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ब्रिटिश इंडिया के दौर में अमेरिकी मिशन

British India: 19वीं सदी में बना मैरी वानामेकर गर्ल्स स्कूल आज भी प्रयागराज की पहचान है. शुरुआत में अमेरिकी प्रेस्बिटेरियन मिशन द्वारा संचालित यह स्कूल भारतीय लड़कियों की शिक्षा में मील का पत्थर साबित हुआ. इस से 20वीं सदी में हजारों महिलाएं शिक्षित हुईं जो सामाजिक सुधारों की नायिका बनीं.

19वीं सैंचुरी के ब्रिटिश इंडिया में प्रयागराज का मैरी वानामेकर गर्ल्स स्कूल अमेरिकी प्रेस्बिटेरियन मिशन का हिस्सा था. 1910 में अमेरिकी व्यापारी जौन वानामेकर ने अपनी पत्नी मेरी एरिंगर ब्राउन वानामेकर की याद में 50 हजार रुपए की लागत से इस स्कूल का निर्माण करवाया.

ब्रिटिश काल में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने में सिर्फ ब्रिटिशर्स का ही नहीं, अमेरिकी और जरमन संस्थाओं का भी बहुत बड़ा रोल था. ब्रिटिश सरकार ने 1854 के वुड्स डिस्पैच नीति के तहत भारतीय लड़कियों की शिक्षा के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए थे. नए कालेज और स्कूल बनाए गए जहां लड़कियों के पढ़ाने का सिलसिला शुरू हुआ.

इस स्कूल का उद्देश्य था भारतीय लड़कियों को शिक्षा देना, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या आर्थिक स्थिति की हों. उस समय भारत में लड़कियों की शिक्षा लगभग न के बराबर थी. लड़कियां जल्दी ब्याह दी जाती थीं और उन्हें पूजापाठ के अलावा सिर्फ घरेलू काम सिखाए जाते थे. इस स्कूल ने हजारों लड़कियों को पढ़ाया जिन में से कई उच्च पदों पर पहुंचीं. कई शिक्षिका बनीं और समाज में बदलाव लाईं. आज यह पुराना स्कूल मैरी वानामेकर गर्ल्स इंटरमीडिएट कालेज के नाम से जाना जाता है. British India

मैकाले की तार्किक शिक्षा या पौराणिक पाखंडी दीक्षा

Lord Macaulay: प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि मैकाले के एजुकेशन सिस्टम को खत्म करना जरूरी है क्योंकि मैकाले की शिक्षा व्यवस्था गुलामों की फौज तैयार करती है. यहां सवाल यह है कि अगर मैकाले से पहले भारतीय शिक्षा व्यवस्था इतनी ही उन्नत थी तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था से निकली महान हस्तियां नजर क्यों नहीं आतीं? तमाम भारतीय इतिहासकार, डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, समाज सुधारक और नेता मैकाले की शिक्षा लागू होने के बाद ही क्यों पैदा हुए? मैकाले की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षित होने वाली पहली पीढ़ी में भारत की ऊंची जाति के लोग ही क्यों थे? अगर मैकाले की शिक्षा व्यवस्था इतनी ही बुरी थी तो ऊंची जाति के लोगों ने इस का बहिष्कार क्यों नहीं किया?

अयोध्या में राममंदिर ध्वजारोहण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मैकाले की शिक्षा नीति को ले कर कहा कि मैकाले ने मानसिक गुलामी की नींव रखी. प्रधानमंत्री ने आने वाले 10 सालों में मैकाले के एजुकेशन सिस्टम को खत्म करने का टारगेट रखा है. इस से यह साफ होता है कि अंगरेजों के जमाने से चली आ रही शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से खत्म करने की तैयारी चल रही है. ऐसे में आइए जानते हैं कि लौर्ड मैकाले आखिर कौन थे और उन के एजुकेशन सिस्टम से मानसिक गुलामों की फौज कैसे पैदा होती है.

मैकाले की शिक्षा नीति से मानसिक गुलामों की फौज खड़ी होती है, यह नैरेटिव आरएसएस की विचारधारा की उपज है. संघ की नजर में लौर्ड मैकाले ही नहीं, विलियम बैंटिक, ज्योतिराव फुले, डा. अंबेडकर और महात्मा गांधी जैसे लोग विलेन ही हैं. वर्ष 1945 में नाथूराम गोडसे द्वारा संपादित पत्रिका ‘अग्रणी’ में दशहरे पर प्रकाशित एक कार्टून में रावण के 10 सिरों में 10 महान हस्तियों को दर्शाया गया था. उन में कुछ वे लोग थे जो देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे और कुछ सामाजिक क्रांति के नेता थे. उन में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद और डा. अंबेडकर जैसे लोग शामिल थे.

इस कार्टून में रावण की ओर तीरकमान लिए वीर सावरकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को राम और लक्ष्मण के रूप में दिखाया गया था. इस पत्रिका के संपादक नाथूराम गोडसे थे जो हिंदू महासभा से जुड़े थे और तब सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे.

हालांकि उस वक्त रावण के 10 सिरों में मैकाले नहीं थे लेकिन आज संघ के खलनायकों की लिस्ट में मैकाले टौप पर हैं. मैकाले को विलेन बनाने के पीछे बहुत से कारण छिपे हैं. ज्योतिराव फुले, डा. अंबेडकर और महात्मा गांधी की सीधी आलोचना से भारत के बुद्धिजीवी नाराज हो जाते हैं और वे संघ की वास्तविकता को उजागर करने में लग जाते हैं. आरएसएस बुद्धिजीवी वर्ग के साथ सीधे टकराव से हमेशा बचता है, इसलिए आरएसएस के लिए मैकाले जैसे अंगरेज आसान शिकार होते हैं.

प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था कैसी थी

इतिहास को ले कर आरएसएस हमेशा भ्रम पैदा करता आया है. भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था के बारे में भी संघ का अपना ?ाठा इतिहास है जिस के तहत वह दावा करता है कि अंगरेजों के आने से पहले भारत की शिक्षा व्यवस्था उत्कृष्ट थी. पहले भारत में स्कूलों की जगह गुरुकुल चलते थे. आरएसएस के अनुसार, अंगरेज मानते थे कि भारत की शिक्षा व्यवस्था दुनिया की सब से ज्यादा विकसित और अच्छी व्यवस्था है. इसे खत्म करने के लिए ही मैकाले को भारत भेजा गया.

मैकाले का कहना था कि वे भारत के लोगों को ऐसी शिक्षा देना चाहते हैं जिस से वे रंग या शक्ल से तो भारतीय रहें लेकिन उन का दिमाग ब्रिटिश हो. मैकाले के बारे में दक्षिणपंथी जमात वर्षों से इस तरह का भ्रम फैलाती आई है. जबकि, सच्चाई इस से अलग है.

यह सच है कि थौमस बेबिंगटन मैकाले भारत में इंग्लिश भाषा में पढ़ाई के जनक थे. 10 जून, 1834 को मैकाले ने गवर्नर जनरल की काउंसिल के कानूनी सदस्य के रूप में काम करना शुरू किया था. बौद्धिक क्षमता और शिक्षा के मामले में मैकाले ब्रिटिश सरकार के तमाम राजनेताओं में सब से ऊपर थे. यही वजह है कि उन्हें भारत में लोक शिक्षा समिति का सभापति बनाया गया. इस के बाद 1935 में मैकाले ने अपना मशहूर स्मरणपत्र गर्वनर काउंसिल के सामने रखा जिसे इंडियन एजुकेशन एक्ट की नींव कहा जाता है.

मैकाले ने सब उलट दिया

मैकाले ने गुरुकुलों और मदरसों को खत्म करने का काम किया. साथ ही, अरबी और संस्कृत में होने वाली पढ़ाई का भी अंत कर दिया. गुरुकुल और मदरसों की जगह उन्होंने कौन्वेंट स्कूलों और अंगरेजी पर जोर दिया, साथ ही, उन्होंने संस्कृत और अरबी भाषाओं में चलने वाले मदरसों व गुरुकुलों को मान्यता देने से इनकार कर दिया. इस के बाद से ही अंगरेजी मीडियम स्कूलों की व्यवस्था शुरू हो गई जो आज तक चली आ रही है.

ब्रिटिश सरकार के चार्टर एक्ट 1833 के तहत भारत के लिए विधि आयोग का गठन किया गया जिस के अध्यक्ष बन कर थौमस मैकाले 10 जून, 1834 को भारत आ पहुंचे. उसी वर्ष मैकाले ने भारत में नई शिक्षा नीति की नींव रखी. थौमस बेबिंगटन मैकाले शिक्षा क्रांति के जनक ही नहीं थे, उन्होंने न्याय को भी आम आदमी की पहुंच में ला कर खड़ा कर दिया.

6 अक्तूबर, 1860 को मैकाले द्वारा लिखी गई भारतीय दंड संहिता यानी इंडियन पीनल कोड लागू हुआ. आईपीसी लागू होने पर कानून की नजर में ब्राह्मण और शूद्र सभी बराबर हो गए. आईपीसी से पहले भारत में अगर ब्राह्मण  हत्या का आरोपी भी होता था तो उसे मृत्युदंड नहीं दिया जाता था. शूद्र और औरतों को शिक्षा का अधिकार नहीं था.

मैकाले भारत के शूद्रों/अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए किसी मसीहा से कम न थे. वे हजारों साल से शिक्षा के अधिकार से वंचित समाज के लिए मुक्तिदूत बन कर भारत आए थे. उन्होंने शिक्षा पर पुरोहित वर्ग के एकाधिकार को समाप्त कर सभी को समान रूप से शिक्षा पाने का अधिकार दिया और पिछड़ों, दलितों व आदिवासियों और औरतों के लिए दरवाजे खोल दिए.

ब्रिटिश गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक द्वारा गठित सार्वजनिक शिक्षा समिति के अध्यक्ष के रूप में मैकाले ने अपने विचार ‘मैकाले मिनट्स’ में

2 फरवरी, 1835 में दिए और उन के विचार ब्रिटिश सरकार द्वारा 7 मार्च, 1835 को स्वीकार किए गए. मैकाले ने सामाजिक भेदभाव, शिक्षण में भेदभाव और दंड संहिता में भेदभाव देख कर ही आधुनिक शिक्षा पद्धति की नींव रखी और भारतीय दंड संहिता लिखी. मैकाले की मौडर्न एजुकेशन पौलिसी में सब के लिए शिक्षा के द्वार खुले थे, वहीं भारतीय दंड संहिता के कानून ब्राह्मण  और अतिशूद्र सब के लिए समान बने.

गैरबराबरी पर खड़ी थी गुरुकुलों की व्यवस्था

पौराणिक व्यवस्था से भारत के उच्च वर्ग को इतनी महानता प्राप्त होती रही थी कि वे अपनेआप को धरती का प्राणी होते हुए भी आसमानी पुरुष यानी देवताओं के भी देव सम?ा करते थे. मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति से ब्राह्मणों को अपने सारे विशेषाधिकार छिनते नजर आए. इसी कारण से उन्होंने खुल कर मैकाले की नीति का विरोध किया और आज भी कर रहे हैं.

दक्षिणपंथियों की नजर में लौर्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति केवल बाबू बनाने की शिक्षा देती है जबकि सच यह है कि लौर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति से शूद्र भी बाबू बन सकते हैं. प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति से तो यह कल्पना से परे की बात है. बस, इसी बात से मैकाले की आलोचना जायज हो जाती है.

मैकाले को विलेन बताने वाले कभी यह नहीं बताते कि प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के किस काल में किस राजा के यहां कोई अतिशूद्र वर्ग का व्यक्ति मंत्री, पेशकार, महामंत्री या सलाहकार हुआ करता था? इसलिए इन जातियों के लिए तो यह शिक्षा पद्धति कुहनी पर लगा गुड़ ही साबित हुई. प्राचीन शिक्षा व्यवस्था की लाख अच्छाइयां रही होंगी पर यदि शूद्रों को पढ़ाया ही नहीं जाता हो, गुरुकुलों में प्रवेश ही नहीं होता हो तो यह किस काम की?

प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का आधार प्राचीन भारतीय धर्मग्रंथ रहे. इस एजुकेशन सिस्टम के तहत शिक्षा सिर्फ ऊंची जाति, खासकर ब्राह्मणों, को दी जाती थी. गुरुकुलों में धार्मिक पूजापाठ और कर्मकांड पढ़ाया जाता था. धार्मिक ग्रंथ, देवीदेवताओं की कहानियां, चिकित्सा, तंत्रमंत्र, ज्योतिष, जादूटोना यही सब सिलेबस का हिस्सा थे. इस एजुकेशन सिस्टम का माध्यम मुख्यतया संस्कृत रहता था. इस में ज्ञानविज्ञान, भूगोल, इतिहास और आधुनिक विषयों का अभाव रहता था या अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से बात कही जाती थी. राम ने हजारों वर्ष राज किया, भारत जम्बू द्वीप में था, कुंभकर्ण का शरीर कई योजन था, हनुमान सूरज निगल गए.

पौराणिक शिक्षा पद्धति के तहत पूरे देश में कभी ऐसा कोई गुरुकुल या विद्यालय नहीं खोला गया जिस में सभी वर्णों और जातियों के बच्चे पढ़ते हों. ब्राह्मणों की शिक्षा नीति ने कोई आंदोलन खड़ा नहीं किया, बल्कि लोगों को अंधविश्वासी, धर्मप्राण, अतार्किक और सबकुछ भगवान पर छोड़ देने वाला ही बनाया. गुरुकुलों में प्रवेश से पूर्व छात्र का यज्ञोपवीत संस्कार अनिवार्य था. चूंकि हिंदू धर्म शास्त्रों में शूद्रों का यज्ञोपवीत संस्कार वर्जित है, इसलिए शूद्र तो गुरुकुलों के द्वार तक भी नहीं पहुंच सकते थे.

औरतें तो वैसे भी जन्मजात शूद्र थीं, इसलिए उन्हें भी शिक्षा से वंचित रखा गया. भारतीय शिक्षा व्यवस्था में तर्क का कोई स्थान नहीं था. धर्म और कर्मकांड पर तर्क करने वाले को नास्तिक करार दिया जाता था. इस से छात्र विश्व से भी परिचित नहीं हो पाते थे क्योंकि भारत से बाहर का ज्ञान तो वर्जित था.

भारतीय शिक्षा व्यवस्था की तारीफों का ढिंढोरा पीटने वाले लोग कभी गुरुकुलों की सच्चाई नहीं बताते. पौराणिक शिक्षा व्यवस्था ने भारत की बहुसंख्यक आबादी को शिक्षा से वंचित रखा और भारत के उच्च वर्ग को काहिल और अकर्मण्य बनाए रखा, जिस से यह देश हजारों वर्षों तक गुलाम रहा.

