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Satirical Story In Hindi : पत्नी के 7 मूलभूत अधिकार

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शादी के मंडप पर वरवधू सात फेरे और सात वचन लेते हैं जिस का लब्बोलुआब यह रहता है कि वे एकदूसरे के प्रति ताउम्र निष्ठा रखेंगे, एकदूसरे का ध्यान रखेंगे, सात जन्मों तक साथसाथ रहेंगे. यह अलग बात है कि शादी के 7 माह बाद ही उन में खटपट होने लगती है. दिलचस्प यह है कि इस खटपट को कानून ने ध्यान में रखा है. यदि पहले 7 वर्षों में किसी ब्याहता की मौत किसी भी कारण से होती है तो उस की जांच इस एंगल के आधार पर अवश्य की जाती है कि कहीं उस की मौत का कारण पति या उस की ससुराल वाले तो नहीं हैं. कानून कित्ता दूरदर्शी होता है.

लोग केवल सात फेरों, सात वचनों व सात जन्मों के साथ की ही बात करते हैं, वे असल बात भूल जाते हैं कि पत्नी के पहले ही दिन से सात अधिकार और हो जाते हैं. मूलभूत अधिकार केवल संविधान ने न?ागरिकों को ही नहीं दिए हैं, हमारा समाज संविधान से भी ज्यादा दूरदर्शी व ताकतवर है. उस ने पत्नी को प्रथम दिवस ही 7 मूलभूत अधिकार दे दिए हैं. इन्हें ब्याह के बाद के डैरिवेटिव अधिकार भी कह सकते हैं. ये पत्नी होने पर पदेन उस के बटुए में आए अधिकार हैं और कुलमिला कर इन 7 अधिकारों का आउटकम यह होता है कि पति अधिक अधिकार में हो जाता है केवल पत्नी के.

पहला अधिकार :  पति अपना दिमाग आले में ताले में रख दें, अब हर छोटीबड़ी बात में दिमाग पत्नी का चलेगा. पति के दिमाग का अब कोई उपयोग नहीं है. हां, यह जड़ न हो जाए, इसलिए 6 माह में एक बार निकाल कर उस का उपयोग करने की अनुमति होगी और यह भी उस की हां में हां मिलाने में. वैसे, अब वह जड़ ही रहे तो ज्यादा बेहतर होगा. हां, आजकल डिजिटल लौकर आ रहे हैं तो पति अपने दिमाग को डिजिटाइज कर के यहां भी रखवा सकता है. मतलब यह है कि आप अपने को बुद्धिमान समझने की गलतफहमी दिमाग से निकाल दें भले ही आप उच्चकोटि के वैज्ञानिक हों या कोई आला अधिकारी. घर में तो अब एक ही महान बुद्धिमान रहेगा.

दूसरा अधिकार :  पत्नी के रिश्तेदार पति से ज्यादा अहम हैं. ब्याह के बाद पति के रिश्तेदारों से ज्यादा बड़े व अहम पत्नी के रिश्तेदार होते हैं, इस पर कोई अन्यथा वहम मन में न पाले. यह अधिकार पत्नी से कोई छीन नहीं सकता है. यदि पति का भाई या पिता घर आएं तो वह काम से छुट्टी न ले वरना उस की छुट्टी हो सकती है? लेकिन उस की छुट्टी यहां भी हो सकती है यदि उस ने यह घुट्टी न पी हो कि साले या उस के ससुरजी के आने पर उसे दफ्तर या अपने कामकाज को तुरंत तिलांजलि दे देनी है वरना उस की इज्जत का फालूदा बन उस की श्रद्धांजलि सभा हो जाएगी. यह पत्नी के मूलभूत अधिकार के तहत पति को निभाना ही है.

तीसरा अधिकार :  अब आप का बातबात पर अपनी खिंचाई करवाने का अधिकार रहेगा. बात कुछ भी हो सकती है, दफ्तर से आधे घंटे ही सही बिना काम के देर कैसे हुई, सब्जी, फलफूल लाना कैसे भूल गए, दवा कैसे भूल गए. वह बातबात में आप को गरिया भी सकती है और आप को इस का प्रतिकार नहीं करना है. यदि वह गलत है तो भी आप को चुप रहना है और यदि आप सही हैं तो भी आप को चुप ही रहना है. यही दांपत्य जीवन की सफलता का राज है.

चौथा अधिकार :  पत्नी के पांव पांव और पति के पैर, मूड तो पत्नी का ही माने रखेगा. पति को अब इश्क, जब पत्नी का मूड हो, तब करना होगा. उस के मूड का ध्यान रखना होगा. यदि वह बोलेगी कि बैठ जाओ तो बैठ जाना चाहिए, यदि वह बोले कि खड़े हो जाओ तो खड़े हो जाना होगा. मूडीज देशों की अर्थव्यवस्था का मूड बताती है लेकिन पत्नी का मूड इश्क के मूड के बारे में बताता है.

5वां अधिकार :  सालभर के अंदर आप का कोई ऐसा दोस्त नहीं रहेगा जिसे कि आप जिगरी दोस्त कह सकें. यदि दोस्ती करनी हो तो पत्नी से ही करनी होगी. वही सब से अच्छी दोस्त होगी. बचपन की दोस्ती भूल जाएं, जवानी की भूल जाए, सब भूल जाएं. दोस्तों को एकएक कर के दूध से मक्खी की तरह निकाल दें, इसी में भलाई है. पत्नी तशरीफ लाई हैं तो दोस्त अब जीवन की छांछ हैं और पत्नी मलाई.

छठा अधिकार :  अब आप गलतियों के पिटारे रहोगे. बातबात में आप की गलतियां ढूंढ़ी जाएंगी और आप को सिर झुका कर सब चुपचाप सहन करना है, जैसे कि गधा सदियों से करता आया है. आप का काम सिर नीचा करना है और उस का अधिकार है कि सिर ऊंचा कर के आप की नुक्ताचीनी कर आप को गधे से भी नीचे ले आए.

7वां अधिकार : अपनी हौबी को गोली मार दें. यदि आप की कोई ऐसी हौबी है जोकि पत्नी की नहीं है तो आप को पत्नी से पहले कंसल्ट करना पड़ेगा. यदि वह आज्ञा देगी तभी आप उसे जारी रख पाएंगे वरना तो घरगृहस्थी के कारण उसे आप को बायबाय करना होगा, चाहे यह लेख लिखना हो, खेल हो या कुछ भी हो यह उस की हौबी होगी कि वह आप की हौबी के लिए अनुमति देती है कि नहीं. जब सिद्धू राजनीति के लिए कौमेडी शो छोड़ सकता है तो आप खुद की पत्नीजी के लिए अपनी एक सड़ी सी हौबी के लिए काहे को अड़ी का विचार मन में रखते हो, हबी जी.

अब आप ने पत्नी के मूल अधिकार तो सुन ही लिए, तो मैं यह कह सकता हूं कि ये 7 अधिकार, वैसे, आप की कुलमिला कर भलाई के लिए ही हैं. सो, भरसक इन अधिकारों के एबसोल्यूट उपयोग में पत्नी की मदद करें, आप की जिंदगी एक अदद जिंदगी बन कर रह जाएगी. वैसे मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि आप पूरा कोऔपरेट कर रहे हैं तभी तो साथ बने हुए हैं. और आप दफ्तर में भी टोटल सबऔर्डिनेशन के ही कारण अच्छे मातहत माने जाते हैं तभी तो समय पर पदोन्नति मिलती है तो पत्नी का भी मातहत ही तो बनने की बात गंगू कर रहा है. इसी में तो दांपत्य जीवन के नित सुकून, सुख, आनंद रूपी पदोन्नति के अवसर छिपे हैं.

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Satirical Story In Hindi : नैटेरिया हुआ…

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अंतर्राष्ट्रीय सर्वे में एक गंभीर बीमारी का पता चला, जो अब विश्वव्यापी है. जल्दी ही अगर इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए तो हालात बद से बदतर हो सकते हैं.

इस के वर्गीकरण, लक्षण, कारण व बचाव पर विस्तृत चर्चा के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं…

– औन्ली मेल नो मिलाप

• लक्षण :  इस रोग से ग्रस्त रोगी को न तो मेल पसंद होता है और न ही फीमेल. उन्हें सिर्फ ईमेल पसंद होता है. बातबात पर ईमेल करते हैं, चाहे उस की आवश्यकता हो या न हो.

• कारण :  इस रोग के रोगी मेलमिलाप में बहुत यकीन रखते हैं उन की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है, ईमेल करना. इन का मानना है कि ईमेल नहीं होता फेल.

• बचाव :  अभी तक आई रिपोर्टों के अनुसार, ये रोग उतना गंभीर नहीं होता है जितना यह महसूस होता है. इस कारण अभी तक इस के लिए कोई वैक्सीन या दवा ईजाद नहीं हुई है. जरा सी सावधानी से ही इस रोग से बचा जा सकता है.

– सैल्फीमेनिया

• लक्षण :  इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति किसी भी स्थान पर अजीबअजीब मुखमुद्राओं और भावभंगिमाओं में पाया जा सकता है. कभी बाल खोल कर, कभी सन ग्लासैस चढ़ा कर, कभी किसी टीले या पेड़ पर चढ़ कर, कभी दरवाजे पर लटक कर तो कभी खिड़की से झांक कर रोगी को सैल्फी लेते हुए पाया जा सकता है.

• कारण :  इस रोग से ग्रस्त रोगी को स्वयं को भिन्नभिन्न मुद्राओं व भावभंगिमाओं में देखना और दिखाना बहुत पसंद आता है. इस पर जमाने को दिखाना है की कहावत चरितार्थ होती है.

• बचाव :  इस रोग से बचाव के लिए अभी शोध चल रहा है, निकट भविष्य में वैक्सीन और दवाएं बनने की संभावनाएं हैं.

– गेम में गुम

• लक्षण :   इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति कभी भी खाली नहीं दिखाई पड़ते हैं. हर वक्त इन की उंगलियां मोबाइल पर नाचती दिखती हैं. गेम जीतने पर इन के चेहरे पर किला फतह करने जैसे भाव साफ दिखाई देते हैं. इन्हें ‘आज मैं आगे, जमाना है पीछे…’ वाले भाव से हर वक्त लबरेज देखा जा सकता है.

• कारण :  इन के पास समय बहुतायत में होता है और करने के लिए बहुतकुछ नहीं होता है. इस कारण ‘डू नथिंग बट लुक बिजी’ नामक ग्रंथि से ये ग्रस्त हो जाते हैं. यही वजह है कि यह रोग इन्हें आसानी से अपनी चपेट में ले लेता है.

• बचाव :  इस रोग से बचाव के लिए जो वैक्सीन बनाई गई है, उस का नाम है बिजी ओ सिन. इस वैक्सीन के प्रभाव से यह रोग धीरेधीरे कम हो कर समाप्त हो जाता है.

– एसएमएस का ओआरएस

• लक्षण :  घर में, औफिस में, रास्ते में, बस में, पार्टी में या एकांत में मोबाइल पर उंगलियां चलाते हुए देख सकते हैं इस रोग से ग्रस्त व्यक्तियों को. इन का स्लोगन है ‘उंगली पर है सारा जमाना.’

• कारण :  अपनी छोटीछोटी चीजों के लिए फोन पर बातें करना इन्हें पसंद नहीं होता और मैसेज के सहारे वे अपना हालेदिल बयान करते हैं.

• बचाव :  ‘टौकोसिन’ नामक वैक्सीन इस रोग के लिए  असरकारी व प्रभावकारी साबित हो सकती है.

– चैटिंग चैंप

• लक्षण :  इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति का किसी भी कार्य में मन नहीं लगता. वह बाहरी दुनिया व समाज से कटाकटा रहता है. इस के लिए चैटिंग बिना ‘जग सूनासूना लागे…’ वाली स्थिति रहती है.

• कारण :  इस रोग के रोगी थोड़े शर्मीले होते हैं जो बोल कर नहीं, बल्कि अपने मनोभावों को चैटिंग के जरिए ही बयान कर सकते हैं, जो धीरेधीरे लत बन जाती है और यह लत कब आदत बन कर इस महारोग में तबदील हो जाती है, इस का पता ही नहीं लग पाता है.

• बचाव :  इस रोग से बचाव के लिए भी ‘टौकोसिन’ नामक वैक्सीन असरकारी साबित हो सकती है.

