. इन में से एक नाम क्लियोपेट्रा का भी है जो प्राचीन मिस्र की अंतिम और सब से प्रसिद्ध रानी थीं. क्लियोपेट्रा टालेमिक वंश से थीं. उन्होंने मिस्र के इतिहास और रोमन राजनीति को गहराई से प्रभावित किया था. क्लियोपेट्रा मैसेडोनियाई वंश की थीं.
प्राचीन मिस्र की अंतिम और सब से प्रसिद्ध रानी क्लियोपेट्रा का स्टैचू (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)
51 ईसा पूर्व में पह रानी बनीं थी. क्लियोपेट्रा के पिता की मृत्यु के बाद सत्ता उस के भाई टालेमी को सौंपी गई, लेकिन उस समय महिलाओं को पुरुष सह शासक के बिना शासन करने की अनुमति नहीं थी, इसलिए सब से आसान उपाय यही लगा कि क्लियो अपने छोटे भाई से शादी कर ले और साथ मिल कर मिस्र पर शासन करे. वैसे तो यह अजीब बात थी. क्लियोपेट्रा ने यही किया. जब टालेमी 13 वर्ष के हुए तो उन्होंने अपनी बहन/पत्नी के बिना शासन करने का मन बना लिया. उन्होंने क्लियोपेट्रा के विरुद्ध षड्यंत्र रचा, जिस के कारण क्लियोपेट्रा सीरिया भाग गईं, वहां उन्होंने शत्रु खड़ा कर दिया और जल्द ही मिस्र गृहयुद्ध में डूब गया.
रोम में भी गृहयुद्ध छिड़ा हुआ था, क्योंकि जूलियस सीजर अपने प्रतिद्वंद्वी पोम्पी से लड़ रहे थे. सीजर को हराने में असमर्थ पोम्पी मदद के लिए मिस्र भाग गए. लेकिन टालेमी ने सीजर को प्रभावित करने के लिए उन्हें तुरंत मरवा दिया. इस से सीजर क्रोधित हो गए और स्वयं मिस्र के लिए रवाना हो गए. सीजर ने टालेमी और क्लियोपेट्रा से जानकारी मांगी. उन दोनों को अपने सामने पेश होने का आदेश दिया. क्लियोपेट्रा विवादों के चलते अपने भाई के महल में नहीं आ सकती थीं.
क्लियोपेट्रा चुपके से एक रजाई में लिपट कर महल में दाखिल हुईं और सीजर से अकेले में मिलीं. जूलियस क्लियोपेट्रा की समझदारी से प्रभावित हुए. जल्द ही दोनों एक हो गए. क्लियोपेट्रा ने मिस्र की स्वतंत्रता और शक्ति बनाए रखने के लिए रोम के शक्तिशाली नेताओं, विशेषकर जूलियस सीजर और मार्क एंटनी के साथ रणनीतिक संबंध बनाए. जिस से रोमन राजनीति में उन का प्रभाव बढ़ा. कुछ सालों के बाद रोमन सेनाओं द्वारा पराजित होने के बाद मार्क एंटनी के साथ क्लियोपेट्रा ने आत्महत्या कर ली. जिस के बाद मिस्र रोमन शासन के अधीन आ गया. क्लियोपेट्रा का नाम उस की खूबसूरती, समझदारी और साहस के लिए आज भी याद किया जाता है.
भारत की पहली मुस्लिम महिला शासक रजिया सुल्तान (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)
भारत में पहली मुस्लिम महिला शासक रजिया सुल्तान को भी जब मौका मिला तो उन्होंने खुद को साबित किया. वह दिल्ली सल्तनत के शासक शम्सुद्दीन इल्तुतमिश की बेटी थी. उन का जन्म 1206 में हुआ था. उस समय चंगेज खां की सेनाएं मध्य एशिया को तबाह कर रही थीं. इल्तुतमिश को न्यायप्रिय शासक माना जाता है. इल्तुतमिश जब बूढ़े हुए तो उन्होंने अपनी बेटी रजिया को उत्तराधिकारी चुना. उन्होंने कहा कि उन के बेटे शासन के योग्य नहीं हैं, लेकिन रजिया प्रशासन में सक्षम है. रजिया ने कई मौकों पर प्रशासनिक कामों को संभाल कर अपनी क्षमता साबित की थी.
इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद दरबारियों ने उन की इच्छा के विरुद्ध उस के सौतेले भाई रुक्नुद्दीन फिरोज को सुल्तान बना दिया. फिरोज ने शासन की अनदेखी की और अय्याशी में डूब गया. उस के कुप्रशासन से परेशान जनता और गवर्नरों ने विद्रोह कर दिया. जब फिरोज दिल्ली से बाहर गए तो रजिया ने जनता का समर्थन हासिल किया. फिरोज की सत्ता पलट दी. रजिया ने खिड़की से दुपट्टा लहराते हुए कहा कि मैं महामहिम की बेटी हूं. मुझे ही उन का वारिस चुना गया था. कुछ समय के लिए ताज मुझे दीजिए, अगर मैं असफल रहूं तो गद्दी किसी और को दे देना.
इस तरह 30 साल की उम्र में नवंबर 1236 में रजिया दिल्ली की गद्दी पर बैठीं और भारत की पहली महिला शासक बनीं. रजिया ने पर्दा प्रथा तोड़ कर खुले दरबार में शासन किया. उन्होंने महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को स्थापित किया. हालांकि उन का शासन दरबारी षड्यंत्रों और पुरुष प्रधान समाज से जूझता रहा, फिर भी रजिया सुल्तान आज भी साहस और दृढ़ता की मिसाल मानी जाती हैं. हर दौर में महिलाओं को जब अवसर मिले उन्होंने खुद को साबित किया. आज भी पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं की जंग जारी है.
भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)
इंदिरा गांधी से ले कर सुनेत्रा पवार तक :
आजाद भारत में इंदिरा गांधी से ले कर सुनेत्रा पवार तक पुरूषवादी वर्चस्व को तोड़ते हुए महिलाओं ने राजनीति में अपनी जगह बनाई. इंदिरा गांधी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बेटी थी. लेकिन उन को प्रधानमंत्री परिवारवाद के चलते नहीं बनाया गया था. इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनने का अवसर तब मिला जब देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का असमय निधन हो गया. उस समय कांग्रेस के एक गुट ने इंदिरा गांधी का विरोध किया. दूसरा गुट इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया मानता था. उसे लगता था कि इंदिरा गांधी फेल हो जाएगी.
प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी ने खुद को साबित किया. उन की गिनती देश के सफल प्रधानमंत्रियों में की जाती है. बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की पत्नी ने कभी राजनीति नहीं की थी न ही उन का यह शौक था. लालू प्रसाद यादव को जब चारा घोटाले में जेल जाना पड़ा तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पत्नी राबड़ी देवी को सौंप दी थी. राबड़ी देवी ने सफलता पूर्वक काम को संभाला था. पहले राबड़ी देवी को अपना नाम भी लिखना नहीं आता था.
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जब जेल जाना पड़ा तो उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी भले ही चंपई सोरेन को दी पर पार्टी की कमान अपनी पत्नी कल्पना सोरेन को सौंप दी थी. कल्पना राजनीति मे सक्रिय हुई. 2024 में गिरिडीह के गंडे विधानसभा का उपचुनाव जीता. 2024 के लोकसभा चुनाव में कल्पना सोरेन ने इंडिया गठबंधन के लिए प्रचार किया. जिस के प्रभाव से भाजपा को बहुमत के आंकड़ें से पीछे रोका जा सका.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमजी रामचन्द्रन की उत्तराधिकारी के रूप में जयललिता ही मशहूर रही है. सही बात यह है कि एमजी रामचन्द्रन के निधन के बाद 7 जनवरी 1988 को उन की पत्नी जानकी रामचन्द्रन ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. वह तमिलनाडु की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी. लेकिन इस के बाद एमजी रामचन्द्रन की पार्टी एआईएडीएमके दो गुटो में बंट गई. जिस के चलते जानकी रामचन्द्रन अपनी बहुमत साबित नहीं कर पाई. 23 दिन के बाद 30 जनवरी 1988 को उन्हें अपना मुख्यमंत्री पद छोड़ना पडा था.