मैकाले की इंग्लिश शिक्षा का कमाल

लौर्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति का आधार परिस्थितियों के अनुसार पैदा हुई जरूरतें रहीं और इस शिक्षा व्यवस्था से उन्होंने वंचित तबके को भी जोड़ दिया. लौर्ड मैकाले ने शिक्षक भरती की नई व्यवस्था की, जिस में हर जाति व धर्म का व्यक्ति शिक्षक बन सकता था. तभी तो डा. अंबेडकर के पिता रामजी सकपाल जैसे लोग सेना में शिक्षक बन पाए. मैकाले की व्यवस्था में धार्मिक पूजापाठ और कर्मकांड के बजाय तार्किकता को महत्त्व दिया गया. इस में इतिहास, कला, भूगोल, भाषाविज्ञान, विज्ञान, इंजीनियरिंग, चिकित्सा और ऐडमिनिस्ट्रेशन शामिल हैं. मैकाले की शिक्षा का माध्यम शुरू में इंग्लिश भाषा और बाद में इस के साथसाथ सभी प्रमुख क्षेत्रीय भाषाएं हो गईं.

मैकाले की शिक्षा में ज्ञानविज्ञान, भूगोल, इतिहास और आधुनिक विषयों को महत्त्व दिया गया और इस में अवैज्ञानिक बातों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी गई. मैकाले की नीति के तहत 1835 से 1853 तक भारत के ज्यादातर जिलों में स्कूल खोले गए. यहीं से भारत के मौडर्नाइजेशन की नींव पड़ी. भारत में स्वाधीनता आंदोलन में लौर्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति का बहुत भारी योगदान रहा क्योंकि लोग मौडर्न शिक्षा का हिस्सा बनने लगे. उन्हें देशविदेश की जानकारी मिलने लगी. अगर शूद्रों और अतिशूद्रों का भला किसी शिक्षा से हुआ तो वह लौर्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा प्रणाली से ही हुआ.

मैकाले ने संस्कृत साहित्य पर प्रहार करते हुए लिखा है, ‘‘क्या हम ऐसे चिकित्साशास्त्र का अध्ययन कराएं जिस पर इंग्लिश पशुचिकित्सा को भी लज्जा आ जाए. क्या हम ऐसे ज्योतिष को पढ़ाएं जिस पर अंग्रेज बालकबालिकाएं हंसें. क्या हम ऐसे भूगोल बालकों को पढ़ाने को दें जिस में शीरा तथा मक्खन से भरे समुद्रों का वर्णन हो.’’ लौर्ड मैकाले संस्कृत तथा फारसी भाषा पर धन व्यय करना मूर्खता सम?ाते थे.

मैकाले : मसीहा या विलेन

देखा जाए तो मैकाले भारत में एक मसीहा के रूप में आए जिन्होंने 4 हजार वर्ष पुरानी सामंतशाही व्यवस्था को ध्वस्त कर के, जाति और धर्म से ऊपर उठ कर, एक इंसानी समाज बनाने का आधार दिया. लौर्ड मैकाले ने शिक्षा और कानून के जरिए वर्णव्यवस्था को ध्वस्त किया तथा गैरबराबरी वाले साम्राज्य को उखाड़ फेंका. मैकाले की शिक्षा के कारण ही ज्योतिबा फुले, साहूजी महाराज, पेरियार रामास्वामी और बाबासाहेब अंबेडकर जैसे लोग सामने आए जिन्होंने भारत का नया इतिहास लिखा.

स्वामी विवेकानंद ने मैकाले की लेखनशैली और बौद्धिक क्षमता की तारीफ की है. प्रसिद्ध इतिहासकार आर सी मजूमदार ने माना कि मैकाले की शिक्षा नीति ने भारत में आधुनिक विज्ञान और इंग्लिश के जरिए वैश्विक ज्ञान तक पहुंच बनाई. संजीव सान्याल, जो अर्थशास्त्री और मोदी सरकार के सलाहकार रह चुके हैं, ने कई बार कहा कि मैकाले की इंग्लिश शिक्षा ने भारत को 19वीं सदी में ही वैश्विक पटल पर ला खड़ा किया और आधुनिक भारत की नींव रखी.

वैज्ञानिक और कमैंटेटर आनंद रंगनाथन कहते हैं, ‘‘मैकाले ने भारत को इंग्लिश दे कर सब से बड़ा उपकार किया, वरना हम आज भी संस्कृत में सौफ्टवेयर कोड लिख रहे होते.’’ अमेरिकी बुद्धिजीवी डेविड फ्राली ने कहा कि मैकाले की नीति ने अनजाने में भारत को आधुनिक बनने का रास्ता दिखा दिया. उदारवादी कौलमनिस्ट जैसे स्वप्न दासगुप्ता, तवलीन सिंह ने भी लिखा कि मैकाले ने भारत में एक नई बुद्धिजीवी पीढ़ी तैयार की जो बाद में स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व कर सकी.

जवाहरलाल नेहरू स्वयं मैकाले के बहुत बड़े प्रशंसक थे. आज के भारत में लौर्ड मैकाले की खुल कर तारीफ करने वाले बुद्धिजीवी यह तर्क देते हैं कि ‘मैकाले की वजह से ही भारत आज सूचना क्रांति का हिस्सा बन सका.’

ऊंची जाति वालों के मसीहा थे मैकाले

1835 में थौमस मैकाले के मिनट औन एजुकेशन के लागू होने के बाद ही भारत में वैचारिक क्रांति की शुरुआत हुई. सती उन्मूलन, विधवा विवाह, बाल विवाह पर रोक और कई सामाजिक सुधार करने वाले नेता मैकाले की शिक्षा से ही उभरे और समाज में बड़े परिवर्तन कर पाए.

मैकाले की नीति ने ही 19वीं सदी में भारत की शिक्षा व्यवस्था को आकार देना शुरू किया जिस में सरकारी स्कूल, कालेज और यूनिवसिटीज में इंग्लिश भाषा, पश्चिमी विज्ञान, कानून और साहित्य पर जोर दिया गया. इस से पहली और दूसरी पीढ़ी के वे तमाम लोग निकल कर सामने आए जिन्हें आज हम 19वीं और 20वीं सदी के महान लोगों में गिनते हैं. आज आरएसएस और बीजेपी जिन बड़े नेताओं को अपने आदर्श के रूप में रखती है उन में से ज्यादातर मैकाले की शिक्षा की पैदाइश ही हैं.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कलकत्ता के प्रैसिडैंसी कालेज से इंग्लिश में औनर्स किया और कलकत्ता यूनिवर्सिटी से एमए और कानून की डिग्री ली थी.

एम एस गोलवलकर ने नागपुर के हिस्लाप कालेज से स्नातक और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से एमएससी तथा कानून की पढ़ाई की थी. बीएचयू के नाम में भले ही हिंदू शब्द जुड़ा था लेकिन उस का पाठ्यक्रम मैकाले की शिक्षा पर ही आधारित था.

के बी हेडगेवार ने कलकत्ता के नैशनल मैडिकल कालेज से मैडिसिन में डिग्री ली. यह कालेज भी मैकाले की शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा था.

लाला लाजपत राय ने रेवाड़ी के गवर्नमैंट हायर सैकंडरी स्कूल और लाहौर के गवर्नमैंट कालेज से पढ़ाई की, जो सीधे ब्रिटिश सरकारी शिक्षा प्रणाली के तहत थे जिसे मैकाले ने बनाया था. अरविंदो घोष ने इंगलैंड में सैंट पौल स्कूल और कैम्ब्रिज के किंग्स कालेज से पढ़ाई की, जो पूरी तरह ब्रिटिश शिक्षा थी. बाल गंगाधर तिलक ने पूना के डेक्कन कालेज से गणित और संस्कृत में स्नातक किया. हालांकि तिलक की शुरुआती शिक्षा घर पर हुई लेकिन कालेज स्तर पर उन्होंने मैकाले की शिक्षा को ही ग्रहण किया.

विनायक दामोदर सावरकर ने पूना के फर्गयूसन कालेज से स्नातक किया और लंदन में कानून की पढ़ाई की. फर्गयूसन कालेज डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी का था, लेकिन पाठ्यक्रम ब्रिटिश था. बंकिम चंद्र चटर्जी ने हुगली कालेजिएट स्कूल और प्रैसिडैंसी कालेज से पढ़ाई की जो मैकाले की नीति पर चलने वाली संस्थाएं थीं. वे कलकत्ता यूनिवर्सिटी के पहले स्नातकों में से एक थे. गोपाल कृष्ण गोखले ने बौम्बे के एलफिंस्टन कालेज से स्नातक किया और लंदन में कानून की पढ़ाई की. यह ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली का हिस्सा था.

ये सभी नेता ब्रिटिश काल में शिक्षित हुए. इन तमाम लोगों की पढ़ाई उस मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के कारण हुई जो इंग्लिश भाषा और पश्चिमी ज्ञान पर आधारित थी. विडंबना देखिए कि मैकाले की शिक्षा से निकले इन में से कई नेताओं ने बाद में मैकाले के एजुकेशन सिस्टम की आलोचना की.

सवाल यह है कि मैकाले के एजुकेशन सिस्टम के लागू होने से पहले भारत का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग क्या कर रहा था? अगर मैकाले से पहले भारतीय शिक्षा व्यवस्था इतनी ही उन्नत थी तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था से निकले लोग नजर क्यों नहीं आते? तमाम भारतीय इतिहासकार, वैज्ञानिक, समाज सुधारक और नेता मैकाले की शिक्षा लागू होने के बाद ही क्यों पैदा हुए? मैकाले की शिक्षा व्यवस्था लागू होने के बाद इस देश में 600 से ज्यादा रियासतें थीं, सभी रियासतों ने अपनी औलादों को मैकाले की दी हुई ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली में ही क्यों शिक्षित किया? मैकाले की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षित होने वाली पहली पीढ़ी भारत की ऊंची जाति के लोग थे. अगर मैकाले की शिक्षा व्यवस्था इतनी ही बुरी थी तो ऊंची जाति के लोगों ने इस का बहिष्कार क्यों नहीं किया?

इंग्लिश शिक्षा को खत्म करना कितना व्यावहारिक

भारत में ऐसे विद्वानों की कमी नहीं है जो प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का गुणगान करते नहीं थकते और लौर्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति को पानी पीपी कर गालियां देते हैं. लौर्ड थौमस बेबिंग्टन मैकाले को भारत के दक्षिणपंथी इंग्लिश शिक्षा प्रणाली थोपने और भारतीय सभ्यता को हीन बताने वाला कहते हैं लेकिन ये लोग खुद ही कौन्वेंट स्कूलों की पैदावार होते हैं या अपने बच्चों को महंगे इंग्लिश माध्यम स्कूलों में पढ़ाते हैं.

अगर मैकाले की शिक्षा इतनी ही खराब है तो देश में धड़ल्ले से कौन्वेंट स्कूल क्यों खोले जा रहे हैं? बीजेपी के ज्यादातर नेताओं के बच्चे महंगे इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ते हैं जिन की फीस लाखों में है. कई नेताओं के बच्चे तो विदेशों में पढ़ते हैं.

भारत में ज्यादातर ‘कौन्वेंट स्कूल’ आज भी ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित होते हैं. उन में अमीरों के बच्चे पढ़ते हैं. आश्चर्य की बात यह है कि मैकाले को गरियाने वाले लोग ईसाई मिशनरीज द्वारा संचालित स्कूलों की तर्ज पर अपने गुरुकुल भी नहीं खोल पाए. ये महंगे कौन्वेंट स्कूल पूरी तरह मैकाले के एजुकेशन सिस्टम पर आधारित होते हैं और इतने महंगे होते हैं कि आम आदमी तो इन स्कूलों के बारे में सोच भी नहीं सकता.

दिल्ली के सैंट फ्रांसिस स्कूल की सालाना फीस तकरीबन 20 लाख रुपए है. लौरेटो कौन्वेंट स्कूल दिल्ली/ कोलकाता की फीस 12 लाख रुपए तक सालाना है. दिल्ली के सैंट थौमस स्कूल  की फीस 10 लाख रुपए सालाना है. दिल्ली के ही कारमेल कौन्वेंट स्कूल की फीस 9 लाख रुपए सालाना है. मैटर डे स्कूल  की फीस 9 लाख रुपए सालाना है तो ला मार्टीनियर कालेज की फीस 15 लाख रुपए सालाना है. बिशप कौन्वेंट बौयज स्कूल, शिमला की फीस 5 लाख रुपए है. गुड शेफर्ड इंटरनैशनल स्कूल, ऊटी की फीस 15 लाख रुपए है. वुडस्टौक स्कूल, मसूरी की फीस 18 लाख रुपए है. द दून स्कूल, देहरादून की फीस 12 लाख रुपए है.

इन महंगे स्कूलों की बात छोड़ दी जाए तो भारत में निजी इंग्लिश माध्यम स्कूलों की संख्या यूडीआईएसई 2021-22 के आंकड़ों के आधार पर प्राइमरी से सीनियर सैकंडरी तक 14,89,115 है. इन में सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल  10,22,386 हैं. निजी अनएडेड स्कूल  3,35,844 हैं.

वर्ष 2019-20 के यूडीआईएसई डेटा के अनुसार, इन स्कूलों में हर साल तकरीबन 2 करोड़ 65 लाख बच्चों का एडमिशन होता है जिन में 26 प्रतिशत छात्र इंग्लिश माध्यम स्कूलों में पढ़ते हैं. इन में सरकारी और निजी दोनों शामिल हैं. 90 प्रतिशत निजी स्कूलों में इंग्लिश माध्यम से ही पढ़ाई होती है और हर आम आदमी अपने बच्चे को इन्हीं इंग्लिश माध्यम स्कूलों में ही पढ़ाना चाहता है जिन के जनक मैकाले हैं. अगर इस शिक्षा व्यवस्था से गुलाम पैदा होते हैं तो सब से पहले बीजेपी के हर कार्यकर्ता और हर नेता को इन का बहिष्कार करना चाहिए और अपने बच्चों को गुरुकुलों में पढ़ाना चाहिए.