हमारे कई शोधकर्ता अभी भी इस दिशा में नएनए शोध कर रहे हैं जिन का खुलासा निकट भविष्य में होने की पूरीपूरी संभावनाएं हैं. जय इंटरनैट, जय इंटरनैट…

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Satirical Story In Hindi : ग्रहों का बौस – ग्रहों को खुश करने के चक्कर में उलझे जोशीजी

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लोगबाग जमीनी चिंता से नहीं, बल्कि आसमानी चिंता से ज्यादा त्रस्त रहते हैं. उन्हें हरदम डर लगा रहता है कि आसमान में ठिया जमाए ग्रह कहीं उन से नाराज न हो जाएं. ऊपर बैठे 9 में से न जाने कब और कौन सा ग्रह उन से नाराज हो जाए और अच्छीभली जिंदगी में मुसीबत खड़ी कर दे. ग्रहों की नाराजगी बहुत महंगी पड़ती है. वे चाहें तो अच्छे पढ़ाकू विद्यार्थी को परीक्षा में फेल कर दें, अच्छीभली नौकरी छुड़वा दें, धंधे में नुकसान करवा दें या फिर दिवालिया ही बना दें. ज्यादा ही नाराज हो गए तो फिर बिस्तर से चिपका दें या हमेशा के लिए ही सुला दें.

इसलिए वे सालभर ग्रहों को शांत करने के लिए तरहतरह के जतन करतेफिरते हैं. वे धरती की परवा नहीं करते, जिस पर उन का शरीर टिका हुआ है और जिस पर वे दिनरात अत्याचार करते रहते हैं. आखिर ज्योतिषियों ने धरती का डर जो नहीं बताया है. उन की निगाह में ऊपर बैठे ग्रह ही सब के बौस हैं.

एक हैं जोशी. ये बताते हैं कि उन का असली सरनेम कभी ज्योतिषी था. दूसरों की जन्मकुंडली पढ़ना उन का खानदानी धंधा था. पता नहीं वे खुद की कुंडली नहीं समझ पाए या दूसरों से नहीं

पढ़ा पाए, इसलिए समय के साथ घिसतेघिसते जोशी हो गए. ये जोशीजी हरदम शोकमुद्रा लादे फिरते हैं क्योंकि आसमान में बैठा कोई न कोई ग्रह इन पर नाराज रहता है. इन दुखीराम पर मंगल कई बार नाराज हो चुका है.

बचपन के खेल का वाक्य ‘एक का पीछा साढ़े सात दाम’ इन के मंगल पर कभी लागू नहीं होता. इन का अंदाजा भी इतना सटीक है कि जरा सी छींक आई तो समझ जाते हैं कि शुक्र ग्रह फेवर में नहीं है और लग जाते हैं शुक्र ग्रह को खुश करने में. कभी उपवास, कभी अंगूठी तो कभी पूजापाठ. इन के सामने शनि का नाम भी ले लें तो मारे डर के पीले पड़ जाते हैं. इसलिए भूल कर भी शनिवार नहीं बोलते. कंप्यूटर में फीड किए शब्द की तरह या तो साफ सैटरडे कहते हैं या फिर रविवार के पहले का, शुक्रवार के बाद का दिन.

वैसे भी, शनि सब से खूंखार ग्रह माना जाता है. दूसरे ग्रह तो ट्वैंटीट्वैंटी मैच खेल कर अगला शिकार ढूंढ़ने में लग जाते हैं, लेकिन शनि महाराज टैस्ट क्रिकेट की तरह लंबे समय तक जमे रहते हैं. साढ़े 7 साल. नतीजा निकलेगा ही, इस बात की गारंटी नहीं है. इसलिए लोग सालभर डोरटूडोर तेल मांगने वाले शनि महाराज को तेल की किस्त बांध देते हैं.

जोशीजी का मानना है कि जब भी उन की तबीयत गड़बड़ होती है तो वे समझ जाते हैं कि शुक्र नाराज हैं. हाथपैर टूटे, तो यह शनि के कोप का नतीजा है. दूसरी नौकरी के लिए इंटरव्यू में फेल हो गए, तो यह गुरू का गुस्सा है. अनचाहा खर्च हुआ यानी बुध ने जेब काट ली. किसी से झगड़ा हुआ है तो राहु को ढंग से नहीं खुश किया होगा.

एक बार उन पर सूर्य की कुदृष्टि पड़ गई. वैसे सूर्य पर जब केतु नाराज होता है तो वह मुंह छिपा लेता है. समझदार लोग इसे सूर्यग्रहण कहते हैं, लेकिन वही सूर्य जोशी पर रुष्ट हो गया. उन की आंखें लाल, सिरदर्द, बदन गरम, हरदम प्यास. दौड़ेदौड़े पंडित के पास गए. पंडितों के पास हर मर्ज की दवा होती है, जो डाक्टरों के पास भी नहीं होती. वे केतु को प्रसन्न करने का इलाज नहीं बताते, बल्कि सूर्य को मनाने का तरीका जानते हैं.

डाक्टर दवा खाने की सलाह देते हैं लेकिन पंडित तो खिलाने को कहते हैं यानी उन्हें स्वयं को खिलाने को. उन के नुस्खे में पीडि़त के लिए हवन, पाठ और उपवास होता है. वे तो चौकी पर बैठ कर सूर्य से पीडि़त की सिफारिश करते हैं. तो जोशीजी को पंडित ने दवा की पर्ची लिख दी और डाक्टरों के अनुसार तयशुदा दुकानदार से ही खरीदने को कहा. पूरे एक सप्ताह तक हवन होता रहा. इसलिए दफ्तर की छुट्टी. चूंकि सूर्य का प्रकोप था, इसलिए रविवार को उपवास करने को कहा. बेचारे जोशीजी.

एक रविवार ही तो मिलता है, जब भरपेट माल उड़ाने को मिलता है, लेकिन सूर्य देवता को प्रसन्न करने में परिवार के दूसरे सदस्यों को माल उड़ाते देख वे मन मसोस कर रह जाते. उन्हें समझाने की जरूरत नहीं है भले ही आप के अच्छे मित्र ही क्यों न हों. वे आप पर उखड़ पड़ेंगे. यदि वे किसी समझदार की बात मान लें तो सूर्यदेव उन्हें कभी भी तंग नहीं करेंगे. बस, छाता तान कर बाहर निकलें. यदि आप फिर भी समझाएं तो सुनने को मिलेगा, ‘‘तुम्हें जरूर विदेशों से पैसा मिलता है. तुम जैसे लोगों के कारण ही भारत की दुर्दशा हो रही है.’’ और वे अज्ञात भूतकाल में गुम हो जाएंगे जब देश में दूध की नदियां बहती थीं, सोने के पहाड़ हुआ करते थे, चंदन के जंगल हुआ करते थे.

उन की राय में छाते से सूर्य को खुश करने की सलाह देने वालों के कारण ही नदियां गटर बन गई हैं और पहाड़ों के सिर कट गए. जंगलों की हजामत हो रही है. ‘‘देखना 9 के 9 ग्रह मिल कर जब तुम पर हमला बोलेंगे न, तब पंडितों के यहां चक्कर लगालगा कर जूते घिस जाएंगे,’’ और वे दुर्वासा बन कर कोई श्राप देंगे.

वे ये सब खटकर्म इसलिए करतेफिरते हैं ताकि सारे ग्रह एकमत से खुश हो कर उन्हें नौकरी में प्रमोशन दिलवा दें, लेकिन ऐसा होता नहीं. हर साल कोई और ही प्रमोशन ले जाता. उन का जूनियर तक उन से आगे बढ़ गया. उन्हें मिले भी तो कैसे? जिन ग्रहों को वे पूजते हैं, वे ही उन की राह के रोड़े बन जाते हैं. जगराते के कारण नींद पूरी नहीं हो पाती, इसलिए दफ्तर में झपकियां लेते रहते. उपवास की कमजोरी की वजह से औफिस का काम ठीक तरह से नहीं कर पाते. जबतब बीमार पड़ते और छुट्टी लेते, सहकर्मियों पर झल्लाते और बौस की डांट खाते. जाहिर है उन्हें प्रमोशन नहीं मिलता.

उन की राय में कभी शुक्र नाराज तो कभी गुरू. मंगल भी पीछा नहीं छोड़ता. उन पर यदि राहु खफा हुआ तो उन के लिए पूर्णिमा को भी अमावस्या होती है. इस बार प्रमोशन लैटर आए. बौस ने एकएक कर सब को केबिन में बुलाया और लैटर दिए. जब बौस के केबिन में जाने की बारी आई तो पहले जोशीजी ने तमाम अंगूठियों और तावीजों को चूमा, फिर सभी ग्रहों को याद किया और अपनी ओर उन का ध्यान खींचा, लेकिन जो होना था वही हुआ.

सालाना परंपरा के अनुसार केबिन से मुंह लटकाए बाहर निकले यानी इस बार भी ग्रहों ने साथ नहीं दिया. उस दिन बुधवार था. उन्होंने कारण ताड़ लिया और कहा, ‘‘अब की बुध ने साथ नहीं दिया. प्रमोशन के लैटर तो कल ही आए थे. दिए आज हैं, इसलिए सब गड़बड़ हो गया. कल देते तो प्रमोशन पक्का था. लगता है मेरी पूजा में ही कुछ कमी रह गई होगी वरना उसे तो मुझ से खुश होना था. अब दूसरे पंडित के पास जाऊंगा और दूनी भक्ति से बुध की पूजा किया करूंगा.’’

यदि कोई उन्हें समझाता कि अगर उन्हें प्रमोशन चाहिए तो वे इन ऊपरी ग्रहों की खुशामद करने के बजाय सब ग्रहों के बौस को खुश रखें. यह बौस आसमान में नहीं रहता, बल्कि धरती पर रहता है और हम इसे देख सकते हैं, छू सकते हैं, इस से बात कर सकते हैं. लेकिन वे सलाह देने वाले को इस तरह देखते मानो वह पगला गया हो. ग्रहों का कोई बौस कैसे हो सकता है? उसे खुश कैसे किया जा सकता है? ऐसा होता भी है कभी?

दफ्तर का बौस. जी हां, वही है सब ग्रहों का बौस. जोशीजी उसे खुश रखें तो उन के सारे दुख दूर हो जाएं. एक तो उसे अपने काम से खुश रखें यानी समय पर दफ्तर आएं और देर से जाएं. काम ढंग से और समय पर करें. ग्रहों को बारबार याद करने के बजाय बौस को हर सुबह आने पर गुडमौर्निंग कहें. जाने के पहले गुड डे कहें. उन का जन्मदिन याद रखें और दफ्तर में ही केक मंगवाएं. उन के विवाह की सालगिरह के दिन उन्हें बधाई दें. दफ्तर की पार्टी में उन की पसंद के गाने गाएं. चुटकुले सुना कर उन्हें हंसाएं. उन के ड्रैस सैंस की तारीफ करें. अपने लायक काम के बारे में पूछें. कभी बाहर जाएं तो उन के लिए मिठाई लाया करें. देखो, वह खुश होते हैं या नहीं, प्रमोशन आसमान से नहीं, धरती से मिलेगा. कोई एक तरीका आजमाएं. अगली बार बौस के केबिन से खुशीखुशी लौटेंगे.

बहरहाल, बहुत दिन हुए जोशीजी नजर नहीं आए. इसलिए कोई नहीं जानता कि वे अब किस बौस को खुश करने में लगे हैं, ऊपर वाले या दफ्तर वाले.

Satirical Story In Hindi

Romantic Story in Hindi : दो चुटकी सिंदूर – क्या बैजू को अपना पाई सविता ?

Romantic Story in Hindi :

‘‘ऐ सविता, तेरा चक्कर चल रहा है न अमित के साथ?’’ कुहनी मारते हुए सविता की सहेली नीतू ने पूछा.

सविता मुसकराते हुए बोली, ‘‘हां, सही है. और एक बात बताऊं… हम जल्दी ही शादी भी करने वाले हैं.’’

‘‘अमित से शादी कर के तो तू महलों की रानी बन जाएगी. अच्छा, वह सब छोड़. देख उधर, तेरा आशिक बैजू कैसे तुझे हसरत भरी नजरों से देख रहा है.’’

नीतू ने तो मजाक किया था, क्योंकि वह जानती थी कि बैजू को देखना तो क्या, सविता उस का नाम भी सुनना तक पसंद नहीं करती.

सविता चिढ़ उठी. वह कहने लगी, ‘‘तू जानती है कि बैजू मुझे जरा भी नहीं भाता. फिर भी तू क्यों मुझे उस के साथ जोड़ती रहती है?’’