1989 में चुनावी हार के बाद जानकी रामचन्द्रन ने राजनीति छोड़ दी. उस के बाद जयललिता ने पार्टी को एकजुट किया. 1991 में वह पहली बार मुख्यमंत्री बनी. इस वजह से जयललिता को एमजी रामचन्द्रन का असली उत्तराधिकारी माना जाता है. ऐसी महिलाओं की संख्या कम नहीं है जहां जिस को जैसे अवसर मिला उसने अपनी प्रतिभा दिखाई. उत्तर प्रदेश में अपना दल इस का एक और उदाहरण है. इस के संस्थापक डाक्टर सोनेलाल पटेल कभी न सांसद बन सके न विधायक लेकिन उन के निधन के बाद बेटी अनुप्रिया पटेल ने 2012 में विधानसभा और 2014 में लोकसभा चुनाव जीता. केंद्र सरकार में मंत्री बनी. दूसरी बेटी पल्लवी पटेल 2022 में विधायक चुनी गई.
बिजनेस को संभालती महिलाएं :
मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी के मातापिता कोकिलाबेन और धीरूभाई अंबानी (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)
घरों में काम करने वाली महिलाओं के सामने जब बिजनेस संभालने का अवसर आया तो उन्होंने इसे चुनौती की तरह से लिया और बिजनेस को सही दिशा दी. रिलायंस ग्रुप का नाम 1990 के दशक में बड़ी तेजी से आगे बढ़ा था. इस के संस्थापक धीरूभाई अंबानी का जुलाई 2002 में निधन हो गया. इस के बाद मुकेश अंबानी ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक का पद संभाला और उन के भाई अनिल अंबानी ने उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक का पद संभाला. दो साल के बाद ही नवंबर 2004 मुकेश और अनिल के बीच झगड़ा सामने आ गया. मुकेश और अनिल की मां कोकिलाबेन की समझदारी के चलते ही रिलायंस ग्रुप का बंटवारा सही तरह से निपट सका.
ओम प्रकाश जिंदल की पत्नी सावित्री जिंदल (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)
सावित्री जिंदल ने पति ओम प्रकाश जिंदल की हेलिकाप्टर हादसे में मृत्यु के बाद जब कारोबार संभाला तो वह 55 साल की थी. सावित्री जिंदल 2021 में 18 अरब डालर की नेटवर्थ के साथ फोब्र्स की शीर्ष 10 लिस्ट में भारत की अकेली अमीर महिला बनी थी. बिजनेस संभालने से पहले सावित्री जिंदल घरेलू महिला थी. 20 मार्च, 1950 को असम के तिनसुकिया कस्बे में जन्मी सावित्री की 1970 के दशक में ओपी जिंदल के साथ शादी हुई थी. वह सफल बिजनेसमैन के अलावा, हरियाणा सरकार में मंत्री और हिसार क्षेत्र से हरियाणा विधानसभा के सदस्य थे.