स्वदेशी की बात करने वालों के बच्चे विदेशों में क्यों पढ़ते हैं

बीजेपी के कई बड़े नेताओं के बच्चे विदेशी यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई कर चुके हैं या कर रहे हैं. यह राष्ट्रवाद या स्वदेशी शिक्षा की बात करने वाले नेताओं का दोगलापन नहीं तो और क्या है? वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की बेटी पराकला वांग्मयी ने लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स से पढ़ाई की है. वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के दोनों बच्चे ध्रुव और राधिका गोयल ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, अमेरिका इन्वैस्टमैंट बैंकिंग की पढ़ाई की है. विदेश मंत्री एस जयशंकर के बेटे ध्रुव जयशंकर ने मैकालेस्टर कालेज और जौर्जटाउन यूनिवर्सिटी, अमेरिका से एमए किया है.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे नीरज सिंह ने लीड्स यूनिवर्सिटी, ब्रिटेन से एमबीए किया है. नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के बेटे महाआर्यमन सिंधिया ने येल यूनिवर्सिटी, अमेरिका से एमबीए किया है. बीजेपी की नेता स्मृति ईरानी की बेटी शैनेल ईरानी ने जौर्जटाउन यूनिवर्सिटी, अमेरिका से एलएलएम किया है. वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह ने जौनसन एंड वेल्स यूनिवर्सिटी, अमेरिका से होटल मैनेजमैंट किया है.

वर्ष 2020 की एक रिपोर्ट में मोदी सरकार के 56 मंत्रियों में से 12 के बच्चे विदेशी यूनिवर्सिटीज में पढ़े थे. गृहमंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह ने भारत में ही निरमा यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है जो मैकाले की शिक्षा व्यवस्था पर आधारित है.

हालांकि यह ट्रैंड सिर्फ बीजेपी तक सीमित नहीं है, कांग्रेस, सपा और कई विपक्षी पार्टियों के नेताओं के बच्चे भी विदेशों में पढ़े हैं या पढ़ रहे हैं लेकिन राष्ट्रवाद और स्वदेशी का ढिंढोरा सिर्फ बीजेपी पीटती है, इसलिए उस के नेताओं को तो अपने बच्चों के लिए गुरुकुलों की व्यवस्था करनी चाहिए?

हर साल लाखों भारतीय स्टूडैंट्स पढ़ाई के लिए विदेश जाते हैं. प्रधानमंत्रीजी को मैकाले के एजुकेशन सिस्टम को खत्म करने से पहले ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि यह ब्रेनड्रेन रुक सके.

प्रधानमंत्री के ताजा बयान को देखें तो उन के हिसाब से मैकाले की दी हुई शिक्षा व्यवस्था मानसिक गुलाम तैयार करती है जिसे खत्म करना जरूरी है. अगले 10 वर्षों में उन्होंने इस व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का संकल्प भी लिया है लेकिन 200 वर्षों से चली आ रही मैकाले की शिक्षा व्यवस्था कैसे उखाड़ फेंकी जाएगी, इस पर प्रधानमंत्री के पास कोई ब्लूप्रिंट नहीं है. इस वक्त बीजेपी के तमाम पढ़ेलिखे लोग और आरएसएस के भी तमाम पढ़ेलिखे लोगों को जोड़ लिया जाए तो इन में ज्यादातर लोगों ने मैकाले की शिक्षा व्यवस्था से ही पढ़ाई की है. सवाल यह है कि क्या ये सभी लोग मानसिक तौर पर गुलाम हैं?   द्य

इंग्लिश भाषा की महत्ता

थौमस मैकाले की शिक्षा नीति के बारे में तमाम तरह के भ्रम पैदा किए जाते हैं जबकि ऐतिहासिक नजरिए से समझते तो मैकाले ने शिक्षा व्यवस्था में क्रांति ला कर भारत के लोगों को सभ्य और शिक्षित बनाया. मैकाले शिक्षा नीति के तहत ब्रिटिश काउंसिल ने एक लाख रुपए का शुरुआती बजट तय किया था जिसे कैसे खर्च करना है, इस के बारे में मैकाले कहते हैं, ‘‘एक लाख रुपए पूरी तरह से गवर्नर जनरल इन काउंसिल के अधिकार में होने चाहिए, ताकि भारत में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन का उपयोग जिस भी तरीके से उचित सम?ा जाए, किया जा सके. गवर्नर जनरल को यह पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे अरबी और संस्कृत के अध्ययन को प्रोत्साहित करना वैसे ही बंद कर दें जैसे गवर्नर जनरल को मैसूर में बाघ मारने के इनाम को कम करने या कैथेड्रल में होने वाले भजनकीर्तन पर सरकारी खर्च रोकने का अधिकार है.’’

अब सवाल यह है कि मैकाले को अरबी और संस्कृत से समस्या क्या थी? इस का जवाब भी मैकाले ने शिक्षा समिति के सामने रखा था.

मैकाले कहते हैं, ‘‘सभी लोग इस बात पर सहमत हैं कि भारत के आम लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं में न तो साहित्यिक और न ही वैज्ञानिक ज्ञान उपलब्ध है. ये भाषाएं इतनी गरीब और असभ्य हैं कि जब तक इन्हें किसी दूसरी भाषा से समृद्ध नहीं किया जाता, तब तक इन में किसी मूल्यवान पुस्तक का अनुवाद करना आसान नहीं होगा. जिन लोगों के पास उच्च शिक्षा प्राप्त करने के साधन हैं उन की बौद्धिक उन्नति किसी ऐसी भाषा के माध्यम से ही हो सकती है जो उन की मातृभाषा न हो. संस्कृत में लिखी गई सभी पुस्तकों से प्राप्त ऐतिहासिक ज्ञान इंगलैंड के प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली साधारण पुस्तकों से भी कम मूल्यवान है. भौतिक और नैतिक दर्शन के हर क्षेत्र में भारत की भाषाओं की अपेक्षा इंग्लिश ज्यादा समृद्ध है.’’

तर्क के दृष्टिकोण से देखें तो मैकाले ने कड़वा सच कहा था. मदरसे या गुरुकुल में शिक्षा के नाम पर जो कुछ पढ़ाया जाता था उसे एजुकेशन नहीं कहा जा सकता था. आज भी मदरसों और गुरुकुलों की शिक्षा पद्धति में कोई ज्यादा बदलाव नहीं है. ये शिक्षण संस्थाएं बाद में हैं पहले ये धार्मिक संस्थाएं होती हैं जिन का उद्देश्य महज मुल्लाओं और पोंगापंडितों को तैयार करना होता है.

सवाल यह है कि अगर मैकाले इंग्लिश की वकालत न कर के पर्शियन की वकालत करते तो क्या आज नरेंद्र मोदी खुश होते? वर्ष 1835 में हिंदी कहां लिखी जा रही थी, यह भाजपा बताएगी क्या? संस्कृत में कौनकौन से ग्रंथ वर्ष 1835 के आसपास लिखे गए और छपे और करोड़ों ने पढ़े? मैकाले की शिक्षा नीति लागू होने से पहले इतिहास, भूगोल, भौतिकी, एस्ट्रोनौमी, मैडिसिन और तकनीक पर भारतीय भाषाओं में कितना काम हुआ?

क्या भाजपा के बुद्धिजीवी नरेंद्र मोदी का समर्थन करने के लिए उन संस्कृत ग्रंथों के नाम लेंगे जो 6 से 12 साल तक के बच्चों को वर्ष 1835 में पढ़ाए जा सकते थे. उस समय तक तो बाल रामायण और बाल महाभारत संस्कृत में नहीं लिखी गई थीं. मैकाले संस्कृत और फारसी की बात कर रहे थे, उस भाषा की नहीं जो अलगअलग जगह बोली तो जा रही थी, लिखी नहीं जा रही थी. Lord Macaulay

 

 

एससी वर्ग अपने अधिकारों की बात करने वाली फिल्मों को फ्लौप करने पर अमादा क्यों?

Movie Flop Reasons: कहते हैं सिनेमा समाज का आईना होता है. बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह, दहेज और जमींदारों के उत्पीड़न जैसे सामाजिक मुद्दों पर भारतीय सिनेमा ने बेहतरीन फिल्में दी हैं. इन सामाजिक मुद्दों को उठाने वाली फिल्मों के जरिए फिल्म निर्माताओं ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी तय की है, साथ ही, इन फिल्मों ने समाज को जागृत करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. लेकिन जातिआधारित भेदभाव, छुआछूत, सामाजिक उत्पीड़न, दलित संघर्ष और शोषित वर्ग के सशक्तीकरण को केंद्र में रख कर फिल्म बनाने की हिम्मत बेहद कम फिल्मकारों ने ही दिखाई है.

सिनेमा समाज को बदलने का जरिया नहीं है, यह एक बिजनैस है. बौलीवुड में हर निर्माता पैसा कमाने के मकसद से फिल्में बनाता है. एक फिल्म को बनाने में खासा बजट लगता है. ऐसे में अगर फिल्म न चले तो निर्माताओं के बरतन तक बिक जाते हैं. सो, फिल्म निर्माता ऐसे मुद्दों को छूते भी नहीं जो घाटे का सौदा साबित हों. लेकिन, कुछ फिल्मकार ऐसे भी हैं जो लीक से हट कर काम करते हैं और सिनेमा के जरिए समाज के प्रति अपनी जवाबदेही तय करते हैं.

इस में दो राय नहीं है कि भारत का एससी वर्ग ऐतिहासिक दमन का शिकार रहा है. इस समाज के साथ सदियों तक जातिगत भेदभाव होता रहा है और हर कदम पर जम कर शोषण हुआ है. आज भी एससी समाज हाशिए पर ही है. ऐसे में अगर कुछ फिल्मकार इस समाज की विडंबनाओं को केंद्र में रखकर सिनेमा बनाने का जोखिम उठाते हैं तो यह एससी वर्ग की जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसी फिल्मों, जो उस की अस्मिता से जुड़ी हैं और उन के अधिकारों की वकालत करती हैं, को पूरा समर्थन प्रदान करें. लेकिन एससी वर्ग की उदासीनता और उन की लापरवाही के कारण ऐसी फिल्में दर्शकों के लिए तरस जाती हैं, नतीजतन, फ्लौप साबित होती हैं.

2012 में संजीव जायसवाल ने फिल्म ‘शूद्र द रायजिंग’ बनाई. उस का बजट लगभग 3 करोड़ रुपए था. फिल्म फ्लौप साबित हुई. फिल्म ने बजट का केवल 25-30 फीसदी ही रिकवर किया. फिल्म को लगभग 2.5 करोड़ रुपए का घाटा हुआ. यह फिल्म प्राचीन भारत की जाति व्यवस्था पर आधारित है. जातिवादी व्यवस्था में किस तरह एक वर्ग के साथ हर कदम पर उत्पीड़न होता है, यह इस फिल्म की थीम है. जातिगत शोषण पर बेस्ड फिल्म होने के कारण इस फिल्म को मुख्यधारा के थिएटर्स में जगह नहीं मिल पाई जिस से मूवी बुरी तरह फ्लौप हुई. हालांकि यह फिल्म सामाजिक संदेश के लिए आलोचकों द्वारा सराही गई, फिर भी इस फिल्म को व्यावसायिक सफलता नहीं मिली.
सवाल यह है की एससी वर्ग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म फ्लौप क्यों हो गई? मात्र 3 करोड़ की लागत भी क्यों नहीं निकाल पाई? यह सच है कि इस मूवी को थिएटर कम मिले थे लेकिन उन कम थिएटरों पर भी तो लोग नहीं पहुंचे. अगर उन सिनेमाघरों में में भी यह फिल्म हाउसफुल गई होती तो भी निर्माता घाटे में न जाता.

भारतीय सिनेमा में जातिगत भेदभाव, सामाजिक अन्याय, आरक्षण और दलित संघर्ष पर बनी फिल्में अकसर कम बजट वाली या आर्टहाउस होती हैं जो क्रिटिकल सफलता तो पाती हैं लेकिन कमर्शियल हिट नहीं बन पातीं. इस विषय पर 50 करोड़ रुपए से ऊपर वाली फिल्में बेहद कम हैं क्योंकि मुख्यधारा के प्रोड्यूसर्स ऐसे संवेदनशील टौपिक्स से बचते हैं. हालांकि एससी वर्ग के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव पर कुछ ऐसी फिल्में भी हैं जो बड़े बजट में बनीं लेकिन वे फिल्में भी दर्शकों से जुड़ नहीं पाईं और फ्लौप साबित हुईं.

2018 में साऊथ के निर्देशक पा रंजीत ने काला फिल्म बनाई जिस में मुख्य भूमिका में रजनीकांत जैसे कलाकार हैं. इस फिल्म का बजट लगभग 125-140 करोड़ रुपए था लेकिन बौक्स औफिस कलैक्शन में यह मूवी अपनी लागत भी नहीं निकाल पाई. भारत में इस फिल्म का कुल कलैक्शन 100 करोड़ रुपए से कम रहा. यह फिल्म मुंबई के धारावी स्लम में एससी वर्ग की जमीनों को ऊंची जातियों द्वारा हड़पने के मुद्दे पर बेस्ड है.
फिल्म के नायक रजनीकांत एक दलित लीडर हैं जो फिल्म में आंबेडकरवादी विचारधारा को स्थापित करते हुए नजर आते हैं. इस फिल्म में ऊंची जाति के खिलाफ कई ऐसी बातें थीं जिन से विवाद खड़ा हुआ. फिल्म की थीम बेहतरीन थी लेकिन फिल्म अपनी लागत भी नहीं निकाल पाई. इस फिल्म के तमिलहिंदी दोनों वर्जनों में दर्शकों की उदासीनता बनी रही. यह पा रंजीत की ‘दलित सिनेमा’ बनाने की एक कोशिश थी जो दलितों की लापरवाही की वजह से कमर्शियल फेलियर साबित हुई.

2011 में तनुजा चंद्रा की फिल्म ‘मिले न मिले हम’ रिलीज हुई. इस फिल्म के जरिए रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान को लौंच किया गया था. फिल्म का बजट 25-30 करोड़ रुपए था लेकिन इस फिल्म का बौक्स औफिस कलैक्शन मात्र 5-6 करोड़ रुपए ही रहा. इस फिल्म में चिराग पसवान का किरदार एक दलित युवा का है जो जातिगत भेदभाव का सामना करते हुए अपने प्रेम को हासिल करना चाहता है. यह बौलीवुड की पहली ‘दलित प्रोटागोनिस्ट’ वाली फिल्म मानी जाती है लेकिन यह भी बुरी तरह फ्लौप साबित हुई. हालांकि इस फिल्म में जातीय संवेदनशीलता को सतही तरीके से हैंडल किया गया था, पर फिर भी यह एससी जमात की फिल्म तो थी ही न.
ऐसी फिल्में बनाने वाले निर्माता बड़े रिस्क के साथ फिल्में बनाते हैं. इन्हें कम से कम उस समाज से तो समर्थन मिलना चाहिए जिस की समस्याओं को ये निर्माता बड़े परदे पर लाने की हिम्मत करते हैं. लेकिन एससी वर्ग के 10 प्रतिशत लोग भी इन फिल्मों को देखने के लिए थिएटर तक नहीं जाते, यह बेहद चिंता का विषय है.