‘‘अरे पगली, मैं तो मजाक कर रही थी. और तू है कि… अच्छा, अब से नहीं करूंगी… बस,’’ अपने दोनों कान पकड़ते हुए नीतू बोली.

‘‘पक्का न…’’ अपनी आंखें तरेरते हुए सविता बोली, ‘‘कहां मेरा अमित, इतना पैसे वाला और हैंडसम. और कहां यह निठल्ला बैजू.

‘‘सच कहती हूं नीतू, इसे देख कर मुझे घिन आती है. विमला चाची खटमर कर कमाती रहती हैं और यह कमकोढ़ी बैजू गांव के चौराहे पर बैठ कर पानखैनी चबाता रहता है. बोझ है यह धरती पर.’’

‘‘चुप… चुप… देख, विमला मौसी इधर ही आ रही हैं. अगर उन के कान में अपने बेटे के खिलाफ एक भी बात पड़ गई न, तो समझ ले हमारी खैर नहीं,’’ नीतू बोली.

सविता बोली, ‘‘पता है मुझे. यही वजह है कि यह बैजू निठल्ला रह गया.’’

मला की जान अपने बेटे बैजू में ही बसती थी. दोनों मांबेटा ही एकदूसरे का सहारा थे.

बैजू जब 2 साल का था, तभी उस के पिता चल बसे थे. सिलाईकढ़ाई का काम कर के किसी तरह विमला ने अपने बेटे को पालपोस कर बड़ा किया था.

विमला के लाड़प्यार में बैजू इतना आलसी और निकम्मा बनता जा रहा था कि न तो उस का पढ़ाईलिखाई में मन लगता था और न ही किसी काम में. बस, गांव के लड़कों के साथ बैठ कर हंसीमजाक करने में ही उसे मजा आता था.

लेकिन बैजू अपनी मां से प्यार बहुत करता था और यही विमला के लिए काफी था. गांव के लोग बैजू के बारे में कुछ न कुछ बोल ही देते थे, जिसे सुन कर विमला आगबबूला हो जाती थी.

एक दिन विमला की एक पड़ोसन ने सिर्फ इतना ही कहा था, ‘‘अब इस उम्र में अपनी देह कितना खटाएगी विमला, बेटे को बोल कि कुछ कमाएधमाए. कल को उस की शादी होगी, फिर बच्चे भी होंगे, तो क्या जिंदगीभर तू ही उस के परिवार को संभालती रहेगी?

‘‘यह तो सोच कि अगर तेरा बेटा कुछ कमाएगाधमाएगा नहीं, तो कौन देगा उसे अपनी बेटी?’’

विमला कहने लगी, ‘‘मैं हूं अभी अपने बेटे के लिए, तुम्हें ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है… समझी. बड़ी आई मेरे बेटे के बारे में सोचने वाली. देखना, इतनी सुंदर बहू लाऊंगी उस के लिए कि तुम सब जल कर खाक हो जाओगे.’’

सविता के पिता रामकृपाल डाकिया थे. घरघर जा कर चिट्ठियां बांटना उन का काम था, पर वे अपनी दोनों बेटियों को पढ़ालिखा कर काबिल बनाना चाहते थे. उन की दोनों बेटियां थीं भी पढ़ने में होशियार, लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि उन की बड़ी बेटी सविता अमित नाम के एक लड़के से प्यार करती है और वह उस से शादी के सपने भी देखने लगी है.

यह सच था कि सविता अमित से प्यार करती थी, पर अमित उस से नहीं, बल्कि उस के जिस्म से प्यार करता था. वह अकसर यह कह कर सविता के साथ जिस्मानी संबंध बनाने की जिद करता कि जल्द ही वह अपने मांबाप से दोनों की शादी की बात करेगा.

नादान सविता ने उस की बातों में आ कर अपना तन उसे सौंप दिया. जवानी के जोश में आ कर दोनों ने यह नहीं सोचा कि इस का नतीजा कितना बुरा हो सकता है और हुआ भी, जब सविता को पता चला कि वह अमित के बच्चे की मां बनने वाली है.

जब सविता ने यह बात अमित को बताई और शादी करने को कहा, तो वह कहने लगा, ‘‘क्या मैं तुम्हें बेवकूफ दिखता हूं, जो चली आई यह बताने कि तुम्हारे पेट में मेरा बच्चा है? अरे, जब तुम मेरे साथ सो सकती हो, तो न जाने और कितनों के साथ सोती होगी. यह उन्हीं में से एक का बच्चा होगा.’’

सविता के पेट से होने का घर में पता लगते ही कुहराम मच गया. अपनी इज्जत और सविता के भविष्य की खातिर उसे शहर ले जा कर घर वालों ने बच्चा गिरवा दिया और जल्द से जल्द कोई लड़का देख कर उस की शादी करने का विचार कर लिया.

एक अच्छा लड़का मिलते ही घर वालों ने सविता की शादी तय कर दी. लेकिन ऐसी बातें कहीं छिपती हैं भला.

अभी शादी के फेरे होने बाकी थे कि लड़के के पिता ने ऊंची आवाज में कहा, ‘‘बंद करो… अब नहीं होगी यह शादी.’’ शादी में आए मेहमान और गांव के लोग हैरान रह गए.

जब सारी बात का खुलासा हुआ, तो सारे गांव वाले सविता पर थूथू कर के वहां से चले गए.

सविता की मां तो गश खा कर गिर पड़ी थीं. रामकृपाल अपना सिर पीटते हुए कहने लगे, ‘‘अब क्या होगा… क्या मुंह दिखाएंगे हम गांव वालों को? कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा इस लड़की ने हमें. बताओ, अब कौन हाथ थामेगा इस का?’’

‘‘मैं थामूंगा सविता का हाथ,’’ अचानक किसी के मुंह से यह सुन कर रामकृपाल ने अचकचा कर पीछे मुड़ कर देखा, तो बैजू अपनी मां के साथ खड़ा था.

‘‘बैजू… तुम?’’ रामकृपाल ने बड़ी हैरानी से पूछा.

विमला कहने लगी, ‘‘हां भाई साहब, आप ने सही सुना है. मैं आप की बेटी को अपने घर की बहू बनाना चाहती हूं और वह इसलिए कि रा बैजू आप की बेटी से प्यार करता है.’’

रामकृपाल और उन की पत्नी को चुप और सहमा हुआ देख कर विमला आगे कहने लगी, ‘‘न… न आप गांव वालों की चिंता न करो, क्योंकि मेरे लिए मेरे बेटे की खुशी

सब से ऊपर है, बाकी लोग क्या सोचेंगे, क्या कहेंगे, उस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है.’’

अब अंधे को क्या चाहिए दो आंखें ही न. उसी मंडप में सविता और बैजू का ब्याह हो गया.

जिस बैजू को देख कर सविता को उबकाई आती थी, उसे देखना तो क्या वह उस का नाम तक सुनना पसंद नहीं करती थी, आज वही बैजू उस की मांग का सिंदूर बन गया. सविता को तो अपनी सुहागरात एक काली रात की तरह दिख रही थी.

‘क्या मुंह दिखाऊंगी मैं अपनी सखियों को, क्या कहूंगी कि जिस बैजू को देखना तक गंवारा नहीं था मुझे, वही आज मेरा पति बन गया. नहीं… नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, इतनी बड़ी नाइंसाफी मेरे साथ नहीं हो सकती,’ सोच कर ही वह बेचैन हो गई.

तभी किसी के आने की आहट से वह उठ खड़ी हुई. अपने सामने जब उस ने बैजू को खड़ा देखा, तो उस का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

बैजू के मुंह पर अपने हाथ की चूडि़यां निकालनिकाल कर फेंकते हुए सविता कहने लगी, ‘‘तुम ने मेरी मजबूरी का फायदा उठाया है. तुम्हें क्या लगता है कि दो चुटकी सिंदूर मेरी मांग में भर देने से तुम मेरे पति बन गए? नहीं, कोई नहीं हो तुम मेरे. नहीं रहूंगी एक पल भी इस घर में तुम्हारे साथ मैं… समझ लो.’’

बैजू चुपचाप सब सुनता रहा. एक तकिया ले कर उसी कमरे के एक कोने में जा कर सो गया.

सविता ने मन ही मन फैसला किया कि सुबह होते ही वह अपने घर चली जाएगी. तभी उसे अपने मातापिता की कही बातें याद आने लगीं, ‘अगर आज बैजू न होता, तो शायद हम मर जाते, क्योंकि तुम ने तो हमें जीने लायक छोड़ा ही नहीं था. हो सके, तो अब हमें बख्श देना बेटी, क्योंकि अभी तुम्हारी छोटी बहन की भी शादी करनी है हमें…’

कहां ठिकाना था अब उस का इस घर के सिवा? कहां जाएगी वह? बस, यह सोच कर सविता ने अपने बढ़ते कदम रोक लिए.

सविता इस घर में पलपल मर रही थी. उसे अपनी ही जिंदगी नरक लगने लगी थी, लेकिन इस सब की जिम्मेदार भी तो वही थी.

कभीकभी सविता को लगता कि बैजू की पत्नी बन कर रहने से तो अच्छा है कि कहीं नदीनाले में डूब कर मर जाए, पर मरना भी तो इतना आसान नहीं होता है. मांबाप, नातेरिश्तेदार यहां तक कि सखीसहेलियां भी छूट गईं उस की. या यों कहें कि जानबूझ कर सब ने उस से नाता तोड़ लिया. बस, जिंदगी कट रही थी उस की.

सविता को उदास और सहमा हुआ देख कर हंसनेमुसकराने वाला बैजू भी उदास हो जाता था. वह सविता को खुश रखना चाहता था, पर उसे देखते ही वह ऐसे चिल्लाने लगती थी, जैसे कोई भूत देख लिया हो. इस घर में रह कर न तो वह एक बहू का फर्ज निभा रही थी और न ही पत्नी धर्म. उस ने शादी के दूसरे दिन ही अपनी मांग का सिंदूर पोंछ लिया था.

शादी हुए कई महीने बीत चुके थे, पर इतने महीनों में न तो सविता के मातापिता ने उस की कोई खैरखबर ली और न ही कभी उस से मिलने आए. क्याक्या सोच रखा था सविता ने अपने भविष्य को ले कर, पर पलभर में सब चकनाचूर हो गया था.

‘शादी के इतने महीनों के बाद भी भले ही सविता ने प्यार से मेरी तरफ एक बार भी न देखा हो, पर पत्नी तो वह मेरी ही है न. और यही बात मेरे लिए काफी है,’ यही सोचसोच कर बैजू खुश हो उठता था.

एक दिन न तो विमला घर पर थी और न ही बैजू. तभी अमित वहां आ धमका. उसे यों अचानक अपने घर आया देख सविता हैरान रह गई. वह गुस्से से तमतमाते हुए बोली, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहां आने की?’’

अमित कहने लगा, ‘‘अब इतना भी क्या गुस्सा? मैं तो यह देखने आया था कि तुम बैजू के साथ कितनी खुश हो? वैसे, तुम मुझे शाबाशी दे सकती हो. अरे, ऐसे क्या देख रही हो? सच ही तो कह रहा हूं कि आज मेरी वजह से ही तुम यहां इस घर में हो.’’

सविता हैरानी से बोली, ‘‘तुम्हारी वजह से… क्या मतलब?’’

‘‘अरे, मैं ने ही तो लड़के वालों को हमारे संबंधों के बारे में बताया था और यह भी कि तुम मेरे बच्चे की मां भी बनने वाली हो. सही नहीं किया क्या मैं ने?’’ अमित बोला.

सविता यह सुन कर हैरान रह गई. वह बोली, ‘‘तुम ने ऐसा क्यों किया? बोलो न? जानते हो, सिर्फ तुम्हारी वजह से आज मेरी जिंदगी नरक बन चुकी है. क्या बिगाड़ा था मैं ने तुम्हारा?

‘‘बड़ा याद आता है मुझे तेरा यह गोरा बदन,’’ सविता के बदन पर अपना हाथ फेरते हुए अमित कहने लगा, तो वह दूर हट गई.

अमित बोला, ‘‘सुनो, हमारे बीच जैसा पहले चल रहा था, चलने दो.’’

‘‘मतलब,’’ सविता ने पूछा.

‘‘हमारा जिस्मानी संबंध और क्या. मैं जानता हूं कि तुम मुझ से नाराज हो, पर मैं हर लड़की से शादी तो नहीं कर सकता न?’’ अमित बड़ी बेशर्मी से बोला.

‘‘मतलब, तुम्हारा संबंध कइयों के साथ रह चुका है?’’