कैफे कौफी डे (सीसीडी) के संस्थापक वीजी सिद्धार्थ की पत्नी मालविका हेगड़े (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)
इस तरह के क्रम में एक नाम मालविका हेगड़े का भी है. मालविका हेगड़े कैफे कौफी डे (सीसीडी) के संस्थापक वीजी सिद्धार्थ की पत्नी है. 2019 में सिद्धार्थ ने खुदकुशी कर ली थी. कंपनी तब 7000 करोड़ रुपए के कर्ज में थी. 2020 में मालविका ने कैफे कौफी डे की कमान संभाली. वह कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा की बेटी हैं. सिद्धार्थ से शादी के बाद उन्होंने काफी इंडस्ट्री में प्रवेश किया. सीसीडी की स्थापना 1996 में हुई थी. कंपनी ने भारत में खूब नाम बटोरा.
खराब समय आया तो सिद्धार्थ ने खुदकुशी कर ली. तब लगा कि यह कंपनी का अंत हो गया है. इस के बाद मालविका ने कंपनी के सीईओ का पदभार संभाला. सीईओ बनने के बाद मालविका ने सब से पहले कर्ज खत्म करने को ही अपना लक्ष्य बनाया. उन्होंने कौफी के रेट नहीं बढ़ाए लेकिन कई घाटे वाले बिजनेस बंद कर दिए. एक समय पर दिवालिया होन की कगार पर पहुंच चुकी कंपनी मुनाफे में पहुंच गई है.
पत्नियों को समझना चाहिए कारोबार :
ऐसे उदाहरण केवल बड़े बिजनेस घरानों के ही नहीं है. सामान्य परिवारों में भी महिलाएं अपना कारोबार संभाल लेती हैं. डाक्टर अर्चना गुप्ता की पुरानी घड़ियों की दुकान भूतनाथ मार्केट में थी. कोविड में उन के पति का निधन हो गया. 5-6 माह उन की दुकान बंद रही. दुकान किराए की थी. उस का किराया भी बकाया हो गया था. घर में अर्चना की सास और बेटी ही थी. बेटी कालेज में पढ़ रही थी. सास बूढ़ी थी. ऐसे में अर्चना ने दुकान संभाली. उन के अपने घर पर जगह थी तो किराए की दुकान छोड़ कर घर पर ही दुकान शुरू कर दी. अपनी मेहनत से पूरा बिजनेस संभाल लिया.
कुछ इसी तरह से चिकन के कपड़ों का काम करने वाली ममता अग्रवाल ने भी अपने पति के निधन के बाद चिकन कपड़ों के शोरूम को संभाल लिया. पति के समय में उन के पास दो दुकानें थी. ममता अग्रवाल ने आर्थिक संकट से उबरने के लिए अपनी एक दुकान बेच दी. उस से जो पैसे मिले उसे बिजनेस में लगाया. वह कहती हैं ‘बिजनेस में एक महिला के लिए काम करना सरल नहीं होता है. खासकर बकाया पैसे वसूल करना मुश्किल काम होता है. मेरे पति का बहुत सारा लेनदेन आपस में मौखिक रूप से था. वह पैसा डूब गया. इस के बाद भी 2 साल में हम ने अपनी शौप को मजबूत कर लिया है.’
पति की अचानक मौत होने के बाद महिलाओं के लिए बिजनेस संभलाना सरल नहीं होता है. ऐसे में उन को पति के साथ कारोबार में दखल देना चाहिए. जिस से जरूरत पड़ने पर वह कारोबार को संभाल सके. कई बार इस तरह के मौके आने पर महिलाएं बिजनेस से अधिक धर्मकर्म पर भरोसा करने लगती है. कई महिलाएं टूट जाती हैं.