साउथ के निर्देशक वेत्रिमारण ने 2019 में ‘असुरन’ फिल्म बनाई, जिस का बजट 25-30 करोड़ रुपए था. बड़े बजट के हिसाब से यह फिल्म भी कोई कमाल नहीं दिखा पाई. फिल्म की कहानी एक दलित किसान धनुष के इर्दगिर्द घूमती है जो ऊपरी जाति के जमींदारों के खिलाफ खड़ा हो जाता है. एक मामूली दलित किसान अपनी जमीन और अपने सम्मान के लिए लड़ाई लड़ता है. यह फिल्म 1990 के दशक में तमिलनाडु में दलितों के खिलाफ हिंसा की सच्ची घटना से प्रेरित है. यह फिल्म हिंदी बेल्ट में रिलीज न होने के कारण तमिल में सफल रही, लेकिन ओवरऔल बजट रिकवर न हुआ क्योंकि जिस के लिए यह फिल्म बनी थी वही समाज थिएटर तक नहीं पहुंच पाया.

1994 में रिलीज हुई फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ फूलन देवी की बायोपिक थी जिस का बजट 10 करोड़ रुपए था. लेकिन यह फिल्म 5 करोड़ ही बटोर पाई. कुछ दृश्यों को ले कर यह फिल्म सैंसरशिप के लंबे विवाद में फंसी रही जिस से फिल्म को घाटा हुआ. इस बेहतरीन फिल्म को देखने में भी एससी वर्ग नदारद रहा, जिस से फिल्म अपनी लागत का आधा भी नहीं निकाल पाई.

2019 में रिलीज हुई निर्देशक अभिनव सिन्हा की फिल्म ‘आर्टिकल 15’ संविधान के अनुच्छेद 15 पर आधारित है. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है कि धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर भारत के सभी नागरिक बराबर हैं. राज्य धर्म, जाति, लिंग या नस्ल के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं करेगा लेकिन धरातल पर स्थिति एकदम उलट है. सिस्टम की इसी सच्चाई को यह फिल्म बेहद सटीकता से प्रस्तुत करती है.
यह फिल्म दो दलित लड़कियों की हत्या की सच्ची वारदात पर आधारित है. इस जघन्य हत्याकांड के बाद पुलिसिया सिस्टम किस तरह संविधान के आर्टिकल 15 की धज्जियां उड़ाता हुआ नजर आता है, यह फिल्म बेबाक तरीके से इस बात को समझा देती है. यह मूवी एससी वर्ग के साथ होने वाले उत्पीड़न और भेदभाव पर आज के समय की सब से मजबूत और सटीक फिल्मों में से एक है. फिल्म हिट हुई क्योंकि इस फिल्म को एससी वर्ग के अलावा बाकी के दर्शकों ने भी देखा. दलित वर्ग ऐसी अच्छी फिल्मों से भी वंचित रहा.
एससी वर्ग को यह कौन समझाए कि उन के अधिकारों से जुड़ी फिल्मों को समर्थन देना उन की सामाजिक जिम्मेदारी है. दलितों के पास 100 रुपए की दारू के लिए कहीं से भी जुगाड़ हो जाता है लेकिन सामाजिक जिम्मेदारियों के लिए पैसे नहीं होते.

निर्देशक चैतन्य तम्हाणे की फिल्म ‘कोर्ट’, जो 2014 में रिलीज हुई थी, एक दलित लोकगायक की आत्महत्या के केस में अदालत की कार्यवाही पर आधारित है. इस फिल्म ने जातिवाद, कानून और सामाजिक अन्याय का बारीक चित्रण किया है. इस फिल्म ने नैशनल अवार्ड तो जीता लेकिन दलितों की उदासीनता की वजह से कीमत भी नहीं निकाल पाई.

निर्देशक अमित मसूरकर की फिल्म ‘न्यूटन’ 2017 में रिलीज हुई थी. यह फिल्म छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाके में चुनाव ड्यूटी पर गए एक सरकारी कर्मचारी की कहानी पर बेस्ड है. हालांकि इस मूवी में जातिवाद का मुद्दा सीधे तौर पर नहीं दिखाया गया है लेकिन फिल्म के नायक को हर स्तर पर जातिवाद झेलना पड़ता है. आदिवासी समाज के उत्पीड़न पर बनी यह फिल्म भी फ्लौप हुई.

दक्षिण भारत के दलित ज्यादा जागरूक हैं
साउथ में एससी वर्ग का रुझान अलग है. वहां दलित समाज उत्तर भारत के दलितों से ज्यादा जागरूक है. यही कारण है कि साउथ के निर्माता एससी वर्ग से जुड़े मुद्दों पर बड़ी फिल्में बनाने की हिम्मत कर पाते हैं.

मारी सेल्वराज तमिल के एक ऐसे फिल्म निर्देशक, लेखक और निर्माता हैं जो जातिवाद और दलित संघर्ष पर आधारित सच्चाई को अपनी फिल्मों के माध्यम से उजागर करते हैं. उन्होंने 2018 में अपनी पहली फिल्म से ही आलोचना झेली लेकिन सफलता भी हासिल की. आज के समय मारी सेल्वराज की फिल्में तमिल सिनेमा में एंटीकास्ट मूवमैंट का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गई हैं.
मारी सेल्वराज एससी वर्ग के मुद्दों पर बेहतरीन फिल्में बनाते हैं. अभी तक उन्होंने ऐसी 5 फिल्मों का निर्देशन किया है जो एससी समाज की व्यथा और संघर्षो को बेहद सटीक तरह से प्रस्तुत करती हैं. 2018 में रिलीज हुई ‘परीयेरुम पेरुमाल’ एक ऐसी ही फिल्म है. एक एससी युवक को ला कालेज में पढ़ाई के दौरान ऊंची जाति की लड़की से प्यार हो जाता है. इस प्यार का अंजाम ‘औनर किलिंग’ तक पहुंच जाता है. इस फिल्म ने जातिवाद का मार्मिक चित्रण किया है.

2021 में मारी सेल्वराज ने ‘कर्णन’ फिल्म बनाई. यह फिल्म निचली कास्ट के विद्रोह की कहानी है जो जातिवाद और उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष करते हैं. यह फिल्म बौक्स औफिस पर जबरदस्त हिट साबित हुई.

2023 में मारी सेल्वराज की फिल्म ‘मामन्नन’ रिलीज हुई. यह मूवी राजनीतिक ड्रामा है जो दलित अधिकारों और ऊंची जाति के लोगों द्वारा सत्ता के दुरुपयोग पर केंद्रित है.

मारी सेलवराज की फिल्म ‘वाझाई’ 2024 में रिलीज हुई. यह फिल्म केला बागान में काम करने वाले श्रमिकों की जिंदगी पर आधारित है. किस तरह एससी वर्ग के साथ गांव में जातिवाद के नाम पर शोषण और गांव से बाहर जाने वाले मजदूरों का आर्थिक शोषण किया जाता है, यह फिल्म इस बात का मार्मिक चित्रण करती है.

2025 में रिलीज हुई ‘बाइसन कालामादन’ भी मारी सेल्वराज की एक जबरदस्त फिल्म है. यह मूवी कबड्डी खिलाड़ी मनाथी गणेशन के जीवन पर आधारित है. 90 के दशक में जातिवाद के नाम पर खिलाड़ियों का किस तरह शोषण होता था, यह फिल्म सटीकता से दर्शाती है. इसी कारण फिल्म विवादों में भी फंसी रही. लेकिन बौक्स औफिस पर इस फिल्म ने 100 करोड़ रुपए के करीब कमाई की.

एससी समाज को चिंतन करना चाहिए
एससी वर्ग का अपना सिनेमा नहीं है. मीडिया में भी इस वर्ग का प्रतिनिधित्व शून्य के बराबर है. सो, एससी वर्ग के हालात और उन के संघर्ष मेनस्ट्रीम से ओझल रहते हैं. यही कारण है कि मुख्यधारा के लोग यह मान कर चलते हैं कि जातिवाद खत्म हो गया है जबकि एससी वर्ग के लिए धरातल पर हालात एकदम उलट नजर आते हैं. इस वर्ग के साथ सामाजिक तौर पर आज भी भेदभाव और उत्पीड़न में कोई कमी नहीं आई है. कहीं घोड़ी पर चढ़ने से रोका जाता है तो कहीं नंगा कर के पीटा जाता है. लेकिन एससी वर्ग के संघर्षो और व्यथाओं पर मेनस्ट्रीम मीडिया में चर्चा तक नहीं होती.

ऐसे में अगर कुछ फिल्मकार एससी वर्ग के मुद्दों को ले कर फिल्म बनाने की हिम्मत करते हैं तो यह बड़ी बात है. ऐसी फिल्मों के लिए एससी वर्ग में उत्साह नजर आना चाहिए. तकरीबन 22 करोड़ की आबादी वाले समाज के अधिकारों की वकालत करने वाली फिल्में फ्लौप क्यों हो जाती हैं, इस बात पर एससी वर्ग को चिंतन जरूर करना चाहिए. एक समय था जब एससी वर्ग के लिए सार्वजनिक जगहों पर जाने की मनाही थी लेकिन आज के वक्त थिएटर में जाने से उन्हें किस ने रोका है. आज के समय 150 या 200 रुपए का मूवी टिकट कौन अफोर्ड नहीं कर सकता. गरीबी और उत्पीड़न का रोना आखिर कब तक रोया जाएगा?

सिनेमा, साहित्य और मीडिया में भागीदारी जरूरी है लेकिन कैसे? क्या बौलीवुड में एससी वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं है? बौलीवुड में स्पौट बौय, तकनीशियंश, लाइटमैन, कैमरामैन और एडिटिंग के क्षेत्र में काम करने वालों में खासी तादाद एससी वर्ग के लोगों की है. ये लोग कई दशकों से बौलीवुड को मजबूत करने में लगे हैं. लेकिन लकीर से आगे नहीं बढ़ पाते. आगे बढ़ने की दिशा में जातिवाद की बाधाएं जरूर आड़े आती हैं लेकिन यह बड़ा कारण नहीं है. आलसी प्रवृत्ति और विजनरी सोच के अभाव में एससी वर्ग आगे की सोच ही नहीं पाता.

एससी वर्ग के वे लोग जो विजनरी होते हैं उन के सपनों के आगे जातिवाद रुकावट नहीं बनता. मीना कुमारी, नागराज मंजुले जैसे बड़े निर्देशक महाराष्ट्र के दलित समुदाय से हैं.
सुशील बोंदे, रिंकू राजगुरु, आकाश ठोसर, वैभव तत्ववादी, सयाली पाटिल जैसे कलाकार एससी वर्ग से ही निकले हैं.

हालांकि मुख्यधारा हिंदी सिनेमा में अब तक कोई भी बड़ा कलाकार, निर्देशक, हीरो या हीरोइन दलित पहचान के साथ नहीं है. ज्यादातर सफल एससी कलाकार नागराज मंजुले की फिल्मों के जरिए या तो मराठी सिनेमा से आए हैं या फिर चुपके से अपनी जाति छिपाकर काम करते रहे हैं.
बौलीवुड में जातिगत भेदभाव आज भी मौजूद है. कई दलित कलाकारों ने कास्टिंग, रोल्स और बरताव में भेदभाव की बात स्वीकारी है लेकिन नागराज मंजुले जैसे लोगों के उदाहरण भी सामने हैं जिन की वजह से एससी के कई लोग बौलीवुड में ऊंचाइयों तक पहुंचे हैं. बौलीवुड में दलित प्रतिनिधित्व तेजी से बढ़ तो रहा है लेकिन मुख्यधारा बौलीवुड अभी भी ऊंची जातियों का गढ़ बना हुआ है. इस गढ़ को कैसे भेदना है, यह एससी वर्ग को खुद सोचना होगा. Movie Flop Reasons
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राजकुमार राव की ‘टोस्टर’: कॉमेडी में उलझी कहानी, दर्शक रह गए निराश

Film Review: `राजकुमार राव ने अपनी शुरुआती फिल्मों में बतौर ऐक्टर कई ऐसी फिल्में दी थीं जिन्होंने क्रिटिक्स समेत दर्शकों को हैरान किया था. इन फिल्मों में ‘शाहिद’, ‘न्यूटन’, ‘सिटी लाइट्स’ ‘अलीगढ़’ जैसी फिल्में थीं, जिन में वे प्रवासी मजदूर, दलित चुनाव अधिकारी, संजीदा वकील इत्यादि बने थे. तब वे अलगअलग जौनर में हाथ आजमाते थे.

पिछले 5-7 सालों में सिलसिलेवार तरीके से उन की फिल्मोग्राफी देखें तो उन के क्राफ्ट में बदलाव आया है. उन की फिल्मों के किरदार आम आदमी तो होते हैं मगर संजीदगी की जगह वे कौमेडी पर ज्यादा निर्भर होने लगे हैं. कौमेडी भी एकजैसी मानो ‘स्त्री’ फिल्म का भूत उन के सिर से उतर ही न रहा हो. यही हाल ‘टोस्टर’ फिल्म का है. फिल्म ‘टोस्टर’ सिचुएशनल कौमेडी पर बेस्ड है. इसे ‘सिटकौम’ कहा जाता है. ऐसी फिल्में जहां कोई कैरेक्टर ऐसी सिचुएशन में फंस जाता है जहां से फिल्म उलझती चली जाती है, इसी उलझन में हास्य पैदा होता है. अकसर ऐसी फिल्में दर्शकों को गुदगुदाने में कामयाब रहती हैं. मगर टोस्टर के साथ ऐसा नहीं होता.

फिल्म ‘टोस्टर’ की कहानी शुरू होती है मुंबई के अमोल आमरे (जितेंद्र जोशी) नाम के एक नेता से, जो शहर में ‘स्पा सैंटर’ को विदेशी और अश्लील कल्चर कह कर बंद करवा रहा है. उसी नेता की अश्लील वीडियो एक चिप में उस का नौकर ग्लेन डिसूजा उर्फ फुकची (अभिषेक बनर्जी) रिकौर्ड कर लेता है. और उस से फिरौती की मांग करता है. फुकची नशेड़ी है.

दूसरी तरफ कहानी में रमाकांत (राजकुमार राव) का किरदार इंट्रोड्यूस होता है. यह किरदार निहायती कंजूस आदमी है. इतना कंजूस कि सुबह पार्क से टहलते हुए मंदिर से केले उठा लेता है, पैट्रोल बचाने के लिए ट्रक की चैन खींच कर रास्ता तय करता है, अपनी पत्नी शिल्पा (सान्या मल्हौत्रा) को डेट के नाम पर लंगर खिलाने ले जाता है. मगर इसी कंजूसी में वह गलत काम भी कर बैठता है. रमाकांत और उस की पत्नी शिल्पा को एक शादी में बुलाया जाता है और शिल्पा महंगा टोस्टर गिफ्ट देने की बात करती है. वह मन मार कर टोस्टर गिफ्ट कर आता है.