‘‘छोड़ो वे सब पुरानी बातें. चलो, फिर से हम जिंदगी के मजे लेते हैं. वैसे भी अब तो तुम्हारी शादी हो चुकी है, इसलिए किसी को हम पर शक भी नहीं होगा,’’ कहता हुआ हद पार कर रहा था अमित.

सविता ने अमित के गाल पर एक जोर का तमाचा दे मारा और कहने लगी, ‘‘क्या तुम ने मुझे धंधे वाली समझ रखा है. माना कि मुझ से गलती हो गई तुम्हें पहचानने में, पर मैं ने तुम से प्यार किया था और तुम ने क्या किया?

‘‘अरे, तुम से अच्छा तो बैजू निकला, क्योंकि उस ने मुझे और मेरे परिवार को दुनिया की रुसवाइयों से बचाया. जाओ यहां से, निकल जाओ मेरे घर से, नहीं तो मैं पुलिस को बुलाती हूं,’’ कह कर सविता घर से बाहर जाने लगी कि तभी अमित ने उस का हाथ अपनी तरफ जोर से खींचा.

‘‘तेरी यह मजाल कि तू मुझ पर हाथ उठाए. पुलिस को बुलाएगी… अभी बताता हूं,’’ कह कर उस ने सविता को जमीन पर पटक दिया और खुद उस के ऊपर चढ़ गया.

खुद को लाचार पा कर सविता डर गई. उस ने अमित की पकड़ से खुद को छुड़ाने की पूरी कोशिश की, पर हार गई. मिन्नतें करते हुए वह कहने लगी, ‘‘मुझे छोड़ दो. ऐसा मत करो…’’

पर अमित तो अब हैवानियत पर उतारू हो चुका था. तभी अपनी पीठ पर भारीभरकम मुक्का पड़ने से वह चौंक उठा. पलट कर देखा, तो सामने बैजू खड़ा था.

‘‘तू…’’ बैजू बोला.

अमित हंसते हुए कहने लगा, ‘‘नामर्द कहीं के… चल हट.’’

इतना कह कर वह फिर सविता की तरफ लपका. इस बार बैजू ने उस के

मुंह पर एक ऐसा जोर का मुक्का मारा कि उस का होंठ फट गया और खून निकल आया.

अपने बहते खून को देख अमित तमतमा गया और बोला, ‘‘तेरी इतनी मजाल कि तू मुझे मारे,’’ कह कर उस ने अपनी पिस्तौल निकाल ली और तान दी सविता पर.

अमित बोला, ‘‘आज तो इस के साथ मैं ही अपनी रातें रंगीन करूंगा.’’

पिस्तौल देख कर सविता की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई.

बैजू भी दंग रह गया. वह कुछ देर रुका, फिर फुरती से यह कह कह अमित की तरफ लपका, ‘‘तेरी इतनी हिम्मत कि तू मेरी पत्नी पर गोली चलाए…’’

पर तब तक तो गोली पिस्तौल से निकल चुकी थी, जो बैजू के पेट में जा लगी.

बैजू के घर लड़ाईझगड़ा होते देख कर शायद किसी ने पुलिस को बुला लिया था. अमित वहां से भागता, उस से पहले ही वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया.

खून से लथपथ बैजू को तुरंत गांव वालों ने अस्पताल पहुंचाया. घंटों आपरेशन चला.

डाक्टर ने कहा, ‘‘गोली तो निकाल दी गई है, लेकिन जब तक मरीज को होश नहीं आ जाता, कुछ कहा नहीं जा सकता.’’

विमला का रोरो कर बुरा हाल था. गांव की औरतें उसे हिम्मत दे रही थीं, पर वे यह भी बोलने से नहीं चूक रही थीं कि बैजू की इस हालत की जिम्मेदार सविता है.

‘सच ही तो कह रहे हैं सब. बैजू की इस हालत की जिम्मेदार सिर्फ मैं ही हूं. जिस बैजू से मैं हमेशा नफरत करती रही, आज उसी ने अपनी जान पर खेल कर मेरी जान बचाई,’ अपने मन में ही बातें कर रही थी सविता.

तभी नर्स ने आ कर बताया कि बैजू को होश आ गया है. बैजू के पास जाते देख विमला ने सविता का हाथ पकड़ लिया और कहने लगी, ‘‘नहीं, तुम अंदर नहीं जाओगी. आज तुम्हारी वजह से ही मेरा बेटा यहां पड़ा है. तू मेरे बेटे के लिए काला साया है. गलती हो गई मुझ से, जो मैं ने तुझे अपने बेटे के लिए चुना…’’

‘‘आप सविता हैं न?’’ तभी नर्स ने आ कर पूछा.

डबडबाई आंखों से वह बोली, ‘‘जी, मैं ही हूं.’’

‘‘अंदर जाइए, मरीज आप को पूछ रहे हैं.’’

नर्स के कहने से सविता चली तो गई, पर सास विमला के डर से वह दूर खड़ी बैजू को देखने लगी. उस की ऐसी हालत देख वह रो पड़ी. बैजू की नजरें, जो कब से सविता को ही ढूंढ़ रही थीं, देखते ही इशारों से उसे अपने पास बुलाया और धीरे से बोला, ‘‘कैसी हो सविता?’’

अपने आंसू पोंछते हुए सविता कहने लगी, ‘‘क्यों तुम ने मेरी खातिर खुद को जोखिम में डाला बैजू? मर जाने दिया होता मुझे. बोलो न, किस लिए मुझे बचाया?’’ कह कर वह वहां से जाने को पलटी ही थी कि बैजू ने उस का हाथ पकड़ लिया और बड़े गौर से उस की मांग में लगे सिंदूर को देखने लगा.

‘‘हां बैजू, यह सिंदूर मैं ने तुम्हारे ही नाम का लगाया है. आज से मैं सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी हूं,’’ कह कर वह बैजू से लिपट गई.

Romantic Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : रामराज्य – इस के आविष्कारकों को शतशत नमन कीजिए

Satirical Story In Hindi : बाड़मेर के किसान छात्रावास में छात्राओं द्वारा हवनयज्ञ करते हुए देख कर आप को मान लेना चाहिए कि अब रामराज्य का आगाज हो गया है. अब स्कूलों में किताबकौपियों का भारी थैला कंधे पर लाद कर बच्चों को नहीं ले जाना पड़ेगा.

इस देश के बड़ेबड़े शिक्षाविद व बुद्धिजीवी काफी समय से गंभीर चिंता जता रहे थे कि नन्हेनन्हे कंधों पर ज्यादा बोझ ठीक नहीं है, लेकिन वे इस का समाधान नहीं खोज पाए.

हमें रामराज्य के आविष्कारी पुरोधाओं का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि अब छात्रावासों में रातरातभर आंखें फाड़ कर बच्चों को पढ़ने की जरूरत नहीं होगी, सिर्फ एक साप्ताहिक यज्ञ किया और बन गए एकदम वैज्ञानिक टाइप समझदार प्रोफैशनल. न किताबों का खर्च, न कौपियों का खर्च. पंडितजी एक शास्त्र ले कर आएंगे और हवनकुंड से निर्मित विशेष चक्रीय वातावरण में बच्चों को बैठा कर उन के दिमाग में डेटा ट्रांसफर कर देंगे.

स्कूलों में तो बचपन में हम ने भी खूब चिल्लाचिल्ला कर सरस्वती वंदना की थी. अगर गुरुजी को होंठ हिलते नहीं दिखते थे तो डंडों की बौछार हो जाती थी और अगर जोर से गुरुजी को आवाज सुनाई दे जाती तो वे मुसकरा देते थे. ऐसा लगता जैसे सरस्वती का स्वर व विद्या हमारे बदले गुरुजी के दिमाग में घुस रही हो और गुरुजी को ठंडेठंडे नवरत्न तेल वाली कूलिंग का अनुभव हो रहा हो.

अभी कुछ दिनों पहले बाड़मेर के ही एक स्कूल की प्रार्थना का वीडियो देख रहा था, जिस में गुरुजी हारमोनियम बजा रहे थे.

दिल को ऐसा सुकून मिल रहा था कि भई, भाड़ में जाए संविधान व धर्मनिरपेक्षता. हमें तो रामराज्य ही चाहिए. आप खुद सोचो कि छोटेछोटे बच्चे उठ कर हनुमान चालीसा पढ़ें, स्कूलों में तुलसीदास की चौपाइयां गाते लड़केलड़कियां नाचते रहें, शांत फिजाओं में वानर एकाएक उड़ने लग जाएं, बीचबीच में पुष्पक विमान के करतब दिखते रहें, हम घर से बाहर निकलें और आदमी के शरीर पर हाथी का सिर लगे विशेषटाइप के इंसान घूमते नजर आएं तो हमें और क्या चाहिए.

क्या करेंगे वैज्ञानिक शिक्षा से. हर जगह महंगाई का रोना. गाडि़यों के लिए महंगे पैट्रोलडीजल के चक्कर में हमारा तेल निकला जा रहा है. ऐसे में बिना ईंधन के पुष्पक विमान दोबारा उड़ने लगेंगे तो कितनी खुशी की बात होगी.

नदियों समुद्रों को पार करने के लिए वानरभालू हम इंसानों के लिए पुल बनाएंगे. ग्लोबल वार्मिंग से मुक्ति के लिए हनुमानजी को बोल दें, वे 4-5 दिनों के लिए सूरज को ही गटक जाएंगे.

मालगाडि़यों व ट्रकों में बेतहाशा ईंधन फूंका जा रहा है, सड़कों पर पैसे बरबाद किए जा रहे हैं. आप सोचो, एक हाथ से द्रोणगिरि पर्वत को उठा कर उड़ने वाले हनुमानजी अकेले ही मालढुलाई का काम नहीं कर देंगे. सर्जिकल स्ट्राइक, सर्जिकल स्ट्राइक चीखने की अब जरूरत ही नहीं रहेगी. हनुमानजी अकेले ही इसलामाबाद को आग लगा कर फूंक आएंगे.

हथियारों की होड़ में देश का अकूत धन फूंका जा रहा है जबकि हमारे पास महामृत्युंजय जाप से दुश्मनों को खत्म करने वाले पंडितों की भरमार है. इन का उपयोग करेंगे तो पैसों की बचत होगी व हंगर इंडैक्स में शतक मारने की जलालत से इस देश को मुक्ति मिल जाएगी.

रोज मीडिया को हम गालियां देते हैं कि ये बिके हुए लोग हैं. तो सोचो, मीडिया का काम खुद नारदमुनि करने लगेंगे तो विश्वसनीयता में चारचांद लगेंगे कि नहीं. महाभारत वाला संजय बिना डिश के खर्चे के घटनाओं का लाइव टैलीकास्ट करेगा तो कितना मजा आएगा. तोड़नेमरोड़ने और एडिटिंग के सारे आरोपों से मुक्ति मिल जाएगी.

बिगड़ते लिंगानुपात से जूझते देश में जब मिट्टी के घड़ों से लड़कियां निकलने लगेंगी तो एक तो हर कुंआरे के लिए पत्नी का इंतजाम हो जाएगा, दूसरा, मेरे जैसे ठालेबैठे व फोन में माथा मार रहे युवा लोग हल ले कर खेतों में जाएंगे तो किसानों की आय दोगुनी तो क्या, दसगुनी हो जाएगी.

अब बाड़मेर वाले गुरु ही इस देश को विश्वगुरु बनाएंगे. दिल्ली ने तो अकर्मण्यता की चादर ओढ़ ली है. ऐसे में वीरों की धरती वाले मरुस्थल के महापुरुष ही इस देश का कल्याण करेंगे. Satirical Story In Hindi

No-Confidence Motion Against Om Birla : क्या अल्पमत वालों को लोकसभा में विरोध का हक नहीं?

No-Confidence Motion Against Om Birla : पौराणिक कथाएं राजा और पति दोनों को भगवान मानती हैं. पौराणिक राज में इन के आगे कोई तर्क माने नहीं जाते. इस कारण ही सरकार हो या पति, दोनों ही विपक्ष और पत्नी को बोलने का अधिकार नहीं देना चाहते हैं.

लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई, मुख्य सचेतक के सुरेश, सचेतक मोहम्मद जावेद के साथ द्रमुक, सपा, शिवसेना यूबीटी जैसे विपक्षी सांसदों ने लोकसभा महासचिव उत्पल कुमार सिंह को संविधान के अनुच्छेद 94 (सी) के तहत लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाए जाने की मांग करते हुए नोटिस दिया. 3 पेज के इस अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर विपक्षी पार्टियों के करीब 120 लोकसभा सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे. इस में तृणमूल कांग्रेस को छोड़ इंडिया ब्लौक के सभी दल शामिल थे.

ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव में विपक्षी सासंदों ने इस के 4 कारण गिनाए हैं. इस का पहला कारण 2 फरवरी, 2026 को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को राष्ट्रपति अभिभाषण धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने नहीं दिया गया. लोकसभा स्पीकर सदन का खुलेआम एकतरफा ढंग से संचालन करते हैं. कई मौकों पर विपक्षी दलों के नेताओं को बोलने नहीं दिया गया जो संसद में उन का बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार है.
इस का दूसरा कारण 3 फरवरी, 2026 को 8 विपक्षी सांसदों को बजट सत्र से मनमाने तरीके से निलंबन की सजा सुना दी गई. इन सदस्यों को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करने के लिए सजा दी गई.

इस का तीसरा कारण 4 फरवरी, 2026 को भाजपा के सांसद निशिकांत दुबे द्वारा 2 पूर्व प्रधानमंत्रियों के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक निजी हमले करने की अनुमति लोकसभा स्पीकर द्वारा देने का कृत्य किया गया. सांसद द्वारा संसदीय परंपराओं तथा मर्यादा के नियमों की धज्जियां उड़ाने के लिए लोकसभा स्पीकर ने एक बार भी सांसद को फटकार नहीं लगाई गई. भाजपा सांसद निशिकांत दुबे को ऐसी छूट पर गंभीर आपत्ति करते हुए विपक्ष ने आरोप लगाया है कि हमारे आग्रह के बावजूद इस खास सांसद के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई जो आदतन अपराधी है.

इस नोटिस में पहले 3 कारण इंग्लिश में लिखे गए थे. चौथा कारण हिंदी में विस्तार से लिखा गया था. इस में विपक्षी महिला सांसदों द्वारा सदन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमले की तैयारी का झूठा आरोप लगाया गया था. कांग्रेस की महिला सांसदों के संदर्भ में बिरला की सदन में टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए नोटिस में कहा गया है, ‘यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्यों पर साफतौर पर झूठा आरोप लगाया गया था. यह बेहद अपमानजनक है.’

अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर पहली हस्ताक्षर कांग्रेस के के सी वेणुगोपाल के थे. 7वें नंबर पर समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने हस्ताक्षर किए थे. राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए थे. सपा के सभी सांसदों ने हस्ताक्षर किए. स्पीकर बिरला ने विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव नोटिस को आगे की प्रक्रिया के लिए लोकसभा सचिवालय को भेज दिया है. इस के साथ ही, ओम बिरला ने फैसला किया है कि महाभियोग प्रस्ताव की प्रक्रिया खत्म होने तक सदन की कार्यवाही में वे हिस्सा नहीं लेंगे.

लोकसभा में एनडीए के पास बहुमत का आंकड़ा था. इसलिए अविश्वास प्रस्ताव से ओम बिरला की कुरसी को कोई खतरा नहीं है. इस के द्वारा विपक्ष के सांसदों ने अपने गुस्से का इजहार किया था. विपक्ष के सांसद कहते हैं कि क्या विपक्ष के सांसदों को बोलने का अधिकार नहीं है. इस बहाने वे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की किरकिरी करना चाहते थे. इस से पहले केवल 3 लोकसभा अध्यक्षों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था. इन के नाम जी वी मावलंकर, हुकुम सिंह और बलराम जाखड़ हैं. यह बात और है कि विपक्ष की ओर से लाया गया अविश्वास प्रस्ताव तीनों ही बार खारिज हो गया था.

क्यों उठी लोकसभा स्पीकर को हटाने की मांग?

लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की मांग पहले भी 3 बार उठी है. वे अविश्वास प्रस्ताव खारिज हो गए थे. सवाल उठता है कि आखिर जब प्रस्ताव का अंजाम पहले से पता हो तो इस कवायद की जरूरत क्यों? विपक्ष के सांसदों का कहना है लोकसभा स्पीकर उन को बोलने का मौका नहीं देते हैं. ऐसे में वे अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं कर पा रहे. भारतीय संविधान के तहत सांसदों के पास व्यापक विधायी, वित्तीय और निर्वाचन संबंधी अधिकार होते हैं. वे संसद में कानून बनाने, सरकार की जवाबदेही तय करने और निर्वाचन क्षेत्र के विकास के लिए प्रश्नों के माध्यम से मुद्दे उठाते हैं.

संविधान सदन में सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष 2 वर्ग होते हैं. इन के नेता को नेता सदन यानी प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष यानी नेता विपक्ष कहा जाता है. नरेंद्र मोदी नेता सदन और राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष है. संविधान दोनों को ही बराबर का अधिकार देता है. सांसद सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का, सदन में उस के अधिकार बराबर होते हैं. हर सांसद की राय बराबर का अधिकार रखती है. इस की वजह यह है कि हर सांसद अपने क्षेत्र से चुनाव जीत कर आता है. विपक्ष के जो सांसद जीत कर आते हैं वे असल में सत्ता पक्ष के सांसद प्रत्याशी को हरा कर आते हैं. ऐसे में उन को कमतर आंकना गलत होता है.

पक्षविपक्ष के बीच केवल संख्या बल का अंतर होता है. अगर पूरे देश में वोट पाने के आकड़ों को देखा जाए तो सत्ता पक्ष से अधिक वोट विपक्ष के पास होते हैं. इस का मतलब होता है कि जनता का समर्थन विपक्ष के पास अधिक होता है. सत्ता पक्ष अपने संख्या बल के कारण अकड़ में रहता है. इस सरकार में डिप्टी स्पीकार नहीं है. इस के पहले जगदीप धनकड़ डिप्टी स्पीकर थे. उन के हटने के बाद नए डिप्टी स्पीकर का चुनाव नहीं हुआ है. विपक्ष का कहना है कि सत्ता पक्ष संवैधनिक संस्थाओं को ठीक से काम नहीं करने दे रहा है.

संसद में लोकसभा और राज्यसभा को मिला कर सांसदों की संख्या 788 है. लोकसभा में सत्ता पक्ष के पास 293 सांसद हैं और विपक्ष के पास 234. विपक्ष के पास केवल 59 सीटें कम हैं. यानी, दोनों के बीच कोई बड़ा अंतर नहीं है. उपराष्ट्रपति के चुनाव में कुल 782 वोट थे. जिन में सत्ता पक्ष के पास 391 और विपक्ष के पास 312 वोट थे. संख्या बल में कोई बहुत अंतर नहीं है. ऐसे में सत्ता पक्ष विपक्ष के सांसदों को सुने नहीं, यह संविधान के अनुकूल नहीं है.

सत्ता पक्ष क्यों डिप्टी स्पीकर का चुनाव नहीं कर रहा, यह रहस्य बना हुआ है.

क्यों जरूरी है डिप्टी स्पीकर का पद?

17वीं लोकसभा के बाद से मोदी सरकार ने डिप्टी स्पीकर का पद खाली रखा है. इस के पहले 16वीं लोकसभा में एआईएडीएमके के एम थंबीदुरई डिप्टी स्पीकर बने थे. लोकसभा स्पीकर के चुनाव एनडीए के ओम बिरला और इंडिया ब्लौक के कोडिकुन्निल सुरेश के बीच चुनाव हुआ जिस में ओम बिऱला चुनाव जीत कर लोकसभा स्पीकर बने थे. डिप्टी स्पीकर के लिए विपक्ष ने अपने प्रत्याशी की रणनीति बनाई जिस के बाद डिप्टी स्पीकर का चुनाव ठंडे बस्ते में चला गया. वर्तमान में लोकसभा में कोई डिप्टी स्पीकर नहीं है.

यूपीए-1 में 2004 से 2009 के बीच माकपा के सोमनाथ चटर्जी स्पीकर और चरणजीत सिंह अटवाल डिप्टी स्पीकर थे. यूपीए-2 की सरकार में 2009 से 2014 तक कांग्रेस की मीरा कुमार स्पीकर और भाजपा के करिया मुंडा डिप्टी स्पीकर थे. जून 2014 से जून 2019 तक भाजपा की सुमित्रा महाजन स्पीकर और अन्नाद्रमुक के एम थंबीदुरई डिप्टी स्पीकर थे. इस के बाद से डिप्टी स्पीकर का पद खाली है.

लोकसभा डिप्टी स्पीकर का पद विपक्ष को मिलता रहा है. जैसे मनमोहन सिंह की सरकार में बीजेपी के करिया मुंडा डिप्टी स्पीकर थे. छठी लोकसभा से ले कर 16वीं लोकसभा तक डिप्टी स्पीकर का पद विपक्ष के पास रहा है. आजाद भारत के इतिहास में 17वीं लोकसभा और 18वीं लोकसभा पहला ऐसा मौका है. जब डिप्टी स्पीकर का पद खाली रहा. संविधान का अनुच्छेद 93 कहता है कि डिप्टी स्पीकर का चयन होना ही चाहिए. सदन के 2 सदस्यों का चयन स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के रूप में होना संविधान के अनुसार अनिवार्य है.

1969 तक कांग्रेस की सत्ता में भी कांग्रेस ये दोनों पद अपने पास ही रखती थी लेकिन साल 1969 में यह चलन बदल गया. कांग्रेस ने औल पार्टी हिल लीडर्स के नेता गिलबर्ट जी स्वेल, जो उस समय शिलौंग से सांसद थे, को यह पद दिया. संविधान के अनुच्छेद 95 के अनुसार डिप्टी स्पीकर लोकसभा अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उन की जिम्मेदारियों का निर्वहन करता है. अगर डिप्टी स्पीकर का पद खाली रहा तो उस स्थिति में राष्ट्रपति लोकसभा के एक सांसद को यह काम करने के लिए चुनते हैं.

संविधान के अनुच्छेद 94 के अनुसार अगर स्पीकर अपने पद से इस्तीफा देते हैं तो इस्तीफे में उन्हें डिप्टी स्पीकर को संबोधित करना होता है. 1949 में संविधान सभा में इसे ले कर बहस हुई थी. डा. भीमराव अंबेडकर का कहना था कि स्पीकर का पद डिप्टी स्पीकर के पद से बड़ा होता है, ऐसे में उन्हें डिप्टी स्पीकर को संबोधित नहीं करना चाहिए बल्कि राष्ट्रपति को संबोधित करना चाहिए. लेकिन यह तर्क दिया गया कि चूंकि स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का चयन सदन के सदस्य करते हैं, इसलिए इस पद की जवाबदेही सदस्यों के प्रति है.

सदन के हर सदस्य को इस्तीफे में संबोधित नहीं किया जा सकता. ऐसे में स्पीकर और डिप्टी स्पीकर को ही संबोधित करना चाहिए क्योंकि वे सदन का ही प्रतिनिधित्व करते हैं. इस के साथ तय हुआ कि अगर स्पीकर इस्तीफा देते हैं तो डिप्टी स्पीकर को संबोधित करेंगे और अगर डिप्टी स्पीकर के इस्तीफे की स्थिति आती है तो वे स्पीकर को संबोधित करेंगे. लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आने के बाद से वे सदन में नहीं आ रहे. ऐसे में लोकसभा बिना डिप्टी स्पीकर के चल रही है.

क्या है लोकसभा अध्यक्ष का दायित्व?

लोकसभा अध्यक्ष सदन का सर्वोच्च अधिकारी, पीठासीन अधिकारी और प्रतिनिधि होता है. उन के मुख्य कार्यों में सत्रों का संचालन, अनुशासन बनाए रखना और सदन में विमर्श के लिए एजेंडा तय करना शामिल हैं. अध्यक्ष लोकसभा की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं और सदन में व्यवस्था व मर्यादा बनाए रखते हैं. वे नियमों के विरुद्ध व्यवहार करने वाले सदस्यों को दंडित या निलंबित भी कर सकते हैं. कोई विधेयक ‘धन विधेयक’ है या नहीं, इस का निर्णय केवल लोकसभा अध्यक्ष करते हैं और इस संबंध में उन का निर्णय अंतिम होता है. धन विधेयक को अनुच्छेद 110 के तहत बनाया गया है. यह सरकार के टैक्स, खर्च और राजस्व से सीधा जुड़ा होता है. इस को संविधान में खास दर्जा दिया गया है.