हमारे समाज में आज भी विधवा महिलाओं को ले कर दोहरा नजरिया रखा जाता है. उन को अपशगुनी माना जाता है. उन के चरित्र को ले कर भी सवाल उठाए जाते हैं. महिलाओं को इस तरह के दकियानूसी विचारों की परवाह न करते हुए आगे बढ़ना चाहिए. जिन महिलाओं ने दकियानूसी और रूढ़िवादी विचारों को त्याग कर आगे कदम बढ़ाए हैं वह सफल हुई हैं. Female Leadership
Social Story in Hindi : पिछले 2 वर्ष से होली में कोई खास मजा नहीं आ रहा था. ऐन होली के दिन मास्टर भोलाराम का जाने कौन सा रिश्तेदार पैदा हो जाता था कि वे गायब हो जाते. अब किशोरों को भी उन्हें होली का भांड़ बनाने में जो मजा आता था, वह किसी और को नहीं. मास्टर भोलाराम भी लाखों में एक थे. छोटा कद, बाहर को निकली तोंद, सड़क पर चलते तो ऐसा लगता जैसे कोई बड़ी फुटबौल लुढ़क रही हो. होली क्या आती, उन के लिए मुसीबत आ जाती. वही सब का निशाना बनते. बेचारे, खुद को बहुत बचाते, पर आखिर पकड़े जाते और फिर उन की ऐसी दुर्गति होती कि बयान करना मुश्किल है. लेकिन पिछले 2 साल से मास्टर भोलाराम किसी को हवा भी नहीं लगने दे रहे थे. होली वाले दिन उन के दरवाजे पर बड़ा सा अलीगढ़ी ताला लटका होता था. किशोर मायूस हो कर लौट जाते.
होली के दूसरे दिन वे अलसुबह बच्चों, बूढ़ों सभी को चुटकी भर गुलाल लगालगा कर होली की मुबारकबाद दे रहे होते. लोग सोचते रह जाते, ‘आखिर, इतनी सुबह मास्टरजी आ कहां से गए ’ सवा किलो मोतीचूर के लड्डुओं का लालच कम नहीं होता. उस वर्ष बजरंगी हलवाई ने जोरजोर से ऐलान किया, ‘‘होली के दिन जो भी मास्टर भोलाराम की सही खबर लाएगा, उसे सवा किलो मोतीचूर के लड्डू दिए जाएंगे.’’
यों सवा किलो लड्डुओं का नुकसान बजरंगी के दिल पर छुरी चला गया था, पर वह तकलीफ उस से बेहतर थी, जो मास्टर भोलाराम के न मिलने पर होती थी, क्योंकि लोगों का दूसरा निशाना वही होता था. कुछ तो लड्डुओं का लालच और कुछ मास्टर भोलाराम के गायब होने का रहस्य जानने की उत्सुकता, अत: लड़कों की टोली पीछे लग गई. 2 दिन पहले से ही उन पर नजर रखी जाने लगी. वैसे इस बात की ज्यादा आशंका थी कि मास्टर भोलाराम रात के अंधेरे में ही कहीं खिसकेंगे. अत: होली की पूर्व संध्या से ही लड़कों की टोली सख्ती से मास्टर भोलाराम की निगरानी में लग गई. रात के 12 बजे तक जब मास्टर भोलाराम कहीं नहीं गए तो किशोरों को विश्वास हो गया कि इस वर्ष मास्टर भोलाराम कहीं नहीं जाएंगे. वे सब दूसरे इंतजाम करने चले गए.
सुबह जब वे सब शोर मचाते, उछलकूद करते मास्टर भोलाराम के दरवाजे पर पहुंचे तो दंग रह गए. दरवाजे पर लटका बड़ा सा ताला उन सब की खिल्ली उड़ाता महसूस हो रहा था. सब एकदूसरे की तरफ देखते हुए जैसे पूछ रहे थे, ‘यह क्या हुआ ’ किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि एकाएक मास्टर भोलाराम कहां गायब हो गए. रात 12 बजे तक तो उन का ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं नजर आता था.कुछ देर विचारविमर्श करने के बाद सब मायूस हो कर लौटने लगे. तभी मास्टर भोलाराम के घर की बगल वाली गली में दूध वाले को जाते देख पवन चौंका. उस ने सब को रुकने का संकेत देते हुए कहा, ‘‘रुको दोस्तो, यह दूध वाला इस गली में कहां जा रहा है, जबकि यह गली तो आगे जा कर बंद हो जाती है इस गली में तो केवल मेरे और मास्टर भोलाराम के घरों के पिछले दरवाजे खुलते हैं ’’
‘‘अरे हां, बात तो तुम्हारी एकदम ठीक लगती है.’’