मगर अगले ही दिन पता चलता है कि जिसे गिफ्ट दिया उस की शादी टूट गई है. अब रामाकांत टोस्टर वापस ला कर दुकान में लौटाने की प्लानिंग करता है. मगर पता चलता है कि वह टोस्टर तो अनाथालय में दान कर दिया गया है. वह अनाथालय से टोस्टर चुरा कर मिस डिसूजा (सीमा पाहवा) के घर रख आता है. यह घर उसी नौकर ग्लेन का है जिस के पास नेता की वीडियो चिप है. ग्लेन उस चिप को टोस्टर के अंदर सेफ जगह में छिपा देता है. जब रमाकांत वापस अपना टोस्टर लेने जाता है तो दोनों की आपसी झड़प में ग्लेन बिल्डिंग से नीचे गिर कर मर जाता है. यहां दिलचस्प तरीके से मिस मालिनी (अर्चना पूरण सिंह) का किरदार उभर कर आता है. वह फिल्म की मेन विलेन है. वह ग्लेन के गिरने की वीडियो अपने फोन से रिकौर्ड कर लेती है और रमाकांत को ब्लैकमेल करती है. फिर टोस्टर को हथिया कर उसी में अपनी चिप छिपा लेती है.

यहां से अफरातफरी शुरू होती है. नेता, पुलिस, रमाकांत, अनाथालय, मिस मालिनी सब उस टोस्टर के पीछे पड़ जाते हैं. फिल्म टोस्टर के ही इर्दगिर्द घूमती है. क्लाइमैक्स में किरदारों के बीच उथलपुथल मचती है. अंत में चीजें बेढंगे तरीके से सुलझ जाती हैं. मिस मालिनी मर जाती है और नेता अपनी चिप निगल जाता है. 2 घंटे की यह फिल्म कौमेडी में गिनी जाएगी मगर राजकुमार राव के कंजूसी वाले फनी सीन हटा दें तो कुछ भी ऐसा नहीं जो मुसकराने को मजबूर करे. बीचबीच में फिल्म बहुत उबाऊ बन जाती है खासकर मिस मालिनी वाले घटनाक्रमों में. फिल्म का टैंपरेचर डार्क जोन में सेट किया गया है मगर खुद को जस्टिफाई करने में फिल्म फेल दिखाई देती है.

बीच में कुछ डायलौग जबरन डाले गए हैं, जैसे ‘आजकल बिना नैपोटिज्म के कोई किसी को काम नहीं देता’. किरदार खूब सारे हैं, कुछ कैमियो भी हैं, जैसे फराह खान और प्रतीक गांधी. मगर वे भी कोई इंपैक्ट नहीं छोड़ते. फिल्म में ‘लेटैंट शो’ से फेमस हुए नमन अरोरा का भी कैमियो है. राजकुमार राव अपनी पिछली फिल्मों वाले ढर्रे पर है, ऐक्टिंग अब प्रिडिक्टिबल लगने लगी है. सान्या मल्होत्रा के पास कुछ ख़ास करने को नहीं था, अर्चना फिल्म में फिट नहीं बैठती. अभिषेक बनर्जी जमा है, पुलिस वाले की भूमिका में उपेंद्र अच्छा लगा है.

फिल्म को विवेक दास चौधरी ने डायरैक्ट किया है, इसे और कसा जा सकता था. फिल्म में गाने नहीं हैं, अंत में ‘हुस्न के लाखों रंग…’ गाने को अजीब तरह से रीमेक किया गया है. यह फिल्म ओटीटी पर रिलीज की गई है. अच्छी बात है कि फिल्म परिवार के साथ देखी जा सकती है. सिनेमेटोग्राफी ठीकठाक है. Film Review

 

टैक्नोलौजी के जमाने में लोन लेना बेहद खतरनाक 

Financial Crisis: कोई ग्राहक जब तक लोन लेता नहीं तब तक बैंक उस को तरहतरह के प्रलोभन देता रहता है. जैसे ही ग्राहक लोन के फार्म पर साइन करता है बैंक का रुख बदल जाता है. इस के बाद बैंक और सूदखोर महाजन में कोई फर्क नहीं रह जाता है. टैक्नलौजी के इस दौर में बैंक लोन चुकाने में देरी करने वाले के खिलाफ क्याक्या कर सकते है इस की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.
मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘सवा सेर गेहूं’ एक गरीब किसान, शंकर की कहानी है. जिस ने एक महात्मा को खिलाने के लिए पंडित विप्र महाराज से ‘सवा सेर गेहूं’ उधार लिया था. समय के साथ उस का ब्याज इतना बढ़ जाता है कि शंकर को अपनी पूरी जिंदगी गुलामी में बितानी पड़ी. उस के मरने के बाद उस का बेटा भी उसी कर्ज के जाल में फंस जाता है. शंकर एक सीधासाधा किसान शंकर था. एक शाम उस के घर एक महात्मा आए. शंकर ने उन को खाने खिलाने के लिए पंडित विप्र से सवा सेर गेहूं उधार ले लिया.
कुछ समय बाद उस ने सवा सेर से अधिक का गेहूं विप्र महराज को दे दिया पर उस का हिसाबकिताब नहीं किया था. करीब 7 साल के बाद विप्र महराज ने ब्याज लगा कर उधार लिए सवा सेर के बदले साढ़े पांच मन (लगभग 200 किलो से अधिक) गेहूं का हिसाब निकाल दिया. शंकर कई बार कर्ज चुका देता था पर कुछ न कुछ ब्याज रह जाता था. इस को चुका न पाने के कारण शंकर को विप्र महराज के यहां बिना मजूरी के काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा. 20 साल के बाद भी कर्ज चुकता नहीं होता. इस बीच शंकर की मौत हो जाती है, कर्ज फिर भी खत्म नहीं होता और विप्र महाराज उस के बेटे को गुलाम बना लेते हैं.
कानपुर के बिल्हौर में पोस्टमास्टर सौरभ शर्मा ने कर्ज और लेनदारों के दबाव से परेशान हो कर आत्महत्या कर ली. दोस्त के घर फांसी लगा कर सुसाइड किया. सौरभ शर्मा हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के कानेना थाना क्षेत्र के चेलवान गांव का रहने वाला था. वह कानपुर देहात के रसूलाबाद क्षेत्र के वीरहूं गांव स्थित डाकघर में ब्रांच पोस्ट मास्टर के पद पर तैनात था. वह घर जाने के दौरान बिल्हौर में अपने दोस्त रोहित के कमरे पर रूका था. रात में दोनों ने साथ खाना खाया और फिर सोने चले गए. सुबह जब काफी देर तक कमरे का दरवाजा नहीं खुला तो रोहित को शक हुआ. उस ने खिड़की से झांक कर देखा तो अंदर का नजारा देख कर सन्न रह गया. सौरभ ने मफलर के सहारे फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली थी.
रोहित ने पुलिस को बताया कि सौरभ पर बहुत कर्ज हो गया था. लेनदार लगातार उस पर पैसे लौटाने का दबाव बना रहे थे. हालात इतने खराब हो गए थे कि सौरभ ने अपना मोबाइल फोन तक बेच दिया था और नंबर भी बंद कर दिया था. इसी तनाव में उस ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. इस तरह की घटनाएं कम नहीं है. बैंक के कर्ज के चक्कर में लोग मानसिक रूप से बीमार हो जा रहे हैं. निजी बैंकों ने लोन की वसूली के लिए ठेकेदार रख लिए हैं जो समय पर लोन न देने वालों के खिलाफ कड़े कदम उठाते हैं. जिस से परेशान लोग खतरनाक कदम उठा लेते हैं.
मैनपुरी के गांव अढूपुर के रहने वाले 60 साल के किसान संतोष कुमार खेती करते थे. वह और उन की 55 वर्षीय पत्नी राधा देवी सांस रोग से पीड़ित थे. यह दोनों दिहुली में डाक्टर से इलाज करा रहे थे. यह दोनों दवा लेने के लिए गए सादौल मार्ग पर गांव सोडरा के निकट दोनों बेहोश अवस्था में मिले. दोनों को सैफई स्थित पीजीआइ में भर्ती कराया गया. जहां इलाज के दौरान दोनों की मृत्यु हो गई. जांच में पुलिस को किसान की जेब में सल्फास की गोलियां मिलीं. पुलिस की विवेचना में पता चला कि कर्ज से परेशान हो कर आत्महत्या की थी.
मरने वाले किसान संतोष कुमार ने करीब 15 साल पहले भूमि विकास बैंक से भैंस खरीदने के लिए 60 हजार का कर्ज लिया था. जमा न करने के कारण यह बढ़ कर 2.62 लाख रुपए हो गया था. इसे भरने को ले कर उन का दोनों पुत्रों से झगड़ा चल रहा था. संतोष कुमार के पास 7 बीघा जमीन थी. कर्ज अदा न करने पर जमीन के नीलाम होने का खतरा था. इस को ले कर पिता और पुत्रों में विवाद था. लड़के नहीं चाहते थे कि जमीन नीलाम हो और पिता के पास कर्ज के पैसे देने वाली हालत नहीं थी.
आज के बैंक बन गए सूदखोर: 
आज के दौर में भी कर्ज की यही कहानी है. अब सूदखोर की जगह बैंकों ने ले ली है. लोन देने के लिए बैंक ग्राहकों को तरहतरह के लालच देते हैं. जैसे ही लोन लिया जाता है बैंक पक्के सूदखोर महाजन हो जाते हैं. लोन के तरहतरह के रूप हो गए हैं. क्रेडिट कार्ड भी इस का हिस्सा हो गया है. बैंक का लोन फार्म देखेंगे तो उस में इतने बिंदू होते हैं जिन को सामान्य लोन लेने वाला आदमी कभी भी पढ कर समझ ही नहीं सकता है. लोन देने के लिए कागजात पूरे कराने वाली नौकर ग्राहक को बस मुंह से समझा देता है. जबकि लौन फार्म पर तमाम शर्ते होती हैं. जिन को ग्राहक ठीक से पढ़ कर समझ ले तो वह कभी लोन ही न लें.
बैंक से कर्ज लेना दोधारी तलवार जैसा होता है. समय पर कर्ज उतर जाए तो अच्छा होता है पर अगर समय पर कर्ज नहीं उतर रहा तो यह अपने आप में खतरनाक है. यह मानसिक तनाव का कारण बन जाता है. कई बार कर्ज लेने वाला अपनी आय की क्षमता से अधिक कर्ज ले लेता है. तो यह हालत फंसने वाली हो जाती है. इस से बचने के लिए लोग दूसरा लोन ले लेते हैं. इस से कर्ज का जाल गहराता जाता है. आजकल पर्सनल लोन लोग अधिक ले लेते हैं. इस में ब्याजदर अधिक होती है. इस को चुकाने में दिक्कत होती है.
क्रेडिट स्कोर ही नहीं पर्सनल इमेज भी खराब कर सकते हैं बैंक: 
बैंक लोन पर प्रोसैसिंग फीस, वेरिफिकेशन फीस और कई तरह की छिपी हुई फीस ली जाती है. जो लोन की कुल लागत को बढ़ा देती है. जिस समय होम लोन या कार लोन लेने के लिए लोन फार्म भरते हैं उसी समय बैंक यह अधिकार ले लेता है कि अगर लोन चुकता नहीं किया गया तो बैंक संपत्ति को नीलाम कर के अपना पैसा वसूल कर सकता है. समय पर लोन चुका न पाने के कारण क्रेडिट स्कोर कम हो जाता है, जिस से भविष्य में लोन मिलना मुश्किल हो जाता है. ईएमआई का बोझ और रिकवरी के लिए कौल या नोटिस मानसिक परेशानी का कारण बन जाते हैं.
एक लोन कई गारंटी:
यदि जानबूझ कर लोन नहीं चुकाते हैं तो बैंक कानूनी कार्यवाही कर सकता है, जिस से लोन लेने वाले का जेल की सजा भी हो सकती है. लोन फार्म भरते समय बैंक व्यक्तिगत जानकारी भी लेती है. इस के लिए बैंक के लोन ऐप्स भी होते हैं. यह बैंक जिस तरह से कर्ज न दे पाने वाले का क्रेडिट स्कोर कम कर देता है. उसी तरह से वह लोन लेने वाले के कौन्टैक्ट्स के जरिए ओला, उबर, जोमैटो, हाउस टैक्स और बहुत सारे लोगो को बता सकता है कि लोन लेने वाला डिफाल्टर है उस से बिजनेस करना ठीक नहीं है.
यही नहीं बैंक मैसेज के जरिए यह भी कह सकता है दबाव बना सकता है कि अगर इस लोन अदा न कर पाने वाले के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाए गए तो बैंक इस की मदद करने वाले के साथ अपना बैकिंग व्यवहार खत्म कर सकते हैं. आज टैक्नलौजी के जमाने में यह संभव है. सभी कुछ औनलाइन है और हर एक पैसे की गतिविधि बैंक से जुड़ी है. बैंक ऐप्स हो, पेटीएम हो और कोई और भुगतान का जरिया बैंक की नजर में सब होता है. ऐसे में ग्राहक के डिफाल्टर होने की जानकारी और उस से बिजनेस न करने के निर्देश और दबाव बैंक कर सकता है.
जब ग्राहक बैंक से कोई पर्सनल लोन या होम लोन लेता है तो उस के पेपर बैंक अपने पास रख लेता है. यह पेपर तब वापस होते हैं जब बैंक लोन चुकता कर दिया जाता है. जब बैंक लोन के बदले गारंटी लेने वालों से गवाही कराती है तो फिर गाड़ी या घर के पेपर क्यों अपने पास रखती है? जब वह बैंक लोन लेने वाले, गारंटी लेने वालों से लोन की रकम वापस लेने की सहमति ले लेती है तो कार या घर के पेपर क्यों रखने चाहिए? अगर पेपर रखने हैं तो गारंटी लेने वालों को क्यों बुलाया जाता है. यह बैंक दोहरे काम क्यों कर रहा है.
डेट ट्रैप में फंस जाते हैं लोन लेने वाले:
बैंकों ने अपना सारा काम ऐप्स पर कर दिया है. यहां डेट ट्रैप से बचना सब से मुश्किल होता है. बैंक लोन की ईएमआई चुकाने की एक डेट यानि तारीख तय कर देती है. किसी भी कारणवश उस डेट पर पैसा बैंक को नहीं मिला तो बैंक ईएमआई पर ब्याज जोड़ देती है. क्रेडिट कार्ड देते समय बैंक कहता है कि तय डेट तक वह ब्याज नहीं लेगी जैसे ही वह डेट निकलती है बैंक ब्याज लेने लगता है. इस डेट ट्रैप से बचना बेहद कठिन होता है. इस से बचने के तरीके समझने जरूरी होता है.
लोन की ईएमआई इनकम की 50 फीसदी से ज्यादा होना खतरनाक होता है. कई बार एक से अधिक लोन चल रहे होते हैं या फिर कोई एक लेकिन बड़ा लोन चल रहा होता है, जिस के लिए मोटी रकम ईएमआई में जा रही होती है. कई बार लोग डिस्काउंट और अच्छी डील के चक्कर में किस्तों पर कई चीज ले लेते हैं. हर महीने इन सब की ईएमआई भर रहे होते हैं. अगर ईएमआई आय की 50 फीसदी से ज्यादा है तो यह जोखिम भरा काम है. ईएमआई आय के 30 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए. ईएमआई जितनी ज्यदा जाएगी, सेविंग्स उतनी ही घटती जाएगी.
अपनी मासिक आय का कम से कम 25 फीसदी बचत करनी जरूरी होती है. अगर सब खर्च हो जा रहा है तो जोखिम है. जल्द ही ऐसा वक्त आ सकता है कि खर्चे पूरे करने के लिए इनकम कम पड़ जाएगी. ऐसे में कर्ज लेना जरूरी हो जाएगा. क्रेडिट कार्ड का मिनिमम बिल चुकाया जाना इस बात का संकेत है कि कर्ज का जाल कसता जा रहा हैं. क्रेडिट कार्ड की देय न्यूनतम रकम आमतौर पर खर्च पर ब्याज की राशि होती है. यदि एक बार में पूरी बकाया राशि का भुगतान नहीं हुआ तो आगे मुश्किल हो सकती है. अगर क्रेडिट कार्ड बिल का 90 फीसदी भुगतान कर दिया जाता हैं, तो बैंक अगले बिल में पूरी राशि पर ब्याज लेंगे, न कि बकाया केवल 10 फीसदी पर. जैसे प्रेमचंद्र की कहानी पूस की रात में हुआ था.
अगर एक कर्ज को चुकाने के लिए एक नया कर्ज लेना पड़ रहा है तो समझ जाएं कि कर्ज के जाल में पूरी तरह फंस चुके हैं. कई लोग यह सोच कर ऐसा करते हैं कि अगले महीने अपने फाइनैंसेज को मैनेज कर लेंगे. इस में से अधिकतर बार मैनेज होता नहीं है. जिस से पूरा बजट बिगड़ जाता है. एक भी दिन डेट से अधिक होने पर फाइन लग जाता है.
जो लोग लाइफस्टाइल जैसे फोन, नई गाड़ी, बड़ी टीवी, फ्रिज या वाशिंग मशीन ईएमआई पर लेते हैं यह नहीं करना चाहिए. लाइफस्टाइल से जुड़ी जरूरतों को अपनी इनकम या फिर बचत से ही पूरा करना चाहिए. जो लोग इस के लिए भी कर्ज ले रहे हैं तो इस का मतलब है कि इनकम को सही तरीके से मैनेज नहीं कर पा रहे हैं. ईएमआई मिस होने से क्रेडिट स्कोर प्रभावित होता है और लोन डिफाल्ट कर सकने का मैसेज जाता है.
क्रेडिट कार्ड भी एक तरह का लोन ही है. इस में पहले खर्च करने और बाद में चुकाने की सुविधा होती है. इसलिए क्रेडिट कार्ड से लिए गए लोन को भी समय पर चुकाना जरूरी है. हर तरह के लोन में सब से महंगा लोन क्रेडिट कार्ड लोन ही होता है. इस की ब्याज दर सब से अधिक होती है. इसलिए लोन इंट्रैस्ट फ्री पीरियड के अंदर चुकाने की कोशिश करें. एक से ज्यादा क्रेडिट कार्ड लोन ले रखे हैं तो खतरे और भी अधिक है. क्रेडिट कार्ड पर मिलने वाली पूरी लिमिट को खर्चा करने से बचना चाहिए. क्रेडिट लिमिट के 20-30 फीसदी से ज्यादा न खर्च न हो.
लोन न चुका पाने के कारण बैंकों का एनपीए बढ़ता जाता है. 2025 में यह करीब 4 फीसदी था. 25 से 35 साल वर्ग के लोग सब से अधिक डिफाल्टर होते हैं. पर्सनल लोन के मुकाबले होम लोन और एग्रीकल्चर लोन समय पर चुकता किए जाते है. सबसे अधिक डिफाल्टर के्रडिट कार्ड वाले होते है. छोटा बिजनेस करने वाले सबसे अधिक डिफाल्टर होते है नौकरी पेषा यानि वेतन पाने वाले लोन देने में अधिक भरोसेमंद होते है. लोन अदा न करने का सबसे बडा कारण नौकरी का जाना, ज्यादा ईएमआई का होना, मेडिकल इमरजेंसी, बिजनेस में हानि या क्रेडिट कार्ड का सही उपयोग न होना होता है.
क्या होता है क्रेडिट स्कोर यानि सीआईबीआईएल ? 
सीआईबीआईएल 300 से 900 के बीच होता है. जितना ज्यादा स्कोर होता है ग्राहक उतना भरोसेमंद होता है. 650 से नीचे स्कोर वाला ग्राहक सब से अधिक रिस्की माना जाता है. 750 से अधिक वाला ग्राहक सब से सुरक्षित होता है. इस को तैयार करते समय बैंक लोन के भुगतान करने वाले के तरीके को देखते हैं. समय पर भुगतान हुआ है या नहीं. बारबार लेट पेमेंट से स्कोर बिगड़ता है. 90 दिन लेट वाले को सब से खतरनाक माना जाता है.
क्रेडिट स्कोर को बनाते समय यह भी देखा जाता है कि लोन की कितनी लिमिट का उपयोग किया था. अगर 80-90 फीसदी क्रेडिट लिमिट का उपयोग किया है तो बैंक यह मानता है कि ग्राहक पैसे के दबाव में है. जब बारबार लोन के लिए एप्लाई करते हैं तो बैंक मानता है कि पैसे की जरूरत अधिक है. जिन की आय स्थिर नहीं होती है उन का स्कोर कम आंका जाता है. बैंक खाते में पैसों के आवागमन, खर्च और आय, नौकरी बदलने की स्थित और बैंक खाते में खर्च और बचत को भी देखा जाता है. इस स्कोर के आधार पर ही लोन दिया जाता है.
बैंक ग्राहकों को सेवा देने का काम कम रहे हैं उस से अधिक ग्राहकों से लूट करते है. चाहे एटीएम से पैसा निकालना हो, चेक बुक लेना हो, पासबुक लेनी हो हर काम के बदले पैसे लिया जाता है. कम बैलेंस होने पर पैसा कट जाता है. एटीएम के उपयोग पर सीमा और कई अन्य छिपे हुई कटौती की जाने लगी है. बैंको द्वारा ग्राहकों को दी जाने वाली सेवाओं में परेशानी बड़ी समस्या है.
टैक्नलौजी के आने के बाद यह परेशानियां कम होने की जगह बढ़ती जा रही है. बैंकिंग सेवाओं के लिए लंबी प्रक्रिया और बारबार पेपर जमा करने की जरूरत पड़ रही है. एटीएम बारबार खराब हो रहे हैं जिस से पैसा निकालने के लिए बारबार एटीएम के चक्कर लगाने पड़ते हैं. औनलाइन बैंकिंग में तकनीकी खामियां आ जाती है. बैंक कर्मचारियों का व्यवहार असंतोषजनक होता है. टैक्नलौजी का प्रयोग होने के बाद भी बैको में काम निपटाने में बहुत अधिक समय लगता है. Financial Crisis
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खामेनेई का अंत