लोकसभा स्पीकार को अधिकार है कि वे 10वीं अनुसूची के तहत दलबदल के आधार पर किसी सदस्य की अयोग्यता के प्रश्नों का निर्णय करते हैं. यदि किसी मुद्दे पर वोट बराबर हो जाते हैं, तो अध्यक्ष के मतदान को निर्णायक मत मान कर फैसला कर सकते हैं, लेकिन वे सामान्य स्थिति में वोट नहीं करते. लोकसभा स्पीकार सभी संसदीय समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति करते हैं और उन के कामकाज की देखरेख करते हैं.

संसद के दोनों सदनों यानी लोकसभा और राज्यसभा की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा स्पीकार करते हैं. वे प्रश्न पूछने, अविश्वास प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव और ध्यानाकर्षण प्रस्तावों की अनुमति देते हैं. राष्ट्रपति और संसद के बीच तथा बाहरी निकायों के साथ संपर्क में लोकसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं. एक तरह से देखें तो लोकसभा स्पीकर विपक्ष के सांसदों के अधिकारों का संरक्षक होता है. लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला से निराश हो कर उन के खिलाफ उन को हटाने का नोटिस दिया गया था.

संविधान ने विपक्ष को क्या अधिकार दिए हैं?

भारतीय संविधान ने विपक्ष को संसदीय लोकतंत्र का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा माना है. अनुच्छेद 19 के तहत विपक्ष को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सरकार से सवाल पूछने, अविश्वास प्रस्ताव लाने और लोक लेखा समिति जैसी समितियों के माध्यम से सरकारी कामकाज की निगरानी करने का अधिकार है. विपक्ष को सरकार की नीतियों पर चर्चा, बहस और आलोचना करने का संवैधानिक अधिकार है. प्रश्नकाल और शून्यकाल के माध्यम से विपक्ष सरकार को नीतियों के लिए जवाबदेह ठहरा सकता है. विपक्ष, अविश्वास प्रस्ताव द्वारा सरकार के बहुमत को चुनौती दे सकता है.

लोक लेखा समिति जैसी महत्त्वपूर्ण समितियों में विपक्ष के नेताओं को जगह दी जाती है ताकि वे सरकारी खर्चों की जांच कर सकें. विपक्ष के नेता का पद कानूनी पद है जो सरकार की ओर से आने वाले किसी भी मनमाने कदम को रोकने के लिए चेकएंडबैलेंस का काम करता है.
असल में पौराणिक कथाओं के आधार पर पौराणिक राज करने वाली मौजूदा भगवाई सरकार संविधान की मजबूरी में विपक्ष को मानती है वरना वह संविधान को महिलाओं जैसा समझती है. पुराणों में राज करने वाले को ही सही माना जाता है. उन्हें यह समझाया जाता है कि तर्क करने का कोई लाभ नहीं होता है. जबकि, लोकतंत्र में संविधान तर्क का अधिकार देता है. रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास तर्क करने को बेमकसद माप मानते कहते हैं- ‘होइहि सोइ जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढावै साखा’ राजा और पति दोनों को पौराणिक कथाएं भगवान बताती हैं, इसलिए उन से बहस करने को मना किया जाता है.

घर की महिलाओं जैसी विपक्ष की हालत

समाज में यह व्यवस्था आज भी कायम है कि घर में परिवार के अंदर महिला को अधिकार तो बहुत हैं पर वे उन को दिए नहीं जाते. जब महिलाएं नौकरी करने लगी हैं, घरपरिवार के लिए आर्थिक सुरक्षा के साधन जुटा रही हैं तब भी आर्थिक, सामाजिक और घरेलू मामलों में उन से राय/सलाह नहीं ली जाती है. अगर घर में कोई बड़ा काम होना है, जैसे एसी लगना हो, इंटीरियर कराना हो, कोई नया निर्माण करना हो तो पुरुष घर की महिलाओं की सलाह नहीं लेता है.

यही नहीं, किस बैंक में पैसा जमा करना है, किस बचत योजना में करना है, यह भी उन से नहीं पूछा जाता है. हैल्थ बीमा और जीवन बीमा के आंकड़ें देखें तो पुरुष अपना बीमा करा लेते हैं, पत्नी का नहीं कराते. वही महिलाएं ज्यादातर बीमा कराती हैं जो खुद जौब में होती हैं. खाने की बात करें तो हर पत्नी पति से ही पूछती है कि खाने में क्या बनाएं? अपनी पंसद का खाना भी वह नहीं बना सकती.

प्रौपर्टी खरीदनी हो, बच्चे का स्कूल में एडमिशन कराना हो, घर के लिए कार लेनी हो या बच्चों के शादीविवाह का फैसला करना हो, महिलाओं से पूछा नहीं जाता. अगर पूछ भी लिया जाए तो उन की बात मानी नहीं जाती. यह कह दिया जाता है कि यह ठीक नहीं है. महिलाओं को अपने फैसले पर तर्क करने का अधिकार नहीं है. वैसे, महिला व पुरुष को घर की व्यवस्था के लिए समान रूप से जिम्मेदार माना जाता है. बराबर के हक ही बात होती है. यह केवल कहा जाता है, असल में सरकार हो या पति, वह कभी नहीं चाहता कि उस की बात को काटा जाए. घरों में विवाद होने पर पत्नी को ही जबरन चुप करा दिया जाता है. No-Confidence Motion Against Om Birla

Power of Habits : छोटी आदतों का बड़ा असर

Power of Habits : आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहां समय की कमी और तनाव हर जगह है, वहां छोटीछोटी अच्छी आदतें ही हमारे मन और भावनाओं को स्वस्थ रखती हैं. अगर हम रोज थोड़ा सा समय खुद को बेहतर बनाने, परिवार और समाज के लिए निकालें, तो जिंदगी में खुशी भी बनी रहती है और जीने का मकसद भी.

आज का युग तीव्र प्रतिस्पर्धा, तनाव और भागदौड़ से भरा हुआ है. हर व्यक्ति जीवन में सफलता, संतुलन और शांति की खोज में है. लोग अकसर यह सोचते हैं कि बड़े परिवर्तन केवल किसी बड़े अवसर या उपलब्धि से आते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि जीवन में बड़ा बदलाव छोटीछोटी आदतों से ही प्रारंभ होता है. यही आदतें हमारे विचार, व्यवहार और व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करती हैं.

हर सुबह समय पर उठना, कुछ क्षण ध्यान या प्रार्थना में बिताना, दिन के कार्यों की रूपरेखा बनाना, आभार व्यक्त करना, या किसी की सहायता करना ये सभी छोटेछोटे कार्य भले ही मामूली लगें, परंतु इन का संचयी प्रभाव अत्यंत गहरा होता है. यही कार्य हमारी दिनचर्या को अनुशासित बनाते हैं और जीवन को एक सार्थक दिशा प्रदान करते हैं.

नियमित दिनचर्या केवल कार्यों का क्रम नहीं है, बल्कि यह मन और मस्तिष्क को स्थिरता देने की प्रक्रिया है. जब हम अपने दिन का नियोजन करते हैं, तो हमारे भीतर आत्मविश्वास और स्पष्टता बढ़ती है. मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, नियमित आदतें व्यक्ति में आत्मअनुशासन विकसित करती हैं, जिस से वह कठिन परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखता है और उचित निर्णय लेता है.

विज्ञान भी इस तथ्य की पुष्टि करता है कि किसी नई आदत को स्थायी रूप देने के लिए व्यक्ति को औसतन 21 से 66 दिनों तक निरंतर प्रयास करना पड़ता है. इस का अर्थ यह है कि यदि हम किसी सकारात्मक अभ्यास जैसे व्यायाम, पठन, या स्वस्थ भोजन को लगातार दोहराते रहें, तो वह हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाता है. इसी प्रकार छोटे प्रयास दीर्घकाल में बड़े परिणामों का कारण बनते हैं.

नियमित दिनचर्या का सब से बड़ा लाभ यह है कि यह हमें मानसिक अव्यवस्था से दूर रखती है. एक सुव्यवस्थित दिन व्यक्ति को न केवल उत्पादक बनाता है, बल्कि मानसिक शांति भी देता है. समय का सदुपयोग, संतुलित भोजन, पर्याप्त विश्राम और आत्ममंथन ये सभी अच्छे स्वास्थ्य और स्थिर मनोबल के आधार हैं.

आज की तेज रफ्तार दुनिया में जहां समय की कमी और तनाव का दबाव सर्वव्यापी है, वहां छोटीछोटी सकारात्मक आदतें ही मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की सुरक्षा करती हैं. यदि हम प्रतिदिन थोड़ा समय आत्मविकास, परिवार और समाज के लिए समर्पित करें, तो जीवन में आनंद और उद्देश्य दोनों बने रहते हैं.

छोटी आदतों का प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता. जब हम अपने जीवन में अनुशासन और सकारात्मकता लाते हैं, तो उस का प्रभाव हमारे परिवार, कार्यस्थल और समाज पर भी पड़ता है. उदाहरण के लिए, यदि हम प्रतिदिन ऊर्जा की बचत करें, पेड़ लगाएं या दूसरों को प्रोत्साहित करें, तो ये छोटीछोटी क्रियाएं सामूहिक रूप से एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन लाने की क्षमता रखती हैं.

इसलिए, आज से ही अपने जीवन में कुछ छोटे लेकिन सार्थक अभ्यास शामिल कीजिए, समय पर सोना और उठना, स्वस्थ भोजन करना, कृतज्ञ रहना, दूसरों की सहायता करना और हर दिन कुछ नया सीखना. यही आदतें धीरेधीरे हमारी सोच को सकारात्मक और जीवन को संतुलित बनाती हैं.

अंततः, सफलता और संतोष किसी एक दिन के बड़े निर्णय का परिणाम नहीं होते, बल्कि वे हर दिन लिए गए छोटेछोटे सही निर्णयों की उपज हैं. याद रखिए “छोटी आदतें ही बड़े बदलावों की जननी हैं.” Power of Habits

Cyber Fraud in India : बुजुर्ग डाक्टर को डिजिटल अरेस्ट कर ठग लिए 14 करोड़ रुपए

Cyber Fraud in India : साइबर फ्रौड को रोकने के लिए सरकार ने तमाम तरह के उपाय किए हैं लेकिन इस तरह की ठगी रुक नहीं रही है. लोगों को मनी लांडरिंग, ड्रग्स या अश्लील साइट्स देखने का आरोप लगा कर डिजिटल ठगी की जाती है. एक लाख या दो लाख ठगे जाने पर तो कई लोग रिपोर्ट भी दर्ज नहीं करवाते. कई लाख या करोड़ की ठगी हो तभी यह मामले सुर्खियों में आते हैं.

दिल्ली में एक बुजुर्ग एनआरआई डाक्टर दंपति को डिजिटल अरेस्ट कर ठगों ने 17 दिन तक फंसा कर रखा और उन से 14.85 करोड़ रुपए ठग लिए. 81 साल के बुजुर्ग डा. ओम तनेजा और 77 साल की उन की पत्नी डा. इंदिरा तनेजा दोनों डाक्टर हैं. इस बुजुर्ग जोड़ी ने अमेरिका में करीब 48 साल बिताए और वे संयुक्त राष्ट्र यूएन से भी जुड़े रहे. 2015 में रिटायरमैंट के बाद वे भारत लौट आए और ग्रेटर कैलाश में रहने लगे.

ठगी 24 दिसंबर 2025 को शुरू हुई जब ठगों ने फोन पर खुद को TRAI टेलीकाम रेगुलेटरी अथौरिटी औफ इंडिया और ED और पुलिस अधिकारी बता कर संपर्क किया. फर्जी अफसरों ने कहा कि दोनों के फोन से आपत्तिजनक कौल्स और मैसेजेस डिटेक्ट हुए हैं जिस के आधार पर मनी लौन्ड्रिंग और नेशनल सिक्योरिटी का गंभीर मामला बनता है इस जुर्म के तहत अफसरों के पास दोनों के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी है.

24 दिसंबर 2025 से 9-10 जनवरी 2026 करीब 17 दिन तक दोनों बुजुर्गों को वीडियो कौल पर लगातार निगरानी में रखा गया. फोन चार्ज रखने, किसी से बात न करने, घर से बाहर न जाने की सख्त हिदायत दी गई. डा. इंदिरा को बारबार बैंक जा कर पैसे ट्रांसफर करने को मजबूर किया गया. ठग स्क्रिप्ट देते थे कि बैंक वाले पूछें तो क्या जवाब देना है. कुल 14.85 करोड़ रुपए 8 अलगअलग बैंक अकाउंट्स में ट्रांसफर करवाए गए. रकम 1.99 करोड़ से 2.2 करोड़ के ट्रांजैक्शन में बंटी थी, जो गुजरात, दिल्ली, मुंबई, UP, कोलकाता और असम के अलगअलग बैंक अकाउंट्स में गई.