‘‘मेरे यहां पिछले दरवाजे से दूध लेने का रिवाज भी नहीं है, फिर ’’
‘‘फिर तो वह जरूर मास्टर भोलाराम के यहां गया होगा.’’ जब दूध वाला लौट कर आया तो उसे लड़कों ने घेर लिया, ‘‘ओ हो, भैयाजी. आज तो बड़ी मस्ती में लग रहे हो ’’
‘‘क्यों न होऊं, जब दोगुने दाम पर मेरा दूध बिक रहा है.’’
‘‘कौन मूर्ख दोगुने दाम दे रहा है ’’
‘‘अरे, वही मास्टर भोलारामजी. लेकिन तुम लोग किसी से कहना नहीं. इसी बात का भेद रखने के तो मुझे दोगुने दाम मिल रहे हैं.’’ लेकिन किशोरों ने इस से आगे कुछ सुना ही नहीं. वे शोर करते हुए एक तरफ चले गए. उन का शिकार जो पिंजरे में मौजूद था. अब सवाल था, पिंजरे का दरवाजा कैसे खुले आननफानन में ढेर सारी चाबियां इकट्ठी हो गईं. फिर चुपकेचुपके ताला खोलने का प्रयत्न शुरू हो गया. आखिर, ताला खुल ही गया. बिना आवाज किए लड़के अंदर प्रवेश करने लगे. मास्टर भोलाराम चौंके. बाहरी कमरे में कदमों की आहट हो रही थी. सहसा पवन ने चिल्ला कर कहा, ‘‘मास्टरजी, बाहर आ जाइए. आप की पोल खुल चुकी है.’’ भीतर से कोई जवाब नहीं मिला. तब सभी अंदर वाले कमरे में पहुंचे. कमरा खाली था. छोटे पिंकू की नजर पलंग पर रखी गुझियों से भरी प्लेट पर अटक गई. तभी आंगन से मोहन की आवाज आई, ‘‘लगता है, इस बार भी मास्टरजी गच्चा दे गए. पीछे का दरवाजा खुला है.’’
‘‘आओ, बाहर देखें. भाग कर कहां जाएंगे,’’ पंकज बोला. पूरी टोली शोर मचाती लौट पड़ी. पिंकू की नजर फिर गुझियों पर अटक गई. धीरेधीरे सब बाहरी कमरे की तरफ जा रहे थे. उस ने मौका देख कर प्लेट की तरफ हाथ बढ़ाया. तभी वह चीख पड़ा. चौंक कर सभी पलटे, ‘‘क्या हुआ, पिंकू ’’
‘‘चमत्कार… देखो, यह गुझियों की प्लेट अपनेआप हिल रही है.’’ तभी प्लेट बड़ी तेजी से हिली.
पवन ने लपक कर फर्श पर लटकी हुई पलंग की चादर उलट दी. मास्टर भोलाराम अपनी बड़ी तोंद के साथ फर्श और पलंग के बीच फंसे हुए थे. फिर तो होली का ऐसा हुड़दंग मचा और मास्टरजी की ऐसी रंगाई हुई कि पिछले 2 साल की कसर पूरी हो गई. अगले दिन पिंकू महाशय दोस्तों के साथ बजरंगी हलवाई की दुकान पर डेढ़ किलो मोतीचूर के लड्डुओं पर हाथ साफ कर रहे थे. बजरंगी हलवाई ने अपनी जान बच जाने की खुशी में दरियादिली दिखाते हुए ढाई सौ ग्राम लड्डू और कुरबान कर दिए थे. Social Story in Hindi