Ayatollah Ali Khamenei: ईरान के धार्मिक तानाशाह अयातुल्लाह अली खामेनेई की इजराइली-अमेरिकी जेटों द्वारा उस समय मिसाइल छोड़ कर हत्या कर देना जब वे अपने देश की राजधानी तेहरान में सैनिक कमांडरों, सलाहकारों व वैज्ञानिकों के साथ मंत्रणा कर रहे थे, अचंभित करने वाली घटना है. हालांकि, इस पर ज्यादा दुख प्रकट नहीं किया जा सकता. खामेनेई ने अपने 37 साल के राज में ईरान की तेल संपदा का उपयोग जनता के भले के लिए कम, दूसरों के साथ निरर्थक युद्धों पर ज्यादा किया था.

ठीक अमेरिकी, इजराइली और ईरानी युद्ध से पहले सप्ताहों तक ईरान के शहर के शहर खामेनेई के खिलाफ उबल रहे थे. वहां की जनता सत्ता परिवर्तन और खूंखार शासन से छुटकारा पाना चाहती थी जिस ने औरतों की आजादी भी छीनी और लाखों आदमियों को भी तड़पातड़पा कर मारा.

सभ्यता का प्रतीक रहा फारस ईरान बनतेबनते एक डरावना भयावह देश बन गया था जिस की सरकार का उद्देश्य इसलाम की रक्षा करना था, जनता की सेवा नहीं.

खामेनेई ने चाहे इसलाम के लिए जो भी करने का वादा किया हो और चाहे जो भी उस की कीमत जनता से ली हो, बदले में जनता को कुछ दिया नहीं. ईरानी जनता ने जो किया वह अपने बलबूते पर किया. सरकार तो केवल धर्म की रक्षा और सैनिक शक्ति बढ़ाने में लगी रही.

सिर्फ बड़ा चोगा पहनने से कोई व्यक्ति शांति, दया, सहृदयता, हमदर्दी का प्रतीक नहीं बन जाता. सभी धर्मों के धर्मगुरु सादा जीवन बिताते दिखते हैं पर असल में उन के पास अपार शक्ति होती है जिसे शासन के साथ मिल कर वे जनता पर थोपते हैं. अयातुल्लाह अली खामेनेई इस से अलग नहीं थे. 1979 की इसलामिक क्रांति के बाद अयातुल्लाह खामेनेई की मुत्यु के बाद खामनेई ने ईरान को उन आजादियों से फिर वंचित कर डाला जिस के लिए शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन पलटा गया था. दोनों धर्मगुरुओं ने धर्म के नाम पर जनता का जम कर दोहन किया.

किसी भी देश या समाज की उन्नति उस के धर्म के फलनेफूलने से या उस के कंटीले पंजे फैलने से नहीं होती, बल्कि लोगों को रोटी, कपड़ा, मकान, टैक्निकल सुविधाओं के साथ मानसिक संतोष देने से होती है कि जो हो रहा है, वह उन की अपनी व्यवस्था उन के लिए कर रही है.

ईरान अब तक यह करने में असफल रहा है. तेल के पैसे से जो सुख जनता को मिल सकता था वह नाहक विवादों में फूंक डाला गया और नतीजा यह हुआ कि अमेरिका और इजराइल को मौका मिल गया कि उन की नाक के नीचे के पनपते कैंसर के फोड़े को वे खत्म कर दें. दुनिया के सभी धार्मिक नेताओं को सम?ा लेना चाहिए कि वे सरकारें बनवा सकते हैं पर सुख तो तब आएगा जब जनता को अपनापन महसूस होगा.

खाड़ी देशों में भारतीय

ईरान, अमेरिका व इजराइल युद्ध में ईरान ने खाड़ी के सभी देशों को घसीट लिया है क्योंकि वे चाहे इजराइल का साथ न दें, अमेरिका के पिट्ठू तो हैं ही. भारत के लिए यह परेशानी का मामला है क्योंकि भारत से 2 तरह के लोग खाड़ी के देशों में लाखों में बसे हैं. एक तो वे हैं जो मजदूरी कर रहे हैं और दूसरे वे जो भारत के कमाए पैसे को ढंग की जगह रखने के लिए खाड़ी के देशों में हैं.

जो मजदूर थे वे भारी पैसा भारत में बसे अपने रिश्तेदारों को भेजते थे. वे वहां न जमीन खरीद सकते हैं, न मकान और इसलिए उन्हें अपने गांवोंकसबों को लौटना ही होगा और उस के लिए वे पैसे भेजते थे. अमीर लोग भारत में कमाए पैसे को टैक्स से बचाने के लिए उस देश में ले जा कर बसे हैं जहां धर्म उन के खिलाफ है और जहां उन से जम कर भेदभाव होगा पर उन्हें कुछ जगह संपत्ति खरीदने दी जा रही हैं.

अब दोनों सकते में हैं. अगर युद्ध की स्थिति बनी रही, जो दिखता है होगा, यह इलाका जो अब तक सुरक्षित, साफ, सभ्य, अनुशासित दिखता था, उजड़ सकता है. मजदूरों की जरूरत नहीं रहेगी और अमीरों की संपत्ति का दाम कौडि़यों का रह जाएगा. भारत सरकार ने इजराइल का समर्थन किया है और हो सकता है कि आम खाड़ी देशों के मुसलिम नागरिक भारतीयों को अब उतना सहन न करें जितना पहले कर रहे थे.

भारत जैसे बड़े देश के लिए ये ?ाटके ऐसे नहीं हैं कि हमें कोई खास फर्क पड़े लेकिन लाखों लोगों को फर्क पड़ेगा, ठीक वैसे जैसे अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफों और घुसपैठियों को पकड़ कर वापस भेजने से पड़ा है. भारतीय मजदूर, स्टूडैंट, अमीर जो खाड़ी के देशों में काम या मौज ढूंढ़ रहे थे, अब निराश हो सकते हैं.

असल में भारत के साथ दिक्कत यह है कि हम अपने देश की मरम्मत करने को तैयार ही नहीं हैं. हमें इतनी बार पौराणिक ?ाठी कहानियां सुनाई गई हैं कि लगता है कि यहां तो सबकुछ ठीक है और कुछ ठीक करने लायक नहीं है. और फिर मोदी है तो जो खराब है, वह ठीक हो जाएगा.

यह जमात भूल रही है कि 1947 से ही देश की सत्ता असल में मोदी जैसों के हाथों में रही है, चाहे प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ही क्यों न रहे हों जिन्होंने नए निर्माण पर ज्यादा खर्च किया. जवाहर लाल नेहरू के बाद सभी प्रधानमंत्री जो जनता द्वारा बनाए जाते रहे उसे तोड़ने में लगे रहे. चाहे मजदूर हों या अमीर, विदेशों में जा कर दूसरे देशों का निर्माण कर रहे हैं जबकि जो यहां बन रहा है उस का आधा यहां की सरकार, यहां की मंदिर की राजनीति, यहां का करप्शन, यहां की गंदगी खा जाती है. जनता की मेहनत पर रोज हमारी अपनी मिसाइलें चलती हैं.