10 जनवरी 2026 को ठगों ने खुद पुलिस स्टेशन जाने को कहा, दावा किया कि आरबीआई से रिफंड मिलेगा. पुलिस स्टेशन पहुंच कर असलियत पता चली. पुलिस ने बताया कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं होती. अब इस मामले को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल जांच कर रही है. अबतक 4 आरोपी गिरफ्तार भी हुए हैं. गुजरात और UP से दिव्यांग पटेल, के.एस. तिवारी और कृतिक शितोली को गिरफ्तार किया गया है.

1.9 करोड़ से 2.1 करोड़ रुपए फ्रीज कर दिए गए. बुजुर्गों का रुपया 700 से ज्यादातर म्यूल अकाउंट्स, बेनामी/फर्जी NGOs, और कंपनियों के अकाउंट्स से हो कर गुजरा. जांच जारी है, बाकी रकम ट्रेस करने की कोशिश की जा रही है.

इस तरह की ठगी डर पर आधारित होती है. इस ठगी में बुजुर्गों, एनआरआई और अमीर लोगों को टारगेट किया जाता है. कई पैसे वाले लोग आसानी से शिकार बन जाते हैं. कई लोग जाने या अनजाने में ऐसी ट्रांजेक्शन कर देते हैं जिसे वह खुद गैरकानूनी समझते हैं ठग इसी बात का फायदा उठाते हैं. लोगों को यह बात अच्छी तरह समझनी चाहिए कि कोई सरकारी अधिकारी फोन कौल या वीडियो कौल पर पूछताछ नहीं कर सकता. आप ने कोई भी गलती की हो आप को इस तरीके से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. कानून से डरने की जरूरत नहीं बल्कि उसे समझने की जरूरत है. Cyber Fraud in India

New IT Rules 2026 : आईटी कानूनों में बदलाव – डिजिटल सैंसरशिप का आगाज

New IT Rules 2026 : प्रिंट और इलैक्ट्रौनिक्स मीडिया पर तो भाजपा और उस की सरकार की आलोचना करने की हिम्मत कोई करता नहीं और जो थोड़ेबहुत करते भी हैं तो उन की पहुंच या तो कम है या फिर वे कम असरदार हैं. लेकिन कमजोर और असुरक्षित सरकार के लिए यह भी हजम नहीं होता कि ये कम भी आखिर हैं तो क्यों हैं, सभी भक्त क्यों नहीं हो जाते.

क्यों पढ़ें – मोदी सरकार कानून बना कर नएनए तरीकों से सच बोलने और अन्याय पर उठने वाली आवाजों का गला घोंट रही है, यह नागरिक के लिए चिंता का विषय होना चाहिए . डिजिटल कानूनों के बदलावों के जरिए कैसे जनता से बेईमानी के तथ्य छिपाने का काम किया जा रहा है, लेख से जानें.

सोशल मीडिया पर ऐसे कंटैंट्स की भरमार रहती है जो भाजपा और उस की सरकार की तीखी, तार्किक और धारदार आलोचना करते हैं. इन अभक्तों पर किसी का खास जोर नहीं चलता.

हर विरोध को खतरा समझने वाली बैसाखियों के सहारे चल रही सरकार ने डिजिटल सैंसरशिप की तरफ एक कदम और बढ़ा दिया है. केंद्र सरकार ने अब अपने आईटी मंत्रालय के जरिए एआई जनरेटेड और डीपफेक कंटैंट्स पर और शिंकजा कसने की गरज से आईटी कानूनों में बदलाव करने का एलान किया है जो 20 फरवरी से लागू होंगे. कहने को ये बदलाव भले ही गलत सूचनाओं, खबरों और कंटैंट्स को रोकने के लिए हों लेकिन भगवाई सरकार की असल मंशा अपने खिलाफ उठने वाली बचीखुची आवाजों को भी दबा देने की है. अलावा इस के, ये बदलाव बहुत अव्यावहारिक और फ्री स्पीच यानी अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने वाले भी हैं.

क्या हैं नए बदलाव?

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 87 के तहत आईटी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम 2021 में किए गए नए बदलाव या नियम किसी मकड़जाल से कम नहीं हैं. उन का सार यह है कि अब सोशल मीडिया यूजर और प्लेटफौर्म दोनों पर बंदिशें और बढ़ गईं हैं. इन्हें कानून से ही समझने की कोशिश करें तो पूरी तसवीर कुछ यों बनती है-

– नियम2 (1) (डब्लू ए) एसजीआई यानी सिंथेटिकली जनरेटेड इन्फौर्मेशन को परिभाषित करता है. इस के तहत वे औडियो, वीडियो, इमेज या आभासी सामग्री जो कंप्यूटर या एआई से बनाई गई हो या बदली गई हो या कि फिर संपादित की गई हो लेकिन लगती असली हो एसजीआई कहलाएगी. बोलचाल की भाषा में इन्हें ही डीपफेक कहा जाता है. इस से पहले इस तरह के कंटैंट्स या सामग्री की कोई कानूनी परिभाषा नहीं थी. अब चूंकि यह सूचना के तहत आ गई है इसलिए कानून का हिस्सा बन गई है.

– नियम 3 (1) (डी) के तहत सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स को शिकायत मिलने पर किसी भी अवैध कंटैंट या सामग्री को हटाने के लिए पहले 36 घंटे दिए जाते थे, अब वह समयसीमा महज 3 घंटे होगी. कुछ खास मामलों, जैसे गैरसहमति वाले फोटो, इमेज, डीपफेक में तो यह समय सीमा 2 घंटे ही होगी. यानी, कोर्ट या सरकार के आदेश जारी करने के 3 घंटे बाद कंटैंट को हटाना अनिवार्य होगा.

– नियम 3 (1) (सी) के तहत अब प्लेटफौर्म को यूजर को 3 महीने में एक बार ऐसी सूचना देना अनिवार्य है जिस में यह बताया जाए कि नियमों का उल्लंघन करने पर क्या कार्रवाई हो सकती है और किस तरह की सामग्री अवैध और घातक होती है.

– नियम 4 (1ए) यूजर की घोषणा (डिक्लरेशन) के लिए है कि जब कोई सामग्री अपलोड हो जाए और वह सिंथेटिक या एआई जनित हो सकती है तो प्लेटफौर्म को यूजर से यह घोषणा लेनी होगी कि यह कंटैंट वास्तविक है या एआई से बनाया गया है. अब तक ऐसा नहीं था कि खुद यूजर बताए कि सामग्री एआई से बनाई गई या बदली गई है. यह एक तरह से हलफनामा है.

– नियम 2 के तहत एआई या एसजीआई सामग्री पर स्पष्ट और न हटाया जा सकने वाला लेबल और मेटाडाटा यूनिक पहचान लगाना अनिवार्य है जिस से कंटैंट के स्रोत और सत्यता की पहचान आसानी से हो सके. मेटाडाटा वह डाटा होता है जो किसी कंटैंट के बारे में अतिरिक्त विवरण देता है. मसलन, डेटा एक किताब है तो उस का लेखक, प्रकाशक, पृष्ठ संख्या और प्रकाशन वर्ष मेटाडाटा होंगे.

– धारा 79 सेफ हार्बर प्रोटैक्शन से संबंधित है जो सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स को उन के प्लेटफौर्म्स पर मौजूद यूजर द्वारा पोस्ट किए गए कंटैंट्स की जिम्मेदारी से बचाता है. यानी, सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स नियमों का सही पालन करते हैं तो उन्हें अनजाने में कोई कानूनी दायित्व नहीं मिलेगा. यानी, उन पर कार्रवाई नहीं होगी.

– इन सब के अलावा नए नियम सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स से यह अपेक्षा रखते हैं कि वे एआई या एसजेआई का इस्तेमाल करने से पहले भी टैक्निकल टूल्स, जैसे औटोमेटेड मौनिटरिंग लगाएं ताकि गैरकानूनी कंटैंट्स को कंट्रोल किया जा सके.

तो फिर कानूनी क्या रह गया?

नए नियमों के हिसाबकिताब से देखें तो अब सोशल मीडिया पर लोड किया जाने वाला हर तीसरा कंटैंट या पोस्ट गैरकानूनी होगी. सिर्फ जय रामजी की, जय हनुमान और भोले शंकर वाली पोस्टें ही कानूनी रह जाएंगी या फिर वे जिन में भाजपा और सरकार सहित नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मुकेश अंबानी और गौतम अडानी जैसे देवताओं की आलोचना नहीं होगी. हालांकि थोड़ी राहत राहुल गांधी, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी जैसे नेताओं को भी मिलेगी लेकिन इस से उन्हें कोई फायदा होने वाला नहीं क्योंकि उन की इमेज बिगाड़ने के लिए भक्तों ने कुछ छोड़ा ही नहीं है और यह ‘नेक’ काम करने के लिए न्यूज़ चैनल्स और अखबार हर वक्त उपलब्ध रहते हैं जो सरकार की मुट्ठी में हैं.

असल गाज नेहा सिंह राठौर, कुणाल कामरा और ध्रुव राठी जैसे यूजर्स पर गिरेगी जो सरकार की आलोचना और खिंचाई का कोई मौका नहीं छोड़ते. अभी भी अदालतों में इन के खिलाफ कई मामले चल रहे हैं लेकिन कोई सख्त कानून वजूद में नहीं था जो उन्हें चंद घंटों में कठघरे में खड़ा कर सके इसलिए कई देवताओं की हकीकत और मंशा सामने आ कर तेजी से वायरल हो जाती थी. अब 3 घंटे के प्रावधान से बदनामी कम होगी और सरकार जब चाहेगी, जैसे चाहेगी इन के कंटैंट्स और पोस्ट सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स से हटवा देगी. वजह, उस ने भी अदालत की तरह कार्रवाई करने का हक ले लिया है.

कोई कंटैंट आपत्तिजनक है या नहीं, यह तय होतेहोते गंगा जी का गैलनों पानी बह चुका होगा और तब तक कंटैंट अपनी सार्थकता खो चुका होगा. कैसे फ्री स्पीच का गला घोंटने के लिए सरकार ने अपने पंजे बोलने वालों की गरदन पर रख दिए हैं, यह इस से साफ है कि कंटैंट हटाने का फैसला सरकार ने अपने हाथ में रखा है. यानी, हर वह बात गलत होगी जो सरकार को नागवार गुजरेगी.

इस तरह अब सबकुछ गैरकानूनी सा बना दिया गया है. यह, दरअसल, नियंत्रण की आड़ में सैंसरशिप है. सरकार की असल मंशा औनलाइन डिस्कोर्स यानी औनलाइन चर्चा या संवाद, जिस में सैकड़ोंहजारों लोग अपनी राय रखते हैं, को रोकने की है न कि मिसइन्फौर्मेशन को रोकने की. जाहिर है, डीपफेक की आड़ ले कर राजनीतिक आलोचना और सटायर को दबाया जाएगा जो सरासर संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन होगा.

3 घंटे में क्या ही होगा?

अव्वल तो आम लोगों को इन नए नियमों से कोई लेनादेना नहीं क्योंकि वे यूजर के नाम पर सिर्फ दर्शक होते हैं. वे कुछ कहते नहीं बल्कि दूसरों की सुन कर अपनी राय कायम करते हैं. अब उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स पर भी न्यूज चैनल्स और अखबारों की तरह एकतरफा भगवा सामग्री मिलेगी. वह सामग्री जो सरकार की नीतियों, फैसलों और मंशा के बारे में नए सिरे से सोचने का मौका देती है, उसे महज 3 घंटे में गायब कर दिया जाएगा.

सरकार इन बदलावों को ले कर कितनी हड़बड़ी में थी, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इतने कम वक्त में कंटैंट की जांच भी हो जाएगी, उस की सच्चाई भी परख ली जाएगी और फिर उसे हटा भी लिया जाएगा. यह किसी पौराणिक करिशमे से कम बात नहीं तो और क्या है. इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स पर लाखों पोस्ट रोज लोड होती हैं; उन में से जायजनाजायज को छांटना और हटाना आसान नहीं होगा.

इतने कम समय में कानूनी और गैरकानूनी में फर्क कर पाना भी बच्चों का खेल नहीं. लेकिन सरकार की मंशा साफ है कि उस के खिलाफ जो भी सामग्री हो वह चाहे फिर असल में उस के खिलाफ न हो, उसे जल्द से जल्द हटा दिया जाए तो कोई क्या कर लेगा. यह बुलडोजर चलाने जैसी बात नहीं तो और क्या है जिस में सुनवाई या अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया जाता, इमारतें सीधे जमींदोज कर दी जाती हैं.