बाहर बस कर सुकून की जिंदगी जीना या चार पैसे कमाना निजी फैसला है पर यह देश के लिए नुकसानदेय है. देश मेहनती और सम?ादार लोगों से लगातार खाली हो रहा है. जो खाड़ी देशों से लौटेंगे वे भी इधरउधर भटकेंगे, काम के नहीं रह जाएंगे.

विदेश नीति में खामी

हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शायद डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में आ कर ऐन उस समय इजराइल जा कर प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ सम?ाते किए जब अमेरिकी समुद्री बेड़े इजराइल के साथ ईरान पर हमलों की तैयारी कर रहे थे. भारत ने अपने सारे दांव इजराइल पर लगा दिए हैं क्योंकि भारत सरकार आज उस धर्म द्वारा चलाई जा रही है जो इजराइल के दुश्मन इसलामी ईरान और इसलामी फिलिस्तीन के खिलाफ है.

इजराइल अपनेआप में एक बहुत आदर्श देश है, इस में शक नहीं है. सदियों पहले फिलिस्तीनी इलाके से यूरोप में भाग गए यहूदी सदियों तक यूरोप के शहरों में बसते रहे जहां ईसाई शासक उन पर अत्याचार करते रहे. ईसाइयों को पाठ पढ़ाया गया था कि यहूदियों ने 2000 साल पहले ईसामसीह को सूली पर चढ़ाया था, इसलिए उन की संतानें हमेशा दोषी रहेंगी.

1940 से 1945 के बीच में जिस तरह का नरसंहार जरमनी के तानाशाह एडौल्फ हिटलर ने नाजी पार्टी के साथ मिल कर यहूदियों का किया वह भी इतिहास का सब से काला धब्बा है. 1945 के बाद अपने पश्चात्ताप के रूप में यूरोप और अमेरिका ने यहूदियों के पुराने क्षेत्र फिलिस्तीन में इजराइल बनवा दिया. मुसलिम देशों को यह पसंद नहीं आया पर वे सैनिक दृष्टि से बेहद कमजोर थे और वे न यूरोप व अमेरिका से लड़ सके न इजराइलियों से.

इजराइल आए यहूदियों ने बंजर जमीन को इस तरह संवारा कि इजराइल आज सीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, लेबनान जैसे उन इसलामी देशों से कहीं संपन्न है जहां तेल का प्राकृतिक खजाना नहीं है. जो इसलामी देश अमीर हैं वे अपनी बुद्धि और परिश्रम से नहीं, तेल के कारण अमीर हैं वरना धर्म तो सभी इसलामी देशों के लिए एक बो?ा है.

हमारे देश में भारतीय जनता पार्टी इजराइल से प्रेरित है शायद इसलिए कि वहां भी पंडों को मुफ्त का खाने को मिलता है, और वे मुसलिम विरोधी भी हैं. इजराइली आसपास के मुसलिम देशों को डरा कर रखते हैं पर फिर भी वे यूरोपीय देशों जैसे समृद्ध हैं. नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कल्पना ऐसे ही देश की है जहां सोना बरसे, ऋषियोंमुनियों को बैठेबिठाए खाना- हलवापूड़ी, सुरक्षा और औरतें भी मिलें. इजराइल का मौडल उस भारत के लिए प्रिय है जो धर्मग्रंथों पर चलना चाहता है, जिस पर ही तो भाजपा देश को चलाना चाहती है.

इजराइल से संबंध सुधारे जाएं लेकिन उस के कदमों पर लोट जाया जाए, यह बिलकुल गलत है. अब भारत और ज्यादा अमेरिका के निकट ले जाया जा रहा है, उस अमेरिका के जिस के पिछलग्गू अब बेहद छोटेछोटे देश रह गए है. यूरोप, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड से अमेरिका के तार टूट गए हैं. ऐसे में यह हमारी विदेश नीति की भयंकर भूल है.

वादीप्रतिवादी और मीडिएशन

अदालतें अब वादीप्रतिवादी को मीडिएशन के जरिए विवाद हल कराने पर जोर देने लगी हैं और लगभग हर मामले में केस शुरू करने से पहले पार्टियों को आमनेसामने बैठ कर किसी वकील, जज या पूर्व जज की मौजूदगी में विवाद को हल करने की सलाह दे रही हैं. सुप्रीम कोर्ट में आए जमीन के एक मामले के लिए मीडिएशन का काम करने वाले दिल्ली के एक वकील हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले तक गए ताकि वे रिश्तेदारों के जमीन विवाद को सम?ा कर, फिर वादीप्रतिवादी को सम?ाबु?ा कर हल करा सकें.

यह प्रक्रिया अच्छी है चाहे अधिकांश मामलों में लोग केवल इसीलिए सम?ाता कर लेते हैं कि न्याय प्रक्रिया लंबी, खर्चीली है और न्यायाधीश कानूनों की जगह कई बार वकीलों की दलील से ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं. जिन मामलों में समस्या का हल आज चाहिए वहां भी पीडि़त पक्ष अपना वाजिब हक छोड़ने को तैयार हो जाता है क्योंकि उसे लगता है डेट पर डेट, तारीख पर तारीख वाली कानूनी व्यवस्था से वह कभी कुछ नहीं पा सकेगा.

समाज की सुरक्षा इसी में है कि कानून व्यवस्था मजबूत ही नहीं बल्कि तुरंत न्याय देने वाली भी हो. खेद की बात है कि जो भारत महान संस्कृति के गुणगान ज्यादा गाता है वह भी न्याय नहीं करा पाया है और शायद इस से उस की तथाकथित संस्कृति को बहुत फायदा होता है.

हमारे यहां संस्कृति का मतलब है पूजापाठ करो, दानपुण्य करो, मंदिरों में जाओ, लोगों को बेमतलब पैसे दो, भोजन कराओ और पैरों का पानी पियो. न्याय व्यवस्था इस संस्कृति को मजबूत बनाने में पूरा सहयोग दे रही है क्योंकि लोगों को जजों के स्थान पर देवीदेवताओं पर ज्यादा भरोसा है और वे हर पेशी से पहले कहीं किसी मंदिर में कुछ चढ़ाना ज्यादा जरूरी सम?ाते हैं.

मीडिएशन इस दानपुण्य की संस्कृति को कम कर सकता है और इसे प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए. लड़ते लोग जब एक मेज पर एक बाहरी वरिष्ठ पदासीन व्यक्ति के सामने बैठते हैं तो लेदे कर कैसे भी फैसले को तैयार हो जाते हैं. मीडिएटर को सुनना ज्यादा होता है, कहना कम. उस का फोकस इसी में रहता है कि वह दोनों पक्षों को भड़ास निकालने दे और उन्हें किसी फैसले पर अपनेआप ही आने दे.

न्याय व्यवस्था यानी हमारी पंच व्यवस्था हमेशा क्रूर व एकपक्षीय रही है. पंच ईश्वर की वाणी होती है, यह केवल एक भ्रांति है. पंच ऊंची जातियों का ही राज स्थापित करते रहे हैं और संस्कृति के नाम पर ताकतवरों का साथ देते रहे हैं. आज के मीडिएटर पंचों से अलग हैं, यह अच्छी बात है.

बच्चों के मुख से

Funny Family Moments: एक दिन सुबहसुबह मेरी बाई मेरी 5 वर्षीया बेटी छवि से कह गई, ‘‘मम्मी से कह देना कि सक्सेना भाभीजी  के घर ‘कट्टी’ पार्टी है. उन्होंने तुम्हारी मम्मी को बुलाया है.’’ मेरी बेटी कुछ परेशान सी अपने पापा से बोली, ‘‘पापा, मम्मी को सक्सेना आंटी के घर मत जाने दीजिए क्योंकि आंटी मम्मी से कट्टी करेंगी.’’ उस की बात सुन पहले तो हम सब सोचने लगे कि छवि इस तरह क्यों और क्या कह रही है? किंतु जैसे ही मेरी समझ में उस की बात आई, हम लोगों की हंसी छूट गई.

वास्तव में सक्सेना भाभीजी के घर किट्टी पार्टी थी जिस में हमें भी जाना था चूंकि बाई ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, इसलिए उस ने किट्टी पार्टी को कट्टी पार्टी कहा जो मेरी बेटी ने सुना वही आ कर मुझ से बोली. बाद में मैं ने उसे कट्टी पार्टी नहीं किट्टी पार्टी बताया. पुष्पा श्रीवस्तव

मैं अपनी ढाई साल की बेटी जौली को अंगरेजी भाषा में पढ़ा रही थी, सिखा रही थी, जैसे खुद का नाम, पिता का नाम, डौगी का नाम इत्यादि. बड़ी मेहनत के बाद उस ने जवाब देना सीख लिया. शाम को जब मेरे पति औफिस से घर आए तो मैं ने खुश हो कर अपने पति से कहा, ‘‘सुनते हैं, आज जौली ने बहुतकुछ सीख लिया है.’’

फिर मैं ने जौली से प्यारभरे लहजे में पूछा, ‘‘बेटा, पापा को बताओ, वाट इज योर नेम? बड़ी मासूमियत से उस ने झट से जवाब दिया, ‘‘माई नेम इज शीला.’’ दरअसल, यह एक फिल्मी गाना है जो उस समय लगभग हर टीवी चैनल पर प्रसारित होता था. मैं ने उस का जवाब सुन अपना सिर पीट लिया और घर में सब हंसे बिना न रह सके. Funny Family Moments

संध्या सिन्हा

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परिवार से दूर रह कर खालीपन महसूस होता है.

Working Woman Issues: परिवार से दूर रहने के कारण किसी से खुल कर बात नहीं कर पाती. मैं (उम्र 26 वर्ष), गुरुग्राम में जौब करती हूं और अकेली रहती हूं. बाहर से देखने पर सब ठीक लगता है अच्छी नौकरी, दोस्त, सोशल लाइफ लेकिन अंदर से अकसर खालीपन महसूस होता है. रात को नींद नहीं आती, छोटीछोटी बातों पर रोना आ जाता है. मन में डर रहता है कि कहीं लोग मुझे कमजोर न समझे. क्या यह सिर्फ थकान है या कुछ और? मैं अपने मन की सेहत का खयाल कैसे रखूं?

जो आप महसूस कर रही हैं, वह आज के तेज रफ्तार शहरी जीवन में बहुत आम है और यह कमजोरी नहीं, आप के मन का मदद मांगने का तरीका है. बाहर से सब ठीक दिखना और भीतर से खालीपन महसूस होना इस बात का संकेत हो सकता है कि आप लंबे समय से भावनात्मक थकान, अकेलेपन या दबे हुए तनाव को ढो रही हैं. लगातार नींद न आना, छोटीछोटी बातों पर रोना आना और मन का भारी रहना ये साधारण थकान से आगे के संकेत हो सकते हैं. यह जरूरी नहीं कि यह कोई बड़ी बीमारी हो, लेकिन यह बताता है कि आप की मैंटल हैल्थ को अभी ध्यान और सहारे की जरूरत है.

सब से पहला कदम है अपनी भावना को स्वीकार करना. किसी भरोसेमंद दोस्त या परिवार के सदस्य से बात करें. अगर संभव हो तो किसी काउंसलर या मनोवैज्ञानिक से सलाह लेना भी मददगार होता है. यह उपचार नहीं, आत्मदेखभाल का हिस्सा है. अपने लिए छोटेछोटे मैंटल ब्रेक तय करें. रोज 10 मिनट बिना मोबाइल के खुद से जुड़ना, थोड़ी देर टहलना, डायरी में मन की बात लिखना. मन की सेहत भी उतनी ही अहम है जितनी शरीर की. समय पर ध्यान देने से बड़ी मानसिक परेशानियों से बचा जा सकता है.

संयुक्त परिवार मेें मेरी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं बची.

हमारा संयुक्त परिवार है. घर में सासससुर, देवरजेठ और उन के परिवार साथ रहते हैं. मेरी उम्र 30 साल है और मेरी शादी को 5 साल हो चुके हैं. समस्या यह है कि मेरे और मेरे पति के छोटेछोटे निर्णयों में भी घर के बड़े लोग दखल देने लगते हैं- बच्चों की परवरिश से ले कर खर्च तक में. मैं कुछ कहना चाहूं तो यह कह दिया जाता है कि ‘संयुक्त परिवार में ऐसा ही होता है.’ धीरेधीरे मु?ो लगने लगा है कि मेरी कोई स्वतंत्र पहचान ही नहीं बची.

आप की परेशानी सिर्फ एडजस्टमैंट की नहीं, बल्कि पहचान के धीरेधीरे मिटते जाने की पीड़ा है. संयुक्त परिवार का मतलब यह नहीं होता कि व्यक्ति की सोच, पसंद और निर्णयों का अस्तित्व ही खत्म हो जाए. जब हर छोटे फैसले पर आप की आवाज दबा दी जाती है और उसे परंपरा या व्यवस्था के नाम पर खारिज कर दिया जाता है तो भीतर एक खालीपन और घुटन पैदा होना स्वाभाविक है. यह कहना कि ‘संयुक्त परिवार में ऐसा ही होता है’ अकसर संवाद से बचने का आसान रास्ता बन जाता है, न कि कोई समाधान.

आप यह समझें कि अपनी सीमाएं चाहना, अपने बच्चों की परवरिश को ले कर राय रखना या खर्च पर सवाल उठाना विद्रोह नहीं है. समस्या वहां पैदा होती है जहां सामूहिकता के नाम पर व्यक्तिगत सम्मान और निर्णय की जगह छीन ली जाती है. जरूरी है कि आप अपने पति से शांत और स्पष्ट बातचीत करें, क्योंकि संयुक्त परिवार में पत्नी की आवाज अकसर पति के माध्यम से ही सुनी जाती है. यह लड़ाई किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व के लिए है.

धीरेधीरे बिना टकराव के यह जताना जरूरी है कि आप परिवार का हिस्सा हैं, कोई मेहमान नहीं. आप की पहचान सिर्फ बहू या मां तक सीमित नहीं है. आप एक सोच रखने वाली, निर्णय लेने की क्षमता वाली स्त्री हैं. संयुक्त परिवार तब ही सुखद होता है जब उस में साथ रहने के साथसाथ एकदूसरे की सीमाओं और स्वतंत्रता का भी सम्मान हो.

सेहत को नजरअंदाज करने की आदत कैसे संभालूं? 

मैं एक प्राइवेट कंपनी में काम करता हूं, मेरी उम्र 39 वर्ष है. मेरी दिनचर्या बहुत अनियमित है- सुबह जल्दी औफिस, देररात घर लौटना, बाहर का खाना, चायकौफी पर दिन निकालना. पिछले कुछ महीनों से लगातार थकान रहती है, वजन बढ़ रहा है और सीढि़यां चढ़ने में भी सांस फूलने लगी है. डाक्टर के पास जाने का समय नहीं निकाल पाता और मन में यह सोच कर टाल देता हूं कि अभी उम्र ही क्या है. परिवार वाले चिंता करते हैं, लेकिन मैं गंभीरता नहीं ले पा रहा हूं. क्या यह लापरवाही आगे चल कर बड़ी बीमारी का कारण बन सकती है? मैं अपनी सेहत को कैसे संभालूं?

शरीर अकसर बीमारी से पहले संकेत देता है- लगातार थकान, वजन बढ़ना और सांस फूलना ऐसे ही चेतावनी संकेत हैं. कम उम्र में ही इन लक्षणों को नजरअंदाज करना आगे चल कर मधुमेह, उच्च रक्तचाप या हृदय संबंधी समस्याओं का कारण बन सकता है. सेहत को ‘अभी नहीं, बाद में’ वाली सूची में डालना सब से बड़ा जोखिम है.

आप को पूरी जिंदगी बदलने की जरूरत नहीं, छोटेछोटे बदलाव काफी हैं. हफ्ते में कम से कम 5 दिन 20-30 मिनट तेज चलना शुरू करें. बाहर के खाने की जगह घर का साधारण भोजन अपनाएं और दिन में पानी की मात्रा बढ़ाएं. साल में एक बार बेसिक हैल्थ चैकअप कराना भी जरूरी है, ताकि शुरुआती समस्याएं समय रहते पकड़ी जा सकें. Working Woman Issues:

 

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आपके पत्र – पद की गरिमा का खयाल रखें

Social Story: व्यक्ति जिस प्रवृत्ति का होता है, उस की वह प्रवृत्ति जाती नहीं है. वह हावभाव से अपनी बात कह ही देता है. बात बीजेपी बनाम मोदी समर्थकों की है. सत्तारूढ़ केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके, सत्ताविरोधी राज्य सरकारों में राज्यपाल मनोनीत किए गए हैं. इन का आचरण किसी से छिपा नहीं है.

ये अपना संवैधानिक पद निभाने के बजाय वहां के शासित मुख्यमंत्री की निंदा करते हैं. जाहिर है, ये ऐसा जान कर करते हैं कि जिस से उन राज्य सरकारों का मनोबल तोड़ा जा सके. पश्चिम बंगाल की सीएम और राज्यपाल के विवाद छाए रहते थे. उत्तर प्रदेश में बीजेपी का राज्यपाल है, वहां भाजपा की सरकार होने के नाते वे मुख्यमंत्री से सहयोग करते रहते हैं. ताजा उदाहरण कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु में भाजपा विरोधी राज्य सरकारें हैं.

वहां राज्यपाल बीजेपी माइंड के हैं जो मुख्यमंत्री के कामों में विघ्न डालते हैं. संवैधानिक पद निभाने के बजाय ऐसे व्यक्ति अपनी हनक दिखाने से बाज नहीं आते. आखिरकार, इन्हें पद की गरिमा गिराने का हक किस ने दिया.

सीमा गुप्ता

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एक वजह कि: मोदी क्यों लेते रहते हैं नेहरू का नाम

Congress vs BJP: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मानसून सत्र में लोकसभा में दिए गए अपने भाषण में 14 बार भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जिक्र किया. वे अपने अधिकांश भाषणों में नेहरू का जिक्र कर उन की ‘गलतियां’ गिनाते हैं. लोकसभा में 102 मिनट तक नरेंद्र मोदी कांग्रेस के संदर्भ पर बोलते रहे. इस के केंद्र में जवाहरलाल नेहरू रहे. वैसे, नरेंद्र मोदी ने नेहरू को न तो देखा होगा न ही उन के समयकाल में वे राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों की समझ रखते रहे होंगे.

मई 1964 में जब नेहरू का निधन हुआ, तब नरेंद्र मोदी 14 साल के रहे होंगे. देश में तमाम प्रधानमंत्री इस के बाद हुए, उन में कई कांग्रेसी और कई गैरकांग्रेसी भी थे. भारत में 13 अलगअलग प्रधानमंत्री हुए हैं. इस के बाद भी नरेंद्र मोदी हमेशा जवाहरलाल नेहरू का नाम लेते रहते हैं. देखा जाए तो नरेंद्र मोदी की पहली राजनीतिक लड़ाई इंदिरा गांधी से होनी चाहिए. उन की लगाई इमरजैंसी में उन्हें और सैकड़ों आरएसएस स्वयंसेवकों को गिरफ्तार किया गया था.

इस के पीछे विचारधारा की लड़ाई है. एक लड़ाई जवाहरलाल नेहरू की आधुनिक माहौल में बराबरी के अधिकारों और पौराणिक संदर्भ में औरतों को घर में बंद करने के ऋषियों के स्पष्ट आदेशों के बीच की है. जवाहरलाल नेहरू महिला अधिकारों के पुरजोर समर्थक थे. उन का मानना था कि कानूनों और परंपराओं के कारण महिलाओं का दमन होता है. उन्हें संपत्ति, कानूनी अनुबंध और पारिवारिक कानून में समान अधिकार मिलना चाहिए. हिंदू कोड बिल लाने का उन का उद्देश्य भी यही था.

मोदी को अखरता है नेहरू का धर्मनिरपेक्ष होना

संसदीय चुनावों में महिलाओं के पर्याप्त प्रतिनिधित्व पर भी नेहरू का जोर रहता था. उस समय महिलाएं राजनीतिक रूप से इतनी जागृत नहीं थीं. वे इस बात का समर्थन करते थे कि राजनीति में ज्यादा से ज्यादा महिलाएं आगे आएं. अपने दौर में कई महिलाओं को आगे लाने का काम भी किया था उन्होंने.

देश के पहले चुनाव के नतीजों के बाद

18 मई, 1952 को जवाहरलाल नेहरू ने देश के मुख्यमंत्रियों को लिखा- ‘मु?ो बड़े अफसोस के साथ यह कहना पड़ रहा है कि महिलाएं कितनी कम संख्या में निर्वाचित हुई हैं और मुझे लगता है कि राज्य विधानसभाओं और परिषदों में भी ऐसा ही हुआ होगा. इस का मतलब किसी के प्रति नर्म पक्ष दिखाना या किसी अन्याय की ओर इशारा करना नहीं है, बल्कि यह देश के भविष्य के विकास के लिए अच्छा नहीं है. मेरा दृढ़ विश्वास है कि हमारी वास्तविक प्रगति तभी

होगी जब महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका निभाने का पूरा अवसर मिलेगा.’

पंडित जवाहरलाल नेहरू औरतों के संबंध में धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के थे. उन की पूरी कोशिश थी कि भारत कभी ‘हिंदू राष्ट्र’ न बने. वे हमेशा हिंदुत्ववादी ताकतों से उल?ाते रहते थे. उन्हें हाशिए पर डालने, यहां तक कि उन्हें बहिष्कृत करने की हर संभव कोशिश करते थे. नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या किए जाने ने हिंदू सांप्रदायिकता को हर मोड़ पर चुनौती देने के उन के संकल्प को और मजबूत कर दिया. उस समय आरएसएस के लिए नेहरू सब से बड़े ‘शत्रु’ थे. जिन से वे वैचारिक और राजनीतिक स्तर पर बेहद नफरत करते थे.

1940 से 1973 तक आरएसएस के सरसंघचालक के रूप में अपने लंबे कार्यकाल के दौरान एमएस गोलवलकर नेहरू को अपना प्रमुख विरोधी मानते थे. वे उन्हें एक ऐसा व्यक्ति मानते थे जो हिंदुत्व को लोगों के बीच स्वीकार्यता हासिल करने से रोक रहे थे. उसी विचारधारा में पलेबड़े नरेंद्र मोदी भी इसी कारण से नेहरू विरोध को उभारते रहते हैं. 2014 में वे जब से प्रधानमंत्री बने हैं, लगातार नेहरू का विरोध करने का काम करते हुए उन के कद को छोटा करना चाहते हैं. इस में आरएसएस उन के साथ है. चाहे वह योजना आयोग को भंग करना हो, सिंधु जल संधि को निलंबित करना हो, नेहरू के मुकाबले पटेल या सुभाष चंद्र बोस के कद को बढ़ाना हो, उन का बड़ा उद्देश्य स्पष्ट है. पटेल और बोस ने औरतों के अधिकारों पर कभी बड़ी बात नहीं की है हालांकि वे भी पौराणिकवादियों जैसे कट्टर नहीं थे.

नेहरू की खामियों को उजागर कर के और उन की कई उपलब्धियों को नकार कर उन का कद छोटा करने की कोशिश में नरेंद्र मोदी जबतब अनापशनाप बोलते रहते हैं. मोदी लगातार प्रधानमंत्री बने रहने का नेहरू का रिकौर्ड तोड़ना चाहते हैं. वर्ष 2029 में होने वाला लोकसभा चुनाव उन के लिए बेहद चुनौतीभरा होगा. इसीलिए 11 साल प्रधानमंत्री बने रहने और तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद जब भी लोकसभा में भाषण देने का मौका मिलता है, मोदी जवाहरलाल नेहरू का नाम लेते रहते हैं.

नेहरू ने हिंदू कोड बिल और हिंदू विवाह और उत्तराधिकार कानून में जिस तरह से महिलाओं को अधिकार दिया उस से दक्षिणपंथी लोगों के मन में नेहरू के प्रति नफरत भरी है.

हिंदू कोड बिल की पहली फांस

1951-52 में भारत में पहले आम चुनाव हुए. नेहरू ने हिंदू कोड बिल को अपना मुख्य चुनावी एजेंडा बनाया था. उन का कहना था कि ‘अगर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जीतती है तो वे इसे संसद से पारित कराने में सफल होंगे. कांग्रेस को भारी जीत मिली और नेहरू फिर से प्रधानमंत्री बने और उन्होंने एक ऐसा विधेयक तैयार करने के लिए व्यापक प्रयास शुरू किया जिसे पारित किया जा सके.

नेहरू ने कोड बिल को 4 अलगअलग विधेयकों में विभाजित किया, जिन में हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम और हिंदू दत्तक ग्रहण और भरणपोषण अधिनियम शामिल थे. 1952 और 1956 के बीच प्रत्येक विधेयक को संसद में प्रभावी ढंग से पेश किया गया और उन को पारित भी करा लिया गया.

हिंदू कोड बिल लागू करने में नेहरू का सब से बड़ा उद्देश्य हिंदू महिलाओं को कानूनी हक दिलाने का था. वे कानूनी समानता से हिंदू समुदाय के भीतर के भेदभावों को मिटाना, हिंदू सामाजिक एकता का निर्माण करना और महिलाओं को बराबर का हक दिलवाना चाहते थे. नेहरू यह मानते थे कि चूंकि वे हिंदू थे इसलिए मुसलिम या यहूदी कानून के विपरीत विशेष रूप से हिंदू कानून को संहिताबद्ध करना उन का विशेषाधिकार था.

हिंदू कोड बिल का विरोध

हिंदू कोड बिल पर बहस के दौरान हिंदू आबादी के बड़े हिस्से ने विरोध किया और बिलों के खिलाफ रैलियां कीं. बिलों की हार की पैरवी करने के लिए कई संगठन बनाए गए और हिंदू आबादी में भारी मात्रा में साहित्य वितरित किया गया. इस तरह के मुखर विरोध के सामने नेहरू को हिंदू कोड बिलों के पारित होने को उचित ठहराना पड़ा.

यह स्पष्ट हो गया कि हिंदुओं का विशाल बहुमत बिलों का समर्थन नहीं करता है. इस कानून के समर्थकों में संसद के भीतर और बाहर विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल थे. हिंदूवादियों के दबाव में नेहरू को इस बिल में शास्त्रीय हिंदू सामाजिक व्यवस्था को शामिल करना पड़ा, जिस के तहत यह माना गया कि हिंदू के लिए विवाह एक पवित्र संस्कार है. विवाह कानून में इस को मानना पड़ा.

इस के बाद भी नेहरू ने महिलाओं को संपत्ति का अधिकार देने की बात में कोई बदलाव नहीं किया. 2005 में इस में संशोधन कर के महिलाओं को संपत्ति में समान अधिकार दे दिया गया. नरेंद्र मोदी इस कारण से ही नेहरू और सोनिया गांधी का सब से अधिक विरोध करने का काम करते हैं. संपत्ति में महिलाओं को हक देने का अधिकार नेहरू के कार्यकाल में हुआ और उन को समान अधिकार 2005 में दिया गया. जब डाक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी यूपीए की प्रमुख थीं. विपक्षी उन को सुपर पीएम कहते थे.

नेहरू नहीं, उन की विचारधारा से दिक्कत

दक्षिणापंथी लोगों को यह पता है कि अगर महिलाओं में धर्म के प्रति आस्था खत्म हो गई तो हिंदू राष्ट्र का सपना कभी पूरा नहीं होगा. ऐसे में वे महिलाओं को मानसिक रूप से गुलाम बना कर रखना चाहते हैं. नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने मुसलिम महिलाओं के लिए तो तीन तलाक कानून में सुधार का काम किया लेकिन हिंदू महिलाओं को जल्द तलाक मिल सके, इस पर कानून बनाने का विचार नहीं किया. क्या वे हिंदू महिलाओं को तलाक के लिए कोर्ट में भटकते देखना चाहते हैं.

एक तरफ नेहरू थे जो हिंदू महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ते रहे, दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी हैं जिन के लिए हिंदू महिलाओं से अधिक तीन तलाक कानून बनाने की जल्दी थी. उन को हिंदू महिलाओं के बारे में सोचने का समय नहीं है. विचारधारा का यही संकट दोनों के बीच अंतर को दिखाता है. इसी कारण मोदी लगातार नेहरू और सोनिया गांधी का विरोध करते हैं. राजीव और इंदिरा से उन को खास दिक्कत नहीं होती.

पंडित जवाहरलाल नेहरू वैज्ञानिक सोच के नेता थे जबकि हिंदूवादी नेता धार्मिक सोच रखते थे. इस कारण हिंदूवादी नेता नेहरू को पसंद नहीं करते और लगातार उन का नाम ले कर कोसते रहते हैं. वे दरअसल नेहरू के बहाने कांग्रेस को घेरने की कोशिश करते हैं.

बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जब पूर्व सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘फोर स्टार्स औफ डेस्टिनी’ की चर्चा करनी शुरू की तो उन को बोलने से रोका गया और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे नेहरू पर प्रकाशित किताबों को संसद में पढ़ने लगे. जब भी भाजपा सरकार किसी मुद्दे पर घिरती है वह नेहरू को ढाल बनाने का काम करती है. Congress vs BJP

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