मेटाडाटा और डिक्लरेशन यानी इच्छामृत्यु

मेटाडाटा दरअसल डिजिटल सैंसरशिप की पहली सीढ़ी होता है जिस के तहत सरकार को यह पता लगाने में देर नहीं लगनी कि कौन किस के संपर्क में है और कितनी बार और कबकब रहा. फिर भले ही मैसेज एन्क्रिप्टेड हो. इतना ही नहीं, सरकार यह देख सकती है कि आप की डिवाइस किस लोकेशन से लौगइन हुई यानी यह प्राइवेसी पर भी हमला है. यह और बात है कि यह बात अभी किसी की समझ नहीं आ रही है.
किन पोस्टों पर एकाएक ही व्यूज बढ़े, यह भी सरकार से छिपा नहीं रहेगा. इस नैटवर्क मैपिंग से किसी भी मुद्दे पर सक्रिय लोगों के सोचने का तरीका या पैटर्न सरकार समझ लेगी और जो उसे अपने खिलाफ लगेगा उसे लपेटे में ले लेगी. उन मीडियाकर्मियों के लिए तो यह बहुत बड़ा खतरा है जिन के लिए डाटा सुरक्षा बेहद अहम और जरूरी होता है. क्योंकि सरकार और उस की जांच एजेंसियां बिना कंटैंट पढ़े ही कौल डिटेल रिकौर्ड से या लौग्स से संपर्क श्रृंखला समझ सकती हैं.

यही चालाकी डिक्लरेशन के मामले में थोपी गई है जिस में यूजर को अपनी जन्मकुंडली देना पड़ेगी. इसे अगर मेटाडाटा से लिंक कर देखा जाए तो कौन किस के संपर्क में है, किस पोस्ट पर ऐक्टिव है और किस नैटवर्क से जुड़ा है, यह जानने में सरकार को ज्यादा माथाफोड़ी नहीं करनी पड़ेगी. भोपाल के एक कंप्यूटर प्रोफैसर की मानें तो यह सौफ्ट सैंसरशिप है.

`अब होगा यह भी कि मेटाडाटा, सैल्फ डिक्लरेशन और एल्गोरिदमिक विश्लेषण या मिश्रण तीनों मिल कर एक ऐसा चक्रव्यूह रच देंगे जिस में किसी भी अभिमन्यु की हत्या आसानी से की जा सकती है. इस में, बकौल प्रोफैसर साहब, `पोस्ट हटाने की भी खास जरूरत नहीं पड़ेगी, उस की रीच कम कर देना भी एक विकल्प सरकार या एजेंसी के पास होगा. यह गाज छोटेमोटे पत्रकारों पर ज्यादा गिरेगी. उन्हें कानूनी नोटिसों और धौंस के जरिए ही हतोत्साहित करना मुमकिन होगा…

डिजिटल सैंसरशिप का शिलान्यास

डीपफेक बिलाशक एक बड़ी समस्या है लेकिन वह इन या उन कानूनों से हल नहीं होने वाली. यह सड़क हादसों सरीखी होती है जिसे कोई कानून नियंत्रित नहीं कर सकता. बात अगर ट्रैफिक सैंस की हो तो हादसे कम जरूर हो सकते हैं, यही हाल डिजिटल ट्रैफिक का है. इन बदलावों की आड़ में सरकार ने डिजिटल सैंसरशिप का शिलान्यास करते खुद के लिए राजपथ बना लिया है, जिस पर आम आदमी पांव भी रखेगा तो अपराधी मान लिया जाएगा.

इस डिजिटल सैंसरशिप का बड़ा फायदा सरकार चुनावों के वक्त उठाएगी जब विरोधियों के प्रचार को बिना किसी सुनवाई का मौका दिए गैरकानूनी घोषित कर देगी. अदालत तक बात पहुंचतेपहुंचते चिड़िया खेत चुग चुकी होगी. लोकतंत्र की इस से बड़ी दुर्दशा कोई और हो भी नहीं सकती कि विपक्ष से प्रचार और अपनी बात कहने का मौका और हक ही छीन लिया जाए.

20 फरवरी से हर पोस्ट, हर कंटैंट डिजिटल पहरे में होगा. बिना डरे अपनी बात कहने वाले नए नियमों की धमक से ही डरे हुए हैं. सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स भी दिक्कत में हैं क्योंकि उन का खर्च भी बढ़ेगा और बेवजह का काम भी उन के सिर लाद दिया गया है. तिस पर डर यह कि न जाने कब सरकार उन पर प्रतिबंध लगा दे. ये प्लेटफौर्म्स सिर्फ इसलिए लोकप्रिय और लोगों की पसंद नहीं हैं कि ये सहजता से उपलब्ध हैं बल्कि इसलिए भी लोकप्रिय और पसंदीदा बने हुए हैं कि इन पर आप सरकार की गलतियों और ज्यादतियों पर अपनी भड़ास निकाल सकते हैं. सरकार को यही तो अखर रहा था. New IT Rules 2026

Satirical Story In Hindi : आयुर्वेदिक प्रेम – आखिर प्रेम के टिकाऊपन पर क्यों न जोर दिया जाए?

Satirical Story In Hindi : प्रेम, प्यार, मुहब्बत के विषय में हमारी सोच थोड़ी अलग है. सस्ता, सरल और टिकाऊ प्रेम की अवधारणा में हमारी लाजवाब खोज आयुर्वेदिक प्रेम है. भ्रमित न हों, यहां हम चिकित्सा विज्ञान पर चर्चापरिचर्चा नहीं कर रहे हैं. विषय पर टिके रह कर हम प्रेम विषय पर आते हैं. ज्ञानीजन जानते हैं, प्रेम बहुत कठिन है, इस के साइड इफैक्ट्स प्रेमीप्रेमिका को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष रूप से घरपरिवार, आसपड़ोस, गलीमहल्ले, गांवबस्ती, शहर या यों कहें कि पूरे समाज को प्रभावित करते हैं, तो भी गलत नहीं होगा. प्रत्यक्षतया 2 जीवों से जुड़े लेकिन उन के प्रेम को देख जलन, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, आन, बान, शान जैसे दूसरे अनिवार्य पहलू अन्य लोगों को भी इस में देरसवेर घसीट ही लेते हैं. ‘फटे में पैर न उलझाएं’ ऐसा भला कैसे संभव है? यदि पी नहीं पाए तो उसे लुढ़काने, फैलाने या बिखेर कर औचित्यहीन करना मानव स्वभाव है. सो, प्रेम 2 जीवों तक सीमित रह ही नहीं सकता. यह शाश्वत सत्य है. ‘इश्कमुश्क छिपाए नहीं छिपते,’ इस कहावत को इसीलिए बुजुर्ग गढ़ गए थे.

अब दोबारा आयुर्वेद कौन्सैप्ट पर लौटते हैं. सब जानते हैं कि भारतीय संस्कृति की विश्व को जो भी देन हैं उन में आयुर्वेद काफी महत्त्वपूर्ण है. हींग लगे न फिटकरी, रंग निकले चोखा, चमकदार बनाने का बेहतरीन नुसखा आयुर्वेद में छिपा है. प्रेम की पहली शर्त यही है कि यह सरलता से निबटे, ज्यादा खर्च या इतर प्रभाव पैदा न करे तो आयुर्वेद तकनीक बैस्ट रहेगी. यह हमारे अघोषित शोध का सुपरिणाम है. आजकल चायनीज लव ज्यादा प्रचलित है जो सस्ता, सरल तो बहुत है, लेकिन टिकाऊपन के मामले में एकदम जीरो है. कब लव हो गया और कब उस की समाप्ति या खात्मा हुआ, कुछ पता ही नहीं चलता. न इति का पता, न आदि का. चायनीज लव कम उम्र के छोकरेछोकरी टाइप के जीवों में ज्यादा उपयोग के कारण उन्हें स्थायित्व से लेनादेना नहीं रहता. यूज ऐंड थ्रो संस्कृति के इस जज्बे को सच्चे प्रेम की श्रेणी में रखा भी नहीं जा सकता.

एलोपैथिक प्रेम भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. यह प्रेम खासतौर पर उस एज ग्रुप में ज्यादा लोकप्रिय है जो इंस्टैंट लव तो चाहते हैं, लेकिन उन में सब्र व धैर्य नाम की चीज नहीं है. चटपट प्रेमानुभूति और पूर्णतया फलदायी प्रक्रिया, इसलिए उन्हें एलोपैथी में प्रेम ज्यादा मुफीद रहता है. एलोपैथी की खासीयत ही यह है कि सबकुछ तुरतफुरत बिना रोग के लक्षणों की सही पहचान के एंटीबायोटिक्स के माध्यम से तुरंत आराम मिल जाता है. यही खूबी इस श्रेणी के प्रेम में भी पाई जाती है. प्रेमीप्रेमिका को कुछ समय के लिए रिलीफ मिलने की शर्तिया गारंटी हो सकती है, लेकिन उस के साइड इफैक्ट्स का उन के पास कोई उपाय नहीं है. इस विधा के प्रेम के नजारे भी कड़वी टैबलेट्स, इंजैक्शन और औपरेशन जैसे हैं. खुद चीरफाड़ या पोस्टमौर्टम न करें तो प्रेम के दर्शक इस जिम्मेदारी को बिना समय गवांए निबटा देते हैं. जितनी स्पीड से लवेरिया फीवर चढ़ता है उसी तेजी से नीचे भी गिर जाता है. न नब्ज का पता न दिल की धड़कनों का. ऐसे गायब होता है जैसे गधे के सिर से सींग. हम इस तकनीक को कतई लाभप्रद नहीं मानते.

प्रेम में होम्योपैथी तकनीक भी बेकार है. यह स्वीट मगर स्लो तकनीक है. रक्त में शुगर की उपलब्धता पर रोग की पहचान और उपचार करती है, लेकिन इस का धीमा असर उपभोक्ता के मन में कोफ्त पैदा करता है. नौ दिन चले अढ़ाई कोस, किस शख्स में होगा इतना धैर्य? प्रेम जनून है तो जादू भी जो प्रेमाकुल के सिर चढ़ कर बोलता है. तो, इस शर्त पर यह तकनीक भी फिट नहीं बैठती. यह सच है कि होम्योपैथी भी साइड इफैक्ट से मुक्त है, लेकिन ऐसा सोना किस काम का जो समय पर अपनी चमक ही न दिखाए. इसी तरह यूनानी पैथी का हाल है. इस की कमी इस का कड़वापन है. रसायनों के घालमेल में लव कैमेस्ट्री का इंबैलेंस होना स्वाभाविक है.

आयुर्वेद तकनीक ही प्रेम के लिए सौ फीसदी मुफीद नजर आती है. धीमेधीमे ही सही लेकिन रोग के लक्षणों की पूर्णतया पहचान कर तदनुरूप प्रेमव्यवहार से परिपक्व प्रेम की संभावना बढ़ जाती है. ऐसे प्रेम का सब से बड़ा फायदा यह रहता है कि बात बनी तो ठीक, वरना प्रयुक्त जड़ीबूटियां शरीर को निरोगी और मजबूत बनाने के काम में तो आएंगी ही. ऋषिमुनियों की इस नायाब खोज का हम इस रूप में इस्तेमाल करें तो भारतीय संस्कृति के संरक्षण का प्रयास भी लगेहाथों पूरा हो सकता है. आयुर्वेद में अधिकतर दवाएं शहद के साथ सेवन की जाती हैं. हनी के स्वीट यूज की इस से बढि़या सीख क्या होगी? वात, पित्त और कफ की आधारशिला पर टिका आयुर्वेद प्रेम तनमनधन के समस्त पहलुओं को सोचसमझ कर प्रेमदरिया में डूबने का संदेश देता है. शरीर की नब्ज, दिल और दिमाग की तंदुरुस्ती का खयाल रख कर प्रेम करना और उस से उत्पन्न प्रभावों को झेल लेना इस नायाब तकनीक में संभव है.

सो, भारतीय होने पर गर्व करें और यदि प्रेम कर रहे हैं या करने की तैयारी में हैं, तो इस बिंदु पर एक बार जरूर गौर फरमाएं. स्वदेशी तकनीक इतिहास रचती है, इतिहास स्वदेशी आंदोलनों से भरा पड़ा है. इसलिए, प्रेम के मामले में इसे जरूर अपनाएं, जनहित में रचित.

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